Friday, March 20, 2026
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क्या भारत में बनेंगे मिलिट्री एयरक्राफ्ट C-295 ?

आने वाली समय में भारत में मिलिट्री एयरक्राफ्ट C-295 बनने जा रहे हैं! भारतीय वायुसेना का ‘महाबली’ कहे जाने वाले C-295 एयरक्राफ्ट अब भारत में ही बनेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और स्पेन के राष्ट्रपति पेड्रो सांचेज ने गुजरात के वडोदरा में देश के पहले प्राइवेट मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट प्रोडक्शन प्लांट का उद्धाटन किया। यह प्लांट भारत के प्राइवेट एविएशन इंडस्ट्री का पहला फाइनल असेंबली लाइन है। इसका मतलब है कि इस प्लांट से निकलने के बाद एयरक्राफ्ट सीधे उड़ान भरने के लिए तैयार होंगे। टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) परिसर में स्थित इस प्लांट में एयरबस C295 एयरक्राफ्ट तैयार किए जाएंगे। ये प्रोजेक्ट एयरोस्पेस उद्योग, मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम और रक्षा क्षमताओं के लिए एक मील का पत्थर है। पीएम मोदी ने कहा कि ‘मेक इन इंडिया’ के तहत ऐसे प्रोजेक्ट कई मायनों में हमारे लिए गेमचेंजर है। इस प्रोजेक्ट के आने से भारत में एयरक्राफ्ट निर्यात की महत्वाकांक्षा को भी बढ़ावा मिलेगा। जानकारी के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट से अलग-अलग साइट पर सीधे 3,000 से अधिक नौकरियां सृजित होंगी। इसके अलावा 15,000 से अधिक अप्रत्यक्ष नौकरियां भी निकलेंगी।’मेक इन इंडिया’ के तहत C-295 एयरक्राफ्ट का निर्माण भारत के लिए गेमचेंजर क्यों है इन 5 प्वाइंट्स में समझिए।

भारतीय वायु सेना (IAF) में C-295 एयरक्राफ्ट को शामिल करना देश की एयरलिफ्ट क्षमताओं में अहम साबित होगा। ये एयरक्राफ्ट, एयरबस डिफेंस एंड स्पेस की ओर से डिजाइन और तैयार किया गया है। ये कई मायनों में अहम है और अलग-अलग मिशन खास रोल निभाता रहा है। इसके जरिए आर्म्ड फोर्सेज का ट्रांसपोर्ट, कार्गो एयरलिफ्ट, मेडिकल सपोर्ट और समुद्री पेट्रोलिंग भी शामिल है। C-295 सोवियत एंटोनोव An-32 और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के एवरो 748 के पुराने बेड़े की जगह लेगा। C-295 एयरक्राफ्ट की क्षमता छोटे और कच्चे रनवे से भी ऑपरेट होने की है। इस खासियत की वजह से ये विमान चुनौतीपूर्ण इलाकों खास तौर से चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) और भारत के रणनीतिक समुद्री सीमा में नेविगेट को आदर्श बनाती है। एयरक्राफ्ट के टॉप क्रूज की स्पीड 482 किमी प्रति घंटे है। इसमें नौ टन तक कार्गो या 71 सैनिकों या 48 पैराट्रूपर्स को ले जाने की क्षमता है। C-295 IAF की परिचालन तत्परता और लचीलेपन को काफी बढ़ाता है। एक जंग-टेस्टेड ट्विन-टरबोप्रॉप, C295 में कार्गो-ड्रॉपिंग, इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल इंटेलिजेंस, मेडिकल इमरजेंसी, समुद्री गश्त के साथ ईंधन भरने की क्षमता भी है। इसी वजह से इसे भारतीय डिफेंस फोर्स के लिए एक बहुमुखी विकल्प है।

C-295 परियोजना भारत की ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल की आधारशिला बन गई है। इसका उद्देश्य आयात पर निर्भरता कम करना और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना है। C-295 कार्यक्रम के तहत, कुल 56 एयरक्राफ्ट तैयार की योजना है। इसमें एयरबस स्पेन में अपनी फाइनल असेंबली लाइन (FAL) से पहले 16 C-295 विमान भारत को सौंपेगा। इसके अलावा 40 एयरक्राफ्ट का निर्माण और असेंबलिंग टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) की ओर से वडोदरा में की जाएगी। अब तक पांच C-295 एयरक्राफ्ट भारतीय वायु सेना (IAF) को दिए जा चुके हैं। पहला C295 सितंबर 2023 में भारत में उतरा था।

टाटा-एयरबस C-295 प्रोजेक्ट से रोजगार और अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ने की उम्मीद है। गुजरात के वडोदरा में इस विमान के निर्माण से भारत के एयरोस्पेस इंडस्ट्री में एक विविधता आने की उम्मीद है, जो परंपरागत रूप से बेंगलुरू, हैदराबाद जैसे दक्षिणी क्षेत्रों में केंद्रित रहा है। जानकारी के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट से अलग-अलग साइट पर सीधे 3,000 से अधिक नौकरियां सृजित होंगी। इसके अलावा 15,000 से अधिक अप्रत्यक्ष नौकरियां भी निकलेंगी।

C295 परियोजना न केवल भारत की घरेलू जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि भविष्य में निर्यात के अवसर भी उपलब्ध कराएगा। स्पेन के सहयोग से गुजरात के वडोदरा में एयरक्राफ्ट का निर्माण और असेंबलिंग होगी। इसी के साथ ये भारतीय वायुसेना के लिए अहम पावर सेंटर बनने जा रहा। देश में अब फाइटर प्लेन, टैंक, सबमरीन के बाद अब ट्रांसपोर्ट प्लेन भी बनाए जाएंगे। पीएम मोदी ने ‘मेक इन इंडिया’ मंत्र के साथ यह प्लांट ‘मेक फॉर द ग्लोब’ के मंत्र को भी साकार करेगा। बता दें कि प्रोजेक्ट एयरोस्पेस उद्योग, मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम और रक्षा क्षमताओं के लिए एक मील का पत्थर है। पीएम मोदी ने कहा कि ‘मेक इन इंडिया’ के तहत ऐसे प्रोजेक्ट कई मायनों में हमारे लिए गेमचेंजर है। इस प्रोजेक्ट के आने से भारत में एयरक्राफ्ट निर्यात की महत्वाकांक्षा को भी बढ़ावा मिलेगा। भारतीय वायु सेना के लिए 40 सी-295 एयरक्राफ्ट बनाने के बाद एयरबस और टाटा कंपनी अन्य देशों से मिलने वाले ऑर्डर पर भी काम कर सकती हैं।

 

आखिर क्या है 2029 से पहले मोदी सरकार का नया प्लान?

आज हम आपको 2029 से पहले का मोदी सरकार का प्लान बताने जा रहे हैं! 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस समेत कई विपक्षी पार्टियों ने जातीय जनगणना का मुद्दा उठाया था। कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन ने वादा किया था कि उनकी सरकार आने पर कास्ट सेंसस कराया जाएगा। अब केंद्र की मोदी सरकार ने इस पर अहम फैसला लिया है। सरकार जातीय जनगणना नहीं बल्कि अगले साल बहुप्रतीक्षित जनगणना कराने जा रही है। 2026 तक इसे पूरा करने का लक्ष्य है। सूत्रों के अनुसार, इस प्रक्रिया में जातिगत गणना को शामिल किया जाए या नहीं, इस पर सुझाव मांगे जा रहे हैं। जनगणना के बाद, सरकार चुनाव क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण के लिए परिसीमन की प्रक्रिया शुरू करेगी। सूत्रों ने बताया कि इसके बाद महिला आरक्षण लागू किया जाएगा। ये दोनों प्रक्रियाएं जनगणना से जुड़ी हुई हैं। 2002 में, अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली तत्कालीन NDA सरकार ने 84वें संशोधन के माध्यम से परिसीमन को 25 साल के लिए स्थगित कर दिया था। उस समय कहा गया था कि यह 2026 के बाद की पहली जनगणना के प्रासंगिक आंकड़े सामने आने के बाद ही किया जाएगा।उन्होंने राज्य के लोगों से आबादी के प्रभाव का जिक्र किया, इसके साथ ही अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित किया है। इस मामले में सरकार के सूत्रों ने कहा कि वे इस चिंता से अवगत हैं और कोई भी उपाय जो दक्षिणी राज्यों को नुकसान पहुंचा सकता है, उससे बचा जाएगा। इसका मतलब था कि परिसीमन 2031 की जनगणना के बाद किया जाएगा।

