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क्या विपक्षी नेता भी चाहते हैं बीजेपी में शामिल होना?

वर्तमान में विपक्षी नेता भी बीजेपी में शामिल होना चाहते हैं! देश में लोकसभा चुनाव की घोषणा से पहले कांग्रेस के साथ ही विपक्षी दलों के लिए सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। हिमाचल प्रदेश में पार्टी में उठी बगावत भले ही थम गई है लेकिन अभी भी कई राज्यों में पार्टी का सिरदर्द कम नहीं हो रहा है। गुजरात, ओडिशा से लेकर अरुणाचल प्रदेश में पार्टी नेताओं में असंतोष देखने को मिल रहा है। लोकसभा चुनाव से पहले तरजीह नहीं मिलने से लेकर पार्टी में उपेक्षा झेल रहे नेता अब पार्टी से किनारा करने लगे हैं। वहीं, कई नेता हिंदुत्व विशेषकर राम मंदिर को लेकर पार्टी के रुख से भी नाराज हैं। पार्टी में हाशिये पर चल रहे नेताओं को बीजेपी समेत अन्य दलों में अपना भविष्य बेहतर नजर आ रहा है। वहीं, क्षेत्रीय दलों के नेताओं में भी असंतोष देखने को मिल रहा है। इसके अतिरिक्त बीजेपी में शामिल होने वाले नेता अपनी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की कमी की भी बात कह रहे हैं। गुजरात में कांग्रेस पार्टी को एक बड़ा झटका देते हुए, वरिष्ठ नेता अर्जुन मोढवाडिया ने सोमवार को विधायक पद और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। मोढवाडिया जनवरी में अयोध्या में भगवान राम मंदिर प्रतिष्ठा समारोह का ‘बहिष्कार’ करने के पार्टी के फैसले पर नाराजगी जताई। मोढवाडिया ने हमारे सहयोगी अखबार टीओआई को बताया कि वह जल्द ही अपने समर्थकों के साथ बीजेपी में शामिल होंगे। दो अन्य, राज्य कार्यकारी अध्यक्ष और पूर्व विधायक अंबरीश डेर और नवसारी जिला अध्यक्ष धर्मेश भीम पटेल ने भी पार्टी छोड़ दी है। यह तिहरा झटका पार्टी के लिए शर्मिंदगी का कारण बन गया। इसकी वजह है कि राज्य में 7-9 मार्च तक राहुल की भारत जोड़ो न्याय यात्रा से महज दो दिन पहले इस्तीफों की झड़ी लग गई। तीन बार के विधायक मोढवाडिया ने सोमवार को स्पीकर शंकर चौधरी से मुलाकात की और विधायक के रूप में अपना इस्तीफा सौंप दिया। मोढवाडिया पहले गुजरात विधानसभा में विपक्ष के नेता और गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के रूप में कार्य कर चुके हैं।

छह बार के अरुणाचल प्रदेश विधायक और सीएलपी नेता लोम्बो तायेंग सोमवार को निर्दलीय विधायक चकत अबोह के साथ बीजेपी में शामिल हो गए। विधानसभा चुनाव से पहले तायेंग के जाने से, 60 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस की ताकत 2019 में चार से घटकर पूर्व सीएम नबाम तुकी के रूप में एकमात्र विधायक रह गई है। इससे पहले पिछले सप्ताह दो अन्य कांग्रेस विधायक, निनॉन्ग एरिंग और वांगलिन लोवांगडोंग भी बीजेपी में शामिल हो गए थे। साथ ही दो एनपीपी विधायकों मुत्चू मिथि और गोकर बसर ने भगवा पार्टी का दामन थाम लिया था।

बीजद विधायक और पूर्व मंत्री प्रेमानंद नायक सोमवार को बीजेपी में शामिल हो गए। नायक तेलकोई विधानसभा सीट से विधायक हैं। नायक पिछले एक महीने से भी कम समय में भाजपा में शामिल होने वाले चौथे मौजूदा विधायक हैं। आदिवासी नेता और दो बार के विधायक नायक 2019 से 2022 तक मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की परिषद में कौशल विकास और तकनीकी शिक्षा राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार थे। इससे पहले 9 फरवरी को नायक ने पार्टी में उपेक्षा के चलते बीजेडी से इस्तीफा देने की घोषणा की थी। नायक ने कहा कि मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लोगों की अधिक प्रभावी ढंग से सेवा करने के लिए भाजपा में शामिल हुआ।” बीजद के पूर्व धामनगर विधायक राजेंद्र दास भी भगवा पार्टी में शामिल हुए। 2009 से 2014 तक धामनगर का प्रतिनिधित्व करने वाले दास ने कहा बीजेपी में लोकतंत्र है।

लोकसभा चुनाव से पहले इस भगदड़ से क्या संकेत मिल रहे हैं। आमतौर पर माना जाता है कि जिस पार्टी की हवा होती है अधिक नेताओं की तरफ से उस दल में शामिल होने की होड़ लग जाती है। फिलहाल, कांग्रेस से लेकर विपक्षी दलों में बीजेपी में शामिल होने की होड़ है तो क्या माना जा सकता है कि इस बार चुनाव में बीजेपी की जीत होगी। हालांकि, विधानसभा चुनावों का ट्रेंड देखें तो यह इस बात की पूरी तरह से तस्दीक नहीं करता है। इससे पहले पिछले सप्ताह दो अन्य कांग्रेस विधायक, निनॉन्ग एरिंग और वांगलिन लोवांगडोंग भी बीजेपी में शामिल हो गए थे। साथ ही दो एनपीपी विधायकों मुत्चू मिथि और गोकर बसर ने भगवा पार्टी का दामन थाम लिया था।उदाहरण के लिए विधानसभा चुनाव से पहले मध्यप्रदेश में भी कई नेता कांग्रेस में शामिल हो रहे थे लेकिन वहां कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। इसके अलट कर्नाटक में भी कई नेता चुनाव से पहले हाथ थाम रहे थे, वहां कांग्रेस को जीत हासिल हुई।

आखिर क्या होता है ड्राई आइस? क्या यह खतरनाक है?

आज हम आपको बताएंगे कि ड्राई आइस क्या होता है और क्या यह खतरनाक होता है! गुरुग्राम के एक कैफे में वो लोग खाना खाने गए। सभी ने खाना खाया। भोजन के बाद माउथ फ्रेशनर भी आ गया। वेटर ने उस ग्रुप को माउथ फ्रेशनर दिया। ग्रुप के पांच लोगों ने माउथ फ्रेशनर खा लिए। अंकित भी उसी ग्रुप में शामिल थे। उन्होंने माउथ फ्रेशनर नहीं खाया। वो लकी निकले। क्यों? क्योंकि माउथ फ्रेशनर खाने वाले थोड़ी देर में पेरशान हो गए। उनका जी मिचलाने लगा और तुरंत खून की उल्टियां होने लगीं। आखिर में अंकित ही उन्हें अस्पताल ले गए और पुलिस को सारी बातें बताईं। सवाल है कि आखिर माउथ फ्रेशनर खाने से खून की उल्टियां कैसे हो सकती हैं? दरअसल, वो माउथ फ्रेशनर कुछ और नहीं, ड्राई आइस था। आइए जानते हैं कि ड्राई आइस यानी सूखी बर्फ क्या होता है और इसके खाने से खून की उल्टियां क्यों आ गईं? ड्राई आइस दरअसल ठोस कार्बन डाइऑक्साइड होता है। यह कार्बन डाइ ऑक्साइड Co2 का जमा हुआ रूप है। हम सांस के रूप में ऑक्सिजन लेते हैं और कार्बन डाइ ऑक्साइड छोड़ते हैं। हमसे उलट पौधे प्रकाश संश्लेषण के लिए कार्बन डाइ ऑक्साइड का इस्तेमाल करते हैं और ऑक्सिजन छोड़ते हैं। ड्राई आइस -78.5 डिग्री सेल्सियस -109.3 डिग्री फारेनहाइट के तापमान पर जमा होता है और सामान्य बर्फ के टुकड़ों से बहुत ज्यादा ठंडा होता है। आइस क्यूब, पानी को 0 डिग्री सेल्सियस 32 डिग्री फारेनहाइट तापमान पर जमाकर बनता है। ड्राई आइस का उपयोग खराब होने वाले सामानों के ट्रांसपोर्टेशन या फिल्मों या पार्टियों में कोहरा जैसे विशेष प्रभाव बनाने में होता है।हालांकि, इसकी ठंडक में ही खतरा छिपा है। सामान्य आइस क्यूब के विपरीत ड्राई आइस पिघलकर पानी नहीं बनता, बल्कि यह उर्ध्वपतन करता है। इसका मतलब है कि यह ठोस से सीधे गैस में बदल जाता है। ठोस से गैस बनने की इस प्रक्रिया में भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड पैदा होता है। यही वजह है कि जब गुरुग्राम के ला फॉरेस्टा कैफे के वेटर ने पांच लोगों को माउथ फ्रेशनर की जगह ड्राई आइस दे दिया तो उन्हें खून की उल्टियां होने लगीं।

