Sunday, April 12, 2026
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क्या 2024 में भी बॉलीवुड चमकाएगा सितारे?

2024 में भी बॉलीवुड सितारे चमका सकता है! बॉक्स ऑफिस पर बीता साल 2023 बहुत शानदार रहा। इस दौरान हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की बल्ले-बल्ले रही। खासकर साल 2022 में अपने सबसे बुरे दौर के बाद बीते साल बॉक्स ऑफिस पर बॉलीवुड ने जोरदार वापसी की। एक साल में चार फिल्मों ‘पठान’, ‘जवान’, ‘गदर 2’ और ‘एनिमल’ ने घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 500 करोड़ क्लब में एंट्री करने का अनोखा रेकॉर्ड बनाया। वहीं, जवान 600 करोड़ क्लब में एंट्री करके हिंदी सिनेमा की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन गई। यही नहीं, शाहरुख खान ने अपनी तीन फिल्मों ‘पठान’, ‘जवान’ और ‘डंकी’ के सहारे एक साल में दुनियाभर में ढाई हजार करोड़ रुपए से ज्यादा कमाई करके नया रेकॉर्ड बनाया है। पठान’ और ‘जवान’ के बंपर प्रदर्शन के बाद माना जा रहा था कि शाहरुख खान की फिल्म ‘डंकी’ भी दुनियाभर में 1000 करोड़ रुपए से ज्यादा कमाई करेगी। लेकिन यह फिल्म दुनियाभर में 500 करोड़ रुपए की कमाई भी नहीं कर पाई। बावजूद इसके किंग खान अकेले ऐसे भारतीय एक्टर बन गए हैं, जिनकी दो फिल्मों ने एक साल में दुनियाभर में 1000 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई की। वहीं, सनी देओल की ‘गदर 2’ और रणबीर कपूर की ‘एनिमल’ ने बॉक्स ऑफिस पर ऐसा धमाकेदार प्रदर्शन किया, जिसकी शायद ही किसी को उम्मीद रही होगी। खास बात यह है कि पहले इन दोनों फिल्मों का बीते साल इंडिपेंडेंस डे पर क्लैश होना था।

बीते साल में बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफलता का स्वाद चखने के बाद बॉक्स ऑफिस के जानकारों की नजरें इस पर हैं कि आने वाले दिनों में कौन सी हिंदी फिल्म बीते साल की तरह दुनियाभर में 1000 करोड़ रुपए कमाई करने का कमाल दिखाने वाली है। क्या इस साल बीते साल का चार हिंदी फिल्मों का घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 500 करोड़ क्लब में एंट्री करने का रेकॉर्ड टूटेगा? खास बात यह है कि बीते साल में बंपर प्रदर्शन करने वाले शाहरुख खान की इस साल कोई फिल्म रिलीज नहीं हो रही, तो सलमान खान की फिल्म भी अब अगले साल ही रिलीज होगी। इन सुपरस्टार्स के अलावा आमिर खान की भी कोई फिल्म इस साल रिलीज शेड्यूल में नहीं है। उनके प्रॉडक्शन हाउस की एक फिल्म जरूर इस साल क्रिसमस पर रिलीज होगी। इसे उनकी सनी देओल स्टारर फिल्म माना जा रहा है। अभी तक यह तय नहीं है कि इस फिल्म से आमिर बतौर एक्टर जुड़ेंगे या नहीं। वहीं बीते साल ‘एनिमल’ से सुपर सक्सेस हासिल करने वाले रणबीर कपूर की भी इस साल कोई फिल्म रिलीज नहीं होगी।

साथ ही रणवीर सिंह भी इस साल बड़े पर्दे पर नजर नहीं आने वाले हैं। यानी इस साल बिना सुपर सितारों की फिल्मों के यह देखना दिलचस्प होगा कि बीते साल की तर्ज पर बॉक्स ऑफिस पर फिल्मों सफलता का सिलसिला किस तरह कायम रहने वाला है। फिलहाल सबकी नजरें ऋतिक रोशन और दीपिका पादुकोण की फिल्म ‘फाइटर’, अक्षय कुमार और टाइगर श्रॉफ की फिल्म ‘बड़े मियां छोटे मियां’ और अजय देवगन व रोहित शेट्टी की ‘सिंघम’ फ्रेंचाइजी की तीसरी फिल्म ‘सिंघम अगेन’ पर हैं। बता दें कि मर्यादा पुरोषत्तम राम की तमाम अच्छाइयों के बावजूद रावण का अपना आकर्षण रहा है। हमारी फिल्मों के नायकों ने भी हीरोइक चरित्रों को महिमामंडित करते-करते अपना रास्ता बदला और पर्दे बुरे आदमी की भूमिका को अंजाम दिया। 1943 में प्रदर्शित हुई किस्मत में जब अशोक कुमार ने एक युवा चोर के ग्रे रोल को अंजाम दिया, तो नायक के खलनायक बनने पर एक बहस छिड़ गई थी। कदाचित पहली बार मुख्यधारा के नायक के खलनायक बनने के बावजूद फिल्म सुपर हिट साबित हुई थी। आगे चलकर भी ज्वेल थीफ में विलेन बने अशोक कुमार को काफी पसंद किया गया।

अशोक कुमार ही क्यों देव आनंद भी इसमें पीछे नहीं रहे। 1952 में आई जाल में वे तेजतर्रार एंटी हीरो के रूप में प्रकट हुए। और तो और ट्रेजिडी किंग कहे जाने वाले दिलीप कुमार 1954 में अमर में एंटी हीरो बन चुके हैं। फिल्म का ये नायक नायिका निम्मी के साथ बलात्कार जैसा कलंकित कृत्य करता है। उनके छाने वालों के लिए उनका ये काला चेहरा चौंकाने वाला था। दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा में इस फिल्म के साथ गंगा जमुना और फुटपाथ का जिक्र भी किया है, जिसमें एंटी हीरो के रूप में दिखे थे। इंडियन सिनेमा की आइकॉनिक फिल्म कही जाने वाली मदर इंडिया 1957 में सुनील दत्त ने नकारात्मक भूमिका करके खूब तारीफ बटोरी थी। पड़ोसन के गुदगुदाने वाले रोल के साथ-साथ आगे चलकर वे मुझे जीने दो और 36 घंटे में भी निगेटिव शेड वाले रोल्स में दिखे थे।

क्या चुनावी दंगल के बीच नेताओं को होगी जेल?

वर्तमान में चुनावी दंगल के बीच नेताओं को जेल हो सकती है! सीबीआई ने इस मामले में तेजस्वी यादव, उनके पिता लालू प्रसाद, मां राबड़ी देवी और अन्य के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया है। ईडी ने तेजस्वी यादव और लालू प्रसाद को पूछताछ के लिए नया समन जारी किया है। ईडी ने हाल ही में केस के सिलसिले में लालू प्रसाद के परिवार की 6 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की थी। कुर्क की गई संपत्तियों में दिल्ली की न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में एक आवासीय मकान सहित दिल्ली और पटना की संपत्तियां शामिल हैं। सीबीआई ने अपने आरोप पत्र में लालू प्रसाद, उनकी पत्नी और बेटे तेजस्वी को ‘अंतिम लाभार्थी’ बताया है। हालांकि, तीनों ने आरोपों से इनकार किया है। मिली जानकारी के मुताबिक, सीबीआई जल्द ही एक और चार्जशीट दाखिल करेगी। यह एक और मामला है जो लालू, तेजस्वी, राबड़ी देवी और अन्य सह-आरोपियों के लिए परेशानी खड़ी कर सकता है क्योंकि सीबीआई ने उनके खिलाफ आरोप तय करने पर बहस की है। आरोप तय करने पर दलीलें सुनने वाले जज के ट्रांसफर के कारण मुकदमा शुरू नहीं हो सका। अभियोजन पक्ष और आरोपी नए जज के सामने आरोपों पर नए सिरे से बहस करेंगे। ईडी ने मामले में मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों की जांच के सिलसिले में मार्च में लालू, तेजस्वी और लालू की बेटियों के आवास पर छापेमारी की थी। सीबीआई ने जुलाई 2017 में लालू-राबड़ी, तेजस्वी और अन्य पर आईआरसीटीसी होटलों के टेंडर की शर्तों में बदलाव करके कथित तौर पर गलत लाभ कमाने का मामला दर्ज किया था। सीबीआई के अनुसार, लालू ने आईआरसीटीसी के अधिकारियों और पत्नी राबड़ी के साथ बनाई मुखौटा कंपनी के मालिकों के जरिए पटना में चाणक्य होटल और सुजाता होटल के मालिकों के साथ मिलीभगत करके घोटाला किया है। ईडी ने नवंबर में कांग्रेस से जुड़े यंग इंडिया लिमिटेड के मालिकाना हक वाले अखबार नैशनल हेराल्ड केस से जुड़ी मनी लॉन्ड्रिंग जांच के सिलसिले में 751.9 करोड़ रुपये की संपत्ति अस्थायी रूप से कुर्क की थी। एजेंसी ने जून और जुलाई में पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से तीन बार में लगभग 12 घंटे तक पूछताछ की थी।

