Thursday, March 5, 2026
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क्या वर्तमान के चुनावी हालात मोदी का रुख बता रहे हैं?

वर्तमान के चुनावी हालात मोदी का रुख बता रहे हैं! राम लहर के बीच विशेषकर उत्तर भारत में भाजपा नीत सरकार चाहे जो धमाल मचा ले, मगर बिहार में मोदी है तो मुमकिन है का तिलिस्म टूटेगा। इसकी एक वजह ये भी है कि बिहार में थके हुए नेताओं के साथ-साथ एक युवा वर्ग का नेतृत्व जो उभरा है, वो कारगर साबित होते दिख रहा है। इस युवा नेतृत्व में तेजस्वी यादव और चिराग पासवान दो नाम बड़ी तेजी से उभरे हैं। आगामी लोकसभा चुनाव में तमाम राजनीतिक पुरोधाओं के बीच इन दो युवा नेताओं का रंग भी दिखने वाला है। बिहार की बात करें तो निश्चित रूप से तेजस्वी यादव को दो बड़े चेहरों के बीच अपनी राजनीति की रोटी सेंकनी है। ये दो बड़े चेहरे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं। नरेंद्र मोदी का चेहरा कड़क हिंदुत्व का है और इस चेहरे का प्रभाव विगत दिनों पांच राज्यों के चुनाव में दिखा भी। बिहार में भी नमो के चेहरे का प्रभाव एक हद तक दिखेगा भी। मगर, मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में महागठबंधन को लाभ मिल सकता है। जहां तक नीतीश कुमार का सवाल है तो तेजस्वी यादव का सामना 2005 से 2010 वाले नीतीश कुमार से नहीं होने वाला है। तेजस्वी का सामना अब उस नीतीश कुमार से है, जिनकी विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लग चुका है। सुशासन बाबू और विकास कुमार के नाम से जाने वाले नीतीश कुमार का नया नामकरण पलटू राम और गिरगिट हो चुका है।

तेजस्वी यादव का सामना उस नीतीश कुमार से भी नहीं होना है जो जेंटलमैन पॉलिटिशियन के नाम से जाने जाते थे। सदन के भीतर तेजस्वी यादव, जीतनराम मांझी या फिर वर्तमान बिहार विधानसभा में नीतीश कुमार का जो रौद्र रूप दिखा, उस नीतीश कुमार से होना है। तेजस्वी यादव का सामना उस नीतीश कुमार से होना है, जो जनगणना के सवाल पर काफी ओछी भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे। नीतीश कुमार के इस बदले स्वरूप से सबसे ज्यादा प्रभाव नीतीश कुमार पर ही पड़ा है। विगत दिनों हुए तीन विधानसभा उपचुनावों में ये अंतर दिखा भी। इन उपचुनावों में नीतीश कुमार का आधार वोट छिटकते नजर आया।

अगर कुछ प्रतिशत मिसलेनियस वोट को छोड़ दें तो बिहार में चुनाव अभी जातीय जकड़न में लिपटा हुआ है। जातीय जकड़न और सेक्युलरिज्म दो ऐसे पहलू हैं जो बिहार लोकसभा चुनाव को प्रभावित करने वाले हैं। ऐसे में एमवाई समीकरण तेजस्वी के साथ खड़ा रहेगा। इस मतलब ये हुआ कि धरातल पर महागठबंधन के साथ एमवाई समीकरण यानी 30 प्रतिशत आधार वोट है। अब इनके साथ वाम दल और कांग्रेस भी शामिल हैं। 2020 विधानसभा चुनाव की बात करें तो राजद को 23.11 प्रतिशत, कांग्रेस को 9.53 प्रतिशत और वाम दल का 1.75 प्रतिशत मत मिला था। एनडीए के पक्ष में राम लहर की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। निश्चित रूप से जदयू के साथ आने से एनडीए का आधार वोट बढ़ा है। पिछले विधानसभा में भाजपा को 19.46, जदयू को15.42, लोजपा को 5.69, रालोसपा को 1.77 प्रतिशत वोट मिले थे। आमतौर पर भाजपा के साथ जब जदयू होती है तो अतिपिछड़ा का लगभग 80 प्रतिशत वोट एनडीए के पक्ष में जाता है। इसके साथ नीतीश कुमार के व्यक्तिगत प्रभाव से हर जाति का मिसलेनियस वोट भी जुड़ जाता है, जो नीतीश कुमार के द्वारा बदले गए बिहार की तस्वीर के कायल हैं। वैसे, अभी तो एनडीए के धरातल पर जितने जुड़े हैं, क्या वे अंत-अंत तक जुड़े रहेंगे? ये एक यक्ष प्रश्न है। खास कर चिराग पासवान और नीतीश कुमार के संबंधों का क्या फलाफल निकलता है? ये देखना अभी शेष है। साथ ही पशुपति पारस और चिराग पासवान का मसला सुलझा लिया जाता है या फिर चिराग का रास्ता अलग होता है? ये आगामी लोकसभा चुनाव में बदलाव लेकर आएगा।

इतना तो तय हो गया है कि तेजस्वी यादव भविष्य के नेता हो गए। पहले चरण में जो तेजस्वी थे, वे दूसरी बार सरकार में आने के बाद काफी मेच्योर नजर आए। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इस बार नीतीश कुमार का एनडीए से जुड़ना भाजपा के लिए लाभदायक नहीं है। नीतीश कुमार की बदली छवि से भाजपा का नुकसान होने जा रहा है। इतना तो तय है कि आगामी लोकसभा चुनाव में एनडीए न तो 39 सीटों पर विजय पाने जा रही है और न ही कांग्रेस एक सीट और राजद जीरो पर आउट होने वाली है। अगर कांग्रेस और राजद के लोकसभा सीटों में बढ़ोत्तरी होगी तो नुकसान हर हाल में बीजेपी-जेडीयू को होना है।

आखिर कौन थे अमीन सयानी? जिनकी आवाज में था दम?

आज हम आपको अमीन सयानी के बारे में जानकारी देने वाले हैं! उन दिनों घर-घर रेडियो सुना जाता था। भारतीय फिल्मी गानों के लिए रेडियो ‘सिलोन’ की फ्रिक्वेंसी सेट की जाती थी। मैं बहुत छोटा था और अमीन सायानी का ‘बहनों और भाइयों’ संबोधन मुझे रट गया था। मुझे यह बिल्कुल याद नहीं कि तब अमीन सायानी रेडियो ‘सिलोन’ से जुड़े थे या विविध भारती से, मगर इतना पता है कि 70 के दशक के सारे हिट गाने उनकी सुनहरी आवाज के पीछे-पीछे चलते चले आते थे। मैं तब स्कूल भी नहीं जाता था और खिड़की पर बहनों और भाइयों की नकल उतारता हुआ अपने मनपसंद सॉन्ग गाने की कोशिश करता था। आज यह बात समझ में आती है कि अमीन सायानी की सफलता का राज यही था कि वो एक ही समय में परफेक्ट होने के साथ-साथ इतने सरल थे कि एक बच्चा तक उनके अंदाज की कॉपी कर सकता था। बहरहाल अमित सायानी को जल्द ही एहसास हो गया कि उनकी आवाज लोग अपने ड्राइंग रूम या बेडरूम में बैठकर सुनते हैं और उनको किसी ऐसी अतिरंजित शैली से बचना चाहिए जो बोलने और सुनने वाले के बीच दूरी का अहसास कराए। लिहाजा उन्होंने स्वाभाविक बोलचाल की शैली पर काम किया, एक ऐसे दोस्त की तरह जो घर पर आया हो चाय के साथ फिल्मों और फिल्मी गीतों पर चर्चा कर रहा हो। कहना न होगा कि न सिर्फ यह आइडिया काम कर गया बल्कि गजब का काम कर गया। बताते हैं कि पहले शो के बाद अमीन सायानी के लिए 9000 चिट्ठियां आईं। कुछ में गीतों के लिए अनुरोध किया गया था तो बहुत सारे खत फीमेल फैंस के थे जिनको अमीन की आवाज बहुत रोमांटिक लगी थी।

अमीन सायानी ने अपने बड़े भाई हामिद सायानी की सलाह पर ऑल इंडिया रेडियो में हिंदी ब्रॉडकास्टर के लिए आवेदन किया, लेकिन उनकी आवाज रेडियो के लिए रिजेक्ट कर दी गई थी। कहा गया, ‘स्क्रिप्ट पढ़ने का आपका हुनर अच्छा है, लेकिन मिस्टर सायानी आपके तलफ्फुज में बहुत ज्यादा गुजराती और अंग्रेजी की मिलावट है, जो रेडियो के लिए अच्छी नहीं मानी जाती।’

