Thursday, March 5, 2026
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क्या टीवी स्टार्स भी झेलते हैं कई मुसीबतें?

आज हम आपको टीवी स्टार्स की कई मुसीबतें बताने वाले हैं! उम्मीद पर दुनिया कायम है और हर पल उम्मीद से भरा होना जरूरी है, मगर कई बार हालात निराश कर देते हैं, ऐसे में आशावादी रवैया ही जीवन को आगे बढ़ाता है। एक फरवरी को वर्ल्ड ऑप्टिमिस्ट डे यानी उम्मीद का दिन है। दुनिया भर में इस दिन को फरवरी महीने के पहले गुरुवार को मनाया जाता है। इस मौके पर हमने टीवी स्टार्स से जाना कि उनके लिए आशावादी होने के मायने क्या हैं और उनकी जिंदगी में कौन सी ऐसी घटनाएं रहीं, जब वो निराश हो गए, पर आगे बढ़ते रहे। किसी ने डिप्रेशन झेला, तो किसी को जेल जाना पड़ा। वहीं कुछ ऐसे भी रहे, जिन्हें पैसों की तंगी झेलनी पड़ी। ‘बिग बॉस 17’ में नजर आईं रिंकू धवन और जिग्ना वोरा से लेकर एक्टर अनिरुद्ध दवे और अंश बागरी ने अपनी जिंदगी के किस्से शेयर किए। आपको अपने जीवन के हर दिन और हर पल में आशावादी रहना होगा। जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, और इसीलिए इसे जीवन कहा जाता है। हर किसी को सकारात्मक रहना चाहिए और कभी उम्मीद नहीं खोनी चाहिए। जब हम अपने सबसे लो फेज में होते हैं तो हमें चीजें समझ में नहीं आती हैं, लेकिन खुद पर भरोसा रखना चाहिए। हम अपने बुरे समय से सबक सीखते हैं।अपने जीवन में, मैंने कई कठिन क्षणों का सामना किया है। आर्थिक कठिनाइयां भावनात्मक संघर्ष और बहुत सारा तनाव, लेकिन मैंने कभी उम्मीद नहीं खोई। हां, मुझे परेशानियों का सामना इस हद तक करना पड़ा कि घर में खाना बनाने के लिए तेल तक नहीं था। मैंने उस तरह से पैसों की तंगी का सामना किया है, जो मानसिक तनाव में बदल जाता है, लेकिन मैंने कभी उम्मीद नहीं खोई। मेरे करीबी लोग जो इसके बारे में जानते थे, सराहना की कि मैंने बहुत खूबी से इस सिचुएशन को हैंडल किया।

जिंदगी की यही रीत है हार के बाद ही जीत है। यदि आप नकारात्मक विचारों को मन में रखेंगे, तो आप स्वयं को और भी अधिक डूबता हुआ पाएंगे। अपने जीवन के सकारात्मक पहलुओं पर फोकस करें, जिसमें यह पहलू भी शामिल है कि आप शारीरिक रूप से स्वस्थ हैं, चल सकते हैं और देख सकते हैं। जब मैंने अपना करियर शुरू किया, तो एक दुर्घटना का शिकार हो गया था, मेरे पैर में फ्रैक्चर हो गया और मुझे ऑपरेशन कराना पड़ा था। मेरे पैर में प्लेटें डाली गईं। मुझे विश्वास था कि मैं ठीक हो जाऊंगा। हालांकि, छह महीने के बाद, मुझे एक और ऑपरेशन से गुजरना पड़ा और मैं यह सोचकर काफी निराश हो गया कि मैं कभी एक्टर नहीं बन पाऊंगा। उस चुनौतीपूर्ण समय में, मुझे एहसास हुआ कि मुझे अपने लिए लड़ना होगा क्योंकि अगर मैं ऐसा नहीं करता, तो यूनिवर्स भी मुझे इससे उबरने में मदद नहीं करेगा। मैंने उम्मीद और सकारात्मकता बनाए रखी। आज, मैं 20 वर्षों से अधिक एक्सपीरियंस वाला एक एक्टर हूं। अपने करियर के चुनौतीपूर्ण क्षणों के दौरान भी, मैंने कभी भी नकारात्मकता को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। सफलता पाने के लिए कड़ी मेहनत के साथ आशावादी होना जरूरी है।

मेरा मानना है कि कि हमें हर दिन आशावादी रहना चाहिए। 2017 में, मैं डिप्रेशन में था, चीजें बिखर रही थीं, कोई काम नहीं था और मैंने अपने जीवन में प्यार की कमी और ब्रेकअप का भी अनुभव किया। उस मुश्किल समय के दौरान भी मैं सकारात्मकता और आशा से जुड़ा रहा, जिसने मुझे वापसी करने के काबिल बनाया। हताशा से उम्मीद की ओर बढ़ने का दौर पूरे एक वर्ष तक चला था, जिसके दौरान मुझमें शारीरिक परिवर्तन आया, उसके बाद मानसिक परिवर्तन हुआ। फिर मैंने अपना जीवन पूरी तरह से बदल दिया और खुद को निरंतर काम के लिए समर्पित कर दिया। उसके बाद मैंने हमेशा खुद को एक्टिव रखा। यह मेरा आशावादी रवैया ही था, जिसने मुझे आज इस मुकाम तक पहुंचाया।

जब मैं मुंबई आया, तो मैं अपने सर्वाइवल के लिए एक या दो शो में नजर आने वाले किरदारों को निभाने को तैयार था। दिल्ली में थिएटर और टेलीविजन में अनुभव के साथ एक प्रशिक्षित अभिनेता होने और अंतरराष्ट्रीय थिएटर फेस्टिवल्स में मुख्य भूमिकाएं निभाने के बावजूद, मैं कैमरे के सामने मुख्य किरदार हासिल करने को लेकर आश्वस्त नहीं था। हालांकि, मैंने उम्मीद बनाए रखी और मेन रोल निभाने का सपना देखा। महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब मुझे छोटे परदे पर राजकुमार आर्यन का लीड रोल मिलाष। ब से, मैंने टीवी पर लगातार लीड रोल प्ले किए। कभी भी साइड रोल या एक या दो दिन वाले किरदारों से समझौता नहीं किया। मैं हर प्राइम लीग चैनल का हिस्सा रहा हूं। हर शो में एक साल बिताता हूं। भारतीय टेलिविजन पर महिला केंद्रित कंटेंट का बोलबाला होने के बावजूद, मैंने लीड किरदार और कुछ सबसे पसंदीदा मेल किरदारों को निभाया है। निराशावाद जीवन का एक हिस्सा है, लेकिन अपने दिल और आत्मा का ख्याल रखते हुए हमें पॉजिटिविटी को बढ़ावा देना चाहिए। उम्मीद पर दुनिया कायम है।

सकारात्मक दृष्टिकोण से ही हमें जीवन में आगे बढ़ने की आशा मिलती है और यही नजरिया एक दिन दूसरों के लिए प्रेरणा बन जाता है। मेरे जीवन में कई घटनाओं ने मुझे ऐसा महसूस कराया है कि सब कुछ खत्म हो गया है। लेकिन फिर मुझे लगता है कि मेरे पास केवल एक ही जीवन है। अगर मैं हार मान लूं तो फिर जीवन का कोई उद्देश्य नहीं बचेगा। मसलन, जेल का माहौल बेहद नकारात्मक था। हालांकि मैंने वहां चुप्पी की अहमियत सीखी, धैर्य को जिंदगी से जोड़ा और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मैंने लोगों को जज करना बंद कर दिया। उन्हें वैसे ही स्वीकार करना सीखा जैसे वो हैं।

जब चीजें हमारे मुताबिक नहीं होतीं तो हम दुखी हो जाते हैं। मेरा मानना है कि जीवन में स्वाभाविक रूप से कुछ भी नकारात्मक नहीं है, यह महज हमारे दिमाग की उपज है। बाहरी रूप से कुछ भी नकारात्मक नहीं है, यह सब हमारे दिमाग द्वारा बनाया गया है। हर चीज को सकारात्मक दृष्टि से देखा जा सकता है और यदि कुछ चीजें काम नहीं कर रही हैं, तो इसे सीखने के अनुभव के रूप में लें। जब मैं उदास महसूस करता हूं तो मैं अपने काम पर फोकस करता हूं, क्योंकि यह मेरे जीवन में सकारात्मकता लाता है। मैं सचेत रूप से सकारात्मक चीजों के बारे में सोचता हूं और सफलता की कल्पना करता हूं। अपने लक्ष्यों के लिए कड़ी मेहनत करने से मुझे सकारात्मकता का अहसास होता है। एक बार जब आप अपना लक्ष्य अपने सामने रख लेते हैं, तो सब कुछ सकारात्मक हो जाता है।

अमेरिका में कनाडा के लिए क्या बोले विदेश मंत्री एस जयशंकर?

