Sunday, January 11, 2026
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क्या लोन देने वाले ऐप से हो रहा है क्राइम?

वर्तमान में लोन देने वाले ऐप से क्राइम होता जा रहा है! सोशल मीडिया फिर से निशाने पर है, और यह सही भी है। भारत सरकार ने उन्हें धोखाधड़ी वाले डिजिटल लोन ऐप्स डीएलए के विज्ञापन दिखाने को लेकर चेतावनी दी है। लेकिन इन विज्ञापनों को दिखाने में भले ही सोशल मीडिया लापरवाह हो, असली अपराध तो ऑनलाइन लोन देने वालों की हैवानियत है। ये तेजी से बढ़ते प्लैटफॉर्म का फायदा उठाकर छोटे खुदरा कर्ज का जाल बिछा रहे हैं। इस साल संसदीय समिति की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में डिजिटल लोन 2012 से 2023 के बीच सालाना 39.5% बढ़कर 350 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इस वृद्धि का एक हिस्सा डिजिटल लोन ऐप्स डीएलए के कारण हुआ है। डीएलए के कारोबार का सही आकलन करना मुश्किल है क्योंकि इसका एक बड़ा हिस्सा अवैध है। आरबीआई ने जनवरी और फरवरी 2021 में दो महीने तक डिजिटल लोन ऐप्स का अध्ययन किया। उसने पाया कि 81 ऐप स्टोर पर 1,100 लोन ऐप उपलब्ध थे। इनमें से 600 अवैध थे। कंज्यूमर सर्वे और पुलिस जांच अवैध लोन ऐप की दुनिया की दो मेन फीचर्स की ओर इशारा करते हैं। अवैध लोन ऐप ग्राहकों को उसी कारण से आकर्षित करते हैं जिस कारण से इन्फॉर्मल फाइनैंसिंग हमेशा करता है- आसानी। जरूरतमंद लोगों को आसानी से लोन मिल जाता है। ब्याज दरें बैंकों की तुलना में कहीं अधिक होती हैं, लेकिन उसके बाद जो होता है वह डिजिटल वर्ल्ड के लिए बहुत खतरनाक है।

ऐप फोन पर डाउनलोड किए जाते हैं। धोखाधड़ी करने वाले लोन ऐप अवैध रूप से लोन लेने वालों के फोन डेटा को कॉपी करते हैं। फिर उस डेटा का इस्तेमाल कर्जदारों को परेशान करने के लिए किया जाता है जब वे रीपेमेंट में देरी करते हैं। पुलिस जांच दिखाती है कि यह धोखाधड़ी कैसे होती है। उत्पीड़न का तो एक तरीका है लोन लेने वाले का फोटो बिगाड़कर उसे उसके कॉन्टैक्ट लिस्ट के लोगों को भेजना। इससे कई बार आत्महत्या तक हो चुकी है। आरबीआई का दायरा बैंकों, एनबीएफसी जैसे वित्तीय मध्यस्थों तक सीमित है। ये सब भी हमेशा निर्दोष नहीं होते हैं। 2022-23 में इनके खिलाफ 1,062 शिकायतें दर्ज हुई थीं, लेकिन अवैध लोन ऐप का मामला तो अलग ही स्तर का है। कुछ मामलों में जांच से पता चला है कि ऐप का मालिकाना हक हॉन्गकॉन्ग से संचालित चीनी कंपनियों के पास है। लोन ऐप के अपराध में मनी लॉन्ड्रिंग का एंगल भी है। इस कारण उनसे निपटने के लिए कई एजेंसियों को साथ काम करने की जरूरत पड़ती है।

अप्रैल 2021 से जुलाई 2022 के बीच 2,500 से अधिक ऐप्स को प्ले स्टोर से हटा दिया गया। यह एक निरंतर प्रक्रिया है जिसे सार्वजनिक जागरूकता अभियानों, तेज पुलिसिया जांच और अपराधियों के खिलाफ त्वरित मुकदमे के जरिए साथ दिया जाना चाहिए। लेकिन भविष्य में ऐसी समस्या पैदा ही नहीं हो, इसके लिए जरूरी है कि वैध तरीकों से लोन लेने की प्रक्रिया आसान हो जाए। जब रेग्युलेटेड कंपनियां लोगों को लोन नहीं देती हैं तो अपराध को फलने-फूलने का मौका मिल जाता है। यहि नहीं आपको बता दें कि जासूस भी क्राइम सीन पर आकर फिंगरप्रिंट्स के निशान लेते हैं। ये एक अनोखा बायोलॉजिकल निशान होते हैं, जो अपराध को अपराधी से जोड़ता है। दिल्ली पुलिस इस अनोखी तकनीक पर पर आजकल जबरदस्त भरोसा कर रही है। इससे केवल अपराध का ही खुलासा नहीं होता है बल्कि अपराधियों को भी पकड़ा जा रहा है। पिछले साल कई सालों से अटके केसों का भी खुलासा हुआ। हाल में ही जारी 2022 पर ‘फिंगरप्रिंट्स इन इंडिया’ के डेटा में नेशनल फिंगरप्रिंट्स पहचान व्यवस्था की जानकारी मिलती है। दिल्ली में 3 लाख 74 हजार 061 लोगों का डेटाबेस है। पिछले साल तक फिंगरप्रिंट्स ब्यूरो ने सजा पाए 1 लाख 19 हजार 611 लोगों के प्रिंट्स लिए थे। रिपोर्ट में ये बताया गया है कि इसके जरिए कई स्लिप ब्यूरों के पास मौजूद प्रिंट्स के जरिए संदिग्ध का आपराधिक इतिहास की जानकारी दिल्ली फिंगरप्रिंट्स ब्यूरों को मिले। डेटा से पता जलता है कि 2,269 फिंगरप्रिंट्स सजायाफ्ता लोगों के थे। इन लोगों में 1,095 लोगों के प्रिंट्स पिछले साल ही लिए गए थे। इसके अलावा हत्या का प्रयास मामले में भी बड़े पैमाने पर प्रिंट्स जुटाए गए हैं।

फिंगरप्रिंट्स विशेषज्ञ करीब 17,564 क्राइम सीन पर सबूत तलाशने में गए करीब और 2022 में करीब 1,530 केसों में 5,478 चांस प्रिंट्स लिए थे। चांस प्रिंट में पैर, हथेली, अंगुली, पैर का अंगूठा, जूते, घटनास्थल पर पड़े चप्पल या अन्य वस्तुओं पर पड़े निशान लिए जाते हैं। 2021 की तुलना में 2022 में प्रिंट्स लेने की संख्या 50 फीसदी ज्यादा रहे। इसके अलावा ब्यूरो ने 137 विदेशियों के फिंगरप्रिंट्स लिए। दिल्ली फिंगरप्रिंट्स ब्यूरो ने 2022 में 45 केसों में 1,191 प्रिंट्स लिए। 14 मामलों में ब्यूरो एक्सपर्ट गवाह के तौर पर कोर्ट में उपस्थित हुआ था।

फिंगरप्रिंट्स ब्यूरो की स्थापना 1987 में हुई थी। ये क्राइम ब्रांच के विशेष आयुक्त के नेतृत्व में काम करता है। एक एसीपी रैंक के अधिकारी इसके इंचार्ज होते हैं। इस वक्त दिल्ली ब्यूरों के पास 9 डिस्ट्रिक्ट मोबाइल टीम है जो क्राइम सीन पर जांच के लिए जाते हैं। विशेष पुलिस आयुक्त रवींद्र यादव ने बताया कि फिंगरप्रिंट्स विश्लेषण तकनीक से आरोपियों की पहचान की सिस्टम को और मजबूती मिली है। चांस प्रिंट्स के जरिए कई केसों का खुलासा हुआ और लंबे अरसे से अटके केस भी साल्व हुए हैं।

क्या कतर में मिली सफलता के लिए बीजेपी को 2024 में मिलेगी सफलता?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कतर में मिली सफलता के लिए बीजेपी को 2024 में सफलता मिलेगी या नहीं! महंगाई, बेरोजगारी, संसद सुरक्षा चूक समेत कई मामलों को लेकर पीएम मोदी और बीजेपी को घेरने की रणनीति में व्यस्त I.N.D.I.A. गठबंधन के सामने आज फिर एक और नई चुनौती आ गई है। यह चुनौती है पीएम मोदी की बढ़ती लोकप्रियता जिसका असर ना केवल देश में बल्कि विदेशों में भी दिखाई दे रहा है। दरअसल कतर में पूर्व भारतीय नौसैनिकों की मौत की सजा पर रोक लग गई है। इसे भारतीय कूटनीति और पीएम मोदी की बहुत बड़ी जीत के तौर पर देखा जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि दिसंबर की शुरुआत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कतर के शासक शेख तमीम बिन हमद अल थानी से मुलाकात की थी और यह बड़ा फैसला उसी मुलाकात का असर है। यह बड़ा फैसला ऐसे में वक्त में आया है, जब देश में कुछ ही महीनों बाद लोकसभा चुनाव होने वाले हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कतर पर भारत की कूटनीतिक जीत को बीजेपी पीएम मोदी की बड़ी कामाबाबी के तौर पर भुनाएगी। आगामी लोकसभा चुनावों की रैलियों में बीजेपी इस मुद्दे को देश की जनता के सामने लेकर जाएगी। बीजेपी इस मुद्दे पर चुनावी फायदा लेने की कोशिश करेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कतर के शासक शेख तमीम बिन हमद अल थानी से दुबई में सीओपी28 शिखर सम्मेलन के दौरान मुलाकात की थी। इस दौरान दोनों नेताओं ने काफी देर तक बातचीत भी की थी। मुलाकात के एक दिन बाद दो दिसंबर को पीएम मोदी ने ट्वीट कर बताया था, ‘कल दुबई में COP28 शिखर सम्मेलन के मौके पर कतर के अमीर महामहिम शेख तमीम बिन हमदद अल थानी से मिलने का अवसर मिला। द्विपक्षीय साझेदारी की संभावना और कतर में भारतीय समुदाय की भलाई पर हमारी अच्छी बातचीत हुई।’ कतर की ओर से इस मुलाकात को लेकर कोई खास जानकारी नहीं दी गई।