इससे पहले, उनके बेटे राहुल गांधी से भी एजेंसी ने जुलाई में पांच मौकों पर 50 घंटे से अधिक समय तक पूछताछ की थी। एजेंसी संपत्तियों की कुर्की की पुष्टि करेगी और कार्रवाई करेगी। आयकर विभाग ने 2013 में भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी की शिकायत पर उनके खिलाफ जांच शुरू की थी। यह आरोप लगाया गया है कि गांधी परिवार ने नेशनल हेराल्ड अखबार के अधिग्रहण में धोखाधड़ी की और धन का दुरुपयोग किया, जो एजेएल द्वारा प्रकाशित और यंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के स्वामित्व में है। गांधी परिवार ने बार-बार आरोपों से इनकार किया है। बीजेपी नेता सुब्रमण्यन स्वामी ने आरोप लगाया था कि गांधी परिवार ने यंग इंडिया के जरिए अखबार के पूर्व प्रकाशकों को खरीदकर नैशनल हेराल्ड के स्वामित्व वाली संपत्तियों का अधिग्रहण किया, जिसमें उनकी 86% हिस्सेदारी है। कांग्रेस ने इस मामले को ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ करार दिया है। ईडी ने गांधी परिवार पर ’50 लाख रुपये का भुगतान करके एजेएल की 2,000 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति का दुरुपयोग करने’ का आरोप लगाया है।

ईडी बीकानेर जमीन खरीद मामले में कथित संलिप्तता को लेकर सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा के कथित सहयोगी महेश नागर पर अपना शिकंजा कसने जा रही है। ईडी ने आरोप लगाया है कि नागर ने ‘रॉबर्ट वाड्रा से प्राप्त निर्देशों के अनुसार काम किया क्योंकि वौ नौकरी पर हैं’। वाड्रा पर आरोप है कि उन्होंने 275 बीघे की संपत्ति 72 लाख रुपये में खरीदी और उसी को बेचकर 615 फीसदी का मुनाफा कमाया। एजेंसी ने 2019 में जांच के सिलसिले में वाड्रा और उनकी मां से पूछताछ की। ईडी ने अपनी जांच में निष्कर्ष निकाला था कि न तो रॉबर्ट वाड्रा और न ही उनकी कंपनी मेसर्स स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी ने बीकानेर में दो लैंड पार्सल खरीदने में ‘उचित नियमों’ का पालन नहीं किया था। ईटी ने सबसे पहले 14 जनवरी, 2020 को रिपोर्ट दी थी कि वाड्रा, ईडी को बीकानेर के दो गांवों में जमीन खरीदने के लिए पैसे का स्रोत नहीं बता पाए थे। वाड्रा ने ईडी को बताया था कि उन्होंने बीकानेर की जमीनें सिर्फ गूगल मैप पर देखी थीं। ईडी के अनुसार, जब कंपनी ने कुछ लाख में कथित तौर पर धोखाधड़ी से खरीदी थीं, तो वाड्रा स्काईलाइट की 99% इक्विटी के साथ मेसर्स स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड के ‘सक्रिय निदेशक’ थे।

आप के दो वरिष्ठ नेता, पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया और राज्यसभा सांसद संजय सिंह, पहले से ही उत्पाद शुल्क नीति एक्साइज पॉलिसी में उनकी कथित संलिप्तता के लिए सलाखों के पीछे हैं और जांच एजेंसियों के रडार पर दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल आ गए हैं। सीबीआई अप्रैल में ही केजरीवाल से पूछताछ कर चुकी है तो ईडी उनसे पूछताछ करना चाहती है और उसे तीन बार समन जारी कर चुकी है। केजरीवाल ने समन को ‘राजनीति से प्रेरित और अवैध’ बताकर ईडी के सामने से पेश होने से इनकार कर दिया है। अगर जांच एजेंसियां ​​आम आदमी पार्टी को मामले में आरोपी बनाने का फैसला करती हैं तो पार्टी विधायकों के लिए और परेशानी बढ़ सकती है। सीबीआई और ईडी की ओर से पेश केंद्र सरकार के वकील ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया था कि एजेंसियां ​​मामले में आप को आरोपी बनाने पर विचार कर रही हैं। फरवरी में एक स्थानीय अदालत ने दिल्ली सरकार की अब समाप्त हो चुकी शराब नीति में मनी लॉन्ड्रिंग जांच के संबंध में ईडी की दायर सप्लीमेंट्री चार्जशीट पर संज्ञान लिया।

इसमें आरोप लगाया गया है कि आप ने पॉलिसी से जुटाए गए पैसे का इस्तेमाल गोवा चुनाव प्रचार के लिए किया। आरोप पत्र में केजरीवाल और मामले के आरोपी इंडोस्पिरिट्स के मालिक समीर महेंद्रू के बीच एक कथित कॉल का जिक्र किया गया था, जिसमें केजरीवाल ने कथित तौर पर उनसे आप संचार प्रभारी विजय नायर के साथ काम करते रहने के लिए कहा था। केजरीवाल ने आरोपों को काल्पनिक बताया।

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला और अन्य लोग जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन में कथित अनियमितताओं के संबंध में मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में जांच का सामना कर रहे हैं। अब्दुल्ला और सह-अभियुक्तों को जुलाई 2022 में श्रीनगर की एक अदालत ने तलब किया था। अदालत ने जून 2022 में ईडी के पूरक अभियोजन शिकायत (चार्जशीट के बराबर) पर संज्ञान लेने के बाद अब्दुल्ला और अन्य को तलब किया था। ईडी ने पहले कहा था कि पूरक आरोप पत्र तीन अनंतिम कुर्की आदेशों से पहले दायर किया गया था। इसमें अब्दुल्ला, मेसर्स मिर्जा संस, गजानफर और मिर्जा की कुल मिलाकर 21.55 करोड़ रुपये की चल और अचल संपत्तियां अटैच की गई थीं।

आखिर मोदी की विजय रथ यात्रा या राहुल की भारत न्याय यात्रा क्या करेगी असर?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि मोदी की विजय रथ यात्रा या राहुल की भारत न्याय यात्रा आखिर क्या असर करेगी! लोकसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी अपनी भारत जोड़ो यात्रा का दूसरा चरण शुरू करने वाले हैं। इसका नाम ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ रखा गया है। यह 14 जनवरी को मणिपुर से शुरू होगी और 20 मार्च को मुंबई में खत्म होगी। यात्रा के पहले संस्करण को कांग्रेस सुपरहिट मानती रही है। कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में जीत का श्रेय भी पार्टी ने राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को ही दिया था। तब उसी का शोर था। हालांकि, एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में करारी शिकस्त के बाद भारत जोड़ो यात्रा की चमक फीकी पड़ गई। उस यात्रा से कांग्रेस को सियासी फायदा हुआ या नहीं, ये भले ही बहस का विषय हो लेकिन इस पर कोई शक नहीं कि यात्रा से राहुल गांधी की छवि जरूर निखरी। एक जुझारू नेता की छवि। अब लोकसभा चुनाव से बमुश्किल 3 महीने पहले वह अब देश को पूरब से पश्चिम की ओर नाप रहे हैं। 15 राज्यों से गुजरने वाली यात्रा से क्या राहुल गांधी कोई करिश्मा कर पाएंगे? इन राज्यों में कांग्रेस की क्या स्थिति है? पिछले चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन क्या था? यात्रा का आखिरी चरण आते-आते लोकसभा चुनाव के लिए तारीखों का ऐलान भी हो चुका होगा। तो कहीं इससे बीजेपी 2024 के चुनाव को ‘नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी’ का रंग देने में तो सफल नहीं हो जाएगी? आइए आंकड़ों के आईने में इन सवालों के जवाब ढूंढने की कोशिश करते हैं। राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ कुल 15 राज्यों से होकर गुजरेगी। करीब 6700 किलोमीटर की दूरी तय होगी। यात्रा 110 जिलों और करीब 100 लोकसभा सीटों से होकर गुजरेगी। रूट पर जो 15 राज्य हैं उनमें लोकसभा की कुल 357 सीटें हैं। जिन राज्यों से होकर ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ निकलेगी, वे हैं- मणिपुर, नगालैंड, असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र। पहले रूट में अरुणाचल प्रदेश नहीं था लेकिन बाद में उसे शामिल किया गया।

राहुल गांधी की ये यात्रा जिन 15 राज्यों से गुजरेगी, उन राज्यों में लोकसभा की कुल मिलाकर 357 सीटें हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में प्रदर्शन को देखें तो इन राज्यों में कांग्रेस की स्थिति बहुत ही खराब है। कितनी खराब इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि इन 357 सीटों में पार्टी महज 14 पर ही जीत हासिल कर पाई थी। भारत जोड़ो न्याय यात्रा वाले राज्यों में से 5 तो ऐसे हैं जहां 2019 में कांग्रेस खाता तक नहीं खोल पाई थी। ये हैं- मणिपुर, नगालैंड, अरुणाचल, राजस्थान और गुजरात।

