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आखिर कौन से शहर झेल रहे हैं मौसम की मार ?

आज हम आपको बताएंगे कि कौन से शहर मौसम की मार झेल रहे हैं! दिल्ली सहित पूरे उत्तर भारत में गर्मी के तेवर के आगे सब नतमस्तक हैं, फिर चाहे वह इंसान हो या जानवर। मॉनसून वाली बारिश की बाट जोह रहे लोगों का इंतजार बढ़ता जा रहा है। अल सुबह जहां ठंडी हवाएं सुकून देती थीं, लेकिन अब सुबह से ही 40 डिग्री वाला फील आता है जो दोपहर होते तक हालत पस्त कर रहा है। इस गर्मी के आगे कूलर ऐसी सब फेल हैं। देश की राजधानी दिल्ली की बात करें तो यहां अभी अधिकतान तापमान 45 डिग्री तक जाएगा। बाकी जगहों की बात करें तो उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब सहित कई राज्यों में अभी मॉनसून से पहले जल्द राहत मिलने की संभवना नहीं है। दिल्ली में लू का प्रकोप एक बार फिर बढ़ रहा है। पश्चिमी राजस्थान और पूर्वी राजस्थान में भी अगले तीन दिन तक प्रचंड गर्मी देखने को मिलेगी। पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में भी अभी राहत की उम्मीद नहीं है। मॉनसून की देरी और बढ़ती तपिश ने इन राज्यों को भी बेहाल कर दिया है।बुधवार को अधिकतम तापमान 44.7 डिग्री सेल्सियस रहा। यह सामान्य से पांच डिग्री अधिक था। आने वाले दिनों में दिल्ली और तपेगी। 18 जून से पहले लू से राहत के आसार नहीं हैं। बुधवार को अधिकतम तापमान 44.7 डिग्री रहा। यह सामान्य से पांच डिग्री अधिक है। न्यूनतम तापमान 28.5 डिग्री रहा। यह सामान्य से एक डिग्री अधिक रहा।

मौसम विभाग के अनुसार, गुरुवार को आंशिक तौर पर बादल छाएंगे। कई जगहों पर लू का प्रकोप रहेगा। जमीनी सतह पर तेज गर्म और शुष्क हवाएं चलेंगी। इनकी स्पीड 25 से 35 किलोमीटर प्रति घंटे रहेगी। अधिकतम तापमान 45 और न्यूनतम तापमान 30 डिग्री तक रह सकता है। इसके बाद 14 और 15 जून को अधिकतम तापमान 44 डिग्री और न्यूनतम तापमान 30 डिग्री तक रह सकता है। आंशिक तौर पर बादल छाएंगे। कुछ जगहों पर लू का प्रकोप रह सकता है। तेज हवाएं चलेंगी। इनकी गति 25 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे रह सकती है। इसके बाद 16 से 18 जून के बीच अधिकतम तापमान 45 और न्यूनतम तापमान 30 से 31 डिग्री तक रह सकता है। आंशिक तौर पर बादल छाए रहेंगे। तेज हवाएं चलेंगी। इनकी गति 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे तक रह सकती है।

आबादी के मामले में सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश भी भयंकर गर्मी से अछूता नहीं है। गोरखपुर से लखनऊ और नोएडा, गाजियाबाद वाले अब जल्द बारिश की उम्मीद कर रहे हैं। मौसम विभाग की मानें को बारिश के लिए अभी और इंतजार करना पड़ सकता है। आईएमडी ने यूपी में मॉनसून पहुंचने की तारीख 20 से 25 जून के बीच की बताई है। मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार आने वाले समय में मौसम शुष्क रहेगा। पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में हल्की बूंदा-बादी हो सकती है।

उत्तराखंड में भी गर्मी का कहर है। अधिकतम तापमान 41 डिग्री तक जा रहा है। तपिश कम होने का नाम ही नहीं ले रही है। मौसम विभाग ने जो अनुमान व्यक्त किया है, उसके हिसाब से अगले 2-3 दिन तापमान में वृद्धि की आशंका है। इस दौरान गर्म हवाएं चलेंगी। मौसम विभाग ने 16 जून तक हीटवेव चलने की भविष्यवाणी की है। हिमाचल प्रदेश की बात करें तो यहां भी हालत ठीक नहीं हैं। गर्मी का पारा यहां भी बढ़ा हुआ है। कई जगहों पर हीटवेव की स्थिति है और अभी यहां भी राहत की उम्मीद नहीं है। पश्चिमी राजस्थान और पूर्वी राजस्थान में भी अगले तीन दिन तक प्रचंड गर्मी देखने को मिलेगी। पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में भी अभी राहत की उम्मीद नहीं है। मॉनसून की देरी और बढ़ती तपिश ने इन राज्यों को भी बेहाल कर दिया है।

बिहार में मॉननसून कब आएगा इसकी घोषणा हो गई है। अब ज्यादा दिनों तक गर्मी नहीं झुलसाएगी। बता दें कि बुधवार को अधिकतम तापमान 44.7 डिग्री सेल्सियस रहा। यह सामान्य से पांच डिग्री अधिक था। आने वाले दिनों में दिल्ली और तपेगी। 18 जून से पहले लू से राहत के आसार नहीं हैं। बुधवार को अधिकतम तापमान 44.7 डिग्री रहा। यह सामान्य से पांच डिग्री अधिक है। न्यूनतम तापमान 28.5 डिग्री रहा। यह सामान्य से एक डिग्री अधिक रहा। मौसम विभाग के मुताबिक 15-16 जून को उत्तर बिहार के जिलों के कई स्थानों पर हल्की से मध्यम स्तर की वर्षा हो सकती है। इस दौरान दिन का तापमान 38 से 42 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहने का अनुमान है। न्यूनतम तापमान 25 से 27 डिग्री सेल्सियस रह सकता है। इससे पहले बिहार में अगले दो-तीन दिनों तक हीट वेव की स्थिति बनी रहेगी।

क्या राजधानी दिल्ली में दूर हो पाएगी पानी की दिक्कत?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या राजधानी दिल्ली में पानी की दिक्कत दूर हो पाएगी या नहीं !राजधानी दिल्ली इन दिनों भीषण जल संकट से जूझ रही है। दिल्ली के कई इलाकों में पीने की पानी की भारी किल्लत है। सरकार इलाकों में पानी के टैंकर भेज कर आपूर्ति करने की कोशिश कर रही है, लेकिन इसके बाद भी समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है। दिल्ली सरकार इस मुद्दे को लेकर हरियाणा सरकार पर आरोप लगा रही है। जल संकट पर जमकर राजनीति हो रही है, लेकिन इसका खामियाजा केवल दिल्ली की जनता भुगत रही है। इस बीच दिल्ली के उपराज्यपाल वी.के सक्सेना की भी इस मामले में एंट्री हो चुकी है। उन्होंने दिल्ली सरकार के मंत्री आतिशी और सौरभ भारद्वाज से राज निवास में मुलाकात की और जल संकट के हालातों की समीक्षा की। एलजी ने दिल्ली के मंत्रियों को आश्वासन दिया कि वह जल आपूर्ति के मुद्दे को हरियाणा सरकार के सामने उठाएंगे। लेकिन उन्होंने दोनों मंत्रियों को ‘आरोप-प्रत्यारोप’ में शामिल न होने और मुद्दों का सौहार्दपूर्ण ढंग से समाधान करने की सलाह दी। गौरतलब है कि दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी सरकार ने बीजेपी शासित हरियाणा पर पिछले कई दिनों से दिल्ली के हिस्से का पानी रोकने का आरोप लगाया है क्योंकि वह भीषण गर्मी के बीच गंभीर जल संकट से गुजर रही है। बैठक के बाद दिल्ली की जल मंत्री आतिशी ने कहा कि उपराज्यपाल वी के सक्सेना ने उन्हें यह सुनिश्चित करने के लिए हरियाणा सरकार से बात करने का आश्वासन दिया है कि राजधानी के हिस्से का 1,050 क्यूसेक पानी मुनक नहर में छोड़ा जाए।

