Thursday, March 5, 2026
Home Blog Page 759

जानिए राजकुमारी कॉल और अटल बिहारी वाजपेई की कहानी!

आज हम आपको राजकुमारी कॉल और अटल बिहारी वाजपेई की कहानी सुनाने जा रहे हैं! अभिनेता पंकज त्रिपाठी की फिल्म ‘मैं अटल हूं’ इन दिनों खूब चर्चा में हैं। देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जीवनी पर आधारित इस फिल्म में पूर्व पीएम के संघर्ष से लेकर उनके प्यार का जिक्र है। पूर्व पीएम वाजपेयी और राजुकमारी कौल के बीच प्यार के किस्से एक खुली किताब है। इस प्यार को दोनों ने कोई नाम तो नहीं दिया लेकिन ये किसी से छिपा भी नहीं था। मशहूर पत्रकार कुलदीप नैयर ने इसे एक महान ‘प्रेम कहानी’ बताया था। मैं अटल हूं फिल्म में भी अटल के इस प्यार के किस्से को दर्शाया गया है। दरअसल, अटल ने कभी इस अफसाने को कभी छुपाया नहीं। इस किस्से की शुरुआत 1940 के दशक के मध्य में शुरू हुई थी। उस दौरान लड़के-लड़की में बातचीत तो कभी कभार ही होती थी। आंखों से इशारे जरूर हो जाते थे, वो भी किसी-किसी के बीच। इसी दौरान ग्वालियर के एक कॉलेज में राजुकमारी कौल के लिए युवा अटल बिहारी वाजपेयी ने एक किताब में लव लेटर रखा था। लेकिन अटल को कभी उस पत्र का जवाब नहीं मिला। हालांकि, ऐसा नहीं था कि राजुकमारी कौल ने जवाब नहीं दिया था, उन्होंने जवाब दिया था लेकिन वो जवाब और वो किताब कभी अटल के पास पहुंच ही नहीं पाई। बाद में सरकारी अधिकारी रहे राजुकमारी कौल के पिता ने अपनी बेटी की शादी कॉलेज के टीचर रहे ब्रिज नारायण कौल से कर दी।

राजुकमारी कौल के करीबी दोस्त और कारोबारी संजय कौल ने बताया था कि राजकुमारी कौल अटल से शादी करना चाहती थीं लेकिन उनके घर वाले तैयार नहीं हुए। कौल खुद को श्रेष्ठ बताते थे। हालांकि, अटल बिहारी वाजपेयी भी ब्राह्मण थे लेकिन कौल खुद को उनसे ऊपर मानते थे। मशहूर पत्रकार कुलदीप नैयर ने अटल और राजुकमारी कौल को करीब से देखा था। वो इसे एक खूबसूरत कहानी बताते थे। उस वक्त हर किसी को पता था कि मिसेज कौल अटल के लिए सबसे प्रिय थीं। नैयर ने एक अखबार में लिखा था कि राजकुमारी कौल अटल बिहारी के लिए सबकुछ थीं। उन्होंने अटल की खूब सेवा की थी। वो अपने मरते दम तक अटल के साथ रहीं। 2014 में उनका हार्ट अटैक से निधन हो गया था।

मशहूर पत्रकार गिरीश निकम ने राजकुमारी कौल के बारे में एक किस्सा बताया था। उन्होंने बताया था कि कैसे अटल के घर पर फोन करने के बाद मिसेज कौल उसे उठाती थीं। फोन उठाते ही वह कहती थीं मिसेज कौल बोल रही हूं। शुरू में वह निकम से पूछ बैठी थीं कि आपको पता है मैं कौन हूं? इसपर निकम ने कहा था नहीं मैम। इसके बाद मिसेज कौल ने जवाब दिया था मैं मिसेज कौल, राजकुमारी कौल हूं। वाजपेयी जी और मैं लंबे समय करीब 40 साल से दोस्त रहे हैं। आपको ये नहीं पता? इसके बाद निकम ने सकुचाते हुए कहा, ओह मैं माफी चाहता हूं, मुझे पता नहीं था। इसके बाद राजुकमारी कौल जोर से हंसती हैं और बताती हैं कि कैसे अटल बिहारी उनके और उनके पति के साथ इन सालों में रहे।

मिसेज कौल ने 1980 में एक प्रेस को इंटरव्यू दिया था। एक महिला पत्रिका को दिए इंटरव्यू में जब उनसे उनके और अटल के बारे में पूछा, तो मिसेज कौल ने जवाब दिया कि अटलजी और उन्होंने कभी भी श्री कौल से माफी मांगने की जरूरत नहीं महसूस की। उन्होंने कहा कि उनके पति के साथ उनका रिश्ता इतना मजबूत था कि ऐसी जरूरत ही नहीं पड़ी। हालांकि, अटल और राजकुमारी कौल की शादी तो नहीं हुई लेकिन वो दोनों काफी वक्त एकसाथ रहे। राजकुमारी कौल की शादी होने के बाद अटल सियासी दुनिया में मशगूल हो गए। इन दोनों की मुलाकात करीब डेढ़ दशक बाद फिर हुई जब अटल संसद के सदस्य बन चुके थे। इस दौरान राजकुमारी कौल अपने पति के साथ दिल्ली आ गई थीं। उनके पति उस वक्त दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज में प्रोफेसर बन गए थे। फिर मिस्टर कौल इसी कॉलेज के हॉस्टल के वार्डन बन गए।

2014 में जब मिसेज कॉल का निधन हो गया तो उस दौरान बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज उनके अंतिम संस्कार में मौजूद रहे थे। यहीं नहीं, ज्योतिरादित्य सिंधिया भी मिसेज कौल के अंतिम संस्कार में पहुंचे थे। अटल और राजुकमारी कौल ने जीते जी कभी भी अपने रिश्ते को कोई नाम नहीं दिया। उनकी करीबी के चर्चे जरूर होते थे लेकिन कभी ये सियासी मसला नहीं बना। अटल जब प्रधानमंत्री बने तो उनके आधिकारिक दौरों में मिसेज कौल का नाम प्रोटोकॉल में नहीं होता था। यानी अटल हरबार अकेले ही विदेशी दौरे पर जाते थे। लेकिन कहा जाता है कि इन दौरों में भी मिसेज कौल की मौजूदगी हमेशा रही। अटल ने मिसेज कौल की दोनों पुत्रियों नमिता और नम्रता के एडॉप्ट कर लिया था। नमिता की शादी रंजन भट्टाचार्य से हुई थी। मिसेज कौल की दूसरी बेटी नम्रता डॉक्टर थीं और वह न्यूयॉर्क में रहती हैं।

बिलकिस बानो के आरोपियों को वापस कब भेजा जाएगा जेल?

यह सवाल उठना लाजिमी है की बिलकिस बानो के आरोपियों को जेल वापस कब भेजा जाएगा! बिलकिस बानो रेप और उनके परिजनों की हत्या मामले में दोषियों को सरेंडर करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद तीन दोषियों ने अर्जी दाखिल कर कहा है कि उन्हें सरेंडर करने के लिए वक्त दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने अर्जी पर सुनवाई के लिए सहमति दे दी है। इन दोषियों ने समय की मांग करते हुए अलग अलग कारण बताए हैं। दोषियों में एक गोविंदभाई नाई ने अर्जी में सरेंडर के लिए चार हफ्ते का वक्त मांगा है और कहा है कि वह अपने 88 साल के पिता और 75 साल की मां की देखभाल कर रहा है। उसने कहा है कि वह अकेला ही है जो अपने पैरेंट्स की देखभाल करता है। उसकी खुद की उम्र 55 साल है और वह खुद अस्थमा से पीड़ित है। दूसरे दोषी रमेश रूपाभाई ने छह हफ्ते का वक्त मांगा है और कहा है कि उसके बेटे की शादी है और उन्हें पारिवारिक दायित्व के निर्वाह के लिए समय चाहिए ऐसे में उसे सरेंडर के लिए और वक्त दिया जाए। वहीं मिथेश चिमालाल भट्ट ने छह हफ्ते का वक्त मांगते हुए कहा है कि खेती का सीजन है और उन्हें खेती का काम पूरा करने के लिएऔर वक्त दिया जाए ताकि सरेंडर कर सके। रजिस्ट्री को निर्देश देते हैं कि वह इस मामले में चीफ जस्टिस को अवगत कराएं ताकि सुनवाई के लिए बेंच का गठन हो सके और मामले की सुनवाई के लिए 19 जनवरी की तारीख तय कर दी है। सुप्रीम कोर्ट में एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से भी यह मामला उठाया गया तब बेंच ने कहा कि सभी की सुनवाई साथ होगी।वहीं बिपिनचंद कन्हैयालाल जोशी और प्रदीप रमण लाल मोधिया ने सर्जरी कराए जाने और खराब स्वास्थ्य का हवाला दिया और कहा कि उन्हें सरेंडर के लिए वक्त दिया जाए।

