Thursday, March 5, 2026
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क्या अब के के पाठक की मुश्किलें हट गई है?

वर्तमान में के के पाठक की सारी मुश्किलें हट गई है! शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव केके पाठक के कड़े फैसलों से शिक्षकों में हड़कंप तो था ही, पूर्व शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर की भी उनकी बेपटरी जगजाहिर थी। दोनों के बीच बेपटरी की शुरुआत तो उसी दिन हो गई थी, जब सीएम नीतीश कुमार ने अपने तत्कालीन शिक्षा मंत्री के बजाय शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव को काम करने की खुली छूट दे दी थी। उनकी सहूलियत के लिए नीतीश ने चंद्रशेखर का विभाग भी बदल दिया। जैसे संकेत मिल रहे हैं, नए शिक्षा मंत्री आलोक मेहता महकमे के अपर मुख्य सचिव के काम में बाधा नहीं डालेंगे। नीतीश की सख्त हिदायत है कि केके पाठक के काम में कोई दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए। नीतीश कुमार से लोजपा आर के अध्यक्ष चिराग पासवान और पूर्व सीएम जीतन राम मांझी का भले ही छत्तीस का आंकड़ा रहा हो, पर केके पाठक के प्रति दोनों के मन में आदर-सम्मान का भाव रहा है। जीतन राम मांझी तो उनकी तारीफ करते हुए यहां तक कह गए कि उन्हें बिहार का मुख्य सचिव बना देना चाहिए। इससे बिहार का भला होगा। चिराग पासवान ने कहा कि जिस तरह पूर्व शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर अपने बयानों से जातिवाद को बढ़ा दे रहे थे, वैसे में उन्हें हटाया जाना सरकार का उचित कदम है। इसको इस रूप में भी समझा जा सकता है कि केके पाठक ने नीतीश की छवि को इतना सुधार दिया है कि विरोधी भी अब नीतीश के फैसले की तारीफ करने लगे हैं।

इसे महज संयोग कहें या नीतीश कुमार की कोई चाल मानें कि केके पाठक जब छुट्टी पर गए तो उनके इस्तीफे का चौतरफा शोर हुआ। जिस दिन वे छुट्टी से लौटे, उसके अगले ही दिन नीतीश ने चंद्रशेखर को शिक्षा मंत्री के पद से हटा दिया और आलोक मेहता को नई जिम्मेवारी दे दी गई। आलोक मेहता इसके पहले भूमि सुधार और राजस्व महकमे के मंत्री थे। आलोक मेहता ने नीतीश द्वारा नई जिम्मेवारी देने के बाद जिस अंदाज में उनका धन्यवाद किया, उससे इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि वे इससे खुश हैं और केके पाठक के काम में शायद ही दखलंदाजी की हिमाकत करें। हालांकि राजनीतिक गलियारे में चर्चा यही रही है कि चंद्रशेखर के विवादित बयानों और अपने एसीएस केके पाठक से उनकी बेपटरी से नीतीश बेहद खफा थे। नाराजगी के कारण ही केके पाठक ने छुट्टी पर जाने का फैसला किया। कहा तो यह भी जा रहा है कि पाठक छुट्टी से लौट कर शिक्षा विभाग छोड़ना चाहते थे। इसकी वजह अपने विभागीय मंत्री से उनकी बेपटरी ही कारण थी। नीतीश को यह नागवार लगा और उन्होंने अपनी नाराजगी आरजेडी के शीर्ष नेतृत्व से जाहिर कर दी। नीतीश इतने नाराज थे कि अगले ही दिन आरजेडी नेता और बिहार के डेप्युटी सीएम तेजस्वी यादव अपने पिता और पार्टी के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के साथ नीतीश के दरबार में पहुंच गए। तकरीबन घंटे भर तीनों नेताओं ने राय-मशविरा किया। आखिरकार चंद्रशेखर का विभाग बदलने पर बेमन से ही सही, आरजेडी ने सहमति दे दी। चूंकि यह विभाग आरजेडी कोटे का था, इसलिए किसी और को मंत्री बनाने के बजाय भूमि-राजस्व मंत्री आलोक मेहता को शिक्षा विभाग की जिम्मेवारी देने की सलाह आरजेडी के शीर्षस्थ नेताओं ने दी।

यह भी सच है कि केके पाठक के शिक्षा विभाग का एसीएस बनाए जाने के बाद बिहार की शिक्षा व्यवस्था पटरी पर आने लगी। स्कूलों में समय से शिक्षक आने-जाने लगे तो छात्रों की उपस्थिति भी बढ़ी। कोचिंग संचालकों पर नकेल कस कर पाठक ने उनकी भी कमर तोड़नी शुरू कर दी। जीतन राम मांझी तो उनकी तारीफ करते हुए यहां तक कह गए कि उन्हें बिहार का मुख्य सचिव बना देना चाहिए। इससे बिहार का भला होगा। चिराग पासवान ने कहा कि जिस तरह पूर्व शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर अपने बयानों से जातिवाद को बढ़ा दे रहे थे, वैसे में उन्हें हटाया जाना सरकार का उचित कदम है। इसको इस रूप में भी समझा जा सकता है कि केके पाठक ने नीतीश की छवि को इतना सुधार दिया है कि विरोधी भी अब नीतीश के फैसले की तारीफ करने लगे हैं।लोग भी यह मानते हैं कि कोचिंग के लोभ में बच्चे स्कूलों में नामांकन तो लेते थे, लेकिन वहां न जाकर वे कोचिंग क्लासेज में चले जाते थे। इतना ही नहीं, सरकारी स्कूलों के शिक्षक भी कोचिंग क्लास चलाने लगे थे। पाठक ने उन्हें भी स्कूल आने के लिए मजबूर कर दिया।

क्या लालू यादव की पार्टी में मच गया है सियासी घमासान?

वर्तमान में लालू यादव की पार्टी में सियासी घमासान मच चुका है! बिहार में वाम दलों को छोड़ इंडी अलायंस की बाकी सभी पार्टियों में खटपट की आहट साफ सुनाई देने लगी है। लोकसभा चुनाव में अभी तीन महीने बाकी हैं, लेकिन नेताओं के इधर से उधर होने की कवायद शुरू हो गई है। जेडीयू में यह सिलसिला तो पहले से ही चल रहा है। कांग्रेस में भी विनीता विजय के लोजपा ज्वाइन करने के साथ इसका श्रीगणेश हो चुका है। अब आरजेडी में भी खटपट की गूंज सुनाई दे रही है। लोकसभा चुनाव की घोषणा होने तक नेताओं के इधर से उधर होने की रफ्तार तेज हो सकती है। मुस्लिम-यादव M-Y के मजबूत समीकरण में भी सेंध लग चुकी है। हालांकि अभी तक आरजेडी के किसी नेता ने पाला बदल नहीं किया है, लेकिन कुछ ऐसे संकेत मिल रहे, जिससे आने वाले दिनों में पार्टी को ऐसे दिन देखने को मिल सकते हैं। अपने विवादित बयानों के लिए बिहार में चर्चित रहे चंद्रशेखर का विभाग नीतीश कुमार ने बदल दिया। हिन्दू भावनाओं को भड़काने वाले बयानों के लिए शिक्षा मंत्री रहते चंद्रशेखर मशहूर हो गए थे। नीतीश ने एक दफा उनको रोका भी था, लेकिन उन्होंने अपना अंदाज नहीं बदला। कहा तो यह भी जाता है कि चंद्रशेखर ने पलट कर नीतीश को जवाब दे दिया था कि वे अपने स्टैंड पर कायम हैं। उन्हें आरजेडी ने भी शह दिया। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह उनके समर्थन में थे। लालू परिवार का करीबी और स्वजातीय होने के कारण उनका मनोबल बढ़ा हुआ था। नीतीश ने मौका पाकर अपनी तल्खी दिखाई तो लालू-तेजस्वी को भागे-भागे उनके के दरबार में हाजिर होना पड़ा। आखिरकार चंद्रशेखर का विभाग बदलने पर राजद ने अपनी सहमति दे दी। जाहिर है कि यह न चंद्रशेखर को जंचा होगा और न उनके समर्थकों को। चंद्रशेखर के देवी-देवताओं और हिन्दू धर्मग्रंथों के खिलाफ बयान से मुस्लिम समाज के लोग भी आह्लादित थे। उनका विभाग बदले जाने को उनके समर्थक खफा हैं। इसका खामियाजा चुनाव में आरजेडी को भुगतना पड़ सकता है।

