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क्या उड़ीसा में नवीन पटनायक कर सकते हैं बीजेपी से गठबंधन?

अब उड़ीसा में नवीन पटनायक बीजेपी से गठबंधन कर सकते हैं! ओडिशा में बीजद के साथ गठबंधन से भाजपा को लाभ है, यह आसानी से समझा जा सकता है। सवाल है कि नवीन पटनायक के नेतृत्व वाली पार्टी ने गठबंधन का रास्ता क्यों चुना जबकि वो 2009 से राज्य में सभी लोकसभा और विधानसभा चुनाव जीत रही है? ओडिशा के दो मुख्य प्रतिद्वंद्वी अब सहयोगी बन गए हैं, विपक्ष की जगह के लिए एकमात्र दावेदार के रूप में बहुत हाशिये पर पड़ी कांग्रेस के लिए इसका क्या मतलब है? बीजेडी के कुछ वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि 15 साल बाद भाजपा के साथ फिर से जुड़ने के पटनायक के फैसले से पता चलता है कि वह फूंक-फूंक कर कदम बढ़ा रहे हैं ताकि करीब 25 वर्षों के मुख्यमंत्री के रूप में रिकॉर्ड कार्यकाल की दहलीज पर अपनी विरासत का निर्माण कर सकें।उन्होंने कहा कि पार्टी के एकमात्र नेता की बढ़ती उम्र की चर्चाओं के बीच सरकार और पार्टी में बेचैनी महसूस की जा रही है। यह अलग बात है कि पटनायक के निर्विवाद प्रभाव और उनकी पार्टी की जीत की लय बरकरार है। हाल के सप्ताहों में अरबिंदा धाली, प्रदीप पाणिग्रही, प्रशांत जगदेव और देबासीस नायक जैसे विधायकों सहित बीजद के कुछ नेता पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। कई लोगों का मानना है कि नए चेहरों को लाने के लिए कई मौजूदा सांसदों और विधायकों को पार्टी के टिकट देने से इनकार करने की पटनायक की प्रवृत्ति को देखकर कुछ बेंच लीडर भी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा में शामिल हो जाएंगे। गठबंधन इस समस्या का कुछ हद तक समाधान करेगा। यह स्पष्ट है कि पटनायक अपने विश्वासपात्र पूर्व नौकरशाह केवी पांडियन को ड्राइविंग सीट पर बैठते देखना पसंद करते हैं। पांडियन राज्यभर में यात्रा कर रहे हैं और सीएम की ओर से मीटिंग ले रहे हैं। बीजेडी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘बीजेडी जितने लंबे समय तक सत्ता में रहेगी, उतना ही ज्यादा महत्वाकांक्षी स्थानीय नेता टिकट या पद चाहेंगे। उम्मीद पूरी नहीं होने पर वो खासकर बीजेपी में अवसर तलाशेंगे।’ इसलिए, बीजेडी के समर्थकों का मानना है कि पार्टी प्रमुख के लिए अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी भाजपा से दोस्ती करना ही सही लगता है, क्योंकि अब उनकी मुख्य रुचि लोकसभा सीटों में होगी।ओडिशा में कांग्रेस का कुछ खास बच नहीं गया है। उसने प्रदेश में पहले बीजेडी को और फिर बीजेपी को अपनी जगह घेरने का मौका दिया और वो खुद तीसरे स्थान पर खिसक गई। अब वह ओडिशा के विपक्ष में खुद को अकेली पाएगी। कांग्रेस के लिए यह मौका भी है और चुनौती भी। एक नाखुश बीजेडी नेता ने कहा, ‘कांग्रेस को सिर्फ घर वापसी करने वाले नेताओं को ही नहीं, बीजेडी में बढ़ती बेचैनी का फायदा उठाने की कोशिश करनी चाहिए।’

इसका मतलब यह भी है कि भाजपा ने फिलहाल बीजेडी को हराने और ओडिशा की सत्ता में आने की अपनी महत्वाकांक्षा को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। उसकी प्राथमिकता ज्यादा से ज्यादा सीटों के साथ मोदी सरकार का तीसरे कार्यकाल शुरू करने में है। ऐसा लगता है कि इसने पार्टनर-इन-वेटिंग बनने के लिए भी समझौता कर लिया है, जैसे कि यह बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले जेडीयू को ढो रहा है। यदि गठबंधन ओडिशा में अगला लोकसभा और विधानसभा चुनाव जीतता है, तो ऐसा लगता है कि बीजेडी ही राज्य सरकार में कोई सत्ता-साझाकरण नहीं चाहेगी। इसके बदले वह केंद्र की सत्ता में शामिल नहीं होगी।

ओडिशा में कांग्रेस का कुछ खास बच नहीं गया है। उसने प्रदेश में पहले बीजेडी को और फिर बीजेपी को अपनी जगह घेरने का मौका दिया और वो खुद तीसरे स्थान पर खिसक गई। पांडियन राज्यभर में यात्रा कर रहे हैं और सीएम की ओर से मीटिंग ले रहे हैं। बीजेडी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘बीजेडी जितने लंबे समय तक सत्ता में रहेगी, उतना ही ज्यादा महत्वाकांक्षी स्थानीय नेता टिकट या पद चाहेंगे। उम्मीद पूरी नहीं होने पर वो खासकर बीजेपी में अवसर तलाशेंगे।’ इसलिए, बीजेडी के समर्थकों का मानना है कि पार्टी प्रमुख के लिए अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी भाजपा से दोस्ती करना ही सही लगता है, क्योंकि अब उनकी मुख्य रुचि लोकसभा सीटों में होगी।ओडिशा में कांग्रेस का कुछ खास बच नहीं गया है।अब वह ओडिशा के विपक्ष में खुद को अकेली पाएगी। कांग्रेस के लिए यह मौका भी है और चुनौती भी। एक नाखुश बीजेडी नेता ने कहा, ‘कांग्रेस को सिर्फ घर वापसी करने वाले नेताओं को ही नहीं, बीजेडी में बढ़ती बेचैनी का फायदा उठाने की कोशिश करनी चाहिए।’

आखिर क्या है बिहार एमएलसी इलेक्शन की गणित?

आज हम आपको बिहार एमएलसी इलेक्शन की गणित समझाने जा रहे हैं! एनडीए से बिहार विधान परिषद का कौन प्रतिनिधित्व करेगा? ये सवाल रणनीतिकारों के सामने अभी भी अनुतरित हैं। कहा जा रहा है कि फिलहाल एनडीए सातवें उम्मीदवार को बिहार विधान परिषद भेजे जाने के जुगाड़ में जुटी हुई है। इसके अलावा भी कई पेच फंसे हुए हैं, जिसे सुलझाए बिना घोषणा कर देना एनडीए के लिए काफी नुकसानदेह हो सकता है। जिन 11 सदस्यों के कार्यकाल खत्म हो रहे हैं, उनमें नीतीश कुमार, राबड़ी देवी, सैयद शाहनवाज हुसैन, प्रेमचंद्र मिश्रा, संजय झा, संतोष कुमार सुमन, मंगल पाण्डेय, खालिद अनवर, रामचंद्र पूर्वे, रामेश्वर महतो और संजय पासवान का नाम शामिल है। एनडीए के पास 6 और महागठबंधन के हिस्से में 5 सीटें हैं। एनडीए के रणनीतिकार अभी इस जुगाड़ में लगे हुए हैं कि कुछ और विधायक एनडीए में आ जाएं तो सातवें उम्मीदवार को भेजा जाना संभव हो सके। अभी महागठबंधन से सात विधायक टूट कर एनडीए आए हैं। अभी आठवें विधायक के रूप में नीतू सिंह जुड़ते-जुड़ते रह गईं।

समीकरण ये है कि अभी एक उम्मीदवार को विधान परिषद में भेजने के लिए 20.16 यानी 21 विधायक की जरूरत है। इन विधायकों के जरिए 6 उम्मीदवार को बिहार विधान परिषद भेजने के बाद भी कई विधायक शेष रह जाते हैं। ऐसे में दो स्थिति एनडीए के लिए फायदेमंद हो सकती है। एक तो ये कि माले एमएलसी चुनाव में भाग नहीं ले। ऐसा गर हुआ तो एक एमएलसी बनाने के लिए 20 विधायक की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में एनडीए को सातवें उम्मीदवार को एमएलसी बनाने में सफलता मिल सकती है। दूसरा पेच तो सामाजिक समीकरण के तुष्टिकरण का है। रणनीतिकार चाहते हैं कि एमएलसी उम्मीदवार के चयन के लिए तय सूची ऐसी हो जो सभी जातियों को भागीदारी देते दिखे। पार्टी के विधायकों की संख्या के अनुसार भाजपा को चार सीटें मिलनी तय हैं। भाजपा एक सीट हम को देने जा रही है इसकी घोषणा प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी पहले ही कर चुके हैं। ऐसे में भाजपा की ओर से तीन नेता ही विधान पार्षद बनेंगे।