सीनियर एडवोकेट वी चिदंबरेश तीन दोषियों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए और जस्टिस बीवी नागरत्ना की बेंच में सरेंडर के लिए और वक्त दिए जाने की मांग संबंधित अर्जी दाखिल किए जाने की बात कही और कहा कि मामले में जल्द सुनवाई की जानी चाहिए। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि सरेंडर करने के लिए रविवार 21 जनवरी तक का वक्त दिया गया है ऐसे में उनकी अर्जी पर जल्द सुनवाई की दरकार है। जस्टिस नागरत्ना की बेंच ने कहा कि मामले में फैसला उन्होंने और जस्टिस यू भुइयां ने दिया था और ऐसे में इस बेंच का गठन होगा जो इस मामले में आवेदन पर सुनवाई कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम रजिस्ट्री को निर्देश देते हैं कि वह इस मामले में चीफ जस्टिस को अवगत कराएं ताकि सुनवाई के लिए बेंच का गठन हो सके और मामले की सुनवाई के लिए 19 जनवरी की तारीख तय कर दी है। सुप्रीम कोर्ट में एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से भी यह मामला उठाया गया तब बेंच ने कहा कि सभी की सुनवाई साथ होगी।

गौरतलब है कि 8 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने अपने अहम फैसले में गुजरात सरकार के उस फैसले को खारिज कर दिया था जिसमें राज्य सरकार ने गुजरात में हुए 2002 के दंगे के दौरान बिलकिस बानो के साथ हुए गैंग रेप व उसके परिजनों की हत्या में उम्रकैद की सजा काटने वाले दोषियों को रिहा करने का आदेश दिया था। राज्य सरकार ने 11 दोषियों की सजा में छूट देकर उसे रिहा करने का आदेश दिया था। इस फैसले को बिलकिस बानो की ओर से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।उसकी खुद की उम्र 55 साल है और वह खुद अस्थमा से पीड़ित है। दूसरे दोषी रमेश रूपाभाई ने छह हफ्ते का वक्त मांगा है और कहा है कि उसके बेटे की शादी है और उन्हें पारिवारिक दायित्व के निर्वाह के लिए समय चाहिए ऐसे में उसे सरेंडर के लिए और वक्त दिया जाए। वहीं मिथेश चिमालाल भट्ट ने छह हफ्ते का वक्त मांगते हुए कहा है कि खेती का सीजन है और उन्हें खेती का काम पूरा करने के लिएऔर वक्त दिया जाए ताकि सरेंडर कर सके। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागत्ना की अगुवाई वाली बेंच ने दोषियों को दो हफ्ते के भीतर जेल अधिकारियों के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार के फैसले को खारिज करते हुए कहा था कि यह आदेश घिसापीटा था और इसे बिना सोचे समझे पारित किया गया था।

क्या अब पीएम मोदी ने तूफानी प्रचार शुरू कर दिया है?

पीएम मोदी ने अब तूफानी प्रचार शुरू कर दिया है! राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम को अब 4 दिन ही शेष हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसके लिए 11 दिनों के अनुष्ठान पर हैं। लेकिन अयोध्या में होने वाले इस भव्य कार्यक्रम के पहले पीएम मोदी 19 जनवरी को तीन राज्यों का दौरा करने जा रहे हैं। बता दें कि पीएम एक दिन में ही ये तीनों राज्य कवर करेंगे। दौरे की शुरुआत महाराष्ट्र के सोलापुर से होगी। इसके बाद कर्नाटक के बेंगलुरु और अंत में तमिलनाडु के चेन्नई में कई विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास करेंगे। लोकसभा चुनाव से पहले तीन राज्यों का यह दौरा कई लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रदानमंत्री नरेंद्र मोद 22 जनवरी से पहले 11 दिनों तक व्रत रहेंगे। उन्होंने अपने व्रत की शुरुआत नासिक धाम पंचवटी से की थी। पीएम मोदी इस दौरान जमीन पर कंबल और चटाई बिछाकर सोते हैं। कहा जा रहा है कि वह यम नियमों का पालन कर रहे हैं। दिनभर में पीएम मोदी केवल नारियल पानी पीकर अपनी भूख-प्यास मिटाते हैं। पीएम मोदी ने अपने व्रत के दौरान देश के अलग-अलग मंदिरों के दर्शन किए और पूजा-अर्चना की। वे महाराष्ट्र के कालाराम मंदिर भी गए और फिर रामकुंड भी पहुंचे। इसके बाद मोदी 16 जनवरी को आंध्र प्रदेश के वीरभद्र मंदिर में भी पूजा-अर्चना की थी। बीते दिन वे केरल के श्री रामास्वामी मंदिर गए थे, जहां पर उन्होंने भगवान की पूजा-अर्चना की। इस दौरान उनके सुरक्षा में लगे एसपीजी गार्ड्स भी उसी पोशाक में नजर आए।

दक्षिणी महाराष्ट्र शहर सोलापुर से पीएम मोदी अपने कार्यक्रम की शुरुआत करेंगे। पीएम मोदी सुबह लगभग 10.45 बजे आयोजित होने वाले एक सार्वजनिक कार्यक्रम में, वह लगभग 2,000 करोड़ रुपये की आठ अमृत कायाकल्प और शहरी परिवर्तन के लिए अटल मिशन परियोजनाओं की आधारशिला रखेंगे। मोदी प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनाए गए 90,000 से अधिक घरों को भी हितग्राहियों को समर्पित करेंगे। इसके अलावा, पीएम मोदी सोलापुर में रायनगर हाउसिंग सोसाइटी के 15,000 घरों को भी लाभार्थियों को सौंपेंगे। इन लाभार्थियों में हजारों हथकरघा श्रमिक, विक्रेता, पावरलूम श्रमिक, कूड़ा बीनने वाले, बीड़ी श्रमिक और चालक शामिल हैं। प्रधानमंत्री कार्यक्रम के दौरान महाराष्ट्र में पीएम-स्वनिधि के 10,000 लाभार्थियों को पहली और दूसरी किस्तों का वितरण भी शुरू करेंगे।

महाराष्ट्र के सोलापुर के बाद पीएम मोदी कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु जाएंगे। वहां मोदी लगभग 2:45 बजे पहुंचेंगे जहां बोइंग इंडिया इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी सेंटर का उद्घाटन करेंगे और बोइंग सुकन्या कार्यक्रम का शुभारंभ करेंगे। रुपये के निवेश से बनाया गया 1, 600 करोड़ रुपये का यह 43 एकड़ का परिसर अमेरिका के बाहर बोइंग का सबसे बड़ा निवेश है। इसके बाद भारत में बोइंग का नया परिसर भारत में जीवंत स्टार्टअप, निजी और सरकारी पारिस्थितिकी तंत्र के साथ साझेदारी के लिए एक आधारशिला बन जाएगा और वैश्विक एयरोस्पेस और रक्षा उद्योग के लिए अगली पीढ़ी के उत्पादों और सेवाओं को विकसित करने में मदद करेगा। बोइंग सुकन्या कार्यक्रम का उद्देश्य देश के बढ़ते विमानन क्षेत्र में भारत भर से अधिक लड़कियों के प्रवेश का समर्थन करना है। यह कार्यक्रम पूरे भारत की लड़कियों और महिलाओं को विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित एसटीईएम क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कौशल सीखने और विमानन क्षेत्र में नौकरियों के लिए प्रशिक्षण के अवसर प्रदान करेगा। युवा लड़कियों के लिए, यह कार्यक्रम एसटीईएम करियर में रुचि पैदा करने में मदद करने के लिए 150 नियोजित स्थानों पर एसटीईएम लैब्स बनाएगा। यह कार्यक्रम उन महिलाओं को छात्रवृत्ति भी प्रदान करेगा जो पायलट बनने के लिए प्रशिक्षण ले रही हैं।

