Home Blog Page 812

जानिए राजस्थान की लेडी डॉन अनुराधा और काला जठेड़ी की प्रेम कहानी के बारे में सब कुछ!

आज हम आपको राजस्थान की लेडी डॉन अनुराधा और काला जठेड़ी की प्रेम कहानी बताने जा रहे है! अनुराधा और संदीप को पहली नजर में ही प्यार हो गया था। दोनों की मुलाकात 2020 के वसंत ऋतु में हुई थी, जब कोरोना वायरस से कोविड-19 महामारी शुरू ही हुई थी। हालांकि, उनकी सिर्फ इतनी चिंता नहीं थी। दोनों दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा पुलिस बलों की मोस्ट वॉन्टेड लिस्ट में थे। पुलिस की फाइलों में अनुराधा, मैडम मिंज थीं और संदीप, गैंगस्टर काला जठेड़ी जिसके सिर पर उस समय 7 लाख रुपये का इनाम था। दोनों 2021 में पुलिस के हत्थे चढ़ चुके थे और तब जठेड़ी जेल में है। हालांकि, अनुराधा को जमानत मिल गई और दोनों ने नियमित मुलाकातों से अपने दिलों में एक-दूसरे के प्रति प्यार को संजोए रखा। सोमवार को द्वारका कोर्ट ने जठेड़ी को 12 मार्च को अनुराधा से शादी करने के लिए छह घंटे की कस्टडी पैरोल की अनुमति दे दी। इसके साथ ही बीते पांच वर्षों की उनकी चाहत के परवान चढ़ने का रास्ता साफ हो गया। जानकारी के अनुसार, फरार रहने के दौरान वैली ऑफ फ्लावर की यात्रा के दौरान उनका प्यार परवान चढ़ा। अगले नौ महीनों तक दोनों ने मसूरी से देहरादून से रानीखेत और अन्य जगहों पर जाते हुए पुलिस के साथ चूहे-बिल्ली का खेल खूब खेला। आखिरकार वो जुलाई 2021 में सहारनपुर के पास पुलिस के हाथ लगे और न्यायिक हिरासत में भेज दिए गए।

लेकिन अलग-अलग जेलों की दीवारें उनके प्यार के परवान चढ़ने से रोक नहीं पाईं। बताया जाता है कि लॉरेंस बिश्नोई जेल में जठेड़ी को बहुत सपोर्ट किया। कई महीनों बाद अनुराधा को जमानत मिल गई और वो लगातार मिलते रहे। उनकी प्रेम कहानी से परिचित लोग कहते हैं कि अनुराधा जिस आसानी से फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती है और वैसे ही उसके हाथ से क्लासनिकोव भी धुआंधार गोलियां उगलता है। जठेड़ी अनुराधा की इसी शख्सियत पर दिल हार बैठा।

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया, ‘2017 की गर्मियों में खूंखार गैंगस्टर आनंदपाल की पुलिस एनकाउंटर में मारे जाने के बाद अनुराधा की जिंदगी भी जैसे खत्म हो गई थी। आनंदपाल और अनुराधा बहुत करीब थे। अनुराधा तब आनंदपाल के प्रतिद्वंद्वी राजू बसौदी के रेडार पर आ गई थी। तभी उसे गैंगस्टर बलबीर बनूडा का साथ मिला। अनुराधा 2019 तक बिश्नोई के संपर्क में आ गई थी और अंततः जठेड़ी से दोस्ती कर ली।’ इसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की टीम ने 2021 में जठेड़ी और अनुराधा को ट्रैक किया था। अनुराधा राजस्थान के सीकर जिले के अलफसर गांव के एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखती है। अधिकारी ने बताया, ‘अनुराधा के बचपन में ही उसकी मां चल बसी थीं। उसके पिता सरकार नौकरी में थे और उन्होंने ही अनुराधा का पालन-पोषण किया। उसका पुकारू नाम मिंटू था। संभवतः इसी वजह से उसे मैडम मिंज कहा जाने लगा।’

सूत्रों ने कहा कि अनुराधा एक पढ़ी-लिखी लेडी है जिसके पास कंप्यूटर एप्लीकेशन में बैचलर डिग्री है। बाद में उसने शेयर बाजार में हाथ आजमाया लेकिन उसका व्यवसाय तब चौपट हो गया जब उसके साथी ने उसे धोखा दिया। अनुराधा पर एक करोड़ का कर्ज था। उसने पुलिस को बताया कि उसने यह कर्ज चुकाने के लिए स्थानीय पुलिस से मदद लेने की कोशिश की थी, लेकिन आखिरकार गैंगस्टर आनंदपाल तक पहुंच गई। उसने पुलिस के सामने और अदालत में कहा था कि उसे दोबारा अपराध की दुनिया में लौटने की कोई मंशा नहीं है। पिछले कुछ महीनों से वह जठेड़ी के बुजुर्ग माता-पिता के साथ रहकर उनकी देखभाल कर रही है। उनके परिचितों का कहना है कि इसी व्यवहार से प्रभावित होकर जठेड़ी ने अनुराधा को शादी का प्रस्ताव दिया। वह अब कानून की पढ़ाई भी कर रही है ताकि वह अदालत में अपने पति की मदद कर सके।

सोमवार की सुनवाई में जठेड़ी के वकील रोहित दलाल ने दलील दी कि विवाह करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है और संदीप को शादी करने का अवसर न देना उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। जठेड़ी की लीगल टीम की दलीलों और पुलिस की प्रतिक्रिया सुनने के बाद अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश दीपक वासन ने सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक पैरोल का आदेश दिया और दिल्ली पुलिस को सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। अदालत के आदेश के मुताबिक, संदीप को 13 मार्च को उसके गांव जठेड़ी में ‘गृह प्रवेश’ समारोह में शामिल होने ले जाया जाएगा। वहां वह सुबह 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक रहेगा। एक पुलिस अधिकारी ने कहा कि जठेड़ी की सुरक्षा में पुलिस अपने सबसे भरोसेमंद जवानों को तैनात करेगी, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वह हिरासत से भागने की कोशिश न करे।

क्या अब पश्चिम बंगाल में भी विजय हासिल कर सकती है बीजेपी?

बीजेपी अब पश्चिम बंगाल में भी विजय हासिल कर सकती है! कलकत्ता हाईकोर्ट के निवर्तमान जज जस्टिस अभिजीत गंगोपाध्याय का राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और मुख्य न्यायाधीश टीएस शिवांगनानम को इस्तीफा सौंपने के कुछ ही घंटों में राजनीति का रुख कर लेना बहुत जल्दबाजी वाला फैसला लगता है। दूसरी ओर, एक राजनीतिक हस्ती के नाते उन्हें अपनी नई भूमिका शुरू करने की मजबूरियां भी हो सकती हैं। हालांकि, ये मजबूरियां क्या हैं, उन्होंने अभी तक स्पष्ट नहीं किया है। उन्होंने भाजपा को देश के भले के लिए काम करने वाली एकमात्र पार्टी बताई है। यह पार्टी के लिए खुशी की बात हो सकती है। लेकिन दुर्भाग्य से यह इस आरोप की पुष्टि करता है कि हाल के महीनों में उनके न्यायाधीश के रूप में काम में पर्याप्त निष्पक्षता और स्वतंत्रता नहीं थी। ये दो सिद्धांत संविधान के एक स्तंभ के रूप में न्यायपालिका के आधार हैं। एक संबंधित मुद्दा यह है कि धर्म के बारे में व्यक्तिगत विकल्प धर्मनिरपेक्ष एवं लोकतांत्रिक राजनीति की संरचना में कैसे फिट होते हैं?गंगोपाध्याय ने कहा है कि अपनी नई पारी के लिए भाजपा को चुनने का आधार साझी आस्था थी। उन्होंने अपने विकल्पों से माकपा को बाहर कर दिया क्योंकि वह धर्म को महत्व नहीं देता। अगर पूर्व जज इस बात पर अड़े रहते कि भाजपा वह पार्टी है जो लोगों के लिए काम करती है या वह भारत के विकास के उस दृष्टिकोण को साझा करते हैं जिसे मोदी लागू कर रहे हैं, तो उनकी राजनीति और चुनावी राजनीति में प्रवेश को समझना आसान होता।चुनाव का मकसद यह तय करना है कि कौन सी राजनीतिक पार्टी मतदाताओं की आकांक्षाओं का बेहतर प्रतिनिधित्व कर सकती है। संभवतः धार्मिक संबद्धता को विजन और गवर्नेंस के बराबर रखकर फैसला करना परेशान करने वाला है जैसा कि जस्टिस गंगोपाध्याय ने किया है। अगर वो अपनी धार्मिक निष्ठा पर मौन रहकर उसे अपनी राजनीति में नहीं मिलाते तो संवैधानिक मूल्यों की प्रतिष्ठा बढ़ा सकते थे। यह ऐसी प्रतिबद्धता है जिसके प्रति उन्होंने जज बनने के समय आस्था प्रकट की होगी। अगर वो संसद के लिए चुने जाते हैं तो उन्हें यही दोहराना चाहिए। भाजपा नेतृत्व निश्चित रूप से उनकी भूमिका को स्पष्ट करेगा। हालांकि आगामी लोकसभा चुनाव में उन्हें उम्मीदवार बनाए जाने की भररपूर उम्मीद है। वो न्यायपालिका के उच्च पदों से चुनाव प्रचार की गहमागहमी वाले माहौल में कैसे स्विच करते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा क्योंकि उनके पिछले और नए पेशे के नियम बहुत अलग हैं। चुनाव प्रचार के दौरान राजनीतिक व्यवस्था की मांगें लगातार बनी रहती हैं। नए राजनेता खुद को चुनावी मांगों के अनुरूप तुरंत ढाल लें, ऐसा कम ही हो पाता है। कुछ ने ऐसा जरूर कर दिखाया है, जैसे पूर्व राजनयिक शशि थरूर। 