काफी मंथन के बाद राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष की उपस्थिति में कई नामों पर विचार किया गया। मिली जानकारी के अनुसार सूची को शॉर्ट लिस्ट करते हुए ओबीसी से चार, राजपूत-ब्राह्मण से चार, और दलित से भी चार उम्मीदवारों के प्रस्ताव भेजे गए है। लेकिन सूत्र बताते है कि इन नाम पर अभी आलाकमान की मुहर नहीं लगी है। बिहार विधान परिषद के द्विवार्षिक चुनाव के लिए नामांकन की प्रक्रिया 4 मार्च से शुरू होगी। 11 मार्च अंतिम तारीख है। 21 मार्च को विधानसभा में सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक वोटिंग होगी। 5 बजे से उसी दिन गिनती होगी।

जेडीयू सूत्रों की माने तो यहां कोई पेच नहीं फंस रहा। विधायकों की संख्या के अनुसार जदयू को दो सीट मिलने जा रही है। एक सीट तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नाम सुरक्षित है। दूसरे सीट पर किसी मुस्लिम या महिला को भेजने की तैयारी है। बता दें कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, संजय झा, रामेश्वर महतो और खालिद अंसारी के टर्म पूरे हो होने वाले हैं। संजय झा को राज्यसभा भेज दिया गया है। ऐसी चर्चा है कि रामेश्वर महतो का टिकट इस बार कट गया है। सेक्युलरिज्म के नाम पर एक सीट मुस्लिम को जाएगा। खालिद अनवर के दूसरे टर्म की उम्मीद 50:50 है। संभव है किसी मुस्लिम या कोई महिला चेहरा भेजा जाए। पार्टी के विधायकों की संख्या के अनुसार, बीजेपी को चार सीटें मिलनी तय है। भाजपा एक सीट हम को देने जा रही है, इसकी घोषणा प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी पहले ही कर चुके हैं। ऐसे में बीजेपी की ओर से तीन नेता ही विधान पार्षद बनेंगे। पार्टी में विधान परिषद के तौर पर कई नाम चर्चा में हैं। भाजपा के भीतर सक्रिय हुई नई टीम के भीतर किसे भेजे और न भेजें , इसे लेकर भारी लोचा है। भाजपा के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी की अध्यक्षता और पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष की उपस्थिति में लगभग 40 से ज्यादा नामों की सूची पर विचार हुआ।

कहा जा रहा है कि इस सूची को लेकर बीएल संतोष काफी नाराज हुए। उन्होंने कहा कि सामाजिक समीकरण पर कोई काम नहीं किया गया है। चुनाव सामने है और सामाजिक समीकरण को संतुलित करने का कोई प्रयास ही नहीं हुआ है। और फिर इस बैठक में जातिगत समीकरण को लेकर बात हुई। वैश्य से धर्मशिला गुप्ता राज्यसभा जा चुकी हैं। इसलिए सूची से वैश्य नाम हटा। इसी तरह फिर सूची से कुशवाहा और भूमिहार के नामों को हटाया गया कि इस जाति से डिप्टी सीएम बना दिए गए हैं। अब सवर्ण में राजपूत और ब्राह्मण से नामों का चयन करें। ओबीसी से छूट गई जाति से आने वाले नामों का चयन करें और दलित से भी उम्मीदवारों के नाम तय किए जाएं। जानकारी के अनुसार, उन 40 से अधिक नामों की सूची को शॉर्ट लिस्ट करते हुए कुल 12 नामों का चयन किया गया है। इनमें दलित, राजपूत और कुर्मी से चार चार नामों की सूची बनाई गई। अब इन नामों पर केंद्रीय नेतृत्व विचार कर तीन नाम तय करेगी जो विधान परिषद जाएंगे।

क्या जनविश्वास रैली से तेजस्वी यादव का बढ़ गया है मान?

वर्तमान में जनविश्वास रैली से तेजस्वी यादव का मान बढ़ चुका है! राष्ट्रीय जनता दल राजद की रविवार को पटना में हुई रैली को इंडी अलायंस के प्रमुख राजनीतिक दलों का न सिर्फ पूरा समर्थन मिला, बल्कि बड़े नेताओं ने शिरकत भी की। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी के अलावा भाकपा के डी राजा, माकपा के सीताराम येचुरी, सीपीआई एमएल के दीपांकर भट्टाचार्य और समाजवादी पार्टी के नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व सीएम अखिलेश यादव भी पहुंचे थे। राजनीति से सरोकार रखने वाले लालू परिवार के पांच सदस्य भी मंच पर मौजूद थे। राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी पूर्व सीएम राबड़ी देवी, बेटी मीसा भारती के अलावा दोनों बेटे- तेजस्वी और तेज प्रताप तो रैली के आयोजक ही थे। 20 फरवरी से एक मार्च तक बिहार में जन विश्वास यात्रा के बाद तेजस्वी ने तीन मार्च को पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में जन विश्वास रैली का आयोजन किया था। रैली में उमड़ी भारी भीड़ से तेजस्वी यादव का उत्साह तो यकीनन बढ़ा होगा। साथ ही पस्त पड़े इंडी अलायंस के नेताओं को भी रैली की भीड़ से ऑक्सीजन मिला होगा। लालू यादव भी अपने दौर में तरह-तरह नामों से रैलियां करते रहे हैं, लेकिन वर्षों बाद आरजेडी की शायद इतनी शानदार रैली पहली बार हुई है। रैली की सफलता का श्रेय सीधे-सीधे तेजस्वी यादव को ही जाएगा, क्योंकि इसके लिए उन्होंने बिहार में 10 दिनों का पहले तूफानी दौरा किया। रैली उन्हीं की योजना-परिकल्पना थी। चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर रैली में आए लोगों को भाड़े की भीड़ बताते हैं। ऐसा होता भी है, इसलिए प्रशांत के आकलन को एकबारगी खारिज नहीं किया जा सकता है। पर, राजनीति में दशक से भी कम का सफर तय करने वाले तेजस्वी इतनी भीड़ अगर अपने दम पर जुटा पाए तो इसे कमतर आंकने की बात बेमानी लगती है।

रैली को मंच पर मौजूद तमाम नेताओं ने संबोधित किया। उम्रदराज और अनुभवी नेता भी उनमें शामिल थे। पीएम नरेंद्र मोदी की आलोचना में सबने अपनी ऊर्जा जाया की, लेकिन तेजस्वी अपने 17 महीने के कार्यकाल की उपलब्धियां गिनाते-बताते रहे। जनता का आशीर्वाद मिलने पर बिहार में रोजगार की भरमार के सपने दिखाते रहे। नीतीश कुमार के महागठबंधन से अलग होने पर उन्होंने तंज तो किया, लेकिन शब्दों की मर्यादा का ख्याल रखा। मल्लिकार्जुन खरगे की तरह उनकी जुबान से न नीतीश कुमार के लिए जहर बुझे शब्द निकले और न नरेंद्र मोदी की कटु आलोचना गूंजी। खरगे के निशाने पर तो नीतीश नहीं थे, लेकिन मोदी को खरगे ने झूठों का सरदार कह दिया। तेजस्वी ने मोदी की आलोचना में भी नीतीश को ही निशाने पर रखा। उन्होंने कहा कि मोदी जी कई तरह की गारंटी दे रहे हैं। पर, क्या वे चाचा नीतीश कुमार के न पलटने की गारंटी दे सकते हैं!

पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने अपने भाषण में रोजगार का उल्लेख खूब किया। यानी 17 महीने नीतीश के साथ उपमुख्यमंत्री रहने की वजह से रोजगार सृजन की दिशा में उन्होंने जो काम किया, उसे ही गिनाया। इसी को आधार बना कर उन्होंने जनता से आशीर्वाद भी मांगा। तेजस्वी की पूरी कवायद से एक संकेत साफ निकल कर सामने आया कि उन्हें दिल्ली की बजाय बिहार की अधिक चिंता है। रैली की भीड़ भी यही बोलती रही कि तेजस्वी मने नौकरी। तेजस्वी ने 10 लाख सरकारी नौकरी का जो वादा 2020 के विधानसभा चुनाव में किया था, उस पर सरकार में रहते कैसे उसे उसी नीतीश कुमार से पूरा कराया, जिसे तब नीतीश ने यह कह कर मजाक उड़ाया था कि इसके लिए पैसे कहां से लाएंगे। बिहार में अगले साल विधानसभा का भी चुनाव होना है। इसलिए अप्रैल में होने वाले लोकसभा चुनाव को उसका पूर्वाभ्यास माना जा सकता है। 2019 में बिहार की 40 में 39 सीटें एनडीए ने नरेंद्र मोदी के नाम पर जीत ली। हालांकि साल भर बाद यानी 2020 के असेंबली चुनाव में उस तरह की उत्साहजनक कामयाबी एनडीए को नहीं मिली। हां, सरकार बनाने का बहुमत जरूर मिल गया था। तब तेजस्वी के महागठबंधन की उपलब्धि भी कम नहीं थी। अपनी मेहनत से महागठबंधन ने 110 सीटें जीत ली थीं। महज 12-13 विधायकों की कमी से वे सरकार बनाने से चूक गए। बाद में अपने कौशल से तेजस्वी ने एआईएमआईएम के चार विधायक झटक कर महागठबंधन विधायकों की संख्या 114 तक पहुंचा दी। हालांकि कांग्रेस और आरजेडी के सात विधायकों ने हाल ही में पाला बदल लिया है। खैर, तेजस्वी ने नौकरी के मामले में जो लकीर खींची है, उससे तो यही लगता है कि अब बिहार की चुनावी लड़ाई इसके ही इर्द-गिर्द घूमेगी। ऐसा हुआ तो तेजस्वी की तपस्या रंग ला सकती है।

आखिर किन-किन राज्यों में जाने वाले हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी?

आज हम आपको बताएंगे कि आखिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किन-किन राज्यों में जाने वाले हैं! प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस सप्ताहांत असम, अरुणाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश का दौरा करेंगे और इस दौरान कई कार्यक्रमों में भाग लेंगे तथा करोड़ों रुपये की विभिन्न विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यस करेंगे। प्रधानमंत्री कार्यालय पीएमओ ने शुक्रवार को एक बयान में यह जानकारी दी। पीएमओ के अनुसार, प्रधानमंत्री शुक्रवार रात को असम पहुंच जाएंगे और अगले दिन शनिवार की सुबह काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान का दौरा करेंगे। यहां से प्रधानमंत्री अरुणाचल के ईटानगर के लिए रवाना होंगे, जहां वह ‘विकसित भारत, विकसित उत्तर पूर्व’ कार्यक्रम में भाग लेंगे। वह सेला सुरंग राष्ट्र को समर्पित करेंगे और लगभग 10,000 करोड़ रुपये की उन्नति योजना की शुरुआत भी करेंगे।कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री मणिपुर, मेघालय, नगालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश में लगभग 55,600 करोड़ रुपये की कई विकास परियोजनाओं का उद्घाटन, लोकार्पण और शिलान्यास भी करेंगे।

इसके बाद प्रधानमंत्री दोपहर करीब सवा बारह बजे असम के जोरहाट में प्रसिद्ध अहोम सेनापति लाचित बोरफुकन की भव्य प्रतिमा का अनावरण करेंगे।वह जोरहाट में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में भी भाग लेंगे और असम में 17,500 करोड़ रुपये से अधिक की कई विकास परियोजनाओं का उद्घाटन, समर्पण और आधारशिला रखेंगे।इसके बाद, प्रधानमंत्री पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी की यात्रा करेंगे और लगभग 3:45 बजे एक सार्वजनिक कार्यक्रम में भाग लेंगे। वह पश्चिम बंगाल में लगभग 4,500 करोड़ रुपये की कई विकास परियोजनाओं का उद्घाटन, लोकार्पण और शिलान्यास करेंगे। यहां से शाम करीब सात बजे प्रधानमंत्री अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी पहुंचेंगे और वहां काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन एवं पूजा करेंगे।

अगले दिन 10 मार्च को दोपहर लगभग 12 बजे प्रधानमंत्री एक सार्वजनिक कार्यक्रम में भाग लेंगे, जहां वे उत्तर प्रदेश में 42,000 करोड़ रुपये से अधिक की अनेक विकास परियोजनाओं का उद्घाटन, लोकार्पण और शिलान्यास करेंगे। इसके बाद प्रधानमंत्री वीडियो कांफ्रेंस के जरिये छत्तीसगढ़ में महतारी वंदना योजना की पहली किस्त वितरित करेंगे। पांच दिन के भीतर दूसरी बार बिहार आ रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फिर से सौगातों का पिटारा खोलेंगे। 2024 लोकसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मिशन मोड में काम कर रहे हैं। हाल ही में दक्षिण राज्य केरल, तमिलनाडु के साथ महाराष्ट्र, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल का दौरा कर चुके पीएम मोदी के अगले दस दिन भी व्यस्तता से भरे होंगे। इस दौरान पीएम मोदी बिना ब्रेक लिए राज्यों का दौरा करने के साथ ही कई विकास परियोजनाओं का उद्घाटन, लोकार्पण और शिलान्यास करेंगे। अगले 10 दिनों में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश भर के 12 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 29 कार्यक्रमों में भाग लेंगे। इनमें तेलंगाना, तमिलनाडु, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार, जम्मू और कश्मीर, असम, अरुणाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और दिल्ली शामिल हैं। इसी क्रम में पीएम मोदी अब 4 से 7 मार्च तक पांच राज्यों का मैराथन दौरा करने वाले हैं, जिनमें तेलंगाना, तमिलनाडु, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और जम्मू-कश्मीर शामिल हैं।

सबसे पहले प्रधानमंत्री मोदी तेलंगाना पहुंचेंगे। जहां आज सुबह साढ़े 10 बजे वो आदिलाबाद में विभिन्न विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास करेंगे। इसके बाद पीएम मोदी 11.15 पर वहां एक जनसभा को भी संबोधित करेंगे। इसके बाद वो तमिलनाडु का दौरा करेंगे। जहां पहले वो कलपक्कम में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे। इसके बाद शाम सवा पांच बजे वो चेन्नई में जनसभा को संबोधित करेंगे। पांच मार्च को पीएम मोदी दोपहर ढाई बजे ओडिशा के चंडीखोल जाजपुर में परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास करने के साथ-साथ जनसभा को संबोधित करेंगे। हालांकि, वो लगातार मैराथन दौरा कर रहे हैं लेकिन बुधवार छह मार्च को पीएम मोदी प्रधानमंत्री कोलकाता में कई विकास परियोजनाओं का उद्घाटन, लोकार्पण और शिलान्यास करेंगे।

7 मार्च को पीएम मोदी जम्मू-कश्मीर जाएंगे। वो सुबह साढ़े ग्यारह बजे श्रीनगर के एसकेआईसीसी स्टेडियम में विभिन्न विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास करेंगे। यहां मिशन 370 प्लस सीट को लेकर एक चुनावी रैली को भी संबोधित करेंगे। बताया जा रहा है कि पीएम मोदी की इस विशाल रैली में 2 लाख से अधिक लोग शामिल हो सकते हैं। 10 मार्च को पीएम मोदी उत्तर प्रदेश की यात्रा करेंगे और आजमगढ़ से विभिन्न परियोजनाएं राष्ट्र को समर्पित करेंगे। बता दें कि लगभग 4,500 करोड़ रुपये की कई विकास परियोजनाओं का उद्घाटन, लोकार्पण और शिलान्यास करेंगे। यहां से शाम करीब सात बजे प्रधानमंत्री अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी पहुंचेंगे और वहां काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन एवं पूजा करेंगे। 11 मार्च को प्रधानमंत्री नई दिल्ली के पूसा में नमो ड्रोन दीदी और लखपति दीदी से जुड़े एक कार्यक्रम में शामिल होंगे। फिर, वह द्वारका एक्सप्रेसवे के हरियाणा खंड का उद्घाटन करेंगे। शाम को पीएम डीआरडीओ के एक कार्यक्रम में शामिल होंगे।