उपराज्यपाल कार्यालय के एक बयान में कहा गया कि सक्सेना ने मंत्रियों को आश्वासन दिया कि वह जल आपूर्ति का मामला हरियाणा सरकार के साथ उठाएंगे और उनसे मानवीय आधार पर अतिरिक्त पानी छोड़ने का अनुरोध करेंगे। इसमें कहा गया है कि सक्सेना ने मंत्रियों को ‘आरोप-प्रत्यारोप’ से बचने और पानी की बर्बादी रोकने की भी सलाह दी। बयान में कहा गया है, ‘उपराज्यपाल ने मंत्रियों को सलाह दी कि वे व्यर्थ के आरोप-प्रत्यारोप में न पड़ें और पड़ोसी राज्यों के साथ इस मुद्दे को सौहार्दपूर्ण ढंग से हल करें। उन्होंने इस ओर भी इंगित किया कि यदि हरियाणा अपने आवंटित हिस्से से अधिक अतिरिक्त पानी छोड़ता है, तो जल शोधित करने और इसकी राजधानी वासियों तक आपूर्ति करने के लिहाज से दिल्ली के पास पर्याप्त जल शोधन संयंत्र (डब्ल्यूटीपी) और क्षमता नहीं है।’

जल बोर्ड के अधिकारियों के मुताबिक 1 एमजीडी की कमी से शहर में लगभग 21,500 लोग प्रभावित होते हैं। पिछले कुछ दिनों में दिल्ली के ज्यादातर इलाकों में या तो पानी की सप्लाई हो ही नहीं रही अगर हो भी रही है, तो जरूरत से काफी कम। इसमें मुनिरका, वसंत कुंज, मीठापुर, किराड़ी, संगम विहार, छतरपुर और बलजीत नगर के कुछ इलाके शामिल हैं। वहीं रोहिणी, बेगमपुर, वसंत कुंज, इंद्र एन्क्लेव, रोहिणी, सराय रोहिल्ला, मानकपुरा, डोलीवालान, प्रभात रोड, रैगरपुरा, बीडनपुरा, देव नगर, बापा नगर, नाइवालान, बलजीत नगर और ईस्ट पटेल नगर में पानी की किल्लत जारी है।

दिल्ली की जल मंत्री आतिशी ने कहा है कि दिल्ली को जितना पानी मिलना चाहिए, उतना नहीं मिल रहा है। हरियाणा की तरफ से छोड़ा जा रहा पानी न जाने कहां गायब हो जा रहा है, जो दिल्ली तक नहीं पहुंच पा रहा है। उन्होंने कहा कि जब से यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है, तब से वजीराबाद बैराज का पानी लगातार नीचे गिर रहा है। जितना पानी हरियाणा सरकार को मुनक कैनाल और वजीराबाद बैराज के लिए छोड़ना चाहिए, वह नहीं छोड़ रही है। इसका नतीजा यह हो रहा है कि दिल्ली के जितने वाटर ट्रीटमेंट प्लांट हैं, वह अपनी कैपेसिटी के हिसाब से काम नहीं कर पा रहे हैं और पूरी दिल्ली में जल संकट बना हुआ है।

आतिशी ने आरोप लगाया कि जब हम हरियाणा सरकार से बात करते हैं तो वह कह रहे हैं कि हम तो पानी छोड़ रहे हैं, लेकिन यह पानी रास्ते में कहां गायब हो जाता है। हरियाणा सरकार के झूठ का खुलासा उन्हीं के सुप्रीम कोर्ट में दायर एफिडेविट से हुआ है। हरियाणा सरकार ने हिमाचल प्रदेश से भेजे जा रहे पानी को रास्ता नहीं दिया और हरियाणा सरकार की साजिश यही नहीं रुकी। जो मुनक कैनाल में पानी आता है, अपर यमुना रिवर बोर्ड के फैसले के बाद भी लगातार हरियाणा कम पानी छोड़ रहा है। दिल्ली में चुनाव से पहले चार दिनों तक हरियाणा ने कम पानी छोड़ा है।

आतिशी ने आरोप लगाते हुए कहा कि जो एफिडेविट हरियाणा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जमा किया है, उसमें साफतौर पर दिख रहा है कि बीते 7, 8, 9 और 10 जून को जो 710 क्यूसेक पानी छोड़ा जाता, उसकी जगह 657 क्यूसेक पानी छोड़ा गया और दूसरे सेंटर पर जो 330 क्यूसेक पानी छोड़ा जाता, वह 310 क्यूसेक छोड़ा गया है। हरियाणा के दिए गए एफिडेविट से ही साफ हो गया है कि वह पूरी तरीके से मुनक कैनाल पर ही कम पानी छोड़ रहा है। जिसकी वजह से दिल्ली में जल संकट बरकरार है।

आखिर कैसा होने वाला है देश के मौसम का मिजाज?

अब देश के मौसम का मिजाज आने वाले समय में बदलने वाला है! दिल्ली-एनसीआर समेत देश भर के ज्यादातर राज्यों में इन दिनों भीषण गर्मी पड़ रही है। मौसम विभाग के अनुसार, मंगलवार को उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में पारा 40 डिग्री के पार दर्ज किया गया। दिल्ली के नरेला और उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में अधिकतम तापमान 47.1 डिग्री सेल्सियस रहा। मौसम विभाग के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर में एक बार फिर हीट वेव का असर देखने को मिलने वाला है। आईएमडी द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक, 12 जून से लेकर 17 जून के बीच हीट वेव का असर देखने को मिल सकता है और पारा 45 डिग्री के पार पहुंच जाएगा। डॉक्टरों की सलाह है कि हीट वेव के दौरान घरों से बिल्कुल ना निकलें और ज्यादा से ज्यादा पानी पिएं ताकि डिहाइड्रेशन का शिकार ना हो पाएं। मौसम विभाग के अनुसार, दिल्ली में 12 जून को आसमान में बादल छाए रहने की उम्मीद है और पारा 44 डिग्री के पार पहुंच सकता है। वहीं 13, 14, 15, 16 और 17 जून तक पारे के 45 डिग्री से ज्यादा पहुंचने की संभावना जताई गई है। साथ ही साथ किसी भी तरीके के कोई भी बादल छाने या बारिश या तेज तूफान के असर को भी मौसम विभाग ने नहीं दिखाया है। इससे साफ तौर पर जाहिर है कि एनसीआर वालों को एक बार फिर भीषण और तेज गर्मी का सामना करना पड़ सकता है और हीट वेव के चलने के कारण लोगों को स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों का भी सामना करना पड़ेगा।

देशभर में गर्मी ने सितम ढा रखा है। मानसून के आने से पहले लोगों के लिए इस चुभती गर्मी ने जीना मुश्किल कर दिया है। तापमान सारे रिकॉर्ड तोड़ रहा है। गर्मी इतनी ज्यादा है कि अस्पतालों में हीटवेव की वजह से बीमार मरीजों की संख्या में खास तेजी देखी जा रही है। स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि पानी की मारा-मारी भी शुरू हो गई है। एनसीआर के क्षेत्र में तो स्थिति और भी भयावह है। दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के नोएडा में गर्मी से लोगों का हाल बुरा है। स्थिति इतनी खराब हो गई है कि प्रशासन को एडवाइजरी जारी करनी पड़ रही है। नोएडा में पारा 46 डिग्री को पार कर गया है। नोएडा जिला अस्पताल की सीएमएस रेनू अग्रवाल ने लोगों से अपील की कि पहले तो आप अपने घर से तब तक बाहर ना जाएं, जब तक कोई काम ना हो। फिर भी किसी तरह की परेशानी इस तपती गर्मी की वजह से किसी को हो रही है तो वह जिला अस्पताल में पहुंचें, यहां उनको पूरा इलाज मिलेगा।

