Monday, March 16, 2026
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क्या आने वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी को होगी मुश्किलें?

आने वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी को मुश्किलें हो सकती है! लोकसभा चुनाव की लड़ाई जीतने के बाद भारतीय जनता पार्टी के लिए आगे आने वाले 3 राज्यों के विधानसभा चुनाव आसान नहीं होंगे। इनमें से हरियाणा और जम्मू-कश्मीर चुनाव की तारीखों का ऐलान हो गया है तो वहीं महाराष्ट्र और झारखंड पर चुनाव आयोग ने सस्पेंस रखा है। क्या भाजपा के लिए एक कठिन परीक्षा है? और अगर ऐसा है, तो क्या कांग्रेस के नेतृत्व वाला विपक्ष फायदा उठाने के लिए तैयार है? क्या जम्मू-कश्मीर और हरियाणा में चुनाव संपन्न होने के बाद ही महाराष्ट्र में चुनाव कराने का चुनाव आयोग का निर्णय सत्तारूढ़ भाजपा-शिवसेना-राकांपा (अजीत पवार) खेमे में घबराहट का संकेत देता है? और अगर ऐसा है, तो क्या महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ गठबंधन को डेढ़ महीने का अतिरिक्त समय विपक्षी कांग्रेस-शिवसेना (उद्धव ठाकरे)-राकांपा (शरद पवार) मोर्चे के खिलाफ लहर को बदलने के लिए पर्याप्त है? ये सवाल ऐसे हैं जो एनडीए और इंडिया गठबंधन दोनों के लिए कठिन हैं। आइए पूरा समीकरण समझते हैं। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटे 5 साल पूरे हो गए हैं। मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश की सूची में रखा है। यहा विशेष राज्य का दर्जा हटने के बाद पहली बार विधानसभा चुनाव होंगे। ऐसे में सवाल है कि क्या जम्मू-कश्मीर में पहला चुनाव आतंकवाद के पुनरुत्थान को रोक सकता है? इसी से जुड़ा अगला सवाल कि राज्य अब उस समय की तुलना में बहुत बेहतर स्थिति में है? 1 अक्टूबर को डेढ़ महीने से भी कम समय बचा है जब जम्मू-कश्मीर और हरियाणा में चुनाव होंगे। एक महीने बाद, नवंबर में किसी समय, महाराष्ट्र विधानसभा के लिए चुनाव बुलाए जाने की संभावना है। शुरुआत हरियाणा से करते हैं।

हरियाणा एक ऐसी लड़ाई होगी जहां एक फिर से अपनी सियासी जमीन तलाश रही कांग्रेस एक दशक के बाद भाजपा को सत्ता से बाहर करने की कोशिश करेगी। यह सबको मालूम है किराष्ट्रीय परिदृश्य पर नरेंद्र मोदी के आगमन तक यह प्रदेश उसका गढ़ था। भाजपा ने 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले नौकरियों, कीमतों और कानून-व्यवस्था के इर्द-गिर्द मजबूत सत्ता विरोधी लहर के संकेत देखे हैं और मुख्यमंत्री एम. एल. खट्टर की जगह नायब सिंह सैनी को नियुक्त कर सुधार करने के भी प्रयास किए गए हैं। लेकिन इस बार भारती जनता पार्टी कांग्रेस को रोक नहीं सकी, जिसने 10 में से पांच सीटें जीतीं। यह 2019 में शून्य और 2014 में सिर्फ एक सीट पर सिमटने के बाद एक बड़ा बदलाव था। लड़ाई की तत्काल पृष्ठभूमि ही कारण है कि कांग्रेस अपनी संभावनाओं के बारे में उत्साहित है, पार्टी के नेताओं ने एक बड़े बदलाव की भविष्यवाणी भी की है।

केंद्र में मोदी लहर द्वारा भाजपा सरकार स्थापित करने के कुछ ही महीनों बाद एक दशक से चली आ रही सत्ता विरोधी लहर के कारण कांग्रेस विधानसभा हार गई, जिसके बाद राज्य केंद्रीय परिदृश्य से अलग हो गया है। बमुश्किल ही राज्य ने 2019 के पुलवामा के बाद के लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए भारी मतदान किया था, जिसने विधानसभा चुनावों में पार्टी को लगभग चौंका दिया था। भाजपा को 40 सीटों पर रोका गया और सरकार बनाने के लिए उसे जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) के साथ गठबंधन करना पड़ा।

दूसरी ओर, भाजपा उस नए चेहरे पर भरोसा कर रही है जिसे उसने 2014 में हरियाणा की राजनीति में “35 कौम का चुनाव” के सूत्र के साथ डाला था। यह 35 अन्य जातियों को एकजुट करके प्रमुख जाट समुदाय के खिलाफ ध्रुवीकरण की रणनीति का एक संकेत है। इसने 2014 के विधानसभा चुनावों और फिर 2019 में भाजपा को फायदा पहुंचाया, यादव और पंजाबी समुदाय पर इसके निरंतर प्रभाव और शहरी केंद्रों में इसकी ताकत देखी गई है। खट्टर को ओबीसी नेता सैनी के साथ बदलने के पीछे का विचार भी इसी योजना के हिस्से के रूप में तैयार किया गया है। हालांकि, कांग्रेस और हुड्डा ने दावा किया है कि नौकरियों, कीमतों, कानून-व्यवस्था और शासन पर भाजपा की विफलता के खिलाफ राज्य एकजुट है। पार्टी का विश्वास आप या किसी अन्य पार्टी के साथ गठबंधन करने से इनकार स्पष्ट है। कांग्रेस गरीबों को मुफ्त बिजली और एलपीजी सिलेंडर की पेशकश करके घरेलू खर्च में कटौती करने के लोकलुभावन वादे कर रही है। अग्निवीर असंतोष का एक और स्रोत है जिस पर कांग्रेस दबाव बना रही है।

नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने 18 सितंबर से तीन चरणों में चुनाव की घोषणा को लंबे इंतजार का अंत बताया। उमर ने कहा, कभी न होने से देर हो जाना बेहतर है। उमर के पिता और नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने भी यही भावना व्यक्त की। मैं भगवान का शुक्रगुजार हूं। यह एक असामान्य रूप से लंबा अंतराल रहा है। पिछले चुनाव 2014 में हुए थे। उमर ने हालांकि कहा कि 1987-88 के बाद यह पहला चुनाव हो सकता है जो इतने कम समय में हुआ हो। इससे पहले चुनाव पांच से छह चरणों में हुए थे। उन्होंने कहा कि यह पार्टियों के लिए एक नया प्रयोग होगा। लेकिन एनसी तैयार है और जल्द ही चुनाव प्रचार शुरू कर देगी। उन्होंने कहा कि अभी के लिए किसी भी चुनाव पूर्व गठबंधन से इनकार है। पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की इल्तिजा मुफ्ती ने फैसले का स्वागत किया लेकिन आश्चर्य जताया कि चुनाव आयोग को छह साल क्यों लगे। पीडीपी अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की बेटी और मीडिया सलाहकार इल्तिजा ने कहा कि पिछले पांच वर्षों में, न केवल जम्मू-कश्मीर के लोगों के मौलिक अधिकार बल्कि लोकतंत्र को निलंबित कर दिया गया है।