इतना ही नहीं, सियासी लिहाज से देश के सबसे बड़े सूबे यूपी समेत यात्रा रूट के 7 राज्यों में कांग्रेस पिछली बार महज 1 सीट पर सिमट गई थी। यूपी के अलावा बाकी 6 राज्य हैं मेघालय, बिहार, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र। यात्रा रूट के 15 राज्यों में कांग्रेस का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन असम में है जहां 2019 में उसके खाते में 3 सीटें आई थीं। बंगाल और छत्तीसगढ़ में उसने 2-2 सीटों पर जीत दर्ज की थी। राहुल गांधी की यात्रा जिन 15 राज्यों से होकर गुजरेगी, वहां की कुल 357 सीटों में से 239 पर बीजेपी का कब्जा है यानी 67 प्रतिशत सीटों पर कमल खिला था। यूपी में अपना दल और बिहार में एलजेपी जैसी सहयोगी पार्टियों की सीटें इसमें शामिल नहीं हैं। राहुल गांधी की यात्रा वाले 2 राज्यों नगालैंड और मेघालय में बीजेपी 2019 में खाता तक नहीं खोल पाई थी। हालांकि, 3 राज्य ऐसे भी हैं जहां पार्टी ने सारी की सारी सीटों पर जीत का परचम लहराया। ये राज्य हैं- राजस्थान, गुजरात और अरुणाचल प्रदेश।

2014 में नरेंद्र मोदी की अगुआई में बीजेपी की प्रचंड जीत के बाद राज्यों के चुनावों में भी कांग्रेस को हार पर हार का सामना करना पड़ा है। बीच-बीच में कुछ राज्यों में जीत से पार्टी उत्साहित होती है लेकिन वह उत्साह ज्यादा वक्त तक नहीं टिक पाता। उदाहरण के तौर पर पिछले साल कांग्रेस ने कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश से बीजेपी को सत्ता से बाहर किया लेकिन साल बीतते-बीतते उसे मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे हिंदी पट्टी के 3 अहम राज्यों में करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 2014 के शानदार प्रदर्शन को और बेहतर ही किया। 2014 और उसके बाद बीजेपी की जबरदस्त चुनावी जीतों में सबसे बड़ा फैक्टर है नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता। मोदी मैजिक के सहारे पार्टी जीत हासिल करने वाली मशीन की तरह बन गई है। राहुल गांधी 2024 लोकसभा चुनाव से ठीक पहले भारत जोड़ो न्याय यात्रा निकाल रहे हैं। ठीक पहले क्या, चुनाव के दौरान ही वह यात्रा पर रहेंगे क्योंकि यात्रा के आखिरी पड़ाव पर आते-आते लोकसभा चुनाव के लिए तारीखों का ऐलान भी हो चुका होगा। ऐसे में यात्रा की वजह से राहुल गांधी को जो कवरेज मिलेगी, उसका इस्तेमाल कर बीजेपी 2024 की लड़ाई को ‘नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी’ का शक्ल देने की कोशिश कर सकती है। 2014 और 2019 में उसे इसका भरपूर फायदा ही मिला है। दूसरी तरफ, विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. के बाकी दल शायद ही चाहेंगे कि चुनाव मोदी बनाम राहुल का रूप ले। वजह ये है कि मोदी के मुकाबले में विपक्ष के पास उनके कद का कोई भी चेहरा नहीं है। यही वजह है कि विपक्षी गठबंधन के ज्यादातर दल बिना पीएम फेस के चुनाव में उतरने के हिमायती हैं।

जानिए दिल्ली प्रदेश महिला आयोग की चेयरपर्सन स्वाति मालीवाल के बारे में सब कुछ!

आज हम आपको दिल्ली प्रदेश महिला आयोग की चेयरपर्सन स्वाति मालीवाल के बारे में जानकारी देने वाले हैं! स्वाति मालीवाल राज्यसभा जाने वाली हैं। दिल्ली और पंजाब के सत्ताधारी दल आम आदमी पार्टी ने स्वाति मालीवाल को संसद के उच्च सदन का सदस्य बनाने का फैसला किया है। राज्यसभा के लिए नामंकन दाखिल करने से पहले दिल्ली स्थित महिला आयोग के दफ्तर में इमोशनल सीन रहा। स्वाति मालीवाल इस्तीफा देते वक्त भावुक हो गईं। यही नहीं उनके साथ काम करने वाले सहकर्मी भी आंसू पोछते नजर आए और अपनी अध्यक्ष को गले लगकर इमोशनल विदाई दी। इसके बाद सभी स्टाफ के सदस्य स्वाति मालीवाल को बाहर गेट तक छोड़ने भीआए। स्वाति अभी दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष थीं। इस पद पर रहते हुए स्वाति लगातार चर्चा बटोरती रही हैं। वो महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर काफी सक्रिय रहती हैं और उनकी चुस्ती-फुर्ती की तारीफ होती है तो आलोचना भी। कई बार उनके दावों पर उंगलियां भी उठ चुकी हैं तो कुछ बयानों पर उन्हें कड़ी प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ा है। कुल मिलाकर कहें तो स्वाति मालीवाल येन-केन प्रकारेण खबरों में रहती हैं और दिल्ली की सियासत और शासन-प्रशासन की काफी जाना-माना चेहरा हैं। 15 अक्टूबर, 1984 को उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में जन्मीं स्वाति मालीवाल ने एमिटी इंटरनैशनल स्कूल में पढ़ाई की और फिर जेएसएस एकेडमी ऑफ टेक्निकल एजुकेशन से आईटी में बैचलर डिग्री हासिल की।आईटी में बैचलर डिग्री पाने के बाद स्वाति ने एक मल्टिनैशनल कंपनी में नौकरी की। बाद में उन्होंने नौकरी छोड़कर ‘परिवर्तन’ नामक सामाजिक संस्था से जुड़ गईं। फिर वो अन्न हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ‘इंडिया अंगेस्ट करप्शन’ का हिस्सा बन गईं और अरविंद केजरीवाल की खास हो गईं। नवीन जयहिंद भी इस आंदोलन से जुड़े थे। आप ने नवीन जयहिंद को हरियाणा का संयोजक बनाया था और पार्टी ने उन्हीं के नेतृत्व में 2019 का विधानसभा चुनाव भी लड़ा।

स्वाति मालीवाल ने नवीन जयहिंद से शादी की थी। महिला अधिकारों के लिए मुखर स्वाति मालीवाल ने 2018 में ने एक बयान के लिए अपने पति की सार्वजनिक निंदा कर दी। नवीन जयहिंद ने तब भाजपा की महिला नेताओं के लिए विवादित बयान दिए थे। उन्होंने कहा था कि जो कोई भाजपा नेता 10 लोगों से यौन उत्पीड़न करवाएंगी, उन्हें वो 20 लाख रुपये देंगे। दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष के तौर पर स्वाति मालीवाल ने अपने पति के इस बयान की आलोचना की। फरवरी 2020 में दोनों ने तलाक ले लिया।

दरअसल, स्वाति मालीवाल को दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ने 2015 में ही प्रदेश महिला आयोग का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया था। उससे पहले वो सीएम केजरीवाल की सलाहकार रह चुकी थीं। स्वाति का दायित्व जन शिकायतों को निपटाने में मुख्यमंत्री की मदद करना था। दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष पद पर नियुक्त होने के बाद स्वाति मालीवाल पर भ्रष्टाचार के आरोप में मुकदमा दर्ज हो गया। दिल्ली पुलिस की एंटी-करप्शन ब्रांच एसीबी ने आयोग में अवैध नियुक्तियों के आरोप में स्वाति के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दायर की थी। एसीबी ने दावा किया था कि उसने आयोग में नियुक्त लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि कम-से-कम 91 नियुक्तियों में नियमों का पालन नहीं किया गया था। तब स्वाति मालीवाल ने कहा था कि अगर वो जेल भी चली जाएंगी तो भी उनका काम नहीं रुकेगा और वो जेल से ही महिलाओं की स्थिति पर रिपोर्ट तैयार करके दिल्ली सरकार को सौंपती रहेंगी। स्वाति मालीवाल ने देश के विभिन्न हिस्सों में युवतियों और महिलाओं पर अत्याचार के खिलाफ 2018 में अनशन शुरू कर दिया था। उन्होंने महिला सुरक्षा पर सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आश्वासन की मांग कर रही थीं। स्वाति ने महिलाओं के यौन उत्पीड़न, बलात्कार जैसे मामलों को फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई के जरिए छह महीने में निपटाने, दिल्ली पुलिस में 66 हजार पुलिसकर्मियों की भर्ती और बेहतर फॉरेंसिक लैब की व्यवस्था करने जैसी कई मांगें की थीं।