फिर अमीन ने अपनी आवाज पर काम किया और एक ऐसी शैली लेकर आए, जिसमें स्वाभाविक शिष्टाचार था, आवाज की पिच न बहुत हाई थी और न ही लो, सुनने वाले को लगता था कि वह किसी मिलनसार, आधुनिक शहरी से रू-ब-रू हो रहा है। सायानी ने नव-साक्षरों के लिए निकलने वाली एक पाक्षिक मैगजीन की एडिटिंग, पब्लिकेशन और मुद्रण में अपनी मां कुलसुम सायानी की मदद की थी। रहबर 1940 से 1960 नाम से निकलने वाला यह पाक्षिक एक साथ देवनागरी , उर्दू और गुजराती लिपियों में पब्लिश हुआ था। गांधी जी के दिशा निर्देश में निकलने वाली इस पत्रिका का मूल संकल्प ये था कि इसे सरल हिंदुस्तानी भाषा में निकाला जाए। इस सरल हिन्दुस्तानी को पढ़ने-समझने के रियाज ने उन्हें अपनी शैली बनाने में भी मदद की।

अमीन सायानी की लोकप्रियता का एक और बहुत बड़ा कारण गीतों का काउंट डाउन था। इसे समझने के लिए थोड़ा सा पीछे इतिहास में जाना होगा। कोलंबो से बीबीसी के लॉन्च होने के ठीक तीन साल बाद एक मीडियम वेव की फ्रिकवेंसी पर कोलंबो रेडियो शुरु हुआ। ये एशिया का पहला रेडियो स्टेशन और दुनिया का दूसरा सबसे पुराना रेडियो स्टेशन था। रेडियो सिलोन की हिंदी सेवा 50 के दशक की शुरू हुई। उन दिनों ग्रेग रोस्कोव्स्की बिनाका हिट परेड प्रस्तुत किया करते थे। इसमें अंग्रेजी पॉप म्यूजिक का काउंट डाउन होता था। यह कार्यक्रम भारत के संगीत प्रेमियों में भी खासा लोकप्रिय था। दर्शकों ने इसी शैली में हिंदी में फिल्मी गीतों की उलटी गिनती का अनुरोध किया और इस बारे में बहुत सारी चिट्ठियां आती रहती थीं। यहीं से बिनाका गीतमाला का जन्म हुआ।

अमीन सायानी ने इस काउंट डाउन के सस्पेंस को अपनी आवाज में घुलामिलाकर इस तरह प्रस्तुत किया कि श्रोता एक मिनट के लिए भी उन्हें ‘मिस’ नहीं करना चाहते थे। आखिरी ‘पायदान’ (इस शब्द का उन्होंने बहुत प्यारा इस्तेमाल किया) से लेकर पहले पायदान तक जाने का सफर इस कदर रोचक होता था कि इसकी कोई दूसरी मिसाल शायद ही मिले। परंपरागत संबोधन की शैली ‘भाइयों और बहनों’ को बदलकर उन्होंने ‘बहनों और भाइयों’ कर दिया। ‘नमस्कार बहनों और भाइयों, मैं आपका दोस्त अमीन सायानी बोल रहा हूं…’ पहली बार अमीन सायानी ने 1952 में श्रीलंका के रेडियो सिलोन से यह शब्द कहे तो एक नए आजाद देश के लोग रोमांचित हो उठे। पहली बार ऐसा हुआ कि रेडियो से किसी आवाज की गर्मजोशी और मिलनसारिता ने अब तक चली आ रही रेडियो की परंपरागत गंभीरता और कठोरता को छिन्न-भिन्न कर दिया।

अमीन सायानी ने एक अखबार के दिए इंटरव्यू में कहा था वे इस बात के लिए आज भी गर्व महसूस करते हैं कि उन्हें आजादी के ठीक बाद लाखों श्रोताओं के साथ हिन्दुस्तानी में संवाद करने का अवसर मिला। एक युग का अंत हुआ। उन्हें भी इस बात पर गर्व होना चाहिए जो रेडियो के इस सुनहरे दौर के गवाह रहे और यह कह सकते हैं, ‘हमें गर्व है कि हमने अमीन सयानी को सुना था!’

INLD नेता नफे सिंह राठी हत्याकांड में पुलिस ने 4 संदिग्धों के खिलाफ मामला दर्ज किया है.

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हरियाणा में विपक्षी नेता की हत्या में चार नामजद, 20 राउंड फायरिंग का आरोप लोकसभा चुनाव से पहले हरियाणा में विपक्षी नेता की हत्या से सनसनी फैल गई है। मनोहर लाल खट्टर सरकार मुश्किल में है. विपक्ष ने राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति पर चिंता जताई है और सरकार के खिलाफ स्वर बुलंद किया है. हरियाणा की विपक्षी पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल (आईएनएलडी) के अध्यक्ष नफे सिंह राठी की हत्या ने राज्य की राजनीति को हिलाकर रख दिया है। हरियाणा में बीजेपी सरकार को विपक्ष के गुस्से का सामना करना पड़ा है. खबर है कि पुलिस ने इस हत्या में शामिल होने के संदेह में चार लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है. हालांकि, अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है. नफ़ के बेटे ने दावा किया, ”जब तक पुलिस एफआईआर में उल्लिखित आरोपियों को गिरफ्तार नहीं करती और हमें सुरक्षा नहीं देती, मैं अपने पिता का अंतिम संस्कार नहीं करूंगा।” इनेलो के एक नेता ने दावा किया कि रविवार रात 20 लोगों ने नफ़ की कार को निशाना बनाया। राउंड फायरिंग की गई।

लोकसभा चुनाव से पहले हरियाणा में विपक्षी नेता की हत्या से हड़कंप मच गया है. मनोहर लाल खट्टर सरकार मुश्किल में है. विपक्ष ने राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति पर चिंता जताई है और सरकार के खिलाफ स्वर बुलंद किया है. इनेलो नेता अभय सिंह चौटाला ने दावा किया, ”नफे दो बार के विधायक हैं. हमारी पार्टी की राज्य शाखा के प्रमुख. उनकी सुरक्षा को लेकर बार-बार वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों, राज्य के गृह मंत्री को पत्र लिखकर चिंता व्यक्त की गई है। हालांकि, राज्य सरकार की ओर से कोई सुरक्षा मुहैया नहीं करायी गयी है.

समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, पुलिस ने चार संदिग्धों- नरेश कौशिक, रमेश राठी, सतीश राठी और राहुल के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। हरियाणा के गृह मंत्री अनिल विज ने कहा कि उन्होंने पुलिस को घटना पर त्वरित कार्रवाई करने का निर्देश दिया है. साथ ही स्पेशल टास्क फोर्स का गठन कर जांच शुरू कर दी गई है. उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि दोषियों को तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाएगा. हालांकि, विपक्ष इस हत्याकांड की जांच सीबीआई से कराने की मांग कर रहा है. रविवार को चार पहिया वाहन से हरियाणा के झज्जर जिले के बहादुरगढ़ इलाके में एक कार्यक्रम में भाग लेने जा रहे नफे की हत्या कर दी गई थी. उनके साथ मौजूद एक और पार्टी कार्यकर्ता की मौत हो गई. नफ़ द्वारा नियुक्त तीन सुरक्षा गार्डों को भी गोली मार दी गई। अस्पताल सूत्रों के मुताबिक तीन लोगों की हालत गंभीर है.

इनेलो नेता की हत्या को लेकर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने भी सत्ता पक्ष पर निशाना साधा है. आप प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया है कि भाजपा हरियाणा में कानून-व्यवस्था को नष्ट कर रही है। उन्होंने कहा, ”जहां गुंडों को पकड़ने के लिए पुलिस तैनात की जानी चाहिए, वहीं हरियाणा सरकार सीमा पर विरोध कर रहे किसानों को रोकने के लिए वह ऊर्जा बर्बाद कर रही है।” उनके शब्दों में, ”एक राजनीतिक दल के अध्यक्ष की हत्या बहुत दुखद है. इस घटना से यह साफ हो गया कि राज्य में कानून-व्यवस्था की कमर टूट गयी है. इस राज्य में कोई भी सुरक्षित महसूस नहीं करता है.” वहीं, हरियाणा बीजेपी के प्रवक्ता जवाहर यादव ने कहा, ”मुझे लगता है कि विपक्ष के लिए किसी की मौत का राजनीतिकरण करना सही नहीं है. अब हम सभी को आरोपियों को जल्द पकड़ने की कोशिश करनी चाहिए.”

हरियाणा के विपक्षी खेमे ने विपक्षी इंडियन नेशनल लोकदल (आईएनएलडी) के अध्यक्ष नफे सिंह राठी की हत्या की सीबीआई जांच की मांग की है. उस मांग को लेकर सोमवार को राज्य विधानसभा में जमकर हंगामा हुआ. वहीं, हरियाणा के गृह मंत्री अनिल विज ने कहा कि हत्या की सीबीआई जांच के आदेश दिए जा सकते हैं.

