Sunday, April 12, 2026
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जानिए मृत पति के बच्चे पर किसका होता है हक?

आज हम आपको बताएंगे कि मृत पति के बच्चों पर किसका हक होता है और कानून क्या कहता है! ऑस्ट्रेलिया में एक 62 साल की महिला ने अपने मृत पति के वीर्य के खातिर न सिर्फ कानूनी लड़ाई लड़ी बल्कि जीत भी गई। महिला के पति की 17 दिसंबर को अचानक मौत हो गई थी। इसके बाद महिला ने अस्पताल से अपने पति के वीर्य को सुरक्षित रखने की गुजारिश की ताकि वह उसके जरिए सरोगेसी का सहारा लेकर मां बन सके। अस्पताल ने हाथ खड़े कर दिए। वक्त कम था। अगर देरी होती तो उसके मृत पति के शरीर से वीर्य निकालना मुमकिन नहीं होता। लिहाजा महिला वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया के सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई। वह अदालत को ये भरोसा दिलाने में कामयाब रही कि वह और उसके पति बड़ी शिद्दत से बच्चा पैदा करने के बारे में सोच रहे थे। खैर, महिला पति के वीर्य पर हक तो हासिल कर लिया है लेकिन अभी वह उसके जरिए मां नहीं बन सकती क्योंकि उसे अब इसके लिए कोर्ट से अलग से इजाजत लेने की जरूरत होगी। वैसे मृत शख्स के वीर्य पर हक की लड़ाई कई बार अदालतों में पहुंची हैं। भारत में भी कई बार ऐसा हो चुका है। सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया वाले हालिया मामले पर नजर डालते हैं। 62 वर्ष की महिला के पति की मौत हो गई। उसने अस्पताल से अपने पति के वीर्य को सुरक्षित रखने की गुहार लगाई। अस्पताल ने हाथ खड़े किए तो सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। वहां महिला जज को ये भरोसा दिलाने में कामयाब हो गई कि वह और उसके पति बच्चा पैदा करना चाहते थे। 2019 में उनके 31 साल के बेटे की एक कार हादसे में मौत हो गई थी। 2017 में उनकी 29 साल की बेटी भी मछली पकड़ने के दौरान हुए हादसे में डूबकर मर गई थी। इन दुखद घटनाओं के बाद कपल इस पर गंभीरता से विचार करने लगा कि क्या इस उम्र में उन्हें बच्चा हो सकता है? क्या 61 साल के पति के वीर्य का इस्तेमाल करके सरोगेसी के जरिए वह फिर से माता-पिता बन सकते हैं? इस बीच पति की अचानक मौत हो गई। महिला ने तब अस्पताल से गुजारिश की कि वह उनके पति के वीर्य को निकालकर स्टोर करे ताकि वह बाद में मां बन सके। अस्पताल ने साफ कह दिया कि वह ऐसा नहीं कर सकता। इसके बाद महिला अर्जेंट ऑर्डर के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंची। 21 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि महिला के मृति पति के वीर्य को कलेक्ट किया जाए और उसे सुरक्षित रखा जाए।

असिस्टेड रीप्रोडक्टिव टेक्नॉलजी रेग्युलेशन ऐक्ट, 2021 यानी एआरटी एक्ट में वीर्य या एग को सुरक्षित करने की उम्र सीमा तय है। कानून के मुताबिक, पुरुष के लिए ये उम्र सीमा 55 वर्ष और महिला के लिए 50 वर्ष तय की गई है। इस कानून में 6 चैप्टर हैं और कुल 46 पैराग्राफ है। इस कानून के जरिए एआरटी क्लीनिक और एआरटी बैंकों के कामकाज को रेग्युलेट किया गया है। वैसे इस कानून में अविवाहित व्यक्तियों के वीर्य को स्टोर करने को लेकर स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं हैं। इस कानून के मुताबिक एआरटी बैंकों को किसी मृत व्यक्ति के वीर्य/अंडे को फ्रीज करने के लिए संबंधित पक्षों की लिखित में सहमति जरूरी है। लेकिन कानून में इस बात को लेकर स्पष्टता नहीं है कि अविवाहित व्यक्ति की मौत के बाद उसके वीर्य पर किसका अधिकार होगा।

2019 में महाराष्ट्र में एक फैमिली कोर्ट ने दिलचस्प फैसला दिया। नांदेड़ कोर्ट में महिला ने आईवीएफ के जरिए बच्चा पैदा करने के लिए पति के वीर्य की मांग की जबकि दोनों के बीच तलाक के लिए पहले से कानूनी लड़ाई चल रही थी। महिला का एक 7 साल का बेटा पहले से था और उसकी कस्टडी भी उसी के पास थी। उसके पति ने क्रूरता के आधार पर तलाक की मांग की थी और महिला ने उसके खिलाफ घरेलू हिंसा का केस दर्ज करा रखा था। कानूनी लड़ाई के बीच महिला ने अलग रह रहे पति के वीर्य को हासिल करने के लिए एक और कानूनी लड़ाई शुरू कर दी। महिला ने दलील दी कि भविष्य में उसके बेटे को भाई या बहन के साथ की जरूरत पड़ सकती है लिहाजा वह वीर्य सुरक्षित कराना चाहती है क्योंकि वह दूसरी शादी भी नहीं करना चाहती। फैमिली कोर्ट ने उसके पक्ष में फैसला सुनाया।

किसी मृत व्यक्ति के वीर्य पर उसकी विधवा का ही अधिकार हो सकता है, इसकी भारत ही नहीं, दुनियाभर की अदालतें मान्यता देती हैं। भारत में भी इस तरह के मामले अदालतों में पहुंच चुके हैं। 2021 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने एक मृत व्यक्ति के वीर्य पर उसके पिता की दावेदारी को खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि मृतक के अलावा सिर्प उसकी पत्नी के पास ही सुरक्षित रखे गए वीर्य को हासिल करने का अधिकार है। दरअसल, शख्स शादीशुदा था और थैलेसीमिया का मरीज था। उसने भविष्य में उपयोग के लिए अपने शुक्राणुओं को दिल्ली के एक अस्पताल में सुरक्षित रखवा दिया था। बाद में उस शख्स की मौत हो गई। उसके बाद उसके पिता ने दिल्ली के अस्पताल से संपर्क किया कि उन्हें उसके मृत बेटे के स्पर्म को दिया जाए। अस्पताल ने बताया कि इसके लिए मृतक की पत्नी की अनुमति जरूरी है। इसके बाद पिता ने बेटे के वीर्य पर हक हासिल करने के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कलकत्ता हाई कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि शख्स की मौत के बाद उसके वीर्य पर सिर्फ और सिर्फ उसकी पत्नी का अधिकार है।

दिल्ली हाई कोर्ट के सामने ये सवाल आया था कि अगर किसी अविवाहित शख्स की मौत हो जाती है और उसने अपने वीर्य के सैंपल को संरक्षित करा रखा हो तो उस पर आखिर किसका हक होगा। इस मामले में दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल ने हाई कोर्ट में हलफनामा देकर बताया कि असिस्टेड रीप्रोडक्टिव टेक्नॉलजी रेग्युलेशन ऐक्ट में इसे लेकर कोई व्यवस्था नहीं है कि किसी मृत व्यक्ति के सीमेन सैंपल पर उसके माता-पिता या उसके कानूनी उत्तराधिकारी का हक होगा या नहीं।

भारत में किसी मृत व्यक्ति के वीर्य से उसकी पत्नी के मां बनने का पहला मामला 2009 में सामने आया था। कपल कृत्रिम गर्भाधान की कोशिश में था और इसके लिए वीर्य को संरक्षित कराया था। दुर्भाग्य से 2006 में पति की मौत हो गई। पति की मौत के 2 साल बाद पत्नी को इस बात की जानकारी हुई कि उसके पति के वीर्य का सैंपल तो अस्पताल में सुरक्षित है। उसके बाद वह अस्पताल से संपर्क की और 2009 में अपने मृत पति के स्टोर किए गए वीर्य की मदद से प्रेग्नेंट हुई और अस्पताल में बेटे को जन्म दिया।

क्या शंकराचार्य को मोदी के मूर्ति छूने से है दिक्कत?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या शंकराचार्य को मोदी के राम मूर्ति छूने से दिक्कत है या नहीं! पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद ने अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल होने से इनकार कर दिया है। उन्होंने इसे लेकर कहा है कि वह अयोध्या नहीं जाएंगे क्योंकि उन्हें अपने पद की गरिमा का ध्यान है। उन्होंने कहा कि वहां पीएम नरेंद्र मोदी मूर्ति का लोकार्पण करेंगे और उसे स्पर्श करेंगे। क्या मैं वहां ताली बजा-बजाकर जय-जय करूंगा? शंकराचार्य के इस बयान के बाद से कंट्रोवर्सी शुरू हो गई है। प्रधानमंत्री मोदी के मूर्ति को स्पर्श करने को शंकराचार्य द्वारा रेखांकित करने पर पुराने विवाद की यादें भी ताजा हो गई हैं। साथ ही सवाल भी उठ रहे हैं कि ऐसे समय में जब नरेंद्र मोदी को सनातन धर्म के प्रतीकों के रक्षक के तौर पर देखा जा रहा है तब स्वामी निश्चलानंद उनसे नाराज क्यों हैं? और ऐसे बागी बयान क्यों दे रहे हैं? गोवर्धन मठ पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती उर्फ नीलाम्बर का जन्म बिहार में हुआ था। 18 अप्रैल 1974 को हरिद्वार में लगभग 31 साल की आयु में स्वामी करपात्री महाराज के सान्निध्य में उन्होंने संन्यास ग्रहण किया था। इसके बाद से वह नीलाम्बर से स्वामी निश्चलानंद हो गए थे। पुरी के 144वें शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ महाराज ने स्वामी निश्चलानंद सरस्वती को अपना उत्तराधिकारी मानकर 9 फरवरी 1992 को पुरी के 145 वें शंकराचार्य पद पर आसीन किया था।

