Thursday, March 12, 2026
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जब पहली बार गठबंधन पर निर्भर रह सरकार चलाएंगे मोदी!

आने वाले समय में अब नरेंद्र मोदी गठबंधन पर निर्भर रहकर सरकार चलाएंगे! लोकसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं। देश की जनता ने एक बार फिर एनडीए को सरकार बनाने का जनादेश दिया है। हालांकि, चुनाव नतीजे बीजेपी के अनुमानों के बिल्कुल उलट आए हैं। स्थिति यह है कि पिछली बार अपने दम पर 300 से अधिक सीट जीतने वाली बीजेपी बहुमत के जादुई आकंड़े से दूर है। रात 8 बजे तक के नतीजों और रुझानों के अनुसार बीजेपी को अपने बूते 240 सीट मिलती दिख रही है। हालांकि, सहयोगी दलों के साथ एनडीए बहुमत के पार पहुंच गया है। ऐसे में 10 साल बाद एक बार फिर से केंद्र में क्षेत्रीय दलों पर निर्भर सरकार बनेगी। ऐसे में पीएम मोदी पहली बार खिचड़ी सरकार चलाने पर मजबूर होंगे। नजर डालते हैं कि क्षेत्रीय दलों पर निर्भरता का नई मोदी सरकार पर क्या असर हो सकता है। चुनाव परिणाम में इस बार क्षेत्रीय दलों का प्रदर्शन बेहतरीन रहा है। एनडीए के साथ ही इंडिया गठबंधन में क्षेत्रीय दलों ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है। एनडीए में टीडीपी और जदयू सबसे अहम सहयोगी बनकर उभरे हैं। टीडीपी ने आंध्रप्रदेश में विधानसभा चुनाव में भी शानदार जीत दर्ज की है। वहीं, जेडीयू ने बिहार में बीजेपी से कम सीटों पर चुनाव लड़ने के बाद भी उससे अधिक सीटों पर जीत हासिल की है।ऐसे में इस तरह के किसी भी प्रस्ताव पर फैसला करने से पहले बीजेपी की मजबूरी होगी कि वह सहयोगी दलों के साथ सहमति बनाए। यदि ऐसा नहीं होता है तो बीजेपी को सहयोगी दलों के अलग होने का खतरा भी बना रहेगा। टीडीपी के खाते में 16 सीट आती दिख रही हैं। वहीं, जेडीयू के 12 सीट पर जीत दर्ज करती नजर आ रही है। ऐसे में केंद्र में बनने वाली नई सरकार में इन दोनों दलों की भूमिका काफी अहम होगी।

बीजेपी के अपने दम पर बहुमत हासिल करने का असर इस बार मंत्रिमंडल के बंटवारे पर साफ दिखेगा। इस बार क्षेत्रीय दल बीजेपी नीत एनडीए सरकार में अधिक मोलभाव करने की स्थिति में होंगे। ऐसे में अहम मंत्रालयों में अगर जेडीयू और टीडीपी कोटे से मंत्री बने तो किसी को भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए। पिछली सरकार में बीजेपी अपने दम पर 300 से अधिक सीट जीती थी। ऐसे में एनडीए में शामिल सहयोगी दल पूरी तरह से बीजेपी की मर्जी पर निर्भर थे। बीजेपी नेतृत्व अपने मर्जी के आधार पर छोटे दलों को मंत्री पद मिला था। पिछले कार्यकाल में यह आरोप भी लगता रहा था कि बीजेपी अपने सहयोगी दलों का सम्मान नहीं करती।

मोदी सरकार के तीसरे कार्यकला में अहम मुद्दों पर निर्णय लेने से पहले सहयोगी दलों से विचार विमर्श अधिक जरूरी हो जाएगा। बीजेपी ने तीसरी बार सत्ता में आने पर एक देश, एक चुनाव और समान नागरिक कानून जैसे अहम मुद्दों को लागू करने की बात कही थी। ऐसे में इस तरह के किसी भी प्रस्ताव पर फैसला करने से पहले बीजेपी की मजबूरी होगी कि वह सहयोगी दलों के साथ सहमति बनाए। यदि ऐसा नहीं होता है तो बीजेपी को सहयोगी दलों के अलग होने का खतरा भी बना रहेगा।

एनडीए सरकार के तीसरे कार्यकाल में नीतीश कुमार और चंद्र बाबू नायूडू अहम किरदार बनकर उभरेंगे। हालांकि, बीजेपी के साथ एक प्लस प्वाइंट यह भी है कि नीतीश कुमार और चंद्र बाबू नायडू पहले भी बीजेपी के साथ मिलकर काम कर चुके हैं। हालांकि, इस बार दोनों नेता अपनी मर्जी से हां और ना कहने की मजबूत स्थिति में होंगे। बता दें कि ऐसे में पीएम मोदी पहली बार खिचड़ी सरकार चलाने पर मजबूर होंगे। नजर डालते हैं कि क्षेत्रीय दलों पर निर्भरता का नई मोदी सरकार पर क्या असर हो सकता है। चुनाव परिणाम में इस बार क्षेत्रीय दलों का प्रदर्शन बेहतरीन रहा है। एनडीए के साथ ही इंडिया गठबंधन में क्षेत्रीय दलों ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है। एनडीए में टीडीपी और जदयू सबसे अहम सहयोगी बनकर उभरे हैं। ऐसे में स्थिर सरकार के लिए बीजेपी इन नेताओं की नाराजगी मोल लेना नहीं चाहेगी।बीजेपी नेतृत्व अपने मर्जी के आधार पर छोटे दलों को मंत्री पद मिला था। पिछले कार्यकाल में यह आरोप भी लगता रहा था कि बीजेपी अपने सहयोगी दलों का सम्मान नहीं करती। चंद्रबाबू नायडू तो एनडीए के संयोजक भी रह चुके हैं। दूसरी तरफ आंध्र प्रदेश में भी चंद्रबाबू नायडू सत्ता में आ गए हैं। ऐसे में वे केंद्र से आंध्र प्रदेश के लिए अतिरिक्त केंद्रीय सहायता से लेकर प्रोजेक्ट लाने में सफल हो सकते हैं।

परिणाम के बाद क्या बोले प्रधानमंत्री मोदी?

हाल ही में परिणाम के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बयान दिया है! लोकसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं। देश की जनता का जनादेश एक बार फिर से एनडीए के पक्ष में है। हालांकि, यूपी, बंगाल समेत कई राज्यों में बीजेपी को बड़ा झटका लगा है। बीजेपी अपने बूते बहुमत के जादुई आंकड़े से दूर है। पार्टी के प्रदर्शन का असर पीएम मोदी के जीत के भाषण पर देखने को मिला। पीएम मोदी चुनाव परिणाम के बाद जब भाषण देने आए तो उनके आवाज में ना तो पहले जैसा जोश दिखा और ना ही चेहरे पर वो चमक थी। वो चमक जो मोदी की पहचान है। शब्दों में वो जोश जिसके लिए मोदी जाने जाते हैं।पीएम मोदी ने कहा कि 1962 के बाद पहली बार कोई सरकार अपने दो कार्यकाल पूरे करने के बाद तीसरी बार वापस आई है। राज्यों में जहां भी विधानसभा के चुनाव हुए, वहां पर NDA को भव्य विजय मिली है, चाहे वो अरुणाचल प्रदेश हो, आंध्र प्रदेश हो, ओडिशा हो या फिर सिक्किम। पीएम मोदी की बॉडी लैंग्वेज 2019 में मिली जीत के बाद जब वो पार्टी मुख्यालय पहुंचे थे उस समय के बिल्कुल उलट थी।एनडीए के भले ही सरकार बनाने लायक बहुमत मिला हो लेकिन पीएम के भाषण के दौरान माहौल बिल्कुल अलग था। 2014 और 2019 में मिली जीत के बाद कार्यकर्ताओं का जोश सातवें आसमान पर था। इस बार माहौल बिल्कुल जुदा था। कार्यकर्ताओं के चेहरे भी अधिकतर बुझे ही दिख रहे थे। पीएम के भाषण के बीच कार्यकर्ताओं की जोश में निकलने वाली आवाज और मोदी-मोदी की गूंज में पहले वाला जोश नहीं दिख रहा था। मोदी ने अपने भाषण में लोकसभा में भाजपा सदस्यों की कम हो रही संख्या का जिक्र नहीं किया।

