Sunday, March 8, 2026
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हाल ही में गर्भपात पर क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गर्भपात पर एक बयान दे दिया गया है! सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट के एक प्रावधान पर सवाल उठाया है। इसमें 24 हफ्ते से ज्यादा के गर्भ को तब भी गिराने की इजाजत नहीं है, जब नाबालिग रेप पीड़िता से जुड़ा हो। कोर्ट ने कहा कि विधायिका का यह मूल्यांकन है कि एक असामान्य भ्रूण गर्भवती महिला के हालात पर सबसे ज्यादा विपरीत असर डालेगा। यानी किसी भी अन्य परिस्थितियों से ज्यादा विपरीत असर असामान्य भ्रूण के कारण होगा। अदालत ने कहा कि यह मूल्यांकन वैज्ञानिक मापदंडों पर आधारित नहीं लगता है। यह एक धारणा पर आधारित है कि एक असामान्य भ्रूण ही महिला को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाएगा। नाबालिग रेप पीड़िता के 28 हफ्ते की प्रेग्नेंसी टर्मिनेशन का मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रजनन स्वायत्ता और गर्भपात के फैसलों में गर्भवती की सहमति अहम होती है।

यदि किसी गर्भवती और उसके गार्जियन के बीच मतभेद है, तो नाबालिग या मानसिक रूप से बीमार गर्भवती की राय को न्यायिक फैसले लेने में अहम पहलू के रूप में लिया जाना चाहिए।नियम के तहत 24 हफ्ते के बाद टर्मिनेशन तभी होगा जब भ्रूण असामान्य हो और उससे महिला को इंजरी हो या फिर भ्रूण से महिला के जीवन को खतरा हो। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में रेप विक्टिम और नाबालिग के गर्भवती के मामले को शामिल न किए जाने पर सवाल किया है।सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि जब भी 24 हफ्ते से ज्यादा की प्रेग्नेंसी होती है तो उसके टर्मिनेशन के लिए संवैधानिक कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाता है। तब MTP एक्ट के तहत मेडिकल बोर्ड बनाया जाता है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि भ्रूण असमान्य तो नहीं है। साथ ही गर्भवती महिला की मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य का पता लगाया जाता है।

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट (MTP Act) कहता है कि दो ही स्थिति में गर्भ को गिराने पर पाबंदी नहीं होगी। पहला अगर मेडिकल प्रैक्टिशनर यह कहे कि यह महिला के जीवन को बचाने के लिए जरूरी है। दूसरी स्थिति में तब अगर धारा-3 (2-बी) के तहत भ्रूण असामान्य हो। सुप्रीम कोर्ट ने इस संदर्भ में कहा कि यह प्रावधान अतार्किक तौर पर स्वायत्ता को अलग करता है। कानून ने धारा 3(2-बी) में एक मूल्यांकन किया है कि असामान्य भ्रूण किसी महिला के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर किसी अन्य परिस्थिति से अधिक हानिकारक होगा। पहली नजर में यह मनमाना और अतार्किक लगता है।

शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि गर्भपात अधिनियम और मेडिकल बोर्ड को गर्भपात के लिए राय बनाते समय वेलफेयर को देखना चाहिए। महिला के शारीरिक और भावनात्मक कल्याण का आकलन करना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रजनन स्वायत्ता और गर्भपात के फैसलों में गर्भवती की सहमति अहम होती है। यदि किसी गर्भवती और उसके गार्जियन के बीच मतभेद है, तो नाबालिग या मानसिक रूप से बीमार गर्भवती की राय को न्यायिक फैसले लेने में अहम पहलू के रूप में लिया जाना चाहिए।

केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2021 में प्रेग्नेंसी टर्मिनेशन के लिए कानून में बदलाव करते हुए गर्भपात के लिए कुछ शर्तों के साथ मियाद 20 हफ्ते से बढ़ाकर 24 हफ्ते कर दी थी। इसके तहत विशेष कैटिगरी की महिलाओं के लिए प्रेग्नेंसी टर्मिनेशन की मियाद 24 हफ्ते कर दी गई थी। अदालत ने कहा कि यह मूल्यांकन वैज्ञानिक मापदंडों पर आधारित नहीं लगता है। यह एक धारणा पर आधारित है कि एक असामान्य भ्रूण ही महिला को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाएगा। नाबालिग रेप पीड़िता के 28 हफ्ते की प्रेग्नेंसी टर्मिनेशन का मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि जब भी 24 हफ्ते से ज्यादा की प्रेग्नेंसी होती है तो उसके टर्मिनेशन के लिए संवैधानिक कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाता है।इसमें रेप विक्टिम से लेकर शादी का स्टेटस बदले जाने की स्थिति में टर्मिनेशन की इजाजत दी गई थी। नियम के तहत 24 हफ्ते के बाद टर्मिनेशन तभी होगा जब भ्रूण असामान्य हो और उससे महिला को इंजरी हो या फिर भ्रूण से महिला के जीवन को खतरा हो। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में रेप विक्टिम और नाबालिग के गर्भवती के मामले को शामिल न किए जाने पर सवाल किया है। संवैधानिक कोर्ट के सामने कई ऐसे मामले आए और कोर्ट को दखल देना पड़ा। इस सवाल का जवाब विधायिका को तलाशना होगा, ताकि ऐसे विक्टिम को प्रोटेक्ट किया जा सके।

होने वाली बीमारियों को लेकर क्या बोला आईसीएमआर?

हाल ही में आईसीएमआर द्वारा होने वाली बीमारियों को लेकर एक बयान दिया गया है! आज की भाग-दौड़ भरी जिंदगी में स्वास्थ्य का ध्यान रखना हर किसी के लिए बेहद जरूरी है। इसमें आपके खान-पान का भी अहम रोल होता है। हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय पोषण संस्थान (NIN) ने करीब 13 साल के अंतराल पर भारतीयों के लिए भोजन संबंधी गाइडलाइंस को संशोधित किया है। एनआईन ने वैज्ञानिक निष्कर्षों, जीवनशैली में बदलाव, बीमारियों और खान-पान की आदतों को ध्यान में रखते हुए जरूरी दिशा-निर्देश जारी किए है। इसमें भारतीय लोगों को कम तेल, चीनी, प्रोटीन सप्लीमेंट से बचने की सलाह दी गई है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने बुधवार को बताया कि भारत में 56.4 फीसदी बीमारियों का कारण अनहेल्थी खाने का सेवन करना है। आईसीएमआर ने आवश्यक पोषक तत्वों की आवश्यकताओं को पूरा करने, मोटापा और डायबिटीज जैसी बीमारियों से बचने के लिए 17 प्रकार के भोजन का सेवन के संबंध में दिशानिर्देश जारी किए हैं। आईसीएमआर के तहत कार्यरत राष्ट्रीय पोषण संस्थान एनआईएन ने कहा कि पोषक तत्वों से भरपूर आहार खाने से हृदय संबधित बीमारियों और हाई ब्लड प्रेशन को काफी हद तक कम किया जा सकता है और डायबिटीज से भी बचा जा सकता है।

आईसीएमआर ने कहा कि ‘स्वस्थ जीवन शैली अपनाने से समय से पहले होने वाली मौत को रोका जा सकता है। एनआईएन ने कम नमक खाने, तेल और वसा का कम मात्रा में उपयोग करने, उचित व्यायाम करने, चीनी और जंक फूड को कम खाने का आग्रह किया है। उसने मोटापे को रोकने के लिए स्वस्थ जीवन शैली अपनाने और पोषक तत्वों से भरपूर भोजन का सेवन करने की सलाह दी है। राष्ट्रीय पोषण संस्थान (एनआईएन) ने भारतीयों को प्रतिदिन 20 से 25 ग्राम चीनी (एक चम्मच लगभग 5.7 ग्राम) का ही सेवन करने की सलाह दी है। इसके साथ ही प्रोटीन सप्लीमेंट से बचने और तेल का इस्तेमाल कम करने की भी सलाह दी गई है। इसके साथ ही संस्थान ने एयर-फ्राइंग और ग्रेनाइट-कोटेड कुकवेयर को बढ़ावा देने की बात कही है।