इधर आरजेडी की खटपट मुजफ्फरपुर में भी दिखी। आरजेडी शिक्षक प्रकोष्ठ के डिस्ट्रिक्ट प्रेसिडेंट हरिशंकर प्रसाद यादव ने कर्पूरी ठाकुर के जन्म शताब्दी समारोह के लिए बैठक बुलाई थी। उन्होंने सबसे आग्रह किया कि पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हाल में 24 जनवरी को होने वाले समारोह में ज्यादा से ज्यादा लोगों की जिले से सहभागिता होनी चाहिए। यहां तो बात ठीक थी, लेकिन राजद के प्रदेश महासचिव जयशंकर प्रसाद यादव का यह कहना कि राजद के मुजफ्फरपुर जिला अध्यक्ष पार्टी को कमजोर कर रहे हैं, गुटबंदी का संकेत दे गया। उन्होंने तो यहां तक आरोप जिला अध्यक्ष पर मढ़ दिया कि 10 जनवरी को कार्यकर्ता संवाद सम्मेलन में जिला कमेटी के लोगों को सम्मान नहीं मिला। कई प्रकोष्ठों के लोगों को बुलाया तक नहीं गया। इससे पार्टी कमजोर हो रही है। ऐसे जिला अध्यक्ष पर पार्टी को एक्शन लेना चाहिए।

हरिशंकर प्रसाद ने यह भी कह दिया कि कई प्रकोष्ठों के जिलाध्यक्षों और प्रदेश पदाधिकारियों को कार्यकर्ता संवाद सम्मेलन की सूचना तक जिला अध्यक्ष ने नहीं दी। यह पार्टी को कमजोर करने वाला कदम है। राजद के कार्यकर्ता इससे नाराज हैं। इससे पार्टी कमजोर होती जा रही है। जिलाध्यक्ष ने राजद को पैकेट पार्टी बना दिया है। उनके इस कदम से निष्ठावान कार्यकर्ता हताश हैं। उन्होंने पार्टी को नुकसान से बचाने के लिए जिलाध्यक्ष पर कार्रवाई की मांग की।

बिहार में सबसे मजबूत स्थिति आरजेडी की रही है। लेकिन कई कारणों से अब उसकी आगे की डगर आसान नहीं दिख रही। नीतीश कुमार की वजह से आरजेडी काफी दबाव में है। नीतीश कुमार के इंडी अलायंस का संयोजक पद ठुकराने के बाद आरजेडी को इसलिए मलामत का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि उसी ने नीतीश को पीएम और संयोजक का सब्जबाग दिखाया था। नीतीश के बारे में यह भी चर्चा लगातार हो रही हैं कि वे इंडी अलायंस से अलग होकर फिर भाजपा से हाथ मिला सकते हैं। ऐसा होता है तो इससे आरजेडी की भारी फजीहत होगी। आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद ने ही विपक्षी एकता की पहल के लिए नीतीश कुमार को सोनिया गांधी से मिलाया था। अगर नीतीश साथ छोड़ते हैं तो बिहार में महागठबंधन सरकार खतरे में पड़ सकती है। तब लालू के बेटे तेजस्वी यादव और तेज प्रताप का मंत्री पद भी चला जाएगा। सीबीआई और ईडी ने पहले से ही लालू परिवार के सदस्यों को हलकान कर रखा है।

जब पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की मौत पर हुआ था सियासी घमासान!

एक ऐसा समय जब पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की मौत पर सियासी घमासान शुरू हो गया था! बिहार के दो बार सीएम रहे ‘जननायक’ कर्पूरी ठाकुर को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया जाएगा। नरेंद्र मोदी सरकार ने दिग्गज समाजवादी नेता को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान के लिए चुना है। लंबे समय से कर्पूरी ठाकुर को ‘भारत रत्न’ देने की मांग की जा रही थी। हालांकि, अब केंद्र ने इस पर फाइनल फैसला ले लिया। कर्पूरी ठाकुर को ‘भारत रत्न’ दिए जाने का ऐलान होते ही उन्हें लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। एक सवाल भी उठने लगे कि क्या बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की हत्या हुई थी? ‘जननायक’ की मौत को लेकर ये सवाल पहले भी कई बार उठ चुके हैं। कभी बीजेपी तो कभी आरजेडी की ओर से ये सवाल उठाए गए। कर्पूरी ठाकुर की मौत पर सवाल साल 2017 में बिहार बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष रहे नित्यानंद राय ने उठाए थे। उन्होंने कहा था कि जननायक कर्पूरी ठाकुर की मौत स्वभाविक नहीं थी बल्कि उनकी हत्या हुई थी। नित्यानंद राय ने तत्कालीन बिहार सरकार से मामले की जांच कराने की भी मांग की थी। 24 जनवरी 2017 को कर्पूरी ठाकुर की जयंती समारोह में उन्होंने ये बातें कही थीं, जिसे लेकर बिहार में सियासी घमासान तेज हो गया था। हालांकि, ये कोई पहला मौका नहीं था जब कर्पूरी ठाकुर की मौत पर सवाल उठाए गए।

साल 2021 में आरजेडी नेता और बाल संरक्षण आयोग के पूर्व सदस्य रहे डॉक्टर निशींद्र किंजल्क ने भी कुछ ऐसी बात कही थी। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री जननायक कर्पूरी ठाकुर की मौत की उच्चस्तरीय जांच कराने की बात कही थी। उन्‍होंने भी कर्पूरी ठाकुर की मौत के पीछे गहरी साज‍िश की आशंका जताई थी। आरजेडी नेता डॉ. निशींद्र किंजल्क ने उस समय सीएम नीतीश कुमार को इस संबंध में चिट्ठी भी लिखी थी। अपने पत्र में उन्होंने कर्पूरी ठाकुर के ही एक लेटर का जिक्र किया था। कर्पूरी ठाकुर ने ये लेटर अपनी मौत से करीब 4 साल पहले 11 सितंबर 1984 में बिहार के तत्कालीन चीफ सेक्रेटरी को भेजा था। इसमें ‘जननायक’ ने अपनी हत्या की आशंका जताई थी। कर्पूरी ठाकुर का निधन 17 फरवरी, 1988 को दिल का दौरा पड़ने से हुआ था, उस समय उनकी 64 वर्ष थी। निशींद्र किंजल्क के 2021 में सीएम नीतीश को भेजे गए लेटर में कर्पूरी ठाकुर की मौत को लेकर कई बातों का जिक्र किया गया था। इसमें बताया कि जब कर्पूरी ठाकुर की मृत्यु हुई तो एक चश्मदीद ने दावा किया था कि पूर्व सीएम के मुंह से झाग निकल रहा था। उनकी मौत बेहद रहस्यमय तरीके से हुई थी ऐसे में इसकी उच्च स्तरीय जांच कराई जानी चाहिए।

नित्यानंद राय और निशींद्र किंजल्क ही नहीं कर्पूरी ठाकुर की मौत पर सवाल तो पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय रघुवंश प्रसाद सिंह ने भी किया था। उन्होंने 22 फरवरी, 1988 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को पत्र लिखकर रहस्यमय मौत की जांच को लेकर डिमांड की थी। उस समय के इस लेटर की प्रति बिहार के तत्कालीन सीएम भागवत झा आजाद को भी दी गई थी। फिलहाल इन दावों और आशंकाओं में कितनी सच्चाई है ये अब तक स्पष्ट नहीं हुआ है।

अब कर्पूरी ठाकुर की 100वीं जयंती पर उन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ दिए जाने की चर्चा हर ओर हो रही। जननायक कर्पूरी ठाकुर की मौत स्वभाविक नहीं थी बल्कि उनकी हत्या हुई थी। नित्यानंद राय ने तत्कालीन बिहार सरकार से मामले की जांच कराने की भी मांग की थी। 24 जनवरी 2017 को कर्पूरी ठाकुर की जयंती समारोह में उन्होंने ये बातें कही थीं, जिसे लेकर बिहार में सियासी घमासान तेज हो गया था। हालांकि, ये कोई पहला मौका नहीं था जब कर्पूरी ठाकुर की मौत पर सवाल उठाए गए।सभी पार्टियां और नेता इस फैसले की तारीफ कर रहे हैं। बता दें कि कर्पूरी ठाकुर का जन्म 24 जनवरी 1924 को समस्तीपुर के पितौंझिया गांव में हुआ था। अब इस गांव को कर्पूरीग्राम भी कहा जाता है। बता दें कि कर्पूरी ठाकुर का निधन 17 फरवरी, 1988 को दिल का दौरा पड़ने से हुआ था, उस समय उनकी 64 वर्ष थी। निशींद्र किंजल्क के 2021 में सीएम नीतीश को भेजे गए लेटर में कर्पूरी ठाकुर की मौत को लेकर कई बातों का जिक्र किया गया था। इसमें बताया कि जब कर्पूरी ठाकुर की मृत्यु हुई तो एक चश्मदीद ने दावा किया था कि पूर्व सीएम के मुंह से झाग निकल रहा था। उनकी मौत बेहद रहस्यमय तरीके से हुई थी ऐसे में इसकी उच्च स्तरीय जांच कराई जानी चाहिए। कर्पूरी ठाकुर पहली बार 22 दिसंबर 1970 को और फिर दूसरी बार 24 जून 1977 को बिहार के सीएम बने थे। कर्पूरी ठाकुर 1952 की पहली बार विधानसभा चुनाव जीते और फिर कभी नहीं हारे।

आखिर कितने अमीर है लालू यादव और नीतीश कुमार?