क्या पुराने सांसदों के हवाले जीत पाएगी कांग्रेस?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कांग्रेस पुराने सांसदों के हवाले जीत पाएगी या नहीं! आखिर लंबे इंतजार के बाद शुक्रवार को देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी और प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने अपनी लिस्ट जारी कर ही दी। पहली लिस्ट पार्टी ने 39 उम्मीदवारों के नाम का ऐलान किया। कांग्रेस संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल, पार्टी के कोषाध्यक्ष अजय माकन और कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रभारी पवन खेड़ा ने मीडिया में उम्मीदवारों को लेकर तस्वीर साफ की। इसमें बताया गया कि राहुल गांधी वायनाड से चुनाव लड़ेंगे। जबकि केसी वेणुगोपाल केरल के अलपुजा से चुनावी मैदान में उतरेंगे। वहीं छत्तीसगढ़ के पूर्व सीएम भूपेश बघेल राजनांदगांव से तो पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर तिरुवनंतपुरम से चुनाव लड़ेंगे। इनके अलावा, प्रमुख चेहरों में के सुरेश मावेलिक्कारा से, कर्नाटक के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के छोटे भाई व मौजूदा सांसद डीके सुरेश को बेंगलुरु ग्रामीण, छत्तीसगढ़ के सीनियर नेता ताम्रध्वज साहू को महासमुंद से टिकट दिया गया है। कांग्रेस की पहली केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक गुरुवार को हुई थी, जिसमें लगभग 60 नामों पर मंथन किया गया। उसी के बाद शुक्रवार को पहली लिस्ट जारी की गई। पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति की दूसरी बैठक सोमवार 11 मार्च को होनी है।

बीजेपी में जहां मौजूदा सांसदों के तमाम टिकट काटे गए, वहीं कांग्रेस ने अपने ज्यादातर सांसदों को फिर से मौका दिया है। इस बारे में वेणुगोपाल का कहना था कि पार्टी ने उम्मीदवार की प्रतिभा, जीत की प्रबलता और पार्टी के प्रति निष्ठा के आधार पर टिकट दिए हैं। उन्होंने अपनी पहली लिस्ट को सामने रखते हुए कहा कि लिस्ट में आपको अनुभवी व युवाओं की जमीन से जुड़े नेताओं का मिश्रण मिलेगा। वेणुगोपाल ने उम्मीदवारों के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि 39 में जहां 15 उम्मीदवार सामान्य वर्ग से हैं, वहीं 24 उम्मीदवार एससी, एसटी, ओबीसी व अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं। इनमें से 12 उम्मीदवार 50 साल से कम उम्र के हैं तो वहीं आठ उम्मीदवार 50-60 आयु वर्ग के, 12 चेहरे 61-70 आयु वर्ग के तो वहीं सात उम्मीदवार 71-76 आयु वर्ग के हैंपहली लिस्ट में जिन आठ राज्यों की सीटों पर उम्मीदवारों को टिकट दिए गए, उनमें केरल से 15 चेहरे, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक से छह-छह उम्मीदवार, तेलंगाना से चार, मेघालय से दो और त्रिपुरा, सिक्किम व नागालैंड से एक-एक नाम शामिल हैं। कांग्रेस उम्मीदवारों की पहली सूची में 15 उम्मीदवार सामान्य वर्ग से और 24 उम्मीदवार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदायों से हैं। 12 उम्मीदवार 50 साल से कम उम्र के हैं। आठ उम्मीदवार 50 से 60 वर्ष के बीच के और 12 उम्मीदवार 61 से 70 साल के बीच के जबकि सात उम्मीदवार 71 से 76 साल के बीच के हैं।

मुख्य विपक्षी दल के उम्मीदवारों की पहली सूची में सबसे अधिक 16 उम्मीदवार केरल से हैं। कांग्रेस केरल की कुल 20 लोकसभा सीट में 16 पर चुनाव लड़ेगी। चार सीट पर सहयोगी दल चुनाव लड़ेंगे। कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ की छह, कर्नाटक की सात, तेलंगाना की चार, मेघालय की दो और लक्षद्वीप, नगालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा की एक-एक सीट के लिए उम्मीदवार घोषित किए हैं। पार्टी ने केरल में अपने सभी 15 मौजूदा लोकसभा सदस्यों को फिर से चुनावी मैदान में उतारा है। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ की कोरबा सीट से सांसद ज्योत्सना महंत और कर्नाटक की बेंगलुरु ग्रामीण सीट से मौजूदा सांसद डीके सुरेश पर फिर से विश्वास जताया है।

कांग्रेस की पहली सूची में पार्टी के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल का भी नाम है। वेणुगोपाल केरल की अलप्पुझा, थरूर तिरुवनंतपुरम और बघेल छत्तीसगढ़ की राजनांदगाव सीट से चुनाव लड़ेंगे। वेणुगोपाल ने यहां एक संवाददाता सम्मेलन में उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ‘चुनावी मोड’ में है। इस मौके पर कांग्रेस के कोषाध्यक्ष अजय माकन और मीडिया विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा भी मौजूद थे। अजय माकन ने कहा कि यह लिस्ट युवाओं और अनुभवी नेताओं का शानदार मिश्रण है। ऐसी अटकलें हैं कि राहुल गांधी एक बार फिर अमेठी से चुनाव लड़ सकते हैं।छत्तीसगढ़ और कर्नाटक से छह-छह उम्मीदवार, तेलंगाना से चार, मेघालय से दो और त्रिपुरा, सिक्किम व नागालैंड से एक-एक नाम शामिल हैं। कांग्रेस उम्मीदवारों की पहली सूची में 15 उम्मीदवार सामान्य वर्ग से और 24 उम्मीदवार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदायों से हैं। पिछली बार उन्हें केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से हार का सामना करना पड़ा था। यह पूछे जाने पर कि क्या राहुल गांधी अमेठी से भी चुनाव लड़ेंगे तो वेणुगोपाल ने कहा कि इस सूची के बारे में सीईसी ने गुरुवार को फैसला किया था। सीईसी की अगली बैठक 11 मार्च हो होगी।

कोलकाता में कार में युवती से ‘गैंगरेप’! दो युवक गिरफ्तार l

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कोलकाता में कार में युवती से ‘गैंगरेप‘! दो नामी युवक गिरफ्तार, तीसरे की तलाश जारी पीड़ित की शिकायत के सूत्र के मुताबिक, वह रविवार रात चाय के लिए बार में गया था. प्रगति मैदान थाने के अंतर्गत दुर्गापुर इलाके में एक खाली कार में उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। लड़की की मेडिकल जांच कोलकाता के एनआरएस अस्पताल में करायी गयी है. पुलिस ने चंदन और विकास को गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ के दौरान उन्होंने बलात्कार के आरोपों को स्वीकार कर लिया। उन्हें अलीपुर कोर्ट में पेश किया गया. कोर्ट ने दोनों आरोपियों को 22 मार्च तक पुलिस हिरासत में भेज दिया. तीसरे शख्स की तलाश की जा रही है.जनवरी के आखिरी रविवार की सुबह मैं दक्षिण कलकत्ता के एक हॉल में बैठा कुछ लोगों की बातें सुन रहा था जो पिछले बीस-तीस वर्षों से जल, जंगल और ज़मीन के अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। शीतल साठे, दयामनी बारला, सोनी सोरी, सिमी साई, अंजुम जमरूद और कई अन्य सह-कलाकार स्क्रीन पर दिखाई दे रहे थे। वे इतिहासकार और फिल्म निर्माता उमा चक्रवर्ती के साथ जेलों के अंदर और बाहर राज्य उत्पीड़न के बारे में बात कर रहे थे, जो शिक्षण से सेवानिवृत्त हुए थे और पिछले कुछ वर्षों से अपनी पेंशन राशि से प्रतिरोध फिल्मों की एक श्रृंखला बना रहे हैं। अठारह वर्षीय चिरतरुणी उमादी की नवीनतम फिल्म जमीर (विवेक) का प्रीमियर 10वें कोलकाता पीपुल्स फिल्म फेस्टिवल में हुआ।