ड्राई आइस खाने से यह मुंह, गले और पेट में मौजूद बहुत गर्म ऊतकों के सीधे संपर्क में आ जाता है। बहुत ठंडा बर्फ और पेट की गर्मी के बीच तापमान में इतने बड़े फर्क के कारण जलन पैदा हो जाता है। इसे ऐसे समझिए कि जैसे गर्म तवे या किसी अन्य बर्तन पर ठंडे पानी के छीटें मार दिए हों। जलन आपके पाचन तंत्र की नाजुक परत को नुकसान पहुंचाती है। यह नुकसान जलन, रक्तस्राव ब्लीडिंग और यहां तक कि अल्सर भी पैदा कर सकता है। सेल को नुकसान पहुंचने से खून बहना आम हो जाता है, जिससे खून के धब्बों वाली उल्टी हो सकती है। गंभीर मामलों में अत्यधिक ब्लीडिंग हो सकती है।

जैसा कि पहले बताया गया है, ड्राई आइस घुलता नहीं बल्कि गैस बन जाता है। इससे बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड गैस निकलती है। आपके पेट जैसे बंद स्थान में यह गैस तेजी से फैलेगी तो पाचन तंत्र पर दबाव पड़ेगा जिससे जलन और ब्लीडिंग जैसी गंभीर समस्या हो सकती है। ड्राई आइस कभी मत खाएं। यह ठोस से सीधे गैस में बदल जाता है। ठोस से गैस बनने की इस प्रक्रिया में भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड पैदा होता है। यही वजह है कि जब गुरुग्राम के ला फॉरेस्टा कैफे के वेटर ने पांच लोगों को माउथ फ्रेशनर की जगह ड्राई आइस दे दिया तो उन्हें खून की उल्टियां होने लगीं।यह खाने के लिए नहीं है और इससे गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।

ड्राई आइस को सावधानी से संभालें। त्वचा के संपर्क से बचने के लिए दस्ताने पहनें, जिससे फ्रॉस्टबाइट हो सकता है। ड्राई आइस को बच्चों और पालतू जानवरों की पहुंच से दूर रखें। वे इसे खाने या खेलने के लिए सुरक्षित चीज समझ सकते हैं।  यदि आपको संदेह है कि किसी ने ड्राई आइस खा लिया है, तो तुरंत डॉक्टर से इलाज करवाएं। किसी ने ड्राई आइस खा ली हो तो उसे उल्टी करवाने की कोशिश नहीं करें और कुछ भी खाने-पीने नहीं दें। खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण FSSAI ने 11 अक्टूबर, 2019 के एक नोट में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के खाद्य सुरक्षा आयुक्तों से ‘खाद्य उत्पादों के लिए शीतलक के रूप में ड्राई आइस के सुरक्षित और उचित संचालन के बारे में सभी फूड बिजनस ऑपरेटरों और आम नागरिकों के बीच जागरूकता पैदा करने के लिए एक व्यवस्थित अभियान शुरू करने’ का आग्रह किया था।

क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी करने लगा है पक्षपात?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी पक्षपात करने लगा है या नहीं! ब्रिटिश साइंस फिक्शन टीवी सीरीज ‘ब्लैक मिरर’ के 2016 के एपिसोड ‘हेटेड इन द नेशन’ में दिखाया गया है कि किस तरह कृत्रिम बुद्धिमत्ता एआई सिस्टम उस डेटा के आधार पर लोगों या समूहों के खिलाफ पूर्वग्रह और भेदभाव को बढ़ा सकते हैं, जिस पर उन्हें प्रशिक्षित किया जाता है। यह एक ऐसी कहानी सुनाता है जिसमें असली मधुमक्खियों के विलुप्त होने के कारण परागण के लिए एआई क्षमताओं वाली रोबोट मधुमक्खियों का उपयोग किया जाता है। हालांकि, अंततः एआई सिस्टम उन लोगों को निशाना बनाती है जो ऑनलाइन नफरत अभियानों का केंद्र रहे हैं। गूगल के जेमिनी एआई को लेकर हुए हंगामे के बहुत पहले से एआई में पक्षपात मौजूद है। वास्तव में, भेदभावपूर्ण डेटा और एल्गोरिदम पर चलने वाले एआई मॉडल बड़े पैमाने पर अपने पूर्वग्रहों को विस्तार देते हैं। एआई सिस्टम के सीखने, ग्रहण करने और सही निर्णय लेने का आधार डेटा है। उदाहरण के लिए, चैटजीपीटी को तीन खरब से अधिक शब्दों के साथ प्रशिक्षित किया गया था। एआई डेवलपर्स, लैंग्वेज मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए शैक्षणिक पत्रों, पुस्तकों, समाचार लेखों, विकिपीडिया और फिल्टर की गई ऑनलाइन सामग्री से हाई क्वॉलिटी डेटा का उपयोग करते हैं। लेकिन इतना ही काफी नहीं है। बाकी डेटा को लो क्वॉलिटी माना गया है जो यूजर क्रिएटेड होता है। इसमें ब्लॉग, सोशल मीडिया पोस्ट और वेबसाइट कमेंट्स शामिल हैं।

2020 की अमेरिकी डॉक्युमेंट्री ‘कोडेड बायस’ बताती है कि कैसे एआई भेदभाव को कायम रखता है। यह डॉक्युमेंट्री जॉय बुओलामविनी नाम के एक कैरेक्टर पर आधारित है जो एमआईटी मीडिया लैब की रिसर्चर है। जॉय को जब समझ गई कि चेहरे की पहचान करने वाला सॉफ्टवेयर गहरे रंग की त्वचा वाले चेहरों की विशेषताओं को गलत पढ़ता है तो उसने एल्गोरिदम में पक्षपात के खिलाफ अमेरिकी कानून के तहत लड़ाई लड़ने का फैसला किया। एआई के पूर्वग्रह बेहद भयावह हैं, खासकर जब एआई हमारी जीवन शैली को नियंत्रित कर रहा है तो इसका पक्षपाती स्वरूप केवल अंतर्निहित मानवीय पूर्वग्रह का प्रतिबिंब और प्रकटीकरण है। यह मनुष्यों द्वारा निर्मित डेटा पर प्रशिक्षित होता है और इसके अंतर्निहित एल्गोरिदम भी मनुष्यों द्वारा लिखे जाते हैं। जब कोई एआई मॉडल किसी खास सबसेट के डेटा पर बहुत ज्यादा फिट हो जाता है, उसके रिजल्ट के रुझान ही वही डेटी सबसेट हो जाते हैं। ऐसे में उसे नए डेटा का सामना करना पड़ता है तो वह गलत आउटपुट देने लगता है। उस आउटपुट में उस डेटा सबसेट के प्रति पक्षपात साफ झलकता है जिस पर एआई मॉडल ट्रेंड हुआ है। अमेरिकी गणितज्ञ कैथी ओ’नील ने अपनी 2016 की किताब ‘वेपन्स ऑफ मैथ डिस्ट्रक्शन: हाउ बिग डेटा इंक्रीजेज इनइक्वलिटी एंड थ्रेटेंस डेमोक्रेसी’ में ऐसे कई उदाहरण दिए हैं, जहां मॉडल अपारदर्शी, अनियमित और अविश्वसनीय होते हैं।