आज हम आपको बताएंगे कि लालू यादव और नितेश कुमार कितने अमीर है! बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर आजादी के बाद से ही राजनीति में सक्रिय रहे। 1952 से 1984 तक लगातार विधायक या सांसद रहे। आपातकाल के बाद 1977 के आम चुनाव में वह समस्तीपुर से सांसद भी चुने गए। 1967 में बिहार सरकार के ताकतवर मंत्रालयों के मंत्री भी रहे। 1970 और 1977 में दो बार बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी भी संभाली। इसके बावजूद उनका बैक बैलेंस कम ही रहा। सीएम आवास में भी वह जमीन पर सोते थे। कर्पूरी ठाकुर की सादगी के कई किस्से मशहूर हैं। उनके निजी सचिव रहे पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने एक इंटरव्यू में बताया था कि सीएम पद से हटने के बाद उन्होंने अपनी फैमिली को पैतृक गांव पितौझिया भेज दिया था, क्योंकि उनकी इनकम कम थी। पटना जैसे शहर में वह परिवार का खर्च नहीं चला सकते थे। उनके पिता गोकुल ठाकुर बेटे के मंत्री और मुख्यमंत्री बनने के बाद भी नाई का काम करते रहे। अनुरंजन झा अपनी किताब ‘गांधी मैदान ब्लफ ऑफ सोशल जस्टिस’ में लिखा है कि कर्पूरी ठाकुर ने विधायक के लिए आवंटित सस्ते प्लॉट लेने से इनकार कर दिया था। आपातकाल के दौरान जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में सोशलिस्ट और जनसंघ के नेताओं ने एक ही छतरी के नीचे आंदोलन किया। सोशलिस्ट नेताओं लालू यादव, नीतीश कुमार और राम बिलास पासवान जैसे दिग्गज नेता कर्पूरी ठाकुर के साथ आंदोलन में जुड़े। कई मौकों पर ये नेता कर्पूरी ठाकुर को राजनीतिक गुरु बता चुके हैं। आपातकाल के बाद कर्पूरी ठाकुर के समाजवादी शिष्य भी विधायक और सांसद बने। 90 के दशक में लालू यादव और 2005 के बाद नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने। कर्पूरी ठाकुर की सादगी के चर्चे तो आज भी होते हैं, मगर उनके शिष्यों की आमदनी पर भी चर्चा होती है। अनुरंजन झा ने किताब ‘गांधी मैदान ब्लफ ऑफ सोशल जस्टिस’ में लिखा है कि लालू यादव विधायक बनते ही जीप खरीद ली, जबकि कर्पूरी ठाकुर रिक्शे में ही चलते रहे। एक बार कर्पूरी ठाकुर ने विधानसभा जाने के लिए उनसे गाड़ी मांगी तो लालू यादव ने बहाना बना दिया, जीप में तेल नहीं है। बाद में लालू यादव के खिलाफ चारा घोटाला, लैंड फॉर जॉब स्कीम समेत कई घोटालों की जांच हुई। चारा घोटाले में लालू यादव को सजा भी हुई।

2009 के चुनाव में लालू यादव ने बताया था कि उनके पास 3.20 करोड़ की संपत्ति है। 2020 में राबड़ी देवी ने अपनी संपत्ति 17.92 करोड़ रुपये बताई थी। लालू यादव के छोटे बेटे डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने चुनावी हलफनामे में 5.88 करोड़ की चल-अचल संपत्ति होने का खुलासा किया था। कैबिनेट सचिवालय की वेबसाइट के अनुसार, तेजस्वी यादव के पास 1.11 करोड़ रुपये की चल संपत्ति और 3 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति भी है। 2019 के लोकसभा चुनाव में पाटलिपुत्र से आरजेडी उम्मीदवार रहीं मीसा भारती ने बताया था कि उनके पास बिहार और दिल्ली में 6.72 करोड़ की प्रॉपर्टी है। 2020 के विधानसभा चुनाव में लालू यादव के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव ने 2.83 करोड़ की कुल प्रॉपर्टी होने की जानकारी दी थी। इससे अलग 2017 में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने लालू परिवार की 9.32 करोड़ रुपये बेनामी संपत्ति जब्त की थी। इस संपत्ति का मार्केट रेट 175 करोड़ रुपये आंकी गई। जुलाई 2023 में भी ईडी ने भी लैंड फॉर जॉब घोटाले में उनकी फैमिली की 6 करोड़ की प्रॉपर्टी अटैच कर ली थी।

कर्पूरी ठाकुर के दूसरे शिष्य नीतीश कुमार पिछले 23 साल से बिहार के मुख्यमंत्री हैं। नीतीश कुमार भी वी पी सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकारों में केंद्रीय मंत्री रहे। सीएम बनने के बाद से वह कैबिनेट सचिवालय विभाग की वेबसाइट पर हर साल अपनी संपत्ति का खुलासा करते हैं। 2024 में घोषित विवरण के अनुसार, उनके पास 1.64 करोड़ रुपये की संपत्ति है। 2022 में उनकी संपत्ति कुल 75.53 लाख रुपये थी। उनके पास फोर्ड इकोस्पोर्ट कार है,जिसकी कीमत 11.32 लाख रुपये है। उनके पास नई दिल्ली के द्वारका में 1.48 करोड़ रुपये कीमत का एक अपार्टमेंट फ्लैट है, जिसे उन्होंने किराये पर दे रखा है। बाद में लालू यादव के खिलाफ चारा घोटाला, लैंड फॉर जॉब स्कीम समेत कई घोटालों की जांच हुई। चारा घोटाले में लालू यादव को सजा भी हुई।इसके अलावा नीतीश कुमार के पास 13 गायें और 10 बछड़े भी हैं। उनके बेटे निशांत के पास कुल 3.61 करोड़ की प्रॉपर्टी है। नीतीश कुमार की पैतृक प्रॉपर्टी और खेती वाली जमीन भी निशांत के नाम पर है। उनके बेटे के पास नालंदा के हकीकतपुर और कल्याण बीघा में मकान है। इसके अलावा पटना के कंकड़बाग में भी निशांत का घर है।

जानिए पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर का एक अद्भुत किस्सा!

आज हम आपको पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर का एक अद्भुत किस्सा सुनाने जा रहे हैं! बिहार के समस्तीपुर के पितौंझिया अब कर्पूरीग्राम में जन्मे कर्पूरी ठाकुर बिहार में एक बार उपमुख्यमंत्री, दो बार मुख्यमंत्री और दशकों तक विधायक और विरोधी दल के नेता रहे। जननायक 1952 की पहली विधानसभा में चुनाव जीतने के बाद वे बिहार विधानसभा का चुनाव कभी नहीं हारे। राजनीति में लंबा सफ़र बिताने के बाद जब उनका निधन हुआ, तब उनके परिवार को विरासत में देने के लिए एक मकान तक नहीं था। वे न तो पटना में, न ही अपने पैतृक घर में वो एक इंच जमीन जोड़ पाए। फरवरी 2014 में बिहार विधान परिषद की पत्रिका ‘साक्ष्य’ में जननायक से जुड़े कई स्मरण को साझा किया था। परिषद ने इस पत्रिका को प्रकाशित हुआ। ये पत्रिका पूरी तरह जननायक को समर्पित रही। इस अंक में बिहार के कई वरिष्ठ नेताओं ने उनके बारे में अपने स्मरण को साझा किया है। केंद्र सरकार ने उन्हें भारत रत्न देने का ऐलान किया है। कर्पूरी ठाकुर के बारे में बिहार राज्य पिछड़ा आयोग के सदस्य रहे निहोरा प्रसाद यादव ने ‘साक्ष्य’ में एक बेहतरीन स्मरण साझा किया है। उन्होंने लिखा है कि मुख्यमंत्री रहते कर्पूरी ठाकुर हर दिन पटना में जरूर मौजूद रहते थे। वे साढ़े सात बजे तैयार होकर अपने सरकारी आवास पर बैठ जाते। वहां एक बड़ा सा टेबल, जो कहीं-कहीं से टूटा हुआ रहता, उसी के पास लगे बेंच पर बैठते। इस दौरान बिहार भर से गरीबों का हुजूम पहुंचता। आने वाले लोगों के तन पर साफ कपड़े नहीं होते। कईयों के पैर में चप्पल नहीं होता। वे अपनी पीड़ा सुनाते। कर्पूरी ठाकुर उनकी समस्या को सुनते।

