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क्या यूपी के यादव समुदाय जाएंगे बीजेपी के साथ?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यूपी के यादव समुदाय बीजेपी के साथ जाएंगे या नहीं! लोकसभा चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने हर एक सीट पर अपनी रणनीति तय करनी शुरू कर दी है। पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी विभिन्न राजनीतिक दलों के गढ़ पर कब्जे की तैयारी में जुटी रही। आजमगढ़ और रामपुर लोकसभा सीट जैसी समाजवादी पार्टी के परंपरागत गढ़ में भाजपा ने सेंधमारी की कोशिश की है। अब यादव लैंड पर कब्जे की कोशिश शुरू हो गई है। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और बिहार में लालू प्रसाद यादव ने यादव वोट बैंक पर कब्जे की कोशिश की जा रही है। दोनों ही नेताओं ने मुस्लिम- यादव यानी माय समीकरण के जरिए 90 के दशक में अपनी राजनीति चमकाई। सत्ता में आए और करीब तीन दशक से यह समीकरण यूपी और बिहार के राजनीतिक मैदान में उसी मजबूती के साथ जमा हुआ है। भाजपा ने इस समीकरण को तोड़ने की कोशिश शुरू कर दी है। इस क्रम में मध्य प्रदेश में मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनकर भारतीय जनता पार्टी ने यादव वोट बैंक पर अपनी नजर गड़ा दी है। शिवराज सिंह चौहान को हटाकर मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनने के पीछे पार्टी की रणनीति बिहार और यूपी तक की राजनीति के मानकों को बदलने की है। यूपी की राजधानी लखनऊ से यादव वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिश के तहत बड़े कार्यक्रम का आयोजन किया गया। गुडौरा मैदान में आयोजित यादव महाकुंभ में खराब मौसम के बाद भी भारी भीड़ उमड़ी थी। यादव महाकुंभ से एक नारा निकला, यादव चला मोहन के संग। इस नारे के जरिए यादव वोट बैंक के बीच एक संदेश देने की कोशिश की जा रही है। मोहन यादव ने भी इस कार्यक्रम में यादवों की शक्ति का अहसास कराया। उन्होंने वोट बैंक के बीच संदेश देने की कोशिश की कि यादव किसी एक परिवार के पीछे- पीछे नहीं चल सकता। इस वर्ग को भी सही- गलत को देखते हुए फैसला लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि एमपी में बिना किसी राजनीतिक आधार के वह मुख्यमंत्री तक की कुर्सी पहुंचे। अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि मेरे पिता मुख्यमंत्री नहीं थे। परिवार के लोगों का राजनीति से नाता नहीं है।

मोहन यादव के इन बयानों को आधार मानेंगे तो आपको अहसास होगा कि यूपी में जिस प्रकार से यादव वोट बैंक खुद को मुलायम परिवार तक सीमित रख रहा था, उसे अब एक और विकल्प देने की कोशिश की जा रही है। मोहन यादव एक बड़े चेहरे के रूप में उभर रहे हैं। यूपी और बिहार के यादव वोट बैंक के बीच उन्हें स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। भाजपा की कोशिश एक बने- बनाए वोट बैंक के किले को ढाहने की है। लोकसभा चुनाव में भी पार्टी मोहन यादव को स्टार प्रचारक बनाएगी। यूपी में समाजवादी पार्टी और बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के किले में सेंधमारी का प्रयास किया जाएगा।

यादव वोट बैंक एकमुश्त वोट करने वाला वर्ग माना जाता रहा है। उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार की राजनीति में कमोबेश यही दिखता है। उत्तर प्रदेश में यादव वोट बैंक का चेहरा मुलायम सिंह यादव रहे। उनके निधन के बाद अब अखिलेश यादव इस वर्ग की राजनीति को आगे बढ़ाने का प्रयास करते दिख रहे हैं। वहीं, बिहार में यादव वोट बैंक की राजनीति लालू प्रसाद यादव ने की। उन्होंने बिहार के यादवों का एकमात्र नेता का तमगा अपने आप ले लिया। उनके बेटे तेजस्वी यादव भी उसी राजनीति को बढ़ाते दिख रहे हैं। अब तक सपा और राजद दोनों प्रदेश में माय मुस्लिम+यादव समीकरण के तहत चुनावी मैदान में उतर रहे थे। पिछले कुछ समय में अखिलेश यादव ने यूपी में पीडीए यानी पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक समीकरण को तैयार करने की कोशिश शुरू की है। तेजस्वी यादव भी पिता के माय समीकरण से आगे निकलकर सभी वर्गों का नेता बनने की कोशिश कर रहे हैं।

परंपरागत माय समीकरण को छोड़कर अन्य वर्गों को साधने की कोशिश में यादवों की राजनीति कुछ हद तक कम होने की आशंका इस वर्ग में जताई जाने लगी है। समाजवादी पार्टी और राजद की नई पॉलिटिक्स को देखते हुए अब तक यूपी- बिहार में यादवों के खिलाफ हमलावर रहने वाली भाजपा ने अब इस वर्ग को साधने की कोशिश शुरू कर दी है। यादवों को बस एक वोट बैंक बनकर रह जाने के कारण दूसरे दर्जे पर जाने वाली समस्या को गिनाया जा रहा है। ऐसे में यादवों को सत्ता पक्ष से जोड़कर एक वोट बैंक बन जाने के मिथक को तोड़ने की कोशिश की जा रही है।

बिहार की राजनीति में यादव वोट बैंक को अहम रहा है। बिहार की राजनीति के दो ध्रुव लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार अपने- अपने हिसाब से इस वर्ग को साधते रहे हैं। भाजपा भी इस राजनीति में जुटी रही है। यही वजह है कि बिहार का हर चौथा विधायक यादव समाज से आता है। यादवों की राजनीतिक ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह वर्ग 16 फीसदी वोट अपने पास रखते हैं। यादव वोट बैंक को राजद का कोर वोट बैंक माना जाता है। जेपी आंदोलन से निकले लालू प्रसाद यादव ने मंडल कमीशन के बाद बिहार के इस वर्ग में राजनीतिक ताकत का अहसास कराया। 1990 में वे बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे। उनकी पार्टी 2005 तक बिहार की राजनीति में सत्ता में रही। लालू के अलावा जितने भी नेता ने बिहार की राजनीति में यादव वोट बैंक की राजनीति को साधने की कोशिश की, उन्हें मात ही मिली।

यूपी में यादव वोट बैंक करीब 8 फीसदी है। प्रदेश के इटावा, एटा, फर्रुखाबाद, मैनपुरी, फिरोजाबाद, कन्नौज, बदायूं, आजमगढ़, फैजाबाद, बलिया, संतकबीर नगर, जौनपुर और कुशीनगर जिले को यादव बहुल क्षेत्र माना जाता है। इन जिलों की 50 से अधिक विधानसभा सीटों पर यादव वोटर अहम भूमिका में हैं। प्रदेश के 44 जिलों में 9 फीसदी वोटर यादव जाति के हैं। वहीं, 10 जिलों में यादव वोटर 15 फीसदी से अधिक हैं। पूर्वी यूपी और बृज क्षेत्र में यादव वोटर सियासत की दशा और दिशा तय करते हैं। यूपी में अभी यादव सियासत के सबसे बड़े चेहरे के तौर पर अखिलेश यादव हैं। वहीं, शिवपाल यादव, धर्मेंद्र यादव, रामगोपाल यादव, रमाकांत यादव जैसे चेहरे भी यहां से हैं। भाजपा ने अखिलेश के सामने दिनेश लाल यादव निरहुआ को चुनावी मैदान में उतार कर उन्हें इस वर्ग का नेता बनाने की कोशिश की है। ऐसे में देखना होगा कि यूपी की राजनीति में एमपी सीएम मोहन यादव किस प्रकार का असर छोड़ते हैं।

आखिर क्या है डॉ. कविता चौधरी के मर्डर की कहानी?

