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सदन में चुने गए सांसदों को क्या-क्या सुविधा मिलती है?

आज हम आपको बताएंगे कि सदन में चुने गए सांसदों को क्या-क्या सुविधा मिलती है! हाल ही में लोकसभा के सभी सांसदों का चयन हो चुका है, उनकी शपथ भी ग्रहण करवाई जा चुकी है! इसी बीच यह सवाल उठने लगा कि आखिर नए चुने हुए सांसदों को कौन-कौन सी सुविधाएं और भत्ते दिए जाते हैं? तो आज हम आपको इसी बारे में जानकारी देने वाले हैं!

आपको बता दें कि 18वीं लोकसभा के लोकसभा सत्र का आगाज हो चुका है। सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कैबिनेट मंत्रियों समेत कई नेताओं ने संसद सदस्य के रूप में शपथ ली। लोकसभा की कार्यवाही शुरू होने पर प्रोटेम स्पीकर भर्तृहरि महताब ने उन्हें 18वीं लोकसभा के सदस्य के रूप में शपथ दिलाई। सदन के नेता होने के नाते लोकसभा में सर्वप्रथम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शपथ दिलाई गई। पीएम मोदी के बाद कांग्रेस सांसद कोडिकुन्निल सुरेश का नाम पुकारा गया लेकिन वह सदन में मौजूद नहीं थे। इसके बाद अन्य कई सांसदों ने शपथ ली। शपथ ग्रहण के बाद सांसद लोकसभा के आधिकारिक सदस्य बन गए हैं। इसी के साथ जनप्रतिनिधियों तो आज से सांसद की सरकारी सुविधाएं मिलना शुरू हो जाएंगी। अब ये नेता आम से खास लोगों में गिने जाएंगे। देश में सांसदों को सरकार की तरफ से क्या सुविधाएं मुफ्त में मिलती हैं? आइए बताते हैं। शपथ लेने के साथ ही सांसदों को राजधानी दिल्ली में सरकारी बंगला अलॉट होने का काम भी शुरू हो जाता है। आमतौर पर पुराने सांसदों जो दोबारा या तीसरी बार सदन में आए हैं, उनके आवास नहीं बदलते। इसके साथ ही रिटायर होने के बाद सांसदों को पेंशन भी दी जाती है।बाकी सभी नए सांसदों को नई दिल्ली एरिया में एक सरकारी आवास दिया जाता है। इस बंगले में सभी सुविधाएं जैसे कुक, सिक्योरिटी भी मिलती हैं। सांसदों के आवास में उनका ऑफिस भी होता है, जहां वे अपने सरकारी कामों का निपटारा करते हैं। अपने सरकारी बंगले में सांसद परिवार के साथ रह सकते हैं।

सांसदों की शपथ के साथ ही उनका कार्यकाल शुरू हो जाता है और हर महीने वेतन मिलता है। जानकारी के अनुसार सांसदों को एक लाख रुपये महीना वेतन मिलता है। इसके अलावा आवास पर मीटिंग के लिए 2000 रुपये दिन के हिसाब से अतिरिक्त अलाउंस के रूप में मिलते हैं। आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, सांसदों को 20 हजार रुपये भत्ता, 4000 रुपये लेखन सामग्री के लिए, 2000 रुपये पत्रों के लिए। कुल मिलाकर सांसद को सैलरी में 1 लाख रुपये, निर्वाचन क्षेत्र के लिए करीब 70 हजार भत्ता, कार्यालय खर्च के लिए करीब 60 हजार रुपये और दैनिक भत्ता मिलता है। इसके साथ ही रिटायर होने के बाद सांसदों को पेंशन भी दी जाती है।

सांसदों को देश भर में हवाई, रेल और सड़क यात्रा के लिए मुफ्त यात्रा पास दिए जाते हैं। यह पास उन्हें सरकारी और निजी कामों के लिए यात्रा में सहायता करते हैं। इसके अलावा सांसदों को सड़क यात्रा के दौरान टोल प्लाजा पर टोल फ्री यात्रा की सुविधा दी जाती है। टोल में छूट के लिए हर सांसद को दो फास्टैग दिए जाते हैं। दिल्ली में सरकारी कामकाज के लिए सांसदों को वाहन सुविधा दी जाती है। यह सुविधा उन्हें स्थानीय यात्रा में सहायता करती । सांसदों को मुफ्त टेलीफोन और इंटरनेट की सुविधा दी जाती है। यह सुविधा उन्हें अपने क्षेत्र और देश भर में संचार बनाए रखने में मदद करती है।

सांसदों और उनके परिवार के सदस्यों को सरकारी अस्पतालों में मुफ्त चिकित्सा सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। यह सुविधा एम्स और सफदरजंग अस्पताल जैसे प्रतिष्ठित सरकारी अस्पतालों में भी उपलब्ध है। अगर सांसद को किसी प्राइवेट अस्पताल में रेफर किया जाता है, तो भी इलाज का पूरा खर्च सरकार वहन करती है। यही नहीं आपको बता दें कि एक सांसद को एक पास भी दिया जाता है, जिसकी मदद से वह किसी भी समय रेलवे से मुफ्त में यात्रा कर सकता है. ये पास किसी भी ट्रेन की फर्स्ट क्लास एसी या एग्जिक्यूटिव क्लास में मान्य होता है. वहीं सरकारी काम के सिलसिले में विदेश यात्रा करने पर भी सांसद को सरकारी भत्ता दिया जाता है. इसके अलावा हर सांसद को मेडिकल फैसिलटी भी मिलती है. सांसद किसी भी सरकारी या रेफर कराने के बाद किसी प्राइवेट अस्पताल में अगर इलाज, ऑपरेशन कराता है, तो उस इलाज का पूरा खर्च सरकार वहन करती है. इसके अलावा सांसद को सरकारी खर्च पर सुरक्षाकर्मी और केयर-टेकर भी मिलते हैं. 

आखिर क्या है तीन नए कानून ,जो भारत के इतिहास को बदल देंगे?

आज हम आपको भारत के तीन नए कानून के बारे में बताने जा रहे हैं! 1 जुलाई 2024 से भारतीय कानून में परिवर्तन हो चुका है! दरअसल, ब्रिटिश काल के कानून आईपीसी, सीआरपीसी और इंडियन एविडेंस एक्ट को बदलकर अब नए तीन कानून बना दिए गए हैं! आज हम आपको इन तीनों नए कानून के बारे में जानकारी देंगे!

आपको बता दें कि लोकसभा ने 20 दिसंबर 2023 को तीन संशोधित आपराधिक कानून विधेयक पारित किए। जो भारतीय न्याय संहिता 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 और भारतीय साक्ष्य विधेयक 2023 हैं। दरअसल, इन तीनों नए कानून को आईपीसी, सीआरपीसी और इंडियन एविडेंस एक्ट के स्थान पर लाया गया है! आइए अब आपको तीनों कानून के बारे में संक्षिप्त में जानकारी देते हैं! बता दें कि भारतीय न्याय संहिता 2023, भारतीय दंड संहिता IPC 1860 का स्थान लेगी। ये देश में क्रिमिनल ऑफेंस पर प्रमुख लॉ है। नए विधेयक में सामुदायिक सेवा को सजा के रूप में परिभाषित किया गया है। इसके अंतर्गत पहले की 511 धाराओं के बजाय अब 358 धाराएं होंगी। इसमें 21 नए अपराध जोड़े गए हैं और 41 अपराधों में सजा के टाइम को बढ़ा दिया गया है। वहीं अगर बात भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की की जाए तो, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023, आपराधिक प्रक्रिया संहिता 1973 CrPC की जगह लेगी। CrPC अरेस्ट, प्रॉसीक्यूशन और बेल के लिए है। इसके अंतर्गत नागरिक सुरक्षा संहिता में 531 धाराएं होंगी, जबकि पहले केवल 484 धाराएं थीं। नए विधेयक में 177 धाराओं में बदलाव किए गए हैं और 9 नई धाराएं जोड़ी गई हैं और 14 धाराओं को निरस्त कर दिया गया है।