कोलकाता रेप केस के बारे में क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता रेप केस के बारे में अपना बयान दे दिया है! कोलकाता के केजी कर अस्पताल में हुई एक ट्रेनी डॉक्टर के साथ रेप और मर्डर के मामले में सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने खुद इस मामले में संज्ञान लिया है। चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच 20 अगस्त को इस मामले की सुनवाई करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को ‘ट्रेनी डॉक्टर के रेप एंड मर्डर केस’ के नाम से लिस्ट किया है। चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच 20 अगस्त को इस मामले की सुनवाई करेगी। बीती 9 अगस्त को कोलकाता में एक पोस्ट ग्रेजुएट ट्रेनी डॉक्टर के साथ रेप और हत्या का मामला सामने आया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने खुद से संज्ञान लिया है। यानी किसी याचिका के बिना ही सुप्रीम कोर्ट ने एक्शन लिया है। दिल्ली के कोचिंग सेंटरों के मालिकों ने भी पीड़ित परिवारवालों के लिए मदद का हाथ आगे बढ़ाया था।जब जनता से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे आते हैं, खासकर जब मौलिक अधिकारों और सुरक्षा का सवाल हो, तो सुप्रीम कोर्ट खुद कार्रवाई शुरू कर सकता है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दखल बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इस घटना का सीधा असर देशभर के डॉक्टरों पर पड़ा है। देश के अलग-अलग शहरों में डॉक्टरों का प्रदर्शन जारी है।

सुप्रीम कोर्ट के दखल से कई महत्वपूर्ण परिणाम हो सकते हैं। इससे मामले की गहन और त्वरित जांच हो सकती है, जिससे सुनिश्चित होगा कि जांच एजेंसियां अपने कार्यों के लिए जवाबदेह होंगी। कोर्ट स्वास्थ्य कर्मियों की सुरक्षा और अस्पतालों में सुरक्षा प्रोटोकॉल की स्थापना के लिए सरकार को निर्देश भी जारी कर सकता है। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट की भागीदारी मेडिकल प्रोफेशनल्स की सुरक्षा में सुधार के उद्देश्य से विधायी या नीतिगत बदलावों को बढ़ावा दे सकती है। इसमें अस्पतालों की सुरक्षा के लिए केंद्रीय बलों की तैनाती और स्वास्थ्य कर्मियों के खिलाफ हिंसा के लिए सख्त दंड लगाने की सिफारिशें शामिल हो सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले दिल्ली के राजेंद्र नगर इलाके में कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में पानी भर जाने से यूपीएससी छात्रों की मौत के मामले में स्वत: संज्ञान लिया था। इसी बीच इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. आरवी अशोकन ने अपने पत्र में लिखा कि हम उसका जीवन बचाने में नाकाम रहे, लेकिन हमने पूरे देश के रूप में, उसे मरने के बाद सम्मान दिया। देश में इस घटना को लेकर गुस्सा, घृणा, निराशा और लाचारी का माहौल है। अशोकन ने लिखा कि पहली बार भारत ने अपने डॉक्टरों को सही समझा। वह 36 घंटे की ड्यूटी पर थी। रात 2 बजे खाना खाने के बाद वार्ड के बगल वाले सेमिनार रूम में बने अस्थायी बिस्तर पर सो रही थी। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की खंडपीठ ने सुरक्षा मानदंडों को सुनिश्चित करने के लिए उठाए गए कदमों पर दिल्ली और भारत सरकार से जवाब मांगा था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कोचिंग सेंटर छात्रों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह घटना एक आंख खोलने वाली घटना है।

किसी भी संस्थान को सुरक्षा मानदंडों का पालन किए बिना संचालित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। यही नहीं आपको बता दें कि हजारों युद्ध की थापियां गूंज रही थीं। हर भारतीय परिवार ने अपनी एक बेटी खो दी। माताएं उबल रही थीं। पिता चुपचाप रो रहे थे। सबसे पहले रेजिडेंट्स सामने आए। अगले सात दिन उन्होंने नींद नहीं ली। हफ्ते के 100 घंटे काम करने की आदत थी। उनका जागरण और साहस ही देश की एकमात्र उम्मीद था। उन्होंने विरोध का आधार तैयार किया। एक मध्यमवर्गीय परिवार की इकलौती बेटी और साधारण भारतीय माता-पिता। असहनीय दुख। उन्होंने जीवन का अर्थ और उद्देश्य खो दिया। बच्चों की तरह भोले और भरोसेमंद। सड़कें खाली थीं। डर हवा में था। कुछ जागरूक युवाओं ने एक कोने में विरोध किया। अजीब खौफनाक सन्नाटा था। अशोकन ने यह भी दावा किया कि ट्रेनी डॉक्टर की मौत से चिकित्सा के पेशेवरों में बहुत गुस्सा है और उन्होंने आश्वासन दिया कि डॉक्टरों का संगठन पूरे देश में विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करता रहेगा।सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद कोचिंग सेंटरों के बेसमेंट वाले हिस्सों को एमसीडी ने तेजी से सील किया था। दिल्ली के कोचिंग सेंटरों के मालिकों ने भी पीड़ित परिवारवालों के लिए मदद का हाथ आगे बढ़ाया था।

कोलकाता रेप केस के बारे में क्या बोली आईएमए चीफ डॉक्टर आरवी अशोकन?

हाल ही में आईएमए चीफ डॉक्टर आरवी अशोकन  ने कोलकाता रेप केस के बारे में एक बयान दिया है! कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में महिला डॉक्टर के साथ जो उस रात हुआ, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। 32 वर्षीय ट्रेनी डॉक्टर का रेप और फिर बाद में मर्डर ने पूरे देश को हिला दिया है। देशभर के डॉक्टकर सड़कों पर हैं तो वहीं हर आम आदमी केस में शामिल आरोपियों के लिए बस एक ही चीज की दुआ कर रहा है और वह है मौत। इस गुस्से के बीच इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष ने एक पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने अफसोस जताते हुए लिखा कि हम उसकी जिंदगी नहीं बचा पाए। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि हमने उसे सम्मान जरूर दिया। IMA के चीफ डॉ. आरवी अशोकन ने अपने भावुक पत्र में और क्या-क्या लिखा है, आइए जानते हैं। उन्होंने विरोध का आधार तैयार किया।आईएमए आजादी की लड़ाई की आग में पैदा हुआ। आग अभी भी जल रही है। पेशे की अंतरात्मा का रखवाला। सभी जिलों में जड़ें जमाए हुए। रेजिडेंट्स का सहारा।इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. आरवी अशोकन ने अपने पत्र में लिखा कि हम उसका जीवन बचाने में नाकाम रहे, लेकिन हमने पूरे देश के रूप में, उसे मरने के बाद सम्मान दिया। देश में इस घटना को लेकर गुस्सा, घृणा, निराशा और लाचारी का माहौल है। अशोकन ने लिखा कि पहली बार भारत ने अपने डॉक्टरों को सही समझा। वह 36 घंटे की ड्यूटी पर थी। रात 2 बजे खाना खाने के बाद वार्ड के बगल वाले सेमिनार रूम में बने अस्थायी बिस्तर पर सो रही थी। एक मध्यमवर्गीय परिवार की इकलौती बेटी और साधारण भारतीय माता-पिता। असहनीय दुख। उन्होंने जीवन का अर्थ और उद्देश्य खो दिया। बच्चों की तरह भोले और भरोसेमंद। सड़कें खाली थीं। डर हवा में था। बुधवार की रात को, हजारों महिलाओं ने देश भर में सड़कों पर उतरकर पीड़िता के लिए न्याय की मांग करते हुए “रिक्लेम द नाइट” मार्च में भाग लिया है।कुछ जागरूक युवाओं ने एक कोने में विरोध किया। अजीब खौफनाक सन्नाटा था। अशोकन ने यह भी दावा किया कि ट्रेनी डॉक्टर की मौत से चिकित्सा के पेशेवरों में बहुत गुस्सा है और उन्होंने आश्वासन दिया कि डॉक्टरों का संगठन पूरे देश में विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करता रहेगा।