राम मंदिर आंदोलन के बहाने धर्म और राजनीति के आपस में घुल-मिल जाने के दौर में तमाम संत खुलकर अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धता प्रदर्शित करने लगे हैं। अयोध्या के तमाम मठों के महंत और शंकराचार्य भी राजनैतिक पार्टियों के समर्थन में यदा-कदा नजर आते हैं। ऐसे माहौल में भी पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद इस बात पर भरोसा करते हैं कि शंकराचार्य का पद किसी पार्टी को समर्थन देने वाला नहीं बल्कि शासकों पर शासन करने वाला पद है। उनकी वेबसाइट पर यह वाक्य प्रमुखता से दर्ज भी है। ऐसे में उनकी इस सैद्धांतिकी में पीएम मोदी से उनका विरोध काफी हद तक समझा भी जा सकता है। निश्चलानंद स्वामी राजनीति में संतों का इस्तेमाल किए जाने की प्रवृत्ति से भी नाराज दिखते हैं। हाल ही में उन्होंने इसे लेकर एक बयान दिया था कि सियासी पार्टियां पहले संतों को अपना स्टार प्रचारक बनाती हैं और बाद में उन्हें मौनी बाबा बना देती हैं। उन्होंने श्री-श्री रविशंकर और योग गुरु बाबा रामदेव का उदाहरण भी दिया। उन्होंने किसी पार्टी का नाम लिए बिना कहा था कि पहले राजनैतिक दल ने दोनों का भरपूर इस्तेमाल किया। शासन सत्ता पाते ही उन्हें मौनी बाबा बना दिया गया।

स्वामी निश्चलादनंद की भाजपा से नाराजगी क्या है, इसका जवाब साफतौर पर नहीं दिया जा सकता। हालांकि, अपने बयानों में जब-तब उन्होंने भाजपा नेताओं और संघ प्रमुख को भी निशाने पर लिया है। उन्होंने बागेश्वर धाम के धीरेंद्र शास्त्री की इसलिए निंदा की थी कि वह भाजपा के प्रचारक बन गए हैं। इसके अलावा हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था पर बयान देने वाले मोहन भागवत के लिए कहा था कि उनके पास ज्ञान की कमी है। इतना ही नहीं, हिंदू मंदिरों में सरकार के हस्तक्षेप से भी निश्चलानंद को दिक्कत है। अपने एक बयान में उन्होंने कहा था कि मंदिरों में सरकार का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए और ट्रस्ट को सक्षम बनकर मंदिरों में बेहतर व्यवस्था करनी चाहिए। मंदिरों के लगातार हो रहे ‘कॉरिडोरीकरण’ का भी निश्चलानंद ने अक्सर विरोध किया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्वामी निश्चलानंद कभी प्रशंसा करते हैं तो कभी उनसे नाराज भी रहते हैं। उनके बयानों से लगता है कि राम मंदिर निर्माण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ज्यादा उपस्थिति भी उनकी आपत्ति का कारण है। राम मंदिर के भूमिपूजन के दौरान उन्होंने इसे लेकर बड़ा बयान दिया था। निश्चलानंद ने सवालिया लहजे में कहा था कि राम जन्मभूमि को लेकर मोदी की क्या भूमिका रही थी? राम मंदिर निर्माण को लेकर क्या उनका एक भी भाषण सुनने को मिलेगा।

अयोध्या न जाने के लिए स्वामी निश्चलानंद ने जो कारण गिनाया है, उसमें उन्होंने कहा है, ‘मोदी लोकार्पण करें। मूर्ति को स्पर्श करेंगे, तो मैं वहां ताली बजाकर जय-जयकार करूंगा क्या?’ उनके इस बयान के तमाम मतलब भी निकाले जा रहे हैं। कहा यह भी जा रहा है कि शंकराचार्य को मोदी के मूर्ति छूने से दिक्कत है। इस संदर्भ में एक पुराने विवाद की भी चर्चा चल पड़ी है। दरअसल, वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश की इजाजत नहीं थी। साल 1958 में काफी लंबी लड़ाई के बाद दलितों को प्रवेश का मौका मिला। तब जैसे ही दलितों ने मंदिर में शिवलिंग को छुआ, तब करपात्री महाराज ने इसका विरोध किया था। उन्होंने विश्वनाथ मंदिर को अछूत घोषित कर दिया और काशी में ही गंगा के तट पर एक दूसरा काशी विश्वनाथ बनवा डाला था। इन्हीं करपात्री महाराज के सान्निध्य में निश्चलानंद ने भी संन्यास ग्रहण किया है। ऐसे में इस पुराने विवाद को नरेंद्र मोदी के रामलला की मूर्ति के स्पर्श करने को लेकर शंकराचार्य की जताई जा रही कथित आपत्ति से जोड़कर देखा जा रहा है।

क्या यूपी में विपक्षी पार्टियां होगी एक?

अब यूपी में विपक्षी पार्टियां एक हो सकती है! पिछले दो लोकसभा चुनावों में भाजपा की बहुमत वाली जीत की यात्रा में उत्तर प्रदेश का काफी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद यहीं से चुनाव लड़ते हैं। इस कारण भी पूरे चुनाव में यूपी की चर्चा जोर-शोर से होती रहती है। चुनावी साल में यूपी के बारे में न केवल बात होगी बल्कि राम मंदिर के उद्घाटन के जरिए राष्ट्रीय चर्चा का रुख भी तय होगा। विपक्षी समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और आरएलडी भाजपा के बढ़ते कदम को रोकने के लिए जाति और स्थानीय भावनाओं को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं बसपा जैसी अन्य पार्टियां, जिनके पास अच्छा वोट शेयर है, तटस्थ बनी हुई हैं। जहां तक बात छोटे दलों की है तो वो बड़े पैमाने पर भाजपा की ओर आकर्षित हुए हैं। भाजपा ने 2014 में यूपी की 80 में से 71 सीटें 42% वोट शेयर के साथ जीती थीं। दो सीटें भाजपा की सहयोगी अपना दल ने जीती थीं। 2019 में बसपा, सपा और आरएलडी ने मिलकर भाजपा को टक्कर दी। फिर भी पार्टी ने 62 सीटें बड़े अंतर से जीत लीं और वोटों की हिस्सेदारी बढ़कर 50% हो गई। 2024 में भाजपा 2014 से भी बेहतर प्रदर्शन करना चाहती है। राम मंदिर का उद्घाटन एक ऐसा तरूप का इक्का है जिसके दम पर भाजपा विपक्षियों को पूरी तरह चित करने की उम्मीद कर रही है। पार्टी ने जल्दी काम करना शुरू कर दिया है। भाजपा ने उन सीटों की पहचान की है जो उसने यूपी में कभी नहीं जीती थीं और जहां 2019 में हार मिली थी। पार्टी सूत्रों के अनुसार, 2019 में जिन सीटों पर भाजपा को हार मिली थी, उन पर विशेष ध्यान देकर पार्टी ने राज्य में और 20 लाख मतदाता जोड़े हैं। पार्टी उन सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा पहले करने की योजना बना रही है जिन पर उसने 2019 में जीत नहीं दर्ज की थी। यह रणनीति हाल ही के विधानसभा चुनावों के दौरान पार्टी के लिए कारगर रही थी, इसलिए इसे आगामी लोकसभा में दोहराना चाहती है।

उत्तर प्रदेश की भाजपा इकाई के अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी ने कहा, ‘ऐसा नहीं है कि हम चुनाव के कारण लोगों के पास जा रहे हैं। भाजपा का हर कार्यकर्ता सालभर लोगों के संपर्क में रहता है। हम हमेशा चुनाव के लिए तैयार रहते हैं।’ चौधरी यूपी में चल रहे कई विकास कार्यों के बारे में भी बात करते हैं। वो कहते हैं, ‘पीएम मोदी के नेतृत्व में यूपी बदल गया है। इस कारण लोग मोदी और भाजपा पर भरोसा करते हैं।’ 2022 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव हुए थे। उसमें भाजपा की दोबारा जीत के बाद सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी एसबीएसपी जैसी छोटी पार्टियां भी भाजपा की ओर आकर्षित हुई हैं। पीएम नरेंद्र मोदी और अन्य वरिष्ठ नेताओं के कार्यक्रम पहले ही शुरू हो चुके हैं। 22 जनवरी को मोदी राम मंदिर का उद्घाटन करेंगे। पार्टी कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया गया है कि वे लोकसभा चुनाव तक मंदिर उद्घाटन का उत्साह बनाए रखें।