हालांकि, सूत्रों के अनुसार, सरकार अब 2027 तक परिसीमन प्रक्रिया शुरू करने और एक साल के भीतर इसे खत्म करने की योजना बना रही है। जिससे अगले यानी 2029 के लोकसभा चुनाव, परिसीमन और महिला आरक्षण विधेयक लागू होने के बाद हो सकें। हाल ही में, भारत के महारजिस्ट्रार और जनगणना आयुक्त मृत्युंजय कुमार नारायण का कार्यकाल इस दिसंबर से आगे अगस्त 2026 तक बढ़ा दिया गया था। हालांकि, विभिन्न वर्गों की ओर से मांग की जा रही कि कास्ट सेंसस को जनगणना में शामिल किया जाए।

आरएसएस ने भी जातिगत जनगणना के विचार का समर्थन किया है। संघ ने कहा कि सही संख्या प्राप्त करना एक सुस्थापित प्रैक्टिस है। हालांकि, एक सूत्र ने बताया कि इसे कैसे किया जाए, इस पर कोई स्पष्टता नहीं है। अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और धर्म की मौजूदा गणना में ओबीसी श्रेणी को जोड़ने, इसमें सामान्य, एससी-एसटी श्रेणियों में उप-वर्गों के सर्वे को शामिल करने जैसे सुझाव हैं। परिसीमन की अपनी समस्याएं होंगी, क्योंकि दक्षिण के राज्य, संसद में अपने राजनीतिक हिस्से पर प्रभाव को लेकर चिंतित है। ऐसा इसलिए क्योंकि उत्तर में अधिक आबादी वाले राज्यों के कारण वहां अनुपातहीन संख्या में सीटें होंगी।

दक्षिण की विभिन्न राज्य सरकारों ने सार्वजनिक रूप से इस चिंता को उठाया है। इसमें आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और एनडीए की प्रमुख सहयोगी TDP के मुखिया चंद्रबाबू नायडू का भी नाम शामिल हैं। उन्होंने राज्य के लोगों से आबादी के प्रभाव का जिक्र किया, इसके साथ ही अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित किया है। इस मामले में सरकार के सूत्रों ने कहा कि वे इस चिंता से अवगत हैं और कोई भी उपाय जो दक्षिणी राज्यों को नुकसान पहुंचा सकता है, उससे बचा जाएगा।

एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट कर दिया है कि परिसीमन प्रक्रिया से उत्तर और दक्षिण के बीच कोई विभाजन नहीं होना चाहिए। हो सकता है कि जनसंख्या-क्षेत्र के फॉर्मूले को ठीक करने या बदलने से मदद मिल सके। बता दें कि सरकार चुनाव क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण के लिए परिसीमन की प्रक्रिया शुरू करेगी। सूत्रों ने बताया कि इसके बाद महिला आरक्षण लागू किया जाएगा। ये दोनों प्रक्रियाएं जनगणना से जुड़ी हुई हैं। 2002 में, अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली तत्कालीन NDA सरकार ने 84वें संशोधन के माध्यम से परिसीमन को 25 साल के लिए स्थगित कर दिया था। सभी स्टेकहोल्डर्स के साथ चर्चा होगी और आम सहमति बनेगी। परिसीमन प्रक्रिया के लिए आवश्यक संशोधनों में अनुच्छेद 81 (जो लोकसभा की संरचना को परिभाषित करता है), अनुच्छेद 170 (विधान सभाओं की संरचना), अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 55 (राष्ट्रपति चुनाव प्रक्रिया से संबंधित है जिसके लिए मूल्य चुनावी कॉलेज में प्रत्येक वोट का फैसला जनसंख्या के आधार पर किया जाता है), अनुच्छेद 330 और 332 (क्रमशः लोकसभा और विधान सभाओं के लिए सीटों के आरक्षण को कवर करना) में परिवर्तन शामिल हैं।

 

आरक्षण जैसे बड़े मुद्दे पर क्या बोली कांग्रेस?

हाल ही में आरक्षण जैसे मुद्दे पर कांग्रेस ने एक बड़ा बयान दे दिया है! कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने जाति आधारित जनगणना की एक बार फिर वकालत की है। उन्होंने बुधवार को कहा कि देश में यह कवायद होकर रहेगी और इस प्रक्रिया से दलितों, अन्य पिछड़ा वर्गों और आदिवासियों के साथ हो रहे अन्याय का पता चलेगा। जाति आधारित जनगणना का वास्तविक अर्थ न्याय है और उनकी पार्टी 50 फीसदी आरक्षण सीमा की दीवार को भी तोड़ेगी। महाराष्ट्र में 20 नवंबर को होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले नागपुर में संविधान सम्मान सम्मेलन में कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने ये बातें कही। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने जिस तरह से इस मुद्दे को उठाया वो बेहद अहम है। इससे पहले उन्होंने तेलंगाना में भी जाति जनगणना पर आवाज बुलंद की। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने एक दिन पहले कहा कि वो तेलंगाना में जाति जनगणना कराने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि वो तेलंगाना को देश भर में जाति जनगणना के लिए एक मॉडल बनाएंगे। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने भारत में जातिगत भेदभाव को अनोखा और दुनिया में सबसे बुरे में से एक बताया। वो देश में 50 प्रतिशत आरक्षण की बनावटी बाधा को ध्वस्त कर देंगे। भेदभाव की सीमा और प्रकृति का आकलन करने के लिए सबसे पहले जाति जनगणना की जानी चाहिए। इसलिए, मैं न केवल तेलंगाना में जाति जनगणना सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध हूं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करूंगा कि तेलंगाना देश में जाति जनगणना के लिए एक मॉडल बने।

सवाल उठ रहे कि क्या कांग्रेस नेतृत्व को कास्ट सेंसस में भविष्य नजर आ रहा? जिस तरह से हरियाणा के चुनाव में पार्टी को शिकस्त मिली उसे देखते हुए कांग्रेस अब कोई गलती नहीं करना चाहती। ऐसा इसलिए क्योंकि महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। पार्टी को उम्मीद है कि आरक्षण और जातीय जनगणना के मुद्दे से पार्टी को फायदा हो सकता है। यही वजह है कि राहुल गांधी ने नागपुर में संबोधन के दौरान संविधान, आरक्षण और कास्ट सेंसस का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि बाबासाहेब आंबेडकर की ओर से तैयार किया गया संविधान सिर्फ एक किताब नहीं बल्कि जीवन जीने का एक तरीका है। उसी तरह जाति जनगणना विकास का प्रतिमान है। इससे स्पष्टता आएगी और नया प्रतिमान बनेगा।

राहुल गांधी यूं ही जातिगत जनगणना की पैरवी नहीं कर रहे। इस मुद्दे को लेकर वो सीधे तौर पर आरएसएस और बीजेपी को टारगेट करना चाहते हैं। यही वजह है कि नागपुर में संविधान सम्मान सम्मेलन के दौरान उन्होंने कहा कि बीजेपी और आरएसएस अभी जातीय जनगणना को लेकर चर्चा कर रहे हैं कि उन्हें क्या रुख अपनाना चाहिए। जाति जनगणना पर उन्हें क्या कहना चाहिए। कांग्रेस नेता ने आगे कहा कि मैं आपसे कहना चाहता हूं कि आरएसएस-बीजेपी कुछ भी कर लें, जातीय जनगणना होकर रहेगी। इस पर जो भी चर्चा करनी है कर लें। भारत की जनता ने तय कर लिया है कि जाति जनगणना होकर रहेगी और 50 फीसदी की दीवार टूटेगी। यह आवाज धीरे-धीरे बढ़ रही है। हमारा काम है कि हम लोगों को समझाएं कि जाति जनगणना से ही संविधान की रक्षा होगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए रायबरेली सांसद ने कहा कि जब भी मैं जाति जनगणना की बात करता हूं, पीएम मोदी कहते हैं कि राहुल गांधी देश को बांटने की कोशिश कर रहे हैं। हमें देश को बताना होगा कि हम देश के हाशिए पर पड़े 90 फीसदी से अधिक लोगों को न्याय दिलाने के लिए लड़ रहे हैं। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने कहा कि संविधान समानता, एक व्यक्ति-एक वोट, सभी के लिए और हर धर्म, जाति, राज्य तथा भाषा के लिए सम्मान की बात करता है। देश में निर्वाचन आयोग जैसे अनेक संस्थान संविधान की भेंट हैं। राजाओं और राजकुमारों के समय निर्वाचन आयोग नहीं होता था।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी महाराष्ट्र और झारखंड चुनावों में संविधान की रक्षा और जातिगत जनगणना की बात कर रहे हैं। खास बात है कि इस बार राहुल मनुस्मृति की आलोचना भी कर रहे। हरियाणा में दलित वोटरों की नाराजगी से जो झटका लगा उसी को देखते हुए शायद कांग्रेस ने नई रणनीति बनाई है। पार्टी इस बार किसी भी कीमत पर दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के वोटों को खोना नहीं चाहती है। यही वजह है कि पार्टी झारखंड और महाराष्ट्र में ‘संविधान सम्मान सम्मेलन’ कर रही। झारखंड में हुए इसी सम्मेलन के दौरान राहुल गांधी ने मनुस्मृति को संविधान विरोधी पुस्तक बताया था। उन्होंने कहा कि संविधान और मनुस्मृति के बीच की लड़ाई वर्षों से चली आ रही है। राहुल गांधी ने झारखंड में मनुस्मृति की आलोचना करते हुए दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के वोटों पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने पाठ्यक्रम में आदिवासियों को जगह देने और 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा को खत्म करने की बात भी कही थी। इस दौरान उन्होंने ओबीसी अधिकारियों का भी मुद्दा उठाया। अब कांग्रेस नेता ने महाराष्ट्र में कहा कि सम्मान जैसे शब्दों का खूब इस्तेमाल हो रहा है, लेकिन अगर कोई व्यक्ति भूख से मर रहा हो तो सम्मान का क्या मतलब है।

