Thursday, March 5, 2026
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पेटीएम के चक्कर में किस कंपनी की हुई वाहवाही?

आज हम आपको बताएंगे कि पेटीएम के चक्कर में आखिर किस कंपनी की वाहवाही हो चुकी है! बीते 31 जनवरी को बैंकिंग सेक्टर के रेगुलेटर रिजर्व बैंक ने पेटीएम पेमेंट बैंक पर बड़ी कार्रवाई का ऐलान किया था। इसके बाद से ही पेटीएम की स्थिति खराब हो गई है। पिछले एक सप्ताह से शेयर बाजार में पेटीएम के शेयरों की पिटाई ही हो रही है। इस बीच खबर आई है कि रिजर्व बैंक और पेटीएम तनातनी मामले में कुछ अन्य वॉलेट्स की बल्ले-बल्ले हो गई है। बीते 31 जनवरी के बाद देखें तो फोनपे, गूगल पे और मोबिक्विक ऐप का डाउनलोड खूब बढ़ा है। ऐप इंटेलीजेंस प्लेटफार्म ऐपट्वीक के आंकड़ों के मुताबिक रिजर्व बैंक और पेटीएम की तनातनी में सबसे बड़ा लाभार्थी फोनपे रहा है। 31 जनवरी 2024 के बाद से वालमार्ट की कंपनी फोनपे के डाउनलोड में 40 फीसदी से भी ज्यादा की बढ़ोतरी देखी गई है। सिर्फ एक से छह फरवरी के बीच में ही गूगल प्ले स्टोर और ऐपल के ऐप स्टोर से फोनपे का 3.75 मिलियन डाउनलोड हुआ है। इसी दौरान गूगल पे ऐप का डाउनलोड भी 14 फीसदी बढ़ा है। मोबिक्विक का डाउनलोड भी करीब दूना हो गया है। उक्त अवधि के दौरान MobiKwik का 280,588 डाउनलोड हुआ।

ऐप इंटेलीजेंस प्लेटफार्म एप्पट्वीक का आंकड़ा बताता है कि 31 जनवरी 2024 के बाद पेटीएम का डाउनलोड करीब 32 फीसदी घटा है। इस अवधि में पेटीएम ऐप का डाउनलोड महज 998301 रहा है। आरबीआई की इस कार्रवाई से पहले इसका एक सप्ताह का डाउनलोड 1.48 मिलियन रहा था। मार्केट इंटेलीजेंस फर्म सेंसर टॉवर Sensor Tower के आंकड़े के अनुसार सप्ताह दर सप्ताह के हिसाब से पिछले सप्ताह पेटीएम ऐप का डाउनलोड 20 फीसदी घटा है। वहीं फोनपे और गूगलपे में औसत 52 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। फोनपे के कुल डाउनलोड में तो 76 फीसदी की बढ़ोतरी दिखी है। फिनटेक कंपनी MobiKwik ने इस बीच अपना वर्कफोर्स एक्सपेंशन करना शुरू कर दिया है। हाल ही में कंपनी ने मोहित नारायण को चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर के रूप में एलिवेट किया है। कंपनी के पेमेंट गेटवे डिवीजन में हरविंदर सिंह चड्ढा को लाया गया है। पेटीएम पेमेंट बैंक पर आरबीआई के शिकंजे के बीच उसके प्रतिस्पर्धी एयरटेल पेमेंट बैंक भी अपने विस्तार का ताना-बाना बुन रहा है। बताया जाता है कि अगली तिमाही के दौरान बैंक अपने सेल्सफोर्स में पांच गुने की बढ़ोतरी करने वाला है। इस समय बाजार में कंपनी के तीन हजार से भी ज्यादा सेल्सपीपल काम कर रहे हैं। इस समय एयरटेल पेमेंट बैंक के 10 लाख से भी जयादा मर्चेंट लाइव हैं।इसी के साथ कंपनी ने अपने साउंडबॉक्स प्रोडक्ट मोबिक्विक वाइब का छोटे कारोबारियों के बीच डिप्लायमेंट बढ़ा दिया है। साथ ही पीओएस मशीनों की संख्या भी बढ़ा रहा है। खबर मिली है कि कंपनी हार्डवेयर इनवेस्टमेंट में 702.85 मिलियन रुपये का योगदान कर रहा है।

बाजार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पिछले आठ दिनों में मोबिक्विक के ऐप इंस्टालमेंट में शत-प्रतिशत का इजाफा हुआ है। यह सब आर्गेनिक ग्रोथ बताया जाता है। यही नहीं, ऑफलान मर्चेंट जीएमवी भी 30 फीसदी बढ़ा है। ऑनलाइन मर्चेंट जीएमवी में 25 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है जबकि यूपीआई ट्रांजेक्शन भी 50 फीसदी बढ़ा है।पेटीएम पेमेंट बैंक पर आरबीआई के शिकंजे के बीच उसके प्रतिस्पर्धी एयरटेल पेमेंट बैंक भी अपने विस्तार का ताना-बाना बुन रहा है। बताया जाता है कि अगली तिमाही के दौरान बैंक अपने सेल्सफोर्स में पांच गुने की बढ़ोतरी करने वाला है। इस समय बाजार में कंपनी के तीन हजार से भी ज्यादा सेल्सपीपल काम कर रहे हैं। इस समय एयरटेल पेमेंट बैंक के 10 लाख से भी जयादा मर्चेंट लाइव हैं।

 पेटीएम संकट से पहले की बात करें तो इसमें अमरीकी कंपनियों का ही बर्चस्व है। ये दो कंपनियां हैं वालमार्ट की कंपनी फोनपे और गूगल का लोकल पेमेंट सर्विस। 31 जनवरी 2024 के बाद से वालमार्ट की कंपनी फोनपे के डाउनलोड में 40 फीसदी से भी ज्यादा की बढ़ोतरी देखी गई है। सिर्फ एक से छह फरवरी के बीच में ही गूगल प्ले स्टोर और ऐपल के ऐप स्टोर से फोनपे का 3.75 मिलियन डाउनलोड हुआ है। इसी दौरान गूगल पे ऐप का डाउनलोड भी 14 फीसदी बढ़ा है। मोबिक्विक का डाउनलोड भी करीब दूना हो गया है। उक्त अवधि के दौरान MobiKwik का 280,588 डाउनलोड हुआ।हर महीने यूपीआई वॉल्यूम में इनकी on an average 80-85% की हिस्सेदारी है। एनपीसीआई NPCI के आंकड़े बताते हैं कि दिसंबर 2023 के दौरान यूपीआई वॉल्यूम में PhonePe की हिस्सेदारी 46% की रही। इसके बाद गूगल पे Google Pay की हिस्सेदारी 36% की और पेटीएम पेमेंट बैंक Paytm Payments Bank की हिस्सेदारी 13% की रही।

क्या वर्तमान में युवाओं में भी हो रहा है प्रोस्टेट कैंसर?