समाजवादी पार्टी सपा, कांग्रेस और राष्ट्रीय लोक दल आरएलडी सीट बंटवारे पर चर्चा में हैं। सभी ने 2022 का विधानसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ा था, लेकिन भाजपा और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आगे टिक नहीं पाए। उस चुनाव में सपा अपना वोट 10 से 32 प्रतिशत बढ़ाकर सबसे ज्यादा फायदे में रही। उसे 2012 में भी 32 प्रतिशत वोट नहीं मिले थे, जब उसने बहुमत हासिल कर सरकार बनाई थी। इसी प्रदर्शन की बदौलत सपा और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आगामी लोकसभा चुनावों में इंडिया ब्लॉक के अगुआ बने। 2024 के लोकसभा चुनाव दरअल 2027 के यूपी विधानसभा चुनावों का प्रैक्टिस सेशन भी है। अखिलेश ने कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। पार्टी प्रवक्ता और विश्लेषक सुधीर पंवार ने बताया कि सपा को अब पिछले एक साल में भाजपा और बसपा की तरह कैडर-आधारित पार्टी के रूप में संगठित किया गया है और यह अब एक औपचारिक संगठन है। इंडिया ब्लॉक में बसपा की अनुपस्थिति में अखिलेश यादव ने ‘पीडीए’ – पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक का नारा गढ़ा है और बसपा के मतदाताओं के बीच पैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। सामाजिक समानता, जातिगत जनगणना और बेरोजगारी पार्टी के अभियान का मुख्य हिस्सा हैं। पार्टी वर्तमान में उम्मीदवार चयन पर काम कर रही है। सर्वेक्षण चल रहे हैं और अखिलेश यादव व्यक्तिगत रूप से इस प्रक्रिया की निगरानी कर रहे हैं। 2004 और 2009 के चुनावों में क्रमशः 35 और 23 लोकसभा सीटें जीतने के अपने सुनहरे दिनों के बाद सपा ने पिछले दो चुनावों में पांच-पांच सीटें ही जीती हैं। आजमगढ़ और रामपुर उपचुनाव में हार के बाद पार्टी के पास लोकसभा में केवल तीन सांसद हैं।

अब तक एनडीए और इंडिया दोनों से दूरी बनाए रखने वाली बसपा 2024 के लोकसभा चुनाव में अपने घटते वोट बैंक को रोकने की कठिन चुनौती का सामना करेगी। 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को एक भी सीट पर जीत नहीं मिली थी, लेकिन 2019 में सपा और आरएलडी के साथ गठबंधन में उसने 10 सीटें जीत ली थीं।

हालांकि, अनुसूचित जाति के मतदाता बसपा का मुख्य आधार बने हुए हैं, लेकिन पार्टी के अंदर में ही एमबीसी जातियों के लिए ‘स्टेपनी वोट’ का तंज कसा जाता है। पार्टी के अधिकांश प्रमुख चेहरे, जो अपनी जाति, खासकर एमबीसी के बीच लोकप्रिय हैं, पहले ही बसपा छोड़कर सपा में शामिल हो चुके हैं। बसपा 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों पर अच्छा प्रदर्शन करने के लिए दो प्रमुख चुनौतियों का सामना कर रही है। बसपा के लिए यह स्वाभाविक है कि वह पहले अपने अनुसूचित जाति के वोटों को बरकरार रखे। दूसरा काम एमबीसी के बीच युवा चेहरों की तलाश करना है। हालांकि, वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में पार्टी के लिए दोनों काम कठिन हैं। मायावती का अकाश आनंद को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी चुनने का फैसला स्पष्ट रूप से अनुसूचित जातियों के बीच युवा मतदाताओं को लुभाने का लक्ष्य साधने के लिए है। पार्टी अपने मूल अनुसूचित जाति के मतदाताओं को अपने राजनीतिक विरोधियों से बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। राजभर, शाक्य, सैनी और निषाद जैसे एमबीसी मतदाताओं को एनडीए और इंडिया दोनों ही खेमे लुभाने की कोशिश कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए कौन से हथियार है बीजेपी के पास?

आज हम आपको बीजेपी के उन हथियार के बारे में बताएंगे जो उसने कांग्रेस के लिए रख रखे हैं! कैसी भी प्रतिस्पर्धा हो, किसी भी प्रतियोगिता का हिस्सा आप बन रहे हैं तो जीत का फॉर्म्युला तो बनाना ही होगा। इस लिहाज से बीजेपी की छवि बेहद मजबूत दल की है। अब जब लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं तो देश की सत्ता में एक दशक से आसीन पार्टी ने चार समितियों का गठन कर दिया है। ये समितियां नेताओं को पार्टी से जोड़ने से लेकर चुनाव प्रबंधन तक का जिम्मा देखेंगी। सूत्रों के मुताबिक भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा की अध्यक्षता में हुई मीटिंग में इन चार कमिटियों को बनाने का फैसला लिया गया। सूत्रों ने बताया कि जॉइनिंग कमिटी, क्लस्टर कमिटी, कैंपेन कमिटी और न्यू वोटर्स कमिटी के नाम से समितियों का गठन किया गया है। इनमें जॉइनिंग कमिटी का दायित्व यह तय करना है कि किन नेताओं को भाजपा से जोड़ना है। यह कमिटी कई स्तर पर काम करेगी। मसलन, उन नेताओं की तलाश और उनसे संपर्क जिन्हें पार्टी से जोड़ा जाना चाहिए। फिर उन नेताओं की पड़ताल जिन्होंने बीजेपी से जुड़ने की इच्छा जताई है। जॉइनिंग कमिटी ही तय करेगी कि भाजपा से रूठकर दूसरी पार्टियों में चले गए किन-किन नेताओं को मनाकर वापस लाने के प्रयास किए जाएं। इसी समिति की जिम्मेदारी है कि वो पार्टी जॉइन करने के इच्छुक दूसरे दलों के नेताओं को विभिन्न पैमानों पर परखे और तय करे कि उन्हें बीजेपी में एंट्री दी जाए या नहीं। यह तय करने के लिए पार्टी नेता को उनकी छवि, जमीन पर पकड़, विचारधारा आदि की कसौटियों पर कसेगी।कमिटी देखेगी कि कौन-कौन पार्टी जॉइन करना चाहता है और उन्हें जॉइन करवा कर पार्टी को फायदा होगा भी या नहीं। साथ ही वे उनका बैकग्राउंड भी देखेंगे और जिस राज्य से हैं उस राज्य के पार्टी संगठन से भी बात करेंगे। वहीं, विभिन्न क्षेत्रों की जानी-मानी हस्तियों को भी पार्टी से जोड़कर उनका पॉलिटिकल डेब्यू कराने की जिम्मेदारी भी जॉइनिंग कमिटी के पास है।

भाजपा सूत्रों के मुताबिक, जॉइनिंग कमिटी में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव, केंद्रीय मंत्री अश्वनी वैष्णव, केंद्रीय मंत्री मनसुख मंडविया, असम के मुख्यमंत्री हेमंत विश्व शर्मा, महासचिव विनोद तावड़े, तरुण चुग और सुनील बंसल शामिल हैं। दरअसल, भाजपा अपने विरोधी दलों के नेताओं को तोड़ने की रणनीति पर भी काम कर रही है। पार्टी के इस मुहीम का मकसद कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों में गए अपने नेताओं को वापस लाना भी है। कमिटी हर नेता से बात करेगी और उनकी असंतुष्टि का कारण पता करेगी। बातचीत के बाद अगर नेता की दलील में दम दिखा तो उन्हें संतुष्ट करने के लिए कदम उठाए जाएंगे और वापसी का रास्ता पुख्ता किया जाएगा। बीजेपी के एक नेता ने बताया कि देशभर में बहुत से लोग बीजेपी जॉइन करने को उत्सुक हैं। इसमें बड़ी संख्या में दूसरी पार्टी के नेता भी हैं। कमिटी देखेगी कि कौन-कौन पार्टी जॉइन करना चाहता है और उन्हें जॉइन करवा कर पार्टी को फायदा होगा भी या नहीं। साथ ही वे उनका बैकग्राउंड भी देखेंगे और जिस राज्य से हैं उस राज्य के पार्टी संगठन से भी बात करेंगे।

दूसरी क्लस्टर कमिटी है। यह समिति लोकसभा सीटों के जो अलग-अलग क्लस्टर बनाए गए हैं, उनके कॉर्डिनेशन का काम देखेगी और जिम्मेदारी तय करेगी। तीसरी कैंपेन कमिटी है। ये हर राज्य में किस तरह से चुनाव प्रचार की गतिविधि चलनी है और कहां-क्या जरूरत है, उस पर नजर रखेगी। चौथी न्यू वोटर्स कमिटी है जो नए मतदाताओं से संपर्क करेगी। लोकसभा चुनाव से पहले फर्स्ट टाइम वोटर्स को लुभाने के लिए बड़े स्तर पर कार्यक्रमों को अंजाम देने की योजना है। इसके अलावा, बीजेपी ने अपना वोटर बेस बढ़ाने के लिए GYAN रीब, युवा, अन्नदाता किसान, नारी फॉर्म्युला भी तैयार किया है।नेताओं की पड़ताल जिन्होंने बीजेपी से जुड़ने की इच्छा जताई है। जॉइनिंग कमिटी ही तय करेगी कि भाजपा से रूठकर दूसरी पार्टियों में चले गए किन-किन नेताओं को मनाकर वापस लाने के प्रयास किए जाएं। इसी समिति की जिम्मेदारी है कि वो पार्टी जॉइन करने के इच्छुक दूसरे दलों के नेताओं को विभिन्न पैमानों पर परखे और तय करे कि उन्हें बीजेपी में एंट्री दी जाए या नहीं। यह तय करने के लिए पार्टी नेता को उनकी छवि, जमीन पर पकड़, विचारधारा आदि की कसौटियों पर कसेगी। बीजेपी गरीबों, युवाओं, किसानों और महिलाओं के बीच अपनी पकड़ को और मजबूत करने की फिराक में है। इन चार वर्गों में मतदाताओं का बड़ा हिस्सा आ जाता है।

क्या भारत न्याय यात्रा कांग्रेस के लिए सजा साबित होगी या दवा?