2014 में ऐमजॉन द्वारा बनाया गया एक एआई बेस्ड अप्लीकेंट इवेल्युएशन टूल, जो 2018 में बंद कर दिया गया था, पक्षपाती डेटा का एक सटीक उदाहरण है। इसने पहले हुई भर्ती प्रक्रियाओं के आंकड़ों से सीखा, जिससे महिलाओं को योग्य उम्मीदवारों के समूह से बाहर कर दिया गया। इसी तरह, अपराध, पुलिसिंग या जेल जाने के रुझानों से सीखने वाले एल्गोरिदम, जो अश्वेत लोगों को असमान रूप से प्रभावित करते हैं, फिलाडेल्फिया के एआई सिक्यॉरिटी सिस्टम SEPTA में रेसियल प्रोफाइलिंग और भेदभाव का कारण बन सकते हैं। डेटा पक्षपात के बारे में 400 साल पहले फ्रांसिस बेकन ने एक शुरुआती वर्णन में दावा किया था कि ‘आज के सिद्धांत बहुत कम डेटा और कुछ बार-बार होने वाले मामलों से लिए गए थे, जिसके बाद उन्हें मॉडल बनाया गया था। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि वे नई घटनाओं की भविष्यवाणी करने में विफल रहते हैं।’ आलोचकों का कहना है कि एआई ऐसे पूर्वग्रहों को और बढ़ा देता है। पक्षपाती डेटा पर प्रशिक्षित एआई टूल्स ने ऐसी गलतियां की हैं, जैसे यह मान लेना कि केवल पुरुष ही हाई लेवल जॉब की योग्यता रखते हैं। काले चेहरों को इंसान के रूप में पहचानने में विफलता भी ऐसी गलतियों का उदाहरण है।

स्टीवन स्पीलबर्ग की 2002 की फिल्म ‘माइनॉरिटी रिपोर्ट’ में वॉशिंगटन डीसी के प्रीक्राइम पुलिस होने वाले अपराधों की भविष्यवाणी के लिए डेटा एनालिसिस का उपयोग करते हैं। सिस्टम में एक पुलिस अधिकारी जॉन को भविष्य की हत्या के लिए फंसाया जाता है और वह अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए निकल पड़ता है। क्या हम पक्षपाती एआई के साथ ऐसे ही विपरीत भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं?

आखिर नेहरू और अंबेडकर की क्या थी UCC पर राय? जानिए!

आज हम आपको बताएंगे कि नेहरू और अंबेडकर की UCC पर राय क्या थी! जब संविधान का प्रारूप तैयार हो रहा था तो जवाहरलाल नेहरू और डॉ. भीमराव आंबेडकर चाहते थे कि पूरे भारत के लिए एक समान नागरिक संहिता हो। लेकिन, उन्हें धार्मिक कट्टरपंथियों के विरोध का सामना करना पड़ा। संविधान सभा में इस पर चर्चा हुई, खूब हंगामा मचा। कई सदस्यों ने तर्क दिया कि समान नागरिक संहिता के लिए देश तैयार नहीं है। अल्पसंख्यक समुदाय में असुरक्षा की भावना है। हालांकि नेहरू और आंबेडकर इसे राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत में शामिल करने में सफल रहे। इसी संवैधानिक निर्देश का अनुकरण करते हुए उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लाई गई। इस अधिनियम के अनुसार, विवाह के लिए लड़कों की न्यूनतम उम्र 21 और लड़कियों की 18 साल होनी चाहिए। बहुविवाह और बाल विवाह प्रतिबंधित है। यह संहिता उत्तराखंड के निवासियों पर लागू होती है। बाहर से आए लोग भी इसकी जद में हैं। हालांकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 366(25) और 342 के तहत संरक्षित अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों को इसमें शामिल नहीं किया गया है।

यह अधिनियम उत्तराधिकार के मामले में भी महत्वपूर्ण व्यवस्था करता है, विशेषकर जब कोई वसीयत न हो। कानून व्यक्ति के जीवनकाल के दौरान पैदा हुए बच्चों और उनकी मृत्यु के बाद पैदा हुए बच्चों के बीच अंतर नहीं करता। यदि किसी विधवा या विधुर ने मृतक की मृत्यु से पहले पुनर्विवाह किया है, तो उन्हें विरासत नहीं मिल सकती। हत्या में शामिल या हत्या में सहायता करने वाला कोई भी व्यक्ति पीड़ित की संपत्ति का उत्तराधिकारी नहीं हो सकता। यह अधिनियम मृतक की संपत्ति की सुरक्षा का भी प्रावधान करता है। इसके तहत स्थानीय न्यायाधीश के पास आवेदन किया जा सकता है। इसके अलावा, जब किसी की मौत हो जाती है, तो उसके मामलों को संभालने के लिए नियुक्त व्यक्ति निष्पादक या प्रशासक हर चीज के लिए उसका कानूनी प्रतिनिधि बन जाता है और मृतक की सारी संपत्ति उसकी हो जाती है।

समकालीन समय में उभरी एक नई संस्कृति ‘लिव-इन रिलेशन’ के चलते महिलाएं उत्पीड़न का शिकार बनी हैं। इससे जुड़ी समस्याओं पर भी UCC में गौर किया गया है। उत्तराखंड के किसी भी निवासी या उत्तराखंड में रहने वाले व्यक्ति को अपने लिव-इन रिलेशनशिप का विवरण उस इलाके के रजिस्ट्रार को देना होगा। अगर दोनों में से कोई भी साथी नाबालिग है या किसी और से विवाहित है या अगर अनुमति जबरन ली गई है, तो लिव-इन रिलेशनशिप को पंजीकृत नहीं किया जाएगा। हालांकि ऐसे रिश्तों से पैदा हुए बच्चे वैध माने जाएंगे। विरोधियों का तर्क है कि इस तरह के अधिनियम को लागू करना धार्मिक स्वतंत्रता के लिए खतरा है, खासकर अल्पसंख्यक समुदायों के प्रति। आलोचक दावा करते हैं कि संविधान सभी धर्मों के अनुयायियों को अपने धर्म का पालन करने और उसे संरक्षित करने के अधिकार की गारंटी देता है। UCC को इस सिद्धांत के विरोधाभास के तौर पर देखा जा रहा। भारत में विभिन्न समुदायों के पर्सनल लॉ में विभिन्न सांस्कृतिक प्रथाएं अंतर्निहित हैं। एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के ढांचे के भीतर सांस्कृतिक विविधता का सम्मान और संरक्षण करना आवश्यक है। अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर मुस्लिम समाज को इस बात का डर है कि UCC इन सांस्कृतिक पहचानों को नष्ट कर सकता है।

लेकिन, अगर व्यापक नजरिए से देखा जाए तो UCC संविधान के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के अनुरूप है, जो सभी नागरिकों के साथ कानून के समक्ष समान व्यवहार करता है। यह विभिन्न धार्मिक समुदायों के लिए अलग-अलग कानूनी ढांचे की आवश्यकता को समाप्त करता है ताकि पर्सनल लॉ के नाम पर लैंगिक असमानताओं को समाप्त किया जा सके।लड़कों की न्यूनतम उम्र 21 और लड़कियों की 18 साल होनी चाहिए। बहुविवाह और बाल विवाह प्रतिबंधित है। यह संहिता उत्तराखंड के निवासियों पर लागू होती है। बाहर से आए लोग भी इसकी जद में हैं। हालांकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 366(25) और 342 के तहत संरक्षित अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों को इसमें शामिल नहीं किया गया है। यह कहना गलत नहीं होगा कि यह अधिनियम एक अधिक प्रगतिशील और समावेशी कानूनी ढांचे को बढ़ावा देता है ताकि कानूनी एकरूपता के माध्यम से सामाजिक-आर्थिक न्याय का मार्ग प्रशस्त किया जा सके। एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के ढांचे के भीतर सांस्कृतिक विविधता का सम्मान और संरक्षण करना आवश्यक है। अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर मुस्लिम समाज को इस बात का डर है कि UCC इन सांस्कृतिक पहचानों को नष्ट कर सकता है।विभिन्न पर्सनल लॉ से उत्पन्न भ्रम और संघर्ष कम करते हुए UCC एक अधिक समतावादी समाज को प्राप्त करने की दिशा में एक सराहनीय प्रयास है।

शाहजहाँ की गिरफ्तारी के बाद सीपीएम ने संदेशखाली में अपना पार्टी कार्यालय फिर से खोला.