अब बात भारतीय साक्ष्य संहिता 2023 की! तो आपकी जानकारी के लिए बता दे कि यह विधेयक भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 का स्थान लेगा। यह अधिनियम इंडियन कोर्ट्स में एविडेंस की ऐडमिसिबिलिटी पर आधारित है। यह सभी नागरिक और आपराधिक कार्यों पर लागू होता है। इन कानूनों में FIR से लेकर केस डायरी, आरोप पत्र, और पूरी प्रक्रिया को डिजिटल बनाने का प्रावधान किया गया है। इसके अंतर्गत पहले की 167 धाराओं के बजाय अब 170 धाराएं होंगी। 24 धाराओं में बदलाव किये गये हैं। बता दें कि लोकसभा में वॉईस वोट से विधेयकों को पारित किया गया। इसका उद्देश्य ब्रिटिश काल के कानूनों को बदलना है। नया कानून मौजूदा आपराधिक न्याय प्रणाली में बड़ा बदलाव लाएगा। वर्तमान कानूनों में केवल दंडात्मक कार्रवाई के प्रावधान हैं लेकिन नए कानून मानवीय दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए तैयार किए गए हैं। इसमें महिलाओं और बच्चों को प्राथमिकता दी गई है।

इन प्रस्तावित कानूनों ने राजद्रोह को अपराध के रूप में खत्म कर दिया और “राज्य के खिलाफ अपराध” नामक एक नई धारा पेश की। इनमें पहली बार, आतंकवाद को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। इसमें मॉब लिंचिंग के लिए भी मौत की सजा दी गई है। नाबालिग से दुष्कर्म में फांसी की सजा का प्रावधान है। ट्रायल अदालतों को FIR दर्ज होने के तीन साल में हर हाल में सजा सुनानी होगी। अपराध कर विदेश भाग जाने वाले या कोर्ट में पेश न होने वालों के खिलाफ उसकी अनुपस्थिति में सुनवाई होगी। सजा भी सुनाई जा सकेगी। यही नहीं भारतीय न्याय संहिता की धारा-106 (1) और (2) के प्रावधान को जानते हैं कि आखिर क्या कहता है प्रावधान। धारा-106 (1) के तहत कहा गया है कि अगर कोई लापरवाही से गाड़ी चलाता है तो होने वाली मौत का मामला गैर इरादतन अपराध की श्रेणी में होगा और दोषी पाए जाने पर पांच साल तक कैद की सजा हो सकती है। वहीं अगर कोई रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिक्शनर द्वारा लापरवाही से किसी मरीज की मौत हो तो उस मामले में उसे अधिकतम दो साल कैद की सजा हो सकती है। मौजूदा आईपीसी की धारा-304 ए में प्रावधान है कि लापरवाही से मौत के मामले में ड्राइवर को अधिकतम दो साल कैद की सजा हो सकती है। नई कानून में कुछ महत्वपूर्ण धाराओं में भी परिवर्तन किया गया है इनमें धोखाधड़ी के मामले में 420 धारा की जगह अब 318 धारा का प्रयोग किया जाएगा! साथ ही साथ धारा 144 की जगह 187 से 189 ,रेप में 375 D की जगह 63 तथा हत्या के मामले में 302 की जगह 101 धारा का हवाला दिया जाएगा!

वहीं भारतीय न्याय संहिता की धारा-106 (2) में प्रावधान है कि अगर लापरवाही से मौत के बाद ड्राइवर मौके से भाग जाता है और वह बिना पुलिस व मैजिस्ट्रेट को बताए मौके से फरार होता है तो दोषी पाए जाने पर उसे 10 साल तक कैद और जुर्माने की सजा होगी।हिट एंड रन मामले से जुड़े प्रावधान का सड़क पर हुआ था भारी विरोध

एक ऐसी जनजाति जो अपने मां-बाप को ही खा जाती है!

आज हम आपको एक ऐसी नरभक्षी जनजाति के बारे में बताने जा रहे हैं जो अपने ही मां-बाप को खा जाती है! आपने कई नरभक्षी जनजातियों के बारे में तो जरुर सुना होगा! जो इंसानों को मार कर खा जाते हैं, लेकिन क्या आपने किसी एक ऐसी जनजाति के बारे में सुना है जो अपने ही मां-बाप और उन प्रिय जनों को खा जाते हैं जो उनसे सबसे ज्यादा प्यार करते हैं! जी हां, आज हम आपको इसी नरभक्षी जनजाति के बारे में जानकारी देने वाले हैं!

आपको बता दें कि जनजातियों के रिवाज़ आम लोगों से बिल्कुल अलग होते हैं. खासतौर पर अफ्रीकी जनजातियों की बात करें तो इनके रस्म-रिवाज़ सुनकर ही लोग दंग रह जाते हैं. पापुआ न्यू गुएना में पाई जाने वाली ऐसी ही एक जनजाति में अलग ही किस्म की परंपरा है. यहां लोग उन्हीं लोगों को खा जाते थे, जिन्हें वे बेइंतहां प्यार करते थे. आपने शायद ही सुना हो कि कोई अपने ही परिवार के लोगों को खा जाए. हालांकि हम आपको आज जिस जनजाति के बारे में बताने जा रहे हैं, वो अपने माता-पिता को भी नहीं छोड़ते और उन्हें खा जाते थे. डेली स्टार की रिपोर्ट के मुताबिक फोर नाम की जनजाति के लोग अपनों के अंतिम संस्कार के तौर उन्हें पूरा का पूरा खा जाते थे, सिर्फ शरीर का एक हिस्सा छोड़कर, जो बेहद कड़वा होता है. पापुआ न्यू गुएना के ओकापा ज़िले में फोर नाम की जनजाति के लोग रहते हैं. 1960 के दशक तक इनके कबीले में ऐसी परंपरा थी कि वे लोग परिजनों की मौत के बाद उन्हें जलाने या दफनाने के बजाय खा जाते थे. उनके मुताबिक ये कोई घिनौना काम नहीं था बल्कि उनका कहना था कि कीड़े-मकोड़े उन्हें खाएं, इससे बेहतर वे ही उन्हें खा लेते थे. अगर कोई अपनी मौत के बाद ऐसा नहीं चाहता है, तो वो जीतेजी बता सकता था. हालांकि ज्यादातर लोग अपनी मौत के बाद अपने परिवार के द्वारा खाए जाने को अपना सम्मान मानते थे.

लिंडेनबॉम नाम के एक ऑस्ट्रेलियन ने बताया कि फोर लोग मरे हुए शख्स की पूरी बॉडी खा जाते हैं, लेकिन एक हिस्से को छोड़ देते हैं. इसकी वजह ये है कि ये हिस्सा काफी कड़वा होता है. शरीर के अंदर मौजूद पित्त की थैली या गॉलब्लैडर इतना कड़वा होता है कि नरभक्षी जनजाति के लोग भी इसे छोड़ देते हैं. हां, महिलाओं की मौत के बाद उन्हें सिर्फ घर की महिलाएं ही खा सकती हैं. लिंडेनबॉम अध्ययन के दौरान 1960-70 के दशक में उनके साथ रहीं और उन्होंने काफी हद तक लोगों को इस परंपरा से दूर करने में सफलता भी पाई. बता दे कि 1950 के दौर में मानव विज्ञानी शर्ले लिंडेनबॉम ने खोज कर ली कि जनजाति के लोगों की ये परंपरा दरअसल एक मानसिक बीमारी है, जिसे कुरु (Kuru) कहते हैं. उन्होंने डेली स्टार को बताया कि जब उनसे पूछा गया कि आप लोग शरीर के साथ ऐसा क्यों करते हैं? बता दे कि ब्रिटेन और पापुआ न्यू गिनी में फोर जनजाति मिलती है। वैज्ञानिकों ने इन जनजाति के लोगों पर शोध किया है, जिसमें हैरान करने वाला खुलासा हुआ है। इस जनजाति के खाने में मृत रिश्तेदारों का दिमाग भी शामिल था। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, 1960 के दशक तक इस जनजाति के कबीले में परंपरा थी कि वह लोग परिजनों की मौत के बाद उन्हें जलाने या दफनाने की जगह खा जाते थे।  फोर जनजाति में किसी शख्स का अंतिम संस्कार होता था, तो वहां दावत का आयोजन किया जाता था। इन आयोजनों में लोग अपने मरने वाले रिश्तेदारों का मांस खाते थे, तो वहीं महिलाएं उनका दिमाग खाती थीं। जनजाति के लोग अपने प्रिय लोगों के सम्मान के तौर पर इस प्रथा का पालन करते थे। यह जनजाति मानती थी कि अगर शरीर को दफनाया जाता है या कहीं पर रखने से कीड़े खाते हैं। इससे अच्छा है कि मृतक से प्यार करने वाले लोग शरीर को खा जाएं। महिलाएं मृत व्यक्ति के शरीर से दिमाग को निकालती थीं और बांस में भरकर पकाती थीं। पित्ताशय को छोड़कर शरीर के सभी मांस को भूनकर खा जाते थे। उन्होंने जवाब दिया – हमने उन्हें खा लिया. कुरु एक लाइलाज न्यूरोलॉजिकल कंडीशन है, जो नर्वस सिस्टम को लगभग बंद कर देती है. माना जाता है कि ये किसी इंफेक्शन के शिकार व्यक्ति के मस्तिष्क को खाने के वजह से आई होगी, जो दूसरों में भी मफैलती गई और परंपरा बन गई! 

जब युद्ध क्षेत्र में दागे गए ढाई लाख गोले!

एक ऐसा युद्ध क्षेत्र जिसमें ढाई लाख गोले एक बार में दागे गए! 1999 में कारगिल जंग पाकिस्तान ने भारत की पीठ में छुरा भोंका था। एक तरफ तो शांति की बात, दूसरी ओर युद्ध छेड़ना। इस युद्ध को जीतने के लिए भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय चलाया था। वहीं, पाकिस्तान ने कारगिल युद्ध के लिए ऑपरेशन कोपाइमा चलाया था। इस ऑपरेशन का यह नाम उर्दू में पड़ा था। कोपाइमा का मतलब होता है-वो इंसान जो पहाड़ियां चढ़ सकता है। इस युद्ध के पीछे इंटेलीजेंस फेलियर भी था। एक्सपर्ट से जानेंगे कि कारगिल की जंग जीतने के लिए भारतीय सेना ने किस तरह की रणनीति अपनाई थी। यह कितनी कारगर रही थी। उस चक्रव्यूह के बारे में भी जानेंगे जिसके जाल में फंसकर पाकिस्तानी सेना को बुरी हार देखनी पड़ी थी। डिफेंस एंड स्ट्रैटेजिक एनालिस्ट लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जेएस सोढ़ी के अनुसार, कारगिल पर कब्जा करने की पाकिस्तान की कार्रवाई जनवरी, 1999 से शुरू हुई थी, मगर भारत का इसका पता चला मई, 1999 के आखिर में। तब भारत ने ऑपरेशन विजय चलाया था। जनवरी से मई तक 6 महीने तक सेना को यह नहीं पता चला कि पाकिस्तानी फौजी हमारे बनाए हुए हमारे पहाड़ों पर बने मोर्चों पर वो तैनात हो गए हैं। यह एक बड़ी चूक थी।

भारतीय सेना को जैसे ही यह जानकारी पता चली कि पाकिस्तानी फौजियों ने हमारी कुछ चौकियों पर कब्जा कर लिया तो भारत ने इसे पूर्ण रूप से युद्ध मानते हुए पाकिस्तानियों को अपने मोर्चे से खदेड़ने की रणनीति अपनाई। अपने हर मोर्चे और कब्जे वाली हर इंच जमीन से पाक फौजियों को भगाने के लिए मल्टी प्रोन अटैक की स्ट्रैटजी अपनाई। भारत की जीत की शुरुआत टाइगर हिल्स पर दोबारा कब्जे के साथ हुई थी, जो 4 जुलाई, 1999 को पाकिस्तानी फौजियों को हराने के साथ संपन्न हुई थी। डिफेंस एक्सपर्ट सोढ़ी के मुताबिक, भारतीय सेना आमतौर पर किसी भी लड़ाई के लिए अटैकर टू डिफेंडर रेश्यो 3:1 अपनाती है। इसका मतलब यह होता है कि दुश्मन के 1 फौजी के मुकाबले भारतीय सेना के 3 जवान तैनात किए जाते हैं। यह रणनीति पहाड़ों में बदल जाती है। किसी भी सैन्य ऑपरेशन में सबसे ज्यादा अहम इंटेलीजेंस होता है। इसी से यह पता चलता है कि दुश्मन के कितने सैनिक कहां बैठे हैं, उनके पास क्या और किस तरह के हथियार हैं? जहां हमला करना है, उसमें दुश्मन की जवाबी कार्रवाई क्या हो सकती है।पहाड़ों में अटैकर टू डिफेंडर का अनुपात 9:1 होता है। इसका मतलब यह है कि पहाड़ों की लड़ाई में दुश्मन के 1 फौजी के मुकाबले भारत के 9 जवान तैनात किए जाते हैं। कारगिल में भी यही रणनीति अपनाई गई थी।

पाकिस्तान ने कारगिल में 15-16 हजार की फीट पर हमारे कई मोर्चों पर कब्जा कर लिया था। जवाब में भारतीय सेना के जवानों ने मुश्किल इलाकों से होते हुए पाकिस्तानी फौजों पर हमला बोला था। इस स्ट्रैटेजी से पाकिस्तानी पस्त हो गए थे। भारत ने कारगिल के हर इंच को छुड़ा लिया था। भारतीय सेना ने बड़ी-बड़ी तोपों से टार्गेट को पहले सॉफ्ट कर दिया था। सेना की भाषा में सॉफ्ट करने का मतलब है दुश्मन के ठिकानों को तहस-नहस कर देना। भारतीय सेना ने वायुसेना का भी इस्तेमाल किया था, जिससे यह जंग जीतना और आसान हो गया।

कारगिल युद्ध में बड़ी संख्या में रॉकेट और बमों का इस्तेमाल किया गया। इस दौरान करीब 2.5 लाख गोले दागे गए। वहीं 5,000 बम फायर करने के लिए 300 से ज्यादा मोर्टार, तोपों और रॉकेटों का इस्तेमाल किया गया। युद्ध के 17 दिनों में हर रोज प्रति मिनट में एक राउंड फायर किया गया। यह ऐसा युद्ध था जिसमें दुश्मन देश की सेना पर इतने बड़े पैमाने पर बमबारी की गई थी। इंटेलीजेंस का बेहद अहम रोल होता है। किसी भी सैन्य ऑपरेशन में सबसे ज्यादा अहम इंटेलीजेंस होता है। इसी से यह पता चलता है कि दुश्मन के कितने सैनिक कहां बैठे हैं, उनके पास क्या और किस तरह के हथियार हैं? जहां हमला करना है, उसमें दुश्मन की जवाबी कार्रवाई क्या हो सकती है।

डिफेंस एक्सपर्ट सोढ़ी के अनुसार, इंटेलीजेंस कई तरह से जुटाई जाती हैं। जैसे इंसानों के जरिए कुछ इन्फॉर्मेशन जुटाई जाती हैं। कारगिल युद्ध में लकड़हारों और चरवाहों ने पाकिस्तानी फौजियों के बारे में जरूरी इनपुट दिए थे। इसके अलावा, सैटेलाइट इमेज से भी जानकारी जुटाई जाती है। खुफिया जानकारी जुटाने वाले हेलीकॉप्टर्स से भी जरूरी जानकारी जुटाई जाती है। इन सभी जानकारियों को एकसाथ रखकर उसका एनालिसिस करते हैं। इसके बाद ही काम की जानकारी को फोकस में रखते हुए दुश्मन के खिलाफ किसी ऑपरेशन को अंजाम दिया जाता है।

जब रूस ने भेजी पहली महिला अंतरिक्ष यात्री!

हाल ही में रूस ने पहली महिला अंतरिक्ष यात्री को स्पेस में भेजा है! यह 1950 के दशक के आखिर का दौर था, जब सोवियत रूस के साथ अमेरिका शीत युद्ध की तरफ बढ़ रहा था। ब्रिटेन का सूरज अस्त होने के बाद दुनिया में अगली महाशक्ति कौन होगी, इस बात को लेकर अमेरिका और रूस में होड़ मची थी। हथियारों, परमाणु बमों और तकनीक के साथ-साथ एक होड़ चल रही थी अंतरिक्ष पर अपना कब्जा जमाने की। अमेरिका तेजी से अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को बढ़ा रहा था तो रूस भी हर रोज अंतरिक्ष को लेकर अपने नए मिशनों से चर्चा में आ जाता। इसी दौर में स्पेस मिशन के लिए महिलाओं को भेजे जाने की भी बात शुरू हुई, मगर तब का अमेरिका इतना दकियानूस था कि उसे यह विचार अच्छा ही नहीं लगा कि महिलाओं को अंतरिक्ष में भेजा जाए। आज भारतीय मूल की अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स और बुच विलमोर बीते तीन हफ्ते से अंतरिक्ष में फंसे हुए हैं और वो दोनों धरती पर सकुशल लौट पाएंगे या नहीं, ये सवाल सबके जेहन में है। एक जमाना था जब अमेरिका महिलाओं को स्पेस में भेजने के खिलाफ था। उस वक्त अमेरिका में यह कहा जाता था कि औरतों के मुकाबले आदमी स्पेस मिशन के लिए ज्यादा फिट हैं। 1950 के दशक में कुछ महिलाओं ने अंतरिक्ष में जाने के लिए कई तरह का टेस्ट पास कर लिया था, मगर उनके स्वास्थ्य के डेटा को नजरअंदाज कर दिया गया। यह अजीबोगरीब तर्क दिया गया कि महिलाओं की शारीरिक क्षमता एक तो कम होती है और दूसरा उनके शरीर की बनावट अंतरिक्ष में जाने के लिहाज से सही नहीं है।

1959 में नासा के चयनकर्ता डॉ. विलियम रैंडोल्फ लवलेस ने मिशन मर्करी के लिए पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं का परीक्षण करने का फैसला किया। 1960 में डॉ. लवलेस ने बताया कि महिला पायलट जेरी कॉब ने अंतरिक्ष यात्री योग्यता टेस्ट पास कर लिया है। उन्होंने यह भी कहा कि महिला अंतरिक्ष पायलटों में अपने सहयोगी पुरुषों के मुकाबले बेहतर हैं।उस वक्त कॉब के अलावा 12 और महिलाओं ने पुरुषों की तरह ही 87 फिजिकल टेस्ट पास किए। महिलाओं का डेटा जानबूझकर दबा दिया गया। यह समस्या पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में कम होती है। अंतरिक्ष मिशन के लिए किसी भी अंतरिक्ष यात्री का शरीर और दिमाग विशिष्ट रूप से अनुकूल होना चाहिए।बाद में इन महिलाओं को स्पेस प्रोग्राम के तहत उड़ान भरने का मौका नहीं मिल पाया और प्रोजेक्ट ही बंद कर दिया गया। 1962 में नागरिक अधिकार अधिनियम पारित हुआ। इसने महिला अंतरिक्ष यात्रियों को स्पेस में जाने में आ रही बंदिशें हटाईं, मगर तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी की मंशा थी कि चांद पर एक आदमी जाए। ऐसे में अंतरिक्ष में जाने के लिए तवज्जो पुरुषों को ही मिली। करीब 20 साल बाद 1983 में सैली राइड बाहरी अंतरिक्ष में जाने वाली पहली अमेरिकी महिला बन पाईं।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व वैज्ञानिक विनोद कुमार श्रीवास्तव के अनुसार, किसी भी स्पेस मिशन के लिए महिलाओं की बॉडी पुरुषों के मुकाबले ज्यादा फिट होती है। पुरुषों को अपना वजन बरकरार रखने के लिए हर दिन महिलाओं के मुकाबले करीब 25 फीसदी कैलोरी ज्यादा की जरूरत होती है। वहीं, अंतरिक्ष में जीरो ग्रैविटी से पुरुषों की आंखों पर ज्यादा असर पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर साल भर रहने वाली स्कॉट केली कहती हैं कि अंतरिक्ष में आंखों से खूब पानी आता है, जिससे रेटिना मोटा हो जाता है। यह समस्या पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में कम होती है। अंतरिक्ष मिशन के लिए किसी भी अंतरिक्ष यात्री का शरीर और दिमाग विशिष्ट रूप से अनुकूल होना चाहिए।

रूस की वैलेंटीना तेरेश्कोवा पहली और सबसे युवा अंतरिक्ष यात्री थीं, जो 16 जून, 1963 को अंतरिक्ष गईं। उनका चुनाव 400 आवेदन में से किया गया था। आप शायद यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि जहां अमेरिका के पुरुषवादी सोच वाले वैज्ञानिक इस घमंड में फूले रहते थे कि अंतरिक्ष की यात्रा सिर्फ आदमी ही कर सकते हैं, वहीं, रूस ने अमेरिका से आगे निकलने की होड़ और जलन में पहली बार अंतरिक्ष में किसी महिला को भेज दिया। वो इस बात का तमगा लेना चाहता था कि उसने अंतरिक्ष में किसी महिला को भेजकर अमेरिका से महान बन गया। वैलेंटीना ने पृथ्वी के 48 बार चक्कर लगाए। कनाडा की रॉबर्टा बॉन्डर पहली कनाडाई महिला थीं, जो अंतरिक्ष में गईं। इसके बाद से कई महिला वैज्ञानिक अंतरिक्ष का चक्कर लगा चुकी हैं, जिनमें 1997 में भारतीय मूल की कल्पना चावला का नाम भी शामिल है।

नए भारतीय कानून के बारे में क्या बोले गृहमंत्री?

हाल ही में गृहमंत्री ने नए भारतीय कानून के बारे में एक बयान दिया है! देश भर में 1 जुलाई से तीनों नए कानून लागू हो गए। नए क्रिमिनल सिस्टम के तहत 15 अगस्त तक तमाम केंद्र शासित प्रदेशों में काम होने लगेगा। बाकी राज्यों में भी तकनीकी स्तर पर काम तेजी से हो रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बताया कि देश के आजाद होने के 77 साल बाद भारत की न्याय प्रणाली पूरी तरह से स्वदेशी हो गई है। उन्होंने तीनों नए कानूनों को दंड की जगह न्याय देने वाला बताया। उन्होंने कहा कि कानून बनाने से पहले इसके हर पहलू पर चार साल तक विस्तार से अलग-अलग स्टेकहोल्डर्स के साथ चर्चा की गई। आजादी के बाद से अब तक किसी भी कानून पर इतनी लंबी चर्चा पहले कभी नहीं हुई। नए कानूनों में पहली प्राथमिकता महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों को दी गई है। इन कानूनों में ऐसा प्रावधान किया गया है कि अगले 50 साल में भी आने वाली तकनीक भी इसमें समाहित हो सकें। गृह मंत्री ने कहा कि देश के अलग-अलग राज्यों में बोली जाने वाली विभिन्न भाषाओं को देखते हुए तीनों कानून देश की 8वीं अनुसूची की सभी भाषाओं में उपलब्ध होंगे। बता दें कि गृह सचिव ने देश के सभी आईपीएस और जिला अधिकारियों से इस संबंध में सुझाव मांगे। पहले कानूनों में केवल पुलिस के अधिकारों की रक्षा की गई थी, लेकिन नए कानूनों में अब पीड़ितों और शिकायतकर्ता के अधिकारों की भी रखा करने का प्रावधान रखा गया है।शाह ने बताया कि उन्होंने खुद 158 बार इन कानूनों की समीक्षा बैठक की। इसके बाद गृह मंत्रालय की समिति के पास इन्हें भेजा गया। फिर ढाई से तीन महीने तक इन पर गहन चर्चा के बाद कुछ राजनीतिक सुझावों को छोड़ते हुए 93 बदलावों के साथ इन बिलों को फिर से कैबिनेट ने पारित किया। केस भी उन्हीं भाषाओं में चलेंगे। इसमें केवल हिंदी या अंग्रेजी भाषा नहीं रखी गई है। नए कानूनों में आज के समय के हिसाब से धाराएं जोड़ी गई हैं। नए कानूनों में अंग्रेजों के राजद्रोह कानून को जड़ से समाप्त कर दिया गया है। कुछ लोग ऐसा भ्रम फैला रहे हैं कि नए कानूनों में रिमांड का समय बढ़ा दिया गया है। यह सच नहीं है। नए कानूनों के तहत भी रिमांड का समय पहले की तरह ही 15 दिन का है।

नए कानूनों में सात साल या इससे अधिक की सजा वाले अपराधों में फरेंसिक जांच अनिवार्य की गई है। नए कानूनों पर करीब 22.5 लाख पुलिसकर्मियों की ट्रेनिंग के लिए 12 हजार मास्टर ट्रेनर तैयार किए जा चुके हैं। कई इंस्टिट्यूशंस को इसके लिए अधिकृत किया गया है। 23 हजार से अधिक मास्टर ट्रेनर्स को भी ट्रेंड किया जा चुका है। पहले कानूनों में केवल पुलिस के अधिकारों की रक्षा की गई थी, लेकिन नए कानूनों में अब पीड़ितों और शिकायतकर्ता के अधिकारों की भी रखा करने का प्रावधान रखा गया है।

उन्होंने कहा कि मॉब लिंचिंग के अपराध के लिए पहले के कानून में कोई प्रावधान नहीं था। अब इन कानूनों में पहली बार मॉब लिंचिंग को परिभाषित किया गया। उन्होंने कहा कि देशभर के 99.9 फीसदी पुलिस थाने कंप्यूटराइज हो चुके हैं। ई-रिकॉर्ड जनरेट करने की प्रक्रिया भी 2019 से शुरू कर दी गई थी। जीरो एफआईआर, ई-एफआईआर और चार्जशीट सभी डिजिटल होंगे। नए कानूनों में सात साल या इससे अधिक की सजा वाले अपराधों में फरेंसिक जांच अनिवार्य होगी। न्यायपालिका में भी 21 हजार सब-ऑर्डिनेट न्यायपालिका की ट्रेनिंग हो चुकी है। 20 हजार पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को ट्रेंड किया गया है। इन कानूनों पर लोकसभा में 9 घंटे 29 मिनट चर्चा हुई। जिसमें 34 सदस्यों ने हिस्सा लिया।

राज्यसभा में 6 घंटे 17 मिनट चर्चा हुई और 40 सदस्यों ने इसमें हिस्सा लिया। उन्होंने कहा कि एक ऐसा झूठ फैलाया जा रहा है कि संसद सदस्यों को बाहर निकालने के बाद यह कानून पारित किए गए। यह गलत है। उन्होंने बताया कि 2020 में सभी सांसदों, मुख्यमंत्रियों, सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट के न्यायाधीशों को पत्र लिखकर उनसे सुझाव मांगे गए। गृह सचिव ने देश के सभी आईपीएस और जिला अधिकारियों से इस संबंध में सुझाव मांगे। शाह ने बताया कि उन्होंने खुद 158 बार इन कानूनों की समीक्षा बैठक की। इसके बाद गृह मंत्रालय की समिति के पास इन्हें भेजा गया। फिर ढाई से तीन महीने तक इन पर गहन चर्चा के बाद कुछ राजनीतिक सुझावों को छोड़ते हुए 93 बदलावों के साथ इन बिलों को फिर से कैबिनेट ने पारित किया।

आखिर क्या है उत्तर प्रदेश में बीजेपी की हार का कारण?

आज हम आपको बताएंगे कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी की हार का कारण क्या है! उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की हार का कारण सामने आया है। भाजपा की समीक्षा रिपोर्ट सामने आई है। इसमें साफ हुआ है कि प्रदेश के सभी क्षेत्रों में भाजपा के वोट घटे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, तमाम इलाकों में सीटों का नुकसान पार्टी को झेलना पड़ा। पार्टी के मजबूत इलाके अवध, काशी, गोरखपुर क्षेत्र में भी पार्टी की सीटें घटी। भाजपा की समीक्षा रिपोर्ट में कई अहम बातें सामने आई हैं। पार्टी ने समीक्षा का बिंदू यूपी में बीजेपी क्यों हारी रखा। सूत्रों के हवाले से आई समीक्षा रिपोर्ट में माना गया है कि भाजपा के लिए संविधान संशोधन वाले बयान भारी पड़े। पार्टी की ओर से यूपी की 78 सीटों पर करीब 40 टीमों ने समीक्षा की। अपनी रणनीति को बेहतर किया। समीक्षा में कहा गया है कि टिकट वितरण में जल्दबाजी की गई और यह भी हार का कारण बनी। 15 पेज की रिपोर्ट में गिनाए गए कारणों में समर्थकों के नाम मतदाता सूची से हटाने को भी कारण माना गया है।करीब 40 हजार कार्यकर्ताओं से बात की गई। इसमें माना गया है कि पिछड़ी जातियां भाजपा से अलग हुई। हार की समीक्षा की 15 पेज की रिपोर्ट में 12 कारण गिनाए गए हैं। अब इस समीक्षा रिपोर्ट पर राष्ट्रीय स्तर पर बैठक में चर्चा होगी। यूपी में लोकसभा चुनाव परिणाम ने साफ कि योगी-मोदी इफेक्ट प्रदेश में कम हुआ है। समीक्षा बैठक में साफ किया गया कि ‘बीजेपी आरक्षण हटा देगी’, यह नैरेटिव बना। विपक्षी दल इस नैरेटिव को जनता के बीच स्थापित करने में कामयाब हो गए। रिपोर्ट में कहा गया है कि गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव एससी वोट समाजवादी पार्टी को गए। लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा करीब 50 फीसदी वोट शेयर तक पहुंच गई थी। इस चुनाव में पार्टी को करीब 8 फीसदी वोट शेयर में गिरावट झेलनी पड़ी।

बीजेपी की समीक्षा रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक का मुद्दा काफी चर्चा में रहा। इस मुद्दे ने भाजपा को लोकसभा चुनाव में काफी नुकसान पहुंचाया। युवाओं के साथ-साथ उनके परिजनों के वोट भी बीजेपी से दूर हुए। वहीं, समीक्षा रिपोर्ट में सामने आया है कि यूपी में सरकारी अधिकारियों से कार्यकर्ताओं की नाराजगी काफी ज्यादा थी। अधिकारियों की मनमानी के कारण यूपी में कार्यकर्ता चुनाव के समय में उदासीन हो गए। समीक्षा में यह भी कहा गया है कि सरकारी स्तर पर बीजेपी कार्यकर्ताओं की अनदेखी की गई। इस कारण मोटिवेटेड कार्यकर्ता भी पार्टी से दूर हो गए। समीक्षा में यह भी कहा गया कि सरकारी विभागों में कॉन्ट्रैक्ट से भर्ती और आउटसोर्सिंग की गई। इससे भी कार्यकर्ताओं और वोटरों में नाराजगी थी।

लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा ने पहले ही अपने पत्ते साफ कर दिए थे। उम्मीदवारों की घोषणा के बाद विपक्षी दलों ने उनके काट खोजे। अपनी रणनीति को बेहतर किया। समीक्षा में कहा गया है कि टिकट वितरण में जल्दबाजी की गई और यह भी हार का कारण बनी। 15 पेज की रिपोर्ट में गिनाए गए कारणों में समर्थकों के नाम मतदाता सूची से हटाने को भी कारण माना गया है।

अयोध्या में बीजेपी की समीक्षा बैठक के दौरान भी कार्यकर्ताओं ने भाजपा समर्थकों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का मुद्दा उठाया था। साथ ही, ठाकुर मतदाताओं के भी बीजेपी से दूर जाने की बात समीक्षा में कही गई है। बहुजन समाज पार्टी उम्मीदवारों के मुस्लिम और अन्य वोट न काट पाने को भी हार के कारणों में गिना गया है। बता दें कि समीक्षा की 15 पेज की रिपोर्ट में 12 कारण गिनाए गए हैं। अब इस समीक्षा रिपोर्ट पर राष्ट्रीय स्तर पर बैठक में चर्चा होगी। यूपी में लोकसभा चुनाव परिणाम ने साफ कि योगी-मोदी इफेक्ट प्रदेश में कम हुआ है। समीक्षा बैठक में साफ किया गया कि ‘बीजेपी आरक्षण हटा देगी’, यह नैरेटिव बना। विपक्षी दल इस नैरेटिव को जनता के बीच स्थापित करने में कामयाब हो गए।गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव एससी वोट समाजवादी पार्टी को गए। लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा करीब 50 फीसदी वोट शेयर तक पहुंच गई थी। इस चुनाव में पार्टी को करीब 8 फीसदी वोट शेयर में गिरावट झेलनी पड़ी। रिपोर्ट में कहा गया है कि गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव एससी वोट समाजवादी पार्टी को गए। अब भाजपा के राष्ट्रीय पदाधिकारी बैठक में यूपी की हार वाली समीक्षा रिपोर्ट पर चर्चा होगी।

युद्ध कोई समाधान नहीं, यूक्रेन पर रात में मोदी की पुतिन को ‘सलाह’!

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रूस पिछले दो वर्षों से यूक्रेन के साथ युद्ध में है। राष्ट्रीय स्तर की एक समाचार एजेंसी के मुताबिक भारत के प्रधानमंत्री ने पुतिन से निजी तौर पर इस युद्ध को ख़त्म करने का अनुरोध किया था. व्लादिमीर पुतिन ने अपने घर पर नरेंद्र मोदी के लिए रात्रिभोज का आयोजन किया. वहां जाकर भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने रूसी राष्ट्रपति को कुछ सलाह दी. सूत्रों के मुताबिक, डिनर टेबल पर दोनों राष्ट्राध्यक्षों के बीच युद्ध पर चर्चा हुई. मोदी ने पुतिन को समझाया कि युद्ध के मैदान में किसी भी समस्या का समाधान नहीं होता.

रूस पिछले दो वर्षों से यूक्रेन के साथ युद्ध में है। उस युद्ध में अमेरिका समेत विश्व के कई देश यूक्रेन के साथ खड़े थे। समाचार एजेंसी एनडीटीवी ने एक रिपोर्ट में बताया कि भारत के प्रधानमंत्री ने पुतिन से अकेले ही इस युद्ध को खत्म करने का अनुरोध किया. साथ ही उन्होंने पुतिन को समझाया कि बातचीत और कूटनीति से इस क्षेत्र में सफलता मिल सकती है. लेकिन कभी युद्ध मत करो.

प्रधानमंत्री मोदी दो दिवसीय दौरे पर रूस के मॉस्को गए। मोदी ने वहां रूसी राष्ट्रपति पुतिन से कूटनीतिक बातचीत भी की. हालाँकि, पुतिन ने सोमवार को उन्हें व्यक्तिगत रूप से अपने घर पर आमंत्रित किया। सूत्रों के मुताबिक, मोदी ने वहां पुतिन से कहा कि भारत संयुक्त राष्ट्र के संस्थागत समझौतों का सम्मान करता है. भारत क्षेत्रीय एकता और संप्रभुता में भी विश्वास रखता है। उस विचार से उनका मानना ​​है कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।

हालाँकि, राष्ट्रीय स्तर की मीडिया के अनुसार, रात में न केवल यूक्रेन के साथ युद्ध रोकने, बल्कि भारत और रूस के बीच ताज़ा जटिलताओं पर भी चर्चा हुई। पिछले कुछ महीनों में भारतीयों को गलती से रूस में लड़ने के लिए भेजे जाने के कई मामले सामने आए हैं. रूस में 25 भारतीयों की भी मौत हो गई. मोदी ने पुतिन से भारतीयों को इस तरह गुमराह कर रूस ले जाए जाने पर चिंता जताई. रूसी राष्ट्रपति ने भी मोदी से इस मामले पर गौर करने का वादा किया है.

भारत के साथ रूस की दोस्ती को लेकर अमेरिका ‘चिंतित’ है. भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार को दो दिवसीय रूस दौरे पर गए। जब वह मॉस्को में हैं, तो अमेरिका से चिंताएं सुनने को मिल रही हैं। इसके अलावा क्रेमलिन के प्रवक्ता ने हाल ही में दावा किया था कि पश्चिमी दुनिया की नजर मोदी के रूस दौरे पर है. उन्होंने दावा किया कि पश्चिमी दुनिया मोदी की रूस यात्रा से ईर्ष्या करती है. राजनयिक हलके के कई लोगों के मुताबिक, क्रेमलिन के प्रवक्ता ने बिना नाम लिए अमेरिका पर निशाना साधा।

अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर से सोमवार को मोदी की रूस यात्रा के बारे में पूछताछ की गई। उस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, ”मोदी रूस जाकर क्या कह रहे हैं, इस पर हमारी नजर है. हम पहले ही भारत के साथ रूस की दोस्ती को लेकर अपनी चिंताओं से दिल्ली को अवगत करा चुके हैं।” मैथ्यू यहीं नहीं रुके। उन्होंने यह भी कहा, “चाहे वह भारत हो या कोई भी देश, जो रूस के साथ मित्रवत है, उन्हें मास्को को संयुक्त राष्ट्र के दिशानिर्देशों का पालन करने की याद दिलानी चाहिए।”

पुतिन ने मोदी को 22वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए देश में आमंत्रित किया। वह निमंत्रण मिलने के बाद भारत के प्रधानमंत्री सोमवार को मॉस्को गये. वहां उनके कई कार्यक्रम थे. पुतिन प्रशासन ने मोदी के स्वागत में कोई गलती नहीं की. रूस के उपप्रधानमंत्री डेनिस मंटुरोव ने मॉस्को हवाईअड्डे पर मोदी का स्वागत किया. प्रधानमंत्री मोदी को ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ दिया गया. उन्होंने सोमवार को पुतिन के साथ डिनर भी किया था. वे वहां एक दूसरे की तारीफ भी करते हैं. हालांकि, यह पता नहीं चल पाया है कि उस रात दोनों नेताओं के बीच यूक्रेन या अमेरिका में युद्ध को लेकर कोई बात हुई थी या नहीं. तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी पहली बार रूस गए। इतना ही नहीं, 2022 में शुरू हुए यूक्रेन युद्ध के बाद से मोदी को रूस दौरे पर नहीं देखा गया है. राजनयिक हलके इस दौरे को उस लिहाज से काफी अहम मान रहे हैं. गौरतलब है कि यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस को अमेरिका, ब्रिटेन और जापान समेत दुनिया के ताकतवर देशों की आलोचना सुननी पड़ रही है. यहां तक ​​कि कई मामलों में प्रतिबंध भी जारी किए गए हैं. हालाँकि, अमेरिका की मौजूदगी के बावजूद भारत रूस के साथ अपनी दोस्ती खोना नहीं चाहता था।

रामदेव की पतंजलि के ’14 उत्पादों का नहीं होगा विज्ञापन’, सुप्रीम कोर्ट ने IMA को दिया आदेश

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मामले में पतंजलि के वकील मुकुल रोहतगी ने मंगलवार को शीर्ष अदालत को बताया कि डिजिटल माध्यम से विज्ञापन पहले ही वापस ले लिए गए हैं।

योग गुरु रामदेव की पतंजलि आयुर्वेद के ‘भ्रामक और झूठे’ विज्ञापनों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर सख्त कार्रवाई की है. मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि उत्तराखंड सरकार के लाइसेंसिंग विभाग को पतंजलि के 14 उत्पादों का उत्पादन बंद करने, डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया और अन्य मीडिया से उनके विज्ञापन तुरंत हटाने का आदेश दिया।

सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति हिमा कोहली और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने फर्जी विज्ञापन को वापस लेने से संबंधित पूरे मामले की निगरानी की जिम्मेदारी ‘इंडियन मेडिकल एसोसिएशन’ (आईएमए) को दी है। संयोग से, आईएमए ने भ्रामक विज्ञापन के लिए पतंजलि के खिलाफ मामला दायर किया। मामले में पतंजलि के वकील मुकुल रोहतगी ने मंगलवार को शीर्ष अदालत को बताया कि डिजिटल माध्यम से विज्ञापन पहले ही वापस ले लिए गए हैं। पिछले साल नवंबर में, शीर्ष अदालत ने पतंजलि को विभिन्न बीमारियों के उपचार के रूप में अपनी दवाओं के बारे में ‘भ्रामक और झूठे’ विज्ञापन के खिलाफ चेतावनी दी थी। मौखिक रूप से यह भी बताया गया कि जुर्माना हो सकता है. उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल फरवरी में केंद्र की निंदा की थी. मामले की सुनवाई के दौरान देखा गया कि इस तरह के विज्ञापनों के जरिए पूरे देश को गुमराह किया जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, ”सरकार आंखें बंद करके बैठी है. यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है. सरकार को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए।”

23 जून, 2020 को पतंजलि ने पहली बार कोरोनिल किट लॉन्च की। किट में ‘कोरोनिल’ और ‘श्वाहारी बोटी’ नामक दो प्रकार की गोलियां और ‘अणु तेल’ नामक तेल की 20 मिलीलीटर की बोतल शामिल है और इसकी कीमत 545 रुपये है। यह भी बताया गया कि टेबलेट और तेल चाहें तो अलग से भी खरीदा जा सकता है। कंपनी के विज्ञापन के मुताबिक, इसके बाद 18 अक्टूबर तक कुल 23,54,000 कोरोनिल किट बिकीं।

आईएमए ने विज्ञापन पर आपत्ति जताते हुए रामदेव के संगठन के खिलाफ मामला दायर किया। आईएमए ने आरोप लगाया कि पतंजलि के कई विज्ञापनों में एलोपैथिक दवा और डॉक्टरों का अपमान किया गया है। इस पर विज्ञापनों के जरिए आम जनता को गुमराह करने का भी आरोप लगाया गया. आरोप था कि रामदेव की पतंजलि ने एंटी-कोविड नहीं होने के बावजूद सिर्फ कोरोनिल किट बेचकर 250 करोड़ रुपये से ज्यादा का मुनाफा कमाया। वहीं, आईएमए का आरोप है कि उसके लिए ‘भ्रामक और झूठा’ विज्ञापन अभियान चलाया गया. इस मामले के चलते 14 पतंजलि उत्पादों पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

संपर्क पत्र में एक बार द्वितीय बार क्षमापत्र छपाएं योगगुरु रामदेव और हाथ सहयोगी आचार्य बालकृष्ण। मंगलबारो तंगारा एक क्षमापत्र छपिलेन्। लेकिन इन क्षमापत्रों को आकार देने के लिए सुप्रीम कोर्ट के प्रश्न का उत्तर देना आवश्यक है। तो फिर परी ताड़ी द्वितीय क्षमापत्र छपलें तना। प्रथम क्षमापत्र की तुलना बुधवार क्षमापत्र के आकार में अनेकता में! बुद्धवार पटंजलिर की तरफ से रामदेव और बालकृष्ण ये क्षमापत्र छापने के लिए एक संवादपत्र हैं पत्र एक चतुर्भुज. शिरोनाम में लिखा है, ‘जनगणना करें कि निरंतर क्षमाप्रार्थना’। हम पर क्षमापत्र लिखते हैं, ‘सुप्रीम कोर्ट में चर्चा विषय पर नजर रखी जाएगी’ व्यक्ति और उसकी कम्पनी की ओर से वह अपने विद्यार्थियों के लिए निश्चित रूप से क्षमाप्रार्थी है। हम एक ही धरने पर बैठेंगे और दूसरी बार ऐसा नहीं करेंगे। शीर्ष अदालत के निर्देश में न्यायाधीश के पद पर नियुक्ति के बाद अमर अंगीकारबद्ध परीक्षा होगी। क्षमापत्र प्रकाश कर दिया गया। तब वे आकार में छोटे छींटे, या सुप्रीम कोर्ट के भण्डार को मुख्यतः गिरा देते हैं। ‘विविधता और मिथ्या’ बीजापन मामले को शांत करने के लिए मंगलबार पर चर्चा करना हिमा कोहलर प्रश्न: क्या क्षमा को बीजापंती के रूप में सही तरीके से छिपाया जा सकता है? क्या आपके पास इतने बड़े बीज हैं कि आप उनसे अधिक छपवा सकते हैं?’’ शायद रोहतगी रामदेवदेर हे सबायल कर समय सुप्रीम कोर्ट जाने, देश के बहुत से संबंधो का धडा लक्ष टका खर्च करके बीजापन दे सकते हैं। यह निश्चित रूप से दूसरी बार चर्चा करने का शीर्ष अदालत है। बिचारपति हिमा कोहली स्पष्ट जानना, विज्ञान जानना रामदेवर संस्था कम लक्ष्य खर्च कर सके, यह निश्चित रूप से नया कोर्ट है। सुप्रीम कोर्ट में चुप कुछ घंटे आगे मंगलबार को देश के विभिन्न हिस्सों से जोड़कर देखा जा सकता है बीजापन प्रकाशित है। इसलिए क्षमा संस्था का उपयोग करें। लिखते हैं, ‘उपदेशक परामर्श के लिए विज्ञान प्रकाश और संवादात्मक विभाजन करना, हम इसे भूल सकते हैं, तो जानिये क्षमा मांगिए। मैं भूल गया हूँ ना। हम अपने प्रतिरूपपूर्ण पृष्ठ केन मंगलबार को खोलकर इस क्षमापत्र छापो को हल करने के लिए प्रश्न पूछते हैं सुप्रीम कोर्ट. शीर्ष अदालत के प्रश्न, केन मंगलबार क्षमा के लिए बीजापन देने के लिए, यहां आएं यह कर कथा छील।

वर्ल्ड कप जीत के 10 दिन बाद द्रविड़ के लिए 189 शब्दों का मैसेज, रोहित ने ‘करियर वाइफ’ के बारे में क्या लिखा?

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भारत ने 29 जून को टी20 वर्ल्ड कप जीता था. इसके ठीक 10 दिन बाद 9 जुलाई को रोहित शर्मा ने पूर्व कोच राहुल द्रविड़ को एक इमोशनल मैसेज लिखा. भारत के कप्तान ने क्या लिखा?

भारत ने 29 जून को टी20 वर्ल्ड कप जीता था. इसके ठीक 10 दिन बाद 9 जुलाई को रोहित शर्मा ने पूर्व कोच राहुल द्रविड़ को एक इमोशनल मैसेज लिखा. इंस्टाग्राम पर 189 शब्दों के संदेश में उन्होंने द्रविड़ को अपना ‘दोस्त’ बताया। साथ ही उन्होंने बताया कि वह द्रविड़ के लिए ट्रॉफी जीतने को लेकर कितने उत्साहित थे.

टी20 विश्व कप के बाद कोच के रूप में द्रविड़ का कार्यकाल समाप्त हो गया। रोहित ने खुद उस फॉर्मेट से संन्यास ले लिया. रोहित ने मंगलवार को इंस्टाग्राम पर द्रविड़ के साथ छह तस्वीरें साझा कीं। हाथों में विश्व कप की तस्वीरें, परिवार के साथ की तस्वीरें, विश्व कप के बाद मुंबई में बस परेड की तस्वीरें और साथ ही मैदान पर विभिन्न पलों की तस्वीरें हैं। रोहित ने लिखा, “प्रिय राहुल भाई, अपनी भावनाओं को बयां करने के लिए सही शब्द ढूंढने की कोशिश कर रहा था। मुझे नहीं पता कि मैं कभी ऐसा करूंगा या नहीं। फिर भी मैंने कोशिश की. लाखों लोगों की तरह, मैं भी बचपन से आपको देखकर बड़ा हुआ हूं। लेकिन मैं भाग्यशाली हूं कि मुझे आपके साथ इतने करीब से काम करने का मौका मिला। आप सारे पुरस्कार, उपलब्धियाँ घर के दरवाजे पर छोड़कर हमारे कोच के रूप में काम करने आये। आप अपने आप को एक आरामदायक जगह पर ले गए जहाँ कोई भी जब चाहे आपसे खुलकर बात कर सकता था। इतने सालों तक क्रिकेट खेलने के बाद भी यह आपका उपहार, विनम्रता और प्यार है। मेरी पत्नी तुम्हें मेरी करियर पत्नी कहती है। मैं भी भाग्यशाली हूं कि आपको इस नाम से बुलाता हूं।”

रोहित ने यह भी लिखा, “मुझे पता है कि विश्व कप आपके शस्त्रागार में एकमात्र नहीं था। मुझे खुशी है कि हम दोनों ने मिलकर यह हासिल किया।’ राहुल भाई, मुझे आपको अपना करीबी दोस्त और कोच कहते हुए गर्व हो रहा है।

टी20 वर्ल्ड कप जीतने के बाद रोहित शर्मा की टीम को भारतीय क्रिकेट बोर्ड (बीसीसीआई) से 125 करोड़ रुपये मिले हैं। बीसीसीआई ने 2007 और 2011 में महेंद्र सिंह धोनी के नेतृत्व में दो विश्व कप जीत के दौरान टीम को वित्तीय पुरस्कार भी दिया। 2013 में चैंपियंस ट्रॉफी जीतने के बाद भी बोर्ड ने आर्थिक इनाम दिया था. हालांकि धोनी की किसी भी टीम को इतनी रकम नहीं मिली जितनी इस बार मिली.

धोनी ने 2007 में पहला टी20 वर्ल्ड कप जीता था. इस बार उस टीम में कप्तान रोहित शर्मा भी थे. उस समय बीसीसीआई ने विश्व विजय के लिए 12 करोड़ रुपये इनाम में दिये थे. यानी विश्व विजेता बनने के बाद धोनी को 1 करोड़ रुपये भी नहीं मिले. 2011 में धोनी के नेतृत्व में भारत ने वनडे वर्ल्ड कप जीता था. बीसीसीआई ने उस समय के प्रत्येक क्रिकेटर के लिए 1 करोड़ टका के इनाम की घोषणा की। बाद में इसे बढ़ाकर विश्व विजेताओं के लिए 2 करोड़ कर दिया गया। टीम के कोच और सपोर्ट स्टाफ को 50 लाख रुपये मिले. तत्कालीन राष्ट्रीय चयनकर्ताओं को पुरस्कार के रूप में 25 लाख रुपये मिले। 2013 में चैंपियंस ट्रॉफी जीतने के बाद बीसीसीआई ने क्रिकेटरों को 1 करोड़ रुपये का इनाम दिया था. उस वक्त सपोर्ट स्टाफ को 30 लाख रुपये मिले थे.

पिछली तीन बार की तुलना में इस बार इनामी राशि काफी बढ़ गई है. इस बार टीम के 15 क्रिकेटरों को 5 करोड़ रुपये मिल रहे हैं. एक भी मैच नहीं खेलने वाले संजू सैमसन, यशस्वी जयसवाल और युजवेंद्र चहल को भी ये पैसा मिलेगा. कोच राहुल द्रविड़ को भी 5 करोड़ रुपये मिलेंगे. तीन सहायक कोचों, बल्लेबाजी कोच विक्रम राठौड़, क्षेत्ररक्षण कोच टी दिलीप और गेंदबाजी कोच पराश माम्ब्रे को 2.5 करोड़ रुपये मिलेंगे। टीम के अन्य सहायक स्टाफ, यानी तीन फिजियो, तीन थ्रोडाउन विशेषज्ञ, दो मालिश करने वाले और एक ताकत और कंडीशनिंग कोच को 2 करोड़ रुपये मिलेंगे। टीम के साथ रिजर्व क्रिकेटर के तौर पर गए शुबमन गिल, रिंकू सिंह, अबेश खान और खलील अहमद को 1-1 करोड़ रुपये मिलेंगे. अजीत अगरकर सहित पांच राष्ट्रीय चयनकर्ताओं को भी 1 करोड़ टका मिलेंगे। बाकी पैसा टीम के वीडियो विश्लेषक और टीम के साथ आने वाले अन्य बोर्ड कर्मियों के बीच बांटा जाएगा।

पिछली तीन बार की तुलना में इस बार बोर्ड ने आर्थिक पुरस्कार की राशि बढ़ा दी है. इस बार विराट कोहली को 5 करोड़ रुपये मिल रहे हैं. उन्हें ही 2011 में वनडे विश्व कप विजेता टीम के सदस्य के रूप में 2 करोड़ रुपये मिले थे।