लेकिन कई गुमनामी के अंधेरे में खो गए।उनकी पसंद की पार्टी जब तक पुष्टि नहीं करेगी कि गंगोपाध्याय को कहां-कैसे तैनात किया जाएगा, तब तक अटकलों का बाजार गर्म रहेगा। हालांकि, पश्चिम बंगाल की राजनीति और खासकर ममता बनर्जी और टीएमसी नेतृत्व की विश्वसनीयता पर उनके फैसले के प्रभाव के बारे में कोई संदेह नहीं है। संदेशखाली की घटनाओं के ठीक बाद गंगोपाध्याय के इस्तीफे से ममता सरकार सबसे खराब स्थिति में आ गई है। यह इस धारणा को मजबूत करता है कि सीएम ममता बनर्जी के वादों से उनकी सरकार की कारगुजारियां बिल्कुल अलग हैं ।

ममता मां, माटी, मानुष के लिए न्याय की लड़ाई लड़ने के वादे के साथ जीत हासिल करके सत्ता में आईं। उन्होंने परिवर्तन का वादा किया था, लेकिन संदेशखाली कांड और शिक्षक भर्ती घोटाले ने उनकी सरकार की पोल खोल दी। जस्टिस गंगोपाध्याय की अध्यक्षता वाली पीठ ने ही भ्रष्टाचार का जाल उजागर करने का आदेश दिया था। वो बड़े पैमाने का घोटाला था, जिसने लोगों का खून चूसकर टीएमसी के नेताओं-कार्यकर्ताओं को लाभ पहुंचाया। इसने राजनीतिक व्यवस्था और उसके सपोर्ट सिस्टम पर गंभीर प्रश्न चिह्न लगा दिया।

शिक्षक भर्ती घोटाले के जरिए सामने आई सत्ता के दुरुपयोग और इससे उपजे कैश कलेक्शन रैकेट से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कलेक्टर और उसका नेटवर्क राजनीतिक संगठन को चलाने के लिए जरूरी हैं। राजनीतिक दलों को अपना संगठन चलाने के लिए अकूत धन की जरूरत होती है, इस घोटाले ने यह भी उजागर किया है। प. बंगाल का शिक्षक भर्ती घोटाला राजनीतिक दलों की इसी जरूरत की पूर्ति का एक रास्ता दिखता है। जब तक खातों को सार्वजनिक रूप से साझा नहीं किया जाता है, तब तक चुनावी बॉन्ड को भी दूसरा रास्ता ही माना जाएगा। दोनों समान रूप से अपारदर्शी हैं।जनता की राय गंगोपाध्याय के जज के रूप में किए गए कार्यों और तुरंत राजनीति में शामिल होने को लेकर कैसी होगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। यह तो तय है कि आगामी चुनाव में वो भाजपा के लिए एक शुभंकर होंगे, जब पार्टी प. बंगाल की कुल 42 में से कम से कम 17 लोकसभा सीटें जरूर जीतने के लिए कमर कस रही है ताकि प्रदेश के पार्टी सांसदों का मौजूदा संख्या बल कायम रहे।उम्मीद के मुताबिक यदि गंगोपाध्याय चुनाव में उम्मीदवार के रूप में खड़े किए जाते हैं तो निश्चित रूप से सबकी निगाहें उन पर होंगी। जिन लाखों लोगों ने पश्चिम बंगाल में शिक्षक भर्ती परीक्षा दी लेकिन घुसखोरी के कारण शॉर्टलिस्ट नहीं हो पाए थे, उनके लिए तो जस्टिस गंगोपाध्याय सत्यनिष्ठा र न्याय के प्रतीक हैं।

जस्टिस गंगोपाध्याय वाली हाई कोर्ट बेंच ने मामले की सीबीआई और ईडी जांच के आदेश दिए तो कई एफआईआर दर्ज की गई। जांच हुई तो टीएमसी नेताओं के ठिकानों से नोटों के पहाड़ सामने आए। इस कारण टीएमसी एक बड़े राजनीतिक बवंडर में फंसती दिखी। इसने निश्चित रूप से सीएम ममता बनर्जी की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया। जस्टिस गंगोपाध्याय के इस्तीफे से पहले भी 2024 का लोकसभा चुनाव ममता के लिए एक कठिन चुनौती थी, अब यह और कठिन हो हो गया है।

आखिर क्या था लखीमपुर खीरी का वह खूनी कांड?

आज हम आपको लखीमपुर खीरी का खूनी कांड बताने जा रहे हैं! 3 अक्टूबर 2021 की तारीख। दिन रविवार। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गोरखपुर के दौरे पर थे। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार लखीमपुर खीरी के सुदूर इलाके तिकुनिया में पहुंचे थे। यहां तक सबकुछ सामान्य था। लेकिन दोपहर के बाद यहां कुछ ही देर के अंदर हिंसा की आंच भड़की, जिसके लखीमपुर से लेकर नई दिल्ली तक कोहराम मचा दिया। इसके बाद लखीमपुर से 60 किलोमीटर दूर नेपाल सीमा के पास तिकुनिया का नाम पूरे देशभर में चर्चा में आ गया। इसके साथ ही स्थानीय सांसद और देश के गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र टेनी और उनके बेटे आशीष मिश्र मोनू का नाम भी हर किसी की जुबान पर आ गया। किसानों के प्रदर्शन के बीच हिंसा और मौत का तांडव मच गया। अब ढाई साल के बाद एक बार फिर से उस कांड पर बात होने लगी है। इस बार वजह है- लखीमपुर से बीजेपी की तरफ से फिर से अजय मिश्र को फिर से बनाया जाना। स्थानीय किसानों ने इसे जख्म पर नमक छिड़कना करार दिया है। देश में किसान आंदोलन चल रहा था। सिख आबादी वाले लखीमपुर के तराई इलाके में भी किसान प्रदर्शन कर रहे थे। सितंबर महीने में अजय मिश्रा टेनी ने मंच से किसानों को धमकी भरे लहजे में चेतावनी दी थी। किसानों में टेनी के इस बयान को लेकर गुस्सा था। इस बीच डेप्युटी सीएम 3 अक्टूबर को तिकुनिया कांड वाले दिन लखीमपुर के दौरे पर थे। उन्हें सरकारी कार्यक्रम में शामिल होना था। इसके बाद वह दंगल कार्यक्रम में विजेताओं को सम्मानित करने तिकुनिया के लिए रवाना हुए। बगल में बनवीरपुर सांसद अजय टेनी का पैतृक गांव है। उनके मंत्री बनने के बाद कार्यक्रम का भव्य आयोजन था, जिसमें खुद डेप्युटी सीएम अतिथि बनकर पहुंच रहे थे।

किसानों ने केशव प्रसाद मौर्य का विरोध करने और उन्हें काला झंडा दिखाने के लिए रास्ता रोककर घेराव की तैयारी कर ली। इसी बीच 3 गाड़ियों का एक काफिला गुजरा और कई किसानों को कुचलते हुए भागने की कोशिश की। इसमें 4 किसानों की मौत हो गई। इस दौरान भड़की किसानों की भीड़ ने भी प्रतिहिंसा में काफिले की गाड़ी को आग लगाई और एक आरोपी को मौत के घाट उतार दिया।

दोपहर में हिंसा के बाद सियासत भी गरमा गई। विपक्षी नेताओं और किसान नेताओं ने लखीमपुर कूच का ऐलान कर दिया। सीएम योगी भी गोरखपुर का दौरा छोड़कर वापस राजधानी लखनऊ लौट आए। प्रशासन के आला अधिकारियों के साथ मीटिंग हुई और उन्हें मौके पर भेजा गया। इस घटना के बाद से तरह तरह के वीडियो सामने आने लगे और गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा के बेटे का नाम उछलने लगा। आरोप लगा कि जिस जीप ने कुचला, उसमें आशीष मिश्रा मौजूद थे। लेकिन मंत्री और उनके बेटे की तरफ से सफाई आई। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी किसी तरह सीतापुर के हरगांव तक पहुंचने में कामयाब रहीं। लेकिन प्रशासन ने उन्हें तीखी बहस के बाद हिरासत में ले लिया। भाकियू नेता राकेश टिकैत के नेतृत्व में किसानों और सरकार के बीच पीड़ित परिजन को 45 लाख, 1 सरकारी नौकरी और आरोपियों की गिरफ्तारी पर समझौता हो गया। 5 अक्टूबर को राहुल गांधी दिल्ली से लखीमपुर खीरी के लिए निकले और प्रियंका गांधी के साथ पीड़ित परिवारों से मिले।