निहोरा प्रसाद यादव ने पत्रिका में चर्चा करते हुए उस दौर की बातों का जिक्र किया है। उन्होंने लिखा है कि उस दौरान मुख्यमंत्री के तौर पर लोगों की समस्या को लेकर अधिकारियों को तत्काल फोन करते। समस्या के निवारण का निर्देश देते। उसके साथ ही कई अधिकारियों को पत्र भी लिखते। इतना ही नहीं दूर से आने वाले लोगों से एक निवेदन भी करते। जननायक उनसे कहते कि-इतना पैसा लगाकर आने की जरूरत क्या थी? मैं खुद आपके इलाके में आने वाला था। कर्पूरी ठाकुर गरीबों को नम्र भाव से ये बात समझाते। वे कहते हैं कि एक रात जब उनसे मिलकर चलने लगा। उन्होंने कहा कि छह बजे आ जाइएगा। सुबह कहीं चलना है। उन्होंने लिखा है कि वे अक्सर मुझे अपने साथ लेकर जाया करते थे।

अगले दिन ठीक छह बजे निहोरा तैयार होकर जननायक के आवास पर पहुंच जाते हैं। उसके बाद अपनी बाइक बंद कर जैसे ही खड़े होने का प्रयास करते हैं। कर्पूरी ठाकुर उन्हें आवाज देते हैं। निहोरा प्रसाद यादव कहते हैं कि मुख्यमंत्री उनसे कहते हैं कि- चलिए। उसके बाद वे अचरज भरी निगाह से दबी आवाज में जननायक कर्पूरी ठाकुर से प्रश्न करते हैं कि गाड़ी तो अभी आपकी आई नहीं। उसके बाद मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर कहते हैं कि आपकी मोटरसाइकिल से ही चलेंगे। निहोरा प्रसाद यादव अपने स्मरण में लिखते हैं कि इतना सुनने के बाद मेरा खून सुख गया। थोड़ी देर तक मैं शून्यता की स्थिति में चला गया। फिर उन्होंने आवाज दी। कहा- स्टार्ट करिए। निहोरा यादव ने कहा है कि बड़ी हिम्मत और साहस के साथ अपने आपको नियंत्रित करते हुए मैंने मोटरसाइकिल स्टार्ट की। बैठने के क्रम में पीछे लगे करियर से कर्पूरी ठाकुर के पैर छिल गये। मैंने अफसोस और दुख प्रकट किया। उन्होंने कहा कि मेरा कद छोटा है। इसलिए ऐसा हुआ। चलिए कोई बात नहीं। बैठने के बाद दोनों हाथ मेरे कंधो पर उन्होंने रख दिया और कहा कि बेली रोड चलिए। निहोरा प्रसाद यादव कहते हैं कि मैं उस समय अजीबो-गरीब स्थिति में था। जब सड़क से गुजरने वाले, पैदल हों या गाड़ी से या साइकिल से सभी लोग जननायक कर्पूरी ठाकुर को मोटरसाइकिल से देख रहे थे। सभी के चेहरे पर अविश्वास था।

लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था कि इतने बड़े राजनेता और बिहार के मुख्यमंत्री मोटरसाइकिल से सफर कर रहे हैं। यह नहीं हो सकता। आपस में तर्क-वितर्क सही गलत होने लगा। कईयों ने उंगली से इशारा कर बताना चाहा कि देखें कर्पूरी ठाकुर जी मोटरसाइकिल से जा रहे हैं। कईयों ने सिर झुकाकर अभिवादन किया। कईयों ने हाथ उठाकर प्रणाम किया। उसके बाद कर्पूरी ठाकुर ने निहोरा प्रसाद यादव को बताया कि कई दिनों से विदेश के कुछ पत्रकार मुझसे मिलने आए हैं। समय नहीं रहने के कारण उन्हें प्रेसिडेंट होटल में ठहरने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि मैंने पत्रकारों से वादा किया था कि सुबह छह बजे मैं स्वयं होटल में ही आकर बात करूंगा।

केंद्र की मोदी सरकार की ओर से कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने का ऐलान हुआ है। उस दौर में आम लोगों के करीबी रहे कर्पूरी ठाकुर के बारे में यादगार बातों को साझा करते हुए निहोरा प्रसाद यादव ने आगे लिखा है कि जैसे ही होटल के पास बाइक रुकी। होटल स्टाफ और कर्मचारी दौड़ कर आ गए। जब विदेशी पत्रकारों के समूह को इसकी जानकारी मिली। वे भी बाहर आए। उन्होंने कर्पूरी ठाकुर को देखते ही कहा- You are really a leader of downtrodden people. We have not seen any leader as you in the entire world. उन्होंने लिखा है कि उनका विशाल व्यक्तित्व एवं बड़े राजनेता होने का एहसास गरीबों की आवाज बनने में कभी और कहीं भी बाधक नहीं बना। यहीं कारण रहा कि वे आवाज को मजबूती प्रदान करने में साधन नहीं, अपने आपको साध्य मानकर आगे बढ़ते गए। लक्ष्य तक पहुंचने में रास्ता चाहे जैसा भी हो। उनकी तनिक भी परवाह नहीं की। न रात देखा और न दूरी देखी। न साधन देखा। न मुसीबत देखी। निर्भीक होकर सीना फैलाकर पैर अड़ाकर लड़ने और संघर्ष से तनिक भी नहीं रुके पूरी जिंदगी ही मानें गरीबों के अपना जीवन गिरवी रख दिया।

क्या वर्तमान में जननायकों को छीन कर बीजेपी दे रही है कांग्रेस को मात?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बीजेपी वर्तमान में जननायकों को छीन कर कांग्रेस को मात दे रही है या नहीं! जननायक कर्पूरी ठाकुर की जयंती से ठीक एक दिन पहले मोदी सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजने का मास्टर स्ट्रोक चला है। बिहार के दो बार मुख्यमंत्री रहे प्रखर समाजवादी नेता ठाकुर को गरीबों का मसीहा माना जाता है। उन्हें सामाजिक न्याय का चैंपियन माना जाता है। आरजेडी के लालू प्रसाद यादव, जेडीयू के नीतीश कुमार जैसे नेता लोहिया-जेपी की परंपरा के खांटी समाजवादी कर्पूरी ठाकुर की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने का दावा करते रहे हैं। लेकिन ‘भारत रत्न’ वाले दांव से एक झटके में बीजेपी ने कर्पूरी ठाकुर की राजनीतिक विरासत पर अपना मजबूत दावा ठोक दिया है। महात्मा गांधी, सरदार बल्लभ भाई पटेल, बीआर आंबेडकर, सुभाष चंद्र बोस, चौधरी चरण सिंह जैसे दिग्गजों के बाद अब बीजेपी ने विपक्ष से कर्पूरी ठाकुर की विरासत भी छीनने जा रही है। बीजेपी की रणनीति विपक्ष से उनके ही नायकों को छीनकर उसे निहत्था करने की है। कर्पूरी ठाकुर की सादगी और ईमानदारी के बारे में तमाम किवदंतियां प्रचलित हैं। उनकी कथनी और करनी में अंतर नहीं रहा। वह आरक्षण के जबरदस्त हिमायती थे। वह दो बार बिहार के मुख्यमंत्री रहे लेकिन दोनों मिलाकर उनका कुल कार्यकाल करीब ढाई वर्ष ही रहा। इतने अल्प कार्यकाल के बाद भी अगर उनकी सियासी विरासत के लिए जेडीयू, आरजेडी के साथ-साथ बीजेपी में होड़ मची हुई है तो उसकी वजह उनकी जननायक, गरीबों के मसीहा और सामाजिक न्याय के योद्धा की छवि ही है। केंद्र सरकार ने कर्पूरी ठाकुर को ‘भारत रत्न’ देने का ऐसे वक्त ऐलान किया है जब बिहार में कास्ट सेंसस की राजनीति चरम पर है। हालिया कास्ट सर्वे के मुताबिक, बिहार में सबसे अधिक 37 प्रतिशत आबादी अत्यंत पिछड़ा वर्ग की है। कर्पूरी ठाकुर नाई समुदाय से आते हैं जो अत्यंत पिछड़ा वर्ग का ही हिस्सा है। इस तरह मोदी सरकार ने उन्हें ‘भारत रत्न’ से नवाजकर अत्यंत पिछड़े वर्ग को साधने की कोशिश की है। कर्पूरी की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने का दावा करने वाले नीतीश कुमार या लालू प्रसाद यादव बीजेपी के इस दांव से भौचक्के हैं। बिहार के सीएम कुमार ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखे पोस्ट में कर्पूरी को भारत रत्न दिए जाने पर खुशी जताई लेकिन कहीं भी पीएम मोदी का जिक्र नहीं किया। हालांकि बाद में उन्होंने पोस्ट को डिलीट कर नया पोस्ट लिखा जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शुक्रिया कहा।