हाल ही में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अमेरिका में जाकर कनाडा के लिए एक बयान दे दिया है! विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कनाडा के हालिया व्यवहार पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि भारत की अपील के बावजूद कनाडा ने अपनी किसी भी चिंता के बारे में कोई जानकारी साझा नहीं की। उन्होंने हमारे अनुरोध को भी नजरअंदाज किया। इसके बजाय जून 2023 में खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या पर भारत के खिलाफ सार्वजनिक रूप से कई आरोप लगाए। विदेश मंत्री ने ये बातें एनडीटीवी को दिए एक इंटरव्यू में कहा है। उन्होंने ये भी कहा कि कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने हरदीप सिंह निज्जर की हत्या को लेकर दोनों देशों के बीच एक बड़ा राजनयिक विवाद पैदा कर दिया था। जस्टिन ट्रूडो ने कहा था कि सरे शहर में एक गुरुद्वारे के बाहर ‘भारत सरकार के एजेंटों’ की ओर से कथित तौर पर हरदीप निज्जर की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। एस जयशंकर ने इंटरव्यू में भारत के प्रति कनाडा के हालिया व्यवहार पर निशाना साथा। उन्होंने इसकी मुख्य वजहों के रूप में कनाडा की राजनीतिक स्थिति को जिम्मेदार ठहराया, जिसमें चरमपंथी तत्व शामिल हो गए हैं। जयशंकर ने बताया कि कनाडा कुछ वर्षों से चरमपंथियों और आतंकवादियों को अपनी राजनीति में जगह दे रहा है। लेकिन फिर सार्वजनिक रूप से आरोप लगाए। इसकी तुलना में, अमेरिका का उदाहरण देखें। अमेरिका ने हमें बताया कि उनके पास अपराधियों के बारे में कुछ जानकारी है, और वे हमें अपनी तरफ से इसे जांचने के लिए कुछ जानकारी देंगे। हम उनकी जानकारी की पड़ताल करेंगे, मामले की जांच करेंगे।मेरा मानना है कि यह उनकी राजनीति की कमजोरी है। इसके कारण वहां बहुत सारी समस्याएं हो रही हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए था।

एस. जयशंकर ने आगे कहा कि कनाडा के प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक रूप से हमारे खिलाफ आरोप लगाए। इससे पहले, दोनों देशों के प्रधानमंत्री की मुलाकात हुई थी, और मैं भी वहां था। तब हमारी स्थिति यह थी कि अगर आपके मन में कोई बात है जो आपको चिंतित कर रही है, कोई जानकारी आपको मिली है, तो कृपया हमें बताएं। अगर आप हमें सब कुछ नहीं बताना चाहते हैं, तो भी कम से कम कुछ तो कहें, ताकि हम अपनी तरफ से जांच कर सकें। विदेश मंत्री ने आगे कहा कि कनाडा के पीएम ने उस समय हमसे कुछ भी साझा नहीं किया, लेकिन फिर सार्वजनिक रूप से आरोप लगाए। इसकी तुलना में, अमेरिका का उदाहरण देखें। अमेरिका ने हमें बताया कि उनके पास अपराधियों के बारे में कुछ जानकारी है, और वे हमें अपनी तरफ से इसे जांचने के लिए कुछ जानकारी देंगे। हम उनकी जानकारी की पड़ताल करेंगे, मामले की जांच करेंगे।

एस. जयशंकर ने कहा कि कनाडा की राजनीति में अलगाववाद, उग्रवाद और हिंसा को जगह दी गई है। अमेरिका में ऐसी कोई समस्या नहीं है। हां, उनके पास अन्य मुद्दे हैं, लेकिन कनाडा और अमेरिका के बीच उनकी राजनीति और उनके दृष्टिकोण कई अंतर देखने को मिले हैं। जैसे कि वो कैसे द्विपक्षीय संबंधों को संभालते हैं। जयशंकर ने अमेरिका में खालिस्तानी आतंकवादी गुरपतवंत सिंह पन्नून की हत्या की कथित साजिश पर विवाद का जिक्र करते हुए ये बात कही। इसी के साथ भारत ने ट्रूडो के आरोपों को ‘बेतुका’ बताकर खारिज भी कर दिया था। बता दें कि इस कदम की शुरुआत ट्रूडो की गठबंधन सहयोगी न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी के कट्टरपंथी जगमीत सिंह ने की है। साथ ही उन्होंने कनाडा की राजनीति में चीनी हस्तक्षेप से ध्यान भटकाने की ट्रूडो सरकार की कोशिश से इंकार नहीं किया है। इसके बजाय जून 2023 में खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या पर भारत के खिलाफ सार्वजनिक रूप से कई आरोप लगाए। विदेश मंत्री ने ये बातें एनडीटीवी को दिए एक इंटरव्यू में कहा है। उन्होंने ये भी कहा कि कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने हरदीप सिंह निज्जर की हत्या को लेकर दोनों देशों के बीच एक बड़ा राजनयिक विवाद पैदा कर दिया था।मेरा मानना है कि यह उनकी राजनीति की कमजोरी है। इसके कारण वहां बहुत सारी समस्याएं हो रही हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए था।कनाडा पर नजर रखने वालों के अनुसार, सिंह पर ट्रूडो की खालिस्तान समर्थक राजनीति को प्रभावित करने का आरोप है। ट्रूडो-जगमीत गठबंधन कनाडाई पीएम की बढ़ती अलोकप्रियता के बीच वोट बैंक की राजनीति में लगा हुआ है क्योंकि ट्रूडो-जगमीत की जोड़ी को कनाडाई अर्थव्यवस्था में मंदी के लिए मतदाताओं के क्रोध का सामना कर रही है।

क्या नीतीश कुमार के आने से बीजेपी को होगा फायदा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बीजेपी को नीतीश कुमार के आने से फायदा होगा या नहीं! आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर सभी सियासी पार्टियों ने तैयारी तेज कर दी है। समाजवादी पार्टी ने तो उम्मीदवारों की पहली लिस्ट भी जारी कर दी। उधर केंद्र में सत्ता संभाल रही बीजेपी इस बार ‘मिशन 400 पार’ पर काम कर रही है। इसके लिए पार्टी नेता अगले महीने अहम बैठक की तैयारी में हैं, जिसमें देशभर से आए बीजेपी नेताओं को चुनावी रणनीति के मद्देनजर फाइनल ब्लूप्रिंट सौंपा जाएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि सत्ताधारी पार्टी लोकसभा चुनाव में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती। पार्टी को भरोसा है कि देश का मूड उसके पक्ष में है। बावजूद इसके बीजेपी आलाकमान 2004 के आम चुनाव वाली गलती नहीं करना चाहती। अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा और वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की ऊंची छलांग से केंद्र की सत्ताधारी बीजेपी को बड़ी उम्मीदें जगी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मतदाताओं को यह विश्वास दिलाया है कि कैसे उनकी सरकार लगातार विकास के मुद्दे पर काम कर रही। इसके साथ ही बीजेपी हिंदुत्व के मुद्दे पर भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही। आगामी आम चुनाव में स्ट्रॉन्ग नजर आ रही बीजेपी इस सबके बावजूद कोई कमी नहीं रहने देना चाहती। यही वजह है कि बीते दिनों बिहार में जिस तरह से सियासी घटनाक्रम हुआ पार्टी नेतृत्व ने उसे बड़ी गंभीरता से संभाला। नीतीश कुमार के आरजेडी के नेतृत्व वाले महागठबंधन में रहने से बीजेपी को बिहार में वो स्विंग मिलता नहीं दिख रहा था जैसा 2019 में जेडीयू के साथ रहने पर मिला था। यही वजह है कि पार्टी ने नीतीश के एनडीए में लौटने पर कोई देरी नहीं की।

