Saturday, March 7, 2026
Home Blog Page 657

क्या भारत में स्वतंत्र नहीं है सीबीआई?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सीबीआई भारत में स्वतंत्र है या नहीं! केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई पर केंद्र और राज्य सरकारों के बीच खींचतान कोई नई बात नहीं है। अब यह सिलसिला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। पश्चिम बंगाल सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से शिकायत की है कि सीबीआई उसकी आम सहमति के बिना राज्य के मामलों में जांच आगे बढ़ा रही है। प. बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि चूंकि प्रदेश ने पहले ही सीबीआई को दी गई आम सहमति वापस ले ली, इसलिए उसके पास अब राज्य सरकार की अनुमति लिए बिना जांच का अधिकार नहीं रह गया है। ममता सरकार ने अपनी शिकायत में साफ तौर पर आरोप लगाया है कि दरअसल सीबीआई केंद्र सरकार का मुखौटा है। एजेंसी सिर्फ और सिर्फ केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के इशारे पर काम कर रही है और ऐसी प्रवृत्तियों पर रोक लगनी चाहिए। केंद्र सरकार ने इस शिकायत को पूरी तरह निराधार बताते हुए सुप्रीम कोर्ट से कहा कि प. बंगाल की याचिका को तुरंत खारिज किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में जारी इस बहस ने सीबीआई की स्वायत्तता को लेकर दशकों पुराने प्रश्न को फिर से सामने खड़ा कर दिया है। प्रश्न यह कि क्या सीबीआई आज भी पिंजड़े बंद वह तोता है जिसे केंद्र सरकार अपने इशारे पर नचाती है? केंद्र की बीजेपी नीत एनडीए सरकार का तो कहना है कि सीबीआई पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है। यूपीए सरकार के दौर में यही बीजेपी सीबीआई को कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन कहा करती थी। 2013 में जब सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को पिंजड़े में बंद तोता बता दिया तो बीजेपी ने सीबीआई के दुरुपयोग को लेकर यूपी सरकार पर हमला बढ़ा दिया। लेकिन जब बीजेपी सत्ता में आई और कांग्रेस को विपक्ष में बैठना पड़ा तो दोनों के नैरेटिव उलट हो गए। तत्कालीन केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने 3 अप्रैल, 2022 को कहा कि सीबीआई अब ‘पिंजरे में बंद तोता’ नहीं है और देश की शीर्ष अपराधिक जांच एजेंसी के रूप में अपना कर्तव्य निभा रही है।

तब रिजिजू ने ट्वीट कर सीबीआई के जांच अधिकारियों के पहले सम्मेलन में एक दिन पहले दिए गए अपने संबोधन का एक छोटा वीडियो भी साझा किया। रिजिजू ने अपने संबोधन में कहा, ‘मुझे अच्छी तरह याद है कि एक समय था, जब सरकार में बैठे लोग कभी-कभी जांच में बाधा बन जाते थे।’ उन्होंने कहा कि आज एक ऐसा प्रधानमंत्री है जो खुद भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम में मुख्य भूमिका निभा रहा है। हालांकि, एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल के पाला बदलकर एनडीए एनडीए घटक दल में शामिल होने के आठ महीने बाद सीबीआई ने उनके खिलाफ मामलों की क्लोजर रिपोर्ट फाइल की तो विपक्ष ने इसे केंद्र सरकार का कदम ही बताया।

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट में प. बंगाल के वकील कपिल सिब्बल की दलील है कि अगर सीबीआई स्वायत्त संस्था है तो फिर संसद में उससे जुड़े सवालों के जवाब केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के राज्य मंत्री देते हैं। उधर, मामले में केंद्र सरकार का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, ‘सीबीआई भारत सरकार के नियंत्रण में नहीं है।’ मेहता ने कहा कि सीबीआई की निगरानी का हक भारत सरकार के पास नहीं है। उन्होंने कहा, ‘केंद्र न तो अपराध के रजिस्ट्रेशन की निगरानी कर सकता हूं, न ही जांच की निगरानी कर सकता हूं और न ही यह निगरानी कर सकता हूं कि वह मामला कैसे बंद करेगी, या आरोप पत्र कैसे दाखिल करेगी, दोषसिद्धि कैसे होगी या दोषमुक्ति कैसे होगी।’

सॉलिसिटर जनरल ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि भारत सरकार ने कोई केस दर्ज नहीं किया है बल्कि सीबीआई ने किया है।’ उन्होंने कहा कि प. बंगाल ने याचिका में जिन मामलों का उल्लेख किया है, उनमें वे मामले भी शामिल हैं जिन्हें कलकत्ता हाई कोर्ट ने दर्ज करने का आदेश दिया था। सिब्बल ने मेहता की दलील का विरोध किया और कहा कि उन्होंने कहा कि जब राज्य ने अपनी सहमति वापस ले ले तो सीबीआई राज्य में प्रवेश कर जांच नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि जब किसी राज्य में सीबीआई आती है तो वहां ईडी भी आ जाती है और इसका देश की राजनीति पर बड़ा असर पड़ता है। सिब्बल ने कहा कि सीबीआई कोई वैधानिक प्राधिकरण नहीं है और यह एक जांच एजेंसी है।

इस पर जजों की बेंच ने पूछा, ‘इसे वैधानिक प्राधिकरण क्यों नहीं माना जा सकता?’ जवाब में सिब्बल ने कहा, ‘सीबीआई सरकार की जांच शाखा है।’ उन्होंने डीएसपीई अधिनियम के प्रावधानों का उल्लेख किया जिसमें विशेष पुलिस प्रतिष्ठानों के संचालन और प्रशासन से संबंधित धारा 4 भी शामिल है। सिब्बल ने कहा, ‘भारत संघ के प्रशासनिक ढांचे में पुलिस प्रतिष्ठान की देखरेख कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के पास है।’ सिब्बल ने कहा कि जब संसद में सीबीआई के बारे में सवाल पूछा जाता है तो इसका जवाब कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के राज्य मंत्री देते हैं।

दरअसल, पश्चिम बंगाल सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत केंद्र के खिलाफ शीर्ष अदालत में एक मूल मुकदमा दायर किया है जिसमें आरोप लगाया गया है कि सीबीआई प्राथमिकी दर्ज कर रही है और अपनी जांच आगे बढ़ा रही है जबकि राज्य ने अपने अधिकार क्षेत्र में संघीय एजेंसी को मामलों की जांच के लिए दी गई आम सहमति वापस ले ली है। पश्चिम बंगाल सरकार ने सीबीआई को जांच करने अथवा राज्य में छापे मारने के संबंध में दी गई आम सहमति 16 नवंबर, 2018 को वापस ले ली थी। अनुच्छेद 131 केंद्र और एक या अधिक राज्यों के बीच विवाद में उच्चतम न्यायालय के मूल अधिकार क्षेत्र से जुड़ा है। एसजी तुषार मेहता ने जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ को बताया कि संविधान का अनुच्छेद 131 सर्वोच्च न्यायालय को प्रदत्त ‘सर्वाधिक पवित्र अधिकार क्षेत्र में से एक’ है और इस प्रावधान के दुरुपयोग की इजाजत नहीं दी जा सकती।

आखिर भारत के प्रति क्या विचार रखता है अमेरिका?

आज हम आपको बताएंगे कि भारत के प्रति अमेरिका क्या विचार रखता है! यह जैसे एक रवायत हो गई है। अमेरिकी सरकार का एक आयोग हर वर्ष दुनिया के विभिन्न देशों में धार्मिक आजादी पर एक रिपोर्ट जारी करता है और उसमें भारत की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त करता है। जवाब में भारत उसकी जमकर लताड़ लगाता है और उसकी खामियां गिनवाता है। अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी अमेरिकी आयोग (USCIRF) की इस वर्ष की रिपोर्ट भी आ गई। इसमें भारत को उन 17 देशों की लिस्ट में रखा गया है, जिन्हें धार्मिक आजादी के कथित उल्लंघन की वजह से खास चिंता वाला देश चिह्नित किया गया। स्वाभाविक है कि भारत के संदर्भ में यह रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया में हुईं गलतियां गिनाई जाएं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यही किया। उन्होंने बेलाग-लपेट कहा कि अमेरिकी आयोग राजनीतिक अजेंडे के तहत पक्षपात करने के लिए कुख्यात है। जयसवाल ने कहा कि यह राजनीति अजेंडे वाली एक पक्षपाती संस्था के तौर पर जाना जाता है। इस कारण उन्हें इस मामले में अमेरिकी कमीशन से कोई खास उम्मीदें नहीं हैं कि वह भारत की विविधता और लोकतांत्रिक मूल्यों को समझने की कोशिश करेगा। जयसवाल ने भारत में आम चुनावों के वक्त ऐसी रिपोर्ट जारी करने के पीछे की विशेष मंशा पर भी सवाल उठाया। उन्होंने साफ कहा कि इस रिपोर्ट के जरिए दुनिया की सबसे बड़ी चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने की कोशिश कभी सफल नहीं होगी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने दोटूक कहा कि अमेरिकी आयोग में बैठे लोग इस रिपोर्ट के बहाने भारत के खिलाफ अपना दुष्प्रचार करते रहते हैं। अमेरिकी आयोग की रिपोर्ट में बीजेपी पर ‘भेदभावपूर्ण राष्ट्रवादी नीतियों को आगे बढ़ाने’ का आरोप लगाया गया है। इसने कहा कि बीजेपी पूरी तरह से पक्षपाती है और यह देश की विविधता, बहुलतावादी और लोकतांत्रिक लोकाचार को समझने की उम्मीद भी नहीं करती है। जवाब में विदेश मंत्रालय के प्रवक्त ने ने कहा, ‘हमें वास्तव में कोई उम्मीद नहीं है कि यूएससीआईआरएफ भारत के विविध, बहुलवादी और लोकतांत्रिक चरित्र को समझने की कोशिश भी करेगा।’

अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (यूएससीआईआरएफ) ने बुधवार को जारी अपनी रिपोर्ट में आरोप लगाया था कि पिछले वर्ष भारत सरकार सांप्रदायिक हिंसा से निपटने में विफल रही। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘2023 में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति और खराब हुई। बीजेपी नेतृत्व वाली सरकार ने भेदभावपूर्ण राष्ट्रवादी नीतियों को मजबूत किया, घृणास्पद बयानबाजी को बढ़ावा दिया और सांप्रदायिक हिंसा को संबोधित करने में विफल रही, जिससे मुस्लिम, ईसाई, सिख, दलित, यहूदी और आदिवासी (स्वदेशी लोग) असमान रूप से प्रभावित हुए। गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए), विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए), नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और धर्मांतरण और गोहत्या विरोधी कानूनों के लगातार लागू होने के कारण धार्मिक अल्पसंख्यकों और उनकी ओर से वकालत करने वालों को मनमाने ढंग से हिरासत में लिया गया, निगरानी की गई और निशाना बनाया गया।’

रिपोर्ट में आगे कहा गया है, ‘धार्मिक अल्पसंख्यकों पर रिपोर्टिंग करने वाले मीडिया संस्थानों और गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) को एफसीआरए नियमों के तहत सख्त निगरानी के अधीन किया गया था। फरवरी 2023 में भारत के गृह मंत्रालय ने एनजीओ सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के एफसीआरए लाइसेंस को निलंबित कर दिया था। इसी तरह, अधिकारियों ने 2002 के गुजरात दंगों के दौरान मुस्लिम विरोधी हिंसा पर रिपोर्टिंग करने के लिए तीस्ता सीतलवाड सहित न्यूजक्लिक के पत्रकारों के कार्यालयों और घरों पर छापे मारे।’

प्रवासी भारतीयों के एक थिंक टैंक फाउंडेशन फॉर इंडिया एंड इंडियन डायस्पोरा स्टडीज (FIIDS) ने इन आरोपों का जवाब दिया। संस्था ने कहा, ‘2023 में भारत में कोई बड़ा हिंदू-मुस्लिम दंगा नहीं हुआ। इसे दंगों से मुक्त वर्ष मानने के बजाय रिपोर्ट में छिटपुट घटनाओं को ऐसे पेश किया गया मानो पूरे देश ऐसी घटनाएं आम हैं। रिपोर्ट तैयार करते वक्त यह भी नहीं सोचा गया कि भारत में इतनी बड़ी मुस्लिम आबादी है।’ एफआईआईडीएस के नीति एवं रणनीति प्रमुख खंडेराव कांड ने कहा कि अमेरिकी आयोग की रिपोर्ट ‘तथ्यों को छिपाने, आंशिक आंकड़ों का उपयोग करने, पूरे संदर्भ को छिपाने, अलग-अलग घटनाओं को सामान्य बनाने तथा देश के कानून के क्रियान्वयन पर सवाल उठाने’ पर आधारित है। उन्होंने कहा, ‘इस रिपोर्ट में आंशिक और पृथक घटनाओं का उपयोग करके 1.4 अरब की आबादी वाले विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को गलत तरीके से ब्रांड किया गया है। जटिल और हिंसक अतीत की पृष्ठभूमि के विरुद्ध सकारात्मक हालिया रुझानों को इंगित करने का अवसर खो दिया गया है।’ उन्होंने कहा, ‘इसके अलावा, एफएटीएफ के तहत भारत का मूल्यांकन करने की सिफारिश अत्यधिक संदिग्ध है, खासकर तब जब भारत स्वयं आतंकवाद का निशाना रहा है।’

उन्होंने कहा कि यूएससीआईआरएफ की रिपोर्ट में भारत की धार्मिक स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी का उल्लेख नहीं किया गया है, जिसमें बलपूर्वक, धोखाधड़ी से और जबरन धर्म परिवर्तन पर प्रतिबंध है। उन्होंने कहा, ‘इसके बजाय इसने भोले-भाले, वंचित लोगों को बचाने के लिए कानूनों के प्रवर्तन के बारे में शिकायत की।’ संगठन ने बयान जारी कर कहा, ‘एफआईआईडीएस तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और अमेरिका के एक मजबूत सहयोगी के खिलाफ किसी भी प्रभाव या एजेंडे के बारे में संदेह और सवाल उठाता है। 2021 में अमेरिका-भारत संबंधों की परिणामी प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, एफआईआईडीएस अनुशंसा करता है कि अमेरिकी विदेश विभाग को यूएससीआईआरएफ की सिफारिशों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करना चाहिए और उन्हें खारिज करना चाहिए।’

केजरीवाल को कौन सी जमीन मिलेगी? सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को दे सकता है निर्देशl

0

क्या दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (यूपी) प्रमुख अरविंद केजरीवाल को लोकसभा चुनाव में जमानत मिलेगी? इस सवाल का जवाब शुक्रवार को मिल सकता है. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजीव खन्ना ने बुधवार को बताया कि वह 10 मई को केजरीवाल मामले में अंतरिम आदेश जारी कर सकते हैं.

आप संयोजक केजरीवाल ने ईडी की गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में मामला दायर किया. मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई हुई. सुनवाई में केजरीवाल की जमानत का मुद्दा उठा. न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की खंडपीठ ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मंगलवार को कोई आदेश पारित नहीं किया. सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को यह आदेश दे सकता है.

मंगलवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केजरीवाल द्वारा दायर किया गया मामला कोई सामान्य मामला नहीं है. केजरीवाल की ओर से पेश वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, ”लोकसभा चुनाव में भाग लेना केजरीवाल के लोकतांत्रिक अधिकार के अंतर्गत है.” न्यायमूर्ति खन्ना की पीठ ने कहा कि वह दिल्ली के मुख्यमंत्री की अंतरिम जमानत याचिका पर सुनवाई करेगी. क्योंकि केजरीवाल एक जन प्रतिनिधि हैं. चुनाव जीता. उन्हें चुनाव में प्रचार करना है. केजरीवाल की जमानत का विरोध करते हुए ईडी ने कोर्ट से कहा कि आपराधिक मामलों में गिरफ्तार सभी लोगों के समान अधिकार हैं. केजरीवाल को जमानत देने से गलत संदेश जाएगा. जस्टिस खन्ना की बेंच ने यह भी कहा, ‘अगर केजरीवाल को अंतरिम जमानत दी जाती है तो कोर्ट नहीं चाहेगा कि वह किसी भी सरकारी काम में शामिल हों।’ अन्यथा विवाद उत्पन्न हो सकता है. हम सरकारी काम में दखल नहीं देना चाहते. अगर चुनाव नहीं होता तो इस जमानत मुद्दे पर विचार नहीं किया जाता.” केजरीवाल किसी भी सरकारी फाइल पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे.

मंगलवार की सुनवाई में ईडी को सुप्रीम कोर्ट के सवालों का सामना करना पड़ा. सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, जांच धीमी क्यों हो रही है? सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सवाल किया कि इस मामले में गवाहों और आरोपियों से पूछताछ करने में ईडी को इतना समय क्यों लगा. सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कोई आदेश जारी नहीं किया. एक्साइज मामले में गिरफ्तार अरविंद केजरीवाल की अर्जी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ईडी से अहम सवाल उठाए. न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्त की पीठ ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान कहा कि आम आदमी पार्टी (यूपी) प्रमुख द्वारा दायर मामला कोई सामान्य मामला नहीं है। साथ ही पीठ ने ईडी से कहा, ”आप किसी को उसके जीवन के अधिकार से वंचित नहीं कर सकते.” शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि केजरीवाल एक मुख्यमंत्री हैं. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर केजरीवाल को अंतरिम जमानत मिल भी जाती है तो भी वह किसी भी सरकारी फाइल पर हस्ताक्षर नहीं कर पाएंगे.

21 मार्च को केजरीवाल को दिल्ली के एक्साइज भ्रष्टाचार मामले में ईडी ने गिरफ्तार कर लिया था. तब से वह जेल में बंद है. केजरी ने सबसे पहले दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और दावा किया कि उनकी गिरफ्तारी ‘अवैध’ थी। लेकिन इस महीने की शुरुआत में दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश स्वर्णकांत शर्मा द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद आप प्रमुख ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

पिछली सुनवाई में जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्त की बेंच ने कहा था, ‘लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए केजरीवाल को अंतरिम जमानत देने पर विचार किया जा सकता है।’ इसलिए अदालत अंतरिम जमानत पर विचार कर सकती है। इसके बाद से ही केजरीवाल की जमानत को लेकर अटकलें शुरू हो गई हैं.

मंगलवार को सुनवाई के दौरान दिल्ली के मुख्यमंत्री की जमानत का मुद्दा उठा. केजरीवाल की ओर से वकील अभिषेक मनु सिंघवी कोर्ट में पैरवी कर रहे हैं. उन्होंने कहा, ”लोकसभा चुनाव लड़ना केजरीवाल के लोकतांत्रिक अधिकार में है।” न्यायमूर्ति खन्ना की पीठ ने कहा कि वह दिल्ली के मुख्यमंत्री की अंतरिम जमानत याचिका पर सुनवाई करेगी। क्योंकि, केजरीवाल एक जन प्रतिनिधि हैं. चुनाव जीता. उन्हें चुनाव प्रचार करना है. हालांकि, केजरीवाल की जमानत का विरोध करते हुए ईडी ने कोर्ट से कहा कि आपराधिक मामलों में गिरफ्तार सभी लोगों के पास समान अधिकार हैं. केजरीवाल को जमानत देने से गलत संदेश जाएगा. जांच के लिए उन्हें छह महीने में नौ बार तलब किया गया। लेकिन वह एक बार भी सामने नहीं आये. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ”देश में आम चुनाव चल रहा है, हम इसे कभी नजरअंदाज नहीं कर सकते.”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ”हम जांच करते हैं कि अंतरिम जमानत देते समय किसी के साथ दुर्व्यवहार तो नहीं किया जाएगा.” ईडी ने कोर्ट को बताया कि केजरी को जांच में ‘असहयोग’ करने के कारण गिरफ्तार किया गया है. केंद्रीय जांच ब्यूरो का कहना है कि अगर केजरीवाल को जमानत दे दी गई तो लोग सोचेंगे कि उन्होंने कुछ नहीं किया है।

निर्वाचित सांसद के खिलाफ बलात्कार और महिला-उत्पीड़न के वीडियो सोशल मीडिया पर जारी !

0

एक निर्वाचित सांसद के खिलाफ बलात्कार और महिला-उत्पीड़न के वीडियो, तस्वीरें और जानकारी वाली 3,000 फाइलों वाली एक पेन ड्राइव मिल रही है, एक के बाद एक आरोप सामने आ रहे हैं, चुनाव के बाद विदेश भाग गए नेता के खिलाफ इंटरपोल नोटिस जारी किए जा रहे हैं।
तूने जिनका अपमान किया है,/ उन सब के बराबर होगा।” जब रवीन्द्रनाथ ने इस अभागे देश के लिए यह कविता लिखी थी, तब भारत स्वतंत्र नहीं था, शासक और शासन का चुनाव जनमत के आधार पर नहीं होता था। आज ये सब किताबों में है, 18वें आम चुनाव का तीसरा चरण बीत चुका है, लेकिन एक चीज़ नहीं बदली- शासक की अपमान करने की आदत. सबसे बड़े लोकतंत्र का सबसे बड़ा घोटाला: निर्वाचित शासक जनता का अपमान करेगा, उस अपमान को शासन के स्तर पर ले जाएगा। अनादर के स्तर कई गुना हैं; लेकिन इसका सार लोगों के प्रतिनिधियों के रूप में दुष्टों के चयन में निहित है। हाल के दिनों में भारत में हुए हर चुनाव से पता चला है कि उम्मीदवारों के चयन में अपराध कोई कारक नहीं है। खासकर केंद्र में सत्तारूढ़ दल के लिए, एक उम्मीदवार का आपराधिक रिकॉर्ड लगभग एक प्रमाण पत्र की तरह होता है: अपराध जितना गंभीर होगा, उतना ही गंभीर होगा। वरना प्राजंल रेवन्ना, बृजभूषण सिंह, कुलदीप सेंगर क्यों चुनाव में बीजेपी का चेहरा बनेंगे, प्रधानमंत्री खुद किसी के समर्थन से जनसभा में वोट मांगेंगे; ‘सुधारवादी’ नेता बिल्किस बानो गैंग रेप की आरोपी को विधानसभा चुनाव में मिलेगा टिकट!

एक निर्वाचित सांसद के खिलाफ बलात्कार और महिला-उत्पीड़न के वीडियो, तस्वीरें और जानकारी वाली 3,000 फाइलों वाली एक पेन ड्राइव मिल रही है, एक के बाद एक आरोप सामने आ रहे हैं, चुनाव के बाद विदेश भाग गए नेता के खिलाफ इंटरपोल नोटिस जारी किए जा रहे हैं। देश के सर्वश्रेष्ठ पहलवान यौन उत्पीड़न के आरोप में एक नेता के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं, कुछ विरोध में खेल छोड़ रहे हैं। इन नेताओं के कुकर्मों का बेड़ा भयावह है, लेकिन इससे भी ज्यादा चिंताजनक है इनके न्यूनतम या बिना किसी सज़ा के बच निकलने के उदाहरण। कुछ के मामले में, इसे पार्टी या गठबंधन में लौटने के लिए समय और अवसर लेते हुए पार्टी से निष्कासित कर दिया जाता है; कुछ मामलों में आरोपी को टिकट देने के बजाय उम्मीदवार के बेटे को सेब के अलावा कुछ नहीं दिया गया। न्यायिक प्रक्रिया के लंबे और जटिल चक्र में अदालत में खड़े होने का कलंक धीरे-धीरे सार्वजनिक स्मृति से मिट जाता है। यह एक अटूट चक्र है, जहां आरोपी, अपराधी या दागी नेता के चेहरे बदल जाते हैं, पार्टी और सत्ता की छत्रछाया में उनके पालन-पोषण और संरक्षण की व्यवस्था नहीं बदलती। भाजपा शासन में ऐसे मामलों के प्रसार से पता चलता है कि किसी नेता, उम्मीदवार या जन प्रतिनिधि के लिए क्या व्यवहार स्वीकार्य है और क्या नहीं, यदि कोई आरोपी या अपराधी उम्मीदवार किसी भी सीमा को पार करता है तो उसे छोड़ दिया जाना चाहिए – उनके पास कोई नीति नहीं है; सारी नैतिकता, असीम पूर्वाग्रह का दलदल ही है।

सत्ताधारी दल का ऐसा व्यवहार न केवल लोकतंत्र के विपरीत है, बल्कि नागरिकों के विचारों की अवमानना ​​और उपेक्षा के धरातल पर खड़ा है। यदि एक पक्ष अपराध और अपराधियों को नज़रअंदाज कर रहा है, तो दूसरा पक्ष विभिन्न स्तरों के नागरिकों के अधिकारों और सशक्तिकरण से पूरी तरह इनकार कर रहा है; कभी महिलाओं पर अत्याचार, कभी धार्मिक अल्पसंख्यकों पर, कभी दलितों पर। भाजपा और उसका गठबंधन भले ही चुनावी घोषणापत्रों और सार्वजनिक सभाओं में महिलाओं को सशक्त बनाने की बात करते हों, लेकिन उनके अनगिनत नेताओं, कार्यकर्ताओं और उम्मीदवारों की उपलब्धियों से यह स्पष्ट है कि महिलाओं के सम्मान, समानता और सुरक्षा के सवाल उनके लिए बेमानी और निरर्थक हैं, महिलाएं हैं उनके लिए वोट बैंक बुक से ज्यादा कुछ नहीं। धार्मिक ध्रुवीकरण और जाति की राजनीति का तो जिक्र ही नहीं, ये दोनों वोट हथियाने के लिए सत्ताधारी पार्टी के उम्मीदवारों के हथियार बन गए हैं। लोकतंत्र का मूल मंत्र नागरिकों के अधिकार और सम्मान हैं, इन्हें लगातार नकार कर कोई आगे नहीं बढ़ सकता, यह बात शासक को याद रखनी होगी।

‘अश्लील’ वीडियो मामले में जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) प्रमुख एचडी देवेगौड़ा के बेटे एचडी रेवन्ना की मुश्किलें बढ़ गई हैं। विशेष जांच दल यानी एसआईटी ने उनके खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया है. सूत्रों के मुताबिक, वह देश छोड़कर न जा सकें, इसलिए यह नोटिस जारी किया गया है।

पिछले हफ्ते, प्राजल के यौन दुराचार के 1,300 वीडियो (जिसे आनंदबाजार ऑनलाइन ने सत्यापित नहीं किया है) से भरी एक पेन ड्राइव सामने आई थी। शिकायतकर्ता देवराज गौड़ा ने दावा किया कि पिछले पांच सालों से हासन के सांसद हजारों महिलाओं के साथ बलात्कार और यौन उत्पीड़न के वीडियो रिकॉर्ड करते थे। उन्होंने कहा, ”प्रज्जल का इरादा पीड़ितों को ब्लैकमेल करना था.” हालांकि, घटना के बाद देवेगौड़ा के पोते ने देश छोड़ दिया.

कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार पहले ही एक सीट गठित कर घटना की जांच के आदेश दे चुकी है. उन्होंने तदनुसार जांच शुरू कर दी है। नोटिस जारी कर प्राजल और उनके पिता एचडी रेवन्ना को पूछताछ के लिए बुलाया गया है. हालाँकि, अभी तक कोई भी जांच अधिकारियों के सामने पेश नहीं हुआ है। जांच अधिकारियों को डर है कि एचडी रेवन्ना पूछताछ से बचने के लिए देश छोड़ सकते हैं. इसलिए उनके खिलाफ पहले लुकआउट नोटिस जारी किया गया था. वहीं देवेगौड़ा के बेटे पर भी एक महिला के अपहरण का आरोप लगा है.

बीजेपी चिंतित! तीसरे चरण के बाद भी उत्तर प्रदेश या गुजरात में मतदान प्रतिशत में कोई खास सुधार नहींl

लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण की प्राथमिक दर से वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी के संकेत मिले हैं, हालांकि पहले दो चरणों की तुलना में यह मामूली थी। हालाँकि, भाजपा नेतृत्व विशेष रूप से आश्वस्त नहीं है। काउ-ज़ोन राज्यों में मध्य प्रदेश में 66 प्रतिशत मतदान हुआ। लेकिन मध्य प्रदेश के अलावा उत्तर प्रदेश और गुजरात में बीजेपी के औसत मतदान प्रतिशत में कोई खास सुधार नहीं हुआ.

पहले दो चरणों में 60 फीसदी के करीब मतदान हुआ था. हालांकि बाद में यह बढ़कर 66 फीसदी हो गया. वहीं, आज रात 11:40 बजे तक देशभर की 93 लोकसभा सीटों पर औसतन 64.40 फीसदी वोट पड़े। चुनाव आयोग को लगता है कि अंतिम आंकड़ों में वह पहले दो चरणों से आगे निकल जाएगा. जिन 93 निर्वाचन क्षेत्रों में आज मतदान हो रहा है, उनमें से भाजपा ने पांच साल पहले लोकसभा में 71 सीटें जीती थीं। इस सूची में गुजरात की 26 सीटें भी शामिल हैं, जिनमें से सभी पिछली बार भाजपा ने जीती थीं। उस नतीजे को बरकरार रखना अब बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती है.

नरेंद्र मोदी आज सुबह अहमदाबाद के निशान हायर सेकेंडरी स्कूल मतदान केंद्र पर वोट डालने पहुंचे. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी मौजूद रहे. मतदान के बाद प्रधानमंत्री कुछ दूर तक पैदल चले और कार में बैठ गये. सड़क के दोनों ओर भीड़ में एक अंधी लड़की को देखकर मोदी उससे बात करने के लिए आगे बढ़े। बच्ची ने प्रधानमंत्री को गले लगाकर गले लगा लिया. जब एक सुरक्षा गार्ड ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो मोदी ने उन्हें आंख मारकर आगे बढ़ने को कहा. प्रधानमंत्री ने बच्ची के सिर पर हाथ रखा और कुछ देर बात की. इसके बाद उन्होंने मीडिया के जरिए देशवासियों से कहा, ”आज तीसरे चरण का मतदान है. हमारे देश में दान का बहुत महत्व है. इसे ध्यान में रखते हुए नागरिकों को अधिक से अधिक मतदान करना चाहिए।

भले ही प्रधान मंत्री ने स्वयं मतदान करके अनुरोध किया, उनके अपने राज्य, गुजरात में मतदान प्रतिशत काफी कम था। दिन के अंत में गुजरात में 58.98 फीसदी वोटिंग हुई. बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, गुजरात में बड़े फेरबदल की संभावना कम है. इसलिए मतदान कम होने पर भी चिंता की कोई बात नहीं है। बल्कि पहले दो एपिसोड की तरह ही उत्तर प्रदेश के आंकड़ों ने भी बीजेपी को असहज कर दिया है. तीसरे चरण में उत्तर प्रदेश की जिन दस सीटों पर मतदान हुआ, उन इलाकों को मुख्य रूप से यादव-भूमि के नाम से जाना जाता है. मुलायम सिंह यादव के परिवार के तीन सदस्य आज दस में से तीन निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए मैदान में थे। दिन के अंत में उत्तर प्रदेश में 57.34 फीसदी वोटिंग हुई. नतीजतन, पार्टी नेतृत्व को लगता है कि इस यात्रा में भी बीजेपी कार्यकर्ताओं-समर्थकों का एक बड़ा हिस्सा बूथ पर नहीं गया.

बिहार में भी यही स्थिति है. नीतीश कुमार के राज्य में 58.18 फीसदी मतदान हुआ. हालांकि, इस सफर में मध्य प्रदेश में 66.05 फीसदी वोटिंग होने से बीजेपी कार्यकर्ताओं में थोड़ी राहत है. पार्टी नेतृत्व का दावा है कि वे इस बार राज्य की सभी 9 सीटें जीतने जा रहे हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव प्रचार में ध्रुवीकरण की राह पर चल रहे हैं. तीसरे दौर के मतदान के दिन मंगलवार को ध्रुवीकरण उनके अभियान का मुख्य स्वर था। गौरतलब है कि इस दिन कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने मतदाताओं से मोदी के ध्रुवीकरण प्रयासों को खारिज करने की अपील की थी. उन्होंने सीधे तौर पर कहा, ”यह नफरत फैलाने वाला भाषण और ध्रुवीकरण की कोशिश राजनीतिक फायदे के लिए है.” इस दिन, तृणमूल नेता और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी मोदी की ध्रुवीकरण की राजनीति के खिलाफ सामने आईं. उनका कटाक्ष, ”मोदी मैजिक ख़त्म!” और मोदी नहीं आएंगे!” मौजूदा लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान के बाद से ही मोदी विकसित भारत का प्रचार छोड़कर सीधे ध्रुवीकरण की राह पर चल रहे हैं. उन्होंने बिना किसी प्रतिक्रिया के मुगलों, मुस्लिम लीग, मांस-भक्षण जैसे मुद्दों पर अभियान चलाया, अगले दौर से पहले उन्होंने महाराज बनाम नवाब, राज बनाम बादशाह के साथ कांग्रेस पर हमला किया। इस बार मोदी ने तीसरी बार ‘वोट जिहाद’ को ‘हथियार’ दिया है. वह जहां भी संभव हो उस ‘हथियार’ का उपयोग कर रहा है। मध्य प्रदेश के खरगोन में आज का चुनाव प्रचार कुछ अलग नहीं था. प्रधानमंत्री ने कहा, ”भारत आज इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है. आपको तय करना है कि भारत में ‘वोट जिहाद’ चलेगा या राम राज्य?” मोदी ने कहा, ”मोदी को 400 सीटें चाहिए क्योंकि कांग्रेस अयोध्या में राम मंदिर में बाबरी का ताला नहीं लगा सकती.” उन्होंने कांग्रेस पर ‘वोट जिहाद’ का आरोप लगाते हुए कहा, ‘कांग्रेस कह रही है, मोदी के खिलाफ ‘वोट जिहाद’ करो.’ यानी एक खास धर्म के लोगों को मोदी के खिलाफ गठबंधन के तौर पर वोट देने के लिए कहना! सोचिए कांग्रेस किस स्तर पर आ गई है! वे हताशा के कारण उस स्थिति में हैं।

मोदी ने कांग्रेस पर निशाना साधने के लिए पाकिस्तान को भारत के मतदान क्षेत्र में घसीटना नहीं छोड़ा। उनके शब्दों में, ”कांग्रेस के एक पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि सेना आतंकवादी गतिविधियां करती है… पाकिस्तान निर्दोष है. एक अन्य कांग्रेस नेता ने कहा कि मुंबई आतंकी हमलों के पीछे पाकिस्तान का हाथ नहीं है. “भारत” विपक्ष के एक नेता फिर कहते हैं, “पाकिस्तान चूड़ियाँ पहनकर नहीं बैठा है।”

कांग्रेस समेत विरोधियों का कहना है कि मोदी के पास अपने अभियान में कोई सकारात्मक हथियार नहीं है. इसलिए हताशा में उन्होंने ध्रुवीकरण का रास्ता चुना. मोदी के इस हथियार को कुंद करने के लिए कांग्रेस मुख्य रूप से उनके सामाजिक-आर्थिक एजेंडे को साधने में सक्रिय है। पार्टी का चुनाव घोषणा पत्र जारी होने के बाद सोनिया ने आज पहला वोट संदेश दिया. प्रधानमंत्री और भाजपा ने देश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को पटल पर ला दिया है।’ एक वीडियो संदेश में उन्होंने कहा, ”युवा समुदाय गंभीर बेरोजगारी का सामना कर रहा है। महिलाओं पर अत्याचार होता है, दलितों-आदिवासियों-पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के साथ भारी भेदभाव होता है। देश के हर कोने में यही तस्वीर है. ये है मोदी और बीजेपी के लिए देश की हालत. देश के विकास में उनकी कोई सद्भावना नहीं है. उनका एकमात्र उद्देश्य किसी भी कीमत पर सत्ता पर कब्ज़ा करना है।

ममता भी मोदी और बीजेपी के ध्रुवीकरण के विरोध में उतर आई हैं. पुरुलिया की एक चुनावी रैली में तृणमूल नेता चुनाव आयोग की आलोचना करने से नहीं चूके. उन्होंने कहा, ”उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों को वोट देने से नहीं रोका जा रहा है. वोट देने गये थे, धूप में पीट-पीट कर मार डाला. मुझे अभी खबर मिली. क्या आपको लगता है कि चुनाव आयोग कार्रवाई करेगा? बिल्कुल नहीं यह ‘आदर्श आचार संहिता’ नहीं, ‘मोदी आचार संहिता’ है! कुछ लोग बीजेपी की मध्यस्थता कर रहे हैं. बांग्ला में छूओगे तो लोग हाथ जोड़ लेंगे. अगर पांच मुसलमानों को वोट नहीं देने दिया गया तो क्या नरेंद्र मोदी जीतेंगे! अरे नहीं, पांच लाख, पांच करोड़ और आपके खिलाफ वोट करेंगे। ”मतदान अत्याचार से नहीं होता.”

रणबीर ने डिलीट कीं दीपिका की शादी की तस्वीरें, क्या बच्चे के जन्म से पहले हो गया ब्रेकअप?

0

रणबीर ने डिलीट कीं दीपिका की शादी की तस्वीरें, क्या बच्चे के जन्म से पहले हो गया ब्रेकअप? ‘बेबीमून’ में दीपिका पादुकोण हैं। लेकिन उनके बीच ऐसा क्या हुआ कि रणवीर ने शादी की सारी तस्वीरें सोशल मीडिया पेज से डिलीट कर दीं। एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह के घर सितंबर में नया मेहमान आने वाला है। कुछ दिन पहले तक दीपिका शूटिंग करती रहीं। रोहित शेट्टी द्वारा निर्देशित ‘सिंघम 3’ में अभिनेत्री एक महिला पुलिस अधिकारी की भूमिका में नजर आएंगी। हालांकि फिलहाल वह अपने पति के साथ ‘बेबीमून’ पर हैं। लेकिन उनके बीच ऐसा क्या हुआ कि रणवीर ने शादी की सारी तस्वीरें सोशल मीडिया पेज से डिलीट कर दीं।

शादी के पाँच साल, शादी से पहले छह साल का प्यार। बॉलीवुड स्टार दीपिका-रणवीर नवंबर 2018 में एक-दूसरे के साथ शादी के बंधन में बंधे थे। उनकी शादी दो तरह के रीति-रिवाजों से होती है, सिंधी और दक्षिण भारतीय। शादी के बाद उन्होंने अपनी शादी की तस्वीरें भी अपने सोशल मीडिया पर शेयर कीं। फिलहाल ये कपल अपनी शादीशुदा जिंदगी में काफी परिपक्व मुकाम पर पहुंच चुका है। ये कपल अपने परिवार में नए मेहमान का स्वागत करने के लिए तैयार है. लेकिन अचानक ही जैसे लय में गिरावट आ गई और शादी की तस्वीरें डिलीट होने से अटकलें लगने लगीं। हालाँकि, बच्चे के जन्म से पहले ही उनका मनोबल प्रदूषित हो जाता है!

एक्ट्रेस इस साल मेट गाला से नदारद रहीं. लाइमलाइट से थोड़ा दूर. आलिया ने इस साल के ‘मेट गाला’ में सबका ध्यान अपनी ओर खींचा, जहां दीपिका का आउटफिट चलन में नहीं है। आलोचकों का कहना है कि एक्टर ने पब्लिसिटी के लिए ऐसा किया. पिछले दिनों विक्की कौशल और कैटरीना कैफ की शादी के दौरान दीपिका ने अपनी शादी की तस्वीरें दोबारा पोस्ट की थीं, उस वक्त कई लोगों ने कहा था कि दीपिका असुरक्षा से जूझ रही हैं। हालाँकि, क्या इस बार ‘दीपबीर’ की जोड़ी ने ऐसा कुछ किया! या फिर इसके पीछे कोई और वजह है ये तो वक्त ही बताएगा.

प्रेगनेंसी के दौरान भी दीपिका पादुकोण ने शूटिंग जारी रखी। रोहित शेट्टी द्वारा निर्देशित ‘सिंघम 3’ की शूटिंग चल रही है। लेडी सिंघम का किरदार रणवीर घरानी निभा रहे हैं. स्टार्स को अक्सर फैन्स से तोहफे मिलते रहते हैं। दीपिका को मिला ऐसा खास तोहफा. फूलों की सजावट वाला एक छोटा सा नोट। अभिनेत्री ने बुधवार सुबह इंस्टाग्राम पर उपहार की एक तस्वीर साझा की। लेकिन एक्ट्रेस ने ये नहीं बताया कि ये गिफ्ट किसने दिया.

“हमारे हीरो, लेडी सिंघम”, चिरकुट की लेखनी ने दीपिका के दिल को छू लिया। माना जा रहा है कि ये गिफ्ट दीपिका को ‘सिंघम 3’ या ‘सिंघम अगेन’ की शूटिंग फ्लोर पर भेजा गया था. इस फिल्म में अजय देवगन मुख्य भूमिका निभा रहे हैं. इसके अलावा रणवीर सिंह, अक्षय कुमार और करीना कपूर भी अहम भूमिकाओं में हैं.

रोहित शेट्टी ने कहा, दीपिका इस फिल्म के हीरो में से एक हैं. उनकी कहानी ही फिल्म का मुख्य संदर्भ बनेगी. इस फिल्म में पिछली दो ‘सिंघम’ फिल्मों से कुछ अंतर है। फिल्म ‘सिंघम 3’ में रोहित शेट्टी और भी नए किरदारों को दर्शकों के सामने पेश करेंगे। ये फिल्म उन नए किरदारों की कहानी बताएगी.

दीपिका-रणवीर की जोड़ी ने इसी साल फरवरी में अपनी प्रेग्नेंसी की घोषणा की थी. उन्होंने बताया कि सितंबर में उनके परिवार में एक नया सदस्य आएगा. स्क्रीन के बाहर भी इस जोड़ी के सिजलिंग रोमांस ने दर्शकों का ध्यान खींचा। जब से दीपिका के मां बनने की खबर आई है, प्रशंसकों ने प्यारी जोड़ी ‘दीवीर’ को ढेर सारी शुभकामनाएं दी हैं।

दीपिका पादुकोण इस साल की शुरुआत में मां बनीं। सितंबर में ‘दीपबीर’ कपल के घर नया मेहमान आने वाला है। शादी के पांच साल बाद रणवीर-दीपिका माता-पिता बनने वाले हैं। सुनने में आ रहा है कि एक्ट्रेस प्रेग्नेंसी के दूसरे स्टेज में पहुंच गई हैं. हालांकि दीपिका को देखकर ये बात समझ नहीं आती. हालाँकि, कई लोगों ने अभी से यह कहना शुरू कर दिया है कि यह जोड़ा शायद सरोगेसी की मदद ले रहा है। हालाँकि, उन्होंने अभी तक इस मामले पर कोई टिप्पणी नहीं की है। हालांकि, रणवीर सिंह ने बेटी नहीं बल्कि बेटे की चाहत जताई।

दीपिका और रणवीर दोनों को बच्चे बहुत पसंद हैं. रणवीर ने बच्चे का नाम तय कर लिया है. अगर लड़का है तो उसका नाम शौर्यवीर सिंह रखें. ये बात उन्होंने खुद एक इंटरव्यू में कही थी. हालांकि एक समय रणवीर ने कहा था कि उन्हें बेटी चाहिए। जो हूबहू दीपिका की तरह दिखें। हालांकि, हाल ही में जब एक्टर से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘जब हम भगवान के मंदिर में जाते हैं और प्रसाद चुनते हैं तो हम क्या करते हैं?’ नहीं इसलिए भगवान जो भी देता है मैं उसमें खुश हूं।”

दीपिका के मां बनने की खबर के बाद से ही एक्टर अपनी पत्नी को करीब रखते नजर आ रहे हैं. चाहे अनंत अंबानी का प्री-वेडिंग फंक्शन हो, या उन्हें एयरपोर्ट पर छोड़ना हो – रणवीर हमेशा दीपिका का ध्यान रखते हुए नजर आते हैं। इस बार सिंघा परिवार में नए मेहमान के आने का इंतजार है।

सिद्धार्थ के पास एसएससी घोटाले का स्पष्टीकरण नहीं! कैसे अयोग्य शिक्षकों की संख्या बदल रही हैl

0

एसएससी ने पहले ही 5250 लोगों की अवैध भर्ती की रिपोर्ट दी थी. वहीं इस दिन एसएससी ने सीबीआई के हवाले से सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 2016 में 8861 अवैध नियुक्तियां हुईं.

सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश से मिली अस्थायी राहत के बावजूद, शिक्षक तब तक अपना संघर्ष जारी रखना चाहते हैं जब तक कि स्कूल सेवा आयोग (एसएससी) सबूत के साथ योग्य उम्मीदवारों की सूची प्रकाशित नहीं कर देता।

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले से साफ हो गया कि 2016 में एसएससी की नौकरी पाने वाले शिक्षकों और शिक्षाकर्मियों की नौकरी 16 जुलाई तक बरकरार रहेगी. एसएससी ने पहले ही 5250 लोगों की अवैध भर्ती की रिपोर्ट दी थी. वहीं इस दिन एसएससी ने सीबीआई के हवाले से सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 2016 में 8861 अवैध नियुक्तियां हुईं. एसएससी के अध्यक्ष सिद्धार्थ मजूमदार ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की कि अपात्रों की संख्या कैसे बदली।

2016 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने अवैध भर्ती को लेकर एसएससी से अपात्रों की सूची मांगे बिना ही उस समय के पूरे पैनल को रद्द कर दिया था. एसएससी, राज्य सरकार और नौकरी गंवाने वाले शिक्षक उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए हैं। ऐसी ही एक शिक्षिका स्वर्णाली चक्रवर्ती ने कहा, ”हमें कक्षा में रहना चाहिए, लेकिन हमें अदालत कक्ष में रहना होगा. सम्मान की इस हानि को पूरी तरह रोका जाए.” शिक्षक वृन्दावन घोष के शब्दों में, ”अगर एसएससी ने हाई कोर्ट से कहा होता कि वे पात्र और अपात्र की सूची प्रदान कर सकते हैं, तो हम सुप्रीम कोर्ट नहीं जाते.”

इस दिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन लोगों को 2016 में नौकरी मिली है, उन्हें यह जमानत देनी होगी कि अगर उनकी नियुक्ति ‘अवैध’ साबित हुई तो वे पैसे लौटा देंगे. शिक्षक मेहबूब मंडल ने दावा किया, ”हमने सुप्रीम कोर्ट में मामला दायर करते समय यह बांड पहले ही दे दिया है. मैंने कहा, अगर इसमें झूठ है तो सुप्रीम कोर्ट जो सजा देगा, मैं भुगतूंगा.

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद इस दिन संघर्ष के संयुक्त मंच पर बैठे नौकरी गंवा चुके शिक्षकों ने अपनी भूख हड़ताल उठा ली. मौमिता सरकार ने कहा, ‘एसएससी का कहना है कि उनके पास सभी ओएमआर शीट नहीं हैं। यह सही नहीं है। ओएमआर शीट कक्षा 9-10 के शिक्षकों के लिए उपलब्ध हैं। जिनके पास ओएमआर शीट नहीं है वे सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी मांगकर ओएमआर शीट प्राप्त कर रहे हैं। एसएससी वह ओएमआर शीट कहां से दे रहा है?

इस दिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद तमलुक शहर में तृणमूल शिक्षक संगठन की पहल पर धरना-प्रदर्शन हुआ. तृणमूल माध्यमिक शिक्षक संघ के राज्य महासचिव बिजन सरकार ने कहा, ”हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने लोकसभा चुनाव के मद्देनजर जल्दबाजी में फैसला सुनाया, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने नौकरी रद्द करने पर रोक लगा दी.” सीबीआई जांच पर रोक नहीं लगाई. शीर्ष अदालत ने कहा कि कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार सीबीआई अवैध भर्ती की जांच जारी रखेगी। मंगलवार को चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने कहा कि हाई कोर्ट के निर्देश के बाद अवैध भर्ती की जांच सीबीआई करेगी. लेकिन केंद्रीय जांच एजेंसी कोई सख्त कार्रवाई नहीं कर सकती. हाई कोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई को उस मामले की जांच तीन महीने के भीतर पूरी करनी है. इस मामले की अगली सुनवाई 16 जुलाई को होगी.

22 अप्रैल को कलकत्ता हाई कोर्ट ने एसएससी भर्ती भ्रष्टाचार मामले में 25753 नौकरियां रद्द करने का फैसला सुनाया. हाईकोर्ट ने नौकरी रद्द करने के साथ ही फैसले में कहा कि चारों विभागों में हुई भर्तियों की आगे की जांच सीबीआई करेगी. एक्सपायर्ड पैनल और व्हाइट बुक जमा कर पैन के बाहर नौकरी पाने वालों से सीबीआई पूछताछ करेगी। जरूरत पड़ने पर उन्हें हिरासत में भी लिया जा सकता है. कोर्ट ने सीबीआई को मामले की जांच कर तीन महीने के भीतर रिपोर्ट सौंपने को कहा है. सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले के इस हिस्से को बरकरार रखा. हालांकि, इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीबीआई किसी के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं कर सकती.

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान पात्र और अपात्र व्यक्तियों की सूची पर कई बार सवाल उठाए. एसएससी ने आंकड़ों के साथ अदालत को बताया कि उस भर्ती प्रक्रिया में 8324 उम्मीदवारों को अयोग्य के रूप में पहचाना गया था। उच्च न्यायालय ने सीबीआई से अतिरिक्त रिक्तियों या ‘अतिरिक्त पदों’ के सृजन के लिए राज्य मंत्रिमंडल की जांच करने को भी कहा। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी थी. मंगलवार की सुनवाई में चीफ जस्टिस की बेंच ने आदेश को बरकरार रखा.

आखिर क्या है प्रज्वल रेवन्ना का सेक्स स्कैंडल?

आज हम आपको प्रज्वल रेवन्ना का सेक्स स्कैंडल बताने जा रहे हैं! सोशल मीडिया पर प्रज्वल नाम ट्रेंड कर रहा है। दरअसल, कर्नाटक के हासन सीट से सांसद और चुनावों में भाजपा की सहयोगी जेडीएस के मौजूदा उम्मीदवार प्रज्वल रेवन्ना अश्लील वीडियो की वजह से चर्चा में है। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के पोते प्रज्वल पर यौन उत्पीड़न, सैकड़ों आपत्तिजनक वीडियो रिकॉर्ड करने, धमकाने और साजिश रचने के आरोप हैं। उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। वहीं, भाजपा नेता देवराजे गौड़ा का एक लेटर भी सामने आया है, जिसमें उन्होंने बीते साल दिसंबर में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र को लिखी थी। इस लेटर में उन्होंने दावा किया है कि मेरे पास एक पेन ड्राइव है, जिसमें महिलाओं के यौन शोषण के करीब 3000 वीडियो हैं, जिनका इस्तेमाल महिलाओं को ब्लैकमेल करने में किया जाता रहा है। अंग्रेजी के चर्चित उपन्यासकार जेम्स ग्राहम बैलार्ड का एक मशहूर कथन है-पोर्नोग्राफी का बढ़ता चलन का मतलब यह है कि प्रकृति हमें अलर्ट कर रही है कि हमारे विलुप्त होने का खतरा बढ़ गया है। भारत में इंटरनेट पोर्नोग्राफी बेहद पॉपुलर है। जो इस वक्त 30 फीसदी से बढ़कर 70 फीसदी जा पहुंची। वहीं, इंडियन स्ट्रीम्स रिसर्च जर्नल की एक रिपोर्ट के अनुसार, शहरी युवा जैसे हरियाणा में पोर्नोग्राफी देखने का चलन काफी ज्यादा है। इनमें से ज्यादातर लोग 74 फीसदी अपने मोबाइल फोन में ही ये अश्लील वीडियो या फोटो देखते हैं। क्वार्ट्ज की एक रिपोर्ट के अनुसार, इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले 50 फीसदी भारतीय अपने मोबाइल फोन पर पॉपुलर पोर्नोग्राफी वेबसाइट्स देखते हैं।