लालू प्रसाद यादव ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न तो बहुत पहले ही मिल जाना चाहिए था। उन्होंने इस फैसले के लिए मोदी सरकार की तारीफ के बजाय उसकी ये कहकर घेरेबंदी की कोशिश की कि उसने जातिगत जनगणना और आरक्षण का दायरा बढ़ने से डरकर ये फैसला लिया है। हालांकि, ये खुद का डर छिपाने के लिए विरोधी को डरा हुआ ठहराने की परंपरागत सियासी रणनीति का हिस्सा ज्यादा लगता है। इस बयान से साफ है कि लालू को भी कर्पूरी ठाकुर की विरासत के छिनने का डर सता रहा है। डॉक्टर मनमोहन सिंह की अगुआई में यूपीए की 10 साल तक चली सरकार के दौरान लालू प्रसाद यादव की तूती बोलती थी। सवाल तो उठेंगे ही केंद्र सरकार में रहते हुए उन्होंने कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न क्यों नहीं दिलवाया?

वैसे ये पहली बार नहीं है जब बीजेपी ने विपक्ष से उसके दिग्गज नेताओं की विरासत को छीनने की कोशिश की है। दिलचस्प बात ये है कि आज बीजेपी ने जिस कर्पूरी ठाकुर की विरासत पर कब्जे की कोशिश की है, 1979 में उनकी सरकार गिरने लिए उसी के पूर्ववर्ती जनसंघ को ही जिम्मेदार माना जाता है। अब बीजेपी समाजवादी दलों से उन्हीं कर्पूरी ठाकुर की विरासत को छीनने की जबरदस्त कवायद की है। इसी तरह कभी आरएसएस पर बैन लगाने वाले सरदार बल्लभ भाई पटेल को उसने कांग्रेस से एक तरह से छीन ही लिया है। पटेल ने ही आजादी के बाद 550 से ज्यादा रियासतों का भारत में विलय कराया था। 2014 में केंद्र में सरकार बनते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 जनवरी को पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के तौर पर मनाने का ऐलान किया। इतना ही नहीं, मोदी सरकार ने गुजरात के केवडिया में पटेल की विशाल मूर्ति लगवाई जिसे स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का नाम दिया गया। 182 मीटर ऊंचे स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के नाम दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति होने का नाम है।

पटेल की तरह ही बीजेपी ने विपक्ष से महात्मा गांधी और डॉक्टर बीआर आंबेडकर की विरासत को भी छीनने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। इसमें वह काफी हद तक सफल भी हुई है। विपक्षी दलों के महापुरुषों की विरासत पर कब्जे के जरिए पार्टी अपना वोट बैंक बढ़ाने की हर मुमकिन कोशिश करती रही है। बीजेपी दावा करती है कि इन महापुरुषों को हमेशा उपेक्षित रखा गया और वह उन्हें वाजिब सम्मान देने की कोशिश कर रही है। भगवान विरसा मुंडा, सावित्री बाई फुले, नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे महापुरुषों पर भी बीजेपी धीरे-धीरे अपना दावा करने में सफल रही है। मोदी सरकार ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती यानी 23 जनवरी को पराक्रम दिवस के तौर पर मनाने की शुरुआत की है। इंडिया गेट पर उनकी प्रतिमा लगी हुई है।

कांग्रेस के महापुरुषों की विरासत पर अगर बीजेपी धीरे-धीरे कब्जा करती जा रही है तो उसके लिए कहीं न कहीं ग्रैंड ओल्ड पार्टी ही जिम्मेदार है। पार्टी पर दशकों से गांधी-नेहरू परिवार के कब्जे का असर ये हुआ कि ग्रैंड ओल्ड पार्टी इस परिवार से इतर देखना ही छोड़ दी। उनके लिए महापुरुष का मतलब ही रह गया- नेहरू, इंदिरा, राजीव। उनसे इतर सिर्फ महात्मा गांधी। केंद्र या राज्य की सत्ता में रहते कोई योजना शुरू करनी हो या संस्थान, उनका नाम गांधी-नेहरू परिवार से इतर सोचना भी मुश्किल। इसी का फायदा बीजेपी ने उठाया। देश अगर आज वैश्विक आर्थिक ताकत के तौर पर उभरा है तो इसकी बुनियाद आर्थिक उदारीकरण में है जिसकी शुरुआत पीवी नरसिम्हा राव ने की थी। लेकिन कांग्रेस अपने ही दिग्गज नेता को वो सम्मान नहीं देती, जिसके वे हकदार थे। उनकी मौत के बाद पार्थिव शरीर को कांग्रेस मुख्यालय में आने तक नहीं दिया गया था। न ही उनकी समाधि के लिए दिल्ली में जगह मिल पाई। लेकिन मोदी सरकार जब पीएम मेमोरियल बनाती है तो उसमें राव और उनके कामकाज को भी जगह मिलती है। इसी तरह नरेंद्र मोदी सरकार ने कांग्रेस के ही दिग्गज नेता और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न का दांव खेला था। इसके जरिए बीजेपी ने ये भी संदेश देने की कोशिश की कि महापुरुषों के सम्मान को वह राजनीतिक विचारधारा के आधार पर नहीं तौलती।

पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को किसानों का मसीहा कहा जाता है लेकिन बीजेपी धीरे-धीरे उनकी विरासत को भी अपना बनाने में कामयाब होती दिख रही है। पिछले महीने पार्टी ने उनकी जयंती को धूमधाम से मनाया। उनकी जयंती पर यूपी के मुरादाबाद में सीएम योगी आदित्यनाथ ने पूर्व प्रधानमंत्री की 51 फीट ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया। योगी सरकार पहले ही चरण सिंह जयंती को किसान दिवस घोषित कर रखी है और उस दिन अवकाश रखा है। बीजेपी का चौधरी चरण सिंह प्रेम पश्चिमी यूपी और हरियाणा में प्रभावशाली जाट वोटों को लुभाने की ही एक बड़ी कवायद है।

क्या बीजेपी ने कांग्रेस को कर दिया है निहत्था?

वर्तमान में बीजेपी ने कांग्रेस को निहत्था कर दिया है! अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह में विपक्षी गठबंधन इंडिया की ओर से एक भी नेता शामिल नहीं हुए। निमंत्रण मिलने के बाद भी कांग्रेस, सपा, जेडी यू, आरजेडी, एनसीपी, शिवसेना और टीएमसी ने समारोह का बहिष्कार किया। डीएमके नेता स्टालिन के बेटे उदयनिधि ने राम मंदिर को लेकर विवादित बयान भी दिए। तमिलनाडु में प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के लाइव टेलिकास्ट पर विवाद भी हुआ। मगर 22 जनवरी को पूरे देश में खासकर हिंदी पट्टी में जो माहौल बना है, उसकी तुलना राम लहर से की जा रही है। राम नाम का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है। सोशल मीडिया में रामलला के विग्रह ट्रेंड कर रहे हैं। गांव-गलियों में अयोध्या और राम छाए हुए हैं। माना जा रहा है कि राम लहर का असर अप्रैल में होने लोकसभा चुनाव में भी दिखेगा। जाति के सहारे लोकसभा चुनाव की नैया पार करने की प्लानिंग कर रहे विपक्षी गठबंधन को अब राम लहर पार्ट-2 से जूझना होगा। 1991 में भी राम लहर राज्यों में जाति की राजनीति को छका चुका है। कम से कम हिंदी पट्टी में राम लहर की अनदेखी नहीं की जा सकती है, जहां 290 लोकसभा सीटें हैं। 22 जनवरी को जब पीएम नरेंद्र मोदी अयोध्या में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा कर रहे थे, तब विपक्ष के अधिकतर नेता खामोश थे। इंडिया गठबंधन के तीन नेता इस धार्मिक उत्सव के मौके पर एक्टिव दिखे। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ सुंदरकांड का पाठ किया। ममता बनर्जी कोलकाता में सभी धर्मगुरुओं के साथ सद्भाव यात्रा निकाली। उद्धव ठाकरे नासिक के उस राम मंदिर में गए, जहां पीएम मोदी अपने 11 दिवसीय व्रत के शुरुआत में पहुंचे थे। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी असम में न्याय यात्रा पर थे। शंकरदेव मंदिर में एंट्री नहीं मिलने पर वह हैबोरगांव में धरने पर बैठे रहे। अखिलेश यादव, नीतीश कुमार, लालू यादव और शरद पवार जैसे दिग्गजों ने क्या किया, इसकी डिटेल मीडिया में नहीं आई। एक्सपर्ट मानते हैं कि राम मंदिर जैसे आयोजनों से दूरी बनाकर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने चुनाव से पहले बड़ी चूक कर दी है, जिसकी भरपाई करना मुश्किल है। प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा, टीडीपी प्रमुख एन. चंद्राबाबू नायडू और जनसेना के नेता पवन कल्याण समेत आए फिल्मी सितारे, क्रिकेटर समेत तमाम सेलिब्रेटी मौजूद रहे। अनिल अंबानी, मुकेश अंबानी, अमिताभ बच्चन, रजनीकांत समेत सभी फिल्म स्टार घंटों राम मंदिर प्रांगण में बैठे रहे, जबकि ये सारे अपने-अपने क्षेत्रों में व्यस्त माने जाते हैं। आम दिनों में इनकी झलक के लिए लोग तरस जाते हैं। मीडिया से बातचीत में इन सेलिब्रेटिज इसे सौभाग्य का अवसर माना। ऐसे में विपक्षी दलों की नेताओं की गैरमौजूदगी पर भी खूब चर्चा हुई। लोकसभा चुनाव में जब बीजेपी राम मंदिर का क्रेडिट लेगी तो विपक्ष की गैरहाजिरी को मुद्दा बनाएगी, यह भी तय है।