विश्लेषकों की माने तो भारत न्याय यात्रा कांग्रेस के लिए सजा और दवा दोनों ही साबित हो सकती है! हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में जीत के बाद कांग्रेस की दमदार वापसी की उम्मीदें हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में शिकस्त के साथ ही धराशायी हो चुकी हैं। इस तरह 2024 लोकसभा चुनाव में पार्टी की राह अब अनिश्चित दिखाई दे रही है। इतना ही नहीं, कांग्रेस हालिया हार से नवगठित I.N.D.I.A. गठबंधन की भी मुश्किल बढ़ रही है क्योंकि इस गठबंधन का भविष्य भी कांग्रेस से जुड़ा हुआ है। अगर कांग्रेस उन 200 से ज्यादा लोकसभा सीटों पर बीजेपी से हारती रहती है जहां दोनों पार्टियों का सीधा मुकाबला है, तो क्षेत्रीय पार्टियों का अच्छा प्रदर्शन भी गठबंधन को जीत दिलाने के लिए काफी नहीं होगा। आखिर कांग्रेस को हो क्या गया है? वह वापसी क्यों नहीं कर पा रही है, या कम से कम अपनी छाप क्यों नहीं छोड़ पा रही है? कई लोग इसके लिए गांधी परिवार के नेतृत्व और उनकी घटती चुनावी जीत को जिम्मेदार मानते हैं। वो कहते हैं कि ‘नए भारत’ में मोदी फैक्टर काफी मजबूत है, जबकि कांग्रेस के पास कोई नया नैरेटिव नहीं है। गांधी परिवार का नेतृत्व विरासत पर आधारित है, जहां सारे अधिकार होते हैं लेकिन हार या गलत फैसलों की कोई जिम्मेदारी नहीं ली जाती। पार्टी हारती है, उसे नुकसान होता है, लेकिन गांधी परिवार इससे अछूता रहता है। कांग्रेस के लिए इस राजनीतिक निराशा के दौर के बीच, पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक और यात्रा पर निकलने का फैसला किया है। राहुल और प्रियंका गांधी वाड्रा को उम्मीद थी कि राज्यों के चुनाव में कांग्रेस की जीत होगी और उसका पूरा श्रेय उनकी भारत जोड़ो यात्रा और जातिगत गणना-ओबीसी कार्ड को जाएगा। लेकिन ऐसा हो न सका। ये देखना बाकी है कि ये नया ‘पूरब-पश्चिम’ बस यात्रा-2 पार्टी को कहां तक ले जा पाएगी।

चुनाव प्रचार समिति सीडब्ल्यूसी की 21 दिसंबर की बैठक में कुछ सदस्यों ने राहुल को आगाह किया था कि लोकसभा चुनाव बेहद नजदीक हैं और ऐसे में एक और यात्रा फायदेमंद नहीं होगी। साथ ही, राम मंदिर उद्घाटन के लिए बीजेपी के कार्यक्रम से ये टकरा सकती है और इसमें पहले जैसा नयापन भी नहीं होगा। लेकिन पार्टी ने इन चेतावनियों को दरकिनार कर दिया है। एक तरफ राहुल दूसरी यात्रा की तैयारी कर रहे हैं तो दूसरी तरफ प्रियंका वाड्रा भी अपना दायरा बढ़ा रही हैं। भले ही उनके नेतृत्व में यूपी कांग्रेस लगभग खत्म हो गई, लेकिन उन्हें ‘बिना विभाग के एआईसीसी महासचिव’ का पद इनाम के तौर पर मिल गया। यानी कहीं भी दखल देने का लाइसेंस और वो भी बिना किसी जवाबदही के। अगर राहुल का पीएम बनने का दावा इस पर आधारित है कि उनके पिता, उनकी दादी और उनके परनाना भी प्रधानमंत्री थे तो प्रियंका वाड्रा के पक्ष में तो एक और योग्यता है यानी चौथा कारण। उनके फैन अब ये दावा कर सकते हैं कि लाल बहादुर शास्त्री भी प्रधानमंत्री बनने से पहले ‘बिना विभाग के मंत्री’ थे।

परिवार के फलने-फूलने में एक चालाकी से चलने वाला ‘टू हैंड्स क्लैप’ सिस्टम मदद करता है यानी ‘आप मेरी पीठ खुजाओ, मैं आपकी पीठ खुजाऊं।’ CWC से लेकर AICC सचिवालय और प्रदेश कांग्रेस समितियों (CPC) तक तकरीबन सभी पदाधिकारी ‘मनोनीत’ होते हैं, जिन्हें चुने हुए सदस्यों के उलट जब चाहे हटाया जा सकता है। सोनिया-राहुल ने अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद भी अपना स्थान सुरक्षित कर लिया। रायपुर अधिवेशन में “पूर्व कांग्रेस अध्यक्षों और पूर्व प्रधानमंत्रियों को CWC में स्थायी सदस्यता” दे दी गई। गांधी परिवार और नियुक्त पदाधिकारी आपसी वफादारी के नाम पर साथ चलते हैं, जबकि कांग्रेस डूबती जा रही है। मनोनीत पदाधिकारी ये राग गाते रहते हैं कि सिर्फ गांधी परिवार ही पार्टी को एकजुट रख सकती है। पार्टियां भविष्य की राजनीति पर काम करके जीतती हैं, अतीत के किस्सों पर नहीं या युवाओं को विरासत में मिले विशेषाधिकारों का दिखावा करके नहीं। और गांधी-वाड्रा परिवार इस मामले में कई क्षेत्रीय पार्टियों की ही तरह हैं, जहां उनकी तरह ही परिवार केंद्रीय भूमिका में है।

राहुल गांधी पार्टी के मनोनीत पदाधिकारियों पर भले ही दबदबा रखते हों, लेकिन ‘इंडिया’ ब्लॉक के नेताओं ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने साफ संकेत दिया कि वह उनके पीएम प्रत्याशी के संभावितों की लिस्ट में भी नहीं हैं। उन्होंने दलित समुदाय से खरगे को पीएम उम्मीदवार के रूप में पेश करके ये बात तेज कर दी। यह देखना बाकी है कि सीटों के बंटवारे में ‘इंडिया’ ब्लॉक की बात चलेगी या कोई पार्टी गठबंधन साथ छोड़ देगी।

कांग्रेस की उम्मीद तेलंगाना, कर्नाटक और हिमाचल पर टिकी है, लेकिन दूसरी तरफ राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और गुजरात जैसे बड़े राज्यों में उसकी पकड़ कमज़ोर हुई है। हिंदी पट्टी के बड़े राज्यों में इस हार से अन्य राज्यों में सीट शेयरिंग को लेकर उसकी मोल-तोल की क्षमता भी बुरी तरह प्रभावित होगी। जैसे बिहार में उसे जेडीयू, महाराष्ट्र में एनसीपी और उद्धव ठाकरे की शिवसेना, यूपी में समाजवादी पार्टी, पश्चिम बंगाल में टीएमसी, झारखंड में जेएमएम, पंजाब और दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ सीटों के तालमेल में कांग्रेस की मोलभाव की क्षमता कम हुई है। इसका मतलब है कि एक तरफ तो सीधे मुकाबले वाले राज्यों में कांग्रेस को बीजेपी के तूफान से खुद निपटना होगा और दूसरी तरफ क्षेत्रीय दलों से मुकाबले वाले राज्यों में ये दुआ करनी होगी कि उसके सहयोगी दल बीजेपी पर भारी पड़ें।

इंडिया’ ब्लॉक के नेताओं को लगता है कि चुनाव को “मोदी बनाम कौन” और धार्मिक मुद्दों से हटाकर रोजमर्रा की समस्याओं पर लाना सबसे अच्छा तरीका है। लेकिन ज़्यादातर पार्टियां एक ही राज्य में मजबूत हैं, वो पूरे देश में कांग्रेस की मदद नहीं कर सकतीं और बीजेपी के सीधे मुकाबले में उसका साथ नहीं दे सकतीं। पिछले चुनावों ने ये भी दिखाया कि ‘मुफ्त की रेवड़ियों’ की होड़ भी बीजेपी के धार को कुंद नहीं कर सकतीं।

इंडिया ब्लॉक के नेताओं को मोदी के दो दांव – ‘वंशवादी राजनीति’ और ‘भ्रष्टाचार’ के जवाब देने में भी मुश्किल हो रही है। जब एक मंच पर ज़्यादातर नेता अपने परिवार के साथ नज़र आते हैं, तो ब्लॉक ‘कंगारू की कतार’ जैसा लगता है और जब उनमें से कई ज़मानत पर रिहा हैं या भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच का सामना कर रहे हैं, तो इससे उनकी छवि को धक्का लगता है। अभी तक ‘इंडिया’ ब्लॉक के पास कोई ऐसा सकारात्मक और विश्वसनीय नैरेटिव नहीं है जो उन मतदाताओं को लुभा सके जिन्हें फ्लोटिंग माना जाता है। यानी ऐसे वोटर जो चुनाव आने तक तय नहीं कर पाते कि उन्हें किसे वोट देना चाहिए। राजनीति में कुछ भी निश्चित नहीं होता, इसलिए कांग्रेस और ‘इंडिया’ ब्लॉक मोदी सरकार के कामकाज के कमजोर पहलुओं को उठा रहे हैं, इस उम्मीद में कि मतदाता बदलाव चाहते हैं। वो इतिहास का हवाला दे रहे हैं कि नेहरू के अलावा किसी केंद्र सरकार को लगातार तीन चुनाव जीत नहीं मिली। इंडिया ब्लॉक तो चमत्कार के लिए प्राथर्ना कर रहा है।

क्या लोकसभा चुनाव में राम मंदिर रामबाण साबित होगा?

