Sunday, March 15, 2026
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आखिर नाम की तख्ती से यूपी में क्यों बढ़ रहा है विवाद?

वर्तमान में यूपी में नाम की तख्ती से विवाद बढ़ता ही जा रहा है! कांवड़ यात्रा के रास्ते पर खान-पान की सामग्री बेचने वाले सभी दुकानदारों को अपने और अपने कर्मचारियों के नाम बताने होंगे। उत्तर प्रदेश प्रशासन के इस आदेश को मुसलमान विरोधी बताया जा रहा है। ये तो चोर की दाढ़ी में तिनका वाली बात हो गई। जब प्रशासन ने किसी धर्म, समुदाय, जाति विशेष का नाम नहीं लिया, उसने सबके लिए आदेश जारी किया है तो फिर इससे मुसलमानों को नुकसान होगा, यह कैसे पता चला? बिल्कुल आसान जवाब है। ये सब जानते हैं कि मुसलमान किस हद तक अनैतिक और अमानवीय हरकतों में जुटे हैं। आए दिन पेशाब, थूक और पता नहीं किन-किन तरकीबों से अपवित्र करके खाने-पीने के सामान बेचने की इनकी घटिया हरकतों के वीडियोज सामने आते रहते हैं। मुसलमान जहां हैं, वहां बस दो ही मानसिकता के साथ काम कर रहे हैं। पहली- गैर-मुस्लिमों को जैसे भी हो सके, प्रताड़ित करो, उनका धर्म भ्रष्ट करो और दूसरी- तरह-तरह के जिहाद से उनका धर्म परिवर्तन करवाओ। अब तो लगातार मिल रहे प्रमाणों से यह साबित सा हो गया है कि मुसलमान न हिंदुओं के साथ सामंजस्य चाहते हैं और ना हिंदुस्तान को अपना मानते हैं। लेकिन उनकी मांग यह है कि हिंदू समावेशी विचारों से तनिक भी नहीं भटकें, धर्मनिरपेक्षता का दामन न छोड़ें। फिर पारदर्शिता से परहेज क्यों? किसकी दुकान है, यह बताने में क्या हर्ज? क्यों बात-बात में इस्लाम को खतरे में देखने वाला मुसलमान अपने होटलों, ढाबों के नाम हिंदू देवी-देवताओं पर रखेगा? उत्तर प्रदेश और कांवड़ यात्रा के मार्ग ही नहीं, पूरे देश में अगर कोई कुछ छिपाकर कारोबार कर रहा है तो क्या वह गुनाह नहीं है?

अगर, यह सच है कि मुसलमान खाने-पीने के सामानों में थूक रहे हैं, पेशाब कर रहे हैं और यह बीमारी किसी एक इलाके की नहीं, देश के कोने-कोने में देखी जा रही है तो फिर कोई किस मुंह से कहता है कि दुकानदारों को नेम प्लेट लगाने का फरमान हिटलरशाही है। अगर यह हिटलरशाही है तो यही सही, लेकिन हिंदू थूक चाटकर और पेशाब पीकर समावेशी और धर्मनिरपेक्ष भावना का झंडाबरदार नहीं बना रह सकता। जो कोई भी यूपी प्रशासन के आदेश की निंदा कर रहा है, वो इस बात की चर्चा तक नहीं करता कि हां, कुछ मुसलमान अमानवीय हरकतें करते हैं। भला ये क्यों चर्चा करें? इन्हें जिहादी मानसिकता से क्या परेशानी? जिसे पेशाब पीना पड़े, थूका हुआ खाना पड़े, वो जानें। इन्हें तो बस लोकतंत्र, संविधान, धर्मनिरेपक्षता, समावेशिता, सहिष्णुता के नारों से जिहादियों का बचाव करना है, जिहाद की आंच तेज करनी है। दूसरी तरफ, धर्मगुरु के वेष में भी हिंदू हाय हुसैन के नारे के साथ अपने शरीर को जख्मी कर रहा है। एकता प्रदर्शित करने का इससे बड़ा और क्या प्रमाण चाहते हो?

दरअसल, ये लोकतंत्र, संविधान, मानवाधिकार, धर्मनिरपेक्षता आदि का इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ युद्ध के औजारों की तरह करते हैं। दुनिया के उस लोतांत्रिक और समावेशी देश का नाम बता दें जहां मुसलमान पलायन करके गए और उस देश का कायाकल्प कर दिया। इसके उलट एक भी देश नहीं जहां पलायन कर गए मुसलमानों की ठीकठाक आबादी होते ही शांति बरकरार रह सकी। इंग्लैंड इसका जीता-जागता उदाहरण है। ये मुसलमान ही हैं जिन्होंने यूरोप के उन देशों की नाक में भी दम करने से परहेज नहीं किया जिन्होंने संकट के वक्त इनके लिए अपनी बाहें पसारीं। ये इतने पतित हैं कि जिन माहौल, जिन हालात से पीछा छुड़ाकर भागे, वही माहौल और हालात उन देशों में भी बना देते हैं जहां इन्होंने शरण ली हुई है। वो तो दूसरे देश हैं, यहां भारत में रहने वाले मुसलमान ही अक्सर ऐसा व्यवहार करते दिख जाते हैं कि मानो किसी दुश्मन देश को युद्ध में हराकर जीत का जश्न मना रहे हों। तिरंगे का अपमान करेंगे और फिलिस्तीनी झंडे को ऐसे लहराएंगे जैसे निजाम-ए-मुस्तफा का ऐलान कर रहे हों। भारत माता की जय कहने से इस्लाम संकट में आ जाता है और संसद में जय फिलिस्तीन का नारा काफी हर्षोल्लास से लेते हैं।

कहते हैं पढ़ाई से, जीवन स्तर ऊंचा होने से कट्टरता कम हो जाती है। लेकिन मुसलमानों पर यह फॉर्म्युला भी काम नहीं आता है। बाकियों को छोड़ दीजिए जो शिक्षा की रोशनी बांटते हैं, वो मुसलमान कट्टरता के किस घुप्प अंधेरों से घिरे हैं इसका प्रमाण अभी-अभी दिल्ली में मिला है। यहां मुस्लिम शिक्षकों ने बच्चों को धर्म परिवर्तन के लिए डराया। जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में एक कर्मचारी का आरोप है कि मुस्लिम उनपर धर्म परिवर्तन करने का दबाव बना रहे हैं। मुसलमान चाहे आईएएस बन जाएं या यूएस चले जाएं, क्रिकेट खेल रहे हों या कोई फिल्म स्टार हो, पत्रकार हो या लेखक, जो जहां है जिहाद में लगा हुआ है। सबका तरीका अलग हो सकता है, लेकिन जिहाद में अपनी भागीदारी जरूर सुनिश्चित कर रहा है। कोई सीधा कत्ल करके तो कोई जिहादी संगठनों की फंडिंग करके, कोई टीवी चैनल पर बैठकर जिहादियों का बचाव करके तो कोई लेख लिखकर। ये बहुरूपिये जिहाद में या तो सीधे शामिल हैं या परोक्ष रूप से।

क्या अब अतिरिक्त फौजियों के जरिए आतंकवादियों को खत्म करेगी सरकार?