बीजेपी ने एक बार फिर नीतीश की जेडीयू से गठबंधन किया और बिहार में एनडीए गठबंधन की सरकार बन गई। नीतीश कुमार को फिर सीएम पद दिया गया। बीजेपी के रणनीतिकारों ने नीतीश कुमार को साथ लाने का फैसला इसलिए लिया क्योंकि उनके मिशन 400 पार सीट के लिए बिहार अहम राज्य है। पार्टी की नजर बिहार के अलावा महाराष्ट्र, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल पर भी है। यहां के चुनावी नतीजे भी अहम माने जा रहे। 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान इन सभी राज्यों में एनडीए गठबंधन ने 123 सीट अपने नाम किया था। जब अगस्त 2022 में जेडी (यू) गठबंधन से बाहर हो गई, तो एनडीए ने अपने 17 सांसद खो दिए। ग्राउंड सर्वे में भी बीजेपी के लिए भारी नुकसान का संकेत दिया गया। इसमें पार्टी केवल 24 सीटों पर जीत हासिल करती नजर आ रही थी। उधर जेडीयू की भी हालत खास अच्छी नहीं बताई जा रही थी। पार्टी नेताओं का आंकलन यही था कि अगर जेडीयू महागठबंधन के साथ रहते हुए चुनाव में गई तो उनके सांसदों की संख्या 5-6 से ज्यादा नहीं होगी। सीटों की स्थिति देखते हुए दोनों पार्टियों के फिर से एक साथ आने का मतलब समझ में आया। बीजेपी के लिए हिंदी भाषी राज्य बिहार पर फोकस बढ़ाना बेहद जरूरी था। ऐसे में नीतीश की एनडीए वापसी सही समय पर हुई।

बीजेपी नेताओं ने तर्क दिया कि 22 जनवरी को राम मंदिर अभिषेक के बाद बिहार में सियासी गणित बदला। बीजेपी सूत्रों ने ये भी बताया कि यह पीएम मोदी ही थे जिन्होंने पहल की और नीतीश कुमार से बात की। उन्हें एनडीए में वापस आने के लिए कहा। बीजेपी नेतृत्व ने आकलन किया कि बिहार में लगभग 15 फीसदी वोट बेस वाला जेडीयू, नीतीश कुमार के बाद बिखर सकता है। अगर बीजेपी ने जेडीयू को अपने साथ जोड़े नहीं रखा तो आरजेडी कम से कम उसके समर्थन वाले वोटर बेस के बड़े हिस्से पर कब्जा कर सकती है। एक बार नीतीश कुमार की लीडरशिप खत्म हुई तो इससे आरजेडी और मजबूत हो सकती है। खास तौर पर 2025 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के लिए गंभीर खतरा पैदा हो जाता।

उधर बीजेपी ने कर्नाटक में भी अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए कवायद शुरू किया है। 2019 में लोकसभा की 28 में से 25 सीटें बीजेपी ने जीतीं थीं। हालांकि, पिछले साल के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की शानदार जीत से इस टैली के प्रभावित होने की संभावना नजर आ रही। यही वजह है कि पार्टी उन नेताओं को वापस लाने के लिए बातचीत कर रही, जिन्होंने असेंबली चुनावों से पहले पार्टी छोड़ दी थी। लगभग एक दर्जन नेता बीजेपी से बाहर चले गए थे। उनमें सबसे प्रमुख जगदीश शेट्टार को पिछले हफ्ते ही पार्टी अपने पाले में वापस ले आई है।

इन सबके बावजूद बीजेपी के शीर्ष नेताओं को 2004 में पार्टी की हार अब भी याद है। उस समय पार्टी नेतृत्व को ये उम्मीद थी की बीजेपी बड़ी जीत दर्ज करेगी, बावजूद इसके वह हार गई थी। उन्होंने समग्र माहौल को अपनी चुनावी रणनीति के आधार पर नहीं लिया। उस समय लीडरशिप ने प्रत्येक राज्य में राजनीतिक स्थिति का विश्लेषण किया लेकिन रिजल्ट अनुकूल नहीं आए। 2004 में बीजेपी के ‘पक्ष में सकारात्मक माहौल’ के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार सत्ता में लौटने में विफल रही थी। उसी स्थिति और कारणों को देखते हुए बीजेपी के एक नेता ने दावा किया कि मौजूदा नेतृत्व उस गलती को दोहराना नहीं चाहता और आगामी लोकसभा चुनाव में कोई मौका नहीं लेना चाहता।

आखिर लद्दाख में क्यों दखल दे रहा है चीन?

वर्तमान में चीन लद्दाख में लगातार दखल दे रहा है!लद्दाख में 2020 में चीनी सेना के बीच खतरनाक झड़प के बाद भारतीय सेना ने बेहद सख्त रुख दिखाते हुए ड्रैगन को जैसे का तैसा जवाब दे रहा है। इसका असर अब दिख भी रहा है और चीनी सैनिकों की हिमाकत को अब वहां रह रहे चरवाहे भी करार जवाब दे रहे हैं। कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर आए एक वीडियो में इसकी बानगी भी देखने को मिली। लद्दाख में भारतीय चरवाहों ने चीनी सैनिकों के साथ सख्ती करते दिखे। दरअसल, चरवाहे चारागाहों में अपने जानवर को ले जा रहे थे। यहीं पर चरवाहे और चीनी सैनिकों के बीच बहस हो रही थी। भारतीय चरवाहे अपने पारंपरिक चारागाहों में अंदर तक जा रहे हैं। जब पीपुल्स लिबरेशन आर्मी पीएलए के सैनिक उन्हें वापस धकेलने की कोशिश करते हैं तो चरवाहे अपनी जमीन पर डटे रहते हैं। इससे पहले, अक्सर सेना ही चरवाहों की आवाजाही को सीमित कर देती थी ताकि चीनी सैनिकों के साथ टकराव से बचा जा सके। सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो में ऐसे ही एक घटना के अनुसार, निडर चरवाहे पीएलए के सैनिकों का विरोध करते दिख रहे हैं, जो हल्के बख्तरबंद गाड़ियों के साथ उनके पास आए थे। बताया जा रहा है कि यह घटना 2 जनवरी को हुई थी! 

खबरों के मुताबिक चीनी सैनिक भारतीय क्षेत्र में एक किलोमीटर अंदर का कागजंग तक आ गए थे। चुशूल निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले लद्दाख हिल काउंसिल के पार्षद कोंचोक स्टैनजिन ने घटना की पुष्टि करते हुए एक्स लिखा कहा, ‘कोई शक नहीं है कि हमारी सेना हमेशा नागरिकों के साथ है। चीनी सैनिक हिमाकत की कोशिश कर रहे थे। लेकिन हमारे चरवाहों ने उनका मजबूती के साथ सामना किया।

गौरतलब है कि गलवान झड़प के बाद से लगभग हर सर्दियों में ऐसी घटनाएं हो रही हैं। हर बार, चीनी सैनिकों की हिमाकत को वहां मौजूद गांव वाले और चरवाहों ने ही रोका था। या फिर स्थानीय लोगों के दावे के अनुसार सादे कपड़ों में आए भारतीय सैनिकों ने। पिछले साल, जब डेमचोक के आसपास सीएनएन जंक्शन क्षेत्र में चरवाहों को पीएलए ने रोका तो सेना ने हस्तक्षेप किया था। कुछ साल पहले इसी तरह की घुसपैठ के एक वीडियो में दिखता है कि कैसे गांव वाले और नागरिक लाठी और पथराव के साथ घुसपैठियों की ओर दौड़ रहे थे। कगजंग और दमचुले इलाकों में ये घटनाएं अक्सर होती रहती हैं। क्योंकि यहां चारागाहों को लेकर दोनों देशों के बीच विवाद है। ये क्षेत्र इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि सर्दियों में जब पशु अपने बच्चे को जन्म देते हैं तो यही चारागाह उनके लिए एकमात्र भोजन का स्रोत होते हैं।