बेंगलुरु से निकलने के बाद लगभग शाम 6 बजे, प्रधानमंत्री मोदी तमिलनाडु के चेन्नई में खेलो इंडिया यूथ गेम्स 2023 के उद्घाटन समारोह में भाग लेंगे। प्रधानमंत्री मोदी चेन्नई के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में आयोजित होने वाले छठे खेलो इंडिया युवा खेल 2023 के उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि होंगे। यह पहली बार है जब खेलो इंडिया युवा खेलों का आयोजन किया जा रहा है यह पहली बार है जब दक्षिण भारत में खेलो इंडिया युवा खेलों का आयोजन किया जा रहा है। ये खेल 19 से 31 जनवरी तक तमिलनाडु के चार शहरों चेन्नई, मदुरै, त्रिची और कोयंबटूर में खेले जाएंगे। इन खेलों का शुभंकर वीरा मंगाई है। रानी वेलु नचियार, जिन्हें प्यार से वीरा मंगाई कहा जाता था, एक भारतीय रानी थीं जिन्होंने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ युद्ध छेड़ा था। यह शुभंकर भारतीय महिलाओं की वीरता और भावना का प्रतीक है, जो महिला शक्ति की ताकत का प्रतीक है। खेलों के लोगो में कवि तिरुवल्लुवर की आकृति शामिल है। खेलो इंडिया युवा खेलों के इस संस्करण में 5600 से अधिक खिलाड़ी भाग लेंगे, जो 13 दिनों में 15 स्थानों पर 26 खेल विषयों, 275 से अधिक प्रतिस्पर्धी आयोजनों और 1 डेमो खेल के साथ फैले हुए हैं। उद्घाटन समारोह के दौरान, प्रधानमंत्री मोदी लगभग 250 करोड़ रुपये की लागत वाली प्रसारण क्षेत्र से संबंधित परियोजनाओं का शुभारंभ और शिलान्यास भी करेंगे।

क्या इरान पर हमला करके पाकिस्तान ने खुद को जाल में फंसा लिया है?

हाल ही में इरान पर हमला करके पाकिस्तान ने खुद को जाल में फंसा लिया है! पश्चिम एशिया में 3-4 महीने से चल रहे इजरायल-हमास युद्ध की वजह से जारी तनाव के बीच ईरान और पाकिस्तान का एक दूसरे की सरजमीं पर हमले से स्थिति और बिगड़ सकती है। मंगलवार को ईरान ने पाकिस्तान की सीमा के भीतर कथित सुन्नी आतंकी समूहों के ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। उसने दावा किया कि ये आतंकी समूह उसके यहां सक्रिय हैं और पाकिस्तान से संचालित हैं। इस हमले के बाद पाकिस्तान को पहले से तो कुछ सूझ नहीं रहा था कि करे तो क्या करें। वह काफी दबाव में था। 5 साल पहले भारत की बालाकोट में एयर स्ट्राइक के बाद अब ईरान के हमले से उसके ऊपर कमजोर देश का ठप्पा लगने का खतरा था। लिहाजा ये दिखाने के लिए वह कमजोर मुल्क नहीं है, उसे कार्रवाई करनी थी। गुरुवार तड़के उसने भी ईरान की सीमा में घुसकर एयर स्ट्राइक का दावा किया। उसने भी वही ग्राउंड गिनाया जो ईरान ने गिनाया था यानी अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बने संगठनों पर कार्रवाई। ईरान के भीतर एयर स्ट्राइक करके पाकिस्तान ने ये संदेश देने की कोशिश की कि वह अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं करने वाला है। हालांकि, ऐसा करते वक्त उसने एक बड़ी कूटनीतिक चूक कर दी। उसकी कार्रवाई से भारत की तरफ से भविष्य में बालाकोट जैसी और एयर स्ट्राइक का रास्ता भी साफ हो गया है। ईरान की एयर स्ट्राइक से पाकिस्तान बिलबिला रहा था। विरोध में उसने तेहरान से अपने राजनयिकों को वापस बुला लिया और ईरानी राजदूत को निष्कासित कर दिया। पाकिस्तानी सेना के ऊपर ‘बदले की कार्रवाई’ करने का घरेलू दबाव था। भारत, अफगानिस्तान के बाद अब एक और पड़ोसी ईरान भी उसके यहां आतंकी ठिकानों पर खुलेआम हमला कर रहा है। परमाणु ताकत होने के बावजूद कोई भी उस पर हमला कर दे रहा। इससे न सिर्फ उसकी छवि एक कमजोर, लाचार देश की बन रही थी बल्कि आतंकवाद के पनाहगाह के तौर पर भी पुख्ता हो रही थी। लिहाजा ईरान पर पलटवार उसकी मजबूरी थी। गुरुवार को उसने दावा किया कि उसने ईरान के सिस्तान-ओ-बलूचिस्तान प्रांत में आतंकियों के छिपने के कथित अड्डों पर सटीक सैन्य कार्रवाई की है जिसमें कुछ ‘आतंकी’ मारे गए हैं।

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर ईरान के भीतर की गई सैन्य कार्रवाई के बारे में बताया। बयान में कहा गया कि इस इंटेलिजेंस-बेस्ड ऑपरेशन का नाम ‘मर्ग बार सर्मचार’ था। इसका शाब्दिक अर्थ ‘गुरिल्ला लड़ाकों की मौत’ है। दरअसल बलूचिस्तान के चरमपंथियों को सर्मचार कहा जाता है। सीएनएन की एक न्यूज रिपोर्ट में ईरान के सिस्तान-ओ-बलूचिस्तान प्रांत के डेप्युटी गवर्नर अलीरेजा मरहामति के हवाले से बताया गया है कि पाकिस्तानी कार्रवाई में 7 लोगों की मौत हुई है जिसमें 3 महिलाएं हैं और 4 बच्चे। मरने वाले सभी लोग विदेशी हैं यानी हमले में किसी भी ईरानी नागरिक की मौत नहीं हुई है।

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि ईरान में पाकिस्तानी मूल के आतंकियों के सुरक्षित पनाहगाह हैं और इसे लेकर इस्लामाबाद ने पिछले कई सालों से लगातार तेहरान के सामने गंभीर चिंता जताता रहा है। पाकिस्तान ने ईरान में इन आतंकियों की मौजूदगी और गतिविधियों के बारे में तेहरान को तमाम डोजियर के माध्यम से पुख्ता सबूत भी मुहैया कराए थे। बयान में कहा गया है कि ईरान ने इन ‘सर्मचार’ पर कोई कार्रवाई नहीं की और वे बेगुनाह पाकिस्तानियों का खून बहा रहे थे। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा कि उसकी कार्रवाई इस बात का प्रतीक है वह अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ हर तरह के खतरे से निपटने के लिए प्रतिबद्ध है। वह अपने लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हर तरह के जरूरी कदम उठाना जारी रखेगा।

पाकिस्तान ने ईरान को सख्त संदेश देने के लिए उसकी सीमा में घुसकर सैन्य ऑपरेशन को अंजाम तो दे दिया लेकिन यहां वह एक बड़ी भूल कर चुका है। उसने ईरानी सीमा के भीतर की गई अपनी इस कार्रवाई के बचाव में कहा है कि ये उसके राष्ट्रीय हितों, राष्ट्रीय सुरक्षा और अपने लोगों की रक्षा के लिए जरूरी थी। वह अपने राष्ट्रीय हितों और राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं कर सकता। उसने बयान में जोर देकर कहा कि ईरान की सरजमीं पर कुछ ऐसे संगठन बेरोकटोक सक्रिय हैं जो पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं। ऐसे तत्वों की मौजूदगी और उनकी गतिविधियों को लेकर उसने ईरान को कई बार सबूत भी सौंपे लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसलिए ये कार्रवाई जरूरी थी। लेकिन पाकिस्तान ने ईरान सीमा के भीतर अपनी सैन्य कार्रवाई को जायज ठहराने के लिए ये जो वजहें गिनाई हैं, उससे भारत की तरफ से भविष्य में उसकी सीमा के भीतर बालाकोट जैसी और एयर स्ट्राइक का रास्ता साफ हो सकता है।

फरवरी 2019 में पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के बालाकोट में घुसकर एयर स्ट्राइक की थी और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद कर दिया था। अब पाकिस्तान ईरान में कार्रवाई को लेकर जो वजहें गिना रहा है, उन्हीं ग्राउंड पर भारत उसके यहां घुसकर कार्रवाई कर सकता है। ये कोई छिपी बात नहीं है कि पाकिस्तान दुनियाभर के कुख्यात आतंकियों का सुरक्षित पनाहगाह है। मुंबई आतंकी हमले के मास्टरमाइंड से लेकर संयुक्त राष्ट्र की तरफ से आतंकी घोषित किए गए तमाम दहशतगर्दों का वह सुरक्षित ठिकाना है। पाकिस्तानी सेना और उसकी कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई बीते कई दशकों से भारत के खिलाफ आतंकवाद को स्टेट पॉलिसी के एक औजार के तौर पर इस्तेमाल किया है। भारत दशकों से सीमा-पार आतंकवाद का पीड़ित रहा है। पाकिस्तान ने ईरान के भीतर कार्रवाई करके एक तरह से भारत को खुद अपने यहां घुसकर एंटी-टेरर ऑपरेशन चलाने का वाजिब कारण मुहैया करा दिया है। अब भारत को पाकिस्तान के खिलाफ बालाकोट जैसी कार्रवाई पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को समझाना और ज्यादा आसान हो सकता है।

आखिर क्या है सेमी कंडक्टर नीति 2024? क्या है इसके फायदे!