वहीं उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में राज्य में सबसे अधिक 47.1 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किया गया। वाराणसी में अधिकतम तापमान 45.3 डिग्री, बागपत और फुरसतगंज में 45.2 डिग्री सेल्सियस, फतेहपुर में 45 डिग्री और राज्य की राजधानी लखनऊ में अधिकतम तापमान 44.7 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। इस बीच, आगरा में हल्की बारिश हुई। बिहार में भीषण गर्मी के बीच राज्य शिक्षा विभाग ने सोमवार को सभी सरकारी स्कूलों को 15 जून तक बंद रखने का आदेश दिया है। शिक्षा विभाग के आदेश में कहा गया है, “राज्य में पड़ रही भीषण गर्मी और आईएमडी द्वारा जारी की गई चेतावनी के मद्देनजर विभाग ने सभी सरकारी स्कूलों को 11 से 15 जून तक बंद रखने का आदेश दिया है। चूंकि स्कूल बंद रहेंगे, इसलिए शिक्षकों के लिए भी 15 जून तक छुट्टियां घोषित की जाएंगी।” मौसम विभाग ने कहा कि राज्य में अगले तीन से चार दिन तक “भीषण गर्मी” रहेगी और 14 जून तक उत्तरी व दक्षिणी क्षेत्रों के लिए ‘रेड अलर्ट’ जारी किया गया है।

राजस्थान के कई स्थानों पर अधिकतम तापमान में एक से दो डिग्री सेल्सियस की वृद्धि के साथ गर्मी का प्रकोप जारी रहा। मंगलवार को चुरू 45.6 डिग्री सेल्सियस अधिकतम तापमान के साथ राज्य का सबसे गर्म स्थान रहा। जयपुर मौसम केन्द्र के एक अधिकारी ने बताया कि चूरू में मंगलवार को अधिकतम तापमान 45.6 डिग्री सेल्सियस, श्रीगंगानगर में 45.1 डिग्री, फतेहपुर और बीकानेर में 44.8 डिग्री, पिलानी में 44.7 डिग्री, संगरिया में 44.3 डिग्री, बाड़मेर में 44 डिग्री, जयपुर, अलवर एवं जैसलमेर में 43.5 डिग्री तापमान तथ जोधपुर और जालौर में 42.8 डिग्री दर्ज किया गया। उन्होंने बताया कि राज्य के अधिकतर स्थानों पर न्यूनतम तापमान 25 डिग्री से 32 डिग्री के बीच दर्ज किया गया। उनके अनुसार मंगलवार को कुछ स्थानों पर हल्की बारिश हुई।

हरियाणा के नूंह में अधिकतम तापमान 45.9 डिग्री सेल्सियस और हिसार में अधिकतम तापमान 44.8 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। इस बीच, पंजाब के अंबाला में अधिकतम तापमान 44.1 डिग्री सेल्सियस और करनाल में 42.6 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। दोनों राज्यों की साझा राजधानी चंडीगढ़ में भी भीषण गर्मी रही और यहां अधिकतम तापमान 43.9 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया।

आखिर कौन से व्यक्ति किसी भी देश में बिना पासपोर्ट के जा सकते हैं?

आज हम आपको बताएंगे कि कौन से व्यक्ति किसी भी देश में बिना पासपोर्ट किया जा सकते हैं! जानकारी के लिए बता दे कि आपने कभी ना कभी तो विदेश यात्रा जरूर की होगी या किसी को करते हुए जरूर देखा होगा! हर किसी के हाथ में अपना पासपोर्ट और वीजा होता है! लेकिन आज हम आपको तीन ऐसे व्यक्ति बताने वाले हैं जो दुनिया में किसी भी देश में चले जाए उन्हें कभी भी पासपोर्ट या वीजा की जरूरत नहीं पड़ती! इस बारे में आपको पूरी जानकारी देंगे!

आपको बता दे कि जब वे विदेश यात्रा करते हैं तो कोई उनसे उनके पासपोर्ट के बारे में नहीं पूछता. बावजूद इसके उन्हें पूरा आदर सम्मान दिया जाता है. पहले के समय में दुनिया के देशों के बीच इस बात पर सहमति नहीं थी कि दूसरे देशों की यात्रा के वक्त दस्तावेज़ों की ज़रूरत होगी लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ही हर देश पासपोर्ट के महत्व को समझने लगा. वर्ष 1920 में अचानक सब कुछ बदल गया. संयुक्त राज्य अमेरिका ने अवैध अप्रवासियों को अपने देश में प्रवेश करने से रोकने के लिए दुनिया भर में पासपोर्ट जैसी प्रणाली बनाने की पहल की. राष्ट्र संघ में भी इस पर बात हुई और 1924 में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपनी नई पासपोर्ट प्रणाली जारी की. अब पासपोर्ट किसी दूसरे देश की यात्रा करने वाले व्यक्ति के लिए आधिकारिक पहचान पत्र बन गया है। इसमें उनका नाम, पता, उम्र, फोटो, नागरिकता और हस्ताक्षर शामिल हैं. यह उस व्यक्ति की पहचान का पता लगाने का एक सरल तरीका बन गया, जिस देश में वह जा रहा था. अब सभी देश ई-पासपोर्ट जारी करते हैं.

हालांकि अब भी 3 खास लोग हैं, जिन्हें दुनिया में कहीं भी यात्रा करने के लिए पासपोर्ट की जरूरत नहीं है. ये तीन विशेष लोग हैं -ब्रिटेन के राजा, जापान के राजा और रानी. चार्ल्स के ब्रिटेन का राजा बनने से पहले यह विशेषाधिकार दिवंगत महारानी एलिजाबेथ के पास था! जब एलिजाबेथ महारानी थीं तो उन्हें विशेषाधिकार प्राप्त था, लेकिन उनके पति प्रिंस फिलिप के पास राजनयिक पासपोर्ट होना ज़रूरी था. ब्रिटेन में सबसे पहले सम्मान राज सिंहासन पर बैठे व्यक्ति को दिया जाता है, वहीं रानी के पति को हमेशा राजकुमार कहा जाता है.

जैसे ही चार्ल्स ब्रिटेन के राजा बने, उनके सचिव ने अपने देश के विदेश कार्यालय के माध्यम से सभी देशों को एक दस्तावेज़ संदेश भेजा. किंग चार्ल्स अब ब्रिटिश शाही परिवार के मुखिया हैं, इसलिए उन्हें पूरे सम्मान के साथ कहीं भी जाने की अनुमति दी जानी चाहिए. इस दौरान कोई बाधा नहीं होनी चाहिए. ब्रिटिश सम्राट को यह अधिकार है, लेकिन उनकी पत्नी को नहीं. जब वे किसी दूसरे देश की यात्रा करें तो उन्हें अपना कांसुलर पासपोर्ट अपने साथ रखना होता है. इसी तरह, शाही परिवार के महत्वपूर्ण सदस्य भी राजनयिक पासपोर्ट रखने के हकदार हैं. इस प्रकार के पासपोर्ट रखने से उन्हें विशेष सम्मान दिया जाता है.