रविवार को पार्टी के एक कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे इनेलो नेता नफे की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. वह अकेले तो थे ही, उनके साथ मौजूद एक और पार्टी कार्यकर्ता की भी बदमाशों की फायरिंग में जान चली गई. तीन सुरक्षा गार्ड घायल हो गये. हत्या का खुलासा होते ही पूरे देश में हंगामा मच गया. विपक्ष ने मनोहर लाल खट्टर सरकार के खिलाफ सुर बुलंद करना शुरू कर दिया. उनका दावा है कि राज्य में कानून व्यवस्था खराब हो गयी है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेता प्रतिपक्ष की हत्या के मामले में पूर्व विधायक नरेश कौशिक समेत 11 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है. हालांकि, अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है. मृतक इनेलो नेता के बेटे ने दावा किया, “मैं अपने पिता का अंतिम संस्कार तब तक नहीं करूंगा जब तक पुलिस एफआईआर में उल्लिखित आरोपियों को गिरफ्तार नहीं कर लेती और हमें सुरक्षा प्रदान नहीं करती।”

आखिर किसकी तरफ से लड़ना चाहते हैं नीतीश कुमार?

यह सवाल अब भी बना हुआ है कि आखिर नीतीश कुमार किसकी तरफ से लड़ना चाहते हैं! राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन को छोड़कर भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए में एक बार फिर वापसी कर नीतीश कुमार दोनों तरफ का नफा-नुकसान देख चुके हैं। अब उन्हें अच्छी तरह पता है कि किसके साथ वे कंफर्टेबल फील करते हैं। फिलवक्त नीतीश एनडीए के साथ हैं। एनडीए में उनकी वापसी किन शर्तों पर हुई, यह तो किसी को नहीं मालूम, लेकिन अनुमान लगाया जाता है कि उनकी वापसी बिना शर्त तो हुई नहीं होगी। भाजपा को जरूर बिहार में नीतीश जैसे साथी की कमी खल रही थी, लेकिन नीतीश के सामने ऐसी कौन-सी मजबूरी थी कि उन्हें अपनी कसम तोड़नी पड़ी। नीतीश ने कहा था कि मर जाएंगे, मिट जाएंगे, लेकिन भाजपा के साथ अब नहीं जाएंगे। यह बात याद दिलाते हुए आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव ने इसका भी खुलासा कर दिया है कि महागठबंधन के साथ जाने के लिए उन्होंने कैसे लालू यादव और राबड़ी देवी के सामने हाथ जोड़ कर पहले की गलती के लिए माफी मांगी थी। यह भी जानना जरूरी है कि नीतीश ने एनडीए का साथ क्यों छोड़ा था। तभी जाकर सटीक अनुमान लगाया जा सकता है कि नीतीश कुमार सवा तीन साल में ही क्यों दो खेमों के बीच आवाजाही करने को मजबूर हुए। जब नीतीश की आवाजाही का आकलन करते हैं तो एक बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि 2020 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू की जो दुर्गति हुई, उससे नीतीश बेहद हतोत्साहित थे। जेडीयू के 43 विधायक ही जीत कर आए थे। हालांकि इसके बावजूद बीजेपी ने गठबंधन धर्म का पालन करते हुए उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया था। नीतीश ने जेडीयू की इस दुर्गति के कारणों की जब समीक्षा की-कराई तो मालूम हुआ कि लोक जनशक्ति पार्टी के नेता चिराग पासवान इसकी बड़ी वजह रहे, जिन्हें भाजपा की तब शह मिली हुई थी। जेडीयू के खिलाफ उनके उम्मीदवारों ने वोटों में कमी कर दी। नतीजतन तकरीबन 30 सीटों पर जेडीयू को हार का सामना करना पड़ा। मन ही मन नीतीश जितने नाराज चिराग से थे, उससे कम भाजपा से भी उनकी नाराजगी नहीं थी। इसलिए कि भाजपा ने चिराग को ऐसा करने से रोका नहीं था। बहरहाल, सरकार बनने के बाद भाजपा के प्रदेश स्तर के नेता नीतीश को इस बात का एहसास कराते रहे कि वे उनकी कृपा से ही सीएम बने हुए हैं। नीतीश के काम पर अंगुली उठाने से भी भाजपा के नेता परहेज नहीं करते थे। यही वजह रही कि नीतीश को महागठबंधन की शरण में जाने को मजबूर होना पड़ा।

यह बात नीतीश और लालू परिवार के अलावा किसी को नहीं मालूम थी कि साथ देने के लिए आरजेडी ने नीतीश के सामने कोई शर्त रखी है। हां, उपेंद्र कुशवाहा जैसे जेडीयू के तत्कालीन कुछ नेता जरूर दाल में काला होने का अनुमान लगा रहे थे। वे इसे नीतीश की आरजेडी से ‘डील‘ बता रहे थे। इसी डील को उजागर करने के लिए उपेंद्र कुशवाहा हड़बोंग मचाते आखिरकार जेडीयू से अलग हो गए। बाद में यह बात उजागर हो गई कि लालू यादव ने अपने बेटे तेजस्वी यादव को सीएम बनाने की शर्त रखी थी। तय हुआ था कि नीतीश राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे और बिहार की गद्दी तेजस्वी को सौंप देंगे। नीतीश इसके लिए तैयार भी थे। यही वजह रही कि उन्होंने विपक्षी एकता की सबसे पहले कवायद शुरू की। उन्हें पहली सफलता मिल भी गई, जब विपरीत प्रकृति के नेता पटना में 23 जून 2023 को एक साथ बैठे। बाद में विपक्षी खेमे में नीतीश को वह रुतबा नहीं मिला, जिसकी उम्मीद उन्होंने पाल रखी थी। विपक्षी नेताओं की बैठक होती रहीं, लेकिन नीतीश के लिए कोई महत्वपूर्ण भूमिका तय नहीं हो सकी। उन्हें संयोजक बनाने का प्रस्ताव भी तब आया, जब उसकी कोई उपयोगिता नहीं दिख रही थी। जब यह पक्का हो गया कि राष्ट्रीय राजनीति में नीतीश के जाने की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है, तब आरजेडी ने शर्तें याद दिला कर तेजस्वी की ताजपोशी का दबाव उन पर बनाना शुरू कर दिया। तब नीतीश के सामने खेमा बदल कर सीएम बने रहने के अलावा कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था।

भरोसेमंद सूत्र बताते हैं कि नीतीश ने एनडीए में वापसी के एप्रोच के साथ अपनी दो बातें रखी थीं। पहला कि उन्हें कम से कम मौजूदा कार्यकाल तक सीएम बने रहने दिया जाए। उनकी दूसरी बात यह थी कि लोकसभा के साथ ही विधानसभा के चुनाव भी करा दिए जाएं। भाजपा उनकी पहली बात मानने को तो तैयार हो गई, लेकिन दूसरी बात से साफ मना कर दिया। भाजपा का कहना था कि लोकसभा के साथ विधानसभा का चुनाव कराने पर मतदाताओं का मिजाज इधर-उधर हो सकता है। इसलिए पहले लोकसभा का चुनाव होने दीजिए। उसके बाद कभी भी विधानसभा के चुनाव कराए जा सकते हैं। नीतीश को विधानसभा चुनाव की हड़बड़ी इसलिए है कि कम विधायकों के कारण उन्हें डगरा के बैंगन की तरह इधर-उधर होना पड़ रहा है। यानी इस बात की प्रबल संभावना है कि लोकसभा चुनाव के बाद बिहार में विधानसभा का मध्यावधि चुनाव हो जाए।

आखिर क्या है मिलन युद्ध अभ्यास?

