Wednesday, March 4, 2026
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आखिर कौन सा है दुनिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर? जानिए अद्भुत रहस्य!

आज हम आपको दुनिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर कहां स्थित है, यह बताने वाले हैं! हमारे देश में भगवान शिव के कई विशाल मंदिर है…. 150 फीट ऊंची शिवलिंग से लेकर कई ऊंचे स्थानों पर बने हुए शिव मंदिर भी उपस्थित है…. लेकिन आज हम आपको दुनिया के सबसे उंचे शिव मंदिर के बारे में जानकारी देने वाले हैं…. साथ ही साथ उससे जुड़े कई रहस्य भी बताने वाले हैं, आपको बता दें कि भगवान शिव को देवों का देव महादेव भी कहा जाता है। भारत में उत्तर से दक्षिण तक शिव जी के कई मंदिर स्थित हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया में सबसे ऊंचा शिव मंदिर कौन सा है? आइए अब आपको दुनिया के सबसे उंचे शिव मंदिर के दर्शन करते हैं .. बता दें कि दुनिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर उत्तराखंड में है, जिसे तुंगनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है। तुंगनाथ भगवान शिव के पंच केदार में से एक है। उत्तराखंड में शिव जी के 5 प्राचीन और पवित्र मंदिर स्थित हैं, जिन्हें पंच केदार कहा जाता हैं। बता दें तुंगनाथ मंदिर 3,680 मीटर यानी 12,073 फीट की ऊंचाई पर चन्द्रनाथ नाम के पर्वत पर मौजूद हैदुनिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर उत्तराखंड में है, जिसे तुंगनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है। तुंगनाथ भगवान शिव के पंच केदार में से एक है। उत्तराखंड में शिव जी के 5 प्राचीन और पवित्र मंदिर स्थित हैं, जिन्हें पंच केदार कहा जाता हैं। बता दें तुंगनाथ मंदिर 3,680 मीटर यानी 12,073 फीट की ऊंचाई पर चन्द्रनाथ नाम के पर्वत पर मौजूद है।

यह उत्तराखंड राज्य के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है। तुंगनाथ का शाब्दिक अर्थ ‘चोटियों के भगवान’ है। इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल जितना पुराना बताया जाता है। शास्त्रों के अनुसार, तुंगनाथ मंदिर की नींव महाभारत के अर्जुन द्वारा रखी गई थी। एक प्रचलित कथा के अनुसार, तुंगनाथ मंदिर के निर्माण को लेकर मान्यता है कि हजारों साल पहले पांडव भाइयों ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए एक मंदिर की स्थापना की थी। दरअसल, महाभारत के युद्ध में पांडवों ने अपने ही भाइयों और गुरुओं का वध किया था। ऐसे में पांडवों पर अपने ही रिश्तेदारों की हत्या का पाप था, इसलिए ऋषि व्यास ने पांडवों से कहा कि वह तभी पाप मुक्त हो सकते हैं, जब भगवान शिव खुद उन्हें माफ करेंगे। बता दें कि व्यास ऋषि की सलाह पर वे सभी शिव से मिलने हिमालय पहुंचे लेकिन शिव महाभारत के युद्ध के चलते नाराज थे। इसलिए उन सभी को भ्रमित करके भैंसों के झुंड के बीच भैंसा इसीलिए शिव को महेश के नाम से भी जाना जाता है का रुप धारण कर वहां से निकल गए। लेकिन पांडव नहीं माने और भीम ने भैंसे का पीछा किया। इस तरह शिव के अपने शरीर के हिस्से पांच जगहों पर छोड़े। ये स्थान केदारधाम यानि पंच केदार कहलाए।

कहते हैं कि तुंगनाथ में ‘बाहु’ यानि शिव के हाथ का हिस्सा स्थापित है। यह मंदिर करीब एक हजार साल पुराना माना जाता है ।इसके बाद पांडवों ने शिव जी की तलाश शुरू कर दी और वे हिमालय जा पहुंचे। बहुत परिश्रम के बाद भोलेनाथ एक भैंस के रूप में दर्शन देते हैं।

हालांकि, इसके बाद भी भगवान शिव ने उन्हें टाल दिया क्योंकि पांडव दोषी थे। तब शिव जी भूमिगत हो गए और बाद में उनके शरीर यानी भैंस के पांच अंग अलग-अलग जगहों पर उठ गए। इन पांचो जगहों पर पांडवों ने शिव मंदिर बनवाएं। इन पंच केदार के प्रत्येक मंदिर को भगवान शिव के शरीर के एक अंग के साथ पहचाना जाता है। तुंगनाथ पंच केदार में से तीसरा (तृतीय केदार) है, जहां भगवान शिव के हाथ मिले थे। इसी के आधार पर मंदिर का नाम भी रखा गया। तुंग का अर्थ हाथ और नाथ भगवान के संदर्भ में कहा गया है। बता दें कि पंच केदार में इसके अलावा केदारनाथ, रुद्रनाथ, मध्यमहेश्वर और कल्पेश्वर मंदिर आते हैं। केदारनाथ में भगवान शिव की कूबड़ प्रकट हुई थी। रुद्रनाथ में उनका सिर, कल्पेश्वर में बाल, जबकि मध्यमहेश्वर मंदिर में शिव जी की नाभि प्रकट हुई थी। यह जगह बेहद ठंडी है। सर्दियों के मौसम में यह बर्फ की चादर में ढक जाती है और तापमान इतना गिर जाता है कि इस दौरान मंदिर बंद कर दिया जाता है। इस दौरान देवता की प्रतीकात्मक मूर्ति और पुजारियों को मुख्य मंदिर से 19 किलोमीटर दूर मुक्कुमठ में ले जाया जाता है। हालांकि अप्रैल से नवंबर माह के बीच मुख्य मंदिर में ही पूजा और दर्शन किए जाते हैं। तो यह है शिव भगवान के सबसे ऊंचे मंदिर तुंगनाथ मंदिर की कहानी!

आखिर क्या है प्रधानमंत्री सोलर स्कीम? जिसके तहत करोड़ घरों को मिलेगा सौर ऊर्जा का फायदा?

हाल ही में प्रधानमंत्री रूफटॉप सोलर स्कीम लॉन्च हो गई है…. जिसके तहत करोड़ घरों को सौर ऊर्जा का फायदा मिलने वाला है… इसी के साथ बिजली के बिलों में भी ₹300 तक की बचत होने वाली है…. लेकिन सवाल यह कि आखिर इससे आम जनता को क्या फायदा होगा और इस योजना में अप्लाई कैसे कर सकते हैं? तो आज हम आपको इस योजना से जुड़े हर सवाल का जवाब देने वाले हैं, आपको बता दें कि केंद्र सरकार ने 13 फरवरी को ‘पीएम-सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना’ नाम से एक योजना शुरू की जिसके लिए ₹75,000 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। इस योजना के तहत, 1 करोड़ परिवारों को अपने घरों की छतों पर सौर ऊर्जा संयंत्र लगाने में मदद मिलेगी, जिससे बिजली बिल को कम करने और पर्यावरण के अनुकूल लक्ष्यों को हासिल करने में मदद मिलेगी। तो आज हम आपको इसी योजना के संदर्भ में संपूर्ण जानकारी देने वाले हैं…. सबसे पहला सवाल जो उठना है, वह यह कि आखिर इससे आम जनता को क्या फायदा होगा? तो बता दे कि छत पर सौर पैनल लगाने से घरों को कई फायदे होंगे। यूजर को हर महीने 300 यूनिट तक की मुफ्त बिजली मिलेगी। इससे छत की क्षमता और खपत के आधार पर सालाना ₹15,000 से ₹18,000 तक की बचत होगी। ग्रामीण इलाकों में घर, खासकर बिजली के दो-तीन पहिया वाहनों/कारों के लिए चार्जिंग स्टेशन लगाकर पैसे भी कमा सकते हैं।