आज हम आपको सेमी कंडक्टर नीति 2024 के बारे में बताने जा रहे हैं! उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने गुरुवार कैबिनेट मीटिंग में सेमी कंडक्टर नीति 2024 को मंजूरी दी। अभी तक सिर्फ गुजरात, ओडिशा और तमिलनाडु ने इसे लेकर नीति बनाई थी। यूपी चौथा राज्य है, जहां सेमी कंडक्टर नीति 2024 बनाई है। जानकारों का मानना है कि योगी सरकार अगर इस नीति का जमीन पर उतार पाती है तो यूपी ही नहीं देश के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है। सरकार का भी मानना है कि इससे बड़े पैमाने पर यूपी में इन्वेस्टमेंट आएगा। योगी सरकार की कोशिश है कि सेमी कंडक्टर निर्माण सेक्टर में उत्तर प्रदेश लीडर बने। इस पॉलिसी के आने के साथ ही क्यों इतनी उम्मीदें बंध गईं, आइए विस्तार से समझते हैं। आपके हाथ में जो मोबाइल है, जिस गाड़ी से आप चलते हैं, लैपटॉप से लेकर तमाम इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स में सेमीकंडक्टर का इस्तेमाल होता है। सिलिकॉन से बनी इस बेहद छोटी सी चिप के बिना सब थम जाएगा। न आपको एटीएम से पैसा मिलेगा न ही फैक्ट्रियों में कोई प्रोडक्शन हो पाएगा। यही कारण है कि सेमीकंडक्टर को आज 21वीं सदी का ‘न्यू ऑयल’ भी कहा जाता है। जो भी देश इसमें अग्रणी होगा, वह अपने आप सबसे ताकतवर बन जाएगा। वर्तमान में ताइवान, चीन और अमेरिका की कंपनियां इन सेमीकंडक्टर की सबसे बड़ी निर्यातक हैं।

वैसे तो भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था में शुमार है। डिजिटलाइजेशन में भारत नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। लेकिन कड़वा सच ये है कि जैसे तेल के मामले में हम आयात पर निर्भर हैं, उसी तरह सेमीकंडक्टर भी हम आयात ही करते हैं। देश की कई कंपनियां इन चिप की डिजाइनिंग, पैकेजिंग और टेस्टिंग में जरूर योगदान देती हैं लेकिन असल में सेमीकंडक्टर यूरोप, अमेरिका या ताइवान चीन में ही बनती हैं। भारत में खपत की बात करें तो जानकारों के अनुसार 2030 से अकेले भारत में सेमीकंडक्टर की खपत 110 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगी। इसी चुनौती से निपटने के लिए मोदी सरकार ने पिछले कुछ समय से सेमीकंडक्टर निर्माण की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए हैं। पिछले साल गुजरात के गांधीनगर में सेमीकॉन इंडिया 2023 सम्मेलन में पीएम ने सेमीकंडक्टर उद्योग पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि देश में सेमीकंडक्टर बनाने की सुविधा स्थापित करने के लिए कंपनियों को 50 फीसदी वित्तीय सहायता दी जाएगी। यही नहीं उन्होंने कहा कि भारत सेमीकंडक्टर के लिए एक ईको सिस्टम डेवलप कर रहा है, ताकि ये उद्योग तेजी से बढ़ सके।

बता दें इस संबंध में सरकार को कई एक्सपर्ट कंपनियों से फीडबैक मिला कि देश में सेमीकंडक्टर उद्योग स्थापित करने के लिए राज्यों और केंद्र को मिलकर इको सिस्टम तैयार करना होगा। ताकि फैक्ट्री लगाने से लेकर हर काम के लिए एक स्पष्ट नीति सामने आए। केंद्रीय सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने तो देश से वादा भी कर दिया है कि 2024 में दिसंबर तक पहली मेड इन इंडिया सेमीकंडक्टर चिप पेश कर दी जाएगी। इससे देश में मोबाइल से लेकर तमाम उपकरणों की कीमतें भी गिरेंगी। गुजरात में इस पर काम भी शुरू हो चुका है। अब यूपी भी गुजरात के साथ इस सेमीकंडक्टर रेस में शामिल हो गया है। योगी सरकार की नीति के बारे में कैबिनेट मंत्री योगेन्द्र उपाध्याय कहते हैं कि सेमी कंडक्टर निर्माण इकाई लगाने वाले उद्योग समूहों को भारत सरकार की ओर से 80 हजार करोड़ रुपए का फंड दिये जाने की व्यवस्था है। यूपी सरकार इसमें 75 प्रतिशत की भागीदारी करेगी। पॉलिसी में उद्योगों को वित्तीय प्रोत्साहन देने की भी व्यवस्था है। इसमें लैंड सब्सिडी के रूप में 200 एकड़ तक 75 फीसदी की सब्सिडी मिलेगी।

उन्होंने बताया कि अब तक 13 कंपनियों ने प्रदेश में सेमी कंडक्टर निर्माण इकाई लगाने के लिए अपनी इच्छा जाहिर की है। उद्योगों को पर्याप्त मात्रा में पानी और निर्बाध बिजली उपलब्ध कराई जाएगी। इंडिया 2023 सम्मेलन में पीएम ने सेमीकंडक्टर उद्योग पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि देश में सेमीकंडक्टर बनाने की सुविधा स्थापित करने के लिए कंपनियों को 50 फीसदी वित्तीय सहायता दी जाएगी। यही नहीं उन्होंने कहा कि भारत सेमीकंडक्टर के लिए एक ईको सिस्टम डेवलप कर रहा है, ताकि ये उद्योग तेजी से बढ़ सके।साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर पेटेंट कराने पर 10 लाख और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेटेंट कराने के लिए यूपी सरकार 20 लाख रुपए प्रदान करेगी। यही नहीं इस इंडस्ट्री को स्किल्ड मैनपॉवर उपलब्ध कराने के लिए इंडस्ट्री से सीएम इंटर्नशिप प्रोग्राम के तहत कोलैबरेशन किया जाएगा। साथ ही प्रदेश के टेक्निकल इंस्टीट्यूटों में भी सेमी कंडक्टर निर्माण से संबंधित ट्रेनिंग की व्यवस्था की जाएगी।

आखिर मोदी राज में कितनी मजबूत हुई भारतीय सेना?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि मोदी राज में भारतीय सेना कितनी मजबूत हुई है! भारतीय जनता पार्टी 2024 के लोकसभा चुनावों में भी जीत दर्ज करने की रणनीति बना रही है। अगर उसकी रणनीति काम कर गई तो भाजपा की लगातार तीसरी बार केंद्र में सरकार होगी और नरेंद्र मोदी देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी कर लेंगे। बीजेपी और खुद पीएम मोदी दावा कर चुके हैं कि मतदाता आज भी उनके साथ है, इसलिए कोई संदेह ही नहीं कि उनकी सरकार की वापसी हो रही है। आखिर बीते दो कार्यकाल में मोदी सरकार ने ऐसा क्या किया है कि उसे मतदाताओं पर इतना भरोसा है? हमने इसी की पड़ताल के लिए एक सीरीज शुरू की है- मोदी सरकार के 10 साल। इस सीरीज में हम हर क्षेत्र में मोदी सरकार के उठाए कदमों और लक्ष्यों की प्राप्ति में मिली सफलता या असफलता का विस्तृत आकलन कर रहे हैं। मोदी सरकार ने आयात पर निर्भरता कम करने और हथियारों से लेकर विमान और पोत तक के निर्माण में ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा देने पर जोर दिया है। सरकार ने देश में डिफेंस इंडस्ट्रीज को मजबूत करने के लिए रक्षा खरीद प्रक्रिया डीपीपी जैसी पहल को संशोधित किया। वहीं, सेनाओं को आधुनिक बनाने के लिए कई हाई-प्रोफाइल एक्विजिशन किए जिनमें फ्रांस से राफेल जेट, रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम और अमेरिका से अपाचे और चिनूक हेलीकॉप्टरों की खरीद शामिल हैं। दूसरी तरफ, थल सेना, वायु सेना और नौसेना में हथियार, निगरानी प्रणाली और युद्ध क्षमताओं के अपग्रेडेशन के साथ महत्वपूर्ण आधुनिकीकरण हुआ है।