स्वाति मालीवाल को पिछले वर्ष तब कठोर प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ा जब उन्होंने अपने पिता पर जुल्म करने के आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि बचपन में उनके पिता उनका यौन शोषण करते थे जिससे उनमें महिला अधिकारों के लिए लड़ने का जज्बा पैदा हो गया। स्वाति नेदावा किया, ‘मेरे पिता बचपन में मेरा यौन उत्पीड़न किया करते थे और मारते थे। तब मैं बहुत छोटी थी। उनसे बचने के लिए पलंग के नीचे छिप जाया करती थी। वो मेरी चोटी पकड़कर मेरा सिर दीवार में मारा करते थे और मैं लहुलुहान हो जाया करती थी। यह तब तक होता रहा जब मैं चौथी कक्षा में थी।’ इस पर कांग्रेस नेता राधिका खेड़ा ने स्वाति का 2016 का एक ट्वीट दिखा दिया। इस ट्वीट में स्वाति ने लिखा था, ‘मैं एक आर्मी मैन की बेटी हूं। मैं आर्मी में पली-बढ़ी हूं। मुझे देश सेवा और देश पर न्योछावर होने की शिक्षा मिली है। मैं किसी से नहीं डरती।’ बीजेपी नेता प्रीति गांधी ने भी एक ट्वीट में कहा, ‘2016 में स्वाति मालीवाल को अपने पिता पर नाज था और 2023 में वही पिता यौन उत्पीड़क बन गया?’ हालांकि, सोशल मीडिया पर स्वाती को काफी समर्थन भी मिला।

स्वाति मालीवाल अक्सर रातों में भी औचक निरीक्षण पर निकल जाती हैं। उन्होंने हाल ही में दिल्ली के विभिन्न इलाकों में बस स्टॉपेज का जायजा लेने के बाद कहा था कि बस स्टॉपेज पर पर्याप्त रौशनी की सुविधा नहीं है जिससे आपराधिक वारदात की गुंजाइश बढ़ जाती है। मालीवाल ने पिछले वर्ष जनवरी में एम्स के पास निरीक्षण के दौरान अपने साथ छेड़छाड़ का एक वीडियो शेयर किया था। उस वीडियो में स्वाति मालीवाल एक कार चालक से बात करती दिखती हैं। उन्होंने ट्वीट कर दावा किया कि ‘देर रात एक गाड़ी वाले ने नशे की हालत में छेड़छाड़ करने की कोशिश की। जब उन्होंने उसे पकड़ने की कोशिश की तो गाड़ी वाले ने शीशा बंद कर उन्हें 10 से 15 मीटर तक घसीटा।’ स्वाति के आरोपों पर दिल्ली पुलिस ने मामले का संज्ञान लेते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया था।

क्या विपक्ष के INDIA गठबंधन को तोड़ेगी बीजेपी?

बीजेपी अब विपक्ष के INDIA गठबंधन को तोड़ सकती है! चुनावों से पहले बहुत कुछ होता है। तमाम तरह के जोड़तोड़ होते हैं। सेंधमारी होती है। कब कौन किधर हो जाए कुछ पता नहीं चलता। सब कुछ अचानक ही होता है। अगला लोकसभा चुनाव भी इससे अछूता नहीं रहने वाला। यही कारण है कि हर ऐक्‍शन के मायने निकाले जाने लगते हैं। फिर चाहे प्रतिद्वंद्वियों की आपसी मुलाकात हो या उनका एक-दूसरे के लिए सॉफ्ट होना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उदयनिधि स्टालिन से मुलाकात के बाद शुक्रवार को ममता बनर्जी को बर्थडे विश करना उसी चश्‍मे से देखा जा रहा है। उदयनिधि द्रविड़ मुनेत्र कड़गम द्रमुक पार्टी के नेता हैं। वह तमिलनाडु के सीएम एमके स्‍टालिन के बेटे और मंत्री भी हैं। ममता बनर्जी बंगाल की मुख्‍यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस चीफ हैं। दोनों विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A के घटक दल हैं। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पीएम के इस जेस्‍चर की क्‍या वजह हो सकती है? आइए, इसे समझने की कोशिश करते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी को उनके जन्मदिन पर बधाई दी। बनर्जी इस दिन 69 वर्ष की हो गईं। पीएम मोदी ने ‘एक्स’ पर पोस्ट में कहा, ‘पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता दीदी को उनके जन्मदिन पर शुभकामनाएं। मैं उनके लंबे और स्वस्थ जीवन के लिए प्रार्थना करता हूं।’

इसके पहले तमिलनाडु के मंत्री और द्रमुक पार्टी के नेता उदयनिधि स्टालिन ने गुरुवार को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री से मुलाकात की। उन्होंने प्रधानमंत्री को इस महीने के अंत में चेन्नई में होने वाले खेलो इंडिया यूथ गेम्स के उद्घाटन समारोह के लिए न्‍योता दिया। उदयनिधि ने कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी से भी मुलाकात की। पीएम से मुलाकात के बाद उदयनिधि ने पोस्ट में लिखा, ‘हमारे मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के अनुरोध के अनुसार मैंने तमिलनाडु के बाढ़ प्रभावित जिलों में व्यापक राहत, बहाली और पुनर्वास कार्य करने के लिए प्रधानमंत्री से राष्ट्रीय आपदा राहत कोष को तत्काल जारी करने का अनुरोध किया। प्रधानमंत्री ने हमें आश्वासन दिया कि वह आवश्यक कदम उठाएंगे।’ उदयनिधि स्‍टालिन की इस मुलाकात से पहले प्रधानमंत्री ने तमिलनाडु का दौरा किया था। इस दौरान उन्‍होंने कई योजनाओं का उद्घाटन किया था। तमाम की आधारशिला रखी थी। एमके स्‍टालिन के साथ कई अवसरों पर पीएम मंच साझा करते दिखे थे।

लोकसभा चुनाव से पहले विरोधियों के साथ पीएम के इस रुख के मतलब निकाले जाने लगे हैं। द्रमुक और टीएमसी स्‍थानीय दल हैं। इनका अपने-अपने क्षेत्रों में जबर्दस्‍त प्रभाव है। विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A में सीट शेयरिंग का अब तक कोई ठोस फॉर्मूला नहीं निकल पाया है। ऐसे में सभी तरह के विकल्‍प खुले हुए हैं। ममता वैसे भी कांग्रेस और राहुल गांधी को कुछ खास पसंद नहीं करती हैं। कई मौकों पर यह बात सामने भी आ चुकी है। बंगाल में वह कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग को लेकर बिल्‍कुल भी नरम नहीं पड़ने वाली हैं। ऐसे में लोकसभा चुनाव से पहले कई तरह के समीकरण बन सकते हैं। कुछ चौंकाने वाले भी! यह बीजेपी की विरोधी खेमे में फूट डालने की कोशिश का हिस्‍सा भी हो सकता है। कुछ विरोधी दलों के साथ नरम रुख रखकर बीजेपी की मंशा I.N.D.I.A खासतौर से कांग्रेस में खलबली पैदा करना भी हो सकती है। भगवा पार्टी का यह दिखाने का प्रयास भी हो सकता है कि मौका पड़ने पर वह इनमें से किसी दल के साथ जुड़ने में परहेज नहीं करने वाली है। यही नहीं, दूसरे दलों के नेताओं को अपने साथ जोड़ने के ल‍िए पार्टी पूरी तरह से खुली हुई है। यहां तक उसने इसके ल‍िए सम‍ित‍ि तक बनाई है।

पीएम मोदी का विरोधी दलों के नेताओं के साथ इस तरह का व्‍यवहार स्‍वस्‍थ राजनीति का भी संदेश देता है। इससे लोगों में बीजेपी के लिए अच्‍छी छवि तैयार होती है। ऐसे में यह बीजेपी की इमेज बिल्डिंग का हिस्‍सा भी हो सकता है। संसद के पिछले सत्र के दौरान बीजेपी ने बड़ी संख्‍या में विपक्ष के सांसदों के निलंबन को उनके अनुचित व्‍यवहार के साथ जोड़ा था। वह दिखाना चाहती है कि विचारों में मतभेद हो सकता है। लेकिन, मनभेद अच्‍छी बात नहीं। पीएम भी कहते रहे हैं कि सिर्फ विरोध के लिए विरोध करना देश को नुकसान पहुंचा सकता है। इस बात में शक नहीं कि लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी किसी भी और दल से ज्‍यादा आक्रामक दिख रही है। वह छोटी से छोटी चीज पर ध्‍यान देने में लगी है। पार्टी किसी के लिए कोई मौका छोड़ना नहीं चाहती है। अभी इस तरह की आक्रामकता दूसरे दलों में नहीं दिख रही है।

जानिए भारत जोड़ो न्याय यात्रा के बारे में पूरी बातें!