अशोकन ने आगे लिखा कि उसने लाखों दीपक जला दिए थे। हजारों युद्ध की थापियां गूंज रही थीं। हर भारतीय परिवार ने अपनी एक बेटी खो दी। माताएं उबल रही थीं। पिता चुपचाप रो रहे थे। सबसे पहले रेजिडेंट्स सामने आए। अगले सात दिन उन्होंने नींद नहीं ली। हफ्ते के 100 घंटे काम करने की आदत थी। उनका जागरण और साहस ही देश की एकमात्र उम्मीद था। उन्होंने विरोध का आधार तैयार किया।आईएमए आजादी की लड़ाई की आग में पैदा हुआ। आग अभी भी जल रही है। पेशे की अंतरात्मा का रखवाला। सभी जिलों में जड़ें जमाए हुए। रेजिडेंट्स का सहारा।

32 साल की एक डॉक्टर महिला का आपत्तिजनक हालत में शरीर 9 अगस्त की सुबह कोलकाता के एक सरकारी अस्पताल के सेमिनार हॉल में मिला था। उसके साथ आरोपी ने अकेला पाकर पहले रेप और फिर मर्डर कर दिया। देश के डॉक्टरों के सबसे बड़े संगठन, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने महिला डॉक्टर के लिए न्याय की मांग के लिए एक बड़ा अभियान चलाया है। बता दें कि उन्होंने यह भी कहा कि हमने उसे सम्मान जरूर दिया। IMA के चीफ डॉ. आरवी अशोकन ने अपने भावुक पत्र में और क्या-क्या लिखा है, आइए जानते हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. आरवी अशोकन ने अपने पत्र में लिखा कि हम उसका जीवन बचाने में नाकाम रहे, लेकिन हमने पूरे देश के रूप में, उसे मरने के बाद सम्मान दिया।

शनिवार को, आईएमए ने पूरे देश में 24 घंटों के लिए सभी गैर-जरूरी चिकित्सा सेवाओं को रोकते हुए एक राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आयोजन किया। बता दें कि बच्चों की तरह भोले और भरोसेमंद। सड़कें खाली थीं। डर हवा में था। कुछ जागरूक युवाओं ने एक कोने में विरोध किया। अजीब खौफनाक सन्नाटा था। अशोकन ने यह भी दावा किया कि ट्रेनी डॉक्टर की मौत से चिकित्सा के पेशेवरों में बहुत गुस्सा है और उन्होंने आश्वासन दिया कि डॉक्टरों का संगठन पूरे देश में विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करता रहेगा। बुधवार की रात को, हजारों महिलाओं ने देश भर में सड़कों पर उतरकर पीड़िता के लिए न्याय की मांग करते हुए “रिक्लेम द नाइट” मार्च में भाग लिया है।

क्या भारत का प्रोजेक्ट चीता हो चुका है फेल?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत का प्रोजेक्ट चीता फेल हो चुका है या नहीं! भारत के ‘प्रोजेक्ट चीता’ पर पूरी दुनिया की नजर रही है। सितंबर 2022 में नामीबिया से 8 चीते भारत लाए गए और मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में छोड़े गए। यह एक ऐतिहासिक पल था क्योंकि भारत में लगभग 8 दशकों बाद चीते वापस आए थे। लेकिन अगस्त 2024 तक, 25 में से सिर्फ एक चीता ही खुले में घूम रहा है, जिसका नाम पवन है। यह प्रोजेक्ट इसलिए शुरू किया गया था ताकि भारत में चीतों की आबादी फिर से बढ़ सके। लेकिन दो साल बाद भी, ज्यादातर चीते अभी भी बाड़ों में बंद हैं। सिर्फ पवन ही आजाद है और अपनी मर्जी से जंगल में घूमता है। वन अधिकारियों का कहना है कि पवन हवा की तरह है, उसे पकड़ना मुश्किल है। उम्मीद थी कि सभी चीते पवन की तरह जंगल में आजाद होंगे, शिकार करेंगे और बच्चे पैदा करेंगे। वन अधिकारियों का कहना है कि पवन हवा की तरह है, उसे पकड़ना मुश्किल है। प्रोजेक्ट चीता को शुरू हुए लगभग दो साल होने वाले हैं। इस प्रोजेक्ट में कुछ अच्छी बातें हुई हैं, लेकिन चीतों को जंगल में आज़ाद करने में अभी तक कामयाबी नहीं मिली है। अधिकारियों का कहना है कि प्रोजेक्ट तय लक्ष्यों से बेहतर प्रदर्शन कर रहा है।

कूनो में चीता प्रोजेक्ट बहुत अच्छा रहा है। चीतों के बच्चे ज्यादा हो रहे हैं और वे स्वस्थ भी हैं। शुरुआत में उम्मीद थी कि चीता की संख्या हर साल 5% बढ़ेगी। लेकिन कूनो में चीतों की संख्या उम्मीद से ज्यादा बढ़ी है। कूनो में अब 25 चीते हैं- 13 बड़े और 12 बच्चे। बड़े चीतों के बचने की संभावना 65% है जो की योजना से कहीं ज्यादा है। पहले उम्मीद थी कि केवल 50% बड़े चीते ही बच पाएंगे। सबसे अच्छी बात यह है कि 70.5% चीते के बच्चे जीवित हैं। यह दर्शाता है कि चीते स्वस्थ हैं और प्रोजेक्ट तेजी से सफलता की ओर से बढ़ रहा है।

प्रोजेक्ट चीता’ की सफलता पर सवाल उठाते हैं। ‘प्रोजेक्ट चीता’ के तहत भारत लाए गए चीतों को शुरुआत में दो महीने के लिए जंगल के माहौल में ढाला जाना था और उसके बाद उन्हें पूरी तरह से आजाद कर देना था। दिसंबर 2023 में ‘प्रोजेक्ट चीता’ की संचालन समिति ने चीतों को कूनो नेशनल पार्क में छोड़ने की सैद्धांतिक मंजूरी भी दे दी थी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। चीतों को अभी भी लगातार निगरानी में रखा जा रहा है। ‘प्रोजेक्ट चीता’ की सफलता नियंत्रित वातावरण का नतीजा है जहां चीतों की 24 घंटे निगरानी की जाती है, पशु चिकित्सक हमेशा मौजूद रहते हैं और जरूरत पड़ने पर उन्हें खाना भी दिया जाता है। यह सही मायने में जंगली जीवन नहीं है।

सवाल यह है कि अगर चीतों को शुरुआती परिचय के बाद सीधे जंगल में छोड़ दिया जाता, तो क्या नतीजे होते? लेकिन सवाल यह है कि … क्या ये आंकड़े तब सामने आते, चीतों को थोड़ी अवधि के अनुकूलन के बाद जंगलों में मुक्त कर दिया जाता? प्रोजेक्ट चीता की सफलताएं एक बहुत ही नियंत्रित वातावरण का उत्पाद हैं। 24×7 निगरानी है, पशु चिकित्सक हैं हाथ, और यहां तक कि जरूरत पड़ने पर फीड की व्यवस्था भी की जाती है। याद रखें, मूल योजना सभी चीतों को भारत में दो महीने के अनुकूलन के बाद जंगल में छोड़ने की थी। दिसंबर 2023 में वापस, संचालन समिति ने सैद्धांतिक मंजूरी दे दी थी कूनो के जंगल में चीतों को छोड़ने के लिए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ है।