 पीएम मोदी ने अपने भाषण में कहा कि आज की ये विजय… दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की जीत है। ये भारत के संविधान पर अटूट निष्ठा की जीत है,ये विकसित भारत के प्रण की जीत है, ये सबका साथ-सबका विकास के मंत्र की जीत है। उन्होंने कहा कि ये 140 करोड़ भारतीयों की जीत है। पीएम मोदी ने कहा कि तीसरे कार्यकाल में देश बड़े फैसलों का एक नया अध्याय लिखेगा। पीएम ने कहा कि आज तीसरी बार जो आशीर्वाद NDA को मिला है, मैं उसके सामने विनय भाव से नतमस्तक हूं। पीएम मोदी ने कहा कि 1962 के बाद पहली बार कोई सरकार अपने दो कार्यकाल पूरे करने के बाद तीसरी बार वापस आई है। राज्यों में जहां भी विधानसभा के चुनाव हुए, वहां पर NDA को भव्य विजय मिली है, चाहे वो अरुणाचल प्रदेश हो, आंध्र प्रदेश हो, ओडिशा हो या फिर सिक्किम। प्रधानमंत्री ने कहा कि इस स्नेह के लिए मैं जनता-जनार्दन को नमन करता हूं, हम उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए पिछले दशक में किये गए अच्छे कार्यों को जारी रखेंगे।

इससे पहले नतीजों के बाद पीएम मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक संदेश पोस्ट किया। उन्होंने लिखा कि देश की जनता-जनार्दन ने एनडीए पर लगातार तीसरी बार अपना विश्वास जताया है। भारत के इतिहास में ये एक अभूतपूर्व पल है। मैं इस स्नेह और आशीर्वाद के लिए अपने परिवारजनों को नमन करता हूं।शब्दों में वो जोश जिसके लिए मोदी जाने जाते हैं। पीएम मोदी की बॉडी लैंग्वेज 2019 में मिली जीत के बाद जब वो पार्टी मुख्यालय पहुंचे थे उस समय के बिल्कुल उलट थी।एनडीए के भले ही सरकार बनाने लायक बहुमत मिला हो लेकिन पीएम के भाषण के दौरान माहौल बिल्कुल अलग था। 2014 और 2019 में मिली जीत के बाद कार्यकर्ताओं का जोश सातवें आसमान पर था। उन्होंने लिखा कि मैं देशवासियों को विश्वास दिलाता हूं कि उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए हम नई ऊर्जा, नई उमंग, नए संकल्पों के साथ आगे बढ़ेंगे।पीएम के भाषण के बीच कार्यकर्ताओं की जोश में निकलने वाली आवाज और मोदी-मोदी की गूंज में पहले वाला जोश नहीं दिख रहा था। मोदी ने अपने भाषण में लोकसभा में भाजपा सदस्यों की कम हो रही संख्या का जिक्र नहीं किया। पीएम मोदी ने अपने भाषण में कहा कि आज की ये विजय… दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की जीत है। ये भारत के संविधान पर अटूट निष्ठा की जीत है,ये विकसित भारत के प्रण की जीत हैसभी कार्यकर्ताओं ने जिस समर्पण भाव से अथक मेहनत की है, मैं इसके लिए उनका हृदय से आभार व्यक्त करता हूं, अभिनंदन करता हूं।

क्या विपक्ष ने याद दिला दिया है 2004 का चुनाव?

हाल ही में विपक्ष ने 2004 का चुनाव भी याद दिला दिया है! एग्जिट पोल में बीजेपी और उसके नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए को बड़ी बढ़त का इशारा मिलते ही विपक्ष लाल हो गया। कांग्रेस, सपा, आरजेडी से लेकर कई विपक्षी दलों ने कहा कि यह दरअसल बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के इशारे पर पेश किया गया अनुमान है। उनका दावा है कि असली रिजल्ट एग्जिट पोल के विपरीत आएगा और विपक्ष 295 सीटें जीतकर सरकार बनाएगा। वहीं, ऐसे बीजेपी और मोदी विरोधी भी भरे पड़े हैं जो बीजेपी की तरफ से ‘अबकी बार 400 पार’ का नारा आने के बाद से ही याद दिला रहे हैं कि 2004 में भी कुछ हुआ था। वो बता रहे हैं कि कैसे 2004 में भी सत्ता पक्ष को लेकर बड़े रोजी पिक्चर बनाए जा रहे थे, सारे एग्जिट पोल भी सरकार की वापसी की घोषणा कर रहे थे, लेकिन असली परिणाम आया तो सारे अनुमान और दावे हवा-हवाई हो गए। तो क्या, सच में इस बार भी 2004 जैसे परिणाम आ सकते हैं? क्या 2004 में अटल सरकार की तरह ही इस बार भी मोदी सरकार की विदाई हो सकती है? सबसे बड़ा सवाल कि क्या सच में 2004 में कांग्रेस ने बीजेपी को बुरी तरह परास्त किया था? आइए इन सवालों के जवाब ढूंढते हुए यह जानने की कोशिश करते हैं कि इस बार का माहौल भी 2004 जैसा ही है! 1999 में बीजेपी ने 182 सीटें जीतकर केंद्र में सरकार बनाई थी। दरअसल अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार 1998 में ही बन गई थी, लेकिन तमिलनाडु के सहयोगी दल एआईएडीएमके के हाथ खींचने से मात्र एक वोट से सिर्फ 13 महीनों में ही सरकार ने विश्वास मत खो दिया था। तब विपक्षी दल मिलकर सरकार नहीं बना पाए थे, इसलिए चुनाव हुआ था। 1999 के उस चुनाव में बीजेपी 182 सीटें लेकर दोबारा सरकार में आ गई। पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया। उससे पहले वो दो बार प्रधानमंत्री बन चुके थे, लेकिन पहली बार तो सिर्फ 13 दिन में सरकार गिर गई थी। 1999 में दूसरी बार बनी सरकार का हश्र ऊपर बताया जा चुका है।

तीसरी बार अटल बिहारी की सरकार ने पांच साल पूरा किया तो उसके कई योजनाओं की बड़ी तारीफ हुई। अटल सरकार ने स्वर्णिम चतुर्भज योजना, नई टेलिकॉम पॉलिसी, सर्व शिक्षा अभियान, पोखरण में परमाणु परीक्षण, चंद्रयान-1 मिशन, केंद्रीय मंत्रालय में उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए नए विभाग का गठन जैसे कई क्रांतिकारी काम किए। अटल सरकार ने विनिवेश मंत्रालय बनाकर निजीकरण को बढ़ावा दिया और घाटे में जा रही कई सरकारी कंपनियों से किनारा कर लिया। 2004 में बीजेपी ने ‘इंडिया शाइनिंग’ के नारे के साथ मतदाताओं से अटल सरकार की वापसी का मौका देने की अपील की। ऐसा लग रहा था मानो जनता अटल सरकार की उपलब्धियों से बहुत खुश है और उसे एक और मौका देने का मन बना चुकी है। एग्जिट पोल्स में भी अटल सरकार की वापसी बताई गई, लेकिन जब मतगणना शुरू हुई तो रिजल्ट पलट गए।