सवाल नंबर दो, कि आखिर इस योजना में कौन-कौन अप्लाई कर सकता है? उसकी योग्यता क्या है? तो आपको बता दे कि इस योजना का फायदा सभी घर ले सकते हैं, लेकिन सब्सिडी सिर्फ 3 किलोवाट kW या 3,000 वाट क्षमता तक के छत सौर संयंत्रों के लिए ही मिलेगी। आप (पीएम सूर्य घर योजना की वेबसाइट पर आवेदन कर सकते हैं। इस वेबसाइट पर आपको छत के हिसाब से लगने वाले सौर संयंत्र की उपयुक्त क्षमता और उससे होने वाले फायदों का पता लगाने में भी मदद मिलेगी।

सवाल नंबर 3, कि आखिर सब्सिडी कैसे पाई जा सकती है? तो बता दे कि सब्सिडी पाने के लिए कुछ शर्तें पूरी करनी होंगी। छत पर लगने वाले सौर पैनल ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम के तहत बने होने चाहिए। पैनल लगाने का काम सरकारी मान्यता प्राप्त विक्रेता जिनकी सूची वेबसाइट पर दी गई है से ही कराना होगा। सब्सिडी पाने के लिए बैटरी स्टोरेज की अनुमति नहीं है। सरकारी सब्सिडी सिर्फ 3 किलोवाट क्षमता तक के छत सौर संयंत्रों के लिए ही उपलब्ध है। सब्सिडी की दरें कुछ इस प्रकार से रहेंगी।  2 किलोवाट क्षमता तक के संयंत्रों के लिए – 60% तथा 2 और 3 किलोवाट क्षमता के बीच के संयंत्रों के लिए – 40% अधिकतम सब्सिडी राशि होगी…. यानी 1 किलोवाट क्षमता – ₹30000, 2 किलोवाट क्षमता – ₹60000, 3 किलोवाट या उससे अधिक क्षमता – ₹78000

यह सब्सिडी सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में तब जमा की जाएगी, जब छत पर पैनल लगा दिए जाएंगे और सरकारी अधिकारियों द्वारा जांच पूरी कर ली जाएगी। इसी के साथ सवाल नंबर 4, कि क्या उपयोगकर्ता को कुछ भुगतान करना पड़ सकता है? तो आपको बता दे कि यूजर्स को कम से कम 40% खर्च का भुगतान करना होगा। ये वो राशि है जो सब्सिडी मिलने के बाद बचती है। केंद्र सरकार की बिजली कंपनियों को छोटे घरों खासकर पीएम आवास योजना के तहत बने घरों में रहने वाले आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए छत पर सौर संयंत्र लगाने का काम सौंपा जा सकता है। ये उन परिवारों के लिए होगा जो शुरुआती निवेश करने में असमर्थ हैं। ऐसी स्थिति में सब्सिडी बिजली कंपनी को दी जाएगी, जो शुरुआती निवेश भी करेगी। यूजर शुरुआती निवेश के लिए रियायती दरों पर ऋण भी ले सकते हैं।

आखरी सवाल यह कि किस तरह के सोलर पैनल लगाने चाहिए तथा उनकी संख्या कितनी हो सकती है? तो आपको बता दे कि आप दो तरह के सौर पैनल लगा सकते हैं – मोनोफेशियल या बाईफेशियल पैनल। इन दोनों में से कोई भी पैनल चुनते समय उनकी Efficiency Rating पर जरूर ध्यान देना चाहिए। यही वह रेटिंग है जो बताती है कि कितनी मात्रा में सूर्य की रोशनी ऊर्जा में बदली जा रही है। दोनों तरह के पैनलों की औसत आयु 25 साल है, लेकिन इसके बाद भी ये कम मात्रा में बिजली बनाते रहते हैं। यही नहीं 1 किलोवाट क्षमता के ज्यादातर छत सौर संयंत्रों में 3 से 4 सौर पैनल लगाए जाते हैं, जिनमें से हर एक पैनल 250 से 330 वाट का होता है। अगर आप हाई-एफिशिएंसी वाले पैनल चुनते हैं, तो आपको उतनी ही बिजली बनाने के लिए कम पैनलों की जरूरत पड़ेगी। वहीं, छत पर लगने वाले सौर संयंत्र की क्षमता बढ़ाने के लिए पैनलों की संख्या भी बढ़ाई जाती है। तो यह थे, प्रधानमंत्री रूफटॉप सोलर स्कीम से जुड़े सवाल और उनके हर जवाब!

आखिर क्यों है गगनयान के एस्ट्रोनॉट्स की ड्रेस अतरंगी?

आज हम आपको बताएंगे कि गगनयान के एस्ट्रोनॉट्स की ड्रेस अतरंगी क्यों होती है… आने वाले समय में हमारे देश के वैज्ञानिकों के द्वारा गगनयान मिशन लॉन्च किया जाएगा… जिसके तहत हमारे देश के वैज्ञानिकों को चांद पर भेजा जाएगा….लेकिन एक सवाल यह कि आखिर इन चारों एस्ट्रोनॉट्स की ड्रेस अतरंगी क्यों है ?एक तरफ आसमानी रंग तो दूसरी तरफ गहरा नीला रंग क्या खासियत रखता है ?तो आज हम आपको इन्हीं गगनयान के एस्ट्रोनॉट्स की अतरंगी ड्रेस के बारे में जानकारी देने वाले हैं, आपको बता दें कि हाल ही में गगन मिशन के चारों एस्ट्रोनॉट्स के नाम की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर दी है। पीएम मोदी से मुलाकात के 4 जांबाजों ने नीले रंग का एक खास ब्लू ग्राउंड सूट पहना था। यह सूट बनाया किसने? किसने डिजाइन किया? इन सभी सवालों के जवाब हर कोई जानना चाहता है। दरअसल पहले मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन गगनयान को लेकर देशवासियों में काफी उत्साह है। गगनयान मिशन से जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात को जानने की जिज्ञासा लोगों के मन में है। एस्ट्रोनॉट्स की ड्रेस की भी एक खास बात है। एस्ट्रोनॉट्स की खास ड्रेस को बेंगलुरु के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी के तीन छात्रों और दो प्रोफेसर ने मिलकर बनाया है। इन स्टूडेंट्स का नाम है लामिया अनीज, समर्पण प्रधान और तुलिया डी। ये तीनों 2022 बैच के छात्र हैं।इसके अलावा दो प्रोफेसर-डॉ. जोनाली बाजपेई और डॉ. मोहन कुमार इस ड्रेस डिजाइन में शामिल थे। बता दें कि अंतरिक्ष यात्रियों ने फरवरी में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी NIFT, बेंगलुरु की एक टीम द्वारा डिजाइन की गई नीली ग्राउंड यूनिफॉर्म में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, निफ्ट टीम ने अंतरिक्ष यात्रियों के लिए पंख भी डिजाइन किया है। निफ्ट ने अंतरिक्ष यात्रियों के यूनिफॉर्म को energetic रूप देने के लिए एक असममित डिजाइन चुना, जिसमें नीला रंग, आकाश और शांति का प्रतीक है। जिस कपड़े से इस यूनिफॉर्म को बनाया गया है वह कपास से बना है। प्रोफेसर बाजपेयी ने कहा, ‘मेरी टीम ने 150 डिज़ाइनों पर काम किया और इसरो की टीम को 70 अलग-अलग विकल्प दिए गए थे।’ उन्होंने बताया कि ग्राउंड यूनिफॉर्म अंतरिक्ष यात्री सूट से अलग है, जिसे भारत ने रूस से खरीदा है। प्रोफेसर बाजपेयी ने कहा, ‘नीला रंग शांति और दृढ़ता की भावना का प्रतीक है।’