पीएम मोदी ने हाल ही में कहा था कि ‘जब सभी से उम्मीद खत्म हो जाती है, तब ‘मोदी की गारंटी’ शुरू होती है।’ राजनीतिक जानकारों का कहना है कि मोदी की गारंटी का फॉर्मूला बीजेपी के लिए फायदे का सौदा साबित हो रहा है। कतर में 8 पूर्व नौसैनिकों की मौत की सजा पर रोक इसका बड़ा उदाहरण बनकर उभरा है। बीजेपी आगामी लोकसभा चुनाव में मोदी की गारंटी का जिक्र करते हुए कतर मामला जनता के सामने जरूर उठाएगी। पीएम मोदी कई जनसभाओं में बोल चुके हैं कि देश या देश से बाहर भारत के नागरिकों की सुरक्षा सरकार के लिए पहली प्राथमिकता है। रूस और यूक्रेन युद्द के दौरान भी कई भारतीयों को सुरक्षित भारत लाया था। वहीं हाल ही में इजरायल और हमास युद्ध के दौरान भी भारतीयों की युद्ध क्षेत्र से सुरक्षित घर वापसी हुई थी। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि दुनिया में पीएम मोदी की बढ़ती लोकप्रियता का फायदा बीजेपी लोकसभा चुनाव में मिलना तय है।

कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कतर में इंडियन नेवी के 8 पूर्व कर्मचारियों को मौत की सजा सुनाए जाने को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए सरकार पर हमला बोला था। तिवारी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा था कि उन्होंने पिछले साल संसद में भी इस मुद्दे को उठाया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि विदेश मंत्रालय और विदेश मंत्री ने न तो पूर्व नौसैनिकों के परिजनों की बात को गंभीरता से ली और न ही एक्स-सर्विसमेन की बातों को। यहां तक कि संसद सदस्य की बातों को भी गंभीरता से नहीं लिया गया जो त्रासद है। कांग्रेस सांसद ने कहा कि प्रधानमंत्री को इस मुद्दे को कतर सरकार के साथ सर्वोच्च स्तर पर उठाना चाहिए और पूर्व नेवी अफसरों को घर लाना चाहिए।

उधर हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी इस मुद्दे को लेकर सरकार को घेरा था। उन्होंने पीएम मोदी पर भी तंज कसा था कि वह इस बात की ‘शेखी बघारते’ रहते हैं कि इस्लामी देश उनसे कितना प्यार करते हैं। ओवैसी ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया था, ‘अगस्त में मैंने कतर में फंसे पूर्व नौसेना अधिकारियों का मुद्दा उठाया था। आज उन्हें मौत की सजा सुनाई गई है। नरेंद्र मोदी शेखी बघार चुके हैं कि इस्लामी देश उनसे कितना प्यार करते हैं। उन्हें हमारे पूर्व नौसेना अधिकारियों को वापस लाना होगा।’ लेकिन कतर पर पीएम मोदी को बड़ी कामयाबी मिल गई है, जिससे विपक्षी दलों को करारा जवाब मिला है। कतर की एक अदालत ने अक्टूबर में 7 सेवानिवृत्त नौसेना अधिकारियों और एक नाविक को मौत की सजा सुनाई। ये लोग अल दहरा ग्लोबल टेक्नोलॉजीज के कर्मचारी थे, जो एक निजी कंपनी थी जो कतर के सशस्त्र बलों और सुरक्षा एजेंसियों को प्रशिक्षण और अन्य सेवाएं प्रदान करती थी। उन्हें पिछले साल अगस्त से अज्ञात आरोपों के चलते गिरफ्तार किया गया था। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि उन पर कथिक रूप से जासूसी के आरोप लगाए गए हैं, लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।

भारत और कतर के बीच दो दिसंबर 2014 को एक संधि हुई थी। इस संधि के तहत भारत और कतर दोनों देश एक-दूसरे की जेलों में बंद नागरिकों को अपनी बाकी बची सजा काटने के लिए उनके देश भेज सकेंगे। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि पूर्व भारतीय नौसैनिकों के मामले में भी ऐसा देखने को मिल सकता है। वह अपनी शेष सजा भारत की ही जेल में काट सकते हैं।

ओवरसीज मिशन में भारत को कैसे मिली सफलता?

आज हम आपको बताएंगे कि ओवरसीज मिशन में भारत को सफलता कैसे मिली! आज यानी 28 दिसंबर का दिन भारतीयों के लिए राहत और बड़ी जीत लेकर आया। कतर में 2022 से फंसे पूर्व भारतीय नौसैनिकों की फांसी की सजा पर रोक लगा दी गई है। कतर की अपील कोर्ट ने 8 पूर्व नौसैनिकों को बड़ी राहत दी है। हालांकि अभी भी ये लोग जेल में ही रहेंगे। इसी साल अक्टूबर में उन्हें फांसी देने का फैसला किया गया था। लेकिन भारत की ओर से इन दो महीनों नवंबर और दिसंबर में जबरदस्त कूटनीति देखने को मिली। पीएम मोदी की कतर के शासक से मुलाकात ने गेंद अपने पाले में कर ली। दोनों देशों के शीर्ष नेताओं की इस मुलाकात ने कतर को भी नरमी बरतने पर मजबूर कर दिया था। लेकिन मोदी के राज में यह कोई पहला मौका नहीं है। इससे पहले यूक्रेन में भारतीयों की वापसी के लिए भारत ने ऑपरेशन गंगा चलाया था। सभी भारतीयों को सफलतापूर्वक लाने वतन वापसी कराने पर सबने दाद दी थी। कहानी यहीं खत्म नहीं होती। यमन में भारतीयों की वापसी के लिए सऊदी अरब, यूएई ने हवाई हमले रोक दिए थे और भारतीय नौसेना को सहायता दी थी। जी20 में घोषणापत्र पर आम सहमति और बिना रूस का नाम लिए, किसी बड़ी जीत से कम नहीं थी। आज हम आपको मोदी सरकार के कार्यकाल में ओवरसीज ओवरसीज मिशन में किस तरह से सफलता मिली उसकी कहानी बयां करेंगे। 8 पूर्व भारतीय नौसैनिकों पर अज्ञात आरोपों के चलते कतर ने उन्हें अपने यहां कैद कर रखा था। अक्टूबर 2022 से कैद ये भारतीय नौसैनिक उम्मीद की किरण देख रहे थे। फिर इस साल अचानक उनकी सजा को फांसी में बदल दिया गया। इसपर भारत ने हैरानी जताई और सभी तरह के कानूनी विकल्पों रपर गौर किया। दाहरा ग्लोबल टेक्नॉलजी ऐंड कंसल्टेंसी सर्विसेज के लिए काम करने वाले ये 8 भारतीय नौसेना अफसरों को शायद ही मालूम था कि उनके साथ क्या होने वाला है। यहीं पर भारत की कूटनीति काम आई। कतर पर दबाव बनाने के लिए खुद पीएम मोदी ने शासक शेख तमीम बिन हमद अल थानी से मुलाकात की। उसके बाद से कतर के तेवर नरम हुए और आज नतीजा सबके सामने है। कतर ने पीएम मोदी और शेख तमीम बिन हमद अल थानी की मुलाकात के तुरंत बाद भारत को पूर्व नौसैनिकों से मिलने के लिए दूसरी बार कांसुलर एक्सेस दी थी। तभी लग गया था कि कतर इस मामले को लेकर अब नरम रुख दिखा रहा है। बता दें कि पीएम मोदी और कतर के अमीर के बीच दुबई में इस साल हुए कॉप28 सम्मेलन के दौरान हुई थी।

इसी साल सितंबर में भारत ने देश की राजधानी दिल्ली में सफलतापूर्वक जी20 आयोजित किया था। अमेरिका, इटली, जापान, ब्राजील,रूस सहित कई देशों के राष्ट्रध्यक्ष एक मंच पर साथ थे। लेकिन घोषणापत्र पर सहमति नहीं बन पा रही थी। वजह था रूस। यूक्रेन क खिलाफ युद्ध के बाद से कई देश इसके खिलाफ थे। आम सहमति नहीं बन पा रही थी। लेकिन भारत ने शाम तक कुछ ऐसा कूटनीतिक पासा फेंका कि सभी इस घोषणापत्र पर एक सुर अलापने लगे। भारत ने रूस का नाम लिए बिना दिल्ली के घोषणापत्र पर बाकी देशों की आम सहमति पा ली थी। फ्रांस और यूरोपीय देशों ने भारत के इस प्रयास की दिल खोलकर तारीफ की थी। पीएम मोदी ने शिखर सम्मेलन के दिन घोषणा की और यह भारत की बड़ी जीत साबित हुई।