राम मंदिर लोकसभा चुनाव में रामबाण साबित हो सकता है! अयोध्या में राम मंदिर में रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा समारोह को लेकर तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। मकर संक्रांति के दिन से ही राम की नगरी में रामोत्सव शुरू हो जाएगा। इस दौरान विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित होंगे। 22 तारीख को प्राण प्रतिष्ठा के बाद मंदिर में दर्शन का दौर शुरू होगा। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार इस पूरे कार्यक्रम को यूपी की अर्थव्यवस्था में बड़े बूस्ट के एक बेहतरीन मौके की तरह देख रही है। ग्लोबल ब्रांडिंग के लक्ष्य के साथ अयोध्या का पूरा कायाकल्प किया जा रहा है। यही नहीं अयोध्या के विकास का असर आसपास के जिलों तक देखा जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ इस मौके को भारतीय जनता पार्टी लोकसभा चुनाव 2024 में राम लहर पैदा करने की कोशिश में है। पहले बात करते हैं भारतीय जनता पार्टी की। भारतीय जनता पार्टी ने राम मंदिर को लेकर डिटेल प्लान तैयार कर लिया है। पार्टी सूत्रों के अनुसार पीएम नरेंद्र मोदी के प्राण प्रतिष्ठा कराने के अगले ही दिन यानी 23 जनवरी से अयोध्या में भाजपा का 5 हजार भक्तों को रोजाना दर्शन कराने का प्लान है। इस दौरान पार्टी की तरफ से भक्तों का ढोल नगाड़ों से स्वागत किया जाएगा। यही नहीं देश भर में राम मंदिर आंदोलन की याद दिलाने के लिए भाजपा कार्यकर्ता इसके इतिहास के संदर्भ में बुकलेट भी बांटेंगे। इस बुकलेट में राम मंदिर आंदेालन के दौरान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा के नेताओं की प्रमुख भूमिका का जिक्र होगा। यही नहीं कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल आदि विपक्षी दलों द्वारा रोड़े अटकाने की बातों का भी जिक्र होगा।

देश भर में पहले से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद अक्षत वितरण कार्यक्रम चला रहा है। संघ और विहिप कई कार्यक्रम भी चला रहे हैं। इन सभी में भाजपा कार्यकर्ता भी जुटेंगे। पूरी कोशिश है कि देश भर में पब्लिक कनेक्ट और मजबूती से स्थापित हो जाए। हर बूथ से कम से कम एक व्यक्ति/परिवार को राम मंदिर में रामलला के दर्शन कराए जाने की योजना है। इसमें सबसे ज्यादा जोर दक्षिण के राज्यों पर है। पार्टी की रणनीति का आयाम इतना बड़ा है कि कोशिश है कि लोकसभा चुनाव से पहले कम से कम 5 हजार लोग रोजाना दर्शन करें और ताकि वह लौटकर अपने क्षेत्र में पार्टी का प्रचार करें। यूपी ही नहीं उत्तर भारत के अन्य राज्यों से भी सीधे बस सेवा देने की योजना है। इसमें वहां की भाजपा सरकारों से भी सहयोग लिया जाएगा। यही नहीं रेलवे ने जो स्पेशल ट्रेनें चलाने का ऐलान किया है, उसका भी ज्यादा से ज्यादा लाभ भाजपा उठाएगी। जिस तरह रैलियों को लेकर रणनीति बनती है, ठीक वैसे ही इसकी भी प्लानिंग है। जो कार्यकर्ता लोगों को राम मंदिर यात्रा के लिए लेकर आएगा, वही उनके लौटने तक उनकी पूरी सहूलियत का ख्याल रखेगा। इसमें पार्टी के अन्य कार्यकर्ता उसका सहयोग करेंगे।

वहीं दूसरी तरफ योगी सरकार राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह को ऐतिहासिक बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही। दरअसल सरकार इसे उत्तर प्रदेश की ग्लोबल ब्रांडिंग के मौके के तौर पर देख रही है। यहां वर्ल्ड क्लास एयरपोर्ट शुरू हो गया है, अयोध्या में तमाम कंपनियों के होटल खोलने की तैयारी है। यही नहीं अयोध्या का विस्तार कर एक अलग प्लांड शहर बसाया जा रहा है। यही नहीं राम मंदिर समारोह के दौरान विशिष्ट अतिथियों को यूपी की वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट योजना से गिफ्ट दिया जाएगा। कोशिश है कि यूपी के हर जिले के अलग उत्पादों को ग्लोबल ब्रांडिंग मिले। वैसे खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यूपी के इन प्रोडक्ट को कई अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों में अतिथियों को भेंट कर चुके हैं। सीएम योगी आदित्यनाथ खुद आयोजन की पूरी व्यवस्था पर नजर बनाए हुए हैं।सीएम योगी का कहना है कि पूरी दुनिया अयोध्या की ओर उत्सुकता से देख रही है। हर कोई अयोध्या आना चाहता है। पूरा देश राममय है। यह उत्तर प्रदेश की ग्लोबल ब्रांडिंग का सुअवसर भी है। प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में आने वाले अतिथियों तथा उसके बाद पर्यटकों/श्रद्धालुओं के आगमन को सुखद, संतोषप्रद अनुभव के लिए राज्य सरकार कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेगी। जनसहयोग से अयोध्या नगरी सुरक्षा, सुविधा और स्वच्छता का मानक होगी। यह श्रीराममंदिर ‘राष्ट्रमन्दिर’ के रूप में भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक एकता का प्रतीक होगा।

उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि 22 जनवरी के बाद अयोध्या में दुनिया भर से रामभक्तों का आगमन होगा। उनकी सुविधा के लिए पूरे नगर में विभिन्न भाषाओं में साइनेज लगाए जाएं। संविधान की 08वीं अनुसूची में सम्मिलित भाषाओं और संयुक्त राष्ट्र की 09 भाषाओं में साईनेज हों। प्रयागराज-अयोध्या,गोरखपुर- अयोध्या, लखनऊ-अयोध्या, वाराणसी-अयोध्या मार्ग पर स्मार्ट साइनेज लगाये जाएं। विभिन्न भाषाओं में सूचना प्रसारित हो। इन मार्गों पर अतिक्रमण कतई न हो। स्वच्छता हो। रेहड़ी-पटरी व्यवसायी न हो। क्रेन, एम्बुलेंस की उपलब्धता हो। इसके लिए मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा संबंधित जनपदों को निर्देशित किया जाए।

जनवरी में जहां एक तरफ भव्य श्रीराम मंदिर का उद्घाटन होगा। वहीं दूसरी तरफ कई विकास कार्य भी पूरे हो जाएंगे। इलमें 394 करोड़ से 4 लेन अयोध्या-अकबरपुर बसखारी मार्ग, एनएच 27 से रामपथ तक रेलवे समपार, पंचकोसी परिक्रमा मार्ग पर बड़ी बुआ रेलवे क्रॉसिंग पर ओवर ब्रिज, दर्शन नगर के पास रेलवे ओवर ब्रिज, अमानीगंज में मल्टी लेवल पार्किंग, कलेक्ट्रेट के पास स्मार्ट वाहन पार्किंग, पंचकोसी और चौदहकोसी मार्ग पर इंटरप्रिटेशन वॉल का निर्माण, परिक्रमा मार्ग पर 25 से ज्यादा पयर्टन स्थलों और कुंडों का विकास, डेकोरेटिव पोल और हेरिटेज लाइटों की स्थापना का कार्य, कौशल्या सदन का निर्माण, मुक्ति वैकुंठ धाम के विकास का कार्य पूरा हो जाएगा। फरवरी में अयोध्या के 7 वार्डों में 24 घंटे जलापूर्ति, सूर्यकुंड के पास आरओबी, मार्च में अयोध्या अकबरपुर मार्ग पर फतेहगंज आरओबी, अयोध्या बिल्हौरघाट 4 लेन सड़क, गुप्तार घाट का सौंदर्यीकरण, नया घाट से लक्ष्मण घाट तक पर्यटन सुविधाओं का विकास, अयोध्या सोलर सिटी का कार्य पूरा कर लिया जाएगा। अप्रैल में अवध बस स्टैंड के पास आश्रय गृह का निर्माण, नाका बाइपास के पास कल्याण भवन का निर्माण, चार ऐतिहासिक प्रवेश द्वारों का निर्माण पूरा कर लिया जाएगा।

क्या दक्षिण में अपनी पैठ बढ़ा सकेंगे पीएम मोदी?