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एक सदी पहले उन्हें पीटा गया और पार्टी कार्यालय से बाहर निकाल दिया गया। नेताओं की तस्वीरें जला दी गईं, साथ ही लाल झंडा भी जला दिया गया। सीपीएम ने शनिवार को संदेशखाली के कोराकाटी में खाली किये गये पार्टी कार्यालय पर ‘फिर से कब्जा’ कर लिया. संदेशखाली के पूर्व सीपीएम विधायक सेफ़र सरदार के नेतृत्व में मार्च कर वामपंथियों ने इस पार्टी कार्यालय पर कब्ज़ा कर लिया. 2011 में राज्य में राजनीतिक सत्ता परिवर्तन के बाद भी सीपीएम ने संदेशखाली में अपना गढ़ बरकरार रखा. लेकिन 2012 में संदेशखाली के कोराकाटी इलाके में लाल झंडा पार्टी कार्यालय को नष्ट कर दिया गया. सीपीएम ने आरोप लगाया कि तृणमूल के लोगों ने सबसे पहले पार्टी कार्यालय में लगे सभी लाल झंडे जलाये और अपनी पार्टी का निशान लगाया. इसके बाद पार्टी कार्यालय में मौजूद लोगों को मारपीट कर भगा दिया गया. सीपीएम का दावा है कि उस दिन से रातों रात तृणमूल का घास फूल का झंडा सीपीएम के पार्टी कार्यालय की शोभा बढ़ाने लगा. उसके बाद कालिंदी, छोटा कालागाछी नदी में काफी पानी बह गया। इलाके के ‘बाघ’ कहे जाने वाले तृणमूल नेता शाहजहां अब जेल में हैं. और उसमें सीपीएम को ‘हवा पलटने’ का संकेत मिल रहा है.

शनिवार सुबह सीपीएम ने इलाके में मार्च किया. जुलूस का नेतृत्व सीपीएम नेता सफ़र सरदार ने किया, जो कभी इस क्षेत्र के विधायक थे। वह वही है जिसने जुलूस के साथ कोराकाटी में प्रवेश किया था। इसके बाद वह बंद पार्टी कार्यालय का ताला खोलकर अंदर घुस गये. सामने लाल झंडा फहराया गया है. आकाश, वायु तब क्रांति की ध्वनि से गर्जना करने लगे। चारों ओर का वातावरण लाल झंडों से ढका हुआ है। सेफ़र कहते हैं, ”2011 से आपने देखा है कि कैसे तृणमूल सीपीएम कार्यकर्ताओं और समर्थकों को आतंकित कर रही है। इलाके के सभी लाल झंडार पार्टी कार्यालयों पर तृणमूल ने कब्जा कर लिया. यह एकमात्र स्थान था जहां क्षेत्र के गरीब किसान और खेतिहर मजदूर बैठकर अपने सुख-दुख पर चर्चा करते थे। आज पार्टी कार्यालय फिर से लोगों से खचाखच भर गया। लोगों की आंखों में खुशी देखी जा रही है.

5 जनवरी को संदेशखाली के सरबेरिया गांव में शाहजहां के घर की तलाशी के दौरान केंद्रीय एजेंसी ईडी के अधिकारियों को ‘बाघ’ के अनुयायियों द्वारा पीछा किए जाने के बाद वापस लौटना पड़ा. संदेशखाली की महिलाएं फरवरी की शुरुआत से ही ज़मीन पर कब्ज़ा करने से लेकर भेड़-बकरियां बनाने और महिलाओं पर अत्याचार करने जैसी कई शिकायतों के साथ सड़कों पर उतर आईं। उस वक्त सेफर को भी गिरफ्तार किया गया था. हालांकि बाद में उन्हें हाई कोर्ट से जमानत मिल गई. और रिहा होने के बाद वह फिर से संगठन को मजबूत करने के काम में लग गये. उसी के एक भाग के रूप में, कोराकाटी, संदेशखाली में पार्टी कार्यालय, जिसे एक सदी पहले खाली कर दिया गया था, पर फिर से कब्जा कर लिया गया। संदेशखाली के शाहजहां शेख ने शुक्रवार को अपनी चुप्पी तोड़ते हुए पहली बार सार्वजनिक रूप से अपनी बेगुनाही का दावा किया। लेकिन शनिवार को फिर पुरानी खामोशी! मेडिकल परीक्षण के लिए ले जाते समय शाहजहाँ चुप रहा। उन्होंने मीडिया के किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया.

बुधवार की रात को सीबीआई हिरासत में लिए जाने के 24 घंटे बाद शाहजहां को मेडिकल जांच के लिए सीबीआई जोका स्थित ईएसआई अस्पताल ले जा रही थी. यहीं पर शाहजहाँ ने पहली बार मीडिया के सामने अपना मुँह खोला। उन्होंने जो कहा उसका मतलब है कि उन्हें न्याय की उम्मीद है, लेकिन ईडी-सीबीआई-पुलिस या कोर्ट से नहीं! मेडिकल जांच के लिए निकलने से पहले शाहजहां ने मीडिया को देखकर अचानक कहा, ‘सब झूठ है।’ इसके तुरंत बाद, संदेशखाली के “प्रभावशाली” नेता ने कहा, “ऊपर वाला इसका फैसला करेगा।” लेकिन शनिवार को, शाहजहाँ को अपनी बेगुनाही का दावा करते नहीं देखा गया।

कई लोगों के अनुसार, राज्य जांचकर्ताओं के हाथों से केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की हिरासत में स्थानांतरित होने के बाद ही शाहजहाँ की शारीरिक भाषा बदल गई। सीबीआई सूत्रों के मुताबिक, 29 फरवरी को गिरफ्तारी के बाद शाहजहां में जो अहंकार सामने आया था, वह पिछले गुरुवार को निजाम पैलेस में देखने को नहीं मिला. शनिवार को शाहजहां की बॉडी लैंग्वेज में भी वही अटपटा भाव दिखा। सिर नीचे गति में कोई परिचित शक्ति नहीं है.

आरएसएस की बैठक में आ सकता है संदेशखाली का मुद्दा.

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आरएसएस की नीति-निर्धारक संस्था अखिल भारतीय प्रताप सभा महिलाओं के खिलाफ संदेशखाली हिंसा, किसान आंदोलन और मणिपुर पर चर्चा के लिए चुनाव से पहले बैठक कर रही है। यह बैठक 15-17 मार्च को नागपुर में होगी. आरएसएस अगले साल सौ साल पूरे करने जा रहा है. ऐसे में अगले एक साल में देशभर में किस तरह से अभियान चलाया जाएगा, इस पर चर्चा होने वाली है.