उन्होंने आगे कहा कि हम गहरे और हल्के नीले रंग और कुछ क्षैतिज पट्टियों के साथ रंगों के एक सुंदर संतुलन तक पहुंचे हैं। अंतरिक्ष यात्री के पैच में पंख, अशोक चक्र और इसरो लोगो शामिल हैं। उन्होंने कहा कि पंख सौर पैनलों के खुलने के समान हैं और सकारात्मकता, प्रचुरता, उड़ान और ऊंचाई का अहसास कराते हैं। ये यह भी दर्शाता है कि अंतरिक्ष यात्री भारतीय वायु सेना से हैं। इसके केंद्र में अशोक चक्र है। हमने इसरो के लोगो को चक्र और पंखों वाले लोगों से मर्ज कर दिया है। ग्राउंड यूनिफ़ॉर्म में एक खास डिजाइन होता है जिसमें एक तरफ हल्का नीला और दूसरी तरफ गहरा नीला होता है। निफ्ट, बेंगलुरु के फैशन टेक्नोलॉजिस्ट डॉ. मोहन वीके ने कहा कि आवश्यकता यह थी कि यह विशेष सूट 140 करोड़ भारतीयों को उत्साहित करे। दूसरा, यह कि अंतरिक्ष उड़ान क्षमताओं वाले देशों के विशिष्ट अंतरिक्ष क्लब में भारत के प्रवेश की जोरदार घोषणा होनी चाहिए। ऐसी आवश्यकताओं के आधार पर, हमने अपनी डिज़ाइन दिशाओं को विषमता तक सीमित कर दिया है। यानी सीधी सी बात यह है कि गगनयान के एस्ट्रोनॉट्स की यह खास ड्रेस कहीं ना कहीं हमारे देश को समस्त देशों के सामने गौरवांवित करती है!

बता दे कि स्पेस सूट का रंग ऑरेंज होने के पीछे सबसे बड़ी वजह होती है, इसका दूसरे रंग से ज्यादा विजीबल होना। स्पेस सूट में प्रयोग होने वाला ऑरेज रंग कोई साधारण कलर नहीं होता। इसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक, खास तौर पर स्पेस सूट के लिए तैयार किया जाता है। इस रंग के पीछे बड़ी वजह ये है कि इस सूट से अंतरिक्ष यात्रियों को आसानी से देखा जा सकता है। कोई हादसा होने पर भी इस रंग के स्पेस सूट की वजह से अंतरिक्ष यात्रियों को दूर से ही पहचाना जा सकता है। समुद्र में लैंडिंग के दौरान भी इस रंग के स्पेस सूट की बदौलत इन्हें दूर से ही देखा जा सकता है। इस सूट को एडवांस्ड क्रू स्केप सूट ACES कहा जाता है। इसका अर्थ ये है कि स्पेस क्राफ्ट के टेकऑफ और पृथ्वी की कक्षा से बाहर जाने के लिए इस सूट का इस्तेेमाल किया जाता है। इसके अलावा यही स्पेेस सूट धरती पर वापस लौटते समय अंतरिक्ष यात्री पहनते हैं।

आखिर क्या होती है काला पानी की सजा? जानिए सेल्यूलर जेल के बारे में सब कुछ!

आज हम आपको कला पानी की सजा के बारे में जानकारी देने वाले हैं, रणबीर हुड्डा फेम एक नई फिल्म आने वाली है… जिसका नाम है वीर सावरकर… जैसे ही इस फिल्म का टाइटल पता चला वैसे ही लोगों के मन में कई सवाल आए कि आखिर वीर सावरकर को मिली काले पानी की सजा क्या थी? वह कितनी खतरनाक थी और इतिहास में उसे काले पन्नों में क्यों लिखा जाता है…? तो आज हम आपको उसी काले पानी की सजा का पूरा इतिहास बताने वाले हैं… इसे पार कर पाना किसी के लिए भी आसान नहीं था। इस जेल की सबसे बड़ी खूबी ये थी कि इसकी चहारदीवारी एकदम छोटा बनाया गया था, जिसे कोई भी आसानी से पार कर सकता था, लेकिन इसके बाद जेल से बाहर निकलकर भाग जाना लगभग नामुमकिन था, क्योंकि ऐसा कोशिश करने पर कैदी समुद्र के पानी में ही डूबकर मर जाते।उस सजा के बारे में बताने वाले हैं, आपको बता दें कि काला पानी की सजा’ बीते जमाने की एक ऐसी सजा थी, जिसके नाम से कैदी कांपने लगते थे। दरअसल, यह एक जेल थी, जिसे सेल्यूलर जेल के नाम से जाना जाता था। आज भी लोग इसे इसी नाम से जानते हैं। यह जेल अंडमान निकोबार द्वीप की राजधानी पोर्ट ब्लेयर में बनी हुई है।

इसे अंग्रेजों द्वारा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों को कैद रखने के लिए बनाया गया था, जो कि भारत की भूमि से हजारों किलोमीटर दूर स्थित थी। काला पानी का भाव सांस्कृतिक शब्द काल से बना माना जाता है जिसका अर्थ होता है समय या मृत्यु। यानी काला पानी शब्द का अर्थ मृत्यु के स्थान से है, जहां से कोई वापस नहीं आता। हालांकि अंग्रजों ने इसे सेल्यूलर नाम दिया था, जिसके पीछे एक हैरान करने वाली वजह है।  बता दें कि सेल्यूलर जेल अंग्रेजों द्वारा भारत के स्वतंत्रता सेनानियों पर किए गए अत्याचारों की मूक गवाह है। इस जेल की नींव 1897 ईस्वी में रखी गई थी और 1906 में यह बनकर तैयार हो गई थी। इस जेल में कुल 698 कोठरियां बनी थीं और प्रत्येक कोठरी 15×8 फीट की थी। इन कोठरियों में तीन मीटर की ऊंचाई पर रोशनदान बनाए गए थे ताकि कोई भी कैदी दूसरे कैदी से बात न कर सके।  यह जेल गहरे समुद्र से घिरी हुई है, जिसके चारों ओर कई किलोमीटर तक सिर्फ और सिर्फ समुद्र का पानी ही दिखता है। इसे पार कर पाना किसी के लिए भी आसान नहीं था। इस जेल की सबसे बड़ी खूबी ये थी कि इसकी चहारदीवारी एकदम छोटा बनाया गया था, जिसे कोई भी आसानी से पार कर सकता था, लेकिन इसके बाद जेल से बाहर निकलकर भाग जाना लगभग नामुमकिन था, क्योंकि ऐसा कोशिश करने पर कैदी समुद्र के पानी में ही डूबकर मर जाते।

भारतीय समाज में कहा जाता था कि जिसने समुद्र पार कर लिया इसका मतलब वह पापी हो चुका है अशुद्ध हो चुका है इसलिए समुद्र के पानी को काला पानी बोलते थे और अंडमान निकोबार में बनी यह सेल्यूलर जेल समुद्र के बीच में थी, इसलिए भी इस काले पानी की जेल कहा जाता था…. इस जेल का नाम सेल्यूलर पड़ने के पीछे एक वजह है। दरअसल, यहां हर कैदी के लिए एक अलग सेल होती थी और हर कैदी को अलग-अलग ही रखा जाता था, ताकि वो एक दूसरे से बात न कर सकें। ऐसे में कैदी बिल्कुल अकेले पड़ जाते थे और वो अकेलापन उनके लिए सबसे भयानक होता था।  कहते हैं कि इस जेल में न जाने कितने ही भारतीयों को फांसी की सजा दी गई थी। इसके अलावा कई तो दूसरी वजहों से भी मर गए थे, लेकिन इसका रिकॉर्ड कहीं मौजूद नहीं है। इसी वजह से इस जेल को भारतीय इतिहास का एक काला अध्याय कहा जाता है। अगर बात अकेलेपन की करें तो यह कहा जाता है कि वीर सावरकर को 3 साल तक पता नहीं चला था कि उनके भाई उस जेल में उन्हीं के साथ बंद थे…काला पानी की सजा’ बीते जमाने की एक ऐसी सजा थी, जिसके नाम से कैदी कांपने लगते थे। दरअसल, यह एक जेल थी, जिसे सेल्यूलर जेल के नाम से जाना जाता था। आज भी लोग इसे इसी नाम से जानते हैं। यह जेल अंडमान निकोबार द्वीप की राजधानी पोर्ट ब्लेयर में बनी हुई है। क्योंकि कोई भी कैदी एक दूसरे को नहीं देख पता था, इसलिए वीर सावरकर को 3 साल तक पता नहीं चला कि उनके ही भाई उनके ही साथ के बैरक में जेल में बंद थे…. ऐसा था यह सेल्यूलर जेल, काले पानी की सजा!