वर्तमान में युवाओं में भी प्रोस्टेट कैंसर का खतरा बढ़ता ही जा रहा है! मुंबई के मरीन ड्राइव के रहने वाले एस. निखिल ने 18 महीने पहले कोविड महामारी के बाद पहली बार पूरे शरीर का चेकअप करवाया था। निखिल ने अपने दोस्तों के कहने पर यह चेकअप कराया था। निखल के पूरे शरीर का चेकअप होने के बाद जो रिपोर्ट सामने आई वो वाकई चौंकाने वाली थी। उनकी रिपोर्ट में प्रोस्टेट-विशिष्ट एंटीजन पीएसए का स्तर बहुत अधिक पाया गया। सरल भाषा में बताएं तो निखिल को प्रॉस्टेट कैंसर था। पीएसए असल में इसी कैंसर का संकेत देने वाला एक प्रोटीन होता है। पेशे से बिजनेसमैन निखिल बताते हैं कि मैं उस वक्त 55 साल का था, स्वस्थ था, लगभग हर रोज टेनिस खेलता था और ऐसा कोई लक्षण नहीं था जिससे मुझे शक हो कि मुझे प्रॉस्टेट कैंसर भी हो सकता है। निखिल को कैंसर होने का एक और कारण यह था कि उन्हें कोई लक्षण नहीं दिख रहे थे। आम तौर पर यह बीमारी 70-80 साल के बुजुर्गों को होती है। लेकिन जांच के बाद डॉक्टरों को पता चला कि उन्हें आठवें चरण का प्रॉस्टेट कैंसर है, जिसका जल्द ऑपरेशन जरूरी था। यूरो-ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. अनूप रमानी और डॉ. अमित जोशी के मुताबिक, निखिल का मामला एक नए चलन को दर्शाता है, जिसमें प्रॉस्टेट कैंसर होने की उम्र घट रही है। दुर्भाग्य से, इन युवाओं में कैंसर का ज्यादा तेजी से बढ़ने वाला रूप पाया जाता है। टाटा मेमोरियल सेंटर, परेल और खारघर में प्रोफेसर डॉ. जोशी, बताते हैं कि पहले तक मुझे शायद 15 दिन में या एक महीने में एक बार 50 साल के मरीज मिलते थे, लेकिन अब हर ओपीडी में कम उम्र के मरीज आ रहे हैं। डॉ. रमानी का कहना है कि उन्होंने करीब 6 साल पहले इस बदलाव को देखा था। उन्होंने कहा कि कुछ तो बदला हुआ है। यह लाइफस्टाइल से जुड़ी आदतें जैसे धूम्रपान और शराब पीना, जेनेटिक कारण या फिर पीएसए टेस्ट की आसानी से उपलब्धता हो सकती है। कम से कम पढ़े-लिखे और आर्थिक रूप से सक्षम लोगों में, हर साल पीएसए टेस्ट करवाने जैसी स्वस्थ्य जांच की आदतें भी युवाओं में इस कैंसर को जन्म दे सकती हैं।

मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु जैसे शहरों में प्रॉस्टेट कैंसर पुरुषों में होने वाले शीर्ष 10 कैंसर में से एक है। मुंबई में, यह 1990 में पुरुषों में आठवें सबसे आम कैंसर से बढ़कर 2014 में तीसरे नंबर पर पहुंच गया है। 4 फरवरी को विश्व कैंसर दिवस पर WHO के आंकड़ों के अनुसार, 2022 में भारत में 37,948 पुरुष प्रॉस्टेट कैंसर से प्रभावित हुए हैं। जो देश में दर्ज 14 लाख नए कैंसर मामलों में लगभग 3% है। डॉ. रमानी ने कहा कि भारत में सबसे बड़ी समस्या मृत्यु दर अधिक होना है। अमेरिका में, 80% प्रॉस्टेट कैंसर के रोगियों का जल्दी पता चल जाता है और 20% बहुत देर से आते हैं। भारत में यह आंकड़े उलट हैं।

आमतौर पर प्रॉस्टेट कैंसर बहुत धीमी गति से बढ़ता है, इसलिए कई मामलों में लक्षण दिखने से पहले ही किसी व्यक्ति की अन्य प्राकृतिक कारणों से मृत्यु हो सकती है। लेकिन 40 या 50 साल के उम्र में होने वाले प्रॉस्टेट कैंसर की अलग खासियत होती है। यह अधिक तेजी से फैलता है। डॉ. जोशी बताते हैं, कम उम्र के प्रॉस्टेट कैंसर वाले मरीज हमारे पास आते हैं तब तक कैंसर अधिक तेजी से बढ़ रहा होता है और अंगों में फैल चुका होता है।’ यह उसी तरह है जैसे कम उम्र की महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का अधिक तेज बढ़ने वाला रूप पाया जाता है। उन्होंने कहा कि कुछ जेनेटिक फैक्टर या आणविक प्रक्रियाएं इसके लिए जिम्मेदार हो सकती हैं, लेकिन अभी तक इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला है। कम उम्र में प्रॉस्टेट कैंसर के बढ़ते मामलों का पता लगाने के लिए डॉ. जोशी की टीम ने टाटा मेमोरियल सेंटर के खारघर शाखा में एक अध्ययन शुरू किया है। लेकिन डॉ. जोशी कहते हैं कि 50 साल से अधिक उम्र के सभी पुरुषों को पीएसए टेस्ट करवाने की सलाह नहीं दी जा सकती।

पूरे विश्व में भारत समेत, कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं। टाटा मेमोरियल सेंटर के निदेशक शैक्षणिक डॉ. श्रीपाद बनावली ने बताया, ‘पहले जब मैं मरीजों का मेडिकल हिस्ट्री लेता था, तो कोई भी मरीज ये नहीं कहता था कि उनके परिवार में किसी और को कैंसर हुआ है। लेकिन अब लगभग हर मरीज के परिवार में कोई न कोई कैंसर का मरीज होता है।’ कैंसर के मामले पूरी दुनिया में बढ़ रहे हैं और साथ ही कम उम्र में होने वाले कैंसर के मामलों में भी वृद्धि हो रही है, जिसमें प्रॉस्टेट कैंसर भी शामिल है। सितंबर 2023 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि पिछले 30 वर्षों में 50 से कम आयु वर्ग के लोगों में कैंसर होने की दर में 79% की वृद्धि हुई है। 1990 में जहां 1.8 मिलियन कैंसर का पता चला था, वहीं 2019 में यह संख्या बढ़कर 3.3 मिलियन हो गई।

क्या इमरान खान पाकिस्तान में फिर से बन सकते हैं मजबूत?

इमरान खान अब पाकिस्तान में फिर से मजबूत बना सकते हैं! पाकिस्तानी सेना कमजोर होने और इमरान खान मजबूत होने से पाकिस्तान को नुकसान होगा। ‘प्रोजेक्ट इमरान’ को खत्म करना पाकिस्तानी सेना और देश दोनों के लिए बहुत महंगा साबित होगा। सेना को इस बार पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ PTI के खिलाफ चुनाव में धांधली का सहारा लेना पड़ा। लेकिन चौंकाने वाले नतीजों ने सेना को मुश्किल में डाल दिया है। सेना को सिर्फ इस बात से राहत मिली कि बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवार खड़े थे, जो उन्हें किंगमेकर की भूमिका में रहने का जरूरी सहायता दे रहे हैं। हालांकि, पाकिस्तान के लोगों ने इमरान के पक्ष में साफ जनादेश दिया है। लेकिन अगर सुप्रीम कोर्ट उनकी पार्टी के चुनाव चिन्ह ‘क्रिकेट बल्ले’ को मंजूरी देता तो ये समर्थन और भी भारी होता। वहीं, जिन लोगों को सेना का साथ देने वाला या सेना के इशारे पर पीटीआई छोड़कर अपना गुट बनाने वाला समझा जाता था, उन्हें जनता ने बुरी तरह हरा दिया है। पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़ (PML-N) के नेता नवाज शरीफ के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। अपने गढ़ लाहौर की महत्वपूर्ण सीट को गंवाने के डर से वे मुश्किल से बचे। 8 फरवरी को गिनती के दौरान वे जेल में बंद पीटीआई की उम्मीदवार और राजनीति में नई यस्मीन राशिद से पीछे चल रहे थे। लेकिन अचानक पाकिस्तान चुनाव आयोग की ओर से लोगों को चुनाव परिणामों की जानकारी देने के लिए स्थापित सभी सिस्टम ध्वस्त हो गए। मतदान के दिन मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं भी बंद कर दी गई थीं। 9 फरवरी को अचानक ये खबर आई कि नवाज शरीफ जीत गए हैं। लेकिन ये कैसे हो सकता था कि सेना यस्मीन को इतनी बड़ी जीत हासिल करने दे? आपको याद होगा कि यस्मीन को हाल ही में पिछले साल 9 मई को इमरान की गिरफ्तारी के बाद हुई हिंसा से जुड़े मामलों में आरोपित किया गया था। मंसेहरा की दूसरी सीट जो नवाज पीटीआई के एक और नए उम्मीदवार से हार गए थे, ने केवल लाहौर में उनकी जीत की विश्वसनीयता को बढ़ाया है। असल में, कई जगह आरोप लगाए जा रहे हैं कि सेना ने चुनाव आयोग पीईसी के जरिए पीएमएल-एन और शायद मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट एमक्यूएम के पक्ष में मतगणना को बदल दिया।