बता दे कि यह न्योमा गांव के पास एलएसी का इलाका है। गांववालों के मुताबिक वे इस जगह पर अपने जानवरों को हमेशा ले जाते हैं। लेकिन चीनी सैनिक उसे अपना इलाका बताते हुए उन्हें रोकने लगे। गांव वालों ने चीनी सैनिकों से कहा कि ये जगह उनकी है और ये उनका चरागाह है। गांव वालों ने चीनी सैनिकों से खूब बहस भी की और चीनी सैनिकों की गाड़ी पर पत्थर भी मारे। वीडियो में चीनी सैनिक पूरे घटनाक्रम को रेकॉर्ड करते दिख रहे हैं और चरवाहों से वापस जाने को कह रहे हैं। चीनी सैनिकों के आर्मर्ड वीइकल भी दिखाई दे रहे हैं। लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल के पास के चरागाह सिर्फ वहां आसपास रहने वाले गांव वालों और उनके पशुओं के लिए ही अहम नहीं है बल्कि यह भारत की सीमा की सुरक्षा के लिहाज से भी अहम हैं। इसलिए आए दिन कभी चीन के सैनिक भारत के लोगों को वहां अपने पशु ले जाने से रोकते हैं तो कभी भारतीय सैनिक चीन की तरफ से आए लोगों को अपने पशु वहां से दूर ले जाने के लिए कहते हैं। कगजंग और दमचुले इलाकों में ये घटनाएं अक्सर होती रहती हैं। क्योंकि यहां चारागाहों को लेकर दोनों देशों के बीच विवाद है। ये क्षेत्र इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि सर्दियों में जब पशु अपने बच्चे को जन्म देते हैं तो यही चारागाह उनके लिए एकमात्र भोजन का स्रोत होते हैं।चरागाह इसलिए भी अहम हैं क्योंकि इसके जरिए दोनों देश उस जगह पर अपना दावा पुख्ता करते हैं। जिन जगहों पर भारत के लोग अपने पशुओं को लेकर जाते हैं वह भारत का इलाका है और भले ही चीन उसे अपना बताता है लेकिन भारतीय चरवाहे उस जगह पर भारतीय दावे को पुख्ता करते हैं।

फरवरी महीने के लिए क्या है मौसम विभाग की भविष्यवाणी?

आज हम आपको फरवरी महीने के लिए दी गई मौसम विभाग की भविष्यवाणी बताने वाले हैं! दिल्ली समेत उत्तर भारत में इस साल मौसम में कई बदलाव देखने को मिले हैं। हालत यह है कि 123 साल में यह पहली बार हुआ है जब उत्तर भारत में जनवरी के महीने में 91 फीसदी कम बारिश हुई है। इस साल जनवरी में महज 3.1 मिमी बारिश दर्ज की गई है। यह 1901 के बाद दूसरी सबसे कम बारिश है। वहीं, पूरे देश में इस महीने में सामान्य से 58% कम बारिश दर्ज की गई। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने बुधवार को यह जानकारी दी। हालांकि, मौसम विभाग ने यह अनुमान लगाया गया है कि फरवरी के दौरान पूरे देश में ‘सामान्य से ऊपर’ बारिश होने की संभावना है। फरवरी महीने में होने वाली रबी फसलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इस बारिश से किसानों को राहत मिल सकती है। तापमान के मोर्चे पर, यह भविष्यवाणी की गई है कि देश के अधिकांश हिस्सों में फरवरी में सामान्य से अधिक न्यूनतम तापमान सामान्य रात से अधिक गर्म रहने की संभावना है। वहीं,उत्तर-पश्चिम, पश्चिम मध्य, उत्तर-पूर्व और पूर्व-मध्य भारत के कुछ हिस्सों में तापमान सामान्य अधिकतम सामान्य दिन से अधिक गर्म के ऊपर रहने की संभावना है। मासिक वर्षा और तापमान का पूर्वानुमान जारी करते हुए, आईएमडी के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्र ने कहा कि हालांकि उत्तर-पश्चिम, उत्तर-पूर्व और मध्य भारत के अधिकांश हिस्सों में ‘सामान्य से सामान्य से अधिक’ वर्षा होने की संभावना है, लेकिन दक्षिण भारत के अधिकांश हिस्सों में ‘सामान्य से कम’ वर्षा होने की संभावना है।

आईएमडी के निदेशक महापात्र ने कहा कि फरवरी के दौरान मध्य भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से कम शीत लहर वाले दिन होने की संभावना है। उन्होंने कहा कि इस दौरान मजबूत अल नीनो स्थितियां – मध्य प्रशांत महासागर में सतही जल का असामान्य रूप से गर्म होना – लगातार कमजोर होने और वसंत ऋतु के अंत तक ईएनएसओ-तटस्थ स्थितियों में बदलने की संभावना है। हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर में बुधवार को हिमपात शुरू हो गया है। इस वजह से सामान्य जनजीवन बाधित रहा। वहीं, उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में बारिश से क्षेत्र में ठंड बढ़ गयी। भारत मौसम विभाग विभाग आईएमडी पूरे देश में फरवरी में सामान्य से अधिक बारिश होने का अनुमान जताया है। आईएमडी के अनुसार, उत्तर भारत में दिसंबर और जनवरी में सामान्य से अधिक शुष्क मौसम के बाद फरवरी में सामान्य और सामान्य से अधिक बारिश होने का अनुमान है।महापात्र के अनुसार अधिकांश मॉडल जुलाई-सितंबर के आसपास भारतीय दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए अनुकूल मानी जाने वाली ला नीना स्थितियों में बदलाव का संकेत देते हैं। 25 दिसंबर से 30 जनवरी तक गंगा के मैदानी इलाकों में कोहरा छाया रहा। यह हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में सबसे लंबे समय तक रहने वाले दौरों में से एक था। मौसम विज्ञानियों ने इसका कारण इस क्षेत्र को प्रभावित करने वाले कम पश्चिमी विक्षोभ को बताया।

हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर में बुधवार को हिमपात शुरू हो गया है। इस वजह से सामान्य जनजीवन बाधित रहा। वहीं, उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में बारिश से क्षेत्र में ठंड बढ़ गयी। भारत मौसम विभाग विभाग आईएमडी पूरे देश में फरवरी में सामान्य से अधिक बारिश होने का अनुमान जताया है। आईएमडी के अनुसार, उत्तर भारत में दिसंबर और जनवरी में सामान्य से अधिक शुष्क मौसम के बाद फरवरी में सामान्य और सामान्य से अधिक बारिश होने का अनुमान है। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने बुधवार को यह जानकारी दी। हालांकि, मौसम विभाग ने यह अनुमान लगाया गया है कि फरवरी के दौरान पूरे देश में ‘सामान्य से ऊपर’ बारिश होने की संभावना है। फरवरी महीने में होने वाली रबी फसलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इस बारिश से किसानों को राहत मिल सकती है।स्थानीय मौसम कार्यालय ने 31 जनवरी और एक फरवरी को पांच जिलों -शिमला, कुल्लू, चंबा, किन्नौर और लाहौल और स्पीति में भारी हिमपात और बारिश की ओरेंज चेतावनी जारी की है।25 दिसंबर से 30 जनवरी तक गंगा के मैदानी इलाकों में कोहरा छाया रहा। यह हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में सबसे लंबे समय तक रहने वाले दौरों में से एक था। मौसम विज्ञानियों ने इसका कारण इस क्षेत्र को प्रभावित करने वाले कम पश्चिमी विक्षोभ को बताया। जम्मू कश्मीर में श्रीनगर-लेह राजमार्ग पर जोजिला अक्ष रेखा समेत ऊपरी इलाकों में फिर बर्फबारी हुई जबकि मैदानी हिस्सों में बारिश हुई।

क्या मोदी सरकार ने बजट में चौंका दिया है?

