Thursday, March 5, 2026
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राहुल गांधी और प्रियंका गांधी नहीं बनना चाहते लोकसभा चुनाव 2024 में अमेठी-रायबरेली से उम्मीदवार.

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यदि न तो राहुल गांधी और न ही प्रियंका गांधी वाड्रा उत्तर प्रदेश के अमेठी-रायबरेली से चुनाव लड़ते हैं, तो समाजवादी पार्टी चाहती है कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे उत्तर प्रदेश की गारंटी वाली सीटों में से एक से चुनाव लड़ें।

समाजवादी पार्टी के मुताबिक, अगर गांधी परिवार से कोई भी उत्तर प्रदेश से चुनाव नहीं लड़ता है, तो यह संदेश जाएगा कि ‘भारत’ ने देश के सबसे बड़े राज्य में पहले ही हार मान ली है. ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष को उत्तर प्रदेश से उम्मीदवार होना चाहिए. कांग्रेस की हिंदी मंडली में पहले ही यह बात बैठ चुकी है कि कांग्रेस की ताकत सिर्फ दक्षिण भारत में है. यदि कांग्रेस अध्यक्ष स्वयं उत्तर प्रदेश से लोकसभा जीतते हैं तो यह विचार गलत साबित होगा। हालाँकि, खड़गे राज्यसभा में सांसद हैं और वहां विपक्ष के नेता हैं। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, अब तक राहुल और प्रियंका में से कोई भी अमेठी या रायबरेली से उम्मीदवार नहीं बनना चाहता है। मंगलवार शाम को कांग्रेस केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक हो रही है. पिछले लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी अमेठी से हार गए थे. जीत केरल के वेनार से लोकसभा में गए।
कांग्रेस ने पहले ही वेनाड के लिए अपने उम्मीदवार के रूप में उनके नाम की घोषणा कर दी है। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, राहुल गांधी अब अमेठी से चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं. उनके मुताबिक दो सीटें जीतने के बाद एक सीट छोड़ने से खराब संदेश जाता है.

वहीं, प्रियंका भी सोनिया गांधी की सीट रायबरेली से उम्मीदवार नहीं बनना चाहती हैं. सोनिया ने रायबरेली छोड़ दिया और राज्यसभा जीतकर सांसद बन गईं। प्रियंका ने कांग्रेस नेताओं से कहा कि अगर सोनिया, राहुल के साथ वह भी उम्मीदवार बनती हैं या संसद जीतती हैं तो वह कांग्रेस से गांधी परिवार की तीसरी सदस्य बनेंगी. परिणामस्वरूप, भाजपा के लिए परिवारवाद पर उंगली उठाना आसान हो जाएगा। बीजेपी जहां उपहास कर रही है, वहीं पिछली बार राहुल के अमेठी में स्मृति ईरानी से हारने के बाद कांग्रेस को इस बार भी रायबरेली में जीत का भरोसा नहीं है. इसलिए राहुल-प्रियंका उम्मीदवार नहीं बनना चाहते.

बीजेपी खेमे में इस बात को लेकर अटकलें चल रही हैं कि क्या बीजेपी इस बार गांधी परिवार के दूसरे खेमे के दो सदस्यों, वरुण गांधी और मेनका गांधी को पिलीवित और सुल्तानपुर से मैदान में उतारेगी. केंद्रीय चुनाव समिति इस सप्ताह बीजेपी उम्मीदवारों की सूची पर बैठक करेगी. मेनका पिछले बीस साल से बीजेपी की सांसद हैं. इससे पहले वह जनता दल के टिकट पर या फिर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर सांसद बने थे. वरुण 2009 से बीजेपी सांसद भी हैं. लेकिन किसान आंदोलन के बाद से वह कई मुद्दों पर मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ उतर आए हैं. अटकलें लगाई जा रही हैं कि इस बार बीजेपी उन्हें मैदान में उतारेगी या नहीं. हालांकि, वरुण ने हाल ही में अपने सुर नरम किए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काम की तारीफ की.

राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक, अगर बीजेपी अंततः वरुण को मैदान में नहीं उतारती है, तो वह अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के समर्थन से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में खड़े हो सकते हैं। ऐसे में कांग्रेस को भी सीट समझौते के फॉर्मूले पर अमल करते हुए वरुण का समर्थन करना होगा. उत्तर प्रदेश में सीटों के समझौते में समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस के लिए 17 सीटें छोड़ी हैं. लेकिन अखिलेश के करीबी लोगों का कहना है कि अगर कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ने के लिए राजी हो जाते हैं तो वे एक और सीट छोड़ सकते हैं, जहां जीत की संभावना ज्यादा है. चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल पुलिस के डीजी राजीव कुमार के साथ-साथ छह राज्यों के गृह सचिवों को भी हटा दिया।

समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, इस सूची में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का राज्य गुजरात और योगी आदित्यनाथ का राज्य उत्तर प्रदेश शामिल है। संयोग से, मोदी उत्तर प्रदेश के वाराणसी से सांसद हैं। जिन छह राज्यों में गृह सचिवों को हटाया गया है उनमें से चार में बीजेपी और उसके सहयोगी दल सत्ता में हैं. चुनाव आयोग के सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड के गृह सचिवों को हटाने के आदेश जारी कर दिए गए हैं. , हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड। गुजरात और उत्तर प्रदेश के अलावा उत्तराखंड में भी बीजेपी सत्ता में है. बिहार में जेडीयू-बीजेपी का गठबंधन. हिमाचल में कांग्रेस और झारखंड में जेएमएम-कांग्रेस गठबंधन सत्ता में है. इसके अलावा मिजोरम और हिमाचल प्रदेश के सामान्य प्रशासनिक विभाग के सचिवों को भी हटा दिया गया है. एक समय भाजपा की सहयोगी रही जेडपीएम पूर्वोत्तर मिजोरम में सत्ता में है।

आखिर क्या है मध्यप्रदेश के भोजशाला का इतिहास?

आज हम आपको मध्यप्रदेश के भोजशाला का इतिहास बताने जा रहे हैं! हाईकोर्ट के फैसले के बाद धार जिले स्थित भोजशाला परिसर में गहमागहमी बढ़ गई है। हिंदू संगठन के लोग वहां जश्न मना रहे हैं। वहीं, दूर-दूर से लोग अब भोजशाला को देखने आने लगे हैं। हाईकोर्ट के फैसले के बाद भोजशाला में पहले की तुलना में गहमागहमी बढ़ गई है। हिंदू संगठन के लोग हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे थे। भोजशाला परिसर का विवाद 800 साल पुराना है। यहां के खंभों पर हिंदू धर्म से जुड़ी आकृतियां हैं। इसके बाद हिंदू पक्ष कहता है कि राजा भोज द्वारा बनवाया गया है, यह भोजशाला है। वहीं, मुस्लिम पक्ष के लोग इस कमाल मौला मस्जिद बताते हैं। उनका कहना है कि हम 800 साल से यहां नमाज पढ़ रहे हैं। हमें हाईकोर्ट के फैसले पर पूर्ण विश्वास है। बनारस के ज्ञानवापी में पूजा का अधिकार दिए जाने के बाद हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ट्रस्ट ने हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में अपनी याचिका के बीच अंतरिम आवेदन प्रस्तुत किया था। इसमें धार की भोजशाला में तथ्य और प्रमाणों के लिए ASI भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को सर्वे कराने के निर्देश देने बाबत मांग की थी। 11 मार्च 2022 को इसे लेकर फैसला आ गया है। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि ASI के महानिदेशक या अतिरिक्त महानिदेशक के नेतृत्व में ASI के 5 या 5 से ज्यादा अधिकारियों की एक विशेष समिति बनाए। यह भोजशाला की ऐतिहासिकता का वैज्ञानिक और तकनीकी सर्वे करें। सर्वे पर एक डॉक्यूमेंट रिपोर्ट छह हफ्ते के अंदर अदालत को सौंपे।

मई 2022 में हिंदू संगठन हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की तरफ से एक याचिका लगाईं गई थी, जिसमें भोजशाला को मंदिर बनाए जाने, वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित करने, विधिवत पूजा अर्चना करने और नमाज बंद करने जैसी मांग की गई थी। जिस पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने फैसला सुनाते हुए धार की ऐतिहासिक भोजशाला का ज्ञानवापी की तर्ज पर सर्वे कराने के आदेश दिए हैं। हाईकोर्ट ने सोमवार को इस मुद्दे पर आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को पांच विशेषज्ञों की टीम बनाने को कहा है। इस टीम को छह सप्ताह में रिपोर्ट हाई कोर्ट को सौंपनी होगी। हिन्दू फ्रंट का मानना है कि ASI सर्वेक्षण के दौरान खुदाई में कई मूर्तियां, चिह्न और संकेत ऐसे पाए जाएंगे, जिससे यह साफ हो सकेगा कि यह मस्जिद नहीं बल्कि पूर्णतः मंदिर ही था।

हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के संयोजक आशीष गोयल ने नवभारत टाइम्स.कॉम से बात करते हुए कहा कि लंबी मेहनत के बाद हमें सफलता मिली है। कोर्ट में हमने सारे साक्ष्य दिए हैं। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सारे पक्षों को नोटिस जारी किया था। सारी पार्टियों ने धीरे-धीरे जवाब दिया था। पांच फरवरी 2024 में हमने एक याचिका लगाई थी कि कोर्ट भोजशाला परिसर की एक साइंटिफिक सर्वे कराए। कोर्ट ने सबकी सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि वाग्देवी की मूर्ति ब्रिटिश संग्रहालय में है। इसे लाकर यहां फिर से स्थापित किया जाए। साथ ही अवैध रूप से हो रहे नमाज को बंद किया जाए। कोर्ट ने सर्वे के दौरान फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी कराने के निर्देश दिए हैं। हमारी मांग है कि हमें 24 घंटे 365 दिन यहां पूजा की अनुमति दी जाए। सर्वे 50 मीटर की परिधि में होगी। इसमें तमाम आधुनिक तकनीक का प्रयोग किया जाएगा। वहीं, उन्होंने कहा कि यहां साक्ष्य की क्या जरूरत है। मंदिर के खंभों के मूर्तियां बनी हुई है। यहां चांद पीठ और सूर्य पीठ बने हुए हैं। ये चीजें हिंदू और सनातन परंपरा में होती है। ऐसे में यह निश्चित रूप से हिंदू परंपरा का केंद्र रहा है। भोजशाला का हर साक्ष्य अपने आप में बोलता है। भोजाशाल में लगी शिलालेख भी इसकी गवाही देती है। गौरतलब है कि पिछले तीन दशकों से धार की भोजशाला को लेकर कई बार हिंसा की घटनाएं और कर्फ्यू जैसे हालात भी बन चुके हैं। हर साल बसंत पंचमी पर भोजशाला को लेकर दोनों पक्षों के बीच तनाव की स्थिति बनती है। अप्रैल 2003 में कोर्ट के निर्देशों के बाद धार की भोजशाला में प्रति मंगलवार को हिंदू समाज के लोग पूजा-अर्चना करते हैं। जबकि शुक्रवार को मुसलमानों को नमाज पढ़ने की अनुमति होती है। वसंत पंचमी पर हिंदू समाज को पूरे दिन पूजा-अर्चना की अनुमति होती है।

वहीं, अदालत ने स्मारक अधिनियम, 1958 की धारा 16 पर ध्यान केंद्रित किया है, जिसका उद्देश्य पूजा स्थलों को दुरुपयोग, प्रदूषण और अपवित्रता से बचाना है। कोर्ट ने इस धारा के तहत इसके प्राथमिक उद्देश्य को समझने के लिए पूजा स्थल के चरित्र को निर्धारित करने के महत्व पर जोर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक पूजा स्थल का चरित्र या प्रकृति निर्धारित नहीं हो जाती, तब तक मंदिर का उद्देश्य रहस्य में डूबा रहता है। कोर्ट का निर्णय इन पवित्र स्थलों के उद्देश्य के बारे में स्थिति स्पष्ट करेगी।

कोर्ट ने माना है कि स्मारक की प्रकृति और चरित्र को समझने और स्पष्ट करने की आवश्यकता है। उसने कहा है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की जिम्मेदारी है कि वह रहस्यों को उजागर करे और स्थल से जुड़े भ्रम को दूर करे। अदालत ने यह भी नोट किया है कि राज्य सरकार और ASI ने चल रहे विवाद और उससे निपटने से जुड़ी चुनौतियों को स्वीकार किया है। अदालत के अनुसार, स्मारक से जुड़ी उलझनों और परस्पर विरोधी कहानियों को सुलझाने का काम अदालत का नहीं, बल्कि ASI का है। अदालत की ये टिप्पणियां संबंधित पक्षों द्वारा प्रस्तुत तर्कों के दौरान की गईं।

आखिर क्यों मनाया जाता है हमारे देश में फूलदेई पर्व?

आज हम आपको बताएंगे कि हमारे देश में फूलदेई पर्व क्यों मनाया जाता है! देहरादून: झरने, नदी, पहाड़, बर्फ… दिल्ली से महज 300 किलोमीटर दूर ‘देवभूमि’ उत्तराखंड का खुशनुमा माहौल जिंदगी की सारी टेंशन को छू मंतर कर देता है। कहा जाता है यहां प्रकृति इंसानों से बात करती है। पहाड़ों से आने वाली ठंडी हवाएं, मिट्टी की सौंधी खुशबू, झरने की संगीतमय धुन और चिड़ियों की चहचहाहट, इंसानों को अहसास दिलाती है कि प्रकृति के बिना उसका कोई अस्तित्व नहीं है। दुर्गम पहाड़ों पर बने शिवालय और मां भगवती के मंदिर बताते हैं कि इंसान कितनी भी तरक्की कर लें, लेकिन ईश्वर के आशीर्वाद के बिना इस सृष्टि का कोई मोल नहीं है। उत्तराखंड के पहाड़ों की सैर पर जाने वाला हर शख्स बस यहीं का होकर रहना चाहता है। लेकिन घर गृहस्थी की जिम्मेदारियां उसे दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों की ओर खींचकर ले आती है। हम समझ सकते हैं आप पहाड़ को कितना मिस करते हैं, इसलिए आपको समय-समय पर पहाड़ के त्योहारों से रूबरू करवाते रहते हैं। आज भी एक खास त्योहार है। इस त्योहार को ‘फूलदेई’ कहते हैं। इसे चैत्र संक्रांति के दिन मनाया जाता है। दरअसल हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र मास ही हिंदू नववर्ष का पहला महीना होता है। बसंत ऋतु के स्वागत के तौर पर भी फूलदेई पर्व मनाया जाता है। फूलदेई’ पर्व में बच्चों का खास महत्व होता है। उत्तराखंड के कुमाऊं में फूलदेई पर्व मनाया जाता है। इस दौरान बच्चों की टोली थाली को सजाकर उसमें चावल, फूल और गुड़ रखती है और आसपास के घरों में जाकर मुख्य द्वार की चौखट पर फूलदेई करते हैं। यानी देहली पर अक्षत और फूल फेंकते हैं और घरों की खुशहाली की कामना करते हैं। इस पूरी रस्म के दौरान वे लोकगीत भी गाते हैं। यह लोक गीत है- फूलदेई छम्मा देई, दैणी भरभंकार, यो देली सो बारम्बार, फूलदेई छम्मा देई, जातुके देला उतुके सई। अल्मोड़ा के डढूली गांव की निवासी शांति देवी ने इस गीत का मतलब समझाया। वह बताती हैं इस लोकगीत के माध्यम से बच्चे कुल देवी-देवताओं से प्रार्थना करते हैं कि ‘देहली फूलों से भरपूर और मंगलकारी हो। सबके घरों में अन्न का पूर्ण भंडार हो।’ वह बताती हैं कि आज के दिन छोटे बच्चे फूलदेई, छम्मा देई गीत गाते हुए सुबह से ही अपने घरों से निकल जाते हैं। अपनी डलिया में बच्चे फ्योंली, बुरांस और दूसरे स्थानीय रंग बिरंगे फूलों को चुनकर लाते हैं और उनसे सजी फूलकंडी लेकर घोघा माता की डोली के साथ घर-घर जाकर फूल डालते हैं और सुख-समृद्धि की मंगलकामना के साथ यह गीत गाते हैं। बच्चों की टोली जिन घरों में जाती है, उन्हें घर के लोग उन्हें रुपये और गुड़ भेंट करते हैं। यह पर्व 8 दिनों तक मनाया जाता है। इस दौरान चावल और गुड़ से बच्चों के लिए अनेक पकवान बनाए जाते है। यह लोकपर्व बताता है कि प्रकृति के बिना इंसान का कोई वजूद नहीं।

प्रकृति से जुड़े इस त्योहार को कुमाऊं में ‘फूलदेई’ जबकि गढ़वाल में ‘फूल संक्रांति’ कहते हैं। इन दिनों पहाड़ों में जंगली फूलों की भी बहार रहती है। चारों ओर छाई हरियाली और कई प्रकार के खिले फूल प्रकृति की खूबसूरती में चार-चांद लगाते हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र महीने से ही नववर्ष होता है। नववर्ष के स्वागत के लिए कई तरह के फूल खिलते हैं। उत्तराखंड में चैत्र मास की संक्रांति अर्थात पहले दिन से ही बसंत आगमन की खुशी में फूलों का त्योहार फूलदेई मनाया जाता है। इस शुभ अवसर पर देवभूमि के लोग प्राचीन समय से ही अपने ईष्ट देवी-देवताओं, मंदिरों में जाकर पूजा अर्चना करते आए हैं। यहां लगभग हर संक्रांति को एक लोकपर्व के रूप में मनाया जाता है।