आखिर पहाड़ों का सीना चीर के कैसे बनाई जाती है सुरंग?

आज हम आपको बताएंगे कि आखिर सुरंग कैसे बनाई जाती है… आपने कई बार बड़ी-बड़ी सुरंगे जरूर देखी होगी… पहाड़ों का सीन चीरकर सुरंग का निर्माण किया जाता है, कई बार यह लगता है कि शायद यह सुरंग इंसानों के द्वारा हाथों से खुद ही गई है, तो कई बार बड़ी-बड़ी मशीन भी दिखाई जाती है… लेकिन सवाल ये कि आखिर यह बड़ी-बड़ी सुरंग खोदी कैसे कैसे जाती है और इसमें किस तकनीकी का प्रयोग किया जाता है… तो आज हम आपको इस बारे में जानकारी देने वाले हैं!आपको बता दें कि हमारे देश ने इंसानों के लिए सबसे मुश्किल जगहों पर पहाड़ों का सीना चीरकर सुरंगें बनाई हैं। ये सुरंगें ऊंचे हिमालय से लेकर अरब सागर की गहराइयों तक जाती हैं। बीते साल उत्तराखंड के सिलक्यारा में एक भयानक सुरंग हादसा हुआ था। इस हादसे में 41 मजदूर 17 दिन तक एक सुरंग में फंसे रहे, राहत की बात यह है कि सभी मजदूरों को कड़ी मशक्कत के बाद सुरंग से बाहर निकाल लिया गया था। इस हादसे के बाद सुरंगों के निर्माण को लेकर हर किसी के मन में जिज्ञासा बढ़ी है कि आखिर सुरंग का निर्माण कैसे किया जाता है और इसमें किस तकनीकी का प्रयोग किया जाता है…. तो आज हम आपको इसी बारे में जानकारी दे रहे हैं….. बता दें कि ऊंचे-ऊचे पहाड़ों पर सुरंग बनाने के लिए ड्रिल और ब्लास्ट विधि (DBM) का इस्तेमाल किया जाता है। यह तकनीक काफी रिस्की होती है। कभी-कभी ब्लास्ट के दौरान चट्टान का बड़ा हिस्सा खिसक जाता है और आसपास के घरों में दरार भी आ जाती है। इसके अलावा सुरंग-बोरिंग मशीन (TBM) से भी सुरंग बनाई जाती है। ड्रिल और ब्लास्ट विधि में चट्टान में छेद कर विस्फोटक भरा जाता है और फिर विस्फोट से चट्टान तोड़ी जाती है। जबकि सुरंग-बोरिंग मशीन विधि में मशीनों के जरिए चट्टान में छेद किया जाता है।

ये ड्रिल और ब्लास्ट विधि की तुलना में मंहगी तो है , लेकिन काफी सुरक्षित भी है। वहीं, न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मैथड सुरंग खोदने का एक पारंपरिक तरीका है। इसका इस्तेमाल सबसे पहले 1962 में ऑस्ट्रिया के रैजबिज ने किया था। न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मैथड का इस्तेमाल आम तौर पर उन इलाकों में किया जाता है, जहां पर टर्नल बोरिंग मशीन से सुरंग बनाना असंभव होता है। बता दें कि एक्सपर्ट बताते हैं कि सुरंग-बोरिंग मशीन विधि का उपयोग ऊंचे पहाड़ों में सुरंग बनाने के लिए किया जा सकता है, क्योंकि इससे पहाड़ में खाली जगह बनने पर चट्टान फट जाती है और उसका हिस्सा गिर जाता है। सुरंग-बोरिंग मशीन तकनीक 400 मीटर तक ऊंची चट्टानों में इस्तेमाल की जाती है। दिल्ली मेट्रो के लिए सुरंगों का निर्माण सुरंग-बोरिंग मशीन विधि के जरिए किया गया है। वहीं जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड सहित हिमालय जैसी जगहों पर ड्रिल और ब्लास्ट विधि तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। बता दें कि सेला दर्रे पर वर्तमान में, भारतीय सेना के जवान और क्षेत्र के लोग तवांग पहुंचने के लिए बालीपारा-चारीदुआर रोड का उपयोग कर रहे हैं। सर्दी के मौसम में अत्यधिक बर्फबारी के कारण सेला दर्रे में भयंकर बर्फ जम जाती है। इससे रास्ता पूरी तरह से बंद हो जाता है। साथ ही, दर्रे पर 30 मोड़ आते हैं, जो बहुत ही घुमावदार हैं। इस कारण यहां आवाजाही पर पूर्ण रूप से  बाधित हो जाती है। सफर के लिए कई-कई घंटों तक का इतंजार करना पड़ता है। इस दौरान पूरा तवांग सेक्टर देश के बाकी हिस्सों से कट जाता है। सेला दर्रा सुरंग मौजूदा सड़क को बायपास करेगी और यह बैसाखी को नूरानंग से जोड़ेगी। इसके साथ ही सेला सुरंग सेला-चारबेला रिज से कटती है, जो तवांग जिले को पश्चिम कामेंग जिले से अलग करती है। रोहतांग सुरंग या अटल सुरंग वर्तमान में भारत की सबसे लंबी ऊंचाई वाली सुरंग है, जो हिमालय पर्वत में स्थित है।

अक्टूबर 2020 में उद्घाटन किया गया, यह 9.02 किमी लंबी सुरंग लेह और मनाली को जोड़ती है और इसे सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) द्वारा बनाया गया था। यह हिमाचल प्रदेश के रोहतांग दर्रा के नीचे और 3,878 मीटर की ऊंचाई पर बनाई गई है। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर, अटल सड़क सुरंग लेह और मनाली के बीच यात्रा के समय को 4 घंटे कम कर देती है। इस सुरंग में भी इसी विधि का प्रयोग किया गया है! तो यह है भारत में सुरंग खोदने की विधि, जानकारी अच्छी लगी हो तो बने रहिए मोजों पत्रकार के साथ! 

आखिर मौत से पहले और मौत के बाद शरीर में क्या बदलाव आते हैं?