आज हम आपको डॉ. कविता चौधरी के मर्डर की कहानी बताने जा रहे हैं! 23 अक्टूबर, 2006 को मेरठ स्थित चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी की लेक्चरर अंशकालिक प्रवक्ता डॉ. कविता चौधरी बुलंदशहर स्थित अपने गांव से मेरठ के लिए निकलीं थी। घरवालों ने मेरठ पहुंचने की जानकारी के लिए 24 अक्टूबर को नंबर मिलाया, तो मोबाइल बंद मिला। दूसरे दिन तक फोन बंद रहने के साथ ही सविता से बात नहीं हो सकी। अनहोनी की आशंका पर 25 अक्टूबर को भाई सतीश मलिक ने यूनिवर्सिटी पहुंच जानकारी करने की कोशिश की, लेकिन कुछ पता नहीं चला। कविता के परिचितों से संपर्क करने पर भी कोई जानकारी नहीं मिली। आखिरकार, 27 अक्टूबर को मेरठ के सिविल लाइन थाने में अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करवाई गई। पहले तो पुलिस ने मामले को हल्के से लिया, लेकिन जब डॉ. कविता के अपहरण को लेकर मीडिया में खबरें आने लगी, तो पुलिस ने छानबीन शुरू की। मेरठ पुलिस डॉ. कविता चौधरी के इंदिरा आवास गर्ल्स हॉस्टल के कमरे में पहुंची। वहां मिले पत्र और नोट्स देख कर पुलिस वालों के चेहरों से हवाइयां उड़ने लगी। आनन-फानन में उच्चाधिकारियों को सूचना दी गई। अधिकारी मौके पर पहुंचे और वहां पत्रों और नोट्स को कब्जे में लिया। रिटायर्ड आईपीएस अफसर राजेश पांडेय बताते हैं कि पत्र और नोट्स के आधार पर पूरा मामला ‘सेक्स रैकेट, सत्ता और ब्लैकमेलिंग’ का लग रहा था। अधिकारियों ने कविता के मोबाइल की कॉल डिटेल निकलवाने के आदेश दिए। हॉस्टल के कमरे से मिले पत्रों में एक पत्र बार-बार पुलिस अधिकारियों में घूम रहा था। इसमें लिखा था कि ‘तत्कालीन मंत्री का करीबी रविंद्र प्रधान हत्या करना चाहता है और वो रविंद्र प्रधान के साथ जा रही है।’ इस पत्र के आधार पर पुलिस ने रविंद्र प्रधान की तलाश शुरू कर दी।

बुलंदशहर निवासी रविंद्र प्रधान यूपी के तत्कालीन बेसिक शिक्षा मंत्री किरण पाल सिंह का करीबी और दबंग था। कविता 2005 में उसके संपर्क में आई। दरअसल 2005 में गांव के एक विवाद में पुलिस ने कविता के भाई को जेल भेजा था। भाई को जेल से निकलवाने के लिए कविता पहली बार रविंद्र से मिलीं। रविंद्र पहली मुलाकात में ही कविता पर फिदा हो गया और उसके भाई को जेल से निकलवाने में मदद की। इसके बाद दोनों की नजदीकियां बढ़ती गईं। कविता के अपहरण के बाद पुलिस लगातार रविंद्र की तलाश में जुटी थी। आखिरकार, 24 दिसंबर 2006 को रविंद्र पुलिस के हत्थे चढ़ गया।

मेरठ के तत्कालीन एसएसपी नवनीत सिकेरा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में रविंद्र को पेश करते हुए बताया कि कविता की हत्या कबूल कर ली है। इस दौरान रविंद्र प्रधान ने जो खुलासे किए, उससे यूपी की तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार हिल गई। बताया कि कविता के संबंध रालोद नेता और दो सितंबर, 2006 को सिंचाई मंत्री पद से इस्तीफा देने वाले डॉ. मेराजुद्दीन समेत कई अन्य रसूखदारों से हैं। कविता चौधरी के उनसे शारीरिक संबंध थे और उसने अश्लील सीडी भी बना ली थी। इसके बाद अलीगढ़ निवासी योगेश के साथ मिलकर सबको ब्लैकमेल कर रही थी। रविंद्र ने पुलिस की मौजूदगी में मीडिया के सामने खुलासा किया था कि सीडी के जरिए पूर्व सिंचाई मंत्री डॉ. मेराजुद्दीन से 35 लाख रुपये वसूले थे। रविंद्र के मुताबिक कविता के पास चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी के पूर्व वीसी आरपी सिंह और ललित कला अकादमी के अध्यक्ष कुंवर बिजेंद्र सिंह की भी अश्लील सीडी थी।

रविंद्र ने बताया कि वसूली की रकम के बंटवारे को लेकर कविता से झगड़ा हो गया था। वसूली की रकम में वह बड़ा हिस्सा चाहती थी। इससे परेशान होकर उसने योगेश के साथ मिलकर कविता की हत्या का प्लान बनाया। इसके बाद दोनों 24 अक्टूबर को कविता को इंडिका कार से बुलंदशहर की तरफ ले गए। रास्ते में लाल कुआं में जूस पिया। उसने कविता के जूस में नशीली गोलियां मिला दी थीं। बेहोश होने पर दादरी से एक लुंगी खरीदकर कविता का गला घोंट दिया। कुछ दूर आगे चल कर लाश सनौटा पुल से नहर में फेंक दी। इसके बाद पुलिस ने नहर में तलाश करवाई, लेकिन कविता की लाश नहीं मिली।

हत्याकांड ने यूपी के सियासी हलकों में तूफान मचा दिया था। वजह, तत्कालीन सपा सरकार में बेसिक शिक्षा मंत्री किरण पाल, राष्ट्रीय लोकदल के आगरा से विधायक और खाद्य प्रसंस्करण मंत्री बाबूलाल और सिंचाई मंत्री रहे डॉ. मेराजुद्दीन का नाम जुड़ना था। तहकीकात में सामने आया कि कविता चार मोबाइल फोन इस्तेमाल करती थी। इसमें से एक उसके नाम और बाकी दूसरों के नाम से थे। यह भी खुलासा हुआ एक सितंबर से 23 अक्टूबर 2006 के बीच कविता और तत्कालीन मंत्री बाबूलाल के बीच 857 बार बातचीत हुई। इस दौरान कविता की 34 बार मंत्री किरण पाल से भी बातचीत हुई थी। इस खुलासे के बाद मंत्री बाबूलाल ने इस्तीफा दे दिया। हालांकि, उन्होंने दावा किया कि हत्याकांड से उनका कोई लेना देना नहीं है। हत्याकांड में नाम आने के बाद पूर्व मंत्री डॉ.मेराजुद्दीन ने रालोद से इस्तीफा दे दिया। उधर, खुलासा होने के बाद पुलिस ने रविंद्र के साथ योगेश, सुल्तान, रविंद्र कुमार और उसके भतीजे के साथ उक्त चार हाई प्रोफाइल लोगों को भी आरोपित बनाकर तहकीकात शुरू की।

मामले की सुनवाई के दौरान डासना जेल में बंद हत्याकांड के मुख्य आरोपित रविंद्र प्रधान की 30 जून, 2008 संदिग्ध हालात में मौत हो गई। विसरा रिपोर्ट में रविंद्र की मौत की वजह जहर बताया गया। रविंद्र प्रधान की मां बलबीरी देवी ने जेल में हत्या का आरोप लगाया। जबकि, कविता के भाई सतीश मलिक ने आरोप लगाते हुए कहा था कि पूर्व मंत्री किरण पाल और अन्य के इशारे पर ही कविता की हत्या हुई और इसी वजह से रविंद्र भी मारा गया। उधर, सुनवाई के बाद 23 सितंबर 2011 को गाजियाबाद में सीबीआई की विशेष अदालत ने योगेश, रविंद्र कुमार को उम्रकैद की सजा सुनाई। जबकि, सुल्तान को तीन साल की सजा मिली थी। कोर्ट ने रविंद्र के भतीजे अशोक कुमार को बरी कर दिया था।

आखिर क्या हुआ भविष्य के आईपीएल खिलाड़ी रॉबिन मिंज के साथ?

भविष्य के आईपीएल खिलाड़ी रॉबिन मिंज के साथ वर्तमान में एक घटना घटित हो गई है! 25 जुलाई 2022, ये वो तारीख है, जब आजाद हिंदुस्तान को द्रौपदी मुर्मू के रूप में उसकी पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति मिली। देश जश्न में डूब गया। हमारा लोकतंत्र और मजबूत हुआ। कुछ इसी तरह का उत्साह खेलप्रेमियों में दो साल बाद तब देखने को मिला जब रॉबिन मिंज आईपीएल के लिए चुने गए पहले आदिवासी क्रिकेटर बने। चंद महीने पहले हुए ऑक्शन में गुजरात टाइंटस ने इस अनजान खिलाड़ी के लिए अपनी तिजोरी खोल दी थी। तीन करोड़ 60 लाख की भारी-भरकम बोली लगाई गई। देश तब रॉबिन से अपरिचित था। कुछ ही देर बाद उनकी पूरी कुंडली सामने थी। 21 साल के रॉबिन मिंज देश के उसी आदिवासी बहुल राज्य झारखंड से आते हैं, जो पूर्व भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का घर है। अब चंद हफ्ते बाद आईपीएल की शुरुआत होने वाली है, लेकिन उससे ठीक पहले ‘झारखंड का क्रिस गेल’ एक रोड एक्सीडेंट में घायल हो गया, उनकी बाइक के परखच्चे उड़ गए। रॉबिन मिंज के पिता जेवियर फ्रांसिस भारतीय सेना से रिटायर होकर रांची एयरपोर्ट पर सिक्योरिटी का जिम्मा संभालते हैं। अपने नौजवान बेटे के एक्सीडेंट पर बताते हुए वह कहते हैं कि रॉबिन की हालत खतरे से बाहर है। उसे मामूली चोट आई है। डॉक्टर्स अपनी निगरानी में रखे हुए हैं। भले ही रॉबिन मिंज या उनके परिवार के लिए ये हादसा घबराने की बात न हो, लेकिन संभलने की जरूर हो। क्रिकेट वर्ल्ड ने समय से पहले कई देसी-विदेशी क्रिकेटर्स को दौलत-शोहरत पाकर रास्ते से भटकते देखा है। आईपीएल के पैसे जान पर खेलने का परमिट तो कतई नहीं देते। हवा से बात करती सुपर बाइक से अनियंत्रित होकर गिरे रॉबिन मिंज को गंभीर चोट भी लग सकती थी। वह ऐसे जानलेवा शौक से खुद को दूर भी रख सकते हैं। ऋषभ पंत का सजीव उदाहरण भी सामने है।