इस त्योहार को क्यों मनाया जाता है? यह सवाल आपके मन में जरूर उठ रहा होगा। इस त्योहार को लेकर पहाड़ों में अनेक लोक कथाएं प्रचलित है। एक मान्यता के अनुसार, सदियों पहले जब पहाड़ों में घोघाजीत नामक राजा का शासन था। उसकी घोघा नाम की एक पुत्री थी‌। कहा जाता है कि घोघा प्रकृति प्रेमी थी। परंतु एक दिन छोटी उम्र में ही घोघा कहीं लापता हो गई। जिसके बाद से राजा घोघाजीत काफी उदास रहने लगे। तभी कुलदेवी ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि राजा गांवभर के बच्चों को वसंत चैत्र की अष्टमी पर बुलाएं और बच्चों से फ्योंली और बुरांस देहरी पर रखवाएं। जिससे घर में खुशहाली आएगी। राजा ने ऐसा ही किया। जिसके बाद से ही पूरे राज्य में फूलदेई मनाया जाने लगा।

वहीं एक अन्य लोककथा के अनुसार, फ्योंली नामक एक वन कन्या थी। जो जंगल मे रहती थी। जंगल के सभी लोग उसके दोस्त थे। उसकी वजह से जंगल मे हरियाली और समृद्धि थी। एक दिन एक देश का राजकुमार उस जंगल में आता है और उसे फ्योंली से प्रेम हो गया। वह उससे शादी करके उसे अपने देश ले गया। कहा जाता है कि इस दिन के बाद जहां पेड़ पौधें मुरझाने लगे, जंगली जानवर उदास रहने लगे वहीं फ्योंली को अपने ससुराल में मायके और अपने जंगल के मित्रों की याद आने लगी। परंतु सास उसे मायके जाने नहीं देती थी। बार-बार प्रार्थना करने बाद भी जब ससुराल वालों का दिल नहीं पसीजा तो एक दिन मायके की याद में तड़पकर फ्योंली मर जाती है। ससुराल वालों द्वारा उसे जिस जगह पर दफनाया जाता है वहां कुछ समय बाद पीले रंग का एक सुंदर फूल खिलता है जिसे फ्योंली के नाम से ही जाना जाता है। फूलदेई पर इसी फूल को चौखट पर रखा जाता है।

आखिर क्या है बीजेपी की उम्मीदवारों की नई लिस्ट का राज?

आज हम आपको भाजपा की उम्मीदवारों की नई लिस्ट का राज बताने जा रहे हैं! भारतीय जनता पार्टी इस बार लोकसभा की कम-से-कम 370 सीटें जीतने के लक्ष्य से उम्मीदवारों की घोषणा में काफी सावधानियां बरत रही है। इस कारण कई सांसदों के टिकट कट रहे हैं तो कई नए चेहरों को मौका दिया जा रहा है। इनमें दूसरी पार्टियों से आए नेता भी शामिल हैं। भाजपा ने लोकसभा चुनावों के लिए उम्मीदवारों को दूसरी लिस्ट बुधवार को जारी की है। पार्टी ने पहली लिस्ट 2 मार्च को जारी की थी। यानी, बीजेपी ने दूसरी लिस्ट जारी करने में 10 दिन लगाए हैं। भाजपा उम्मीदवारों की दूसरी लिस्ट, पहली लिस्ट के मुकाबले छोटी है। दूसरी लिस्ट में 72 कैंडिडेट्स घोषित किए गए। इस लिस्ट में नौ राज्यों और दो केंद्रशासित प्रदेशों (दादर एवं नागर हवेली और दिल्ली) से कैंडिडेट्स के नाम हैं। महाराष्ट्र से 20, कर्नाटक से 20, गुजरात से 7, हरियाणा से 6, तेलंगाना 6, मध्य प्रदेश से 5, हिमाचल से 2, दिल्ली से 2, उत्तराखंड 2, दादर-नागर हवेली से 1 और त्रिपुरा से 1 सीट पर कैंडिडेट घोषित। बीजेपी ने लोकसभा चुनाव के लिए अपनी पहली कैंडिडेट लिस्ट 2 मार्च को जारी की थी। उस लिस्ट में 16 राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेशों में 195 सीटों पर उम्मीदवार घोषित किए गए थे।

बीजेप ने दूसरी लिस्ट में पांच केंद्रीय मंत्रियों को टिकट दिया है। इनके नाम हैं- नितिन गडकरी सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री, पीयूष गोयल वाणिज्य एवं उद्योग, उपभोक्ता मामलों, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण और कपड़ा मंत्री, प्रह्लाद जोशी संसदीय कार्य, कोयला और खनन मंत्री, अनुराग ठाकुर सूचना एवं प्रसारण और युवा मामलों एवं खेल मंत्री और राव इंद्रजीत सिंह सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन और योजना राज्य मंत्री। पहली लिस्ट में 34 केंद्रीय मंत्रियों को टिकट मिला था। इस तरह, बीजेपी ने अब तक कुल 39 केंद्रीय मंत्रियों को लोकसभा का टिकट दे दिया है। पीयूष गोयल करीब चार दशकों के राजनीतिक जीवन में पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। हां, दर्शना जरदोश का टिकट कटा है। वो रेलवे और कपड़ा मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं। गुजरात की सूरत सीट पर उनकी जगह इस बार चंद्रकांत दलाल को बीजेपी का टिकट मिला है।

दूसरी लिस्ट में बीजेपी ने 30 सांसद बदले हैं। इनमें एक कर्नाटक से सदानंद गोड़ा हैं जिन्होंने नवंबर, 2023 में ही राजनीति से संन्यास लेने का ऐलान किया था। उनके अलावा, दिल्ली में दो, उत्तराखंड में दो, गुजरात में पांच, हरियाणा में दो, कर्नाटक में नौ, मध्य प्रदेश में दो, महाराष्ट्र में पांच, तेलंगाना में दो और त्रिपुरा में एक सांसद का टिकट काटा गया है। सबसे ज्यादा कर्नाटक के सांसदों के टिकट कटे हैं। बुधवार को घोषित 20 नामों की सूची में पार्टी ने वहां 10 मौजूदा सांसदों को टिकट नहीं दिया है। इसके बाद महाराष्ट्र और गुजरात में क्रमशः सात और पांच मौजूदा सांसदों को टिकट नहीं दिया गया है।कर्नाटक के मैसूर से सांसद प्रताप सिम्हा का टिकट काटा गया है। कुछ महीने पहले जब संसद की सुरक्षा में सेंध लगी थी और लोकसभा की विजिटर्स गैलरी से दो लोग हाउस में कूद गए थे तब यह सामने आया था कि वे प्रताप सिम्हा के नाम से ही पास बनाकर संसद पहुंचे। कर्नाटक से नलिन कुमार कतील का भी टिकट काटा गया है, वह भी अपने बयानों से विवादों में रहे हैं।इस लिस्ट में एक ही केंद्रीय मंत्री का टिकट कटा है। सूरत से दर्शना जरदोश की जगह मुकेशभाई चंद्रकांत दलाल को टिकट दिया गया है। बीजेपी उम्मीदवारों की पहली लिस्ट में 33 सांसदों का टिकट काटा गया था। इनमें प्रज्ञा ठाकुर, रमेश बिधूड़ी और परवेश वर्मा जैसे चर्चित नाम शामिल हैं। इस तरह अब तक घोषित 267 उम्मीदवारों में से बीजेपी के 67 सांसदों के टिकट कट चुके हैं। वहीं, 140 मौजूदा सांसदों को दोबारा मौका मिला है।

इस लिस्ट में हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर करनाल, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बासवराज बोम्मई हावेरी और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत हरिद्वार लोकसभा सीट से कैंडिडेट बनाए गए हैं। पहली लिस्ट में बीजेपी ने शिवराज सिंह चौहान, बिप्लव देब, सर्वानंद सोनेवाल, अर्जुन मुंडा जैसे पूर्व मुख्यमंत्रियों को टिकट दिए थे। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज को विदिशा से, त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लब देब को त्रिपुरा पश्चिम, असम के पूर्व मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल को डिब्रूगढ़ जबकि झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को खूंटी से टिकट मिला था। वहीं, उत्तराखंड के एक और पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का टिकट कट गया है। दूसरी लिस्ट में घोषित 72 कैंडिडेट्स में बीजेपी ने 15 महिलाओं को शामिल किया है। बीजेपी ने अपनी पहली लिस्ट में 28 महिलाओं को लोकसभा चुनाव का टिकट दिया था। इस तरह, कुल 267 उम्मीदवारों में बीजेपी ने 43 महिलाओं को अपना उम्मीदवार बनाया है। बीजेपी ने अब तक जारी दो लिस्ट में जिन 267 कैंडिडेट्स के नाम घोषित किए हैं, उनमें दो ने अपने नाम वापस ले लिए हैं। इनमें एक पश्चिम बंगाल की आसनसोल लोकसभा सीट से भोजपुरी कलाकार पवन सिंह और उत्तर प्रदेश की बाराबंकी लोकसभा सीट से उपेंद्र सिंह रावत शामिल हैं।

आखिर कैसी है भारत की नई विदेश नीति?