यह सवाल उठना लाजिमी है की मौत से पहले और मौत के बाद शरीर में क्या बदलाव आते हैं… आपने यह बात जरूर सुनी होगी की मौत आने से पहले एक व्यक्ति अलग प्रकार से व्यवहार करने लगता है और मौत समीप आती है तो वह व्यक्ति अलग सा व्यवहार करने लग जाता है, तो आज हम आपको बताएंगे कि आखिर मौत से पहले और मौत के बाद व्यक्ति के साथ क्या बदलाव होते हैं… शारीरिक और मानसिक तौर पर उसमें क्या-क्या परिवर्तन आते हैं, आपको बता दें कि इस दुनिया में जो पैदा होता है उसकी मौत निश्चित है. अब बात करते हैं कि जब किसी की मृत्यु नजदीक आती है तो उस व्यक्ति को कैसा मेहसूस होता है? यह एक ऐसा विषय है जिसके बारे में कोई अपनी राय नहीं दे सकता है, क्योंकि इस बारे में सिर्फ वही व्यक्ति बता सकता है, जिसने मौत का अनुभव किया हो, बता दे कि इस बात को समझाते हुए एक एक्सपर्ट ने इस बात का खुलासा किया है कि मरने से ठीक पहले क्या-क्या होता है और व्यक्ति कैसा मेहसूस करता है? द एक्सप्रेस की रिपोर्ट मे बताया गया है कि एक डॉक्टर ने अपनी लाइफ में काफी लोगों को मरते हुए देखा है, साथ ही उन्होंने बताया है कि मरने से ठीक पहले व्यक्ति के शरीर में क्या-क्या बदलाव आने शुरू हो जाते हैं? तो बता दे कि रिपोर्ट के अनुसार, मृत्यु से पहले क्या मेहसूस होता है, इस  विषय पर चर्चा करते हुए एक डॉक्टर ने कहा कि मरने की प्रक्रिया नॉर्मली दिल की धड़कन रुकने से लगभग 2 सप्ताह पहले शुरू हो जाती है.

लिवरपूल यूनिवर्सिटी में मानद रिसर्च फेलो सीमस कोयल ने द कन्वर्सेशन के लिए लिखे एक आर्टिकल में मौत की प्रक्रिया के बारे में बात की है. उन्होंने बताया कि मौत की प्रक्रिया व्यक्ति की मौत के 2 सप्ताह पहले से ही शुरू हो जाती है. 2 सप्ताह के भीतर ही व्यक्ति की सेहत गिरने लगती है. उसे चलने और सोने में भी परेशानी होनी शुरू हो जाती है. जिंदगी के आखिरी दिनों में, व्यक्ति की दवाई  खाने, भोजन करने और पीने की क्षमता तक खत्म हो जाती है. यही नहीं कुछ रिसर्च के मुताबिक, मौत के वक्त दिमाग से काफी सारे केमिकल निकलते है. उन्हीं केमिकल मे से एक है एंडोर्फिन. यह केमिकल व्यक्ति की भावनाओं को संदीप्त करता है. सीमस कोयल ने बताया, मौत के पलों को समझना मुश्किल तो है लेकिन अभी तक हुई रिसर्च के अनुसार, जैसे-जैसे व्यक्ति मौत के करीब आता हैं, वैसे-वैसे उसकी बॉडी मे स्ट्रेस केमिकल्स बढ़ते जाते है. कैंसर वाले व्यक्ति की बॉडी में सूजन भी आने लगती है. मौत की प्रक्रिया के वक्त व्यक्ति का दर्द कम हो जाता है. यह बताना मुश्किल है कि ऐसा क्यों होता है? शायद ऐसा एंडोर्फिन के कारण हो सकता है. आमतौर पर, हर इंसान की मृत्यु अलग-अलग तरीके से होती है. ऐसे मे, यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि शांतिपूर्ण तरीके से किसकी मौत होगी. कई कम उम्र के लोगो को भी देखा गया है जिन्हें बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि वे मर रहे हैं!

बता दे कि डॉक्टर्स केे अनुसार जबब व्यक्ति का दिमाग काम करना बंद कर दे और उसके दिल की धड़कन रुक जाए, साथ ही वो व्यक्ति सांस लेना भी बंद कर दे तब उसेे ब्रेन डेड माना जाता है. इसी को हम आम भाषा में मौत कहते हैं. हालांकि कानूूनी रूप से किसी व्यक्ति की मृत्यु की घोषणा करने के लिए पहले ये देखा जाता है कि व्यक्ति ब्रेन स्टेम रिस्पांस कर पा रहा है या नहीं. यदि रिस्पांस करने में व्यक्ति कामयाब नहीं हो पाता तब उसे मृत घोषित कर दिया जाता है! किसी व्यक्ति की मौत केे बाद उसकेे शरीर की सभी मसल्स रिलैैक्स हो जाती हैं. जिसे मेडिकल की भाषा में प्राइमरी फ्लेक्सिबिलिटी कहा जाता है. इसके बाद व्यक्ति की पलकें अपना तनाव खो देनेे के चलते बंद हो जाती हैं और सिकुड़ने लगती हैं. उसका जबड़ा खुल जाता है और उसके शरीर के सभी जोड़ और अंग बहुत लचीले हो जाते हैं. वहीं हृदय गति रुक जानेे के चलते कुछ मिनटों तक डेेड बॉडी के अंदर पेलोर मोर्टिन नामक प्रक्रिया शुरू हो जाती है जिसके बाद व्यक्ति का शरीर गुलाबी दिखने लगता है!

मृत्यु के समय आमतौर पर किसी व्यक्ति के शरीर का तापमान 37 डिग्री सेल्सियस होता है जो मौत के बाद तेजी से गिरने लगता है. इस प्रक्रिया को एल्गास मोर्टिस या डेथ चिल कहा जाता है. पहले 2 घंटे में ये तापममान 2 डिग्री सेल्सियस और फिर हर घंटे 1 डिग्री कम होता जाता है. कई बार तो मांसपेशियों की रिलेक्स होने की प्रक्रिया में डेड बॉडी से मल-मूत्र तक निकल जाता है. वहीं मृत्यु के बाद 2 सेे 6 घंटे की बीच शरीर की मांसपेशियां भी अकड़नेे लगती हैं!

आखिर क्या होती है क्रॉस वोटिंग? जिसकी चर्चा हर चुनाव में होती है!

आज हम आपको बताएंगे कि आखिर क्रॉस वोटिंग क्या होती है? जिसकी चर्चा हर चुनाव में है… हाल ही में 56 राज्यसभा सीटों पर राज्यसभा चुनाव संपन्न कर लिए गए,लेकिन इसी बीच क्रॉस वोटिंग एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ था कि आखिर यह क्रॉस वोटिंग होती क्या है? जिसके कारण कई नेता हार जाते हैं, तो कई नेता जीत जाते हैं… तो आज हम आपको इसी क्रॉस वोटिंग के बारे में जानकारी देने वाले हैं… साथ यह भी बताने वाले हैं कि आखिर क्रॉस वोटिंग हमारे राजनीतिक इतिहास में कब-कब हुई है और उससे क्या-क्या प्रभाव पड़े हैं? आपको बता दें कि क्रॉस वोटिंग का मतलब समझने के लिए पहले जानते हैं कि राज्यसभा चुनाव कैसे होते हैं. हर राज्य की आबादी के आधार पर राज्यसभा सांसदों की सीटें तय हैं. राज्य के विधायक वोट देकर अपना राज्यसभा सांसद चुनते हैं. राज्य में राज्यसभा सांसद की सीटों और विधायकों की संख्या के आधार पर तय होता है कि जीत के लिए एक सदस्य को कितने मत चाहिए होते हैं. जैसे कि यूपी में 399 विधायक हैं और 10 सीटों पर राज्यसभा सांसद का चयन होना है. ऐसे में एक उम्मीदवार को जीत के लिए कम से कम 37 वोट मिलना जरूरी है… राज्यसभा चुनाव के दौरान हर पार्टी के विधायक अपना मत तय करते हैं और इसे पार्टी के मुखिया को दिखाते हैं. इसके बाद उसे सभापति के पास जमा कर दिया जाता है. जब विधायक अपनी पार्टी के उम्मीदवार की बजाय किसी अन्य उम्मीदवार को वोट दे देता है, तो उसे क्रॉस वोटिंग कहते हैं. 27 फरवरी को हुए राज्यसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के विधायकों के क्रॉस वोटिंग करने के आसार थे… क्रॉस वोटिंग करने वाले विधायक को पार्टी से निकाला भी जा सकता है. हालांकि, राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग होती रही है…. बता दें कि पहली बार 1998 में क्रॉस वोटिंग हुई थी. कांग्रेस प्रत्याशी की हार के बाद ओपेन बैलेट का नियम भी लाया गया, जिसके कारण हर विधायक को अपना मत पार्टी के मुखिया को दिखाना होता है, लेकिन क्रॉस वोटिंग अभी भी होती है. 2022 में हरियाणा के कांग्रेस नेता कुलदीप बिश्नोई ने क्रॉस वोटिंग की थी. वह बाद में बीजेपी में शामिल हो गए. इसी चुनाव में राजस्थान से बीजेपी नेता शोभारानी कुशवाह ने भी क्रॉस वोटिंग की थी. वह भी पार्टी से निकाल दी गईं…. यही नहीं 2016 में उत्तर प्रदेश से कांग्रेस के छह नेताओं ने बीजेपी के लिए क्रॉस वोटिंग की थी. पार्टी ने सभी को निष्कासित कर दिया था. 2017 में कांग्रेस की अपील पर दो नेताओं के वोट खारिज हो गए थे, क्योंकि इन दोनों ने अपना बैलेट पेपर अमित शाह को दिखाया था. इसके बाद कांग्रेस के अहमद पटेल राज्यसभा सांसद बने थे…. यानी सीधी सी बात यह है कि क्रॉस वोटिंग अपने पार्टी के बजाय किसी अन्य पार्टी के नेता को वोट देने से है… यानी क्रॉस वोटिंग करने से है… इसके बाद विधायकों को हटाया जा सकता है या फिर विधायक स्वयं ही उस पार्टी को छोड़ सकते हैं!