राहुल गांधी ने कहा कि बेहतर है कि उस व्यक्ति को पैसे और ताकत का इस्तेमाल करके सशक्त और सक्षम बनाया जाए, उसके बाद उसे आपके सम्मान की जरूरत नहीं होगी। कुल मिलाकर राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व महाराष्ट्र-झारखंड चुनाव में जिस रणनीति से आगे बढ़ रहे, पार्टी को लग रहा इससे जनता का सपोर्ट उनके लिए बढ़ेगा। हालांकि उनकी ये रणनीति कितनी सफल होगी ये दोनों राज्यों के चुनाव नतीजों से स्पष्ट होगा।

 

महाराष्ट्र में दो खेमे खैराती पर भरोसा कर रहे हैं

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केंद्रीय गृह मंत्री और बीजेपी नेता अमित शाह ने आज महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में मतदाताओं का दिल जीतने के लिए पार्टी की ओर से संकल्प पत्र जारी किया. 25 सूत्रीय वादे में बीजेपी ने मुख्य रूप से महिला-किसानों और युवाओं के वोटों पर निशाना साधा है.
युयुधन भाजपा और ‘भारत’ मंच ने मुख्य रूप से खैराती राजनीति को एक उपकरण के रूप में उपयोग करके महाराष्ट्र की सत्ता पर कब्ज़ा करने के उद्देश्य से घोषणापत्र प्रकाशित किया। आज एनडीए और महायुति गठबंधन की प्रमुख सहयोगी बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में राज्य की महिलाओं को 2100 रुपये प्रति माह मदद देने का वादा किया है. बदले में, महाविकास अग्रहरि या भारत मंच ने महिलाओं के लिए प्रति माह 3,000 रुपये और मुफ्त बस यात्रा का वादा किया है।

राजनेताओं के अनुसार, कांग्रेस-एनसीपी-शिवसेना (यूबीटी) मंच ने मूल रूप से कर्नाटक के मॉडल पर महाराष्ट्र में भाजपा-गठबंधन को फंसाने की रणनीति अपनाई है। अपने ही वादे पर सत्ता में आने पर इंडिया मंच ने जातीय जनगणना का वादा कर गेरुआ खेमे की बेचैनी काफी बढ़ा दी है.

केंद्रीय गृह मंत्री और बीजेपी नेता अमित शाह ने आज महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में मतदाताओं का दिल जीतने के लिए पार्टी की ओर से संकल्प पत्र जारी किया. 25 सूत्रीय वादे में बीजेपी ने मुख्य रूप से महिला-किसानों और युवाओं के वोटों पर निशाना साधा है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विभिन्न भाषणों में खैराती की राजनीति की आलोचना की है, लेकिन भाजपा और महायुति नेतृत्व ने सत्ता पर कब्जा करने के लिए खैराती का रास्ता अपनाया है। संकल्प पत्र में कहा गया है कि अगर एनडीए सरकार सत्ता में आई तो महिलाओं को लाडली बहिन योजना के तहत प्रति माह 1500 टका के बजाय 25,000 टका प्रति वर्ष मिलेंगे। भाजपा ने मुख्य रूप से महिलाओं का वोट सुनिश्चित करने के लिए योजना में मासिक दान बढ़ाने का फैसला किया है। बीजेपी ने बताया कि मध्य प्रदेश में इसी तरह की योजना ने पार्टी को जीत दिलाने में मदद की. इसलिए पार्टी ने महाराष्ट्र में भी उसी समीकरण के मुताबिक आगे बढ़ने का फैसला किया है. लेकिन जैसे ही विपक्षी खेमे ने अपने वादे के बदले महिलाओं को 3000 रुपये प्रति माह देने की घोषणा की, गेरुआ खेमा असहज हो गया. हालात को संभालने के लिए बीजेपी नेतृत्व ने कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़ग के भाषण को हथियार की तरह इस्तेमाल किया है. बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद के शब्दों में कहें तो कर्नाटक में खैराती की राजनीति करते-करते खजाना खाली हो गया है. हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना जैसे कांग्रेस शासित राज्यों में भी यही स्थिति है। इसलिए खड़गे ने पार्टी नेतृत्व को खैराती राजनीति से परहेज करने की सलाह दी. महाराष्ट्रवासी कभी नहीं चाहेंगे कि उनके राज्य में वित्तीय अनुशासन टूटे।

सार्वजनिक तौर पर बीजेपी नेतृत्व ने विपक्षी राज्यों को राजकोषीय अनुशासन की याद दिलाई है, लेकिन बीजेपी ने अपने ‘संकल्प पत्र’ में परोपकार का ही रास्ता अपनाया है. दिल्ली में बीजेपी ने अरविंद केजरीवाल की बिजली क्षेत्र की सब्सिडी नीति की आलोचना की, लेकिन महाराष्ट्र में पार्टी ने केजरीवाल की राह पर चलते हुए बिजली बिल पर 30 फीसदी सब्सिडी की घोषणा की. इसके अलावा बीजेपी ने किसानों का वोट पाने के लिए कृषक सम्मान निधि योजना में 12 हजार की जगह 15 हजार रुपये देने का वादा किया है. फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य में कम से कम 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी की घोषणा की गई है, जो महाराष्ट्र जैसे कृषि प्रधान राज्यों के किसानों की लंबे समय से चली आ रही मांग रही है। किसानों द्वारा उर्वरक की खरीद पर राज्य को लगने वाले जीएसटी को भी माफ करने की घोषणा की गई है। गरीबों के लिए पर्याप्त आवास और खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के अलावा, बुजुर्गों का वोट पाने के लिए वरिष्ठ नागरिक भत्ता 1500 रुपये से बढ़ाकर 2100 रुपये कर दिया गया है। राज्य के 15000 गांवों को पक्की सड़कों से जोड़ा जाएगा साथ ही आशा कार्यकर्ताओं को 1500 रुपये भत्ता दिया जाएगा. इसके अलावा युवा समाज का वोट सुरक्षित करने के लिए 10 लाख छात्रों को प्रति माह 10,000 टका का अनुदान और 25 लाख नई नौकरियों का वादा किया गया है। कांग्रेस का कटाक्ष, नरेंद्र मोदी ने कभी साल में दो करोड़ नौकरियां देने का वादा किया था. वह वादा पूरा नहीं हुआ. अब एनडीए गठबंधन ने नयी नौकरियों का वादा कर युवाओं को भ्रमित करने की रणनीति अपनायी है.

दूसरी ओर, एमवीए गठबंधन ने आज अपना ‘महाराष्ट्रनामा’ जारी किया और कहा कि यह राज्य के समग्र विकास के उद्देश्य से किया गया है। ‘महाराष्ट्र नामा’ नामक प्रतिज्ञा का उद्देश्य महाराष्ट्र के किसानों और कृषि क्षेत्र में सुधार, औद्योगिक विकास, शहरी विकास, पर्यावरण संरक्षण और लोक कल्याण है। आज ‘महाराष्ट्रनामा’ का उद्घाटन करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने दावा किया कि अगर उनकी प्रतिज्ञा पर अमल हुआ तो महाराष्ट्र के हर परिवार को प्रति वर्ष तीन लाख रुपये की सरकारी सहायता मिलेगी. इंडिया अलायंस के मुताबिक, प्रत्येक परिवार की महिलाओं को प्रति माह 3,000 रुपये की वित्तीय सहायता मिलेगी। साथ ही इस राज्य में महिलाओं को कर्नाटक की तरह मुफ्त बस सेवा भी मिलेगी. यह भी बताया गया है कि बेरोजगार युवाओं को 5000 टका की वित्तीय सहायता के अलावा प्रति माह 4000 टका का भत्ता मिलेगा ताकि किसान समय पर अपना ऋण चुका सकें। इंडिया अलायंस ने राज्य के नागरिकों को हर परिवार को 25 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा कवरेज प्रदान करने के अलावा मुफ्त दवा वितरण प्रणाली प्रदान करने का भी वादा किया है।