आज हम आपको भारत की नई विदेश नीति के बारे में जानकारी देने वाले हैं! हमारे लिए अमेरिका से राब्ते में रहने, चीन को रोकने, यूरोप से फायदा उठाने, रूस को भरोसे में रखने, जापान से गलबहियां करने, पड़ोसियों को लुभाने, पड़ोस एवं समर्थन के पारंपरिक क्षेत्रों का विस्तार करने का समय है।’ विदेश मंत्री एस. जयशंकर की पुस्तक ‘द इंडिया वे’ में लिखे इस एक वाक्य से नरेंद्र मोदी सरकार की विदेश नीति की बहुआयामी झलक मिल जाती है। इसे जमीन पर परखने की कोशिश करेंगे तो पता चलेगा कि मोदी सरकार बिल्कुल इसी नजरिए से भारत की विदेश नीति को बढ़ा रही है। बीते 10 वर्षों में भारत के विदेशों से विकसित हो रहे संबंधों का जायजा लेते हैं तो कुछ प्रमुख बिंदु स्पष्ट रूप से उभरते हैं। वो यह कि भारत ने विदेशों के साथ संबंधों में ‘संतुलन’ साधने की पुरजोर कोशिश की है। वक्त की मांग समझते हुए भारत ने जिसे दंडित किया तो उसकी मदद भी की। पाकिस्तान इसका बड़ा उदाहरण है। इसी तरह, आपदा में तुर्किये की मदद के लिए सबसे पहले अपनी टीम भेजकर भारत ने दुनिया को यह बताया कि मतभेद अपनी जगह, लेकिन मानवीय सहायता की दरकार में भारत हमेशा सबसे भरोसेमंद है। यही भारत की पहचान है। लेकिन इस पहचान के साथ एक नया पहलू भी जुड़ा है- छेड़ोगे तो छोड़ेंगे नहीं। चीन-पाकिस्तान जैसे देशों के प्रति भारत के कठोर रुख ने दुनिया को बिल्कुल सटीक संदेश दे दिया है। तो आइए, मोदी सरकार के 10 साल के कार्यकाल का जायजा लेने की कड़ी में आज भारत की ‘विदेश नीति’ के इन्हीं पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करते हैं। पहले बात उदारता की। जयशंकर अपनी पुस्तक ‘द इंडिया वे’ में एक जगह लिखते हैं, ‘मानवीय सहायता और आपदा में मदद उदार रुख प्रदर्शित करने का एक स्पष्ट तरीका है।’ कोरोना वायरस से पैदा हुई वैश्विक महामारी कोविड-19 ने दुनिया के सामने मानवता की रक्षा का सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया तब भारत इसका हल ढूंढने में जुट गया। इसने न सिर्फ अपने लिए बल्कि पूरे विश्व को ध्यान में रखकर समाधान ढूंढने में एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया और जब वैक्सीन के रूप में वह समाधान मिला तो इसे सबके लिए सुलभ करने का बीड़ा भी उठाया। भारत ने कोविड के दौरान ‘वैक्सीन मैत्री’ पहल के जरिए 100 से अधिक देशों को टीके और 150 से अधिक देशों को दवाइयां दीं। वैश्विक व्यवधानों के दौरान विश्वसनीय आपूर्ति श्रृंखलाओं पर भारत की ऐसी पहल ने साझेदार देशों के साथ विश्वास को बढ़ावा दिया है।

दूसरी तरफ, तुर्किये जैसे विरोधी देश में आपदा आई तब भारत ने मानवता की रक्षा में दौड़ पड़ा। पिछले साल फरवरी में तुर्किये में भयंकर भूकंप आया। उस वक्त भारत ने दुनिया के किसी और देश से पहले मदद भेजी। एनडीआरएफ सर्च एंड रेस्क्यू टीम, डॉग स्क्वॉड, मेडिकल सप्लाई, ड्रिलिंग मशीन और अन्य उपकरण तुर्किये भेजे गए। यह सब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश पर हुआ। इसके बाद भी जब तुर्किये ने संयुक्त राष्ट्र में भारत के खिलाफ जहर उगला तो मोदी सरकार की पहल पर सवाल उठने लगे। एक राय यह सामने आई कि भारत के प्रति दुश्मनी के भाव के कारण तुर्किये इस तरह की उदारता के लायक नहीं है। लेकिन द इंडिया वे में एस. जयशंकर लिखते हैं, ‘दुनिया को यह जरूर बताया जाना चाहिए कि सीमित संसाधनों के बावजूद हमने दूसरों को आर्थिक मदद और ट्रेनिंग मुहैया कराई। दुनिया के साथ हमारे बढ़ते राब्ते को महज हमारी महत्वाकांक्षा के चश्मे से देखना सही नहीं, इसके बहुत अलग और गंभीर मायने हैं।’

जयशंकर के इस विचार की पुष्टि 19 पाकिस्तानी नागरिकों को सोमालिया के समुद्री डाकुओं के चंगुल से छुड़ाए जाने की घटना से भी होती है। इसी वर्ष जनवरी में भारतीय नौसेना के युद्धपोत आईएनएस सुमित्रा ने पाकिस्तानी मछुआरों के जहाज अल नाईमी को समोलियाई डाकुओं से मुक्त कराया। उस जहाज के चालक दल में 19 पाकिस्तानी नागरिक थे। भारतीय सैनिक उस पाकिस्तान के नागरिकों की जान बचाने के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी जिसने भारत को आतंकवाद का दर्द दिया। आज भी वह भारत की बर्बादी के सपने देखता है। मोदी सरकार में भारत ने पाकिस्तान की इस बीमारी का इलाज भी वक्त-वक्त पर किया है। वो चाहे सर्जिकल स्ट्राइक हो या एयर स्ट्राइक, मोदी सरकार ने पाकिस्तान को साफ संदेश दे दिया कि वो ‘जैसा करेगा, वैसा भरेगा।’ उड़ी अटैक के बाद भारतीय सेना ने 29 सितंबर, 2016 को पाकिस्तान के अधिकृत कश्मीर (पीओके) में आतंकवादी लॉन्च पैड्स पर सर्जिकल स्ट्राइक किया था। पाकिस्तान उसके बाद भी पुलवामा में सीआरपीएफ की टुकड़ी पर हमला करवा दिया। इसके जवाब में 26 फरवरी, 2019 को बालाकोट एयरस्ट्राइक हुआ।इस कार्रवाई में भारत ने पाकिस्तान के करीब 300 आतंकी मार गिराए। मतलब साफ है, अब यह संभव नहीं कि भारत के खिलाफ साजिश को अंजाम देकर पाकिस्तान चैन से बैठ जाए। उसकी हरकतों पर बीते 10 वर्षों से मुंहतोड़ जवाब मिल रहा है।

मोदी सरकार की उदार विदेश नीति के नमूने खाड़ी देशों के साथ भारत के मौजूदा रिश्तों में देखे जा सकते हैं। अरब के मुस्लिम देश ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान के समर्थक और भारत के अनिवार्य विरोधी रहे। मोदी सरकार ने विदेश नीति में उदारता का भाव भरकर इस स्थिति को उलट दिया। सऊदी अरब, यूएई, बहरीन से लेकर कई देश आज भारत के साथ रिश्ते मजबूत करने को प्राथमिकता दे रहे हैं। कई देशों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा। यहां तक कि यूएई ने पीएम मोदी के आग्रह पर भव्य मंदिर बनाने की न केवल अनुमति दी बल्कि वहां के राज परिवार ने जमीन भी मुहैया कराई। भारत के मुस्लिम देशों के साथ सुधरे संबंधों का ही नतीजा है कि जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद पाकिस्तान ने लाख प्रॉपगैंडा किया लेकिन किसी खाड़ी देश का उसे मनमाफिक समर्थन नहीं मिला। मुस्लिम देशों के संगठन आईओसी ने जरूर भारत के फैसले के खिलाफ प्रस्ताव पास किए, लेकिन वो औपचारिकता से बढ़कर और कुछ नहीं हैं।

आखिर क्यों हो रहीं हैं IIT कानपुर में आत्महत्याएँ?