साल 2022 में शुरू हुआ रूस-यूक्रेन युद्ध के वक्त भारत के रूख की भी बात हुई। लेकिन यहां भी भारत ने अपनी कूटनीति का परिचय दिया। रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत का रुख तटस्थता और शांति की वकालत करने का रहा है। भारत ने हमेशा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस की निंदा वाले प्रस्तावों से भी खुद को अलग रखा था। भारत ने युद्ध को जल्द से जल्द समाप्त करने की अपील कीऔर दोनों पक्षों के बीच बातचीत से समाधान निकालने का आह्वान किया। विदेश मंत्री जयशंकर और पीएम मोदी ने बिना किसी के दबाव में आए बगैर हमेशा एक अलग रणनाति अपनाई। विदेशी मंचों और रूस-यूक्रेन के राष्ट्रपतियों व्लादिमीर पुतिन और वोलेदिमीर जेलेंस्की से आधिकारिक बातचीत में भी दोनों को साथ आकर बातचीत करने और युद्ध रोकने की बात दोहराई गई थी। भारत के इस रुख ने उसपर पश्चिमी देशों का दबाव भी नहीं बनने दिया। भारत के इस रुख के पीछे कई कारण हैं।

भारत के इस रुख की आलोचना भी हुई है। कुछ लोगों का कहना है कि भारत को रूस की निंदा करनी चाहिए और यूक्रेन का समर्थन करना चाहिए। हालांकि, भारत का मानना है कि उसका तटस्थ रुख ही युद्ध को समाप्त करने के लिए सबसे अच्छा तरीका है। भारत के रुख को देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि युद्ध के बाद भारत रूस के साथ अपने संबंधों को कैसे आगे बढ़ाएगा। हालांकि, यह संभावना है कि भारत रूस के साथ अपने रक्षा संबंधों को बनाए रखेगा। साथ ही, भारत यूक्रेन के साथ भी अपने संबंधों को मजबूत करने का प्रयास करेगा। ऑपरेशन रक्षक भारत सरकार द्वारा यमन में फंसे भारतीय नागरिकों को निकालने के लिए चलाया गया एक सैन्य अभियान था। यह अभियान 2015 में यमन में गृहयुद्ध शुरू होने के बाद शुरू हुआ था। ऑपरेशन रक्षक के तहत, भारतीय वायु सेना ने यमन के विभिन्न शहरों से भारतीय नागरिकों को निकालने के लिए सैकड़ों उड़ानें भरी। इन उड़ानों में भारतीय नागरिकों के अलावा, कई अन्य देशों के नागरिक भी शामिल थे। ऑपरेशन रक्षक की सफलता से भारत सरकार की वैश्विक छवि को मजबूती मिली। इस अभियान में भारत सरकार ने अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़ी मेहनत की थी। ऑपरेशन रक्षक के तहत निकाले गए भारतीय नागरिकों की संख्या 4,500 से अधिक थी। इन नागरिकों को भारतीय वायु सेना के विमानों से भारत के विभिन्न शहरों में लाया गया। ऑपरेशन रक्षक के तहत निकाले गए भारतीय नागरिकों में बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग शामिल थे। इन नागरिकों को यमन में गृहयुद्ध के कारण भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। ऑपरेशन रक्षक की सफलता के लिए भारतीय वायु सेना के जवानों ने कड़ी मेहनत की थी। इन जवानों ने यमन में खतरनाक परिस्थितियों में भी भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकालने में सफलता हासिल की।

ऑपरेशन संजीवनी भारत सरकार द्वारा श्रीलंका में आर्थिक संकट के कारण फंसे भारतीय नागरिकों को निकालने के लिए चलाया गया एक मानवीय अभियान था। यह अभियान 2022 में श्रीलंका में आर्थिक संकट शुरू होने के बाद शुरू हुआ था। ऑपरेशन संजीवनी के तहत, भारतीय वायु सेना ने श्रीलंका के विभिन्न शहरों से भारतीय नागरिकों को निकालने के लिए सैकड़ों उड़ानें भरी। इन उड़ानों में भारतीय नागरिकों के अलावा, कई अन्य देशों के नागरिक भी शामिल थे। ऑपरेशन संजीवनी की सफलता से भारत सरकार की वैश्विक छवि को मजबूती मिली। इस अभियान में भारत सरकार ने अपने नागरिकों की मदद करने के लिए कड़ी मेहनत की थी। ऑपरेशन संजीवनी के तहत निकाले गए भारतीय नागरिकों की संख्या 2,000 से अधिक थी। इन नागरिकों को भारतीय वायु सेना के विमानों से भारत के विभिन्न शहरों में लाया गया।

मोदी सरकार में भारत की एक और जीत खाड़ी देशों में मिली कही जा सकती है। मोदी इन देशों में जहां भी गए वहां उन्हें वहां के सर्वोच्च सम्मान से नवाजा गया। सबसे पहले पीएम मोदी को पापुआ न्यू गिनी के गवर्नर-जनरल सर बॉब डाडे ने अपने देश के सर्वोच्च सम्मान ग्रैंड कम्पेनियन ऑफ द ऑर्डर ऑफ लोगोहू से सम्मानित किया था। इसी दिन फिजी के पीएम सित्विनी राबुका ने PM मोदी को ‘कम्पेनियन ऑफ द ऑर्डर ऑफ फिजी’ से सम्मानित किया था। इसके अलावा पलाऊ गणराज्य के राष्ट्रपति सुरंगेल एस व्हिप्स जूनियर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सर्वोच्च सम्मान ‘एबाक्ल अवॉर्ड’ से सम्मानित किया था। मोदी को भारत के दोस्त रूस ने ऑर्डर ऑफ सेंट एंड्रयू से सम्मानित किया था। इसके पहले साल 2021 में भी पीएम को भूटान ने अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ द ड्रक ग्यालपो’से पीएम मोदी को नवाजा था।

इसके 2 साल पहले बहरीन ने PM मोदी को ‘द किंग हमाद ऑर्डर ऑफ द रेनेसां’ से सम्मानित किया था। अगस्त 2019 में ही संयुक्त अरब अमीरात ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वहाँ के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने ‘ऑर्डर ऑफ जायद’ पुरस्कार से सम्मानित किया था। यह यूएई का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। फरवरी 2018 में फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने पीएम मोदी को ‘ग्रैंड कॉलर ऑफ द स्टेट ऑफ फिलिस्तीन’ पुरस्कार से सम्मानित किया था। जून 2016 में तब के अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने प्रधानमंत्री मोदी को सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘अमीर अमानुल्लाह खान पुरस्कार’ से सम्मानित किया था। वहीं, अप्रैल 2016 में ही सऊदी अरब की यात्रा पर पहुँचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तब सऊदी अरब के किंग सलमान बिन अब्दुलअजीज ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘किंग अब्दुलअजीज सैश’ से सम्मानित किया था।

क्या नीतीश कुमार की जगह तेजस्वी यादव बन सकते हैं मुख्यमंत्री?

आने वाले समय में नीतीश कुमार की जगह अब तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री बन सकते हैं! बिहार की सियासत में बेमौसम गरमाहट छाई हुई है। वैसे तो लोकसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर अभी से ही देश भर में चहल-पहल बढ़ने लगी है। देश की जब भी चर्चा होती है तो उसका कनेक्शन बिहार से स्वतः जुड़ ही जाता है। बिहार की धरती प्रयोगधर्मी रही है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर अब तक बड़े परिवर्तन का आगाज बिहार से होता रहा है। लंबे समय तक बिहार में शासन कर लालू यादव ने सामाजिक न्याय का कॉन्सेप्ट विकसित किया तो उसी की देखादेखी बसपा प्रमुख मायावती ने उत्तर प्रदेश में सोशल इंजीनियरिंग का नुस्खा बनाया। लालू बिहार में जंगल राज के लिए ‘मशहूर’ रहे तो नीतीश कुमार ‘सुशासन’ की वजह से पहचाने गए। दोनों धुर विरोधी फिलवक्त एक साथ हैं। पता नहीं, राजनीतिक शब्दावली में इस घालमेल को अब कौन-सा नाम दिया जाएगा। बिहार की सियासत की गरमाहट के केंद्र में अभी नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जेडीयू है। बीजेपी के साथ रह कर लगातार जेडीयू पल्लवित-पुष्पित होती रही। जेडीयू को पहली बार सदमा वर्ष 2020 में तब लगा, जब विधानसभा के चुनाव हुए। उसके साल भर पहले 2019 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू ने भाजपा के साथ अपने संबंधों का भरपूर सियासी लाभ उठाया था। लोकसभा में जेडीयू ने बीजेपी के बराबर सीटों पर चुनाव लड़ कर 16 पर कामयाबी हासिल की थी। वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में पता नहीं कौन-सी ऐसी हवा चली कि नीतीश की पार्टी जेडीयू सबसे खराब स्थिति में पहुंच गई। उसे भाजपा से तकरीबन आधी महज 43 सीटों पर कामयाबी मिली, जबकि भाजपा के बराबर सीटों पर जेडीयू ने भी चुनाव लड़ा था।