आज हम आपको मिलन युद्ध अभ्यास के बारे में जानकारी देने वाले हैं! ये भारत ही है जिसकी मेजबानी में अमेरिका और रूस एक मंच पर आ सकते हैं तो इजरायल और ईरान के बीच भी गलबहियां हो सकती है। लाल सागर में हूती हमलों के बीच भारत मिलन नौसैनिक युद्धाभ्यास की मेजबानी करने जा रहा है। विशाखापत्तनम में इसका आयोजन 19 से 27 फरवरी तक होगा। हर दूसरे वर्ष आयोजित होने वाले इस युद्धाभ्यास का उद्देश्य हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सहयोग और सुरक्षा को बढ़ावा देना है, जिसमें हूती हमलों के कारण उजागर हुई साझा समुद्री चुनौतियों को संबोधित करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। मिलन नेवल एक्सरसाइज की शुरुआत 1995 में हुई थी। तब भारत की ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ के अनुरूप इसकी कल्पना की गई। फिर इसे नरेंद्र मोदी सरकार की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ और ‘क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास’ एसएजीएआर पहल के अनुरूप ढाला गया है। इस अभ्यास का उद्देश्य भाग लेने वाली नौसेनाओं के बीच एकजुटता, सौहार्द और सहयोग को बढ़ावा देना, पेशेवर बातचीत, ऑपरेशनल स्किल्स और आपसी आदान-प्रदान को बढ़ाना है। 19 से 27 फरवरी तक विशाखापत्तनम के नौसेना डॉकयार्ड में होने वाला मिलान नौसेना अभ्यास अपना 12वां संस्करण है। इस वर्ष का अभ्यास भारत की जी20 प्रेसीडेंसी और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ थीम के अनुरूप होने के कारण महत्वपूर्ण है, जो वैश्विक एकता और सहयोग पर जोर देता है। इसमें अभूतपूर्व भागीदारी की उम्मीद है, जिसमें अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी के साथ-साथ अन्य यूरोपीय, आसियान, अफ्रीकी और दक्षिण एशियाई देशों की शक्तिशाली नौसेनाओं सहित 50 से अधिक देशों को आमंत्रित किया गया है। इस अभ्यास में खास तौर पर सभी चार क्वाड सदस्य शामिल होंगे। इससे हिंद और प्रशांत महासागर, दोनों में समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले एक जॉइंट फोर्स के रूप में इस समूह को मजबूत करने के भारत के प्रयासों को बल मिलेगा।

अभ्यास को बंदरगाह चरण और समुद्री चरण में बांटा गया है। बंदरगाह चरण में एक अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगोष्ठी, एक शहर परेड, प्रदर्शनियां, विशेषज्ञ आदान-प्रदान और युवा अधिकारियों के बीच बातचीत की सुविधा होगी। समुद्री चरण में बड़े पैमाने पर युद्धाभ्यास, उन्नत वायु रक्षा संचालन, पनडुब्बी रोधी युद्ध और सतह रोधी युद्ध संचालन शामिल होंगे, जिसमें भारतीय नौसेना इकाइयों के साथ-साथ जहाजों, समुद्री गश्ती विमानों और मित्र विदेशी देशों की पनडुब्बियों की भागीदारी होगी। मिलन 2024 भारत के लिए अपनी नौसैनिक क्षमताओं और रक्षा उद्योग, विशेष रूप से समुद्री प्रणालियों, उप-प्रणालियों और घटकों को प्रदर्शित करने के लिए एक मंच के रूप में कार्य करता है। यह भारतीय रक्षा कंपनियों को दुनिया की नौसेनाओं के सामने अपने प्रॉडक्ट प्रदर्शित करने का अवसर भी प्रदान करता है, जिससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक जिम्मेदार समुद्री शक्ति और एक शुद्ध सुरक्षा प्रदाता के रूप में भारत की भूमिका मजबूत होती है।

1995 में शुरू किया गया, मिलन एक प्रमुख आयोजन बन गया है, जिसने इस संस्करण में 50 से अधिक देशों की भागीदारी को आकर्षित किया है। यह राष्ट्रों को साझेदारी बनाने, विचारों का आदान-प्रदान करने और समुद्री सुरक्षा बढ़ाने, क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देने की अनुमति देता है।

क्षेत्र में समुद्री डकैती, आतंकवाद और अवैध गतिविधियों जैसे बढ़ते समुद्री खतरों के कारण इस वर्ष का अभ्यास विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इस अभ्यास में बंदरगाह और समुद्री चरण शामिल हैं। हार्बर फेज: सांस्कृतिक आदान-प्रदान और पेशेवर बातचीत के साथ-साथ हूती हमलों, समुद्री डकैती और तेल रिसाव जैसे प्रमुख समुद्री मुद्दों पर चर्चा। सी फेज: खोज और बचाव, समुद्री डकैती विरोधी और मानवीय सहायता सहित विभिन्न समुद्री सुरक्षा परिदृश्यों पर प्रतिक्रिया का अनुकरण करने वाला संयुक्त परिचालन अभ्यास।

हालांकि यह अभ्यास पूरी तरह से हूती हमलों पर केंद्रित नहीं है, लेकिन यह निश्चित रूप से क्षेत्र में ऐसे उभरते खतरों के समाधान पर चर्चा करने और रणनीति बनाने के लिए एक प्लैटफॉर्म प्रदान करता है। यमन, जिबूती, सोमालिया केंद्रित हूती गतिविधियों से प्रभावित देशों की भागीदारी इस मुद्दे को संबोधित करने में सहयोग करने की उनकी उत्सुकता को इंगित करती है।यह भारतीय रक्षा कंपनियों को दुनिया की नौसेनाओं के सामने अपने प्रॉडक्ट प्रदर्शित करने का अवसर भी प्रदान करता है, जिससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक जिम्मेदार समुद्री शक्ति और एक शुद्ध सुरक्षा प्रदाता के रूप में भारत की भूमिका मजबूत होती है। कुल मिलाकर, मिलन नौसैनिक अभ्यास अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए एक महत्वपूर्ण मंच और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अधिक सुरक्षित समुद्री वातावरण सुनिश्चित करने की दिशा में एक संभावित कदम के रूप में कार्य करता है।

क्या विदेशों में मोदी सरकार कर रही है चमत्कार?

वर्तमान में विदेशों में मोदी सरकार चमत्कार कर रही है! खाड़ी के प्रमुख देश कतर में मौत की सजा पाए इंडियन नेवी के 8 पूर्व अफसरों की सजा का माफ होना और उनका सकुशल घर लौटना। यूएई में भव्य हिंदू मंदिर का निर्माण। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथ उसका उद्घाटन। पीएम मोदी की पश्चिम एशिया की हालिय यात्रा खाड़ी देशों के साथ भारत के लगातार मजबूत होते रिश्तों की कहानी कहता है। इजरायल के साथ खुलकर दोस्ती और साथ में खाड़ी देशों के साथ कमाल की ट्यूनिंग, ये नरेंद्र मोदी सरकार की कामयाब विदेश नीति और वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती साख और धाक की वानगी भर है। अगर ये कहा जाए कि अरब देशों के साथ भारत के रिश्ते अबतक के अपने सबसे ऊंचे मुकाम पर हैं तो गलत न होगा। आखिर खाड़ी के देश मोदी की शीर्ष प्राथमिकता में क्यों हैं? ऐसा नहीं है कि सिर्फ भारत ही खाड़ी देशों के साथ मजबूत रिश्तों के लिए बेचैनी दिखा रहा। खाड़ी देश भी उसके साथ रिश्तों को एक नई ऊंचाई तक ले जाने को लालायित दिख रहे। आइए समझते हैं कि मोदी आखिर ये करिश्मा कैसे कर रहे। प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में पश्चिम एशिया की यात्रा की, जिसको भारत और उस क्षेत्र के रिश्तों में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। इस यात्रा के दौरान, उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात और कतर का दौरा किया। UAE में, उन्होंने एक बड़े निवेश समझौते पर हस्ताक्षर किए। 40,000 से अधिक भारतीय प्रवासियों को संबोधित किया और अबू धाबी में एक भव्य हिंदू मंदिर का उद्घाटन किया। उनके कतर दौरे को इंडियन नेवी के 8 पूर्व अफसरों की सजा माफी और जेल से रिहाई के बाद शुक्रिया के तौर पर देखा गया। मौत की सजा का सामना कर रहे नेवी के 8 पूर्व अफसरों की सकुशल वतन वापसी निःसंदेह नरेंद्र मोदी सरकार की जबरदस्त कूटनीतिक जीत है। प्रधानमंत्री की पश्चिम एशिया यात्रा का मुख्य उद्देश्य व्यापार, प्रवासियों और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सहयोग को मजबूत करना था। भारत अरब देशों के सामने खुद को निवेश का एक आकर्षक ठिकाने के तौर पर पेश कर रहा है। उसकी कोशिश खुद को चीन के एक विकल्प के रूप में स्थापित करने की है।

आजादी के बाद, भारत और खाड़ी देशों के बीच संबंध कमजोर पड़ गए थे। लेकिन अब मोदी सरकार इन्हें फिर से मजबूत बनाने की कोशिश कर रही है। आर्थिक मोर्चे पर देखें तो भारत पहले सिर्फ कच्चा तेल खरीदता था और वहां मजदूर भेजता था। अब व्यापार का स्वरूप बदल चुका है। यूएई अब भारत का दूसरा सबसे बड़ा निर्यात बाजार है और दोनों देशों ने मिलकर साल 2030 तक व्यापार को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है। नरेंद्र मोदी सरकार के दौरान भारत और खाड़ी देशों के रिश्तों में और भी ज्यादा गर्मजोशी आई है। अपने 10 साल के कार्यकाल में पीएम मोदी ने खाड़ी सहयोगी परिषद (GCC) देशों के 13 दौरें कर चुके हैं। इनमें से 7 दौरे तो अकेले यूएई के हैं। जीसीसी देशों में बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और यूएई। प्रधानमंत्री मोदी इसके अलावा ईरान, मिस्र और जॉर्डन की यात्रा भी कर चुके हैं। मोदी पहली बार 2015 में यूएई दौरे पर आए थे जो तब 34 सालों में किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला यूएई दौरा था। इजरायल का दौरा करने वाले भी वह पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं। मोदी के कार्यकाल के दौरान इजरायल के साथ भारत के रिश्ते और मजबूत हुए ही हैं, अरब देशों के साथ ताल्लुकात भी एक नई ऊंचाई पर हैं। इजरायल और अरब देशों के बीच छत्तीस के आंकड़े के मद्देनजर दोनों के साथ भारत की दोस्ती कामयाब विदेश नीति की एक नई ही इबारत लिख रही है।