आज हम आपको भारत जोड़ो न्याय यात्रा के बारे में पूरी बातें बताने जा रहे हैं! लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस भारत जोड़ो न्याय यात्रा को लेकर अंतिम तैयारियों में जुटी हुई है। गुरुवार को कांग्रेस के नेताओं की मीटिंग में फैसला लिया गया कि 14 जनवरी से शुरू होने वाली यात्रा का नाम ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ होगा। पहले पार्टी ने इसे भारत न्याय यात्रा नाम दिया था। अब यह यात्रा 14 राज्यों में नहीं बल्कि 15 राज्यों से होकर गुजरेगी। इसमें अरुणाचल प्रदेश को भी शामिल किया गया है। यात्रा 6200 किमी की बजाय 6700 किमी की दूरी तय करेगी। मणिपुर की राजधानी इंफाल से शुरू होने वाली यात्रा के बारे में जयराम रमेश का कहना था कि राहुल गांधी की अगुआई में निकली पहली भारत जोड़ो यात्रा ब्रैंड बन चुकी है। गुरुवार की मीटिंग में ज्यादातर लोगों की राय थी कि न्याय यात्रा में भारत जोड़ो आना चाहिए। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की अध्यक्षता में पार्टी महासचिवों, तमाम राज्यों के प्रभारियों, प्रदेश इकाई प्रमुखों और कांग्रेस विधायक दल के नेताओं की बैठक में यात्रा को लेकर कई मुद्दों पर चर्चा हुई। रमेश ने कहा कि अब यह यात्रा 14 राज्यों में नहीं बल्कि 15 राज्यों से होकर गुजरेगी। इसमें अरुणाचल प्रदेश को भी शामिल किया गया है। यह यात्रा 6700 किमी की दूरी तय करेगी। इसमें अरुणाचल प्रदेश में तय की जाने वाली 55 किलोमीटर की दूरी भी शामिल रहेगी। अरुणाचल प्रदेश पहले भी यात्रा के रूट में था, लेकिन सुरक्षा संबंधी मुद्दों के सुनिश्चित होने के बाद ही पार्टी ने अरुणाचल प्रदेश के नाम का ऐलान करने का फैसला किया। 6,713 किलोमीटर से अधिक की यह यात्रा बसों के जरिए और पैदल तय की जाएगी। यात्रा में राहुल गांधी रोजाना कम-से-कम दो सभाएं करेंगे। राज्य में जनाधार बुरी तरह से खो चुकी कांग्रेस एक बार फिर देश के सबसे बड़े सूबे में अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रही है। यह यात्रा मणिपुर, नागालैंड, असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, बंगाल, ओड़िशा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, यूपी, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र जैसे राज्यों से होकर गुजरेगी।रोज लगभग 70-80 किमी की दूरी बस से पूरी की जाएगी। 8-10 किमी. पैदल यात्रा होगी। यात्रा के जरिए 110 जिले, लगभग 100 लोकसभा सीटें और 337 विधानसभा सीटें कवर होंगी।

कांग्रेस नेता रमेश ने ऐलान किया कि 2024 आम चुनाव के मद्देनजर यात्रा का सबसे बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश से होकर गुजरेगा। उनका कहना था कि राहुल गांधी की अगुआई में यात्रा उत्तर प्रदेश में 11 दिनों में 1074 किलोमीटर की दूरी तय करेगी। यह प्रदेश में 20 जिलों से होकर गुजरेगी। राज्य में जनाधार बुरी तरह से खो चुकी कांग्रेस एक बार फिर देश के सबसे बड़े सूबे में अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रही है। यह यात्रा मणिपुर, नागालैंड, असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, बंगाल, ओड़िशा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, यूपी, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र जैसे राज्यों से होकर गुजरेगी। 20 मार्च को यात्रा मुंबई में संपन्न होगी।

66 दिनों की यात्रा शुरुआत मणिपुर के इंफाल से होगी। मणिपुर के चार जिलों में कुल 107 किलोमीटर का सफर एक दिन में तय होगा। इसके बाद नगालैंड में एंट्री होगी। दो दिनों में पांच जिलों से होकर 257 किलोमीटर की दूरी तय होगी। असम में आठ दिनों में 17 जिलों में 833 किलोमीटर का सफर, अरुणाचल में एक दिन में एक जिले में की दूरी, मेघालय में एक दिन में एक जिले और 5 किमी की यात्रा, वेस्ट बंगाल में पांच दिनों में सात जिलों में 530 किमी का सफर, बिहार में चार दिन में सात जिलों से गुजरते हुए 425 किमी की दूरी तय होगी। कांग्रेस की यात्रा झारखंड में 8 दिनों में 13 जिलों से होते हुए 804 किमी का सफर, ओडिशा में चार दिनों में चार जिलों में 341 किमी की दूरी, छत्तीसगढ़ में यात्रा पांच दिनों में सात जिलों के जरिए 536 किमी की दूरी, बता दे कि लेकिन सुरक्षा संबंधी मुद्दों के सुनिश्चित होने के बाद ही पार्टी ने अरुणाचल प्रदेश के नाम का ऐलान करने का फैसला किया। 6,713 किलोमीटर से अधिक की यह यात्रा बसों के जरिए और पैदल तय की जाएगी। यात्रा में राहुल गांधी रोजाना कम-से-कम दो सभाएं करेंगे। रोज लगभग 70-80 किमी की दूरी बस से पूरी की जाएगी। 8-10 किमी. पैदल यात्रा होगी। यात्रा के जरिए 110 जिले, लगभग 100 लोकसभा सीटें और 337 विधानसभा सीटें कवर होंगी। मध्य प्रदेश में पांच दिनों में नौ जिलों से होकर 698 किमी की दूरी, राजस्थान में एक दिन में दो जिलों से होकर 128 किमी का सफर, गुजरात में पांच दिनों में सात जिलों से गुजरते हुए 445 किमी की दूरी और महाराष्ट्र में पांच दिनों में छह जिलों से होते हुए 480 किमी की दूरी तय करेगी।

क्या हेमंत सोरेन और केजरीवाल जाएंगे जेल?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जेल जाएंगे या नहीं! जैसे-जैसे आम चुनाव की तारीख नजदीक आ रही है, सियासी फिजा में राजनीतिक जंग भी तेजी पकड़ रही है। नए साल के पहले हफ्ते में ही देश के दो राज्यों के सीएम पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है। दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल और झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन को केंद्रीय एजेंसी ईडी समन पर समन भेज रही है। ईडी ने केजरीवाल को दिल्ली में शराब नीति घोटाले मामले में समन भेजा है। वहीं सोरेन को मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में ईडी सात बार समन भेज चुकी है। दोनों सीएम अभी तक केंद्रीय एजेंसी के सामने पेश नहीं हुए हैं। दोनों ही दल आरोप लगा रहे हैं कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार उन्हें गिरफ्तार करने की साजिश कर रही है। चूंकि मौसम चुनावों का है तो सभी दल एक-दूसरे पर हमला बोल रहे हैं। राजनीतिक पार्टियां ईडी के समन में सियासी नफा-नुकसान ढूंढ रही हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ ही आम आदमी पार्टी का गठन करने वाले केजरीवाल अपने राजनीतिक जीवन के एक मुश्किल संकट से गुजर रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी बीजेपी दिल्ली के सीएम पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा रही है। ईडी ने केजरीवाल को अपने पास पेश होने के लिए तीन बार समन भेज चुकी है। आप और केजरीवाल इसे केंद्र सरकार की साजिश बता रही है। आप ने कहा कि केजरीवाल को चुनाव प्रचार से रोकने के लिए साजिश रची जा रही है। उधर, बीजेपी केजरीवाल पर भ्रष्टाचार को लेकर हमला बोल रही है। दिल्ली शराब घोटाला मामले में ही राज्य के पूर्व डेप्युटी सीएम मनीष सिसोदिया और पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह इस वक्त जेल में हैं। अब आप को ये डर है कि ईडी केजरीवाल को भी गिरफ्तार कर सकती है। केजरीवाल की पार्टी कह रही है कि सीएम ईडी की जांच में सहयोग को तैयार हैं लेकिन उनको भेजा गया समन पूरी तरह गैरकानूनी है।

आप के लिए अभी दोहरी मुसीबत आ गई है। पार्टी को दो बड़े नेता जेल में हैं और सीएम केजरीवाल को भी ईडी का समन आ चुका है। कुछ महीने बाद ही लोकसभा चुनाव होने वाले हैं। पार्टी दिल्ली और पंजाब में चुनाव की तैयारियों में जुटी हुई है। अगर इस केजरीवाल की गिरफ्तारी हो जाती है तो पार्टी के लिए बड़ा झटका होगा। केजरीवाल पार्टी के स्टार प्रचारक हैं। अगर ईडी उन्हें गिरफ्तार करती है तो पार्टी के चुनावी भविष्य पर असर पड़ना तय है। हालांकि, अभीतक केजरीवाल ईडी के सामने पूछताछ के लिए पहुंचे ही नहीं है। बीजेपी तो आरोप लगा रही है कि केजरीवाल थर-थर कांप रहे हैं। लेकिन AAP भी राजनीतिक दांव-पेच में जुटी हुई है। फिलहाल केजरीवाल ईडी के समन से बच रहे हैं। पार्टी की कोशिश है कि इस मामले को जितना देर तक खींचा जा सकता है खींचा जाए। केजरीवाल आरोप लगाते रहे हैं कि बीजेपी 2024 के चुनाव से पहले विपक्षी आवाज को दबाने की कोशिश कर रही है। पार्टी अब ईडी के समन का जवाब कानून के मुताबिक देने की बात कह रही है।