अब सरकार अतिरिक्त फौजियों के जरिए आतंकवादियों को खत्म करने के प्लान बना रही है! जम्मू क्षेत्र में लगातार हो रही आतंकी वारदातों को देखते हुए भारतीय सेना ने वहां अतिरिक्त 3,000 सैनिकों की तैनाती कर दी है। सूत्रों के मुताबिक इसी हफ्ते सेना ने जम्मू क्षेत्र में एक ब्रिगेड हेडक्वॉर्टर, तीन बटालियन और कुछ पैरा एसएफ की टीम को भी भेज दिया है। एक बटालियन में करीब 800 सैनिक होते हैं। इसी तरह एक पैरा एसएफ टीम में करीब 40 कमांडो होते हैं। इस तरह करीब 2,500 सैनिक और करीब 500 पैरा कमांडो को जम्मू भेजा गया है। इसके साथ ही सीएपीएफ (सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्स) ने भी जम्मू क्षेत्र में अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती कर दी है। सैनिकों की कमी और ईस्टर्न लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन के साथ तनाव का असर जम्मू क्षेत्र में दिखाई दिया और वहां आतंकियों को फिर से पनपने का मौका मिला। आतंकियों ने सैनिकों की कमी का फायदा उठाते हुए खुद का खड़ा ही नहीं किया बल्कि अब जम्मू क्षेत्र में वे सिक्यॉरिटी फोर्स के लिए बड़ा सिरदर्द बन गए हैं। भारतीय सेना में करीब चार साल पहले ही एक लाख सैनिकों को कम करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई थी। टारगेट रखा गया था कि 2027 तक यह संख्या कम हो जाएगी। संसद की रक्षा मामलों की स्टैंडिंग कमिटी को भी तब इसकी जानकारी दी गई थी कि तकनीक का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं इसलिए मैन पावर कम किया जा रहा है।चार साल पहले जब ईस्टर्न लद्दाख में चीन के साथ एलएसी पर तनाव बढ़ा और स्थिति हिंसक झड़प तक पहुंच गई तब यहां से यूनिफॉर्म फोर्स को हटाकर LAC पर भेज दिया गया। यहां से एक डिविजन जितने सैनिकों को कम किया गया। यानी करीब 10-12 हजार सैनिक यहां से कम हुए।

जम्मू क्षेत्र में चार साल पहले सेना की करीब चार डिविजन जितनी संख्या थी। यूनिफॉर्म फोर्स को एलएसी भेजने से यहां तीन डिविजन रह गई। यहां अभी राष्ट्रीय राइफल (आरआर) की रोमियो फोर्स और डेल्टा फोर्स है। ये पूरी तरह से काउंटर इनसर्जेंसी-काउंटर टेररिजम (सीआईसीटी) टास्क को देख रही है। एक फोर्स में एक डिविजन जितने यानी करीब 12 हजार सैनिक हैं। सेना की दो और डिविजन जम्मू क्षेत्र में है। एक डिविजन का टास्क एलओसी देखना है और दूसरी डिविजन का टास्क एलओसी भी है और सीआईसीटी भी है।

सूत्रों के मुताबिक भारतीय सेना में इस वक्त करीब 1 लाख 80 हजार सैनिकों की कमी है। कोविड की वजह से दो साल तक सैनिकों की भर्ती ही नहीं हुई। इस दौरान हर साल 60 हजार सैनिक रिटायर हुए। इस लिहाज से कोविड वाले दो सालों में करीब 1 लाख, 20 हजार सैनिक रिटायर हुए। 2022 से अग्निवीर की भर्ती हुई और पहले और दूसरे साल दोनों बार 40 – 40 हजार अग्निवीर भर्ती किए गए। इन दो सालों में करीब 1 लाख, 40 हजार सैनिक रिटायर हुए क्योंकि 2022-23 में करीब 80 हजार सैनिक रिटायर हुए जबकि भर्ती हुए 80 हजार। इस तरह सेना में करीब 1 लाख, 80 हजार सैनिकों की कमी है।

जम्मू में हुए आतंकी हमलों के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या तकनीक सैनिकों की कमी पूरी कर सकती है? भारतीय सेना में करीब चार साल पहले ही एक लाख सैनिकों को कम करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई थी। टारगेट रखा गया था कि 2027 तक यह संख्या कम हो जाएगी। संसद की रक्षा मामलों की स्टैंडिंग कमिटी को भी तब इसकी जानकारी दी गई थी कि तकनीक का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं इसलिए मैन पावर कम किया जा रहा है। लेकिन एलएसी पर तनाव बढ़ने के बाद से वहां 50 हजार सैनिक डटे हुए हैं। जम्मू से हटाकर कई सैनिकों को वहां भेजा गया। बता दें कि सैनिकों की कमी और ईस्टर्न लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के साथ तनाव का असर जम्मू क्षेत्र में दिखाई दिया और वहां आतंकियों को फिर से पनपने का मौका मिला। आतंकियों ने सैनिकों की कमी का फायदा उठाते हुए खुद का खड़ा ही नहीं किया बल्कि अब जम्मू क्षेत्र में वे सिक्यॉरिटी फोर्स के लिए बड़ा सिरदर्द बन गए हैं। जिन जगहों पर सैनिकों की संख्या कम की गई वहां आतंकियों को फिर से पनपने का मौका मिल रहा है। वहां जिस तरह की भौगोलिक स्थितियां हैं वहां जो काम सैनिक कर सकते हैं वह काम तकनीक से नहीं हो सकता। क्या सैनिकों की संख्या कम करने के फैसले पर फिर से विचार किया जाना चाहिए?

भारत और रूस के संबंधों पर क्या बोल रहा है अमेरिका?

हाल ही में अमेरिका ने भारत और रूस के संबंधों पर एक बयान दिया है! अमेरिका के बाइडन प्रशासन ने कहा है कि रूस के साथ अपने संबंधों को लेकर चिंताओं के बावजूद भारत वाशिंगटन का रणनीतिक साझेदार बना रहेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 22वीं भारत-रूस शिखर वार्ता के लिए मॉस्को के दो दिवसीय दौरे पर गए थे। यूक्रेन में जारी युद्ध के बीच रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ उनकी बातचीत पर पश्चिमी देशों की करीबी नजर थी। मंगलवार को पुतिन से बातचीत में मोदी ने उनसे कहा कि यूक्रेन संघर्ष का समाधान युद्ध के मैदान पर संभव नहीं है और शांति के प्रयास बम और बंदूकों के बीच सफल नहीं होते हैं। अमेरिकी रक्षा विभाग के मुख्यालय पेंटागन और विदेश विभाग के प्रवक्ताओं ने रूस के साथ भारत के रिश्तों और मोदी के मॉस्को दौरे से जुड़े सवालों पर मंगलवार को अलग-अलग प्रतिक्रिया दी। पेंटागन के प्रेस सचिव मेजर जनरल पैट राइडर ने वाशिंगटन में संवाददाताओं से बातचीत में कहा, “भारत और रूस के बीच काफी लंबे समय से रिश्ते हैं। अमेरिका के नजरिये से, भारत एक रणनीतिक साझेदार है, जिसके साथ हम रूस से उसके रिश्तों सहित पूर्ण और स्पष्ट बातचीत करना जारी रख रहे हैं। चूंकि, यह इस हफ्ते होने वाले नाटो शिखर सम्मेलन से संबंधित है, इसलिए निश्चित रूप से, आपकी तरह ही दुनिया का ध्यान भी इस पर केंद्रित है।”

वहीं दूसरी ओर, अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर ने अपने दैनिक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि अमेरिका “रूस से भारत के रिश्तों को लेकर अपनी चिंताओं के बारे में” बिल्कुल स्पष्ट रहा है। उन्होंने कहा, “हमने अपनी चिंताओं को निजी तौर पर सीधे भारत सरकार के समक्ष जाहिर किया है और हम ऐसा करना जारी रख रहे हैं। इसमें बदलाव नहीं हुआ है।” व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव केरीन जीन-पियरे ने कहा कि भारत एक रणनीतिक साझेदार है जिसके साथ अमेरिका पूरी तरह और खुलकर संवाद करता है जिसमें रूस के साथ उनके संबंध शामिल हैं। उन्होंने मंगलवार को अपने दैनिक संवाददाता सम्मेलन में कहा, ”हमने पहले भी इस बारे में बात की है। इसलिए हमारा मानना है कि यह महत्वपूर्ण है कि जब यूक्रेन की बात हो तो भारत समेत सभी देश एक स्थायी और न्यायसंगत शांति को साकार करने के प्रयासों का समर्थन करें।”