खाड़ी के देश क्यों इतने अहम हैं, ये इससे समझा जा सकता है कि भारत से बाहर जितने भी भारतीय रहते हैं उनमें से एक चौथाई से ज्यादा तो सिर्फ गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) देशों में रहते हैं। दुनियाभर में 3.21 करोड़ भारतीय प्रवासी रहते हैं, इनमें से 90 लाख यानी 27 प्रतिशत सिर्फ जीसीसी देशों में रहते हैं। खाड़ी देशों की बात करें तो सबसे ज्यादा 34.3 लाख भारतीय यूएई में, उसके बाद 25.9 लाख सऊदी अरब में, 10.3 लाख कुवैत, 7.8 लाख ओमान, 7.5 लाख कतर और 3.3 लाख भारतीय बहरीन में रहते हैं। खाड़ी देशों में भारतीय प्रवासियों की विशाल तादाद का पीएम मोदी को राजनीतिक फायदा भी मिलता है। वहां रहने वाले भारतीय बताते हैं कि पिछले कुछ सालों में उनका सम्मान बढ़ा है और उनसे बेहतर व्यवहार किया जाता है। भारत की साख बढ़ी है और वे इसका श्रेय मोदी को देते हैं। हालांकि, मोदी की विदेश यात्राओं का मुख्य उद्देश्य राजनीतिक नहीं है, बल्कि भारत के लिए वैश्विक मंच पर एक महत्वपूर्ण स्थान हासिल करना है।

विदेश में रहने वाले भारतीय हर साल भारत में जितना पैसा रेमिटेंस के तौर पर भेजते हैं, उनका तकरीबन आधा तो सिर्फ जीसीसी के देशों से आता है। 2014-15 में भारत को विदेश में रहने वाले अपने नागरिकों से मिले कुल रेमिटेंस का करीब 29 प्रतिशत जीसीसी देशों से आता था जो 2020-21 में बढ़कर 50.3 प्रतिशत हो गया। 2020-21 में भारत को कुल 89,12.7 करोड़ डॉलर का रेमिटेंस मिला था जिसमें साढ़े 4 हजार करोड़ डॉलर सिर्फ जीसीसी देशों से मिला था।

भारत ने पिछले साल 7 अक्टूबर को इजरायल पर हमास के बर्बर हमले को बिना लागलपेट के आतंकी कृत्य बताते हुए निंदा की। हालांकि, इजरायल की जवाबी कार्रवाई और गाजा में चल रहे युद्ध के बीच कई बार भारत शांति की अपील कर चुका है। गाजा युद्ध के बीच संयुक्त राष्ट्र में कुछ मौकों पर भारत इजरायल के खिलाफ भी वोट दे चुका है।

सुरक्षा के मोर्चे पर, तस्वीर और भी तेजी से बदली है। हाल के वर्षों में इजरायल भारत के शीर्ष तीन हथियार आपूर्तिकर्ताओं में से एक बन गया है। खाड़ी के कई अरब देशों के साथ, इजरायल भी आतंकवाद विरोधी प्रयासों में भारत का एक महत्वपूर्ण भागीदार है। अब भारत इस क्षेत्र में अपनी अब तक की सबसे बड़ी नौसेना तैनाती के साथ समुद्री सुरक्षा में उल्लेखनीय योगदान दे रहा है। भारतीय नौसेना यमन में हूती चरमपंथियों के ठिकानों पर हमला करने वाली अमेरिकी और ब्रिटिश सेनाओं में शामिल नहीं हुई है। इसके बजाय, यह व्यापक क्षेत्र में समुद्री डकैती पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, जहां उसने लगभग 250 जहाजों की जांच की है और 40 पर छापे मारे हैं। यह अमेरिका और ब्रिटेन के साथ मिलकर काम कर रहा है।

क्या कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दिल्ली की सीटों को लेकर एक हो पाएंगे?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दिल्ली की सीटों को लेकर एक हो पाएंगे या नहीं! लोकसभा चुनाव की तारीख नजदीक आते-आते भारतीय जनता पार्टी बीजेपी के खिलाफ बना इंडिया गठबंधन अब खत्म होने के कगार पर पहुंच चुका है। पंजाब में लोकसभा के सभी सीटों पर अपने कैंडिडेट देने की घोषणा के बाद दिल्ली की सतारूढ़ आम आदमी पार्टी ने अब राजधानी में भी ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस को बैकफुट पर धकेलने की रणनीति में जुट गई है। पार्टी ने दिल्ली की 7 सीटों में से केवल एक सीट ही कांग्रेस को ऑफर की है। देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए ये किसी झटका से कम नहीं है। आप के ऑफर पर स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं में काफी रोष है। स्थानीय वर्कर तो इसे पार्टी के लिए बेइज्जती तक करार दे रहे हैं। आप के ऑफर के बाद दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली ने कहा कि इसपर आलाकमान से बात कर फैसला किया जाएगा। लेकिन जिस तरह से आप ने कांग्रेस को राजधानी दिल्ली में महज एक सीट का ऑफर दिया है, इसे देखते हुए साफ कहा जा सकता है कि देर-सबेर दिल्ली में भी आप और कांग्रेस के रास्ते अलग हो सकते हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर 46.40 प्रतिशत था। वहीं, आप को उस चुनाव में करीब 33 प्रतिशत वोट मिले थे। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर 57 प्रतिशत हो गया था। आप का वोट प्रतिशत इस दौरान घटकर 18 फीसदी आ गया था। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 22.5 फीसदी वोट मिले थे। इंडिया टुडे के हाल में किए गए मूड ऑफ द नेशन सर्वे में जो आंकड़े आए थे वो भी चौंकाने वाले थे। इसके अनुसार अगर अभी राज्य में लोकसभा चुनाव हो जाए तो बीजेपी को को 56.6 प्रतिशत वोट मिल सकते हैं जबकि कांग्रेस इस बार दूसरे नंबर पर रहेगी और उसे 25.3 फीसदी वोट मिलने की उम्मीद है। वहीं आप को महज 14.9 प्रतिशत वोट ही मिल पाएगा।

2014 को लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी ने सभी 7 सीटों पर जीत दर्ज की थी। उसे कुल 46.63 प्रतिशत वोट मिले थे। 16वीं लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सभी सीटों पर हार का सामना करना पड़ा था और उसका वोट प्रतिशत 15.22 रहा था। वहीं आप को भी सभी सीटों पर हार मिली थी लेकिन उसका वोट प्रतिशत कांग्रेस से ज्यादा था। आप को 33.08 प्रतिशत वोट मिले थे। हालांकि, 2019 के संसदीय चुनावों में, कांग्रेस ने आप से बेहतर प्रदर्शन किया, सात में से पांच सीटों पर दूसरा नंबर पर रही थी, जबकि आप केवल दो सीटों पर ही दूसरे नंबर पर रही थी। लेकिन अगर लोकसभा चुनाव की बात करें तो 2019 के आम चुनाव में दिल्ली में कांग्रेस ने आप से बेहतर प्रदर्शन किया था। बीजेपी ने पिछले चुनाव में सभी 7 सीटों पर जीत दर्ज की थी और उसे कुल 56.9 प्रतिशत वोट मिले थे। बीजेपी को कुल 4,908,541 लाख वोट मिले थे। कांग्रेस को 2019 के चुनाव में 22.5 प्रतिशत वोट मिले थे और उसे कुल 1,953,900 लाख वोट मिले। वहीं, आप को पिछले लोकसभा चुनाव में 18.1 फीसदी वोट मिले थे और उसे कुल 1,571,687 लाख वोट मिले थे।