जमीर- यह पहली बार है जब मैंने हिडमे मार्कोम को देखा। हालाँकि मैं सोनी सोरी के बारे में जानता था, लेकिन मैं छत्तीसगढ़ की लोकतांत्रिक अधिकार कार्यकर्ता हिडमे मार्कोम को नहीं जानता था, न ही मैं उनके संघर्ष के बारे में जानता था। गले के पास एक आंसू आ गया जब मैंने सोनी सोरी के मुंह से सुना कि कैसे दिन-ब-दिन तबाह, बीमार, थकी हुई सोनी को हिड़मे ने देखभाल और प्यार से जेल में मजबूत बनाया, वे गंभीर यातना के बाद खड़े होने के लिए एक-दूसरे की ताकत बन गईं। सीमा पार उनके मजबूत भाईचारे के बारे में सुनकर मुझे भारत और स्वतंत्र देशों के कुछ राजबंदियों की जेल की कहानियाँ याद आ गईं – ऐसी कहानियाँ जो जेल प्रणाली के शासन-नियम-दमन-यातना के साथ-साथ एकजुटता और भाईचारे के मार्मिक उदाहरणों को भी दर्शाती हैं। कैदी। ।

मैंने जमीर में समसामयिक जेल-संसार को उस समय दृश्यमान होते देखा, जब देश में कहीं भी कोई जेल-मुक्ति आंदोलन दिखाई नहीं दे रहा था। पिछले महीने कलकत्ता हाई कोर्ट को सौंपी गई एक रिपोर्ट में कहा गया था कि पश्चिम बंगाल की जेलों में कई कैदी गर्भवती हो गई हैं। कई दिनों तक इस बात पर बहस होती रही कि क्या जेल में प्रवेश करने से पहले जेल में गर्भधारण हुआ था। लेकिन हमने इस पर बात नहीं की कि कैदी के मौलिक अधिकारों को कैसे खंडित किया जा रहा है. तीन साल पहले 84 वर्षीय शांतिवादी जेसुइट पादरी स्टेन स्वामी की मृत्यु से हम कुछ हद तक हिल गए थे। कई लोगों ने कहा कि यह संस्थागत हत्या है! लेकिन स्टेन स्वामी की मृत्यु के बाद स्वतःस्फूर्त नागरिक आक्रोश के क्षण ने हमें सभी कैदियों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए आगे बढ़ने और बिना मुकदमे के बंद किए गए जाति, मुस्लिम, दलित, ट्रांसजेंडर और अन्य हाशिए वाले समूहों के लोगों की रिहाई की मांग करने में असमर्थ बना दिया।

सुधा भारद्वाज की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक-फ्रॉम हैंगिंग यार्ड (2023)-जामी देखने के एक या दो दिन के भीतर ही आ गई। भीमा कोरेगांव मामले में 2018 में गिरफ्तारी के बाद, एक वकील और मानवाधिकार और ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता सुधा को पहले डेढ़ साल के लिए पुणे की एरवाड़ा जेल में उच्च जोखिम वाले कैदियों के लिए एक विशेष निष्पादन कक्ष में रखा गया था। उनके बगल वाली कोठरी में उसी मामले में आरोपी चौसठ वर्षीय शिक्षिका सोमा सेन थीं, जो अभी भी मुंबई की भायखला जेल में बंद हैं। एरवाडा में हिरासत में रहने के दौरान अपने सेल में हर रात लिखी जाने वाली इस हस्तलिखित पत्रिका में, सुधा ने 76 साथी कैदियों का विवरण दिया है, जिनमें से लगभग सभी ने वर्षों तक लिंग-आधारित अन्याय और हिंसा का सामना किया है। वह उनसे अदालत जाते समय पुलिस वैन में या अपने परिवार से मिलने की प्रतीक्षा करते समय ‘मुलाकात’ कक्ष में या जेल कक्ष में पानी भरते समय मिले हैं। कभी-कभी अपनी कोठरी से बाहर घूमते समय जो बातचीत वह सुनती है, उससे सुधा समझती है, आठ बजे घरकन्ना के काम का दबाव और परिवार नामक पितृसत्तात्मक पिंजरे में कुछ लोगों को कुछ दिनों की ‘छुट्टी’ का एहसास होता है।
जिस तरह उनके सह-कैदी सुधा से भी कहीं अधिक कठिन परिस्थिति में भी अन्याय के खिलाफ लड़े, बिना निराशा के जिए, हँसे, प्यार किया, कई बार झगड़ों और झगड़ों के बावजूद एक-दूसरे की मदद के लिए आगे आए – इससे हर दिन असीम प्रेरणा और साहस मिलता

अल पचिनो को आखिर क्यों ऑस्कर के मंच पर मांगनी पड़ी माफी!

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उनके पास ऑस्कर भी है! लेकिन अल पचीनो ने ऑस्कर के मंच पर गलती कर दी और माफ़ी मांग ली
इस बार ऑस्कर के मंच पर सबसे बड़ा सरप्राइज “डब्ल्यूडब्ल्यूई” के मशहूर जॉन सीना की मौजूदगी रही। उन्होंने नग्न शरीर में सर्वश्रेष्ठ पोशाक कलाकार के नाम की घोषणा की। इसी मंच पर हॉलीवुड एक्टर अल पचिनो ने भी विवाद खड़ा कर दिया. पिछले साल के अकादमी पुरस्कार समारोह में ज्यादा विवाद नहीं हुआ था. हालांकि, पिछले साल यानी 2022 में ऑस्कर मंच पर थप्पड़ मारने की घटना अभी भी चर्चा में है. अभिनेता विल स्मिथ ने कथित तौर पर अपनी पत्नी का अपमान करने के लिए ऑस्कर के मंच पर मेजबान क्रिस रॉक को थप्पड़ मार दिया। वह कड़वा अनुभव आज भी फैंस के जेहन में ताजा है। उस समय 8-श्रेणी के पुरस्कार समारोह को मुख्य कार्यक्रम से बाहर करने पर भी आक्रोश था। हालाँकि, इस बार ऑस्कर मंच पर मुख्य आश्चर्य ‘डब्ल्यूडब्ल्यूई’ प्रसिद्ध जॉन सीना की उपस्थिति थी। उन्होंने नग्न शरीर में सर्वश्रेष्ठ पोशाक कलाकार के नाम की घोषणा की। इसी मंच पर हॉलीवुड एक्टर अल पचिनो ने भी विवाद खड़ा कर दिया. सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार की घोषणा की जिम्मेदारी उन्हीं की थी. लेकिन मंच पर ‘गॉडफादर’ से बड़ी गलती हो गई. सर्वश्रेष्ठ चित्र नामांकन के बिना, क्रिस्टोफर नोलन की ‘ओपेनहाइमर’ पूरी तरह विजेता रही। जो पूरी तरह से ऑस्कर के नियमों के खिलाफ है. हॉलीवुड के एक दिग्गज अभिनेता से ऐसा कारनामा अप्रत्याशित है। इसके साथ ही आलोचना शुरू हो गई.

अल पचिनो के पास अकादमी पुरस्कारों की मेजबानी करने का दशकों का अनुभव है। अभिनेता के खाते में ऑस्कर है। उन्होंने ‘सेंट ऑफ अ वुमन’ में अपने अभिनय के लिए पुरस्कार भी जीता। उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए नौ बार नामांकित किया गया है। ऑस्कर में विभिन्न श्रेणियों में विजेताओं की घोषणा से पहले नामांकन पढ़े जाते हैं। इसके बाद विजेता के नाम की घोषणा की जाती है. इतने सालों से यही नियम है. लेकिन इस साल, अल पचिनो ने उस नियम को बदल दिया। उन्होंने मंच पर सर्वश्रेष्ठ फिल्म के रूप में ‘ओपेनहाइमर’ के नाम की घोषणा की. घटना के एक दिन बाद एक बयान में अभिनेता ने कहा कि उन्होंने अचानक ऐसा क्यों किया।