पीएम मोदी अब धीरे-धीरे दक्षिण में अपनी पैठ बढ़ा रहे हैं! लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने अपने लिए ‘अबकी बार 400 पार’ का लक्ष्य दिया है। कार्यकर्ताओं को 50+% का महत्वाकांक्षी टारगेट दिया गया है। लेकिन क्या ये इतना आसान है? खासकर तब जब तमाम राज्यों में बीजेपी की सीटें पहले ही अपने चरम पर हैं यानी अब सीटें बढ़ने से रहीं, हां घट जरूर सकती हैं। ऐसे में बीजेपी लगातार तीसरी बार केंद्र की सत्ता में हैटट्रिक का लक्ष्य कैसे पूरा करेगी? बीजेपी को बखूबी पता है कि लक्ष्य आसान नहीं लेकिन मोदी की अगुआई में पार्टी धीरे-धीरे दक्षिण में भी अपनी पैठ बढ़ा रही है। काशी-तमिल संगमम से लेकर त्रिशूर में महिला संगमम तक, नरेंद्र मोदी चुपके-चुपके दक्षिण में बीजेपी की पैठ बढ़ा रहे हैं। तमिलनाडु दौरे के अगले दिन बुधवार को पीएम मोदी केरल में ‘2 लाख महिलाओं’ की रैली के जरिए दक्षिण भारत में बीजेपी के लोकसभा अभियान का शंखनाद कर चुके हैं। केरल के त्रिशूर में ‘नारी शक्ति मोदीकोप्पम महिला संगमम’ के जरिए बीजेपी शक्तिप्रदर्शन कर रही है। पार्टी का दावा है कि ये कार्यक्रम अभूतपूर्व है क्योंकि दक्षिण भारत में किसी भी पार्टी के कार्यक्रम में महिलाओं की इतनी बड़ी भागीदारी नहीं हुई है। ये कार्यक्रम ऐतिहासिक महिला आरक्षण कानून को संसद के दोनों सदनों से मंजूरी मिलने पर केरल की महिलाओं की तरफ से पीएम मोदी को धन्यवाद देने के लिए है। बिना किसी शोरशराबे के बीजेपी चुपचाप दक्षिण में अपनी जड़ें मजबूत करने में जुटी है। कांग्रेस के हाथों कर्नाटक हारने के बाद अभी दक्षिण के किसी राज्य में उसकी सरकार नहीं है। लेकिन पार्टी लगातार वहां अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में है। 119 सीटों वाली तेलंगाना विधानसभा चुनाव में पार्टी ने न सिर्फ 8 सीटों पर जीत दर्ज की बल्कि अपना वोटशेयर भी दोगुना किया। 2018 में सूबे में पार्टी को 6.2 प्रतिशत वोट मिले थे जो इस बार बढ़कर 14 प्रतिशत के करीब रहा। इतना ही नहीं, कामरेड्डी सीप पर तो बीजेपी के के. वेंकट रमन रेड्डी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव और तेलंगाना कांग्रेस अध्यक्ष रेवंत रेड्डी दोनों को शिकस्त दी। हालांकि, दोनों नेता अपनी-अपनी दूसरी सीट से जीतने में सफल रहे और कांग्रेस के रेवंत रेड्डी तो मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे। पार्टी का ये प्रदर्शन बताता है कि तेलंगाना में उसका प्रदर्शन कोई तुक्का नहीं है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में बीजेपी ने पिछले कई सालों की कोशिशों से धीरे-धीरे एक नया वोट बैंक तैयार करने में सफलता हासिल की है। ये नया वोट बैंक है आधी आबादी यानी महिलाओं का। ऐतिहासिक महिला आरक्षण बिल को संसद से पास कराना उसी दिशा में एक अहम कदम है। एक ही बार में तीन बार तलाक बोलकर महिला से रिश्ता खत्म करने की बुराई तलाक-ए-बिद्दत को बैन करने से मुस्लिम महिलाओं को फायदा पहुंचा है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और राज्यों की कई बीजेपी सरकारें महिलाओं को सीधा फायदा पहुंचाने वाली कई तरह की कल्याणकारी योजनाएं चला रही हैं। केंद्र सरकार की बात करें तो उसकी बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, सुकन्या समृद्धि योजना, उज्ज्वला योजना, जनधन अकाउंट, मिशन पोषण, सुरक्षित मातृत्व आश्वासन, मैटरनिटी लीव को 12 की जगह 26 हफ्ते करना, मातृवंदन योजना के तहत बच्चे के जन्म पर मां को 5000 रुपये जैसी तमाम योजनाएं महिलाओं पर ही केंद्रित हैं। आर्मी में महिलाओं को परमानेंट कमीशन देने जैसे कदम से समान अवसर और समानता का अधिकार देने की कोशिश की। उज्ज्वला योजना के तहत 10 करोड़ महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन का लाभ मिला है। अभी अयोध्या में पीएम मोदी ने उज्ज्वला योजना की 10 करोड़वीं लाभार्थी से मुलाकात की थी। इसके अलावा जनधन योजना के तहत 27 करोड़ महिलाओं का बैंक में खाता खुला है। बैंक से बिना गारंटी के कर्ज वाली मुद्रा लोन योजना के लाभार्थियों में 70 प्रतिशत महिलाएं हैं। स्टैंड अप इंडिया स्कीम के लाभार्थियों में भी आधे से ज्यादा महिलाएं हैं। चुनावों में बीजेपी को मोदी सरकार की इन स्कीम का लाभ मिलता रहा है।

2019 के लोकसभा चुनाव की बात करें तब देश में कुल 91 करोड़ वोटर थे जिनमें से 44 करोड़ महिलाएं थीं। बीते कई बार से चुनाव में महिलाएं पुरुषों के मुकाबले बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। 2019 में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया था। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 2019 में कुल रजिस्टर्ड महिला वोटरों में से 67.18 फीसदी ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया जबकि पुरुषों के मामले में ये आंकड़ा 67.02 प्रतिशत था। तमिलनाडु, केरल, अरुणाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा जैसे 12 राज्य ऐसे थे जहां महिलाओं का वोटर टर्नआउट पुरुषों के मुकाबले ज्यादा था। इन राज्यों में लोकसभा की करीब 200 सीटें हैं। तमिलनाडु और केरल को छोड़कर बीजेपी ने 2019 में इन सभी राज्यों में जबरदस्त प्रदर्शन किया था। सीएसडीएस के आंकड़े बताते हैं कि देश में महिलाओं की पसंदीदा पार्टी बीजेपी है। 2019 में देशभर में बीजेपी को औसतन 36 प्रतिशत महिलाओं का वोट मिला। कांग्रेस को 20 प्रतिशत और बाकी 44 प्रतिशत वोट टीएमसी, बीजेडी जैसी क्षेत्रीय पार्टियों को मिले थे।

हिंदी पट्टी के तीन बड़े राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस बुरी तरह मुंह की खाई लेकिन तेलंगाना वह केसीआर की बादशाहत को खत्म करने में कामयाब रही। हालांकि, अजेंडा के तहत कुछ तत्वों ने पिछले महीने आए चुनाव नतीजों के आधार पर भारत को ‘उत्तर बनाम दक्षिण’ में बांटने की खूब कोशिश की। ऐसे तत्वों में I.N.D.I.A. गठबंधन की प्रमुख साझेदार डीएमके और कांग्रेस के कुछ स्वघोषित हमदर्द शामिल थे। लेकिन मोदी ने काशी-तमिल संगमम के जरिए उत्तर-दक्षिण बंटवारे की इस गंदी राजनीति की काट भी निकाल रखी है। पीएम मोदी ने 17 दिसंबर को दूसरे काशी तमिल संगमम केटीएस के दूसरे संस्करण का उद्घाटन किया जो 30 दिसंबर तक चला। पीएम ने केटीएस के जरिए रामेश्वरम और काशी के प्राचीन और सांस्कृतिक संबंधों को नया आयाम देने की कोशिश की है। इस कार्यक्रम को भले ही मोदी राजनीतिक नहीं मानते, लेकिन इस कल्चरल एक्सचेंज प्रोग्राम के जरिए बीजेपी को तमिलनाडु में जमीन तलाशने और उसे मजबूत करने में मदद मिलेगी।

आखिर हिट एंड रन पर क्यों हो रहा है हंगामा?