आईपील ऑक्शन से कुछ हफ्ते पहले जब रॉबिन के पिता फ्रांसिस जेवियर मिंज रांची एयरपोर्ट पर एमएस धोनी से मिले, तो माही ने उनसे कहा था, ‘अगर कोई उसे नहीं लेता है, तो हम लेंगे।’ चेन्नई सुपरकिंग्स ने पहली बोली भी लगाई, लेकिन बाजी गुजरात टाइटंस मार ले गई। बेटे को मिली बेशुमार दौलत से गदगद माता-पिता फूट-फूटकर रोने लगे। उन रिश्तेदारों का भी बधाई देने फोन आने लगा, जिन्होंने लगभग संबंध खत्म ही कर दिए थे। सेना से छुट्टी पर घर लौटे फ्रांसिस ने जब अपने दो साल के बेटे रॉबिन को बेंत से कंकड़ मारने की कोशिश करते देखा तो उन्होंने फौरन लकड़ी के एक टुकड़े से एक बल्ला बनाया और बाजार से गेंद खरीदी। बस यही से रॉबिन के क्रिकेट करियर की शुरुआत हो गई थी।फ्रांसिस के रांची ट्रांसफर होने के कुछ समय बाद ही, उनका परिवार शहर से 15 किलोमीटर दूर नामकुम में रहने लगा। इधर रॉबिन के स्कूल में क्रिकेट एक्टिविटी काफी बढ़ गई थी। यह परिवाार के लिए आसान नहीं था। रॉबिन की दो बहनें थीं और फ्रांसिस के लिए अपने तीनों बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना बेहद मुश्किल हो रहे था। बेटे के लिए महंगे क्रिकेट उपकरण खरीदना तो दूर की बात थी। कभी-कभी उन्हें पैसे उधार लेने पड़ते थे। कई बार, परिवार की किसी जरूरी चीज को कुर्बान करना पड़ता था। रॉबिन के क्रिकेट के लिए फ्रांसिस जो कुछ भी कर सकते थे, किया।

रॉबिन की मां ने एक इंटरव्यू में बताया था कि, ‘जब हम पहली बार रॉबिन के लिए बल्ला और दूसरे सामान खरीदने स्पोर्ट्स स्टोर गए तो हमने सोचा कि 2000 रुपये में सब कुछ मिल जाएगा, लेकिन अकेले बल्ले की कीमत 5000 रुपये थी! हमें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। दुकानदार भी हमें शक की नजर से देख रहा था कि हम पैसे दे पाएंगे या नहीं। लेकिन हमने मैनेज किया, हमें कुछ पैसे उधार लेने पड़े, लेकिन हमने मैनेज किया। क्रिकेट वर्ल्ड ने समय से पहले कई देसी-विदेशी क्रिकेटर्स को दौलत-शोहरत पाकर रास्ते से भटकते देखा है। आईपीएल के पैसे जान पर खेलने का परमिट तो कतई नहीं देते। हवा से बात करती सुपर बाइक से अनियंत्रित होकर गिरे रॉबिन मिंज को गंभीर चोट भी लग सकती थी। वह ऐसे जानलेवा शौक से खुद को दूर भी रख सकते हैं। ऋषभ पंत का सजीव उदाहरण भी सामने है।रॉबिन ज्यादा बातचीत नहीं करते। एक बार स्कूल प्रिंसिपल ने उनके माता-पिता को बुलाकर कहा था कि ‘अपने बेटे को बात करना सिखाओ’, क्योंकि वह बहुत शांत था। बड़े होकर भी रॉबिन नहीं बदले, लेकिन उनका बल्ला बहुत जोर से बोलता है। स्थानीय क्रिकेट सर्कल में उन्हें ‘झारखंड का क्रिस गेल’ या ‘अगला धोनी’ कहते हैं।

सांसदों के घूस लेने के बारे में क्या बोला सुप्रीम कोर्ट ?

हाल ही में सांसदों के घूस लेने के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने एक बयान दिया है! सुप्रीम कोर्ट ने वोट के बदले नोट मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने इस संबंध में 5 जजों की संविधान पीठ के 1998 वाले फैसले को पलट दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह इस संबंध में सांसदों को राहत देने पर सहमत नहीं है। शीर्ष अदालत ने कानून के संरक्षण में सांसदों को छूट देने से इनकार किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी को घूस की छूट नहीं दी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली सात जजों की संवैधानिक बेंच इस मामले में सुनवाई की। पीठ ने कहा कि वोट के लिए नोट लेने वालों पर केस चलना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच ने सोमवार को 1998 के फैसले को खारिज कर दिया। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने इस मामले में सुनवाई के बाद पांच अक्टूबर 2023 को फैसला सुरक्षित रख लिया था। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एम एम सुंदरेश, जस्टिस जेबी पारदीवाला, जस्टिस मनोज मिश्रा, जस्टिस एएस बोपन्ना, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस पीवी संजय कुमार की पीठ ने सुनाया फैसला। पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 105 या 194 के तहत रिश्वतखोरी को छूट नहीं दी गई है क्योंकि रिश्वतखोरी में लिप्त सदस्य एक आपराधिक कृत्य में लिप्त होता है। पीठ ने कहा कि हम पीवी नरसिम्हा मामले में फैसले से असहमत हैं। पीवी नरसिम्हा मामले में फैसले, जो विधायक को वोट देने या भाषण देने के लिए कथित तौर पर रिश्वत लेने से छूट प्रदान करता है, के व्यापक प्रभाव हैं और इसे खारिज कर दिया है। पीठ ने कहा कि विधायकों द्वारा भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी भारतीय संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को नष्ट कर देती है।

सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच ने उस मामले में फैसला सुनाया जिसमें सांसदों और विधायकों को सदन में वोट व भाषण के बदले नोट के मामले में केस से छूट है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह इस मुद्दे को डील करेंगे कि क्या सांसदों को मिली छूट तब भी जारी रहेगी जब मामला आपराधिक हो? सुप्रीम कोर्ट ने 1998 में दिए अपने फैसले में कहा था कि एमपी और एमएलए को सदन में वोट और बयान के बदले कैश के मामले में मुकदमा चलाने से छूट है। सुप्रीम कोर्ट ने 1998 में दिए अपने फैसले में कहा था कि एमपी और एमएलए को सदन में वोट और बयान के बदले कैश के मामले में मुकदमा चलाने से छूट थी। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि 1998 का फैसला सांसदों और विधायकों को वोट के बदले नोट और बयान के बदले नोट के मामले में इम्युनिटी प्रदान करता था। लेकिन इसका पब्लिक लाइफ, संसदीय लोकतंत्र और लोकहित पर व्यापक प्रभाव पड़ रहा था। उक्त फैसले पर दोबारा विचार न किया जाना गंभीर खतरे की ओर ले जा रहा था।

सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच ने 1998 के मामले में दिए गए फैसले पर दोबारा विचार किया और फिर फैसला दिया है। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने 2019 में इस मामले को पांच जज को रेफर किया था और कहा था कि यह मामला सार्वजनिक महत्ता और व्यापक प्रभाव का है। इसके बाद मामले को सात जजों की बेंच को रेफर किया गया था। सीता सोरेन की अर्जी पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा 1998 के फैसले पर विचार करने का फैसला किया था।

सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच ने कहा था कि वह इस मुद्दे को डील करेंगे कि सांसदों व विधायकों को मिली छूट तब भी जारी रहेगी जब मामला आपराधिक हो? हम पीवी नरसिम्हा मामले में फैसले से असहमत हैं। पीवी नरसिम्हा मामले में फैसले, जो विधायक को वोट देने या भाषण देने के लिए कथित तौर पर रिश्वत लेने से छूट प्रदान करता है, के व्यापक प्रभाव हैं और इसे खारिज कर दिया है। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने इस मामले में सुनवाई के बाद पांच अक्टूबर 2023 को फैसला सुरक्षित रख लिया था। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एम एम सुंदरेश, जस्टिस जेबी पारदीवाला, जस्टिस मनोज मिश्रा, जस्टिस एएस बोपन्ना, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस पीवी संजय कुमार की पीठ ने सुनाया फैसला।पीठ ने कहा कि विधायकों द्वारा भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी भारतीय संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को नष्ट कर देती है।सांसदों और विधायकों को सदन में भाषण व वोट के बदले नोट के मामले में मुकदमा चलाने से मिली छूट के मामले को दोबारा सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की बेंच ने परीक्षण किया।

क्या राजनीति में आयेंगे कोलकाता के जस्टिस अभिजीत गांगुली?