जहां बीजेपी नेतृत्व गणना के मुद्दे पर पूरी तरह से चुप है, वहीं इंडिया अलायंस ने अपने प्रतिज्ञा पत्र ‘महाराष्ट्र नामा’ में इसे प्रमुखता दी है. खड़गे ने कहा कि अगर वह सत्ता में आए तो सबसे पहले राज्य में जाति जनगणना कराई जाएगी. उन्होंने आरक्षण पर 50 फीसदी की सीमा हटाने का वादा किया. लोकसभा चुनाव अभियान में, इंडिया अलायंस जाति गणना की वकालत करके दलितों और पिछड़े वर्गों के वोटों को आकर्षित करने में सक्षम था। इस मामले में भी, इंडिया अलायंस ने अनुसूचित जाति, जनजाति और ओबीसी के वोट सुनिश्चित करने के लिए जाति गणना और आरक्षण की ऊपरी सीमा को उठाने की पुरजोर वकालत की है। इस संदर्भ में अमित शाह का कटाक्ष, ”दरअसल,

जीत के बाद ट्रंप का पुतिन को फोन, यूक्रेन में युद्ध रोकने को कहा, याद दिलाई अमेरिका की ताकत

ट्रंप ने पिछले गुरुवार को फ्लोरिडा स्थित अपने आवास से पुतिन को फोन किया था. अमेरिकी चुनाव के नतीजे अभी पूरे नहीं आये थे. लेकिन रिपब्लिकन की जीत सुनिश्चित थी. अमेरिकी चुनाव जीतने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को फोन किया. वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने पिछले गुरुवार को फ्लोरिडा स्थित अपने आवास से पुतिन से फोन पर बातचीत की थी. अमेरिकी चुनाव के नतीजे अभी पूरे नहीं आये थे. इससे पहले दोनों प्रदेश नेताओं के बीच बातचीत हुई. सूत्रों के मुताबिक, उनकी बातचीत का मुख्य विषय यूक्रेन में युद्ध था.

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ट्रंप ने पुतिन से यूक्रेन के साथ युद्ध रोकने की अपील की थी. उन्होंने अमेरिका की ‘ताकत’ की भी याद दिलाई. संयुक्त राज्य अमेरिका के भावी राष्ट्रपति ने फोन पर पुतिन को यूरोप में अमेरिकी सेना की ताकत की याद दिलाई। इस संबंध में समाचार एजेंसी एएफपी ने ट्रंप के प्रतिनिधियों से संपर्क किया. लेकिन वे कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते थे. ट्रंप ने पुतिन से यूक्रेन युद्ध और उससे जुड़ी जटिलताओं पर बात की. बताया जाता है कि उन्होंने युद्ध समाप्त करने और समस्या का स्थायी समाधान खोजने के लिए बातचीत करने की इच्छा भी व्यक्त की है।

चुनाव से पहले यह ज्ञात था कि ट्रम्प रूस-यूक्रेन युद्ध के त्वरित समाधान में रुचि रखते हैं। कई लोगों का मानना ​​है कि ट्रम्प यूक्रेन को अरबों डॉलर की युद्ध सहायता नहीं देंगे, जैसा कि जो बिडेन प्रशासन ने किया था। बल्कि उसकी रुचि युद्ध रोकने में अधिक है. उनके सत्ता में आने के बाद कई लोग उम्मीद कर रहे हैं कि पिछले तीन साल से चल रहा ये युद्ध रुक सकता है. ट्रंप ने पिछले बुधवार को यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की से फोन पर बात की थी। सूत्रों के मुताबिक, अमेरिकी अरबपति एलन मस्क भी उस कॉल में शामिल हुए. ज़ेलेंस्की ने कहा कि ट्रंप ने यूक्रेन के साथ करीबी रिश्ते और सहयोग बनाए रखने का आश्वासन दिया है.

ट्रंप ने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में भारी बहुमत से जीत हासिल की. नतीजों की घोषणा रविवार को पूरी हो गई. उन्होंने डेमोक्रेट्स से सभी सात स्विंग स्टेट छीन लिए। 20 जनवरी को ट्रंप दूसरी बार आधिकारिक तौर पर राष्ट्रपति पद पर आसीन होंगे। हालाँकि, निवर्तमान राष्ट्रपति बिडेन की सरकार ने कहा है कि व्हाइट हाउस 20 तारीख से पहले यूक्रेन को यथासंभव सहायता भेजेगा। इसके बाद ट्रंप प्रशासन पूर्वी यूरोप की इस समस्या को लेकर किस तरह आगे बढ़ेगा, इसका संकेत पुतिन के साथ उनके संवाद में मिला.

जिस समूह को पश्चिमी देश लंबे समय से हानिरहित मानते रहे हैं, क्या उसने इस बार उनके सामने जवाबी चुनौती पेश की है? क्या रूस कूटनीति की बिसात पर आगे बढ़ रहा है? हाल ही में रूस के कज़ान में आयोजित ब्रिक्स वार्षिक सम्मेलन में ऐसा संकेत मिला। संयोग से इस साल ब्रिक्स में कुनबा बढ़ गया है. मॉस्को की अध्यक्षता के दौरान इथियोपिया, मिस्र, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात पूर्ण सदस्य के रूप में ‘ग्लोबल साउथ’ के इस अंतरराष्ट्रीय मंच में शामिल हुए हैं। सऊदी अरब भी इस समूह में शामिल होने का इच्छुक है। ब्रिक्स के सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों समेत तीस से अधिक देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने बताया कि पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद क्रेमलिन “अकेला” नहीं हुआ है. सम्मेलन में समूह के सदस्यों ने न केवल गाजा में संघर्ष विराम का आह्वान किया, बल्कि फिलिस्तीन में नरसंहार और लेबनान पर आक्रमण के लिए इज़राइल की कड़ी निंदा भी की। वे पश्चिम के अवैध एकतरफा जबरदस्ती उपायों और प्रतिबंधों के खिलाफ भी एकजुट हैं, जो उनके अनुसार न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा रहे हैं, बल्कि कई देशों के सतत विकास में भी बाधा डाल रहे हैं। सदस्य देशों की मांगों, संप्रभु समानता, सर्वसम्मति, एक निष्पक्ष वित्तीय और व्यापार धारा और गठबंधन के कई अन्य सिद्धांतों के परिणामस्वरूप कई और देश इस मंच में शामिल होने में रुचि रखते हैं।

वर्तमान में, ब्रिक्स दुनिया की कुल आबादी का लगभग चालीस प्रतिशत और सकल घरेलू उत्पाद का एक चौथाई हिस्सा है। इस बार दुनिया के तीन सबसे बड़े तेल उत्पादक राज्यों – संयुक्त अरब अमीरात, ईरान और संभावित सऊदी अरब – के शामिल होने से निस्संदेह विश्व मंच पर ब्रिक्स का महत्व बढ़ गया है। इसके अलावा, इस गठबंधन ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में ‘ग्लोबल साउथ’ का प्रभाव बढ़ाया। ब्रिक्स विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के विकल्प के रूप में अपने न्यू डेवलपमेंट बैंक को मजबूत करने पर विचार कर रहा है। इसके अलावा, ब्रिक्स, खासकर रूस और चीन का एक लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार लेनदेन में डॉलर के प्रभुत्व और महत्व को कम करना और क्षेत्रीय मुद्राओं की मदद से एक वैकल्पिक तंत्र विकसित करना है। इस बीच कज़ान में भारत के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि प्रधानमंत्री मोदी की चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से अगल-बगल मुलाकात रही. दोनों पक्ष पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर संघर्ष समाप्त करने पर सहमत हुए।

लेकिन समस्या भी कई गुना है. सवाल यह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय बाजार में लेनदेन में डॉलर के प्रभुत्व को कम करना संभव होगा। इसके अलावा, सदस्यों की बढ़ती संख्या और उनकी अलग-अलग आर्थिक शक्ति और भू-राजनीतिक हितों के कारण समूह में संतुलन बनाना आसान नहीं है। यह भी सर्वविदित है कि चीन और रूस ब्रिक्स को जी7 के प्रतिद्वंद्वी के रूप में विकसित करने में रुचि रखते हैं, जिसमें अमेरिका भी वैश्विक अर्थव्यवस्था के चालक के रूप में शामिल है। भारत को सावधान रहना होगा कि आने वाले दिनों में नए समावेशन में किसी देश का अपना हित न हो। जहां भारत समेत ब्रिक्स के अन्य सदस्यों के पश्चिम के साथ रणनीतिक संबंध हैं, वहीं कोई नहीं चाहेगा कि उनके अपने हित में ये रिश्ते खराब हों। इसलिए इस समूह की प्रभावशीलता की कुंजी संतुलन है।

जान्हबीर को रंग-बिरंगा ‘कैसाटा’ खाने का शौक, ‘स्ट्रिक्ट’ डाइट बचाने के लिए उन्होंने आखिरकार क्या किया?