आज हम आपको बताएंगे की हिट एंड रन पर हंगामा क्यों हो रहा है! हिट-एंड-रन मामलों के लिए भारतीय न्याय संहिता में नए प्रावधानों के खिलाफ ट्रक ऑपरेटरों की हड़ताल ने पूरे देश की रफ्तार रोक दी। खाने-पीने की चीजों की आपूर्ति से लेकर परिवहन सेवाएं ठप्‍प हो गईं। हालात बिगड़ते देख सरकार ने भी ‘पैनिक’ बटन दबाने में देर नहीं लगाई। मंगलवार को देर शाम उसने वाहन चालकों के साथ सुलह का रास्‍ता निकाल लिया। सरकार के साथ यूनियनों ने भी ड्राइवरों को काम पर वापस लौटने की अपील की। ये ड्राइवर बीएनएस में हिट-एंड-रन मामलों को लेकर किए गए कड़े प्रावधानों से नाराज थे। ऐसे मामलों में 10 साल की सजा और सात लाख रुपये के जुर्माने के प्रावधान ने उनका पारा चढ़ा दिया था। सरकार ने साफ कर दिया कि नए कानून और प्रावधान लागू नहीं हुए हैं। इस पर कोई भी फैसला ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के साथ बातचीत के बाद लिया जाएगा। नए प्रावधानों के खिलाफ ड्राइवरों का विरोध सिक्‍के का एक पहलू है। लेकिन, इसका दूसरा पहलू भी है। उसे भी दरकिनार नहीं किया जा सकता है। सड़क दुर्घटनाओं और उनमें होने वाली मौतों का बढ़ता ग्राफ बेहद डराने वाला है। इनमें हिट-एंड-रन मामलों की भी हिस्‍सेदारी है। आइए, यहां आंकड़ों से समझने की कोशिश करते हैं कि क्‍यों हमें सड़क दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए कड़े प्रावधानों की जरूरत है? इस बारे में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के आंकड़े होश उड़ाने वाले हैं। इनसे पता चलता है कि 2022 में कुल सड़क दुर्घटनाओं और इनमें होने वाली मौतों में हिट-एंड-रन मामलों की हिस्सेदारी 14.6 फीसदी और 18.1 फीसदी थी। 2021 में यह संख्या 16.8 फीसदी और 11.8 फीसदी थी।

आंकड़े बताते हैं कि भारत में सड़क दुर्घटनाओं या इनमें होने वाली मौतों का कोई एक बड़ा कारण नहीं है। इसमें कई कारण शामिल हैं। जैसे आमने-सामने की टक्कर। पीछे या बगल से चोट। एक्‍सीडेंट और इनमें होने वाली मौतों में इनकी लगभग बराबर की हिस्सेदारी है। सटीक तौर पर कहें तो 2022 में नौ प्रकार की सड़क दुर्घटनाओं और इनसे जुड़ी मौतों के आंकड़ों में हिट-एंड-रन का हिस्सा पांचवें और दूसरे स्थान पर था। सरकार के आंकड़े कहते हैं कि 2022 में कुल सड़क दुर्घटनाओं में लगभग 72 फीसदी और इन सड़क दुर्घटनाओं में हुईं मौतों में 71 फीसदी ओवर स्‍पीडिंग के कारण हुईं। आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि नेशनल हाईवे पर सामान्य सड़कों की तुलना में दुर्घटना का ज्‍यादा खतरा होता है। जहां 2022 में कुल सड़क लंबाई में राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों की हिस्सेदारी सिर्फ 4.9 फीसदी थी। वहीं, सड़क दुर्घटनाओं में कुल मौतों का 60.5 फीसदी इन सड़कों पर हुईं।

जिन वाहनों ने सड़क दुर्घटनाएं कीं और जो वाहन इसका शिकार हुए उसका भी डेटा है। आंकड़ों से पता चलता है कि क्राइम और विक्टिम वीकल दोनों के मामले में दोपहिया वाहन सबसे आगे रहे। टू-वीलर की आपस में टक्‍कर का आंकड़ा सबसे अधिक है। जहां तक ट्रकों और लॉरियों का सवाल है, तो वे क्राइम वीकल ग्रुप जिन वाहनों से एक्‍सीडेंट हुआ में दूसरे नंबर पर रहे। उनके सबसे बड़े शिकार दोपहिया वाहन थे।

अगर मुकदमा पूरा हुआ हो तो नहीं। अन्य दुर्घटनाओं की तुलना में हिट-एंड-रन मामलों में सजा का आंकड़ा बेहतर है। उदाहरण के लिए जिन हिट-एंड-रन मामलों की सुनवाई 2022 में पूरी हुई, उनमें सजा की दर 47.9 फीसदी थी। अन्य दुर्घटनाओं के लिए यह दर महज 21.8 फीसदी थी। यहां तक कि हत्या और गैर इरादतन हत्या में भी सजा की दर कम थी। यह 43.8 फीसदी और 38.7 फीसदी थी। हालांकि, यह और बात है कि अन्य अपराधों की तरह हिट-एंड-रन के 90 फीसदी से अधिक मामले एक साल अदालतों में लंबित रहते हैं। यह ट्रेंड 2022 से पहले के वर्षों में भी यही था।

यहां जिन अन्‍य तीन अपराधों का जिक्र किया गया है, उनमें पुलिस को हिट-एंड-रन मामलों में चार्जशीट दाखिल करने में ज्‍यादा समय लगता है। 2022 में पुलिस की ओर से निपटाए गए हिट-एंड-रन मामलों में से केवल 66.4 फीसदी में आरोप पत्र दायर हुए। वहीं, हत्या के 81.5%, गैर इरादतन हत्या के 84% और 79.6% अन्य दुर्घटनाओं के मामलों में आरोप पत्र दाखिल हुए। हिट-एंड-रन मामलों में चार्जशीट दाखिल नहीं होने का एक बड़ा कारण है। वह यह है कि पुलिस को सच जानने के बावजूद भी सबूत नहीं मिलते हैं। 2022 में पुलिस की ओर से निपटाए गए हिट-एंड-रन मामलों में से 28% में अपर्याप्त सबूत या कोई सुराग नहीं होना रहा। हत्या के 11%, गैर इरादतन हत्या के 9% और अन्य दुर्घटनाओं के 11% मामले में ऐसा देखा गया। इससे पता चलता है कि हिट-एंड-रन मामलों में चार्जशीट दाखिल करने की दर के कम होने के पीछे अपराधी को न ढूंढ पाना एक कारण हो सकता है। शायद भारतीय दंड संहिता आईपीसी की जगह लेने वाले भारतीय न्‍याय संहिता बीएनएस में इस बात का भी ध्‍यान रखा गया था।

क्या बीजेपी की वजह से ही आप आए हैं राम मंदिर में रामलला?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बीजेपी की वजह से ही रामलला राम मंदिर में पधार पाए हैं! हम गोली नहीं चलाएंगे, दिल्ली में राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में जब उन्हें कारसेवकों के विरुद्ध कड़े कदम उठाने की सलाह दी गई तो उन्होंने बेहिचक यही बात कही। 30 अक्टूबर, 1990 को मुलायम सिंह यादव की सरकार ने आयोध्या में कारसेवकों पर गोलियां चलवाई थीं। अगले वर्ष 1991 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में मुलायम को मुख्यमंत्री की कुर्सी खोनी पड़ी और पहली बार बीजेपी को प्रदेश में अपना मुख्यमंत्री बनाने का मौका मिला। भाजपा ने इस पद के लिए कल्याण सिंह को चुना तो वो सीधे अयोध्या गए, राम लला का दर्शन करने। वहां उन्होंने अपना प्रण दुहराया- राम लला आपका मंदिर बनकर रहेगा, चाहे कुछ भी हो। कल्याण ने अपना संकल्प पूरा किया, भले ही उन्हें एक वर्ष में ही अपनी सरकार की आहुति देनी पड़ी। आज ‘राम मंदिर आंदोलन के स्तंभ’ की विशेष श्रृंखला में बात इन्हीं कल्याण सिंह की। 5 जनवरी, 1932 को अलीगढ़ जिला स्थित अतरौली गांव में जन्मे कल्याण सिंह ने दुनियादारी की समझ होते ही राष्ट्रवाद का रास्ता चुन लिया। वो अपने स्कूली दिनों में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस से जुड़ गए। देश के लिए कुछ कर गुजरने की लालसा ने उनमें अथक परिश्रमी और अटल संकल्प का व्यक्तित्व गढ़ दिया। कल्याण वाचाल थे तो समाज और सियासत में उनकी पूछ होने लगी। कद बढ़ा तो पद भी बढ़ा। 1967 में पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा

पहुंच गए और 10 साल बाद 1977 में पहली बार प्रदेश सरकार में मंत्री भी बने। 1980 के दशक शुरुआती दशक में जब विश्व हिंदू परिषद वीएचपी ने अयोध्या में राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण का आंदोलन चलाया तो कल्याण सिंह इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे। वो हिंदुत्व का प्रमुख चेहरा बन गए, खासकर उत्तर प्रदेश में।

कल्याण जब 1991 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तब तक भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या की रथयात्रा संपन्न हो चुकी थी। रथयात्रा को बिहार में रोककर आडवाणी को नजरबंद कर लेने के बावजूद राम मंदिर आंदोलन अपने उद्देश्य की तरफ बढ़ता रहा और 30 अक्टूबर, 1990 का वो दिन आया जब अयोध्या में कार सेवकों पर पुलिस ने गोलियां बरसा दीं। तब से मुलायम सिंह यादव की छवि मुल्ला मुलायम की बनने लगी। संभवतः मुलायम के कार सेवकों के प्रति इसी कठोर रवैये ने कल्याण सिंह को भी एक रास्ता सुझाया- किसी भी हद तक जाने का। उन्हें लगा कि अगर मंदिर बनने से रोकने वाले कुछ भी कर सकते हैं तो मंदिर बनाने की राह में आने वाली किसी बाधा की परवाह भला वो क्यों करें।