शुरुआती योजना में माना गया था कि 3,200 वर्ग किलोमीटर का कूनो जंगल 21 चीतों को रख सकता है। लेकिन हाल के सर्वेक्षणों से पता चलता है कि कूनो में वास्तव में लगभग 12 चीते ही रह सकते हैं। चीते 600 वर्ग किलोमीटर से लेकर 3,000 वर्ग किलोमीटर तक के क्षेत्र में घूमते हैं। यही कारण है कि कूनो में छोड़े जाने के बाद ही चीते जंगल से बाहर निकलने लगे। वन अधिकारियों के लिए चीतों को ढूंढना और उन्हें वापस लाना एक बड़ी चुनौती बन गया। पवन और आशा नाम के दो चीते कूनो से 100 किलोमीटर तक दूर चले गए। वे कूनो से काफी दूर मानव आबादी के पास पहुंच गए। इससे इंसानों और चीतों के बीच संघर्ष का डर पैदा हो गया। इस डर के कारण चीतों को वापस बाड़ों में लाने का फैसला किया गया। पवन को छोड़कर सभी को वापस बाड़ों में डाल दिया गया।

अंतर्राष्ट्रीय चीता विशेषज्ञ का कहना है कि शुरुआत में जब चीतों ने शिकार किया था, तो उन्होंने शिकार का पूरा मांस खाया था। उन्होंने कहा, ‘मैंने पहले कभी किसी चीते को इतनी सफाई से शिकार खाते नहीं देखा। वे वास्तव में जंगली शिकार चाहते हैं।’ विशेषज्ञ ने बताया कि फिलहाल चीते निगरानी में रहते हुए खुद शिकार कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘अगर किसी कारण से कोई चीता शिकार नहीं कर पाता है, तो हमारी टीम उसे खाना देती है।’ जब चीते क्वारंटीन में थे, तो उन्हें भैंस का मांस दिया जाता था। इसमें विटामिन और मिनरल्स भी मिलाए जाते थे जो उन्हें आमतौर पर शिकार से मिलते हैं।

वन्यजीव विशेषज्ञों ने कूनो अधिकारियों से चीतों के खाने का पूरा रिकॉर्ड रखने को कहा है। इसमें कितना मांस दिया गया और कितना खाया गया, इसकी पूरी जानकारी होनी चाहिए। कूनो नेशनल पार्क में चीतों को बसाने की कोशिशों में नई चुनौतियां सामने आ रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि चीतों के प्रजनन, स्वास्थ्य और अनुकूलन क्षमता पर विशेष ध्यान देना होगा। ‘प्रोजेक्ट चीता’ को एक प्रयोग के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमे यह पता लगाया जा रहा है कि क्या अफ्रीकी चीते भारतीय परिवेश में जीवित रह सकते हैं। एक बड़ी चिंता चीतों में प्रजनन को लेकर है। पवन नाम के चीते ने पहले ही दो बार संतानें पैदा कर ली हैं और उसके लगातार कुनो में रहने से करीबी रिश्तेदारों के बीच प्रजनन का खतरा बढ़ सकता है। ऐसा होने से आनुवंशिक विविधता कम होती है और बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

 

क्या मंकी पॉक्स बन सकता है आने वाले समय में खतरा?

मंकी पॉक्स अब आने वाले समय में खतरा बन सकता है! कोराना के बाद एक और वायरस एमपॉक्स भारत सहित पूरी दुनिया को टेंशन दे रहा है। भारत के लिए राहत की बात यह है कि यहां अभी एक भी केस रिपोर्ट नहीं किया गया है। सरकार भी समय से पहले इसे लेकर अलर्ट हो गई है। आज प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव डॉ. पीके मिश्रा ने एक उच्च स्तरीय बैठक की अध्यक्षता की। इस बैठक में प्रधानमंत्री मोदी के निर्देशन में मंकीपॉक्स यानी चेचक जैसी बीमारी की तैयारियों पर चर्चा की गई। एक बयान के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी इस स्थिति पर बारीकी से नजर रख रहे हैं। बता दें कि एक दिन पहले यानी शनिवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने भी स्वास्थ्य अधिकारियों संग एक मीटिंग की थी। पीएम मोदी के प्रमुख सचिव पीके मिश्रा ने एमपॉक्स(mpox) को लेकर की गई मीटिंग के बारे में बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के पहले के एक बयान के अनुसार, साल 2022 से अब तक 116 देशों में कुल 99,176 मामले और 208 मौतें मंकीपॉक्स के कारण हुई हैं।NCDC द्वारा पहले जारी की गई मंकीपॉक्स पर संक्रामक रोग अलर्ट को नए घटनाक्रमों को शामिल करने के लिए अपडेट किया जा रहा है। देश में आने वाले मुख्य रास्तों, यानी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर तैनात मेडिकल स्टाफ को जागरूक करने और तैयार करने की कोशिशें की गई हैं। इसके बाद, उन्होंने बताया कि कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में मंकीपॉक्स के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। पिछले साल, मामलों में काफी बढ़ोतरी हुई थी, और इस साल अब तक के मामलों की संख्या पिछले साल के कुल मामलों से भी ज्यादा हो गई है। अब तक 15,600 से ज्यादा मामले और 537 मौतें हो चुकी हैं।

प्रमुख सचिव ने निगरानी बढ़ाने और मामलों का जल्दी पता लगाने के लिए प्रभावी उपाय करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने जल्दी निदान के लिए जांच प्रयोगशालाओं के नेटवर्क को बढ़ाने का भी निर्देश दिया है। फिलहाल 32 प्रयोगशालाएं जांच के लिए तैयार हैं। इसके अलावा, पीके मिश्रा ने बीमारी की रोकथाम और इलाज के तरीकों को व्यापक रूप से फैलाने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने स्वास्थ्य कर्मचारियों को लक्षणों की पहचान करने और निगरानी प्रणाली को समय पर सूचना देने की आवश्यकता पर जागरूकता अभियान चलाने के महत्व पर बल दिया। बैठक में नीति आयोग के सदस्य डॉ वी के पॉल, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सचिव अपूर्व चंद्रा, स्वास्थ्य अनुसंधान सचिव डॉ. राजीव बहल, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के सदस्य सचिव कृष्णा एस वत्स, सूचना एवं प्रसारण सचिव संजय जाजू और गृह सचिव गोविंद मोहन सहित अन्य मंत्रालयों के अधिकारी उपस्थित थे।

जारी बयान के अनुसार, स्वास्थ्य सचिव ने बताया कि पिछले एक हफ्ते में स्थिति से निपटने के लिए कई कदम उठाए गए हैं… 12 अगस्त, 2024 को, नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (NCDC) ने भारत के लिए संभावित खतरे का आकलन करने के लिए विशेषज्ञों की एक बैठक बुलाई। NCDC द्वारा पहले जारी की गई मंकीपॉक्स पर संक्रामक रोग अलर्ट को नए घटनाक्रमों को शामिल करने के लिए अपडेट किया जा रहा है। देश में आने वाले मुख्य रास्तों, यानी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर तैनात मेडिकल स्टाफ को जागरूक करने और तैयार करने की कोशिशें की गई हैं।

शनिवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक बैठक की अध्यक्षता की थी, जिसमें बंदर चेचक की स्थिति और देश की तैयारियों का आकलन किया गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अफ्रीका सीडीसी ने इस हफ्ते मंकीपॉक्स को वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर दिया है।एक दिन पहले यानी शनिवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने भी स्वास्थ्य अधिकारियों संग एक मीटिंग की थी। पीएम मोदी के प्रमुख सचिव पीके मिश्रा ने एमपॉक्स को लेकर की गई मीटिंग के बारे में बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के पहले के एक बयान के अनुसार, साल 2022 से अब तक 116 देशों में कुल 99,176 मामले और 208 मौतें मंकीपॉक्स के कारण हुई हैं। मामलों में काफी बढ़ोतरी हुई थी, और इस साल अब तक के मामलों की संख्या पिछले साल के कुल मामलों से भी ज्यादा हो गई है। अब तक 15,600 से ज्यादा मामले और 537 मौतें हो चुकी हैं।यह बीमारी अफ्रीका के 13 देशों में फैल गई है, जिनमें से चार नए देश हैं। बयान में कहा गया है कि वर्ष 2022 में WHO द्वारा अंतरराष्ट्रीय चिंता के सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किए जाने के बाद से भारत में 30 मामले सामने आए थे। बंदर चेचक का आखिरी मामला मार्च 2024 में पाया गया था। भारत में अभी तक बंदर चेचक के कोई मामला दर्ज नहीं किया गया है।

क्या वर्तमान में ममता बनर्जी की हो रही है अग्नि परीक्षा?