एक वक्त था जब दिल्ली में शीला दीक्षित के समय में राजधानी में कांग्रेस का बोलबाला था। पार्टी लगातार तीन बार राज्य की सत्ता में आई थी। लेकिन आप के उदय और शीला सरकार के पतन के बाद कांग्रेस धीरे-धीरे राजधानी में अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई। पिछले दो बार के विधानसभा चुनाव में तो पार्टी अपना खाता तक नहीं खोल पाई। आप के नेता संदीप पाठक ने कहा कि अलग-अलग राज्यों में सीट बंटवारे में देरी के कारण आप दिल्ली की 6 लोकसभा सीटों पर अपने कैंडिडेट का ऐलान करने के लिए मजबूर होगी। ऐसे में कांग्रेस के लिए केवल एक ही सीट बचेगी। आप नेता ने कहा, कांग्रेस के पास लोकसभा में शून्य सीटें और विधानसभा में शून्य सीटें हैं। पिछले साल एमसीडी चुनावों में, कांग्रेस ने 250 में से नौ वार्ड जीते थे। यदि आप योग्यता के आधार पर और आंकड़ों के आधार पर देखें, तो कांग्रेस एक सीट की भी हकदार नहीं है। लेकिन गठबंधन धर्म का ध्यान रखते हुए हम उन्हें एक सीट की पेशकश करते हैं। लेकिन कांग्रेस इस बेइज्जती को सहन करने के मूड में नहीं है। पार्टी के कार्यकर्ता इस बात के लिए राजी ही नहीं है। ऐसे में कांग्रेस आप के दिल्ली वाले ऑफर को स्वीकार करे इस बात की संभावना बेहद कम लगती है। जिस तरह आप ने एकतरफा फैसला लेते हुए उसे महज एक सीट देने की बात कही है उससे दोनों दलों के बीच रिश्ते में भी कड़वे हो सकते हैं।

आप ने कांग्रेस को केवल एक सीट का ऑफर देने के पीछे विधानसभा और एमसीडी चुनावों का भी हवाला दिया। आप नेता ने कहा कि कांग्रेस ने 250 वार्डों में से कांग्रेस ने 2022 में केवल 9 सीट ही जीत पाई थी। जबकि विधानसभा चुनावों में तो पिछले दो बार से कांग्रेस अपना खाता तक नहीं खोल पाई है। आप ने तो यहां तक कह दिया कि मौजूदा आंकड़ों के हिसाब से तो कांग्रेस पार्टी एक सीट की भी हकदार नहीं है।

जिस तरीके इंडिया गठबंधन के दलों में अभी तनातनी चल रही है ऐसे में साफ कहा जा सकता है कि ये गठबंधन फिलहाल तो नाम की ही रह गई है। दिल्ली में आप के ऑफर के बाद तो साफ कहा जा सकता है कि यहां भी दोनों दलों के बीच गठबंधन की उम्मीदें सफल होती नहीं दिख रही है। पार्टी के कई नेता दबी जुबान स्वीकार कर रहे हैं कि आप का ऑफर मंजूर होना संभव नहीं है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि ये लोकसभा चुनाव है और कांग्रेस एक राष्ट्रीय दल है। इसके अलावा 2019 के चुनाव में पार्टी 5 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही थी। ऐसे में 2024 के लोकसभा चुनाव में केवल एक सीट पर वह लड़ने की सोच भी नहीं सकती है।

आखिर कैसे तय की जाती है बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि?

आज हम आपको बताएंगे कि बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि आखिर कैसे तय की जाती है! उत्तराखंड के विश्व प्रसिद्ध धाम बद्रीनाथ के कपाट खुलने की तिथि की घोषणा सदियों पुरानी परंपराओं का निर्वहन करते हुए की गई है। 12 मई को बद्रीनाथ धाम के कपाट श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोल दिए जाएंगे। देवभूमि में बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने और बंद होने की प्रक्रिया बेहद रोचक होती है। बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि राजा की कुंडली के अनुसार तय होती है। वहीं इस दौरान सदियों से चली आ रही परंपराओं का भी विधि-विधान के साथ निर्वहन किया जाता है। बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि हर वर्ष बसंत पंचमी के दिन टिहरी के राज दरबार में तय होती है। प्राचीन समय से मान्यता चली आ रही है कि राजा ही जनता के लिए भगवान हुआ करते थे और राजा के ग्रहों की अनुकूलता को देखते हुए ही राजपुरोहित बद्रीनाथ धाम के कपाट खोलने की तिथि घोषित करते थे। इस प्रक्रिया का आज भी अक्षरश: पालन होता है। यहां राजपुरोहित राजा की कुंडली ग्रहों की अनुकूलता को देख कर तिथि तय करते हैं। इसीलिए राजदरबार से महाराजा ही कपाट खुलने की तिथि की घोषणा करते हैं।

टिहरी दरबार के राज परिवार के लोग भगवान बद्रीनाथ के तेल कलश गाड़ू कलश को ले जाने की परंपरा का हजारों वर्षों से निर्वहन कर रहे हैं। टिहरी राजवंश के पहले राजा सुदर्शन शाह को जनता ने बोलांदा बद्रीश का नाम दिया था। पूर्व में मान्यता यह भी थी कि जो भक्त भगवान बद्री विशाल के दर्शन करने के लिए नहीं पहुंच पाते थे, उन्हें राजा के दर्शन मात्र से ही धाम के दर्शन के समान पुण्य मिल जाता था। श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ धाम के मीडिया प्रभारी डॉ. हरीश गौड़ के अनुसार राजशाही के समय से ही धाम की व्यवस्था राजमहल से की जाती रही है। इस कारण आज भी ज्योतिष गणना के बाद राजा की कुंडली में ग्रहों की अनुकूलता देखी जाती है। इसके बाद राजा की उपस्थिति में विधि विधान के साथ बद्री विशाल के कपाट खुलने का मुहूर्त तय किया जाता है। बताया कि भगवान बद्री विशाल ही टिहरी नरेश के कुल देवता थे, उनके नियंत्रण में ही इन सभी परंपराओं का पालन पूर्व से किया जाता है। इसी वजह से राजमहल से ही तिथि की घोषणा महाराज के द्वारा की जाती है।

बसंत पंचमी के दिन भगवान बद्री विशाल के कपाट खुलने की तिथि के साथ-साथ गाड़ू घड़ा प्रक्रिया की भी तिथि घोषित की जाती है। बसंत पंचमी के दिन होने वाली यह घोषणा बेहद महत्वपूर्ण होती है। भगवान बद्री विशाल के शीत निद्रा से उठने के बाद मानव पूजा के साथ कपाट खुलने का समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। गाड़ू घड़ा परंपरा के लिए नरेंद्र नगर राजमहल में महारानी की अगुवाई में तिल का तेल निकाला जाता है।

कपाट खोलने के कुछ दिन पहले ही गाड़ू घड़ा यात्रा के लिए प्रक्रिया शुरू कर दी जाती है। इसमें नरेंद्र नगर राजमहल में महारानी राज्य लक्ष्मी शाह सुहागिन महिलाओं के साथ व्रत रखकर, पीले वस्त्र धारण कर मूसल-ओखली और सिलबट्टे से तिल का तेल पिरोती हैं। इस तेल को एक घड़े में भरा जाता है, जिसे गाड़ू घड़ा कहा जाता है। यह तेल कलश डिम्मर गांव स्थित श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर में रखा जाता है। धाम के कपाट खुलने के समय बद्रीनारायण की मूर्ति के अभिषेक के साथ ही छह माह तक इसी तिल के तेल का प्रयोग धाम में किया जाता है। अखंड ज्योति इसी तिल के तेल से जलाई जाती है।

डिम्मर गांव पहुंचने पर तेल कलश की पूजा अर्चना की जाती है और बद्रीनाथ धाम के कपाट खोलने से चार दिन पहले ही तेल कलश को डिम्मर गांव से जोशीमठ स्थित नृसिंह मंदिर लाया जाता है। इसके बाद नृसिंह मंदिर से बद्रीनाथ के मुख्य पुजारी रावल की अगुवाई में तेल कलश के साथ आदि शंकराचार्य की गद्दी रात्रि विश्राम के लिए योग ध्यान बद्री मंदिर पांडुकेश्वर पहुंचती है। जहां से अगले दिन यात्रा बद्रीनाथ धाम के लिए रवाना होती है। इस यात्रा में गरुड़ जी, देवताओं के खजांची कुबेर जी और भगवान नारायण के बाल सखा उद्धव जी की डोलियां भी शामिल की जाती हैं।

मान्यता है कि भगवान शंकर ने 6 वर्षों तक इस स्थान पर निवास किया था। वह 6 महीने बद्रीनाथ में और शेष 6 माह केदारनाथ में रहते थे। हिंदू अनुयायियों का दावा है कि उन्होंने अलकनंदा नदी में बद्रीनाथ के देवता की खोज की और इसे तप्त कुंड गर्म झरने के पास एक गुफा में स्थापित किया। वहीं पौराणिक कथा यह भी है कि यह वह स्थान है, जहां भगवान विष्णु ने कई वर्षों तक तपस्या की थी।

बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि आज घोषित कर दी गई है। वहीं केदारनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि 8 मार्च को शिवरात्रि के अवसर पर पंचकेदार गद्दी स्थल श्री ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ रुद्रप्रयाग में विधि-विधान से पंचांग गणना के पश्चात तय होगी। इसी दिन श्री केदारनाथ भगवान के पंचमुखी भोग मूर्ति के केदारनाथ धाम प्रस्थान का कार्यक्रम भी तय किया जाएगा। श्री गंगोत्री और श्री यमुनोत्री धाम के कपाट हर वर्ष अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर खुलते हैं। इस वर्ष अक्षय तृतीया 10 मई को है। अप्रैल महीने में श्री गंगोत्री मंदिर समिति और श्री यमुनोत्री मंदिर समिति गंगोत्री, यमुनोत्री धाम के विधिवत कपाट खुलने की तिथि और समय का ऐलान किया जाएगा।

आखिर कैसा है सोनिया गांधी का राजनीतिक जीवन?