6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में संज्ञान लिया और सात तारीख को सुनवाई का दिन मुकर्रर किया और उसी दिन सभी दलों के नेताओं को लखीमपुर खीरी जाने की अनुमति दे दी गई। सपा, बसपा, शिरोमणि अकाली दल, टीएमसी से लेकर अलग अलग दल के नेता मौके पर पहुंचे और गृहराज्यमंत्री के बेटे की गिरफ्तारी के साथ-साथ उनके इस्तीफे का मांग करने लगे। पूरे राजनीतिक भूचाल के बीच गृह राज्यमंत्री आशीष मिश्रा टेनी अपने बेटे को निर्दोष ही बताते रहे। सुप्रीम कोर्ट की तरफ से यूपी सरकार को फटकार के बाद 9 अक्टूबर के दिन आशीष मिश्रा टेनी ने चेहरे पर रुमाल बांधकर कोर्ट में सरेंडर कर लिया। सुप्रीम कोर्ट ने साल 2021 के आशीष मिश्रा को अंतरिम जमानत देने के अपने पहले के आदेश को बढ़ा दिया। न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ को 26 सितंबर 2023 के बाद मुकदमे की स्थिति से संबंधित कोई रिपोर्ट रिकॉर्ड पर नहीं मिली। मामले को स्थगित करते हुए, पीठ जिसमें न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन भी शामिल थे, ने शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री को ट्रायल कोर्ट से स्थिति रिपोर्ट प्राप्त करने के लिए कहा और इस बीच, अंतरिम जमानत की अवधि बढ़ाने का आदेश दिया।

वहीं लखीमपुर में भी किसानों ने प्रेस कॉन्फ्रेस और प्रेस नोट रिलीज कर अजय मिश्र के टिकट पर विरोध जताया है। तिकोनिया कांड में मृतक नक्षत्र सिंह के पुत्र जगदीप ने कहा कि भाजपा बार-बार हमारे जख्म कुरेद देती है। सूची जारी होते ही किसान नेता सरवन सिंह पंधेर ने विडियो जारी करते हुए कहा था कि सरकार ने किसानों के जले पर नमक छिड़क दिया है। भारतीय किसान यूनियन के जिलाध्यक्ष दिलबाग सिंह ने भी विरोध जताते हुए कहा कि अभी तक हमारा विरोध अजय मिश्र की बर्खास्तगी को लेकर था। पर भाजपा ने फिर से टिकट दे कर हमारी भावनाओं से खेला है। किसानों ने पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा से अजय मिश्र का टिकट काटने की अपील की है।

पश्चिम बंगाल जाकर क्या बोले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी?

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल में जाकर एक पुरानी कहानी सुना दी है! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कितने कैलकुलेटिव हैं, इसका अंदाजा तो वक्त-वक्त पर लगता ही रहता है, लेकिन आज कोलकाता की रैली में उन्होंने जो कहा, जिस भाव-भंगिमा से साथ कहा, वो उनके चुनावी राजनीति में प्रकांड होने का अनोखा प्रमाण है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बारासात के एक कार्यक्रम में अपने अतीत को लेकर ऐसा दावा किया जिसका मतदाताओं के मन पर गहरा असर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि वो तो बचपन में ही घर से झोला लेकर निकल गए थे। उन्होंने मतदाताओं को समझाने की कोशिश की कि वो यूं ही पूरे देश को अपना परिवार नहीं कहते हैं, बल्कि यही सच है। पीएम मोदी का यह प्रयास एक तीर से दो निशाने साधने का लक्ष्य साधने के लिए हो सकता है। मोदी की मंशा बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के व्यक्तिगत हमले के खिलाफ अभियान को आगे बढ़ाने की हो सकती है। दूसरी तरफ, वो अपने त्याग की कहानी बताकर वोटरों को इतना भावुक करना चाहते होंगे कि उनकी नजरों में सीएम ममता बनर्जी की सादगी बड़ी बात न रहे जाए। ध्यान रहे कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी बड़ी सतर्कता के साथ खुद को बेहद सादगी पसंद साबित करने की कोशिश करती रहती हैं। ममता अक्सर सफेद साड़ी और हवाई चप्पलों में ही दिखती हैं। पहले बात पीएम मोदी के बयान की। उन्होंने बारासात में कहा, ‘मैं जीवन का एक पहलू, जिसके विषय में मैं आम तौर पर नहीं बोलता हूं, लेकिन आज जब माताएं-बहनें बैठी हैं तो बोलने का मेरा मन कर रहा है। बताऊं, बताऊं, बताऊं, मैं बताऊं? मैं पहले कभी नहीं बताता था, लेकिन आज मन करता है बता दूं। कुछ लोगों को लगता होगा कि किसी राजनेता ने मुझे गाली दी, इसलिए मैं सबको मेरे परिवार, मेरे परिवार कह रहा हूं। लेकिन मैं सच्चाई बताना चाहता हूं।’फिर वो कहते हैं, ‘मैं बहुत छोटी आयु में घर छोड़ करके एक झोला लेकरके चल पड़ा था। परिव्राजक की तरह देश के कोने-कोने में भटक रहा था, कुछ खोज रहा था। मेरी जेब में कभी एक पैसा नहीं रहता था। लेकिन आपको जानकरके गर्व होगा कि मेरे देश का हर परिवार कैसा है। कंधे पर एक झोला लटकता था और मैं देखता था, कोई ना कोई परिवार, कोई मां-बाप कोई बहन, पता नहीं क्या कारण- वो मुझे पूछ लेते थे कि भाई, बेटे, कुछ खाना खाए हो कि नहीं खाए हो? और आज मैं देशवासियों को बता रहा हूं, सालों तक मैं परिव्राजक रहा, कंधे पर झोला लेकर घूमता रहा हूं। जेब में एक पैसा नहीं रहा, लेकिन मैं एक दिन भी भूखा नहीं रहा।’

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत हमला किया तो बीजेपी ने उसे चुनावी मुद्दा बनाने की ठान ली। पार्टी के बड़े-बड़े नेता, यहां तक कि केंद्रीय मंत्री भी अपने सोशल मीडिया हैंडलों पर अपने नाम के साथ ‘मोदी का परिवार’ लिखने लगे। दूसरी तरफ, पीएम मोदी भी अपनी रैलियों में देश की 140 करोड़ जनता को अपना परिवार बताने का सिलसिला तेज कर दिया। लालू प्रसाद ने पटना के गांधी मैदान में आयोजित विपक्षी गठबंधन की रैली में कहा था कि नरेंद्र मोदी का कोई परिवार क्यों नहीं है, उनकी कोई संतान क्यों नहीं है? उन्होंने पीएम मोदी से सवाल पूछते हुए बार-बार ‘तुम’ शब्द का प्रयोग किया और दावा किया कि मोदी हिंदू भी नहीं हैं। लालू के इस बयान पर बीजेपी बिफर पड़ी और प्रेस कॉन्फ्रेंस से लेकर सोशल मीडिया और रैलियों तक, हर जगह लालू को घेरा जाने लगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपनी रैलियों में कहने लगे कि लालू प्रसाद यादव ने उनके लिए जो कहा, बीत दो दशक में उससे भी कठोर बातें उनके लिए कही गई हैं। पीएम ने कहा कि विपक्ष के पास जमीनी मुद्दे नहीं हैं, इस कारण वो गाली-गलौज करते हैं। लालू ने जिस दिन पटना में हमला बोला, उसी दिन पीएम मोदी तेलंगाना के अदीलाबाद की रैली में जवाबी अभियान का आगाज कर दिया। पीएम परिवारवाद पर खूब बोले और तब से वो हर रैली में इस पर लंबे वक्त तक बोलते हैं। हालांकि, राजनीति में परिवारवाद का विरोध वो लंबे समय से कर रहे हैं। उन्होंने लाल किले के प्राचीर से भी कहा है कि परिवारवादी पार्टियां इस देश को दीमक की तरह चाट रही हैं।

खैर, लालू प्रसाद यादव और परिवारवादी राजनीति को एक तरफ रख दें तो कहा जा सकता है कि कोलकाता में पीएम मोदी का अपने त्याग की चर्चा करने के पीछे बड़ा मकसद ममता बनर्जी रही होंगी। ममता बनर्जी भी 2011 के बाद से पश्चिम बंगाल की सत्ता में आसीन हैं। उन्होंने पिछले तीन विधनसभा चुनावों अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को लगातार जीत दिलाती रही हैं। बाकी सभी कारणों के अलावा ममता बनर्जी की अपनी शख्सियत हर चुनाव में विरोधियों पर भारी पड़ती है। ममता बनर्जी एक महिला हैं, इस कारण महिला मतदाताओं का उनके प्रति विशेष अनुराग रहता है जो पिछले कुछ वर्षों से चुनावी नजरिए से काफी मुखर हो गई हैं। दूसरी तरफ, ममता बनर्जी की छवि एक जुझारू नेता की है।