नवंबर-दिसंबर में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी की गारंटी का जादू चला। राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह ने नरेंद्र मोदी की गारंटी को और मजबूत दिया है। इससे पहले नरेंद्र मोदी की अपील पर कोरोना के दौरान लोगों ने थालियां बजाई थीं। दीये भी जलाए थे। इसकी काफी आलोचना भी हुई, मगर राम मंदिर के नाम पर फिर लोगों ने सोमवार शाम को दिवाली मनाई। इसके साथ ही 2024 में मंडल बनाम कमंडल करने की विपक्ष के प्लान को भी बड़ा झटका लगा है। इंडिया गठबंधन बनने के बाद से ही कांग्रेस, जेडी यू और आरजेडी जैसे राजनीतिक दल जातीय जनगणना को तुरुप का इक्का मान रहे थे। बिहार में नीतीश कुमार ने जातीय जनगणना की रिपोर्ट जारी करने के बाद ओबीसी आरक्षण की सीमा भी बढ़ा दी। कांग्रेस शासित राज्यों में भी राहुल गांधी ने जातीय जनगणना कराने का वादा किया। अब राम लहर पार्ट-2 में जाति वाला दांव कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। जिन युवाओं को 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की राम रथयात्रा, राम मंदिर आंदोलन और 1992 में बाबरी विध्वंस को जानने का मौका नहीं मिला, वे नए वोटर राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के साक्षी बने। इससे उलट इन युवाओं को मंडल कमिशन लागू होने के बाद हुए आरक्षण आंदोलन की भनक तक नहीं है।

1989 के भारतीय आम चुनाव में बीजेपी को 85 सीटें मिली थीं। उसका वोट प्रतिशत 7.74 प्रतिशत से बढ़कर 11.36 फीसदी हो गया। वी पी सिंह की सरकार बनी। बीजेपी ने सरकार को बाहर से समर्थन दिया। 1990 में वी पी सिंह ने मंडल कमिशन की रिपोर्ट लागू करने की घोषणा कर दी। सारे देश में आरक्षण के समर्थन और विरोध में आंदोलन शुरू हो गया। तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 26 अगस्त, 1990 को बैठक बुलाई और राम मंदिर आंदोलन को तेज करने का फैसला किया। 25 सितंबर 1990 को लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथयात्रा निकाली। बिहार में लालू यादव की सरकार ने लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया। बीजेपी ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। फिर समाजवादी नेता चंद्रशेखर ने कांग्रेस के समर्थन से चार महीने की सरकार चलाई। मई-जून 1991 में मध्यावधि चुनाव हुए। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 120 सीटें जीतीं और उसे कुल 20.07 फीसदी वोट मिले। मंडल कमिशन लागू करने वाले जनता दल 59 सीटों पर सिमट गई। जनता दल का वोट प्रतिशत 17.79 से खिसककर 11.73 प्रतिशत हो गया। 20 मई 1991 को पहले चरण की वोटिंग हुई। 21 मई 1991 को राजीव गांधी की श्रीपेरम्बदूर में हत्या हो गई और कांग्रेस के पक्ष में सहानुभूति की लहर चल पड़ी। अगर राजीव गांधी की हत्या नहीं हुई होती तो लोकसभा चुनाव के नतीजे अलग ही होते।

लोकसभा चुनाव से पहले कैसा होगा देश का बजट?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि लोकसभा चुनाव से पहले देश का बजट कैसा होगा! नरेंद्र मोदी सरकार अपने दूसरे कार्यकाल के अंतिम चरण में है। सरकार इस कार्यकाल का आखिरी बजट 1 फरवरी को पेश करेगी। अयोध्या राम मंदिर में राललला की प्राण-प्रतिष्ठा से पूरे देश में जोश और जज्बे की नई लहर है जिसके दम पर बीजेपी लोकसभा चुनावों में रिकॉर्ड जीत दर्ज करने की उम्मीद कर रही है। हालांकि, बीजेपी सिर्फ राम मंदिर के भरोसे लोकसभा चुनावों में जाने के पक्ष में नहीं है। वैसे भी इस बार बीजेपी अपना वोटर बेस में बड़ी वृद्धि करने की रणनीति पर गंभीरता से आगे बढ़ रही है। इस उद्देश्य को हासिल करने की दिशा में पार्टी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती है। इस वजह से उम्मीद की जा रही है कि मोदी सरकार इस बार के बजट के जरिए और इससे इतर भी कुछ लोकलुभावन कदम उठा सकती है। हम यहां उन संभावित फैसलों की चर्चा कर रहे हैं जिनको लेकर अटकलें लग रही हैं कि मोदी सरकार आम लोगों को चुनावी तोहफा दे सकती है! नौकरी-पेशा वर्ग का बड़ा तबका बीजेपी समर्थक है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले 2023-24 के बजट में सिर्फ यह कहा था कि टैक्स की नई व्यवस्था के तहत 7 लाख रुपये तक की सालाना आमदनी वालों को टैक्स से पूरी तरह छूट मिलेगी। वित्त वर्ष 2022-23 में नई टैक्स रिजीम पेश की गई तब टैक्स छूट की सालाना आय की सीमा 5 लाख रुपये तय की गई थी। वहीं, पुराने टैक्स स्लैब में 10 लाख रुपये से ही ज्यादा की इनकम पर 30% टैक्स लागू है जो अधिकतम दर है। पुराने टैक्स रिजीम में वित्त वर्ष 2017-18 में ही आखिरी बदलाव हुआ जब वित्त मंत्री अरुण जेटली थे। उन्होंने अरुण जेटली ने 2.5 लाख से 5 लाख रुपये तक की सालाना आमदनी पर टैक्स 10 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया था। साथ ही आयकर कानून, 1961 के सेक्शन 87ए के तहत टैक्स छूट की सीमा को 3.5 लाख तक की सालाना आय वालों पर लागू कर दिया। इसके तहत 3.5 लाख तक की सालाना आय वालों को टैक्स में 2.5 हजार रुपये की छूट दे दी गई। इस कारण 3 लाख रुपये तक की सालान इनकम वाले पूरी तरह टैक्स मुक्त हो गए जबकि 3.5 लाख तक की सालाना आमदनी पर टैक्स की रकम 5 हजार रुपये से घटकर 2,500 रुपये रह गई। उम्मीद की जा रही है कि लंबे समय के इंतजार के बाद मोदी सरकार ओल्ड टैक्स रिजीम में भी टैक्स छूट की सीमा साला 5 लाख रुपये से बढ़ाएगी।

मोदी सरकार के पास पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कटौती का बढ़िया मौका है। इंडियन ऑइल, हिंदुस्तान पावर, भारत पेट्रोलियम जैसी सरकारी कंपनियां अभी प्रति लीटर पेट्रोल पर 11 रुपये जबकि प्रति लीटर डीजल पर 6 रुपये का मोटा मुनाफा कमा रही हैं। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी आईसीआरए (ICRA) ने मंगलवार की रिपोर्ट में बताया कि सितंबर 2023 से ही कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेज गिरावट आई है। इस बीच सरकारी ऑइल मार्केटिंग कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में एक बार भी कटौती नहीं की है। पिछली बार मोदी सरकार ने 22 मई, 2022 को पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में क्रमशः आठ रुपये और छह रुपये की कमी थी।