अगर वर्तमान की बात करें तो वर्तमान में ममता बनर्जी की अग्नि परीक्षा हो रही है! समूचे बंगाल में हजारों की संख्या में महिलाएं सड़कों पर उतर आई हैं। एकदम स्वतःस्फूर्त तरीके से। वे ममता बनर्जी को संकेत दे रही हैं कि बस, अब बहुत हो गया। उनका संदेश बहुत ही साफ है। न्याय का आह्वान कर रही हैं। वो न्याय जिसमें अभिव्यक्ति और आंदोलन की स्वतंत्रता, कानून के शासन, समानता और बहुत कुछ शामिल है। यह बहुत महत्वपूर्ण है। यह 2011 से बंगाल में पोरिबोर्तन यानी बदलाव के नाम पर किए गए सभी अत्याचारों का संदर्भ देता है। यह वह बैनर है जिसके तहत ममता ने अपनी प्राथमिकताएं मां, माटी, मानुष – महिला, भूमि और जनता निर्धारित की हैं।

उदाहरण के लिए, न्याय की मांग 2012 के पार्क स्ट्रीट सामूहिक बलात्कार से जुड़ी है, जिसे तत्कालीन नए सीएम ने शाजानो घोटोना यानी एक नकली घटना के रूप में खारिज कर दिया था। इसने सामूहिक बलात्कार की पीड़िता को बदनाम किया, जबकि उसके साथ हुए भयानक अपराध को नकार दिया जो उसने झेला था। फिर 2013 में कामदुनी में एक कॉलेज छात्रा की बर्बर हत्या और सामूहिक बलात्कार की घटना हुई। डॉक्टरों के आंदोलन के कारण स्वास्थ्य सेवाओं में आई भारी बाधा के प्रति अपने धैर्य से लोगों ने एक कड़ा संदेश दिया है, जिसे सीएम ने पढ़ा और समझा है। यह उनके लिए शासन को फिर से पटरी पर लाने की चेतावनी है।अपराधियों ने उसके पैरों को नाभि तक फाड़ दिया। उसका गला काट दिया और उसके शव को पास के एक खेत में फेंक दिया। ममता बनर्जी ने इसे भी ठीक से नहीं संभाला। पुलिस ने कार्रवाई करने में देरी की। जब लोगों का गुस्सा बढ़ा और कोलकाता और दूसरे जिलों में विरोध रैलियां फैल गईं; बुद्धिजीवियों ने अपनी आवाज उठाई और सरकार की निंदा की, तब जाकर दीदी ने इस घटना पर राजनीति करने के बजाय काम करना शुरू किया।

इस बार आरजी कर में डॉक्टर के रेप और मर्डर केस में ममता की प्रतिक्रिया काफी तेज रही। उन्होंने दावा किया कि अपराधियों को पकड़ने के लिए दुनिया की सबसे अच्छी पुलिस टीम को तैनात किया गया था। समस्या यह थी कि न तो युवा डॉक्टर और न ही आम जनता पुलिस की कार्रवाई से संतुष्ट थी। ऊपर से मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के बॉस संदीप घोष का रुख भी संदेह पैदा करने वाला रहा। वह पोलिटिकल कनेक्शन वाले व्यक्ति हैं।

इस बार ममता के कम होते आत्मविश्वास के और भी संकेत हैं। उन्होंने युवा डॉक्टरों की लंबी हड़ताल को जारी रहने दिया। हड़ताली डॉक्टरों को उनके सीनियरों और बंगाल के साथ-साथ देश भर के डॉक्टरों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों ने समर्थन किया। ममता ने हड़ताल को प्रशासनिक या राजनीतिक मुद्दा बनाए बिना चलने दिया है। जिस चीज ने उन्हें रोक रखा है, वह है जनता की प्रतिक्रिया। हड़ताल को मिले व्यापक समर्थन पर गौर कीजिए। भले ही इसने न केवल आरजी कर अस्पताल में बल्कि राज्य की राजधानी के अन्य अस्पतालों में भी ओपीडी और आपातकालीन सेवाओं को प्रभावित किया हो, आम लोग डॉक्टरों के साथ हैं। डॉक्टरों के आंदोलन के कारण स्वास्थ्य सेवाओं में आई भारी बाधा के प्रति अपने धैर्य से लोगों ने एक कड़ा संदेश दिया है, जिसे सीएम ने पढ़ा और समझा है। यह उनके लिए शासन को फिर से पटरी पर लाने की चेतावनी है।

उनका सबसे वफादार वोट बैंक सामूहिक रूप से उनके खिलाफ उठ खड़ा हुआ है। याद रखें, आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल कोलकाता के सबसे व्यस्त अस्पतालों में से एक है। यहां काम करने वाली 31 वर्षीय डॉक्टर के बलात्कार और हत्या को अब महिलाओं को कार्यस्थल सुरक्षा प्रदान करने में राज्य की व्यापक विफलता से जोड़ा जा रहा है। महिलाएं एक सरल अल्टीमेटम दे रही हैं: आपका समय अब शुरू होता है!इस धारणा की समस्या से निपटने के लिए, ममता को अपनी सरकार के काम करने के तरीके में बदलाव करना होगा। बता दें कि सामूहिक बलात्कार की पीड़िता को बदनाम किया, जबकि उसके साथ हुए भयानक अपराध को नकार दिया जो उसने झेला था। फिर 2013 में कामदुनी में एक कॉलेज छात्रा की बर्बर हत्या और सामूहिक बलात्कार की घटना हुई। अपराधियों ने उसके पैरों को नाभि तक फाड़ दिया। वह जानती हैं कि अगर वह इसमें नाकाम रहती हैं, तो 2021 के विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने जो विशाल राजनीतिक पूंजी सफलतापूर्वक जुटाई हैं, वह 2026 तक खतरनाक रूप से समाप्त हो जाएगी।

 

आखिर बंगाल में क्यों हो रहे हैं इतने सारे रेप?