नवाज शरीफ ने पहले तो केवल राष्ट्रीय सभा में पूर्ण बहुमत मिलने पर ही प्रधानमंत्री बनने का वादा किया था, लेकिन अब उन्हें अपना रुख बदलना पड़ा। उनकी पार्टी, पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) अब तक घोषित 253 राष्ट्रीय सभा सीटों में से केवल 72 ही हासिल कर सकी है। दूसरी ओर, इमरान खान की पार्टी के समर्थन वाले निर्दलीय उम्मीदवारों ने कुल 265 सीटों में से 91 सीटें हासिल की हैं। इसलिए नवाज ने अब गठबंधन सरकार बनाने पर हामी भर दी है। अब सरकार बनाने के लिए नवाज शरीफ को संख्या जुटाने की जरूरत है, इसलिए वे पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी), जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (जेयूआई) और एमक्यूएम की मदद मांग रहे हैं। पीपीपी के पूर्व अध्यक्ष और पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के पास पहले से ही राष्ट्रीय सभा की 54 सीटें हैं। नई सरकार बनाने के लिए बातचीत करने वे और उनके बेटे, पीपीपी के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो पहले ही लाहौर पहुंच चुके हैं। सेना समर्थित एक अन्य पार्टी एमक्यूएम ने 17 सीटें जीतकर कई राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। अब राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यसभा के सभापति और केंद्र में कई मंत्रालयों के पद दांव पर लगे हैं। कई निर्दलीय राजनेता पैसे और ताकत के लिए समझौता करने को तैयार होंगे। साथ ही, बलूचिस्तान विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बाद, पीपीपी प्रांत के मुख्यमंत्री पद का दावा करेगी।

इमरान खान को सत्ता से हटाए जाने के बाद सेना के नेतृत्व के खिलाफ अभूतपूर्व हमले किए गए और इसके लिए अमेरिका को भी दोषी ठहराया गया। उन्होंने जनसभाओं में जो केबल दिखाया, उसी का इस्तेमाल उन्हें सजा दिलाने के लिए किया गया। माना जाता है कि इमरान की पार्टी ने इस केबल की जानकारी “द इंटरसेप्ट” वेबसाइट को लीक कर दी थी। लेकिन मतदाताओं को उनके पक्ष में करने वाला मुख्य कारण जेल में होने के बावजूद कई कठिनाइयों का सामना करने के बावजूद सेना और अमेरिका के खिलाफ उनका अडिग और अटूट रुख था। पाकिस्तान के चुनाव पहले ही विवादों में घिर चुके हैं। भले ही अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने औपचारिक रूप से चुनावों के संचालन की आलोचना की हो, लेकिन नई सरकार की वैधता को लेकर हमेशा सवाल उठेंगे। पाकिस्तान की सेना के लिए सरकार को एकजुट और कार्यशील बनाए रखना एक कठिन काम होगा। वैसे भी सेना नेतृत्व ड्राइविंग सीट पर ही रहेगा। इससे असैनिक नेतृत्व के लिए फैसले लेना और नीतियां बनाना बेहद मुश्किल हो जाएगा।

पाकिस्तान के चुनाव पहले ही विवादों में घिर चुके हैं। भले ही अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने औपचारिक रूप से चुनावों के संचालन की आलोचना की हो, लेकिन नई सरकार की वैधता को लेकर हमेशा सवाल उठेंगे। पाकिस्तान की सेना के लिए सरकार को एकजुट और कार्यशील बनाए रखना एक कठिन काम होगा। वैसे भी सेना नेतृत्व ड्राइविंग सीट पर ही रहेगा। इससे असैनिक नेतृत्व के लिए फैसले लेना और नीतियां बनाना बेहद मुश्किल हो जाएगा। चाहे जो भी हो, सेना किसी भी हाल में इमरान को जेल से बाहर नहीं आने देगी। उसे देश में ऐसी बातें फैलाने की भी इजाजत नहीं दी जाएगी जिससे सेना की छवि खराब हो या फिर नई सरकार की स्थिरता को खतरा हो। अभी जो स्थिति दिख रही है, उससे साफ है कि पाकिस्तान में और ज्यादा राजनीतिक उथल-पुथल और अस्थिरता आने वाली है।

क्या बीजेपी में शामिल हो सकते हैं नीतीश की तरह बड़े नेता?

अब बीजेपी में नीतीश की तरह और भी कई बड़े नेता शामिल हो सकते हैं! 1857 का विद्रोह, खासकर छावनियों में सिपाहियों का विद्रोह, ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए आश्चर्यचकित करने वाला था। अंग्रेज अधिकारियों को भले ही उत्तर और मध्य भारत के गांवों में रहस्यमय चपाती बंटने की खबरें मिली थीं, लेकिन वो इसका सही मतलब नहीं समझ सके। इसकी वजह साफ है। ब्रिटिश साम्राज्य के छावनियों और तीन प्रेसीडेंसी शहरों में एक अलग भारत रहता था। लेकिन वहीं पास ही एक देसी भारत था जिसका अपना अलग नजरिया था। एक तरफ ब्रिटिश शासन को तरक्की की निशानी माना जाता था, तो दूसरी तरफ फिरंगियों को स्वदेशी परंपराओं और संस्थानों को अपमानित करने वाले के रूप में देखा। कुछ अंग्रेज अधिकारियों को तो पहले ही समझ आ गया था कि भारत के बारे में जो कुछ सच है, उसके उलट भी सच हो सकता है। इन सबके बीच अपने को बुद्धिमान समझने का अभिमान राज शासकों से होते हुए आजादी के बाद के शासन तक चला आया।अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन का इतिहास बताता है कि ये लड़ाई 1948 में बाबरी मस्जिद में राम लला की मूर्ति मिलने के बाद शुरू हुई थी। हालांकि अखबारों को देखने से पता चलता है कि ये मुद्दा 1988-89 में शिला पूजन और 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा तक बड़े शहरों तक नहीं पहुंचा था। असल में, 1991 के चुनाव तक देश के बड़े नेताओं को ये अहसास ही नहीं हुआ था कि कुंभ मेले वाला भारत, जिसे नेहरूवादी आधुनिकता से खत्म हो चुका माना जाता था, असल में बहुत प्रभावशाली था। ये समझना मुश्किल था कि हिंदू धर्म और उसके इतिहास से जुड़े लोगों की भावनाएं कितनी गहरी हैं। इसे अक्सर नजरअंदाज किया जाता था। इससे पहले अक्सर ऐसा सोचा जाता था कि पश्चिमीकरण यानी आधुनिकता ही सब कुछ है पर ये चुनाव दिखा गया कि ये बात पूरी तरह सच नहीं है।

राम मंदिर बनने के बाद लोगों में जो खुशी दिखी, उससे कुछ नेताओं को थोड़ा झटका लगा होगा। आने वाले चुनाव में कितने लोग हिंदुत्व विचारधारा को मानते हुए वोट देंगे, अभी ये कहना मुश्किल है लेकिन विपक्ष के कई नेताओं का अचानक हिंदू धर्म को मानने का दिखावा करना कुछ संकेत देता है। लगता है विपक्ष को डर है कि लोग अब ज्यादा हिंदुत्व की तरफ झुक रहे हैं और नरेंद्र मोदी को शायद एक बड़े नेता के रूप में देख रहे हैं। कुछ पार्टियां तो अभी भी विरोध कर रही हैं, पर राम मंदिर के उद्घाटन के बाद से उन्हें मानसिक रूप से थोड़ा कमजोर पड़ते देखा जा रहा है। राहुल गांधी भले ही अपनी यात्रा जारी रखे हों पर कुछ दूसरे नेता नीतीश कुमार की तरह सोचने लगे हैं। इससे पता चलता है कि ‘इंडिया’ गठबंधन के कुछ दलों के बीच वास्तविक डर है।