वर्तमान में मोदी सरकार ने बजट में चौंका कर रख दिया है! मोदी सरकार ट्रेंड तोड़ने की माहिर है। अक्‍सर देखने को मिला है कि वह अपने फैसलों से चौंका देती है। यही कारण है क‍ि उसके फैसलों के बारे में अनुमान लगा पाना मुश्किल होता है। बात चाहे राजनीति की हो या आर्थिक नीतियों की। इस मामले में उसका रिकॉर्ड एक जैसा है। यह सरकार परिपाटियों को तोड़ने के लिए जानी जाती है। मोदी 1.0 में तत्‍कालीन वित्‍त मंत्री अरुण जेटली ने बजट को पेश करने की 92 साल पुरानी परंपरा तोड़ी थी। बजट को फरवरी के अंत में पेश करने के बजाय इसे फरवरी के पहले दिन पेश करना शुरू किया गया था। फिर मोदी 2.0 में ब्रीफकेस की जगह बही-खाता जैसे प्रयोग किए गए। 2019 से वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बजट पेश करने के लिए ब्रीफकेस की जगह लाल कपड़े से ढके बही-खाते का इस्तेमाल करती रही हैं। यह बदलाव प्रतीकात्मक है। इसका मकसद भारत की समृद्ध विरासत और पारंपरिक मूल्यों को दर्शाना है। गुरुवार को पेश होने वाला बजट अंतरिम बजट है। यह लोकसभा चुनाव से पहले पेश किया जा रहा है। इसी के चलते ज्‍यादातर लोगों को उम्‍मीद है कि यह लोकलुभाव होगा। इसमें भी चार ‘जातियों’ पर ज्‍यादा फोकस हो सकता है। इन चार ‘जातियों’ में गरीब, युवा, महिला और किसान शामिल हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार कहते रहे हैं कि उनके लिए सिर्फ यही चार जातियां हैं। सवाल यह है कि ट्रेंड तोड़ने की माहिर मोदी सरकार बजट में चौंकाएगी तो नहीं! क्‍या ऐसी भी उम्‍मीद की जा सकती है कि नई स्‍कीमों पर बड़े खर्च करने के ट्रेंड को छोड़ बजट गैप को कम करने पर फोकस हो। अर्थव्यवस्था को बम-बम रखने के लिए बुनियादी ढांचे पर ध्यान द‍िया जाए। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी को बजट पेश करेंगी। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इसके जरिये पॉलिटिकल मैसेज भी दिया जाएगा। ऐसे में मोदी सरकार ग्रोथ की पिच पर बैटिंग कर सकती है। इस कड़ी में उसकी ओर से खर्चों को काबू में रखने का नजरिया भी अपनाया जा सकता है।सिटीग्रुप के इकनॉमिस्‍ट समीरन चक्रवर्ती की मानें तो सरकार शायद चुनाव से पहले राजनीतिक संदेश दे। वह खर्चों और आर्थिक मजबूती के बीच संतुलन बनाकर रख सकती है।

मसलन, सरकार महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए महिला किसानों को वार्षिक भुगतान दोगुना कर 12,000 रुपये कर सकती है। इसे लागू करने में सरकारी खजाने पर करीब 1,195 करोड़ का बोझ पड़ेगा। यह सरकार के कुल खर्च में एक छोटी रकम है। लेकिन, इसका मैसेज बहुत बड़ा होगा। सरकार सब्सिडी के मद में होने वाले खर्च को भी मौजूदा स्‍तर पर रख सकती है। मोदी सरकार पहले ही मुफ्त खाद्यान्न कार्यक्रम को अगले पांच साल के लिए बढ़ा चुकी है। इसमें भी बहुत कम अतिरिक्त खर्च आएगा। कारण है कि सालों से यह सब्सिडी वाली स्‍कीम चली रही है।

सरकार अपने राजकोषीय घाटे को कम करने की कोशिश में है। यह खर्च और राजस्व के बीच का अंतर होता है। वह इसे चालू वित्तीय वर्ष के लिए सकल घरेलू उत्पाद के 5.9 फीसदी के लक्ष्य से कम से कम आधा फीसदी घटाना चाहती है।

सरकार से यह उम्‍मीद भी है कि वह युवाओं में बेरोजगारी को लेकर विपक्ष की आलोचना पर ध्यान देगी। बुनियादी ढांचे पर भारी खर्च को जारी रखेगी। जबकि विदेशी और घरेलू निर्माताओं को प्रोत्साहन के जरिये निवेश करने के लिए लुभाने की कोशिश करेगी। यह इस उम्मीद में किया जा सकता कि इससे नौकरियां पैदा होंगी। चुनावी साल में राजकोषीय घाटा कम होने की कोशिश से पता चलेगा कि सरकार मतदाताओं को लुभाने के लिए सामाजिक खर्च पर बहुत अधिक निर्भर नहीं हो सकती है। अलबत्‍ता, वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता पर भरोसा कर रही है। इसने सत्तारूढ़ पार्टी को हाल के राज्य चुनावों में जीत हासिल करने में मदद की है।

सार्वजनिक खर्च के बूते भारत की अर्थव्यवस्था जुलाई-सितंबर तिमाही में 7.6 फीसदी बढ़ी। ऐसे में मोदी सरकार ग्रोथ की पिच पर बैटिंग कर सकती है। इस कड़ी में उसकी ओर से खर्चों को काबू में रखने का नजरिया भी अपनाया जा सकता है।सिटीग्रुप के इकनॉमिस्‍ट समीरन चक्रवर्ती की मानें तो सरकार शायद चुनाव से पहले राजनीतिक संदेश दे। वह खर्चों और आर्थिक मजबूती के बीच संतुलन बनाकर रख सकती है।31 मार्च को समाप्त होने वाले पूरे वर्ष के लिए 7.3 फीसदी की बढ़ोतरी का अनुमान लगाया जा रहा है। यह प्रमुख अर्थव्यवस्‍थाओं में दुनिया की सबसे तेज रफ्तार है।

क्या एलन मस्क के प्रयोग से इंसानी दिमाग पर होगा मशीनों का राज?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या एलन मस्क के प्रयोग से इंसानी दिमाग पर मशीनों का राज होगा या नहीं! एलन मस्क की कंपनी न्यूरालिंक ने हाल ही में पहली बार किसी इंसान के दिमाग में ‘टेलीपैथी’ नाम का एक नया उपकरण लगाया है। इससे पहले भी ऐसे प्रयास हो चुके हैं, लेकिन न्यूरालिंक की टेक्नोलॉजी काफी अलग है। आमतौर पर इम्प्लांट की ऐसी कोशिशें दिमाग के ऊपर उपकरण फिट करने के लिए होती थीं। लेकिन न्यूरालिंक का ये चिप सीधे दिमाग के अंदर जाता है। ये चिप बहुत पतले तारों का इस्तेमाल करता है जो दिमाग की अलग-अलग कोशिकाओं से जुड़ सकते हैं। इससे भविष्य में हमें अपने दिमाग से ही मोबाइल फोन और कंप्यूटर चलाने में मदद मिल सकती है। खासकर, ये उन लोगों के लिए फायदेमंद हो सकता है जो अपने हाथों का इस्तेमाल नहीं कर पाते। हालांकि, न्यूरालिंक का असली मकसद इंसानों और कंप्यूटरों को एक-दूसरे से जोड़ना है। यानी भविष्य में हम सोचकर ही चीजों को कंट्रोल कर सकेंगे, ये मानो साइंस फिक्शन की फिल्मों जैसा लगता है। लेकिन अभी इसे लेकर काफी सवाल भी हैं। मसलन, कहीं इस टेक्नॉलजी का गलत इस्तेमाल तो नहीं होने लग सकता है? फिलहाल, ये टेक्नॉलजी शुरुआती दौर में है और इसके दूरगामी असर को समझने के लिए अभी और वक्त लगेगा।

अगर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तरक्की करता रहे जैसा कि कहा जा रहा है, तो न्यूरालिंक जैसे उपकरण इंसानों को पूरी तरह बदलकर रख सकते हैं। कल्पना कीजिए, हम सीधे ड्रोन, सेल्फ-ड्राइविंग कारों को भी अपने दिमाग से कंट्रोल कर सकेंगे। सुपर कंप्यूटर जैसा शतरंज खेल पाएंगे या प्रोटीन संरचना जैसे जटिल वैज्ञानिक प्रयोगों की देखरेख कर सकेंगे।

ऐसा करना भी बहुत मुश्किल नहीं है, क्योंकि आज की तकनीक भी काफी हद तक ये कर सकती है। हम बिना तार के मोबाइल और लैपटॉप चलाते हैं, उनकी बैटरी भी बिना किसी तार के चार्ज करने की तकनीक पहले से मौजूद है ही। ऐसे में ये कल्पना करना मुश्किल नहीं कि भविष्य में हमारे दिमाग में लगा एक चिप आसपास के उपकरणों को कंट्रोल कर सकेगा और उसे बिना तार के ही चार्ज किया जा सकेगा। लेकिन ये टेक्नोलॉजी अभी पूरी तरह तैयार नहीं है। न्यूरालिंक का कहना है कि वो 2024 में 11 लोगों पर ये चिप लगाएगा और इससे इस तकनीक को और बेहतर बनाने में मदद मिलेगी। इंसानों पर प्रयोग से पहले उन्होंने बंदरों पर टेस्ट किया था। यानी ये माना जा सकता है कि ये सर्जरी मेडिकल रूप से सुरक्षित है।