अगर वर्तमान की बात करें तो वर्तमान में बंगाल में बहुत सारे रेप होते जा रहे हैं! कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में जूनियर डॉक्टर से रेप के बाद हत्या मामले ने देश के लोगों का गुस्सा बढ़ा दिया है। देशभर के डॉक्टर सड़क पर उतर कर इंसाफ की मांग कर रहे हैं। उधर इस वक्त बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर विपक्षी दलों के अलावा आम जनता का दवाब भी पड़ रहा है। प्रदेश की मुख्यमंत्री होने के बावजूद ममता असहाय क्यों हैं? ममता बनर्जी प्रदेश की कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने की जगह कोलकाता में महिला डॉक्टर के लिए न्याय की मांग को लेकर मार्च करती हैं। जिसके चलते विपक्षी पार्टियां उन पर तीखे हमले कर रही हैं। ऐसा नहीं है कि बंगाल में पहली बार रेप-मर्डर को लेकर इतना बड़ा हंगामा मचा हो। इसके पहले भी महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामले में राज्य की राजनीति में बवाल मच चुका है। लेकिन कोलकाता रेप-मर्डर केस ने बनर्जी और उनके कार्यकाल में महिलाओं के खिलाफ अपराधों को लेकर उनकी प्रतिक्रियाओं पर एक बार फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं। 2012 में पार्क स्ट्रीट रेप मामले को ‘मनगढ़ंत’ कहने से लेकर 2024 में आरजी कर मेडिकल कॉलेज रेप-मर्डर केस में विरोध प्रदर्शनों पर सवाल उठाने तक, बनर्जी का रवैया हमेशा आलोचनाओं के घेरे में रहा है।

प्रकाशित एक लेख ने ममता बनर्जी के शासनकाल में रेप के कई मामलों और महिलाओं के खिलाफ अपराधों को लेकर उनकी विवादास्पद प्रतिक्रियाओं की पड़ताल की। लेख में 2012 के पार्क स्ट्रीट बलात्कार मामले की जांच करने वाली आईपीएस अधिकारी दमयंती सेन का उदाहरण दिया गया है, जिन्हें मामले को सुलझाने के बाद तबादले का सामना करना पड़ा था। लेख में 2013 के कमदुनी सामूहिक बलात्कार मामले को भी हाई लाइटेड किया गया है, जहां बनर्जी ने प्रदर्शनकारी महिलाओं पर ही सवाल उठाए थे।

अप्रैल 2012 में आईपीएस दमयंती सेन को अचानक तबादले का आदेश दिया गया। सेन ने बंगाल के पार्क स्ट्रीट बलात्कार मामले को सुलझाकर कोलकाता मीडिया में सनसनी मचा दी थी। इसके लिए उन्हें सराहना मिल रही थी। लेकिन इसके बाद उन्हें जॉइंट कमिश्नर ऑफ पुलिस (क्राइम), कोलकाता पुलिस के पद से हटाकर डीआईजी (ट्रेनिंग) के रूप में बैरकपुर पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज भेज दिया गया। उनकी गलती क्या थी? उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के दावों पर सवाल उठाने की हिम्मत की थी। इंडिया टुडे में छपे लेख के मुताबिक, ममता बनर्जी ने इस बलात्कार मामले को ‘मनगढ़ंत घटना’ बताते हुए इसे ‘अपनी नई सरकार को बदनाम करने की साजिश’ करार दिया था। यह घटना उस समय घटी जब ममता बनर्जी को सत्ता में आए एक साल से भी कम समय हुआ था। उनके इस बयान के बाद सेन ने मामले की जांच जारी रखी और सच्चाई सामने लाई। इससे नाराज होकर बनर्जी ने सेन का तबादला कर दिया।

लेख ने ममता बनर्जी सरकार के कार्यकाल में हुए कई दुष्कर्म और हत्या के मामलों को याद दिलाया गया है। हंसखली में हुए एक दुष्कर्म को उन्होंने ‘प्रेम प्रसंग’ बताकर खारिज कर दिया था। कामदुनी में प्रदर्शनकारियों को ‘CPI(M) समर्थक’ कहा था और महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर सवाल उठाने वालों को ‘माओवादी’ (2012) करार दिया था। मई-जून 2021 में, जब पूरे बंगाल में पुलिस थानों में बलात्कार की शिकायतें दबाई जा रही थीं, तब भी ममता बनर्जी की चुप्पी ने सबको चौंका दिया था। एक बार फिर कोलकाता एक और दुष्कर्म और हत्या के मामले से जूझ रहा है। प्रदर्शनकारी न्याय की गुहार लगा रहे हैं। ऐसे में ममता बनर्जी का विरोध प्रदर्शनों का विरोध करना कई सवाल खड़े करता है।

2013 के कमदुनी सामूहिक बलात्कार मामले का भी जिक्र किया गया है। जब बनर्जी घटना के 10 दिन बाद कमदुनी गईं, तो उन्हें गुस्साई महिलाओं की भीड़ का सामना करना पड़ा था। उनमें से एक ने उन पर चिल्लाते हुए कहा था, ‘क्या आप अपना चेहरा दिखाने यहां आई हैं?’ यह घटना ममता के पंचायत चुनाव प्रचार से कुछ दिन पहले की है। बता दें कि ममता बनर्जी ने इस बलात्कार मामले को ‘मनगढ़ंत घटना’ बताते हुए इसे ‘अपनी नई सरकार को बदनाम करने की साजिश’ करार दिया था। यह घटना उस समय घटी जब ममता बनर्जी को सत्ता में आए एक साल से भी कम समय हुआ था। ममता ने एक बार फिर अपनी सरकार के खिलाफ साजिश को भांप लिया था। ममता ने कहा था, ‘यहां के लोग माकपा समर्थक हैं। मुझे यह कहते हुए दुख हो रहा है कि माकपा राजनीति कर रही है। गिरफ्तार किए गए सभी गुंडेमाकपा समर्थक थे।’

 

क्या कर्नाटक के मुख्यमंत्री के खिलाफ होगी कार्यवाही?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कर्नाटक के मुख्यमंत्री के खिलाफ कार्यवाही होगी या नहीं! कर्नाटक सरकार एमयूडीए घोटाले को लेकर राजनीति गरमा गई है। राज्यपाल थावरचंद गहलोत से मुख्यमंत्री सिद्धरमैया को जारी किए गए ‘कारण बताओ नोटिस’ को सरकार ने सख्त लहजे में ‘वापस’ लेने की सलाह दी है। गहलोत ने सिद्धरमैया से कारण बताओ नोटिस में पूछा है कि कथित मैसूरु शहरी विकास प्राधिकरण (एमयूडीए) साइट आवंटन ‘घोटाले’ के संबंध में मुकदमा चलाने की अनुमति क्यों नहीं दी गई। उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने मंत्रिमंडल की बैठक के बाद संवाददाताओं को संबोधित करते हुए राज्यपाल के फैसले को ‘लोकतंत्र और संविधान की हत्या’ करार दिया। शिवकुमार ने कहा कि सिद्धारमैया की पत्नी पार्वती को MUDA से वैकल्पिक साइट मिलने में कुछ भी अवैध नहीं है। शिवकुमार ने कहा कि मुकदमे का सवाल ही नहीं उठता। राज्यपाल की नोटिस के बाद कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया गुरुवार को कैबिनेट बैठक में शामिल नहीं हुए। बैठक में राज्यपाल द्वारा उन्हें जारी कारण बताओ नोटिस पर चर्चा हुई। नोटिस में उनसे यह बताने के लिए कहा गया था कि कथित मैसूर शहरी विकास प्राधिकरण (एमयूडीए) साइट आवंटन के संबंध में अभियोजन को मंजूरी क्यों नहीं दी जानी चाहिए।

 गृह मंत्री परमेश्वर ने पत्रकारों से बात करते हुए बताया कि सिद्दारमैया ने उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को बैठक की अध्यक्षता करने के लिए अधिकृत किया थाा। इसके बाद बैठक की अध्यक्षता उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को ने की। कर्नाटक में इन दिनों मैसूर शहरी विकास प्राधिकरण (एमयूडीए) का मुद्दा गर्माया हुआ है।

राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को नोटिस जारी कर एमयूडीए द्वारा उनकी पत्नी को भूमि साइटों के आवंटन में कथित अनियमितताओं को लेकर स्पष्टीकरण मांगा है।भारतीय संविधान में राज्यपाल को राज्य का प्रमुख बनाया गया है। हालांकि, प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ही राज्य की वास्तविक शासक होती है। राज्यपाल के अधिकार संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लेखित हैं, लेकिन ये अधिकार आमतौर पर नाममात्र के होते हैं और उन्हें केंद्र सरकार के निर्देशों का पालन करना होता है।

इस मुद्दे पर सिद्धारमैया ने पार्टी आलाकमान को बताया था कि वह एमयूडीए भूमि आवंटन से संबंधित किसी भी दस्तावेज़ पर हस्ताक्षरकर्ता नहीं थे। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने आलाकमान से अपने खिलाफ किसी भी फैसले को कानूनी और राजनीतिक रूप से लड़ने के लिए समर्थन मांगा है।

कर्नाटक के मंत्री प्रियांक खरगे ने गुरुवार को कहा कि मैसूर शहरी विकास प्राधिकरण (मुडा) घोटाले के संबंध में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को कारण बताओ नोटिस जारी करने का राज्यपाल थावरचंद गहलोत का फैसला सही नहीं है। बेंगलुरु में गृह मंत्री जी. परमेश्वर से मुलाकात के बाद पत्रकारों से बात करते हुए प्रियांक खरगे गे ने कहा कि मुख्यमंत्री सिद्दारमैया को कारण बताओ नोटिस मिला है और वह इसका उचित जवाब देंगे। खरगे ने पूछा कि मुख्यमंत्री सिद्दारमैया को अचानक नोटिस मिला, जो उन्हें गलत लगा।

सीएम ने पहले ही राज्यपाल को पर्याप्त जानकारी दे दी थी और संबंधित दस्तावेज जमा कर दिए थे। इसके बावजूद उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। ऐसे में सवाल है कि मुख्यमंत्री के खिलाफ कार्रवाई के लिए यह स्क्रिप्ट कहां से आ रही है? बता दे कि राज्यपाल का नोटिस भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता टीजे अब्राहम की एक याचिका के बाद आया था जिसमें मुडा में कथित अनियमितताओं को लेकर सिद्धारमैया के खिलाफ मुकदमा चलाने की मांग की गई थी। अपनी याचिका में उन्होंने आरोप लगाया था कि कई करोड़ रुपये के इस घोटाले से राज्य के खजाने को भारी नुकसान हुआ है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उनकी पत्नी पार्वती के अलावा शिकायतकर्ता ने सिद्धारमैया के बहनोई मल्लिकार्जुन स्वामी देवरज पर भी गलत काम करने का आरोप लगाया है। मुख्यमंत्री ने सभी आरोपों का खंडन किया और कहा कि सब कुछ कानून के अनुसार किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि विकास प्राधिकरण ने उनकी पत्नी की मैसूर के केसरुर में चार एकड़ जमीन पर बिना उचित अधिग्रहण के अवैध रूप से लेआउट विकसित किया।

जुलाई में लोकायुक्त पुलिस में दर्ज कराई गई एक शिकायत में श्री अब्राहम ने आरोप लगाया था कि सिद्धारमैया की पत्नी बीएम पार्वती को एक उच्च श्रेणी के मैसूरु पड़ोस में 14 वैकल्पिक साइटों का आवंटन अवैध था, जिससे खजाने को 45 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। सूत्रों के अनुसार, राज्यपाल सामाजिक कार्यकर्ता टीजे अब्राहम की मुडा भूमि घोटाले से संबंधित शिकायत के आधार पर मुख्यमंत्री सिद्दारमैया के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दे सकते हैं।

क्या एक राज्यपाल नहीं दे सकते मुख्यमंत्री पर कार्रवाई करने के आदेश?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या एक राज्यपाल मुख्यमंत्री पर कार्यवाही करने का आदेश नहीं दे सकता! देश की राजनीति में राज्यपाल और प्रदेश के सीएम के बीच खींचतान की कहानियां अब नई नहीं रह गई हैं। उदाहरण के लिए दिल्ली के सीएम और एलजी, तमिलनाडु के राज्यपाल और स्टालिन सरकार, केरल सरकार और राज्यपाल के बीच तकरार। अब ताजा मामला कर्नाटक से आया है। मैसूरु अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी (मुदा) द्वारा साइट आवंटन में कथित अनियमितताओं के मामले में सीएम सिद्धारमैया फंसते दिख रहे हैं। उनपर इस केस को लेकर मुकदमा चलाया जाएगा। कर्नाटक के मौजूदा राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने MUDA भूमि घोटाले के मामले में उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दे दी है। अब इन सब के बीच सवाल यह उठता है कि क्या किसी प्रदेश का राज्यपाल मुख्यमंत्री पर मुकदमा चलाने का आदेश दे सकता है? सवाल इसलिए भी लाजिमी हो गया है क्योंकि राज्यपाल के निर्देशानुसार, कर्नाटक के सीएम पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 218 के तहत मुकदमा चलाने की तैयारी है। पहले समझते हैं कि आखिर कर्नाटक में सीएम सिद्धारमैया जिस मामले में फंसते दिख रहे हैं, वह असल में है क्या? यह मामला MUDA की ओर से उस समय मुआवजे के तौर पर जमीन के पार्सल के आवंटन से जुड़ा है जब सिद्धारमैया मुख्यमंत्री थे। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की पत्नी पार्वती के इस मामले में लाभार्थी होने के कारण मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार के आरोपों के केंद्र में आ गए हैं। विपक्षी दल आरोप लगाते हैं कि मुख्यमंत्री ने दलित समुदाय की जमीन पर कब्जा किया और आरोप है कि यह घोटाला 3000 करोड़ रुपये का है। बता दें कि कई करोड़ रुपये के इस घोटाले से राज्य के खजाने को भारी नुकसान हुआ है। जुलाई में लोकायुक्त पुलिस में दर्ज कराई गई एक शिकायत में श्री अब्राहम ने आरोप लगाया था कि सिद्धारमैया की पत्नी बीएम पार्वती को एक उच्च श्रेणी के मैसूरु पड़ोस में 14 वैकल्पिक साइटों का आवंटन अवैध था, जिससे खजाने को 45 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। मुडा पर जाली दस्तावेज बनाने और करोड़ों रुपये की जमीन हासिल करने का आरोप लगाते हुए शिकायतकर्ता स्नेहमयी कृष्ण ने सिद्धारमैया और उनके परिवार के खिलाफ कई आरोप लगाए हैं। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उनकी पत्नी पार्वती के अलावा शिकायतकर्ता ने सिद्धारमैया के बहनोई मल्लिकार्जुन स्वामी देवरज पर भी गलत काम करने का आरोप लगाया है। मुख्यमंत्री ने सभी आरोपों का खंडन किया और कहा कि सब कुछ कानून के अनुसार किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि विकास प्राधिकरण ने उनकी पत्नी की मैसूर के केसरुर में चार एकड़ जमीन पर बिना उचित अधिग्रहण के अवैध रूप से लेआउट विकसित किया।

पिछले महीने राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को एक ‘नोटिस’ जारी किया था जिसमें उन्हें अपने खिलाफ लगे आरोपों का जवाब सात दिनों के भीतर देने और बताया गया था कि उनके खिलाफ मुकदमा क्यों नहीं चलाया जाना चाहिए। इसके बाद राज्य मंत्रिमंडल ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें राज्यपाल से मुकदमा चलाने की मंजूरी न देने की अपील की गई। सिद्धारमैया की अगुवाई वाली सरकार ने उनसे नोटिस वापस लेने की भी सलाह दी और राज्यपाल के ‘संवैधानिक पद का घोर दुरुपयोग’ करने का आरोप लगाया।