वर्तमान में IIT कानपुर में काफी आत्महत्याएँ देखने को मिल रही हैं! आईआईटी कानपुर में एक महीने के अंदर तीन सुइसाइड हो चुके हैं। आईआईटी कानपुर में लगातार सुइसाइड के मामले सामने आ रहे हैं। जिसकी वजह आईआईटी प्रशासन सवालों के घेरे में है। आईआईटी कानपुर में जितनी भी सुइसाइड केस हुए हैं, उनकी असल वजह अभी तक सामने आई है। सभी मौतें एक रहस्य बन कर रह गईं हैं। बल्कि सुइसाइड करने वालों छात्रों के परिजनों भी नहीं समझ पाए कि उनके बच्चे ने आत्महत्या क्यों की? आइए अब तक हुए मामलों पर सिलसिलेवार ढंग से नजर डालते हैं,झारखंड के दुमका जिले के रणबहियार गांव में रहने वालीं प्रियंका जायसवाल केमिकल इंजिनियरिंग से पीएचडी कर रहीं थीं। प्रियंका ने बीते 29 दिसंबर 2023 को दाखिला लिया था। प्रियंका के पिता नरेंद्र जायसवाल बीसीसीएल माइंस रेस्क्यू स्टेशन सुदामडीह के प्रभारी प्रबंधक हैं। वर्तमान में उनकी तैनाती धनबाद में है। छात्रा के पिता नरेंद्र जायसवाल गुरूवार सुबह से बेटी को कॉल कर रहे थे। लेकिन प्रियंका का फोन रिसीव नहीं हो रहा था। जिसकी वजह से नरेंद्र परेशान थे। जब प्रियंका ने कॉल रिसीव नहीं की, तो उन्होंने हॉस्टल मैनेजर रितु पांडेय को कॉल किया। उन्होंने हॉस्टल मैनेजर को बताया कि उनकी बेटी सुबह से फोन नहीं उठा रही है। रितु पांडेय ने जब जाकर देखा, तो प्रियंका का शव उसके कमरे में फंदे से लटक रहा था।

आईआईटी कानपुर में केमिकल इंजिनियरिंग से पीएचडी करने वाली छात्रा प्रियंका जायसवाल पढ़ने में ब्रिलिएंट थी। उसने आईआईटी तमिलनाडू से एमटेक किया था। इसके बाद उसने गेट में अच्छी रैकिंग हासिल की थी। जिसकी वजह से प्रियंका को आईआईटी कानपुर में दाखिला मिला था। प्रियंका ने 29 दिसंबर 2023 को दाखिला लिया था। वहीं, कुछ दिनों पहले ही क्लासेस शुरू हुईं थीं। जिसकी वजह से अभी पढ़ाई का इतना दबाव भी नहीं था। साथी छात्रों के मुताबिक प्रियंका अभी अन्य छात्र-छात्राओं से घुलमिल भी नहीं पाई थी। प्रियंका पर फिलहाल किसी तरह का दबाव नहीं था, तो उसने इतना बड़ा कदम क्यों उठाया।

आईआईटी प्रशासन ने पीएचडी स्टूडेंट प्रियंका जासवाल के सुइसाइड की खबर पुलिस को दी। छात्रा की सुइसाइड से पुलिस में भी हड़कंप मच गया। डीसीपी, एडीसीपी, एसीपी और कल्यानपुर थाने की पुलिस के सामने हॉस्टल के रूम के दरवाजा तोड़कर प्रियंका के शव को बाहर निकाला गया। फोरेंसिक टीम ने घटना स्थल का निरीक्षण कर साक्ष्य इकट्ठे किए। पुलिस ने छात्रा के मोबाइल फोन को अपने कब्जे में ले लिया है। सोशल मीडिया प्लेटफार्म फेसबुक, इंस्टाग्राम, वॉट्एसएप समेत एक्स को खंगालने में जुटी है। वहीं, छात्रा के शव को मॉर्चुरी में रखा गया है। परिजनों के आने के बाद शव का पोस्टमॉर्टम कराया जाएगा।

आईआईटी कानपुर में पढ़ने वाली छात्रा स्वप्निल भास्कर ने 2005 में सुइसाइड कर लिया था।

आईआईटी कानपुर से एमटेक करने वाले शैलेश शर्मा ने 2006 में सुइसाइड कर लिया था, आईआईटी कानपुर में पढ़ने वाले जे भारद्वाज ने ट्रेन के आगे कूद कर जान देदी थी। आईआईटी से बीटेक करने वाले प्रशांत कुमार ने 2008 में सुइसाड कर लिया था। आईआईटी कानपुर से बीटेक करने वाली छात्रा जोया चटर्जी ने 2008 में फेल होने आहत होकर सुइसाइड कर लिया था। आईआईटी कानपुर से एमटेक करने वाले जे सुमन ने 2009 में सुइसाइड कर लिया था। आईआईटी कानपुर से पीएचडी करने वाले छात्र भीम सिंह ने 2018 में सुइसाइड कर लिया था। आईआईटी कानपुर से कंप्यूटर सांइस एंड इंजिनियरिंग विभाग के प्रफेसर प्रमोद सुब्रमण्यम ने 2020 में सुइसाइड कर लिया था। आईआईटी में पढ़ने वाले छात्र प्रशांत सिंह ने 2022 में सुइसाइड कर लिया था। आईआईटी कानपुर में एक महीने के अंदर यह तीसरी सुइसाइड है। आईआईटी कानपुर में प्रोजेक्ट एक्जीक्यटिव ऑफिसर के पद पर तैनात पल्लवी चिल्लका ने बीते 19 दिसंबर 2023 को हॉस्टल के रूम में सुसाइड कर लिया था। पल्लवी मूलरूप से ओड़िसा की रहने वाली थीं। उन्होंने बीते अगस्त 2023 में ज्वाइनिंग की थी।

आईआईटी कानपुर में बीते 10 जनवरी 2024 को मेरठ के कंकरखेड़ा में रहने वाले विकास कुमार मीणा ने सुइसाइड कर लिया था। विकास मीणा आईआईटी कानपुर से एरोस्पेस इंजिनियरिंग से एमटेक कर रहे थे। विकास मीणा ने सुइसाइड करने से पहले सुइसाइड नोट लिखा था। उनके रूम से किसी ने उनका लिखा हुआ, सुइसाइड नोट चोरी कर लिया था। आईआईटी कानपुर से केमिकल इंजिनियरिंग से पीएचडी करने वाली प्रियंका जायसवाल ने 18 जनवरी 2024 को सुइसाइड कर लिया। आईआईटी कैंपस में लगातार सुइसाइड की घटनाएं सामने आ रही हैं। जिसकी वजह से आईआईटी कानपुर सवालों के घेरे में हैं।

आखिर क्या था इतिहास का अस्तापुर कांड?

आज हम आपको अस्तापुर कांड के बारे में बताने जा रहे हैं! बेहमई कांड के बदले में लालाराम गैंग ने औरैया जिले के अस्तापुर गांव में सामूहिक नरसंहार किया था। ये बात बहुत कम लोग जानते हैं। डकैतों ने गांव को घेर लिया फिर एक ही बात कही कि फूलन की बहुत मदद करते हो अब हमें भी पैसे दो हथियार खरीदने हैं। कुछ ही देर में 12 लोगों को पकड़ कर बदमाशों ने गोली मार दी। इसके बाद गांवों में आग लगा दी। आग से एक महिला व उसके पांच वर्षीय बच्चे की जलकर मौत हो गई थी। इस सामूहिक नरसंहार में 14 लोग मारे गए थे। आज भी यहां के लोग न्याय के लिए इंतजार कर रहे हैं।बेहमई कांड में फैसला आने के बाद बीहड़ पट्टी के गांवों में डकैतों के आंतक की चर्चा शुुरु हो गई हैं। एक समय ऐसा था जब बीहड़ पट्टी गांवों के लिए ठीक से रास्ते तक नहीं थे। थाना, चौकी बहुत दूर होते थे और पुलिस के पास संसाधनों की भी कमी थी। ऐसे में गांवों के विवाद व पंचायत डकैत ही निपटाते थे। यमुना बीहड़ पट्टी की बात की जाए तो यहां मल्लाहों व मेव ठाकुरों की आबादी अधिक है।दोनों जातियों के बीच अक्सर किसी ने किसी बात को लेकर तनाव हो जाता था। ऐसे में इन जातियों के डकैत अपनी जाति का पक्ष करने लगते थे। इन्हीं हालातों की वजह से बेहमई और अस्तापुर कांड हुए। बेहमई में मल्लाह फूलन देवी ने 14 फरवरी 1981 को 20 लोगों को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया इसमें 17 ठाकुर थे। फूलन इससे नाराज थी कि बेहमई गांव के ठाकुर अपनी बिरादरी के डकैत लालाराम व श्रीराम गैंग की मदद करते थे। बीहड़ पट्टी के गांवों के बुजुर्ग बताते हैं कि बेहमई गांव से लालाराम श्रीराम गैंग का काफी जुड़ाव रहा है। बेहमई में जब 17 ठाकुरों को फूलन ने मार दिया तो लालाराम गैंग का खून खौल गया। इस गैंग ने बदले की भावना से मल्लाहों के गांवों में कई छुटपुट घटनाएं की। बड़ी घटना 26 मई 1984 को औरैया के अस्तापुर गांव में की। यहां लालाराम गैंग ने भगवानदीन, शंभूदयाल, दर्शन सिंह, रामशंकर, लालाराम, छोटेलाल, धनीराम, महादेव, भीखालाल, शंकर, बांकेलाल, लक्ष्मीनारायन मल्लाहों समेत 12 मल्लाहों की गोली मारकर हत्या कर दी थी।