आज हम आपको बताएंगे कि क्या कोलकाता के जस्टिस अभिजीत गांगुली राजनीति में आएंगे या नहीं! कोलकाता हाई कोर्ट के जज जस्टिस अभिजीत गांगुली ने अपनी न्यायपालिका की नौकरी को अलविदा कह दिया है। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में कुछ भी ठीक नहीं है। उनका दावा है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस के शासन में प. बंगाल अव्यवस्था और अराजकता के भयंकर दौर से गुजर रहा है। हालात ये हो गए हैं कि जज सरकार से संबंधित मामलों की सुनवाई की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं और जो सुनवाई की प्रक्रिया का हिस्सा बनकर फैसले देते हैं उनके खिलाफ सरकार प्रायोजित हमले होते हैं। जस्टिस गांगुली का कहना है कि टीएमसी नेता टीवी चैनलों पर जाकर उन्हें चुनौते दे रहे थे कि हिम्मत है तो चुनाव अखाड़े में आ जाएं तो उनकी चुनौती स्वीकार है। जस्टिस गांगुली ने ऐलान किया है कि वो राजनीतिक का रुख कर रहे हैं और किसी पार्टी ने उन्हें लोकसभा चुनाव का टिकट दिया तो वौ शौक से अपनी किस्मत आजमाएंगे। जस्टिस गांगुली के राजनीति में आने के फैसले पर सवाल उठने लगे हैं और दावा किया जा रहा है कि आज के दौर में न्यायपालिका का भी राजनीतिकरण हो गया है। तो क्या कोलकाता हाई कोर्ट के जज जस्टिस अभिजीत गांगुली के राजनीति में आने से न्यायपालिका की विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाएगी? इससे भी बड़ा सवाल है कि क्या अभिजीत गांगुली पहले जज हैं जिन्होंने राजनीति का रुख किया है? वह तारीख 5 सितंबर, 2013 थी जब राज्यसभा में विपक्ष के तत्कालीन नेता अरुण जेटली ने जजों के राजनीति में आने को लेकर ऐसी बातें कही थीं जिनकी नजीर आज भी दी जाती है। उन्होंने कहा था कि जज जो फैसले देते हैं, वो उनकी रिटायरमेंट के बाद नौकरियां पाने की इच्छा के कारण प्रभावित होते हैं। यह न्यायपालिका के स्वतंत्रता के लिए खतरा है। जेटली ने तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार की तरफ से जजों की रिटायरमेंट की उम्र सीमा बढ़ाने के प्रस्ताव पर चर्चा में भाग लिया था। उन्होंने राज्यसभा में कहा था, ‘मुझे लगता है कि अब हम रिटायरमेंट के बाद जजों को नौकरी देने के मामले में थोड़ा ज्यादा ही आगे चल गए हैं।’ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देकर जबर्दस्त तंज कसा था। उन्होंने कहा कि एक तो सरकारें रिटायर्ड जजों को नौकरी देने का भरपूर प्रयास करती है और अगर सरकारें नहीं करें तो वो खुद अपने लिए व्यवस्था कर लेते हैं। इसीलिए, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि केंद्रीय सूचना आयोग के सारे सदस्य रिटायर्ड जज ही होंगे।

अरुण जेटली कानून के जानकार थे और केंद्रीय कानून मंत्री रह चुके थे। उनके राज्यसभा में दिए इस बयान से स्पष्ट है कि कम-से-कम रिटायरमेंट के बाद तो जजों को अलग-अलग पद ऑफर करने की लंबी परंपरा रही है। जहां तक बात जजों के राजनीति में आने की है तो ऐसे राज्यपालों की लिस्ट अच्छी-खासी है जो पूर्व में जज रह चुके हैं। देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस रंजन गोगोई रिटायर हुए तो मौजूदा सरकार ने उन्हें सीधे राज्यसभा के लिए नॉमिनेट कर दिया। इतिहास में न्यायपालिका और राजनीति के बीच सांठगांठ का सिलसिला देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की सरकार के दौर से ही शुरू हो गया था। इतिहास में ऐसे वाकये भरे पड़े हैं। आइए एक नजर डालते हैं, नेहरू सरकार ने जस्टिस फजल अली के सुप्रीम कोर्ट के जज रहते हुए ही राज्यपाल के रूप में नियुक्ती की घोषणा कर दी थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू के कहने पर जस्टिस फजल अली ने 30 मई, 1952 को जज का पद त्याग दिया और सिर्फ आठ दिन के अंदर 7 जून, 1952 को उड़ीसा के राज्यपाल बन गए।

नेहरू सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एमसी चागला को पहले अमेरिका में राजदूत बनाया, फिर यूके का उच्चायुक्त। उसके बाद नेहरू सरकार में वो पहले शिक्षा मंत्री और फिर विदेश मंत्री बनाए गए। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश कोका सुब्बा राव ने 1967 में राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष का उम्मीदवार बनने के लिए पद छोड़ दिया। उन्होंने जज पद से इस्तीफा देने के तीन महीने बाद हुए राष्ट्रपति चुनाव में सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार जाकिर हुसैन के खिलाफ ताल ठोंकी थी।अप्रैल, 1962 से 10 साल तक कांग्रेस के राज्यसभा सांसद रहे थे। फिर उन्हें इंदिरा गांधी सरकार ने दिसंबर, 1980 में सुप्रीम कोर्ट जज नियुक्त कर दिया। फिर उनके रिटायरमेंट में छह सप्ताह बाकी ही थे कि उन्हें इस्तीफा दिलवा दिया गया और असम चुनाव में बतौर कांग्रेस प्रत्याशी उतार दिया गया। इस्लाम ने 13 जनवरी, 1983 को सुप्रीम कोर्ट जज पद से इस्तीफा दे दिया और अगले ही दिन कांग्रेस ने असम के बारपेटा लोकसभा सीट से उन्हें अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। मजे की बात है कि रिटायरमेंट के चार सप्ताह पहले ही उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा को धोखाधड़ी और आपराधिक दुराचार के आरोपों से मुक्त किया था। शिवनंदन पासवान बनाम स्टेट ऑफ बिहार का वह मामला काफी चर्चित रहा। जस्टिस बहारुल इस्लाम से पहले जस्टिस एस हेगड़े भी राज्यसभा सदस्य हुआ करते थे। उन्होंने 1957 में मैसूर हाई कोर्ट का जज बनने के लिए राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया था। जस्टिस मोहम्मद हिदायतुल्ला 1970 में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पद से रिटायर हुए थे। बाद में वो देश के उप-राष्ट्रपति चुने गए।

बहरहाल, उपर के उदाहरणों से कम-से-कम यह तो कहा ही जा सकता है कि जजों और राजनीति में लाने और यहां तक कि राजनीति से न्यायपालिका में भेजे जाने की पुरानी परंपरा रही है। जस्टिस अभिजीत गांगुली ने अगर रिटायरमेंट ने राजनीति में जाने के लिए पद छोड़ने की घोषणा की तो पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने जस्टिस फजल अली को पद पर रहते हुए ही राज्यपाल नियुक्त कर दिया था। इसलिए जहां तक बात जस्टिस गांगुली के जज पद त्यागकर राजनीति में जाने से न्यायपालिका की विश्वसनीयता घटने का सवाल है तो इसका जवाब आप खुद ढूंढ सकते हैं। हैरानी की बात है कि जब कोई व्यक्ति जज पद पर होते हैं तो उनके पास नेताओं को अदालत में अपने सामने खड़े करने की शक्ति होती है लेकिन राजनीति में जाकर वो खुद उन्हीं नेताओं के मातहत हो जाते हैं। अगर कोई अपनी हैसियत में गिरावट स्वीकार करने को तैयार होता है तो निश्चित रूप से उसके बदले उसे बहुत कुछ हासिल होता होगा। विकसित देशों के मुकाबले भारत में जजों के वेतन-भत्ते और सुविधाएं बहुत कम हैं। इस कारण जज अपने पद पर होते ही रिटायरमेंट के बाद का भविष्य संजोने में जुट जाते हैं। कुछ का राजनीतिक दलों से सांठगांठ हो जाता है और जो कुछ ऐसा नहीं करना चाहते या चाहकर भी सफल नहीं होते, वो उद्योग जगत में बड़े-बड़े पद पाते हैं। कॉर्पोरेट वर्ल्ड में पूर्व जजों की बड़ी पूछ होती है और वो मोटी तनख्वाह पर कंपनियों को अपनी सेवा देते हैं।