बीजेपी ने 2004 के लोकसभा चुनाव में 364 कैंडिडेट उतारे थे। पार्टी को 37.91% की स्ट्राइक रेट से 138 सीटों पर जीत हासिल हुई। वहीं, कांग्रेस पार्टी की स्ट्राइक रेट 34.77% रही और उसके कुल 417 उम्मीदवारों में 145 चुनकर संसद पहुंचे। यानी, बीजेपी के मुकाबले कांग्रेस को सिर्फ सात सीटें ज्यादा आईं। जहां तक वोटों की बात है तो बीजेपी को कुल 8 करोड़, 63 लाख, 71 हजार, 561 यानी कुल 22.61% वोट मिले। वहीं, कांग्रेस को 10 करोड़, 34 लाख, 8 हजार, 949 यानी 26.53% वोट मिले थे। इस लिहाज से देखें तो बीजेपी को प्रति कैंडिडेट औसतन 2,37,284 वोट मिले थे जबकि कांग्रेस के लिए यह आंकड़ा 247,983 रहा था। इस चुनाव में बीजेपी को उत्तर प्रदेश से बहुत बड़ा झटका मिला था। पांच साल पहले जिस उत्तर प्रदेश ने बीजेपी को 29 सांसद दिए थे, वहां वो 10 सीटों पर सिमट गई थी। एक प्रदेश में ही 19 सीटों का घाटा। कांग्रेस ने तब यूपी में नौ सीटें हासिल कर ली थी। कांग्रेस को 2004 के चुनाव में सबसे अधिक आंध्र प्रदेश से 29 सीटें मिल गई थीं। वहीं बीजेपी को सबसे ज्यादा 25 सीटें मध्य प्रदेश से मिली थीं।

मजे की बात है कि इस चुनाव में भी कांग्रेस को बीजेपी के मुकाबले ज्यादा वोट मिले थे। तब कांग्रेस को 10,31,20,330 यानी 28.30% जबकि बीजेपी को 8,65,62,209 यानी 23.75% वोट मिले थे। बीजेपी को 1999 में 53.69% के स्ट्राइक रेट से 182 सीटों पर जीत मिली थीं। उसने कुल 339 कैंडिडेट चुनाव मैदान में उतारे थे। उस चुनाव में बीजेपी को उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में 29-29 सीटें मिली थीं जबकि कांग्रेस को यूपी में क्रमशः 10 और 11 सीटें मिली थीं। उसे सबसे ज्यादा 18 सीटें कर्नाटक से मिली थीं जबकि आंध्र प्रदेश से उसे सिर्फ 5 सीटें मिली थीं। साफ है कि 2004 के चुनाव में जिस तरह उत्तर प्रदेश ने बीजेपी को तगड़ा झटका दिया, उसके उलट आंध्र प्रदेश ने कांग्रेस को बड़ी बढ़त दिला दी।

EVM तोड़ने वाले विधायक के लिए क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने EVM तोड़ने वाले विधायक के लिए एक बयान दिया है! सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को वाईएसआर कांग्रेस पार्टी वाईएसआरसीपी के विधायक पिन्नेली रामकृष्णा रेड्डी को फटकार लगाते हुए उनके मतगणना केंद्र पर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया। एक मतदान केंद्र पर ईवीएम पटकने का विधायक का वीडियो कैमरे में कैद हो गया था। जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने घटना का वीडियो देखने के बाद कहा कि ईवीएम को जमीन पर पटकने का आरोप ‘सिस्टम की खिल्ली उड़ाने’ जैसा है। अदालत ने कहा कि यदि अंतरिम सुरक्षा देने के उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक नहीं लगाई गई तो यह भी पूरी न्याय प्रणाली का उपहास उड़ाने जैसा होगा। पीठ में जस्टिस संदीप कुमार भी शामिल थे। शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में मचेरला विधायक के वकील विकास सिंह द्वारा वाईएसआरसीपी नेता की ओर से दायर उस हलफनामे पर भी विचार किया जिसमें कहा गया था कि वह मंगलवार को मतगणना केंद्र या उसके आसपास नहीं जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय से अंतरिम सुरक्षा देने के अपने पूर्व के फैसले से प्रभावित हुए बिना, मामले में अग्रिम जमानत की याचिका पर गुण-दोष के आधार विचार करने के लिए कहा। हाई कोर्ट ने 23 मई को अपने अंतरिम आदेश में मतदान के दौरान ईवीएम पटकने के मामले में 5 जून तक आरोपी विधायक की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ टीडीपी के एक पोलिंग एजेंट ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका में आरोप लगाया गया है कि रामकृष्णा रेड्डी के रसूख के दबाव में वीआरओ ने अपनी रिपोर्ट में मतदान केंद्र में ईवीएम को नुकसान पहुंचाने का आरोप अज्ञात लोगों पर लगाया था।

रामकृष्णा रेड्डी वाईएसआरसीपी उम्मीदवार के रूप में पांचवीं बार विधायकी के लिए मचेरला से चुनाव मैदान में हैं। पुलिस ने ईवीएम पटकने का उनका वीडियो वायरल होने के बाद आईपीसी; जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951; और लोक संपत्ति को नुकसान की रोकथाम (पीडीपीपी) अधिनियम, 1984 की संबंधित धाराओं के खिलाफ मामला दर्ज किया है। घटना माचेर्ला में 13 मई को मतदान के दिन एक मतदान केंद्र की है। ईवीएम पटकने का वीडियो वायरल होने के बाद चुनाव आयोग ने उनकी गिरफ्तारी का आदेश दिया था। बाद में विधायक के खिलाफ मतदान के दिन हिंसा की साजिश के तीन नए मामले दर्ज किए गए थे।

पीठ ने रेड्डी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह से कहा, ‘जब आप वीडियो देखेंगे तो पाएंगे कि यह पूरी तरह से गलत आदेश है। यह न्याय प्रणाली का भद्दा मजाक है।’ पीठ ने रेड्डी को चार जून को माचेर्ला विधानसभा क्षेत्र के मतगणना केंद्र में प्रवेश नहीं करने और उसके आसपास भी न रहने का निर्देश दिया। आंध्र प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एकसाथ हुए थे। न्यायालय ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय से कहा कि अदालत रेड्डी के खिलाफ छह जून को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध मामलों से संबंधित याचिका पर बिना किसी संकोच के निर्णय ले। रेड्डी को 28 मई को अंतरिम राहत दी गई थी। माचेर्ला विधानसभा क्षेत्र से वाईएसआरसीपी के उम्मीदवार रेड्डी अपने समर्थकों के साथ 13 मई को मतदान वाले दिन कथित तौर पर मतदान केंद्र में घुसे और वीवीपैट और ईवीएम मशीनों को तोड़ दिया।

शीर्ष अदालत तेलुगू देशम पार्टी (TDP) के पोलिंग एजेंट शेषगिरी राव नंबूरी की ओर से दायर दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें विधायक को गिरफ्तारी से दी गई अंतरिम सुरक्षा को रद्द करने की मांग की गई थी। नंबूरी ने दावा किया कि वीडियो साक्ष्य होने के बावजूद पुलिस ने विधायक के खिलाफ मुकदमा दर्ज न कर, कुछ अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। सिंह ने कहा कि वह इन घटनाओं को नहीं बल्कि कथित तौर पर जब ये घटनाएं हुईं तो बूथ पर विधायक की मौजूदगी को चुनौती दे रहे हैं।न्यायालय ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय से कहा कि अदालत रेड्डी के खिलाफ छह जून को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध मामलों से संबंधित याचिका पर बिना किसी संकोच के निर्णय ले। रेड्डी को 28 मई को अंतरिम राहत दी गई थी। पीठ ने कहा कि घटना के वीडियो को देखने पर आरोप प्रथम दृष्टया सच प्रतीत होते हैं और इन्हें स्वीकार किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा, ‘शिकायत में बताया गया कि आठ लोग बूथ के अंदर घुसे और वीवीपैट व ईवीएम ले गए और उन्हें नष्ट कर दिया। अब, अगर हम अग्रिम जमानत आदेश पर रोक नहीं लगाते हैं, तो यह न्यायिक प्रणाली का मजाक होगा।’

क्या पाकिस्तान के हैकर्स भी हो चुके हैं वर्तमान में एक्टिव?