सियासी विशेषज्ञ बता रहे हैं कि जिस तरह से बीजेपी अब केजरीवाल को कट्टर बेईमान बता रही है इसका असर लोकसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है। क्योंकि केजरीवाल भ्रष्टाचार के खिलाफ ही चुनकर आए थे। राजधानी में लोकसभा की 7 सीटें हैं। अभी सभी सीटों पर बीजेपी के सांसद हैं। केजरीवाल को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरकर बीजेपी आप पर मानसिक बढ़त बनाना चाह रही है। दूसरी तरफ इंडिया गठबंधन के साथ आप का दिल्ली में सीट शेयरिंग अभी फिक्स नहीं हो पाया है। ऐसे में आप के लिए एकबार फिर दिल्ली में पेच फंस सकता है। पार्टी का लोकसभा में अभी कोई सांसद नहीं है। पार्टी पूरी कोशिश में है कि उसका लोकसभा चुनाव में प्रदर्शन अच्छा हो ताकि रिजल्ट के बाद पार्टी मोलभाव करने में आगे रहे।

झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन को भी ईडी अबतक 7 बार समन भेज चुकी है। सातवें समन भेजते हुए ईडी ने उन्हें हरहाल में पेश होने को कहा है। अभीतक ईडी के समन से बचते फिर रहे जेएमएम नेता इसबार घिर गए हैं। कयास हैं कि सोरेन को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तारी का डर है और इसी कारण वह अपनी जगह पत्नी कल्पना सोरेन को सीएम बनाने का दांव खेल सकते हैं। बीजेपी नेता भी राज्य में ऐसा दावा कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि सोरेन ने पत्नी को सीएम बनाने के लिए दांव चल भी दिया है। राज्य के गांडेय विधानसभा क्षेत्र से पार्टी के विधायक सरफराज अहमद ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। ये सीट जेएमएम के लिए काफी मुफीद मानी जाती है। अगर मनी लॉन्ड्रिंग केस में हेमंत की गिरफ्तारी होती है तो वह अपनी पत्नी के लिए सीएम पद की फील्डिंग पूरी तरह से कर चुके हैं।

झारखंड में इसी साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं जबकि लोकसभा चुनाव तो बस मुहाने पर खड़ा है। राज्य में लोकसभा की 14 सीटें हैं। बीजेपी हेमंत पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाती रही है। दूसरी तरफ बीजेपी ने राज्य का अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी को बनाकर आदिवासी दांव भी चल दिया है। यानी अगर हेमंत की गिरफ्तारी हुई तो भगवा दल उन्हें भ्रष्टाचारी बताते हुए जमकर निशाना साधेंगे। दूसरी तरफ अगर कल्पना को सीएम का पद मिलता है तो पार्टी हेमंत पर वंशवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाएगी। यानी लोकसभा चुनाव से पहले झारखंड के सीएम बुरी तरह फंस चुके हैं।

पीएम मोदी ने पिछले साल अगस्त में एक बड़ा बयान देते हुए कहा था कि 2014 के पहले भ्रष्टाचार और घोटाले का युग था। पीएम मोदी लगातार विपक्ष खासकर कांग्रेस पर इसे लेकर निशाना साधते रहे हैं। पीएम मोदी ने कहा था कि वह न तो खाएंगे न और खाने देंगे। उनके इस बयान का चुनाव में बड़ा असर दिखा था। ऐसे में अगर देश को दो बड़े सीएम भ्रष्टाचार के आरोप में घिरते हैं तो आम चुनाव से पहले बीजेपी के पास एक ऐसा ब्रह्मास्त्र होगा जिसकी काट विपक्ष के पास नहीं होगी। इसी महीने राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का भी बीजेपी भरपूर फायदा उठाने के संकेत दे चुकी है। ऐसे में 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी एक मजबूत इरादे के साथ उतरेगी। वहीं, विपक्ष अपने बिखरे घर को सुधारने की ही कोशिश में जुटी हुई है।

जानिए पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की अद्भुत कहानी!

आज हम आपको पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की कहानी बताने जा रहे हैं! दिल्ली में राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में जब उन्हें कारसेवकों के विरुद्ध कड़े कदम उठाने की सलाह दी गई तो उन्होंने बेहिचक यही बात कही। 30 अक्टूबर, 1990 को मुलायम सिंह यादव की सरकार ने आयोध्या में कारसेवकों पर गोलियां चलवाई थीं। अगले वर्ष 1991 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में मुलायम को मुख्यमंत्री की कुर्सी खोनी पड़ी और पहली बार बीजेपी को प्रदेश में अपना मुख्यमंत्री बनाने का मौका मिला। भाजपा ने इस पद के लिए कल्याण सिंह को चुना तो वो सीधे अयोध्या गए, राम लला का दर्शन करने। वहां उन्होंने अपना प्रण दुहराया- राम लला आपका मंदिर बनकर रहेगा, चाहे कुछ भी हो। कल्याण ने अपना संकल्प पूरा किया, भले ही उन्हें एक वर्ष में ही अपनी सरकार की आहुति देनी पड़ी। 5 जनवरी, 1932 को अलीगढ़ जिला स्थित अतरौली गांव में जन्मे कल्याण सिंह ने दुनियादारी की समझ होते ही राष्ट्रवाद का रास्ता चुन लिया। वो अपने स्कूली दिनों में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस से जुड़ गए। देश के लिए कुछ कर गुजरने की लालसा ने उनमें अथक परिश्रमी और अटल संकल्प का व्यक्तित्व गढ़ दिया। कल्याण वाचाल थे तो समाज और सियासत में उनकी पूछ होने लगी। कद बढ़ा तो पद भी बढ़ा। 1967 में पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा पहुंच गए और 10 साल बाद 1977 में पहली बार प्रदेश सरकार में मंत्री भी बने। 1980 के दशक शुरुआती दशक में जब विश्व हिंदू परिषद वीएचपी ने अयोध्या में राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण का आंदोलन चलाया तो कल्याण सिंह इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे। वो हिंदुत्व का प्रमुख चेहरा बन गए, खासकर उत्तर प्रदेश में।

कल्याण जब 1991 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तब तक भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या की रथयात्रा संपन्न हो चुकी थी। रथयात्रा को बिहार में रोककर आडवाणी को नजरबंद कर लेने के बावजूद राम मंदिर आंदोलन अपने उद्देश्य की तरफ बढ़ता रहा और 30 अक्टूबर, 1990 का वो दिन आया जब अयोध्या में कार सेवकों पर पुलिस ने गोलियां बरसा दीं। तब से मुलायम सिंह यादव की छवि मुल्ला मुलायम की बनने लगी। संभवतः मुलायम के कार सेवकों के प्रति इसी कठोर रवैये ने कल्याण सिंह को भी एक रास्ता सुझाया- किसी भी हद तक जाने का। उन्हें लगा कि अगर मंदिर बनने से रोकने वाले कुछ भी कर सकते हैं तो मंदिर बनाने की राह में आने वाली किसी बाधा की परवाह भला वो क्यों करें।

कल्याण सिंह की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया था कि बाबरी मस्जिद को नुकसान नहीं पहुंचने दिया जाएगा। लेकिन राम मंदिर निर्माण का निश्चय पक्का था, इसलिए सरकार ने अयोध्या में राम जन्मभूमि के आसपास 2.27 एकड़ जमीन खरीद ली और पास में ही राम चबूतरा बनवा दिया। सरकार का मकसद साफ था- तीर्थस्थल में पर्याप्त सुविधाएं सुनिश्चित करना। विश्व हिंदू परिषद भी लोगों को समझा-बुझाकर तीर्थस्थल के आसपास के इलाके की जमीनें खरीदने लगी। कल्याण सरकार ने भी जो जमीनें खरीदीं, वो विश्व हिंदू परिषद के ट्रस्ट को सौंपती गई। उसने राम कथा पार्क के लिए आसपास की 42.09 एकड़ जमीन विहिप ट्रस्ट को ट्रांसफर कर दी।