बता दे कि संविधान के मुताबिक, राज्‍यसभा चुनावों में राजनीतिक दलों की ओर से व्हिप तो जारी किया जा सकता है, लेकिन ये बेअसर ही होता है. दरअसल, पार्टी की ओर से जारी व्हिप को मानना या ना उसके खिलाफ जाना पूरी तरह से विधायकों और सांसदों की मर्जी पर निर्भर करता है. वहीं, राज्‍यसभा चुनावों में पार्टी लाइन के खिलाफ मतदान करने पर दलबदल कानून भी लागू नहीं होता है. बता दें कि राज्यसभा में सांसदों की ज्‍यादा से ज्‍यादा संख्या होना हर पार्टी के लिए जरूरी है, क्योंकि इसी संख्या के आधार पर राष्ट्रपति चुनाव में हर दल अपनी दावेदारी पेश करता है. राष्ट्रपति चुनाव में राज्‍यसभा के सदस्‍यों की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है!

सबसे पहले जानते हैं कि क्रॉस वोटिंग क्या है औऱ ऐसा करने वालों के खिलाफ क्या कार्रवाई होती है? क्रॉस वोटिंग का मतलब है कि अपनी पार्टी के खिलाफ जाकर दूसरी पार्टी के पक्ष में वोट करना. आमतौर पर दुनियाभर में राजनीतिक दलों के बीच संसद या महत्वपूर्ण मामलों में क्रासवोटिंग के उदाहरण हैं. हालांकि, पार्टियां इसे व्हिप जारी कर रोकने की पूरी कोशिश करती हैं. हालांकि, कई बार राजनीतिक दलों को इसमें नाकामी मिलती है. राज्‍यसभा चुनावों में दलबदल कानून लागू नहीं होने के कारण क्रॉस वोटिंग करने वाले विधायकों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकती हैं. साफ है कि हिमाचल प्रदेश और उत्‍तर प्रदेश में पार्टी लाइन के खिलाफ जाने वाले विधायकों पर पार्टी नेतृत्‍व कोई कार्रवाई नहीं कर पाएगा!

आखिर कहां होते हैं सबसे ज्यादा बाल विवाह?

आज हम आपको बताएंगे की सबसे ज्यादा बाल विवाह कहां होते हैं… एक समय ऐसा था जब हमारा देश बाल विवाह के लिए सबसे ज्यादा जाना जाता था… क्योंकि यहां पर बाल विवाह सबसे ज्यादा प्रचलित था, लेकिन अगर मैं वर्तमान की बात करूं तो वर्तमान में भी बाल विवाह देश के अधिकतर हिस्सों में होते हैं, हालांकि यह विवाह गैरकानूनी है, लेकिन फिर भी चोरी छुपे बाल विवाह वर्तमान में हो रहे हैं… इसी बीच ये सवाल उठता है कि आखिर यह बाल विवाह क्यों होते हैं और भारत में ऐसा कौन सा राज्य है जहां सबसे ज्यादा बाल विवाह अब भी होते हैं? तो आज हम आपको इसी बारे में जानकारी देने वाले हैं! आपको बता दें कि असम सरकार ने बाल विवाह पर रोक लगाने के मकसद से मुस्लिम विवाह और तलाक से जुड़े 1935 के कानून को खत्म कर दिया. 23 फरवरी को मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की अध्यक्षता वाली कैबिनेट ने फैसला लिया है कि अब ऐसे विवाह पूरी तरह से समाप्त कर दिए जाएंगे… ये समान नागरिक संहिता यूसीसी की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है… सीएम हिमंत बिस्वा ने ये भी कहा कि अगर लड़का और लड़की शादी की कानूनी उम्र लड़कियों के लिए 18 साल और लड़कों के लिए 21 साल तक नहीं पहुंचे हैं, तो भी उनकी शादी करा दी जाती थी.. जो कहीं ना कहीं गैरकानूनी विवाह यानी बाल विवाह को प्रेरित करता है… जिसे अब समाप्त कर दिया जाएगा… बता दें कि भारत में बाल विवाह की समस्या गंभीर है. दुनिया के 40% से ज्यादा बाल विवाह भारत में ही होते हैं. यहां लगभग आधी लड़कियों की 18 साल से पहले ही शादी कर दी जाती है. हालांकि हाल के दशकों में बाल विवाह की समस्या में कमी आई है. 1993 में जहां 49% लड़कियों की शादी कम उम्र में हो जाती थी, वहीं 2021 में यह आंकड़ा घटकर 22% हो गया है.