आज हम आपको सोनिया गांधी का राजनीतिक जीवन बताने जा रहे हैं! कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने चुनावी राजनीति से संन्यास लेकर राज्यसभा के जरिए संसद पहुंचने का फैसला किया है। सोनिया गांधी राजस्थान से राज्यसभा जाएंगी। उन्होंने जयपुर जाकर राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन का पर्चा भर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17वीं लोकसभा के समापन भाषण में किसी का नाम लिए बिना कहा भी- कुछ लोग तो चुनाव लड़ने का माद्दा भी खो चुके हैं। आज जब सोनिया गांधी ने चुनावी राजनीति से संन्यास ले लिया है तो लगता है कि पीएम मोदी का निशाना संभवतः सोनिया ही थीं। सोनिया गांधी का राजनीतिक सफर हमेशा बहस का विषय रहेगा। उन्हें कांग्रेस पार्टी को उबारने का श्रेय मिला तो पुत्र मोह में इसे डूबता छोड़ने का भी आरोप भी। सोनिया पर राजनीतिक शुचिता को भी मलिन करने के आरोप लगे जब सीताराम केसरी के साथ कांग्रेसियों ने ही दुर्व्यवहार किया और जब प्रधानमंत्री रहे पीवी नरिसम्हा राव के 2004 में निधन के बाद शव को कांग्रेस मुख्यालय में नहीं रखने दिया गया। वक्त-वक्त की बात है। एक वक्त था जब सोनिया गांधी पर्दे के पीछे से देश की सरकार चला रही थीं और एक वक्त अब है जब उनका साम्राज्य बिखर चुका है। नौबत यह आ गई है कि अब उन्होंने चुनावी राजनीति से तौबा कर लिया है। 78 वर्षीय सोनिया गांधी ने अपने जीवन में काफी उतार चढ़ाव देखे। इटली में एक सामान्य परिवार में पैदा हुईं सोनिया को 1968 में राजीव गांधी से शादी के बाद भारत आना पड़ा। वो यहां शासक परिवार के घर की बहु बनीं। लेकिन अगले तीन दशक में उन्हें पहले अपनी सास इंदिरा गांधी और फिर पति राजीव गांधी को खोने की भारी विपदाओं का सामना करना पड़ा।

1984 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हो गई तो उनके पुत्र राजीव गांधी को अचानक राजनीति में आना पड़ा। वो देश के प्रधानमंत्री बन गए। सोनिया तब सहमी थीं। वो अपनी सास की दिनदाहड़े हत्या के बाद अपने पति को राजनीति में नहीं आने देना चाहती थीं। लेकिन नियती देखिए, 1991 में सोनिया का डर सही हो गया और राजीव गांधी लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान तमिलनाडु की एक रैली में आत्मघाती हमले के शिकार हो गए। वक्त की सुई फिर वहीं आ टिकी थी जब इंदिरा की हत्या के बाद राजीव के राजनीति को लेकर उहापोह का दौर था। सोनिया ने कभी पति राजीव को जो सलाह दी थी, खुद के लिए वही मौका आया तो अड़ी रहीं।

लेकिन वो कहते हैं ना, कई बार इंसान खुद को सोचा नहीं कर पाता है, परिस्थितियां उससे कुछ और ही करवा लेती हैं। सीताराम केसरी की अगुवाई में कांग्रेस पार्टी कमजोर होने लगी तो सोनिया गांधी पर कमान संभालने का दबाव बढ़ने लगा। आखिरकार छह साल बाद सोनिया को अपने फैसले से डिगना पड़ा। उन्होंने 1997 में कांग्रेस जॉइन करके राजनीति में पदार्पण कर ही लिया। अगले ही वर्ष 1998 में उन्हें कांग्रेस की कमान भी सौंप दी गई। कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी पार्टी को संगठित करना जो नेताओं के बीच आंतरिक कलह के कारण लगातार कमजोर पड़ रही थी। सीताराम केसरी के दौर में एक कहावत मशहूर हो गई थी- ना खाता ना बही, केसरी जो कहें वही सही।

सोनिया ने कांग्रेस पद संभाला तो अगले ही वर्ष लोकसभा के चुनाव हो गए। 1999 के आम चुनाव में सोनिया ने उत्तर प्रदेश की अमेठी और कर्नाटक की बेल्लारी सीट से पहली बार चुनावी किस्मत आजमाई। उन्हें दोनों जगहों पर सफलता मिली और 13वीं लोकसभा में वो पहली बार संसद पहुंच गईं। बेल्लारी में उन्होंने बीजेपी की धाकड़ नेता सुषमा स्वराज को हराया था। हालांकि, उन्होंने यह सीट छोड़ दी और अमेठी का प्रतिनिधित्व करती रहीं। बाद में इन्हीं सुषमा स्वराज ने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री से रोकने के लिए एक बड़ा संकल्प लिया। इसकी कहानी आगे।

सोनिया की व्यक्ति सफलता के बाद बारी थी कांग्रेस पार्टी की चमक वापस लाने की। 2004 के लोकसभा चुनावों में यह लक्ष्य भी हासिल हो गया। कांग्रेस पार्टी 2004 को लोकसभा चुनावों में 145 सीटें पाकर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बन गई। सोनिया गांधी के नेतृत्व में पार्टी ने पहली बार गठबंधन सरकार का नेतृत्व करने का फैसला किया। सोनिया प्रधानमंत्री बनने वाली थीं, लेकिन न केवल विरोधी बीजेपी बल्कि कांग्रेस के अंदर से भी उनके विदेशी मूल के होने का मुद्दा आसमान छू गया। सुषमा स्वराज ने ऐलान कर दिया कि अगर सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो वो अपना सिर मुंडवा लेंगी। उधर, शरद पवार, पीए संगमा और तारीक अनवर ने 1999 में ही कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बना ली थी। उन्होंने भी सोनिया के विदेशी मूल के होने को ही अपने विरोध का आधार बनाया था। यह अलग बात है कि एनसीपी पिछले कई वर्षों से उसी कांग्रेस के साथ गठबंधन में है।

2004 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन बना तो सोनिया उसकी चेयरपर्सन चुनी गईं। वो इस बार उत्तर प्रदेश की रायबरेली से जीतकर लोकसभा पहुंची थीं। सोनिया ने विरोध को देखते हुए खुद पीएम पद नहीं लेकर मनमोहन सिंह को देश का प्रधानमंत्री बना दिया था। तब नीतिगत मामलों में मनमोहन सरकार को निर्देशित करने के लिए राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) का गठन किया गया और इसकी अध्यक्ष बनीं सोनिया गांधी। आज भी दावा किया जाता है कि दरअसल 2004 से 2014 तक के मनमोहन सिंह सरकार के दो कार्यकाल की असली प्रधानमंत्री तो सोनिया गांधी ही थीं। दावा किया जाता है कि सोनिया ने पर्दे के पीछे से देश का शासन चलाया और सारी जिम्मेदारियों से मुक्त रहीं। यूपीए सरकार में जो भी घपले-घोटाले हुए, उन सबके लिए मनमोहन सिंह के नेृत्व को अक्षम बताया गया और सोनिया सारे फैसले लेकर भी पाक साफ रहीं।

एनएसी चेयरमैन के बतौर सोनिया गांधी पर पर्दे के पीछे से शासन चलाने के आरोप तो लगे ही, एक जबर्दस्त विवाद एनएसी की तरफ से तैयार एक कानूनी मसौदे पर हुआ। सोनिया ने दूसरी बार एनएसी चेयरमैन का पद संभाला तो सांप्रदायिक हिंसा विधेयक, 2011 का ड्राफ्ट तैयार हुआ। आरोप है कि इस मसौदे में दंगों का प्राथमिक दोषी हिंदुओं को मानने का प्रावधान किया गया था। हालांकि, एनएसी ने सूचना का अधिकार कानून, शिक्षा का अधिकार कानून, मनरेगा और खाद्य सुरक्षा कानून जैसे कई अच्छे फैसले भी लिए। कांग्रेस सत्ता से बेदखल हो गई, लेकिन सोनिया गांधी रायबरेली से चुनाव जीतती रहीं। सोनिया ने गांधी परिवार के इस गढ़ से 2009, 20014 और 2019 का चुनाव जीता। उनका आखिरी लोकसभा चुनाव इस मायने में बहुत खास रहा कि वो उत्तर प्रदेश से चुनकर आने वाली कांग्रेस पार्टी की अकेली लोकसभा सांसद थीं। यहां तक कि परंपरागत अमेठी सीट पर राहुल गांधी को बीजेपी नेता स्मृति इरानी से हार का मुंह देखना पड़ा। अब सोनिया के राज्यसभा का रुख करने के बाद बड़ा सवाल पैदा हो गया है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में क्या कांग्रेस पार्टी का उत्तर प्रदेश में खाता भी खुल पाएगा?