भारत ने सितंबर 2016 में 36 राफेल जेट के लिए फ्रांस के साथ सरकार-से-सरकारी समझौते पर हस्ताक्षर किए। इन जेट्स की डिलीवरी जुलाई 2020 में शुरू हुई और तय कार्यक्रम के मुताबिक चल रही है। राफेल 4.5 पीढ़ी का मल्टीरोल लड़ाकू विमान है, जो अपनी बहुमुखी प्रतिभा, लंबी दूरी और उन्नत हथियारों के लिए जाना जाता है। यह अडवांस्ड एवयोनिक्स, रडार और इलेक्ट्रॉनिक कम्यूनिकेशन सिस्टम सहित अत्याधुनिक तकनीक से लैस है और कई शक्तिशाली हथियारों और मिसाइलों को ले जाने में सक्षम है। राफेल जेट के शामिल होने से भारतीय वायु सेना की लड़ाकू क्षमताओं में बड़ा इजाफा है, जिससे हवाई श्रेष्ठता और गहरे हमले वाले मिशनों में बढ़त मिलती है।

भारत ने अक्टूबर 2018 में ए-400 ट्रायम्फ एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम्स की डील पूरी की। सिस्टम की डिलीवरी चल रही है और आने वाले वर्षों में पूरा होने की उम्मीद है। एस-400 दुनिया की सबसे अडवांस वायु रक्षा प्रणालियों में से एक है, जो लंबी दूरी पर विमान, क्रूज मिसाइलों और बैलिस्टिक मिसाइलों सहित कई प्रकार के लक्ष्यों पर हमला करने में सक्षम है। यह एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक करके उन्हें निशाना बना सकता है और अपनी हाई मोबिलीटी और बहुमुखी प्रतिभा के लिए जाना जाता है। एस-400 के आने से भारत की वायु रक्षा क्षमता बढ़ गई है। मोदी सरकार में ही भारत ने 22 AH-64E अपाचे हेलीकॉप्टरों का कॉन्ट्रैक्ट किया जिसकी डिलीवरी 2019 में शुरू हुई। अपाचे एक बहुउद्देश्यीय लड़ाकू हेलीकॉप्टर है और इसे अपनी तरह का सबसे अडवांस हेलीकॉप्टर माना जाता है। यह अत्याधुनिक हथियारों से लैस है और हवाई हमले, एंटी-आर्मर और नजदीकी हवाई सपोर्ट सहित विभिन्न अभियानों में प्रदर्शन कर सकता है। अपाचे हेलीकॉप्टरों के शामिल होने से भारतीय वायुसेना को स्ट्रैटिजिक एयर सपोर्ट, टोही और युद्धक्षेत्र प्रबंधन के मामले में महत्वपूर्ण बढ़त मिलती है।

भारत का पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत, जिसे मिग-29के लड़ाकू विमानों, कामोव-31 हेलीकॉप्टरों और अन्य विमानों को संचालित करने के लिए डिजाइन किया गया है, जो भारतीय नौसेना की समुद्री क्षमताओं में जबर्दस्त इजाफा करता है। भारत का पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत, भारतीय नौसेना की समुद्री क्षमताओं को बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह परियोजना जहाज निर्माण और समुद्री सुरक्षा में भारत की बढ़ती शक्ति का प्रतीक है। वाहक को मिग-29के लड़ाकू विमानों, कामोव-31 हेलीकॉप्टरों और अन्य विमानों को संचालित करने के लिए डिजाइन किया गया है, जो शक्ति प्रक्षेपण और समुद्री नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रोजेक्ट 75 के हिस्से के रूप में इन पनडुब्बियों का निर्माण फ्रांस से टेक्नॉलजी ट्रांसफर के साथ भारत में किया जा रहा है। ये एडवांस डीजल-इलेक्ट्रिक हमलावर पनडुब्बियां हैं। इन पनडुब्बियों का निर्माण मेक इन इंडिया पहल के तहत भारत में किया जा रहा है। प्रोजेक्ट 75(आई) प्रोजेक्ट 75 का फॉलो अप है, जिसका लक्ष्य स्वदेशी रूप से छह अडवांस स्टील्थ पनडुब्बियों का निर्माण करना है। यह परियोजना भारतीय नौसेना की पानी के भीतर युद्ध क्षमताओं को बढ़ाने में महत्वपूर्ण है।

जब पहली बार गिराया गया बाबरी मस्जिद का गुंबद!

एक ऐसा समय जब बाबरी मस्जिद का गुंबद गिराया गया था! बालक प्रभु रामलला की परीक्षा लेने की तैयारी में माता पार्वती कर रही थीं। इसी प्रयोजन से वह भगवान शिव के पास आईं। भगवान शिव उस समय भगवान राम का ध्यान कर रहे थे। अनायास ही उनके मुंह से यह दोहा निकला। दरअसल, शिव जानते थे कि माता सती नहीं बल्कि स्वयं प्रभु रामलला उनकी परीक्षा लेनेा चाह रहे थे। इस दोहे के पहले अंश का अर्थ है कि राम जो चाहते हैं, वही होगा। आप सोच रहे होंगे कि आज मैं इस कहानी की शुरुआत एक कविता से क्यों कर रही हूं। दरअसल, अयोध्या की घटनाओं को भी इस दोहे से जोड़कर खूब देखा जाता रहा है। 6 दिसंबर 1992 को जो कुछ हुआ, उसको लेकर भी कुछ लोगों का कहना है कि यह सब राम ने पहले ही रच रखा था। बालकांड में रचित इस दोहे का एक अलग अर्थ मैंने उस दिन जाना था। रामभक्त कारसेवक उस दिन उग्रता की सभी सीमाओं को पार कर गए थे। एक अंत का आरंभ था। एक नए इतिहास की शुरुआत। रामायण काल में भगवान श्रीराम और रावण के बीच युद्ध 84 दिनों तक चला था। भगवान श्रीराम ने आठ दिनों की लड़ाई के बाद रावण को परास्त किया था। अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद विवाद का ‘लंका कांड’ 30 अक्टूबर 1990 से 6 दिसंबर 1992 तक चला। तकरीबन दो साल 37 दिन। वहीं, बाबरी विध्वंस पहर में पूरा हुआ और आगे चार पहर में पूरे इलाके को समतल बनाया गया। मैं अयोध्या हूं और मै आज आपको उस घटना के पहले चार पहर की कहानी सुनाने जा रही हूं। सभी धर्मों के ग्रंथों को आप पढ़ेंगे तो उसका एक ही सार है, अंत ही सत्य है। 1528 में मुगल बादशाह बाबर के सिपहसालार मीरबाकी ने जुल्म मेरे प्रभु रामलला की नगरी में किया था। यह उस आरंभ के अंत की शुरुआत थी। श्रीमद् भागवत गीता में श्रीकृष्ण एक स्थान पर अर्जुन को कहते हैं कि तुम निमित्त मात्र हो। इस चराचर जगत का स्वामी मैं हूं। मैं ही सब कुछ संचालित करता हूं। जो कुछ इस हस्तिनापुर की युद्धभूमि में हो रहा है, वह सब मैंने ही रचा है। जो कुछ हो रहा है या जो कुछ होने वाला है, वह सब मैंने ही निर्धारित किया है। इसलिए, पार्थ तुम अपना कर्तव्य करो। पाप और पुण्य को तय करने की जिम्मेदारी मुझ पर छोड़ दो। अयोध्या में 6 दिसंबर को कारसेवक भी कुछ इसी मंशा से विवादित स्थल तक पहुंचे थे। यहां सवाल यह उठता है कि क्या भगवान ने सबकुछ रचा था। या फिर वह कुछ ओर ही था।