नीतीश कुमार ने 2010 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू को मिली सफलता के बाद ये मुगालता पाल लिया था कि उनकी वजह से ही बीजेपी बिहार में पनप रही है। सच तो ये है कि बीजेपी ने बिहार को गैर दलीय व्यक्ति नीतीश कुमार के भरोसे ही छोड़ रखा था। उनका यही मुगालता आगे चल कर उनकी परेशानी का सबब बना। बीजेपी ने पीएम के लिए जब गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी का नाम प्रस्तावित किया तो नीतीश ऐसे बिदके, जैसे लाल कपड़ा देख कोई सांड भड़क जाता है। उन्होंने न सिर्फ इस फैसले पर अपनी आपत्ति जताई, बल्कि बीजेपी से झटके में कट्टी भी कर ली। वर्ष 2014 का लोकसभा चुनाव जेडीयू ने अकेले लड़ा और अपनी असलियत भी पार्टी ने जान ली। नीतीश के चेहरे पर अकेले लड़े गए चुनाव में जेडीयू के खाते में सिर्फ दो सीटें आईं।

अब तक नीतीश को अपनी हैसियत का पता चल चुका था। उन्हें एहसास हो गया कि अकेले जेडीयू के भरोसे बिहार की सत्ता पर काबिज होना मुश्किल है। तब उन्होंने आरजेडी प्रमुख लालू यादव से यारी गांठ ली। इसका सुखद परिणाम भी सामने आया। वर्ष 2015 में हुए विधानसभा चुनाव आरजेडी, जेडीयू और कांग्रेस ने मिल कर लड़ा। सीटें आरजेडी से जेडीयू को कम मिलीं, लेकिन सीएम की कुर्सी की गारंटी नीतीश पहले ही आरजेडी से ले चुके थे। यानी नीतीश ने बीजेपी की तरह महागठबंधन को भी आजमा कर देख लिया। दो खेमों- एनडीए और महागठबंधन में रह कर नीतीश ने दोनों को जांचा-परखा। उन्हें मूल चिंता कुर्सी की थी। कुर्सी सलामत रही। बाद में उन्हें लगा कि इससे बढ़िया तो एनडीए ही है। एनडीए में रहते उन्हें आरजेडी के साथ रहने जैसा दबाव कभी महसूस नहीं हुआ था। इसलिए आधा कार्यकाल पूरा करने से पहले ही उन्होंने आरजेडी को झटका दे दिया और दोबारा बीजेपी के खेमे में आ गए। बीजेपी के साथ आने का मतलब था कि पूरे कार्यकाल के लिए उनकी कुर्सी की सलामती। इसमें वे कामयाब रहे।

नीतीश की छवि उनकी पलटी मार राजनीति के कारण खराब हो गई। राजनीति के माहिर खिलाड़ी माने जाने वाले नीतीश को इसका एहसास तक नहीं हुआ। वे बीजेपी के साथ 2020 के विधानसभा चुनाव में उतरे जरूर, लेकिन उनकी हरकतों से खार खाई जनता ने उन्हें सबक सिखा दिया। महज 43 विधायकों के साथ बीजेपी के रहमोकरम पर वे बिहार के फिर सीएम बन गए। हालांकि उन्होंने चुनावी नतीजों के बाद सीएम की अपनी दावेदारी वापस ले ली थी, लेकिन भाजपा ने उन्हें समझा-मना कर इसके लिए तैयार कर लिया। चूंकि, बीजेपी के विधायक जेडीयू से लगभग दोगुने थे, इसलिए उसकी मोनोपोली स्वाभाविक थी। बार-बार बीजेपी के नेता नीतीश को उनकी औकात का एहसास भी करा रहे थे। उन्हें भाजपा नेताओं के इस आचरण से भय था कि किसी दिन उनकी कुर्सी न चली जाए। इस बीच भाजपा नेताओं के इस बयान ने आग में घी का काम किया कि क्षेत्रीय दलों के दिन लद गए। नीतीश को अपने बाकी कार्यकाल पर खतरा दिखने लगा तो उन्होंने महागठबंधन से सांठगांठ कर मौजूदा कार्यकाल पूरा करने का बंदोबस्त कर लिया।

नीतीश ने आरजेडी को या ये कहें कि लालू यादव फैमिली को तुरंत लॉलीपॉप दिखा दिया कि 2025 का विधानसभा चुनाव उनके ही ‘घराने’ के तेजस्वी यादव के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। यानी कार्यकाल पूरा करने का बंदोबस्त नीतीश ने बड़ी चालाकी से कर लिया। नीतीश को लगा कि उन्होंने आरजेडी को बड़ी होशियारी से गच्चा दे दिया। मगर, हकीकत ये नहीं है। आरजेडी नेताओं को अच्छी तरह पता है कि अगले विधानसभा चुनाव में नीतीश साथ रहें या न रहें, कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। तब तक लालू परिवार के बेरोजगार चल रहे दो बेटों को मंत्रिमंडल में सम्मानजनक पद तो मिल जाएगा। इसीलिए, आरजेडी नीतीश की चालाकी समझने के बावजूद नासमझ बना रही।

नीतीश कुमार से पिंड छुड़ाने के लिए आरजेडी ने ऐसी चाल चली कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। नीतीश को विपक्षी गठबंधन का पीएम फेस बनाने का झुनझुना थमा दिया। नीतीश ने खूब कूद-फांद की। विपक्षी दलों को एकजुट किया। फल काटने का वक्त आया तो कांग्रेस ने कमान झटक ली। इतना ही नहीं, नीतीश के सपने को चकनानचूर करने के लिए ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल को मोहरा बना दिया गया। ममता ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का नाम पीएम पद के लिए प्रस्तावित किया तो अरविंद केजरीवाल ने समर्थन कर दिया। यानी राष्ट्रीय राजनीति में जाने के नीतीश के दरवाजे बंद हो गए। नीतीश को बिदकाने के लिए आरजेडी ने पहले अपने हुड़दंगी ब्रिगेड को सक्रिय किया, जो अभियानी अंदाज में नीतीश कुमार और उनके शासन-प्रशासन के खिलाफ देसज अंदाज में आवाज बुलंद करता रहा। नीतीश पर इसका भी कोई असर नहीं हुआ।

अब आरजेडी ने नीतीश को हटाने के लिए लोकसभा चुनाव तक इंतजार करने का मन बनाया है। इसके पहले नीतीश के खिलाफ कोई भड़काऊ कदम उठा कर आरजेडी विपक्षी इंडिया अलायंस का खेल बिगाड़ने की तोहमत मोल लेना नहीं चाहती है। चुनाव बीतते ही नीतीश पर आरजेडी दबाव बढ़ाएगी। अगर उन्होंने खुद सीएम की कुर्सी नहीं छोड़ी तो उन्हें आरजेडी जबरन बेदखल कर देगी। लोकसभा चुनाव के परिणाम अगर एनडीए के पक्ष में आए, जैसा कि सर्वेक्षणों से पता चल रहा है और केंद्र में मोदी की सरकार बन गई तो जेडीयू के अस्तित्व पर ही खतरा उत्पन्न हो जाएगा। लंबे समय तक बीजेपी के साथ रहने के कारण जेडीयू के ज्यादातर नेताओं का झुकाव अब भी उसकी ओर अधिक है। जेडीयू को लोकसभा में कम सीटें आईं तो उसके नेता बिखर जाएंगे। कुछ आरजेडी के नेतृत्व वाले महागठबंधन में चले जाएंगे तो कुछ एनडीए खेमे में।

क्या लव करने के बाद भी होगा मर्डर?