क्या पीएम मोदी के ऊपर परिवार का हमला करके गलत कर बैठे लालू?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पीएम मोदी के ऊपर परिवार का हमला करके लालू यादव ने गलती की है या नहीं! आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव अपने अनोखे अंदाज और बयान के लिए मशहूर रहे हैं। लोगों को रिझाने वाले लटके-झटके तो पहले उनकी साधारण बोलचाल में भी शामिल रहते थे। लंबे समय तक जेल में रहने और स्वास्थ्य बाधा के कारण वे थोड़ा कमजोर पड़े हैं, लेकिन अंदाज वही पुराना है। आरजेडी की जन विश्वास महारैली में लालू प्रसाद यादव ने लागल-लागल झुलनिया के धक्का, बलम कलकत्ता निकल गए सुनाया तो लोग वाह-वाह कर उठे। रैली में शामिल होने आए लोगों का मनोरंजन करने के लिए विधायक आवासों में नर्तक-नर्तकियों का इंतजाम तो था ही। लालू ने नरेंद्र मोदी को मां के निधन पर सिर नहीं मुड़ाने की बात कह उनके हिन्दू न होने का नरेटिव भी दे दिया। देश भर में यह चर्चा का विषय बन गया है। लालू ने यह भी कह दिया कि नरेंद्र मोदी का तो कोई परिवार ही नहीं है। उनके इस बयान को बीजेपी ने भुना लिया है।लालू के इस नरेटिव को नरेंद्र मोदी ने ठीक उसी अंदाज में भुना लिया, जैसा राहुल गांधी के ‘चौकीदार चोर है’ नारे को भुना लिया था। मोदी ने कहा कि लालू ने मेरे परिवार को लेकर मुझ पर निशाना साधा है। पर, अब पूरा देश बोल रहा है- मैं हूं मोदी का परिवार। पीएम मोदी के नारे के बाद तो भाजपा के बड़े नेताओं ने अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल में बदलाव करते हुए लिखा- ‘मोदी का परिवार।’ अमित शाह, जेपी नड्डा, नितिन गडकरी जैसे बड़े नेताओं ने सोशल मीडिया के अपने प्रोफाइल में ‘मोदी का परिवार’ लिख कर अपना परिचय संशोधित कर लिया है। भाजपा ने लालू के बयान को भुनाने का अभियान छेड़ दिया है।

लालू यादव ने जन विश्वास रैली में भाषण करते हुए दो तरह की टिप्पणी की थी। पहली यह कि नरेंद्र मोदी हिन्दू नहीं हैं। अपनी मां के निधन पर उन्होंने मुंडन नहीं कराया। ऐसा कहते समय लालू भूल गए कि भौगिलक सीमा बदलते ही हिन्दुओं की कई परंपराएं बदलती रही हैं। बिहार और यूपी जैसे इलाके में परिजन के निधन पर सिर मुंड़ाने की परंपरा है, लेकिन गुजरात में यह परंपरा नहीं है। दक्षिण भारत में भांजी के साथ मामा के ब्याह को शुभ माना जाता है, पर हिन्दी पट्टी में ननिहाल के कुल-गोत्र तक का ख्याल रखा जाता है। लालू ने दूसरी बात यह कही- ‘मोदी क्या है ? मोदी कोई चीज नहीं है। मोदी के पास तो परिवार ही नहीं है। अरे भाई तुम बताओ न कि तुम्हारे परिवार में कोई संतान क्यों नहीं हुआ। ज्यादा संतान होने वाले लोगों को बोलता है कि परिवारवाद है।’ लालू के पहले बयान पर तो भाजपा नेताओं ने न कोई सफाई दी और न इस पर प्रतिक्रिया देना ही उचित समझा। पर, परिवार वाले बयान पर भाजपा नेताओं ने मोर्चा खोल दिया है।

अब से पांच साल पहले राहुल गांधी ने भी नरेंद्र मोदी के बारे में ‘चौकीदार चोर है’ कह कर नरेटिव गढ़ने की कोशिश की थी। उसके बाद मोदी ने उसे अपने पक्ष में कैसे भुना लिया, यह किसी से छिपा नहीं है। सोशल मीडिया पर ‘मैं भी चौकीदार’ का कैंपेन लोगों ने जबरदस्त ढंग से चलाया था। तब कांग्रेस लोकसभा में दहाई अंकों में सिमट गई थी। लालू के इस बयान का कितना असर होगा, यह तो समय बताएगा, लेकिन मोदी ने इसे अपने पक्ष में भुनाने का अभियान चला कर गोलबंदी का मंच तो खड़ा कर ही दिया है।

लालू ने नरेंद्र मोदी के खिलाफ बयान देकर 2015 जैसे परिणाम की उम्मीद लोकसभा चुनाव में कर रहे हैं। अगर सच में वे ऐसा सोचते होंगे तो यह उनकी भूल साबित होगी। इसलिए कि यह विधानसभा का चुनाव नहीं है। लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नाम पर भाजपा या एनडीए को वोट मिलते हैं। लालू ने 2014 और 2019 में यह देखा है। ज्यादा संतान होने वाले लोगों को बोलता है कि परिवारवाद है।’ लालू के पहले बयान पर तो भाजपा नेताओं ने न कोई सफाई दी और न इस पर प्रतिक्रिया देना ही उचित समझा। पर, परिवार वाले बयान पर भाजपा नेताओं ने मोर्चा खोल दिया है।2015 के विधानसभा चुनाव में लालू ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण संबंधी बयान को लेकर भ्रम फैला दिया और महागठबंधन की सरकार बन गई थी। नीतीश तब महागठबंधन के साथ नहीं होते तो यह बयान भी शायद कारगर नहीं हो पाता। अगर 2015 जैसा नरेटिव सोच कर लालू ने मोदी के बारे में अपनी बातें कही हैं तो यह उनकी भूल है।

आखिर कैसी चल रही है बड़े मियां छोटे मियां फिल्म की शूटिंग?

आज हम आपके बड़े मियां छोटे मियां फिल्म की शूटिंग के बारे में कुछ जानकारी देने वाले हैं! बॉलिवुड के खिलाड़ी अक्षय कुमार और युवा पीढ़ी के ऐक्शन स्टार टाइगर श्रॉफ इन दिनों अपनी आने वाली फिल्म ‘बड़े मियां छोटे मियां’ को लेकर चर्चा में हैं। फिल्म के दो गाने टाइटल ट्रैक और डांस नंबर ‘मस्त मलंग झूम’ जारी हो चुका है, जिसमें अक्षय और टाइगर ताल से ताल मिलाते नजर आ रहे हैं। खास बात ये है कि इन गानों को आकर्षक अंदाज देने के लिए अरबी देश जॉर्डन के अलग-अलग शहरों में फिल्माया गया है। जानकारी के मुताबिक, अली अब्बास जफर निर्देशित इस फिल्म के चारों गाने जॉर्डन में फिल्माए गए हैं। इनमें टाइटल ट्रैक अबू धाबी के अलावा जॉर्डन के जेराश शहर में शूट हुआ है। जबकि बाकी गाने अम्मान, अकाबा, वादी रम जैसे शहरों में जनवरी के महीने में शूट हुए। इस दौरान वहां का तापमान दो से तीन डिग्री था। इसके बावजूद अपने ऐक्शन और डांस के लिए मशहूर टाइगर श्रॉफ और अक्षय कुमार ने कोरियोग्राफर जोड़ी बॉस्को-मार्टिस के निर्देशन में ठुमके लगाते दिख रहे हैं। प्रॉडक्शन से जुड़े लोगों ने बताया कि इन गानों की शूटिंग के लिए भारत से समेत 250 लोगों की टीम, जिसमें 100 से ज्यादा डांसर थे, जॉर्डन गई थी। इन गानों का कुछ हिस्सा अम्मान के प्रतिष्ठित रोमन थिएटर में भी फिल्माया गया है। यहां पहली बार कोई शूटिंग हुई, जो वहां के स्थानीय लोगों के लिए भी एक नया अनुभव था। असल में जॉर्डन की राजधानी अम्मान में स्थित यह ओपन थिएटर रोमन काल का बना हुआ है, जहां 6 हजार लोगों के बैठने के लिए सीटें हैं। हालांकि, जॉर्डन में फिल्म निर्माण सीमित होने के चलते वहां लोकल फिल्मों की शूटिंग ना के बराबर होती है, मगर अब वहां का रॉयल फिल्म कमीशन न केवल लोकल कॉन्टेंट क्रिएशन पर जोर दे रहा है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मेकर्स को लुभाने की भी पूरी कोशिश कर रहा है। जॉर्डन सरकार ने अपनी फिल्म इंडस्ट्री ओलिववुड भी स्थापित की है। ऑलिववुड फिल्म स्टूडियो के चेयरमैन रजा गरगौर कहते हैं, ‘बेशक हमारे देश में अभी ज्यादा फिल्में नहीं बन रही हैं, लेकिन हमारे पास इससे जुड़े इक्विपमेंट और प्रशिक्षित तकनीशियन की कोई कमी नहीं है, जिससे यहां शूटिंग करने वालों को सहूलियत होती है।’