NIN ने पहली बार पैकेज्ड फूड लेबल की व्याख्या के लिए भी दिशा-निर्देश जारी किए। ICMR के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल ने बुधवार को संशोधित गाइडलाइंस जारी किए। इसमें मुख्य रूप से जो सुझाव दिए गए हैं उनमें खाना पकाने के तेल का इस्तेमाल कम करना बेहद अहम है। वैसे भी नट्स, तिलहन और सी-फूड्स के माध्यम से जरूरी फैटी एसिड मिल जाता है। अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों को लेकर भी गाइडलाइंस दिए गए हैं।

राष्ट्रीय पोषण संस्थान (एनआईएन) की ओर से 13 साल के अंतराल पर संशोधित आहार संबंधी दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि प्रोटीन सप्लीमेंट्स से बचना ही बेहतर है। इनके फायदे जोखिमों के अनुरूप नहीं हैं। प्रोटीन पाउडर अंडे, डेयरी दूध या सोयाबीन, मटर और चावल जैसे सोर्स से बनाए जाते हैं। एनआईएन ने कहा कि ‘प्रोटीन पाउडर में अतिरिक्त शर्करा, नॉन-कैलोरी स्वीटनर और आर्टिफिशियल फ्लेवर जैसे एडिटिव भी हो सकते हैं। ऐसे में प्रोटीन पाउडर का नियमित इस्तेमाल की सलाह नहीं दी जा सकती।

एनआईएन ने कहा कि ब्रांच्ड-चेन एमिनो एसिड से भरपूर प्रोटीन गैर-संचारी रोगों के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। ऐसे में हाई लेवल प्रोटीन का खास तौर पर सप्लीमेंट पाउडर के रूप में इस्तेमाल की सलाह नहीं दी जा सकती है। रिसर्च के निष्कर्ष बताते हैं कि स्वस्थ युवाओं में लंबे समय तक रजिस्टेंस एक्सरसाइज ट्रेनिंग (RET) के दौरान डायट प्रोटीन मांसपेशियों की ताकत और आकार में केवल एक छोटी सी बढ़ोतरी से जुड़े हुए हैं। 1.6 ग्राम/किलोग्राम शरीर के वजन/दिन से अधिक प्रोटीन का सेवन आरईटी से जुड़े फायदे में और योगदान नहीं करता है।

गाइडलाइंस तैयार करने वाली समिति की अध्यक्ष, एनआईएन निदेशक डॉ. हेमलता आर ने कहा कि बच्चों को लेकर रिसर्च में चौंकाने वाले आंकड़े आए हैं। उन्होंने बताया कि बच्चों का एक बड़ा हिस्सा खराब पोषण की स्थिति से पीड़ित है। इसके साथ ही, अधिक वजन और मोटापा भी बढ़ रहा है, जिससे कुपोषण का दोहरा बोझ पैदा हो रहा। प्रोटीन पाउडर अंडे, डेयरी दूध या सोयाबीन, मटर और चावल जैसे सोर्स से बनाए जाते हैं। एनआईएन ने कहा कि ‘प्रोटीन पाउडर में अतिरिक्त शर्करा, नॉन-कैलोरी स्वीटनर और आर्टिफिशियल फ्लेवर जैसे एडिटिव भी हो सकते हैं। ऐसे में प्रोटीन पाउडर का नियमित इस्तेमाल की सलाह नहीं दी जा सकती।कुपोषण और मोटापा दोनों एक ही समुदाय और घरों में नजर आ रहे हैं। अनुमान बताते हैं कि भारत में बीमारी को लेकर 56.4 फीसदी अनहेल्थी डाइट ही प्रमुख वजह है। स्वस्थ आहार और शारीरिक गतिविधि कोरोनरी हृदय की बीमारी और हाई ब्लड प्रेशर के अनुपात को कम कर सकती है।

क्या वैक्सीन से उत्पन्न हो सकता है खतरा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वैक्सीन से खतरा उत्पन्न हो सकता है या नहीं! भारत में हार्ट अटैक या स्ट्रोक जैसे कोरोना वैक्सीन के साइड इफेक्ट को रोकने के लिए बहुत से लोग खून को पतला करने वाली दवाएं यानी ब्लड थिनर्स ले रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी ऐसी बहुत सी सलाह दी जा रही है। दरअसल, हाल ही में ब्रिटेन की एक अदालत में ब्रिटिश दवा कंपनी एस्ट्राजेनेका ने स्वीकार किया था कि कोविड वैक्सीन लेने वाले लोगों में हार्ट अटैक या ब्रेन स्ट्रोक जैसे रेयर साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं। कंपनी ने दुनिया भर से ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की कोरोना वायरस को रोकने वाली वैक्सीन को मंगाने का भी ऐलान किया है। भारत में इसी फॉर्मूले पर सीरम इंस्टीट्यूट ने कोविशील्ड नाम से वैक्सीन बनाई गई थी, जिसके सबसे ज्यादा 175 करोड़ डोज लगाए गए थे। वहीं, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में इस वैक्सीन को वैक्सजेवरिया नाम दिया गया है। इसके बाद से ब्लड थिनर्स की डिमांड बढ़ गई है, मगर ये ब्लड थिनर्स काफी खतरनाक साबित हो सकते हैं। इस बारे में कई रिसर्च और डॉक्टरों से बात की गई, जिन्होंने इसे जानलेवा तक बताया है।

झारखंड की राजधानी रांची में इंटरनेशनल मेडिसिन के एक्सपर्ट डॉक्टर रविकांत चतुर्वेदी के अनुसार, ब्लड थिनर्स एक तरह की दवाएं होती हैं, जो हमारी धमनियों और शिराओं में खून का थक्का बनने से बचाती हैं। इसका ब्लड वेसल्स यानी धमनियों और वेंस यानी शिराओं में खून के प्रवाह को बनाए रखने में मददगार होता है। इसे एंटी प्लेटलेट्स ड्रग्स और एंटी कोआगुलेंट्स भी कहते हैं। एक बात महत्वपूर्ण बात यह जाननी जरूरी है कि अगर शरीर में पहले से खून के थक्के बने हुए हैं तो ये दवाएं उसे तोड़ती नहीं हैं। इतना जरूर है कि ये उस थक्के को और बड़ा बनने से रोक देंगी। ऐसे में यह जानकारी होनी जरूरी है, क्योंकि खून की नालियों में थक्के बनते हैं, जिनकी वजह से हार्ट अटैक, स्ट्रोक और ब्लॉकेज होता है।

दुनिया में तकरीबन 30 लाख लोग हर साल ब्लड थिनर्स लेते हैं। सबसे खतरनाक खून के थक्के पैर में बनते हैं। अगर कोई मोटापे से पीड़ित है तो उसमें थक्के बनने की आशंका ज्यादा होती है। डॉ. रविकांत कहते हैं वैक्सीन सिर्फ भारत में ही नहीं लगी है। पूरी दुनिया में लगी है। उस समय आनन-फानन में सबकी जान बचानी जरूरी थी। फिर हर वैक्सीन के साइड इफेक्ट होते हैं। वो भी बेहद रेयर। जैसे इसी मामले में हर 10 लाख में से 1 को साइड इफेक्ट्स की आशंका रहती है। घबराने की जरूरत नहीं है और न ही टेंशन लेने की जरूरत है। बस अपनी लाइफस्टाइल दुरुस्त रखिए और सेहत पर ध्यान दीजिए।

अगर किसी को दिल या ब्लड वेसल से जुड़ी किसी तरह की कोई दिक्कत है तो वह ब्लड थिनर ले सकता है। अगर दिल की धड़कन सामान्य नहीं है, यानी एट्रियल फिब्रिलेशन है तो भी ब्लड थिनर का इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर किसी ने हार्ट वॉल्व का रिप्लेस कराया है तो भी उसे ब्लड थिनर दिया जा सकता है। सर्जरी के बाद अगर खून के थक्के बनने की आशंका है तो भी यह दवा दी जाती है। दिल से जुड़ी बीमारी में भी ये दवाएं दी जाती हैं। मगर एक बात यह ध्यान में रखना चाहिए कि किसी को भी ब्लड थिनर्स तभी लेना चाहिए, जब डॉक्टर या स्पेशलिस्ट उसे ब्लड थिनर्स लेने की सलाह दे। यू-ट्यूब, फेसबुक, वाट्सऐप या इंस्टाग्राम पर दी गई सलाह को मानकर खुद के डॉक्टर न बनें।

वेबसाइट मेडलाइन प्लस के अनुसार, ब्लड थिनर्स दो तरह के होते हैं-एक एंटी कोआगुलेंट्स जैसेकि हीपैरिन या वारफैरिन (इसे कोउमैडिन भी कहते हैं)। ये दवाएं शरीर में कहीं भी खून के थक्के बनने की प्रक्रिया को धीमा कर देती हैं। वहीं, एंटीप्लेटलेट्स दवाएं जैसे कि एस्पिरिन और क्लोपिडोग्रेल वगैरह खून में मौजूद प्लेटलेट्स को एकजुट होने से रोकती हैं। ये दवाएं अक्सर उन लोगों को दी जाती हैं, जिन्हें पहले हार्ट अटैक या स्ट्रोक हो चुका है। ब्लड थिनर्स का सबसे आम साइड इफेक्ट इंटरनल ब्लीडिंग है। इससे पेट खराब रहना, नाक बहना और डायरिया जैसी समस्याएं हो सकती हैं। यूरिन लाल या भुरा हो सकता है। मसूढ़ों और नाक से खून बह सकता है, जो जल्दी नहीं थमेगा। उल्टी की शिकायत हो सकती है। भयंकर सिरदर्द या पेटदर्द हो सकता है। हमेशा कमजोरी महसूस हो सकती है। अगर कोई महिला ब्ल्ड थिनर्स ले रही है तो उसे हैवी पीरियड्स आ सकते हैं। कई बार बिना जाने-सुने ब्लड थिनर्स मेडिसिन लेना किसी को भी मौत के दरवाजे तक पहुंचा सकता है।

क्या पश्चिम बंगाल में चल पाएगा बीजेपी का जादू?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पश्चिम बंगाल में बीजेपी का जादू चल पाएगा या नहीं! बंगाल भाजपा के लिए महत्वपूर्ण है। राज्य में कुल 42 में से 2019 में पार्टी ने 18 लोकसभा सीटें जीती थीं। बीजेपी को केंद्र सरकार में तीसरा कार्यकाल बरकरार रखना है तो कम-से-कम बंगाल में पिछला प्रदर्शन तो दुहराना होगा। लेकिन राज्य में पार्टी का अभियान लड़खड़ाता रहा है। इतना कि बंगाल के सात चरणों के चुनाव के तीन चरण पूरे होने के बाद भाजपा खुद को ऐसे मोड़ पर पा रही है जहां से कहानी को बचाना मुश्किल है। भाजपा के नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) विफल हो गए हैं। खास तौर पर तब जब प्रश्न यह हो कि राज्य के लोगों के साथ केंद्र का व्यवहार कैसा होगा। इस सवाल के साथ एक भी चूक बेचैन मतदाताओं को राजनीतिक बाड़े से बाहर निकालने के लिए काफी होती है। और ऐसा लगता है कि सीएए ने ठीक यही किया है। सीएए के तहत नियमों की जल्दबाजी में अधिसूचना जारी किए जाने को भाजपा का मास्टरस्ट्रोक बताया गया। लेकिन लगता है कि यह पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित होगा। मोटे आकलन के मुताबिक, मतदाताओं की पसंद पर इसका असर 20 लोकसभा क्षेत्रों तक फैलेगा।

जैसा कि ‘संपत्ति के बंटवारा’ पर दोषारोपण का खेल खेला गया, उसी तरह मतदाताओं का एक वर्ग यह आकलन करने लगा है कि भाजपा का चुनाव प्रचार 2047 तक विकसित भारत से हटकर बहुसंख्यकों के बीच भ्रम पैदा करने लगा। बीजेपी ने सभी विपक्षी दलों पर हिडन एजेंडे को आगे बढ़ाने का आरोप लगाया। भाजपा ने इस बात पर जोर दिया है कि कथित तौर पर ये सभी दल अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण का वादा कर रहे हैं। भाजपा ने बताया कि दरअसल संपत्ति के पुनर्वितरण का एक मतलब यह भी है कि दलितों और आदिवासियों से आरक्षण छीनकर मुसलमानों को दिया जाएगा।

बीजेपी के इस प्रचार के खिलाफ बंगाल में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और सीपीएम के नेतृत्व वाली वामपंथी पार्टियां एक साथ आ गईं। और यह बीजेपी के लिए अच्छा नहीं रहा। इस हमले से सिर्फ इतना ही सुनिश्चित हुआ है कि बंगाल में बीजेपी के दुश्मनों में दोस्ती हो गई और वो भाजपा को हराने के लिए एकजुट हो गए हैं। खास तौर पर चुनाव के तीसरे चरण से बीजेपी विरोधियों में जबर्दस्त एका दिखने लगा है। आगे दक्षिण बंगाल में ज्यादा से ज्यादा लोकसभा क्षेत्रों में मतदान होने हैं। वहां ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि एक महत्वपूर्ण बदलाव हो रहा है। इस आंदोलन के नतीजे समय के साथ सामने आएंगे। लेकिन जो पहले से ही स्पष्ट है वह यह है कि भाजपा ने जिन सभी पार्टियों को एक साथ जोड़ दिया है – कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और सीपीएम के नेतृत्व वाली वामपंथी – उनका मुख्य दुश्मन अब भाजपा ही है।

पिछले चुनावों की उलझन और दुविधा खत्म हो गई है। तृणमूल 2021 के विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव दोनों में ही प्रतिद्वंद्वी है, पहले जैसी दुश्मन नहीं। आइए इस बिंदु पर गौर करें। कांग्रेस, सीपीएम और तृणमूल कांग्रेस सभी एक ही खेमे में हैं। इनका आम दुश्मन भाजपा है, जिसे ममता बनर्जी और वामपंथियों ने ‘बाहरी’ करार दिया है। ऐसा लगता है कि भाजपा के रणनीतिकारों ने 2021 के राज्य विधानसभा चुनाव के नतीजों को सही विश्लेषण नहीं किया। 294 में से 77 सीटें जीतना यह संदेश था कि उत्तर भारत में संघ परिवार की नियमावली में निहित हिंदुत्व का जादू बंगाल में काम नहीं करता।

सीएए के नियमों के अलावा भाजपा की कई असफलताओं पर विचार करना भी लाजिमी है। केंद्र सरकार अनियमितताओं का हवाला देते हुए मनरेगा और पीएमएवाई के लिए भुगतान जारी नहीं कर रही है। फिर, केंद्रीय एजेंसियों के छापे पड़ रहे हैं। राज्यपाल सीवी आनंद बोस के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोप पर भी भाजपा और सत्तारूढ़ पार्टी के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिल रही है। कुल मिलाकर, राजनीतिक रूप से अनुभवी बंगाली मतदाता के पास पिछली प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करने के लिए पर्याप्त कारण हैं।

पीछे मुड़कर देखें तो 2019 के चुनाव नतीजों ने बीजेपी को एक छोटी पार्टी से मुख्य विपक्ष में बदल दिया। उस चुनाव में सीपीएम शून्य पर सिमट गई जबकि कांग्रेस ने बहरामपुर और मालदा दक्षिण के अपने गढ़ों को बरकरार रखा। यह तब था जब मोदी लहर पूरे देश में चल रही थी और इतनी तेज हो गई थी कि बंगाल के मतदाताओं को लगा कि एक नई मजबूत ताकत उभरी है। बड़ी संख्या में सीपीएम से वोट बीजेपी को मिले। वाम दलों का वोट प्रतिशत 2014 में 29.9 से घटकर 7.5 हो गया। इसके विपरीत, 2014 में बीजेपी का वोट शेयर 17% से बढ़कर 40% हो गया।

मुर्शिदाबाद एक अलग कहानी बयां करता है। इस बार, सीपीएम को भरोसा है कि शहरी और ग्रामीण इलाकों में मतदाता उसके पाले में लौट रहे हैं। राज्य पार्टी प्रमुख और पोलित ब्यूरो सदस्य मोहम्मद सलीम ने मुर्शिदाबाद से चुनाव लड़कर तीन चीजों पर दांव लगाया है। पहला, कांग्रेस का वोट सीपीएम में ट्रांसफर कराने का। दूसरा, शिक्षक भर्ती घोटाला, संदेशखली आदि के मद्देनजर तृणमूल जबकि बेरोजगारी और महंगाई पर कथित विफलताओं को देखकर भाजपा, दोनों से सत्ता विरोधी वोटों को अपने पाले में करना। तीसरा, भाजपा समर्थक लहर का अभाव।

अपनी ही पार्टी कांग्रेस के बारे में क्या बोली राधिका खेड़ा?

हाल ही में कांग्रेस की पूर्व प्रवक्ता राधिका खेड़ा ने अपनी ही पार्टी कांग्रेस के बारे में एक बयान दिया है! लोकसभा चुनाव के बीच कांग्रेस को झटके पर झटके लग रहे हैं। छत्तीसगढ़ कांग्रेस की नेता राधिका खेड़ा ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी के नेता सुशील आनंद शुक्ला और उनके दो साथियों ने उनके साथ अभद्रता करने की कोशिश की। इतना ही नहीं जब उन्होंने इसकी शिकायत पार्टी के शीर्ष नेताओं से की तो उसके बाद भी उन पर कोई एक्शन नहीं लया गया। कांग्रेस की पूर्व नेता राधिका खेड़ा ने कहा कि उन्होंने राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और जयराम रमेश तक सबको इस आपत्तिजनक घटना के बारे में बताया गया, लेकिन आरोपी नेताओं पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसलिए उन्होंने पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दिया। वह राम मंदिर जाने और राम लला की मूर्ति के दर्शन करने से खुद को रोक नहीं सकीं।मैंने अपने जीवन के 22 साल इस पार्टी को समर्पित किए हैं और एनएसयूआई से लेकर कांग्रेस के मीडिया विभाग तक पूरी ईमानदारी से काम किया है। उसके बाद भी मुझे विरोध का सामना करना पड़ा क्योंकि मैं अयोध्या में राम का समर्थन करती हूं।राधिका खेड़ा ने पार्टी पर आरोप लगाया कि अयोध्या राम मंदिर की यात्रा के कारण उन्हें पार्टी के नेताओं द्वारा काफी परेशान किया गया। इसकी शिकायत जब उन्होंने छत्तीसगढ़ इकाई में वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं सचिन पायलट, जयराम रमेश, भूपेश बघेल और पवन खेड़ा सहित अन्य नेताओं से की तो उसके बाद भी उनकी कोई सहायता नहीं की गई। उन्हें पार्टी के भीतर से आलोचना का सामना करना पड़ा, क्योंकि वह राम मंदिर जाने और राम लला की मूर्ति के दर्शन करने से खुद को रोक नहीं सकीं।मैंने अपने जीवन के 22 साल इस पार्टी को समर्पित किए हैं और एनएसयूआई से लेकर कांग्रेस के मीडिया विभाग तक पूरी ईमानदारी से काम किया है।जिसके बाद राधिका खेड़ा ने पार्टी के अंदर से पुरुषवादी मानसिकता को उजागर करने की कसम खा ली थी।

कांग्रेस की पूर्व नेता राधिका खेड़ा ने दावा किया कि उन्होंने जिस भी कांग्रेस नेता से बात की, उनमें से हर एक ने उन्हें चुप रहने की हिदायत दी और पार्टी के साथ तालमेल न रखने के लिए फटकार लगाई। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का जिक्र करते हुए खेड़ा ने आरोप लगाया कि सुशील आनंद द्वारा अपमान और मौखिक दुर्व्यवहार के बारे में जानने के बाद, पूर्व ने उन्हें छत्तीसगढ़ छोड़ने के लिए कहा था। राधिका खेड़ा ने सुशील आनंद शुक्ला पर आरोप लगाया कि उन्होंने मेरे साथ बदतमीजी की और गाली भी दी। जब मैंने फोन पर रिकॉर्डिंग करने की धमकी दी तो उनके साथ कमरे में मौजूद दो लोगों ने कमरा बंद कर दिया और मुझे गालियां देने लेगे। मैं चिल्लाती रही लेकिन उन्होंने मेरी एक न सुनी। उसके बाद मैंने दरवाजे को धक्का दिया और प्रदेश महासचिव के कमरे में चली गई और वहां उनकी शिकायत की लेकिन वो एक बार भी अपनी कुर्सी से नहीं उठे।

राधिका खेड़ा ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को लिखे अपने इस्तीफे में कहा कि उन्हें पार्टी के भीतर से आलोचना का सामना करना पड़ा, क्योंकि वह राम मंदिर जाने और राम लला की मूर्ति के दर्शन करने से खुद को रोक नहीं सकीं।मैंने अपने जीवन के 22 साल इस पार्टी को समर्पित किए हैं और एनएसयूआई से लेकर कांग्रेस के मीडिया विभाग तक पूरी ईमानदारी से काम किया है। उसके बाद भी मुझे विरोध का सामना करना पड़ा क्योंकि मैं अयोध्या में राम का समर्थन करती हूं।

राधिका खेड़ा ने कांग्रेस नेता सुशील कुमार पर आरोप लगाया कि सुशील कुमार ने मुझे भारत जोड़ो यात्रा के दौरान शराब ऑफर की थी। उन्होंने मुझे बार बार फोन करके पूछा कि कौन सी शराब चाहिए। बता दें कि कांग्रेस की पूर्व नेता राधिका खेड़ा ने कहा कि उन्होंने राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और जयराम रमेश तक सबको इस आपत्तिजनक घटना के बारे में बताया गया, लेकिन आरोपी नेताओं पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसलिए उन्होंने पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दिया। राधिका खेड़ा ने पार्टी पर आरोप लगाया कि अयोध्या राम मंदिर की यात्रा के कारण उन्हें पार्टी के नेताओं द्वारा काफी परेशान किया गया। वह मेरे कमरे को भी बार- बार खटखटाते थे। जब मैंने इसकी शिकायत शीर्ष नेताओं से की मेरी कोई मदद नहीं की। हालांकि मुझे बाद में एहसास हुआ कि उन्होंने कोई मदद नहीं दी गई क्योंकि उनकी विचारधारा कांग्रेस के हिंदू विरोधी और राम विरोधी विचारों से मेल नहीं खाती थी।

मालदीव के मंत्री ने कहा कि उनके पायलट भारत द्वारा दान किए गए विमान उड़ाने में असमर्थ हैं.

भारतीय सेना की वापसी से मुश्किल में घिरी मुइज्जू सरकार, मालदीव में भारत द्वारा दिए गए विमान को उड़ाने के लिए नहीं है कोई पायलट! मालदीव के रक्षा मंत्री ने सेना वापसी को लेकर पत्रकारों के सवालों के जवाब में अपनी परेशानी बताई. उन्होंने कहा, ”भारत द्वारा मुहैया कराए गए तीन विमानों को उड़ाने के लिए हमारी सेना में कोई कुशल पायलट नहीं है.” मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू के अनुरोध पर उस देश में मौजूद भारतीय सैनिकों को वापस भारत लाया गया. लेकिन इसके बाद मुइज्जू सरकार संकट में है. मालदीव की सेना के पास भारत द्वारा उपहार में दिए गए तीन विमानों को उड़ाने के लिए उपयुक्त कर्मी नहीं हैं! यह बात वहां के रक्षा मंत्री घासन मौमुन ने कही।

राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेने के तुरंत बाद, मुइज्जू ने घोषणा की कि मालदीव के क्षेत्र में कोई भी भारतीय सैनिक नहीं होगा। भारत सरकार से सेना हटाने का अनुरोध किया। लंबी चर्चा के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने मुइज्जू का अनुरोध स्वीकार कर लिया. इसके बाद मालदीव से चरणबद्ध तरीके से 76 सैनिकों को भारत वापस लाया गया.

इन सैनिकों की वापसी को लेकर पत्रकारों के सवालों के जवाब में मालदीव के रक्षा मंत्री ने अपनी परेशानियों के बारे में बताया. उन्होंने कहा, ”हमारी सेना के पास भारत द्वारा मुहैया कराए गए तीन विमानों को उड़ाने के लिए कोई कुशल पायलट नहीं है. हमने अपने सैनिकों को उन विमानों को उड़ाने का प्रशिक्षण देना शुरू किया। इस प्रशिक्षण पद्धति के कई चरण हैं। लेकिन विभिन्न कारणों से प्रशिक्षण पूरा नहीं हो सका।” गौरतलब है कि भारतीय सैनिक दो हेलीकॉप्टरों और डोर्नियर विमानों के संचालन और रखरखाव के लिए मालदीव में तैनात थे। जिसे भारत ने द्वीप राष्ट्र को उपहार में दिया था। हालाँकि, मुइज्जू ने देश की जनता से मालदीव से भारतीय सेना को हटाने का वादा किया। मालदीव में तैनात भारतीय सेना की एक टीम 9 अप्रैल को स्वदेश लौट आई। वे मालदीव में एक विशेष हेलीकॉप्टर के संचालन और रखरखाव के प्रभारी थे। इसके बाद भारत लौटने के लिए सिर्फ एक और टीम बची थी. मुइज्जू के कार्यालय की प्रवक्ता हिना वालिद ने एक स्थानीय मीडिया में दावा किया कि उन्होंने 10 मई से पहले मालदीव भी छोड़ दिया था।

मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने भारत से 10 मई तक मालदीव से अपने सैनिक वापस बुलाने को कहा। भारत ने यह काम तय समय सीमा के भीतर किया. सभी भारतीय सैनिक द्वीप राष्ट्र से स्वदेश लौट आए हैं। मालदीव के राष्ट्रपति के कार्यालय के प्रवक्ता मोहम्मद मुइज्जू ने यह दावा किया है.

भारतीय सैनिक मालदीव में दो हेलीकॉप्टर और एक डोर्नियर विमान के संचालन और रखरखाव के लिए तैनात थे। जिसे भारत ने द्वीप राष्ट्र को उपहार में दिया था। हालाँकि, मुइज्जू ने देश की जनता से मालदीव से भारतीय सेना को हटाने का वादा किया। इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच कई बैठकें हुईं. हालांकि, कूटनीतिक हलकों का मानना ​​है कि इसका कोई खास फायदा नहीं हुआ।

मालदीव में तैनात भारतीय सेना की एक टीम 9 अप्रैल को स्वदेश लौट आई। वे मालदीव में एक विशेष हेलीकॉप्टर के संचालन और रखरखाव के प्रभारी थे। इसके बाद भारत लौटने के लिए सिर्फ एक और टीम बची थी. मुइज्जू के कार्यालय के प्रवक्ता ने दावा किया कि उन्होंने 10 मई से पहले मालदीव भी छोड़ दिया था। मीडिया “इंडिया टुडे” की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति कार्यालय की मुख्य प्रवक्ता हिना वालिद ने एक स्थानीय मीडिया को बताया कि भारतीय सैनिकों का आखिरी समूह मालदीव में है। मालदीव ने द्वीप राष्ट्र छोड़ दिया है। हालाँकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि कितने भारतीय सैनिक मालदीव छोड़कर भारत लौटे हैं। हिना ने कहा, “कितने सैनिकों को वापस भेजा गया है, इसकी जानकारी बाद में जारी की जाएगी।”

गौरतलब है कि मालदीव के विदेश मंत्री मूसा जमीर हाल ही में भारत दौरे पर आए हैं. उन्होंने गुरुवार को विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात की. दोनों पक्षों के बीच द्विपक्षीय संबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा पर ‘चर्चा’ हुई. इस बीच, मुइज्जू के कार्यालय के प्रवक्ता ने दावा किया कि मालदीव से सभी भारतीय सैनिकों को हटा दिया गया है।

गुरुवार को दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने कहा कि भारतीय सैनिकों का पहला और दूसरा बैच भारत लौट आया है. उनकी जगह कुशल भारतीय तकनीकी कर्मचारियों ने ले ली है।

क्या तीसरे चरण के मतदान में बीजेपी को मात दे पाई कांग्रेस?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या तीसरे चरण की मतदान में बीजेपी को कांग्रेस मात दे पाई है या नहीं! लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण के लिए जिन सीटों पर आज यानी 7 मई को वोटिंग शुरू है उसमें अधिकांश सीटों पर पिछली बार बीजेपी ने जीत हासिल की थी। तीसरे चरण में 11 राज्यों की 93 सीटों पर वोटिंग हो रही है और पिछले चुनाव में इन 93 लोकसभा सीटों में से 71 पर BJP ने जीत हासिल की थी। वहीं कांग्रेस को केवल चार सीटों पर जीत मिली थी। वहीं इन्हीं सीटों पर एनडीए के पिछले आंकड़े को देखा जाए तो जीती हुई सीटों की संख्या और भी अधिक थी। 2019 में एनडीए ने 78 सीटों पर बढ़त हासिल की। वहीं मौजूदा ‘इंडिया’ गठबंधन के विपक्षी दलों को 12 सीटों पर जीत मिली थी। अन्य दलों ने तीन सीटों पर जीत हासिल की थी। इंडिया गठबंधन में इस बार कई दल मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं और ऐसे में देखना होगा कि वह एनडीए को कितनी चुनौती दे पाते हैं। सीटों की संख्या के हिसाब से बीजेपी के लिए यह काफी महत्वपूर्ण फेज है। वहीं इंडिया गठबंधन के सामने चुनौती बड़ी है। 2019 में इन सीटों पर एनडीए का औसत जीत का अंतर 21 प्रतिशत था तो वहीं इंडिया गठबंधन का 11 फीसदी के करीब। जीत का अंतर दोनों गठबंधन के बीच अधिक था। इस चरण में जिन राज्यों में मतदान शुरू है उनमें गुजरात, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश शामिल हैं – ये तीनों ही भारतीय जनता पार्टी के गढ़ हैं। ऐसे में कांग्रेस की संभावनाएं तभी बढ़ेंगी जब एनडीए के वोटों में भारी सेंध लगेगी। गुजरात में 25, कर्नाटक में 14, मध्य प्रदेश में नौ, महाराष्ट्र में 11, उत्तर प्रदेश में 10, पश्चिम बंगाल में चार, असम में चार, बिहार में पांच, छत्तीसगढ़ में सात सीटों पर वोटिंग शुरू है। जिन 93 सीटों पर वोटिंग हो रही है उसमें बीजेपी अकेले 81 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। वहीं इंडिया गठबंधन की ओर से कांग्रेस 68 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। इस फेज में जिन दिग्गज उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला होगा उनमें गांधीनगर से अमित शाह, गुना से ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह राजगढ़ से, शिवराज सिंह चौहान विदिशा से वहीं यूपी की मैनपुरी सीट से डिंपल यादव, मनसुख मंडाविया पोरबंदर से, प्रहलाद जोशी धारवाड़ से और बारामती से सुप्रिया सुले प्रमुख हैं।

पिछले चुनाव में इन सीटों पर बीजेपी के सीटों की संख्या अधिक है सिर्फ यही एक बात नहीं है बल्कि जीत का अंतर भी अधिक था। पिछले चुनाव में बीजेपी ने इन 93 सीटों में 38 सीटों पर 50-60 प्रतिशत वोट शेयर के साथ जीत हासिल की। वहीं 20 सीटों पर उसका वोट शेयर 60 से 70 फीसदी के बीच था। वोट शेयर के लिहाज से देखें तो बीजेपी को जिन 20 सीटों पर जीत मिली वहां 70 फीसदी वोट शेयर था। 5 साल बाद चुनाव हो रहे हैं यह सही बात है लेकिन कांग्रेस के पक्ष में नतीजे आएं इसके लिए बड़े बदलाव की जरूरत होगी। इस चुनाव में पहले के दो चरणों में कम वोटिंग पर भी चर्चा हो रही है। विपक्षी दल इसको अपने पक्ष में बता रहे हैं। लेकिन 2019 के चुनाव नतीजों को देखा जाए तो जिन 62 सीटों पर मतदान में गिरावट आई थी, उनमें से 14 सीटों पर विजेता बदल गए। इसके अलावा जिन 31 सीटों पर ज्यादा वोटिंग हुई उनमें से नौ पर मौजूदा उम्मीदवार हार गए।

राज्य की 26 सीटों पर वोटिंग हो रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी अहमदाबाद के पोलिंग बूथ पर अपना वोट डाला। गुजरात बीजेपी का मजबूत किला है। गुजराती अस्मिता की अहम भूमिका है क्योंकि नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों ही इस राज्य से आते हैं। बीजेपी एक बार फिर यहां सभी 26 सीटों पर जीत की उम्मीद कर रही है क्योंकि वोट शेयर के मामले में कांग्रेस पर बीजेपी की पूरे देश में बढ़त 19 प्रतिशत है तो गुजरात में यह 30 फीसदी है।

पश्चिम बंगाल में जिन चार सीटों पर वोटिंग हो रही है उसमें तीन सीटें मालदा, मुर्शिदाबाद, जंगीपुर पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अधिक है। 2019 में कांग्रेस को मालदा दक्षिण सीट पर जीत मिली थी वहीं कांग्रेस और तृणमूल के बीच वोटों के बंटवारे के कारण बीजेपी के खाते में मालदा उत्तर सीट मिल गई थी। इस बार कांग्रेस-वाम दलों का गठबंधन और अल्पसंख्यक वोटों पर उनकी नजर है। पिछले लोकसभा चुनाव में तृणमूल को 63% मुस्लिम वोट मिले थे और टीएमसी फिर जीत का दावा कर रही है। नए मुख्यमंत्री और विदिशा से शिवराज सिंह चौहान के जुड़े होने के कारण मध्य प्रदेश भाजपा इकाई को नए नेतृत्व में अपनी जीत का सिलसिला जारी रखने की उम्मीद है। कांग्रेस, जिसने दिग्विजय सिंह और कांतिलाल भूरिया जैसे पुराने दिग्गजों को मैदान में उतारा है, वह भी सांसदों के खिलाफ स्थानीय सत्ता विरोधी लहर के सहारे कुछ सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही है। महाराष्ट्र में बारामती सीट पर पारिवारिक कलह के चलते मुकाबला रोमांचक हो गया है, क्योंकि सुप्रिया सुले का मुकाबला उनकी भाभी और अजीत पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार से है। 11 सीटों पर जहां वोटिंग हो रही है उनमें 2019 में एनडीए ने 11 सीटों में से सात पर जीत हासिल की थी।

जानिए क्या है स्पूफ वीडियो विवाद?.

आज हम आपको वर्तमान राजनीति में हो रहे स्पूफ वीडियो विवाद के बारे में बताने जा रहे हैं! सोशल मीडिया पर एक स्पूफ वीडियो सामने आया है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी डांस करते दिखाई दे रहे हैं। पीएम मोदी ने इस वीडियो की तारीफ करते हुए कहा कि चुनावी गहमा-गहमी के बीच ऐसे वीडियो चेहरे पर मुस्कान लाते हैं। यह वीडियो ‘एथीस्ट कृष्णा’ आईडी से पोस्ट किया गया है। इसमें यूजर ने लिखा, ‘यह वीडियो पोस्ट कर रहा हूं क्योंकि मैं जानता हूं कि ‘द डिक्टेटर’ मुझे इसके लिए गिरफ्तार नहीं करेंगे।’ प्रधानमंत्री ने इसे पोस्ट पर रिएक्ट करते हुए कहा कि आप सभी की तरह मुझे भी खुद को डांस करते हुए देखकर मजा आया। चुनाव की गहमा-गहमी के बीच इस प्रकार की रचनात्मकता वास्तव में आनंददायक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को अपने एक्स अकाउंट पर ये स्पूफ वीडियो शेयर किया। इसमें वो स्टेज पर चलते और डांस करते दिखाई दे रहे हैं। यह स्पूफ वीडियो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के ऐसे ही शेयर किए गए एक वीडियो के कुछ समय बाद आया। ममता का जो वीडियो शेयर किया गया, उनके यूजर्स को कोलकाता पुलिस ने नोटिस जारी कर दिया गया। पूरे मामले का ओरिजिनल वीडियो अमेरिकी रैपर लिल याचटी को स्टेज पर एंट्री करते हुए दिखाया गया है। 21 जून, 2022 को यूट्यूब पर पोस्ट किया गया यह वीडियो एक लोकप्रिय मीम टेम्प्लेट बन गया है। इसमें लोग सोरा AI आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग करके लिल याचटी की जगह अलग-अलग चर्चित हस्तियों को रखा जा रहा।

इससे पहले दो एक्स यूजर्स ने अपने हैंडल पर ममता बनर्जी का एक ऐसा ही मीम शेयर किया था। जिसमें उन्हें सीआरपीसी की धारा 149 संज्ञेय अपराधों की रोकथाम के तहत कोलकाता पुलिस के साइबर क्राइम टीम से नोटिस मिला था। ममता बनर्जी के स्पूफ को लेकर यूजर्स को पोस्ट का जवाब देते हुए, कोलकाता पुलिस ने कहा कि आपको नाम और एड्रेस समेत अपनी पहचान तुरंत देने का निर्देश दिया जाता है। हिमाचल प्रदेश की मंडी लोकसभा सीट से बीजेपी की उम्मीदवार कंगना रनौत ने कहा कि ममता दीदी जी इसे चिल पिल लेना कहते हैं, आप भी कभी ले लिया करो, हमेशा गुस्से में रहती हो, बच्चों ने आपका डांसिंग मीम क्या बना दिया, आप तो उनको जेल में डालने लगी। आप कितनी अनकूल हैं!! कहने में खेद है लेकिन आप बहुत सख्त, कठोर और अनकूल हैं। मांगी गई जानकारी का खुलासा नहीं किया जाता है, तो आप सीआरपीसी की धारा 42 के तहत कानूनी कार्रवाई के लिए उत्तरदायी होंगे। हालांकि, बाद में पुलिस ने पोस्ट पर अपना जवाब हटा दिया। इधर पुलिस की सूचना के बावजूद, वीडियो सोशल मीडिया यूजर्स में जमकर वायरल हो गया। ममता बनर्जी के स्पूफ वीडियो मामले पर बीजेपी ने निशाना साधा था।

बीजेपी आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने कोलकाता पुलिस के नोटिस पर रिएक्ट करते हुए कहा कि रिलेक्स @कोलकाता पुलिस – आपके पास ममता बनर्जी की डोरमैट की तरह काम करने के बजाय अन्य अधिक महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। उदाहरण के लिए, टीएमसी कार्यकर्ता सत्तारूढ़ पार्टी से अलग राजनीतिक विचार रखने पर कोलकाता भर में महिलाओं पर हमला कर रहे हैं। इससे भी बदतर उन्होंने ग्रेटर कोलकाता क्षेत्र में प्रधानमंत्री का मजाक उड़ाते हुए अश्लील पोस्टर भी चिपकाए हैं… आपने उनके बारे में क्या किया है?’

हिमाचल प्रदेश की मंडी लोकसभा सीट से बीजेपी की उम्मीदवार कंगना रनौत ने कहा कि ममता दीदी जी इसे चिल पिल लेना कहते हैं, बता दे कि प्रधानमंत्री ने इसे पोस्ट पर रिएक्ट करते हुए कहा कि आप सभी की तरह मुझे भी खुद को डांस करते हुए देखकर मजा आया। चुनाव की गहमा-गहमी के बीच इस प्रकार की रचनात्मकता वास्तव में आनंददायक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को अपने एक्स अकाउंट पर ये स्पूफ वीडियो शेयर किया।कहने में खेद है लेकिन आप बहुत सख्त, कठोर और अनकूल हैं। मांगी गई जानकारी का खुलासा नहीं किया जाता है, तो आप सीआरपीसी की धारा 42 के तहत कानूनी कार्रवाई के लिए उत्तरदायी होंगे। हालांकि, बाद में पुलिस ने पोस्ट पर अपना जवाब हटा दिया। इधर पुलिस की सूचना के बावजूद, वीडियो सोशल मीडिया यूजर्स में जमकर वायरल हो गया। ममता बनर्जी के स्पूफ वीडियो मामले पर बीजेपी ने निशाना साधा था। आप भी कभी ले लिया करो, हमेशा गुस्से में रहती हो, बच्चों ने आपका डांसिंग मीम क्या बना दिया, आप तो उनको जेल में डालने लगी। आप कितनी अनकूल हैं!! कहने में खेद है लेकिन आप बहुत सख्त, कठोर और अनकूल हैं।

आज के समय भाजपा को कौन सी पार्टी दे रही है टक्कर?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि आज के समय भाजपा को कौन सी पार्टी टक्कर दे रही है! देश में लोकसभा चुनाव का आधा सफर हो चुका है। तीसरे चरण में 11 राज्यों की 93 सीटों पर वोटिंग के साथ ही लोकसभा की देश की 543 में 283 पर मतदान प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। इस पूरे चुनाव में पीएम मोदी ने एनडीए के साथ ही बीजेपी की तरफ जबरदस्त चुनाव प्रचार किया। पीएम मोदी की एनर्जी को लेकर लोग खूब तारीफ कर रहे हैं। पीएम मोदी रोज दो से तीन राज्यों में चुनाव प्रचार कर रहे हैं। वे अपनी सरकार की उपलब्धियों के साथ ही कांग्रेस की कमियों को भी गिना रहे हैं। पीएम मोदी पूर्व में असम लेकर पश्चिम में गुजरात तक प्रचार कर रहे हैं। दक्षिण में वे तमिलनाडु और केरल में चुनाव प्रचार कर चुके हैं। हालांकि, इस चुनाव में मोदी की एनर्जी के मामले में 80 पार के दो नेताओं शरद पवार और मल्लिकार्जुन खरगे ने जोरदार टक्कर दी है। 83 साल के शरद पवार अपनी सियासी पारी के अंतिम पड़ाव पर सबसे लड़ाई लड़ रहे हैं तो वहीं 81 साल के मल्लिकार्जुन खड़गे भी सबसे पुरानी पार्टी के मुखिया के तौर पर विपक्ष की धुरी बने हुए हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या मोदी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनेंगे या इंडिया शाइनिंग की तरह, अबकी बार-400 पार का नारा भी केवल नारा ही रह जाएगा। विपक्ष की कमान संभाल रहे राजनीति के इन दो दिग्गजों पर बहुत कुछ निर्भर करेगा। 81 साल की उम्र में मल्लिकार्जुन खरगे कांग्रेस के चुनाव प्रचार की धुरी बने हुए हैं। उत्तर से लेकर दक्षिण तक खरगे ने पार्टी के लिए प्रचार की जिम्मेदारी संभाली है। पार्टी के प्रचार कार्यक्रम से खरगे की व्यस्तता अंदाजा लगाया जा सकता है। खरगे राहुल गांधी के साथ मिलकर दक्षिण के राज्यों में चुनाव प्रचार पर खास फोकस किया है। वहीं प्रियंका गांधी के साथ मिलकर उत्तर के राज्यों में भी उतने ही एक्टिव नजर आते हैं। खरगे एक दिन में एक राज्य में दो से तीन रैलियां या दो राज्यों में दो रैलियां कर रहे हैं। खरगे ने पिछले तीन सप्ताह में महाराष्ट्र के अलावा अपने गृह नगर कलबुर्गी, बेंगलुरू, कोलार में भी रैलियां की हैं। उन्होंने तमिलनाडु के अलावा राजस्थान में जयपुर के अलावा चितौड़गढ़, बांसवाड़ा में भी पार्टी के लिए प्रचार किया। इतना ही नहीं खरगे बिहार के किशनगंज और कटिहार में भी रैली की है। पार्टी के नेताओं का कहना है कि राहुल-प्रियंका अलावा चुनाव में प्रचार में खरगे की डिमांड सबसे अधिक है। खरगे ने पार्टी के लिए दक्षिण में चेहरा तो हैं ही उन्होंने छत्तीसढ़ से लेकर देहरादून में कांग्रेस के चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत की। खरगे ने दिल्ली में चुनाव प्रचार में हिस्सा लिया है। उन्होंने उत्तर-पूर्वी दिल्ली में तो रोड शो भी किया। इतना ही नहीं खरगे इस उम्र में घर-घर जाकर पार्टी का मेनिफेस्टो भी बांट रहे हैं।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष और महाराष्ट्र के सीएम रह चुके शरद पवार ने इस चुनाव में जी-जान झोंक दी है। महाराष्ट्र में बारामती, सतारा से लेकर बीड तक पवार ने अपनी पार्टी के लिए मोर्चा संभाला हुआ है। वे अपनी पार्टी के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। 83 वर्षीय शरद पवार ने बारामती में अपनी बेटी सुप्रिया सुले के लिए प्रचार किया था। पार्टी के लिए रणनीति बनाने से लेकर उनके लिए प्रचार बैठक आयोजित करने में शरद पवार की अहम भूमिका रही है। चुनाव प्रचार में शरद पवार लोगों से एनसीपी (शरद गुट) के पक्ष में ऐतिहासिक जनादेश की अपील कर रहे हैं। विधायक और शरद पवार के पोते रोहित का कहना है कि पिछले 20 दिन में सिर्फ 4 से 5 घंटे की ही नींद ले रहे हैं। हालांकि, इसका असर उनकी सेहत पर भी कुछ दिखा। डॉक्टरों ने उन्हें आराम करने की सलाह दी है लेकिन सीनियर पवार हैं कि वे थमने-रुकने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। शरद पवार की सेहत को लेकर बीड से पार्टी उम्मीदवार बजरंग सोनवने ने लिखा, आप आराम करें, जीत आपके चरणों में है। आप बस अपनी सेहत का ध्यान रखे। इस उम्र में शरद पवार की सक्रियता और एनर्जी का अंदाजा 5 महीने पहले उस कार्यक्रम से लगाया जा सकता है कि जहां वह बारिश के दौरान भीगते हुए भाषण देते रहे थे। नवी मुंबई के उस भाषण का वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था।

स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी पर बोला हमला, कांग्रेस ने दिया जवाब.

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जब से राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ आमने-सामने बहस करने के आह्वान का जवाब दिया है, तब से इस मुद्दे पर बीजेपी खेमे के साथ-साथ विपक्षी मंच भारत में भी चर्चा शुरू हो गई है. ‘भारत’ मंच के नेताओं के एक वर्ग ने कहा कि राहुल को ऐसे प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए. क्योंकि मोदी और बीजेपी हमेशा लड़ाई को ‘राहुल बनाम मोदी’ दिखाना चाहते हैं. इसके अलावा राहुल ‘भारत’ मंच पर प्रधानमंत्री पद का चेहरा नहीं हैं. परिणामस्वरूप, यदि वह उस प्रस्ताव का जवाब देता है, तो एक और संदेश भेजा जाएगा। इस बार बीजेपी नेता स्मृति ईरानी ने भी उसी लहजे में सवाल उठाया, ‘क्या राहुल प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं या नहीं?’ कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्ति के साथ आमने-सामने बहस में बैठना चाहते हैं? हालांकि, स्मृति के बयान को देखते हुए वे उनका मजाक उड़ाने से नहीं चूकते। कांग्रेस नेताओं के मुताबिक स्मृति मीडिया में महत्व पाने के लिए इसलिए कूदी हैं क्योंकि राहुल गांधी ने अपना मुंह खोला है. लेकिन कांग्रेस को उनकी कोई परवाह नहीं है. इसके अलावा रेवन्ना के सेक्स स्कैंडल को लेकर भले ही पूरे देश में हंगामा मचा था, लेकिन स्मृति उस वक्त चुप रहीं। परिणामस्वरूप, उसे अनावश्यक महत्व देना व्यर्थ है।

सोशल मीडिया पर कई लोगों ने स्मृति पर हमला बोलते हुए कहा, ‘राहुल के मुंह खोलते ही मोदी कैबिनेट के राहुल मामलों के मंत्री दर्शकों के बीच गिर पड़े! हालांकि, प्रजल को लेकर उनकी ओर से कोई टिप्पणी नहीं आई. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ‘करोड़पति टेम्पोवालों’ के सुर में सुर मिलाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ‘कठपुतली राजा’ कहकर हमला बोला. तीन दिन पहले एक सार्वजनिक सभा में मोदी ने शिकायत की थी कि अंबानी-अडानियों ने कांग्रेस को बोरे भर पैसे दिए हैं. इसी के मद्देनजर उत्तर प्रदेश की एक सभा से राहुल ने कटाक्ष करते हुए मोदी को ‘टेम्पो करोड़पतियों के हाथों की कठपुतली राजा’ कहा था. उन्होंने एक्स-हैंडल में अपने भाषण के अंश पर भी प्रकाश डाला और कहा, “वह प्रधान मंत्री नहीं हैं, वह राजा हैं। उन्हें संविधान, संसद, कैबिनेट से कोई लेना-देना नहीं है!

मौजूदा चुनाव प्रचार में मोदी के कई बयानों पर निशाना साधते हुए कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाद्रा ने भी आरोप लगाया कि मोदी ने प्रधानमंत्री पद की गरिमा को गिराया है. वहीं, प्रियंका ने आज यह भी शिकायत की कि बीजेपी ने राम मंदिर के उद्घाटन के दौरान राष्ट्रपति को जाने नहीं दिया. जब से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, तब से बार-बार यह आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने नियमों को तोड़ा है और मुट्ठी भर औद्योगिक समूहों को कई लाभ दिए हैं। राहुल गांधी सहित विपक्षी नेताओं ने बार-बार नियमों को तोड़ने और गौतम अडानी के समूह को विशेषाधिकार देने की शिकायत की है, जो मोदी के बहुत करीबी माने जाते हैं। राहुल सहित विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि मोदी ने जंगलों, हवाई अड्डों, कोयला खदानों सहित देश के कई संसाधनों को अडानी समूह को सौंपने के लिए सभी मानदंडों का उल्लंघन किया। विपक्ष ने यह भी आरोप लगाया है कि जो लोग सामने आए हैं उन्हें तरह-तरह से परेशान किया जा रहा है. ऐसे में मोदी ने कुछ दिन पहले एक चुनावी रैली में शिकायत की थी कि लोकसभा चुनाव प्रचार शुरू होने के बाद से राहुल अब अडानी-अंबानी के बारे में बात नहीं कर रहे हैं. हालांकि कांग्रेस ने कई वीडियो जारी किए हैं, लेकिन मोदी का दावा सच नहीं है. इसके विपरीत, राहुल ने दोनों उद्योगपतियों के साथ मोदी की ‘नजदीकियों’ को लेकर कई बार लोकसभा में प्रचार किया।

मोदी ने आरोप लगाया कि दोनों उद्योगपतियों ने कांग्रेस को ‘टेंपो में भरे काले धन के बैग’ पहुंचाए थे, इसलिए राहुल उन पर चुप रहे. इसके बाद राहुल ने पलटवार करते हुए कहा, ”मोदी अपने हाथों में मौजूद ईडी-सीबीआई का इस्तेमाल उन दो उद्योगपतियों की जांच के लिए क्यों नहीं करते?” अन्य विपक्षी नेताओं ने भी मोदी की बात का समर्थन करते हुए दोनों उद्योगपतियों से मोदी की नजदीकियों को लेकर सुर बुलंद कर दिए.

उस हमले के आधार पर राहुल ने कल उत्तर प्रदेश की एक सभा में मोदी पर अमीर उद्योगपतियों की कठपुतली कहकर व्यंग्य किया. उन्होंने कहा, ”मोदी राजा हैं! वह प्रधानमंत्री नहीं, राजा हैं! उन्हें कैबिनेट, संसद, संविधान से कोई लेना-देना नहीं है. वह 21वीं सदी के राजा और दो-तीन करोड़पति हैं, जिनके हाथों में असली ताकत उनका चेहरा है!” अपने एक्स-हैंडल पर व्यावहारिक रूप से उसी भाषा में मोदी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा, ”मोदी एक कठपुतली राजा हैं, जिनके धागा टेम्पो करोड़पतियों के पास है।”

इस बीच, राहुल ने चुनाव के दौरान मोदी और राहुल के बीच सार्वजनिक बहस में बैठने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मदन बी लोकुर, उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एपी शाह और अनुभवी पत्रकार एन राम के निमंत्रण का जवाब दिया। उन्होंने कहा, वह किसी भी दिन, कहीं भी मोदी से बहस करने को तैयार हैं. लेकिन राहुल यह सवाल पूछने से नहीं रुके कि क्या मोदी ऐसी सार्वजनिक बहस का जवाब देंगे या नहीं। दो नेताओं के बीच बहस में बैठने का यह मामला बिल्कुल अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में दो उम्मीदवारों के बीच बहस में बैठने जैसा है. राहुल की आज की प्रतिक्रिया से भारत के कुछ साझेदार नेता थोड़े नाराज हैं. उनके मुताबिक मोदी हमेशा चुनाव में ‘मोदी बनाम राहुल’ के मुद्दे को बढ़ावा देना चाहते हैं. इससे देश में अन्य विपक्षी नेताओं की अहमियत का पता चल सकता है. भारत के नेताओं के एक वर्ग ने कहा कि राहुल को ऐसे प्रस्तावों पर प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए. इसके अलावा वह भारत के प्रधानमंत्री का चेहरा भी नहीं हैं.