वर्तमान में पाकिस्तान के हैकर्स भी एक्टिव हो चुके हैं! इंटरनेट के बिना अब जिंदगी जीना नामुमकिन सा हो गया है। अगर मोबाइल और लैपटॉप में इंटरनेट न हो तो उसे हम डिब्बा समझने लगते हैं। हमारे इंटरनेट से बढ़ते इस लगाव का फायदा साइबर ठग खूब उठा रहे हैं। खास कर पाकिस्तानी हैकर्स हमारे देश के लोगों को खूब निशाना बना रहे रहे हैं। दरअसल पाकिस्तान बेस्ड हैकर्स के एक ग्रुप को ट्रांसपेरेंट ट्राइब के नाम से जाना जाता है। जो भारत सरकार और सैन्य संस्थानों को निशाना बना रहा है। ब्लैकबेरी रिसर्च एंड इंटेलिजेंस टीम द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, ये धमकाने वाले एक्टर्स प्रोग्रामिंग भाषाओं जैसे पायथन, गोलांग और रस्ट का उपयोग कर रहे हैं, साथ ही टेलीग्राम, डिस्कॉर्ड, स्लैक और गूगल ड्राइव का भी दुरुपयोग कर रहे हैं। ब्लैकबेरी रिसर्च एंड इंटेलिजेंस टीम के अनुसार ट्रांसपेरेंट ट्राइब दिसंबर 2023 के अंत से अप्रैल 2024 तक सक्रिय रहा था और संभावना है कि यह आगे भी जारी रहेगा। ग्लोबल साइबरसिक्योरिटी सॉल्यूशंस प्रोवाइडर क्विक हील टेक्नोलॉजीज लिमिटेड की ब्रांच सेक्राइट द्वारा किए गए एक रिसर्च में एक अन्य पाकिस्तान स्थित APT समूह, साइडकॉपी द्वारा सरकार को निशाना बनाने वाले तीन अलग-अलग अभियानों का पता चला। लोकसभा चुनावों के बीच साइबर हमले के ये अभियान तेज हो गए हैं।

ट्रांसपेरेंट ट्राइब जिसे APT36, ProjectM, Mythic Leopard या Earth Karkaddan के नाम से जाना जाता है, 2013 से सक्रिय है। यह एक साइबर निगरानी समूह है जो पाकिस्तान से काम करता है। इसने पहले भारत के शिक्षा और रक्षा क्षेत्रों के खिलाफ साइबर जासूसी अभियान चलाए हैं। इसके अलावा भारत की सरकारी एयरोस्पेस कंपनी, डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी और एशिया के दूसरी सबसे बड़ी अर्थ मूविंग इक्विपमेंट बनाने वाली कंपनी को भी ऐसे ईमेल भेजे गए. ये कंपनियां भारत के इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोजेक्ट से जुड़ी हुई हैं. ये सभी ग्राउंड सपोर्ट व्हीकल्स प्रदान कर रही हैं. ट्रांसपेरेंट ट्राइब मुख्य रूप से फिशिंग ईमेल का इस्तेमाल करता है, जिसमें खास तौर पर जिप आर्काइव या लिंक का इस्तेमाल किया जाता है। ब्लैकबेरी रिसर्च एंड इंटेलिजेंस टीम ने पाया कि ये ग्रुप पिछले अभियानों में इस्तेमाल किए गए टूल्स के साथ-साथ उनके नए अपडेट वर्जन का भी इस्तेमाल कर रहा है। रिसर्च में सामने आया कि पाकिस्तान स्थित एक मोबाइल डेटा नेटवर्क ऑपरेटर से जुड़े एक रिमोट आईपी पते का भी पता चला है, जो एक फिशिंग ईमेल में छिपा हुआ था। जिसमें इस ग्रुप से भेजी गई एक फाइल में टाइम ज़ोन (टीजेड) वेरिएबल को एशिया/कराची पर सेट किया गया था, जो पाकिस्तान का मानक समय है।

अपने जाने-माने तरीकों के साथ-साथ ट्रांसपेरेंट ट्राइब नए तरीके भी अपना रहा है। अक्टूबर 2023 में, उन्होंने हमले के तरीके के रूप में आईएसओ इमेज का इस्तेमाल किया था। ब्लैकबेरी ने समूह द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले एक नए गोलांग कम्पाइलड ऑल-इन-वन जासूसी टूल का भी पता लगाया है, बता दे कि ट्रांसपेरेंट ट्राइब के नाम से जाना जाता है। जो भारत सरकार और सैन्य संस्थानों को निशाना बना रहा है। बता दें कि रक्षा संबंधी यंत्र बनाने वाली तीन कंपनियां और भारतीय फोर्सेस भी पाकिस्तानी हैकिंग समूहों द्वारा लगातार निशाने पर रह रही हैं.  डिफेंस मिनिस्ट्री के तहत आने वाली रक्षा संस्थाओं, कंपनियों और सेना से जुड़े अधिकारियों को लगातार टारगेट किया जा रहा है. ये काम ट्रांसपैरेंट ट्राइब नाम का समूह कर रहा है. साइबरसिक्योरिटी से जुड़े प्रोफेशनल इसे एडवांस्ड परसिसटेंट थ्रेट (APT) 36 कहते भारतीय फोर्सेस और डिफेंस कॉन्ट्रैक्टर्स लगातार सितंबर 2023 से अप्रैल 2024 तक ट्रांसपैरेंट ट्राइब के निशाने पर रहे हैं. ये दावा किया है ब्लैकबेरी रिसर्च एंड इंटेलिजेंस टीम ने अपनी रिपोर्ट में. फिशिंग ईमेल भेजे जाते हैं. इसमें मालवेयर होता है. ऐसे ही ईमेल एशिया की सबसे बड़ी एयरोस्पेस और डिफेंस कंपनियों को भेजा गया. 

 ब्लैकबेरी रिसर्च एंड इंटेलिजेंस टीम द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, ये धमकाने वाले एक्टर्स प्रोग्रामिंग भाषाओं जैसे पायथन, गोलांग और रस्ट का उपयोग कर रहे हैं, ट्रांसपेरेंट ट्राइब मुख्य रूप से फिशिंग ईमेल का इस्तेमाल करता है, जिसमें खास तौर पर जिप आर्काइव या लिंक का इस्तेमाल किया जाता है। ब्लैकबेरी रिसर्च एंड इंटेलिजेंस टीम ने पाया कि ये ग्रुप पिछले अभियानों में इस्तेमाल किए गए टूल्स के साथ-साथ उनके नए अपडेट वर्जन का भी इस्तेमाल कर रहा है।साथ ही टेलीग्राम, डिस्कॉर्ड, स्लैक और गूगल ड्राइव का भी दुरुपयोग कर रहे हैं। जिसमें लोकप्रिय फाइल एक्सटेंशन वाली फाइलों को ढूंढने और उन्हें बाहर निकालने, स्क्रीनशॉट लेने, फाइलों को अपलोड और डाउनलोड करने और कमांड चलाने की क्षमता है।