लोकसभा चुनाव सामने हैं. उससे ठीक पहले होने वाली बैठक में संघ के नीतिगत मुद्दों के अलावा हाल की विभिन्न घटनाओं पर भी चर्चा होने की उम्मीद है. सूत्रों के मुताबिक बैठक में संदेशखाली की घटना पर विस्तार से चर्चा होनी है. सरब संघ परिवार लंबे समय से अतिक्रमण के कारण जनसंख्या असंतुलन की शिकायत करता रहा है, खासकर पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में। इस मामले में स्थानीय महिलाएं महिला हिंसा के मुद्दे को लेकर आगे आई हैं, इसलिए इस मामले ने खास तूल पकड़ लिया है. सूत्रों के मुताबिक, गेरुआ शिबिर चाहते हैं कि उन इलाकों में प्रताड़ित हिंदू महिलाएं सामने आएं और अपना मुंह खोलें। राजनेताओं के मुताबिक, संदेशखाली महिलाएं अत्याचारों के बारे में जितना अधिक बोलेंगी, लोकसभा से पहले पश्चिम बंगाल में ध्रुवीकरण उतना ही अधिक होगा। लाभ
ये बीजेपी का होगा. इसीलिए संदेशखाली के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा करने पर जोर दिया जा रहा है. साथ ही मणिपुर में जिस तरह से मेइतिदों पर अत्याचार हो रहा है, जिस तरह से कुकी उग्रवादी विदेशी हथियारों की मदद से हमला कर रहे हैं, उस पर भी संज्ञान लेने का फैसला किया गया है.

लोकसभा के बाद हरियाणा में विधानसभा चुनाव. लेकिन पिछले फरवरी से उस राज्य में किसान केंद्र विरोधी धरने पर बैठे हैं. उन्हें रोकने के लिए हरियाणा की बीजेपी शासित मनोहरलाल खट्टर सरकार को बल प्रयोग करना पड़ा. ऐसे में यह मामला प्रतिनिधि सभा की बैठक में उठना तय माना जा रहा है. संघ का करीबी भारतीय किसान संघ जहां किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की वकालत करता है, वहीं किसान संगठन समय-समय पर किसानों द्वारा सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के तरीके की आलोचना करता रहा है। अब प्रतिनिधि सभा लोकसभा और फिर विधानसभा चुनाव से पहले आगे की रणनीति पर चर्चा करने जा रही है.

इसके अलावा बैठक में समान नागरिक संहिता, जनसंख्या नियंत्रण नीति जैसे विवादास्पद मुद्दों पर भी चर्चा होनी तय है. आरएसएस पूरे देश में समान नागरिक संहिता के पक्ष में है. उत्तराखंड सरकार पहले ही राज्य विधानसभा में समान नागरिक संहिता विधेयक पारित कर चुकी है। बैठक में प्रतिनिधि सभा के सदस्य इस बात पर भी चर्चा करने वाले हैं कि आने वाले दिनों में पूरे देश में समान नागरिक संहिता और जनसंख्या नियंत्रण कानून लागू करने को लेकर कैसे आगे बढ़ा जाए. सूत्रों के मुताबिक, बैठक में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के शामिल होने की उम्मीद है.

सूत्रों के मुताबिक, आरएसएस समान नागरिक संहिता, जनसंख्या कानून, स्वदेशी के बढ़ते इस्तेमाल जैसे मुद्दों को बीजेपी के लोकसभा घोषणापत्र में जगह दिलाना चाहता है. उन मुद्दों पर नड्‌डा की मौजूदगी में चर्चा होनी है। इसके अलावा आरएसएस की शताब्दी के मौके पर देशभर में कम से कम एक लाख शाखाएं बनाने का लक्ष्य लिया गया है. महिला शाखाओं की संख्या बढ़ाने पर जोर दिया गया है, खासकर आरएसएस में महिलाओं की सदस्यता बढ़ाने पर। एक सदी पहले उन्हें पीटकर पार्टी कार्यालय से बाहर निकाल दिया गया था. नेताओं की तस्वीरें जला दी गईं, साथ ही लाल झंडा भी जला दिया गया। सीपीएम ने शनिवार को संदेशखाली के कोराकाटी में खाली किये गये पार्टी कार्यालय पर ‘फिर से कब्जा’ कर लिया. संदेशखाली के पूर्व सीपीएम विधायक सेफ़र सरदार के नेतृत्व में मार्च कर वामपंथियों ने इस पार्टी कार्यालय पर कब्ज़ा कर लिया.

2011 में राज्य में राजनीतिक सत्ता परिवर्तन के बाद भी सीपीएम ने संदेशखाली में अपना गढ़ बरकरार रखा. लेकिन 2012 में संदेशखाली के कोराकाटी इलाके में लाल झंडा पार्टी कार्यालय को नष्ट कर दिया गया. सीपीएम ने आरोप लगाया कि तृणमूल के लोगों ने सबसे पहले पार्टी कार्यालय में लगे सभी लाल झंडे जलाये और अपनी पार्टी का निशान लगाया. इसके बाद पार्टी कार्यालय में मौजूद लोगों को मारपीट कर भगा दिया गया. सीपीएम का दावा है कि उस दिन से रातों रात तृणमूल का घास फूल का झंडा सीपीएम के पार्टी कार्यालय की शोभा बढ़ाने लगा. उसके बाद कालिंदी, छोटा कालागाछी नदी में काफी पानी बह गया। इलाके के ‘बाघ’ कहे जाने वाले तृणमूल नेता शाहजहां अब जेल में हैं. और उसमें सीपीएम को ‘हवा पलटने’ का संकेत मिल रहा है.

आमिर खान की आने वाली फिल्म सितारे ज़मीन पर डाउन सिंड्रोम को संबोधित करती है?

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करियर के लिहाज से बॉलीवुड एक्टर आमिर खान के लिए पिछले कुछ साल खास अच्छे नहीं रहे हैं। ‘लाल सिंह चड्ढा’ बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो गई। लोकप्रिय हॉलीवुड अभिनेता टॉम हैंक्स अभिनीत फिल्म ‘फॉरेस्ट गंप’ की असफलता के बाद आमिर लगभग एक साल तक सुर्खियों से दूर रहे। उन्होंने अभिनय से ब्रेक लेने का भी फैसला किया। लेकिन पिछले कुछ महीनों से ऐसी अफवाहें आ रही हैं कि अभिनेता धीरे-धीरे खुद को अभिनय में वापसी के लिए तैयार कर रहे हैं। हाल ही में एक इंटरव्यू में आमिर ने बताया कि उनकी अगली फिल्म का नाम ‘सितारे जमीन पर’ है। आमिर 2007 में रिलीज हुई फिल्म ‘तारे जमीन पर’ के दम पर सफलता की तलाश में हैं।

‘तारे ज़मीन पर’ में एक 10 साल के लड़के को दिखाया गया है जो डिस्लेक्सिया से पीड़ित है। इस बार इसी फिल्म की कहानी के अंदाज में ‘सितारे जमीन पर’ बनाई जा रही है। वहां डाउन सिंड्रोम जैसी चीजों पर प्रकाश डाला जाएगा. अभिनेता ‘तारे जमीन पर’ के जरिए डिस्लेक्सिया के बारे में जागरूकता बढ़ाना चाहते थे। इस फिल्म में उनके द्वारा निभाया गया ‘निकुंभ सर’ का किरदार आज भी दर्शकों के दिलों में बसा हुआ है। सूत्रों के मुताबिक, ‘सितारे ज़मीन पार’ एक ऐसी फिल्म है जो दिखाएगी कि डाउन सिंड्रोम वाले लोगों पर क्या गुजरती है। बेहद संवेदनशील मामला. इस फिल्म के जरिए यह संदेश दिया जाएगा कि डाउन सिंड्रोम से पीड़ित लोग बाकियों से बाकी पांच लोगों की तरह ही व्यवहार की उम्मीद करते हैं. इस फिल्म के बारे में आमिर ने कहा कि फिल्म का मुख्य स्वर ‘सितारे जमीन पर’ वही है. आमिर ने कहा, ”पिछली फिल्म में मैंने ईशान की मदद की थी, इस बार इसका उलट होगा.”