6 दिसंबर, 1992 को जब अयोध्या में कारसेवकों का जनसमुद्र उमड़ा तो आडवाणी समेत बीजेपी और आरएसएस के दिग्गज नेताओं ने उन्हें संभालने की भरपूर कोशिशें कीं। लेकिन रामभक्तों पर एक मानो एक जुनून सवार था- अत्याचार और अन्याय की सदियों पहले पड़ी नींव के प्रतीक रूप में बाबरी मस्जिद का सफाया। एक-एक कर कारसेवक बाबरी मस्जिद की गुंबदों पर चढ़ने लगे और कुछ देर में ही गुंबद टूटकर गिरने लगे। दो साल पहले उत्तर प्रदेश की जिस पुलिस ने अयोध्या की भूमि कारसेवकों के खून से रंग दी थी, वो बाबरी विध्वंस को चुपचाप देख रही थी। कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे के मुताबिक बाबरी की सुरक्षा में असफल रहने की नैतिक जिम्मेदारी लेने में देर नहीं की। उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अदालत की अवमानना के लिए 2,000 रुपये का जुर्माना लगाकर उन्हें 24 घंटे के लिए तिहाड़ जेल भेज दिया। जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें उस समय पद खोने का कोई पछतावा है तो कल्याण सिंह ने जवाब दिया कि मुख्यमंत्री का पद भगवान राम के सामने कुछ भी नहीं है। वर्षों बाद जब सुप्रीम कोर्ट ने ही राम जन्मभूमि पर ही भव्य मंदिर बनाने का रास्ता साफ कर दिया तो कल्याण सिंह ने लखनऊ में अपने आवास पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया। इसमें उन्होंने कहा, ‘6 दिसंबर 1992 को जब बाबरी मस्जिद गिरी थी, मैंने अयोध्या में हुई अराजकता की पूरी जिम्मेदारी ली थी। मैंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर और उसी दिन राज्यपाल को इस्तीफा सौंपकर उसकी कीमत चुकाई थी। मेरा विश्वास है कि 2022-23 तक अयोध्या में एक भव्य राम मंदिर बनकर तैयार होगा, जिसके दर्शन देश-विदेश से लोग करेंगे।’ उन्होंने कहा, ‘हर किसी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है और उसे स्वीकार कर लिया है, जो न्यायपूर्ण, वैध और सर्व-समावेशी है। इसने 500 साल पुराने विवाद को समाप्त कर दिया है।’

क्या पीएम मोदी का हर कार्य राजनीति से जुड़ा हुआ होता है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पीएम मोदी का हर कार्य राजनीति से जुड़ा हुआ होता है या नहीं! उत्तर प्रदेश के अयोध्या में एक अलग ही माहौल है। प्रभु रामलला के उनके भव्य मंदिर में विराजमान किए जाने की तैयारियां चल रही हैं। इसी अयोध्या में एक परिवार इस समय खासा खुश है। वह है मीरा मांझी का परिवार। 30 दिसंबर को अचानक प्रधानमंत्री उनके घर पहुंच गए। घर में बनी चाय का स्वाद लिया। उस दौरान पीएम मोदी ने कहा था, आपलोग मीठी चाय पीते हैं। मैं चायवाला हूं, मुझे चाय पीते ही उसके स्वाद का अंदाजा हो जाता है। अब उनका संदेश आया है। एक पत्र, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके घर पहुंचने के अनुभवों को साझा किया। नए साल की बधाई भेजी और साथ में कुछ गिफ्ट भी। प्रधानमंत्री का संदेश और उपहार पाकर परिवार की खुशियां कई गुना बढ़ी हुई हैं। अब हर तरफ मीरा मांझी की चर्चा है। इन चर्चाओं के बीच निषादराज की चर्चा शुरू हो गई है। भगवान राम के परममित्र रहे निषादराज लंका दमन के बाद सिंहासन संभालने के क्रम में आयोजन का साक्षी बने थे। निषादराज अयोध्या भगवान राम के निमंत्रण पर पधारे थे। भगवान राम ने मित्र का दर्जा दिया। अब प्रभु रामलला अपने भव्य मंदिर में करीब 550 सालों के बाद विराजमान होने वाले हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री ने मीरा मांझी को इस आयोजन का निमंत्रण स्वयं देकर त्रेता युग की परंपरा को बरकरार रखने का संदेश दिया। वहीं, इसके राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या के निषाद परिवार को नए साल की शुभकामनाएं और गिफ्ट भेजकर एक अलग राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। दरअसल, यूपी की राजनीति में ओबीसी वोट बैंक बड़ी भूमिका में है। निषाद जातियों का प्रदेश में एक बड़ा वोट बैंक है, जो जीत- हार में बड़ी भूमिका निभाता रहा है। भगवान राम के परम मित्र निषादराज के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस वर्ग को साधने की कोशिश की है। 30 दिसंबर को अयोध्या पहुंचे प्रधानमंत्री अचानक अपने दौरे में बदलाव कर मीरा मांझी के घर पहुंच गए। मीरा मांझी उज्ज्वला गैस कनेक्शन योजना की एक 10 करोड़वीं लाभुक हैं। प्रधानमंत्री ने इस दौरे के जरिए एक तीर से कई शिकार किए।

निषाद जातियों के बीच छोटे- छोटे दलों का प्रभाव है। यूपी में निषाद पार्टी इस वोट बैंक पर अपना दावा करती दिखती है। निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद इस वर्ग पर अपना दावा करते हैं। वहीं, बिहार में वीआईपी पार्टी अध्यक्ष मुकेश साहनी का अपना दावा है। निषाद पार्टी अभी एनडीए के साथ है। डॉ. संजय निषाद यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार का हिस्सा हैं। वहीं, बिहार की वीआईपी पार्टी कभी एनडीए तो कभी विपक्षी गठबंधन के पाले में जाती रही है। पीएम नरेंद्र मोदी के मीरा मांझी के घर पर जाने को लेकर निषाद वर्ग में एक अलग ही माहौल बना है। सवाल यह किया जाने लगा है कि आखिर किसी सामान्य निषाद परिवार में अब से पहले कोई प्रधानमंत्री आया है? इन सवालों को भाजपा की तरफ से भी उठाया जा रहा है। पूर्वांचल से उत्तरी बिहार के अधिकांश इलाकों में निषाद जाति वर्ग के वोटरों के बीच इस संदेश को काफी तेजी से फैलाया जा रहा है। इसका असर भी उसी तेजी से देखने को मिल रहा है।

पीएम ने उज्ज्वला योजना को लेकर सरकार की ओर से चलाए गए अभियान को एक तरीके से सफल करार दिया। अपने सरकार की उपलब्धियां बता दी। दूसरी तरफ मीरा मांझी के जरिए उन्होंने निषाद कम्युनिटी को सीधे- सीधे टारगेट किया। असर उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार तक पड़ना तय माना जा रहा है। यूपी की 18 फीसदी आबादी निषाद समुदाय से जुड़ी हुई है। वहीं, बिहार में इस वर्ग की जनसंख्या करीब 14 फीसदी है। पिछले दो लोकसभा चुनावों में इस वर्ग ने पीएम नरेंद्र मोदी को अपना समर्थन दिया है।

बिहार में भाजपा की निषाद पॉलिटिक्स अलग है। पार्टी ने पहले कैप्टन जयप्रकाश नारायण निषाद को अपने साथ जोड़ा। अब उनके बेटे अजय निषाद भाजपा से सांसद हैं। वे बिहार की मुजफ्फरपुर सीट से पिछले दो लोकसभा चुनावों में जीत दर्ज कर चुके हैं। इससे पहले कैप्टन निषाद 2009 में जनता दल यूनाइटेड के टिकट पर जीते थे। इस प्रकार निषाद पॉलिटिक्स को साधने की कोशिश में जुटे मुकेश साहनी को अजय निषाद के जरिए भाजपा किनारे लगाती दिख रही है। दरअसल, बिहार में निषाद वर्ग का वोट बैंक करीब 8 फीसदी है। वहीं, प्रदेश में निषाद समाज की 21 उपजातियां हैं। इनके वोट बैंक भी करीब 5 से 6 फीसदी हैं। इस प्रकार प्रदेश के करीब 14 फीसदी वोट बैंक तक पीएम नरेंद्र मोदी के अवध में लिए गए एक्शन का प्रभाव पहुंचा है।

यूपी में निषाद जाति 17 ओबीसी समुदाय का प्रतिनिधित्व करती है। कभी इस वर्ग को साधने के लिए समाजवादी पार्टी की मुलायम सिंह यादव सरकार ने एससी का दर्जा देने का प्रस्ताव तैयार किया। हालांकि, वोट बैंक की राजनीति में यह प्रस्ताव कानूनी पचड़े में फंस गया। कोर्ट की इस पर रोक लग गई। 2011 की जनगणना को आधार बनाकर देखा जाए तो यूपी में निषाद समाज का वोट बैंक करीब 18 फीसदी है। यूपी की 165 विधानसभा सीटों पर इनकी बहुलता है। इनका वोट बैंक 90 हजार से एक लाख के करीब है। अन्य जिलों में भी इनकी आबादी 25 से 30 हजार के करीब है। मतलब, यह वर्ग जीत- हार का अंतर पैदा करने वाला है।