राज्यपाल का नोटिस भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता टीजे अब्राहम की एक याचिका के बाद आया था जिसमें मुडा में कथित अनियमितताओं को लेकर सिद्धारमैया के खिलाफ मुकदमा चलाने की मांग की गई थी। अपनी याचिका में उन्होंने आरोप लगाया था कि कई करोड़ रुपये के इस घोटाले से राज्य के खजाने को भारी नुकसान हुआ है। जुलाई में लोकायुक्त पुलिस में दर्ज कराई गई एक शिकायत में श्री अब्राहम ने आरोप लगाया था कि सिद्धारमैया की पत्नी बीएम पार्वती को एक उच्च श्रेणी के मैसूरु पड़ोस में 14 वैकल्पिक साइटों का आवंटन अवैध था, जिससे खजाने को 45 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

भारतीय संविधान में राज्यपाल को राज्य का प्रमुख बनाया गया है। हालांकि, प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ही राज्य की वास्तविक शासक होती है। राज्यपाल के अधिकार संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लेखित हैं, लेकिन ये अधिकार आमतौर पर नाममात्र के होते हैं और उन्हें केंद्र सरकार के निर्देशों का पालन करना होता है।

सिद्धारमैया का बचाव करते हुए कर्नाटक कांग्रेस ने आरोप लगाया कि राज्यपाल पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी और पूर्व कर्नाटक मंत्रियों शशिकला जोल्ले और मुरुगेश निरानी के खिलाफ जांच में कार्रवाई में देरी कर रहे हैं। पार्टी ने कहा कि यह तथ्य कि राज्यपाल ने केवल मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के खिलाफ एक निराधार निजी शिकायत पर ही चौंकाने वाली तेजी के साथ कार्रवाई की, यह एक राजनीतिक रूप से प्रेरित साजिश लगती है।

 

जब पत्नी पीड़ित इंजीनियर ने सुनाई अपनी दास्तान!

हाल ही में एक ऐसी घटना सामने आई, जिसमें पत्नी पीड़ित इंजीनियर ने अपनी दास्तान सुना डाली! हमारे भारत में कहा जाता है कि पति-पत्नी का बंधन 7 जन्मों का होता। साथ जीने-मरने की कस्में खाई जाती हैं, हर परिस्थिति में एकदूसरे का साथ देना होता है,लेकिन बेंगलुरु का एक टेक्नीशियन अपनी पत्नी से ही परेशान है। उसके परेशानी की इंतेहा इसी से समझी जा सकती है कि वह अपनी पत्नी से पीछा छुड़ाकर बेंगलुरु से नोएडा भाग आया है। पति का कहना है कि मुझे जेल में सड़ा दो, लेकिन उसके साथ नहीं रहूंगा। शख्स 4 अगस्त को अचानक गायब हो गया था जिसके बाद उसे नोएडा के एक मॉल के पास देखा गया। बता दें कि वह तब मान गया जब पुलिस ने उसे बताया कि उसकी पत्नी द्वारा दर्ज की गई गुमशुदगी की शिकायत को केवल उसकी मौजूदगी में ही बंद किया जा सकता है। उत्तर बेंगलुरु का रहने वाला यह व्यक्ति फिल्म देखने के बाद मॉल से बाहर निकला तभी पुलिस उसे पकड़कर वापस बेंगलुरु ले आई। आइए जानते हैं पूरा माजरा क्या है? दरअसल, उत्तर बेंगलुरु में पेशे से टेक्नीशियन विपिन गुप्ता बीते 4 अगस्त को अचानक लापता हो गया। उसकी पत्नी ने उसे खोजने के लिए सोशल मीडिया पर पोस्ट करके कहा कि पुलिस उनके पति को खोजने के लिए पर्याप्त कोशिश नहीं कर रही है। उसने कहा कि मैं कुंवारा था और उससे शादी करने के लिए राजी हो गया। हमारी एक आठ महीने की बेटी भी है।पत्नी को शक था कि उनके पति का अपहरण हो गया है। इसके बाद विपिन के गुमशुदगी की खबर गूगल पर ट्रेंड करने लगी। हर कोई इसके बारे में उत्सुकता से खोज रहा था।

शुरुआती जांच में पुलिस को आदमी के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली क्योंकि उसने अपना मोबाइल फोन बंद कर दिया था। पुलिस ने बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और यहां तक कि हवाई अड्डे पर कई सीसीटीवी कैमरों की भी जांच की लेकिन कुछ नहीं मिला। हालांकि, नोएडा में खरीदे गए नए सिम कार्ड को अपने पुराने फोन में लगाने से ही पुलिस उस तक पहुंच पाई। विपिन गुप्ता की लोकेश नोएडा के मॉल के पास मिली। पुलिस जब वहां पहुंची तो वह एक फिल्म देखकर बाहर आया था। मॉल से बाहर आने पर टेक्नीशियन से मिले जांच अधिकारियों ने द टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि जब हम तीनों ने उसे घेर लिया, तो उसे एहसास हुआ कि हम सादे कपड़ों में पुलिस वाले हैं। वह मुस्कुराया और पूछा कि अब क्या होगा? हमने उससे कहा कि हमें शहर वापस उड़ान भरनी चाहिए, लेकिन उसने इसका कड़ा विरोध किया।

कुछ घंटों बाद ही तीनों अधिकारी टेक्नीशियन को वापस उड़ान भरने के लिए मना सके। टेक्नीशियन ने उनसे कहा कि मुझे जेल में डाल दो, मैं वहां रहूंगा,लेकिन मैं वापस नहीं जाऊंगा। हालांकि, वह तब मान गया जब पुलिस ने उसे बताया कि उसकी पत्नी द्वारा दर्ज की गई गुमशुदगी की शिकायत को केवल उसकी मौजूदगी में ही बंद किया जा सकता है।

शुक्रवार सुबह बेंगलुरु के केम्पेगौड़ा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरने के बाद पुलिस ने उसका बयान लिया और उसे घर भेज दिया। अपने बयान में टेक्नीशियन ने कहा कि उसकी पत्नी उसे परेशान और यातना देती है। टीओआई के हवाले से उन्होंने पुलिस को बताया कि मैं उसका दूसरा पति हूं। बता दें कि 4 अगस्त को अचानक गायब हो गया था जिसके बाद उसे नोएडा के एक मॉल के पास देखा गया। उत्तर बेंगलुरु का रहने वाला यह व्यक्ति फिल्म देखने के बाद मॉल से बाहर निकला तभी पुलिस उसे पकड़कर वापस बेंगलुरु ले आई। आइए जानते हैं पूरा माजरा क्या है? बता दे कि शुरुआती जांच में पुलिस को आदमी के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली क्योंकि उसने अपना मोबाइल फोन बंद कर दिया था। पुलिस ने बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और यहां तक कि हवाई अड्डे पर कई सीसीटीवी कैमरों की भी जांच की लेकिन कुछ नहीं मिला। हालांकि, नोएडा में खरीदे गए नए सिम कार्ड को अपने पुराने फोन में लगाने से ही पुलिस उस तक पहुंच पाई। दरअसल, उत्तर बेंगलुरु में पेशे से टेक्नीशियन विपिन गुप्ता बीते 4 अगस्त को अचानक लापता हो गया। करीब तीन साल पहले जब मैं उससे मिला तो वह 12 साल की बेटी के साथ थी और उसका तलाक हो गया था। उसने कहा कि मैं कुंवारा था और उससे शादी करने के लिए राजी हो गया। हमारी एक आठ महीने की बेटी भी है।