आमिर खान ने अपनी नई फिल्म की शूटिंग शुरू कर दी है ये खबर पहले से ही सामने आ चुकी है. ‘सितारे जमीन पर’ नाम की इस फिल्म की रिलीज को लेकर आमिर ने नई जानकारी दी।

आमिर ने कुछ महीने पहले पहली बार अपनी अगली फिल्म के बारे में खुलासा किया था। फिल्म के नाम का खुलासा करने के अलावा, अभिनेता ने कहा कि यह फिल्म 2007 में रिलीज हुई फिल्म ‘तारे जमीन पर’ की शैली में बनाई जाएगी जिसमें आमिर ने अभिनय किया था। समीक्षकों द्वारा प्रशंसित इस फिल्म में विशेष रूप से सक्षम बच्चों की सफलता की कहानियाँ दिखाई गईं। फिल्म का मुख्य किरदार ईशान डिस्लेक्सिया नामक बीमारी से पीड़ित था। आमिर ने ड्राइंग टीचर रामशंकर निकुंभ का किरदार निभाया था. सूत्रों के मुताबिक इस बार भी फिल्म की पटकथा एक चर्चित सामाजिक समस्या पर तैयार की गई है.

हाल ही में एक इंटरव्यू में बॉलीवुड के ‘मिस्टर परफेक्शनिस्ट’ ने इस फिल्म की रिलीज को लेकर अपने विचार व्यक्त किए. आमिर ने कहा, ”एक अभिनेता के तौर पर यह मेरी अगली फिल्म होगी। हम फिल्म को अगले क्रिसमस पर रिलीज करने की योजना बना रहे हैं। स्क्रिप्ट सुनने के बाद मुझे कहानी पसंद आई।”

फिल्म की शूटिंग हाल ही में शुरू हुई है. फिल्म में आमिर तो हैं, लेकिन सरप्राइज और भी हैं। आमिर के मुताबिक, ‘फिल्म में मैं मेन रोल में नहीं, बल्कि कैमियो रोल में हूं।’ इस फिल्म में आमिर के अलावा जेनेलिया देशमुख हैं। यह पहली बार है जब वे किसी फिल्म में जोड़ी बना रहे हैं। इसके अलावा आमिर अपनी प्रोडक्शन कंपनी की फिल्म ‘अति सुंदर’ में भी कैमियो रोल निभाएंगे।

2022 में आमिर की फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ रिलीज हुई थी। ऑस्कर विजेता अंग्रेजी फिल्म ‘फॉरेस्ट गंप’ की रीमेक यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असफल रही। विफलता के घावों को भुलाने के लिए मैंने अभिनय से अस्थायी ब्रेक की भी घोषणा की। लेकिन उसके बाद फैंस ये जानकर खुश हैं कि वह एक्टिंग में वापसी कर रहे हैं. अब आइए अतीत को भूल जाएं और देखें कि क्या आमिर ‘सितारे ज़मीन पर’ के साथ दर्शकों के मन में अपनी खोई हुई सीट वापस पा पाते हैं। फिल्म की शूटिंग हाल ही में शुरू हुई है. फिल्म में आमिर तो हैं, लेकिन सरप्राइज और भी हैं। आमिर के मुताबिक, ‘फिल्म में मैं मेन रोल में नहीं, बल्कि कैमियो रोल में हूं।’ इस फिल्म में आमिर के अलावा जेनेलिया देशमुख हैं। यह पहली बार है जब वे किसी फिल्म में जोड़ी बना रहे हैं। इसके अलावा आमिर अपनी प्रोडक्शन कंपनी की फिल्म ‘अति सुंदर’ में भी कैमियो रोल निभाएंगे।

अर्जुन बिजलानी को पेट में तेज दर्द के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया.

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हाथ में सलाइन का चैनल! अस्पताल के बिस्तर पर लेटे अर्जुन, एक्टर को क्या हुआ? अभिनेता-निर्देशक अर्जुन बिजलानी अस्पताल में भर्ती। शूटिंग के सेट पर अर्जुन बीमार पड़ गए. अभिनेता और निर्देशक अर्जुन बिजलानी को गंभीर बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया था। अभिनेता को शुक्रवार को मुंबई के हिंदुजा अस्पताल में भर्ती कराया गया था। सूत्रों के मुताबिक, वह कई दिनों से पेट दर्द से परेशान थे. शुक्रवार कष्ट सहने की सीमा है। उस वक्त अर्जुन शूटिंग कर रहे थे। शूटिंग सेट से अर्जुन को अस्पताल ले जाया गया। टेस्ट के बाद पता चला कि एक्टर को अपेंडिसाइटिस है. एक्टर ने बताया कि सर्जरी कल यानी रविवार को की जाएगी. शनिवार को अर्जुन ने कहा, ”मुझे पेट दर्द के कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। आज एक्सरे होगा. ”कल मेरी सर्जरी होगी.”

अर्जुन फिलहाल ‘पेय्यर का पहला अध्याय: शिव अध्याय’ नाम के सीरियल में अभिनय कर रहे हैं। उन्होंने डॉ. शिव कश्यप का किरदार निभाकर दर्शकों की सराहना हासिल की. इस सीरियल की शूटिंग के दौरान अर्जुन अचानक बीमार पड़ गए। वह पेट दर्द से अकड़ गया था। अर्जुन को तुरंत अस्पताल ले जाया गया। अर्जुन की शारीरिक स्थिति को आंकने के बाद डॉक्टरों ने अभिनेता को अस्पताल में भर्ती कर लिया।

खारा का हाथ से प्रवाहित होना। अर्जुन ने वो तस्वीर अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी में दी. इसके बाद फैंस चिंतित हो गए. फोटो के नीचे अर्जुन ने लिखा, ”जो होता है अच्छे के लिए होता है.” लेकिन अर्जुन ने बार-बार कहा है कि किसी को उनकी चिंता नहीं करनी चाहिए. वह बिल्कुल सही है. दर्द पहले से काफी कम है. सर्जरी से दर्द से पूरी तरह छुटकारा मिल जाएगा। मासिक धर्म के कुछ दिनों बाद कई महिलाओं को पेट में तेज दर्द का अनुभव होता है। लेकिन पेट के निचले हिस्से में दर्द का मतलब मासिक धर्म में होने वाला दर्द नहीं है। कई लोग ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जिनका परिणाम घातक हो सकता है। 39 साल की फे लुईस कई दिनों से पेट दर्द से परेशान थीं। फे को लगा कि ये दर्द मासिक धर्म के कारण है. लेकिन यह गलती उनकी जान ले लेती. दर्द चरम सीमा पर पहुंचने पर फ़े डॉक्टर के पास गए। वहां जांच के बाद उन्हें पता चला कि वह कैंसर से पीड़ित हैं. इतना ही नहीं, डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि वह कैंसर की आखिरी स्टेज पर पहुंच चुके हैं।

फे के अपेंडिक्स पर एक दुर्लभ प्रकार का ट्यूमर था। यहीं से दर्द शुरू होता है. पहले तो डॉक्टर भी समझ नहीं पाए कि असल में उन्हें हुआ क्या है. शुरुआत में डॉक्टरों को लगा कि फे का दर्द कब्ज के कारण हो सकता है। लेकिन जब दवा लेने के बाद भी दर्द कम नहीं हुआ तो डॉक्टरों ने अल्ट्रासाउंड कराया। रिपोर्ट के मुताबिक, उनके पेट में 17 सेमी का सिस्ट है। हालांकि, डॉक्टरों को महिला के अपेंडिक्स में सूजन नजर आई। पता चला कि कैंसर अपेंडिक्स तक फैल चुका है। कैंसर के बारे में सुनकर फे बहुत दुखी हुई। उन्होंने इंस्टाग्राम पर अपने प्रशंसकों के साथ अपनी स्थिति साझा की। उन्होंने कहा, ”कैंसर के बारे में जानने के बाद मैं मानसिक रूप से टूट गया था. मैंने दो साल पहले अपनी माँ को कैंसर के कारण खो दिया था। इसलिए यह सुनने के बाद कि मुझे कैंसर है, मैंने बचने की उम्मीद छोड़ दी। वो दिन मेरी जिंदगी का सबसे बुरा समय था।”