हाल के दिनों में हॉलिवुड और बॉलिवुड फिल्ममेकर्स को जॉर्डन शूटिंग के लिए काफी पसंद आ रहा है। इसकी एक बड़ी वजह वहां जंगल से लेकर ऊंची-ऊंची पहाड़ियों और समंदर (रेड सी और डेड सी) से लेकर दूर तक फैले रेगिस्तान तक की विविधतापूर्ण लोकेशन का आस-पास होना है।ऑस्कर विनर हॉलिवुड फिल्म ड्यून, अलादीन, स्टार वार्स, मिशन टू मार्स, जॉन विक जैसी चर्चित फिल्में जॉर्डन में शूट की गई हैं। वहीं, भारतीय फिल्मों की बात करें तो बड़े मियां छोटे मियां के अलावा, साउथ के स्टार पृथ्वीराज सुकुमारन की पिछली फिल्म द गोट लाइफ की शूटिंग भी जॉर्डन में हुई थी। इसके अलावा, ओटीटी की कुछ वेब सीरीज में भी इस देश के नजारे दिखाई देंगे। जॉर्डन रॉयल फिल्म कमीशन के मैनेजिंग डायरेक्टर मोहम्मद अल बाकरी कहते हैं, ‘जॉर्डन की इतनी विविधता वाले लोकेशन हैं, एक तरफ अफ्रीका जैसे दिखने वाले रेगिस्तान तो दूसरी तरफ दूर तक फैले जंगल, फिर यहां एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के लिए फ्लाइट की जरूरत नहीं है। आप कुछ घंटों में एक लोकेशन से दूसरी लोकेशन तक पहुंच सकते हैं। साथ ही यहां हेलिकॉप्टर से लेकर मिलिट्री टैंक और हर तरह के हथियार किराए पर मिल जाते हैं। इसके लिए हमारी मिलिट्री हमें सपोर्ट करती है। वहीं, जॉर्डन की ओर फिल्ममेकर्स की बढ़ती रुचि की एक और वजह यहां मिलने वाली सब्सिडी भी है। यहां शूटिंग करने वाले मेकर्स को टैक्स पर 10 पर्सेंट छूट दी जाती है। साथ ही 16 पर्सेंट वैट भी तुरंत माफ किया जाता है। इसके अलावा, शूटिंग की लागत के हिसाब से कैशबैक की सहूलियत भी है। मेकर्स की सहूलियत के लिए वन विंडो क्लीयरेंस की सुविधा भी है। इन वजहों से हाल के दिनों में हॉलिवुड और बॉलिवुड की फिल्मों और सीरीज की शूटिंग यहां बढ़ी है।’

ऑस्कर विनर हॉलिवुड फिल्म ड्यून, अलादीन, स्टार वार्स, मिशन टू मार्स, जॉन विक जैसी चर्चित फिल्में जॉर्डन में शूट की गई हैं। वहीं, भारतीय फिल्मों की बात करें तो बड़े मियां छोटे मियां के अलावा, साउथ के स्टार पृथ्वीराज सुकुमारन की पिछली फिल्म द गोट लाइफ की शूटिंग भी जॉर्डन में हुई थी। इसके अलावा, ओटीटी की कुछ वेब सीरीज में भी इस देश के नजारे दिखाई देंगे।

क्या एमएसपी जरूरी है या गैर जरूरी है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या एमएसपी जरूरी है या गैर जरूरी! MSP का मतलब न्यूनतम समर्थन मूल्य है। यह किसानों के हित के लिए सरकार की ओर से बनाई गई व्यवस्था है। इसके तहत सरकार फसल की एक न्यूनतम कीमत तय करती है। अगर बाज़ार में फसलों के दाम कम भी हो जाएं, तो किसान आश्वस्त रहता है कि उसकी फसल सरकार कम से कम इस कीमत पर ज़रूर खरीद लेगी। कुल मिलाकर MSP कृषि उत्पादन को सुरक्षित करने और किसानों के जीवन को सुधारने के लिए कृषि व्यवस्था का एक अहम हिस्सा है। बात 1930 के दशक की है। उस दौरान अमेरिका में मंदी के हालात थे। उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डेलानो रूज़वेल्ट ने किसानों को सहारा देने के लिए प्राइस सपोर्ट पॉलिसी बनाई। उस समय पूरी अर्थव्यवस्था को मंदी की स्थिति से बाहर लाने के लिए जो नीति बनी थी, उसका नाम था न्यू डील पॉलिसी और प्राइस सपोर्ट पॉलिसी उसका ही एक हिस्सा था। प्राइस सपोर्ट पॉलिसी की अमेरिका को उस दौर में मंदी से उबारने में बड़ी भूमिका रही। उसके बाद दुनिया के कई विकसित और विकासशील देशों ने इसे अपनाया है। चीन में यह काफी कारगर भी साबित हुई।

भारत जब आज़ाद हुआ तो खाद्यान्न का संकट भी उतना ही बड़ा था, जितना बड़ा संकट बंटवारे के बाद जनसंख्या के अदल-बदल का। उस दौर में 1951 से लेकर 1965 तक भारत अमेरिका से खाद्यान्न के आयात पर निर्भर रहा। 1965 में जब भारत-पाकिस्तान का युद्ध हुआ तो अमेरिका पाकिस्तान के साथ खड़ा था और भारत के संबंध रूस के साथ थे। यह बात अमेरिका को नागवार गुज़री और नाराज़गी में उसने भारत को राशन की सप्लाई बंद कर दी। उस दौरान खाद्यान्न का भयंकर संकट आया, जिसे देश में 1965 का अकाल कहा जाता है। संयोग से उस साल मॉनसून ने भी भारत का साथ नहीं दिया। उसी दौर में बाबा नार्गाजुन ने कविता लिखी थी कि ‘कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास’….। स्थिति ऐसी बनी कि खाद्य सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बन गया। तब तक जापान और फिलिपींस आदि देशों से धान-गेहूं के फसल की बोनी किस्में आ चुकी थीं। इसी स्थिति में भारत में पहली बार MSP का कांसेप्ट साल 1965-1966 में सामने आया। उस समय इसका मकसद उत्पादन बढ़ाना और उसका भंडारण कर जन वितरण प्रणाली के तहत गरीबों तक राशन पहुंचाना था। इसी दौरान FCI भारतीय खाद्य निगम भी बना और यही हरित क्रांति का भी दौर कहा जाता है। हरित क्रांति के लिए हाल ही में भारत सरकार ने एम.एस.स्वामीनाथन को भारत रत्न से सम्मानित किया गया है।

फिलहाल सरकार 23 फसलों के लिए MSP तय करती है। इनमें अनाज और दलहन शामिल हैं। लेकिन MSP पर कानून नहीं होने की वजह से यह पूरे देश में सही ढंग से लागू नहीं हो पाता है। सरकार रवि और खरीफ की फसलों की बुआई से पहले, जिन फसलों पर MSP दी जानी है, उसकी पूरी लिस्ट जारी करती है। पहली लिस्ट जून-जुलाई और दूसरी लिस्ट नवम्बर दिसम्बर में जारी की जाती है। केंद्र सरकार फसलों पर MSP लागू करती है और राज्य सरकारों के पास भी MSP लागू करने का अधिकार है। केंद्र सरकार ने किसानों की फसलों को सही कीमत दिए जाने के लिए साल 1965 में कृषि लागत और मूल्य आयोग यानी CACP का गठन किया था। यह हर साल रबी और खरीफ फसलों के लिए MSP तय करती है। पहली बार 1966-67 में MSP की दर लागू की गई थी। CACP की ओर से की जाने वाली सिफारिशों के आधार पर ही सरकार हर साल 23 फसलों के लिए MSP का ऐलान करती है। हालांकि CACP को कृषि मंत्रालय का ही एक हिस्सा माना जाता है। केंद्र और राज्य सरकार ही सरकारें फसल की जब भी खरीद करती हैं तो उन्हें MSP देना ही पड़ता है।

जब पहली बार MSP का कांसेप्ट आया था तो उस दौरान सिर्फ धान और गेहूं ही MSP के दायरे में आते थे। बाद में गन्ना और कपास पर भी MSP में शामिल किया गया। 1986 में जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और विश्वनाथ प्रताप सिंह वित्त मंत्री थे तो उस दौरान 22 फसलों पर MSP की घोषणा की गई थी। उस नीति का नाम था ‘दीर्घकालीन कृषि मूल्य नीति’। लेकिन गेहूं, धान, कपास और गन्ना पर किसानों को MSP कुछ राज्यों में ही मिलता रहा है। पंजाब और हरियाणा में ही MSP प्रभावी ढंग से लागू हो पाया। लेकिन MSP के आने के बाद से ही इसे प्रभावी ढंग से लागू करने की मांग उठती रही।