पियरे ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा, ”हमारे सभी सहयोगियों के लिए इसका एहसास करना महत्वपूर्ण है। और इसलिए हम यह भी मानते हैं कि रूस के साथ भारत का दीर्घकालिक संबंध उसे राष्ट्रपति पुतिन से अपने क्रूरतापूर्ण युद्ध, यूक्रेन में एक अकारण युद्ध को समाप्त करने का आग्रह करने की क्षमता देता है। इसे खत्म करना राष्ट्रपति पुतिन की जिम्मेदारी है। राष्ट्रपति पुतिन ने युद्ध शुरू किया और राष्ट्रपति पुतिन युद्ध समाप्त कर सकते हैं।” भारत रूस के साथ अपनी ‘विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी’ का दृढ़ता से बचाव करता रहा है और उसने यूक्रेन संघर्ष के बावजूद संबंधों में गति बनाए रखी है। नई दिल्ली ने यूक्रेन पर 2022 में रूस के आक्रमण की अभी तक निंदा नहीं की है। भारत लगातार बातचीत और कूटनीति के माध्यम से संघर्ष के समाधान की वकालत करता आया है।

राइडर ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि अगर राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (मोदी की) इस यात्रा को कुछ ऐसे पेश करें, जिससे किसी तरह यह दिखाया जा सके कि वह बाकी दुनिया से अलग-थलग नहीं हैं, तो कोई भी आश्चर्यचकित होगा। सच तो यह है कि राष्ट्रपति पुतिन के युद्ध का विकल्प चुनने से रूस बाकी दुनिया से अलग-थलग हो गया है और उसे इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है।” उन्होंने कहा, “उन्हें आक्रामकता की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है और तथ्य इस बात की गवाही देते हैं। इसलिए, हम भारत को रणनीतिक साझेदार के तौर पर देखना जारी रखेंगे। हम उनके साथ ठोस बातचीत करना जारी रखेंगे।”

इस दौरान एक संवाददाता ने कहा कि पुतिन उतने अलग-थलग नहीं दिख रहे हैं, क्योंकि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रमुख अभी मॉस्को में हैं और उनसे गर्मजोशी से मिल रहे हैं। इस पर राइडर ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने हाल में यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की से भी मुलाकात की थी और उन्हें आश्वस्त किया था कि भारत यूक्रेन युद्ध के शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन करने के लिए वह सबकुछ करना जारी रखेगा, जो उसके बस में है।

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि हमें यकीन है कि भारत यूक्रेन में स्थायी और न्यायसंगत शांति कायम करने के प्रयासों का समर्थन करेगा और पुतिन को संयुक्त राष्ट्र चार्टर तथा संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता के सिद्धांतों का पालन करने के महत्व से अवगत कराएगा।” मिलर ने कहा कि अमेरिका “भारत से यूक्रेन की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता को बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों के आधार पर देश में स्थायी और न्यायसंगत शांति कायम करने के प्रयासों का समर्थन करने का लगातार आग्रह करता है। और यह मुद्दा ऐसा है, जिस पर हम भारत से बातचीत जारी रखेंगे।”

आखिर स्पेस में कैसे अपने दिन काट रही है सुनीता विलियम्स?

आज हम आपको बताएंगे कि सुनीता विलियम्स स्पेस में अपने दिन कैसे काट रही है! नासा के अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर स्पेस में फंसे हुए हैं। फिलहाल वह स्पेस में अपने अतिरिक्त समय का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में प्रयोग करने और इमरजेंसी ड्रिल करने में बिता रहे हैं। नासा की ओर से बताया गया है कि भारतीय मूल की सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर 5 जुलाई को बोइंग के स्टारलाइनर यान से स्पेस में पहुंचे थे। स्पेस में फंस जाने के बाद दोनों भारहीन वातावरण में पौधों को प्रभावी ढंग से पानी देने के तरीकों की खोज जारी रखे हुए हैं। दोनों अंतरिक्ष यात्रियों ने हार्मनी मॉड्यूल के जरिए परीक्षण किया कि विभिन्न आकारों के रूट मॉडल और पौधे माइक्रोग्रैविटी में पानी कैसे अवशोषित करेंगे। सुनीता और बुच का समय कैसे बीत रहा है, इसे नासा की ओर से दी गई अपडेट के जरिए समझा जा सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, नासा ने 16 जुलाई को कहा था कि बुच विल्मोर और सुनीता विलियम्स ने अपने दिन का अधिकांश समय सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण के भारहीन वातावरण में मिट्टी के बिना उगने वाले पौधों को पानी देने के तरीकों का परीक्षण करने में बिता रहे हैं। वे कक्षा में अतिरिक्त समय मिलने की शिकायत नहीं कर रहे हैं, और स्टेशन चालक दल की मदद करने का आनंद ले रहे हैं।नासा के मुताबिक विलियम्स ने सबसे पहले हार्मनी मॉड्यूल में प्लांट वाटर मैनेजमेंट हार्डवेयर स्थापित किया और फिर परिणामों की वीडियो रिकॉर्ड करते हुए कई विधियों का परीक्षण किया। विल्मोर ने अंतरिक्ष यान और अंतरिक्ष आवासों पर विभिन्न प्रकार के पौधों को प्रभावी ढंग से पोषण देने के तरीके सीखने के लिए हाइड्रोपोनिक्स और वायु परिसंचरण तकनीक के लिए भी परीक्षण किए।

नासा ने 15 जुलाई को साझा किए गए अपडेट में बताया गया था कि स्टारलाइनर पायलट सुनीता विलियम्स और कमांडर बुच विल्मोर ने अल्ट्रासाउंड 2 डिवाइस का उपयोग करके नसों के स्कैन में भाग लिया। दोनों ने बारी-बारी से एक-दूसरे की गर्दन, कंधे और पैर की नसों की इमेजिंग की। जमीन पर मौजूद डॉक्टरों ने वास्तविक समय में इस प्रक्रिया की निगरानी की। इसके बाद विल्मोर ने नासा के फ्लाइट इंजीनियर मैथ्यू डोमिनिक की नसों को स्कैन किया, जिससे शोधकर्ताओं को यह समझने में मदद मिली कि माइक्रोग्रैविटी मानव शरीर को कैसे प्रभावित करती है। इस बीच सुनीता विलियम्स ने अलग-अलग अध्ययनों पर काम किया। उनका प्रारंभिक शोध माइक्रोग्रैविटी में उच्च गुणवत्ता वाले ऑप्टिकल फाइबर के निर्माण पर केंद्रित था। विलियम्स ने अंतरिक्ष में उगाए गए पौधों को पानी देने और पोषण देने के दौरान गुरुत्वाकर्षण की कमी को दूर करने की जांच की।

विलमोर और विलियम्स ने फ्लुड सिस्टम सर्विस का उपयोग करने की प्रक्रियाओं की भी समीक्षा की है, जो अंतरिक्ष स्टेशन पर प्रणालियों पर तरल पदार्थ को निकालता और प्रसारित करता है। दोनों अंतरिक्ष यात्रियों ने सुबह के समय हृदय और श्वास सेंसर से जुड़े हुए व्यायाम साइकिल पर बारी-बारी से पैडल चलाया। इसने उनकी एरोबिक क्षमता को मापा।

अंतरिक्ष यात्री बुच विल्मोर और सुनी विलियम्स नासा के बोइंग क्रू फ्लाइट टेस्ट मिशन के चालक दल के सदस्य हैं। उन्हें कुछ सप्ताह पहले वापस आ जाना चाहिए था। उनकी परीक्षण उड़ान आठ दिनों तक चलनी चाहिए थी, ये समयसीमा 14 जून को समाप्त हो गई। हीलियम रिसाव और थ्रस्टर की विफलता ने अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर उनके आगमन को पटरी से उतार दिया। इससे दोनों को योजना से ज्यादा समय तक स्पेस में रहना पड़ रहा है।

नासा के वाणिज्यिक चालक दल कार्यक्रम निदेशक स्टीव स्टिच ने पिछले सप्ताह एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि सुनीता और उनके साथी जुलाई के अंत तक वापस आ सकते हैं। नासा का लक्ष्य उन्हें अगस्त के मध्य में स्पेसएक्स द्वारा नए चालक दल को भेजने से पहले वापस लाना है। भारहीन वातावरण में मिट्टी के बिना उगने वाले पौधों को पानी देने के तरीकों का परीक्षण करने में बिता रहे हैं। नासा के मुताबिक विलियम्स ने सबसे पहले हार्मनी मॉड्यूल में प्लांट वाटर मैनेजमेंट हार्डवेयर स्थापित किया और फिर परिणामों की वीडियो रिकॉर्ड करते हुए कई विधियों का परीक्षण किया।दोनों अंतरिक्ष यात्रियों ने कहा कि वे पृथ्वी पर थ्रस्टर परीक्षण पूरा होने के बाद वापस लौटने की उम्मीद करते हैं। उन्होंने कहा कि वे कक्षा में अतिरिक्त समय मिलने की शिकायत नहीं कर रहे हैं, और स्टेशन चालक दल की मदद करने का आनंद ले रहे हैं।

क्या जर्मनी के सहारे रूस को दबाना चाहता है अमेरिका?