किसी के आपत्तिजनक वीडियो या फोटो लेना एक तरह का पैराफिलिया है। यह एक ऐसा मनोवैज्ञानिक विकार है, जिसमें कुंठा या अवसाद से पीड़त यौन कल्पनाओं की दुनिया में डूबा रहता है। वैसे तो पैराफिलिया यूनानी भाषा का शब्द है, जिसका मतलब है कि प्यार से इतर असामान्य यौन इच्छा। ये एक तरह की कुंठा है, जो सामाजिक तौर पर खतरनाक मानी जाती है। अमेरिका की नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के अनुसार, पैराफिलिया लगभग 550 तरह के होते हैं। वहीं, कुछ लोगों में बचपन में ‘सेक्शुअल मैसोचिज्म डिसऑर्डर’ यानी दूसरों को सताने में आनंद आने जैसा विकार पनपता है। ऐसा व्यक्ति पोर्नोग्राफी और सेक्शुअल कंटेंट को लगातार देखता रहता है और कुछ असामान्य हालात में वह खुद पर काबू नहीं रख पाता। कुछ कुंठित लोग रेप जैसे अपराध भी कर बैठते हैं। ऐसे मनोविकार को ‘बायस्टोफिलिया’ भी कहते हैं। हमारे शरीर में दिमाग ही हमसे सबकुछ कराता है। यह सब कुछ हॉर्मोन के बदलाव की वजह से भी होता है। अमेरिका की नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के अनुसार, जो लोग पैराफिलिया से ग्रस्त होते हैं, उनके शरीर में सिरोटोनिन और नॉरपीनेफ्रिन हॉर्मोन काफी बढ़ जाता है। वैसे तो यौन कल्पनाओं में डूबा व्यक्ति तभी तक ठीक है, जब तक वह खुद को या दूसरे को नुकसान नहीं पहुंचाता है। इन 5 लक्षणों से पैराफिलिया से ग्रस्त व्यक्ति की पहचान की जा सकती है। ऐसे लोगों में बार-बार यौन भावनाएं उमड़ती हैं। किसी वस्तु या व्यक्ति के बारे में यौन फैंटेसी बुनते रहते हैं। बार-बार खुद को या दूसरों को पीड़ा पहुंचाते हैं। बच्चों या लड़कियों को शिकार बनाते हैं। बिना पार्टनर की सहमति के संबंध बनाते हैं और आक्रामक बर्ताव हो जाता है।

एक्सप्लोरिंग योर माइंड’ पर प्रकाशित एक स्टडी में कहा गया है कि आम तौर पर पहले यही माना जाता था कि पैराफिलिया के मनोरोगी सिर्फ पुरुष ही होते हैं। मगर, कई स्टडी के अनुसार, पैराफिलिया पुरुषों में 85 फीसदी तो महिलाओं में 15 फीसदी पाया जाता है। पैराफिलिया का किसी दवा से 100 फीसदी इलाज संभव भी नहीं है। अमेरिका की नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के अनुसार, पैराफिलिया ग्रस्त व्यक्ति किसी भी माहौल में आसानी से ढल जाता है। इनमें विनम्रता के साथ अहंकार भी होता है। ऐसी दोहरी पर्सनालिटी की वजह से इनके इलाज में मुश्किल आती है। ऐसा व्यक्ति अपने भीतर की कमी को नहीं मानता है और दूसरों से अपनी खामी बताते भी नहीं हैं।

सेक्शटॉर्शन यानी आपत्तिजनक वीडियो बनाकर ब्लैकमेल करने का चलन गलत तरीके से जल्दी पैसे कमाने का जरिया बन चुका है। इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट यानी आईटी एक्ट की धारा 67 में कहा गया है कि आपत्तिजनक फोटो या वीडियो जैसे अश्लील कंटेंट को फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया पर पोस्ट करना और इंटरनेट पर फैलाना अपराध है। ऐसे मामलों में पहली बार दोषी ठहराए जाने पर 5 साल तक की कैद और 10 लाख तक जुर्माना हो सकता है। दूसरी बार ऐसा करते हुए पाए जाने पर 7 साल तक की कैद और 10 लाख तक जुर्माना या दोनों हो सकता है। तकनीकी आधारित अपराध के मामले दिनोंदिन बढ़ रहे हैं। ये नए-नए रूपों में आ रहे हैं। ऐसे में इसके लिए अलग से कानून बनाया जाना चाहिए।

उत्तर प्रदेश की लोकसभा सीटों को अचानक से क्यों संभालने लगे अमित शाह?

हाल ही में गृहमंत्री अमित शाह उत्तर प्रदेश की लोकसभा सीटों को अचानक से संभालने लगे हैं! उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के दो चरणों का मतदान हो चुका है। अब तीसरे चरण में 10 सीटों पर 7 मई को वोट डाले जाने हैं। वैसे तो सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और विपक्ष इन दोनों ही चरणों में अपनी जीत के दावे कर रहे हैं। लेकिन दोनों ही चरणाें में घटे वोटिंग प्रतिशत ने सभी दलों के माथे पर चिंता की लकीरें पैदा कर दी हैं। यूपी में सभी 80 सीटों पर जीत के दावे कर रही भारतीय जनता पार्टी भी परेशान दिख रही है। यही कारण है चुनाव के बीच पार्टी के ‘चाणक्य’ माने जाने वाले अमित शाह ने मोर्चा संभाल लिया है। अमित शाह यूपी में रैलियों और तमाम आयोजनों में शामिल होने के साथ ही संगठन के कील-कांटे दुरुस्त करने के लिए एक्शन मोड में हैं। लखनऊ के सत्ता के गलियारे में अमित शाह के खुद मोर्चा संभालने को लेकर कई तरह की चर्चाएं भी आम हैं। सबसे ज्यादा चर्चा पार्टी के प्रदेश संगठन के पिछले दो चरणों मे प्रदर्शन को लेकर केंद्रीय नेतृत्व में नाराजगी को लेकर है। पार्टी स्तर पर जो फीडबैक हाईकमान तक गया, उसमें ये बताया गया कि भले ही पहले दो चरणों में वोटिंग प्रतिशत गिरा हो लेकिन भाजपा के वोटर पहुंच रहे हैं। लेकिन दिल्ली से मिली जानकारी के अनुसार पार्टी नेतृत्व यूपी में पार्टी संगठन से ज्यादा खुश नहीं है। उसका मानना है कि खासतौर पर पहले चरण में जिस तरह का ग्राउंड पर एक्शन दिखना चाहिए था वो नहीं दिखा। अभी तक भाजपा के विजयी सफर में उसकी वोटरों को बूथ तक ले जाने की रणनीति सबसे बड़ी ताकत रही है, लेकिन पश्चिम के 8 महत्वपूर्ण सीट, जहां पिछले चुनाव में भाजपा सिर्फ 3 सीटें ही जीत सकी थी, वहां संगठन उतना एक्शन में नहीं था, जितना होना चाहिए था। इसके अलावा ग्राउंड लेवल पर समन्वय का भी अभाव दिखा। इसके अलावा पार्टी संगठन की तरफ से ‘अपनों’ की नाराजगी दूर करने के पर्याप्त उपाय नहीं किए गए।

संगठन की इसी कमजोरी को दूर करने के लिए अमित शाह ने खुद मोर्चा संभाल लिया। दरअसल यूपी में 2014 और 2019 की प्रचंड जीत में अमित शाह का अहम रोल रहा। वह यहां की हर सीट की गुणा-गणित से लेकर जातिगत समीकरण, धार्मिक समीकरण अच्छे से समझते रहे हैं। यही कारण रहा कि दूसरे चरण की वोटिंग होने के ऐन बाद अमित शाह कानपुर पहुंचे और यहां अवध क्षेत्र और कानपुर-बुदेलखंड क्षेत्र की 23 लोकसभा सीटों के संयोजकों एवं सह संयोजकों की बैठक की। इसमें तीसरे और चौथे चरण की 23 सीटों पर बूथ जीता-चुनाव जीता का मंत्र दिया गया।

बैठक में साफ निर्देश दिया गया कि मतदाताओं के घर-घर जाकर मिलिए और उन्हें आयुष्मान योजना का फार्म भी देना न भूलें। पन्ना प्रमुख घर-घर संपर्क करें। वोटिंग हो जाने तक लोगों से संवाद जरूरी है। लोकसभा संयोजकों व जिलाध्यक्षों को निर्देश दिया गया कि उन्हें भाजपा का स्टीकरण हर दरवाजे पर लगाना है। जानकारी के अनुसार कानपुर में करीब 7 चरणों में दर्जनों कार्यकर्ताओं के साथ अमित शाह ने बैठक की। इसमें लोकल नेता भी शामिल थे। उनकी बैठक में सबसे ज्यादा फोकस नाराजगी दूर करने और पार्टी प्रत्याशी को जिताने के लिए एकजुट होने पर रहा।