आइए अब जानते हैं कि जापान के सम्राट और महारानी को यह विशेषाधिकार क्यों और कैसे मिला. जापान के वर्तमान सम्राट नारुहितो हैं. उनकी पत्नी मसाको ओवाटा जापान की महारानी थीं और उन्होंने अपने पिता अकिहितो के सम्राट पद छोड़ने के बाद यह पद संभाला था. जब तक उनके पिता जापान के सम्राट थे, उन्हें और उनकी पत्नी को पासपोर्ट रखने की आवश्यकता नहीं थी. 88 वर्षीय अकिहितो 2019 तक जापान के सम्राट थे, जिसके बाद उन्होंने सेवानिवृत्त होने का फैसला किया. ऐसे में अब उन्हें विदेश यात्रा के दौरान कॉन्सुलर पासपोर्ट साथ रखना होगा.

जापान के सरकारी दस्तावेज़ बताते हैं कि विदेश मंत्रालय ने अपने सम्राट और साम्राज्ञी के लिए यह विशेष व्यवस्था 1971 में शुरू की थी. जापान का विदेश मंत्रालय और ब्रिटेन में राजा का सचिवालय तीनों के विदेश जाने की स्थिति में संबंधित देश को पहले ही जानकारी भेज देते हैं बता दे कि पहले के समय में दुनिया के देशों के बीच इस बात पर सहमति नहीं थी कि दूसरे देशों की यात्रा के वक्त दस्तावेज़ों की ज़रूरत होगी लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ही हर देश पासपोर्ट के महत्व को समझने लगा. वर्ष 1920 में अचानक सब कुछ बदल गया. संयुक्त राज्य अमेरिका ने अवैध अप्रवासियों को अपने देश में प्रवेश करने से रोकने के लिए दुनिया भर में पासपोर्ट जैसी प्रणाली बनाने की पहल की . दुनिया के सभी प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों को एक देश से दूसरे देश की यात्रा करते समय पासपोर्ट रखना अनिवार्य होता है. उनके पासपोर्ट काउंसलर पासपोर्ट होते हैं. इन नेताओं को सुरक्षा जांच और अन्य प्रक्रियाओं से भी छूट दी गई है. भारत में यह दर्जा प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति को प्राप्त होता है!

आखिर चीनी को क्यों कहा जाता था सफेद सोना?

आज हम आपको बताएंगे कि चीनी को आखिर सफेद सोना क्यों कहा जाता है! चीनी यानी शक्कर, जिसे शुगर भी कहा जाता है! लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर शक्कर को एक समय सफेद सोना भी कहा जाता था! इसका भारतीय इतिहास और चीनी इतिहास से काफी मिलता-जुलता गहरा संबंध है! खैर, इस इतिहास के बारे में आपको पूरी जानकारी देंगे! 

आपको बता दे कि हर किसी की रसोई में कुछ और हो न हो, चीनी ज़रूर पाई जाती है. इसकी मिठास हमारी ज़ुबान पर यूं घुली हुई है कि इसे हम अपने से अलग मान ही नहीं सकते. क्या आपने कभी सोचा है कि गन्ने से बनने वाली चीनी को आखिर चीनी क्यों कहा जाता है, जबकि ये शुद्ध तौर पर भारतीय है. चीनी के मीठे ज़ायके के बिना इंसान का जीवन ही फीका हो जाएगा. इसमें न कोई विटामिन मिलता है और न ही कोई खास मिनरल, बावजूद इसके चीनी की मिठास में हर कोई जकड़ा हुआ है. आजकल चीनी हर कोई खरीद सकता है लेकिन चीनी को एक वक्त में सफेद सोना कहा जाता था. सफेद दानेदार चीनी को गन्ने और चुकंदर से बनाया जा सकता है. एक समय में चीनी इतनी महंगी थी कि सिर्फ व्यवसायी और राजा-महाराजा ही इसे अफोर्ड कर सकते थे!

गन्ने से शक्कर बनाने की प्रक्रिया का आविष्कार ही भारत में हुआ था और ईसा पूर्व सातवीं सदी में लिखे गए आयुर्वेदिन ग्रंथ ‘चरकसंहिता’ में इसकी जानकारी दी गई है. कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी गुड़-खांड समेत 5 तरह की शक्कर का ज़िक्र है. दुनिया में इसके पुराना शक्कर बनाने का दूसरा विवरण नहीं है. भारत से ही चीनी दुनिया के दूसरे देशों तक पहुंची. भारत में तो इसका वर्णन शक्कर और शर्करा के रूप में रहा, फिर ये चीन से इसका क्या मतलब?

दरअसल भारत में इस्तेमाल होती थी- शक्कर, जो चीनी से अलग है. गन्ने के रस को गर्म करके इसे सुखाकर शक्कर बनती थी. उजली- पारदर्शी और दानेदार चीनी का चीन से गहरा वास्ता है. 13वीं सदी में इतालवी व्यापारी, खोजकर्ता और राजदूत मार्को पोलो के संस्मरणों में बताया गया है कि चीन के बादशाह कुबलई खां ने मिस्र से कारीगर बुलवाए थे, जिन्होंने चीन के लोगों को दानेदार शक्कर बनाना सिखाया. चूंकि इस तकनीक को चीन से मुगलकाल में भारत लाया गया, इसलिए इस प्रक्रिया से बनी शक्कर को चीनी कहा गया, बता दे कि चीनी की ‘जकड़’ इतनी सघन है कि मनुष्य का पूरा जीवन इसके स्वाद में ही फंसा रहता है. सबको पता है कि इसका अधिक सेवन बीमारियां पैदा करता है, लेकिन मरते दम तक आदमी इसकी मधुरता का दीवाना हुआ जाता है. इसमें मोटे तौर न कोई विटामिन है और न ही खनिज, वसा या फाइबर. जो कुछ होता भी है वह रिफाइनिंग प्रक्रिया के दौरान निकल जाता है. इसमें सिर्फ कैलोरी होती है.

वो भी एक चम्मच में मात्र 15-20, लेकिन इसे मोटापे का कारक इसलिए माना जाता है, क्योंकि लोग इससे बनने व्यंजनों के अलावा और भी आहार (इसके साथ) ज्यादा खा जाते हैं.हैरानी की बात यह है कि पूरी दुनिया में मिठास (शुगर) कई फलों, सब्जियों व अन्य पदार्थों में हैं, लेकिन सफेद दानेदार चीनी सिर्फ गन्ने और चुकंदर से ही बनाई जा सकती है. मध्य युग में चीनी (शक्कर) को दुर्लभ आहार माना जाता था.रिर्पोटों के अनुसार 15वी शताब्दी तक दुनिया के अधिकांश लोगों को शक्कर की मिठास की जानकारी नहीं थी. तब मीठे के नाम पर फलों के अलावा अलग से मिठास पाने के लिए शहद ही था. स्पष्ट था कि वैश्विक स्तर पर शक्कर के कारोबार की गुंजाइश बची थी. इसे पुर्तगाली सौदागरों ने लपका, जिसके बाद चीनी बनने का इतिहास बुरी तरह ‘कड़वा’ हो गया. 15वी शती में वे करिबियन पहुंचे. यह इलाका गन्ने की खेती के लिए उपयुक्त था और वहां शक्कर बनाने के लिए जंगलों में पर्याप्त ईंधन भी. बस लोगों की कमी थी. वे पश्चिम अफ्रीका पहुंचे और वहां अफ्रीकन लोगों को दास बनाकर करिबिया लाए. दासों का सिलसिला शुरू हुआ और 1505 में वहां पहली शुगर कॉलोनी खड़ी हो गई. उस दौरान यह बहुत महंगी थी और शासकों और बड़े कारोबारियों तक ही इसकी पहुंच थी. इसी दौरान इसे ‘सफेद सोना’ भी कहा गया. भारत में तो सालों तक राशनी कार्ड पर चीनी मिलती रही है. ये नाम सफेद शक्कर के लिए इतना लोकप्रिय हुआ कि सफेद-दानेदार चीनी घर-घर में पहुंच गई. भारत में पहली चीनी मिलों को लगाने का रिकॉर्ड 1610 में मिलता है.