गोरखपुर, जौनपुर, भदोही, वाराणसी से लेकर पूरे पूर्वांचल में इस वर्ग का वोट बैंक प्रभावी माना जाता है। नौका चालक और मछली पकड़ने का काम करने वाले इस वर्ग के बीच पीएम मोदी का पहुंचना एक बड़ी राजनीतिक घटना के रूप में देखा जा रहा है। पीएम मोदी के इस कदम से क्षेत्रीय छत्रपों की राजनीति भी प्रभावित होनी तय मानी जा रही है। पीएम मोदी ने इसके बाद जनसभा में भी उज्ज्वला योजना की चर्चा की। पीएम ने कहा कि वर्ष 1947 में देश की आजादी के बाद से 2014 तक देश में केवल 14 करोड़ गैस कनेक्शन दिए गए। पिछले साढ़े नौ सालों में 18 करोड़ गैस कनेक्शन दिए गए हैं। इसमें से 10 करोड़ कनेक्शन तो उज्ज्वला योजना के हैं। साथ ही, उन्होंने एक सामान्य लाभुक के मुंह से आवास योजना में भ्रष्टाचार जैसी शिकायतों पर बात की। पूछा, कितने पैसे आए। मीरा ने कहा- तीन किश्तों में ढाई लाख रुपये आए। इस पर पीएम ने पूछा- किसी ने कुछ मांगा तो नहीं? किसी को कुछ देना तो नहीं पड़ा? मीरा ने कहा- पूरे पैसे एकाउंट में आए। किसी को खिलाना नहीं पड़ा।

भाजपा का विरोध करने के लिए बनी I.N.D.I.A. हो या अन्य विपक्षी दल, पीएम नरेंद्र मोदी के एक्शन का असर उन पर पड़ना तय है। पीएम मोदी ने एक सामान्य निषाद परिवार और मुहल्ले में पहुंचकर एक अलग माहौल पैदा किया। इस पर बहस शुरू हुई। इसका सीधा राजनीतिक लाभ उन्हें मिलना तय है। यूपी की राजनीति में अखिलेश यादव और मायावती निषाद वर्ग को साधकर अपनी तरफ लाने का प्रयास करती रही है। हालांकि, अब पीएम नरेंद्र मोदी ने मीरा मांझी के घर पहुंचकर संदेश दिया है कि इस वर्ग का असली मित्र भाजपा ही है। वहीं, जमीन पर सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने के दिल्ली से दावे की हकीकत अयोध्या से दिखाकर पीएम मोदी ने विरोध करने वाले दलों को भी जमीन पर उतरने का संदेश दिया है।

देशभर में एक साल में कितने होते हैं हिट एंड रन के मामले?

आज हम आपको वह आंकड़े दिखाएंगे जिनमे हिट एंड रन के मामले देश भर में एक साल में गिने गए हैं! भारतीय न्याय संहिता बीएनएस में सड़क दुर्घटनाओं के लिए सजा के प्रावधान के खिलाफ ट्रक ड्राइवरों में रोष है। देशभर के ट्रक ड्राइवर बीएनएस की धारा 104 को वापस लेने की मांग करते हुए हड़ताल पर चले गए थे। उनकी चिंता यह है कि सड़क हादसे के लिए 10 साल जेल की सजा का प्रावधान बहुत कठोर है जो ड्राइवरों की जिंदगी और उनका परिवार तबाह कर देगा। हालांकि, सच्चाई कुछ और है। नया कानून कहता है कि अगर कोई ड्राइवर किसी को ठोकर मारकर भाग जाता है और वह घटना की रिपोर्टिंग नहीं करता है तब उसे 10 साल की सजा हो सकती है। अगर वह पुलिस को घटना की जानकारी खुद दे दे तो उसे 5 साल तक की सजा ही हो सकती है जिसका प्रावधान मौजूदा कानून में भी है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर अगर नए कानून के प्रावधान को परखें तो क्या आप कहेंगे कि यह गलत है? आइए, आपको इस सवाल का जवाब ढूंढने में थोड़ी और मदद करते हैं। दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022 में दिल्ली में सड़क हादसों से जितनी मौतें हुईं, उनमें 47% यानी करीब आधे मामलों में पता ही नहीं चल पाया है कि आखिर टक्कर किसने मारी? इसे ही हिट एंड रन केस कहते हैं- मारो और निकल लो। सोचिए, अगर ड्राइवर की जिंदगी और उसका परिवार है तो क्या हादसे में जान गंवाने वालों की जिंदगी और परिवार का कोई महत्व नहीं? कानून सिर्फ यही कहता है कि अगर हादसा हो गया है तो इसकी जानकारी पुलिस को दें ताकि पीड़ित को जान बचाने की कोशिश की जा सके। अगर ऐसा हुआ तो निश्चित रूप से सड़क हादसों में मौतों की संख्या बहुत हद तक नीचे आ सकती है। तब कई जिंदगियां बच सकती हैं, कई परिवार एक झटके के बाद दोबारा उबर सकता है।

आइए सड़क हादसों में मौतों पर थोड़ा विस्तार से बात करते हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो 2002 में राजधानी दिल्ली में लगभग सड़क हादसों में होने वाली आधी मौतों की वजह ऐसे वाहन होते हैं जिनका कभी पता ही नहीं चल पाता है। पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, 2022 में दिल्ली में सड़क हादसों में हुई मौतों में से 47% अज्ञात वाहनों के कारण हुई थी। वहीं, कार या टैक्सी से 14% जबकि भारी वाहनों से हादसों में 12% मौतें हुई हैं। अज्ञात वाहनों ने उस साल 668 लोगों की जान ली और लगभग 1,104 को घायल कर दिया। 2023 के आंकड़े अभी तक प्रकाशित नहीं हुए हैं, लेकिन माना जाता है कि वे लगभग समान स्तर पर हैं।

अब जरा पूरे देश का हाल देख लें। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2022 में सभी सड़क हादसों में टक्कर मारकर भागने के मामले करीब 15% थे। यानी हर 100 दुर्घटनाओं में से 15 में टक्कर मारने वाले वाहन का पता ही नहीं चला। हिट एंड रन केस में मौतों की बात करें तो यह आंकड़ा 18% है। आइए कुछ ऐसे सवालों के जवाब भी जान लें जो आपके मन में भी उठ सकते हैं। नहीं, भारत में सड़क हादसों के कई कारण होते हैं.। सामने से टक्कर, पीछे से टक्कर, साइड से टक्कर, ओवरस्पीडिंग, नशे में गाड़ी चलाना- ये सब भी बड़े कारण हैं। टक्कर मारकर भागना सड़क हादसों का पांचवां सबसे बड़ा कारण है और मौतों का दूसरा सबसे बड़ा कारण है।आंकड़े बताते हैं कि सबसे ज्यादा डर ट्रक-लॉरी से लगाता है। हकीकत भी यही है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि दुर्घटनाओं में सबसे ज्यादा दोपहिया वाहन शामिल होते हैं। सबसे ज्यादा टक्कर दोपहिया वाहनों में ही होती है। ट्रक-लॉरी के ज्यादातर शिकार दोपहिया वाहन ही होते हैं।

अगर मामला अदालत तक पहुंचे तो मिलती है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि हिट एंड रन केस में जो ट्रायल पूरा हो जाते हैं, उनमें करीब 47.9% में सजा होती है। ये दर दूसरी दुर्घटनाओं से काफी ज्यादा है। हत्या और गैर-इरादतन हत्या जैसे गंभीर मामलों में सजा की दर क्रमशः 44% और 39% ही है। हालांकि ये भी जानना जरूरी है कि हिट एंड रन के 90% से ज्यादा केस सालभर तक कोर्ट में ही पेंडिंग रह जाते हैं। यही स्थिति दूसरे गंभीर अपराधों की भी है।

इसका मतलब ये हुआ कि टक्कर मारकर भागने वाले को पकड़ पाना, सबूत जुटाना और चार्जशीट बनाना पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती है। यही एक बड़ा कारण है जिसके चलते सरकार ने नया कानून बनाने का फैसला किया है। पुलिस का कहना है कि नंबर प्लेट खराब या धुंधला हो तो वाहन का पता लगाना भी मुश्किल हो जाता है। ऊपर से प्रत्यक्षदर्शी भी पुलिस को जानकारी देने से हिचकते हैं। वैसे भी, हिट एंड रन के ज्यादातर मामले रात में होते हैं जब प्रत्यक्षदर्शी कम ही होते हैं। सड़कों पर सीसीटीवी कैमरों की कमी से जांच और भी मुश्किल हो जाती है। भारतीय दंड संहिता आईपीसी की जगह ले रही भारतीय न्याय संहिता बीएनएस में हादसे के बाद भाग खड़े होने वाले ड्राइवरों को 10 साल तक की जेल और 7 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। हालांकि, दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ रोड ट्रैफिक एजुकेशन के अध्यक्ष डॉ. रोहित बाजलुजा का मानना है कि इस कानून को पूरी तरह लागू करना मुश्किल होगा। उनका कहना है कि ‘बिना उचित तैयारी और साधनों के कानून बनाना खतरनाक है। यह किसी को हथियार देकर उसे अपनी मर्जी से इस्तेमाल करने की इजाजत देने जैसा है।’ वे आगे कहते हैं, ‘दिल्ली में ही लगभग 80 हजार पुलिसकर्मी हैं, जिनमें से 5,000 ट्रैफिक पुलिस में हैं। अब इतने कम पुलिसकर्मियों से इतने सारे वाहनों और इतने बड़े क्षेत्र पर निगरानी रखना और सभी कानून तोड़ने वालों पर कार्रवाई करना लगभग असंभव है।’