उन्होंने कहा, “मैं नामांकन रद्द नहीं करना चाहता था।” लेकिन इवेंट अधिकारियों ने मुझे नामांकन दोबारा न पढ़ने के लिए कहा। ऐसा इसलिए क्योंकि पूरे शो के दौरान नॉमिनेशन कई बार दिखाए गए। इसलिए मैंने अधिक समय बर्बाद न करते हुए सीधे विजेता फिल्म के नाम की घोषणा कर दी। लेकिन अगर मेरे कृत्य से किसी को अपमान हुआ है तो मैं माफी मांगता हूं.” 96वें अकादमी पुरस्कार समारोह में मंच पर कुछ की किस्मत खराब रही तो कुछ निराश होकर लौटे। क्रिस्टोफर नोलन की ‘ओपेनहाइमर’ ने इस साल सबसे ज्यादा ऑस्कर जीते हैं। उनके नाम कुल 7 ऑस्कर हैं. वहीं इस फिल्म को दो फिल्मों ‘बार्बी’ और ‘पुअर थिंग्स’ ने कड़ी चुनौती दी थी। पिछले साल ऑस्कर दो श्रेणियों में भारत आए थे। फिल्म ‘आरआरआर’ के लिए ‘नाटू नाटू’ ने सर्वश्रेष्ठ संगीत का पुरस्कार जीता। हालाँकि, इस फिल्म का विषय इस साल ऑस्कर मंच पर भी लौट आया है। कार्यक्रम में अभिनेता रयान गोसलिंग और एमिली ब्लंट ने सिनेमा की दुनिया के स्टंटमैनों को श्रद्धांजलि देते हुए डेढ़ मिनट की एक वीडियो क्लिप दिखाई। फिल्म ‘आरआरआर’ का एक एक्शन सीन था. फिल्म के निर्माताओं ने बाद में एक्स पर वीडियो पोस्ट किया और लिखा, “यह हमारे लिए एक प्यारा आश्चर्य था। हमें गर्व है कि अकादमी के अधिकारियों ने फिल्म में दुनिया के कुछ सर्वश्रेष्ठ एक्शन दृश्यों को श्रद्धांजलि देने के लिए फिल्म ‘आरआरआर’ का एक दृश्य संलग्न किया है।
दूसरी ओर, इस साल किसी भी भारतीय फिल्म को ऑस्कर में सीधे नामांकन नहीं मिला। लेकिन भारतीय-कनाडाई निर्देशक निशा पाहुजा की ‘टू किल अ टाइगर’ ने सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री श्रेणी में बाजी मारी। हाल ही में प्रियंका चोपड़ा और अभिनेता देव पटेल डॉक्यूमेंट्री के कार्यकारी निर्माता के रूप में शामिल हुए। परिणामस्वरूप असंख्य देशवासी आशा से भर गये। लेकिन इस श्रेणी में यूक्रेन की ‘ट्वेंटी डेज़ इन मारियुपोल’ ने बाजी मार ली. चार्ट में ऑस्कर के मंच पर और किसे सम्मानित किया गया

अपेक्षित परिणाम। क्रिस्टोफर नोलन की फिल्म ‘ओपेनहाइमर’ ने पिछले कुछ महीनों में फिल्म जगत में कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते हैं। रविवार (सोमवार सुबह IST) को लॉस एंजिल्स के डॉली थिएटर में 96वें अकादमी पुरस्कारों में कई ऑस्कर श्रेणियों में विजेता भी दिखे। इस साल ओपेनहाइमर को ऑस्कर में कुल 13 श्रेणियों में नामांकित किया गया है। फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म और सर्वश्रेष्ठ निर्देशक सहित 7 श्रेणियों में जीत हासिल की। भौतिक विज्ञानी और ‘बम के जनक’ जे रॉबर्ट ओपेनहाइमर द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका की लॉस एलामोस प्रयोगशाला के निदेशक थे। उनका जीवन और ‘मैनहट्टन प्रोजेक्ट’ में उनकी भूमिका इस फिल्म का विषय है। सोमवार को ‘पीकी ब्लाइंडर्स’ के अभिनेता सिलियन मर्फी ने फिल्म की शीर्षक भूमिका में अपने प्रदर्शन के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ऑस्कर जीता। सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता रॉबर्ट डाउनी जूनियर। इस साल ऑस्कर में सर्वश्रेष्ठ पिक्चर की दौड़ में ‘ओपेनहाइमर’ के अलावा ‘बार्बी’, ‘किलर्स ऑफ द फ्लावर मून’, ‘एनाटॉमी ऑफ ए फ्रूट’, ‘मेस्ट्रो’ समेत कई अन्य लोकप्रिय फिल्में थीं। . लेकिन नोलन निर्देशित फिल्म को आखिरी हंसी मिली। नोलन पहले कई बार ऑस्कर जीतने वाले पहले निर्देशक बने। ऑस्कर के इतिहास में नोलन द्वारा निर्देशित विभिन्न फिल्मों को कुल 49 नामांकन प्राप्त हुए, जिनमें से 11 को पुरस्कार दिया गया। सोमवार को पुरस्कार लेने के लिए खड़े होकर उन्होंने कहा, “सिनेमा का इतिहास सौ साल से कुछ अधिक पुराना है। मुझे नहीं पता कि उसके बाद क्या होगा. लेकिन मेरे लिए यह महसूस करना महत्वपूर्ण है कि मैं इसका एक सार्थक हिस्सा हूं।” उन्होंने कहा, “हमने उस आदमी की बायोपिक बनाई जिसने परमाणु बम का आविष्कार किया था।” अच्छा हो या बुरा, यही वह दुनिया है जिसमें हम रहते हैं। मैं यह पुरस्कार उन लोगों को समर्पित करता हूं जो विश्व शांति के लिए काम कर रहे हैं।” सर्वश्रेष्ठ संपादक का पुरस्कार जेनिफर लैम्ब को दिया गया। संगीतकार लुडविग गोरान्सन को सर्वश्रेष्ठ मूल स्कोर के लिए नामांकित किया गया था।

देश का कारोबारी समुदाय मोदी सरकार का समर्थन क्यों कर रहा है? बीजेपी-राज उन्हें क्या उम्मीद दे रही है?

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भारतीय कारोबारी डर के मारे तो नहीं करते मोदी सरकार की आलोचना? भाजपा सरकार के पीछे व्यापारियों का समर्थन किस मानसिकता से आ रहा है? भारतीय व्यापार जगत इस समय संघर्ष की स्थिति में है। एक ओर जहां आगामी चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की जीत की गूंज ने शेयर बाजार में जोरदार तेजी ला दी है। दूसरी ओर, कई व्यापारी दिल्ली में बीजेपी सरकार को लेकर आशंकित हैं. उद्योगपति राहुल बजाज (दिवंगत) ने चार साल पहले अमित शाह से कहा था कि उद्योगपति सरकार की आलोचना करने से डरते हैं। क्योंकि उन्हें लगता है कि सरकार ऐसी आलोचना बर्दाश्त नहीं करेगी. उन्होंने यह भी कहा कि औद्योगिक जगत में उनका कोई भी मित्र इस मामले को इतनी स्पष्टता से स्वीकार नहीं करेगा। साथ ही उन्होंने मनमोहन सिंह युग की तुलना बीजेपी युग से की और कहा कि अतीत में सरकार की खुलकर आलोचना करना संभव था.

जवाब में, शाह ने बजाज से कहा कि उनकी सरकार को संसद में और संसद के बाहर किसी भी अन्य सरकार की तुलना में अधिक आलोचना का सामना करना पड़ा है। आलोचना के कारण सरकार के निशाने पर आने का कोई अच्छा कारण नहीं है। शाह ने यह भी कहा कि सरकार का इरादा किसी को डराना नहीं है. लेकिन हकीकत में व्यापारियों और उद्योगपतियों में सरकार और उसकी ‘एजेंसियों’ को लेकर एक सतर्कता है. व्यावसायिक ‘लॉबी समूह’ या ‘प्रभावशाली समूह’ भी सार्वजनिक रूप से सरकार की आलोचना न करने की सलाह देते हैं। लेकिन शेयर बाजार में विदेशी कंपनियों या घरेलू निवेशकों के उत्साह को देखकर ऐसा लगता है कि उनमें से कोई भी उस अर्थ से डरता नहीं है, बल्कि वे काफी आशावादी हैं।