कसाटा या चमकीला तीन रंगों वाला आइसक्रीम केक किसी भी खाने के शौकीन को लुभाता है। आइसक्रीम में पांच परतें होती हैं जो आधे चांद की तरह दिखती हैं। उसे नियमानुसार भोजन करना होता है. उस दिनचर्या में नींबू निचोड़ने की कोई जरूरत नहीं है। यही समस्या है. ऐसा पेशा, जहां सतर्कता जरूरी है. अच्छी शक्ल, अच्छी बनावट से अतिरिक्त अंक मिलते हैं। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि आप नियम नहीं तोड़ना चाहते? अभिनेत्री जान्हवी कपूर की इच्छा कभी-कभी पूरी हो जाती है। मिठाइयों से परहेज करें. हालाँकि, उस समय आइसक्रीम केक ‘कासाटा’ खाने की इच्छा पैदा हुई। अभिनेत्री उस इच्छा तक कैसे पहुंची? बाकी समय वह क्या करते हैं यह तो पता नहीं, लेकिन हाल ही में जान्हवी ने इंस्टाग्राम पर लिखा, ”मुझे कसाटा खाना बहुत पसंद था. इसके बजाय, मैंने घर ले लिया।

कसाटा या चमकीला तीन रंगों वाला आइसक्रीम केक किसी भी खाने के शौकीन को लुभाता है। आइसक्रीम में पांच परतें होती हैं जो आधे चांद की तरह दिखती हैं। सबसे नीचे केक है. इसके ऊपर हल्की नारंगी टूटीफ्रूटी या केसर आइसक्रीम डालें। इसके ऊपर पिस्ता आइसक्रीम डाली गई है। चौथी परत मीठे गुलाबी रंग की है। और उसके ऊपर कुचले हुए बादाम की ‘टॉपिंग’ होती है. हालाँकि सभी कसाटा बार एक जैसे नहीं दिखते, भारत में कसाटा आइसक्रीम मूल रूप से आइसक्रीम केक को संदर्भित करता है। लेकिन जान्हवी ने उस आइसक्रीम केक को ड्रेस की तरह कैसे पहना? इसका जवाब जान्हवी के कपड़ों से मिल सकता है। उन्होंने इंस्टाग्राम पर उस आउटफिट की तस्वीर भी दी है.

जान्हवी ने बिल्कुल कासाटा आइसक्रीम केक के रंग की साड़ी पहनी हुई है। कासा के तीन चमकीले रंग – गुलाबी, हल्का हरा और नारंगी साड़ी की ज़मीन पर खेलते हैं। साड़ी को कॉस्ट्यूम डिजाइनर मनीष मल्होत्रा ​​ने बनाया है। साड़ियों के डिजाइन में भी उनका स्टाइल साफ झलकता है। शिफॉन बॉर्डर और हेम पर बारीक धागे और मोतियों का काम किया गया है। पारदर्शी पूर्ण आस्तीन ब्लाउज में धागे और मोतियों के पैटर्न वाली पुष्प अल्पना भी है। हालांकि, मनीष ने अपनी बनाई साड़ी कासाटा का जिक्र नहीं किया। मनीष ने अपने इंस्टाग्राम पेज पर एक साड़ी की तस्वीर के साथ लिखा, “रंग। जब से मैंने कक्षा छह में स्कूल में ड्राइंग करना शुरू किया, तब से विज्ञान में उत्तीर्ण होने के लिए ड्राइंग ही एकमात्र तरीका था। मैं पढ़ाई में हमेशा कमजोर था. लेकिन रंगों ने मुझे हमेशा आकर्षित किया है। जान्हवी ने जो साड़ी पहनी है, उसमें उस रंग के प्रति मेरा प्यार गायब हो गया है।’ और वह साड़ी में बहुत अच्छी भी लगती हैं.”

जब आप कांजीवरम साड़ी कहते हैं तो मन में क्या आता है? पोटाई ज़री या रेशम डालने वाला बॉर्डर। चमकदार रेशम के साथ मुलायम ज़मीन. साड़ी प्रेमी इतने लंबे समय से बारह हाथों की उस मनमोहक बुनाई से मंत्रमुग्ध रहे हैं। बॉलीवुड डिजाइनर मनीष मल्होत्रा ​​ने अभिनेत्री जान्हवी कपूर को विशेष कांजीवरम साड़ी पहनाकर एक झटके में साड़ी का आकर्षण बढ़ा दिया। जान्हवी ने लिखा, उस सुनहरी साड़ी को पहनकर वह ‘गोल्डन आइलैंडर’ की तरह महसूस करती हैं।

जान्हवी ने अपनी पहली साउथ फिल्म ‘देवरा’ के लॉन्च पर मनीष द्वारा डिजाइन की गई साड़ी पहनी थी। वहां जान्हवी को देख फैंस गदगद हो गए हैं। जान्हबीर की साड़ी से कई छोटे-छोटे क्रिस्टल चमक रहे थे। बाद में पता चला कि साड़ी को मनीष ने उत्कृष्ट गुणवत्ता के कीमती क्रिस्टल से बनाया था। उन्होंने इसके साथ सोने के फीते का पुराना काम भी जोड़ दिया। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि उस साड़ी की कीमत करोड़ों से भी ज्यादा है. जान्हवी ने साड़ी को सिंपल तरीके से पहना था। छोटी आस्तीन वाले ब्लाउज के साथ. बालियों की एक जोड़ी. और एक छोटी सी नक्शबी. खुले बालों के साथ “गोल्डन आइलैंडर”।

जान्हवीर ‘डेबरा’ के जरिए साउथ फिल्म में डेब्यू करने जा रही हैं। उस फिल्म में उनके साथ साउथ के स्टार एनटीआर जूनियर और बॉलीवुड एक्टर सैफ अली खान ने काम किया था. फिल्म का विषय तटीय क्षेत्र के लोगों के इर्द-गिर्द घूमता है। जान्हवीर के किरदार का नाम थंगम है। यह किरदार एक तटीय इलाके की बेटी है।

इससे पहले भी जान्हवी अपनी फिल्म के प्रमोशन के लिए अपने कपड़ों में फिल्म के कंटेंट की झलक रख चुकी हैं। ‘मिस्टर एंड मिसेज माही’ के प्रमोशन के लिए उन्होंने क्रिकेट बॉल आउटफिट पहनकर सबको चौंका दिया। इस बार भी जान्हवी ने लिखा, ”थंगम का मतलब सोना होता है। यहां मैं सुनहरे द्वीप की बेटी की तरह महसूस करती हूं।”

एक्ट्रेस भूमि ने किया साउथ गोवा का दौरा, क्या आप जाना चाहेंगे? वहां क्या करना है?

पहाड़ों, नारियल के पेड़ों और समुद्र के संयोजन के साथ गोवा की सुंदरता हमेशा पर्यटकों को आकर्षित करती है। वहां कहां जाना है? क्या खाने के लिए दिवाली के दौरान कुछ एक्ट्रेस पार्टी करने में बिजी थीं. परिवार के साथ समय बिताने वाला कोई। बी-टाउन के कुछ सितारे एक बार फिर छुट्टियों पर निकले। पूर्व मिस वर्ल्ड मानुषी छिल्लर रणथंभौर के जंगल में गईं. एक्ट्रेस भूमि पेडनेकर ने साउथ गोवा को चुना. ‘भक्षक’ की एक्ट्रेस ने सोशल मीडिया पर बीच सनसेट और फुर्सत के पलों की कई तस्वीरें शेयर की हैं.

तितली समुद्रतट

नाव पालोलेम से बटरफ्लाई बीच के लिए प्रस्थान करती है। पहाड़ों से घिरे एक छोटे से समुद्र तट तक 15 मिनट की नाव की सवारी से पहुंचा जा सकता है। सूर्यास्त देखने के लिए ‘सनसेट पॉइंट’ है। यहां से पहाड़ी रास्ते पर 5 किमी का ट्रैकिंग रूट भी है। आप चाहें तो पहाड़ी की चोटी पर भी समुद्र की खूबसूरती का आनंद ले सकते हैं। यदि आप भाग्यशाली हैं, तो वापसी में आपके साथ डॉल्फ़िन भी हो सकती हैं।

काबो दे रामा किला

दक्षिण गोवा में काबो डी रामा किला देखा जा सकता है। इस अति प्राचीन किले पर 1760 के दशक में पुर्तगालियों ने कब्ज़ा कर लिया था। किले में आज भी प्राचीन तोपें मौजूद हैं। किले के ऊपर से समुद्र की सुंदरता मंत्रमुग्ध कर देने वाली है।

गोवा का खाना
जब आप गोवा आते हैं तो अगर आप स्थानीय खाना नहीं चखेंगे तो आपकी यात्रा अधूरी रहेगी। समुद्रतटीय शहर होने के कारण यहाँ भोजन के रूप में विभिन्न प्रकार की मछलियाँ और समुद्री जीव उपलब्ध हैं। गोवा झींगा करी, मछली करी देश में प्रसिद्ध है। गोवा का अपना सूरा भी है। आप काजू फेनी और नारियल फेनी भी पी सकते हैं।

मसाला उद्यान

गोवा में दालचीनी, काली मिर्च, लौंग सहित विभिन्न मसालों की खेती की जाती है। यहां कई मसालों के बगीचे हैं। आप चाहें तो वहां भी जा सकते हैं.