आने वाले हफ्तों में हो सकता है कि बीजेपी के पुराने और साथी वापस आ जाएं। बीजेपी की ओर से लोगों को अयोध्या में मंदिर दर्शन का इंतजाम किया जा रहा है। कुछ लोग पूरे भारत में राम मंदिर का प्रसाद भी बांट रहे हैं। इसके पीछे ये सोच भी हो सकती है कि जिस तरह 30 साल पहले शिला पूजन और रथ यात्रा से लोगों में जोश आया था, उसी तरह अब भी लोगों को आकर्षित किया जा सकता है। 2024 का चुनाव राम मंदिर के आसपास घूमेगा या नहीं, ये अभी पता नहीं। जो लोग हिंदुत्व विचारधारा से जुड़े हैं और 1991 से बीजेपी को वोट देते आ रहे हैं, उन्हें जरूर ये कहानी लुभाएगी। लेकिन मोदी सरकार 2014 से सत्ता में है, इसलिए सिर्फ हिंदुत्व की बात करके ही सबको लुभा पाना मुश्किल होगा।

2002 के गुजरात दंगों के बाद नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री के तौर पर जीते थे, पर 2007 में उनकी जीत का श्रेय गुजरात के विकास को दिया गया। 2012 में भी यही हुआ। पिछले हफ्ते संसद में उनकी बातों से साफ था कि वो अपने 10 साल के काम को बताकर चुनाव लड़ना चाहते हैं। 2024 में बीजेपी का चुनाव अभियान विकसित भारत और मोदी के वादों के इर्द-गिर्द घूमेगा। विपक्ष सांप्रदायिकता और पुराने भारत को खत्म करने का आरोप लगाएगा तो मोदी जवाब में अपने काम और भविष्य के लिए अपने नजरिए से देंगे। अयोध्या का गौरव, एक बड़े सपने का प्रतीक बनेगा, मानो भारत दुनिया में आगे बढ़ने को तैयार है। ये तस्वीर उन लोगों की समझ से बाहर है जो सिर्फ बड़े शहरों में रहते हैं।

क्या अब धरती न्यूरोंलिंक दुनिया में बदल सकती है?

क्या धरती न्यूरोंलिंक दुनिया में बदल सकती है यह सवाल उठना लाजिमी है! जनवरी में एक खबर आती है कि दुनिया में पहली बार इंसानी दिमाग में चिप को प्रत्यारोपित किया गया है। अरबपति कारोबारी एलोन मस्क ने खुद ट्वीट कर इसकी जानकारी दी थी। इसमें बताया गया कि यह चिप यूजर को ‘सिर्फ सोच कर’ अपने फोन या कंप्यूटर को नियंत्रित करने में सक्षम बनाएगा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या एलोन मस्क का न्यूरालिंक साइंस-फिक्शन की सामग्री को मूर्त वास्तविकता में बदल रहा है? ब्रिटिश न्यूरोसाइंटिस्ट अनिल सेठ का मानना है कि यह कई नैतिक और दार्शनिक प्रश्न उठाता है। सेठ ने चेतना के विज्ञान का अध्ययन करने में दो दशक से अधिक समय बिताया है। ब्रिटेन के ससेक्स विश्वविद्यालय में चेतना विज्ञान केंद्र के निदेशक सेठ ने, मस्तिष्क कंप्यूटर इंटरफेस के निहितार्थ के बारे में बातचीत की। यह दोनों में से थोड़ा-थोड़ा है। एलोन मस्क जो कुछ भी करते हैं उसमें बड़े पैमाने पर मीडिया का ध्यान आकर्षित करने वाले तत्व शामिल होते हैं। यह निश्चित रूप से पहली बार है जब न्यूरालिंक ने अपनी तकनीक को मानव मस्तिष्क में प्रत्यारोपित किया है, लेकिन यह किसी भी तरह से पहली बार नहीं किया गया है। टेक्नोलॉजी दशकों पुरानी है, और अन्य कंपनियों ने वास्तविक विकास के संदर्भ में बहुत अधिक जानकारी दी है। प्रचार के तहत, इसके बारे में विशिष्ट बात यह है कि मस्क को प्राइवेट एरिया के संसाधनों को मुश्किल समस्याओं में लाने के लिए जाना जाता है। हम जो थोड़ा जानते हैं, उससे ऐसा लगता है कि वे चीजों के इंजीनियरिंग पक्ष में आगे बढ़ रहे हैं। उनके पास बड़ी संख्या में प्रोब्स हैं – जिन्हें आप मस्तिष्क में डालते हैं – जो संभावित रूप से बैंडविड्थ सुनने वाले न्यूरॉन्स की संख्या को बढ़ाती हैं। पिछले मस्तिष्क कंप्यूटर इंटरफेस बीसीआई में, चिप बाहर थी, लेकिन न्यूरालिंक के साथ, यह त्वचा के नीचे है। हालांकि यह मस्तिष्क में नहीं है। टेक्नोलॉजी के इतिहास में यह कोई अनोखा क्षण नहीं है, लेकिन न्यूरालिंक नया है और तेजी से आगे बढ़ रहा है, जो थोड़ी चिंता का विषय है।

यह वास्तव में बहुत सरल है, मस्तिष्क के बारे में अधिकांश चीजों के विपरीत। आप आमतौर पर मस्तिष्क में बहुत बारीक जांच तार डालते हैं, ताकि वे न्यूरॉन्स या मस्तिष्क कोशिकाओं की गतिविधि पर नजर रख सकें। इस मामले में सिग्नल कंप्यूटर, चिप पर भेजे जाते हैं। फिर जानकारी पर ऐक्शन लिया जा सकता है। उदाहरण के लिए, जो लोग लकवाग्रस्त हैं लेकिन उनका मस्तिष्क सक्रिय है, आप अभी भी मोटर कॉर्टेक्स में गति से संबंधित मस्तिष्क गतिविधि देख सकते हैं। आप शायद किसी रोबोट को नियंत्रित कर सकते हैं या किसी लकवाग्रस्त व्यक्ति को फिर से चलने में मदद कर सकते हैं। आप दूसरी दिशा में भी जा सकते हैं – मस्तिष्क में गतिविधि को उत्तेजित करें। मान लीजिए कि कोई अंधा है, तो आप बीसीआई को विजुअल कॉर्टेक्स में प्लग कर सकते हैं और कैमरे के इनपुट के आधार पर इसे एक्टिव कर सकते हैं। दोनों एक साथ भी हो सकते हैं – मिर्गी में उपयोग किए जाने वाले बीसीआई मस्तिष्क को पढ़कर देख सकते हैं कि मिर्गी का दौरा पड़ रहा है या नहीं और फिर तदनुसार मस्तिष्क को उत्तेजित कर सकते हैं।

सबसे रोमांचक बात यह है कि जब पक्षाघात और न्यूरोलॉजिकल स्थितियों की बात आती है तो इसमें मेडिकल क्षमता होती है, जहां लोग अपने शरीर को नियंत्रित करने या दुनिया को विशेष तरीकों से समझने की क्षमता खो देते हैं। इसे अधिकांश बीसीआई कंपनियां टारगेट कर रही हैं। लोग पहले से ही अवसाद जैसी चीज़ों के लिए मस्तिष्क उत्तेजना का उपयोग कर रहे हैं। यहां तक कि न्यूरालिंक का घोषित उद्देश्य लकवे से निपटना है। फिर सामान्य नैतिक चिंताएं हैं। यह इनवेसिव ब्रेन सर्जरी है। इसलिए यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे आप हल्के में करते हैं। इस कहानी के इतना लोकप्रिय होने का दूसरा कारण इसका विज्ञान कथा भाग है – संज्ञानात्मक संवर्द्धन। यह नैतिक रूप से कहीं अधिक विश्वासघाती क्षेत्र है। वास्तव में वैज्ञानिक रूप से भी, मुझे लगता है। वह कैसे काम करेगा? मस्तिष्क जटिल है चाहे आप इसे वांछनीय समझें या मनहूस, व्यवहार्यता संबंधी चिंताएं हैं। और अगर मेरे दिमाग का उपयोग करके मेरे फोन को स्क्रॉल करना संभव भी है, तो मैं ऐसा क्यों करना चाहूंगा? मेरे हाथ और मुंह ठीक काम करते हैं और उन पर मेरा नियंत्रण है। शायद कभी-कभी मेरा मुंह पर नहीं हंसते हुए। इवोल्यूशन ने हमारे दिमाग को उनके पास मौजूद बैंडविड्थ के हिसाब से डिजाइन किया है। इसलिए हमारे दिमाग को एक ही समय में तीन इंस्टाग्राम फीड को डूमस्क्रॉल करने के लिए डिजाइन नहीं किया गया है। गोपनीयता संबंधी चिंताएं भी हैं। हम पहले ही सभी प्रकार की चीजों के लिए साइन अप करके अपनी गोपनीयता का त्याग कर चुके हैं। यदि हमारे दिमाग में जो चल रहा है वह सर्वर फॉर्म पर समाप्त होता है, तो यह संभावित रूप से बुरी खबर है। कोई आपके मस्तिष्क को दूर से नियंत्रित कर रहा है, यह कोई महान विज्ञान-कल्पना परिदृश्य नहीं है।