वित्त मंत्री निर्मला सीतरमण अंतरिम बजट में फ्लैट खरीदारों के लिए राहत की घोषणा कर सकती है। दरअसल, रियल एस्टेट डेवलपर्स’ एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने आगामी बजट के लिए अपनी विश लिस्ट में सरकार से होम लोन के मूलधन और ब्याज पर टैक्स छूट की सीमा बढ़ाने की मांग की है। इसका उद्देश्य आवासीय संपत्तियों की मांग को बढ़ावा देना है। क्रेडाई ने किफायती घर की परिभाषा में संशोधन की भी वकालत की है। अपने बजट पूर्व सिफारिशों के हिस्से के रूप में क्रेडाई ने हाउसिंग लोन पर ब्याज के भुगतान पर आयकर की धारा 80सी टैक्स छूट बढ़ाने का प्रस्ताव दिया है, जो अभी 1.5 लाख रुपये तक सीमित है। एक विकल्प के रूप में क्रेडाई ने हाउसिंग लोन के इंट्रेस्ट पेमेंट पर एकमुश्त रकम की छूट का प्रस्ताव रखा है। इसके अलावा, क्रेडाई ने इस बात पर जोर डाला है कि 2017 में 45 लाख रुपये निर्धारित अफोर्डेबल हाउसिंग की परिभाषा में कोई बदलाव नहीं हुआ है और यह रकम बढ़ाई जाए।

विपक्ष मोदी सरकार पर ‘रोजगार विहीन विकास’ के ढर्रे पर चलने का आरोप लगाता है। लोकसभा चुनावों में विपक्ष के इन आरोपों को ताकत न मिल जाए, इसकी चिंता सरकार को भी सता रही होगी। आंकड़ों के मुताबिक, हर साल 10 लाख से ज्यादा युवा देश के वर्कफोर्स में शामिल होते हैं। इनके लिए रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं बनेंगे तो भारत को बड़ी युवा आबादी से संभावित फायदे की राह कठिन हो जाएगी। इसलिए उम्मीद की जा रही है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ग्रामीण क्षेत्रों में इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए बजट आवंटन बढ़ा सकती हैं। वहीं, सेवाओं और रसायनों जैसे उद्योगों को शामिल करने के लिए उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन पीएलआई कार्यक्रमों के दायरे को व्यापक बनाने के लिए कुछ प्रोत्साहन की घोषणा भी की जा सकती है।

सरकार नेशनल पेंशन स्कीम को और आकर्षक बनाने के लिए जमा और निकासी पर टैक्स छूट बढ़ा सकती है, खासकर 75 साल से ऊपर के बुजुर्गों के लिए। उधर, पेंशन फंड नियामक पीएफआरडीए ने कर्मचारी भविष्य निधि कार्यालय ईपीएफओ से कहा है कि वह एंप्लॉयर के योगदान पर टैक्स के मामले में ‘समानता’ लाए। अभी कर्मचारियों के लिए फंड के निर्माण में एंप्लॉयर के अंशदान में असमानता है। इसमें मूल वेतन और महंगाई भत्ते के 10 प्रतिशत तक के कंपनी के अंशदान को एनपीएस के मामले में टैक्स से छूट दी गई है, जबकि ईपीएफओ के मामले में यह अंशदान सीमा 12 प्रतिशत है। यानी, ईपीएफओ से कहा गया है कि वो पेंशन फंड में एंप्लॉयर के योगदान के लिए टैक्स छूट की सीमा 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 12 प्रतिशत करे। वहीं, केंद्र सरकार सरकार के कर्मियों के लिए यह सीमा 14 प्रतिशत है। उम्मीद की जा रही है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इस संबंध में कुछ घोषणाएं अंतरिम बजट में कर सकती हैं। दरअसल, सरकार को टैक्स से ज्यादा कमाई होने की उम्मीद है। इस कारण उसके खजाने में इतने पैसे होंगे कि मिडल क्लास के नौकरी-पेशा तबके को राहत देने और कल्याणकारी योजनाओं पर ज्यादा खर्च कर सके। समाचार एजेंसी पीटीआई ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि इस वित्तीय वर्ष में इनकम टैक्स और कॉर्पोरेट टैक्स का कलेक्शन अच्छा रहा है। डायरेक्ट टैक्स का कुल कलेक्शन बजट अनुमान से करीब 1 लाख करोड़ रुपये ज्यादा रहने की उम्मीद है। इस बढ़े हुए फंड का इस्तेमाल मनरेगा (मनरेगा), स्कूल के मिड-डे मील जैसे पोषण कार्यक्रमों और पेंशन योजनाओं जैसे बुनियादी जरूरतों को पूरा करने पर होने वाला है। सरकार आयुष्मान भारत जैसी मौजूदा स्वास्थ्य और शिक्षा योजनाओं के लिए फंडिंग को भी जारी रखेगी। दूसरी तरफ, सरकार इनकम टैक्स और होम लोन पर राहत देकर लोकसभा चुनाव से पहले बड़ा दांव चल सकती है।

क्या पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देना बीजेपी का बड़ा प्लान है?

पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देना बीजेपी का बड़ा प्लान साबित हो सकता है! बिहार के बड़े नेता कर्पूरी ठाकुर की जयंती के 100 साल पूरा होने के ठीक एक दिन पहले नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में केंद्र सरकार ने उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न देकर चौंका दिया। इस एक फैसले से आम चुनाव से पहले दिल्ली से लेकर पटना तक राजनीति तेज हो गई। भारत रत्न के ऐलान के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने X पर कहा, ‘मुझे इस बात की बहुत प्रसन्नता हो रही है कि भारत सरकार ने समाजिक न्याय के पुरोधा महान जननायक कर्पूरी ठाकुर जी को भारत रत्न से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। उनकी जन्म-शताब्दी के अवसर पर यह निर्णय देशवासियों को गौरवान्वित करने वाला है। पिछड़ों और वंचितों के उत्थान के लिए कर्पूरी जी की अटूट प्रतिबद्धता और दूरदर्शी नेतृत्व ने भारत के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य पर अमिट छाप छोड़ी है। यह भारत रत्न न केवल उनके अतुलनीय योगदान का विनम्र सम्मान है, बल्कि इससे समाज में समरसता को और बढ़ावा मिलेगा।’ वहीं, बिहार के CM नीतीश कुमार ने कहा कि कर्पूरी ठाकुर जी को देश का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न दिया जाना हार्दिक प्रसन्नता का विषय है। केंद्र सरकार का यह अच्छा निर्णय है। यह सम्मान दलितों, वंचितों और उपेक्षित तबकों के बीच सकारात्मक भाव पैदा करेगा। हम हमेशा से ही उन्हें भारत रत्न देने की मांग करते रहे हैं। वर्षों की पुरानी मांग आज पूरी हुई है।

पिछले कुछ दिनों से बिहार में पिछड़े की राजनीति जोरों पर है। बीजेपी के हिंदुत्व और राम मंदिर फैक्टर से मुकाबले के लिए नीतीश कुमार ने बिहार में जाति जगनणना का कार्ड खेला। महागठबंधन सरकार ने न सिर्फ जाति जनगणना के आंकड़े जारी किए बल्कि इसके बाद पिछड़ों के लिए आरक्षण की सीमा भी बढ़ाई। वहीं, बुधवार को जेडीयू की रैली में कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न दिए जाने की मांग भी अजेंडे में था। बीजेपी को पता था कि आरजेडी के मुस्लिम और यादव वोट समीकरण और साथ में नीतीश कुमार के पिछड़े वोट के सियासी गणित को हराना इतना आसान नहीं है। ऐसे में कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने के साथ ही बीजेपी ने पिछड़ों की राजनीति और नीतीश के वोट में सेंध लगाने की कोशिश है। सरकारी सूत्रों ने कहा कि कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देकर सामाजिक न्याय को बड़ी मान्यता दी गई है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों से बिहार की तमाम राजनीतिक दलों ने कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने की मांग भी की है।