अमेरिका अब जर्मनी के सहारे रूस को दबाना चाहता है! रूस ने जर्मनी में अमेरिका की लंबी दूरी के पारंपरिक हथियारों की तैनाती की योजना पर जबरदस्त नाराजगी जताई है। रूसी उप विदेश मंत्री सर्गेई रयाबकोव ने अमेरिका की इस योजना के जवाब में परमाणु मिसाइलों की नई तैनाती से इनकार नहीं किया है। इंटरफैक्स समाचार एजेंसी ने रयाबकोव के हवाले से कहा कि रूस के कलिनिनग्राद क्षेत्र की रक्षा एक विशेष फोकस है। कलिनिनग्राद नाटो सदस्यों पोलैंड और लिथुआनिया के बीच में है। यहां रूसी नौसेना के उत्तरी बेड़े का मुख्यालय भी है। एजेंसी ने कहा कि उन्होंने मॉस्को में संवाददाताओं से कहा कि “मैं किसी भी विकल्प से इनकार नहीं कर रहा हूं।” अमेरिका ने पिछले सप्ताह कहा था कि वह नाटो और यूरोपीय रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करने के लिए 2026 से जर्मनी में हथियारों की तैनाती शुरू करेगा जिसमें एसएम-6, टॉमहॉक और नई हाइपरसोनिक मिसाइलें शामिल होंगी। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पिछले महीने कहा था कि मॉस्को छोटी और मध्यम दूरी की भूमि-आधारित मिसाइलों का उत्पादन फिर से शुरू करेगा और जरूरत पड़ने पर उन्हें कहां तैनात करना है, यह तय करेगा।सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि नियोजित तैनाती हथियारों की दौड़ का हिस्सा है जो यूक्रेन में युद्ध को लेकर तीव्र तनाव के समय पहले से ही जटिल खतरों की श्रृंखला को और बढ़ा देती है।जहां से वे अलास्का या यहां तक कि कैलिफोर्निया को भी निशाना बना सकते हैं। रूस की अधिकांश मिसाइल प्रणालियां पारंपरिक या परमाणु वारहेड से सुसज्जित होने में सक्षम हैं।

इंटरफैक्स ने रयाबकोव के हवाले से कहा कि रूस अमेरिका के कदम का सबसे प्रभावी जवाब देने के लिए विकल्पों की सबसे व्यापक संभव श्रृंखला में से चुनेगा, जिसमें लागत के मामले में भी शामिल है। उन्होंने कहा कि रूस का सबसे पश्चिमी भाग कलिनिनग्राद, जो इसके बाकी भूभाग से कटा हुआ है, ” उस पर लंबे समय से हमारे विरोधियों की गंदी नजर बनी हुई है।” रयाबकोव ने कहा, “आक्रामक योजनाओं को बढ़ावा देने वाले और हमें कुछ ऐसे कदम उठाने के लिए उकसाने की कोशिश करने वालों को पीछे धकेलने के लिए हर संभव प्रयास करने के हमारे 100% दृढ़ संकल्प के मामले में कलिनिनग्राद कोई अपवाद नहीं है, जो किसी के लिए भी अवांछनीय हैं और आगे की जटिलताओं से भरे हुए हैं।”

रूस और अमेरिका जिन मिसाइलों को तैनात करने पर विचार कर रहे हैं, वे मध्यम दूरी के जमीनी हथियार हैं, जिन्हें 1987 की यू.एस.-सोवियत संधि के तहत प्रतिबंधित किया गया था। यू.एस. ने 2019 में रूस पर उल्लंघन का आरोप लगाते हुए संधि से बाहर निकल गया, जिसका मास्को ने खंडन किया। सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि नियोजित तैनाती हथियारों की दौड़ का हिस्सा है जो यूक्रेन में युद्ध को लेकर तीव्र तनाव के समय पहले से ही जटिल खतरों की श्रृंखला को और बढ़ा देती है।

कलिनिनग्राद में रूसी परमाणु मिसाइलों की तैनाती नाटो देशों के साथ इसकी सीधी निकटता के कारण पश्चिम को एक शक्तिशाली संकेत भेजेगी। लेकिन संयुक्त राष्ट्र निरस्त्रीकरण अनुसंधान संस्थान के एक हथियार नियंत्रण विशेषज्ञ एंड्री बकलिट्स्की ने कहा कि कलिनिनग्राद में रूसी मिसाइल लांचर संभवतः नाटो खुफिया और निगरानी के लिए “हर सेकंड” दिखाई देंगे, इसलिए ऐसी तैनाती “दिखावा” के बराबर होगी। बता दें कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पिछले महीने कहा था कि मॉस्को छोटी और मध्यम दूरी की भूमि-आधारित मिसाइलों का उत्पादन फिर से शुरू करेगा और जरूरत पड़ने पर उन्हें कहां तैनात करना है, यह तय करेगा।

रूस की अधिकांश मिसाइल प्रणालियां पारंपरिक या परमाणु वारहेड से सुसज्जित होने में सक्षम हैं। इस सप्ताह की शुरुआत में एक टेलीफोन साक्षात्कार में, इंटरफैक्स ने रयाबकोव के हवाले से कहा कि रूस अमेरिका के कदम का सबसे प्रभावी जवाब देने के लिए विकल्पों की सबसे व्यापक संभव श्रृंखला में से चुनेगा, जिसमें लागत के मामले में भी शामिल है। बता दें कि रूस और अमेरिका जिन मिसाइलों को तैनात करने पर विचार कर रहे हैं, वे मध्यम दूरी के जमीनी हथियार हैं, जिन्हें 1987 की यू.एस.-सोवियत संधि के तहत प्रतिबंधित किया गया था। यू.एस. ने 2019 में रूस पर उल्लंघन का आरोप लगाते हुए संधि से बाहर निकल गया, जिसका मास्को ने खंडन किया। उन्होंने कहा कि रूस अपने मॉस्को या लेनिनग्राद क्षेत्रों में या सुदूर पूर्व में चुकोटका में भी मिसाइलों को तैनात कर सकता है, जहां से वे अलास्का या यहां तक कि कैलिफोर्निया को भी निशाना बना सकते हैं।