ड्रेस के साथ, आधे ने इसे नीले और काले रंग में देखा, और बाकी ने सफेद और सुनहरे रंग में देखा। दिलचस्प हिस्सा वह दृढ़ विश्वास है जिसके साथ लोग इसे ही एकमात्र रास्ता मानते हैं। गहरा सबक यह है कि यह किसी खास तस्वीर की विचित्रता नहीं है। यह हर समय होता है, लेकिन हम इसे पहचान नहीं पाते क्योंकि मतभेद आमतौर पर इतने नाटकीय नहीं होते हैं। जिसे मैं अवधारणात्मक विविधता कहता हूं, उसके इस पूरे क्षेत्र को नजरअंदाज कर दिया गया है। हम सभी दुनिया को एक अनोखे तरीके से देखते हैं। हम इस विविधता का पता लगाने और उसका पता लगाने के लिए एक धारणा जनगणना पर काम कर रहे हैं।

एक अर्थ में, हम पहले से ही हैं। हममें से ज्यादातर लोग अपने स्मार्टफोन पर निर्भर हैं, हालांकि इसमें इक्विटी संबंधी मुद्दे भी हैं। अगर हम मस्तिष्क के अंदर की बात कर रहे हैं, तो हां, शायद ऐसी चीजें होंगी जो मानव चेतना को बदल देती हैं। दार्शनिक रूप से, यहां दिलचस्प प्रश्न हैं – यदि हमारे पास चुनने की क्षमता है, तो हमारे पास किस प्रकार के सचेत अनुभव हैं, हम उस स्वतंत्रता का क्या मतलब है? क्या नैतिक रूप से चेतना की कोई अच्छी या बहुत बुरी अवस्थाएं होती हैं? एक और बात जो मैंने मस्क को कहते हुए सुनी वह यह है कि हम अपनी यादों को ताजा करने में सक्षम होंगे। इस बारे में एक ‘ब्लैक मिरर’ एपिसोड है और इसका अंत बहुत अच्छा नहीं हुआ। मानव मनोविज्ञान के लिए चीजों को भूलना बहुत महत्वपूर्ण है।

आखिर कैसे वापस आए कतर में सजा काट रहे भारतीय नौसैनिक?

आज हम आपको बताएंगे कि कतर में सजा काट रहे भारतीय नौसैनिक भारत वापस कैसे आए! कतर की जेल में बंद 8 पूर्व भारतीय नौसैनिकों को रिहा कर दिया गया है, ये वही पूर्व सैनिक हैं जिन्हें कतर की एक अदालत ने फांसी की सजा सुनाई थी। लेकिन भारत की कूटनीतिक दखल के बाद कतर ने सजा को माफ कर दिया। अब आखिरकार इन पूर्व नौसैनिकों को कतर ने रिहा कर दिया। आठ में सात पूर्व नौसैनिक भारत पहुंच भी चुके हैं। इस मामले में भारत सरकार की कूटनीति काबिले तारीफ है। कुछ दिन पहले लोकसभा में AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी बोले ने सरकार को चैलेंज करते हुए कहा था कि कतर में फंसे सैनिकों को वापस लाकर दिखाइए। किसे मालूम था कि सरकार अंदरखाने ऐसी रणनीति बनाएगी कि हमारे पूर्व नौसैनिकों को कतर वापस भेज देगा। कतर के इस फैसले का भारत के विदेश मंत्रालय ने स्वागत किया है। इस पूरे मामले की इनसाइड स्टोरी हम आपको बता रहे हैं। हाल ही में कतर की अदालत ने इन आठ पूर्व नौसैनिकों को फांसी की सजा सुनाई थी। कुछ दिनों के बाद सैनिकों की सजा को माफ कर दिया गया। दरअसल भारत और कतर के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध हैं। दोनों देशों के बीच मजबूत व्यापारिक संबंध हैं। ऐसे में भारत ने शुरू से ही इस मामले को लेकर कतर से बातचीत जारी रखी। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल दिसंबर में कतर के अमीर शेख तमीम बिन हम्द अल-थानी से दुबई में हुए सीओपी 28 सम्मेलन से इतर मुलाकात की थी। इस मीटिंग में पीएम मोदी ने पूर्व भारतीय नौसैनिकों की रिहाई के मसले पर बात की। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भी इस मीटिंग का जिक्र करते हुए ये बताया कि दोनों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को लेकर एक अच्छी वार्ता हुई।

गौर करने की बात ये भी है कि पूर्व नौसैनिकों की रिहाई उस समय हुई है, जब पिछले सप्ताह ही दोनों देशों के बीच एक अहम समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत भारत कतर से लिक्विफाइड नेचुरल गैस खरीदेगा। ये डील अगले 20 सालों के लिए हुई है और इसकी लागत 78 अरब डॉलर है। भारत की पेट्रोनेट एलएनजी लिमिटेड पीएलएल कंपनी ने कतर की सरकारी कंपनी कतर एनर्जी के साथ ये करार किया है। इस समझौते के तहत कतर हर साल भारत को 7.5 मिलियन टन गैस निर्यात करेगा। इस गैस से भारत में बिजली, उर्वरक और सीएनजी बनाई जाएगी।

एक तरफ जहां सरकार कतर में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक रणनीतियों को अंजाम दे रही थी, तो वहीं दूसरी तरफ घरेलू स्तर पर भी काम कर रही थी। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मौत की सजा पाए पूर्व नौसैनिकों के परिवारों से मुलाकात की और उन्हें आश्वासन दिया कि सरकार उनकी रिहाई को सुरक्षित करने के लिए हर संभव प्रयास करती रहेगी। नौसेना प्रमुख एडमिरल आर. हरि कुमार ने भी कहा कि सरकार नौसैनिकों को छुड़ाने के लिए कोशिश कर रही है। इधर विपक्षी पार्टियां इस मामले को लेकर लगातार केंद्र सरकार को घेरती रहीं।

कतर की सरकार ने इन आठ नौसैनिकों के खिलाफ लगे आरोपों का खुलासा नहीं किया। उन्हें कतर की पनडुब्बी प्रोग्राम के लिए इजरायल के लिए जासूसी करने के संदेह में गिरफ्तार किया गया था। भारत सरकार ने आरोपों को लेकर तो कुछ नहीं कहा, लेकिन उसने अपने नागरिकों के साथ उचित व्यवहार की करने पर जोर दिया था।

बता दें कि जेल से रिहा हुए ये पूर्व नौसैनिक दाहरा ग्लोबल टेक्नोलॉजीज एंड कंसल्टिंग सर्विसेज में काम करते थे। कतर ने इन्हें पिछले साल गिरफ्तार किया। कंपनी ने इस कंपनी को भी बंद कर दिया। बता दें कि दोनों देशों के बीच मजबूत व्यापारिक संबंध हैं। ऐसे में भारत ने शुरू से ही इस मामले को लेकर कतर से बातचीत जारी रखी। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल दिसंबर में कतर के अमीर शेख तमीम बिन हम्द अल-थानी से दुबई में हुए सीओपी 28 सम्मेलन से इतर मुलाकात की थी। इस मीटिंग में पीएम मोदी ने पूर्व भारतीय नौसैनिकों की रिहाई के मसले पर बात की। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भी इस मीटिंग का जिक्र करते हुए ये बताया कि दोनों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को लेकर एक अच्छी वार्ता हुई। जिन भारतीयों को गिरफ्तार किया गया था, उसमें कमांडर पूर्नेंदु तिवारी, कैप्टन नवतेज सिंह गिल, कमांडर बीरेंद्र कुमार वर्मा, कैप्टन सौरभ वशिष्ठ, कमांडर सुग्नाकर पकाला, कमांडर अमित नागपाल, कमांडर संजीव गुप्ता, और सेलर रागेश शामिल थे।

जानिए राज्यसभा चुनाव की पूरी कहानी!

