Friday, July 19, 2024
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घाटी में कश्मीरी पंडितों के बन रहे है घर मनमोहन की योजना को मोदी सरकार में मिली गति

हाल  मे  रिलीज हुई फिल्म कश्मीर फाइल्स के बाद कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार का मुद्दा  गर्मा गया है। कश्मीरी पंडितों के जख्म भी हरे हुए हैं । कश्मीर से विस्थापित हुए पंडितों को घाटी में फिर से बसाने के लिए मनमोहन सिंह सरकार ने रोजगार पैकेज की घोषणा की थी। अब मोदी सरकार ने इस प्रोजेक्ट को और मजबूत करके तेज गति से शुरू किया है। मनमोहन सरकार में सिर्फ नौकरी मिल रही थी, अब सरकार मकान भी दे रही है। श्रीनगर से बाल्टाल जाते वक्त रास्ते में गांदरबल पड़ता है। यहां कश्मीरी पंडितों के लिए प्रधानमंत्री विकास पैकेज में नौकरी पाने वाले लोगों को कवर्ड कैम्पस में बसाने की योजना है। इस प्रोजेक्ट के तहत घाटी में अलग-अलग जगहों पर विस्थापित कश्मीरियों के परिवारों को बसाने की योजना है।

स्थानीय   मीडिया  रिपोर्टर्स के मुताबिक PWD के कर्मचारी अब्दुल मजीद बताते हैं कि यहां 12 टावर पर काम चल रहा है। 5-6 टावर लगभग तैयार हैं। अगस्त तक आधे से अधिक टावर में लोग रहने लगेंगे। गांदरबल की तरह दूसरे इलाकों में निर्माण गति इतनी तेज नहीं है। गांदरबल में ही यहां से करीब तीन किमी दूरी पर भी 12 टावर प्रस्तावित है। यहां एक हफ्ते पहले ही काम शुरू हुआ है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के मुताबिक, 2015 से कश्मीरी पंडितों के लिए प्रस्तावित आवास का सिर्फ 17% काम ही पूरा हो सका है। 2015 में घोषित प्रधानमंत्री विकास पैकेज के तहत केंद्र सरकार ने कश्मीरी प्रवासियों के लिए 3,000 सरकारी नौकरियों को मंजूरी दी थी।

अब तक 1,739 प्रवासी कश्मीरियों को नौकरी दी जा चुकी है। इस लेटलतीफी पर रेवेन्यू डिपार्टमेंट के एक अधिकारी बताते हैं कि यह प्रोजेक्ट की सरकार की टॉप प्रायोरिटी हैं। एक अन्य अधिकारी बताते हैं कि कश्मीरी पंडितों को बसाने के इरादे से यह अच्छा आइडिया था। 2008 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस अनूठे रोजगार पैकेज की घोषणा की थी। इसका मकसद यह था कि विस्थापित कश्मीरियों को घाटी में उनके इलाके के आसपास नौकरी दी जाए। तब इस पैकेज में स्वीकृत 3,000 पदों में से 2,905 पदों को भरा गया था।

इसके बाद मोदी सरकार ने करीब 6 हजार आवास की घोषणा की, जिन्हें 920 करोड़ की लागत से नौकरी प्रदान की जानी थी। इस साल फरवरी तक केवल 1,025 आवास का ही निर्माण आंशिक या पूरा हो सका। 50% इकाइयों पर काम तक शुरू नहीं हो सका है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री पैकेज के तहत रोजगार पाने वाले लोगों को आवास की कमी से जूझना पड़ रहा है।

कई जगह आवासी परिसर बने हाल में इन कर्मचारियों को रहना पड़ रहा है। स्कीम से लोगों की वापसी पर यहां के कश्मीरियों का कहना है कि यहां वहां पिजरों में डालने से कश्मीरी पंडितों की कभी वापसी नहीं हो सकती। यदि आप दीवार बनाकर रखोगे तो कैसे काम करेगा, लोग पिंजरों में और दहशत में कैसे रह सकते हैं।

2744 के लिए टेंडर प्रक्रिया जल्द, 6 परिसर में लोग आ चुके हैं

सरकार के मुताबिक 1488 यूनिट लगभग तैयार हैं। 2,744 यूनिट के लिए टेंडर को अंतिम रूप दिया जा रहा है। कई कश्मीरी प्रवासी वेसु (कुलगाम), मट्टन (अनंतनाग), हाल (पुलवामा), नटनसा (कुपवाड़ा), शेखपोरा (बडगाम) और वीरवान (बारामूला) में मौजूदा ट्रांजिट रेसिडेंस में रह रहे हैं। उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर में 64,827 पंजीकृत प्रवासी परिवार हैं। इनमें 60,489 हिंदू परिवार, 2,609 मुस्लिम और 1,729 सिख परिवार हैं।

देरी की प्रमुख वजह

  • पहले भूमि उपलब्ध नहीं थी। 2019 में सरकार ने फैसला किया कि ये सारे फ्लैट्स सरकारी जमीन पर बनाए जाएंगे। इसके बाद भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई।
  • अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के कारण कश्मीर में कर्फ्यू था।
  • 2020-2021 में कोविड के कारण निर्माण कार्य प्रभावित हुआ था।
  • सर्दियों में आमतौर पर कोई निर्माण कार्य नहीं होता है। ये देरी की प्रमुख वजह रहा।
  • पिछले साल बाहरी मजदूरों पर आतंकी हमले हुए। बहुत सारे मजदूर कश्मीर छोड़ कर भागने लगे, इस कारण इन प्रोजेक्ट्स को मजदूरों की कमी से जूझना पड़ा।

 

ICHRRF ने माना, कश्मीरी पंडितों का नरसंहार हुआ 

वाशिंगटन स्थित अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (ICHRRF) ने कश्मीरी पंडितों पर हुए जुल्म को ‘नरसंहार’ माना है। इसमें शामिल दोषियों को सजा देने की मांग की है। ICHR ने कहा 1989-90 में जातीय और सांस्कृतिक नरसंहार हुआ था।

लोग कुछ इस तरह याद कर रहे है  , काले दिन को

“खौफ याद है… हवेली से टेंट में पहुंचीं “पुलवामा के गांव की तंग गलियों से गुजरते हुए हम कश्मीरी पंडितों की बस्ती पहुंचे तो खंडहर बने दर्जनों घर दिखे। इसी बस्ती में सड़क के सामने एक घर में हमारी मुलाकात बिंदु (परिवर्तित नाम) से हुई, जिनके पति दुकान चलाते हैं। अगल-बगल कश्मीरी पंडितों के खाली मकान हैं। उन्होंने बताया, उनका मायका 20 किमी दूर वुची गांव में है। दादा दीवान और पिता जमींदार थे।

आतंकवाद के काले दौर में हर तरफ तबाही थी। एक शाम हथियारबंद लोगों ने पड़ोसियों से ऐसा सुलूक किया हमारा सब्र टूट गया। रातोंरात पूरा परिवार आलीशान कोठी से निकलकर जम्मू के शरणार्थी टेंट में पहुंच गया। तीन साल टिनशेड में रहे। वहीं पढ़ाई की। शादी के बाद मैं यहां आई तो बहुत डर लगता था। घर से बाहर नहीं निकलती थी। बिंदी-सिंदूर तक नहीं लगाती थी। हालात सुधरने में काफी वक्त लग गया है।

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