क्या दिल्ली में खुलेआम बिक रही है कैंसर की नकली दवा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या दिल्ली में कैंसर की नकली दवा खुलेआम बिक रही है या नहीं! पंजाब के एक व्यक्ति ने अपनी मां के लिए 16.20 लाख रुपये में 12 इंजेक्शन खरीदे थे। चंडीगढ़ की एक महिला ने अपनी दादी के लिए 13.50 लाख रुपये में 10 इंजेक्शन खरीदे थे। पश्चिम बंगाल का एक व्यक्ति था, जिसने अपने पिता के लिए 24 लाख रुपये में 24 इंजेक्शन खरीदे थे। एक और चंडीगढ़ की महिला थी, जिसने अपनी मां के लिए 13.50 लाख रुपये में 10 इंजेक्शन खरीदे थे। इस तरह आठ लोगों ने कैंसर से जूझ रहे अपने परिवार के लिए करीब 75 लाख रुपये के इंजेक्शन खरीदे थे। इन सब में एक चीज कॉमन थी। इन लोगों ने जो कैंसर के इलाज के रूप में जो उम्मीद खरीदी थी, वो इंजेक्शन की तरह ही नकली थी। राजधानी में करीब तीन महीने पहले कैंसर की नकली दवा बेचने वाले गिरोह का भंडाफोड़ हुआ। ऊपर जिन लोगों की चर्चा हुई है ये सभी ‘मौत के सौदागरों’ का शिकार हैं। दिल्ली पुलिस ने इस मामले में आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी है। पुलिस ने जांच के बाद नकली इंजेक्शन खरीद कर लगवाने वाले 8 लोगों को खोजने में सफलता पाई। दुख की बात है कि इन 8 मरीजों में से एक की कैंसर की नकली दवा से मौत भी हो गई। पुलिस ने आरोप पत्र में इन आरोपियों के बारे में विस्तृत जानकारी के साथ ही उनके नकली दवा बनाने से लेकर बेचने के बारे में चार्चशीट में खुलासा किया है। पुलिस ने जब इस गिरोह का भंडाफोड़ किया था तब उनके पास से नकली दवा से भरी हुई शीशियां भी जब्त की थी। उन नकली दवाओं की 140 शीशियों का बाजार में वास्तविक मूल्य लगभग 4 करोड़ रुपये था।

चार्जशीट के हवाले से कहा है कि बिहार के मधुबनी के एक व्यक्ति ने पुलिस को बताया कि उसकी पत्नी मुंह और फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित थी। उसका राजीव गांधी कैंसर संस्थान (RGCI) और पटना के बुद्ध कैंसर अस्पताल में इलाज चल रहा था। डॉक्टरों ने उसकी पत्नी को कीट्रुडा इंजेक्शन लगाने की सलाह दी थी। वह एक ऑनलाइन मार्केटप्लेस इंडियामार्ट के जरिए लव नरूला नाम के व्यक्ति के संपर्क में आया। नरूला ने उसे 90,000 रुपये में एक इंजेक्शन देने की पेशकश की। उसने अप्रैल से अगस्त 2022 के बीच 3.60 लाख रुपये में चार इंजेक्शन खरीदे। लेकिन जब उसकी पत्नी को बुद्ध कैंसर अस्पताल में दो इंजेक्शन दिए गए, तो उसकी हालत बिगड़ गई और 11 सितंबर, 2022 को उसकी मौत हो गई।

आरोपी दिल्ली और गुड़गांव के शीर्ष अस्पतालों में काम करते थे। आरोपपत्र के अनुसार, आरोपी कथित तौर पर फार्मासिस्ट या अस्पताल के कर्मचारियों से महत्वपूर्ण दवाओं की खाली शीशियां 3,000 से 6,000 रुपये में थे। इसके बाद इन शीशियों में नकली पदार्थ भरते थे। इन्हें बाद में फार्मासिस्ट और वेबसाइटों के जरिए 40,000 से 50,000 रुपये में बेच दिया जाता था। इस साल की शुरुआत में 12 मार्च को क्राइम ब्रांच के अंतर-राज्यीय सेल और दिल्ली सरकार के औषधि नियंत्रण विभाग द्वारा की गई छापेमारी के दौरान दिल्ली और गुड़गांव स्थित अस्पतालों के कर्मचारियों सहित सात आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था।

जांच के दौरान बाद में पांच अन्य को गिरफ्तार किया गया। आरोपियों की पहचान मास्टरमाइंड विफिल जैन, सूरज शाट नीरज चौहान, तुषार चौहान, परवेज, कोमल तिवारी, अभिनय सिंह , आदित्य कृष्णा, रोहित सिंह बिष्ट, जितेंद्र, माजिद खान, और साजिद के रूप में हुई थी। जांचकर्ताओं को चार आरोपियों से खरीदी गई दवा की खाली शीशियां भी मिली हैं जो दिल्ली और गुड़गांव के तीन प्रमुख कैंसर अस्पतालों के ऑन्कोलॉजी विभागों में काम कर रहे थे। 12 आरोपियों में से दो राजीव गांधी कैंसर संस्थान में फार्मासिस्ट के तौर पर काम करते थे।

रिपोर्ट में चार्जशीट के हवाले से बताया गया कि आरजीसीआई के अनुसार कोमल तिवारी और अभिनय सिंह साइटोटॉक्सिक मिक्सिंग यूनिट में तैनात थे। वे रोजाना साइटोटॉक्सिक दवाओं के मिक्सिंग के लिए जिम्मेदार थे। फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट (गुड़गांव में) ने कहा कि जितेन्द्र हेमटोलॉजी, हेमेटो-ऑन्कोलॉजी और बोन मैरो ट्रांसप्लांट विभाग में एक क्लीनिकल फार्मासिस्ट के रूप में काम कर रहा था। वह हेमटोलॉजी विभाग के तहत भर्ती मरीजों को दी जाने वाली ऑन्कोलॉजी दवाओं के मिक्सचर के लिए जिम्मेदार था। वेंकटेश्वर अस्पताल ने बताया कि रोहित सिंह बिष्ट ऑन्को-डेकेयर का ओवरऑल इंचार्ज था। कीमो दवा लेने वाले सभी मरीज बिष्ट की देखरेख में थे।

मिलेनियम कैंसर सेंटर ने पुलिस को बताया कि साजिद ऑन्कोलॉजी विभाग में तैनात था। वह मरीजों को दवा-मिक्सचर और कीमो एडमिनिस्ट्रेश के लिए जिम्मेदार था। पुलिस ने बताया कि सप्लायरों को शीशियां बेचने के अलावा आरोपियों ने नकली कैंसर रोधी इंजेक्शन की बिक्री को बढ़ावा देने के लिए ऑनलाइन बिजनेस प्लेटफॉर्म इंडियामार्ट का भी इस्तेमाल किया था। सात आरोपियों ने इंडियामार्ट पर खुद को रजिस्टर्ड कराया था।

आखिर क्या है दिल्ली के रिज एरिया में 1100 पेड़ों की कटाई का मामला?

आज हम आपको दिल्ली के रिज एरिया में 1100 पेड़ों की कटाई का मामला बताने जा रहे हैं! दिल्ली में रिज क्षेत्र में पेड़ों की कटाई के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को नाराजगी व्यक्त की। शीर्ष अदालत ने पेड़ काटने के मामले में उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना की भूमिका पर अधिकारियों की तरफ से लगातार लीपापोती करने पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) को यह बताने का निर्देश दिया कि क्या पेड़ों को काटने का आदेश उपराज्यपाल की मौखिक अनुमति के आधार पर पारित किया गया था या एजेंसी ने स्वतंत्र रूप से यह निर्णय लिया था। सुप्रीम कोर्ट सड़क चौड़ीकरण परियोजना के लिए रिज वन में 1,100 पेड़ों की कथित कटाई को लेकर डीडीए के उपाध्यक्ष के खिलाफ स्वत:संज्ञान से अवमानना कार्यवाही की सुनवाई कर रहा था। जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने कहा कि पेड़ों की कटाई की अनुमति देने में दिल्ली के उपराज्यपाल ने विवेक का प्रयोग नहीं किया। पीठ ने कहा कि सुनवाई के पहले दिन ही उसे यह बता दिया जाना चाहिए था कि उपराज्यपाल ने पहले ही पेड़ों की कटाई के निर्देश जारी किये थे।

पीठ ने कहा कि हमें इस बात से परेशानी है कि हर किसी ने गलती की है। पहले दिन सभी को अदालत में आकर कहना चाहिए था कि हमसे गलती हुई है। लेकिन लीपापोती चलती रही। चार-पांच आदेशों के बाद डीडीए अधिकारी के हलफनामे के रूप में सच्चाई सामने आ जाती है। गलती तो सभी ने की है, उपराज्यपाल सहित सभी ने। खेदजनक स्थिति है।” सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसे इस मामले में उपराज्यपाल की भूमिका का एहसास तब हुआ जब अटार्नी जनरल आर. वेंकटरमणी स्वयं उपस्थित हुए और कहा, ‘यह पर्याप्त संकेत था’। शीर्ष अदालत ने कहा कि रिज क्षेत्र में पेड़ों की कटाई में दिल्ली सरकार भी समान रूप से दोषी है। सरकार को 422 पेड़ों को काटने की अवैध अनुमति देने का दोष स्वीकार करना चाहिए। कोर्ट ने AAP सरकार से कहा कि वह पेड़ों की इस अवैध कटाई की भरपाई के लिए कोई व्यवस्था बनाए।

डीडीए के उपाध्यक्ष की तरफ से दाखिल दो हलफनामों पर गौर करते हुए पीठ ने कहा कि प्रथम दृष्टया, हमें ऐसा प्रतीत होता है कि सभी संबंधित पक्षों की ओर से यह बताने में अनिच्छा थी कि तीन फरवरी, 2024 को उपराज्यपाल के मौके का दौरा करने के दौरान वास्तव में क्या हुआ था, जब पेड़ों को काटने का मौखिक आदेश दिया गया था। पीठ ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि उपराज्यपाल ने कहा है कि वृक्ष अधिनियम के तहत पेड़ों की कटाई की अनुमति उनके द्वारा दी गई मंजूरी के आधार पर पहले ही दी जा चुकी है। इसलिए डीडीए को मंजूरी के बारे में सूचित किया जाना चाहिए।

पीठ ने ठेकेदार को नोटिस जारी किया और स्पष्टीकरण मांगा कि किसके निर्देश पर पेड़ों की कटाई की गई। पीठ ने कहा, “सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि यद्यपि राज्य सरकार के सभी वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे, लेकिन उनमें से किसी ने भी यह नहीं बताया कि रिज क्षेत्र में पेड़ों को काटने के लिए न्यायालय की अनुमति लेने की आवश्यकता है और अन्य क्षेत्रों में पेड़ों को काटने के लिए वृक्ष अधिकारी की अनुमति लेने की आवश्यकता है।शीर्ष अदालत ने दिल्ली सरकार को एक हलफनामा दायर करने का भी निर्देश दिया जिसमें यह बताया जाए कि किसके आदेश पर लकड़ियां जब्त करने का आदेश दिया गया है और ठेकेदार से यह भी पूछा कि काटे गए पेड़ों का स्थान क्या है।बता दें कि जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने कहा कि पेड़ों की कटाई की अनुमति देने में दिल्ली के उपराज्यपाल ने विवेक का प्रयोग नहीं किया।

पीठ ने कहा कि सुनवाई के पहले दिन ही उसे यह बता दिया जाना चाहिए था कि उपराज्यपाल ने पहले ही पेड़ों की कटाई के निर्देश जारी किये थे।शीर्ष अदालत ने कहा कि रिज क्षेत्र में पेड़ों की कटाई में दिल्ली सरकार भी समान रूप से दोषी है। सरकार को 422 पेड़ों को काटने की अवैध अनुमति देने का दोष स्वीकार करना चाहिए। कोर्ट ने AAP सरकार से कहा कि वह पेड़ों की इस अवैध कटाई की भरपाई के लिए कोई व्यवस्था बनाए। पीठ ने कहा कि अधिकारियों को लगातार निगरानी रखने की योजना बनानी होगी ताकि अवैध रूप से पेड़ों की कटाई के मामले तुरंत अधिकारियों के संज्ञान में आ सकें।

आखिर मध्य प्रदेश सरकार ने सीबीआई पर क्यों का कसा शिकंजा?

हाल ही में मध्य प्रदेश सरकार ने सीबीआई पर शिकंजा कस दिया है! राज्य में किसी भी मामले में सीबीआई जांच के लिए राज्यों की अनुमित के मुद्दे पर बीजेपी को झटका लगता दिख रहा है। विपक्षी दलों के शासित राज्यों की तर्ज पर मध्यप्रदेश सरकार ने भी सीबीआई की जांच को संबंध में एक अहम फैसला किया है। मध्य प्रदेश सरकार ने का कहना है कि सीबीआई को अपने अधिकार क्षेत्र में जांच शुरू करने से पहले राज्य से लिखित सहमति की आवश्यकता होगी। इस संबंध में मंगलवार को एक अधिसूचना प्रकाशित की गई थी। यह आदेश राज्य में 1 जुलाई से प्रभावी माना जाएगा। पश्चिम बंगाल, केरल, पंजाब और तमिलनाडु पहले ही सीबीआई जांच की अनुमति को लेकर केंद्र सरकार का विरोध कर रहे हैं। जबकि राज्य ने अपने अधिकार क्षेत्र में मामलों की जांच के लिए संघीय एजेंसी को दी गई सहमति वापस ले ली है। बंगाल सरकार ने 2018 में ही सीबीआई को जांच के लिए दी गई अनुमति वापस ले लिया था।पश्चिम बंगाल और केंद्र सरकार का मामला तो हाल ही में सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा था। अब मध्यप्रदेश सरकार का यह फैसला आया है। मध्यप्रदेश में सीएम मोहन यादव की सरकार ने सीधे-सीधे तो सीबीआई के क्षेत्राधिकार या मामले की जांच को रोकने की बात तो नहीं कही है लेकिन उसने लिखित सहमति का ‘ब्रेक’ जरूर लगा दिया है। इसके साथ ही बीजेपी शासित मध्य प्रदेश उन राज्यों की लंबी सूची में शामिल हो गया है, जिनमें ज्यादातर विपक्षी दलों द्वारा शासित हैं। इनमें बंगाल, तमिलनाडु, पंजाब, केरल और तेलंगाना शामिल हैं। इन राज्यों में सीबीआई को जांच से पहले संबंधित सरकारों से अनुमति लेने की आवश्यकता है।

रिपोर्ट के अनुसार गृह विभाग के सूत्रों ने बताया कि केंद्र सरकार की तरफ से पारित तीन नए आपराधिक कानूनों में से एक भारतीय न्याय संहिता के कार्यान्वयन के बाद नए कानूनी ढांचे का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक था। सूत्रों ने कहा कि बदलावों का पालन करने के लिए अधिसूचना महत्वपूर्ण थी। सूत्रों ने कहा कि अन्य भाजपा शासित राज्यों द्वारा भी इसी तरह की अधिसूचनाएं पारित किए जाने की उम्मीद है। विशेष रूप से, सीबीआई को अब निजी व्यक्तियों, सरकारी अधिकारियों या राज्य के भीतर किसी भी संस्था की जांच करने के लिए मध्य प्रदेश प्रशासन से लिखित मंजूरी की आवश्यकता है। दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम की धारा 6 के अनुसार, सीबीआई को अपने अधिकार क्षेत्र में जांच करने के लिए राज्य सरकार से सहमति लेना आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट भी दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन (डीएसपीई) अधिनियम, 1946 के अनेक प्रावधानों का जिक्र करते हुए कह चुका है कि स्थापना, शक्तियों का प्रयोग, अधिकार क्षेत्र का विस्तार, डीएसपीई का नियंत्रण, सब कुछ भारत सरकार के पास है। ऐसे में विपक्षी दल केंद्र सरकार पर सीबीआई का बदले की भावना से प्रयोग का आरोप लगाते रहे हैं।

इससे पहले पश्चिम बंगाल सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत केंद्र के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक मूल वाद दायर किया था। इसमें आरोप लगाया गया था कि सीबीआई प्राथमिकियां दर्ज कर रही है और जांच कर रही है, जबकि राज्य ने अपने अधिकार क्षेत्र में मामलों की जांच के लिए संघीय एजेंसी को दी गई सहमति वापस ले ली है। बंगाल सरकार ने 2018 में ही सीबीआई को जांच के लिए दी गई अनुमति वापस ले लिया था।

सीबीआई को जांच की अनुमति वापस लिए जाने की राज्यों की कार्यवाई पर पिछले साल दिसंबर में तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। केंद्र सरकार ने कहा था कि सीबीआई को अनुमति लेने की आवश्यकता होने से मामलों की जांच करने की उसकी शक्तियां गंभीर रूप से सीमित हो गई हैं। एक संसदीय पैनल ने कहा था कि एक कानून बनाने की आवश्यकता है ताकि एजेंसी राज्य के ‘हस्तक्षेप’ के बिना मामलों की जांच कर सके। बता दें कि सीएम मोहन यादव की सरकार ने सीधे-सीधे तो सीबीआई के क्षेत्राधिकार या मामले की जांच को रोकने की बात तो नहीं कही है लेकिन उसने लिखित सहमति का ‘ब्रेक’ जरूर लगा दिया है। इसके साथ ही बीजेपी शासित मध्य प्रदेश उन राज्यों की लंबी सूची में शामिल हो गया है, जिनमें ज्यादातर विपक्षी दलों द्वारा शासित हैं। साथ ही, पैनल ने यह भी माना कि सीबीआई के कामकाज में निष्पक्षता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है ताकि राज्य भेदभाव की शिकायत न करें।

क्या मोदी सरकार अब संघ की नाराजगी को कर रही है दूर?

वर्तमान में मोदी सरकार अब संघ की नाराजगी को दूर करती जा रही है! 1966 को दिल्ली अभी जगी भी नहीं थी कि बड़ी संख्या में साधु और संन्यासी संसद भवन के सामने जमा होने लगे थे। ज्यादातर लोगों को यह अंदाजा भी नहीं था कि आखिर क्या बात हो गई कि संसद के सामने हजारों की भीड़ जुट गई। शुरुआत में दिल्ली पुलिस भी नहीं समझ पाई कि आखिर ये माजरा क्या है? पुलिस ने भीड़ को हटाने के लिए आंसू गैस छोड़े, लाठियां भी भांजी, मगर भीड़ टस से मस नहीं हुई। संसद भवन गेट के सामने पुलिस और साधुओं का यह संघर्ष तब भड़क उठा, जब प्रदर्शनकारियों के फेंके पत्थरों से एक पुलिसवाले की मौत हो गई। दोपहर करीब 1:30 बजे तक माहौल पूरा गरमा गया और पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए गोलीबारी करनी शुरू कर दी। संसद के समक्ष जमा यह भीड़ गौ हत्या पर राष्ट्रीय कानून बनाने के लिए सरकार पर दबाव बना रही थी। इस प्रदर्शन को तब भारतीय जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का समर्थन हासिल था। 1966 में इसी आरएसएस को लेकर तब इंदिरा गांधी सरकार ने एक पाबंदी लगा दी थी। उन्होंने सरकारी कर्मचारियों को इसकी शाखाओं और कार्यक्रमों में जाने पर रोक लगा दी थी। आज 58 साल बाद मोदी सरकार ने यह रोक हटा दी है। इसके बाद से भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने हैं। नवंबर 1966 को तपस्वियों , नागा साधुओं की अगुवाई में हुए प्रदर्शनों में आधिकारिक रूप से 8 लोगों की मौत की बात बताई गई और सैकड़ों लोग घायल हो गए। हालांकि, कई दूसरे गैर सरकारी आंकड़ों में सैकड़ों लोगों के मारे जाने की बात कही गई। उस वक्त यह अनुमान लगाया गया कि प्रदर्शनों के दौरान वाहनों और दफ्तरों में तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाओं में कुल करीब 100 करोड़ रुपए की संपत्ति को नुकसान पहुंचा था। इन प्रदर्शनों के दौरान कांग्रेस के प्रमुख नेता के कामराज का घर और ऑल इंडिया रेडियो का दफ्तर भी निशाना24 जनवरी, 1966 को इंदिरा के प्रधानमंत्री बनने के बाद जेपी यानी समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण से उनके रिश्ते कई वर्षों तक बहुत मधुर बने रहे यह उनके बीच हुए पत्र व्यवहारों से भी पता चलता है। उन पत्रों में उनके रिश्तों की प्रगाढ़ता तो पता चलती ही है, एक दूसरे पर विश्वास भी झलकता है और देश के मुद्दों को लेकर चिंता भी। जेपी उन्हें सलाह देने से गुरेज नहीं करते थे। मसलन, गोवध पर प्रतिबंध के मुद्दे पर दोनों के बीच हुए पत्र व्यवहार में इसकी झलक दिखती है। इंदिरा के प्रधानमंत्री बनने के कुछ महीने बाद गोवध पर प्रतिबंध को लेकर चल रहे आंदोलन को लेकर जेपी ने उन्हें 21 सितंबर, 1966 को एक पत्र लिखा और आग्रह किया:

‘मैं आपका ध्यान एक अत्यंत गंभीर होती स्थिति की ओर दिलाने के लिए लिख रहा हूं। आप गोवध पर प्रतिबंध को लेकर लंबे समय से चल रहे आंदोलन के बारे में जानती हैं। संसद के पिछले सत्र में भी यह मुद्दा उठा था। मुझे पता चला है कि जगतगुरु शंकराचार्यों जैसे शीर्ष हिंदू नेताओं ने इस वर्ष 20 नवंबर से आमरण अनशन करने का फैसला किया है। मैं समझ सकता हूं कि इस हताशापूर्ण कदम पर पूरी गंभीरता से विचार किया गया है। आप कल्पना कर सकती हैं कि इसके क्या गंभीर परिणाम हो सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में यह एक सामान्य बात हो गई है कि सरकार तब तक कोई कार्रवाई नहीं करती, जब तक कि स्थिति गंभीर न हो जाए। ….नतीजतन अक्सर सरकार को दबाव में कुछ ऐसे अस्वस्थकर कदम उठाने पड़ते हैं, जिनसे लोगों की नजर में सरकार की छवि नीचे गिरती है।…मैं समझ नहीं पाता कि हिंदू बहुल भारत जैसे देश में जहां गोवध को लेकर सही हो या गलत तीव्र भावनाएं हैं, वहां कानूनी प्रतिबंध क्यों नहीं लग सकता।

जेपी के इस पत्र का इंदिरा ने 13 अक्टूबर, 1966 को जवाब दिया। छोटे से पत्र में इंदिरा ने देर से जवाब देने के लिए अफसोस जताया और लिखा, ‘सरकार इस समस्या के सारे पहलुओं पर विचार कर रही है।’ इंदिरा ने इस पत्र का समापन इस तरह किया, ‘मुझे यह जानकार दुख हुआ कि हाल ही में आप इफ्लुएंजा से पीड़ित थे। उम्मीद है आप पूरी तरह स्वस्थ होंगे।’

दरअसल, 7 नवंबर की सुबह भारतीय जनसंघ, हिंदू महासभा और आर्य समाज के समर्थन प्राप्त राख से सने, त्रिशूलधारी अघोरी नगा साधु संसद भवन के सामने जमा हो गए। फ्रांसीसी पॉलिटिकल साइंटिस्ट क्रिस्टोफ जैफरलॉट ने इसे आजादी के बाद का सबसे लोकप्रिय जन आंदोलन बताया। द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार उस दिन माहौल ‘सामान्य और करीब-करीब उत्सव जैसा था, जिसमें गायों की अहमियत बताई जा रही थी। पहले वक्ता स्वामी करपात्री जी महाराज थे। हालांकि, जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने करपात्री जी को आंदोलन को वापस लेने की अपील की थी, मगर भीड़ स्वामी रामेश्वरानंद की जय कहते हुए उग्र हो उठी थी। ये भारतीय जनसंघ के करनाल से चुने गए सांसद थे, जिन्होंने भीड़ से संसद में जबरन घुसने और सबक सिखाने की अपील की थी। इसी के बाद पुलिस और भीड़ में संघर्ष शुरू हो गया। बाद में इस आंदोलन में 500 तपस्वियों समेत 1500 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। लेखक सुदीप ठाकुर इतिहासकार रामचंद्र गुहा के हवाले से बताते हैं कि जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वामी से अपील की कि वह आंदोलन वापस ले लें, मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