आज हम आपको राज्यसभा चुनाव की पूरी कहानी बताने वाले हैं! इस बार के राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी बीजेपी से लेकर तृणमूल कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव का पूरा ध्यान रखा है। बीजेपी ने जातीय समीकरण को साधा है। वहीं, टीएमसी ने भी बंगाल में मतुआ संप्रदाय से ताल्लुक रखने वाली ममता बाला ठाकुर को ऊपरी सदन में भेजने का फैसला कर आम चुनाव से पहले एक बड़ा दांव खेला है। दूसरी तरफ कांग्रेस की तरफ से माना जा रहा है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व गर्वनर रघुराम राजन को संसद के उच्च सदन में भेजने की तैयारी है। वहीं सोनिया को भी पार्टी ऊपरी सदन के रास्ते ही संसद पहुंचाना चाहती है। बीजेपी ने इसबार बिहार के दिग्गज नेता सुशील कुमार मोदी को ऊपरी सदन के लिए उम्मीदवार नहीं बनाया है। इसके अलावा सरोज पांडेय को भी दोबारा नहीं भेजा रहा है। पार्टी ने लोकसभा चुनाव से पहले जातीय समीकरण पर खास ध्यान दिया है और नए चेहरों पर दांव लगाया है। यूपी के 7 पूर्व राज्यसभा सांसदों में से केवल सुंधाशु त्रिवेदी को फिर से ऊपरी सदन भेजा जा रहा है। इसके अलावा पार्टी ने आरपीएन सिंह को राज्यसभा भेजने का फैसला किया है।केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर और पार्टी के प्रवक्ता अनिल बलूनी की जगह नए चेहरों को भगवा दल ने ऊपरी सदन भेजा है। माना जा रहा है कि ये दोनों नेता लोकसभा चुनाव में उतर सकते हैं। कुछ दिन पहले पीएम नरेंद्र मोदी ने राज्यसभा से जनसभा वाला बयान दिया था। उनके इस बयान के बाद ही कयास लगाए जाने लगे थे कि इसबार के चुनाव में कुछ नेताओं को लोकसभा के समर में पार्टी उतार सकती है।गृह मंत्री अमित शाह के चुनाव से पहले CAA लागू करने के ऐलान के बाद पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने मतुआ समुदाय से आने वाली ममता बाला ठाकुर को ऊपरी सदन भेजने का फैसला किया है। पिछली बार के विधानसभा और लोकसभा चुनाव में इस बिरादरी ने खुलकर बीजेपी का समर्थन किया था। ऐसे में ममता ने मतुआ समुदाय के कैंडिडेट पर दांव लगाकर इस समुदाय के वोटर को लुभाने की कोशिश की है।पार्टी ने नए चेहरों के साथ-साथ जातीय समीकरण का भी पूरा ख्याल रखा है।

केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर और पार्टी के प्रवक्ता अनिल बलूनी की जगह नए चेहरों को भगवा दल ने ऊपरी सदन भेजा है। माना जा रहा है कि ये दोनों नेता लोकसभा चुनाव में उतर सकते हैं। कुछ दिन पहले पीएम नरेंद्र मोदी ने राज्यसभा से जनसभा वाला बयान दिया था। गृह मंत्री अमित शाह के चुनाव से पहले CAA लागू करने के ऐलान के बाद पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने मतुआ समुदाय से आने वाली ममता बाला ठाकुर को ऊपरी सदन भेजने का फैसला किया है। पिछली बार के विधानसभा और लोकसभा चुनाव में इस बिरादरी ने खुलकर बीजेपी का समर्थन किया था।उनके इस बयान के बाद ही कयास लगाए जाने लगे थे कि इसबार के चुनाव में कुछ नेताओं को लोकसभा के समर में पार्टी उतार सकती है। कांग्रेस गलियारे में इस बात की जबरदस्त चर्चा है कि पार्टी पूर्व आरबीआई गर्वनर रघुराम को राज्यसभा कैंडिडेट बना सकती है। इसके अलावा देश की सबसे पुरानी पार्टी अपनी पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी हिमाचल प्रदेश से राज्यसभा भेज सकती है। पार्टी राज्यसभा कैंडिडेट पर आज ऐलान कर सकती है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि स्वास्थ्य वजहों से सोनिया लोकसभा चुनाव नहीं लड़ सकती हैं। इसलिए पार्टी उन्हें ऊपरी सदन भेजने पर विचार कर रही है। सूत्रों ने बताया कि रघुराम को पार्टी महाराष्ट्र या कर्नाटक से ऊपरी सदन भेज सकती है।

गृह मंत्री अमित शाह के चुनाव से पहले CAA लागू करने के ऐलान के बाद पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने मतुआ समुदाय से आने वाली ममता बाला ठाकुर को ऊपरी सदन भेजने का फैसला किया है। पिछली बार के विधानसभा और लोकसभा चुनाव में इस बिरादरी ने खुलकर बीजेपी का समर्थन किया था। ऐसे में ममता ने मतुआ समुदाय के कैंडिडेट पर दांव लगाकर इस समुदाय के वोटर को लुभाने की कोशिश की है।पार्टी ने नए चेहरों के साथ-साथ जातीय समीकरण का भी पूरा ख्याल रखा है।पिछली बार के विधानसभा और लोकसभा चुनाव में इस बिरादरी ने खुलकर बीजेपी का समर्थन किया था। ऐसे में ममता ने मतुआ समुदाय के कैंडिडेट पर दांव लगाकर इस समुदाय के वोटर को लुभाने की कोशिश की है।

क्या चीन के जाल में नहीं फंस का रहा है नेपाल?

नेपाल वर्तमान में चीन के जाल में नहीं फंस रहा! चीन के बेल्ड एंड रोड इनिशिएटिव परियोजना का अब नेपाल में भी भरपूर विरोध हो रहा है। दरअसल, चीन नेपाल को अपने कर्ज के जाल में फंसाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन नेपाल ने ड्रैगन से भारत जैसी मदद की मांग कर रहा है। दरअसल, पिछले हफ्ते पर्यटन स्थल पोखरा में नया हवाई अड्डा बनाया गया, जिसके लिए चीन ने पैसा दिया था था। ड्रैगन ने दावा किया गया था कि यह एयरपोर्ट नेपाल में BRI का हिस्सा है। चीन की इस हरकत पर वहां के स्थानीय लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। गौरतलब है कि भारत चीन की इस परियोजना का शुरू से विरोध करता रहा है। इस बार के बजट में नरेंद्र मोदी सरकार ने मध्य पूर्व को जोड़ने के लिए एक बड़े गलियारे का ऐलान किया था। इसका नाम भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर है। इस परियोजना की लॉन्चिंग भारत में पिछले साल हुए जी-20 बैठक में की गई थी। पिछले हफ्ते, राष्ट्रीय एकता अभियान ने पोखरा में एक जागरूकता रैली का आयोजन किया, जिसमें BRI और नेपाल के लिए इसके संभावित खतरों को लेकर चिंता जताई गई थी। विरोध का मुख्य केंद्र पोखरा अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डा था। विरोध के दौरान आरोप लगाया गया कि इसके पीछे चीन की कोई छिपी चाल हो सकती है। हो सकता है ड्रैगन पोखरा इलाके में चीनी सेना को तैनात करना चाहती हो। इसके लिए वह पोखरा एयरपोर्ट को आर्थिक नुकसान पहुंचाने का दांव भी चल सकता है। गौरतलब है कि चीन भारत के हर उस पड़ोसी देशों पर डोरे डाल रहा है। भारत और नेपाल के आपसी संबंध अच्छे हैं। ऐसे में चीन भारत के पड़ोसी देशों को अलग-अलग तरीकों से लुभाने की कोशिश में जुटा है।