क्या है स्वामी स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश? जिसे लोग आज स्वामीनाथन आयोग के नाम से जानते हैं, उसका नाम है राष्ट्रीय किसान आयोग। इसके पहले अध्यक्ष थे BJP सरकार के पूर्व कृषि राज्य मंत्री सोमपाल शास्त्री। लेकिन 2004 में जब BJP लोकसभा का चुनाव हार गई तो जून में इसका पुनर्गठन किया गया और इसके अध्यक्ष बने एम. एस. स्वामीनाथन। इस आयोग ने सैकड़ों सिफारिशें की, जिसमें दो ही अहम सिफारिशें थीं। पहला था किसानों को अल्पकालीन लोन दिया जाना और दूसरा संपूर्ण लागत जिसमें किसानों की फैमिली लेबर और ज़मीन का किराया भी शामिल है से 50 फीसदी ज़्यादा MSP तय की जाए। इसके बाद से ही किसान स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार MSP दिए जाने की मांग करने लगे! यह जानना बहुत ज़रूरी है कि अगर MSP है तो किसान मांग किस चीज़ की कर रहे हैं क्योंकि MSP तो कोई नई चीज़ है नहीं। फिलहाल MSP कृषि मंत्रालय की एक व्यवस्था है, किसान इसकी लीगल गारंटी मांग रहे हैं। इसके तहत MSP एक कानून बन जाए। जैसे भारत में मनरेगा कानून है लेकिन MSP कानून नहीं है। किसानों की मांग है कि अगर MSP कानून बन जाता है और उसके बाद MSP से कम कीमत पर कोई फसल खरीदता है तो उसके ऊपर FIR दर्ज हो और वह अपराधी माना जाए। दूसरी सबसे बड़ी मांग है कि स्वामीनाथन आयोग के सिफारिशों के अनुसार ही MSP लागू की जाए।

किसानों की पूरी उपज सरकार MSP पर खरीदे तो उसे सालाना करीब 10 लाख करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। अभी तक यह खर्च 2 लाख 28 करोड़ का है। ऐसा अनुमान बताया जा रहा है। इसकी वजह से देश के राजकीय कोष पर बड़ा दबाव बनेगा।

अगर MSP पर खरीद का कानून बनता है तो अचानक देश में महंगाई बढ़ जाएगी। इसका सीधा असर आम लोगों को पड़ेगा।

देश अब खाद्य सुरक्षा के मामले में आत्मनिर्भर हो गया है। इसलिए इसकी भूमिका खत्म हो चुकी है। ये व्यवस्था हमेशा के लिए नहीं चल सकती । उस दौर में देश की परिस्थितियां अलग थीं।

देश में ज़रूरत से ज़्यादा अनाज का भंडार है और रखने की जगह की कमी होने की वजह से बड़ी मात्रा में अनाज खराब हो जाता है। इसकी वजह से भंडारण की व्यवस्था किए बगैर MSP की कानूनी गारंटी देना मुश्किल है।

उस वक्त सरकार ने किसानों को ज्यादा फसल पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करने के कदम के तौर MSP की व्यवस्था लागू की थी। अब ‘फूड सरप्लस’ का दौर है और MSP की ज़रूरत खत्म हो गई है।

इसकी वजह से बाजार की स्वतंत्रता पर प्रभाव पड़ सकता है। यह बाजार को असंतुलन की दिशा में ले जा सकता है और बाजार की दरों प्रभावित करेगा। 7- MSP किसानों को लगातार निरंतर एक ही फसल की खेती के लिए प्रेरित कर सकते हैं। इससे भूमि का उपयोग असंतुलित हो सकता है और पर्यावरणीय प्रभाव पैदा हो सकता है।

क्या बीजेपी की जारी की गई लिस्ट से बदलेगा चुनावी समीकरण?

यह सवाल उसने लाजमी है कि क्या बीजेपी की जारी की गई लिस्ट से चुनावी समीकरण बदलेगा या नहीं! लोकसभा चुनाव 2024 के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपने उम्मीदवारों के नाम पर फैसला लेना शुरू कर दिया है। पार्टी ने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की है। 16 राज्य और दो केंद्र शासित प्रदेशों की 195 सीटों पर उम्मीदवारों के नाम की घोषणा कर दी गई है। इसमें सबसे अधिक उत्तर प्रदेश की 51 सीटें शामिल हैं। यूपी में 80 लोकसभा सीटें हैं। इसमें से 51 पर उम्मीदवार के नाम तय कर दिए गए हैं। पार्टी के शीर्ष नेता पीएम नरेंद्र मोदी यूपी की वाराणसी लोकसभा सीट से तीसरी बार चुनावी मैदान में उतरेंगे। पार्टी बची 29 सीटों पर गठबंधन के फाइनल होने के बाद नामों का ऐलान कर सकती है। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय लोक दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, अपना दल सोनेलाल और निषाद पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन है। माना जा रहा है कि गठबंधन के तहत भाजपा 5 से 6 सीटों पर सहयोगी दल को उतार सकती है। इसमें राष्ट्रीय लोक दल को दो, अपना दल एस को दो और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को एक सीट देने की तैयारी है। भाजपा की पहली लिस्ट में निषाद पार्टी प्रमुख संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद को टिकट दिया जा चुका है। साथ ही, इस सूची में उन 9 सीटों पर भी उम्मीदवार दिए गए हैं, जहां पिछली बार भाजपा को हार झेलनी पड़ी थी। भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव को लेकर मिशन- 80 लक्ष्य तय किया है। पार्टी लोकसभा चुनाव में हर सीट के लिए अलग समीकरण के साथ चुनावी मैदान में उतर रही है। पार्टी के रणनीतिकारों ने जीत का गणित तैयार किया है। इसके लिए तमाम सीटों पर गुणा- गणित कर उम्मीदवारों को निर्धारित किया गया है। बीजेपी यूपी में क्लीन स्वीप का टारगेट लेकर चल रही है। इसको ऐसे समझ सकते हैं कि पार्टी ने जिन उम्मीदवारों के नाम तय किए गए हैं, उसमें अधिकतर पुराने चेहरे हैं। पार्टी ने 2019 में हरी लोकसभा सीटों को एक बार फिर जीतने के लिए बड़ा दांव खेल है। लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर पिछले चुनाव में हारी 16 में से 9 सीटों पर भाजपा ने प्रत्याशियों का ऐलान कर दिया है। इसमें रामपुर और आजमगढ़ की सीट भी शामिल है, जो उप चुनाव में बीजेपी के पाले में आ गई थी।

अमरोहा लोकसभा सीट पर 2014 में सांसद रहे कंवर सिंह तंवर पर भाजपा ने फिर भरोसा जताया है। अमरोहा से 2019 में बसपा के टिकट पर दानिश अली जीते। उन्हें सपा- बसपा समीकरण का लाभ मिला था। इस बार अमरोहा सीट कांग्रेस के पाले में गई है। ऐसे में गुर्जर वोटों के समीकरण को देखते हुए भाजपा ने कंवर सिंह तंवर पर भरोसा जताया है। संभल लोकसभा सीट पर भाजपा ने जीत का गणित बनाना शुरू कर दिया है। पिछले दिनों सपा सांसद डॉ. शफीकुर्रहमान बर्क के निधन के बाद सपा उनके ही परिवार को टिकट दे सकती है। पहले ही पार्टी ने डॉ. बर्क को उम्मीदवार घोषित कर दिया था। वहीं, भाजपा ने यहां से परमेश्वर सैनी को चुनावी मैदान में उतार दिया है. 2014 में मुस्लिम बहुल सीट से सत्यपाल सैनी जीतने में सफल रहे थे। एक बार फिर समीकरण को ध्यान में रखते हुए भाजपा सैनी पर दांव खेल रही है। हालांकि, उम्मीदवार का चेहरा बदल दिया गया है।

जौनपुर सीट से भारतीय जनता पार्टी ने कृपा शंकर सिंह को प्रत्याशी बनाया है। लोकसभा चुनाव में सपा- बसपा गठबंधन के तहत यह सीट बसपा के पास गई थी। बसपा के श्याम सिंह यादव जीत दर्ज करने में कामयाब रहे। इस बार श्याम सिंह यादव का टिकट कटना तय है। श्याम सिंह यादव पिछले दिनों कांग्रेस के संपर्क में थे। लेकिन, सपा- कांग्रेस गठबंधन के तहत यह सीट सपा के पास चली गई है। ऐसे में सपा को उम्मीदवार तय करना है। भाजपा ने अपना पत्ता खोल दिया है। कृपा शंकर सिंह जौनपुर के रहने वाले हैं, लेकिन मुंबई में अभी तक राजनीति करते रहे हैं। कांग्रेस की सरकार में महाराष्ट्र के गृह मंत्री रह चुके हैं। 2019 के बाद भाजपा में शामिल हुए। अब भाजपा ने उनके गृह जिले से प्रत्याशी घोषित कर दिया है।