चीनी भले ही कुछ ज्यादा विटामिन-मिनरल न रखती हो, लेकिन इसका उपयोग डायरिया, उल्टी, बुखार-खांसी में होता रहा है. इतना ही नहीं घावों और ज़ख्मों को भरने के लिए यूरोप में इस्तेमाल होती रही है! तो यह है शर्करा यानी चीनी का पूरा इतिहास!

क्या पीएम मोदी ने तोड़ दिया है पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू का रिकॉर्ड?

हाल ही में लोकसभा चुनाव 2024 के परिणाम सबके सामने आ चुके हैं, जिसके बाद यह कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ दिया है! जी हां, देश में अब तक दो ऐसे प्रधानमंत्री रहे हैं जिन्होंने लगातार तीन बार प्रधानमंत्री का पद संभाला है! पहले थे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और अब बन चुके हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी! खैर, इस आंकड़े के बारे में आपको पूरी जानकारी देंगे!

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि एनडीए के बहुमत का आंकड़ा पार करने के साथ पीएम नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। उनसे पहले देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नाम यह रेकॉर्ड दर्ज था। हालांकि मोदी के लगातार तीसरी बार सत्ता में आने और नेहरू के रेकॉर्ड में एक बड़ा फर्क है। मोदी ने चुनावी नतीजों की तस्वीर साफ होने के बाद मंगलवार को X पर एक पोस्ट में कहा, ‘देश की जनता-जनार्दन ने एनडीए पर लगातार तीसरी बार अपना विश्वास जताया है। भारत के इतिहास में ये एक अभूतपूर्व पल है। मैं इस स्नेह और आशीर्वाद के लिए अपने परिवारजनों को नमन करता हूं।‘ एक तरफ 2014 के चुनाव में बीजेपी ने मोदी की अगुआई में 282 और 2019 चुनाव में 303 सीटें जीतकर अकेले दम पर बहुमत हासिल किया था लेकिन इस बार बीजेपी अकेले दम पर बहुमत के लिए जरूरी 272 सीटों के आंकड़े से काफी पीछे है और सहयोगी दलों को मिलाकर NDA बहुमत हासिल कर पाया है। दूसरी ओर, 1951-52 में पहले आम चुनाव में नेहरू की अगुवाई में कांग्रेस को 364 सीटें मिली थीं। केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव अपूर्व चंद्रा समेत मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने बैठक में हिस्सा लिया। यानी सीधी सी बात यह है कि यह बात सच है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के रिकॉर्ड को तोड़ दिया है, लेकिन उस रिकॉर्ड में और इस रिकॉर्ड में जनादेश का बहुत अंतर है!1957 में हुए दूसरे चुनाव में कांग्रेस को 371 सीटें मिलीं और नेहरू फिर प्रधानमंत्री बने। 1962 में हुए तीसरे चुनाव में भी कांग्रेस ने अपने दम पर बहुमत हासिल किया था। कांग्रेस को 361 सीटें मिलीं और नेहरू ने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद संभाला था।

नेहरू 1947 से 1964 तक पीएम रहे। 27 मई 1964 को उनका निधन हुआ। उन्होंने 16 साल 286 दिनों तक सत्ता संभाली थी। 1966-1977 और 1980 से 1984 तक पीएम रहीं इंदिरा गांधी ने 15 साल 350 दिनों तक सत्ता संभाली थी। पीएम नरेंद्र मोदी 10 वर्षों से इस पद पर हैं और अब उनका तीसरा कार्यकाल शुरू होने वाला है। यही नहीं नई सरकार बनने के बाद महत्वपूर्ण विभागों में तुरंत उठाए जाने वाले कदमों के लिए 100 दिन के अजेंडे के शीघ्र क्रियान्वयन पर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। केंद्रीय मंत्रियों ने अधिकारियों को पहले 100 दिनों के अजेंडे पर पूरी गंभीरता के साथ काम करने को कहा है। बीजेपी के अध्यक्ष जेपी नड्डा ने मंगलवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री का पदभार संभाल लिया। नड्डा ने कार्यभार संभालने के बाद स्वास्थ्य राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल और प्रतापराव गणपतराव जाधव के साथ स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों से बातचीत की। उन्होंने ट्वीट कर कहा कि देश की प्रगति में स्वास्थ्य मंत्रालय की महत्वपूर्ण भूमिका है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में आने वाली सभी चुनौतियों के लिए तैयार रहना होगा। भारत के हेल्थकेयर सिस्टम को पूरी दुनिया में मान्यता मिल रही है।

स्वास्थ्य मंत्रालय इस समय देश में कई बड़ी योजनाओं को लागू करने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है। साथ ही आयुष्मान योजना का दायरा बढ़ाने की भी तैयारी है। 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों को आयुष्मान भारत योजना के दायरे में लाने की एक बड़ी योजना है और बताया जा रहा है कि पहली बैठक में स्वास्थ्य मंत्री ने इस संबंध में भी चर्चा की है। आयुष्मान भारत योजना के तहत पांच लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज मिलता है। अब इस योजना का दायरा बढ़ाकर 70 वर्ष की आयु से ऊपर के हर बुजुर्ग को आयुष्मान योजना के दायरे में लाया जाएगा। 70 साल से ऊपर का हर बुजुर्ग, चाहे वो गरीब हो, मध्यम वर्ग का हो या फिर उच्च मध्यम वर्ग से ही क्यों न हो, उन्हें भी 5 लाख रुपये तक के मुफ्त इलाज की सुविधा मिलेगी।’ जनऔषधि केंद्रों पर 80 पर्सेंट डिस्काउंट के साथ सस्ती दवाएं मिलती रहेंगी, इन केंद्रों का विस्तार होगा। केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव अपूर्व चंद्रा समेत मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने बैठक में हिस्सा लिया। यानी सीधी सी बात यह है कि यह बात सच है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के रिकॉर्ड को तोड़ दिया है, लेकिन उस रिकॉर्ड में और इस रिकॉर्ड में जनादेश का बहुत अंतर है!

आने वाले समय में किन विदेश नीतियों पर काम करेगा भारत?

आज हम आपको बताएंगे कि आने वाले समय में भारत किन विदेश नीतियों पर काम करेगा! राजनयिक से नेता बने एस. जयशंकर ने विदेश मंत्री के रूप में मंगलवार को अपना दूसरा कार्यकाल शुरू करने पर कहा कि ‘भारत प्रथम’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ देश की विदेश नीति के दो मार्गदर्शक सिद्धांत होंगे। उन्होंने कहा कि नई सरकार का जोर, टकरावों और तनावों का सामना कर रहे विभाजित विश्व में भारत को ‘विश्व बंधु’ बनाने पर होगा। जयशंकर बीजेपी के उन नेताओं में शामिल हैं, जिन्हें पिछली सरकार में संभाले गए मंत्रालयों की ही जिम्मेदारी दी गई है। राजनाथ सिंह, अमित शाह, नितिन गडकरी और निर्मला सीतारमण सहित कई सीनियर नेताओं को फिर से वही मंत्रालय सौंपे गये हैं, जो पिछली सरकार में उनके पास थे।जयशंकर ने यूक्रेन में युद्ध के मद्देनजर रूस से कच्चे तेल की खरीद पर पश्चिमी देशों की आलोचना को निष्प्रभावी करने से लेकर चीन से निपटने के लिए एक दृढ़ नीति- दृष्टिकोण तैयार करने तक प्रधानमंत्री मोदी की पिछली सरकार में अच्छा काम करने वाले अग्रणी मंत्रियों में से एक के रूप में उभरे। उन्हें विदेश नीति के मामलों को खासकर भारत की जी-20 की अध्यक्षता के दौरान घरेलू पटल पर विमर्श के लिए लाने का श्रेय भी दिया जाता है। जयशंकर ने कहा, ‘भविष्य को ध्यान में रखते हुए, निश्चित रूप से मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री ने हमें जो दो सिद्धांत दिए हैं – भारत प्रथम और वसुधैव कुटुंबकम, वे भारतीय विदेश नीति के दो मार्गदर्शक सिद्धांत होंगे।’ उन्होंने कहा, ‘हमें पूरा विश्वास है कि हम सब मिलकर एक अशांत, बंटी हुई दुनिया में, संघर्षों और तनावों से भरी दुनिया में विश्व बंधु के रूप में खुद को स्थापित करेंगे।’