पोखरा हवाईअड्डा सीधे तौर पर चीन के BRI का हिस्सा नहीं था, पर कुछ बातें गौर करने लायक हैं। इस एयरपोर्ट के लिए ज्यादातर पैसा चीन के बैंकों से ही आया था। एयरपोर्ट को बनाने का काम भी एक चीनी कंपनी ने ही किया था। भले ही नेपाल सरकार को इस बारे में थोड़ी शंका थी, पर चीन लगातार यही कहता रहा कि ये प्रोजेक्ट BRI का ही हिस्सा है। चीन का BRI नेपाल में शुरू ही नहीं हो पाया है। हालांकि, 2017 में नेपाल और चीन ने इस पर एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन करीब सात साल बीत जाने के बाद भी इसका कोई भी प्रोजेक्ट न तो शुरू हुआ है और न ही इस पर बातचीत ही हुई है। नेपाल के जानकारों का कहना है कि श्रीलंका और पाकिस्तान की तरह नेपाल की सरकारें पेइचिंग से कर्ज लेने से हिचकिचा रही हैं, जिस वजह से BRI प्रोजेक्ट्स आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।

नेपाल सरकार चीन की चाल से सतर्क है। काठमांडू चीन के अनुदान लेने को तो तैयार है लेकिन उसका कर्ज नहीं लेना चाह रही है। दरअसल, चीन ऊंचे ब्याज पर कर्ज देता है। श्रीलंका चीन के कर्ज के जाल में फंस चुका है। श्रीलंका की मदद के लिए खुद भारत आगे आया है। जाहिर है नेपाल भी श्रीलंका के हाल को देखते हुए चीनी कर्ज में नहीं फंसना चाहता है। सूत्रों का कहना है कि 2020 की शुरुआत से ही नेपाल और चीन के बीच बीआरआई कार्यान्वयन योजना पर हस्ताक्षर करना एक प्रमुख मुद्दा रहा है, लेकिन निवेश की शर्तों को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद होने के कारण अभी तक कोई समझौता नहीं हो पाया है।

नेपाल, एशिया के कई अन्य देशों की तुलना में चीन का बहुत कम कर्जदार है। ऐसा इसलिए है क्योंकि नेपाल हमेशा से कर्ज लेने में सावधानी बरतता रहा है और अनुदान सहायता चाहता रहा है। भारत 1950 के दशक से ही नेपाल को उदारतापूर्वक मदद प्रदान करता रहा है। नेपाल भारत के सबसे बड़े और सबसे प्रमुख विकास साझेदारों में से एक है। नेपाल में आधुनिक बुनियादी ढांचे के विकास के लिए भारत-नेपाल सहयोग 1951 में शुरू हुआ था। भारत ने नेपाल में बुनियादी ढांचे के विकास के अलावा शिक्षा, स्वास्थ्य, पुरातत्व, सिंचाई, बिजली, बागवानी, उद्योग विकास और व्यापार संवर्धन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में तकनीकी ज्ञान भी साझा किया है। लेकिन निवेश की शर्तों को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद होने के कारण अभी तक कोई समझौता नहीं हो पाया है।इससे नेपाल के सामाजिक और आर्थिक विकास में काफी योगदान मिला है। भारत-नेपाल विकास साझेदारी सात दशक से भी अधिक समय से जारी है और इसका लगातार विस्तार भी होता जा रहा है।

क्या पति से अलग होने वाली महिला को मिलता है गुजारा भत्ता?

आज हम आपको बताएंगे कि पति से अलग होने वाली महिला को गुजारा भत्ता मिलेगा या नहीं! मध्य प्रदेश में जबलपुर के फैमिली कोर्ट ने साफ कहा है कि अगर महिला अपनी मर्जी से अलग रह रही है तो उसे पति से गुजारा भत्ता पाने का कोई हक नहीं है। कोर्ट ने यह कहते हुए पति से अलग रह रही महिला की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि चूंकि महिला ने खुद ही पति से अलग रहने का फैसला किया था, इसलिए उसे गुजारा भत्ता मांगने का अधिकार ही नहीं है। अदालत में जब महिला के आवेदन पर सुनवाई हो रही थी, उसके पति ने बताया कि दोनों 15 दिसंबर, 2020 से ही अलग हैं। पति ने कहा कि तब पत्नी खुद ही अलग हो गई थी। तब पति ने हिंदू विवाह कानून की धारा 9 के तहत प्राप्त दाम्पत्य अधिकारों की बहाली की मांग को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया था।

उधर, पत्नी ने भी उसके खिलाफ दहेज प्रताड़ना की शिकायत कर दी थी। इसके साथ ही महिला ने समझौते के तहत पति से प्राप्त 12 लाख रुपये के चेक के बाउंस होने का आरोप लगाकर केस भी कर दिया था। परिवार अदालत के प्रधान न्यायाधीश केएन सिंह के सामने मामला आया तो उन्होंने महिला के बयान का हवाला देकर ही उसकी अर्जी खारिज करी दी। अब अन्य सभी विधिक प्रक्रिया और औपचारिकताएं पूरी करने के बाद यूसीसी लागू करने वाला उत्तराखंड देश का पहला राज्य बनेगा। विधेयक में सभी धर्म-समुदायों में विवाह, तलाक, गुजारा भत्ता और विरासत के लिए एक कानून का प्रावधान है। महिला-पुरुषों को समान अधिकारों की सिफारिश की गई है।अनुसूचित जनजातियों को इस कानून की परिधि से बाहर रखा गया है।जज केएन सिंह ने कहा कि महिला ने खुद कहा है कि वो पति के साथ नहीं रहना चाहती है तो फिर उसे गुजारा भत्ता पाने का हक कैसे है। जज ने यह कहते हुए महिला की मांग मानने से इनकार कर दिया।

उधर, अहमदाबाद के सत्र न्यायालय ने यह कहते हुए एक हिंदू दंपती का तलाक खारिज कर दिया कि हिंदुओं में विवाह बहुत पवित्र संस्था का नाम है, दूसरे धर्मों की तरह कोई समझौता नहीं। सेशंस कोर्ट ने इसी हवाले से ट्रायल कोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया। सेशंस कोर्ट ने यह हिदायत भी दी कि ट्रायल कोर्ट को तुरंत तलाक की अर्जी मंजूर करने के बजाय विवाह को बचाने का प्रयास करना चाहिए था। उसने पति-पत्नी से आग्रह किया कि वो आपसी मतभेद को दूर करने की कोशिश करें। वहीं दूसरी ओर बुधवार को सदन में विधेयक पर चर्चा के बाद सदन ने इसे पास कर दिया। अब अन्य सभी विधिक प्रक्रिया और औपचारिकताएं पूरी करने के बाद यूसीसी लागू करने वाला उत्तराखंड देश का पहला राज्य बनेगा। विधेयक में सभी धर्म-समुदायों में विवाह, तलाक, गुजारा भत्ता और विरासत के लिए एक कानून का प्रावधान है। महिला-पुरुषों को समान अधिकारों की सिफारिश की गई है।अनुसूचित जनजातियों को इस कानून की परिधि से बाहर रखा गया है।