प. बंगाल के मतदाताओं के सामने जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टियों के बीच चुनाव करना होता है तो उन्हें निर्णय लेने में बहुत मशक्कत नहीं करनी पड़ती है। कोई मोदी में त्याग देखता है तो कोई ममता में सादगी। जिस तरह मोदी की संतान नहीं है, उसी तरह ममता भी निःसंतान हैं। ममता ने तो शादी ही नहीं की है। इस कारण प. बंगाल के मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग है कि वो भ्रष्ट नहीं हो सकतीं, उनकी सरकार में किसी ने घपले-घोटाले किए भी तो निश्चित रूप से ममता उन कारगुजारियों से अनजान होंगी। ऐसे मतदाताओं का टीएमसी से मोहभंग करवाकर बीजेपी की तरफ रुख करवाना आसान नहीं। यह तभी संभव हो सकता है जब ममता बनर्जी की शख्सियत उनके विरोधियों के आगे छोटी पड़ जाए।

पीएम मोदी ने विपक्ष के करीब-करीब सभी दलों को इस रेस में बहुत पीछे छोड़ दिया है। ईमानदारी और निष्ठा के मामले में उनकी छवि देश में सबसे मजबूत है, लेकिन चुनावी जीत सिर्फ शख्सियतों की शर्त पर तय नहीं होती। प. बंगाल में बीजेपी ने पिछले कुछ वर्षों से विपक्ष की जगह पर अपनी दावेदारी मजबूत कर दी है। लेकिन जब लक्ष्य लोकसभा की 370 सीटें जीतने की हो तो बंगाल की 42 सीटें बड़ी हिस्सेदारी निभा सकती हैं। यही वजह है कि प. बंगाल में पीएम मोदी की विशेष नजर है। उन्होंने बारासात में न केवल अपने त्याग का जिक्र किया बल्कि वहां से करीब 100 किलोमीटर दूर संदेशखाली के पीड़ितों से भी मिले। संदेशखाली में टीएमसी नेता शाहजहां शेख और उसके सहयोगियों के खिलाफ महिलाओं ने ही मोर्चा खोला है। शाहजहां और सहयोगियों की कारगुजारियों ने ममता से महिला मतदाताओं को दूर करने की नींव रखी तो पीएम मोदी के पास अपना त्याग बताकर उस नींव पर दीवार खड़ी करने का मौका है।

जानिए कौन है जदयू के पूर्व सांसद धनंजय सिंह?

आज हम आपको जदयू के पूर्व सांसद धनंजय सिंह के बारे में पूरी जानकारी देने वाले हैं! उत्तर प्रदेश की राजनीति में धनंजय सिंह का नाम बाहुबली नेताओं की श्रेणी में आता है। छात्र राजनीति से पूर्वांचल के बाहुबलियों के बीच अपनी अलग जगह बनाने वाले धनंजय सिंह अब तक कानून की गिरफ्त में नहीं आ पाए थे। 33 साल पहले उन पर पहली बार दर्ज हुआ। हालांकि, अब पहली बार अपहरण केस में सजा का ऐलान हुआ है। वह भी तब, जब गवाह मुकर गए। पुलिस की जांच और साक्ष्यों के आधार पर धनंजय को कोर्ट ने दोषी करार दिया।बाहुबली धनंजय सिंह की कहानी फिल्मी लगती है। कभी पूर्वांचल के अपराध की दुनिया में बड़े नाम को टक्कर देते वे दिखाई दिए। अपनी अलग जगह बनाई। वहीं, पुलिस से बचने के लिए उन्होंने अपनी मौत तक की खबर फैला दी थी। उनकी तीन शादियों का किस्सा भी कुछ अलग ही है। धनंजय सिंह अपने नाम और काम के लिए खासे चर्चित रहे हैं। लोगों के डर का माहौल बनाने वाले धनंजय ने जब राजनीति में कदम रखा तो अपने दम पर जौनपुर की राजनीति को कंट्रोल किया। लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर धनंजय तैयारियों में जुटे थे। लेकिन, मई 2020 के नमामि गंगे प्रोजेक्ट मैनेजर अपहरण केस में उनके खिलाफ सजा का ऐलान कर दिया गया। धनंजय को जौनपुर एमपी एमएलए कोर्ट की ओर से 7 साल की सजा सुनाई गई है। इसके अलावा उन पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। कोर्ट के आदेश के बाद धनंजय के चुनाव लड़ने का सपना टूटता दिख रहा है। धनंजय सिंह का जन्म 16 जुलाई 1975 को कोलकाता में हुआ था। जन्म के कुछ साल बाद पूरा परिवार जौनपुर आ गया। वर्ष 1990 में 10वीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान महर्षि विद्या मंदिर के शिक्षक गोविंद उनियाल की हत्या हो गई। इस हत्या मामले में धनंजय सिंह का नाम आया था। 12वीं में पहुंचे तो एक और युवक की हत्या हो गई। फिर से धनंजय सिंह का नाम आया। पुलिस ने पकड़ लिया। धनंजय सिंह ने जेल में रहते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखी। जेल से ही उन्होंने तीन परीक्षाएं दी। स्कूली शिक्षा के बाद धनंजय सिंह का दाखिला लखनऊ यूनिवर्सिटी में हुआ। लखनऊ यूनिवर्सिटी में धनंजय की अभय सिंह से दोस्ती हो गई। यहां से उनकी राजनीति की शुरुआत हुई।यूनिवर्सिटी में धनंजय सिंह की निकटता अभय सिंह, बबलू सिंह और दयाशंकर सिंह बढ़ गई। लखनऊ यूनिवर्सिट में इसे ठाकुरवाद कहा जाने लगा। यूनिवर्सिटी में उन्होंने बर्चस्व बढ़ाना शुरू किया। इसके बाद ठेकों में दखलअंदाजी शुरू हुई। धनंजय सिंह की यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान उनकी दबंगई चर्चा में आ गई। हबीबुल्ला हॉस्टल केंद्र था। उनका नाम अपराध की घटनाओं में जुड़ने के बाद हॉस्टल चर्चा में आने लगा। चाकूबाजी, किडनैपिंग से लेकर गोलीबारी तक की घटनाओं में धनंजय सिंह का नाम जुड़ने लगा।

धनंजय सिंह ने यूपी के अपराध की दुनिया में वर्चस्व बनाने वालों को रेलवे के ठेकों में हाथ आजमाता देखा तो वे भी इसमें कूद पड़े। रेल ठेकों को मैनेज करने में दखल देना शुरू किया। उसी समय गुंडा टैक्स की चर्चा होने लगी। वर्ष 1997 तक धनंजय सिंह पर 12 मुकदमे दर्ज हो चुके थे। पीएचईडी विभाग के इंजीनियर गोपाल शरण श्रीवास्तव की हत्या के बाद उन पर साजिश का आरोप लगा। धनंजय फरार हो गए और 50 हजार रुपये की इनामी घोषणा हुई।

धनंजय सिंह ने पुलिस की फाइल से अपना नाम गायब कराने के लिए बड़ा खेल खेला। यह खेल ऐसा था कि पुलिस रिकॉर्ड में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। दरअसल, 17 अक्टूबर 1998 को भदोही- मिर्जापुर रोड पर स्थित एक पेट्रोल पंप पर लूट की सूचना आई। पुलिस ने तत्परता दिखाई और धनंजय सिंह को गिरफ्तार किया। इसके बाद पुलिस ने दावा किया कि धनंजय सिंह वहां से फरार हो रहे थे। इसी दौरान उन्हें मार गिराया गया। हालांकि, बाद में मामला खुला। धनंजय जीवित पाए गए तो एनकाउंटर पर सवाल खड़ा हुआ। जांच में पाया गया कि एनकाउंटर में सपा कार्यकर्ता ओम प्रकाश यादव को मार गिराया गया था। सपा ने भाजपा के खिलाफ सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन शुरू कर दिया। मानवाधिकार आयोग की ओर से गठित जांच टीम ने बड़ी गड़बड़ी पाई। जांच आयोग की रिपोर्ट के बाद 34 पुलिसकर्मियों को सस्पेंड किया गया। उनके खिलाफ केस दर्ज किया गया।

धनंजय सिंह की राजनीतिक मैदान में एंट्री भी अलग ही प्रकार से हुई। दरअसल, जौनपुर के क्षेत्र में एक समय बाहुबली विनोद नाटे का वर्चस्व था। विनोद नाटे राजनीतिक मैदान में एंट्री मारने वाला था। हालांकि, उसकी रोड एक्सिडेंट में मौत हुई और धनंजय सिंह की किस्मत खुल गई। नाटे को क्षेत्र के लोग का समर्थन मिल रहा था। उसकी मौत से लोग दुखी हुए थे। एक सहानुभूति की लहर क्षेत्र में थी। इसका फायदा धनंजय सिंह ने उठा लिया। राजनीति के मैदान में एंट्री मारी। यूपी चुनाव 2002 में रारी विधानसभा से चुनावी मैदान में उतरे। जीत दर्ज कर विधायक बन गए। विधानसभा चुनाव में जीत के बाद धनंजय ने अपनी छवि बदलनी शुरू की। वे गरीबों, दबे- कुचलों की मदद करने लगे। क्षेत्र में उनकी छवि रॉबिनहुड वाली बनती गई।