क्या अपनों से ही मुसीबत में घिर जाएंगे अखिलेश यादव?

अखिलेश यादव अब अपनों से ही मुसीबत में घिर सकते हैं! उत्तर प्रदेश की सिराथु से विधायक पल्लवी पटेल नाराज हैं। अखिलेश यादव जिस पीडीए यानी पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक वोट बैंक के सहारे लोकसभा चुनाव की बैतरणी पार करने की कोशिश में हैं, उसी पर सवाल खड़े कर रही हैं। उनका आक्रोश बच्चन- रंजन (जया बच्चन और आलोक रंजन) पर भड़का हुआ है। सवाल कर रही हैं कि राज्यसभा चुनाव के उम्मीदवारों में पीडीए कहां है? वहीं, राजनीति के माहिर खिलाड़ी स्वामी प्रसाद मौर्य का आक्रोश भी सामने आया है। स्वामी प्रसाद मौर्य समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। इसके बाद भी उनके विवादित बयानों से हमेशा पार्टी किनारा करती रही है। ऐसे में वे सवाल कर रहे हैं कि दलित- पिछड़ों को जोड़ने के लिए वे जिस प्रकार की रणनीति पर काम कर रहे हैं, उस पर सवाल खड़ा हो रहा है। वहीं, राज्यसभा चुनाव के समय में उनके इस्तीफे को भी इससे जोड़ा जा रहा है। दरअसल, स्वामी प्रसाद मौर्य को राज्यसभा चुनाव के उम्मीदवारों के नामांकन के दौरान नहीं देखा गया। इसके बाद से ही सवाल उठ रहा था कि कहीं वे नाराज तो नहीं चल रहे हैं? भारतीय जनता पार्टी ने यूपी से 10 सीटों पर राज्यसभा चुनाव के लिए सात सीटों पर उम्मीवारों की घोषणा की थी। हालांकि, समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों की घोषणा नहीं हुई। सूत्रों के हवाले से खबर आई कि तीन उम्मीदवारों के नाम का चयन कर लिया गया है। सोमवार को इस प्रकार की सुगबुगाहट हुई। पार्टी के सीनियर नेताओं की ओर से उम्मीद की जा रही थी कि केंद्रीय नेतृत्व की ओर से उन्हें कोई जानकारी दी जाएगी। लेकिन, मीडिया में तीन उम्मीदवारों के नाम सामने के अगले ही दिन अखिलेश यादव, शिवपाल यादव के नेतृत्व में जया बच्चन, आलोक रंजन और रामजी लाल सुमन ने निर्वाची अधिकारी कार्यालय पहुंच कर नामांकन दाखिल कर दिया। इस प्रकार की कार्रवाई के बाद दो बड़ी राजनीतिक घटनाएं घटी है। पहले तो अखिलेश यादव के करीबी माने जा रहे स्वामी प्रसाद मौर्य ने राष्ट्रीय महासचिव पद से इस्तीफा दिया। इसके बाद पल्लवी पटेल का बागी रुख सामने आ गया।

स्वामी प्रसाद मौर्य ने नाराजगी का कारण राष्ट्रीय महासचिव पद के अधिकारों को लेकर जताया है। उनके बयानों को निजी बताए जाने पर वे आहत दिख रहे हैं। इसके अलावा पार्टी के स्तर पर उनका पक्ष न लिए जाने को लेकर भी उनकी नाराजगी सामने आई है। स्वामी प्रसाद मौर्य कह रहे हैं कि दलित, पिछड़ा और आदिवासी समाज को सपा से जोड़ने में वे कामयाब रहे हैं। उनको साथ लाने और सपा के वोट बैंक में इजाफे के लिए दिया गया बयान निजी कैसे हो सकता है? हालांकि, महासचिव के अधिकार और निजी बयान बताए जाने के मसले पुराने हैं। अचानक इस्तीफा क्यों? इस पर राजनीतिक विश्लेषकों की राय अलग ही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का दावा है कि स्वामी प्रसाद मौर्य नाराजगी का कारण दिखा कुछ रहे हैं और असली कारण कुछ और ही है। दरअसल, स्वामी प्रसाद मौर्य ने अपने बयानों से अपनी बेटी और बदायूं से भाजपा सांसद संघमित्रा मौर्य की राह में रोड़े अटका दिए हैं। सपा ने पहले ही बदायूं सीट से धर्मेंद्र यादव को मैदान में उतार दिया है। ऐसे में उन्हें उम्मीद थी कि संघमित्रा को सपा पीडीए पॉलिटिक्स के तहत राज्यसभा भेज सकती है। लेकिन, सपा ने राज्यसभा चुनाव में स्वामी प्रसाद मौर्य को पूछा तक नहीं। ऐसे में वे खुद को राष्ट्रीय महासचिव के पद से खुद को अलग करते दिख रहे हैं। यह स्थिति अखिलेश यादव के लिए चुनौतीपूर्ण होने वाली है।

पार्टी के पद पर रहते हुए वे अपनी बेटी के लिए अब बड़े स्तर पर प्रयास करते नहीं दिख पाते। सपा के राष्ट्रीय महासचिव पद से स्वामी प्रसाद मौर्य के हटने के बाद बदायूं से धर्मेंद्र यादव के खिलाफ एक बार फिर भाजपा संघमित्रा मौर्य को उम्मीदवार बना सकती है। वहीं, स्वामी प्रसाद मौर्य भी बेटी के समर्थन में वोटरों को एकजुट कर सकते हैं। पद पर न रहने के कारण उनकी प्रतिबद्धता भी उस स्तर की नहीं रहेगी। साथ ही, अखिलेश तक उन्होंने इस्तीफे से एक बड़ा संदेश पहुंचा दिया है। साथ ही, संदेश उस वर्ग तक भी पहुंचा दिया है, जो स्वामी प्रसाद मौर्य के आसरे समाजवादी पार्टी से जुड़ता दिख रहा था।

पल्लवी पटेल किस प्रकार से अखिलेश यादव का नुकसान पहुंचा सकती हैं? यह सवाल इस समय राजनीतिक महकमे में खूब उछल रहा है। दरअसल, अपना दल कमेराबादी को पूर्वांचल के एक बड़े इलाके में सोनेलाल पटेल और कृष्णा पटेल के प्रति सहानुभूति रखने वाले एक वर्ग के बीच जगह बनाता देखा जा सकता है। अपना दल सोनेलाल से अलग राय रखनेवाला वर्ग इससे जुड़ता दिखता है। पिछड़ों की राजनीति करने वाली पल्लवी पटेल ने यूपी के डिप्टी सीएम और भाजपा में पिछड़ा वर्ग का चेहरा रहे केशव प्रसाद मौर्य को सिराथु से हराया है। अब वे नाराज हैं। इसका सीधा संदेश पिछड़ा और कमेरा वर्ग में जाएगा कि सपा इस वर्ग की बात भी नहीं सुन रही है।

अखिलेश यादव जिस पीडीए की बात कर रहे हैं, जब राज्यसभा चुनाव हुआ तो उसके उम्मीदवारों की सूची में यह गायब दिखा। वहीं, भाजपा ने अगड़े- पिछड़े सबको राज्यसभा चुनाव में साधा है। ऐसे में भले ही पल्लवी पटेल अपने स्तर से सपा को बड़ा डेंट न दें, लेकिन वे पार्टी के भीतर बगावत की आवाज जरूर बन गई हैं। मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद अखिलेश को अपने दम पर लोकसभा चुनाव 2024 में उतरना है। पिछले दो लोकसभा चुनावों में पार्टी 5 सीटों पर अटकी है। इस बार कांग्रेस और बसपा की कमजोरी उजागर होने के बाद भी सपा अपनी स्थिति और समीकरण को अपने नेताओं के बीच ही स्थापित करने में कामयाब नहीं हो पा रही है। ऐसे में मुश्किलें कम नहीं हो पा रही है।