लालाराम व श्रीराम गैंग की सदस्य कुसुमा नाइन ने गांव में आग लगा दी थी। छप्पर व कच्चे घर आग से जलने लगे थे, इसमें शिव कुमारी व पांच वर्षीय बेटे मुनीष आग से जलकर मौत हो गई थी। इस तरह से इस गैंग ने गांव में तबाही मचा दी हर तरफ चीख पुकार मची थी। गांव में 14 शव पड़े थे। इसके बाद पुलिस पहुंची तब तक यमुना पार करके ये गिरोह जालौन की तरफ बढ़ गया।

घटना को अंजाम देने के पहले डकैत ग्राम प्रधान गंगाराम निषाद के यहां पहुंचे। कहा कि तुमने फूलन की खूब मदद की है इसी बीच गंगाराम की पत्नी को पकड़ लिया। ग्रामीणों के सामने ही उन्हें निर्वस्त्र कर दिया। एक डकैत ने निर्वस्त्र महिला पर गोली चला दी लेकिन गोली उनके ही एक साथी को लग गई सब उसे ही देखने लगे इस बीच वह महिला भाग कर गांव में कहीं छिप गई। बदमाशों ने उसे ढूंढा। घटना को अंजाम देने के बाद वह घायल साथी को अपने साथ लेकर चले गए।

अस्तापुर के ग्रामीणों को भी आज भी फैसले का इंतजार है। घटना में मारे गए लोगों के परिवार न्याय व्यवस्था से बुरी तरह से आहत है। सामूहिक नरसंहार में 14 लोग मारे गए थे। आज भी यहां के लोग न्याय के लिए इंतजार कर रहे हैं।बेहमई कांड में फैसला आने के बाद बीहड़ पट्टी के गांवों में डकैतों के आंतक की चर्चा शुुरु हो गई हैं। एक समय ऐसा था जब बीहड़ पट्टी गांवों के लिए ठीक से रास्ते तक नहीं थे। थाना, चौकी बहुत दूर होते थे और पुलिस के पास संसाधनों की भी कमी थी। एक डकैत ने निर्वस्त्र महिला पर गोली चला दी लेकिन गोली उनके ही एक साथी को लग गई सब उसे ही देखने लगे इस बीच वह महिला भाग कर गांव में कहीं छिप गई। बदमाशों ने उसे ढूंढा।ऐसे में गांवों के विवाद व पंचायत डकैत ही निपटाते थे। यमुना बीहड़ पट्टी की बात की जाए तो यहां मल्लाहों व मेव ठाकुरों की आबादी अधिक है।दोनों जातियों के बीच अक्सर किसी ने किसी बात को लेकर तनाव हो जाता था।न्याय की आस में कई बुजुर्गों की मौत हो गई। कई महिलाएं जो बहुत कम उम्र में विधवा हो गई थीं, वह न्याय की आस लिए बूढ़ी हो चुकी है।

आखिर उत्तर प्रदेश में क्यों बढ़ता जा रहा है मोदी योगी का मैजिक?

वर्तमान में उत्तर प्रदेश में मोदी योगी का मैजिक बढ़ता ही जा रहा है! लोकसभा चुनाव से पहले तमाम राजनीतिक दल अपनी- अपनी तैयारी को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। गठबंधन को अंतिम रूप दिया जा रहा है। वहीं, राजनीतिक मैदान में जीत समीकरण स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा हैं। अखिलेश यादव पीडीए यानी पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक पॉलिटिक्स को स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। वहीं, बसपा प्रमुख मायावती दलित अल्पसंख्यक पिछड़ा समीकरण को साधने का प्रयास कर रही हैं। इसी प्रकार कांग्रेस की कोशिश सवर्ण पिछड़ा अल्पसंख्यक वोट बैंक को अपने पाले में लाने की है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी के स्तर पर अपने कोर वोट बैंक को साधने के साथ-साथ हिंदुत्व की राजनीति और विकास को जमीनी स्तर पर सेट किया गया है। वोटरों को अपने पहले में लाने की कोशिश हर दल कर रहा है। लेकिन, बुधवार को आए दो ओपिनियन- एग्जिट पोल के रिजल्ट कुछ अलग ही तस्वीर दिखा रहे हैं। इसमें भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए बड़ी बढ़त बनाती दिख रही है। यूपी में तमाम दल जीत का समीकरण बनाते दिख रहे हैं, लेकिन मोदी- योगी मैजिक के आगे सब फेल हो रहे हैं। वर्तमान माहौल में विपक्ष को बड़ा झटका लगता दिख रहा है। भारतीय जनता पार्टी अपने दम पर 50 फीसदी से अधिक वोट शेयर को पार करती दिख रही है। यह स्थिति तब है, जब देश में नरेंद्र मोदी अपने कार्यकाल का 10 साल पूरा कर रहे हैं। वहीं, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार 7 वर्ष पूरे कर आठवें साल में प्रवेश कर चुकी है। डबल इंजन की सरकार को लेकर यूपी में अभी तक एंटी इनकंबैंसी जैसा माहौल बनता नहीं दिख रहा है। इसके उलट प्रो इनकंबैंसी जैसी स्थिति लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर बनती दिख रही है। दरअसल, बुधवार को लोकसभा चुनाव को लेकर दो ओपिनियन- एग्जिट पोल सामने आए। इसमें भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए उत्तर प्रदेश के चुनावी मैदान में बड़ी बढ़त बनती दिख रही है। एबीपी न्यूज की ओर से कराए गए ओपिनियन पोल में भाजपा 74 सीटों पर जीत दर्ज करती दिख रही है। वहीं, न्यूज- 18 के सर्वे में भाजपा को 77 सीटों पर जीत मिलती दिखाइ गई है। इन प्री-पोल सर्वे में विपक्ष का सफाया होता दिख रहा है।

लोकसभा चुनाव को लेकर यह स्थिति क्यों बनी? इसके पीछे की वजह डबल इंजन सरकार की योजनाएं हैं। दरअसल, यूपी चुनाव 2022 के दौरान कोरोना काल में शुरू की गई फ्री राशन योजना का बड़ा असर दिखा। मायावती के परंपरागत दलित वोट बैंक में इससे सेंधमारी करने में सफलता मिली। यूपी में करीब साढ़े तीन दशक के बाद कोई सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद दूसरी बार सत्ता में आने में सफल रही। योगी आदित्यनाथ एक बार फिर मुख्यमंत्री बने। उनका बुलडोजर मॉडल काफी कारगर रहा है। वहीं, पीएम नरेंद्र मोदी की योजनाओं को भी जमीन पर उतारने में कामयाबी मिली है। नरेंद्र मोदी सरकार की ओर से किसान सम्मान निधि से लेकर उज्ज्वला योजना तक का लाभ लोगों को मिल रहा है। इसके अलावा आयुष्मान योजना से लेकर हर घर को नल का जल योजना तक को तेज गति से पूरा कराने में सफलता मिली है। वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट जैसी योजनाएं जिलों को नेशनल और इंटरनेशनल लेवल तक ले जाने में कामयाब हुई है। एक्सप्रेसवे का निर्माण भी हो रहा है। यह सभी भाजपा के पक्ष में माहौल बना रहा है।