अभय सिंह और धनंजय सिंह के बीच अच्छी दोस्ती थी, लेकिन बाद में दोनों के बीच अनबन शुरू हो गई। यूपी चुनाव 2002 में विधायक बनने के करीब 8 माह बाद वाराणसी के पास धनंजय सिंह के काफिले पर हमला हुआ। इस हमले का आरोप अभय सिंह पर लगाया गया। लखनऊ यूनिवर्सिटी में साथ रहने वाले अभय सिंह और धनंजय सिंह के बीच इस घटना ने दरार पैदा की। टकसाल सिनेमा के पास धनंजय के काफिले पर गोलीबारी के बाद दोनों दोस्त एक प्रकार से दुश्मन बन गए। मामले की प्राथमिकी दर्ज कराई गई। धनंजय ने इसमें अभय सिंह को आरोपी बनाया। इसके बाद दोनों अलग हो गए।

धनंजय सिंह ने पहली बार 2002 में निर्दलीय जीत दर्ज की थी। यूपी चुनाव 2007 में निषाद पार्टी के टिकट से चुनाव लड़े और जीते। हालांकि, मायावती के सत्ता में आने के बाद उन्होंने वर्ष 2008 में बसपा ज्वाइन कर लिया। मायावती ने उन पर भरोसा जताते हुए वर्ष 2009 में जौनपुर से लोकसभा सीट से प्रत्याशी बना दिया। धनंजय ने लोकसभा चुनाव जीत कर पहली बार संसद तक का सफर तय किया। हालांकि, हालांकि, इसके बाद धनंजय कोई चुनाव नहीं जीत पाए। वर्ष 2011 में मायावती ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण धनंजय को पार्टी से बर्खास्त कर दिया। यूपी चुनाव 2012 में पूर्व पत्नी जागृति सिंह को उतारा। हालांकि, सपा के पारसनाथ यादव ने उन्हें साढ़े 31 हजार वोटों से हराया। जागृति को इस चुनाव के बाद नौकरानी हत्याकांड में गिरफ्तार कर लिया गया। धनंजय पर सबूत मिटाने का आरोप लगा। इस घटना के बाद जागृति और धनंजय का तलाक हो गया।लोकसभा चुनाव 2014 में धनंजय सिंह निर्दलीय उतरे। मोदी लहर में केवल 64 हजार वोट पा सके। यूपी चुनाव 2017 में निषाद पार्टी ने एक बार फिर उन्हें मल्हनी सीट से उम्मीदवार बनाया। लेकिन, इस बार उन्हें पारसनाथ यादव के हाथों हार झेलनी पड़ी। पारसनाथ की मौत के बाद वर्ष 2020 में उप चुनाव हुआ। पारसनाथ के बेटे लकी यादव ने भी धनंजय को हराया। यूपी चुनाव 2022 में भी धनंजय मल्हनी से जीत नहीं दर्ज कर पाए। लोकसभा चुनाव 2024 में वे एक बार फिर निर्दलीय उतरने की तैयारी में थे। कैंपेन भी लॉन्च किया था। लेकिन, अब सात साल की सजा के ऐलान के बाद मुश्किल बड़ी होगी।

15 फरवरी 2022 को एसटीएफ ने धनंजय सिंह पर लगी गैर जमानती धाराओं को हटाते हुए बड़ी राहत दे दी। उन पर जमानती धाराओं के तहत आरोप निर्धारित किया गया। इसके बाद वे 17 फरवरी 2022 धनंजय सिंह ने जनता दल यूनाइटेड मल्हनी सीट पर फिर से नामांकन किया। हालांकि जीत दर्ज कर पाने में कामयाबी नहीं मिली। सरकार से राहत के बाद एक बार फिर वे जौनपुर लोकसभा सीट से उम्मीदवारी पेश कर रहे थे। एनडीए से वे उम्मीदवारी की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन अब एमपी- एमएलए कोर्ट का आदेश उन पर आफत बन कर आया है। 2020 के प्रोजेक्ट मैनेजर अपहरण केस में उनके खिलाफ विशेष जज ने सात साल की जेल और 50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। इस प्रकार धनंजय सिंह एक बार फिर सलाखों के पीछे हो गए हैं। धनंजय सिंह ने तीन शादियां की हैं। यह मामला भी खूब चर्चा में रहा है। पॉलिटिकल साइंस से एमए की डिग्री हासिल करने वाले धनंजय सिंह ने पूर्वांचल में अपनी धाक जमाई थी। धनंजय की पहली शादी 2006 में हुई थी। उनकी पहली पत्नी का नाम मीनू था। मीनू का बाद में निधन हो गया। इसके बाद धनंजय ने वर्ष 2009 में डॉ. जागृति सिंह से शादी की। धनंजय और जागृति बाद में अलग हो गए। वर्ष 2017 में धनंजय ने श्रीकला रेड्‌डी से तीसरी शादी की। उनकी यह शादी खूब चर्चा में रही है।

आखिर क्या है कांग्रेस के घोषणा पत्र में खास?

आज हम आपको बताएंगे कि कांग्रेस के घोषणा पत्र में क्या कुछ खास है! कांग्रेस की घोषणा पत्र समिति ने घोषणा पत्र का मसौदा बुधवार को पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को सौंप दिया। समिति के प्रमुख पी चिदंबरम एवं इसके कुछ अन्य सदस्यों ने खरगे को घोषणा पत्र का मसौदा सौंपा। खरगे ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया कि हरित क्रांति और श्वेत क्रांति से लेकर सार्वजनिक उपक्रमों के निर्माण तक, दूरसंचार एवं आईटी क्रांति से उदारीकरण तक, समावेशी शासन से अधिकार आधारित प्रतिमान तक कांग्रेस हमेशा भारत के कल्याण और विकास के लिए प्रतिबद्ध रही है। 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए न्याय पर आधारित हमारे घोषणापत्र का मसौदा तैयार है और आज कांग्रेस घोषणापत्र समिति द्वारा मुझे प्रस्तुत किया गया। कांग्रेस कार्यसमिति के समक्ष इसे अनुमोदन के लिए रखा जाएगा। सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस का घोषणा पत्र ‘न्याय के पांच स्तंभों’ पर केंद्रित रहने वाला है और जिसमें पार्टी युवाओं को प्रशिक्षण के साथ मानदेय देने, पेपर लीक के खिलाफ सख्त कानून बनाने, जाति जनगणना कराने तथा ‘अग्निपथ’ योजना को खत्म करने जैसे कई बड़े वादे कर सकती है।पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम की अध्यक्षता वाली घोषणा पत्र समिति ने चुनाव मुद्दों के संदर्भ में लंबी मंत्रणा की है।पार्टी की घोषणापत्र समिति में प्रियंका गांधी वाद्रा, शशि थरूर, जयराम रमेश और आनंद शर्मा जैसे वरिष्ठ नेता शामिल हैं।

समिति के प्रमुख सदस्यों ने मंगलवार दोपहर पार्टी मुख्यालय में बैठक कर दस्तावेज के मसौदे को अंतिम रूप दिया था। पार्टी का घोषणापत्र युवाओं,महिलाओं, गरीबों और किसानों को सशक्त बनाने पर केंद्रित होगा।उन्होंने कहा कि पार्टी पेपर लीक के खतरे से निपटने के लिए एक योजना पर विचार कर रही है और सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता लाने के लिए अपना दृष्टिकोण पेश करने की संभावना है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में पेपर लीक की हालिया घटनाओं की पृष्ठभूमि में मंगलवार को कहा था कि उनकी पार्टी भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए एक ठोस योजना तैयार कर रही है और जल्द ही एक दृष्टिकोण लोगों के सामने रखेगी। युवाओं का भविष्य ‘इंडिया’ गठबंधन की प्राथमिकता है। चुनाव से पहले बेरोजगारी और महंगाई के मुद्दों को बड़े पैमाने पर उठाने के बाद कांग्रेस जर्मनी जैसे कुछ विकसित देशों की तर्ज पर युवाओं के लिए एक योजना की घोषणा कर सकती है। इस योजना के तहत युवाओं को प्रशिक्षण और साथ ही एक निश्चित मानदेय दिया जाता है।

घोषणापत्र में 5-न्याय न्याय के पांच स्तंभ पर जोर होने की संभावना है, जिसका वादा कांग्रेस ने पार्टी नेता राहुल गांधी की अगुवाई वाली ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के दौरान किया था। कांग्रेस के न्याय के पांच स्तंभ युवा न्याय, भागीदारी न्याय, नारी न्याय, किसान न्याय और श्रमिक न्याय हैं। सूत्रों का कहना है कि पार्टी न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी गारंटी देने और सरकारी रिक्तियों को भरने के लिए देश में जाति-आधारित जनगणना का वादा करने पर भी ध्यान केंद्रित करेगी। बता दें कि 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए न्याय पर आधारित हमारे घोषणापत्र का मसौदा तैयार है और आज कांग्रेस घोषणापत्र समिति द्वारा मुझे प्रस्तुत किया गया।

कांग्रेस कार्यसमिति के समक्ष इसे अनुमोदन के लिए रखा जाएगा। सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस का घोषणा पत्र ‘न्याय के पांच स्तंभों’ पर केंद्रित रहने वाला है और जिसमें पार्टी युवाओं को प्रशिक्षण के साथ मानदेय देने, पेपर लीक के खिलाफ सख्त कानून बनाने, जाति जनगणना कराने तथा ‘अग्निपथ’ योजना को खत्म करने जैसे कई बड़े वादे कर सकती है। कांग्रेस कुछ कल्याणकारी उपायों पर जोर दे सकती है जैसे कि समाज के हाशिए पर रहने वाले वर्गों को वित्तीय सहायता प्रदान करना और यह सुनिश्चित करना कि उन्हें न्याय मिले और वो राज्य कल्याण उपायों का हिस्सा बनें। पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में पेपर लीक की हालिया घटनाओं की पृष्ठभूमि में मंगलवार को कहा था कि उनकी पार्टी भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए एक ठोस योजना तैयार कर रही है और जल्द ही एक दृष्टिकोण लोगों के सामने रखेगी। युवाओं का भविष्य ‘इंडिया’ गठबंधन की प्राथमिकता है। चुनाव से पहले बेरोजगारी और महंगाई के मुद्दों को बड़े पैमाने पर उठाने के बाद कांग्रेस जर्मनी जैसे कुछ विकसित देशों की तर्ज पर युवाओं के लिए एक योजना की घोषणा कर सकती है।कांग्रेस सेना में भर्ती की नई योजना ‘अग्निपथ ‘ को भी खत्म करने और पुरानी भर्ती प्रक्रिया को बहाल करने का वादा कर सकती है।

क्या अपनी आंतरिक कलह ही नहीं भांप पाती कांग्रेस?