कर्पूरी ठाकुर के बहाने बीजेपी बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश और सटे राज्यों में भी बड़ा अभियान शुरू कर सकती है। पहले भी नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी ने विपक्ष के प्रतीकों को अपने पाले में करने की सफल राजनीति की है। ऐसे में बीजेपी ने एक फैसले से दो शिकार किए हैं और मंडल-कमंडल दोनों कार्ड को अपने पाले में करने की कोशिश की है। केंद्र के फैसले पर जेडीयू वरिष्ठ नेता और पार्टी की राजनीतिक सलाहकार के. सी. त्यागी ने कहा कि जेडीयू हमेशा से कर्पूरी को जननायक माना है। पार्टी उन्हें अपने आदर्शों में शामिल रखती है। ऐसे में अगर भारत रत्न मिलता है तो इससे उन्हें खुशी होती है और इसमें राजनीति नहीं देखी जानी चाहिए। फैसले का स्वागत आरजेडी ने भी किया। आरजेडी सांसद मनोज झा ने इसके लिए नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव को क्रेडिट दिया। उन्होंने कहा, ‘पूरे अंचल के सामाजिक न्याय के प्रणेता स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर को मरणोपरांत भारत रत्न देने के लिए बाध्य सत्ता को बहुजन सरोकारों का उभार समझ में आया। इसके लिए नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव को बधाई। पहले जातिगत जनगणना और फिर आरक्षण का दायरा बढ़ाना डरा गया उन्हें।’

कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देकर क्या यह नीतीश कुमार को आम चुनाव से पहले बीजेपी का सियासी संदेश है? कुछ दिन पहले गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि एनडीए से गए अगर कोई पुराने सहयोगी वापस आना चाहते हैं तो उनका स्वागत है। तभी से आम चुनाव से पहले बिहार में सियासी सस्पेंस जारी था। कहा गया कि नीतीश कुमार I.N.D.I.A. गठबंधन से लेकर कई मुद्दों पर असहज है। यह भी कहा गया कि वह लोकसभा के साथ राज्य में अपनी अगुआई में विधानसभा चुनाव भी चाहते हैं। इन्हीं अटकलों के बीच उन्होंने एनडीए संयोजक का पद भी ठुकराया। ऐसे में बीजेपी का कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देना कहीं न कहीं बीजेपी-जेडीयू के बीच न सिर्फ तल्खी को कम कर सकती है बल्कि संवाद का पुल भी बना सकती है। ऐसे में बुधवार को पटना में होने वाली नीतीश कुमार की रैली पर सबकी नजर रहेगी कि वहां नीतीश क्या बोलते हैं।

जानिए इस बार के गणतंत्र दिवस की खास बातें!

आज हम आपको इस बार के गणतंत्र दिवस की कुछ खास बातें बताने जा रहे हैं! गणतंत्र दिवस परेड में इस बार पहली बार भारत की नारी शक्ति पूरे कर्तव्य पथ पर छाई रहेगी। परेड में 80 फीसदी महिलाएं होंगी। ऐसा पहली बार है जब बड़ी संख्या में ऑल विमिन दस्ते मार्च करेंगे। भारतीय सेना की आर्टिलरी महिला ऑफिसर भी पहली बार कर्तव्य पथ पर दिखाई देंगी। साथ ही सेना की मिडियम रेंज सर्फेस टू एयर मिसाइल भी पहली बार गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होगी। फ्रांस का मार्चिंग दस्ता भी परेड का हिस्सा होगा और फ्रांसीसी फाइटर जेट राफेल भी उड़ान भरेंगे।सेना के दिल्ली एरिया के चीफ ऑफ स्टाफ मेजर जनरल सुमित मेहता ने बताया कि परेड में 80 फीसदी महिलाएं होंगी। पहली बार ट्राई सर्विस दस्ता यानी आर्मी, नेवी और एयरफोर्स की महिलाओं का दस्ता भी कर्तव्य पथ पर मार्च करेगा। इसमें आर्मी की सीएमपी की महिलाएं और नेवी और एयरफोर्स की महिला अग्निवीर होंगी, जिसे इंडियन आर्मी की ऑफिसर लीड करेंगी। CAPF का भी ऑल विमिन दस्ता है और BSF के ऊंट पर सवार दस्ते में महिलाएं भी होंगी। परेड की शुरुआत भी महिलाएं भारतीय वाद्य यंत्रों के साथ करेंगी।

फ्रांस का फॉरेन लीजन का मार्चिंग दस्ता भी परेड में शामिल होगा। मेजर जनरल सुमित मेहता ने बताया कि परमवीर और अशोक चक्र विजेताओं के पीछे फ्रांस का मार्चिंग दस्ता होगा। जब फ्रांस का दस्ता मार्च कर रहा होगा तो उसके साथ ही आसमान पर फ्रांस के दो राफेल फाइटर जेट और मल्टी रोल ट्रांसपोर्ट टैंकर उड़ान भरेंगे। यह ट्रांसपोर्ट टैंकर एक बार में दो फाइटर जेट को रीफ्यूल कर सकता है। फ्रांस के राफेल जेट अपने बेस से उड़ान भरकर आएंगे और फिर लौट जाएंगे।परेड में पहली बार भारतीय सेना का MRSAM मिडियम रेंज सर्फेस टू एयर मिसाइल सिस्टम दिखेगा। इसे लीड करेंगी भारतीय सेना की लेफ्टिनेंट सुमेधा तिवारी। लेफ्टिनेंट तिवारी ने बताया कि इस मिसाइल की खासियत यह है कि यह दुश्मन के ड्रोन, फाइटर जेट, क्रूज मिसाइल को लॉन्ग रेंज में ही इंगेज कर उन्हें नष्ट करता है। यह हमारे क्रिटिकल असेस्ट्स को एरिया एयर डिफेंस देता है। मल्टी फंक्शनल रेडार भी कर्तव्य पथ पर दिखाई देगा। ये अडवांस रेडार है जो MRSAM सिस्टम को पूरे एरिया की जानकारी देता है। इसकी रेंज करीब 300 किलोमीटर है। MRSAM लॉन्चर से सुपरसोनिक मिसाइल को लॉन्च करते हैं।

भारतीय सेना की आर्टिलरी महिला ऑफिसर भी पहली बार परेड में शिरकत करेंगी। पिछले साल से ही सेना ने अपनी आर्टिलरी आर्म को महिला ऑफिसर्स के लिए खोला है। पिछले साल अप्रैल में 5 महिला ऑफिसर आर्टिलरी में शामिल हुई और पांच महिला ऑफिसर सितंबर में आर्टिलरी का हिस्सा बनीं। भारतीय सेना में इंफ्रेंट्री के बाद सबसे बड़ी आर्म आर्टिलरी ही है। आजादी के बाद कई जंग में आर्टिलरी रेजिमेंट ने अपना लोहा मनवाया है। युद्ध के मैदान में आर्टिलरी को गेम चेंजर कहा जाता है।

फ्रांस के साथ भारत की सामरिक और राजनयिक दोस्ती लगातार मजबूत हो रही है और गणतंत्र दिवस समारोह इसका गवाह रहा है। भारतीय नौसेना को फ्रांस से जल्द ही राफेल-एम फाइटर जेट मिलने हैं और तीन स्कॉर्पीन सबमरीन भी मिलनी हैं। इस बार फ्रांस के राष्ट्रपति गणतंत्र दिवस परेड के मुख्य अतिथि हैं। बताया कि परेड में 80 फीसदी महिलाएं होंगी। पहली बार ट्राई सर्विस दस्ता यानी आर्मी, नेवी और एयरफोर्स की महिलाओं का दस्ता भी कर्तव्य पथ पर मार्च करेगा। इसमें आर्मी की सीएमपी की महिलाएं और नेवी और एयरफोर्स की महिला अग्निवीर होंगी, जिसे इंडियन आर्मी की ऑफिसर लीड करेंगी। CAPF का भी ऑल विमिन दस्ता है और BSF के ऊंट पर सवार दस्ते में महिलाएं भी होंगी। परेड की शुरुआत भी महिलाएं भारतीय वाद्य यंत्रों के साथ करेंगी।यह छठी बार है जब फ्रांस के राष्ट्रपति गणतंत्र दिवस परेड में अतिथि हैं। पिछले साल अप्रैल में 5 महिला ऑफिसर आर्टिलरी में शामिल हुई और पांच महिला ऑफिसर सितंबर में आर्टिलरी का हिस्सा बनीं। भारतीय सेना में इंफ्रेंट्री के बाद सबसे बड़ी आर्म आर्टिलरी ही है। आजादी के बाद कई जंग में आर्टिलरी रेजिमेंट ने अपना लोहा मनवाया है। युद्ध के मैदान में आर्टिलरी को गेम चेंजर कहा जाता है।फ्रांस इकलौता ऐसा देश हैं जिसके राष्ट्रपति सबसे ज्यादा बार भारत के गणतंत्र दिवस परेड में मुख्य अतिथि के तौर पर आए हैं। 2016 में भी फ्रांस के राष्ट्रपति मुख्य अतिथि थे और तब भी फ्रांस का मार्चिंग दस्ता परेड में शामिल हुआ था।