पीएम नरेंद्र मोदी से लेकर योगी आदित्यनाथ तक धर्म को कनेक्ट करने में कामयाब रहे हैं। पीएम मोदी के दूसरे कार्यकाल के शुरुआती दिनों में ही राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आया। करीब पांच शताब्दियों से चला आ रहा यह विवाद आखिरकार सुलझ गया। इसी कार्यकाल में राम मंदिर भी बनकर तैयार हुआ। पीएम मोदी राम मंदिर के शिलान्यास से लेकर प्राण प्रतिष्ठा तक के कार्यक्रम में दिखे। अपने हिंदुत्व छवि को इन कार्यक्रम में बखूबी उभारा। वे एक बड़े वर्ग से खुद को कनेक्ट करने में सफल रहे। वहीं, सीएम योगी ने अयोध्या के दीपोत्सव को देश-विदेश में प्रसिद्ध कर दिया है। मोदी सरकार के कार्यकाल में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर बनकर तैयार हुआ। अब मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि कॉरिडोर निर्माण पर काम चल रहा है।पीएम नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के तौर पर धर्म को लेकर अलग रुख रख रहे हैं। हालांकि, पिछले दिनों उन्होंने संकेतों में भगवान शिव और श्रीकृष्ण के धाम के विकास की बात कही। वहीं, इस मामले में सीएम योगी विधानसभा में ज्ञानवापी के व्यासजी तहखाने का बैरिकेट टूटने की बात कर चुके हैं। इस प्रकार विकास से लेकर धर्म तक के मामले में दोनों नेताओं का कनेक्ट बड़े वर्ग से होता दिख रहा है। इसका असर भी ओपिनियन पोल रिजल्ट के जरिए सामने आ रहा है।

लोकसभा चुनाव 2024 में एक बार फिर भाजपा को वोट शेयर में इजाफे की उम्मीद की जा रही है। वर्ष 2014 में भाजपा नरेंद्र मोदी के चेहरे के साथ चुनावी मैदान में उतरी। वाराणसी से उतरे नरेंद्र मोदी का मैजिक प्रदेश में चला। 42 फीसदी वोट शेयर के साथ पार्टी यूपी की 71 सीटों पर जीत दर्ज करने में कामयाब रही। वहीं, एनडीए को इस चुनाव में 73 सीटों पर जीत मिली। वहीं, लोकसभा चुनाव में भाजपा करीब 50 फीसदी और एनडीए 50.62 फीसदी वोट शेयर हासिल करने में कामयाब रही। इस चुनाव में भाजपा को 62 और एनडीए को 64 सीटों पर जीत मिली।एक सर्वे में भाजपा को 51 और न्यूज 18 के सर्वे में भाजपा को 57 फीसदी वोट शेयर मिलने की संभावना जताई गई है।

लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर आए ओपिनियन पोल पर डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक का बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने कहा कि भाजपा मिशन- 80 को पूरा करने में कामयाब होगी। एनडीए सभी सीटों पर जीत दर्ज करने जा रही है। प्रदेश में मोदी लहर चल रही है। साथ ही, उन्होंने दावा किया कि इस चुनाव में पार्टी 60 फीसदी वोट शेयर हासिल करेगी।

आखिर कौन है नए चुनाव आयुक्त? जानिए!

आज हम आपको नए चुनाव आयुक्त के बारे में जानकारी देने वाले हैं! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समिति ने निर्वाचन आयोग में दो आयुक्तों के खाली पदों पर भर्ती के लिए दो नामों पर मुहर लगा दी। समिति ने ज्ञानेश कुमार गुप्ता और सुखबीर सिंह संधू को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया है। ये दोनों रिटायर्ड आईएस हैं। दोनों अलग-अलग समय में भारतीय प्रशासनिक सेवा आईएएस से रिटायर्ड हुए हैं। निर्वाचन आयोग के दोनों आयुक्त के पद पहले अनूप चंद्र पाण्डेय के फरवरी में रिटायरमेंट और फिर हाल ही में अरुण गोयल के इस्तीफे से खाली हुए थे।  ज्ञानेश कुमार केरल कैडर के रिटायर्ड आईएएस ऑफिसर हैं। वो केंद्रीय गृह मंत्रालय में कश्मीर डिविजन के उस वक्त इनचार्ज थे जब केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया था। मोदी सरकार ने 5 अगस्त, 2019 को आर्टिकल 370 खत्म किया था। 1988 बैच के आईएएस ज्ञानेश कुमार मई, 2022 में सहकारिता मंत्रालय के सचिव बनाए गए। उन्हें संसदीय कार्य मंत्रालय में सचिव पद से ट्रांसफर किया गया था। कुमार ने सहकारिता मंत्रालय में देवेंद्र कुमार सिंह को रिप्लेस किया था। सिंह भी केरल कैडर के ही आईएस थे जिन्हें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का महासचिव बनाया गया था। ज्ञानेश कुमार की सर्विस रिटायरमेंट एज के बाद भी बरकरार रखी गई थी। वो 31 जनवरी, 2024 को रिटायर हुए। ध्यान रहे कि पहले गृह मंत्रालय और फिर सहकारिता मंत्रालय, दोनों मंत्रालयों के सचिव के तौर पर उन्होंने मंत्री अमित शाह के साथ ही काम किया। शाह इन दोनों मंत्रालयों के मंत्री हैं।

सुखबीर संधू 1998 बैच के रिटायर्ड आईएएस ऑफिसर हैं। 2021 में पुष्कर सिंह धामी जब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बनाए गए तब प्रदेश के मुख्य सचिव के पद पर सुखबीर संधू ही थे। उससे पहले संधू राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के चेयरमैन और मानव संसाधन मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग में अडिशनल सेक्रेटरी की भूमिका में भी रहे। सुखबीर संधू ने अमृतसर के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस और गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी से इतिहास में एम डिग्री हासिल की है। उनके पास कानून की डिग्री भी है। संधू ने ‘अर्बन रिफॉर्म्स’ और ‘म्यूनिसिपल मैनेजमेंट एंड कपैसिटी बिल्डिंग’ पर रिसर्च पेपर्स भी लिखे हैं। लुधियाना नगर निगम के आयुक्त के तौर पर उनकी सेवाओं के लिए संधू को राष्ट्रपति मेडल से नवाजा गया था।

दोनों चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के साथ केंद्रीय चुनाव आयोग की टीम पूरी हो गई है। निर्वाचन आयोग के मुखिया यानी देश के मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार हैं। उन्होंने 15 मई, 2022 को भारत के पांचवें मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला था। इससे पहले वो 1 सितंबर, 2020 को चुनाव आयुक्त बनाए गए थे। राजीव कुमार 1984 बैच के बिहार-झारखंड कैडर के आईएएस हैं। उन्होंने पब्लिक एंटरप्राइजेज सेलेक्शन बोर्ड के चेयरमैन, केंद्रीय वित्त मंत्रालय में सचिव, वित्तीय सेवाओं के सचिव और स्थापना अधिकारी के पद भी संभाले हैं। बता दें कि ज्ञानेश कुमार और सुखबीर संधू देश के दो नए चुनाव आयुक्त होंगे। आज पीएम नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई बैठक में इन दोनों नामों पर सहमति बन गई है। लोकसभा में विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी ने भी इन नामों की जानकारी दी है। गौरतलब है कि चुनाव आयुक्त अरुण गोयल के इस्तीफे के बाद चुनाव आयुक्त का एक और पद खाली हो गया था जबकि एक स्थान पहले से ही खाली था।

चुनाव आयुक्त चुनने वाली समिति की बैठक के बाद, लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि उनके सरकार पास समिति में बहुमत है। पहले, उन्होंने मुझे 212 नाम दिए थे, लेकिन नियुक्ति से 10 मिनट पहले उन्होंने मुझे सिर्फ छह नाम दिए। मुझे पता है कि मुख्य न्यायाधीश वहां नहीं है, सरकार ने ऐसा कानून बना दिया है कि CJI दखल नहीं दे सकता और केंद्र सरकार अपनी पसंद का नाम चुन सकती है। मैं यह नहीं कह रहा कि यह मनमाना है, लेकिन जो प्रक्रिया अपनाई जा रही है उसमें कुछ खामियां हैं। ज्ञानेश कुमार रिटायर्ड IAS अधिकारी हैं। वो कुछ दिन पहले ही सहकारिता मंत्रालय के सचिव पद से रिटायर हुए हैं। इस मंत्रालय के गठन के वक्त से ही ज्ञानेश ने यहां काम किया था। इससे पहले वह गृह मंत्रालय में कश्मीर डिवीजन के संयुक्त सचिव थे। उस दौरान ही जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 खत्म किया गया था। ज्ञानेश 1988 बैच के केरल कैडर के अधिकारी रहे हैं।

दूसरे चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू भी पूर्व IAS अधिकारी हैं। वह 1988 बैच के उत्तराखंड कैडर के अधिकारी हैं। संधू को 2021 में जब पुष्कर सिंह धामी सीएम बने थे तो राज्य का मुख्य सचिव नियुक्त किया गया था।

बॉलीवुड की किन मुश्किलों की बात कर रही है एकता कपूर?