पिछले दिनों अमित शाह के काशी दौरे (वाराणसी लोकसभा चुनाव) में भी यही देखने को मिला। यहां उन्होंने काशी क्षेत्र के भाजपा पदाधिकारियों के साथ लंबी बैठक की। बता दें कि पार्टी नेतृत्व यूपी में पार्टी संगठन से ज्यादा खुश नहीं है। उसका मानना है कि खासतौर पर पहले चरण में जिस तरह का ग्राउंड पर एक्शन दिखना चाहिए था वो नहीं दिखा। अभी तक भाजपा के विजयी सफर में उसकी वोटरों को बूथ तक ले जाने की रणनीति सबसे बड़ी ताकत रही है, लेकिन पश्चिम के 8 महत्वपूर्ण सीट, जहां पिछले चुनाव में भाजपा सिर्फ 3 सीटें ही जीत सकी थी, वहां संगठन उतना एक्शन में नहीं था, जितना होना चाहिए था। इसमें हर बूथ पर 300 से ज्यादा वोट हासिल करने का लक्ष्य रख दिया गया है। भाजपा कार्यकर्ताओं को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने विधानसभा, ब्लॉक, मंडल, बूथ स्तर पर अलग-अलग वर्गों से जुड़े चौपाल कार्यक्रम, जनसंपर्क और अन्य साधनों से लोगों तक पहुंचें। उनसे अपील करें और बूथ तक लाने की जिम्मेदारी उठाएं।

कानपुर के बाद अमित शाह का काशी दौरा हुआ। यहां भी उन्होंने मैराथन बैठकों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रिकॉर्ड मतों से जिताने की रणनीति बनाई। इस दौरान नरेंद्र मोदी के भव्य रोड शो को लेकर रणनीति बनाई गई। जानकारी के अनुसार अब अमित शाह अगला दौरा लखनऊ का है और यहां भी इसी तरह की बैठकों का दौर जारी रहेगा।

आखिर किन सीटों पर मतदान देने नहीं गए लोग ?

आज हम आपको बताएंगे कि लोग किन सीटों पर मतदान देने नहीं गए! चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनावो में पहले और दूसरे चरण के मतदान के अनंतिम आंकड़े बता दिए। आयोग ने कहा है कि पहले चरण में 66.14% जबकि दूसरे चरण में 66.71% मतदान हुआ था। निर्वाचन आयोग के आंकड़े बताते हैं कि 84% संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में 2019 के चुनावों के मुकाबले वोटिंग घटी है। 2019 में हुए आम चुनावों के पहले चरण के मतदान में 69.4% जबकि दूसरे चरण में 69.6% मतदाताओं ने लोकतंत्र के इस महापर्व में हिस्सा लिया था। इस तरह, 2019 के मुकाबले 2024 के चुनावों के पहले दो चरणों में करीब-करीब 3 प्रतिशत कम वोटिंग हुई है। हालांकि, निर्वाचन आयोग के मुताबिक, पोस्टल बैलेट से प्राप्त वोटों को जोड़ने के बाद ही अंतिम आंकड़े मिल सकेंगे। निर्वाचन आयोग की तरफ से जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक, पहले चरण में 16.63 करोड़ लोग मतदान के योग्य थे जिनमें करीब 11 करोड़ लोगों ने वोट डाले।बता दें कि 2019 की तुलना में 25.2 प्रतिशत अंकों की गिरावट देखी गई। इसी तरह, मध्य प्रदेश के सीधी लोकसभा क्षेत्र में 13 प्रतिशत अंकों की कमी आई। वहीं, उत्तर प्रदेश के मथुरा में 11.6 प्रतिशत, मध्य प्रदेश के खजुराहो में 11.31 प्रतिशत, मध्य प्रदेश के रीवा में 10.9 प्रतिशत, केरल के पथानामथिट्टा में 10.9 प्रतिशत जबकि मध्य प्रदेश के शहडोल में 10.1 प्रतिशत कम वोट पड़े। इसी तरह, दूसरे चरण 15.88 करोड़ पात्र मतदाताओं में से लगभग 10.6 करोड़ ने भाग लिया।पहले चरण के मतदान में 66.22% पुरुष जबकि 66.07% महिला मतदाताओं ने अपनी जिम्मेदारी निभाई। आंकड़ों से पता चला है कि तीसरे लिंग के 31.32% पात्र मतदाताओं ने मतदान प्रक्रिया में भाग लिया। दूसरे चरण के दौरान, 66.99% पात्र पुरुष मतदाताओं ने मतदान किया, जबकि महिला मतदाताओं का प्रतिशत 66.42% रहा। इस चरण में थर्ड जेंडर के लगभग 24% मतदाताओं ने मतदान प्रक्रिया में भाग लिया। पहले चरण में 102 जबकि दूसरे चरण में 88 लोकसभा क्षेत्रों में मतदान हुए थे। आंकड़ों से पता चलता है कि 2019 के जिन 176 लोकसभा क्षेत्रों (परिसीमन में बाकी लोकसभा क्षेत्र बदल गए) में हुए मतदान की तुलना इस वर्ष से की जा सकती है, उनमें 148 पर वोटिंग पर्सेंटेज में गिरावट दर्ज की गई है।

12 निर्वाचन क्षेत्रों की तुलना करना संभव नहीं है क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद उनकी सीमाओं को फिर से निर्धारित किया गया था। इनमें असम की 10 और जम्मू-कश्मीर की दो लोकसभा सीटें शामिल हैं। जिन 148 निर्वाचन क्षेत्रों में 2019 के मुकाबले कम वोटिंग हुई है, उनमें से 124 ऐसे हैं जहां दो प्रतिशत से ज्यादा की गिरवाट दर्ज की गई है। इन 124 सीटों में भी 57 पर तो मतदान में पांच प्रतिशत से अधिक की कमी देखी गई जबकि सात पर 10 प्रतिशत से अधिक की गिरावट हुई है।

जिन सात सीटों पर वोटिंग में सबसे अधिक 10 प्रतिशत से भी ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई है, वो हैं- नागालैंड, जहां 2019 की तुलना में 25.2 प्रतिशत अंकों की गिरावट देखी गई। इसी तरह, मध्य प्रदेश के सीधी लोकसभा क्षेत्र में 13 प्रतिशत अंकों की कमी आई। वहीं, उत्तर प्रदेश के मथुरा में 11.6 प्रतिशत, मध्य प्रदेश के खजुराहो में 11.31 प्रतिशत, मध्य प्रदेश के रीवा में 10.9 प्रतिशत, केरल के पथानामथिट्टा में 10.9 प्रतिशत जबकि मध्य प्रदेश के शहडोल में 10.1 प्रतिशत कम वोट पड़े। पहले चरण के मतदान में 66.22% पुरुष जबकि 66.07% महिला मतदाताओं ने अपनी जिम्मेदारी निभाई। आंकड़ों से पता चला है कि तीसरे लिंग के 31.32% पात्र मतदाताओं ने मतदान प्रक्रिया में भाग लिया। दूसरे चरण के दौरान, 66.99% पात्र पुरुष मतदाताओं ने मतदान किया, जबकि महिला मतदाताओं का प्रतिशत 66.42% रहा। इस चरण में थर्ड जेंडर के लगभग 24% मतदाताओं ने मतदान प्रक्रिया में भाग लिया।

आंकड़े बताते हैं कि 11 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जहां सभी निर्वाचन क्षेत्रों में एक ही चरण में मतदान हुआ, मेघालय एकमात्र ऐसा राज्य था जहां मतदान और कुल मतदाताओं की संख्या दोनों में वृद्धि देखी गई। केरल, नागालैंड, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, मिजोरम और उत्तराखंड में मतदान और कुल मतदाताओं की संख्या दोनों में कमी आई। बता दें कि आम चुनावों के पहले चरण के मतदान में 69.4% जबकि दूसरे चरण में 69.6% मतदाताओं ने लोकतंत्र के इस महापर्व में हिस्सा लिया था। इस तरह, 2019 के मुकाबले 2024 के चुनावों के पहले दो चरणों में करीब-करीब 3 प्रतिशत कम वोटिंग हुई है। हालांकि, निर्वाचन आयोग के मुताबिक, पोस्टल बैलेट से प्राप्त वोटों को जोड़ने के बाद ही अंतिम आंकड़े मिल सकेंगे। निर्वाचन आयोग की तरफ से जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक, पहले चरण में 16.63 करोड़ लोग मतदान के योग्य थे जिनमें करीब 11 करोड़ लोगों ने वोट डाले। इसी तरह, दूसरे चरण 15.88 करोड़ पात्र मतदाताओं में से लगभग 10.6 करोड़ ने भाग लिया। हालांकि, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, लक्षद्वीप, पुदुचेरी और तमिलनाडु में मतदान में कमी आई, लेकिन पात्र मतदाताओं की संख्या में वृद्धि के कारण कुल मतदाताओं की संख्या में वृद्धि हुई।