लोकसभा चुनाव 2019 में श्रावस्ती सीट भाजपा के हाथों से चली गई थी। बसपा के शिरोमणि वर्मा ने यहां से जीत दर्ज की थी। इस बार सपा- बसपा गठबंधन नहीं है। ऐसे में भाजपा ने यहां से नृपेंद्र मिश्रा के बेटे साकेत मिश्रा को चुनावी मैदान में उतारा है। नृपेंद्र मिश्रा प्रधानमंत्री के सचिव रह चुके हैं और राम मंदिर निर्माण ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं। साकेत मिश्रा काफी समय से श्रावस्ती क्षेत्र में सक्रिय थे, इसको देखते हुए बीजेपी ने दांव खेल दिया है। लालगंज सुरक्षित लोकसभा सीट पर अभी बहुजन समाज पार्टी का कब्जा है। सपा- बसपा गठबंधन के कारण राजनीतिक समीकरण बसपा की संगीता आजाद के पक्ष में चला गया है। उनके बीजेपी में जाने की चर्चा चल रही थी। हालांकि, पार्टी ने नीलम सोनकर पर दांव खेला है। नीलम सोनकर दलित समाज के बीच अपनी पकड़ को बढ़ाकर इस सीट पर जीत का समीकरण तलाश सकती हैं।

रामपुर लोकसभा सीट पर लोकसभा चुनाव 2019 में सपा के मोहम्मद आजम खान ने जीत दर्ज की थी। यूपी चुनाव 2022 में रामपुर से विधायकी जीतने के बाद आजम खान ने संसद सदस्य पद से इस्तीफा दे दिया। लोकसभा उप चुनाव 2022 में भाजपा के घनश्याम लोधी ने मुस्लिम बहुल सीट पर अपना कब्जा जमा लिया। इस प्रकार आजम खान और सपा के गढ़ पर भगवा झंडा फहरा दिया गया। एक बार फिर भाजपा ने घनश्याम लोधी पर अपना भरोसा जताया है। उन्होंने अपनी चुनावी तैयारी भी शुरू कर दी है। लोकसभा चुनाव में 16 सीटों पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। इसमें से 9 पर तो उम्मीदवार घोषित कर दिए गए हैं। लेकिन, सात सीटों पर घोषणा होनी बाकी है। इसमें मैनपुरी, सहारनपुर, गाजीपुर, मुरादाबाद, रायबरेली, बिजनौर और घोसी लोकसभा सीट शामिल है। माना जा रहा है कि घोसी सीट भाजपा अपने सहयोगी ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा और बिजनौर सीट आरएलडी को दे सकती है। 2019 में सपा- बसपा के गठबंधन के कारण बदले सामाजिक समीकरण का लाभ महागठबंधन के उम्मीदवारों को हो गया था। इस बार भाजपा ने अलग रणनीति के साथ चुनाव में उम्मीदवारों का ऐलान कर पहले से ही माहौल को बेहतर बनाने की योजना तैयार की है। पार्टी के रणनीतिकार इसका फायदा चुनावों में मिलने की बात कर रहे हैं।

जब जन्मो जन्मो तक पंकज उदास को किया जाएगा याद!

मशहूर संगीतकार पंकज उदास को जन्मो जन्मो तक याद किया जाएगा! सात समुंदर पार गया तू, हमको ज़िंदा मार गया तू, दिल के रिश्ते तोड़ गया तू, आंख में आंसू छोड़ गया तू, ‘, कभी अपने सुपरहिट गाने चिट्ठी आई है… के इन बोलों से लोगों की आंखें नम करने वाले गजल गायिकी के सरताज पंकज उधास ने सोमवार को अपने चाहने वालों को यही पंक्तियां दोहराने पर मजबूर कर दिया। संगीत की दुनिया को अपनी आवाज से ‘धनवान’ बनाने वाले पद्मश्री पंकज उधास सोमवार को दुनिया को अलविदा कह गए और पीछे छोड़ गए अपनी सदाबहार ग़ज़लों की सुरीली विरासत। अभी पिछले साल की तो बात थी। अपनी आवाज से वक्त को थाम देने वाले पंकज उधास राजधानी के सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम में जनता की मांग पर गा रहे थे- चिट्ठी आई है… और जैसे-जैसे वे आगे ‘बड़े दिनों के बाद, हम बेवतनों को याद, वतन की मिट्टी आई है’, ‘ऊपर मेरा नाम लिखा है, अंदर ये पैगाम लिखा है’, ‘ओ परदेस को जाने वाले, लौट के फिर ना आने वाले…’ की ओर बढ़े, ऑडिटोरियम में सन्नाटा छा गया। कहीं सिसकियां भी सुनाई देने लगीं। ये जादू था, ग़ज़ल गायिकी को नया मुकाम देने वाले जादुई आवाज के मालिक पंकज उधास का। फिर, ये कोई एक गाने या एक कॉन्सर्ट की बात नहीं थी, उनके हर परफॉर्मेंस के बाद उनकी आवाज का नशा लोगों पर यूं ही देर तक रहता। हर कोई उनके गाने गुनगुनाता हुआ ही बाहर आता लेकिन सोमवार को यह मखमली आवाज़ हमेशा के लिए खामोश हो गई।

ग़ज़ल गायिकी के सरताज कहे जाने वाले पद्मश्री पंकज उधास सोमवार को 72 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए और अपने चाहने वालों को यह कहने पर मजबूर कर दिया कि ‘जिए तो जिए कैसे बिन आपके’। वह लंबे समय से बीमार थे और मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती थे। बताया जा रहा है कि कुछ महीने पहले उन्हें कैंसर डिटेक्ट हुआ था। उनकी बेटी नायाब ने ट्वीट करके उनके निधन की जानकारी दी। उन्होंने लिखा, ‘बहुत भारी मन से, हम आपको लंबी बीमारी के कारण 26 फरवरी, 2024 को पद्मश्री पंकज उधास के दुखद निधन के बारे में सूचित करते हुए दुखी हैं।’

पंकज उधास का जन्म 17 मई 1951 को गुजरात के जेतपुर में हुआ था। संगीत का शौक उन्हें विरासत में मिला था, क्योंकि उनके पिता को संगीत में रुचि थी और उन्होंने शास्त्रीय वाद्ययंत्र दिलरुबा/इसराज सीखा था। इसी के चलते उन्होंने अपने तीनों बेटों मनहर, निर्मल और पंकज उधास को राजकोट संगीत अकादमी में दाखिल करवा दिया था। यहीं तबला सीखने गए पंकज उधास ने शास्त्रीय संगीत की बारीकियां सीखीं। कहा जाता है कि पंकज उधास ने अपनी पहली स्टेज परफॉर्मेंस भारत-चीन युद्ध के दौरान दी थी। तब उन्होंने ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गाया था, जिसके लिए ऑडियंस में से किसी ने उन्हें 51 रुपये का इनाम दिया था। जबकि फिल्मी गायिकी की शुरुआत उन्होंने 1970 में आई फिल्म ‘तुम हसीन मैं जवान’ के गाने ‘मुन्ने की अम्मा ये तो बता’ से की थी। खास बात ये थे कि अपना पहला ही गाना उन्होंने लेजेंडरी किशोर कुमार के साथ गाया था। लेकिन इसके बाद उन्होंने सोलो शुरुआत 1980 में अपनी गज़ल ‘अलबम’ आहट जारी करके की। इसके बाद 1981 में ‘मुकर्रर’, 1982 में ‘तरन्नुम’, 1983 में ‘महफिल’ जैसी ग़ज़लों की एलबम ने उन्होंने अपनी अलग पहचान बना ली। लेकिन 1986 में आई महेश भट्ट की फिल्म नाम के लोकप्रिय गाने चिट्ठी आई है से तो उन्होंने जो नाम कमाया कि फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

संगीत के प्रति अपने अद्भुत योगदान के लिए पद्मश्री समेत कई सम्मान से नवाजे जा चुके पंकज उधास अपनी बीमारी के कुछ महीने पहले तक मंच पर सक्रिय थे। पिछले साल भी वह दिल्ली, मुंबई, पुणे, चेन्नै जैसे कई शहरों में कॉन्सर्ट करते हुए नजर आए। ऐसे में, उनके अचानक निधन से पूरा फिल्म और संगीत जगत सन्न है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, योगी आदित्यनाथ समेत अनूप जलोटा, सोनू निगम आदि ने भावभीनी श्रद्धांजलि दी।

उनके निधन पर बॉलीवुड और संगीत जगत के सितारे श्रद्धांजलि देते हुए उनके लिए दर्द भी जता रहे हैं। सोनू निगम ने कहा, ‘मेरे बचपन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा आज खो गया है। श्री पंकज उधास जी, मैं आपको हमेशा याद करूंगा। यह जानकर मेरा दिल रो रहा है कि आप नहीं रहे। वहां होने के लिए आपका शुक्रिया। ओम शांति।’ अनूप जलोटा ने लिखा है, ‘स्तब्ध करने वाला… संगीत जगत के दिग्गज और मेरे मित्र पंकज उधास का निधन। हम इस कठिन समय में उनके परिवार और प्रियजनों के प्रति अपनी हार्दिक संवेदना व्यक्त करते हैं।’