कल्याण सिंह की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया था कि बाबरी मस्जिद को नुकसान नहीं पहुंचने दिया जाएगा। लेकिन राम मंदिर निर्माण का निश्चय पक्का था, इसलिए सरकार ने अयोध्या में राम जन्मभूमि के आसपास 2.27 एकड़ जमीन खरीद ली और पास में ही राम चबूतरा बनवा दिया। सरकार का मकसद साफ था- तीर्थस्थल में पर्याप्त सुविधाएं सुनिश्चित करना। विश्व हिंदू परिषद भी लोगों को समझा-बुझाकर तीर्थस्थल के आसपास के इलाके की जमीनें खरीदने लगी। कल्याण सरकार ने भी जो जमीनें खरीदीं, वो विश्व हिंदू परिषद के ट्रस्ट को सौंपती गई। उसने राम कथा पार्क के लिए आसपास की 42.09 एकड़ जमीन विहिप ट्रस्ट को ट्रांसफर कर दी।

6 दिसंबर, 1992 को जब अयोध्या में कारसेवकों का जनसमुद्र उमड़ा तो आडवाणी समेत बीजेपी और आरएसएस के दिग्गज नेताओं ने उन्हें संभालने की भरपूर कोशिशें कीं। लेकिन रामभक्तों पर एक मानो एक जुनून सवार था- अत्याचार और अन्याय की सदियों पहले पड़ी नींव के प्रतीक रूप में बाबरी मस्जिद का सफाया। एक-एक कर कारसेवक बाबरी मस्जिद की गुंबदों पर चढ़ने लगे और कुछ देर में ही गुंबद टूटकर गिरने लगे। दो साल पहले उत्तर प्रदेश की जिस पुलिस ने अयोध्या की भूमि कारसेवकों के खून से रंग दी थी, वो बाबरी विध्वंस को चुपचाप देख रही थी। कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे के मुताबिक बाबरी की सुरक्षा में असफल रहने की नैतिक जिम्मेदारी लेने में देर नहीं की। उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अदालत की अवमानना के लिए 2,000 रुपये का जुर्माना लगाकर उन्हें 24 घंटे के लिए तिहाड़ जेल भेज दिया। जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें उस समय पद खोने का कोई पछतावा है तो कल्याण सिंह ने जवाब दिया कि मुख्यमंत्री का पद भगवान राम के सामने कुछ भी नहीं है। वर्षों बाद जब सुप्रीम कोर्ट ने ही राम जन्मभूमि पर ही भव्य मंदिर बनाने का रास्ता साफ कर दिया तो कल्याण सिंह ने लखनऊ में अपने आवास पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया।

इसमें उन्होंने कहा, ‘6 दिसंबर 1992 को जब बाबरी मस्जिद गिरी थी, मैंने अयोध्या में हुई अराजकता की पूरी जिम्मेदारी ली थी। मैंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर और उसी दिन राज्यपाल को इस्तीफा सौंपकर उसकी कीमत चुकाई थी। मेरा विश्वास है कि 2022-23 तक अयोध्या में एक भव्य राम मंदिर बनकर तैयार होगा, जिसके दर्शन देश-विदेश से लोग करेंगे।’ उन्होंने कहा, ‘हर किसी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है और उसे स्वीकार कर लिया है, जो न्यायपूर्ण, वैध और सर्व-समावेशी है। इसने 500 साल पुराने विवाद को समाप्त कर दिया है।’

क्या उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के आएंगे स्वर्ण दिन?

अब उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के स्वर्ण दिन आ सकते हैं! उत्तर प्रदेश सरकार ने अभी तक 2023-24 सत्र के लिए गन्ने का राज्य परामर्श मूल्य घोषित नहीं किया है। इस साल होने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर किसानों के साथ ही चीनी मिल भी कीमत को लेकर चिंतित हैं। किसानों को उम्मीद है कि अप्रैल-मई में होने वाले चुनाव से पहले उन्हें गन्ने की कीमत को लेकर खुशखबरी मिल जाएगी। गन्ना उत्पादक किसानों से लेकर शुगर मिल तक क्या है हाल, हर पहलू समझते हैं। गन्ने की पेराई का सत्र अक्टूबर से शुरू हो जाता है। लेकिन अब जनवरी का महीना आ गया और किसानों को यह ही नहीं पता है कि उन्हें वर्तमान सत्र के लिए गन्ने की क्या कीमत मिल रही है? इस बार गन्नों में रोग लगने की वजह से पैदावार पर भी असर पड़ा है। किसान संगठन गन्ने की SAP को बढ़ाए जाने की मांग कर रहे हैं। आखिरी बार 2021-22 में गन्ने की जनरल वेराइटी के लिए 340 रुपये प्रति क्विंटल और अर्ली वेराइटी के लिए 350 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाया गया था। वहीं गन्ने की सीओ-0238 वैरायटी के रेड रोट बीमारी होने की वजह से प्रति एकड़ फसल भी काफी कम हो गई है। यह पिछले सत्र में 121.35 लाख टन से 7.6 प्रतिशत तक कम है। हालांकि उत्तर प्रदेश में उत्पादन महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु जैसे राज्यों के मुकाबले बेहतर हुई है।2016-17 के सत्र में योगी सरकार के यूपी की सत्ता में आने के बाद से गन्ने की कीमत में प्रति क्विंटल के हिसाब से 35 रुपये की बढ़ोत्तरी हुई है। पहले के 305-315 से बढ़कर अब 340-350 रुपये प्रति क्विंटल कीमत हो गई है।

अगर सपा और बसपा शासनकाल की पिछली सरकारों पर नजर डालें तो अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्वकाल में गन्ने की कीमत में 65 रुपये प्रति क्विंटल 2011-12 में 240-250 से लेकर 2016-17 में 305-315 तक और मायावती के शासन में 125-130 रुपये प्रति क्विंटल 2006-07 में 125-130 से लेकर 2011-12 में 240-250 तक की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई थी। यह दोनों सरकारें 5 साल के लिए थीं, जबकि योगी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार दूसरी बार सत्ता में आई है। सरदार वीएम सिंह का कहना है कि किसानों को आज की तारीख में गन्ने की कटाई के लिए प्रति कुंतल के हिसाब से 45-50 रुपए लेबर चार्ज देना पड़ रहा है, जबकि 2 साल पहले 30 से 35 तक का दाम था। इसके साथ ही खाद, बीज, कीटनाशक का दाम भी काफी बढ़ा है। वहीं गन्ने की सीओ-0238 वैरायटी के रेड रोट बीमारी होने की वजह से प्रति एकड़ फसल भी काफी कम हो गई है।

हालांकि यह दिक्कत केवल किसानों की अकेले की ही नहीं है। उत्तर प्रदेश के शुगर मिल भी गन्ने की SAP घोषित करने में हो रही देरी को लेकर चिंतित हैं। इसकी वजह यह है कि गाने से गुड़ और खंडसारी जैसे विकल्प तैयार करने वाले प्रति क्विंटल के हिसाब से 20 से 50 रुपये तक अधिक कीमत अदा कर रहे हैं। ऐसे व्यापारी अधिक दाम दे रहे हैं और तुरंत ही कैश में दे दे रहे हैं। वहीं सरकार हमारे इनपुट यानी गन्ना और आउटपुट यानी चीनी सभी का दाम मॉनिटर करती है। नैशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्री लिमिटेड ने देश की शुगर आउटपुट 2023-24 में दिसंबर तक 112.10 लाख टन तक होने का अनुमान लगाया है। बता दें कि गन्ने की पेराई का सत्र अक्टूबर से शुरू हो जाता है। लेकिन अब जनवरी का महीना आ गया और किसानों को यह ही नहीं पता है कि उन्हें वर्तमान सत्र के लिए गन्ने की क्या कीमत मिल रही है? इस बार गन्नों में रोग लगने की वजह से पैदावार पर भी असर पड़ा है। किसान संगठन गन्ने की SAP को बढ़ाए जाने की मांग कर रहे हैं। आखिरी बार 2021-22 में गन्ने की जनरल वेराइटी के लिए 340 रुपये प्रति क्विंटल और अर्ली वेराइटी के लिए 350 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाया गया था।जबकि योगी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार दूसरी बार सत्ता में आई है।

सरदार वीएम सिंह का कहना है कि किसानों को आज की तारीख में गन्ने की कटाई के लिए प्रति कुंतल के हिसाब से 45-50 रुपए लेबर चार्ज देना पड़ रहा है, जबकि 2 साल पहले 30 से 35 तक का दाम था। इसके साथ ही खाद, बीज, कीटनाशक का दाम भी काफी बढ़ा है। वहीं गन्ने की सीओ-0238 वैरायटी के रेड रोट बीमारी होने की वजह से प्रति एकड़ फसल भी काफी कम हो गई है। यह पिछले सत्र में 121.35 लाख टन से 7.6 प्रतिशत तक कम है। हालांकि उत्तर प्रदेश में उत्पादन महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु जैसे राज्यों के मुकाबले बेहतर हुई है।