जयशंकर ने अपने मंत्रालयी सहयोगियों पबित्रा मार्गेरिटा और कीर्ति वर्धन सिंह का विदेश मंत्रालय में स्वागत भी किया। असम से राज्यसभा सदस्य मार्गेरिटा और उत्तर प्रदेश के गोंडा निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा चुनाव जीतने वाले सिंह विदेश मंत्रालय में नये राज्य मंत्री हैं। जयशंकर ने मॉस्को, कोलंबो, बुडापेस्ट और तोक्यो के दूतावासों के साथ-साथ विदेश मंत्रालय और राष्ट्रपति सचिवालय में अन्य राजनयिक पदों पर भी काम किया है।जयशंकर ने कहा, ‘मेरे लिए यह बहुत बड़ा सम्मान, बहुत बड़ा सौभाग्य है कि मुझे एक बार फिर विदेश मंत्रालय का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी दी गई है। आप सभी जानते हैं कि पिछले कार्यकाल में इस मंत्रालय ने वास्तव में असाधारण प्रदर्शन किया था।’

भारत की ‘पड़ोसी पहले’ नीति के महत्व पर जोर देते हुए जयशंकर ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय मंत्रिपरिषद के शपथ ग्रहण समारोह में मालदीव, श्रीलंका, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, सेशेल्स और मॉरीशस के नेताओं को आमंत्रित करने का उल्लेख किया। उन्होंने कहा, ‘हमारे सभी पड़ोसी देश (शपथ ग्रहण समारोह में) आए और प्रधानमंत्री मोदी ने उन सभी से मुलाकात की। पड़ोसी के तौर पर हमारे संबंध पहली प्राथमिकता और मोदी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होगी।’ यह पूछे जाने पर कि क्या नयी सरकार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के लिए स्थायी सीट की मांग करेगी, जयशंकर ने सीधा जवाब नहीं दिया और कहा कि देश का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। जयशंकर ने यूक्रेन में युद्ध के मद्देनजर रूस से कच्चे तेल की खरीद पर पश्चिमी देशों की आलोचना को निष्प्रभावी करने से लेकर चीन से निपटने के लिए एक दृढ़ नीति- दृष्टिकोण तैयार करने तक प्रधानमंत्री मोदी की पिछली सरकार में अच्छा काम करने वाले अग्रणी मंत्रियों में से एक के रूप में उभरे। उन्हें विदेश नीति के मामलों को खासकर भारत की जी-20 की अध्यक्षता के दौरान घरेलू पटल पर विमर्श के लिए लाने का श्रेय भी दिया जाता है। वर्तमान में जयशंकर गुजरात से राज्यसभा के सदस्य हैं।

जयशंकर ने 2015-18 तक भारत के विदेश सचिव, अमेरिका में राजदूत 2013-15, चीन में 2009-2013 और चेक गणराज्य में राजदूत 2000-2004 के रूप में कार्य किया है। बता दें कि कई सीनियर नेताओं को फिर से वही मंत्रालय सौंपे गये हैं, जो पिछली सरकार में उनके पास थे। जयशंकर ने कहा, ‘भविष्य को ध्यान में रखते हुए, निश्चित रूप से मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री ने हमें जो दो सिद्धांत दिए हैं – भारत प्रथम और वसुधैव कुटुंबकम, वे भारतीय विदेश नीति के दो मार्गदर्शक सिद्धांत होंगे।’ वह सिंगापुर में भारत के उच्चायुक्त 2007-2009 भी रहे। जयशंकर ने मॉस्को, कोलंबो, बुडापेस्ट और तोक्यो के दूतावासों के साथ-साथ विदेश मंत्रालय और राष्ट्रपति सचिवालय में अन्य राजनयिक पदों पर भी काम किया है।

आखिर कौन बनेंगे भारत के नए आर्मी चीफ?

आज हम आपको बताएंगे कि भारत के नए आर्मी की आखिर कौन बनेंगे! लेफ्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी देश के नए सेना प्रमुख होंगे। केंद्र सरकार उन्हें अगले चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ के रूप में नियुक्ति दी है। लेफ्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी को 30 जून की दोपहर से अगले सेनाध्यक्ष के रूप में पदभार संभालेंगे। द्विवेदी वर्तमान में उप सेनाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं। वर्तमान सेनाध्यक्ष जनरल मनोज सी पांडे 30 जून को पदमुक्त हो रहे हैं। दरअसल, मौजूदा आर्मी चीफ जनरल मनोज पांडे का कार्यकाल 31 मई को पूरा हो रहा था लेकिन 30 जून तक का एक्सटेंशन दे दिया गया था। लेफ्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी को 15 दिसंबर, 1984 को भारतीय सेना की इन्फैंट्री (जम्मू और कश्मीर राइफल्स) में कमीशन मिला था। लगभग 40 वर्षों की अपनी लंबी और विशिष्ट सेवा के दौरान, उन्होंने विभिन्न कमांड, स्टाफ, इंस्ट्रक्शनल और विदेशी नियुक्तियों में काम किया है। लेफ्टिनेंट जनरल द्विवेदी की कमांड नियुक्तियों में रेजिमेंट (18 जम्मू और कश्मीर राइफल्स), ब्रिगेड (26 सेक्टर असम राइफल्स), महानिरीक्षक, असम राइफल्स (पूर्व) और 9 कोर की कमान शामिल है। लेफ्टिनेंट जनरल के पद पर, अधिकारी ने सेना के उप प्रमुख के रूप में नियुक्त होने से पहले 2022-2024 तक महानिदेशक इन्फैंट्री और जनरल ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ (मुख्यालय उत्तरी कमान) सहित महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई हैं।

01 जुलाई, 1964 को जन्मे द्विवेदी सैनिक स्कूल रीवा, नेशनल डिफेंस कॉलेज और यूएस आर्मी वॉर कॉलेज के पूर्व छात्र रहे हैं। उन्होंने डीएसएससी वेलिंगटन और आर्मी वॉर कॉलेज, महू में भी कोर्स किया है। इसके अलावा, ले. जनरल द्विवेदी को यूएसएडब्ल्यूसी, कार्लिस्ले, यूएसए में प्रतिष्ठित एनडीसी समकक्ष पाठ्यक्रम में ‘विशिष्ट फेलो’ से सम्मानित किया गया। ले. जनरल द्विवेदी के पास रक्षा और प्रबंधन अध्ययन में एम फिल और सामरिक अध्ययन और सैन्य विज्ञान में दो मास्टर डिग्री हैं। उन्हें परम विशिष्ट सेवा पदक (पीवीएसएम), अति विशिष्ट सेवा पदक (एवीएसएम) और तीन जीओसी-इन-सी प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया गया है।

बता दे कि लेफ्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी अगले सेना प्रमुख होंगे। वह वर्तमान सेना प्रमुख जनरल मनोज पांडे का स्थान लेंगे। उनके नाम की घोषणा सरकार की ओर से मंगलवार रात की गई। जनरल पांडे 30 जून को रिटायर होंगे। लेफ्टिनेंट जनरल द्विवेदी की नियुक्ति में सरकार ने वरिष्ठता क्रम का पालन किया है। सरकार ने कुछ ही दिन पहले जनरल पांडे की रिटायरमेंट से पहले उनका कार्यकाल एक महीने के लिए बढ़ा दिया था। जनरल पांडे को 31 मई को पहले रिटायर होना था। रक्षा मंत्रालय ने कहा सरकार ने वर्तमान में उप सेना प्रमुख के रूप में कार्यरत लेफ्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी को 30 जून से अगले सेना प्रमुख के रूप में नियुक्त किया है।

एक जुलाई 1964 को जन्मे लेफ्टिनेंट जनरल द्विवेदी सैनिक स्कूल, रीवा के पूर्व छात्र हैं। वह 15 दिसंबर 1984 को भारतीय सेना की 18-जम्मू कश्मीर राइफल्स में शामिल हुए थे। बाद में उन्होंने यूनिट की कमान संभाली। लेफ्टिनेंट जनरल द्विवेदी ने 19 फरवरी को उप सेना प्रमुख का पदभार संभाला था। उप सेना प्रमुख का पदभार संभालने से पहले लेफ्टिनेंट जनरल द्विवेदी 2022-2024 तक उत्तरी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ के रूप में कार्यरत थे। लेफ्टिनेंट जनरल द्विवेदी को चीन और पाकिस्तान से सटी सीमाओं पर कार्य करने व्यापक अनुभव है। वह वर्तमान में उप सेना प्रमुख के रूप में कार्यरत हैं। देश के नए आर्मी चीफ के पास आतंकवाद के खिलाफ लड़ने का अनुभव है। उनके पास उत्तरी और पश्चिमी सीमाओं पर काम करने का शानदार अनुभव है। उन्हें उत्तरी पूर्वी राज्यों में उग्रवाद से निपटने वाले ऑपरेशन में भी महारत हासिल है। नए आर्मी चीफ सेना के आधुनिकीकरण प्रक्रिया में भी शामिल रह चुके हैं। मेक इन इंडिया के तहत सेना में स्वदेशी हथियारों को शामिल कराने में उनकी अहम भूमिका रही।

उपेंद्र द्विवेदी नेशनल डिफेंस कॉलेज और यूएस आर्मी वॉर कॉलेज के पूर्व छात्र हैं। उन्होंने डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज, वेलिंगटन और आर्मी वॉर कॉलेज, महू से भी पाठ्यक्रम पूरा किया है। उनके पास रक्षा और प्रबंधन अध्ययन में एम फिल और सामरिक अध्ययन और सैन्य विज्ञान में दो मास्टर डिग्री है। जनरल पांडे 30 जून को रिटायर होंगे। लेफ्टिनेंट जनरल द्विवेदी की नियुक्ति में सरकार ने वरिष्ठता क्रम का पालन किया है। सरकार ने कुछ ही दिन पहले जनरल पांडे की रिटायरमेंट से पहले उनका कार्यकाल एक महीने के लिए बढ़ा दिया था। जनरल पांडे को 31 मई को पहले रिटायर होना था।उपेंद्र द्विवेदी को 15 दिसंबर 1984 को भारतीय सेना की इन्फैंट्री जम्मू और कश्मीर राइफल्स में कमीशन मिला था। 40 वर्षों की लंबी सेवा के दौरान लेफ्टिनेंट द्विवेदी ने विभिन्न कमांड, स्टाफ, इंस्ट्रक्शनल और विदेशी नियुक्तियों में काम किया है।

क्या अब अमरनाथ यात्रा पर आ सकता है संकट ?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब अमरनाथ यात्रा पर संकट आ सकता है या नहीं! जम्मू के रियासी में श्रद्धालुओं से भरी बस पर आतंकवादियों के हमला करने के बाद अब 29 जून से शुरू होने वाली अमरनाथ यात्रा पर खतरा मंडराने लगा है। बाबा बफार्नी के दर्शन के लिए यात्रा 19 अगस्त तक चलेगी। इसे देखते हुए जम्मू-कश्मीर पुलिस ने पूरे राज्य के लिए सिक्योरिटी रिव्यू भी किया, ताकि यह पता लगाया जा सके कि किस-किस पॉइंट पर कितना खतरा है और वहां किस स्तर की सिक्योरिटी की जरूरत है। रियासी बस अटैक मामले में जम्मू-कश्मीर पुलिस ने मंगलवार को 20 संदिग्धों को हिरासत में लेकर पूछताछ की। शक है कि आतंकवादियों की मदद के लिए कोई ना कोई स्थानीय शख्स भी इस हमले में शामिल था, जो बैक हैंड से आतंकवादियों को सपोर्ट कर रहा था। इस मामले में जम्मू-कश्मीर पुलिस, सेना और सीआरपीएफ की संयुक्त जवानों की 11 टीमें जंगलों और पहाड़ों में फरार आतंकियों की तलाश कर रही हैं। इसके लिए हेलीकॉप्टर, ड्रोन और खोजी कुत्तों की भी मदद ली जा रही है।

मामले में यह भी आशंका जताई जा रही है कि पुंछ जिले के सुरनकोट में 4 मई को एयरफोर्स काफिले पर आतंकियों द्वारा किए गए हमले में जो आतंकवादी शामिल थे। संभवत: वही आतंकवादी रियासी हमले में भी हो सकते हैं। शक लश्कर-ए-तैबा के टॉप कमांडर अबू हमजा, पाकिस्तानी सेना में कमांडो रह चुके फौजी और आदून नाम के एक अन्य आतंकी पर भी जताया जा रहा है, जिन्होंने हमला किया या फिर हमला करने वाले आतंकवादियों को निर्देश दिए। इनमें 32 साल का अबू हमजा पर 10 लाख का इनाम भी घोषित है।

जम्मू-कश्मीर पुलिस का कहना है कि फिलहाल इस मामले में अभी तक कोई आतंकी गिरफ्तार नहीं है। हां, 20 संदिग्ध लोगों से पूछताछ जरूर की जा रही है। मामले में बस के पीछे चल रही एक ईको कार के लापता होने और एक जीप के पीछे चलने की बात सामने आई थी। जिसे आतंकियों से जोड़कर देखा जा रहा था। इस मामले में जम्मू-कश्मीर पुलिस का कहना है कि ईको कार को ढूंढ लिया गया है। उसमें कुछ संदिग्ध नहीं मिला है। सर्च ऑपरेशन जारी है। कुछ इनपुट मिले हैं। जिनके आधार पर काम किया जा रहा है। कामयाबी मिलने की उम्मीद है। आतंकवादियों द्वारा बस में जो गोलियां बरसाई गई। वह कई तरह की मिली हैं। जिससे लग रहा है कि आतंकवादियों ने एक से अधिक टाइप के हथियार इस्तेमाल किए। इनमें अमेरिकी एम-4 कार्बाइन के साथ अन्य राइफलों के इस्तेमाल करने का शक है। जैसा की एनबीटी ने 10 जून को ही लिखा था कि अगर बस खाई में ना गिरती तो आतंकी बस में सवार सभी लोगों को मार डालते। बस में सवार घायलों का भी यही कहना है।