हाल ही में एकता कपूर ने बॉलीवुड की कई मुश्किलों की बात की है! अभी ज्यादा वक्त नहीं बीता, जब पुरुष प्रधान बॉलिवुड में नायिका प्रधान फिल्मों ने अपना परचम लहराना शुरू किया था। ‘पीकू’ हो या ‘तुम्हारी सुलु’, अपनी ‘कहानी’ से दर्शकों का दिल जीतकर खुद को बॉक्स ऑफिस का ‘क्वीन’ साबित करना शुरू किया था लेकिन प्रड्यूसर एकता कपूर की मानें, तो कोविड के बाद इन महिला प्रधान फिल्मों की राह फिर मुश्किल हो गई है। बॉलिवुड में औरतों के बारे में फिल्में बनाना बहुत ज्यादा मुश्किल होता जा रहा है। मैंने तीन हीरोइनों को लेकर एक फिल्म बनाई है, द क्रू जिसके प्रोमो को बहुत प्यार मिला लेकिन मैं आपको बता नहीं सकती कि कितने लोगों ने मुझसे कहा कि तीन औरतों की फिल्म कौन देखेगा?’ इंडस्ट्री की जानी-मानी निर्माता एकता कपूर ने हाल ही में ‘फिक्की फ्रेम्स’ में अपने इस बयान से सबको चौंका दिया। बात हैरानी की है भी, क्योंकि लंबी लड़ाई के बाद अब जाकर हमारी नायिकाओं ने सिल्वर स्क्रीन पर अपना दबदबा कायम किया था। प्रियंका चोपड़ा, कंगना रनौत, विद्या बालन, दीपिका पादुकोण, आलिया भट्ट आदि ने ‘मैरी कॉम’, ‘पीकू’, ‘कहानी’, ‘द डर्टी पिक्चर’, ‘तनु वेड्स मनु 2’, ‘क्वीन’, ‘राजी’, ‘पद्मावत’ जैसी कामयाब फिल्मों से इस नायक प्रधान बॉलिवुड में नायिका प्रधान फिल्मों की राह मजबूत की थी। अभी तो कई स्तर पर बराबरी की लड़ाई चल ही रही थी। ऐसे में, एकता कपूर जैसी स्थापित निर्माता का तबू, करीना कपूर खान और कृति सेनन जैसी चर्चित अदाकाराओं से सजी फिल्म ‘द क्रू’ के लिए ऐसे सवालों का सामना करना निश्चित तौर पर निराशा भरी बात है।

इंडस्ट्री में विमन सेंट्रिक फिल्मों के दबदबे की आम धारणा को तोड़ते हुए एकता ने खुलासा किया कि कोविड के बाद हालात बदल गए हैं और ऐसी फिल्में बनाना और मुश्किल हो गया है। बकौल एकता, ‘आज माचाेइजम वाली फिल्में बनाना आसान है, जबकि फेमिनिजम एक टैबू है, जो डरावनी बात है। अगर मेरी फिल्म में तीन हीरोइनों के बजाय तीन हीरो होते तो कहानी कुछ और होती। मेरा मानना है कि इस सोच की जड़ कॉमर्स यानी पैसे से जुड़ी है। जब इन फीमेल सेंट्रिक फिल्मों का कॉमर्स बदलेगा, तभी ये सोच बदलेगी। आप देखें, तो अब भी पैसे से जुड़े फैसले मर्द के होते हैं। बहुत सी औरतें अब भी मूवी की टिकट खरीदने के लिए अपने पतियों का इंतजार करती हैं। इसलिए, ओटीटी और टीवी में भले बदलाव और बराबरी आ गई हो, लेकिन फिल्मों में अभी भी काफी चुनौतियां हैं।’ गौर करें ताे एकता की बात सही ही लगती है। कोविड के बाद थिएटर्स में आई फीमेल सेंट्रिक फिल्मों में आलिया भट्ट की गंगूबाई काठियावाड़ी ही हिट साबित हुई। जबकि अदा शर्मा की द केरल स्टाेरी सरप्राइज हिट रही, तो रानी मुखर्जी की चटर्जी वर्सेज नॉवे ने ठीकठाक कमाई की। इनके अलावा, कंगना रनौत की थलाइवी, तेजस, धाकड़ सभी बॉक्स ऑफिस पर असफल ही रहीं। विद्या बालन की लीड वाली नीयत, काजोल स्टारर सलाम वेंकी, शिल्पा शेट्टी की सुखी, भूमि पेडनेकर की थैंक यू फॉर कमिंग, दीया मिर्जा, रत्ना पाठक, फातिमा सना शेख की धक धक जैसी तमाम फीमेल सेंट्रिक फिल्में भी थिएटर में दर्शक नहीं खींच पाईं। हाल ही में आई किरण राव की लापता लेडीज को खूब वाहवाही मिली लेकिन बॉक्स ऑफिस पर धमाल वह भी नहीं मचा पाई।

हालांकि, फीमेल सेंट्रिक फिल्मों के साथ बजट से लेकर स्क्रीन की संख्या तक, हर जगह भेदभाव भी होता है। पर्दे पर खुद सशक्त महिला किरदार निभाने के बाद अब बतौर निर्माता भी फीमेल सेंट्रिक फिल्में बनाने वाली ऐक्ट्रेस रिचा चड्ढा और तापसी पन्नू का अनुभव भी एकता की तरह ही कड़वा रहा है। रिचा चड्ढा कहती हैं, ‘अगर आपकी फिल्म हीरोइन सेंट्रिक है, डायरेक्टर या प्रड्यूसर फीमेल है और आप अपनी फिल्म बेचने जाते हैं तो आपसे पूछा जाता है कि हीरो कौन है? इंडस्ट्री में बॉयज क्लब काम करता है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता।’ वहीं, इंडस्ट्री में हीरो-हीरोइन को लेकर होने वाले भेदभाव के खिलाफ हमेशा आवाज उठाने वाली तापसी पन्नू ने अपने बैनर तले बनी नायिका प्रधान फिल्म धक धक काे सही से प्रमोट नहीं किए जाने पर खुलकर नाराजगी जताई थी। रत्ना पाठक शाह, दीया मिर्जा, फातिमा सना शेख, संजना सांघी स्टारर इस फिल्म का ट्रेलर महज रिलीज से चार दिन पहले रिलीज किया गया था। इस भेदभाव से नाखुश तापसी ने दो टूक कहा था, ‘ये सबसे बड़ा झूठ है कि कॉन्टेंट ही किंग है। जब फिल्म बनती है तो एक लाइन सुनने के बाद ही फाइनैंसर पूछने लगते हैं कि हीरो कौन है? उसके आधार पर ही वे तय करते हैं कि कितना इन्वेस्टमेंट करना है।’

पहली लाइन ही यही बोली जाती है कि फीमेल सेंट्रिक फिल्म है न, तो इतना बजट नहीं होगा। फीमेल सेंट्रिक फिल्म है न, तो आप फीस कम करो। हमारा, बजट, स्क्रीन, सैलरी सब कम होता है और ये अपमानजनक तरीके से कम होता है।’ तापसी इसकी एक वजह ऑडियंस के नजरिए को भी मानती हैं। बकौल तापसी, ‘बिजनेस के लिहाज से सोचें तो मेकर्स पूरी तरह गलत भी नहीं हैं। वे कहते हैं कि थिएटर में लोग ही नहीं आ रहे हैं। आप प्री-बुकिंग का डाटा देख लीजिए, जब हीरो वाली फिल्म आती है तो लोग पहले से तय कर लेते हैं कि उन्हें फलां फिल्म देखनी है, लेकिन एक हीरोइन की लीड वाली फिल्म आती है तो लोग रिव्यू का इंतजार करते हैं। इसलिए बजट, स्क्रीन की संख्या, फीस सबमें बराबरी आने में बहुत वक्त लगेगा।’

बॉक्स ऑफिस पर फीमेल सेंट्रिक फिल्मों के ना चलने के कारण ओटीटी ऐसी फिल्मों का मुख्य ठिकाना बन गया है। निर्माता रिस्क न लेते हुए अपनी विमन सेंट्रिक फिल्माें को सीधे ओटीटी पर ला रहे हैं। फिर वह करीना कपूर की जाने जां हो, तबू की खुफिया, विद्या बालन की शेरनी, जलसा हो या काजोल-कृति सेनन की दो पत्ती, रवीना टंडन की पटना शुक्ला, सारा अली खान की ऐ वतन मेरे वतन, ज्यादातर हीरोइनों की मुख्य भूमिका वाली फिल्में थिएटर के बजाय ओटीटी की शोभा बन रही हैं।