लेकिन फे के 30 साल के बॉयफ्रेंड ने उसे कैंसर से लड़ने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया है। आख़िरकार महिला सर्जरी कराने के लिए तैयार हो गई. कैंसर कोशिकाओं के फैलने के कारण डॉक्टरों ने महिला के शरीर से पित्ताशय, प्लीहा और छोटी आंत सहित कुल 8 अंग निकाल दिए। फिलहाल वह स्वस्थ हैं. हालांकि, उन्होंने इंस्टाग्राम पर अपने फैन्स को बताया कि पेट दर्द जैसे साधारण लक्षण भी कैंसर का संकेत हो सकते हैं, इसलिए इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें। कई लोग ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जिनका परिणाम घातक हो सकता है। 39 साल की फे लुईस कई दिनों से पेट दर्द से परेशान थीं। फे को लगा कि ये दर्द मासिक धर्म के कारण है. लेकिन यह गलती उनकी जान ले लेती. दर्द चरम सीमा पर पहुंचने पर फ़े डॉक्टर के पास गए। वहां जांच के बाद उन्हें पता चला कि वह कैंसर से पीड़ित हैं. इतना ही नहीं, डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि वह कैंसर की आखिरी स्टेज पर पहुंच चुके हैं।

अभिषेक बनर्जी ने ब्रिगेड रैली की तैयारियों का अवलोकन किया.

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अभिषेक ने नक्शा लिया और ब्रिगेड को मापा, मंच के चारों ओर चले, रैंप पर चले और कहा, रविवार को मिलते हैं। इसमें कई नई चीजें हैं. शनिवार की दोपहर पार्टी के अखिल भारतीय महासचिव अभिषेक ने समझौता देखा. तृणमूल कमांडर अभिषेक बनर्जी दोपहर में ही ब्रिगेड पहुंचे थे और तैयारियों के अंतिम चरण का निरीक्षण किया था। हाथ में नक्शा लेकर उन्होंने मंच की सारी दिशाएं, सभा स्थल सब कुछ अपने तरीके से समझा। अभिषेक ने पिछले गुरुवार को एक बार ब्रिगेड का दौरा किया था। लेकिन तब केवल ढांचा तैयार किया गया था.’ उसके बाद पिछले 48 घंटों में लगभग सब कुछ धीरे-धीरे होता गया. मूर्ति बनाई आखिरी वक्त में सिर्फ आंखों को रंगने का काम चल रहा है.

अभिषेक शनिवार शाम चार बजे ब्रिगेड मंच पर पहुंचे। देखा जा सकता है कि उनके आसपास छात्र और युवा नेताओं की भीड़ लगी हुई है. अभिषेक के साथ कोलकाता के पार्षद वैश्वानर चटर्जी, अभिषेक के चाचा और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भाई स्वपन बनर्जी (बबून), मंत्री अरूप विश्वास के भाई स्वरूप विश्वास भी थे. आरामबाग से निवर्तमान सांसद अपरूपा पोद्दार भी मंच पर नजर आईं.

रविवार को होने वाली तृणमूल ब्रिगेड की रैली को ‘जनजन सभा’ ​​उपनाम दिया गया है. उस मुलाकात में कई बातें नई हैं. ममता, अभिषेक मंच से लंबा रैंप वॉक कर लोगों तक पहुंचेंगे. शनिवार को अभिषेक खुद उस रैंप पर चले. उसके बाद, उन्होंने एक ताररहित माइक्रोफोन लिया और ध्वनि का परीक्षण किया। उन्होंने मैदान में जुटे प्रशंसकों से कहा, ”विजय बांग्ला!” ”आप सभी से कल (रविवार) मुलाकात होगी।” मुख्य मंच की पृष्ठभूमि में एक विशाल एलईडी डिस्प्ले बोर्ड है। जिसे ‘वीडियो वॉल’ कहा जाता है। ऐसी तीन दीवारों की व्यवस्था की गई है। इसके नीचे लिखा है, ‘जनता की दहाड़, बंगाली विरोधियों का साथ-तृणमूल को मिलेगा अधिकार’. ब्रिगेड में कुल तीन स्टेज बनाए गए हैं. बड़े मंच के दोनों ओर दो छोटे मंच हैं। आगे दो छोटे पड़ाव और हैं. तृणमूल ने बताया कि बैठक की शुरुआत में सांस्कृतिक कार्यक्रम होगा. पूरी ब्रिगेड में करीब डेढ़ हजार लाउडस्पीकर लगाए गए हैं.

जब विपक्ष ने संदेशखाली पर अपना अभियान तेज़ कर दिया तो अभिषेक ने अचानक 10 मार्च की ब्रिगेड रैली की घोषणा कर दी. दिनांक 25 फरवरी. दूसरे शब्दों में कहें तो रैली की तैयारी के लिए तृणमूल को सिर्फ 15 दिन मिले. उत्तर बंगाल, जंगलमहल और दूर-दराज के जिलों से कोलकाता आने वाले या आने वाले तृणमूल समर्थकों के लिए कुल पांच स्थानों की व्यवस्था की गई है। न्यू टाउन में इको पार्क, कोस्बार में गीतांजलि स्टेडियम, अलीपुर में मुक्तांगन दर्रा, नेताजी इंडोर स्टेडियम और हावड़ा में एक जगह पर तृणमूल समर्थक हैं। अभिषेक ने पिछले तीन दिनों में उन सभी जगहों के इंफ्रास्ट्रक्चर का दौरा किया. शनिवार को अभिषेक हावड़ा छोड़ कर जिले से आनेवाले कार्यकर्ताओं व समर्थकों के आवास व भोजन की व्यवस्था देखने गये. मंच से नीचे आने के बाद उन्होंने स्वयंसेवकों को आवश्यक निर्देश भी दिये.

राज्य में सत्तारूढ़ दल कल, रविवार को ब्रिगेड में ‘जनजन सभा’ ​​में लोगों को लाने के लिए कोलकाता और उपनगरों के अलावा जिलों से किराए पर ली गई बसों पर निर्भर है। बैठक के कारण आज यानी शनिवार सुबह से कोलकाता से रवाना होने वाली लंबी दूरी की बसों में देरी हो सकती है. साथ ही, रविवार को बैठक के दिन कोलकाता और उपनगरों के अधिकांश मार्ग वस्तुतः बस-मुक्त होने की संभावना है। सूत्रों के मुताबिक, 21 जुलाई की बैठक की तरह बसें जुटाने की गतिविधि बहुत पहले से शुरू नहीं हुई थी, लेकिन शुक्रवार से राज्य की सत्ताधारी पार्टी की गतिविधियां तेज हो गई हैं. भविष्य की बैठकों में दक्षिण बंगाल के विभिन्न जिलों के अलावा कोलकाता के आसपास के जिलों से लोगों को लाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

निजी जमींदार संघ के नेतृत्व का मानना ​​है कि एस्प्लेनेड और कोलकाता स्टेशनों से जिले को कोलकाता से जोड़ने वाली लंबी दूरी की अधिकांश बसें आज, शनिवार को नहीं चलेंगी। रविवार को सड़क पर निजी बसों की संख्या आमतौर पर सप्ताह के अन्य दिनों की तुलना में काफी कम होती है। ‘ऑल बंगाल बस-मिनीबस कोऑर्डिनेटिंग सोसाइटी’ के महासचिव राहुल चट्टोपाध्याय और ‘सिटी सबअर्बन बस सर्विस’ के महासचिव टीटू साहा ने कहा, लेकिन कल की सार्वजनिक बैठक के कारण, कोलकाता और लागोआ जिलों में विभिन्न मार्गों पर बसें नहीं चलेंगी। कुल मिलाकर, यह बताया गया है कि सार्वजनिक समारोहों के लिए सैकड़ों-हजारों बसों को ले जाया जा रहा है।

बताया गया है कि बीटी रोड, बारासात, दमदम, नागेरबाजार, न्यू टाउन, सपुरजी अबसन, जांगड़ा, हटियारा, ईएम बाईपास, बसंती हाईवे, बारुईपुर सहित विभिन्न मार्गों पर अधिकांश बसें वापस ली जा रही हैं। बस मिनीबस ओनर्स एसोसिएशन के महासचिव प्रदीप नारायण बोस ने कहा कि उनसे उन कार्यकर्ता-समर्थकों के लिए कई बसें उपलब्ध कराने को कहा गया है जो लंबी दूरी की ट्रेन से सियालदह और कोलकाता स्टेशनों पर आएंगे. चूंकि बैठक को लेकर सत्ताधारी दल का मजदूर संघ सक्रिय है, इसलिए उस दिन शहर के विभिन्न रूटों पर ऑटो चलने की संभावना भी कम है. सूत्रों के मुताबिक, रैली के कारण कुछ सरकारी बसें भी नहीं चलेंगी. कुल मिलाकर कल और रविवार को सड़क पर निकलने वाले यात्रियों को परेशान किये जाने का डर है.