कांग्रेस अपनी आंतरिक कलह ही नहीं भांप पाती है! कांग्रेस के भीतर बगावत और असंतोष का उभरना कोई नई बात नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में एक के बाद एक कई राज्यों में बगावती सुर उभरे हैं। कुछ राज्यों में पार्टी इसे दबाने में कामयाब रही तो कई जगह उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। 15 महीने में कमलनाथ सरकार का गिरना हो या फिर आपसी गुटबाजी और असंतोष के चलते पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में सफलता न मिल पाना भी इसी का संकेत है। इसका ताजा उदाहरण पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश में दिखाई दे रहा है, जहां हालिया राज्यसभा चुनाव में पार्टी के आधा दर्जन विधायकों ने क्रॉस वोटिंग कर सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार पर संकट के बदले खड़े कर दिए। आखिर ऐसा क्यों है कि कांग्रेस विद्रोह की ज्वाला भड़कने का इंतजार करती रहती है? कांग्रेस के भीतर लगातार कई स्तरों पर जो असंतोष के सुर दिखाई दे रहे हैं उसके पीछे एक बड़ी वजह संवादहीनता है। कांग्रेस के भीतर संवादहीनता का यह सिलसिला केंद्रीय नेतृत्व से लेकर क्षेत्रीय नेतृत्व का अपने पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ तक जारी है। हाल ही में हिमाचल में जो विद्रोह खड़ा हुआ उसमें बागी विधायकों से लेकर मंत्री विक्रमादित्य सिंह और प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह सभी का कहना था कि बार-बार नेतृत्व के सामने समस्याएं उठाने के बावजूद न तो कोई सुनवाई हो रही थी और न ही उस पर ऐक्शन हो रहा था।

कांग्रेस के भीतर एक बड़ी समस्या आम कार्यकर्ताओं से लेकर विधायकों, सांसदों और नेताओं का केंद्रीय नेतृत्व तक सहज पहुंच का न होना भी है। यही वजह है कि तमाम कोशिशें के बावजूद जब आम कार्यकर्ता या नेता हाईकमान तक नहीं पहुंच पाता तो संवादहीनता बढ़ने लगती है। केंद्रीय नेतृत्व जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं और नेताओं से कट चुका है। ज्योतिरादित्य सिंधिया से लेकर मिलिंद देवड़ा तक तमाम ऐसे नेता रहे पार्टी छोड़ते समय जिनका आरोप था कि उन्होंने हाईकमान से संपर्क करने की कोशिश में हफ्तों या कई बार महीनों निकल गए, लेकिन उन्हें वक्त नहीं मिला। गांधी परिवार, खासकर राहुल गांधी से वक्त न मिलने की शिकायत तो आम थी, लेकिन कांग्रेस की कमान मल्लिकार्जुन खरगे के हाथ में आने के बाद भी कोई ज्यादा बदलाव नहीं हुआ।

कांग्रेस नेतृत्व अगर इन बगावती सुरों को लेकर कोई समाधान निकालने में कामयाब नहीं हो पा रहा तो इसकी एक बड़ी वजह उसके पास सही फीडबैक का न होना भी है। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व पिछले दो दशक से कुछ खास तरह के लोगों से घिरा हुआ रहता है, जो जमीनी हकीकत को ठीक तरह से उन तक नहीं पहुंचने देता। शीर्ष नेतृत्व के आसपास तैयार यह मंडली अपने निजी हितों और स्वार्थ के आधार पर सूचनाओं और जानकारी आगे बढ़ाती है। कई बार जानकारी इसी स्तर पर रोक दी जाती है। नतीजा, शीर्ष नेतृत्व तक सही फीडबैक नहीं पहुंच पाता। राहुल गांधी की टीम और उनके ऑफिस पर यह आरोप लगातार लगते रहे हैं। टॉप लीडरशिप भी पूरी तरह से अपनी टीम आसपास के लोगों से मिले फीडबैक पर ही निर्भर करती है। राज्यों के प्रभारी और प्रदेश अध्यक्ष अपने हिसाब से शीर्ष नेतृत्व को फीडबैक देते हैं।

पार्टी के भीतर इस हालत के पीछे एक बड़ी वजह नेतृत्व के स्तर पर फैसलों में ढिलाई और कार्यवाही में देरी भी मानी जा सकती है। सभी को साथ लेकर चलने की कोशिश की जाती है। पार्टी में लोकतांत्रिक माहौल बनाने पर जरूरत से ज्यादा जोर देने की परंपरा है। यह पार्टी के लिए खूबी बनने से ज्यादा बोझ बनती रही है। पिछले एक दशक में हिंदी पट्टी के तमाम ऐसे राज्यों में कांग्रेस अपनी सरकार बनाने या बनाए रखने से चूक गई, जहां आपसी गुटबाजी और खींचतान पार्टी हित के ऊपर भारी पड़ती दिखाई दी।

मध्य प्रदेश में कमलनाथ, दिग्विजय सिंह बनाम ज्योतिरादित्य सिंधिया, राजस्थान में अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट, छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल बनाम टीएस सिंहदेव, पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह बनाम नवजोत सिंह सिद्धू, फिर चरणजीत सिंह चन्नी बनाम सिद्धू, हरियाणा में पहले भूपेंद्र सिंह हुड्डा बनाम अशोक तंवर और उसके बाद हुड्डा बनाम शैलजा और रणदीप सिंह सुरजेवाला की खींचतान पार्टी की जीत की संभावनाओं पर पानी फेरते रहे हैं। पार्टी के भीतर समय रहते कार्यवाही करने की बजाय चीजों को यथावत रखने की कोशिश या फैसलों को लटकाए रहने की आदत के चलते यह समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। कई बार फैसला लेने में इतनी देर हो जाती है कि उन फैसलों या कार्यवाहियों का कोई औचित्य नहीं बचता।

पार्टी में इस स्थिति के पीछे एक बड़ी वजह एक से ज्यादा पावर सेंटर्स माने जा रहे हैं। गांधी परिवार के तीन सदस्यों सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ-साथ मल्लिकार्जुन खरगे के रूप में एक और पावर सेंटर का तैयार होना भी कई बार कई बार फैसलों में देरी की वजह बनता है। असंतुष्ट चेहरों या बाकियों को किसी एक पावर सेंटर से मिला प्रश्रय भी उनके खिलाफ कार्यवाही को रोकते हैं। नवजोत सिंह सिद्धू, सचिन पायलट जैसे नेताओं के पीछे प्रियंका गांधी का हाथ माना गया। इसकी वजह से उनके तमाम बागी तेवरों के बावजूद पार्टी उनके खिलाफ सख्त एक्शन लेने को टालती रही।

क्या एशियाई देशों में अपनी छवि निखार रहा है भारत?