क्या बीजेपी के मोदी मय का तोड़ निकाल पाएगी कांग्रेस?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कांग्रेस बीजेपी के मोदी मय का तोड़ निकाल पाएगी या नहीं! कांग्रेस ने राहुल गांधी को फोकस करते हुए बीजेपी के MR फेक्टर माहौल का काउंटर नैरेटिव तैयार करने के लिए अब 14 जनवरी से भारत जोड़ो न्याय यात्रा निकालने का फैसला किया है। बीजेपी का MR समीकरण मतलब है M= मोदी मय R=राम मय। ‘राम मय’ और ‘मोदी मय’ के काउंटर नरैटिव को कांग्रेस ने भले ही इसे चुनावी यात्रा करार नहीं देते हुए सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक मुद्दों पर न्याय यात्रा कहा है। लेकिन, विश्लेषक स्पष्ट रूप से इसे भारत जोड़ो यात्रा .2 के रूप में लोकसभा इलेक्शन कैंपेन ही निरूपित कर रहे हैं। अभी भी तालमेल की तलाश कर रहे इंडिया गठबंधन को कांग्रेस इस यात्रा के बहाने यह मैसेज भी देना चाह रही है कि विपक्ष का प्राइम मिनिस्टर मैंटेरियल राहुल गांधी ही है। दरअसल, लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस देशभर में फिर एक यात्रा निकाल रही है। पार्टी ने मणिपुर के इंफाल से मुंबई तक भारत जोड़ो यात्रा.2 का रोड मैप जरूर जारी कर दिया है। लेकिन जिन मुद्दों को लेकर वह यात्रा के लिए निकल रही है उसका रोड मैप फिलहाल बिल्कुल भी स्पष्ट नहीं है। विभिन्न जांच एजेंसियों के घेरे में आए गांधी परिवार, कमजोर पड़ रही कांग्रेस और केंद्र सरकार के विरोध के लिए भारत जोड़ो यात्रा निकाली गई थी। मध्य प्रदेश के संदर्भ में बात करें तो जिन क्षेत्रों से राहुल गांधी निकले थे, वहां चुनावी सफलता या विशेष छाप नहीं छोड़ पाए।वहीं कमजोर संसाधनों वाली कांग्रेस के पास मुद्दों लेकर जनता तक पहुंचने के लिए समय नहीं बचेगा। समाजवादी पार्टी के नेता आईपी सिंह ने चुनाव के मुहाने पर आयोजित हो रही इस यात्रा पर टिप्पणी की ‘द्वारे आई बारात तो समधन चली स्नान’. दूसरे, इसमें इंडिया गठबंधन के नेताओं के समावेश नहीं होने से यह कांग्रेस और राहुल गांधी की ही यात्रा मानी जाएगी। लेकिन, हताश व निराश कांग्रेस में एक नई जान जरूर फूंकने में सफल हुए थे। उनकी यात्रा के बाद पूरे देश की बात करें तो मिला जुला असर देखने को मिला। लेकिन मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान ने उन्हें स्पष्ट रूप से नकार दिया। मध्य प्रदेश में तो कांग्रेस 66 सीटों पर ही सिमट गई।

ज्यादातर बस के माध्यम से होने वाली यह यात्रा मध्य प्रदेश में 7 दिन के दौरान मुरैना, ग्वालियर, शिवपुरी, अशोक नगर, गुना, राजगढ़, आगर मालवा उज्जैन और रतलाम की 698 किलोमीटर यात्रा तय कर राजस्थान में प्रवेश करेगी।

बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता आशीष अग्रवाल ने तंज कसते हुए कहा कि यात्रा का नाम बदलने से कुछ नहीं होने वाला। कांग्रेस ने वर्षों से जनता के साथ अन्याय किया है। उसके लिए तो उसे क्षमा यात्रा निकालना चाहिए। प्रतिपक्ष के उप नेता हेमंत कटारे ने कहा कि यह यात्रा जनता से सीधे जोड़ने का माध्यम है। जनता के मन की बात सुनकर उसके अनुरूप चलेंगे। पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने एक कदम बढ़ कर टिप्पणी की है कि राहुल गांधी की यात्रा लोकतंत्र के इतिहास में मील का पत्थर साबित होगी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस यात्रा के दौरान 67 दिनों तक कांग्रेस अपने बचे खुचे संसाधनों को झोंक देगी। यात्रा की समाप्ति के ठीक बाद लोकसभा चुनाव रहेंगे। जहां अभी से चुनाव के एक्टिव मोड पर आ चुकी भाजपा मध्य प्रदेश जीतने से बेहद उत्साहित है, और वह इस यात्रा के दौरान ही बूथ लेवल तक पहुंच चुकी होगी। वहीं कमजोर संसाधनों वाली कांग्रेस के पास मुद्दों लेकर जनता तक पहुंचने के लिए समय नहीं बचेगा। समाजवादी पार्टी के नेता आईपी सिंह ने चुनाव के मुहाने पर आयोजित हो रही इस यात्रा पर टिप्पणी की ‘द्वारे आई बारात तो समधन चली स्नान’. दूसरे, इसमें इंडिया गठबंधन के नेताओं के समावेश नहीं होने से यह कांग्रेस और राहुल गांधी की ही यात्रा मानी जाएगी। हालांकि मध्य प्रदेश में सपा को छोड़ इंडिया गठबंधन से जुड़ी ज्यादा पार्टियां नहीं है।

इस तरह से यात्रा और राहुल गांधी को मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बाद टूट चुकी कांग्रेस का मनोबल बढ़ाने की बड़ी चुनौती होगी। यहां 29 में से 28 सीटों पर भाजपा काबिज है। लेकिन, हताश व निराश कांग्रेस में एक नई जान जरूर फूंकने में सफल हुए थे। उनकी यात्रा के बाद पूरे देश की बात करें तो मिला जुला असर देखने को मिला। लेकिन मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान ने उन्हें स्पष्ट रूप से नकार दिया। मध्य प्रदेश में तो कांग्रेस 66 सीटों पर ही सिमट गई।इस तरह की यात्राओं से लाभ तो होता है, लेकिन कितना ,यह समय बताएगा।

क्या कभी कांग्रेस पार्टी भी हुई है 400 पार?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कभी कांग्रेस पार्टी भी 400 पार हुई है या नहीं! अब से कुछ ही घंटों में 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे घोषित हो जाएंगे। अगर एग्जिट पोल सही साबित होते हैं तो बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए आसानी से 350-400 सीटें हासिल करते हुए बहुमत का आंकड़ा पार कर जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिन्होंने जोरदार चुनाव प्रचार किया था, को ऐतिहासिक तीसरा कार्यकाल मिलने की संभावना है। इसके साथ ही वोदेश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी कर लेंगे। लेकिन यह एकमात्र रिकॉर्ड नहीं है जिसे बीजेपी हासिल करना चाहती है। 4 जून को सुबह 8 बजे से नतीजे आने शुरू हो जाएंगे, सभी की निगाहें एनडीए की अंतिम सीटों की संख्या पर होंगी। लोग यह देखेंगे कि बीजेपी क्या वह वास्तव में ‘400 पार’ (400 से ज़्यादा सीटें) हासिल कर पाती है। एकमात्र बार किसी पार्टी ने यह लक्ष्य 1984 के आम चुनावों में हासिल किया था। उस समय राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने 414 सीटें जीती थीं। तब 541 सीटों के लिए वोट डाले गए थे। 2014 में जब एनडीए ने प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी के नाम की घोषणा की, तो उसने अपने लोकसभा चुनाव अभियान को एक नया मोड़ दिया। यह बीजेपी के लिए मोदी-केंद्रित चुनाव अभियान की शुरुआत थी। गुजरात के विकास मॉडल पर ध्यान केंद्रित करते हुए, बीजेपी ने कांग्रेस को केंद्र से बाहर करने के लिए वोट मांगे। उस समय बीजेपी ने ‘घर-घर मोदी’ और ‘अबकी बार मोदी सरकार’ जैसे नारे दिए। 2019 में, जब पीएम मोदी ने दूसरा कार्यकाल चाहा, तो भाजपा ने ‘अबकी बार’ नारे को आगे बढ़ाया और ‘फिर एक बार मोदी सरकार’ के नारे के साथ आई। पीएम मोदी के विकास कार्यों की तरह यह नारा भी मतदाताओं के दिलों में उतर गया। एनडीए ने 2019 के लोकसभा चुनावों में लगातार जीत दर्ज की। गठबंधन ने अपनी सीटों की संख्या 336 से बढ़ाकर 353 कर ली। इस वर्ष, जैसा कि पीएम मोदी ने तीसरे कार्यकाल के लिए जवाहर लाल नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी करने का लक्ष्य रखा। उन्होंने एनडीए के लिए 400 सीटों का लक्ष्य निर्धारित करते हुए ‘अबकी बार, 400 पार’ का नारा दिया। जैसा कि उन्होंने देश भर में प्रचार किया, 200 से अधिक रैलियां, रोड शो और अन्य सार्वजनिक आउटरीच कार्यक्रम आयोजित किए। उन्होंने मतदाताओं से कहा कि वे ‘400 पार’ को वास्तविकता में बदल दें ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कांग्रेस और विपक्षी भारत ब्लॉक अयोध्या में मंदिर पर ‘बाबरी ताला’ लगाने या जम्मू और कश्मीर में अनुच्छेद 370 को वापस लाने की अपनी योजना में सफल न हो।