आखिर बीजेपी की पहली लिस्ट क्या देती है संदेश?

बीजेपी की पहली लिस्ट एक संदेश छोड़कर गई है.. आज हम आपको उसी के बारे में जानकारी देने वाले है.. लोकसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान भले ही अभी नहीं हुआ हो लेकिन बीजेपी समेत दूसरे सियासी दल रणनीतिक तैयारी में जुटे हैं। खास बात ये है कि केंद्र की सत्ताधारी बीजेपी ने कांग्रेस समेत दूसरे दलों को चौंकाते हुए उम्मीदवारों की पहली लिस्ट भी जारी कर दी। इस लिस्ट के लिए बीजेपी केंद्रीय चुनाव समिति को मैराथन बैठक हुई। पीएम मोदी की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में अलग-अलग राज्यों के कुल 195 कैंडिडेट्स का नाम घोषित किया गया। हालांकि, उम्मीदवारों की पहली लिस्ट में शामिल भोजपुरी सुपरस्टार पवन सिंह ने 24 घंटे बाद ही चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। बीजेपी ने पवन सिंह को पश्चिम बंगाल की आसनसोल लोकसभा सीट से अपना उम्मीदवार बनाया था। भले ही पवन सिंह चुनाव लड़ने से मना कर चुके हों लेकिन बीजेपी ने उम्मीदवारों के सेलेक्शन कई बातों पर ध्यान दिया है। बीजेपी की पहली लिस्ट पर गौर करें तो पार्टी आलाकमान ने उम्मीदवारों के चुनाव में जीत को प्राथमिकता दी है। ऐसा इसलिए क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस चुनाव में बीजेपी के लिए 370 सीटों पर जीत का टारगेट सेट किया। पार्टी नेतृत्व भी इस लक्ष्य को हासिल करने में कोई कोर कसर छोड़ना नहीं चाहता। यही वजह है कि पार्टी ने 195 उम्मीदवारों की लिस्ट में 20 फीसदी मौजूदा सांसदों के टिकट काट दिए हैं। अकेले दिल्ली की 5 सीटों पर घोषित उम्मीदवारों में 4 के टिकट काटे गए हैं। इसके अलावा विवादित बयानबाजी को लेकर सुर्खियों में आए सांसदों को भी झटका लगा है। मौजूदा सांसदों में से करीब 20 फीसदी को खराब प्रदर्शन और जीत की कम संभावनाओं के चलते टिकट नहीं दिया गया है।

दिल्ली की बात करें तो यहां लोकसभा की 7 सीटें हैं। आगामी चुनाव के लिए आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने गठबंधन का ऐलान किया है। ऐसे मुकाबला और दिलचस्प हो गया। बदले सियासी हालात को देखते हुए पार्टी ने दिल्ली में, पांच में से चार मौजूदा सांसदों को बदल दिया है। पूर्वी दिल्ली से क्रिकेटर से नेता बने गौतम गंभीर, जिन्होंने इस बार खुद ही चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया। उधर सिंगर हंस राज हंस को भी उम्मीदवार नहीं बनाया गया। मीनाक्षी लेखी का टिकट कटने से जरूरी कुछ लोगों को आश्चर्य लगा, लेकिन उनकी जगह लेने वाली बांसुरी स्वराज एक राजनीतिक खानदान से आती हैं। वो सुषमा स्वराज की बेटी हैं। उन्हें टिकट मिलना जरूर पीएम मोदी के परिवारवाद की राजनीति के रुख के खिलाफ जाती है।

अपने पिता की विरासत और मोदी लहर के दम पर दो बार सांसद रहे प्रवेश साहिब सिंह वर्मा भी इस दौरान कोई खास छाप नहीं छोड़ पाए। विवादित बयानों की वजह से उन्हें भी बीजेपी की लिस्ट में जगह नहीं मिली। लोकसभा में दो कार्यकाल पूरे करने वाले और स्वास्थ्य मंत्रालय से हटाए गए हर्षवर्धन को भी टिकट से वंचित कर दिया गया है। इसी के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास की घोषणा भी कर दी। वहीं सांसद दानिश अली के खिलाफ सांप्रदायिक टिप्पणी करने के कारण प्रमुख गुर्जर नेता रमेश बिधूड़ी का भी टिकट इस बार कट गया। दिल्ली में बीजेपी ने केवल मनोज तिवारी पर फिर से भरोसा जताया और सांसद रहते हुए एक बार चुनाव मैदान में उतारने का फैसला लिया है।

विवादित बयानों के चलते भले ही दिल्ली में सांसदों के टिकट कटे हों लेकिन यूपी में ऐसा कुछ भी देखने को मिला। इससे ऐसा लगता है कि पार्टी का पूरा फोकस जीत के गणित पर है। यही वजह है कि पार्टी नेतृत्व जातिगत वोटों पर प्रभाव के चलते साक्षी महाराज और साध्वी निरंजन ज्योति को फिर से चुनाव मैदान में उतारा है। इनके अलावा अजय मिश्रा टेनी को किसानों के विरोध प्रदर्शन में उनके बेटे की कथित संलिप्तता के बावजूद मजबूत उम्मीदवारी के चलते खीरी से फिर टिकट दिया गया है। दूसरी ओर, 2008 के मालेगांव ब्लास्ट केस में आरोपी प्रज्ञा ठाकुर को भोपाल सीट से उम्मीदवार नहीं बनाया गया है। पिछली बार उन्होंने इस सीट पर कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह को हराया था। टिकट कटने वालों में पूर्व वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा का भी नाम है। उन्होंने अपनी हजारीबाग सीट से दावेदारी को लेकर पहले ही पीछे हटने का क्लियर मैसेज कर दिया था।

मशहूर हस्तियों में, भोजपुरी अभिनेता पवन सिंह, जो शुरू में पूर्वी उत्तर प्रदेश से टिकट मांग रहे थे, लेकिन पार्टी ने पश्चिम बंगाल के आसनसोल से मैदान में उतारा। हालांकि, अब उन्होंने चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान कर दिया। हालांकि, एक अन्य लोकप्रिय भोजपुरी अभिनेता दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ एक बार फिर आजमगढ़ सीट दावेदारी करते नजर आएंगे। बीजेपी ने अलग-अलग पार्टियों से आए दिग्गजों को भी चुनाव मैदान में उतारा है। इनमें ज्योति मिर्धा का नाम शामिल है जो कांग्रेस छोड़कर आई हैं। कांग्रेस से आए कृपाशंकर सिंह, गीता कोड़ा, अनिल एंटनी को भी टिकट मिला है। वहीं बीएसपी से आए रितेश पांडे और टीएमसी छोड़कर बीजेपी में आए सौमेंदु अधिकारी का भी नाम पार्टी की पहली लिस्ट में शामिल है। लोकसभा में अपनी संख्या बढ़ाने के लिए, बीजेपी ने कुछ प्रमुख राज्यसभा सदस्यों को भी उम्मीदवार बनाया है। इनमें केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर और वी मुरलीधरन प्रमुख हैं, जो केरल से चुनाव लड़ेंगे।