अब लव करने के बाद भी मर्डर हो सकता है! लव, सेक्स चेंज और शादी का सपना, बात सिर्फ यहीं तक नहीं इसके आगे मर्डर। चेन्नई में मर्डर की एक ऐसी कहानी जिसको सुनकर सब हैरान हैं। एक युवक अपनी दोस्त पर पेट्रोल डालकर उसे जिंदा जला दिया। पुलिस को पता चला कि उसने लड़की से शादी के लिए कुछ दिन पहले ही सेक्स चेंज कराया था। बाद में जब लड़की ने इनकार कर दिया तो उसके बर्थडे वाले दिन ही उसका मर्डर कर दिया। यह कोई पहला मामला नहीं इसी साल की बात है जब यूपी में सेक्स चेंज , तंत्र मंत्र और मर्डर की कहानी सामने आई थी। इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब पुलिस को एक कंकाल मिला। कुछ समय पहले ही हरियाणा में एक लड़के ने सेक्स चेंज कराने और शादी करने के लिए पूरे परिवार का ही मर्डर कर दिया। सेक्स चेंज की ऐसी सनक जो इन्हें सलाखों के पीछे पहुंचा देती है। ऐसी घटनाओं पर लोगों का कहना है कि सेक्स चेंज से तन तो बदल जाता है पर मन का क्या। प्यार में धोखा मिलने की कई कहानियां हैं लेकिन चेन्नई में मामला कुछ अलग ही है। प्यार में धोखा मिलने के बाद प्रेमिका को सरप्राइज देने के लिए बुलाया लेकिन कुछ ऐसा कर दिया जिसके बाद वह सीधे जेल पहुंच गया। आरोपी मृत की सहेली थी और उसने अपनी दोस्त से शादी करने के लिए सेक्स चेंज कराकर लड़का बन गया था। मुरुगेश्वरी और नंदिनी दोनों मदुरै के एक गर्ल्स स्कूल में पढ़ती थीं और दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी। मुरुगेश्वरी ने शादी के लिए अपना सेक्स चेंज करा लिया। सेक्स चेंज के बाद उसने अपना नाम वेट्रिमरन रख लिया। वेट्रिमरन ने एक दिन नंदिनी के सामने प्यार का इजहार किया और संबंध बनाने की कोशिश की। नंदिनी ने उसे मना किया और उससे दूरी बना ली। हालांकि दोनों संपर्क में थे। पिछले शनिवार को वेट्रिमरन ने नंदिनी को साथ घूमने के लिए मना लिया। इसके आगे की कहानी काफी हैरान करने वाली है। वेट्रिमरन उसे कपड़े दिलवाए, एक अनाथ आश्रम ले गया, दान करवाया और फिर घर के लिए निकल गए। रास्ते में एक सुनसान जगह पर वेट्रिमरन ने गाड़ी रोकी और नंदिनी को फोटो के लिए पोज देने को कहा। जब वह ऐसा करने लगी तब उसे जंजीरों से बांध दिया। वेट्रिमरन ने नंदिनी की गर्दन, हाथ और पैर को काटा और फिर आग लगाकर वहां से भाग गया। वेट्रिमरन पकड़ा गया लेकिन नंदिनी की जान न बच सकी।

घटना इसी साल की है। दो लड़कियां जो एक दूसरे से प्यार और शादी भी करना चाहती थीं। उनमें से एक सोचती है कि सेक्स चेंज कराकर लड़का बन जाएगी और फिर दोनों की शादी हो जाएगी लेकिन यह रास्ता कहीं और ही जाता था। यूपी के शाहजहांपुर की यह घटना है। पूनम अपनी सहेली प्रीति से प्यार करती थी और उससे शादी करना चाहती थी। प्रीति लगातार घर आ रहे शादी के रिश्तों को नकार रही थी और उसके घरवाले इससे परेशान थे। एक दिन प्रीति की मां को इसकी वजह पता चली। यहां उसने पूनम को रास्ते से हटाने का प्लान बनाया। पूनम को रास्ते से हटाने के लिए एक तांत्रिक से डेढ़ लाख में सौदा तय कर लिया। कुछ पैसे भी एडवांस दे दिए। तांत्रिक ने पूनम और प्रीति दोनों को मिलने के लिए पास के जंगल में बुलाया। पूनम से कहा कि तंत्र मंत्र की शक्ति से वो उसे लड़का बना देगा फिर दोनों शादी कर सकते हैं। दोनों को अपने झांसे में ले लिया। पूनम को अकेले में मिलने के लिए बुलाया और उसकी हत्या कर दी। उसके गुम होने की पुलिस को सूचना दी गई। दो महीने की जांच के बात पुलिस को एक कंकाल मिला और जांच में पता चला कि वो कंकाल पूनम का है। जब मामले का खुलासा हुआ तो सभी के होश उड़ गए।

कुछ समय पहले का मामला है जब हरियाणा के रोहतक में एक लड़के ने अपना सेक्स चेंज कराने के चक्कर में पूरे परिवार का ही मर्डर कर दिया। रोहतक पुलिस को जब सच्चाई का पता चला तो उसे भी इस घटना पर यकीन करना मुश्किल हो रहा था। आरोपी लड़का अभिषेक अपने पुरुष प्रेमी के साथ रहने के लिए अपना सेक्स चेंज करवाना चाह रहा था। इंटरनेट पर वह इसके लिए जानकारी जुटा रहा था और ऐसे क्लीनिक की तलाश में था। वह दोस्त से शादी रचाकर विदेश भागना चाहता था। उसकी इस प्लानिंग की जानकारी घरवालों को लग गई वह इसके विरोध में थे। वह परिवार से 5 लाख की डिमांड कर रहा था लेकिन पिता ने इससे इनकार कर दिया। इसके बाद उसने माता-पिता, बहन और नानी की मौत की खौफनाक साजिश रच डाली। उसने एक दिन इन सभी को गोली मार दी और सभी के गहने उतार लिए जिससे लगे कि यह लूट के चलते हत्या हुई है। मौके से भागकर वह खुद होटल जा पहुंचा। हालांकि पुलिस के हाथ एक सीसीटीवी फुटेज लग गया जिसके बाद पूरी झूठी कहानी का खुलासा हुआ।

क्या राम मंदिर स्थापना में जाएगा पूरा विपक्ष?

राम मंदिर स्थापना में पूरा विपक्ष जा सकता है! अगले साल 22 जनवरी की तारीख ऐतिहासिक होगी। इस पर पूरे देश की नजर है। इस दिन अयोध्या के राम मंदिर में रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह का आयोजन है। इसके लिए अतिथियों को न्‍योता भेजा जा रहा है। इनमें विपक्ष के कई नेता भी शामिल हैं। विपक्ष के नेताओं को न्‍योता भेजकर बीजेपी ने उन्‍हें पूरी तरह उलझा दिया है। उन्‍हें समझ नहीं आ रहा है कि वे करें तो क्या करें। लोकसभा चुनाव 2024 से पहले बीजेपी राम मंदिर का पूरा श्रेय अपने खाते में लेगी। व‍िपक्ष को इस बात का डर है। उसे पता है क‍ि बीजेपी समारोह को इतना बड़ा और भव्‍य बनाएगी क‍ि दुनिया देखेगी। विपक्ष के सामने दुविधा यह है कि वह आयोजन में जाने से मना करेगा तो फंसेगा, वहां जाएगा तो भी। लोकसभा चुनाव में तय है कि बीजेपी राम मंदिर का श्रेय लेगी। इसका श्रेय लेने से उसे कैसे रोका जाए, इस पर भी विपक्षी दलों में मंथन हो चुका है। बीजेपी ने राम मंदिर मुद्दे पर विपक्ष को पूरी तरह धर्मसंकट में डाल दिया है। विपक्ष के जिन नेताओं को निमंत्रण मिला है, उनमें पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, अधीर रंजन चौधरी, सीताराम येचुरी सहित कई नाम शामिल हैं। इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई मंत्रियों और 4000 संतों के शामिल होने की उम्मीद है। वाम दलों को छोड़कर कार्यक्रम में शामिल होने को लेकर अब तक व‍िपक्ष की ज्‍यादातर पार्टियों ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल होने से इनकार कर चुके हैं। लेफ्ट पार्टी ने कहा है कि उसका मानना है कि धर्म व्यक्तिगत मामला है। वाम दल के पोलित ब्यूरो ने एक बयान जारी कर कहा है कि यह सबसे दुर्भाग्यपूर्ण है कि बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने एक धार्मिक समारोह को राज्य प्रायोजित कार्यक्रम में बदल दिया है। इसमें सीधे प्रधानमंत्री, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और अन्य अधिकारी शामिल हो रहे हैं।

हालांकि, कांग्रेस को इस निमंत्रण ने पूरी तरह उलझाकर रख दिया है। वह अब तक साफ नहीं कर पाई है कि उसके नेता कार्यक्रम में हिस्‍सा लेंगे या नहीं। कांग्रेस के जिन नेताओं को श्री राम जन्‍मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्‍ट से न्‍योता गया है, उनमें सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और अधीर रंजन चौधरी के नाम हैं। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी निमंत्रण दिया गया है। दिक्‍कत यह है कि अगर सोनिया, खरगे और अधीर कार्यक्रम में नहीं जाते हैं तो फट बीजेपी को मौका मिल जाएगा। उसे कांग्रेस को ‘हिंदू विरोधी’ साबित करने में जरा देर नहीं लगेगी। जाते हैं तो मुसलमानों की नाराजगी मोल लेनी पड़ सकती है। कांग्रेस के नेता कार्यक्रम में गए और सपा-बसपा ने इससे दूरी बनाई तो मुस्लिम वोटरों का समीकरण बिगड़ सकता है। दरअसल, उस स्थिति में मुसलमान मतदाता सपा और बसपा का रुख कर सकते हैं। कांग्रेस ऐसा बिल्‍कुल नहीं चाहेगी।

इसकी भी वजह है। हाल के कुछ वर्षों में कांग्रेस मुसलमानों का भरोसा जीतते हुए दिखी है। तेलंगाना में कांग्रेस की फतह इसकी बानगी है। वहां बीआरएस से पल्‍ला छुड़ाकर मुसलमानों ने कांग्रेस का हाथ थामा। सबसे ज्‍यादा संसदीय सीटों वाले यूपी का उदाहरण लें तो यहां सपा की सबसे बड़ी ताकत मुस्लिम मतदाता के साथ उसका खड़ा होना है। बसपा और कांग्रेस को भी उनका वोट मिलता है। बीजेपी को चुनौती देने वाली पार्टी की तरफ मुस्लिम वोट एकतरफा पड़ता है। राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कांग्रेस बीजेपी को सबसे बड़ी चुनौती पेश करती है। ऐसे में कांग्रेस मुस्लिम वोटरों को नाराज नहीं करना चाहेगी।

हिंदुओं पर बीजेपी की आक्रामकता के कारण पिछले कुल सालों में राजनीति में बड़ा फर्क आया है। उसने एक तरह से दूसरी पार्टियों को मजबूर किया है कि वे हिंदुओं के मुद्दों को दरकिनार नहीं कर सकती हैं। प्राण प्रतिष्‍ठा कार्यक्रम के निमंत्रण को ठुकराना इसलिए मुश्किल है। I.N.D.I.A अलायंस की ज्‍यादातर पार्टियों ने मुस्लिम तुष्टिकरण के बूते राष्‍ट्रीय पटल पर पहचान बनाई है। इनमें से कई ने या तो राम मंदिर आंदोलन का विरोध किया या फिर इससे दूरी बनाकर रखी। 1990 में लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल में ही बिहार में रथ यात्रा को घुसते ही रोक दिया गया था। इस यात्रा का नेतृत्‍व कर रहे लालकृष्‍ण आडवाणी गिरफ्तार हो गए थे। उसी साल यूपी में तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोलियां चलवाई थीं। राम मंदिर आंदोलन से लेकर राम मंदिर बनने तक का सफर लोगों ने आंखों से देखा है। इससे कई पीढ़‍ियां जुड़ी रही हैं। ऐसे में तथ्‍यों को छुपाया या तोड़ा-मरोड़ा नहीं जा सकता है। यहां बीजेपी के पास बड़ा ‘एडवांटेज’है। राम मंदिर के लिए उसका संघर्ष इतिहास के पन्‍नों में दर्ज है। उसी का वह फायदा उठा रही है।

जब मुरली मनोहर जोशी के भाषण ने कारसेवकों को दी एक नई आग!

एक ऐसा समय जब मुरली मनोहर जोशी के भाषण ने कारसेवकों को एक नई आग दे दी! अयोध्या में भगवान राम की जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का सपना सैकड़ों सालों से करोड़ों राम भक्तों ने देखा। इस सपने को साकार करने के लिए कई लोगों ने जीवन की आहुति दे दी तो कई लोगों ने अपना सर्वस्व न्योछावर करने के संकल्प के साथ अथक प्रयास किए। 1980 के दशक में विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने नए सिरे से अयोध्या आंदोलन का बिगुल फूंका तो उसमें जीवन के हर क्षेत्र से जुड़े रामभक्त शामिल हो गए। वक्त के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और उसकी राजनीतिक शाखा भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के कई कद्दावर नेता आंदोलन का चेहरा बन गए। लाल कृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या की रथ यात्रा ने तो राम मंदिर आंदोलन में गजब की ऊर्जा भर दी। आडवाणी के बाद दूसरे बड़े भाजपाई नेता मुरली मनोहर जोशी ने भी अयोध्या आंदोलन को परिणति तक पहुंचाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। मुरली मनोहर जोशी अचानक लाल कृष्ण आडवाणी के साथ सुर्खियों में तब आ गए जब राम लला की प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर उन्हें आमंत्रण पत्र तो मिला, लेकिन साथ ही यह भी अनुरोध किया गया कि वो अयोध्या नहीं आएं। पत्र में दोनों की ज्यादा उम्र के कारण स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया गया। इस पर देशभर से कड़ी प्रतिक्रिया हुई तो राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास ने अपनी गलती सुधारी। आडवाणी और जोशी को उनके घर जाकर आमंत्रण पत्र दिया गया। हमने सीरीज के पहले लेख में लाल कृष्ण आडवाणी के योगदान की चर्चा की थी। आज बात करते हैं मुरली मनोहर जोशी की।

आडवाणी की तरह जोशी भी राम मंदिर आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिसा लेते रहे। बीजेपी की वेबसाइट पर मुरली मनोहर जोशी के परिचय का एक अंश कहता है, ‘डॉ. जोशी ने अयोध्या के आन्दोलन में काफी अहम भूमिका निभाई थी। राम जन्मस्थान पर मंदिर निर्माण के लिए उन्हें 8 दिसंबर 1992 को गिरफ्तार कर लिया गया और माता टीला पर लालकृष्ण आडवाणी और अशोक सिंघल के साथ अयोध्या मामले में गिरफ्तार किया गया। उनके जीवन में सबसे ज्यादा महत्व इलाहाबाद का है। उन्होंने चार दशक से भी ज्यादा समय वहां दिया है। वह इलाहाबाद लोकसभा सीट से लगातार तीन बार जीते।’ जोशी राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की विचारधारा के पोषक रहे। इस कारण उन्होंने कश्मीरी आतंकियों की चुनौती स्वीकार करते हुए लाल चौक पर तिरंगा भी फहराया था। बीजेपी की वेबसाइट कहती है, ‘भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. जोशी ने 1992 में गणतंत्र दिवस के दिन ऐतिहासिक एकता यात्रा कन्याकुमारी से श्रीनगर तक लक्षित की थी जिसका उद्देश्य लाल चौक पर झंडा फहराना था। इस घटना ने अयोध्या की घटना के साथ मिलकर देश के भविष्य पर एक गहरी छाप छोड़ी।’ राम मंदिर आंदोलन हो या लाल चौक पर तिरंगा फहराने की दिलेरी, मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सभी कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते रहे। मुरली मनोहर जोशी भी इन्हीं कार्यक्रमों के जरिए नरेंद्र मोदी की क्षमता को पहचाना और आडवाणी की तरह वो भी मोदी पर दांव खेलने लगे।

कारसेवकों ने अयोध्या में जब बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराया तब बीजेपी के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ही थे। उन्होंने बीजेपी के लिए राम मंदिर आंदोलन के निहितार्थों को अच्छी तरह समझते हुए पूरी प्लानिंग की और उन्हें जमीन पर उतारा। आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गनाइजर के संपादक शेषाद्रि चारी ने अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि जोशी का आंदोलन में गहरा संबंध था। उन्होंने अखबार को बताया, ‘एक उपसमूह था जिसमें भानु प्रताप शुक्ला, दत्तोपंत ठेंगड़ी, अशोक सिंघल और गिरिलाल जैन शामिल थे जो आंदोलन की गहन योजना बनाते थे। मैं वहां एक तरह का रिकॉर्ड कीपर हुआ करता था। हम ठेंगड़ी के घर पर बहुत बार मिलते थे। मैं ऑर्गनाइजर का संपादक था। मैं नोट्स लेता था और पेपर तैयार करता था। उपसमूह सूचनाओं जमा करके लोगों से मिलता था। जोशी इस उपसमूह के साथ बहुत करीब से काम करते थे।’

चारी ने आगे कहा, ‘विहिप ने 30 अक्टूबर 1992 को घोषणा की कि वह मस्जिद के बगल की जमीन पर मंदिर निर्माण शुरू करेगा जो विवादित स्थल के आसपास निर्माण की अनुमति न देने वाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ गया था। नरसिंह राव ने आडवाणी के साथ नियमित बैठकें शुरू कीं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कुछ भी अप्रिय न हो। आडवाणी और कल्याण सिंह दोनों ने वादा किया कि मस्जिद को कुछ नहीं होगा। बार-बार आश्वासन के बाद अदालत ने 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में कारसेवकों को पूजा करने की अनुमति दी।’ उस दिन यानी 6 दिसंबर, 1992 को कार सेवकों ने बाबरी मस्जिद की गुंबदों को गिरा दिया। उस वक्त की एक तस्वीर बहुत चर्चित है। इस तस्वीर में उमा भारती उत्साह में मुरली मनोहर जोशी की पीठ पर चढ़ी दिख रही हैं। राज्यसभा सांसद स्वप्न दासगुप्ता भी उस वक्त मौके पर मौजूद थे। अखबार ने उनके हवाले से लिखा, ‘उस दिन की एक तस्वीर से एक गलत धारणा बनाई गई है जिसमें जोशी दिख रहे हैं। इसमें उमा भारती पीछे से उनके कंधे पर लटकी हुई हैं और विध्वंस का आनंद ले रही हैं। वह तस्वीर सुबह ली गई थी जब सब कुछ शांत था ना कि जब विध्वंस हुआ था।’

बाबरी विध्वंस के आरोपियों की सूची में मुरली मनोहर जोशी को भी शामिल किया गया। विभिन्न लोकसभा क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व भी किया और वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री बने रहे। इंडियन एक्सप्रेस ने बाबरी विध्वंस मामले के आरोपपत्र के हवाले से लिखा, ‘जांच के अनुसार मुरली मनोहर जोशी ने 1 दिसंबर, 1992 को मथुरा में अयोध्या जाते समय कहा था कि कोई ताकत राम मंदिर निर्माण को रोक नहीं सकती और वह मंच से कारसेवकों को प्रोत्साहित कर रहे थे। 6 दिसंबर, 1992 को विवादित ढांचे के विध्वंस के लिए और भड़काऊ नारे लगा रहे थे।’ हालांकि, 2020 में स्पेशल सीबीआई कोर्ट का फैसला आया तो यह बात निराधार साबित हुई। कोर्ट ने कहा कि आडवाणी हों या जोशी, सभी बड़े नेता उग्र भीड़ से अपील कर रहे थे कि वह कुछ भी गैर-कानूनी काम नहीं करे ताकि निर्धारित कार्यक्रम को शांतिपूर्ण संपन्न हो सके।

क्या समुद्री जहाज पर हुए हमले से सख्त हो गया है भारत?