बता दें कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जनता से किए गए वायदे के अनुसार पहली कैबिनेट बैठक में ही यूसीसी का ड्रॉफ्ट तैयार करने के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने का फैसला किया। सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय कमेटी गठित कर दी गई। समिति ने व्यापक जन संवाद और हर पहलू का गहन अध्ययन करने के बाद यूसीसी के ड्रॉफ्ट को अंतिम रूप दिया है। इसके लिए प्रदेश भर में 43 जनसंवाद कार्यक्रम और 72 बैठकों के साथ ही प्रवासी उत्तराखण्डियों से भी समिति ने संवाद किया।परिवार अदालत के प्रधान न्यायाधीश केएन सिंह के सामने मामला आया तो उन्होंने महिला के बयान का हवाला देकर ही उसकी अर्जी खारिज करी दी। जज केएन सिंह ने कहा कि महिला ने खुद कहा है कि वो पति के साथ नहीं रहना चाहती है तो फिर उसे गुजारा भत्ता पाने का हक कैसे है। अहमदाबाद के सत्र न्यायालय ने यह कहते हुए एक हिंदू दंपती का तलाक खारिज कर दिया कि हिंदुओं में विवाह बहुत पवित्र संस्था का नाम है, दूसरे धर्मों की तरह कोई समझौता नहीं।जज ने यह कहते हुए महिला की मांग मानने से इनकार कर दिया। समान नागरिक संहिता विधेयक के कानून बनने पर समाज में बाल विवाह, बहु विवाह, तलाक जैसी सामाजिक कुरीतियों और कुप्रथाओं पर रोक लगेगी, लेकिन किसी भी धर्म की संस्कृति, मान्यता और रीति-रिवाज इस कानून से प्रभावित नहीं होंगे। बाल और महिला अधिकारों की यह कानून सुरक्षा करेगा।

जेवियर माशेरानो ने लियोनेल मेस्सी को पेरिस ओलंपिक 2024 में खेलने के लिए आमंत्रित किया.

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मेसी को दोस्त कहें, ओलंपिक में नजर आएंगे अर्जेंटीना के विश्व विजेता कप्तान? अर्जेंटीना ने 2024 पेरिस ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कर लिया है। वे ओलिंपिक में गोल्ड जीतना चाहते हैं. तभी उनके दोस्त ने लियोनेल मेसी से खेलने का अनुरोध किया. सबसे पहले कोपा अमेरिका. उसके बाद फाइनलीसिमा. आख़िरकार, फ़ुटबॉल विश्व कप। अर्जेंटीना ने पिछली तीन फीफा फुटबॉल प्रतियोगिताएं जीती हैं। इस बार उनकी नजर ओलंपिक गोल्ड पर है. अर्जेंटीना ने ब्राजील को हराकर 2024 पेरिस ओलंपिक के लिए क्वालीफाई किया। लियोनेल मेस्सी से उनके मित्र जेवियर माशेरानो ने उस टीम में खेलने का अनुरोध किया था। वह अर्जेंटीना की अंडर-23 टीम के कोच हैं, वह टीम जिसने ओलंपिक के क्वालीफाइंग दौर में केवल अंडर-23 फुटबॉलरों को मैदान में उतारा था। लेकिन तीन सीनियर फुटबॉलर ओलंपिक में खेल सकते हैं. कोच माशेरानो चाहते हैं कि लियोनेल मेस्सी खेलें। मेस्सी ने 2008 ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता था। लियो के एक समय के साथी माशेरानो ने कहा, “हर कोई जानता है कि लियो के साथ मेरा रिश्ता कैसा है। वह मेरा बहुत अच्छा दोस्त है. हमारा दरवाजा उनके लिए हमेशा खुला है.’ हम उनसे अनुरोध करेंगे. लियो तय करेंगे कि खेलना है या नहीं, हम उनके फैसले को स्वीकार करेंगे।” क्वालीफाइंग राउंड का फाइनल मैच ब्राजील और अर्जेंटीना के बीच था। 2024 पेरिस ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करने के लिए ब्राजील को आखिरी मैच ड्रॉ कराना पड़ा। लेकिन उस मैच में वे अर्जेंटीना से हार गए। अर्जेंटीना ने लुसियानो गोंडौ द्वारा किए गए एकमात्र गोल से जीत हासिल की। पराग्वे दक्षिण अमेरिका का एक और देश है जिसे ओलंपिक में मौका मिला। मेस्सी ने अपने करियर में अपने देश और क्लब के लिए कुल 821 गोल किये। उनके पास 361 सहायक हैं। मेसी ने अपने करियर में रिकॉर्ड 43 ट्रॉफियां जीतीं। इनमें 10 ला लीगा, चार चैंपियंस लीग, सात कोपा डेल रे, आठ स्पेनिश सुपर कप, तीन यूईएफए स्पेनिश कप, दो लीग वन, तीन फीफा क्लब विश्व कप, एक फ्रेंच सुपर कप, एक लीग कप शामिल हैं। देश के पास कोपा अमेरिका, फ़ाइनलसीमा, फ़ुटबॉल विश्व कप और ओलंपिक स्वर्ण हैं। यह देखना बाकी है कि मेस्सी उस सूची में जोड़ने के लिए माशेरानो के कॉल का जवाब देते हैं या नहीं। अर्जेंटीना के दो मैच रद्द कर दिए गए हैं, चीनी प्रशंसक मेस्सी पर नाराज़ हैं
लियोनेल मेस्सी को लेकर चीनी लोगों में गुस्सा है. प्रशंसक अर्जेंटीना के विश्व कप विजेता फुटबॉलर से नाराज हैं जो हांगकांग के खिलाफ एक प्रदर्शनी मैच में इंटर मियामी के लिए नहीं खेले। चीन सरकार ने अर्जेंटीना के खिलाफ दो मैत्री मैच रद्द कर दिए हैं. लियोनेल मेस्सी को लेकर चीनी लोगों में गुस्सा है. अर्जेंटीना के विश्व कप विजेता फुटबॉलर इंटर मियामी के लिए हांगकांग के खिलाफ प्रदर्शनी मैच में नहीं खेले। इसलिए फैंस नाराज हैं. हांगकांग के आयोजकों ने उस मैच के पैसे आंशिक रूप से वापस करने का फैसला किया है। इसके अलावा, चीनी सरकार ने मेस्सी को लेकर प्रशंसकों की नाराजगी के डर से अर्जेंटीना के खिलाफ दो दोस्ताना मैच रद्द कर दिए हैं।

हांगकांग XI ने पिछले सप्ताह इंटर मियामी के विरुद्ध खेला था। प्रदर्शनी मैच में मेसी को देखने के लिए कई प्रशंसक पहुंचे। लेकिन उन्हें निराश करते हुए मेसी मैदान पर नहीं उतरे. बाद में उन्होंने कहा कि उन्हें चोट लगी है. हाल ही में मियामी द्वारा खेले गए छह प्रदर्शनी मैचों में से मेसी अकेले इस मैच में नजर नहीं आए थे. मियामी टीम के व्यवहार से फैंस नाराज थे. वे उस दिन मैदान पर मेसी और मियामी के मालिक डेविड बेकहम पर व्यंग्यात्मक सीटियों और तानों से भरे हुए थे। इस बार आयोजकों ने कहा कि उस मैच के 50 फीसदी टिकट वापस कर दिए जाएंगे. टिकट की कीमत का 50% वापस कर दिया जाएगा। इस बीच, मार्च में हांग्जो में अर्जेंटीना और नाइजीरिया के बीच एक दोस्ताना मैच होने वाला था। अर्जेंटीना को कुछ दिनों बाद बीजिंग में आइवरी कोस्ट से खेलना था। सबसे पहले हांग्जो में होने वाला मैच रद्द कर दिया गया. शनिवार को बीजिंग में आइवरी कोस्ट का मैच भी रद्द कर दिया गया है. इस बीच, मार्च में हांग्जो में अर्जेंटीना और नाइजीरिया के बीच एक दोस्ताना मैच होने वाला था। अर्जेंटीना को कुछ दिनों बाद बीजिंग में आइवरी कोस्ट से खेलना था। सबसे पहले हांग्जो में होने वाला मैच रद्द कर दिया गया. शनिवार को बीजिंग में आइवरी कोस्ट का मैच भी रद्द कर दिया गया है.