अब से कुछ ही घंटों में हमें पता चल जाएगा कि एनडीए 400 सीटों का अपना लक्ष्य हासिल कर पाएगा या नहीं। भारतीय चुनावी इतिहास में यह महत्वाकांक्षी लक्ष्य सिर्फ एक बार ही हासिल किया जा सका है, वह भी 1984 के लोकसभा चुनाव में। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए 1984 के चुनाव में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को कुल 541 सीटों में से 414 सीटें मिली थीं। सबसे ज्यादा सीटों के साथ-साथ कांग्रेस को किसी एक पार्टी के लिए अब तक का सबसे ज़्यादा वोट शेयर भी मिला। उस वक्त कांग्रेस का वोट शेयर 48.12 प्रतिशत था। दूसरे स्थान पर सीपीआई (एम) रही थी। उसे 22 सीटें और 5.71 प्रतिशत वोट शेयर मिले थे। बीजेपी को तब 7.4 प्रतिशत वोट शेयर के साथ सिर्फ 2 सीटें मिली थीं।

शनिवार को किए गए एग्जिट पोल के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने पद पर लगातार तीसरी बार जीत मिलने की उम्मीद है। इसके साथ ही बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए को लोकसभा चुनावों में महत्वपूर्ण बहुमत मिलने का अनुमान है। एक्सिस माई इंडिया का अनुमान है कि भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन 361 से 401 सीटों के बीच सुरक्षित रहेगा। वहीं, विपक्षी इंडिया ब्लॉक को 543 सदस्यीय लोकसभा में 131-166 सीटें जीतने की उम्मीद है। एबीपी-सी वोटर ने सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए 353-383 सीटों और इंडिया ब्लॉक के लिए 152-182 सीटों का अनुमान लगाया है। चाणक्य के एग्जिट पोल ने 2019 के चुनावों की तुलना में भाजपा और उसके गठबंधन के लिए और भी अधिक सीटों का अनुमान लगाया है। इससे बीजेपी के लिए 335 सीटों और एनडीए के लिए 400 सीटों की भविष्यवाणी की गई है। दोनों तरफ 15 सीटों का अंतर है। विपक्षी गठबंधन को 107 सीटें जीतने का अनुमान है। टाइम्स नाउ-ईटीजी रिसर्च के एग्जिट पोल में एनडीए को 358 सीटें और इंडिया ब्लॉक को 152 सीटें दी गई हैं।

एनडीए 2019 की 353 सीटों की संख्या को पार कर सकता है, जबकि पिछले चुनाव में भाजपा ने 303 सीटें जीती थीं। कांग्रेस ने 53 सीटें हासिल की थीं, जबकि उसके सहयोगियों ने 38 सीटें जीती थीं। एनडीए तमिलनाडु और केरल में अपना खाता खोल सकता है। गठबंधन को कर्नाटक में जीत मिल सकती है लेकिन बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे राज्यों में नुकसान हो सकता है। अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, उत्तर प्रदेश भाजपा का गढ़ बना रहेगा। एक्सिस माई इंडिया ने बीजेपी को 322-340 सीटें, कांग्रेस को 60-76 सीटें और कांग्रेस के सहयोगियों को 71-90 सीटें मिलने का अनुमान लगाया है। पी मार्क पोल के अनुसार सत्तारूढ़ गठबंधन को 359 सीटें मिलेंगी, जबकि विपक्षी दल इंडिया को 154 सीटें मिलेंगी। मैट्रिज पोल के अनुसार एनडीए को 353-368 सीटें और विपक्ष को 118-133 सीटें मिलेंगी। जन की बात पोल के अनुसार सत्तारूढ़ एनडीए को 362-392 सीटें और विपक्षी गठबंधन को 141-161 सीटें मिलने का अनुमान है। इंडिया टीवी-सीएनएक्स ने एनडीए को 371-401 सीटें और विपक्ष को 109-139 सीटें मिलने का अनुमान लगाया है। वहीं, न्यूज नेशन ने एनडीए को 342-378 सीटें और विपक्ष को 153-169 सीटें मिलने का अनुमान लगाया है।

क्या चुनावी नतीजे से असंतुष्ट होने पर जांच की जा सकती है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या चुनावी नतीजे से असंतुष्ट होकर जांच की जा सकती है या नहीं! लोकसभा चुनाव के बाद अब वोटों की गिनती शुरू होने में कुछ ही घंटे बाकी है। चुनाव आयोग की तरफ से वोटों की गिनती के बाद रिजल्ट की घोषणा की जाती है। ऐसे में जो उम्मीदवार चुनाव परिणाम से असंतुष्ट होंगे वे ईवीएम वेरिफिकेशन के लिए आवेदन कर सकते हैं। चुनाव आयोग की तरफ से इस संबंध में एक प्रोटोकॉल जारी किया है। इसके तहत रिजल्ट की घोषणा के बाद पहले दो हारने वाले उम्मीदवार 4 जून के परिणाम के बाद ईवीएम माइक्रोकंट्रोलर में जली हुई मेमोरी का सत्यापन/ऑडिट कराने की अनुमति दे सकते हैं। चुनाव आयोग ने 1 जून को सभी मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को भेजे पत्र में कहा कि किसी निर्वाचन क्षेत्र में पहले दो उपविजेता उम्मीदवार कथित छेड़छाड़ या संशोधन के लिए ईवीएम माइक्रोकंट्रोलर के सत्यापन की मांग कर सकेंगे। यह विंडो परिणाम घोषित होने के सात दिनों तक खुली रहेगी। इस मानक संचालन प्रक्रिया को सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के साथ भी साझा किया गया है। 26 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बादअनुरोध विवरण ईवीएम-वीवीपीएटी निर्माताओं को भेज देंगे। ऐसे निर्वाचन क्षेत्र के मामले में जहां परिणाम को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका अदालत में दायर की गई हो, वहां जली हुई मेमोरी का सत्यापन केवल तभी किया जाएगा जब संबंधित उम्मीदवार याचिका के लंबित रहने के दौरान ऐसा करने की अनुमति देने वाला अदालती आदेश प्राप्त कर लेगा। जारी एसओपी के अनुसार, उम्मीदवार मतगणना के दिन से सात दिनों के भीतर प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र/संसदीय निर्वाचन क्षेत्र के लगभग 5% ईवीएम में सत्यापन की मांग कर सकेंगे। यह 10 जून तक होगा।

ईवीएम निर्माताओं (ईसीआईएल और बीईएल) के इंजीनियरों के साथ उम्मीदवारों की मौजूदगी में जांच और सत्यापन किया जाएगा। चुनाव याचिकाओं के मामले को छोड़कर, यह प्रक्रिया नतीजों की घोषणा के दो महीने के भीतर पूरी होने की संभावना है। 2024-25 के चुनाव चक्र के लिए, प्रत्येक ईवीएम इकाई (जिसमें नियंत्रण इकाई, बैलट इकाई और वीवीपीएटी शामिल है) की जांच और सत्यापन के लिए प्रक्रिया पर ₹40,000 प्लस 18% जीएसटी खर्च होगा। भारतीय चुनाव आयोग ने यह फैसला किया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि वेरिफिकेशन प्रक्रिया में मशीन यूनिट के साथ छेड़छाड़ साबित होने पर यह राशि वापस कर दी जाएगी।