हालांकि, इस टेक्नोलॉजी के कुछ नुकसान भी हो सकते हैं। जैसे अगर किसी का दिमाग हैक हो जाए तो काफी खतरनाक हो सकता है। लेकिन कुल मिलाकर, ये डिवाइस दिव्यांग लोगों की जिंदगी को आसान बना सकते हैं, इसलिए इस पर रिसर्च जरूरी है। मगर ये टेक्नोलॉजी कुछ सवाल खड़े करती है, खासकर नैतिकता के लिहाज से।

न्यूरालिंक जैसी टेक्नोलॉजी को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं: सुपर इंटेलिजेंस वाला AI: सबसे पहला सवाल ये है कि क्या सचमुच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इतना ज्यादा उन्नत हो जाएगा कि वो इंसानों से भी ज्यादा तेज दिमाग वाला बन जाएगा? अभी तो ये सिर्फ एक अनुमान है। ये बेशक कई कामों में इंसानों से बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। लेकिन क्या AI ही सामान्य बुद्धि जनरल इंटेलिजेंस में तब्दील हो जाएगा और इंसानों से ज्यादा जनरल इंटेलिजेंस वाल हो जाएगा? फिलहाल तो ये कहना मुश्किल है। इंसान और AI का मेल: दूसरा सवाल ये है कि क्या मेडिकल साइंस और न्यूरोलॉजी इतनी तरक्की कर पाएंगे कि इंसान और AI का मानसिक रूप से जुड़ाव हो सकेगा? तकनीकी तौर पर कंप्यूटरों को आपस में जोड़ना संभव है, क्योंकि हमारा दिमाग भी एक तरह का कंप्यूटर ही है। लेकिन इसमें दिमाग और शरीर से जुड़ी कई दिक्कतें आ सकती हैं। इसका पता लगाने के लिए अभी और रिसर्च करनी होगी।

तीसरा सवाल ये है कि अगर दिमाग में चिप लगा ली जाए तो क्या इंसान और भी ज्यादा बुद्धिमान बन जाएगा? क्या वो AI से भी ज्यादा समझदार हो पाएगा, या फिर इंसानी भावनाओं और व्यवहार को ज्यादा गहराई से समझ सकेगा? ताकत का ट्रांसफर? चौथा सवाल ये है कि क्या ये सुपर बुद्धिमान इंसान AI और बाकी इंसानों के बीच नैतिक मध्यस्थता कर पाएगा? या अगर जरूरत पड़ी तो क्या वो AI को काबू में रख पाएगा? ये सभी सवाल इसलिए जरूरी हैं क्योंकि न्यूरालिंक जैसी टेक्नोलॉजी भविष्य में काफी बदलाव ला सकती है। इसलिए इस पर गंभीरता से सोचना और रिसर्च करना जरूरी है। यहां तक कि अगर सब कुछ न्यूरालिंक के हिसाब से हो भी जाए, तब भी कई नैतिक सवाल उठते हैं।क्या ये सही है कि हम किसी के दिमाग में चिप लगाकर उसे ‘साइबर वंडर वूमन’ या ‘साइबर कैप्टन मार्वल’ बना दें? क्या ये गारंटी है कि ऐसा इंसान नैतिक होगा या ‘इंसानियत’ की तरफ खड़ा होगा?

क्या ताज से भी भव्य बनने वाली है अयोध्या की मस्जिद?

वर्तमान में अयोध्या की मस्जिद ताज से भी भव्य बनने वाली है! एक तीखे धार्मिक विवाद से पैदा हुए धर्मस्थल को भाई-चारे और समावेशी परिवेश का केंद्र बनाया जा सकता है? इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन आईआईसीएफ अयोध्या के धन्नीपुर में बनाई जा रही मस्जिद से ऐसी ही उम्मीद कर रहा है। अयोध्या के प्रसिद्ध बाबरी मस्जिद विवाद में फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद के लिए अलग जगह देने का आदेश दिया था। इसके बाद अयोध्या से 25 किमी दूर धन्नीपुर में आईआईसीएफ मस्जिद के साथ-साथ अस्पताल, वृद्धाश्रम और स्कूल के निर्माण पर काम कर रहा है। फाउंडेशन ने तय किया है कि इस मस्जिद का नाम बाबर के नाम पर नहीं बल्कि पैगंबर मोहम्मद साहब के पिता मुहम्मद बिन अब्दुल्ला के नाम पर रखा जाएगा। धन्नीपुर गांव में 11 एकड़ की जगह को ‘दवा’ और ‘दुआ’ का बहुसांस्कृतिक स्थल बनाने की तैयारी की जा रही है। इसके लिए मस्जिद बोर्ड को सरकार से 5 एकड़ जमीन मिली थी। सुन्नी वक्फ बोर्ड ने उसके साथ 6 एकड़ का प्लॉट और जोड़ दिया है। आईआईसीएफ यहां पर 500 बिस्तरों वाला एक कैंसर अस्पताल, 2 कॉलेज, 1 वृद्धाश्रम और एक पूर्ण शाकाहारी रसोईघर के अलावा बगीचों और फव्वारों के बीच भव्य मस्जिद बनाने की योजना पर काम कर रहा है।

मस्जिद डिवेलपमेंट समिति के नवनियुक्त अध्यक्ष हाजी अरफात शेख चाहते हैं कि यह एक ऐसी जगह हो जहां सभी धर्मों के लोग आना चाहें। उन्होंने कहा कि शाकाहारी कैंटीन, अस्पताल, कॉलेज सभी सही फैसले हैं। इससे सभी धर्मों के लोगों को यहां भोजन मिलेगा। कोई भी भूखा नहीं लौटेगा। ये जगह पर्याप्त सब्सिडी वाले मॉडर्न एजुकेशन और चिकित्सा का केंद्र भी होगा। मुंबई के भाजपा नेता और महाराष्ट्र अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष शेख ने कहा कि आईआईसीएफ धन्नीपुर में भव्य मस्जिद के लिए धन जुटाएगा, जो “भव्यता में ताजमहल को भी मात देगा। वे इस महीने क्यूआर कोड-आधारित क्राउडफंडिंग ऑपरेशन शुरू करने की योजना बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि हम नहीं चाहते कि लोग सड़कों पर खड़े हों और मस्जिद के लिए दान मांगें, इसमें हर भारतीय योगदान दे सकेगा, पैसा कैसे और कहां खर्च किया जाए, इसमें पूरी पारदर्शिता बरती जाएगी। दानकर्ता मस्जिद निर्माण के लिए एक-एक ईंट भी दान कर सकेंगे। उन्होंने कहा कि हर ईंट को एक नंबर दिया जाएगा और दानदाताओं को सूचित किया जाएगा कि मस्जिद में उनकी ईंट कहां रखी गई है। शेख ने कहा कि इसके लिए लागत अभी तय नहीं की गई है।

मस्जिद में पांच मीनारें होंगी जो इस्लाम के पांच केंद्रीय सिद्धांतों कलमा, नमाज, रोजा, जकात और हज का प्रतिनिधित्व करेंगी। इसके प्रार्थना कक्ष में एक समय में 9,000 लोगों के लिए जगह होगी, जो संभवतः दिल्ली की जामा मस्जिद के बाद भारत में दूसरी सबसे बड़ी मस्जिद होगी। जामा मस्जिद में एक साथ 25,000 लोगों के बैठने की व्यवस्था होती है। मस्जिद को लेकर चर्चा का एक विषय भगवा रंग में बंधी 21 बाई 36 फीट की कुरान है। यह रंग अजमेर के ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती के साथ जुड़ा हुआ है जो मुसलमानों के बीच ‘चिश्तिया’ के नाम से जाने जाते थे। शेख ने बताया कि अगर आपको याद हो तो गरीब नवाज (चिश्ती) की शॉल और पगड़ी चिश्तिया हैं।

शेख ने मस्जिद का जो डिजाइन शेयर किया है, उसमें एक पूरी तरह से सफेद संगमरमर की मस्जिद दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि हालांकि, मस्जिद बनाने में अन्य पत्थरों का भी उपयोग किया जाएगा। डिजाइन में बदलाव किया जा रहा है क्योंकि कुछ लोगों ने बदलाव की मांग की है। बावजूद इसके मस्जिद देखने लायक होगी। यह ताज से भी ज्यादा खूबसूरत होगा। शेख चाहते हैं कि सभी धर्मों के लोग यहां आएं। पर्यटकों के लिए एक बड़े मछलीघर की योजना बनाई गई है और दिन की आखिरी नमाज के साथ फव्वारे जीवंत हो उठेंगे।