गौरक्षा को लेकर पहला संगठित गौरक्षा आंदोलन सिख धर्म के कूकाओं द्वारा शुरू किया गया था। यह एक सुधारवादी समूह था, जिन्होंने 1800 के दशक के आखिर में ब्रिटिश राज के दौरान गायों की सुरक्षा के विचार को फैलाया। आर्य समाज ने इस भावना को राष्ट्रीय आंदोलन में बदलने में जबरदस्त भूमिका निभाई। इस संस्था ने बड़े पैमाने पर गौहत्या को अपराध घोषित करने की पैरवी की। देश में पहली गौरक्षिणी सभा (गौरक्षा परिषद) की स्थापना 1882 में पंजाब प्रांत में की गई थी।

4 जून को लोकसभा चुनाव के नतीजे आए। इन नतीजों में भाजपा 400 के पार के नारे को पूरा नहीं कर पाई। उसे बहुमत से 32 कम यानी महज 240 सीटें ही मिलीं। इसके कुछ दिन बाद 10 जून को नागपुर में संघ के एक कार्यक्रम आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि जो मर्यादा का पालन करते हुए कार्य करता है, गर्व करता है, मगर लिप्त नहीं होता, अहंकार नहीं करता, वही सही अर्थों मे सेवक कहलाने का अधिकारी है। भागवत ने मणिपुर के हालात का जिक्र करते हुए भी कहा था कि मणिपुर एक साल से शांति की राह देख रहा है। बीते 10 साल से राज्य में शांति थी, लेकिन अचानक से वहां गन कल्चर बढ़ गया। जरूरी है कि इस समस्या को प्राथमिकता से सुलझाया जाए। इसके बाद से यह अटकलें लग रही थीं कि भाजपा और उसके शीर्ष नेतृत्व की कार्यशैली से संघ काफी नाराज है।

क्या पश्चिम बंगाल सरकार हिंदुओं के साथ कर रही है भेदभाव?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पश्चिम बंगाल सरकार हिंदुओं के साथ भेदभाव कर रही है या नहीं! बांग्लादेश में स्टूडेंट मूवमेंट चल रहा है। इस कारण वहां अराजकता की स्थिति पैदा हो गई है। इस माहौल से भागकर बहुत से बांग्लादेशी भारत की ओर कूच कर रहे हैं। ऐसे में बांग्लादेश की सीमा से सटे प्रदेश पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बांग्लादेशियों को खुला निमंत्रण दे दिया है। उन्होंने कहा कि जो भी बांग्लादेशी संकट की इस घड़ी में उनके राज्य में आएगा, उनका स्वागत किया जाएगा। केंद्र सरकार में बैठी और प. बंगाल में मुख्य विपक्षी की भूमिका निभार रही बीजेपी ने ममता के इस बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। प्रदेश में बीजेपी के सह-प्रभारी अमित मालवीय ने कहा कि ममता बनर्जी राज्य और केंद्र के बीच कामकाज और दायित्वों के बंटवारे की सीमा का उल्लंघन कर रही हैं। उन्होंने ममता पर मुस्लिम तुष्टीकरण और हिंदू विरोध का भी आरोप लगाया है। सीएम ममता बनर्जी ने शहीद दिवस पर अपनी पार्टी की रैली में ये तो कहा कि बांग्लादेश में जो हो रहा है, वो उनका आंतिरक मामला है, लेकिन हम शरणार्थियों का स्वागत करेंगे। ममता ने अपने बयान में संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) के दिशानिर्देशों का भी हवाला दिया। ममता ने कहा, ‘यूएन गाइडलाइंस के मुताबिक बांग्लादेश में अपने घरों से निकाले गए उन सभी शरणार्थियों का हम स्वागत करेंगे जो हमारे राज्य में शरण लेना चाहते हैं।’ उन्होंने बंगाल के लोगों से किसी उकसावे में नहीं आने की अपील की है।

पश्चिम बंगाल सरकार की मुखिया की तरफ से आया बयान निश्चित रूप से बांग्लादेशियों को भारत में शरण लेने को प्रोत्साहित करेगा। प. बंगाल की सीमा पर अवैध घुसपैठ के मामले रिपोर्ट होते रहते हैं। अगर बांग्लादेशी अवैध तरीके से जान पर खेलकर भारत आने की फिराक में रहते हैं तो सरकार की तरफ से स्वागित किए जाने की खबर पाकर तो उनमें शरणार्थी बनने की होड़ मच सकती है। दूसरी तरफ, घुसपैठ कर आ चुके बांग्लादेशियों को शरणार्थी बताकर वैधता दी जाने की भी आशंका है। संभवतः इसी आशंका में बीजेपी ने ममता बनर्जी के बयान की आलोचना की है।

पश्चिम बंगाल के बीजेपी सह-प्रभारी और पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अमित मालवीय ने ममता के बयान को एक अवैध घुसपैठियों को प. बंगाल, झारखंड और दूसरे पड़ोसी राज्यों में सेटल करने की कुत्सित योजना है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म एक्स पर लिखा, ‘ममता बनर्जी एक दिन कहती हैं कि हिंदू शरणार्थियों को हम आने की अनुमति नहीं देंगे। हिंदू शरणार्थी तो धार्मिक प्रताड़ना झेलकर सीएए के अंदर अवैध तरीके से भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करना चाहते हैं। लेकिन ममता कहती हैं कि अगर वो दबाव बनाएंगे तो हम अवैध रोहिंग्याओं को ट्रेनें जलाने, सड़कें जाम करने और लोगों की हत्या करने को कहेंगे क्योंकि रोहिंग्या टीएमसी को वोट करते हैं। दूसरी तरफ ममता कहती हैं कि बांग्लादेशियों का भारत में स्वागत है।’

मालवीय ने ममता से पूछा कि आखिर उन्हें विदेशियों को न्योता देने का अधिकार किसने दिया? उन्होंने लिखा, ‘शरणार्थियों और नागरिकता का मामला सिर्फ और सिर्फ केंद्र सरकार के अधीन है। बता दें कि सीएम ममता बनर्जी ने शहीद दिवस पर अपनी पार्टी की रैली में ये तो कहा कि बांग्लादेश में जो हो रहा है, वो उनका आंतिरक मामला है, लेकिन हम शरणार्थियों का स्वागत करेंगे। ममता ने अपने बयान में संयुक्त राष्ट्र संघ के दिशानिर्देशों का भी हवाला दिया। इस मामले में राज्य सरकारों का कोई हक नहीं बनता है। यह विपक्षी इंडी अलायंस की दुर्भवानपूर्ण योजना है कि अवैध बांग्लादेशियों को बंगाल से झारखंड में बसाया जाए ताकि वो चुनावों में जीत दर्ज कर सकें।’ यही नहीं पश्चिम बंगाल में बढ़ती मुस्लिम आबादी को लेकर बेगूसराय के सांसद गिरिराज सिंह ने ममता बनर्जी सरकार पर हमला बोला है. बीजेपी नेता गिरिराज सिंह ने डायरेक्ट एक्शन डे की याद दिलाते हुए बंगाल के लोगों को हिंदुओं को संगठित होने को कहा है. उन्होंने कहा कि आज पश्चिम बंगाल में हिंदू अपने अस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़ रहे हैं.

इससे पहले बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने दावा करते हुए कहा था कि झारखंड के संथाल परगना, बिहार और पश्चिम बंगाल के कुछ क्षेत्रों में अवैध रूप से बांग्लादेशी घुसपैठियों के कारण मुस्लिम आबादी बढ़ रही है, जिस वजह से हिंदुओं के गांव के गांव खाली हो रहे हैं. सोशल मीडिया पर उन्होंने लिखा, ‘जिन्ना के अनुयायी सोहराबर्दी ने 1946 में ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ पर बंगाल में लगभग 30,000 हिंदुओं का नरसंहार किया था. गोपाल पाठा ने हिंदुओं को संगठित किया और नरसंहार को रोकने की कोशिश की. अगर आज बंगाल में गोपाल पाठा जैसे लोग नहीं खड़े होंगे तो हिंदुओं को पश्चिम बंगाल खाली करना पड़ेगा. आज पश्चिम बंगाल में हिंदू अपने अस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़ रहे हैं.