कोल्वा-सेर्नाबैटिम-अगोंडा-पालोलेम
रोमांटिक समुद्र, नीले पानी से घिरे पहाड़, द्वीप, जंगल – उत्तरी गोवा की तरह दक्षिण गोवा का मुख्य आकर्षण कुछ समुद्र तट हैं। इनमें से कुछ प्रसिद्ध हैं, और स्वयं खोजने के लिए ऑफ-द-मैप स्थानों की कोई कमी नहीं है। कोलवा से पालोलेम तक, दक्षिण गोवा के कम प्रसिद्ध समुद्र तट गुणवत्ता के मामले में उत्तर से कम नहीं हैं।
उत्तरी गोवा में कुछ दिन बिताने के बाद, आइए दक्षिण की ओर चलें। छोटा सा राज्य, कहीं से कोई लंबी ड्राइव नहीं। घूमने के लिए अधिक समय है क्योंकि रास्ते में समय बर्बाद नहीं होता है। देश के पश्चिमी भाग में सूरज देर से डूबता है। इसके अलावा, दोनों तरफ के दृश्य अन्य प्रेम से भरे हुए हैं। गाँव साफ-सुथरे हैं, सड़कें आकर्षक चर्चों, मंदिरों, पुर्तगाली वास्तुकला के विलाओं से सजी हैं। रास्ते में बेहतरीन माहौल वाले रेस्तरां, बार, कॉफ़ी शॉप। 21वीं सदी के भारत का महानगरीय स्वरूप परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत संयोजन है। शाम के बाद एक और अनोखी रोशनी. गोवा की रात बहुत खूबसूरत लगती है.

उत्तरी गोवा की तरह दक्षिण गोवा का मुख्य आकर्षण कुछ समुद्र तट हैं। इनमें से कुछ प्रसिद्ध हैं, और स्वयं खोजने के लिए ऑफ-द-मैप स्थानों की कोई कमी नहीं है। कोलवा से पालोलेम तक, दक्षिण गोवा के कम प्रसिद्ध समुद्र तट गुणवत्ता के मामले में उत्तर से कम नहीं हैं। भीड़ भी कम है. इस दिशा का मुख्य शहर मारगांव है। कोलवा बीच यहां से कुछ ही दूरी पर है। दक्षिण का सबसे व्यस्त समुद्र तट, कोलवा का आकर्षण अनूठा है। कोलवा एक क्षितिज से दूसरे क्षितिज तक फैलता है क्योंकि आसपास कोई पहाड़ियाँ नहीं हैं। सुबह सात बजे मछुआरे अपनी डोंगी लेकर नदी के बीच में तैरने लगे। इसके बाद पूरा दिन हजारों मौज-मस्ती में बीतता है और दिन का अंत खूबसूरत सूर्यास्त के साथ होता है। सुबह से शाम तक विभिन्न जल क्रीड़ाओं का आयोजन किया जाता है। कोलवा देर रात तक जागता है। समुद्र तट की कुर्सियों या रेस्तरां में बैठना सुरक्षित है। ताजी समुद्री मछली, झींगा, केकड़ों का विभिन्न अज्ञात, लेकिन मुंह में पानी ला देने वाले शब्दों में परीक्षण किया जा सकता है। मानसून समाप्त होने के बाद जब पर्यटन का मौसम शुरू होता है, तो जमा राशि समुद्र तट के बगल में रखी जाती है। विभिन्न रॉक बैंड ने मंच की शोभा बढ़ाई और प्रदर्शन किया। दक्षिण गोवा की सभी स्मारिका दुकानें कोलवा और पालोलेम में हैं।

पालोलेम से कार द्वारा दक्षिण गोवा घूमना आसान है। इसे कम से कम दो दिन तक रखना चाहिए. एक दिन समुद्र तट पर सैर और दूसरे दिन पश्चिमी घाट पर्वत श्रृंखला पर ट्रैकिंग। यहां भी कोई स्व-चालित कैब या बाइक किराए पर ले सकता है और जीपीएस के भरोसे बाहर जा सकता है। फिर, कोई कोल्वर की भीड़ के बिना किसी अन्य अपेक्षाकृत एकांत समुद्र तट पर रात बिता सकता है। आइए उनमें से कुछ की तलाश करें। सेर्नाबैटिम बीच कोलवा से सिर्फ 2 किमी दूर है। लेकिन दोनों में काफी अंतर है. सेर्नाबतिम दुर्लभ और दुर्लभ है। भीड़-भाड़ से दूर एक आदर्श समुद्र तट स्नान स्थल। समुद्र तट के एक छोर पर ढीबर गाँव है। सुबह-सुबह उनका व्यस्त समय होता है। दक्षिणी समुद्र तट हनीमून मनाने वालों के लिए आदर्श हैं क्योंकि वे बहुत एकांत हैं। यही बात कोलवा से लगभग आधे घंटे की दूरी पर स्थित ट्विन बीच भीड़ कावलोसिम पर भी लागू होती है। समुद्र तट के पास निजी रिसॉर्ट्स की वास्तुकला खूबसूरती से प्रकृति के अनुकूल है। इसके अलावा, मोबोर की सुंदरता शाल नदी से भी बढ़ जाती है। समुद्र में मिलने से पहले नदी ने इस क्षेत्र को एक प्रायद्वीप का आकार दिया। ऐसी भौगोलिक विविधता गोवा के किसी अन्य समुद्रतट पर देखने को नहीं मिलती। आप शाल नदी में नाव से तैर सकते हैं। छोटे-छोटे गाँवों और नारियल के पेड़ों से गुजरते हुए, आपको ऐसा लगेगा जैसे आप बैकवाटर देश केरल में आ गए हैं। दोपहर में, मुहाना की ओर मुख करके, सूर्यास्त देखने की आशा में।

पलोलेम. भीड़-भाड़ से दूर एक आदर्श समुद्र तट स्नान स्थल।

मोबोर बीच के बाद, चलिए अगोंडा चलते हैं। सिंगल-लेन सड़क हरी छाती को काटती हुई अंतहीन नीले रंग के गहनों तक चली गई। जब आप उस रास्ते से अगोंडा उतरेंगे तो आपको ऐसा लगेगा मानो आप स्वर्ग के पिछले स्टेशन पर पहुंच गए हों। अरब सागर के पानी में डूबे पत्थरों की अनोखी संरचना से आप प्रभावित होंगे। एक ओर, पहाड़ समुद्र में समा गये। विपरीत दिशा में, आकाश को छूती हुई, दूर तक नीले पहाड़ों की तीन श्रेणियाँ इशारा कर रही थीं। समुद्र तट भी चौड़ा है. धूप सेंकने के लिए सुनहरे समुद्र तटों की कतारें

गंभीर ने कहा, रोहित ऑस्ट्रेलिया में पहले टेस्ट में अनिश्चित हैं कि अगर वह नहीं खेलेंगे तो कप्तान कौन होगा

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ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहले टेस्ट में रोहित शर्मा के प्रदर्शन को लेकर अटकलें लगाई जा रही थीं. कोच गौतम गंभीर ने उस अटकल को बरकरार रखा. अगर रोहित नहीं खेलते हैं तो कप्तान कौन होगा इसका नाम उन्होंने बता दिया है. अटकलें खत्म नहीं हुई हैं. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहले टेस्ट में रोहित शर्मा के प्रदर्शन को लेकर अटकलें लगाई जा रही थीं. कोच गौतम गंभीर ने उस अटकल को बरकरार रखा. हालांकि, उन्होंने जानकारी दी है कि अगर रोहित नहीं खेलते हैं तो उनकी जगह जसप्रीत बुमराह कप्तानी करेंगे.

(यह खबर अभी प्रकाशित हुई है। विवरण जल्द ही आ रहे हैं। कुछ देर बाद पेज को ‘रिफ्रेश’ करें, आपको ताजा खबर दिखेगी। तेजी से खबर पहुंचाते समय भी हमें सूचना की सच्चाई से अवगत रहना होगा। इसलिए कोई भी ‘खबर’ ‘ (‘फेक न्यूज’ के दौर में यह तरीका और भी महत्वपूर्ण है) रोहित शर्मा अभी ऑस्ट्रेलिया नहीं जा रहे हैं. पहला टेस्ट 22 नवंबर से शुरू होगा. रोहित उससे पहले ऑस्ट्रेलिया जा सकते हैं. लेकिन वह पार्टी के साथ नहीं जा रहे हैं. एक मीडिया सूत्र के मुताबिक ये बात पता चली है.