जवाब में, शाह ने बजाज से कहा कि उनकी सरकार को संसद में और संसद के बाहर किसी भी अन्य सरकार की तुलना में अधिक आलोचना का सामना करना पड़ा है। आलोचना के कारण सरकार के निशाने पर आने का कोई अच्छा कारण नहीं है। शाह ने यह भी कहा कि सरकार का इरादा किसी को डराना नहीं है. लेकिन हकीकत में व्यापारियों और उद्योगपतियों में सरकार और उसकी ‘एजेंसियों’ को लेकर एक सतर्कता है. व्यावसायिक ‘लॉबी समूह’ या ‘प्रभावशाली समूह’ भी सार्वजनिक रूप से सरकार की आलोचना न करने की सलाह देते हैं। लेकिन शेयर बाजार में विदेशी कंपनियों या घरेलू निवेशकों के उत्साह को देखकर ऐसा लगता है कि उनमें से कोई भी उस अर्थ से डरता नहीं है, बल्कि वे काफी आशावादी हैं। इसके बाद भी व्यापारी मोदी सरकार को चुन रहे हैं. क्योंकि, इस सरकार ने कुछ ऐसे कदम उठाए हैं जो उनके बिजनेस के लिए मददगार हैं। उदाहरण के लिए, कॉर्पोरेट कर के स्तर को कम रखना, घरेलू उत्पादकों को विदेशी आयात द्वारा निगले जाने से बचाने के लिए टैरिफ और गैर-टैरिफ सुरक्षा प्रदान करना (याद रखें, अधिकांश भारतीय व्यवसायी, यहां तक ​​​​कि राहुल बजाज ने भी वैश्वीकरण के पक्ष में बात नहीं की है)। इसके अलावा, अप्रत्यक्ष करों के क्षेत्र में भी सुधार किये गये हैं। निवेश के लिए सब्सिडी का प्रस्ताव है और उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन भी दिया जाता है। और इसने भौतिक बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता में सुधार के लिए अभूतपूर्व सरकारी निवेश को भी सक्षम बनाया है। तो आलोचना वास्तव में कहां है?

इसके बाद भी व्यापारी मोदी सरकार को चुन रहे हैं. क्योंकि, इस सरकार ने कुछ ऐसे कदम उठाए हैं जो उनके बिजनेस के लिए मददगार हैं। उदाहरण के लिए, कॉर्पोरेट कर के स्तर को कम रखना, घरेलू उत्पादकों को विदेशी आयात द्वारा निगले जाने से बचाने के लिए टैरिफ और गैर-टैरिफ सुरक्षा प्रदान करना (याद रखें, अधिकांश भारतीय व्यवसायी, यहां तक ​​​​कि राहुल बजाज ने भी वैश्वीकरण के पक्ष में बात नहीं की है)। इसके अलावा, अप्रत्यक्ष करों के क्षेत्र में भी सुधार किये गये हैं। निवेश के लिए सब्सिडी का प्रस्ताव है और उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन भी दिया जाता है। और इसने भौतिक बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता में सुधार के लिए अभूतपूर्व सरकारी निवेश को भी सक्षम बनाया है। तो आलोचना वास्तव में कहां है?

इतिहास पर नज़र डालने पर, हम जो पाते हैं वह दूर की समानता है। जैसा कि आर्थिक इतिहासकार तीर्थंकर राय ने अपनी पुस्तक ‘ए बिजनेस हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ में बताया है, मुगल साम्राज्य के विस्तार ने वास्तव में एक आर्थिक माहौल तैयार किया जिसमें व्यापारी (मुख्य रूप से फैनजाबी क्षत्रिय और मरोवादी बानियाक) पूर्वी भारत की ओर बढ़ने लगे। जब ‘पैक्स मुगलियाना’ (मुगल साम्राज्य का सीधा शासन) बंगाल तक फैल गया, तो उन्होंने संघर्ष में अपना व्यवसाय भी खो दिया। परिणामस्वरूप, जब मुगल साम्राज्य का पतन हुआ, तो व्यापारियों ने उन क्षेत्रों को चुनना शुरू कर दिया जहां सामंती अशांति कम थी और ऐसे क्षेत्र जो अपेक्षाकृत राजनीतिक रूप से स्थिर थे। यही कारण है कि बम्बई, मद्रास और कलकत्ता जैसे ब्रिटिश शासित बंदरगाह शहर उन व्यापारियों के व्यापारिक क्षेत्र बन गये। कम से कम उस समय के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारी परिवार सेठ का इतिहास ऐसे साक्ष्य देता है। 1857 के महान विद्रोह के दौरान, भारतीय व्यापारिक समुदाय ने अंग्रेजों का समर्थन किया। लेकिन जैसा कि ब्रिटिश साम्राज्यवादी इतिहासकार क्रिस्टोफर बेली ने दिखाया है, भारतीय पूंजी और ब्रिटिश शक्ति की परस्पर निर्भरता सुखद नहीं थी।

CAA: घर बैठे कर सकते हैं नागरिकता आवेदन, फोन से भी कर सकते हैं आवेदन, केंद्र ने बताई प्रक्रिया, कितना आएगा खर्च?

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केंद्र सरकार ने सोमवार शाम को सीएए लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी. वहीं मंगलवार को विशिष्ट पोर्टल ने आवेदन करने की जानकारी दी है. केंद्र सरकार ने सोमवार शाम को सीएए लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी. वहीं मंगलवार को विशिष्ट पोर्टल ने आवेदन करने की जानकारी दी है.

एक और अधिक पढ़ें और पढ़ें রেছে. एक और अधिक पढ़ें मेरे पास एक अच्छा विकल्प है। বাংলার শিল্প-সংস্কৃতি জগতের বিশিষ্টজনের কপাল और भी बहुत कुछ। क्या आपने कभी सोचा है? मेरे पास एक अच्छा विकल्प है। एक और विकल्प चुनें मेरे पति और पत्नी के लिए एक अच्छा विकल्प चुनें मेरे पास एक अच्छा विकल्प है। ““यह एक अच्छा विचार है।” एक और अधिक पढ़ें यह एक अच्छा विकल्प है— यह एक अच्छा विकल्प है। एक अच्छा क्रेडिट कार्ड प्राप्त करें। एक बार फिर से एक बार फिर से एक नया रिकॉर्ड बना लिया गया है एक और विकल्प चुनें एक ‘पर्यावरण’ के साथ एक नया अनुभव प्राप्त करें েই. इसके अलावा, यह एक अच्छा विचार है। मेरे पास एक अच्छा विकल्प है, और यह भी एक अच्छा विचार है নে থাকব. ठीक है, मुझे एक अच्छा विचार प्राप्त हुआ, और यह भी एक अच्छा विचार है और पढ़ें

संशोधित नागरिकता कानून के लिए आवेदन कैसे करें?

नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6बी के लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। आवेदन पत्र केंद्र सरकार की वेबसाइट ( Indiancitizenshiponline.nic.in ) पर उपलब्ध है। फिर, यह आवेदन पत्र सीएए-2019 (CAA-2019) नामक मोबाइल ऐप पर भी उपलब्ध है। अभ्यर्थी उस ऐप के माध्यम से मोबाइल फोन से भी आवेदन कर सकते हैं। यानी आवेदन की पूरी प्रक्रिया घर बैठे मोबाइल से ही हो जाएगी.

नागरिकता अधिनियम के तहत किसे आवेदन करना चाहिए?

हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से शरणार्थी के रूप में आए। मूल रूप से उन लोगों को आवेदन करना चाहिए जो 1971 के बाद उन देशों से भारत आए थे। संयोग से, उसी वर्ष बांग्लादेश के स्वतंत्र राज्य का जन्म हुआ। जो लोग तब से लेकर 31 दिसंबर 2014 के बीच भारत आए, उन्हें सीएए के जरिए नागरिकता मिल जाएगी। वे नहीं जो इसके बाद आये।

नागरिकता के लिए आवेदन कैसे करें?

आवेदन जिला स्तरीय समिति (डीएलसी) के माध्यम से सीएए पर अधिकार प्राप्त समिति को ऑनलाइन जमा किया जाना चाहिए। इससे पहले आवेदक को यह पता होना चाहिए कि आवेदन पत्र किस विभाग में जमा करना है। उस वेबसाइट या मोबाइल ऐप पर जाकर उन्हें इस संबंध में ‘मार्गदर्शन’ दिया जाएगा. फॉर्म के भी विभिन्न भाग होते हैं। वहां लिखा होगा कि किसे किस सेक्शन के लिए कितने फॉर्म लेने हैं।

कितने पैसे लगेंगे?