ये आंकड़े भले ही सकारात्मक है, लेकिन पूरे देश में बाल विवाह की समस्या अभी भी गंभीर है. 2021 में भी लगभग हर पांचवीं लड़की और हर छठे लड़के का विवाह 18 साल से कम उम्र में ही हो जाता है. यानी 2021 में लगभग 135 लाख लड़कियां और 14 लाख लड़के बाल विवाह के शिकार बने. अब भी कुछ चार-पांच राज्यों में देश के आधे से ज्यादा लड़के-लड़कियों का बाल विवाह होता है. इनमें बिहार, झारखंड, राजस्थान और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य सबसे ऊपर हैं. गांवों में शहरों के मुकाबले बाल विवाह की समस्या ज्यादा गंभीर है. गांव में 56% और शहरों में 29% लड़कियों का विवाह 18 साल से पहले हो जाता है… .बता दे भारत में विवाह की कानूनी उम्र पुरुषों के लिए 21 साल और महिलाओं के लिए 18 साल है. लैंसेट ग्लोबल हेल्थ जर्नल की हालिया रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, मणिपुर को छोड़कर देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 1993 से 2021 के बीच लड़कियों के बाल विवाह में कमी आई है. लैंसेट ग्लोबल हेल्थ जर्नल ने 1993 से 2021 तक 5 बार 1993, 1999, 2006, 2016, 2021 में हुए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे एनएफएचएस के आंकड़ों के अध्ययन के आधार पर एक रिपोर्ट जारी की है. अनुमान के अनुसार, 2021 में बाल विवाह की शिकार हुई लड़कियों की संख्या लगभग 1 करोड़ 34 लाख 64 हजार 450 थी, जबकि लड़कों की संख्या लगभग 14 लाख 54 हजार 894 थी… लड़कियों के बाल विवाह मामले में कुल आंकड़ों का आधे से ज्यादा हिस्सा सिर्फ चार राज्यों में पाया गया- बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, और महाराष्ट्र. वहीं लड़कों के लिए ये आंकड़े गुजरात, बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा थे..  यानी सीधी सी बात यह है कि अब भी बाल विवाह काफी प्रचलित है… लेकिन सवाल यह कि आज फिर ऐसी कुप्रथा को कैसे समाप्त किया जा सकता है? तो आपको बता दे कि बाल विवाह की समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए सरकार को कई स्तर पर काम करने होंगे. कम उम्र में शादी करने वाले बच्चों को शिक्षा पूरी करने का मौका नहीं मिलता है. इससे गरीबी का चक्र बना रहता है और परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं होता है. इसके अलावा कम उम्र में गर्भधारण करने से लड़कियों की मृत्यु दर बढ़ जाती है. जब बच्चे शिक्षा और रोजगार में योगदान नहीं दे पाते, तो देश का विकास भी धीमा हो जाता है. यूनिसेफ का कहना है कि देश में बाल विवाह को रोकने के लिए पर्याप्त निवेश नहीं किया जाता है. लोगों को जागरूक करने और कानूनों को लागू करने के लिए धन की कमी है. साथ ही सामाजिक और राजनीतिक इच्छाशक्ति की भी कमी है. लड़कियों को लड़कों की तुलना में बराबर का महत्‍व न दिया जाना भी एक कारण है. शिक्षा और सशक्तिकरण ही बाल विवाह खत्म करने का सबसे सटीक तरीका है. उन्हें आत्मनिर्भर बनने और पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना होगा… यानी यह कि अब बाल विवाह रोकने के लिए जागरूकता बहुत जरूरी है और कानून का सख्त होना भी बहुत जरूरी है!

एआईएफएफ सुनील छेत्री को उनके 150वें अंतरराष्ट्रीय मैच पर सम्मानित करेगा.

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150वें अंतरराष्ट्रीय मैच से पहले सुनील! भारतीय टीम के कप्तान को सम्मानित करेगा फेडरेशन सुनील ने अब तक देश के लिए 149 मैच खेले हैं और 93 गोल किए हैं. अपने 25वें, 50वें, 75वें, 100वें और 125वें अंतरराष्ट्रीय मैचों में गोल किये। 2005 में पाकिस्तान के खिलाफ डेब्यू. अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (एआईएफएफ) ने भारतीय फुटबॉल टीम के कप्तान सुनील छेत्री को विशेष अभिनंदन देने की योजना बनाई है। अगर सबकुछ ठीक रहा तो सुनील 26 मार्च को अफगानिस्तान के खिलाफ देश के लिए 150वां मैच खेलेंगे. उस दिन फेडरेशन गुवाहाटी मैदान पर उनका स्वागत करेगा.

भारतीय टीम विश्व कप 2026 और 2027 में एएफसी एशियन कप के लिए क्वालीफाइंग मैच खेल रही है। मंगलवार का मैच इगोर स्टिमाच की टीम के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अफगानिस्तान के खिलाफ पहला मैच गोलरहित समाप्त हुआ था। गुवाहाटी में एशले वेस्टवुड की टीम को हराने में नाकाम रहने पर भारतीय टीम दबाव में होगी। उस मैच से पहले फेडरेशन सुनील को 150वें अंतरराष्ट्रीय मैच का मील का पत्थर छूने के लिए सम्मानित करना चाहता है.

एआईएफएफ के अध्यक्ष कल्याण चौबे ने कहा, ”यह आश्चर्यजनक और आश्चर्यजनक बात है। सुनील छेत्री 2005 से देश के लिए खेल रहे हैं। उन्हें इतने लंबे समय तक उच्चतम स्तर पर खेलते देखना हमारे लिए सौभाग्य की बात है। सुनील अपना 150वां अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने वाले हैं. महान उपलब्धि। सुनील लंबे समय से भारतीय फुटबॉल का झंडा बुलंद रखे हुए हैं। वह न सिर्फ एक महान फुटबॉलर हैं बल्कि उन्होंने लाखों बच्चों को फुटबॉल खेलने के लिए प्रेरित भी किया। अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल में इस ऊंचाई तक पहुंचने के लिए सुनील को मेरी बधाई।”सुनील ने 12 जून 2005 को क्वेटा में पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय जर्सी में अपनी पहली उपस्थिति दर्ज की। उन्होंने अब तक 149 मैच खेले हैं और देश के लिए 93 गोल किए हैं. जो भारतीय फुटबॉलरों में सबसे ज्यादा है. उनका एक और उदाहरण है. सुनील ने अपने 25वें, 50वें, 75वें, 100वें और 125वें अंतरराष्ट्रीय मैचों में स्कोर किया।

भारतीय टीम कभी भी विश्व कप क्वालीफिकेशन के तीसरे चरण के लिए क्वालीफाई नहीं कर पाई है। सुनील छेत्री आज गुरुवार रात सऊदी अरब में अफगानिस्तान के खिलाफ पहला मैच जीतते हैं तो अपने लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में कदम बढ़ा देंगे. लेकिन द्वंद्व से पहले सहल अब्दुल समद को लेकर कोच इगोर स्टिमाच की चिंता बढ़ गई.

इगोर चोट के कारण एएफसी एशियन कप के ग्रुप चरण में ऑस्ट्रेलिया और उज्बेकिस्तान के खिलाफ सहल को टीम में नहीं रख सके। उन्होंने पिछले मैच में सीरिया के खिलाफ 64 मिनट के विकल्प के रूप में मोहन बागान स्टार को उतारा था। इगोर सहल को रखकर अफगानिस्तान को हराने की रणनीति तैयार कर रहे थे. लेकिन मंगलवार को अभ्यास के दौरान गेंद पकड़ते समय उनके पैर की मांसपेशियों में चोट लग गई. भारतीय कोच गुरुवार के मैच में सहल को खिलाने का जोखिम नहीं उठाना चाहते. सूत्रों के मुताबिक, 26 मार्च को गुवाहाटी में अफगानिस्तान के खिलाफ वापसी मैच में उनके खेलने की संभावना कम है.

ब्रेंडन फर्नांडिस भी पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हैं. उनकी जगह विक्रम प्रताप सिंह खेल सकते हैं. इसके बावजूद विशेषज्ञ गुरुवार के मुकाबले में भारत को आगे रख रहे हैं. सबसे पहले, सुनील फीफा रैंकिंग में 117वें स्थान पर हैं। अफगानिस्तान 158वें नंबर पर है. दूसरा, 18 अफगान फुटबॉलरों ने अपने देश के फुटबॉल संगठन पर वित्तीय भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए राष्ट्रीय टीम का बहिष्कार किया। हालाँकि, मोहम्मद अकबरी, ओमिद पोपलाज़ी और मोसावर अहदी हृदय परिवर्तन के साथ लौट आए हैं। तीसरा, अफगानिस्तान ने अब तक भारत को केवल एक बार हराया है।

हालांकि, न तो कोच इगोर और न ही कप्तान सुनील प्रतिद्वंद्वी को कमजोर मानते हैं। क्योंकि, बेंगलुरु एफसी के पूर्व कोच एशली वेस्टवुड अब अफगानिस्तान की राष्ट्रीय टीम के प्रभारी हैं। मैच से चौबीस घंटे पहले सुनील ने कहा, ”अफगानिस्तान आक्रामक फुटबॉल खेलता है. क्योंकि, एश्ले इसी तरह की फुटबॉल खेलती है।” उन्होंने कहा, ”एएफसी एशियन कप में क्या हुआ. काम कठिन है, लेकिन हमें पलटना होगा।” एएफसी एशियन कप के बाद से ही इस मैच के लिए टीम तैयार कर रहा है।