भारत वर्तमान में एशियाई देशों में अपनी छवि निखार रहा है! विदेश नीति के मोर्चे पर पिछले एक दशक में भारत की स्थिति पहले की तुलना में काफी मजबूत हुई है। जी-20 से लेकर वैश्विक मंचों पर भारत की मौजूदगी ने एक अलग ही छाप छोड़ी है। भारत ने यूरोपीय देशों के साथ ही एशिया में भी अपनी धाक जमाई है। इन सब के बीच में भारत पर दबंग होने के आरोप भी लगते रहे हैं। क्या भारत के पड़ोसी देश उसे दबंग मानते हैं? इस सवाल का विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपनी तरफ से जवाब दिया। जवाब में जयशंकर ने इस तरह के सवाल उठाने वालों को आईना दिखा दिया। जयशंकर ने कहा कि दुनिया के इस हिस्से में आज बड़ा बदलाव यह है जो भारत और उसके पड़ोसियों के बीच हुआ है। उन्होंने कहा कि

जब पड़ोसी देश मुसीबत में होते हैं तो दबदबा बनाने वाला बड़ा देश 4.5 अरब अमेरिकी डॉलर नहीं देता है। उन्होंने कहा कि जब कोविड महामारी चल रही थी, तब दबदबा बनाने वाले बड़े देशों ने अन्य देशों को वैक्सीन की सप्लाई नहीं की। उन्होंने कहा कि हमने भोजन की मांग, ईंधन की मांग, उर्वरक की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए अपने स्वयं के नियमों में अपवाद बना दिया क्योंकि दुनिया के किसी अन्य हिस्से में युद्ध ने उनके जीवन को जटिल बना दिया था।

विदेश मंत्री ने कहा कि आपको आज यह भी देखना होगा कि वास्तव में भारत और उसके पड़ोसियों के बीच क्या बदलाव आया है। उन्होंने कहा कि निश्चित रूप से, बांग्लादेश और नेपाल के संदर्भ में मेरा मतलब है कि आज आपके पास एक पावर ग्रिड है, आपके पास सड़कें हैं जो एक दशक पहले मौजूद नहीं थीं, आपके पास रेलवे हैं जो एक दशक पहले यह अस्तित्व में नहीं था, जलमार्गों का उपयोग होता है। भारतीय व्यवसाय बांग्लादेश के बंदरगाहों का उपयोग नेशनल ट्रीटमेंट के आधार पर करते हैं। विदेश मंत्री ने कहा कि भारत और उसके पड़ोसी देशों के बीच कनेक्टिविटी को बढ़ाने और सुधारने के लिए काम किया गया है। ऐसी धारणा है कि विदेश नीति कुछ जटिल, गूढ़ है। इससे निपटने के लिए इसे कुछ लोगों पर छोड़ दिया जाना चाहिए…जो पूरी तरह से बिना किसी औचित्य के नहीं है। औसत व्यक्ति को इसमें शामिल होना चाहिए, विदेश नीति पर अधिक ध्यान देना चाहिए…और उनमें से कुछ घटनाएं, यदि आप देखें, तो वे कोविड थी।उन्होंने कहा कि नेपाल, श्रीलंका, भूटान, बांग्लादेश और मालदीव के साथ व्यापार निवेश और यात्रा में तेज वृद्धि देखी गई है। विदेश मंत्री ने कहा कि आज कनेक्टिविटी की बात करें तो आने जाने वाले लोगों की संख्या कम-अधिक होती है लेकिन न केवल नेपाल और बांग्लादेश के साथ बल्कि श्रीलंका के साथ वहां होने वाले व्यापार की मात्रा, निवेश आदि वास्तव में बताने के लिए एक बहुत अच्छी कहानी है। जयशंकर ने इस दौरान भूटान का भी नाम लिया। उन्होंने कहा कि मैं उनके नाम पर चूकना नहीं चाहता क्योंकि वे लगातार मजबूत भागीदार रहे हैं। विदेश मंत्री ने कहा कि इसलिए पड़ोस में हमारी समस्या, बहुत ईमानदारी से, एक देश के संबंध में है। जयशंकर ने कहा कि कूटनीति में, आप हमेशा आशा रखते हैं कि, हां ठीक है, इसे जारी रखना चाहिए और कौन जानता है कि एक दिन भविष्य में क्या होगा।

इस बात पर जोर देते हुए कि एक ‘औसत व्यक्ति’ के लिए विदेश नीति के मामलों में सक्रिय रूप से शामिल होना आवश्यक है, जयशंकर ने कहा कि निश्चित रूप से, सभी भारतीयों को विदेश नीति में अधिक रुचि लेने की आवश्यकता है।जब कोविड महामारी चल रही थी, तब दबदबा बनाने वाले बड़े देशों ने अन्य देशों को वैक्सीन की सप्लाई नहीं की। उन्होंने कहा कि हमने भोजन की मांग, ईंधन की मांग, उर्वरक की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए अपने स्वयं के नियमों में अपवाद बना दिया क्योंकि दुनिया के किसी अन्य हिस्से में युद्ध ने उनके जीवन को जटिल बना दिया था। उन्होंने कहा कि यह दुनिया भर में बहुत आम है, ऐसी धारणा है कि विदेश नीति कुछ जटिल, गूढ़ है। इससे निपटने के लिए इसे कुछ लोगों पर छोड़ दिया जाना चाहिए…जो पूरी तरह से बिना किसी औचित्य के नहीं है। औसत व्यक्ति को इसमें शामिल होना चाहिए, विदेश नीति पर अधिक ध्यान देना चाहिए…और उनमें से कुछ घटनाएं, यदि आप देखें, तो वे कोविड थी।

क्या अब सांसद नहीं ले पाएंगे घूस?

आने वाले समय में अब सांसद घूस नहीं ले पाएंगे!सुप्रीम कोर्ट ने वोट के बदले नोट मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने इस संबंध में 5 जजों की संविधान पीठ के 1998 वाले फैसले को पलट दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह इस संबंध में सांसदों को राहत देने पर सहमत नहीं है। शीर्ष अदालत ने कानून के संरक्षण में सांसदों को छूट देने से इनकार किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी को घूस की छूट नहीं दी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली सात जजों की संवैधानिक बेंच इस मामले में सुनवाई की। पीठ ने कहा कि वोट के लिए नोट लेने वालों पर केस चलना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच ने सोमवार को 1998 के फैसले को खारिज कर दिया। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने इस मामले में सुनवाई के बाद पांच अक्टूबर 2023 को फैसला सुरक्षित रख लिया था।चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एम एम सुंदरेश, जस्टिस जेबी पारदीवाला, जस्टिस मनोज मिश्रा, जस्टिस एएस बोपन्ना, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस पीवी संजय कुमार की पीठ ने सुनाया फैसला। पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 105 या 194 के तहत रिश्वतखोरी को छूट नहीं दी गई है क्योंकि रिश्वतखोरी में लिप्त सदस्य एक आपराधिक कृत्य में लिप्त होता है। पीठ ने कहा कि हम पीवी नरसिम्हा मामले में फैसले से असहमत हैं। पीवी नरसिम्हा मामले में फैसले, जो विधायक को वोट देने या भाषण देने के लिए कथित तौर पर रिश्वत लेने से छूट प्रदान करता है, के व्यापक प्रभाव हैं और इसे खारिज कर दिया है। पीठ ने कहा कि विधायकों द्वारा भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी भारतीय संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को नष्ट कर देती है।

  चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच ने एक मत से दिए फैसले में 1998 के फैसले को पलट दिया और कहा कि सांसद और विधायक रिश्वतोखरी मामले में मुकदमा से छूट नहीं पा सकते हैं। सांसद और विधायक विशेषाधिकार (इम्युनिटी) का दावा तब नहीं कर सकते हैं जब उन पर रिश्वतखोरी का आरोप हो। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम 1998 के फैसले से असहमत हैं और उसे खारिज करते हैं। सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच ने उस मामले में फैसला सुनाया जिसमें सांसदों और विधायकों को सदन में वोट व भाषण के बदले नोट के मामले में केस से छूट है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह इस मुद्दे को डील करेंगे कि क्या सांसदों को मिली छूट तब भी जारी रहेगी जब मामला आपराधिक हो? सुप्रीम कोर्ट ने 1998 में दिए अपने फैसले में कहा था कि एमपी और एमएलए को सदन में वोट और बयान के बदले कैश के मामले में मुकदमा चलाने से छूट है। सुप्रीम कोर्ट ने 1998 में दिए अपने फैसले में कहा था कि एमपी और एमएलए को सदन में वोट और बयान के बदले कैश के मामले में मुकदमा चलाने से छूट थी।

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि 1998 का फैसला सांसदों और विधायकों को वोट के बदले नोट और बयान के बदले नोट के मामले में इम्युनिटी प्रदान करता था। लेकिन इसका पब्लिक लाइफ, संसदीय लोकतंत्र और लोकहित पर व्यापक प्रभाव पड़ रहा था। उक्त फैसले पर दोबारा विचार न किया जाना गंभीर खतरे की ओर ले जा रहा था।

सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच ने 1998 के मामले में दिए गए फैसले पर दोबारा विचार किया और फिर फैसला दिया है। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने 2019 में इस मामले को पांच जज को रेफर किया था और कहा था कि यह मामला सार्वजनिक महत्ता और व्यापक प्रभाव का है। इसके बाद मामले को सात जजों की बेंच को रेफर किया गया था। सीता सोरेन की अर्जी पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा 1998 के फैसले पर विचार करने का फैसला किया था। पीवी नरसिम्हा मामले में फैसले, जो विधायक को वोट देने या भाषण देने के लिए कथित तौर पर रिश्वत लेने से छूट प्रदान करता है, के व्यापक प्रभाव हैं और इसे खारिज कर दिया है। पीठ ने कहा कि विधायकों द्वारा भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी भारतीय संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को नष्ट कर देती है।सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच ने कहा था कि वह इस मुद्दे को डील करेंगे कि सांसदों व विधायकों को मिली छूट तब भी जारी रहेगी जब मामला आपराधिक हो? सांसदों और विधायकों को सदन में भाषण व वोट के बदले नोट के मामले में मुकदमा चलाने से मिली छूट के मामले को दोबारा सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की बेंच ने परीक्षण किया।

जब जस्टिस अभिजीत गांगुली ने किया राजनीति में आने का खुला ऐलान!