पीवी नरसिंह राव सरकार की वादाखिलाफी के विरोध में 26 जुलाई 1992 को अयोध्या में चल रही कारसेवा को रोकने की घोषणा करने वाली विश्व हिंदू परिषद खुद को ठगा महसूस कर रही थी। राव सरकार लगातार बैठकों में अपने स्टैंड बदल रही है। ऐसे में सितंबर- अक्टूबर में वीएचपी ने 6 दिसंबर 1992 को कारसेवा का ऐलान कर दिया। इस कारसेवा को गोरखपुर मठ, शिवसेना, भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस का समर्थन मिला। राम मंदिर आंदोलन को लेकर यह पहला मौका था जब आरएसएस खुलकर अयोध्या में उतरी थी। कारसेवा की घोषणा होने के बाद 5 दिसंबर 1992 तक इसे रोकने या इसकी दिशा बदलने के प्रयास चलते रहे। लेकिन, हासिल कुछ नहीं हुआ। भाजपा, आरएसएस, वीएचपी के तमाम सीनियर नेता अयोध्या पहुंच चुके थे। हजारों कारसेवकों का हुजूम तीन दिसंबर से ही अयोध्या पहुंचने लगी थी।

6 दिसंबर तक यह अयोध्या में एक लाख से अधिक कारसेवक पहुंच चुके थे। कारसेवा को लेकर वीएचपी और भाजपा की ओर से घोषणा की गई थी कि यह सांकेतिक होगी। मुलायम सरकार ने 1990 में जिस प्रकार से कारसेवकों को रोकने के लिए रोड और रेल सेवा को बंद कराया था, वैसा कुछ भी इस बार नहीं था। 5 दिसंबर को भी केंद्र सरकार कर ओर स यूपी के सीएम कल्याण सिंह से बातचीत की गई। उन्हें अप्रिय स्थिति से निपटने को कहा गया। सीएम कल्याण सिंह ने भरोसा दिलाया कि कारसेवा शांतिपूर्ण होगी। विधि व्यवस्था को बिगड़ने नहीं दिया जाएगा। उन्होंने यह भी जोड़ा कि कारसेवकों पर किसी भी स्थिति में गोली नहीं चलेगी। सीएम कल्याण ने अधिकारियों को अयोध्या में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने के निर्देश दिए थे। साथ ही, यह भी निर्देश दे दिया कि था कि गोली नहीं चलेगी, किसी भी स्थिति में नहीं चलेगी।

रविवार 6 दिसंबर की सुबह सबसे अलग थी। अयोध्या का माहौल भक्तिमय हो चुका था। सड़कें कारसेवकों से अटी पड़ी थीं। हर ओर जय श्री राम के नारे लग रहे थे। सुबह के 7 बजे थे। सांसद विनय कटियार के घर हिंदू धाम का फोन बजा। सांसद ने फोन उठाया। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव थे। पीएम चिंतित थे। सांसद ने भरोसा दिलाया कि शनिवार यानी 5 दिसंबर को जो तय हुआ था, उसी के अनुरूप सांकेतिक कारसेवा होगी। उन्हें निश्चिंत किया। अयोध्या में भाजपा के सीनियर नेता मौजूद थे तो सांसद कटियार ने सबको नाश्ते पर बुलाया था। सुबह 8 बजे भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी हिंदू धाम पहुंचे। अशोक सिंघल तब तक वहां पहुंच चुके थे। तमाम नेताओं ने कारसेवकों की भारी संख्या पर चिंता जताई। उन्हें काबू में करने की रणनीति बनाने लगे। इसी बीच सुबह साढ़े बजे कटियार के घर सीएम कल्याण सिंह का फोन आया। उन्होंने भी सांसद से स्थिति संभालने का अनुरोध किया। वे भी अनहोनी की आशंका से चिंतित थे।

कारसेवा के लिए सुबह 9:30 बजे एक्शन शुरू हो गया। तमाम सीनियर नेता, साधु- संत विवादित स्थल पर पहुंचने लगे थे। कारसेवकों ने तो पहले से वहां डेरा जमा लिया था। राम चबूतरा के चारों तरफ बैरिकेडिंग बनाई गई थी। सुबह 10 बजे करीब 150 साधु- संत पूजन सामग्री के साथ राम चबूतरा पर विराजमान हो गए थे। लालकृष्ण आडवाणी, अशोक सिंघल और मुरली मनोहर जोशी को लेकर एएसपी अंजू गुप्ता विवादित स्थल पर पहुंचीं। आडवाणी को देखते ही कारसेवकों का पारा हाई हो गया। उन्हें लगा कि आडवाणी कारसेवा स्थगित कराने आए हैं। उग्र कारसेवकों ने बैरिकेडिंग तोड़कर चबूतरा तक पहुंचने की कोशिश की। कारसेवकों को उग्र होता देख पुलिस ने बल प्रयोग किया। उन्हें पीछे खदेड़ने की कोशिश की गई। इस पर कारसेवकों का गुस्सा और भड़क गया। कुछ कारसेवकों ने बैरिकेडिंग तोड़ी। राम चबूतरा तक पहुंच गए। वहां मौजूद लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के साथ धक्का- मुक्की शुरू कर दी। अशोक सिंघल बीच- बचाव करते रह गए।

रामलला के पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास कारसेवकों के मस्जिद के गुंबद पर लगातार बढ़ते हमलों को देखते हुए रामलला को लेकर बाहर निकले। रामलला को मस्जिद से बाहर आता देख कारसेवकों की भीड़ हर्षित हो गई। चारों तरफ जय श्रीराम के नारे लग रहे थे। बाबरी मस्जिद की गुंबद पर कारसेवक चढ़े थे। वे लगातार मस्जिद पर हमला कर रहे थे। वहीं, दूसरी तरफ कारसेवा रोकने की कवायद जारी थी। रामलला के बाहर आते ही प्रहार तेज हो गया। वहीं, डीएम के निर्देश पर केंद्रीय सुरक्षा बलों को लाने के लिए एक सीओ और एक मजिस्ट्रेट फैजाबाद डोगरा रेजिमेंट सेंटर पहुंचे। आईटीबीपी के डीजी ने ढांचा के तीनों गुंबदों को नुकसान पहुंचाए जाने की रिपोर्ट दी। यूपी पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए गए। सीओ और मजिस्ट्रेट के पहुंचने के बाद दोपहर 1:50 बजे आईटीबीपी की तीन बटालियन अयोध्या की तरफ रवाना हो गई।

केंद्रीय बलों को रास्ते में रोक दिया गया। पथराव होने लगा। भारी संख्या में जुटे कारसेवकों ने केंद्रीय बलों को किसी भी स्थिति में विवादित परिसर की तरफ न जाने देने की कोशिश की। इस पर मजिस्ट्रेट ने केंद्रीय बलों को वापस लौटने को लिखित में दिया। आईटीबीपी ने इस संबंध में केंद्रीय गृह मंत्रालय को सूचना दी। लगातार आदेश- निर्देश जमीन पर उतरते नहीं दिख रहे थे। इसी बीच केंद्रीय गृह मंत्रालय को दोपहर 2:50 बजे आईबी की सूचना आई, ढांचे का पहला गुंबद गिर गया है। केंद्रीय बल मौके पर जाने में असमर्थ हैं। दंगा भड़क सकता है। यूपी सरकार बिना फायरिंग स्थिति काबू में करने को कह रही है, जो संभव नहीं है।

क्या अब चीन लाने वाला है नया खतरा?

चीन अब नया खतरा लाने वाला है! भारत सहित दुनिया के कुछ देशों में कोराना ने चेहरा बदलकर नए वैरिएंट JN.1 के रूप में एंट्री ली है। लोगों में फिर से इस खतरनाक वायरस के नए स्वरूप के आने के बाद डर बैठ गया है। दूसरी ओर चीन फिर कुछ ऐसा कर रहा है जिससे एक्सपर्ट भी परेशान हैं। उन्होंने चीन के इस एक्सपेरिमेंट को पागलपन करार दिया है। दरअसल, एक स्टडी में यह दावा किया जा रहा है कि चीन के वैज्ञानिक एक जानलेवा वायरस के साथ प्रयोग कर रहे हैं, जो चूहों में 100% घातक साबित हुआ है। इस खतरनाक वायरस का नाम GX_P2V है और वैज्ञानिकों ने इसे bioRxiv नामक रिसर्च साइट पर प्रकाशित अध्ययन में बताया है। यह वायरस चूहों के दिमाग पर हमला करता है, जिनकी जेनेटिक बनावट को इंसानों के दिमाग से मिलती-जुलती बनाया गया था। ड्रैगन के इस घातक कदम से भारत में चिंता बढ़ गई है। चिंता बढ़ने का एक और कारण यह भी है कि 2019 के दिसंबर में चीन में सबसे पहले कोरोना वायरस पाया गया था, जिसके बाद 2020 मार्च में इसने खतरनाक रूप अख्तियार कर लिया था। 2020-21 में भारत ने जो इस महामारी के दौरान झेला, उससे अबतक नहीं उबर पाया है। ऐसे में चीन से आ रहे एक और खतरे ने टेंशन बढ़ा दी है। रिसर्चर्स ने पाया कि वायरस से संक्रमित होने के पांच दिनों के भीतर चूहों का वजन काफी कम हो गया, वो सुस्त हो गए और उनकी आंखें सफेद हो गईं। अध्ययन में आगे बताया गया है कि संक्रमित होने के सिर्फ आठ दिनों के बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। वैज्ञानिक इस तेजी से हुई मौत से आश्चर्यचकित हैं। यह खबर चिंताजनक है क्योंकि GX_P2V वायरस कोरोनावायरस से मिलता-जुलता है और इसके फैलने का खतरा है। कई विशेषज्ञों ने इस अध्ययन के बाद चिंता जताई है और कहा है कि चीन के इस पागलपन को रोकना ही होगा। वैज्ञानिकों ने स्टडी में बताया कि अध्ययन इस बात की ओर इशारा करता है कि GX_P2V वायरस इंसानों में भी फैल सकता है। उन्होंने आगे बताया कि इस नए वायरस से हमें SARS-CoV-2 जैसे वायरसों के काम करने का तरीका समझने में भी मदद मिल सकती है।

वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि चूहों के शरीरों का परीक्षण करने के बाद, उन्होंने पाया कि वायरस ने फेफड़ों, हड्डियों, आंखों, श्वासनली और दिमाग पर हमला किया था। दिमाग का संक्रमण इतना गंभीर था कि इसी वजह से जानवरों की मृत्यु हो गई। स्टडी के मुताबिक, यह वायरस सार्स-सीओवी-2 जैसा है और इसे 2017 में कोविड के फैलने से पहले पैंगोलिन में पाया गया था।अध्ययन करने वाली टीम ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि यह अपने तरह का पहला अध्ययन है जो कोरोनावायरस से जुड़े वायरस से संक्रमित चूहों में 100% मृत्यु दर दिखा रहा है। ये नतीजे एक और अध्ययन से मिले आंकड़ों से भी ज्यादा गंभीर हैं। हालांकि, अध्ययन के नतीजों से ये साफ नहीं होता कि ये वायरस इंसानों को कैसे प्रभावित करेगा। अध्ययन ऑनलाइन आते ही, विशेषज्ञों ने चिंता जताई है।

लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज के जेनेटिक्स इंस्टीट्यूट के एक महामारी विशेषज्ञ, फ्रांस्वा बॉलोक्स ने इस शोध को भयानक और वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह से बेतुका बताया है। वायरस से संक्रमित होने के पांच दिनों के भीतर चूहों का वजन काफी कम हो गया, वो सुस्त हो गए और उनकी आंखें सफेद हो गईं। अध्ययन में आगे बताया गया है कि संक्रमित होने के सिर्फ आठ दिनों के बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। वैज्ञानिक इस तेजी से हुई मौत से आश्चर्यचकित हैं। यह खबर चिंताजनक है क्योंकि GX_P2V वायरस कोरोनावायरस से मिलता-जुलता है और इसके फैलने का खतरा है। कई विशेषज्ञों ने इस अध्ययन के बाद चिंता जताई है और कहा है कि चीन के इस पागलपन को रोकना ही होगा। वैज्ञानिकों ने स्टडी में बताया कि अध्ययन इस बात की ओर इशारा करता है कि GX_P2V वायरस इंसानों में भी फैल सकता है।उन्होंने एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा कि मुझे समझ नहीं आता कि इंसानों की तरह बनाए गए चूहों को अचानक वायरस से संक्रमित करके क्या सीखा जा सकता है। इससे ज्यादा, मुझे डर है कि ऐसी चीजें गलत भी हो सकती हैं। 2024 के इस अध्ययन का चीन के वुहान वायरोलॉजी संस्थान से कोई सम्बन्ध नहीं दिखता, जो महामारी को लेकर लैब लिक थ्योरी के केंद्र में था।

क्या बीजेपी कांग्रेस के नेताओं को अपनी साइड कर पाएगी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि बीजेपी कांग्रेस के नेताओं को अपनी साइड कर पाएगी या नहीं! लोकसभा चुनाव सिर पर हैं। भारतीय जनता पार्टी ने इसके लिए अपनी तैयारी तेज कर दी है। तीसरी बार केंद्र की सत्‍ता में काबिज होने के लिए उसने कई प्‍लान बनाए हैं। इनमें से एक दूसरे दलों के नेताओं को तोड़कर अपने साथ मिलाना भी है। वैसे तो इसके लिए भगवा पार्टी की नजर सभी दलों पर है। लेकिन, उनमें भी सबसे ऊपर कांग्रेस है। इसके पीछे दो बड़ी मंशा हैं। पहली, इससे बीजेपी को मजबूती मिलेगी। दूसरी, प्रतिभावान नेताओं को चुन अपने साथ मिलाकर वह विपक्ष को कमजोर करने में कामयाब होगी। इसे राहुल ब्रिगेड पर बीजेपी के डोरे डालने की बड़ी वजह भी माना जाता है। दरअसल, बीजेपी ने कमजोर सीटों के लिए स्ट्रैटेजी बनाई है। ये ऐसी सीटें हैं जहां वह चुनावी और वैचारिक तौर पर कमजोर है। पार्टी इन सीटों को मजबूत करने के लिए नए लोगों का स्‍वागत कर रही है। इससे चुनावी माहौल भी बनेगा। हालांकि, इस बार निशाने पर मुख्‍य रूप से कांग्रेस होगी। पार्टी के प्रभावशाली नेताओं के निकलने से यह उसे कमजोर करेगा। बीजेपी आलाकामान पहले ही इसके लिए एक उच्च-स्तरीय समिति बना चुका है। इसका नाम ज्‍वाइनिंग कमिटी दिया गया है। इसमें केंद्रीय मंत्री भूपिंदर सिंह यादव, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, राष्ट्रीय पार्टी महासचिव विनोद तावड़े और महासचिव संगठन बीएल संतोष शामिल हैं। यह समिति संभावित उम्‍मीदवारों को पार्टी में शामिल करने से पहले उनकी स्‍क्रीनिंग करेगी। किसी उम्‍मीदवार को पार्टी के साथ जोड़ा जाए या नहीं, पहला निर्णय इसी का होगा।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी नीतियों के सबसे बड़े आलोचकों के तौर पर पेश किया है। उन्‍हें पीएम मोदी के खिलाफ विपक्ष के प्रमुख चेहरे के तौर पर देखा जाता है। बीजेपी की कोशिश राहुल को राजनीतिक रूप से कमजोर करने की है। वह कांग्रेस में राहुल के प्रभाव को कम करना चाहती है। यही वजह है कि हाल के सालों में बीजेपी ने राहुल की टीम से कई युवा नेताओं को शामिल किया है। उन्हें मुख्‍य पद देकर इनाम भी दिया है। इन नेताओं में ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद और आरपीएन सिंह शामिल हैं। सिंधिया केंद्रीय विमानन मंत्री हैं। प्रसाद योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार में लोक निर्माण मंत्री हैं। वहीं, आरपीएन सिंह को बीजेपी में बड़े पद का इंतजार है।

वैसे तो बीजेपी ने सचिन पायलट और मिलिंद देवड़ा को भी अपने साथ मिलाने की कोशिश की। लेकिन, बात नहीं बनी। देवड़ा आखिरकार पिछले रविवार को एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो गए। यह महाराष्ट्र में बीजेपी की सहयोगी है। अभी तक कांग्रेस आलाकमान पायलट को बनाए रखने में कामयाब रहा है। उन्हें एआईसीसी के महासचिव पद पर प्रमोट किया गया है। अगर नेताओं को पाला बदलने के लिए लुभाकर बीजेपी कांग्रेस पर चोट करने में अब और कामयाब हुई तो इसका राहुल गांधी पर सीधा असर पड़ेगा। इसे राहुल की बड़ी नाकामी माना जाएगा। इसके उलट अपनी कोशिश में बीजेपी ने कांग्रेस के ही कई पुराने दिग्‍गजों को इस कवायद में लगा रखा है। इनमें हिमंत बिस्वा सरमा, एन बीरेन सिंह पेमा खांडू, नारायण राणे, कैप्टन अमरिंदर सिंह, विजय बहुगुणा, एसएम कृष्णा और दिगंबर कामत शामिल हैं।

