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क्या जमानत मिलने के बाद भी निगरानी रखना संवैधानिक है ?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या जमानत मिलने के बाद भी आरोपी पर निगरानी रखना संवैधानिक है या नहीं! एक शख्स को डकैती के झूठे आरोप में फंसा दिया जाए। सबूत नहीं हैं, फिर भी उसे ‘हिस्ट्रीशीटर’ घोषित कर दिया जाए। पुलिसवाले रात-रात भर उसके घर के दरवाजे पर दस्तक देते रहें। खड़क सिंह के साथ ऐसा ही हुआ था। 1962 में खड़क सिंह ने देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया था। सुप्रीम कोर्ट ने आधी रात को दस्तक देने के नियम को तो गलत माना, लेकिन निजता के अधिकार को लेकर कुछ खास नहीं कहा। कई दशक बीत गए। अब तकनीक ने बहुत तरक्की कर ली है। कुछ समय पहले दिल्ली में नाइजीरिया के नागरिक फ्रैंक विटस को जमानत पर छोड़ा गया था, लेकिन शर्त यह थी कि उसे अपनी लोकेशन पुलिस को बतानी होगी। मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने कहा कि यह गलत है। किसी को भी लगातार ट्रैक नहीं किया जा सकता। यह निजता के अधिकार का हनन है।

ये फैसले हमें बताते हैं कि हमारी निजी जिंदगी हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण है और सरकार या पुलिस इसे छीन नहीं सकती। आज के दौर में, तकनीक की मदद से हमारी हर गतिविधि पर नजर रखना बहुत आसान हो गया है। इन फैसलों से हमें यह याद दिलाया जाता है कि तकनीक का इस्तेमाल करते हुए भी हमें अपने अधिकारों का ध्यान रखना चाहिए। फ्रैंक विटस मामले में सुप्रीम कोर्ट को चिंता थी कि जमानत आदेशों में ऐसी शर्तें किसी व्यक्ति को निरंतर निगरानी में रहने के लिए मजबूर करती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अभियुक्तों को निरंतर निगरानी में रखना असंवैधानिक है। ऐसा करने से संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए गए निजता के अधिकार और जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन होगा। न्यायालय ने तर्क दिया कि किसी व्यक्ति को ‘निरंतर निगरानी’ में रखना, उसे एक तरीके से कारावास में रखने के समान है।

भारत में निजता का अधिकार हमेशा से एक संघर्षपूर्ण विषय रहा है। स्वतंत्रता के बाद से ही इस अधिकार को लेकर कई बहसें होती रही हैं। पहले, हमारे देश के संविधान में निजता के अधिकार को सीधे तौर पर नहीं माना जाता था। लेकिन साल 2017 में एक बड़ा बदलाव आया। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि निजता का अधिकार हमारे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आने वाले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का एक हिस्सा है। इससे पहले, खड़क सिंह जैसे मामलों में निजता के अधिकार को लेकर उतना महत्व नहीं दिया जाता था। लेकिन अब, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि हर व्यक्ति की निजी जिंदगी का सम्मान किया जाना चाहिए।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह निर्णय संविधान को एक जीवित दस्तावेज के रूप में मानने के स्थायी लाभों की समय पर याद दिलाता है जो वर्तमान चुनौतियों के लिए जीवित है। उस समय, किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि तकनीक का इस्तेमाल लोगों की निगरानी के लिए किया जाएगा। लेकिन हमारे संविधान के निर्माताओं ने बहुत सोच-समझकर इसे बनाया था। उन्होंने ऐसा ढांचा बनाया कि भविष्य में आने वाली किसी भी समस्या का समाधान संविधान के दायरे में ही मिल सके।

निजता का अधिकार, ये अधिकार हमारे संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए गए जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से निकले हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि 1962 में खड़क सिंह ने जो चिंता व्यक्त की थी, वह आज भी काफी हद तक मौजूद है। जो बदलाव आया है, वह यह है कि अब इस चिंता को और अधिक गंभीरता से निपटाया जा सकता है। निजता का अधिकार निस्संदेह नई तकनीक के तरीकों से प्रभावित होता है। लेकिन जैसा कि फ्रैंक विटस के फैसले से हमें याद आता है, संविधान 21वीं सदी में तकनीकी प्रगति के विरोधाभासों से निपटने में सक्षम है। संविधान जीवित है।

बता दे कि सीबीआई की तरफ से गिरफ्तारी के लिए दिए गए आधार पर ही सवाल उठा दिया गया। जस्टिस भुइयां ने साफ कहा कि किसी भी आरोपी से जबरन अपने खिलाफ गवाही नहीं दिलवाई जा सकती है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 20(3) के तहत मौलिक अधिकार की तरफ इशारा किया और कहा कि यह आरोपी का अधिकार है कि पूछताछ में वो कुछ बोले या नहीं। उसकी चुप्पी का यह मतलब नहीं निकाला जा सकता है कि आरोपी जांच में सहयोग नहीं कर रहा है या आरोप सही हैं। आइए जानते हैं कि संविधान का अनुच्छेद 20(3) क्या है जिसका हवाला देकर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई के सवालों पर अरविंद केजरीवाल की चुप्पी को जायज ठहराया।

संविधान के भाग तीन के तहत नागरिकों के मौलिक अधिकारों का वर्णन है। इन्हीं मौलिक अधिकारों में एक ‘अपराधों की दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण का अधिकार’ भी है जिसका वर्णन अनुच्छेद 20 में है। यह अनुच्छेद आपराधिक कार्यवाही में कुछ अधिकारों की रक्षा करता है। यह आत्म दोष, दोहरे खतरे और पूर्वव्यापी दंड के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है। अनुच्छेद 20(3) में स्पष्ट कहा गया है, ‘किसी भी अपराध के आरोपी व्यक्ति को स्वयं के खिलाफ गवाही देने को मजबूर नहीं किया जा सकता है।’

इसका मतलब है कि किसी अपराध के आरोप में पूछताछ के वक्त आरोपी से उसके ऊपर लगे आरोपों को जबर्दस्ती नहीं मनवाया जा सकता है। संविधान के तहत हर नागरिक का यह अधिकार है कि वह अपने ऊपर लगे आरोपों को सिरे से खारिज कर दे या फिर आंशिक रूप से स्वीकार करे या पूरी तरह स्वीकार कर ले। इतना ही नहीं, आरोपी अगर पूछताछ में कोई जवाब नहीं देना चाहता तो बिल्कुल चुप रह सकता है, उससे आरोप स्वीकार करवाना तो दूर, जबरन चुप्पी भी नहीं तुड़वाई जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के इसी अनुच्छेद का जिक्र कर कहा कि अरविंद केजरीवाल को सीबीआई इस आधार पर गिरफ्तार नहीं कर सकती है कि उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोप नहीं कबूले। जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा, ‘आरोपी की चुप्पी का कोई प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है। इस आलोक में याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी का जो आधार दिया गया है वह पूरी तरह अमान्य है। ऐसे आधारों पर ऐसे आधारों पर अपीलकर्ता को सीबीआई मामले में आगे भी हिरासत में रखना न्याय का मखौल होगा, खासकर तब, जब उसे पीएमएलए के अधिक कड़े प्रावधानों के तहत उन्हीं आरोपों पर पहले ही जमानत मिल चुकी है।’

आखिर पीएम मोदी का अमेरिकी दौरा क्यों बना सियासी जंग की जड़?

हाल ही में पीएम मोदी का अमेरिकी दौरा सियासी जंग की जड़ बन चुका है! पीएम नरेंद्र मोदी अमेरिका के दौरे पर हैं। इधर भारत में बीजेपी और कांग्रेस के बीच जुबानी जंग तेज होती जा रही है।दरअसल पीएम मोदी के अमेरिका दौरे के दिन ही वहां उनके खिलाफ पोस्टर देखे गए। बीजेपी ने इस घटना के लिए राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि हाल ही में अमेरिका दौरे पर गए राहुल गांधी का इस मामले से संबंध हो सकता है। बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने इन पोस्टरों को ‘भारत विरोधी नफरत की दुकान’ का काम बताया। उन्होंने कहा, ‘भारतीयों को शक है कि क्या ये पोस्टर राहुल गांधी के अमेरिका में भारत विरोधी ताकतों से मुलाकात का नतीजा तो नहीं हैं। क्योंकि वह कुछ दिन पहले ही अमेरिका से लौटे हैं।’ उन्होंने कहा कि देश के हर व्यक्ति में यह संदेह पैदा होता है टाइमलाइन को देखकर, कहीं इसके पीछे वही लोग तो नहीं हैं, जो राहुल गांधी से भारत विरोधी शक्तियों की मुलाकात कराकर, भारत विरोधी सियासत को बढ़ा रहे थे। फिर चाहे अंकल सैम से हों, या कोई भी हो और अधिक दुख इस बात का होता है कि उस प्रधानमंत्री के लिए है, जिसने भारत को 10 वर्षों में फ्रेजाइल फाइव से टॉप-5 इकोनॉमी में पहुंचाया है। जिसने 26 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है। जिसने डिजिटल वर्ल्ड में भारत को सिरमौर बनाया, जिसने आंतरिक और बाह्य सुरक्षा इतनी सुधारी कि 10 साल पहले भारत का कोई ऐसा राज्य या बड़ा शहर नहीं था, जहां आतंकी हमले ना होते हो।

उन्होंने कहा कि अफसोस की बात यह है कि एक तरफ हमारे ऐसे प्रधानमंत्री जो हर भारतवासी के लिए भारत के गौरव, राष्ट्रीय अस्मिता और राष्ट्रवाद के एक महामेरु पर्वत के रूप में दिखाई पड़ते हैं, तो वहीं दूसरी तरफ यह नफरती दुकान का इश्तेहार उनके ऊपर निम्न स्तरीय प्रहार करने का प्रयास दिखता है। ऐसे विज्ञापन देने वाले लोग जो भले ही मुखौटा कोई और लगाएं हों, मगर सारा देश समझ रहा है कि पीछे से वह किसके द्वारा संचालित हैं।

अमेरिका में अपने हालिया बयान के बारे में BJP पर झूठ फैलाने का आरोप लगाते हुए राहुल गांधी ने शनिवार को सिखों से पूछा कि उन्होंने जो कहा, उसमें कुछ गलत है। क्या भारत ऐसा देश नहीं होना चाहिए, जहां हर भारतीय बिना किसी डर के अपने धर्म का पालन कर सके। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने कहा कि BJP उन्हें चुप कराने के लिए बेताब है, क्योंकि वह सच्चाई बर्दाश्त नहीं कर सकती। राहुल ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘BJP अमेरिका में मेरे बयान के बारे में झूठ फैला रही है। मैं भारत और विदेश में रहने वाले हर सिख भाई-बहन से पूछना चाहता हूं- क्या मैंने जो कहा है उसमें कुछ गलत है? क्या भारत ऐसा देश नहीं होना चाहिए जहां हर सिख और हर भारतीय बिना किसी डर के अपने धर्म का पालन कर सके?’ राहुल ने कहा वह हमेशा उन मूल्यों के लिए बोलेंगे जो भारत को परिभाषित करते हैं- विविधता में हमारी एकता, समानता और प्रेम।

गांधी ने अमेरिका में दिए गए अपने बयान का एक छोटा विडियो भी शेयर किया, जिसमें वह एक सिख व्यक्ति का जिक्र कर रहे हैं। वॉशिंगटन डीसी के उपनगर वर्जीनिया के हर्नडॉन में भारतीय-अमेरिकियों की एक सभा में राहुल ने कहा था, ‘सबसे पहले, आपको यह समझना होगा कि लड़ाई किस बारे में है। यह लड़ाई राजनीति की नहीं है। लड़ाई इस बात पर है कि क्या उन्हें एक सिख के रूप में भारत में पगड़ी पहनने की अनुमति दी जाएगी या उन्हें एक सिख के रूप में भारत में कड़ा पहनने की अनुमति दी जाएगी। या फिर वह एक सिख के तौर पर गुरुद्वारे जा पाएंगे। लड़ाई इसी बात को लेकर है। और सिर्फ उनके लिए नहीं सभी धर्मों के लिए है।’

BJP ने कई सिख समूहों के संयुक्त बयान का हवाला देते हुए शनिवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी से अमेरिका में दिए बयान को वापस लेने को कहा। BJP नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने बताया कि कई सिख और गुरुद्वारा प्रबंधन निकायों ने इस मुद्दे पर गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय से मुलाकात की और उन्होंने कहा कि सिखों के बलिदान ने देश को मजबूत बनाया है। सिरसा ने कहा कि सिख संगठनों ने गांधी से बयान वापस लेने का आग्रह किया है क्योंकि यह उन्हें नुकसान पहुंचा रहा है। उन्होंने कहा कि गुरपतवंत सिंह पन्नू जैसी राष्ट्र विरोधी ताकतों ने गांधी की टिप्पणी का फायदा उठाया है।

आखिर इतनी बड़ी शांति के बाद क्यों बौखला गया है पाकिस्तान?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि इतनी बड़ी शांति के बाद अब पाकिस्तान क्यों बौखला गया है ! तुर्की के राष्‍ट्रपति एर्दोगान के कश्‍मीर मुद्दे पर चुप्‍पी साधने के बाद पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ बौखलाए हुए हैं। शहबाज शरीफ सरकार की पाकिस्‍तान में जमकर आलोचना हो रही है और कई राजनयिक सवाल उठा रहे हैं। इस बीच भारत की सैन्‍य तैयारी और दुनिया में अकेले पड़ते पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की बौखलाहट शुक्रवार को संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा की बैठक में साफ दिखाई दी। शहबाज शरीफ ने अपने वार्षिक भाषण में कहा कि भारत की मोदी सरकार एलओसी को पार करके पीओके पर कब्‍जा करना चाहती है। शहबाज ने गीदड़भभकी दी कि अगर भारत ऐसा करता है तो पाकिस्‍तानी सेना निर्णायक कार्रवाई करेगी। उन्‍होंने यह भी दावा किया कि भारत परमाणु हमले के तहत सीमित युद्ध की तैयारी कर रहा है। दरअसल, दोस्‍त तुर्की के भी किनारा करने के बाद कश्मीर मुद्दे को उठाने के प्रयास में पाकिस्‍तान अब वैश्विक स्तर पर अलग-थलग पड़ चुका है। इसको लेकर पाकिस्‍तान के राजनयिक हलके में बहस शुरू हो गई है। पाकिस्‍तान के अंदर इसे भारत की जीत करार दिया जा रहा है। पाकिस्‍तान के अखबार डॉन ने पाकिस्‍तान के विदेश मंत्रालय की प्रवक्‍ता मुमताज जहरा बलोच के हवाले से कहा, ‘हमें एक बयान कोई अनुचित निष्‍कर्ष नहीं निकालना चाहिए।’ वहीं पाकिस्‍तान की पूर्व राजनयिक मलीहा लोदी ने माना कि तुर्की अपनी पुरानी नीति से पलट गया है।

मलीहा लोदी ने एक्‍स पर लिखा, ‘पिछले 5 साल से उलट राष्‍ट्रपति एर्दोगान ने अपने महासभा में दिए भाषण में कश्‍मीर का ज‍िक्र नहीं किया। एर्दोगान ने साल 2019, 2020, 2021 2022 और साल 2023 में कश्‍मीर का मुद्दा उठाया था।’ मलीहा लोदी संयुक्‍त राष्‍ट्र में पाकिस्‍तान की पूर्व राजदूत रह चुकी हैं। यही नहीं पाकिस्‍तान के अमेरिका में राजदूत रह चुके हुसैन हक्‍कानी ने भी शहबाज सरकार पर निशाना साधा है। माना जा रहा है कि तुर्की को ब्रिक्‍स की सदस्‍यता चाहिए और यह बिना भारत की सहमति के संभव नहीं है। इसी वजह से एर्दोगान ने पाकिस्‍तान को धोखा दे दिया।

एर्दोगान के इस फैसले को भारत और तुर्की के बीच बढ़ते आर्थिक संबंधों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। इस पूरे घटनाक्रम से बौखलाए शहबाज शरीफ ने संयुक्‍त राष्‍ट्र में गीदड़भभकी दे दी। शरीफ ने दावा किया कि भारत एक औचक हमला और परमाणु हमले के तहत सीमित युद्ध की तैयारी कर रहा है ताकि वह पाकिस्तान के कब्जे में मौजूद कश्मीर के हिस्से पर कब्जा कर सके। उन्होंने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के कहानी की तरफ ध्यान आकर्षित करने के लिए काल्पनिक खतरे की बात कही।

पाकिस्तानी पीएम ने कहा, ‘मैं स्पष्ट शब्दों में कहना चाहता हूं कि पाकिस्तान किसी भी भारतीय हमले का सबसे निर्णायक तरीके से जवाब देगा।’ पाकिस्तान के साथ कारगिल युद्ध समेत तीन युद्ध की विभीषिका को देखते हुए यह अशुभ संकेत है। शरीफ ने जोर देकर कहा कि ‘भारत ने बिना सोचे-समझे पाकिस्तान के पारस्परिक, रणनीतिक, संयमित शासन के प्रस्तावों को ठुकरा दिया है’ और ‘इसके नेतृत्व ने अक्सर नियंत्रण रेखा पार करने’ और उसके कब्जे वाले क्षेत्रों पर कब्जा करने की धमकी दी है।

शरीफ ने बातचीत शुरू करने के लिए अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर के संबंध में किए गए बदलावों को रद्द करने की शर्त रखी। दूसरी ओर, भारत बातचीत शुरू करने से पहले चाहता है कि पाकिस्तान सीमा पार से आतंकवाद को समर्थन देना बंद करे। शरीफ ने कहा, ‘स्थायी शांति सुनिश्चित करने के लिए भारत को 5 अगस्त 2019 से उठाए गए एकतरफा और अवैध उपायों को वापस लेना चाहिए तथा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा प्रस्तावों और कश्मीरी लोगों की इच्छाओं के अनुसार जम्मू-कश्मीर विवाद के शांतिपूर्ण समाधान के लिए बातचीत शुरू करनी चाहिए।’

हालांकि, वास्तव में, 21 अप्रैल 1948 को अपनाए गए सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 47 के अनुसार, पाकिस्तान सरकार को सबसे पहले जम्मू-कश्मीर से अपने सभी सैनिकों और घुसपैठियों को वापस बुलाना होगा। उस प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि इस्लामाबाद कश्मीर में हमले जारी रखने वाले आतंकवादियों को धन या हथियार नहीं देगा, जिसे पाकिस्तान नजरअंदाज करता है। अब तक बोलने वाले विश्व नेताओं में से किसी ने भी कश्मीर का जिक्र तक नहीं किया है।शरीफ ने दावा किया कि भारत एक औचक हमला और परमाणु हमले के तहत सीमित युद्ध की तैयारी कर रहा है ताकि वह पाकिस्तान के कब्जे में मौजूद कश्मीर के हिस्से पर कब्जा कर सके। खुद को अलग-थलग पड़ते देख शरीफ ने कश्मीर मुद्दे को फिलिस्तीन से जोड़ने की कोशिश की, जिस पर पूरी दुनिया का ध्यान है।

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने ऐप कैब में यौन उत्पीड़न के आरोप के लिए कंपनी को 5 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है

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गुस्से में बस कंडक्टर को दरवाजे से हटने को कहा! पुलिस ने युवक को बेंगलुरु से गिरफ्तार कर लिया
बेंगलुरु में एक यात्री बस में एक यात्री की कंडक्टर से बहस हो गई. वह दरवाजे के सामने खड़ा था. जब कंडक्टर ने उसे हटने के लिए कहा तो उसने कथित तौर पर कंडक्टर पर चाकू से हमला कर दिया। एक युवक भीड़ भरी बस के दरवाजे की चौखट पर खड़ा था। उन्हें बार-बार नीचे खड़े होने के लिए कहा गया. लेकिन युवक ने जिद की, दरवाजे से बिल्कुल मत हटना। बस के अन्य यात्रियों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा था. बहस के बीच अचानक युवक ने अपनी जेब से चाकू निकाल लिया। बस कंडक्टर पर हमला कर दिया. चाकू लगने से कंडक्टर गंभीर रूप से घायल हो गया. बाद में युवक को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया गया।

यह घटना मंगलवार रात बेंगलुरु के आईटीपीएल बस स्टैंड के सामने हुई। यात्री बस में स्वचालित दरवाजे की व्यवस्था थी। यानी बस के दरवाजे अपने आप बंद और खुलेंगे। नतीजतन, युवक बस के प्लेटफार्म पर दरवाजे के सामने खड़ा था और उसे दरवाजा खोलने और बंद करने में परेशानी हो रही थी। इसीलिए कंडक्टर उसे अंदर खड़े रहने के लिए कहता रहा. जिससे उनमें बहस होने लगी। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि युवक ने अचानक अपनी जेब से चाकू निकाला और कंडक्टर के ऊपर चढ़ गया. उन्होंने कंडक्टर को कई थप्पड़ मारे.

अचानक हुए हमले से बस यात्रियों में भगदड़ मच गई। यात्री जल्दी-जल्दी बस से उतरने लगे। आरोपी ने अन्य यात्रियों को भी चाकू दिखाकर धमकाया। ड्राइवर ने बस रोक दी. खाली बस में युवक फंस गया और सभी लोग उतर गए। इसके बाद वह खिड़की का शीशा तोड़कर बाहर निकलना चाहता था. लेकिन यह संभव नहीं हो सका. पुलिस ने मौके पर जाकर युवक को गिरफ्तार कर लिया।

घायल कंडक्टर को बचाकर अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने बताया कि उनकी हालत स्थिर है. पुलिस ने युवक के खिलाफ हत्या के प्रयास का मामला दर्ज किया है। उन्हें पता चला कि युवक एक निजी कंपनी में काम करता है। कुछ दिन पहले उसकी नौकरी छूट गई। इसके बाद से पुलिस पूछताछ में युवक ने दावा किया है कि उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है. कर्नाटक हाई कोर्ट ने कार में यौन उत्पीड़न की शिकार महिला को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया. ऐप कैब कंपनी को वह रकम चुकानी होगी। हाई कोर्ट के जस्टिस एमजीएस कमल की एकल पीठ ने सोमवार को यह आदेश दिया. साथ ही कोर्ट ने कैब कंपनी को महिला को केस लड़ने के खर्च के लिए 50 हजार रुपये देने का आदेश दिया. इसके अलावा, न्यायाधीश ने कहा, ऑनलाइन कैब कंपनी की आंतरिक शिकायत समिति को पॉश अधिनियम, 2013 (कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम) के अनुसार उचित जांच करनी चाहिए। जज ने 90 दिन के अंदर जांच पूरी कर रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया.

घटना 2019 की है. कथित तौर पर, महिला ऑनलाइन बुक की गई कैब में चढ़ गई और ड्राइवर ने उसका यौन उत्पीड़न किया। घटना के बाद उन्होंने सबसे पहले संगठन से शिकायत की। महिला ने आरोप लगाया, लेकिन उस समय कैब एजेंसी की आंतरिक शिकायत समिति इस मामले की जांच करने को तैयार नहीं थी। ऐसे में उन्होंने कर्नाटक हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. आवेदन में अदालत को ऐप कंपनी की खोज करने का आदेश देने की मांग की गई थी। उन्होंने महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय से यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक निर्देश जारी करने का भी अनुरोध किया कि संगठन पॉश अधिनियम का अनुपालन करे।

मामले में पीड़िता के वकील ने कहा कि ऐप कैब कंपनी ट्रांसपोर्टेशन से जुड़ा है. इसलिए वाहन चालक के किसी भी कृत्य के लिए कंपनी उत्तरदायी है। उधर, ऐप कैब कंपनी के वकील ने कहा कि कंपनी से जुड़े ड्राइवर कंपनी के कर्मचारी नहीं हैं. वे अनुबंध के आधार पर काम करते हैं। उन्होंने अदालत से कहा, कानून के मुताबिक संगठन को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. दोनों पक्षों के बयान सुनने के बाद न्यायाधीश ने पीड़िता को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाई कोर्ट के जज की विवादित टिप्पणियों का जिक्र करते हुए कहा कि भारत के किसी भी हिस्से को पाकिस्तान नहीं कहा जा सकता. बुधवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाई कोर्ट के जज की आलोचना की.

प्रकाश कर्मियों का नया संघ किन समस्याओं का समाधान करेगा?

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“हमारे पास कोई गिल्ड नहीं था। इसलिए हमें उचित पारिश्रमिक नहीं मिल रहा था। इस गिल्ड का गठन वहीं से हुआ है”, संगठन के अध्यक्ष को बताया। महालय में नया मोड़. कई वर्षों से चली आ रही चर्चा के इस दिन बुधवार को स्क्रीन लाइटिंग वर्कर्स के नए गिल्ड का गठन किया गया। साढ़े चार सौ से अधिक सदस्य एक छतरी के नीचे एकत्र हुए। संगठन बनाने के बाद, संपादक सुब्रत माझी को बताया, “हम कई वर्षों से अभाव और अन्याय के शिकार रहे हैं। कोई गिल्ड न होने के कारण उचित देय से वंचित किया गया। इस मामले की चर्चा कई दिनों तक होती रही. अंततः, देवी पक्ष के लिए हमारा विचार साकार हो गया है।”

1926 के ट्रेड यूनियन अधिनियम के अनुसार, प्रकाश उपकरण श्रमिकों के इस संगठन को महालया से एक दिन पहले 1 अक्टूबर को गिल्ड प्रमाणपत्र प्राप्त हुआ। महालया में कार्यकर्ताओं की उपस्थिति में गिल्ड की औपचारिक घोषणा की गई। साथ ही उन्होंने एक प्रकाशित सर्कुलर में अपने विचार व्यक्त किये. इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ‘लाइट केयरटेकर’ के नाम से जाने जाने वाले इन कर्मचारियों के पास काम के कोई निश्चित घंटे नहीं हैं। कभी शूटिंग से दो घंटे पहले तो कभी एक दिन पहले गाड़ी जलाने से लेकर काम शुरू हो जाता है। इसके अलावा श्रमिकों के लिए तय समय के अनुसार कोई निश्चित पारिश्रमिक भी नहीं था. लेकिन अन्य तकनीशियनों को समय पर भुगतान मिलता है। इसके अलावा, ‘लाइट केयरटेकर’ के पारिश्रमिक को बढ़ाने का कोई प्रयास नहीं किया गया है, भले ही उनका पारिश्रमिक बाजार दरों में वृद्धि के साथ बढ़ता है।

संस्था के संपादक को एक उदाहरण दिया है. उनके शब्दों में, ”बांग्लादेश की फिल्म ‘तूफ़ान’ या अभी पुरुलिया में बनकर तैयार हुई फिल्म का पारिश्रमिक अब तक सभी को नहीं मिला है. किसी को नहीं पता कि बकाया का भुगतान होगा भी या नहीं. कोई भी निर्देशक या निर्माता हमारी ज़रूरतें नहीं सुनता। आधिकारिक दस्तावेज़ दिखाने के लिए कहें. जो संगठन की कमी के कारण हमारे पास नहीं है। हम फेडरेशन अध्यक्ष के रूप में बिस्वास से संपर्क करने के लिए मजबूर हैं। यूनियन बनाने को कहा. उन्होंने हमारी स्थिति पर विचार किया है।” अब बाकी फेडरेशन की मंजूरी.

फेडरेशन नई गिल्ड को कब मंजूरी देगा? साथ ही, सवाल यह भी है कि क्या एक और नया संघ टॉलीवुड के लिए लाभ का स्रोत बनेगा या समस्या?

फेडरेशन अध्यक्ष से सवाल पूछा। उन्होंने कहा, ”फेडरेशन के अंतर्गत 26 गिल्ड हैं. वह निर्णय होगा जो प्रत्येक गिल्ड अध्यक्ष, सचिव मिलकर लेंगे। यह समय की बात है।” दूसरे प्रश्न के उत्तर में उनके अनुसार गिल्ड का अर्थ है मिलकर काम करना। जो टॉलीवुड के लिए अच्छा है. इसलिए वह ‘लाइट केयरटेकर’ कार्यकर्ताओं को इस प्रयास के लिए बधाई देते हैं।

क्या टालीगंज के निर्माता, निर्देशकों के माथे पर यह नया गिल्ड झुक रहा है? अन्य गिल्डों की तरह, यह गिल्ड फेडरेशन की बड़ी छत्रछाया में आता है, इस डर से कि यदि भविष्य में इसके किसी सदस्य को अभाव का सामना करना पड़ता है, तो संगठन उसके लिए लड़ने के लिए एकजुट हो सकता है। यदि हां, तो क्या प्रोडक्शन कंपनी या निदेशक भविष्य में कोई और विचार करेंगे? ने पता लगाने के लिए निदेशकों राज चक्रवर्ती, अतनु घोष, परमब्रत चटर्जी, कौशिक गंगोपाध्याय से संपर्क किया। निर्माताओं की सूची में अतनु रॉयचौधरी, श्यामसुंदर डे शामिल थे। लेकिन फिलहाल बिना जानकारी के कोई भी मुंह खोलने को तैयार नहीं है. अतानु के अलावा बाकी निदेशकों से फोन पर संपर्क नहीं हो सका। प्रोड्यूसर्स ने भी इस मुद्दे से किनारा कर लिया है.

शनिवार को फेडरेशन के कुछ पत्र सामने आए. उसके बाद मेरे मन में कुछ सवाल आये. मैं इसे सोशल मीडिया पर शेयर करता हूं. इसके बाद ये पोस्ट वायरल हो गया है. इसी संदर्भ में अंडाबाजार ने ऑनलाइन सवाल पूछे। जानना चाहा, फेडरेशन के एकुशी कानून और फेडरेशन अध्यक्ष के खिलाफ कई लोगों की शिकायतें। इसका ताजा उदाहरण एक हेयर स्टाइलिस्ट की आत्महत्या का प्रयास है जो हेयरड्रेसर्स गिल्ड का सदस्य था। उस बिंदु से आनंदबाजार ऑनलाइन ने प्रश्न मुझ पर छोड़ दिए।
इस बार जवाब देने की बारी मेरी है. मेरी राय में, बिल्कुल ऐसा ही। उत्पादन देखने वाला व्यक्ति आमतौर पर फेडरेशन से संपर्क करता है। मैंने हमेशा निर्माता के साथ अनुबंध के अनुसार फिल्म का रचनात्मक पक्ष देखा है। चूंकि मैंने खुद कभी कोई फिल्म नहीं बनाई है, इसलिए मुझे अब तक फेडरेशन के पहलू पर गौर करने का मौका नहीं मिला है। समय-समय पर प्रोडक्शन की ओर से कहा गया होगा कि दो और असिस्टेंट डायरेक्टर ले लिए जाएं. ज्यादातर मामलों में उन्हें प्रोडक्शन से काम पर रखा गया था, मुझे बताया भी नहीं गया। मैंने दो या तीन नियमित सहायकों के साथ आराम से काम किया।

कई सालों तक मैंने अपनी फिल्मों का बजट भी नहीं बनाया। शूटिंग में कितने दिन लगेंगे, कैमरामैन, संपादक, कला या संगीत निर्देशक के रूप में किसकी आवश्यकता होगी, किस भूमिका के लिए कौन सा अभिनेता चाहिए या क्या किसी विशेष उपकरण या प्रकाश व्यवस्था की आवश्यकता होगी – ये वो बातें हैं जो मैं शॉट के बारे में बताता हूं डिविजन, लोकेशन सेलेक्शन, एक्टर्स की वर्कशॉप, ये सब चीजें मन कभी-कभी कुछ कहना हो तो प्रोड्यूसर की बात सुननी पड़ती है, ‘सोचने की जरूरत नहीं है बहन, आप अपने दिमाग से पिक्चर बनाओ!’
और मैं इन सबके बारे में चिंता करने के लिए साल-दर-साल तस्वीरें नहीं बनाता!

शनिवार को फेडरेशन के कुछ पत्र सामने आए. उसके बाद मेरे मन में कुछ सवाल आये. मैं इसे सोशल मीडिया पर शेयर करता हूं. इसके बाद ये पोस्ट वायरल हो गया है. इसी संदर्भ में अंडाबाजार ने ऑनलाइन सवाल पूछे। जानना चाहा, फेडरेशन के एकुशी कानून और फेडरेशन अध्यक्ष के खिलाफ कई लोगों की शिकायतें। इसका ताजा उदाहरण एक हेयर स्टाइलिस्ट की आत्महत्या का प्रयास है जो हेयरड्रेसर्स गिल्ड का सदस्य था। उस बिंदु से आनंदबाजार ऑनलाइन ने प्रश्न मुझ पर छोड़ दिए।

इस बार जवाब देने की बारी मेरी है. मेरी राय में, बिल्कुल ऐसा ही। उत्पादन देखने वाला व्यक्ति आमतौर पर फेडरेशन से संपर्क करता है। मैंने हमेशा निर्माता के साथ अनुबंध के अनुसार फिल्म का रचनात्मक पक्ष देखा है। चूंकि मैंने खुद कभी कोई फिल्म नहीं बनाई है, इसलिए मुझे अब तक फेडरेशन के पहलू पर गौर करने का मौका नहीं मिला है। समय-समय पर प्रोडक्शन की ओर से कहा गया होगा कि दो और असिस्टेंट डायरेक्टर ले लिए जाएं. ज्यादातर मामलों में उन्हें प्रोडक्शन से काम पर रखा गया था, मुझे बताया भी नहीं गया। मैंने दो या तीन नियमित सहायकों के साथ आराम से काम किया।

कई सालों तक मैंने अपनी फिल्मों का बजट भी नहीं बनाया। शूटिंग में कितने दिन लगेंगे, कैमरामैन, संपादक, कला या संगीत निर्देशक के रूप में किसकी आवश्यकता होगी, किस भूमिका के लिए कौन सा अभिनेता चाहिए या क्या किसी विशेष उपकरण या प्रकाश व्यवस्था की आवश्यकता होगी – ये वो बातें हैं जो मैं शॉट के बारे में बताता हूं डिविजन, लोकेशन सेलेक्शन, एक्टर्स की वर्कशॉप, ये सब चीजें मन कभी-कभी कुछ कहना हो तो प्रोड्यूसर की बात सुननी पड़ती है, ‘सोचने की जरूरत नहीं है बहन, आप अपने दिमाग से पिक्चर बनाओ!’

हाल ही में डायरेक्टर्स गिल्ड के साथ फेडरेशन के विवाद के बारे में कुछ चर्चा हुई थी, मैं फेसबुक पर कुछ पोस्ट देख रहा था, लेकिन डायरेक्टर्स गिल्ड की ओर से किसी ने भी मुझे कुछ नहीं बताया। हाल ही में WFSW प्लस के सुदिप्ता-विद्दीप्ता-चैती-अनन्या-सवर्णी आदि सदस्यों से हेयर ड्रेसर के आत्महत्या के प्रयास और उसके पूर्व इतिहास के बारे में पता चला। मैं नवगठित संगठन का सक्रिय सदस्य भी हूं। इसके बाद कल एक डायरेक्टर ने मुझे डायरेक्टर की संस्था का एक फेसबुक पोस्ट फॉरवर्ड किया. मैंने वाजिब सवाल उठाया है.

बंदी रियल ‘रैंचो’ सोनम वांगचुक, लेह के पास राष्ट्रीय सड़क नंबर 1 नाकाबंदी समर्थक

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सोनम लद्दाख को राज्य का दर्जा दिलाने के लिए लड़ रही हैं। उन्होंने मांग की कि केंद्र को लद्दाख को राज्य का दर्जा देने के बारे में सोचना चाहिए. पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को सोमवार आधी रात को विरोध प्रदर्शन करते समय सिंघु बॉर्डर पर गिरफ्तार कर लिया गया। करीब 150 लद्दाख निवासियों को भी गिरफ्तार किया गया है. इस घटना का विरोध करते हुए इस बार गुस्साए समर्थकों ने लेह के पास नेशनल हाईवे नंबर 1 को जाम कर दिया.

कई समर्थकों ने लेह के फियांग शहर से लगभग 6 किमी दूर राष्ट्रीय राजमार्ग 1 को अवरुद्ध कर दिया। सोनम की गिरफ्तारी के विरोध में सड़कें जाम कर दी गईं. नाकाबंदी के कारण सैकड़ों कारें सड़क के उस पार खड़ी हो गईं। 50 मालवाहक ट्रक भी फंसे रहे. नाकाबंदी. काफी देर की मशक्कत के बाद स्थिति सामान्य हो सकी.

सोमवार शाम को, सोनम ने केंद्र से उनकी मांगों पर लद्दाख नेतृत्व के साथ एक और चर्चा करने का आग्रह करने के लिए लेह से नई दिल्ली तक विरोध मार्च का आह्वान किया। जुलूस में कई लोग शामिल हुए. लेकिन जैसे-जैसे रात हुई, सोनम समेत करीब 150 लोगों को दिल्ली पुलिस ने सिंघु बॉर्डर पर गिरफ्तार कर लिया. इनमें कई अनमने लोग भी थे. उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 163 के तहत हिरासत में लिया गया। विपक्षी नेता राहुल गांधी ने भी दिल्ली पुलिस के काम की आलोचना की है. अन्य हलकों में इसकी आलोचना शुरू हो गई है. राहुल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा, ‘किसान आंदोलन की तरह ये चक्र भी एक दिन टूटेगा. उस दिन तुम्हारी मूर्ति भी कुचल दी जायेगी। ”लद्दाख क्या चाहता है, एक दिन तुम्हें सुनना ही पड़ेगा.”

संयोग से, सोनम लंबे समय से लद्दाख को राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने मांग की कि केंद्र लद्दाख को राज्य का दर्जा देने की मांग पर चर्चा करे। संविधान की छठी अनुसूची के तहत लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाना चाहिए। लद्दाख के लिए एक अलग लोक सेवा आयोग का गठन किया जाना चाहिए। साथ ही लेह और कारगिल जिलों के लिए अलग-अलग लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था की जानी चाहिए। वास्तविक जीवन का ‘रैंचो’ बार-बार ऐसी मांगों के साथ आगे आता रहा है। पिछले महीने भी सोनम ने केंद्र को चेतावनी दी थी कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो वह 28 दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठेंगी. इससे पहले इसी साल मार्च में वांगचुक 21 दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठे थे. उन 21 दिनों तक उन्होंने नमक और पानी के अलावा कुछ भी नहीं खाया। मांग एक ही थी कि लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए.

जम्मू और कश्मीर को एक राज्य के रूप में अपना दर्जा फिर से मिल गया, लेकिन लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश बना रहा। बता दें कि केंद्र इस बार लद्दाख को राज्य का दर्जा देने की मांग पर चर्चा करेगा। वास्तविक जीवन के ‘रैंचो’ जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की तलाश है। उन्होंने केंद्र के लिए 15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस) तक बातचीत शुरू करने की चरम सीमा भी तय की। वांगचुक ने कहा, अन्यथा वह स्वतंत्रता दिवस से 28 दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठेंगे।

संयोग से, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी इस सप्ताह कारगिल विजय दिवस मनाने के लिए द्रास गए थे। समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए एक साक्षात्कार में वांगचुक ने कहा कि लेह एपेक्स बॉडी (एबीएल) और लद्दाख के कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) दोनों ने प्रधानमंत्री को अपनी मांगें सौंपी हैं। उन्होंने कहा, ”हम चुनाव के दौरान सरकार पर अधिक दबाव नहीं बनाना चाहते थे. हम चाहते हैं कि सरकार को चुनाव के बाद भी कुछ सांस लेने का समय मिले। मुझे उम्मीद है कि नई सरकार निश्चित तौर पर सकारात्मक कदम उठाएगी।”

वांगचुक ने आगे कहा, “दावा प्रस्तुत कर दिया गया है। हमें उम्मीद है कि उस मांग पत्र को देखने के बाद हमारे नेताओं को चर्चा के लिए बुलाया जाएगा. यदि नहीं, तो हम 15 अगस्त से विरोध प्रदर्शन का एक और दौर शुरू करेंगे। उन्होंने कहा कि अगर शर्तें पूरी नहीं हुईं तो वह आगामी स्वतंत्रता दिवस से 28 दिनों की भूख हड़ताल शुरू करेंगे. वांगचुक ने दावा किया कि केंद्र ने लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने का वादा किया है लेकिन यह अभी तक पूरा नहीं हुआ है। वांगचुक इसके लिए केंद्र पर उद्योगपतियों के एक वर्ग के दबाव को जिम्मेदार मानते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ उद्योगपति लद्दाख के खनिज भंडार का दुरुपयोग करने की कोशिश कर रहे हैं.

संयोग से, इस साल की शुरुआत में मार्च में वांगचुक 21 दिनों की भूख हड़ताल पर बैठे थे। उन 21 दिनों में नमक और पानी के अलावा और कुछ नहीं लिया गया। मांगें अब भी वही थीं. लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाना चाहिए। इस बार वांगचुक उसी मांग को लेकर एक बार फिर भूख हड़ताल पर बैठने जा रहे हैं.

मरीज-डॉक्टर एक ही पक्ष, धर्मतल्ला मंच से संदेश, सीबीआई का सामना, दिल्ली में प्रदर्शन!

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जूनियर डॉक्टरों ने दूसरी बार हड़ताल का फैसला किया है. इसे लेकर तरह-तरह के सवाल उठने लगे हैं. इस बार जूनियर डॉक्टरों ने धर्मतला मंच से अपनी स्थिति और स्पष्ट कर दी. आरजी टैक्स घटना के विरोध में जूनियर डॉक्टर बुधवार को फिर कोलकाता की सड़कों पर उतरे. उन्होंने कॉलेज स्क्वायर से धर्मतला तक मार्च किया. जुलूस के बाद बैठक हुई. पिछले कार्यक्रमों की तरह, वरिष्ठ डॉक्टरों ने बुधवार को जूनियर डॉक्टरों से हाथ मिलाया। मार्च में नागरिक समाज भी शामिल हुआ. फिर से पूरी हड़ताल क्यों हुई, इसका स्पष्टीकरण भी धर्मतल्ला की बैठक से दिया गया. साथ ही यह समझाने की कोशिश की गई कि राज्य सरकार ही आंदोलन की एकमात्र दिशा नहीं है. उतना ही सी.बी.आई. जरूरत पड़ने पर सीबीआई के खिलाफ संगठित आंदोलन की भी चेतावनी दी गयी. यह संदेश भी आया कि डॉक्टर मरीज़ों और उनके परिवारों से अलग पक्ष नहीं हैं. धर्मतल्ला की बैठक में जूनियर डॉक्टरों के समक्ष यह प्रस्ताव भी रखा गया कि क्या लोगों की चिंता को देखते हुए हड़ताल के अलावा आंदोलन में कोई अन्य कार्यक्रम अपनाया जा सकता है. वे राजनेता भी सामने आए जो आंदोलन को अपने हितों के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं।

आंदोलनकारी जूनियर डॉक्टरों के प्रतिनिधि देबाशीष हलदर का दावा है कि सरकार का एक वर्ग जूनियर डॉक्टरों को ‘सार्वजनिक दुश्मन’ बनाने की कोशिश कर रहा है। देबाशीष ने दावा किया कि यह विचार फैलाने की कोशिश की जा रही है कि लोगों के बारे में सोचे बिना हड़ताल की जा रही है. उन्होंने कहा, ”किसी मरीज की मौत उसके परिवार के लिए उतना ही दुखदायी होती है, जितना एक डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी के लिए. क्या आप जानते हैं कि हमें हड़ताल पर लौटने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ा? हम एक सद्भावना देखना चाहते थे. लेकिन अब राज्य सरकार वह सद्भावना नहीं दिखा रही है. वे खेल रहे हैं. डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी एक पक्ष हैं. मरीज़ दूसरी तरफ हैं. लेकिन हम कहना चाहते हैं, डॉक्टर-नर्स-स्वास्थ्यकर्मी-मरीज-परिवार सब एक तरफ हैं. अगर विपरीत पक्ष में कोई है तो वह राज्य सरकार है।

देबाशीष ने उन विभिन्न सवालों के बारे में भी बताया जिनका जूनियर डॉक्टरों को हड़ताल के कारण सामना करना पड़ रहा है। क्या मरीजों की मौत के लिए सिर्फ सरकार जिम्मेदार है? जूनियर डॉक्टर नहीं? ऐसे सवाल उन्हें सुनने पड़ते हैं. धर्मतला सभा के देबाशीष ने कहा कि वे काम पर लौटना चाहते हैं. लेकिन स्वास्थ्य सचिव नारायणस्वरूप निगम को हटाया जाना चाहिए और उनकी मांगें सरकार को माननी चाहिए. उन्होंने कहा, ”हम जनता के दुश्मन नहीं हैं. हम हड़ताल पर जाना चाहते हैं. अभी उठाना चाहते हैं. लेकिन अगर मांगें पूरी नहीं हुईं तो क्या होगा? हम इस जगह से कैसे सुरक्षित महसूस कर सकते हैं? लेकिन हम साबित कर देंगे कि डॉक्टर-मरीज़ सब एक पार्टी हैं. जो लोग विपरीत दिशा में हैं, वे एक पक्ष चुन लें। वे इस बैठक के पक्ष में नहीं आएंगे या इसके विपरीत आंदोलन को धूमिल करना चाहेंगे. हम समय देते हैं. हम हर घंटे का हिसाब रखेंगे।”

जूनियर डॉक्टरों के मंच से भी सीबीआई को संदेश आया. जूनियर डॉक्टरों ने संदेश दिया कि उनके आंदोलन की दिशा सिर्फ राज्य सरकार की ओर नहीं, बल्कि सीबीआई की ओर भी है. उन्होंने केंद्रीय जांच एजेंसी के वकीलों की भूमिका पर सवाल उठाए. वे शीर्ष अदालत और निचली अदालतों में सीबीआई वकीलों की भूमिका में ‘अत्यधिक गैरजिम्मेदारी’ देखते हैं। जूनियर डॉक्टर इस बात पर भी संदेह व्यक्त करते हैं कि पिछले दिनों जिन मामलों की जांच सीबीआई ने अपने हाथ में ली है, उनमें से कितने का अंतत: समाधान हो पाया है. उन्हें डर है कि अगर आंदोलन को जिंदा नहीं रखा गया तो यह ‘सेटिंग’ बन सकता है. मंच से संदेश आया, ”हम इस सेटिंग की इजाजत नहीं देंगे. जरूरत पड़ी तो हम दिल्ली जायेंगे. हम मिलकर अपनी आवाज उठाएंगे.’ राज्य सरकार ही हमारे आंदोलन की एकमात्र दिशा नहीं है. लेकिन, गैरजिम्मेदार राज्य सरकार ही आंदोलन की दिशा है. लेकिन ये दबाव सीबीआई को भी महसूस होना चाहिए.’

हालांकि जूनियर डॉक्टर बुधवार को दूसरी बार हड़ताल करने के फैसले पर बार-बार सफाई देते दिखे. वे उन मरीजों के बारे में भी बताते हैं जिन्हें वे ध्यान में रख रहे हैं। उनका तर्क है कि अगर उन्हें हड़ताल की राह से हटना होगा तो वे आम लोगों के बारे में सोचकर यह फैसला लेंगे. किसी का ‘नैतिक ज्ञान’ सुनकर नहीं.

वरिष्ठ डॉक्टरों का एक समूह शुरू से ही पीड़ितों के लिए न्याय की मांग कर रहे जूनियर डॉक्टरों के आंदोलन का समर्थन करता नजर आया है. बुधवार को जूनियर डॉक्टरों के कार्यक्रम में वरिष्ठ डॉक्टरों के कई संगठनों के मिलन मंच ‘ज्वाइंट प्लेटफॉर्म ऑफ डॉक्टर्स’ के प्रतिनिधि पुण्यब्रत गुना भी मौजूद थे. उन्होंने कहा कि सीनियर डॉक्टर आंदोलन की शुरुआत से ही जूनियर डॉक्टरों के साथ हैं. जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल के पहले दौर में सीनियर डॉक्टरों ने करीब 50 दिनों तक ओवरटाइम काम किया है. सरब अस्पताल में ‘डर की राजनीति’ को लेकर भी चिंतित हैं। उन्होंने जूनियर डॉक्टरों को आने वाले दिनों में भी आंदोलन में खड़े रहने का संदेश दिया. पुण्यब्रत ने कहा, “जूनियर डॉक्टर काम पर वापस चले गए। मजबूरन उन्हें दोबारा यह कदम उठाना पड़ रहा है। हम अपने भाइयों और बहनों को ऐसी स्थिति में काम करने के लिए नहीं कह सकते जहां वे सुरक्षित महसूस नहीं कर सकें।” हालाँकि, इसके साथ ही जूनियर डॉक्टरों ने यह विनम्र अनुरोध किया कि आंदोलन के कार्यक्रम को आम लोगों के विचार में लिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा, ”हड़ताल के अलावा अन्य कार्यक्रम भी हो सकते हैं. जूनियर डॉक्टरों और वरिष्ठ डॉक्टरों दोनों द्वारा धरना, भूख हड़ताल या हड़ताल हो सकती है। आप यह देखकर निर्णय लेंगे कि लोग हमारे साथ रहें।” बुधवार के जुलूस में जूनियर डॉक्टरों के साथ अभिनेत्री सोहिनी सरकार भी चलीं. जुलूस के बाद उन्होंने मंच से भाषण दिया. वहीं, सोहिनी ने कहा, वे समझते हैं कि कुछ राजनेता इस आंदोलन का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ”हम समझते हैं कि वे अपने हितों के लिए आ रहे हैं. साल 2026 सामने है. यह विषय है

अक्षय की जिंदगी में सबसे कीमती क्या है? खिलाड़ी ने जवाब दिया, ”मैं उस एक मुद्दे पर समझौता नहीं करूंगा.”

अक्षय अब 57 साल के हैं। छोटी उम्र में ही उन्होंने एक्शन फिल्मों में अभिनय कर पहचान बना ली। लेकिन इस उम्र में भी अक्षय एक के बाद एक एक्शन फिल्में और एडवेंचरस गेम शो करते रहते हैं। अक्षय कुमार से पूछा गया कि उनकी जिंदगी की सबसे महंगी चीज क्या है? इसके जवाब में उन्होंने जो कहा, उसके जवाब की बहुतों को उम्मीद नहीं थी.

एक अभिनेत्री पत्नी, दो बच्चे, 33 साल का सफल बॉलीवुड करियर, प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा – अभिनेता अक्षय कुमार के पास अपने जीवन में रखने के लिए बहुत कुछ है। लेकिन, इनमें से किस एक्टर को पहले संभालना चाहते हैं? अक्षय ने एक पॉडकास्ट में उस सवाल का जवाब दिया. उन्होंने कहा, ”जो मेरे लिए सबसे कीमती है वह दुनिया के हर व्यक्ति को प्रिय होना चाहिए.” अभिनेता ने कहा, ”मुझे लगता है कि दुनिया का सबसे अमीर व्यक्ति वह है जिसके पास स्वस्थ शरीर और अच्छा स्वास्थ्य है.”

अक्षय अब 57 साल के हैं। छोटी उम्र में ही उन्होंने एक्शन फिल्मों में अभिनय कर पहचान बना ली। लेकिन इस उम्र में भी अक्षय एक के बाद एक एक्शन फिल्में और एडवेंचरस गेम शो करते रहते हैं। टाइगर श्रॉफ जैसे नई पीढ़ी के बॉलीवुड अभिनेताओं के साथ प्रतिस्पर्धा। अक्षय के लिए स्वास्थ्य कितना महत्वपूर्ण है, यह बताते हुए उन्होंने कहा, ”मैं काम के लिए बहुत कुछ कर सकता हूं। लेकिन मैं काम के लिए भी अपनी सेहत से कभी समझौता नहीं करूंगी.”

कई लोगों ने बचपन से ही ‘स्वास्थ्य ही धन है’ कहावत सीखी है। लेकिन अक्षय का जवाब साफ है, उन्होंने इस शब्द को आत्मसात कर लिया है. ये बॉलीवुड की सबसे पॉपुलर जोड़ियों में से एक हैं. अक्षय कुमार और ट्विंकल खन्ना की खुशहाल शादी अक्सर चर्चा में रहती है। लेकिन, ट्विंकल से शादी करने का फैसला करने से पहले अभिनेता की मानसिक स्थिति क्या थी?

17 जनवरी 2001 को अक्षय और ट्विंकल शादी के बंधन में बंध गए। अक्षय ने एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्हें नहीं पता था कि वह ट्विंकल से शादी करेंगे। अक्षय काम के सिलसिले में दिवंगत सुपरस्टार राजेश खन्ना के ऑफिस नियमित तौर पर जाते थे। ट्विंकल के साथ उनका प्यार भी फिल्म पर आधारित है। अक्षय के शब्दों में, ”मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरी शादी राजेश खन्ना की बेटी से होगी.”

हालांकि, इंडस्ट्री में कई लोगों को शुरुआत में नहीं पता था कि अक्षय-ट्विंकल शादी करेंगे। स्टार मेहंदी आर्टिस्ट वीना नागदा ने एक बार एक इंटरव्यू में कहा था, ”हम मेहंदी वाले दिन सुबह जाकर देखते हैं, ट्विंकल अभी भी बहुत साधारण ड्रेस में हैं।”

अक्षय ने हाल ही में अपनी नई फिल्म ‘भूत बांग्ला’ की घोषणा की है। ‘भूल भुलैया’ की रिलीज के करीब 14 साल बाद अक्षय प्रियदर्शन के साथ दोबारा फिल्म करने जा रहे हैं। यह फिल्म एक हॉरर कॉमेडी जॉनर की फिल्म है। हालांकि, मेकर्स का दावा है कि फिल्म काले जादू और अंधविश्वास के खिलाफ संदेश देगी। फिल्म की शूटिंग इस साल के अंत तक शुरू हो सकती है।

अक्षय कुमार का ‘बर्थडे बॉय’ अपने जन्मदिन पर पाई की जगह दूध का कटोरा खाकर खुश! बॉलीवुड के ‘खिलाड़ी’ ने सोमवार सुबह अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर एक ऐसी तस्वीर शेयर की है. उस तस्वीर में रहस्य की झलक है.

दरअसल, इसे तस्वीर की जगह ‘मोशन पोस्टर’ कहना ज्यादा बेहतर है। वहां सबसे पहले देखने वाली चीज़ एक काली बिल्ली की पूंछ है। इसके बाद अक्षय हाथ में दूध का कटोरा लिए नजर आए। उन्होंने अपनी जीभ उस तरफ बढ़ा दी है. लेकिन काली बिल्ली अपने कंधे पर रखते हुए, वह नायक के लालच को पसंद नहीं करता है।

अक्षय ने अपने जन्मदिन पर प्रशंसकों को लिखा, “इतने वर्षों में मेरे जन्मदिन पर आपने मुझे जो प्यार दिखाया है, उसके लिए धन्यवाद। इस साल का जन्मदिन आगामी फिल्म ‘भूत बांग्ला’ की पहली झलक साझा करके मना रहा हूं। मैं लगभग 14 साल बाद प्रियदर्शन के साथ दोबारा काम करने को लेकर बेहद उत्साहित हूं। यह स्वप्निल फिल्म लंबे इंतजार की शुरुआत है। मैं इस दौरे के अनुभव को आपके साथ साझा करने के लिए इंतजार नहीं कर सकता। जादू कैसे होता है यह जानने के लिए हमारे साथ बने रहें।” 2010 में अक्षय ने प्रियदर्शन की खट्टा-मीठा में अभिनय किया। प्रियदर्शन की हिंदी फिल्में पिछले कुछ सालों में ज्यादा नहीं देखी गई हैं। ‘रंगरेज’ 2013 में और ‘हंगामा 2’ 2021 में रिलीज हुई थी। अक्षय के साथ उनकी दूसरी फिल्म ‘भूत बांग्ला’ 2025 में रिलीज हो सकती है। माना जा रहा है कि इस फिल्म में डर का माहौल होगा. लेकिन मोशन पोस्टर में अक्षय के एक्सप्रेशन से पता चलता है कि इस फिल्म के हर कोने में हास्य का पुट होगा. हालांकि, अभी तक यह पता नहीं चल पाया है कि अक्षय के साथ और कौन सा स्टार रह रहा है।

2024 में अक्षय की ‘बड़े मिया छोटे मिया’, ‘सराफिरा’ रिलीज हुई हैं। लेकिन हीरो को ज्यादा सफलता नहीं मिली. वह फिल्म ‘स्त्री 2’ में कैमियो करते नजर आए थे। इसके बाद ‘खेल खेल में’ आने वाली है। इस फिल्म में अक्षय के साथ फरदीन खान, वाणी कपूर, एमी विर्क, तापसी पन्नू हैं। इस साल ‘स्काई फोर्स’ और ‘सिंघम अयान’ रिलीज होंगी।

एक ऐसे नेता जिनकी वजह से इंदिरा गांधी को देना पड़ा था इस्तीफा!

एक समय ऐसा भी था जब इंदिरा गांधी को एक नेता की वजह से इस्तीफा देना पड़ा था! दिग्गज कम्युनिस्ट नेता और सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी अब इस दुनिया में नहीं हैं। 12 सितंबर को 72 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। येचुरी राजनीतिक रूप से एक कट्टर कम्युनिस्ट थे, हालांकि, राजनीति में उन्होंने हमेशा व्यावहारिकता को प्राथमिकता दी। यही वजह है कि एक समय उन्होंने इंदिरा गांधी के खिलाफ ऐसा विरोध मार्च निकाला कि उन्हें इस्तीफा देने पर मजबूर होना पड़ा। हालांकि, जब सियासी हालात बदले तो ये दिग्गज कम्युनिस्ट नेता राहुल गांधी के ‘मेंटर’ बनने से भी नहीं हिचके। सीपीएम नेता येचुरी अपनी पीढ़ी के कई व्यावहारिक राजनेताओं की तरह विनम्र और मिलनसार थे, और सभी दलों के नेताओं के साथ अच्छे संबंध रखते थे। बीजेपी का उभार और केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनने के बाद सीताराम येचुरी उन कुछ सीपीएम नेताओं में से थे जिन्होंने कांग्रेस के साथ गठबंधन पर वैचारिक बहस करने से परहेज किया। उनकी सोच बस यही थी कि बीजेपी का मजबूती से मुकाबला किया जा सके। हालांकि, कांग्रेस को पहले कम्युनिस्टों का मुख्य विरोधी माना जाता था, लेकिन येचुरी ने बीजेपी को चुनौती देने के लिए उनके साथ गठबंधन को जरूरी समझा। 2024 के आम चुनावों के दौरान भी उन्होंने जोर देकर कहा कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी का मुकाबला राज्य-दर-राज्य गठबंधन के जरिए किया जाना चाहिए। चुनावी नतीजों ने उनकी इस सोच को कहीं न कहीं सही साबित भी किया।

दिलचस्प बात यह है कि सीपीएम के कट्टरपंथी नेता आज भी कांग्रेस के साथ पार्टी के गठबंधन को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं करते हैं। ये हाल तब है जब सीपीएम खुद ‘INDIA’ गठबंधन का हिस्सा है। एक छात्र नेता के रूप में येचुरी ने इंदिरा गांधी को जेएनयू के चांसलर पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया था। बाद में उनका व्यावहारिक राजनीति का रुख अपनाना इस घटना को और भी महत्वपूर्ण बना देता है। 1970 के दशक में नक्सलवाद से खुद को अलग रखना भी येचुरी की व्यावहारिक राजनीतिक समझ को दर्शाता है। नक्सलवादी आंदोलन, मार्क्सवादी विचारधारा की एक शाखा थी, जिसने चीन के कम्युनिस्टों के प्रति निष्ठा की घोषणा की थी। 2014 में जब मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने थे, तब येचुरी ने कहा था कि परिस्थितियां बदली हैं, इसलिए हमारा विश्लेषण और गठबंधन भी बदलना भी जरूरी है।

कुछ लोग उनकी तुलना एक अन्य व्यावहारिक कम्युनिस्ट नेता, हरकिशन सिंह सुरजीत से करते हैं, जो गठबंधन बनाने में माहिर थे। लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि दोनों नेताओं की सफलता दर में अंतर की एक बड़ी वजह यह है कि सुरजीत के समय में सीपीएम राजनीतिक रूप से अधिक मजबूत स्थिति में थी। येचुरी का मिलनसार और सरल स्वभाव बनावटी नहीं था। एक छात्र कार्यकर्ता के रूप में भी, वह दबंग या बड़े-बड़े बयान देने वाले नेता नहीं थे। वह बहस में शामिल होना पसंद करते थे, और अपनी बात चुटीले अंदाज में रखते थे। कई राजनेता, जिनमें कम्युनिस्ट भी शामिल हैं, भाषण देने के शौकीन होते हैं। येचुरी कभी ऐसे नहीं थे।

एक और खास बात यह थी कि अपने कई मार्क्सवादी साथियों के उलट, वो कठिन भाषा का इस्तेमाल नहीं करते थे। साथ ही, सैद्धांतिक मार्क्सवादियों के विपरीत, उनकी रुचि न केवल एक वर्ग बल्कि सामाजिक ग्रुप्स और धर्म में भी थी। वह समझते थे कि भारतीय समाज को समझने के लिए ये दोनों पहलू महत्वपूर्ण हैं। तेलुगु उनकी मातृभाषा थी। पार्टी फोरम और बैठकों में, वह अंग्रेजी पसंद करते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि राजनीतिक विचारों को इस भाषा में व्यक्त करना उनके लिए आसान है। लेकिन वे सार्वजनिक रूप से हिंदी में भाषण देते थे। पश्चिम बंगाल से राज्यसभा में अपने दो कार्यकाल के दौरान, उन्होंने बंगाली पत्रकारों के साथ बातचीत के दौरान बंगाली में बात करने की कोशिश की।

एक तेलुगु ब्राह्मण परिवार में जन्मे सीताराम येचुरी ने जनेऊ पहनने और श्लोक पढ़ने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि वह अपने परिवार में पहले कम्युनिस्ट थे। लेकिन उन्होंने प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में छिपी दार्शनिक बहसों को कभी नकारा नहीं। इस खुले विचारों ने बाद में उन्हें हिंदुत्व विचारधारा पर बहस करने में मदद की। उन्हें जानने वाले लोग कहते हैं कि एक राजनेता के रूप में येचुरी की एक खासियत यह थी कि वे पार्टियों और समूहों के बीच मतभेदों की बजाय समानताओं को तलाशने में ज्यादा रुचि रखते थे।

येचुरी की ये विशेषताएं संसद में उनके काम आईं, जहां उनकी अच्छी बोलचाल ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई। खासकर उस समय जब संसदीय हस्तक्षेप की गुणवत्ता गिरती जा रही थी। जब 2017 में उनका राज्यसभा कार्यकाल समाप्त हुआ, तो समाजवादी पार्टी के सांसद राम गोपाल यादव ने उनकी प्रशंसा की। वह अकेले नहीं थे, कई अन्य सांसदों ने भी महसूस किया कि सदन को येचुरी की कमी खलेगी। जैसे-जैसे वामपंथियों का जनाधार कम होता गया, वैसे-वैसे येचुरी सहित सीपीएम नेताओं का राष्ट्रीय राजनीति में महत्व भी कम होता गया। उनका स्वर्णिम दौर 2004 से 2008 के बीच माना जाता है। पहली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA-1) सरकार के गठन से लेकर उस समय तक जब तक सीपीएम ने भारत-अमेरिका परमाणु समझौते पर मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस नहीं ले लिया था।

भारतीय राजनेताओं, जिनमें कम्युनिस्ट भी शामिल हैं, उनके लिए सार्वजनिक रूप से आत्मनिरीक्षण करना कठिन होता है। लेकिन येचुरी उनमें बिल्कुल अलग थे। UPA-2 सरकार बनने के बाद उन्होंने स्वीकार किया था कि उनकी पार्टी मतदाताओं को परमाणु समझौते पर अपना रुख समझाने में सफल नहीं हो पाई थी। इसी वजह से कांग्रेस नीत गठबंधन को जबरदस्त जीत हासिल हुई। ऐसा करने वाले शायद वो पोलित ब्यूरो के अकेले सदस्य थे। बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की जीत ने सीपीएम और उसके नेताओं को ऐसा झटका दिया, जिससे वे अब तक उबर नहीं पाए हैं।

दिल्ली के एम्स में आईसीयू से जनरल वार्ड में शिफ्ट होने के दिन येचुरी का आखिरी सार्वजनिक संदेश आया था। रिकॉर्ड किया गया यह मैसेज एक अन्य कम्युनिस्ट नेता और बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को उनकी श्रद्धांजलि थी, जिनका हाल ही में निधन हो गया था। बीमार पड़ने से पहले येचुरी एक गहरे निजी दुःख से जूझ रहे थे। उन्होंने 2021 में अपने बेटे आशीष को कोविड के कारण खो दिया था। उनके करीबी लोगों के अनुसार, वो उसके बाद से पहले जैसे कभी नहीं रहे। एक पिता के तौर पर वो टूट गए थे। लेकिन यह एक राजनेता के तौर पर उनकी क्षमताओं का ही प्रमाण है कि व्यावहारिक कम्युनिस्ट के रूप में उन्होंने खुद को संभाला और आगे बढ़ते रहे।

बीजेपी और कांग्रेस की विचारधारा में क्या अंतर बता रहे हैं राहुल गांधी?

हाल ही में राहुल गांधी ने बीजेपी और कांग्रेस के विचारधारा में एक बड़ा अंतर बताया है! अमेरिका की अपनी यात्रा में राहुल गांधी की कुछ टिप्पणियों ने राजनीतिक विवाद को जन्म दिया। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने अपने राजनीतिक विचारों के बारे में क्या कहा और क्या नहीं कहा। उन्होंने कांग्रेस के दृष्टिकोण पेश किया, जिसमें दो मुख्य विषयों पर जोर दिया गया: निष्पक्षता और बहुलवाद। राहुल ने इसकी तुलना बीजेपी के दृष्टिकोण से की, जिसके बारे में उन्होंने दावा किया कि यह जाति पदानुक्रम और बहुसंख्यकवाद पर आधारित है। उन्होंने ऐसी व्यवस्था की भी निंदा की, जिसमें 90% लोगों को अवसर नहीं मिल पाते। लेकिन आरक्षण में वृद्धि सहित जाति जनगणना के नीतिगत निहितार्थों पर राहुल गांधी ने कहा कि यह इस पर निर्भर करेगा कि इन स्टडी में क्या निकलता है। यहां, विपक्ष के नेता जिस राजनीतिक दृष्टिकोण पर जोर दे रहे हैं उसमें एक महत्वपूर्ण अंतर देखा जा सकता है। दृष्टिकोण में वैचारिक मुद्दों की अधिकता है, जबकि मूल्य के मुद्दों पर कम। राजनीति विज्ञान में, एक वेलेंस मुद्दा (रोज़गार/भ्रष्टाचार/जीवन-यापन की लागत) मतदाताओं के बीच एक समान अपील वाला होता है, जबकि एक वैचारिक मुद्दा वह होता है जो विभिन्न वर्गों के बीच राय को विभाजित करता है।

भारत में, मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग है जो क्रॉस-कटिंग वेलेंस मुद्दों पर काम करने के लिए पार्टियों की क्षमता पर अपना मतदान विकल्प आधारित करता है। वैचारिक लगाव कमजोर हो सकता है। सिर्फ एक उदाहरण के लिए, बंगाल और त्रिपुरा में लंबे समय से हावी सीपीएम के नाटकीय पतन पर विचार करें। उनके बड़े ‘वामपंथी’ वोटिंग ब्लॉक का तेजी से लुप्त होना इस बात का संकेत है कि किसी पार्टी का सामाजिक समर्थन आधार काफी हद तक सत्ता-अधिग्रहण में उसकी विश्वसनीयता और सार्वजनिक वस्तुओं को वितरित करने की क्षमता से प्राप्त होता है। इन दो आकर्षक कारकों के बिना, वैचारिक स्थिति अप्रासंगिक हो जाती है।

राजनीतिक दार्शनिक जॉर्जेस सोरेल ने कहा कि एक राजनीतिक दृष्टि और कुछ नहीं बल्कि ‘सामाजिक मिथक’ है – भविष्य का एक प्रतीकात्मक, अक्सर काल्पनिक दृष्टिकोण जो व्यापक जनता को एक राजनीतिक ताकत के पीछे प्रेरित कर सकता है। यह विचारधारा से उच्च स्तर पर स्थित है, जो दृष्टि को प्राप्त करने का मार्ग बनाती है। राहुल के नेतृत्व में, कांग्रेस के जहाज ने धीरे-धीरे खुद को एक समतावादी वामपंथी ताकत के रूप में फिर से स्थापित किया है। पार्टी ने समझदारी से मतदाताओं के अपने कैचमेंट क्षेत्र को बढ़ाया है, विशेष रूप से उन क्षेत्रवादी, पिछड़ी जाति और अंबेडकरवादी निर्वाचन क्षेत्रों को आकर्षित किया है जो कभी इसे संदेह की दृष्टि से देखते थे। हालांकि, असमानता को कम करने का इसका मुख्य संदेश देश के विकास की एक आकर्षक दृष्टि से जोड़कर अधिक जोरदार तरीके से व्यक्त किया जा सकता है, जो सभी के लिए ऊपर की ओर गतिशीलता और विस्तारित आजीविका के अवसरों का वादा करता है।

इस साल की शुरुआत में सीएसडीएस-लोकनीति सर्वे में पाया गया कि बेरोजगारी लगभग दो-तिहाई मतदाताओं के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है। इसमें सबसे अधिक अनुपात ओबीसी, मुस्लिम और दलित मतदाताओं में पाया गया। मतदाताओं का बाकी हिस्सा न केवल सांप्रदायिक मुद्दों के प्रति सजग है, बल्कि रोटी-रोजी की चिंताओं से भी उतना ही जुड़ा हुआ है।

विकास का गुजरात मॉडल’ एक आकर्षक दृष्टि का निर्माण करता है। 2014 में, इस प्रतीक द्वारा प्रदान किए गए अभियान के सहारे मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी को लगभग तीन दशकों में पहली बार स्पष्ट बहुमत हासिल करने में मदद मिली। इसने तेजी से निजी-निवेश-आधारित विकास और इसी के अनुरूप रोजगार सृजन ‘न्यूनतम सरकार अधिकतम शासन’ के मंत्र के आधार पर की छवि को उभारा। पिछले 10 वर्षों में एनडीए के फीके प्रदर्शन ने इस दृष्टि को बुरी तरह से प्रभावित किया है। निजी निवेश का स्तर सकल स्थिर पूंजी निर्माण के संदर्भ में मापा गया प्रभावशाली नहीं रहा है, जबकि रोजगार सृजन स्थिर रहा है। विश्व बैंक ने बताया कि भारत में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर का 2022 में सकल घरेलू उत्पाद में 13% हिस्सा था, जो 2010 में 17% था यानी 4 प्रतिशत की गिरावट आई।

एनडीए 3.0 को रोजगार सृजन पर सवालों का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए, यह राहुल के लिए नौकरियों पर एक वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रदान करने का एक सुनहरा अवसर है। न केवल गरीब मतदाताओं से जुड़ने के लिए, बल्कि ‘मनमोहन सिंह-मिडल क्लास वर्ग’ के साथ कांग्रेस के संबंधों को फिर से जगाने के लिए भी। इस वर्ग ने 2009 में कांग्रेस को वोट दिया था, लेकिन पिछले दशक में भाजपा (या, दिल्ली में AAP) में चले गए। कांग्रेस देश के उदारीकरण के बाद के मध्यम वर्ग के शिल्पी के रूप में अपनी प्रतीकात्मक राजनीतिक पूंजी का निर्माण कर सकती है। अपने अमेरिकी दौरे में, राहुल ने बेरोजगारी संकट को संबोधित किया, एक बिंदु पर सुझाव दिया कि भारत उपभोक्ता-केंद्रित अर्थव्यवस्था से उत्पादन-केंद्रित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने में चीन और वियतनाम से सीख सकता है। इसके अलावा, उन्होंने मैन्यूफैक्चरिंग-बेस्ड अप्रोच की वकालत की और तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्यों द्वारा की गई प्रगति का हवाला दिया। सभी विचार दिलचस्प हैं लेकिन उन्हें बिना विस्तार के और असंबद्ध छोड़ दिया गया।

असंगत सुझावों के बजाय, शायद वे कांग्रेस की अपनी आर्थिक दृष्टि को मूर्त रूप दे सकते थे। चीन और वियतनाम जैसे देशों से भारत कौन से ठोस गवर्नेंस प्रैक्टिस अपना सकता है? तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्यों द्वारा अपनाई जाने वाली सर्वोत्तम पद्धतियां क्या हैं, और क्या इन्हें मिलाकर एक राष्ट्रीय मॉडल बनाया जा सकता है? आर्थिक नीति के मामले में नई कांग्रेस यूपीए-युग की कांग्रेस से किस तरह अलग है? क्या कांग्रेस नौकरशाही ढांचे में व्यापक सुधारों का समर्थन करती है? पार्टी राज्य-केंद्र संबंधों को किस तरह देखती है? शैक्षिक सुधारों, सामाजिक समानता और आर्थिक अवसरों पर कांग्रेस शासित राज्यों द्वारा उठाए गए कुछ प्रमुख उपाय क्या हैं? क्या पार्टी विकास के लिए I.N.D.I.A गठबंधन मॉडल या कांग्रेस विकास मॉडल की वकालत करती है?

कांग्रेस ने पहले ही खुद को सेंटर-लेफ्ट राजनीतिक समन्वय पर मजबूती से स्थापित कर लिया है, जो एक उपजाऊ सामाजिक आधार वाले क्षेत्र की ओर अग्रसर है। लेकिन जैसे जाल के जरिए मछली पकड़ने वाला जहाज अपना कैचमेंट इस तरह बढ़ाता है कि जाल को अधिक से अधिक क्षेत्र में फेंका जा सके, कांग्रेस को अब सबसे व्यापक संभव जाल बिछाने की जरूरत है, और ऐसा करने के लिए स्पष्ट रूप से सक्षम हाथों की जरूरत है।