हाल ही में जस्टिस अभिजीत गांगुली ने राजनीति में आने का खुला ऐलान कर दिया है! कोलकाता हाई कोर्ट के जज जस्टिस अभिजीत गांगुली ने अपनी न्यायपालिका की नौकरी को अलविदा कह दिया है। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में कुछ भी ठीक नहीं है। उनका दावा है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस के शासन में प. बंगाल अव्यवस्था और अराजकता के भयंकर दौर से गुजर रहा है। हालात ये हो गए हैं कि जज सरकार से संबंधित मामलों की सुनवाई की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं और जो सुनवाई की प्रक्रिया का हिस्सा बनकर फैसले देते हैं उनके खिलाफ सरकार प्रायोजित हमले होते हैं। जस्टिस गांगुली का कहना है कि टीएमसी नेता टीवी चैनलों पर जाकर उन्हें चुनौते दे रहे थे कि हिम्मत है तो चुनाव अखाड़े में आ जाएं तो उनकी चुनौती स्वीकार है। जस्टिस गांगुली ने ऐलान किया है कि वो राजनीतिक का रुख कर रहे हैं और किसी पार्टी ने उन्हें लोकसभा चुनाव का टिकट दिया तो वौ शौक से अपनी किस्मत आजमाएंगे। जस्टिस गांगुली के राजनीति में आने के फैसले पर सवाल उठने लगे हैं और दावा किया जा रहा है कि आज के दौर में न्यायपालिका का भी राजनीतिकरण हो गया है। तो क्या कोलकाता हाई कोर्ट के जज जस्टिस अभिजीत गांगुली के राजनीति में आने से न्यायपालिका की विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाएगी? इससे भी बड़ा सवाल है कि क्या अभिजीत गांगुली पहले जज हैं जिन्होंने राजनीति का रुख किया है? वह तारीख 5 सितंबर, 2013 थी जब राज्यसभा में विपक्ष के तत्कालीन नेता अरुण जेटली ने जजों के राजनीति में आने को लेकर ऐसी बातें कही थीं जिनकी नजीर आज भी दी जाती है। उन्होंने कहा था कि जज जो फैसले देते हैं, वो उनकी रिटायरमेंट के बाद नौकरियां पाने की इच्छा के कारण प्रभावित होते हैं। यह न्यायपालिका के स्वतंत्रता के लिए खतरा है। जेटली ने तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार की तरफ से जजों की रिटायरमेंट की उम्र सीमा बढ़ाने के प्रस्ताव पर चर्चा में भाग लिया था। उन्होंने राज्यसभा में कहा था, ‘मुझे लगता है कि अब हम रिटायरमेंट के बाद जजों को नौकरी देने के मामले में थोड़ा ज्यादा ही आगे चल गए हैं।’ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देकर जबर्दस्त तंज कसा था। उन्होंने कहा कि एक तो सरकारें रिटायर्ड जजों को नौकरी देने का भरपूर प्रयास करती है और अगर सरकारें नहीं करें तो वो खुद अपने लिए व्यवस्था कर लेते हैं। इसीलिए, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि केंद्रीय सूचना आयोग के सारे सदस्य रिटायर्ड जज ही होंगे।

अरुण जेटली कानून के जानकार थे और केंद्रीय कानून मंत्री रह चुके थे। उनके राज्यसभा में दिए इस बयान से स्पष्ट है कि कम-से-कम रिटायरमेंट के बाद तो जजों को अलग-अलग पद ऑफर करने की लंबी परंपरा रही है। जहां तक बात जजों के राजनीति में आने की है तो ऐसे राज्यपालों की लिस्ट अच्छी-खासी है जो पूर्व में जज रह चुके हैं। देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई रिटायर हुए तो मौजूदा सरकार ने उन्हें सीधे राज्यसभा के लिए नॉमिनेट कर दिया। इतिहास में न्यायपालिका और राजनीति के बीच सांठगांठ का सिलसिला देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की सरकार के दौर से ही शुरू हो गया था। इतिहास में ऐसे वाकये भरे पड़े हैं। आइए एक नजर डालते हैं, नेहरू सरकार ने जस्टिस फजल अली के सुप्रीम कोर्ट के जज रहते हुए ही राज्यपाल के रूप में नियुक्ती की घोषणा कर दी थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू के कहने पर जस्टिस फजल अली ने 30 मई, 1952 को जज का पद त्याग दिया और सिर्फ आठ दिन के अंदर 7 जून, 1952 को उड़ीसा के राज्यपाल बन गए।

नेहरू सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एमसी चागला को पहले अमेरिका में राजदूत बनाया, फिर यूके का उच्चायुक्त। उसके बाद नेहरू सरकार में वो पहले शिक्षा मंत्री और फिर विदेश मंत्री बनाए गए। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश कोका सुब्बा राव ने 1967 में राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष का उम्मीदवार बनने के लिए पद छोड़ दिया। उन्होंने जज पद से इस्तीफा देने के तीन महीने बाद हुए राष्ट्रपति चुनाव में सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार जाकिर हुसैन के खिलाफ ताल ठोंकी थी।

अप्रैल, 1962 से 10 साल तक कांग्रेस के राज्यसभा सांसद रहे थे। फिर उन्हें इंदिरा गांधी सरकार ने दिसंबर, 1980 में सुप्रीम कोर्ट जज नियुक्त कर दिया। फिर उनके रिटायरमेंट में छह सप्ताह बाकी ही थे कि उन्हें इस्तीफा दिलवा दिया गया और असम चुनाव में बतौर कांग्रेस प्रत्याशी उतार दिया गया। इस्लाम ने 13 जनवरी, 1983 को सुप्रीम कोर्ट जज पद से इस्तीफा दे दिया और अगले ही दिन कांग्रेस ने असम के बारपेटा लोकसभा सीट से उन्हें अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। मजे की बात है कि रिटायरमेंट के चार सप्ताह पहले ही उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा को धोखाधड़ी और आपराधिक दुराचार के आरोपों से मुक्त किया था। शिवनंदन पासवान बनाम स्टेट ऑफ बिहार का वह मामला काफी चर्चित रहा। जस्टिस बहारुल इस्लाम से पहले जस्टिस एस हेगड़े भी राज्यसभा सदस्य हुआ करते थे। उन्होंने 1957 में मैसूर हाई कोर्ट का जज बनने के लिए राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया था। जस्टिस मोहम्मद हिदायतुल्ला 1970 में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पद से रिटायर हुए थे। बाद में वो देश के उप-राष्ट्रपति चुने गए।

पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने एक मौके पर कहा था कि संविधान के मुताबिक जजों की नियुक्ति करना सरकार का काम है, लेकिन 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने अपना कॉलेजियम सिस्टम शुरू कर दिया। उन्होंने कहा, ‘दुनियाभर में कहीं भी जज दूसरे जजों की नियुक्ति नहीं करते हैं। जजों का मुख्य काम है न्याय देना, लेकिन मैंने नोटिस किया है कि आधे से ज्यादा समय जज दूसरे जजों की नियुक्ति के बारे में फैसले ले रहे होते हैं। इससे न्याय देने का उनका मुख्य दायित्व प्रभावित होता है।’ रिजिजू ने अपनी सरकार का बचाव करते हुए कहा था कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान 1973 में तीन वरिष्ठ जजों को हटाकर अगले जज एएन रे को चीफ जस्टिस बनाया गया था। मोदी सरकार ऐसे कामों में दखल नहीं देती है।

बहरहाल, उपर के उदाहरणों से कम-से-कम यह तो कहा ही जा सकता है कि जजों और राजनीति में लाने और यहां तक कि राजनीति से न्यायपालिका में भेजे जाने की पुरानी परंपरा रही है। जस्टिस अभिजीत गांगुली ने अगर रिटायरमेंट ने राजनीति में जाने के लिए पद छोड़ने की घोषणा की तो पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने जस्टिस फजल अली को पद पर रहते हुए ही राज्यपाल नियुक्त कर दिया था। इसलिए जहां तक बात जस्टिस गांगुली के जज पद त्यागकर राजनीति में जाने से न्यायपालिका की विश्वसनीयता घटने का सवाल है तो इसका जवाब आप खुद ढूंढ सकते हैं। हैरानी की बात है कि जब कोई व्यक्ति जज पद पर होते हैं तो उनके पास नेताओं को अदालत में अपने सामने खड़े करने की शक्ति होती है लेकिन राजनीति में जाकर वो खुद उन्हीं नेताओं के मातहत हो जाते हैं। अगर कोई अपनी हैसियत में गिरावट स्वीकार करने को तैयार होता है तो निश्चित रूप से उसके बदले उसे बहुत कुछ हासिल होता होगा। विकसित देशों के मुकाबले भारत में जजों के वेतन-भत्ते और सुविधाएं बहुत कम हैं। इस कारण जज अपने पद पर होते ही रिटायरमेंट के बाद का भविष्य संजोने में जुट जाते हैं। कुछ का राजनीतिक दलों से सांठगांठ हो जाता है और जो कुछ ऐसा नहीं करना चाहते या चाहकर भी सफल नहीं होते, वो उद्योग जगत में बड़े-बड़े पद पाते हैं। कॉर्पोरेट वर्ल्ड में पूर्व जजों की बड़ी पूछ होती है और वो मोटी तनख्वाह पर कंपनियों को अपनी सेवा देते हैं।