भारत अब समुद्री जहाज पर हुए हमले से सख्त हो गया है! गाजा में इजरायल-हमास युद्ध की आंच भारत तक महसूस की जाने लगी है। लाल सागर में हूती आतंकी जहाजों पर ड्रोन और मिसाइलों से हमले कर रहे हैं। भारतीय चालक दल वाले कुछ जहाज भी उनका निशाना बने हैं। लाल सागर और अरब सागर में भारतीय चालक दल वाले जहाजों पर ड्रोन हमलों को भारत ने काफी गंभीरता से लिया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तो दो टूक कह दिया है कि जिन्होंने भी इन हमलों को अंजाम दिया है, उन्हें पाताल से भी ढूंढ निकाला जाएगा। उन्हें सबक सिखाया जाएगा। इस बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से बात की है। दोनों नेताओं ने पश्चिम एशिया की शांति, सुरक्षा और स्थिरता पर बात की। दोनों ने बातचीत में समुद्री सुरक्षा और जहाजों के मुक्त आवागमन की आजादी पर खास जोर दिया। पिछले हफ्ते पीएम मोदी और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच भी बात हुई थी। जहाजों पर हमले के मद्देनजर भारत ने समुद्र में पहरा भी बढ़ा दिया है। इस महीने भारतीय चालक दल वाले दो जहाजों पर ड्रोन हमले हुए हैं। गैबन का झंडा लगे जहाज पर दक्षिण लाल सागर में ड्रोन से हमला किया गया था। यह जहाज भारत की ओर आ रहा था। एमवी साई बाबा नाम के इस जहाज पर चालक दल के 25 सदस्य थे और सभी भारतीय थे। 19 दिसंबर को गुजरात तट के पास अरब सागर में ‘चेम प्लूटो’ नाम के जहाज पर इसी तरह ड्रोन अटैक हुआ था। यह जहाज सऊदी अरब से चला था। इन हमलों पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि हमलावरों को पाताल से भी खोज निकाला जाएगा। व्यापारिक जहाजों पर ड्रोन अटैक के बाद भारत ने समंदर में निगरानी और सुरक्षा बढ़ा दी है। समुद्री डाकुओं या आतंकियों के हमलों को काउंटर करने के लिए इंडियन नेवी ने 4 गाइडेड मिसाइल विध्वंसक तैनात किए हैं। इनमें आईएनएस मोर्मुगाओ, आईएनएस कोच्चि और आईएनएस कोलकाता शामिल हैं। इसके अलावा P-81 एयरक्राफ्ट, सी गार्डियंस, हेलिकॉप्टर और कोस्ट गार्ड के जहाजों की संयुक्त तैनाती की गई है ताकि किसी भी खतरे से समय रहते निपटा जा सके।

7 अक्टूबर को बर्बर आतंकी हमले के बाद इजरायल ने गाजा में हमास आतंकियों के खिलाफ आर-पार की जंग छेड़ रखी है। इस वजह से लाल सागर में हूती आतंकियों की गतिविधियां भी बढ़ गई हैं। यमन में मौजूद ईरान समर्थित हूती आतंकियों ने लाल सागर से गुजर रहे जहाजों पर ड्रोन और मिसाइलों से हमले कर रहे हैं। उनकी मांग है कि गाजा में इजरायल तत्काल युद्ध रोके नहीं तो वे लाल सागर में जहाजों को निशाना बनाते रहेंगे। अब तक हूती आतंकियों ने ड्रोन और मिसाइलों के जरिए जहाजों पर तकरीबन 100 हमले किए हैं। इसमें 10 जहाज प्रभावित हुए हैं। आतंकियों के हमलों से ईस्ट-वेस्ट ट्रेड खासकर तेल का व्यापार प्रभावित हुआ है। बीपी, मोलर-मैयर्स्क और हैपाग-लॉयड जैसी कुछ बड़ी कंपनियां तो अनिश्चितकाल के लिए लाल सागर से होकर अपने ऑइल टैंकर के शिपमेंट को बंद कर दिया है। इससे शिपमेंट में काफी समय लग रहा है।

लाल सागर की भौगोलिक स्थिति उसे व्यापारिक और रणनीतिक तौर पर काफी अहम बनाती है। ये मिस्र, सऊदी अरब, यमन, सूडान, इरीट्रिया और जिबूती से लगता है। उत्तर में स्वेज नहर के जरिए यह भूमध्य सागर से जुड़ा हुआ है। स्वेज नहर दुनिया का सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग में से एक है। लाल सागर एशिया और अफ्रीका महाद्वीप के देशों के बीच में स्थित है। यह मिडल ईस्ट को फार ईस्ट से तो अलग करता ही है, यूरोप और एशिया को भी अलग करता है। इसकी भूराजनीतिक स्थिति इस लिहाज से काफी अहम है कि ये अफ्रीका की पूर्वी तटीय सीमा और अरब प्रायद्वीप की पश्चिमी तटीय सीमा को निर्धारित करता है। लाल सागर बाब अल मंडेब जलडमरूमध्य और अदन की खाड़ी के जरिए दक्षिण में यह हिंद महासागर से जुड़ा हुआ है। कई अरब देशों के लिए पेट्रोलियम व्यापार का यही मुख्य रूट है। कुछ अरब देशों के कुल निर्यात का 90 से 100 प्रतिशत तक इसी रूट से होता है। जॉर्डन, जिबूती और सूडान के लिए तो समुद्री परिवहन का यही एक मात्र जरिया है। ये सबकुछ लाल सागर को भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण बनाता है। लाल सागर के जरिए यूरोप से भारत तक शिपमेंट में आम तौर पर 24 दिन लगते हैं। लेकिन अगर शिपमेंट केप ऑफ गुड होप के जरिए हो तो इसमें 38 दिन तक लग जाते हैं। यही वजह है कि जहाजों पर हमले को भारत ने काफी गंभीरता से लिया है और समुद्री सुरक्षा को अभेद्य बनाने की तैयारी कर रहा है।

क्या भारत के लिए 2024 होगा चुनौती पूर्ण?

आने वाला साल 2024 भारत के लिए चुनौती पूर्ण हो सकता है! भारत को 2024 का साल उम्मीद से देखना चाहिए या डर से? सच कहूं तो दोनों भाव होने चाहिए, लेकिन थोड़ा ज्यादा उम्मीद वाला। बीते साल की परेशानियां भले ही अभी खत्म न हों, पर उम्मीद की किरण जरूर जानी चाहिए। सबसे बड़ा सवाल है कि क्या बीजेपी 2024 में फिर से बहुमत ला पाएगी? मोदी के तो बतौर पीएम दोबारा आने की संभावना ज्यादा है, लेकिन चुनौतियां 2023 से भी ज्यादा होंगी। शायद मोदी को लोगों और विपक्ष की थोड़ी बात भी माननी पड़े। हमारे आर्थिक और राजनीतिक हालात पर ज्यादातर असर अंदरूनी ही होगा, लेकिन बाहरी घटनाएं भी उन पर प्रभाव डालती हैं। एक राहत की बात यह है कि रूस-यूक्रेन युद्ध शायद खत्म होने की तरफ बढ़ रहा है, क्योंकि यूक्रेन को मदद देने वाले देश अब थकने लगे हैं। दूसरी तरफ, इजरायल-हमास के बीच हो रहा युद्ध दुनिया भर के लिए आर्थिक और राजनीतिक तौर पर नुकसानदायक हो सकता है। अगर दोनों ही युद्धों का अंत समझौते पर हो, तो 2024 का साल 2023 से काफी बेहतर होगा।

कुछ विदेशी घटनाएँ हमें चिंतित करती हैं, जिनमें हमारे पड़ोसी देशों बांग्लादेश और पाकिस्तान के चुनाव भी शामिल हैं। बांग्लादेश में 7 जनवरी और पाकिस्तान में 8 फरवरी को चुनाव होने वाले हैं। पाकिस्तान में चाहे कोई भी जीते, हमारे लिए बहुत कुछ नहीं बदलेगा। लेकिन अगर बांग्लादेश में शेख हसीना की हार होती है, तो हमारे लिए चीजें थोड़ी मुश्किल हो सकती हैं, क्योंकि नई सरकार चीन के ज्यादा करीब हो सकती है। इस साल के अंत में अंग्रेजी बोलने वाले देशों में दो बड़े चुनाव होने वाले हैं, जिनका भारत की वैश्विक स्थिति पर भी असर पड़ेगा। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प का जीतना किसी डेमोक्रेटिक उम्मीदवार से बेहतर हो सकता है, लेकिन हम तो हर तरह के राष्ट्रपतियों के साथ रहना सीख चुके हैं। ब्रिटेन में अगर लेबर पार्टी जीतती है, तो फ्री ट्रेड एग्रीमेंट की संभावना खतरे में पड़ सकती है या उसमें देरी हो सकती है, लेकिन सच कहें तो यह एग्रीमेंट हमारे लिए कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं लाएगा।

2024 में उम्मीदों का पिटारा खुलने वाला है, और सबसे पहले राम मंदिर का उद्घाटन होगा। यह 22 जनवरी को होगा या कहें इसकी प्राण प्रतिष्ठा रखी जाएगी। ये सिर्फ धार्मिक और राजनीतिक रूप से ही बड़ा नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश के आर्थिक विकास के लिए भी बहुत ज़रूरी है। यूपी भारत के गरीब राज्यों में से एक माना जाता है, लेकिन वहां 2017 से योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राजनीतिक स्थिरता लौटी है, जिससे आर्थिक विकास के भी संकेत मिले हैं। लेकिन राम मंदिर के उद्घाटन के बाद ये विकास दोगुना होने वाला है। दिल्ली से सटे हुए पश्चिमी यूपी में नोएडा अब स्टार्ट-अप हब बन चुका है, ठीक वैसे ही जैसे हरियाणा गुरुग्राम की वजह से तरक्की कर गया। राम मंदिर से पूरब के यूपी को भी फायदा होगा, जहां अभी कम विकास हुआ है। धार्मिक पर्यटन और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर से ये इलाका भी आगे बढ़ेगा। अगर काशी और मथुरा जैसे धार्मिक स्थलों को भी उसी तरह विकसित किया जाए, तो यूपी तेजी से तरक्की करेगा। यूपी के साथ, पूरे भारत का विकास होगा। 2024 की आशा यही है कि यूपी उड़ान भरने को तैयार है!