इसके अलावा ऐसे समय में जब बीजेपी अपने आधार का विस्तार करने के लिए केरल में ईसाइयों को लुभाने की कोशिश कर रही है। तब पार्टी ने केजे अल्फोंस, टॉम वडक्कन और अनिल एंटनी सहित समुदाय के कुछ प्रमुख चेहरों को शामिल किया है। अनिल एंटनी कांग्रेस के दिग्गज नेता और रक्षा मंत्री रह चुके एके एंटनी के बेटे हैं। इसमें केंद्रीय मंत्री भूपिंदर सिंह यादव, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, राष्ट्रीय पार्टी महासचिव विनोद तावड़े और महासचिव संगठन बीएल संतोष शामिल हैं। यह समिति संभावित उम्‍मीदवारों को पार्टी में शामिल करने से पहले उनकी स्‍क्रीनिंग करेगी। किसी उम्‍मीदवार को पार्टी के साथ जोड़ा जाए या नहीं, पहला निर्णय इसी का होगा।मीडिया में खबरें हैं कि बीजेपी कांग्रेस खेमे के ऐसे कई नेताओं के संपर्क में है जो उसके साथ जुड़ने की इच्‍छा रखते हैं।दिग्‍गजों को इस कवायद में लगा रखा है। इनमें हिमंत बिस्वा सरमा, एन बीरेन सिंह पेमा खांडू, नारायण राणे, कैप्टन अमरिंदर सिंह, विजय बहुगुणा, एसएम कृष्णा और दिगंबर कामत शामिल हैं। इनमें से कुछ हरियाणा, महाराष्ट्र, पंजाब और राजस्थान में गांधी परिवार के करीबी माने जाते हैं। ये लोकसभा चुनाव से पहले पाला बदल सकते हैं।

आखिर बीजेपी की काट कैसे ढूंढ पाएगी कांग्रेस?

ये सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर कांग्रेस बीजेपी की काट कैसे ढूंढ पाएगी! 2024 में पहुंच गए हैं। चुनाव का वर्ष है। लोकसभा चुनावों से महीनों पहले कांग्रेस हिंदी हृदय क्षेत्र के तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव हार गई जो केंद्र में सरकार बनाने के लिए महत्वपूर्ण है। राजस्थान में अंदरूनी कलह को भूल जाइए, आसान जीत की उम्मीद वाले प्रदेश छत्तीसगढ़ में हार और मध्य प्रदेश में विवादों में फंसी बीजेपी की मुश्किल बढ़ाने में भी असफलता, ये सब कांग्रेस के लिए बहुत बुरे संकेत हैं। उधर, अयोध्या के मुख्य पुजारी ने घोषणा की है कि बीजेपी शासन में राम राज्य आ रहा है। कांग्रेस की एक बड़ी समस्या यह है कि वह अलग तरह के ब्रैंड पॉलिटिक्स का नैरेटिव नहीं गढ़ पा रही है। राहुल गांधी इसे एक विचारधारा की लड़ाई बताते हैं, लेकिन वो नई सकारात्मक सोच सामने नहीं ला पा रहे हैं। गांधी ने मोदी-शाह के ‘नफरत के बाजार’ के खिलाफ ‘मोहब्बत की दुकान’ का नैरेटिव गढ़ा था। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए ‘पनौती’ जैसे छिछले शब्द का उपयोग करके फिर इसकी धार खो दी। कांग्रेस को बीजेपी को उसके वैचारिक आधार पर आकर ही लड़ना होगा। कांग्रेस को अपनी विचारधारा के सांचे में राम राज्य की परिभाषा पेश करनी होगी। बीजेपी की बिल्कुल स्पष्ट विचारधारा है। वह ऐसे राम राज्य की कल्पना को आधार देने में जुटी है जहां हिन्दुत्व और विकास की राजनीति का संगम हो। रामायण में इसका उपयोग करना नया नहीं है: चोलों से मुगलों तक, शासकों ने इसे राजनीतिक युक्ति के रूप में इस्तेमाल किया है। वे रामायण की सांस्कृतिक महत्त्व का उपयोग करते हैं जो मतदाताओं के दिमाग में एक संकल्प के रूप में स्थापित हो जाता है। हर भाषा में रामायण के 300 संस्करण हैं, जिन्हें रामलीला से लेकर टीवी सीरियल तक मनोहारी परंपराओं में दर्शाया जाता है।

भाजपा भारतीय उपहमाद्वीप में राम और रामायण के जरिए हिंदू राष्ट्रवाद के एजेंडे को मजबूत करना चाहती है। सावरकर अपनी किताब ‘इसेंसियल्स ऑफ हिंदुत्व’ में रामायण को हिंदुओं के लिए राष्ट्रवादी ग्रंथ मानते हैं जैसा यहूदियों के लिए जेनेसिस है। भाजपा के लिए राम राज्य शक्तिशाली जनवादी विचारधारा बन गया है। राम राज्य की कल्पना आर्थिक-सामाजिक उथल-पुथल से जख्मी अपने हिंदू नागरिकों को वो हिंदू राज्य में मुक्ति का सपना दिखाती है। महामारी के बाद मोदी की लोकप्रियता बढ़ने के पीछे भी यही कारण है। कांग्रेस अगर वापसी चाहती है तो उसे भाजपा से अलग अपनी स्पष्ट पहचान बनानी होगी। भाजपा जैसा बनना तो उसे और कमजोर ही करेगा। भाजपा की रणनीति के केंद्र में होने के कारण रामायण से सीधे जुड़ना जरूरी है। इसकी नई व्याख्या से भाजपा की हिंदू जनता पर पकड़ कमजोर हो सकती है और कांग्रेस के नजरिए को समर्थन मिल सकता है। इसमें राहुल गांधी अकेले नहीं हैं। उनके पास महात्मा गांधी का सहारा है।

महात्मा गांधी ने स्वराज को राम राज्य से जोड़ते हुए कहा था, ‘स्वराज रामराज्य का ही दूसरा नाम है।’ उन्होंने इसका इस्तेमाल धार्मिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक रूप से किया था। उनके लिए रामराज्य पश्चिमी मानदंडों की नकल नहीं, बल्कि भारत के अपने इतिहास और आत्मनिर्भरता से पैदा हुए लोकतंत्र का प्रतीक था। इस प्रकार, राम राज्य आत्मनिर्भर स्वराज्य का प्रतीक बन गया। कांग्रेस पार्टी हिंदू राष्ट्र के विरोध में महात्मा गांधी की नीति का सहारा लेकर राम राज्य पर बीजेपी की राजनीति की बखिया उधेड़ सकती है। महात्मा गांधी ने कहा था, ‘रामराज्य का मतलब हिंदू राज नहीं है। अगर भारत का स्वराज सिर्फ हिंदुओं का राज होगा तो मैं उसे स्वराज नहीं मानूंगा।’ राहुल गांधी की ‘मोहब्बत की दुकान’ से आगे बढ़ते हुए कांग्रेस सभी धर्मों के लिए समावेशी राम राज्य का विचार पेश सकती है। महात्मा गांधी तो ‘राम और रहीम को एक’ मानते थे।

कांग्रेस का रामराज्य लोगों को सत्ता सौंपने और विकेंद्रीकरण पर जोर दे सकता है, जैसा गांधी चाहते थे। इससे भाजपा द्वारा संघीय ढांचे को कमजोर करने के आरोप का भी जवाब मिल सकता है। कांग्रेस की कल्याणकारी सोच को ऐसे रामराज्य के नजरिए से भी जोड़ा जा सकता है, जहां राजा और प्रजा बराबर हों। राहुल गांधी के पास पहले भी गांधीवादी रामराज्य का नैरेटिव बनाने का मौका था। वो चाहते तो संसद सदस्यता छिनने के बाद बंगले से निकाले जाने या भारत जोड़ो यात्रा को क्रमशः राम के वनवास और उनकी पदयात्रा से जोड़कर पेश कर सकते थे। कांग्रेस कह सकती थी कि जैसे राम अयोध्या से दक्षिण श्रीलंका गए, वैसे ही राहुल कश्मीर से कन्याकुमारी तक चले। यूपीए-1 की जीत भी ऐसी ही अप्रत्याशित थी। तब कोई विश्लेषक नहीं भांप सका था कि बीजेपी की सरकार जाने वाली है। आज की गठबंधन की राजनीति में कांग्रेस को एक ब्रह्मास्त्र की जरूरत है। गांधीवादी रामराज्य को सभी के लिए समृद्धि का प्रतीक बताना वह ब्रह्मास्त्र हो सकता है।