उन्होंने कहा कि यहां उन सभी निर्दोष लोगों के लिए प्रार्थना करने की जगह होगी जो बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के दौरान हुई झड़पों के दौरान मारे गए थे। कॉलेजों को लेकर शेख ने कहा कि यहां पर सभी धर्मों और बैकग्राउंड के छात्रों को प्रवेश मिलेगा। हालांकि उन्होंने मुसलमानों के लिए कम कटऑफ पर फैसला नहीं किया है। उन्होंने कहा कि हम उम्रदराज़ मुस्लिम छात्रों, विशेषकर लड़कियों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहते हैं। हालांकि सरकार ने खुद ही धन्नीपुर में मस्जिद के लिए जमीन आवंटित की है, लेकिन मस्जिद समिति इस बात को लेकर आश्वस्त होना चाहती है कि वह किसी विवाद में न पड़े। शेख ने कहा कि मस्जिद निर्माण का काम शुरू करने से पहले हम चाहेंगे कि राज्य सरकार हमें एक प्रमाण पत्र दे जिसमें कहा गया हो कि भूमि का मालिकाना हक साफ है। हम यहां बाबरी मस्जिद की पुनरावृत्ति नहीं चाहेंगे। परियोजना के डिजाइन को अंतिम रूप दिया जा रहा है और मंजूरी के लिए यूपी सरकार को प्रस्ताव भी लगभग तैयार है। उन्होंने कहा कि हम इस साल फरवरी में साइट पर अपना निर्माण कार्यालय खोलेंगे और मई में रमज़ान के बाद निर्माण शुरू करेंगे।”

मस्जिद की पहली ईंट एक भव्य समारोह में रखी जाएगी। शेख ने कहा कि मस्जिद के नाम और उस पर लिखी ‘दुआ’ वाली एक बड़ी ईंट को देश भर की मस्जिदों में आशीर्वाद देने के बाद एक जुलूस के रूप में धन्नीपुर लाया जाएगा। शेख ने कहा कि संत सरकार पीर आदिल, जिनकी कब्र बीजापुर में है, उनके एक वंशज के हाथों मुंबई से नींव के लिए पहली ईंट लाई जाएगी। हम सब ट्रेन से अयोध्या जाएंगे और प्रत्येक स्टेशन पर ईंट की पूजा की जाएगी।

उन्होंने बताया कि मस्जिद का निर्माण पांच से छह साल तक चल सकता है और ट्रस्ट मस्जिद में पहली नमाज के लिए मक्का से इमाम को बुलाएगा। यह पूछे जाने पर कि क्या उनका मानना है कि मस्जिद सभी धर्मों के लोगों को एक साथ ला सकती है, शेख ने कहा कि ये वो प्रतिबद्धता है जो उन्होंने और आईआईसीएफ ने खुद से की है। मुझे उम्मीद है कि हम पुराने घावों को भरने और उज्जवल भविष्य की ओर बढ़ने में सक्षम हैं।

क्या अयोध्या में होने जा रहा है मस्जिद निर्माण?

वर्तमान में अयोध्या में मस्जिद निर्माण होने वाला है! उत्तर प्रदेश के अयोध्या में प्रभु श्रीरामलला का धाम बनने के बाद श्रद्धालुओं की भारी भीड़ यहां उमड़ रही है। वहीं, धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण बनी इस नगरी में एक और धार्मिक स्थल का निर्माण कराने की योजना तैयार की गई है। प्रभु रामलला की भव्य मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा और राम मंदिर के उद्घाटन के बाद अब धन्नीपुर मस्जिद के निर्माण की योजना पर कार्य तेज हो गया है। धन्नीपुर मस्जिद विकास समिति के प्रमुख और इंडो- इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन के सदस्य हाजी अरफात शेख ने कहा कि मस्जिद का निर्माण इस साल अप्रैल से शुरू होगा। धन्नीपुर मस्जिद के नवनिर्मित ब्लूप्रिंट को उन्होंने एक मीडिया चैनल से साझा किया। उन्होंने कहा कि यह भारत की पहली मस्जिद होगी, जिसमें पांच मीनारें और दुबई से भी बड़ा एक मछलीघर होगा। आईआईसीएफ यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की ओर से अयोध्या के धन्नीपुर गांव में बाबरी मस्जिद के बदले आवंटित पांच एकड़ भूमि पर मस्जिद के निर्माण की देखरेख के लिए गठित ट्रस्ट है। हाजी अरफात शेख को यूपी के सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने धन्नीपुर में मस्जिद के विकास के लिए नामित किया था। हाजी शेख भाजपा नेता और महाराष्ट्र राज्य अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं, जिन्होंने कई सामाजिक पहल की हैं। नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पांच एकड़ जमीन आवंटित किए हुए काफी लंबा समय हो गया है। राम मंदिर का निर्माण हाल ही में पूरा कराया गया है। इसके बाद भव्य प्राण प्रतिष्ठा समारोह का आयोजन 22 जनवरी को किया गया। इसके बाद से धन्नीपुर मस्जिद के निर्माण की योजना पर कार्य किया जा रहा है। देश ने भगवान राम की मूर्ति की भव्य प्रतिष्ठा और अयोध्या मंदिर के उद्घाटन का गवाह बनाया।

हाजी अरफात शेख ने मस्जिद निर्माण पर बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा है कि यह एक बड़ी परियोजपना है। मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूं कि पवित्र मस्जिद की स्थापना के इस कार्य के लिए मुझे 25 करोड़ मुसलमानों में से चुना गया है। उन्होंने दावा किया कि यह मस्जिद इस्लामी संरचना का उत्कृष्ट नमूना होगी। हम इसे दुनिया की सबसे खूबसूरत मस्जिदों में से एक के रूप में विकसित करने की योजना बना रहे हैं। ऐसी परियोजनाओं में समय लगता है। आखिरकार इस रमजान के बाद काम शुरू कराया जाएगा। इस बीच हम तकनीकी और अन्य संबंधित औपचारिकताओं पर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पहले स्ट्रक्चर का नाम धन्नीपुर मस्जिद था। कुछ लोगों ने मस्जिद- ए- अमन नाम भी सुझाया। इसका नाम प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी मौलवी अहमदुल्ला शाह फैजाबादी के नाम पर रखा गया।

धन्नीपुर मस्जिद का नाम अब बदलकर मोहम्मद बिन अब्दुल्ला मस्जिद कर दिया गया है। हाजी शेख ने कहा कि मोहम्मद बिन अब्दुल्ला मस्जिद अंतिम नाम है। उन्होंने बताया कि पवित्र नाम का गहरा महत्व है। इसमें हमारे प्यारे पैगंबर मोहम्मद के पिता का नाम शामिल है। यह धन्य नाम राष्ट्र को विपत्तियों से बचाने और उसके सभी लोगों को ब्लेसिंग देने में सहायक होगा। उन्होंने कहा कि एक दिन दुनिया खत्म हो जाएगी। लेकिन, यह पवित्र मस्जिद प्रकाश की किरण के रूप में अपनी चमक बिखेरता रहेगा। यह केवल भारत ही नहीं, बल्कि सीमाओं के पार तक अपनी चमक से लोगों को प्रकाशमान करेगा।

