Tuesday, April 23, 2024
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क्या अपनों से ही मुसीबत में घिर जाएंगे अखिलेश यादव?

अखिलेश यादव अब अपनों से ही मुसीबत में घिर सकते हैं! उत्तर प्रदेश की सिराथु से विधायक पल्लवी पटेल नाराज हैं। अखिलेश यादव जिस पीडीए यानी पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक वोट बैंक के सहारे लोकसभा चुनाव की बैतरणी पार करने की कोशिश में हैं, उसी पर सवाल खड़े कर रही हैं। उनका आक्रोश बच्चन- रंजन (जया बच्चन और आलोक रंजन) पर भड़का हुआ है। सवाल कर रही हैं कि राज्यसभा चुनाव के उम्मीदवारों में पीडीए कहां है? वहीं, राजनीति के माहिर खिलाड़ी स्वामी प्रसाद मौर्य का आक्रोश भी सामने आया है। स्वामी प्रसाद मौर्य समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। इसके बाद भी उनके विवादित बयानों से हमेशा पार्टी किनारा करती रही है। ऐसे में वे सवाल कर रहे हैं कि दलित- पिछड़ों को जोड़ने के लिए वे जिस प्रकार की रणनीति पर काम कर रहे हैं, उस पर सवाल खड़ा हो रहा है। वहीं, राज्यसभा चुनाव के समय में उनके इस्तीफे को भी इससे जोड़ा जा रहा है। दरअसल, स्वामी प्रसाद मौर्य को राज्यसभा चुनाव के उम्मीदवारों के नामांकन के दौरान नहीं देखा गया। इसके बाद से ही सवाल उठ रहा था कि कहीं वे नाराज तो नहीं चल रहे हैं? भारतीय जनता पार्टी ने यूपी से 10 सीटों पर राज्यसभा चुनाव के लिए सात सीटों पर उम्मीवारों की घोषणा की थी। हालांकि, समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों की घोषणा नहीं हुई। सूत्रों के हवाले से खबर आई कि तीन उम्मीदवारों के नाम का चयन कर लिया गया है। सोमवार को इस प्रकार की सुगबुगाहट हुई। पार्टी के सीनियर नेताओं की ओर से उम्मीद की जा रही थी कि केंद्रीय नेतृत्व की ओर से उन्हें कोई जानकारी दी जाएगी। लेकिन, मीडिया में तीन उम्मीदवारों के नाम सामने के अगले ही दिन अखिलेश यादव, शिवपाल यादव के नेतृत्व में जया बच्चन, आलोक रंजन और रामजी लाल सुमन ने निर्वाची अधिकारी कार्यालय पहुंच कर नामांकन दाखिल कर दिया। इस प्रकार की कार्रवाई के बाद दो बड़ी राजनीतिक घटनाएं घटी है। पहले तो अखिलेश यादव के करीबी माने जा रहे स्वामी प्रसाद मौर्य ने राष्ट्रीय महासचिव पद से इस्तीफा दिया। इसके बाद पल्लवी पटेल का बागी रुख सामने आ गया।