2023-24 में भारत की अर्थव्यवस्था 7% तक बढ़ने की उम्मीद है, और 2024-25 भी उतना ही शानदार रह सकता है, अगर अमेरिका और यूरोप भारी मंदी में न फंसें। भारत के अंदरूनी हालात अच्छे हैं, खासकर चुनावी सालों में राज्यों का खर्च बढ़ने से। 2024 में लोकसभा चुनाव के अलावा, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में भी विधानसभा चुनाव होने हैं। 2024 में खेल जगत में सबसे ज्यादा धूम मचेगी क्रिकेट की T20 विश्व कप की! ये जून में अमेरिका और वेस्ट इंडीज में होगा। उम्मीद है इस बार हमारी टीम 2023 के वनडे विश्व कप जैसा निराश नहीं करेगी। इससे पहले, मार्च-मई में भारत में महिला आईपीएल और पुरुष आईपीएल का भी रोमांच देखने को मिलेगा। व्यापार जगत भी इन लीगों से खूब कमाई की उम्मीद कर रहा है। 2009 में लोकसभा चुनावों के कारण आईपीएल को दक्षिण अफ्रीका स्थानांतरित करना पड़ा था। देखना होगा कि क्या ऐसा 2024 में भी होगा?

सालों से टली हुई जनगणना 2024 में होनी ही चाहिए, ये न सिर्फ चुनाव क्षेत्रों के सीमांकन के लिए जरूरी है, बल्कि संसद में पास हो चुके 33% महिला आरक्षण बिल को लागू करने के लिए भी जरूरी है। अगर इस साल जनगणना शुरू हुई, तो नतीजे 2025 तक ही मिलेंगे, जिससे 2029 तक लोकसभा सीटें बढ़ाने का काम थोड़ा मुश्किल हो जाएगा। 2024 में अच्छी बारिश की उम्मीद के साथ-साथ, ‘गगनयान’ प्रोजेक्ट भी पूरे साल सुर्खियों में रहेगा। इस साल कई टेस्ट लॉन्च होंगे, और अगर सबकुछ ठीक रहा, तो ये भारत के पहले मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन की तैयारियों को गति देंगे। कुल मिलाकर, 2024 एक ऐसा साल हो सकता है जिसमें भारत कई क्षेत्रों में ऊंचाइयां छू सकता है, बस ज़रूरत है चीजों के सही दिशा में चलने की!

क्या भारत न्याय यात्रा बनेगी कांग्रेस की ढाल?

भारत न्याय यात्रा कांग्रेस की ढाल बन सकती है! भारत जोड़ो यात्रा के बाद अब राहुल गांधी नए साल में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले भारत न्याय यात्रा पर निकलेंगे। कांग्रेस की 14 जनवरी से भारत न्याय यात्रा में मणिपुर से मुंबई तक छह हजार किमी से अधिक दूरी तय होगी। राहुल गांधी यात्रा 2.0 में अधिक दूरी कम समय में तय करेंगे। 6200 किलोमीटर की यात्रा कई ऐसे राज्यों से होकर गुजरेगी जहां लोकसभा की अधिक सीटें हैं। जिन राज्यों से भारत न्याय यात्रा गुजरेगी वहां से लोकसभा की 355 सीटें आती हैं। लोकसभा चुनाव से पहले इस यात्रा का कांग्रेस के नजरिए से काफी महत्व होगा। हालांकि इस भारत न्याय यात्रा पर इंडिया गठबंधन के साथियों की भी नजर रहेगी। विपक्षी दलों के गठबंधन I.N.D.I.A में सीटों का बंटवारा अभी हुआ नहीं है और उम्मीद की जा रही है कि जल्द हो जाएगा। राहुल गांधी इस बार जिन राज्यों से होकर गुजरेंगे उनमें से अधिकांश राज्य ऐसे हैं जहां इंडिया गठबंधन के भीतर सीटों के तालमेल को लेकर सवाल हैं। इसमें बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र प्रमुख रूप से शामिल है। यात्रा के पहले या बीच इंडिया गठबंधन में सीटों की बात तय होती या नहीं दोनों ही सूरत में यह देखने वाली बात होगी कि विपक्ष के दूसरे साथी इस यात्रा को कैसे देखते हैं। कांग्रेस ने राहुल गांधी की अगुवाई में 14 जनवरी से 20 मार्च तक भारत न्याय यात्रा आयोजित करने की बुधवार को घोषणा की। यह यात्रा मणिपुर से शुरू होकर मुंबई तक जाएगी और इस दौरान 14 राज्यों और 85 जिलों में छह हजार किलोमीटर से अधिक की दूरी तय की जाएगी। भारत जोड़ो यात्रा के बाद पार्टी राहुल गांधी के नेतृत्व में भारत न्याय यात्रा निकालेगी। भारत न्याय यात्रा मणिपुर, नागालैंड, असम, मेघालय, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात और महाराष्ट्र से होकर गुजरेगी और 6,200 किलोमीटर की दूरी तय करेगी। भारत न्याय यात्रा ज्यादातर बस से होगी लेकिन कहीं-कहीं पदयात्रा भी होगी। यात्रा मणिपुर से शुरू करने के कारण के बारे में पूछे जाने पर कांग्रेस की ओर से कहा गया कि वह देश का महत्वपूर्ण हिस्सा है, साथ ही पार्टी उस पूर्वोत्तर राज्य के लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने की प्रक्रिया शुरू करना चाहती है।

भारत न्याय यात्रा 14 राज्यों से होकर गुजरेगी और यहां लोकसभा की कुल 355 सीटें आती हैं। ये वो राज्य हैं जहां कांग्रेस का पिछले दो चुनावों में प्रदर्शन बेहद ही खराब रहा।  लोकसभा चुनाव से ठीक पहले भारत न्याय यात्रा पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों से होकर गुजरेगी। ये वो राज्य हैं जहां बड़ी संख्या में लोकसभा सीटें हैं। इसके अलावा, जब पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में इंडिया गठबंधन में शामिल दलों के साथ सीट बंटवारे की बात आती है तो कांग्रेस को सबसे अधिक चुनौतियों का सामना यहीं करना पड़ सकता है। यात्रा के दौरान इंडिया गठबंधन के सहयोगी अपने-अपने राज्यों में राहुल गांधी का किस तरह समर्थन करते हैं यह देखना होगा। यह वक्त 2024 के चुनाव से ठीक पहले का होगा और इंडिया गठबंधन के दूसरे दल भी इसी दौरान विभिन्न स्थानों पर रैलियों की योजना बना रहे हैं।

यात्रा की अगुवाई राहुल गांधी करेंगे और कांग्रेस की ओर से पूरे यात्रा के केंद्र में वही रहेंगे। पोस्टर- बैनर से लेकर यात्रा के केंद्र में वह रहेंगे। ऐसे में यह भी काफी दिलचस्प है क्योंकि हाल ही में दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक में दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल और बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को 2024 में इंडिया गठबंधन की ओर से पीएम उम्मीदवार बनाए जाने का प्रस्ताव रखा। हालांकि खरगे ने इस बात पर जोर दिया था कि गठबंधन को एक पीएम चेहरा पेश करने की जरूरत नहीं है। फिलहाल जरूरी काम चुनाव जीतना है। राहुल गांधी का नाम फिलहाल गठबंधन के किसी साथी की ओर से आगे नहीं रखा जा रहा है। यात्रा मणिपुर से शुरू करने के कारण के बारे में पूछे जाने पर कांग्रेस की ओर से कहा गया कि वह देश का महत्वपूर्ण हिस्सा है, साथ ही पार्टी उस पूर्वोत्तर राज्य के लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने की प्रक्रिया शुरू करना चाहती है।साथ ही खरगे का नाम आगे कर कुछ दलों ने अपनी मंशा भी जाहिर कर दी है। ऐसे में इस यात्रा के बीच ही कई सवालों के जवाब भी मिलेंगे। साथ ही यह भी तय हो जाएगा कि 2024 से ठीक पहले विपक्ष की दिशा क्या होगी।