भारतीय टीम रविवार और सोमवार को अलग-अलग समय में ऑस्ट्रेलिया की यात्रा करने वाली है। मालूम हो कि रोहित टीम के साथ नहीं जाएंगे. बोर्ड के एक अधिकारी ने कहा, ”रोहित अभी ऑस्ट्रेलिया नहीं जा रहे हैं. लेकिन ऐसा नहीं है कि वह पहला टेस्ट नहीं खेलेंगे. वह टीम से जुड़ने के लिए अगले हफ्ते ऑस्ट्रेलिया जा सकते हैं।”

शुरुआत में सुनने में आया था कि रोहित भारत-ऑस्ट्रेलिया टेस्ट सीरीज का पहला मैच नहीं खेलेंगे. उन्होंने खुद कहा था कि वह उस मैच को लेकर अनिश्चित हैं. सुनने में आ रहा है कि रोहित दूसरी बार पिता बनने वाले हैं। उनके बच्चे का जन्म ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहले टेस्ट के दौरान हो सकता है. उस समय, उन्होंने शायद अपनी पत्नी के साथ रहने के लिए पहला टेस्ट नहीं खेलने का फैसला किया। लेकिन शुक्रवार की बैठक के बाद कहा गया कि रोहित पहले मैच से खेलना चाहते हैं. यह भी पता चला कि भारतीय टीम के कई खिलाड़ी 10 नवंबर को ऑस्ट्रेलिया में खेलने के लिए रवाना होंगे. रोहित उस टीम के साथ ऑस्ट्रेलिया जा सकते हैं. लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है. रोहित ने कहा कि वह निजी कारणों से ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहला मैच नहीं खेलेंगे. जिससे सुनील गौस्कर नाराज थे. उन्होंने कहा, ”कप्तान के लिए पहला टेस्ट मैच काफी अहम होता है. चोटें अलग बात हैं. लेकिन अगर वह पहला टेस्ट नहीं खेलना चाहते हैं तो सहायक कप्तान पर दबाव है. मैं कहीं पढ़ रहा था कि रोहित शायद ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहले दो टेस्ट नहीं खेलेंगे। मुझे लगता है कि ऐसे में चयन समिति को पूरी सीरीज के लिए बुमराह को कप्तान बना देना चाहिए.’ साथ ही रोहित से कहा कि अगर वह सीरीज के दौरान टीम में शामिल होते हैं तो सिर्फ एक खिलाड़ी बनकर ही रहें. रोहित को पहले टेस्ट के लिए टीम के साथ रहना चाहिए।”

न्यूजीलैंड के खिलाफ घरेलू मैदान पर 0-3 से सीरीज हारना भारतीय टीम के लिए बड़ा झटका है। बोर्ड के प्रमुखों ने कप्तान रोहित शर्मा और कोच गौतम गंभीर के साथ बैठकर हार का पोस्टमॉर्टम किया। और सुनने में आ रहा है कि उस मुलाकात के बाद रोहित की राय बदल गई है. वह ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहले टेस्ट से खेल सकते हैं.

ऐसी अफवाह थी कि रोहित भारत-ऑस्ट्रेलिया टेस्ट सीरीज का पहला मैच नहीं खेलेंगे. उन्होंने खुद कहा था कि वह उस मैच को लेकर अनिश्चित हैं. सुनने में आ रहा है कि रोहित दूसरी बार पिता बनने वाले हैं। उनके बच्चे का जन्म ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहले टेस्ट के दौरान हो सकता है. उस समय, उन्होंने शायद अपनी पत्नी के साथ रहने के लिए पहला टेस्ट नहीं खेलने का फैसला किया। लेकिन शुक्रवार की मीटिंग के बाद सुनने में आ रहा है कि रोहित पहले मैच से खेलना चाहते हैं. भारतीय टीम के कई खिलाड़ी ऑस्ट्रेलिया में खेलने के लिए 10 नवंबर को रवाना होंगे. मालूम हो कि रोहित उस टीम के साथ ऑस्ट्रेलिया जा सकते हैं. भारत को ऑस्ट्रेलिया से कड़ी टक्कर मिल रही है. वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंचने के लिए भारत को यह सीरीज जीतना जरूरी है. ऐसे में कप्तान न मिलना भारत के लिए बड़ा झटका होता. रोहित ने कहा कि वह निजी कारणों से ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहला मैच नहीं खेलेंगे. जिससे सुनील गौस्कर नाराज थे. उन्होंने कहा, ”कप्तान के लिए पहला टेस्ट मैच काफी अहम होता है. चोटें अलग बात हैं. लेकिन अगर वह पहला टेस्ट नहीं खेलना चाहते हैं तो सहायक कप्तान पर दबाव है. मैं कहीं पढ़ रहा था कि रोहित शायद ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहले दो टेस्ट नहीं खेलेंगे। मुझे लगता है कि ऐसे में चयन समिति को पूरी सीरीज के लिए बुमराह को कप्तान बना देना चाहिए.’ साथ ही रोहित से कहा कि अगर वह सीरीज के दौरान टीम में शामिल होते हैं तो सिर्फ एक खिलाड़ी बनकर ही रहें. रोहित को पहले टेस्ट के लिए टीम के साथ रहना चाहिए।”

ऑस्ट्रेलिया के लिए चुनी गई टीम में रोहित के अलावा यशस्वी जयसवाल और अभिमन्यु ईश्वरन बतौर ओपनर हैं। अगर रोहित पहले टेस्ट में नहीं खेलते तो अभिमन्यु के डेब्यू करने की संभावना थी। लेकिन अगर रोहित पहले टेस्ट से खेलते हैं तो अभिमन्यु को मौका मिलना मुश्किल होगा. हालांकि ऑस्ट्रेलियाई टीम के खिलाफ उन्होंने उस तरह रन नहीं बनाए.

क्या कनाडा की भाषा में ही कनाडा को जवाब देगा भारत?

आने वाले समय में भारत कनाडा को कनाडा की भाषा में ही जवाब देगा! भारत के मोस्ट वॉन्टेड आतंकियों के सुरक्षित पनाहगाह के तौर पर उभरे कनाडा में दंगाइयों ने हिंदू मंदिरों को निशाना बनाया है। श्रद्धालुओं पर हमले किए हैं। भारतीय राजनयिकों पर हमले की कोशिश की है। जस्टिन ट्रूडो की सरकार भारतीय राजनयिकों की निगरानी कर रही है। उनकी जासूसी कर रही है। कनाडाई आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बाद ट्रूडो ने भारत पर बेतुके आरोप लगाए। तब से दोनों देशों के रिश्ते गर्त में पहुंच चुके हैं। अब हिंदू मंदिरों पर ट्रूडो सरकार के पाले गुंडों और दंगाइयों के हमले ने लक्ष्मण रेखा पार कर दी है। तभी तो ट्रूडो के बेसिर पैर के बेतुके आरोपों के बाद भी संयम बरतने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बार कनाडाई सरकार को ‘न्याय सुनिश्चित’ करने और ‘कानून का शासन’ स्थापित करने की नसीहत दी है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी मंदिरों पर हमले को ‘बेहद चिंताजनक’ करार दिया है। विदेश मंत्री ने ये भी कहा है कि कनाडा ने बिना किसी सबूत के आरोप लगाने का एक पैटर्न विकसित कर लिया है। पीएम मोदी का बयान बताता है कि भारत के सब्र का बांध अब टूट चुका है और उन्होंने संकेत दे दिया है कि कनाडा को अब उसी की भाषा में जवाब दिया जाएगा। हिंदू मंदिरों पर हमले की निंदा करते हुए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मंगलवार को कहा, ‘कनाडा में हिंदू मंदिर पर जो हुआ वह बेहद चिंताजनक है।’ उन्होंने ये बात ऑस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा में कही।

इससे पहले सोमवार को पीएम मोदी ने कनाडा में हिंदू मंदिरों पर जानबूझकर किए गए हमले और भारतीय राजनयिकों को डराने की कायराना कोशिशों पर बहुत ही तल्ख भाषा में जस्टिन ट्रूडो सरकार को नसीहत दी। उन्होंने एक्स पर लिखा, ‘कनाडा में हिंदू मंदिर पर हुए जानबूझकर किए गए हमले की मैं कड़ी निंदा करता हूं। हमारे राजनयिकों को डराने की कायराना कोशिशें भी उतनी ही निंदनीय हैं। हिंसा के ऐसे कृत्य भारत के संकल्प को कमजोर नहीं कर सकते। हम कनाडा सरकार से न्याय सुनिश्चित करने और कानून का राज कायम करने की उम्मीद करते हैं।’ इससे पहले विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कनाडा में भारतीय राजनयिकों की निगरानी पर उसे चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि कनाडा ने बिना सबूत दिए आरोप लगाने का एक पैटर्न विकसित कर लिया है। जयशंकर ने कहा, ‘भारतीय राजनयिकों पर निगरानी रखी जा रही है जो अस्वीकार्य है। कनाडा में चरमपंथी ताकतों को राजनीतिक जगह दी जा रही है।’