स्वामी प्रसाद मौर्य ने नाराजगी का कारण राष्ट्रीय महासचिव पद के अधिकारों को लेकर जताया है। उनके बयानों को निजी बताए जाने पर वे आहत दिख रहे हैं। इसके अलावा पार्टी के स्तर पर उनका पक्ष न लिए जाने को लेकर भी उनकी नाराजगी सामने आई है। स्वामी प्रसाद मौर्य कह रहे हैं कि दलित, पिछड़ा और आदिवासी समाज को सपा से जोड़ने में वे कामयाब रहे हैं। उनको साथ लाने और सपा के वोट बैंक में इजाफे के लिए दिया गया बयान निजी कैसे हो सकता है? हालांकि, महासचिव के अधिकार और निजी बयान बताए जाने के मसले पुराने हैं। अचानक इस्तीफा क्यों? इस पर राजनीतिक विश्लेषकों की राय अलग ही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का दावा है कि स्वामी प्रसाद मौर्य नाराजगी का कारण दिखा कुछ रहे हैं और असली कारण कुछ और ही है। दरअसल, स्वामी प्रसाद मौर्य ने अपने बयानों से अपनी बेटी और बदायूं से भाजपा सांसद संघमित्रा मौर्य की राह में रोड़े अटका दिए हैं। सपा ने पहले ही बदायूं सीट से धर्मेंद्र यादव को मैदान में उतार दिया है। ऐसे में उन्हें उम्मीद थी कि संघमित्रा को सपा पीडीए पॉलिटिक्स के तहत राज्यसभा भेज सकती है। लेकिन, सपा ने राज्यसभा चुनाव में स्वामी प्रसाद मौर्य को पूछा तक नहीं। ऐसे में वे खुद को राष्ट्रीय महासचिव के पद से खुद को अलग करते दिख रहे हैं। यह स्थिति अखिलेश यादव के लिए चुनौतीपूर्ण होने वाली है।

पार्टी के पद पर रहते हुए वे अपनी बेटी के लिए अब बड़े स्तर पर प्रयास करते नहीं दिख पाते। सपा के राष्ट्रीय महासचिव पद से स्वामी प्रसाद मौर्य के हटने के बाद बदायूं से धर्मेंद्र यादव के खिलाफ एक बार फिर भाजपा संघमित्रा मौर्य को उम्मीदवार बना सकती है। वहीं, स्वामी प्रसाद मौर्य भी बेटी के समर्थन में वोटरों को एकजुट कर सकते हैं। पद पर न रहने के कारण उनकी प्रतिबद्धता भी उस स्तर की नहीं रहेगी। साथ ही, अखिलेश तक उन्होंने इस्तीफे से एक बड़ा संदेश पहुंचा दिया है। साथ ही, संदेश उस वर्ग तक भी पहुंचा दिया है, जो स्वामी प्रसाद मौर्य के आसरे समाजवादी पार्टी से जुड़ता दिख रहा था।

पल्लवी पटेल किस प्रकार से अखिलेश यादव का नुकसान पहुंचा सकती हैं? यह सवाल इस समय राजनीतिक महकमे में खूब उछल रहा है। दरअसल, अपना दल कमेराबादी को पूर्वांचल के एक बड़े इलाके में सोनेलाल पटेल और कृष्णा पटेल के प्रति सहानुभूति रखने वाले एक वर्ग के बीच जगह बनाता देखा जा सकता है। अपना दल सोनेलाल से अलग राय रखनेवाला वर्ग इससे जुड़ता दिखता है। पिछड़ों की राजनीति करने वाली पल्लवी पटेल ने यूपी के डिप्टी सीएम और भाजपा में पिछड़ा वर्ग का चेहरा रहे केशव प्रसाद मौर्य को सिराथु से हराया है। अब वे नाराज हैं। इसका सीधा संदेश पिछड़ा और कमेरा वर्ग में जाएगा कि सपा इस वर्ग की बात भी नहीं सुन रही है।

अखिलेश यादव जिस पीडीए की बात कर रहे हैं, जब राज्यसभा चुनाव हुआ तो उसके उम्मीदवारों की सूची में यह गायब दिखा। वहीं, भाजपा ने अगड़े- पिछड़े सबको राज्यसभा चुनाव में साधा है। ऐसे में भले ही पल्लवी पटेल अपने स्तर से सपा को बड़ा डेंट न दें, लेकिन वे पार्टी के भीतर बगावत की आवाज जरूर बन गई हैं। मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद अखिलेश को अपने दम पर लोकसभा चुनाव 2024 में उतरना है। पिछले दो लोकसभा चुनावों में पार्टी 5 सीटों पर अटकी है। इस बार कांग्रेस और बसपा की कमजोरी उजागर होने के बाद भी सपा अपनी स्थिति और समीकरण को अपने नेताओं के बीच ही स्थापित करने में कामयाब नहीं हो पा रही है। ऐसे में मुश्किलें कम नहीं हो पा रही है।

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