इसमें बस ड्राइवर विजय कुमार और कंडक्टर अर्जुन कुमार की बहादुरी भी बताई जा रही है। जिन्होंने फौजी जैसी ड्रेस पहने आतंकियों ने जब ड्राइवर को बस रोकने के लिए कहा तो उसने उन्हें भांपते हुए बस नहीं रोकी। जिसमें आतंकियों ने बस और टायरों पर गोलियां बरसा दीं। बस खाई में जा गिरी। घायलों में 10 लोगों को गोलियां लगी हैं। हमले में नौ लोगों की मौत हुई है, 41 घायल हुए। बता दें कि रविवार शाम 6:10 पर बस पर आतंकी हमला हुआ। इस हमले में स्थानीय राजबाग पौनी के रहने वाले बस ड्राइवर विजय कुमार और कटरा निवासी कंडक्टर अर्जुन की भी मौत हो गई। बस में सवार कुछ यात्रियों ने मीडिया को बताया कि जब बस ढलान पर थी तो एक आतंकी फौजी वर्दी में सड़क के बीचों-बीच बैठा था। बस की रफ्तार धीमी होते ही उसने फायरिंग शुरू कर दी। फिर और तरफ से भी बस पर फायरिंग होने लगी। उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हुआ। ड्राइवर को भी गोली लगी और उनका बस से नियंत्रण खो गया। बस खाई में गिर गई। तब भी आतंकी बस पर गोलियां बरसाते रहे।

फरार आतंकियों की तलाश में जम्मू-कश्मीर पुलिस, सीआरपीएफ और सेना ने साथ मिलकर सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है। पहाड़ी इलाके में आतंकियों के छिपे होने की आशंका को देखते हुए ड्रोन की भी मदद ली जा रही है। मौके पर जम्मू-कश्मीर पुलिस के DGP आर. आर. स्वैन और रियासी की SSP मोहिता शर्मा समेत अन्य तमाम अफसर पहुंचे। इस बीच घटनास्थल पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की एक टीम भी पहुंची। फरेंसिक टीम ने मौके से सैंपल इकट्ठा किए हैं।

पुरुषों और महिलाओं के बीच यह अंतर मुख्य रूप से इस तथ्य के कारण है कि

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पुरुषों और महिलाओं के बीच यह अंतर मुख्य रूप से इस तथ्य के कारण है कि
प्राकृतिक विविधता को समय के साथ सत्तावादी पितृसत्ताओं द्वारा असमानता के एक उपकरण में बदल दिया गया है। कमोबेश हर किसी को इस बात का प्रत्यक्ष अनुभव है कि लिंग अंतर का वास्तव में क्या मतलब है। विश्व आर्थिक मंच के शोधकर्ताओं ने 2024 में पुरुषों और महिलाओं के बीच अंतर की घोषणा की है, जो आर्थिक भागीदारी और भागीदारी, शैक्षिक प्राप्ति और उपलब्धि, स्वास्थ्य और जीवन शैली और राजनीतिक शक्ति जैसे कारकों के आधार पर दुनिया में पुरुषों और महिलाओं की स्थिति को मापता है। . लड़कियाँ पीछे हैं। समाज के अधिकांश नागरिक यही सोचते हैं कि ये सब ठीक चल रहा है, सब कुछ सही है। ये ‘महिलाओं के अधिकार’, ‘महिलाओं के अवसर’, ये सब एक उच्च श्रेणी का नौसिखिया आंदोलन है। विश्वविद्यालय में ‘मानविकी’ नामक विषय का अध्ययन करने के फलस्वरूप इस अध्ययन का समाज की स्थिति से कोई सम्बन्ध नहीं है। ये सरासर झूठ है. इस इनकार में, न देखने की रणनीति में खतरे का बीज छिपा है। विश्व आर्थिक मंच के अनुसार, मौजूदा लैंगिक असमानता का अंतर इतना व्यापक है कि इसे पाटने में 134 साल लगेंगे। इस मत से पहले के 134 साल के आंकड़े से साफ पता चलता है कि स्त्री-पुरुष के बीच कितना बड़ा अंतर है और इतना बड़ा होने के बावजूद यह कितना अनैतिक है।

पुरुषों और महिलाओं के बीच यह अंतर मुख्य रूप से इस तथ्य के कारण है कि प्राकृतिक विविधता को समय के साथ सत्तावादी पितृसत्ताओं द्वारा असमानता के एक उपकरण में बदल दिया गया है। प्रकृति ने महिलाओं को बच्चे पैदा करने के लिए जो अधिकार दिया था, उसका फायदा उठाकर पुरुषों ने महिलाओं को एक अधीनस्थ स्थिति में ला दिया। जहां तक ​​अन्य देशों की बात है, भारतीय संस्कृति में लड़कियों को पीछे रखने के कई तरीके हैं। आइए लड़कियों को कन्या, जया, जननी इन तीन रूपों के आधार पर परखें। ‘मनुसंघिता’ में स्त्रियाँ बचपन में पिता, युवावस्था में पति और बुढ़ापे में पुत्र के अधीन रहती थीं। केवल ‘मनुसंघिता’ ही क्यों, अन्य धर्मों के नियमों में भी लड़कियों की यह अधीनता है। इसलिए बेगम रोकैया ने घिरी हुई लड़कियों की मुक्ति का सपना देखने के लिए सुल्ताना ड्रीम की रचना की। नारी साम्राज्य की कथा में लड़कियाँ प्रत्येक कार्य में स्वतंत्र एवं आत्मनिर्भर हैं। यही समझ लड़कियों की हालत बदल सकती है. 19वीं सदी में, महिला शिक्षा के विरोधियों ने घोषणा की कि उच्च शिक्षित लड़कियां बच्चे पैदा करने की क्षमता खो देती हैं। शिक्षित महिलाएं पति से वंचित रहती हैं। ऐसा विचार समाज से लुप्त नहीं हुआ है, यह स्कूलों को देखकर पता चलता है। लड़कियों की शादी करके माता-पिता अक्सर उन्हें शिक्षा के अधिकार से वंचित कर देते हैं। शिक्षा को विवाह प्रणाली के विपरीत माना जाता है। यूं तो शादी लड़कियों की मुक्ति है। उसके बाद भवचक्र में बच्चे को जन्म देने वाली माताओं की एकमात्र जिम्मेदारी, बच्चे के साथ काम पर जाने की विभिन्न असुविधाएँ दिखाकर उनके आर्थिक अधिकारों को कमतर कर दिया गया। हालाँकि, एक उपयुक्त पारिवारिक बुनियादी ढाँचा बनाने का प्रयास दिखाई नहीं दे रहा है ताकि बच्चे को जन्म देने वाली माँ बच्चे के साथ काम कर सके। इसके अलावा सहिष्णु, सर्वशक्तिमान माँ का आदर्श प्रस्तुत कर भारतीय लड़कियों को उनके पोषण और स्वास्थ्य के अधिकार से वंचित करने की आध्यात्मिक रणनीति है। परिवार में सभी के भोजन के बाद जो बचता है उसे आवंटित किया जाता है। सामूहिक आश्वासन में यह भावना इतनी प्रबल है कि लड़कियां स्वास्थ्य और पोषण के लिए कुछ भी करने में दोषी महसूस करती हैं। जब भारतीय लड़कियाँ शिक्षा-स्वास्थ्य-कार्यस्थल-जीवनशैली सभी पहलुओं में पिछड़ी हैं, तो कहना न होगा कि वे राजनीतिक सत्ता से भी वंचित होंगी। पंचायत में लड़कियों के सामने पुरुषों द्वारा कलकठी करने की कहानी तो मशहूर है.

तो इस अंतर को दूर करने का तरीका क्या है? रास्ता आसान नहीं है. लेकिन सबसे पहले, हमें यह स्वीकार करना होगा कि एक अंतर है और यह अंतर ‘अनैतिक’ है। समाज के सभी स्तरों पर सामान्य जागरूकता की आवश्यकता है। जागरूकता बढ़ाने के लिए लोकप्रिय मनोरंजन मीडिया का भी उपयोग किया जा सकता है। लड़कियों के सक्रिय रहने के साथ ही पुरुषों की भूमिका भी अहम है। हालाँकि, आशा का एक शब्द बाकी है। समलैंगिक पुरुषों की संख्या थोड़ी ही सही, लेकिन बढ़ रही है। महिलाओं में अपनी किस्मत खुद जीतने का साहस और ताकत धीरे-धीरे बढ़ रही है।