विश्व कप क्वालीफाइंग दौर के पहले मैच में अफगानिस्तान को कतर ने 1-8 से हरा दिया। दूसरे मैच में कुवैत से 0-4 से हार हुई. भारत ने कुवैत को उसके घरेलू मैदान पर 1-0 से हराया. हालाँकि, सुनीरा कतर से 0-3 से हार गई। भारत फिलहाल ग्रुप ए में दो मैचों में तीन अंकों के साथ तीसरे स्थान पर है। कुवैत के भी दो मैचों में तीन अंक हैं. लेकिन गोल अंतर (3) में भारत से आगे (-2) होने के कारण वे दूसरे स्थान पर हैं। तालिका में सबसे नीचे मौजूद अफगानिस्तान के शून्य अंक हैं। फिर भी, इगोर को लगता है कि गुरुवार की लड़ाई कठिन होगी। उन्होंने कहा, ”अफगानिस्तान ने विश्व कप क्वालीफायर के पहले मैच में जिस तरह से खेला था उसकी तुलना में उन्होंने काफी सुधार किया है. इसलिए यह मैच बिल्कुल भी आसान नहीं होगा।”

केकेआर के आंद्रे रसेल ने आईपीएल 2024 में SRH के खिलाफ अपनी पारी के दौरान कई रिकॉर्ड बनाए.

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ईडन में 25 गेंदों पर 64 रनों की तूफानी पारी, रसेल ने शनिवार को हैदराबाद के खिलाफ कौन सी मिसाल कायम की? आंद्रे रसेल ने शनिवार को हैदराबाद के खिलाफ ईडन गार्डन्स में जोरदार धमाका किया। 25 गेंदों पर 64 रन बनाए और गेंद से दो विकेट लिए। इस ऑलराउंडर ने बल्लेबाजी के दौरान भी कई मिसालें कायम कीं. क्या रहे हैं? आंद्रे रसेल ने शनिवार को ईडन गार्डन्स को हराया। रसेल की 25 गेंदों में 64 रनों की पारी और गेंद से दो विकेट ने कोलकाता को हैदराबाद के खिलाफ जीत दिलाने में मदद की। इस ऑलराउंडर ने बल्लेबाजी के दौरान भी कई मिसालें कायम की हैं. उनमें से एक में हमवतन क्रिस गेल ने टॉप किया है।

रसेल ने तीन चौकों और सात छक्कों की मदद से 64 रन बनाये. इनमें से मयंक मार्कंडेय और भुवनेश्वर कुमार के प्रति सबसे ज्यादा निर्दयी थे। आईपीएल के इतिहास में सबसे तेज बल्लेबाज के रूप में रसेल ने 200 छक्के लगाने का रिकॉर्ड बनाया है. उन्होंने 1322 गेंदों पर 200 छक्के लगाए। क्रिस गेल का रिकॉर्ड टूटा. गेल ने 1811 गेंदों पर 200 छक्के लगाए। साथ ही रसेल आईपीएल के इतिहास में 200 छक्के लगाने वाले नौवें क्रिकेटर बन गए।

इसके अलावा रसेल ने रिंकू सिंह के साथ सातवें विकेट के लिए 81 रन जोड़े. यह पहली बार है जब केकेआर के लिए सातवें विकेट पर इतने रन बने हैं. यह जोड़ी आईपीएल इतिहास में पांचवें स्थान पर है.

मैच के बाद रसेल ने अपने प्रदर्शन के बारे में कहा, ”गेंदबाज पिछले दो साल से मेरे खिलाफ अच्छी योजना बना रहे थे। वह योजना बना रहा था कि मुझे कैसे रोका जाए। इसलिए मुझे योजना बनानी पड़ी. मेरे शॉट के साथ खेला. इसलिए मैं इस बार अच्छा खेल रहा हूं।” रसेल ने उन पर भरोसा करने के लिए केकेआर को धन्यवाद भी दिया। उन्होंने कहा कि जब वह यह जर्सी पहनते हैं तो उन्हें अच्छे खेल की उम्मीद होती है। रसेल ने कहा, ”यह फ्रेंचाइजी मेरे बहुत करीब है. उन्होंने 2014 से मुझ पर भरोसा किया है। मैं नियमित रूप से खेलता था। वह कोलकाता की जर्सी पहनकर अच्छा खेलना चाहते हैं।’ इस बार मैं ऐसा करने में कामयाब रहा।”

आंद्रे रसेल ने आईपीएल में मिसाल कायम की. कोलकाता नाइट राइडर्स के अनुभवी ऑलराउंडर ने शनिवार को सनराइजर्स हैदराबाद के खिलाफ एक नया मुकाम हासिल किया। उन्होंने 25 गेंदों पर 64 रनों की नाबाद पारी खेलकर एक नई उपलब्धि हासिल की. उन्होंने 170 पारियों में 251 छक्के लगाए. शनिवार को इस सूची में कोलकाता के रसेल का भी नाम शामिल हो गया।

रसेल ने शनिवार को ईडन में 3 चौके और 7 छक्के लगाए। केकेआर के इस ऑलराउंडर ने ईडन में आईपीएल में 200 छक्के लगाए। यह उपलब्धि हासिल करने वाले वह नौवें क्रिकेटर हैं। रसेल ने 97वीं पारी में 200 छक्कों का आंकड़ा छुआ. शनिवार को रसेल की आक्रामक बल्लेबाजी के सामने हैदराबाद के गेंदबाज लगभग दिशाहीन नजर आए. वेस्टइंडीज के इस क्रिकेटर ने प्रतिद्वंद्वी टीम के किसी भी गेंदबाज को हिट नहीं किया। वेस्टइंडीज के पूर्व क्रिकेटर क्रिस गेल के नाम आईपीएल में सबसे ज्यादा छक्के हैं। उन्होंने 141 पारियों में 357 छक्के लगाए. भारतीय टीम के कप्तान रोहित शर्मा इस लिस्ट में दूसरे स्थान पर हैं। मुंबई इंडियंस के पूर्व कप्तान ने अब तक 238 पारियों में 257 छक्के लगाए हैं। तीसरे स्थान पर दक्षिण अफ्रीका के पूर्व बल्लेबाज एबी डिविलियर्स हैं। उन्होंने 170 पारियों में 251 छक्के लगाए. शनिवार को इस सूची में कोलकाता के रसेल का भी नाम शामिल हो गया।

उन्होंने आईपीएल के पहले ही मैच में ईडन में तूफान मचा दिया था. आंद्रे रसेल ने बल्लेबाजी के अलावा गेंद से भी 2 विकेट लिए. कोलकाता नाइट राइडर्स की जीत के पीछे रसेल की सबसे बड़ी उपलब्धि. टीम की जीत के बाद स्वाभाविक रूप से उन्हें मैन ऑफ द मैच का पुरस्कार मिला। लेकिन रसेल ने जीत का श्रेय टीम साथी हर्षित राणा को दिया। आखिरी ओवर में हर्षित ने जिस तरह से गेंदबाजी की उससे रसेल प्रभावित हुए.

आखिरी ओवर में जीत के लिए 13 रन चाहिए थे. हर्षित और रसेल दोनों के ओवर बचे थे. कई लोगों ने सोचा कि अनुभवी रसेल गेंदबाजी करेंगे। श्रेयस अय्यर ने उनकी जगह हर्षित को गेंद थमाई. मैच के बाद रसेल ने कहा कि हर्षित अपनी ही गेंद खेलना चाहते थे. रसेल ने कहा, “हमने बातचीत की।” हर्षित ने मुझसे कहा कि वह बात करना चाहता है। मेरे हाथ से गेंद लगभग छीन ही ली. पहली गेंद पर छक्का लगाकर हर्षित वापस आ गए हैं। टीम जीत गई।”