मोहम्मद बिन अब्दुल्ला मस्जिद को लेकर हाजी शेख ने बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा कि यह मस्जिद मुसलमानों के लिए एक पवित्र जगह होगी। विशेष रूप से सुन्नियों, शियाओं, तब्लीगियों के लिए विशेष जगह के स्थान पर सभी वर्गों के लिए यहां कोई भेदभाव नहीं होगा। उन्होंने कहा कि अभी मुसलमान संप्रदायों में विभाजित हो गया हैं। यह मस्जिद सांप्रदायिक विभाजन को पाट देगी। यह मस्जिद अपनी विशेषताओं के लिए जानी जाएगी। 340 फीट की ऊंचाई तक पांच मीनारें यहां होंगी। ये मीनारें इस्लाम के पांच सिद्धांतों- शाहदा विश्वास की घोषणा, सलाह प्रार्थना या नमाज, सॉम उपवास या रोजा, जकात दान और हज को प्रदर्शित करेंगी। हाजी अरफात शेख ने कहा कि यह मस्जिद मुस्लिम भाइयों के लिए पवित्र स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा। यह मस्जिद दो भागों में विभाजित की जाएगी। इसमं बेसमेंट क्षेत्र और ग्राउंड फ्लोर का निर्माण किया जाएगा। बेसमेंट में एक मल्टीपरपस हॉल होगा। वहीं, ग्राउंड फ्लोर पर एक विशाल नमाज हॉल होगा, जिसमें एक समय में 9,000 से अधिक नमाजियों को नमाज पढ़ने की सुविधा होगी। नमाज हॉल में पांच प्रवेश होंगे। यह पूरी तरह से नमाज अदा करने के लिए होगा। महिला नमाजियों के लिए भी खास इंतजाम हैं। सीढ़ियों और एक छोटी खिड़की के साथ ऊंची मीनारें, मस्जिद के नए डिजाइन का एक अनिवार्य हिस्सा होंगी।

इस्लामिक वास्तुकला की एक और अनिवार्य विशेषता डोम, नए डिजाइन के अनुसार प्रस्तावित मस्जिद का हिस्सा होगी। दीवारों पर अरबी सुलेख लिपियां या कुरान की आयतें अंकित की जाएंगी। हमने मस्जिद के ताले और चाबी के डिजाइन पर भी विशेष ध्यान दिया है। सजावटी लकड़ी के काम के साथ-साथ दीवार के अंदरूनी और बाहरी हिस्से पर प्लास्टर का काम होगा, जो संरचना को और अधिक सुंदर बना देगा। बगीचे और फव्वारे और जलाशयों के साथ भव्य आंगन शामिल हैं। नमाजियों को नमाज अदा करने से पहले स्नान करने में मदद करेंगे।

मस्जिद में शुद्ध शाकाहारी रसोईघर होगा। यह अजमेर शरीफ की तर्ज पर विकसित किया जाएगा। हाजी शेख ने कहा कि शाकाहारी सामुदायिक रसोई चलाने के पीछे हमारा उद्देश्य लोगों को इस्लाम की शिक्षाओं से अवगत कराना है जो पूरी तरह से प्रेम और शांति फैलाने में विश्वास करता है। हम दुनिया को बताना चाहते हैं कि हम ख्वाजा गरीब नवाज को मानने वाले हैं, बाबर के नहीं, जो भारत को लूटने आया था। 5000 से अधिक लोग रसोई में ताजा पका हुआ शाकाहारी भोजन खा सकते हैं जो अनंत काल तक क्रियाशील रहेगा। मस्जिद में 500 बेड का अस्पताल भी बनाया जाएगा। यह कैंसर अस्पताल के रूप में विकसित किया जाएगा।

आखिर क्या है चुनाव के लिए अखिलेश यादव का नया दाव?

आज हम आपको अखिलेश यादव का चुनाव के लिए अपनाया गया नया दाव बताने वाले हैं! लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर समाजवादी पार्टी की प्रत्याशियों की पहली लिस्ट सामने आ चुकी है। राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 16 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट में पत्नी डिंपल यादव, चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव, अक्षय यादव के टिकट फाइनल कर दिए हैं। वहीं बसपा और कांग्रेस से आए कुछ नेताओं को भी टिकट का उपहार मिला है। प्रत्याशी ऐलान के अखिलेश के इस कदम को एक तरफ इंडिया गठबंधन की आपसी राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ इस ऐलान को कहीं न कहीं भाजपा के दांव से उस पर ही मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाने की कोशिश से भी जोड़ा जा रहा है। पहले बात करते हैं इंडिया गठबंधन की। समाजवादी पार्टी की लिस्ट पर नजर डालें तो इस लिस्ट में कुछ ऐसे नेताओं को भी टिकट दिया गया है, जो कुछ समय पहले कांग्रेस छोड़कर पार्टी में पहुंचे हैं। इनमें अन्नू टंडन का नाम सबसे ऊपर है। अन्नू टंडन पुरानी कांग्रेसी मानी जाती हैं। उन्नाव से वह सांसद भी रह चुकी हैं। हालांकि इस सीट पर अब भाजपा के साक्षी महाराज सांसद हैं। 2019 के लाेकसभा चुनाव में अन्नू टंडन कांग्रेस से प्रत्याशी थीं और तीसरे स्थान पर रही थीं। समाजवादी पार्टी दूसरे नंबर पर रही थी। अब अन्नू टंडन को सपा से टिकट मिला है। इसी तरह अकबरपुर लोकसभा सीट से सपा ने राजाराम पाल को प्रत्याशी बनाया है। 2019 के लोकसभा चुनाव में राजाराम कांग्रेस के टिकट पर मैदान में थे। वह तीसरे नंबर पर रहे थे। उस चुनाव में ये सीट सपा-बसपा गठबंधन के तहत बसपा के खाते में गई थी। बसपा दूसरे नंबर पर रही थी और जीत भाजपा के देवेंद्र सिंह भोले की हुई थी।

इसी तरह से समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस को झटका देते हुए फर्रूखाबाद से डॉ नवल किशोर शाक्य को प्रत्याशी बना दिया है। फर्रूखाबाद सीट से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद चुनाव लड़ते रहे हैं। 2019 में सलमान खुर्शीद तीसरे स्थान पर रहे थे। इस सीट पर भी गठबंधन के तहत बसपा ने मनोज अग्रवाल को टिकट दिया था, जो दूसरे नंबर रहे थे। भाजपा के मुकेश राजपूत ने यहां से जीत दर्ज की थी। इसी तरह से कांग्रेस लखनऊ लोकसभा सीट पर भी हर बार जोर लगाती रही है। पिछली बार प्रमोद कृष्णम को यहां से प्रत्याशी बनाया गया था। लेकिन काफी कोशिश के बाद भी कांग्रेस यहां तीसरे स्थान पर रही थी। पिछली बार सपा-बसपा गठबंधन के तहत इस सीट पर सपा ने पूनम सिन्हा को मैदान में उतारा था लेकिन वह भी दूसरे स्थान पर ही रही थीं। इस बार समाजवादी पार्टी ने आगे बढ़ते हुए पहले ही रविदास मेहरोत्रा काे प्रत्याशी ऐलान कर दिया है। अब देखना ये होगा कि क्या कांग्रेस इन्हें समर्थन देती है?

ये ताे रही इंडिया गठबंधन की बात भाजपा की बात करें तो वह प्रत्याशियों का ऐलान हमेशा से पहले करती रही है। हाल ही में हुए राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी ऐसा ही देखने को मिला था, जब भाजपा ने छत्तीसगढ़-मध्य प्रदेश चुनाव में पहले ही उम्मीदवारों की घोषणा कर मनोवैज्ञानिक बढ़त ले ली थी। यूपी में वैसे तो बहुजन समाज पार्टी का सबसे पहले प्रत्याशियों के ऐलान का इतिहास रहा है। कई बार तो ये स्थिति देखी गई जब चुनाव के कई महीने पहले ही प्रत्याशियों का ऐलान कर दिया गया और चुनाव आते-आते दो बार टिकट बदल भी दिया गया। इसी तरह अकबरपुर लोकसभा सीट से सपा ने राजाराम पाल को प्रत्याशी बनाया है। 2019 के लोकसभा चुनाव में राजाराम कांग्रेस के टिकट पर मैदान में थे। वह तीसरे नंबर पर रहे थे। उस चुनाव में ये सीट सपा-बसपा गठबंधन के तहत बसपा के खाते में गई थी। बसपा दूसरे नंबर पर रही थी और जीत भाजपा के देवेंद्र सिंह भोले की हुई थी।लेकिन पिछले कुछ चुनावों से बसपा का प्रदर्शन काफी कमजोर रहा है। इस बार समाजवादी पार्टी ने आगे बढ़ते हुए पहले ही रविदास मेहरोत्रा काे प्रत्याशी ऐलान कर दिया है। अब देखना ये होगा कि क्या कांग्रेस इन्हें समर्थन देती है?इसका सीधा असर टिकट बंटवारे में भी देखने को मिलता रहा है। बहरहाल, जानकारों के अनुसार अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश में सबसे पहले टिकट का ऐलान कर सभी दलों पर मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल करने की कोशिश जरूर की है। अब इसका कितना लाभ चुनाव में मिलेगा ये देखने वाली बात है।