ऐसा लगता है जैसे जस्टिन ट्रूडो सरकार बिना किसी शर्म-हया के खुलकर आतंकियों के साथ खड़ी है, तभी तो कनाडाई पुलिस भी दंगाइयों को नियंत्रित करने के बजाय पीड़ित हिंदुओं पर बल प्रयोग करती दिखी। एक हिंदू लड़के को पुलिस इस अंदाज में गिरफ्तार करती दिखी जैसे 2020 में अमेरिका के मिनियापोलिस में जॉर्ज फ्लायड नाम के एक अश्वेत को पुलिस ने जमीन पर गिराकर गर्दन दबाया था। फ्लायड की दम घुटने से मौत हो गई थी और दुनियाभर में उस कांड के बाद अमेरिका की किरकिरी हुई थी। लेकिन जस्टिन ट्रूडो सरकार और उनकी पुलिस बेशर्मी की सारी सीमाएं पार कर चुकी हैं। ब्रैम्पटन में हिंदू मंदिर पर हमला करने वाले दंगाइयों की भीड़ में कनाडा पुलिस का एक ऑफ ड्यूटी अफसर भी शामिल था। दबाव के बाद उसे सिर्फ सस्पेंड करके कार्रवाई का दिखावा किया गया है।

इससे पहले सोमवार को विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा था कि भारत उग्रवादियों और अलगाववादियों की तरफ से की गई हिंसा की निंदा करता है। साथ ही, भारत सरकार को उम्मीद है कि हिंसा में शामिल लोगों पर मुकदमा चलाया जाएगा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, ‘हम ओंटारियो के ब्रैम्पटन में हिंदू सभा मंदिर में उग्रवादियों और अलगाववादियों की तरफ से की गई हिंसा की निंदा करते हैं। हम कनाडा सरकार से यह सुनिश्चित करने का आह्वान करते हैं कि सभी पूजास्थलों को ऐसे हमलों से बचाया जाए। हम यह भी उम्मीद करते हैं कि हिंसा में शामिल लोगों पर मुकदमा चलाया जाएगा। हम कनाडा में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर रूप से चिंतित हैं। भारतीयों और कनाडाई नागरिकों को सेवाएं प्रदान करने के लिए हमारे दूतावास के अधिकारियों के प्रयासों को धमकी, उत्पीड़न और हिंसा से नहीं रोका जा सकता है।’

 

आखिर विदेश में हिंदुओं को ही क्यों बनाया जाता है टारगेट?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि विदेश में हिंदुओं को ही टारगेट क्यों बनाया जाता है! शेख हसीना के बांग्लादेश की पीएम पद से हटने के बाद वहां हिंदुओं पर जमकर अटैक के मामले सामने आए थे। उस समय वहां मंदिरों को भी निशाना बनाया गया। हालांकि, भारत सरकार ने ऐसे वक्त में करारा विरोध जताया जिसके बाद हालात कुछ सामान्य हुए। अभी ये मामला चल ही रहा था इसी बीच कनाडा के मंदिर में हिंदुओं पर अटैक का वीडियो सामने आया। इस हमले का आरोप खालिस्तानी चरमपंथियों पर है। कनाडा में हिंदुओं पर हमले के बाद केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने जस्टिन ट्रूडो सरकार को जमकर फटकार लगाई। चाहे पीएम मोदी हों या विदेश मंत्री एस. जयशंकर, हर मोर्चे पर केंद्र की ओर से कनाडा सरकार को टारगेट किया जा रहा। खुद प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट करके कनाडा सरकार को चेतावनी दी। विदेश मंत्रालय ने दो टूक शब्दों में कहा कि हमले के दोषियों को बख्शा नहीं जाना चाहिए। जो भी इसमें शामिल हैं उनके खिलाफ कनाडा की ट्रूडो सरकार को कानूनी एक्शन लेना चाहिए। सरकार की ओर से लगातार कनाडा पर इस मामले को गंभीरता से लेने का दबाव बनाया जा रहा। इन सबके बीच सवाल ये भी उठ रहा कि आखिर हिंदू सॉफ्ट टारगेट क्यों बन रहे हैं?

क्या पाकिस्तान, बांग्लादेश के बाद कनाडा अब कट्टरपंथियों की सबसे फेवरेट जगह बन रहा? जिस तरह से कनाडा के ब्रैम्पटन शहर में खालिस्तानी चरमपंथियों ने हिंदू मंदिर में पूजा के लिए आए लोगों से मारपीट की, वो चौंकाने वाला है। हमलावरों ने मंदिर में श्रद्धालुओं को लाठी-डंडों से पीटा। यही नहीं कनाडा पुलिस पर भी हमलावरों के सपोर्ट के आरोप लगे हैं। मंदिर में खालिस्तानियों के अटैक का जो वीडियो सामने आया है उसमें साफ नजर आ रहा कैसे पुलिस उन हमलावरों का साथ देते नजर आ रहे। सवाल ये कि क्या पुलिस का सपोर्ट मिलने से ये चरमपंथी इतने सक्रिय हो रहे हैं। फिलहाल ट्रुडो सरकार ने मंदिर पर हुए हमले की निंदा की है। उन्होंने कहा है कि पुलिस मामले की जांच कर रही और जरूरी कार्रवाई की जाएगी। लेकिन सवाल ये कि ऐसा कब होगा।

कनाडा में हिंदू महासभा मंदिर पर अटैक को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने करारा वार किया। उन्होंने एक्स पर पोस्ट में इस घटना की कड़ी निंदा की। पीएम मोदी ने कहा कि मैं कनाडा में एक हिंदू मंदिर पर जानबूझकर किए गए हमले की कड़ी निंदा करता हूं। हमारे राजनयिकों को डराने-धमकाने की कायरतापूर्ण कोशिशें भी उतनी ही भयावह हैं। हिंसा के ऐसे कृत्य कभी भी भारत के संकल्प को कमजोर नहीं करेंगे। हम कनाडा सरकार से न्याय सुनिश्चित करने और कानून के शासन को बनाए रखने की उम्मीद करते हैं। कनाडा के साथ भारत के रिश्तों में चल रही तल्खी के बीच ये पहली बार है जब पीएम मोदी ने वहां की सरकार को सख्त लहजे में चेताया है।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ब्रैम्पटन में हिंदू मंदिर पर हमले की घटना पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि इससे पता चलता है कि वहां चरमपंथी ताकतों को किस तरह राजनीतिक जगह दी जा रही। ऑस्ट्रेलिया दौरे पर विदेश मंत्री ने कनाडा को लेकर ये कमेंट किया। केवल भारत की सरकार नहीं बल्कि कनाडा की विपक्षी पार्टियों और वहां के कई सांसदों ने भी हिंदुओं पर अटैक को लेकर ट्रूडो सरकार को आड़े हाथों लिया है।

जिस तरह से कनाडा और उससे पहले बांग्लादेश में हिंदुओं को टारगेट किया जा रहा उसे लेकर सवाल उठना लाजमी है। आखिर केंद्र सरकार इस मुद्दे को कैसे संभालेगी। क्या दुनिया में हिंदुओं की राजनीतिक ताकत कमजोर पड़ रही? क्या इसी बात का फायदा भारत-विरोधी देश उठाना चाहते हैं? वे भारत में अलगाववाद के समर्थक लोगों को उकसाने की कोशिश कर रहे।

भारत के बाहर अगर सिखों की सबसे ज्यादा आबादी कहीं है तो वो कनाडा है। ऐसे में वहां के सिखों को उकसा कर इस घटना को अंजाम दिया जा रहा। इससे पहले बांग्लादेश में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला था जब कट्टरपंथियों ने हिंदुओं को टारगेट किया। मंदिरों को निशाना बनाया। लूटपाट और मार-पीट की घटनाएं सामने आई थीं। सवाल ये कि आखिर केंद्र सरकार इससे कैसे निपटेगी। क्या मोदी सरकार कनाडा की सरकार को दोषियों पर सख्त कार्रवाई के संबंध में कोई कूटनीतिक दबाव बनाने में सफल होगी। क्या सच में ट्रूडो सरकार इस तरह के मामलों पर लगाम के लिए कोई कदम उठाएगी, देखना दिलचस्प होगा।