सत्यापन पर 5% की सीमा के संबंध में, ईसीआई ने कहा कि एक विधानसभा क्षेत्र/खंड जिसने, मान लीजिए, 400 मतपत्र इकाइयों, 200 नियंत्रण इकाइयों और 200 वीवीपीएटी का उपयोग किया है। ऐसे में 20 बैलेट यूनिट, 10 कंट्रोलिंग यूनिट और 10 वीवीपीएटी बर्न मेमोरी/माइक्रोकंट्रोलर का यूज इस उद्देश्य के लिए किया जाएगा। पहले और दूसरे स्थान पर आने वाले को मतदान केंद्र संख्या या बीयू, सीयू और वीवीपीएटी (मतदान से पहले उम्मीदवारों के पास उपलब्ध) की विशिष्ट क्रम संख्या के अनुसार इकाइयों का एक सेट चुनने की अनुमति होगी।

एसओपी में जिला निर्वाचन अधिकारी को पूरी प्रक्रिया के लिए जिम्मेदार बनाया गया है। जिला निर्वाचन अधिकारी वेरिफिकेशन आवेदनों की जानकारी राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को भेजेंगे, जो परिणामों की घोषणा के 30 दिनों के भीतर सत्यापन अनुरोध विवरण ईवीएम-वीवीपीएटी निर्माताओं को भेज देंगे। ऐसे निर्वाचन क्षेत्र के मामले में जहां परिणाम को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका अदालत में दायर की गई हो, वहां जली हुई मेमोरी का सत्यापन केवल तभी किया जाएगा जब संबंधित उम्मीदवार याचिका के लंबित रहने के दौरान ऐसा करने की अनुमति देने वाला अदालती आदेश प्राप्त कर लेगा।

दो सप्ताह के भीतर, ईसीआईएल और बीईएल सीईओ के परामर्श से और अपने ऑथोराइज्ड इंजीनियरों के विवरण के साथ राज्यवार और जिलावार जांच और सत्यापन कार्यक्रम तैयार करेंगे। बता दें कि चुनाव आयोग ने 1 जून को सभी मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को भेजे पत्र में कहा कि किसी निर्वाचन क्षेत्र में पहले दो उपविजेता उम्मीदवार कथित छेड़छाड़ या संशोधन के लिए ईवीएम माइक्रोकंट्रोलर के सत्यापन की मांग कर सकेंगे। यह विंडो परिणाम घोषित होने के सात दिनों तक खुली रहेगी। यही नहीं सत्यापन पर 5% की सीमा के संबंध में, ईसीआई ने कहा कि एक विधानसभा क्षेत्र/खंड जिसने, मान लीजिए, 400 मतपत्र इकाइयों, 200 नियंत्रण इकाइयों और 200 वीवीपीएटी का उपयोग किया है। ऐसे में 20 बैलेट यूनिट, 10 कंट्रोलिंग यूनिट और 10 वीवीपीएटी बर्न मेमोरी/माइक्रोकंट्रोलर का यूज इस उद्देश्य के लिए किया जाएगा। कुल मिलाकर, यह प्रक्रिया परिणामों की घोषणा के दो महीने के भीतर पूरी होने की उम्मीद है। इस उद्देश्य के लिए ईवीएम इकाइयों के स्टोरेज के लिए स्ट्रांग रूम के साथ एक सुरक्षित हॉल बनाया जाएगा। इसे वीडियोग्राफी के तहत उम्मीदवारों की उपस्थिति में खोला और बंद किया जाएगा।

जिला कलेक्टरों से क्या बोले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे?

हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने जिला कलेक्टरों से एक विनती की है! मतगणना से एक दिन पहले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने सभी सिविल सेवकों और अधिकारियों से एक अपील की है। उन्होंने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अधिकारियों से आग्रह करती है कि वे संविधान का पालन करें, किसी से न डरें और मतगणना दिवस पर योग्यता के आधार पर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें। हम भावी पीढ़ियों के लिए आधुनिक भारत के निर्माताओं द्वारा रचित जीवंत लोकतंत्र और दीर्घकालिक संविधान के ऋणी हैं। खड़गे ने अधिकारियों के नाम लिखे अपने पत्र में कहा कि अधिकारी अपने कर्तव्यों का पालन करें और बिना किसी भय, पक्षपात या द्वेष के राष्ट्र की सेवा करें। किसी से डरें नहीं। किसी असंवैधानिक तरीके के आगे न झुकें। अपने खुले पत्र में उन्होंने लिखा कि मैं आपको विपक्ष के नेता राज्यसभा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष की हैसियत से लिख रहा हूँ। 18वीं लोकसभा के लिए चुनाव संपन्न होतानाशाही शक्ति, धमकी, बलपूर्वक तंत्र और एजेंसियों के दुरुपयोग के साथ, सत्ता के आगे झुकने की यह प्रवृत्ति उनके अल्पकालिक अस्तित्व का एक तरीका बन गई है। हालांकि, इस अपमान में भारत का संविधान और लोकतंत्र हताहत हुए हैं। चुके हैं, 4 जून, 2024 को मतगणना होगी। मैं भारत के चुनाव आयोग, केंद्रीय सशस्त्र बलों, विभिन्न राज्यों की पुलिस, सिविल सेवकों, जिला कलेक्टरों, स्वयंसेवकों और आप में से हर एक को बधाई देना चाहता हूंं, जो इस विशाल और ऐतिहासिक कार्य के क्रियान्वयन में शामिल थे।

खरगे ने कहा, हमारे प्रेरणास्रोत और भारत के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने सिविल सेवकों को ‘भारत का स्टील फ्रेम’ कहा था। भारत के लोग अच्छी तरह जानते हैं कि यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ही है जिसने भारत के संविधान के आधार पर कई संस्थाओं की स्थापना की, उनकी ठोस नींव रखी और उनकी स्वतंत्रता के लिए तंत्र तैयार किए। संस्थाओं की स्वतंत्रता सर्वोपरि है, क्योंकि प्रत्येक सिविल सेवक संविधान की शपथ लेता है कि वह अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक और कर्तव्यनिष्ठा से निर्वहन करेगा तथा संविधान और कानून के अनुसार सभी प्रकार के लोगों के साथ बिना किसी भय या पक्षपात, स्नेह या द्वेष के सही व्यवहार करेगा”। इस भावना से हम प्रत्येक ब्यूरोक्रेट और अधिकारी से संविधान की भावना के अनुसार अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने की अपेक्षा करते हैं, जो बिना किसी दबाव व धमकी के हो। उन्होंने कहा कि इस तथ्य को रेखांकित करना महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस पार्टी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू, डॉ. बी.आर. अंबेडकर, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद, सरोजिनी नायडू और हमारे अनगिनत प्रेरणादायी संस्थापक सदस्यों द्वारा तैयार संविधान के माध्यम से न केवल मजबूत शासन का ढांचा तैयार किया, बल्कि ब्यूरोक्रेसी और नागरिक समाज में हाशिए पर पड़े लोगों को हमारे स्वायत्त संस्थानों में प्रतिनिधित्व देकर सकारात्मक कार्रवाई भी सुनिश्चित की।

कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि पिछले दशक में सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा हमारे स्वायत्त संस्थानों पर हमला करने, उन्हें कमजोर करने और दबाने का एक व्यवस्थित पैटर्न देखा गया है। परिणामस्वरूप भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों को नुकसान पहुंच रहा है। भारत को एक तानाशाही शासन में बदलने की व्यापक प्रवृत्ति है। हम तेजी से देख रहे हैं कि कुछ संस्थाएं अपनी स्वतंत्रता को त्याग रही हैं और बेशर्मी से सत्ताधारी पार्टी के हुक्मों का पालन कर रही हैं। कुछ ने पूरी तरह से उनकी संवाद शैली, उनके कामकाज के तरीके और कुछ मामलों में तो उनकी राजनीतिक बयानबाजी को भी अपना लिया है। यह उनकी गलती नहीं है। तानाशाही शक्ति, धमकी, बलपूर्वक तंत्र और एजेंसियों के दुरुपयोग के साथ, सत्ता के आगे झुकने की यह प्रवृत्ति उनके अल्पकालिक अस्तित्व का एक तरीका बन गई है। हालांकि, इस अपमान में भारत का संविधान और लोकतंत्र हताहत हुए हैं।

उन्होंने अपने पत्र में लिखा कि ‘जनता की इच्छा’ सर्वोच्च है, और लोग चाहते हैं कि भारतीय ब्यूरोक्रेसी सरदार पटेल द्वारा परिकल्पित उसी ‘भारत के स्टील फ्रेम’ पर वापस लौट आए, जो समय की कसौटी पर खरा उतरा है।जो बिना किसी दबाव व धमकी के हो। उन्होंने कहा कि इस तथ्य को रेखांकित करना महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस पार्टी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू, डॉ. बी.आर. अंबेडकर, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद, सरोजिनी नायडू और हमारे अनगिनत प्रेरणादायी संस्थापक सदस्यों द्वारा तैयार संविधान के माध्यम से न केवल मजबूत शासन का ढांचा तैयार किया इस आशा के साथ कि भारत का स्वरूप वास्तव में लोकतांत्रिक बना रहे, मैं आप सभी को शुभकामनाएं देता हूंं और उम्मीद करता हूं कि संविधान के हमारे शाश्वत आदर्श बेदाग रहेंगे।

2019 के चुनावी परिणाम से कितना अलग है 2024 का परिणाम?

2024 का परिणाम 2019 के परिणाम से कितना अलग है आज हम आपको बताने जा रहे हैं! लोकसभा चुनाव, 2024 के नतीजे जल्द ही आने लगेंगे। सबसे पहले पोस्टल बैलेट की ही गिनती की जाएगी। उसके 30 मिनट बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) में दर्ज वोटों की ही गिनती शुरू होगी। ये पोस्टल बैलेट चुनाव नतीजों में अहम भूमिका निभाएंगे। माना जा रहा है कि इस बार देश में बड़ी संख्या में पोस्टल बैलेट से मतदान हुआ है। ऐसे में पोस्टल बैलेट की गिनती पर सबकी निगाहें रहेंगी। 2019 के लोकसभा चुनाव में 8 राज्यों की 9 लोकसभा सीटों पर पोस्टल बैलेट के सहारे ही प्रत्याशियों को जीत हासिल हुई थी।विपक्ष की यह भी मांग थी कि ईवीएम की ‘कंट्रोल यूनिट’ को सीसीटीवी निगरानी वाले कॉरीडोर से होकर ले जाया जाना चाहिए।मतदान केंद्रों के वीवीपैट पर्ची की रैंडम गिनती भी जरूरी होने से समय लगने लगा तो इस प्रक्रिया में बदलाव कर दिया गया। हाल ही में विपक्ष ने चुनाव संचालन नियम, 1961 के नियम 54-A के मुताबिक वोटों की गिनती कराई जाए, जिसमें कहा गया है कि रिटर्निंग अधिकारी पहले पोस्टल बैलेट गिनेंगे। इससे पहले कांग्रेस नेता अजय माकन ने ‘एक्स’ पर आरोप लगाया कि चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों के मतगणना एजेंटों को सहायक रिटर्निंग अधिकारी की टेबल पर जाने की अनुमति नहीं दी जा रही। इन सीटों पर जीत के अंतर से ज्यादा पोस्टल बैलेट से वोट पड़े थे।पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान 14 लोकसभा क्षेत्रों की जिन 9 सीटों पर जीत का अंतर 5000 वोट से ज्यादा था, वहां पर यह जीत हासिल हुई थी। ऐसे में यहां पर पोस्टल बैलेट गेमचेंजर साबित हुए थे।

2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों में सबसे दिलचस्प वाकया उत्तर प्रदेश की मछली शहर सीट पर देखने को मिला था। जहां भाजपा प्रत्याशी ने बसपा के उम्मीदवार को बेहद कम मार्जिन 181 वोटों से हराया था। वहां पर कुल 2,814 पोस्टल बैलेट से वोट डाले गए थे।  2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की आरामबाग सीट पर तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा प्रत्याशी को 1,142 वोटों से हराया था। यहां पर कुल 1,549 पोस्टल बैलेट से वोट पड़े थे।

चुनाव आयोग ने 18 मई, 2019 को नई गाइडलाइन जारी कर दी। इसमें कहा गया था कि पोस्टल बैलेट की गिनती के दौरान ही ईवीएम की भी गिनती हो सकती है। ईवीएम की गिनती पूरी होने के बाद ही वीवीपैट पर्चियों की गिनती पूरी की जा सकती है। आयोग का यह तर्क था कि इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिटेड पोस्टल बैलेट सिस्टम के जरिये पोस्टल बैलेट की संख्या काफी बढ़ गई थी। इसके अलावा, 5 मतदान केंद्रों के वीवीपैट पर्ची की रैंडम गिनती भी जरूरी होने से समय लगने लगा तो इस प्रक्रिया में बदलाव कर दिया गया। हाल ही में विपक्ष ने चुनाव संचालन नियम, 1961 के नियम 54-A के मुताबिक वोटों की गिनती कराई जाए, जिसमें कहा गया है कि रिटर्निंग अधिकारी पहले पोस्टल बैलेट गिनेंगे। विपक्ष की यह भी मांग थी कि ईवीएम की ‘कंट्रोल यूनिट’ को सीसीटीवी निगरानी वाले कॉरीडोर से होकर ले जाया जाना चाहिए। इससे पहले कांग्रेस नेता अजय माकन ने ‘एक्स’ पर आरोप लगाया कि चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों के मतगणना एजेंटों को सहायक रिटर्निंग अधिकारी की टेबल पर जाने की अनुमति नहीं दी जा रही। आयोग ने इसका फौरन खंडन करते हुए कहा कि काउंटिंग एजेंटों को रिटर्निंग ऑफिसर या सहायक रिटर्निंग ऑफिसर की टेबल पर जाने की अनुमति दी गई है।

मतों की गिनती सुबह 8 बजे शुरू होती है। सबसे पहले पोस्टल बैलेट और इलेक्ट्रॉनिक पोस्टल बैलट की गिनती होती है। बता दें कि 2019 के लोकसभा चुनाव में 8 राज्यों की 9 लोकसभा सीटों पर पोस्टल बैलेट के सहारे ही प्रत्याशियों को जीत हासिल हुई थी। इन सीटों पर जीत के अंतर से ज्यादा पोस्टल बैलेट से वोट पड़े थे। यही नहीं जहां भाजपा प्रत्याशी ने बसपा के उम्मीदवार को बेहद कम मार्जिन 181 वोटों से हराया था। वहां पर कुल 2,814 पोस्टल बैलेट से वोट डाले गए थे।  2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की आरामबाग सीट पर तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा प्रत्याशी को 1,142 वोटों से हराया था। यहां पर कुल 1,549 पोस्टल बैलेट से वोट पड़े थे। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान 14 लोकसभा क्षेत्रों की जिन 9 सीटों पर जीत का अंतर 5000 वोट से ज्यादा था, वहां पर यह जीत हासिल हुई थी। ऐसे में यहां पर पोस्टल बैलेट गेमचेंजर साबित हुए थे। इसके तुरंत बाद ईवीएम के वोटों की गिनती शुरू होती है। करीब 1 घंटे बाद रुझान आने शुरू हो जाते हैं।