इसमें बताए गए सभी दस्तावेजों के साथ फॉर्म को ऑनलाइन जमा करने से पहले आवेदक को 50 रुपये का शुल्क ऑनलाइन जमा करना होगा। उसके बाद वह आवेदन जमा करने के चरण में प्रवेश करेगा। आवेदन जमा होने के बाद आवेदकों को एक डिजिटल पावती पत्र प्राप्त होगा।

आपको नागरिकता प्रमाणपत्र कैसे चाहिए?

आपसे पूछा जाएगा कि क्या आपको नागरिकता का डिजिटल प्रमाणपत्र चाहिए, या कागजी प्रमाणपत्र चाहिए। आवेदक को यह तभी मिलेगा जब वह कागज पर हस्ताक्षरित प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करेगा। अन्यथा डिजिटल सर्टिफिकेट जारी किया जाएगा.

कैसे सत्यापित करें?

आवेदन पत्र जमा करने के बाद इसे जिला स्तरीय समिति (डीएलसी) द्वारा सत्यापित किया जाएगा। सत्यापन के बाद, डीएलसी आवेदक को ईमेल या एसएमएस के माध्यम से सूचित करेगा जब उसे मूल दस्तावेजों के साथ डीएलसी से मिलने की आवश्यकता होगी।

निष्ठा की शपथ और दस्तावेजों का सत्यापन

सत्यापन पूरा होने पर, प्रभारी अधिकारी आवेदक को भारत की नागरिकता के साथ निष्ठा की शपथ दिलाएगा। हालाँकि, जानकारी में कमी होने पर डीएलसी आवेदक से उचित दस्तावेज जमा करने के लिए कहेगा। यदि आवेदक आवश्यक दस्तावेज जमा करने में विफल रहता है या सत्यापन प्रक्रिया के लिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं होता है, या शपथ लेने के लिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं होता है, तो आवेदन को अस्वीकृति के लिए अधिकार प्राप्त समिति को भेजा जा सकता है।

ऑनलाइन जानकारी

सत्यापन पूरा होने के बाद, डीएलसी के प्रभारी अधिकारी जानकारी की ऑनलाइन पुष्टि करेंगे। इसके साथ ही वह आवेदक का शपथ पत्र भी ऑनलाइन जमा करेगा। इसके बाद वह आवेदक के आवेदन पत्र को अधिकार प्राप्त समिति को यह कहते हुए भेज देगा कि सत्यापन पूरा हो चुका है।

आखिरी एपिसोड

अधिकार प्राप्त समिति सभी तथ्यों को देखने के बाद यदि आवश्यक हो तो आगे की पूछताछ भी कर सकती है। संतुष्ट होने पर वे नागरिकता आवेदन दे सकते हैं। संतुष्ट न होने पर मना कर सकते हैं।

प्रमाणपत्र प्राप्त करें

डिजिटल सर्टिफिकेट के लिए आवेदन करने पर यह ऑनलाइन उपलब्ध होगा। यदि कागज पर हस्ताक्षरित प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया जाता है, तो इसे अधिकार प्राप्त समिति के कार्यालय से प्राप्त किया जाना चाहिए। यह वास्तव में राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के जनगणना निदेशक के कार्यालय से होता है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर स्टेट बैंक ने दी ‘बॉन्ड’ की जानकारी ! जल्द ही किया जाएगा सार्वजनिक

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सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर स्टेट बैंक ने ‘बॉन्ड’ की जानकारी चुनाव आयोग को सौंप दी, जिसे सार्वजनिक किया जाएगा
चुनावी बांड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि एसबीआई 12 अप्रैल 2019 से अब तक चुनावी बांड से जुड़ी जानकारी सौंपे. उन्होंने उस निर्देश के अनुसार जानकारी प्रस्तुत की।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने मंगलवार शाम से पहले चुनाव बांड से जुड़ी सारी जानकारी चुनाव आयोग को सौंप दी. इस बार सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक आयोग को अगले शुक्रवार तक बॉन्ड की जानकारी अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित करनी होगी.

चुनावी बांड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि 12 अप्रैल 2019 से अब तक के चुनावी बांड से जुड़ी जानकारी 6 मार्च तक एसबीआई को सौंपी जाए. लेकिन उन्होंने जानकारी का खुलासा करने के लिए शीर्ष अदालत से अतिरिक्त समय का अनुरोध किया। हालांकि, मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सोमवार को एसबीआई की याचिका खारिज कर दी। सोमवार को सुनवाई की शुरुआत में एसबीआई को शीर्ष अदालत के सवालों का सामना करना पड़ा. सुप्रीम कोर्ट का इस सरकारी बैंक से सवाल, ‘आप पिछले 26 दिनों से क्या कर रहे थे?’ आपके आवेदन में इसका कोई उल्लेख नहीं है।”

संयोग से, सुप्रीम कोर्ट ने 15 फरवरी को चुनावी बांड प्रणाली को ‘असंवैधानिक’ और ‘हानिकारक’ करार दिया था। अदालत ने एसबीआई को तुरंत बांड जारी करना बंद करने का निर्देश दिया। इसके अलावा शीर्ष अदालत ने चुनावी बांड के जरिये किसी भी राजनीतिक दल को कितना चंदा मिला और उन्हें चंदा किसने दिया, यह भी सार्वजनिक करने का आदेश दिया. 6 मार्च को सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित समय सीमा के बाद भी चुनाव आयोग को चुनावी बांड के संबंध में जानकारी जमा नहीं करने पर एसबीआई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अदालत की अवमानना ​​का मामला भी दायर किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर स्टेट बैंक ने ‘बॉन्ड’ की जानकारी चुनाव आयोग को सौंप दी, जिसे सार्वजनिक किया जाएगा
चुनावी बांड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि एसबीआई 12 अप्रैल 2019 से अब तक चुनावी बांड से जुड़ी जानकारी सौंपे. उन्होंने उस निर्देश के अनुसार जानकारी प्रस्तुत की।

सोमवार को चीफ जस्टिस की बेंच में दोनों मामलों की एक साथ सुनवाई हुई. सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि अगर एसबीआई मंगलवार तक चुनावी बांड की जानकारी का खुलासा नहीं करता है, तो अदालत के आदेश की ‘जानबूझकर अवज्ञा’ करने के लिए उनके खिलाफ अवमानना ​​का मामला दायर किया जाएगा। इसके अलावा एसबीआई के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक को कोर्ट के आदेश का पालन कर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है. हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एसबीआई के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक ने अभी तक कोर्ट के आदेश के मुताबिक हलफनामा दाखिल नहीं किया है।

किस पार्टी को किस कॉरपोरेट से चंदा मिला है, इससे जुड़ी सारी जानकारी एसबीआई कल शाम 5 बजे तक चुनाव आयोग को सौंप देगा। देश की शीर्ष अदालत ने सोमवार को यह घोषणा की. वह सारी जानकारी 15 मार्च तक चुनाव आयोग की वेबसाइट पर प्रकाशित होनी चाहिए. 15 फरवरी के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि 12 अप्रैल 2019 से अब तक कारोबार किए गए सभी चुनावी बॉन्ड की जानकारी 6 मार्च तक एसबीआई को सौंपी जाए. स्टेट बैंक ने 30 जून तक का अतिरिक्त समय मांगने के लिए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया। आज की सुनवाई में, राज्य के स्वामित्व वाले बैंक को मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संवैधानिक पीठ के कठिन सवालों का सामना करना पड़ा। कोर्ट का SBI से सवाल, ”26 दिन तक क्या कर रहे थे?” बंद जानकारी क्यों नहीं खोलते?” उस दिन की संविधान पीठ में मुख्य न्यायाधीश के अलावा न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति बीआर गवई, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा शामिल थे।

15 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बांड को ‘असंवैधानिक’ और ‘हानिकारक’ करार देते हुए रद्द कर दिया। उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि 6 मार्च तक सारी जानकारी चुनाव आयोग को सौंपी जाए. सुप्रीम कोर्ट ने अतिरिक्त समय के लिए एसबीआई के अनुरोध को खारिज करते हुए सोमवार को कहा कि अगर यह जानकारी मंगलवार तक जमा नहीं की गई तो एसबीआई के खिलाफ ‘जानबूझकर अदालत की अवमानना’ का मामला दायर किया जाएगा। शीर्ष अदालत ने राज्य के स्वामित्व वाले बैंक के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक को इस संबंध में एक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया।