Friday, March 6, 2026
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आखिर क्या होता है EVM में NOTA का मतलब? और यह कितना दमदार है?

आज हम आपको EVM में NOTA का महत्व बताने जा रहे हैं! बता दे कि आने वाले समय में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं,इसी बीच मतदाताओं को अपने मत का मतलब समझना बहुत जरूरी है, इसलिए आज हम आपके लिए एक महत्वपूर्ण जानकारी लेकर सामने आया है और वह है NONE OF THE ABOVE यानी NOTA का बटन, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में नोटा का बटन बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है! आपको बता दे कि सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद साल 2013 में वोटरों को None of the Above यानी NOTA का विकल्प दिया गया। मकसद यह था कि वोटरों को अगर एक भी उम्मीदवार पसंद न हो, उन्हें लगे कि ईमानदारी सहित दूसरे पैमानों पर कोई भी उनके हिसाब से सही नहीं है, तो वे NOTA का विकल्प चुन सकते हैं। 2013 से हुए विधानसभा और लोकसभा चुनावों में NOTA के खाते में काफी वोट गए। कुछ चुनाव क्षेत्रों में तो NOTA वोट रनर-अप कैंडिडेट के बाद तीसरे नंबर पर रहे और कुछ दलों को मिले कुल वोटों से भी अधिक रहे। बता दें कि इलेक्शन कमिशन ने वोटरों को NOTA विकल्प देने का फैसला अक्टूबर 2013 में किया था। इससे पहले वोटरों के पास 49-O फॉर्म भरकर किसी को वोट न देने का विकल्प था। वोट CPI, JDS, SAD जैसे 21 दलों को मिले वोटों से अधिक थे। 44 सीटों पर 2014 लोकसभा चुनाव में NOTA को मिले वोट दूसरे नंबर के प्रत्याशी के ठीक बाद रहे। छत्तीसगढ़ में 5 और कर्नाटक में 4 सीटों पर दूसरे नंबर के प्रत्याशी के ठीक बाद NOTA वोट रहे। तमिलनाडु, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, मेघालय, दादरा नगर हवेली और दमन दीव में 1-1 सीट पर ऐसा हाल रहा।दिल्ली, छत्तीसगढ़, मिजोरम, राजस्थान और मध्य प्रदेश के 2013 असेंबली इलेक्शन में NOTA विकल्प मिला। बिहार की गोपालगंज सीट पर 2019 के चुनाव में सबसे ज्यादा थे। यानी आप इन आंकड़ों से समझ ही गए होंगे कि नोटा बटन भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है!बता दे कि सितंबर 2015 में चुनाव आयोग ने NOTA के लिए EVM में स्पेशल सिंबल बना दिया।

यह विकल्प देने के पीछे एक बड़ा मकसद पार्टियों पर साफ-सुथरे प्रत्याशी उतारने का दबाव बनाना था। दूसरा बड़ा मकसद था, अधिक से अधिक वोटरों को मतदान के लिए प्रेरित करना। इसी के साथ वोटर टर्नआउट कुछ बढ़ा, लेकिन इसमें NOTA का कोई बड़ा रोल सामने नहीं आया। बता दें कि साफ-सुथरे प्रत्याशी उतारने का मकसद तो बिल्कुल भी पूरा नहीं हो सका है। लेकिन हाँ, NOTA वोटों से विक्ट्री मार्जिन पर असर जरूर पड़ता रहा है। 2013 में 5 राज्यों के चुनावों में 16,82,024 वोटरों ने NOTA विकल्प चुना था। 2014 लोकसभा चुनाव में करीब 60 लाख वोटरों ने यानी (1.08%) ने NOTA का बटन दबाया था, NOTA के वोट CPI, JDS, SAD जैसे 21 दलों को मिले वोटों से अधिक थे। 44 सीटों पर 2014 लोकसभा चुनाव में NOTA को मिले वोट दूसरे नंबर के प्रत्याशी के ठीक बाद रहे। छत्तीसगढ़ में 5 और कर्नाटक में 4 सीटों पर दूसरे नंबर के प्रत्याशी के ठीक बाद NOTA वोट रहे। तमिलनाडु, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, मेघालय, दादरा नगर हवेली और दमन दीव में 1-1 सीट पर ऐसा हाल रहा।

छत्तीसगढ़ के बस्तर में कुल पड़े वोटों में से सबसे ज्यादा 5.03% वोट NOTA को मिले। 17 राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों में NOTA वोटों की संख्या लोकसभा चुनाव में इसके राष्ट्रीय औसत से ज्यादा रही। बता दें कि लोकसभा चुनावों में NOTA के खाते में काफी वोट गए। कुछ चुनाव क्षेत्रों में तो NOTA वोट रनर-अप कैंडिडेट के बाद तीसरे नंबर पर रहे और कुछ दलों को मिले कुल वोटों से भी अधिक रहे। बता दें कि इलेक्शन कमिशन ने वोटरों को NOTA विकल्प देने का फैसला अक्टूबर 2013 में किया था। यह विकल्प देने के पीछे एक बड़ा मकसद पार्टियों पर साफ-सुथरे प्रत्याशी उतारने का दबाव बनाना था। दूसरा बड़ा मकसद था, अधिक से अधिक वोटरों को मतदान के लिए प्रेरित करना। इसी के साथ वोटर टर्नआउट कुछ बढ़ा, लेकिन इसमें NOTA का कोई बड़ा रोल सामने नहीं आया।इससे पहले वोटरों के पास 49-O फॉर्म भरकर किसी को वोट न देने का विकल्प था। बता दें कि मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और कर्नाटक में 34 सीटों पर BJP, कांग्रेस के बाद NOTA वोट रहे। 17 सीटों पर गुजरात में NOTA वोट दूसरे नंबर के प्रत्याशी के ठीक बाद रहे। 65 लाख से ज्यादा वोट 1.06% वोट 2019 लोकसभा चुनाव में NOTA को मिले थे। 51,600 NOTA वोट बिहार की गोपालगंज सीट पर 2019 के चुनाव में सबसे ज्यादा थे। यानी आप इन आंकड़ों से समझ ही गए होंगे कि नोटा बटन भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है!

आखिर भारत को क्यों माना जाता है दुनिया का विश्व गुरु?

आज हम आपको बताएंगे कि भारत को दुनिया का विश्व गुरु क्यों माना जाता है! भारत पूरी दुनिया में एक ऐसा देश बन चुका है जो विश्व गुरु कहलाता है, प्राचीन समय से ही भारत पूरी दुनिया में एक विशेष दर्जा प्राप्त किए हुए हैं, लेकिन अगर वर्तमान पीढ़ी की बात करें तो उनके लिए विश्व गुरु जैसा शब्द एक नाटकीय रूप रखता है, लेकिन फिर भी भारत समस्त देशों के बीच में अपना वर्चस्व बनाए हुए हैं, आज हम आपको उन सभी बातों के बारे में बताएंगे जो भारत को पूरी दुनिया से अलग बनाता है और पूरी दुनिया को भारत का कायल बनता है! आपको बता दें कि भारत की विविधता और एकता पूरी दुनिया को इसके प्रति आकर्षित करती है. प्राचीन इतिहास, विविध संस्कृति, अलग-अलग धर्मों और भाषाओं की खूबसूरती ने दुनिया का ध्यान इस देश की ओर खींचा है. कहीं विशाल समुद्र तो कहीं ऊंचे-ऊंचे बर्फीले पहाड़, कहीं घने जंगल तो कहीं दूर-दूर तक फैला रेगिस्तान, कहीं मैदानी इलाकों की सुंदरता तो कहीं चट्टानों का आकर्षण, प्रकृति का ऐसा रंग शायद ही किसी देश में एक साथ देखने को मिले. हिन्दुस्तान की ऐसी कई बातें हैं, जो पूरी दुनिया को इसके प्रति आकर्षित करती है. 

यहां हम उन्ही कुछ बातों का जिक्र करने जा रहे हैं… बता दे कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है. इसका कुल क्षेत्रफल 3.28 मिलियन वर्ग किमी है. संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक, भारत देश में दुनिया की 18 फीसदी आबादी रहती है. भारत दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाले लोकतंत्र के रूप में प्रसिद्ध है. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में रजिस्टर्ड वोटर्स की संख्या लगभग 911 मिलियन के करीब थी… बता दे कि भारत में 22 आधिकारिक भाषाएं हैं. भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची आधिकारिक भाषाओं को सूचीबद्ध करती है. इसमें मूल रूप से 14 भाषाएं शामिल थीं. 1967 में इसमें 21वें संशोधन के बाद सिंधी भाषा को जोड़ा गया. 1992 में 71वें संशोधन द्वारा कोंकणी, मैतेई (मणिपुरी) और नेपाली भाषाओं को शामिल किया गया. 2003 में 92वें संशोधन द्वारा चार और भाषाओं- बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली को जोड़ा गया. भारत की 22 आधिकारिक भाषाओं में- असमिया, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मराठी, मैतेई, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू शामिल हैं… 

इसी के साथ माना जाता है कि शतरंज के खेल का आविष्कार भारत में किया गया था. ऐतिहासिक प्रमाण बताते हैं कि छठी शताब्दी में गुप्त साम्राज्य के शासनकाल के दौरान शतरंज भारत में एक लोकप्रिय खेल हुआ करता था. भारत से यह खेल फिर अरब और उसके बाद यूरोप के अलग-अलग हिस्सों तक फैल गया. यही नहीं योग साधना का इतिहास पूर्व-वैदिक काल का रहा है. ऐसा माना जाता है कि योग की उत्पत्ति 5 हजार साल पहले भारत में ही हुई थी. वेदों और उपनिषदों में भी योग का जिक्र मिलता है. भगवान शिव को हिंदू लोक-कथाओं में पहला योगी या आदियोगी माना गया है… बता दें कि भारत के जंगलों में बाघों की संख्या लगभग 2967 है. यह देश दुनिया की बाघों की आबादी का 70 प्रतिशत है और इनकी संख्या देश में तेजी से बढ़ भी रही है… 

इन सभी खासियतों के अलावा भारत चार धर्मों- हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म और सिख धर्म की जन्मस्थली है. इन धर्मों की उत्पत्ति भारत में हुई है. इतना ही नहीं, इन धर्मों का पालन अब दुनिया की लगभग 25 प्रतिशत आबादी भी करती है…. भारत में ही दुनिया के लगभग 70 प्रतिशत मसालों का उत्पादन किया जाता है.. भारत 109 किस्मों में से लगभग 75 मसालों का प्रोडक्शन करता है. इसके अलावा, भारत देश को मसालों के सबसे बड़े उपभोक्ता और निर्यातक के रूप में भी जाना जाता है… यही नहीं भारत की फिल्म इंडस्ट्री एक ऐसी इंडस्ट्री है, जहां हर साल सबसे ज्यादा फिल्में बनती हैं. फिल्मों के मामले में इंडियन फिल्म इंडस्ट्री दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री है. भारत हर साल हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में 1500 से 2000 फिल्में बनाता है….बता दें भारत अकेला ऐसा गैर-इस्लामिक मुल्क है, जहां 3,00,000 से ज्यादा सक्रिय मस्जिद हैं. यह देश दुनिया में सबसे ज्यादा मस्जिदों का घर है. कई इस्लामी देशों में भी भारत की तुलना में मस्जिदों की संख्या कम है… आयुर्वेद की उत्पत्ति भी भारत में हुई थी. कहा जाता है कि वैदिक युग के दौरान भारत में आयुर्वेद की उत्पत्ति हुई थी…. तो आपको समझ आ गया होगा कि आखिर भारत को दुनिया से अलग क्यों समझा जाता है और यह विश्व गुरु क्यों कहलाता है!

आखिर भारत और पाकिस्तान के बीच में क्यों होती है धाकड़ अंदाज में परेड!

आज हम आपको बताएंगे कि भारत और पाकिस्तान के बीच धाकड़ अंदाज में परेड आखिर क्यों होती है ! आपने भारत की बाघा बॉर्डर पर पाकिस्तान और भारत के बीच होने वाली धाकड़ परेड को कभी ना कभी देखा ही होगा! लेकिन आपके मन में एक सवाल जरूर उठना होगा कि आखिर भारत और पाकिस्तान के बीच में यह परेड क्यों होती है और दुनिया भर में क्या और भी ऐसे देश है, जिनके बीच में ऐसी परेड होती है? तो आज हम आपको इन्हीं सब सवालों के जवाब देने वाले हैं! आपको बता दें कि आपने भारत-पाकिस्तान के वाघा बॉर्डर पर होने वाली परेड यानी बीटिंग द रिट्रीट जरूर देखी होगी। बॉर्डर के गेट खुलते हैं, दोनों देशों के सैनिक जोश के साथ सलामी देते हैं और गेट बंद हो जाते हैं। इस समारोह को देखने के लिए बड़ी संख्या में दर्शक पहुंचते हैं और देशभक्ति नारेबाजी की आवाज दूर-दूर तक गूंजती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत के अलावा दुनिया के अलग-अलग देशों में अनोखे अंदाज में परेड होती है। कहीं स्लो मोशन में सैनिक परेड करते हैं तो कहीं खास यूनिफॉर्म पहनकर परेड में शामिल हुआ जाता है। 

चलिए आज हम आपको यही बताते हैं…. बता दे कि ​भारत के बाघा बॉर्डर पर जो परेड होती है, उसे ‘बीटिंग द रिट्रीट’ समारोह या ‘लोअरिंग ऑफ द फ्लैग्स’ समारोह के नाम से जाना जाता है। यह एक सैन्य समारोह है जो भारत और पाकिस्तान की सीमा पर स्थित बाघा बॉर्डर पर हर शाम को आयोजित किया जाता है। इस समारोह में दोनों देशों के सैनिक अपनी-अपनी सीमाओं पर विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए परेड के दौरान दिखावटी और ऊर्जावान प्रदर्शन करते हैं। समारोह की शुरुआत में सैनिक दोनों देशों के झंडे को सावधानीपूर्वक उतारते हैं और उसके बाद वे उच्च ऊर्जा और समन्वित कदमों के साथ परेड करते हैं। इस प्रक्रिया में तेज कदम चाल, लंबे कदमों का प्रदर्शन, और दोनों तरफ के सैनिकों द्वारा जोरदार नारे लगाए जाते हैं। यह समारोह अंतरराष्ट्रीय समझौते और दोनों देशों के बीच सम्मान का प्रतीक है। पाकिस्तान में बाघा बॉर्डर के समानांतर, वाघा-अटारी बॉर्डर पर जो परेड होती है, वह भी भारतीय पक्ष की परेड के समान ही होती है।

पाकिस्तानी रेंजर्स और भारतीय बीएसएफ (सीमा सुरक्षा बल) के बीच संचालित, यह परेड दोनों देशों की सैन्य शक्ति और समन्वय का प्रदर्शन करती है। परेड में पाकिस्तानी रेंजर्स विशेष वर्दी पहनते हैं और ऊँचे कदमों के साथ मार्च करते हैं, जिसे ‘गूस स्टेप‘ के रूप में जाना जाता है। बता दें कि इस समारोह को देखने के लिए बड़ी संख्या में दर्शक पहुंचते हैं और देशभक्ति नारेबाजी की आवाज दूर-दूर तक गूंजती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत के अलावा दुनिया के अलग-अलग देशों में अनोखे अंदाज में परेड होती है। कहीं स्लो मोशन में सैनिक परेड करते हैं तो कहीं खास यूनिफॉर्म पहनकर परेड में शामिल हुआ जाता है।  परेड के दौरान, दोनों पक्षों के सैनिक एक-दूसरे की ओर मुखातिब होकर अपने-अपने राष्ट्रीय ध्वजों को सम्मान के साथ नीचे उतारते हैं और फिर ध्वजारोहण करते हैं।  इसी तरह भारत और पाकिस्तान में जहां जोशीले अंदाज में परेड होती है, वहीं ग्रीस में रॉयल गार्ड्स की परेड अपने स्लो मोशन स्टाइल के लिए काफी चर्चित है। इंटरनेट पर ग्रीस के रॉयल गार्ड्स के मार्च का एक वीडियो वायरल हो रहा है। ग्रीस के सैनिक शाही पोशाक और जूते पहनते हैं और खास अंदाज में हाथ-पैर हिलाकर परेड करते हैं। रॉयल गार्ड्स हवा में पैर लहराते हुए दो कदम पीछे जाते हैं। इसके बाद धीमी गति में लंबे कदमों से आगे बढ़ना शुरू करते हैं। 

अगर बात उनकी शाही पोशाक की करें, तो गार्ड्स सफेद रंग की स्कर्ट और लेंगिंग्स को पहने हुए दिखाई देते है। वही वेटिकन सिटी में, पोंटिफिकल स्विस गार्ड नामक एक छोटी सेना सैनिक परेड करती है। यह परेड स्विस गार्ड की रक्षा बदलने, विशेष अवसरों का जश्न मनाने और पर्यटकों का मनोरंजन करने के लिए आयोजित की जाती है। सबसे खास होती है इन सैनिकों की यूनिफॉर्म। परेड करने वाले गार्ड्स आम सैनिकों से अलग चमकीली पोशाक पहनते हैं। वहीं ये गार्ड्स सिर पर भी ऐतिहासिक कवच पहनते हैं, जो सदियों से प्रचलन में है। तो यह है कुछ खास तरह की परेड जो भारत और पाकिस्तान सहित दुनिया के अन्य देशों में भी होती है!

आखिर समुद्र में अन्य देशों की सेना से कैसे मांगी जाती है मदद?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर समुद्र में अन्य देशों की सेना से मदद कैसे मांगी जाती है! हाल ही में हिंद महासागर एवं अरब सागर के कई इलाकों में समुद्री लुटेरों द्वारा आतंक का जाल फैलाया गया है,जिसमें ईरान, अफगानिस्तान से आने वाले कई जहाजों को समुद्री लुटेरो द्वारा लूट लिया गया, इसी बीच यह सवाल उठा कि आखिर भारतीय जल सेना या किसी और देश की नौसेना समुद्री जहाज को इन लुटेरों से कैसे बचाती है? तो आपको बता दे कि पिछले कुछ महीनों में भारतीय नौसेना ने समुद्री हमलों से कई देशों के नागरिकों को बचाया है। शुक्रवार को भारतीय नौसेना ने अरब सागर में लुटेरों के चंगुल से ईरानी मछली पकड़ने वाली नाव अल-कंबर और उसके 23 पाकिस्तानी चालक दल के सदस्यों को बचाया। इससे पहले भी इस तरह के कई ऑपरेशन को भारतीय नौसेना अंजाम दे चुकी है। लेकिन कभी आपने सोचा है कि समुद्र के भीतर जब किसी देश के जहाज पर हमला होता है, तो वे दूसरे देशों की नौसेना से कैसे मदद मांगते हैं? और आखिर भारतीय नौसेना पाकिस्तानी, कतर या किसी अन्य देशों के जहाजों के क्रू को समुद्र में कैसे बचाती है? तो आज हम आपको इसी बारे में जानकारी देने वाले हैं…. बता दें कि समुद्र में अलग-अलग देशों की नौसेना अपनी पनडुब्बियों के साथ तैनात रहती है। भारतीय नौसेना भी अरब सागर और हिंद महासागर में तैनात रहती है। 

यहां से भारतीय नौसेनिक दुश्मनों पर नजर तो रखते ही हैं, साथ ही किसी इमरजेंसी में मदद भी पहुंचाते हैं। अगर किसी कारोबारी जहाज या किसी अन्य जहाज पर समुद्री लुटेरे या कोई अन्य दुश्मन हमला करता है, तो ऐसे में जानकारी मिलते ही नौसेना मदद भेजती है। जहाजों में खास तरह का कम्युनिकेशन सिस्टम लगा होता है, जिससे आपात स्थिति में आसपास के जहाजों को मदद के लिए सिग्नल भेजा जा सकता है। इन सिग्नलों के माध्यम से एक देश की नौसेना दूसरे देश के जहाजों को बचाने के लिए पहुंच जाती है। अगर बात भारतीय नौसेना की करें तो हमारी नौसेना भी अपने युद्धपोतों के माध्यम से समुद्री क्षेत्र में दूसरे देश के जहाजों को बचाने के लिए कई तरीकों का उपयोग करती है। भारतीय नौसेना ने अरब सागर में समुद्री हमलों के खतरों का सामना करने के लिए कई गाइडेड मिसाइल लॉन्चर तैनात किए हैं। इसके अलावा नौसेना ड्रोन और एयरक्राफ्ट की मदद से समुद्री क्षेत्र में जहाजों की निगरानी करती है और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें बचाने के लिए कार्रवाई करती है। 

वहीं भारतीय नौसेना के पास ताकतवर पनडुब्बियां हैं, जो समुद्र के नीचे से दाग सकती हैं। भारतीय नौसेना ने अपनी ताकत को समुद्री क्षेत्र में बढ़ावा दिया है और विभिन्न तरीकों से दूसरे देश के जहाजों की सुरक्षा की है। गौरतलब है कि हिन्द महासागर क्षेत्र में समुद्री लूटेरों और हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों के चलते जहाजों के आने-जाने में दिक्कत हो रही थी। इस समस्या से निपटने के लिए भारतीय नौसेना ने “ऑपरेशन संकल्प” के तहत 23 मार्च को 100 दिन का अभियान पूरा किया। इस अभियान में अदन की खाड़ी, अरब सागर और सोमालिया के पूर्वी तट पर गश्त लगाई गई है। भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल आर हरि कुमार ने कहा है कि हिन्द महासागर क्षेत्र में सबसे बड़ी नौसेना शक्ति के रूप में, भारत इस इलाके को सुरक्षित और स्थिर बनाए रखने के लिए समुद्री लूटेरों और ड्रोन हमलों के खतरे से निपटने की कार्रवाई जारी रखेगा। बता दें कि नौसेना ने माल्टा के झंडे वाले व्यापारी जहाज “रुएन” और उसके 17 सदस्यीय दल को बचाने के लिए चलाए गए 40 घंटे के अभियान के बाद 35 सोमाली लुटेरों को कानूनी कार्रवाई के लिए मुंबई ले आई थी। 

इस अभियान में भारतीय तट से करीब 2,600 किलोमीटर दूर समुद्री कमांडो को C-17 विमान से गिराया गया था और गोलीबारी भी हुई थी। अधिकारियों के मुताबिक, दिसंबर के मध्य से शुरू हुए इस अभियान में 5,000 से ज्यादा जवान, 21 युद्धपोतों के साथ 450 से ज्यादा “जहाज के दिन” और समुद्री निगरानी विमानों द्वारा 900 घंटे से ज्यादा उड़ान भरकर क्षेत्र में खतरों से निपटा गया। इस दौरान, नौसेना ने लगभग 20 घटनाओं का जवाब दिया और हिन्द महासागर क्षेत्र में सबसे पहले मदद पहुचाने वाला और पसंदीदा सुरक्षा सहयोगी के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तो इस तरीके से भारतीय नौसेना के द्वारा समुद्र में अन्य जहाजों की सुरक्षा की जाती है!

लोकसभा चुनाव में कैसे भरा जा सकता है नामांकन?

आज हम आपको बताएंगे कि लोकसभा चुनाव में नामांकन की प्रक्रिया कैसे की जाती है! आने वाले समय में देश में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं.. इसी बीच मतदाताओं के मन में एक सवाल जरूर उठता है कि आखिर उम्मीदवारों के द्वारा नामांकन कैसे भरा जाता है, उसके क्या-क्या नियम होते हैं तथा क्या प्रक्रिया होती है? तो आज हम आपको इस प्रक्रिया और नियम के बारे में पूरी जानकारी देने वाले हैं, आपको बता दें कि देश में लोकसभा चुनाव की डुगडुगी बज गई है। देश की 543 लोकसभा सीटों पर चुनाव का शंखनाद हो गया है। चुनाव आयोग की ओर से तारीखों का ऐलान होते ही जिला स्तर पर चुनावी तैयारियां शुरू कर दी गई है। जिला प्रशासन की ओर से तमाम चुनाव तैयारियां को अंतिम रूप दिया जा रहा है। बता दें कि जिला स्तर पर ही लोकसभा चुनाव के उम्मीदवार अपने नामांकन पत्रों को जमा कराएंगे। नामांकन पत्रों को जमा करना लोकसभा चुनाव के लिए सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। 

इसके तहत उम्मीदवार अपने नाम को चुनाव आयोग के समक्ष रजिस्टर करते हैं। वे दावा करते हैं कि लोकसभा चुनाव के मैदान वे जनता का वोट हासिल करने के लिए सही दावेदार हैं। देश में लोकसभा चुनाव का बिगुल बजने के बाद 20 मार्च से नामांकन फॉर्म भरे जाने की तैयारी भी शुरू कर दी गई है। पहले चरण की वोटिंग 19 अप्रैल को होगी। वहीं, 1 जून को आखिरी चरण का मतदान और 4 जून को मतगणना के बाद रिजल्ट का प्रकाशन किया जाएगा। प्रत्याशियों की ओर से जमा कराए गए तमाम प्रमाण पत्रों की जांच के बाद चुनाव आयोग उनकी लोकसभा चुनाव की उम्मीदवारी तय करती है। चुनाव आयोग की ओर से प्रत्याशियों को उम्मीदवार के रूप में रजिस्टर्ड घोषित किया जाता है। उम्मीदवारी फाइनल होने के बाद ही प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतर कर अपना प्रचार अभियान तेज कर अपने पक्ष में वोट मांग सकते हैं। उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला आखिरकार जनता अपनी वोट की ताकत के जरिए करती है। इस प्रक्रिया में नॉमिनेशन को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। आईए जानते हैं नॉमिनेशन की प्रक्रिया किस प्रकार पूरी कराई जाती है! 

बता दें कि लोकसभा चुनाव के लिए अधिसूचना जारी होने के साथ ही नामांकन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। कोई भी भारतीय नागरिक किसी भी लोकसभा सीट के लिए नामांकन कर सकते हैं। इसके लिए उनका वोटर लिस्ट में नाम होना अनिवार्य होता है। जब किसी उम्मीदवार को किसी राजनैतिक पार्टी की ओर से प्रत्याशी बनाया जाता है, तो सामान्य तौर पर इसे पार्टी का टिकट मिलना शब्द से संबोधित किया जाता है। सिंबल के साथ प्रत्याशी अपना नामांकन दाखिल करते हैं। ऐसे में उन्हें चुनाव आयोग की ओर से संबंधित पार्टी सिंबल का आवंटन किया जाता है। इसके अलावा देश का कोई भी नागरिक सांसद बनने के लिए नामांकन कर सकता है। लोकसभा चुनाव 2024 के लिए भारतीय निर्वाचन आयोग ने सात चरणों में चुनावी प्रक्रिया पूरी करने का ऐलान किया है। अलग- अलग लोकसभा सीटों के लिए निर्वाची पदाधिकारी और ऑर्ब्जवर्स की नियुक्ति की गई है। उम्मीदवार जिला निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय में पहुंच कर नामांकन फॉर्म जमा कर सकते हैं। नामांकन पत्र के साथ उम्मीदवारों को जमानत राशि के रूप में निर्धारित रकम भी जमा करानी होती है। चुनाव अधिकारी के मुताबिक उम्मीदवार नामाकंन के दौरान सीमित संख्या में गाड़ी का इस्तेमाल करना होता है। इसके अलावा वाहनों को निर्वाचन अधिकारी कार्यालय से 100 मीटर पहले खड़ा किया जाता है। नामाकंन के दौरान निर्वाचन अधिकारी की स्वीकृति के बिना कोई उम्मीदवार ढोल-नगाड़े का इस्तेमाल नहीं कर सकता है।उम्मीदवर को नामांकन पेपर के साथ शपथ पत्र भी देना होता है। नोटरी के स्तर पर इस शपथ पत्र को तैयार कराया जाता है। इसमें प्रत्याशी अपनी आय- व्यय के ब्यौरा से लेकर पूरी जानकारी भरता है। लोकसभा सीट पर उम्मीदवार बनने से पहले नामांकन पत्र भरना होता है। जरूरी कागजों में प्रत्याशी को अपने पासपोर्ट साइज फोटो, आधार कार्ड, पैन कार्ड, मूल निवास, जाति प्रमाण पत्र की फोटोकॉपी जैसे कागजों की जरूरत होती है। विधायक बनने से पहले नामांकन पत्र में अपनी चल- अचल संपत्ति का ब्यौरा, पत्नी और आश्रित बच्चों की भी आय- व्यय एवं लोन की पूरी जानकारी देनी पड़ती है। इसके अलावा उम्मीदवारों के कितने हथियार हैं, कितने जेवर हैं और शैक्षणिक जानकारी भी देनी होती है। आय के साधन को भी यहां अंकित करना होता है। 

इसके अलावा प्रत्याशी पर कितने आपराधिक मामले दर्ज हैं? कितने मामले कोर्ट में चल रहे हैं? क्या किसी मामले में सजा हुई है? इन सभी का विवरण एफिडेविट के माध्यम से सही- सही देना होता है। उम्मीदवारी के लिए न्यूनतम आयु सीमा 25 वर्ष रखी गई है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 36(2) और संविधान के अनुच्छेद 173(बी) के तहत इसका निर्धारण किया गया! तो यह थी वह प्रक्रिया जिसके तहत नामांकन भरा जाता है!

चुनाव आयोग कैसे तय करता है चुनाव का खर्च?

आज हम आपको बताएंगे कि चुनाव आयोग चुनाव का खर्च कैसे तय करता है! आने वाले समय में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं, इसी बीच मतदाताओं के मन में कई प्रकार के सवाल उमड़ रहे हैं, सवाल यह कि आखिर चुनाव करते समय कितना खर्चा आता है? चुनाव आयोग इन खर्चों का अनुमान कैसे लगता है? साथ ही साथ प्रत्येक उम्मीदवार का खर्चा कितना होता है? तो आज हम आपको इन्हीं सवालों के जवाब देने वाले हैं,

आपको बता दें कि साल 2024 की लोकसभा चुनाव की तारीख और फेज का ऐलान हो चुका है। किसी भी चुनाव में साम-दाम-दंड-भेद के तरीके की बात की जाती है। लेकिन इनमें दाम की भूमिका सबसे प्रभावी होती है। चुनाव के लिए निर्वाचन आयोग ने पारदर्शिता के कई पैमाने तय किए हैं, जिनमें खर्च पर नियंत्रण भी शामिल है। चुनाव में एक प्रत्याशी के खर्चे की लिमिट कितनी है, इसका पूरा हिसाब-किताब बना हुआ है। इसमें चाय-बिस्किट से लेकर गुब्बारे और गाड़ी तक का हर ब्योरा शामिल करना होता है। किसी चुनाव में निर्वाचन आयोग की तरफ से प्रदेश की आबादी और मतदाताओं की संख्या के हिसाब से राज्यवार चुनाव खर्च की सीमा फिक्स की जाती है। 

इसमें प्रत्याशी की सार्वजनिक बैठक, रैली, विज्ञापन, पोस्टर, बैनर, वाहनों सहित अन्य खर्च शामिल होता है। प्रत्याशी चुनाव के दौरान निर्धारित सीमा से अधिक राशि खर्च नहीं कर सकते हैं। लोकसभा चुनाव में होने वाले चुनावी खर्च की लिमिट बीते दो दशक के दौरान करीब-करीब चार गुना तक बढ़ गई है। वहीं विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रत्याशी पांच से छह गुना तक खर्च कर रहे हैं। अब इस बार 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रत्येक प्रत्याशियों को 95 लाख रुपये तक खर्च करने की छूट दी गई है। हालांकि राजनीतिक दलों को इस सीमा से छूट है। वहीं लोकल गायकों के लिए इसे 30 हजार या फिर असली बिल तय है। यानी सीधी सी बात यह है कि एक छोटे से छोटे खर्चे से लेकर बड़े से बड़ा खर्चा चुनाव आयोग के द्वारा पहले से ही तय कर लिया जाता है,जिसके अनुसार उम्मीदवारों को वह खर्च करना होता है,आपको यह जानकारी कैसी लगी, अपना जवाब हमारे कमेंट बॉक्स में जरूर दीजिएगा!आयोग की ओर से नियम 90 में बदलाव किया गया था, जिसके बाद विधानसभा और लोकसभा चुनाव के उम्मीदवार के चुनावी खर्चे की सीमा में बढ़ोतरी की गई थी। चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार उम्मीदवार को चुनावी खर्च करने के लिए एक अकाउंट खुलवाना होता है, जिसके माध्यम से ही उम्मीदवारों को खर्चा भी करना होता है। 

वहीं, 20 हजार से ज्यादा के खर्च का भुगतान चेक आदि के माध्यम से करना होगा। बता दें कि सभी उम्मीदवारों को रोजाना के खर्चे के लिए एक डायरी मेनटेन करनी होती है, जिसमें हर एक खर्चे का ब्यौरा होता है। इसमें चुनावी प्रचार के लिए किया गया छोटे से छोटा खर्चा भी शामिल होता है। ग्रामीण और शहरी इलाकों में किराए के कार्यालयों के लिए मासिक किराया 5 हजार और 10 हजार रुपये तय किया गया है। यहां तक कि इसमें गुब्बारों, झाड़ू, सीसीटीवी कैमरों और ड्रोन कैमरों की कीमत भी तय की जाती है। चाय-समोसे के खर्च को भी इसमें जोड़ा जाता है। अब सोशल मीडिया पर विज्ञापनों पर खर्च को चुनावी खर्च का हिस्सा माना जाता है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार एक कप चाय की कीमत 8 रुपये और समोसे की कीमत 10 रुपये तक की गई है। बर्फी 200 रुपये प्रति किलो, बिस्कुट 150 रुपये प्रति किलो, एक ब्रेड पकौड़ा 10 रुपये का, एक सैंडविच 15 रुपये और जलेबी 140 रुपये प्रति किलो का रेट तय किया गया है। चुनाव में एक प्रत्याशी के खर्चे की लिमिट कितनी है, इसका पूरा हिसाब-किताब बना हुआ है। इसमें चाय-बिस्किट से लेकर गुब्बारे और गाड़ी तक का हर ब्योरा शामिल करना होता है। किसी चुनाव में निर्वाचन आयोग की तरफ से प्रदेश की आबादी और मतदाताओं की संख्या के हिसाब से राज्यवार चुनाव खर्च की सीमा फिक्स की जाती है। इसके साथ ही कार, बस और ऑटो जैसे वाहनों को किराये पर लेने का रेट प्रति दिन 750 और 3000 रुपये के बीच होनी चाहिए। मशहूर गायकों के लिए फीस 2 लाख रुपये या फिर असली बिल तय किया गया है। वहीं लोकल गायकों के लिए इसे 30 हजार या फिर असली बिल तय है। यानी सीधी सी बात यह है कि एक छोटे से छोटे खर्चे से लेकर बड़े से बड़ा खर्चा चुनाव आयोग के द्वारा पहले से ही तय कर लिया जाता है,जिसके अनुसार उम्मीदवारों को वह खर्च करना होता है,आपको यह जानकारी कैसी लगी, अपना जवाब हमारे कमेंट बॉक्स में जरूर दीजिएगा!

NIA के जांचकर्ता बेंगलुरु विस्फोटों के बाद भागे दो आतंकवादियों का पीछा करने के लिए पोर्ट ब्लेयर गए.

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बेंगलुरु धमाकों के बाद भागे दो आतंकियों का पीछा करने के लिए एनआईए के जांचकर्ता पोर्ट ब्लेयर गए थे. बाद में 28 मार्च को उन दोनों आतंकियों अब्दुल मथिन अहमद ताहा और मुसाविर हुसैन शाजिब को पश्चिम बंगाल के न्यू दीघा के एक होटल से पकड़ा गया.

केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक सूत्र ने कहा कि 1 मार्च को बेंगलुरु के रामेश्वरम कैफे में विस्फोट के बाद ताहा और शाजिब की तलाश के लिए देश की सभी एजेंसियों को सतर्क कर दिया गया था। इसके बाद विभिन्न एजेंसियों से ‘इनपुट’ आना शुरू हो गया. ऐसे ही एक इनपुट से पोर्ट ब्लेयर को जानकारी मिली। उस दिन दो लोग पश्चिम बंगाल में दाखिल हुए. जासूसों को संदेह है कि दोनों कोलकाता से फ्लाइट से पोर्ट ब्लेयर भाग गए होंगे।

सूत्रों का दावा है कि शुरुआत में इनका नाम कोलकाता से पोर्ट ब्लेयर फ्लाइट की यात्री सूची में नहीं मिला। गृह मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि ताहा और शाजिब अपने असली नामों की जगह चार अन्य नामों का इस्तेमाल कर रहे थे. उनमें से एक थे अनमोल कुलकर्णी. उनके असली नामों के साथ-साथ चारों नामों की भी तलाश की गई. लेकिन, पोर्ट ब्लेयर की यात्री सूची में किसी का नाम नहीं मिला. फिर भी बिना कोई जोखिम उठाए जासूस स्वयं पोर्ट ब्लेयर पहुंच गए. पोर्ट ब्लेयर ही नहीं, अंडमान के विभिन्न पर्यटन केंद्रों में भी ये नहीं पाए जाते।

जासूसों को यह भी संदेह था कि वे दोनों पोर्ट ब्लेयर में मिले बिना कोलकाता से विदेश भाग सकते हैं। कोलकाता हवाई अड्डे पर आव्रजन कार्यालय को सतर्क कर दिया गया। एक बात के लिए, जासूसों को तब तक यकीन हो गया था कि ताहा और शाजिब पश्चिम बंगाल के अंदर ही कहीं थे। इसलिए दोनों की तलाश में सभी केंद्रीय एजेंसियों ने इस राज्य पर फोकस किया. मूल रूप से कोलकाता से विभिन्न एयरलाइनों की यात्री सूची भी पाई जाती है।

खबर आती है कि वे जंगलमहल में कहीं एकांत ‘होम-स्टे’ में छिपे हुए हैं। यह भी खबर है कि वे पुरुलिया के उस होम-स्टे में डेरा डाले हुए हैं. लेकिन, गायें ढूंढने पर भी वहां नहीं मिलीं। आखिर में दीघा के बारे में पता चलता है. एनआईए ने अदालत में दावा किया कि राज्य पुलिस द्वारा प्रस्तुत आरोप पत्र में विस्फोट की घटना का समय बदल दिया गया था।

पूर्वी मेदिनीपुर के भूपतिनगर विस्फोट मामले के आरोपी बलाईचरण मैती और मनोब्रत जाना को सोमवार को विचार भवन स्थित विशेष एनआईए अदालत में पेश किया गया। वहीं, केंद्रीय जांच एजेंसी के अधिकारी ने कहा, ”विस्फोट के मामले में खास तौर पर कुछ लोगों को छिपाने की कोशिश की गई थी.” राज्य पुलिस की चार्जशीट और एनआईए जांच की जानकारी में अंतर सामने आया है.’ जांच अधिकारी ने बताया कि एनआईए की जांच में पता चला है कि धमाका रात करीब 10 बजे हुआ था. राज्य पुलिस की चार्जशीट में बताया गया है कि विस्फोट सुबह 8:30 बजे के आसपास हुआ।

जांच अधिकारी के मुताबिक, हादसे में तीन लोगों की मौके पर ही मौत हो गई. जानकारी मिली है कि बलाई और मनोब्रत ने रात करीब 9:51 बजे इनमें से किसी एक से फोन पर बात की थी. उस संबंध में कई गवाहों के बयान भी हैं. एनआईए जांचकर्ताओं ने दावा किया कि बलाई और मनोब्रत के मोबाइल फोन की कॉल डिटेल से इसका पता चला.

मामले की आज हुई सुनवाई में एनआईए के जांच अधिकारी ने कोर्ट में दावा किया, ”अगर किसी व्यक्ति की मौत 8:30 बजे विस्फोट में हुई तो उसने 9:51 बजे आरोपी से फोन पर कैसे बात की, इस पर सवाल उठाया जा रहा है.” दोनों लोगों को रिमांड पर लेकर पूछताछ की जाएगी।” जज ने दोनों को 18 अप्रैल तक एनआईए की हिरासत में रखने का आदेश दिया.

इस दिन कोर्ट में खड़े होकर बलाई ने कहा, ”हम विस्फोट के बारे में कुछ नहीं जानते. घटना के वक्त मैं एक राजनीतिक बैठक में था. जांच में दोषी पाए जाने पर हम फांसी पर चढ़ने को तैयार हैं।” दोनों ने आरोप लगाया कि एनआईए की हिरासत में उन्हें ठीक से खाना नहीं दिया जा रहा है. गर्मियों में पंखा बंद रखना।

जांच अधिकारी ने कहा, ”बिजली कट गई थी. उस समय पूरे कार्यालय में अंधेरा था. एसपी भी अंधेरे में कमरे में थे. सभी बेबुनियाद आरोप लगाए जा रहे हैं. दोनों आरोपियों को नियमानुसार भोजन दिया जा रहा है।”

लोकसभा चुनाव से पहले तमिलनाडु का परिदृश्य.

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ब्राह्मण पुजारी का ढाल मंदिर, नहीं टिक पा रहा सनातन प्रचार तमिलनाडु की सत्तारूढ़ डीएमके के सांसद अक्सर संसद में शिकायत करते हैं कि मोदी सरकार शास्त्रीय भाषाओं में तमिल की तुलना में संस्कृत के विकास पर बीस गुना अधिक खर्च करती है। यह उसका प्यारा बदला है! कपालेश्वर मंदिर में सुबह से ही शिव पूजा चल रही है. लगभग एक सौ बीस फीट ऊंची अलमारियों वाले विस्तृत गोपुरम या तोरण के सामने 8वीं शताब्दी में निर्मित प्राचीन मंदिर के सामने भक्तों की भीड़ उमड़ती है। नादस्वरम बज रहा है. मुख्य पुजारी बेंकट सुब्रमण्यम मंत्र का जाप करते रहते हैं।

जाहिर तौर पर यह मंदिर तमिलनाडु भर में फैले हजारों शिव या विष्णु मंदिरों से अलग नहीं है। अगर फेलुदा ने टॉपसे से पूछा होगा, थोड़ा अंतर है, तो मैं क्या कहूं? अगर आप थोड़ा सुनेंगे तो आपको फर्क नजर आएगा. मंत्र संस्कृत में पाठ नहीं हैं। जप तमिल में है. तीन साल पहले करुणानिधि के बेटे एमके स्टालिन के नेतृत्व में नई डीएमके सरकार बनी थी. इसके बाद सरकारी पहल के तौर पर मंदिर में तमिल में पूजा करने की परियोजना शुरू की गई. इसकी उत्पत्ति इसी कपालेश्वर मंदिर में हुई थी। मायलापुर के बाद यह प्रणाली श्रीरंगम, मदुरै, तंजावुर के कई मंदिरों में शुरू की गई है। अगर कोई भक्त चाहे तो पुजारी को संस्कृत के बजाय तमिल मंत्र पढ़कर पूजा करा सकता है।

तमिलनाडु के सत्तारूढ़ डीएमके सांसद अक्सर संसद में शिकायत करते हैं कि मोदी सरकार शास्त्रीय भाषाओं में तमिल की तुलना में संस्कृत के विकास पर बीस गुना अधिक खर्च करती है। यह उसका प्यारा बदला है!

इस बिंदु पर आश्चर्य हुआ? तमिलनाडु सरकार के हिंदू धार्मिक और सेवा संपत्ति मंत्री पीके शेखर मुस्कुराते हैं। “क्या आप जानते हैं, हमारे राज्य में मंदिरों में अब ब्राह्मणों को पुजारी नियुक्त किया जाता है! ब्राह्मण होते हुए भी उन्हें मंदिर में पूजा करने की जिम्मेदारी मिली? सरकार ने उन्हें डेढ़ साल की ट्रेनिंग के बाद पुजारी के पद पर नियुक्त कर लिया?”

बूढ़ा आदमी नहीं. वास्तव में मदुरै के अय्यप्पन मंदिर के टी मारीचामी से लेकर तिरुचिरापल्ली के व्यालुर मुरुगन मंदिर के एस प्रभु तक – प्रतिदिन पुजारी मंत्रों का पाठ करते हैं, अनुष्ठान करते हैं और पूजा करते हैं। लेकिन इनमें से कोई भी ब्राह्मण नहीं है. एक-दो नहीं, स्टालिन सरकार ने ऐसे 23 हिंदू पुजारियों की नियुक्ति की. इनमें से कुछ दलित हैं, कुछ पिछड़े हैं, कुछ विशेष पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधि हैं।

बीजेपी ने तमिलनाडु के डीएमके नेताओं पर पारंपरिक हिंदू धर्म का अपमान करने का आरोप लगाया है. क्योंकि, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे उदयनिधि सनातन ने कहा था कि हिंदू धर्म का इलाज मलेरिया, डेंगू और कोरोना की तरह किया जाना चाहिए। बीजेपी ने पूरे देश में हंगामा मचा दिया. द्रमुक विरोधी मंच ‘भारत’ का साझेदार. बीजेपी ने पूरे ‘भारत’ मंच को सनातन हिंदू विरोधी बताकर हमला बोला. अब भी बीजेपी मौका मिलने पर इस मुद्दे को उठा रही है. अमित शाह कन्याकुमारी में चुनाव प्रचार कर रहे हैं और डीएमके पर तमिलों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगा रहे हैं. क्या बदला लेने के लिए डीएमके सरकार तमिलनाडु में सनातन धर्म के खिलाफ जाकर मंदिरों में ब्राह्मणों को पुजारी बना रही है? क्या संस्कृत को पीछे छोड़कर तमिल का प्रभुत्व दिखाने के लिए मंदिरों में तमिल मंत्रों की व्यवस्था की जा रही है?

गलत दरअसल, उत्तर भारत या हिंदी भाषी गोबलाय की सनातन धर्म की परिभाषा द्रविड़ भूमि पर आकर उपहास का पात्र बन गई है। शेष भारत में सनातन धर्म का अर्थ हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार रहना है। तमिलनाडु में सनातन का अर्थ है नस्लवाद, जातिगत भेदभाव, अस्पृश्यता। जब स्टालिन के बेटे उदयनिधि वामपंथी प्रगतिशील लेखक-कलाकार संघ के एक समारोह में गए और सनातन धर्म की निंदा के बारे में बात की, तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। इसे लेकर बीजेपी ने हंगामा शुरू कर दिया तो पार्टी नेता हैरान रह गए.

डीएमके के वरिष्ठ नेता टीकेएस एलंगोवन ने मामले पर सफाई दी. 1970 के दशक में तमिलनाडु के समाज सुधारक पेरिया ने सपना देखा था कि मंदिर के दरवाजे सभी के लिए खुले होंगे। ब्राह्मणों का वर्चस्व नहीं रहेगा. कोई जात-पात का भेदभाव नहीं होगा. यही वह समय था जब करुणानिधि मुख्यमंत्री बनना चाहते थे और सभी हिंदुओं के लिए मंदिर के पुजारी के रूप में काम करने की योजना शुरू करना चाहते थे। इतने वर्षों के बाद, विभिन्न कानूनी उलझनों के बाद, यह प्रणाली अंततः करुणानिधि-पुत्र स्टालिन के कार्यकाल के दौरान पेश की गई थी। तमिलनाडु सरकार के हिंदू धार्मिक और सेवा संपत्ति विभाग के तहत राज्य में लगभग 44,000 मंदिर हैं। सभी मंदिरों में ब्राह्मणों को पुजारी के रूप में सेवा करने का अवसर मिलेगा। सभी मंदिरों में अब संस्कृत की जगह तमिल मंत्रों का उच्चारण किया जाएगा.

पूरे तमिलनाडु में किसी को इसकी चिंता नहीं है. क्या सनातन का अपमान करके बीजेपी को वोट मिलेंगे? सवाल सुनकर हर कोई हैरान रह गया। क्या यह सब मतदान के बारे में है? ब्राह्मण का दाह संस्कार. लेकिन वे तमिल आबादी का केवल 3 प्रतिशत हैं। एलंगोवन ने सवाल पूछा, ”मुझे बताएं कि क्या इस बार बीजेपी सनातन धर्म के आधार पर तमिलनाडु में वोट जीत सकती है?” हिंदू धर्म, पारंपरिक धर्म से बीजेपी का क्या मतलब है? मनुस्मृति, या ब्राह्मणवाद? वे इसकी व्याख्या नहीं करते!”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के बीच की जंग दक्षिण भारत तक पहुंच गई है.

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वाम-कांग्रेस रिश्ते विवादों में, दक्षिण में मोदी-राहुल की जुगलबंदी वाम नेतृत्व पर हमला करते हुए मोदी ने कहा, “त्रिपुरा, बंगाल या केरल – वामपंथियों का चरित्र एक ही है। यानि कुछ भी नहीं छोड़ा कुछ भी सही नहीं। यानी जब वामपंथी सरकारें आती हैं तो उनके पास कुछ नहीं बचता। कुछ भी इसे सही नहीं बनाता है।” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के बीच की जंग आज दक्षिण भारत तक पहुंच गई. दक्षिण में सीटें बढ़ाने को बेताब मोदी ने केरल के पलक्कड़ और तिरुअनंतपुरम में दो रैलियों में राहुल गांधी का नाम लेने के बजाय उन्हें ‘युवराज’ कहकर संबोधित किया. दिल्ली में कांग्रेस के साथ सीपीएम का गठबंधन और केरल में युद्ध – उन्होंने इस ‘दोहरेपन’ की ओर इशारा किया. दूसरी ओर, उसी राज्य के वानाडे रोड शो और कोझिकोड में सार्वजनिक बैठक में राहुल का बयान, मोदी वास्तव में एक देश, एक नेता, एक भाषा के सिद्धांत को आयात करके देश का अपमान कर रहे हैं। राहुल ने अपने निर्वाचन क्षेत्र वानाड के सभी लोगों को अपने परिवार का सदस्य बताते हुए कहा कि वह सीपीएम नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ भी अभद्र व्यवहार नहीं कर सकते।

मोदी ने आज केरल में एक सार्वजनिक सभा में राहुल का नाम लिए बिना कहा, ”कांग्रेस के एक बड़े नेता ने केरल आकर नया आधार बनाया और कहा कि उत्तर प्रदेश में उनके अपने खानदानी निर्वाचन क्षेत्र का सम्मान बचाना मुश्किल है। उन्होंने उन संगठनों के राजनीतिक विंग के साथ पिछले दरवाजे से संवाद किया, जिन्हें राष्ट्र-विरोधी के रूप में प्रतिबंधित किया गया है। कांग्रेस के युवराज यहां आकर आपसे वोट मांगेंगे. लेकिन अपने दावों, अपने मामलों के बारे में एक शब्द भी मत बोलो।” मोदी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस केरल में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए प्रतिबंधित संगठन की राजनीतिक शाखा एसडीपीआई के साथ पिछले दरवाजे से संवाद कर रही है। उनके मुताबिक, कांग्रेस केरल में वामपंथी कार्यकर्ताओं को ‘आतंकवादी’ कहती है. लेकिन दिल्ली में वे उन आतंकवादियों के साथ घूमते हैं, चुनावी रणनीति बनाते हैं, केरल में मोदी ने कांग्रेस गठबंधन यूडीएफ और वाम गठबंधन एलडीएफ को एक ही ब्रैकेट में रखकर एनडीए की महानता का वर्णन किया। कहा, ”भाजपा की ताकत से देश तेजी से आगे बढ़ रहा है. लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि एलडीएफ और यूडीएफ केरल को पीछे ले जा रहे हैं। केंद्र सरकार इस क्षेत्र के विकास के लिए लगातार प्रयास कर रही है, लेकिन राज्य सरकार इसमें रोड़ा अटका रही है. वे राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना को भी अवरुद्ध करना चाहते हैं।

वामपंथी नेतृत्व पर हमला बोलते हुए मोदी ने कहा, ”त्रिपुरा हो, बंगाल हो या केरल- वामपंथियों का चरित्र एक ही है। यानि कुछ भी नहीं छोड़ा कुछ भी सही नहीं। यानी जब वामपंथी सरकारें आती हैं तो उनके पास कुछ नहीं बचता। कुछ भी इसे सही नहीं बनाता है।”

राहुल गांधी आज तमिलनाडु के नीलगिरी से अपनी लोकसभा सीट वेनार्ड पहुंचे और रोड शो किया. उन्होंने शाम को कोझिकोड में एक सार्वजनिक बैठक भी की. प्रधानमंत्री के हमले के बारे में पूछे जाने पर राहुल ने सीधे तौर पर कुछ न कहते हुए कहा, ”मोदी की एक राज्य, एक भाषा, एक नेता की बात देश को गलत समझती है.” देश का अपमान हुआ है।” वाम-कांग्रेस के ‘दोहरेपन’ के आरोपों का जिक्र करते हुए राहुल ने कहा, ‘मुझे यकीन है कि वाम मोर्चे के भीतर भी कुछ लोग मेरा समर्थन करेंगे. यहां हर कोई मेरा परिवार है. अगर मैं किसी वामपंथी समर्थक से मिलता हूं तो उसे बता सकता हूं कि अगर विचारधाराएं मेल नहीं खातीं तो भी चर्चा करने में कोई दिक्कत नहीं है. मैं उसे समझा सकता हूं कि मेरा आदर्श उससे बेहतर क्यों है। लेकिन मैं उस लेफ्ट समर्थक के साथ कभी दुर्व्यवहार नहीं करूंगा. मैं उसका अपमान नहीं करूँगा।”

मोदी का प्रचार था कि पूरा देश उनका परिवार है. इस पर राहुल का जवाब था, ”सिर्फ इतना कहना काफी नहीं है. यहां तक ​​कि एक परिवार में भी अलग-अलग राय के लोग होते हैं, उन सभी को स्वीकार करना होगा। लेकिन यहां असली लड़ाई हमारे और आरएसएस के आदर्शों के बीच है। हमें अंग्रेजों से आजादी इसलिए नहीं मिली क्योंकि भविष्य में हम आरएसएस की विचारधारा के कारण अपने आदर्श खो देंगे।” केंद्र सरकार इस क्षेत्र के विकास के लिए लगातार प्रयास कर रही है, लेकिन राज्य सरकार इसमें रोड़ा अटका रही है. वे राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना को भी अवरुद्ध करना चाहते हैं।

वायनाड में राहुल गांधी के खिलाफ प्रचार से दूर रहेंगे सीताराम येचुरी.

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सवाल लाजिमी है कि वह बीजेपी के खिलाफ सीधी लड़ाई के मैदान से बचकर लेफ्ट के खिलाफ लड़ने क्यों आये हैं. हालांकि राहुल गांधी के फैसले को लेकर सवाल और गुस्सा है, लेकिन सीपीएम का शीर्ष नेतृत्व उनसे आमने-सामने की लड़ाई से बचना चाहता है. अब तक जो बात साफ है वह यह है कि सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी राहुल की लोकसभा सीट वायनाड में प्रचार नहीं करने जा रहे हैं. पार्टी के पूर्व महासचिव प्रकाश करात के चुनावी दौरे के कार्यक्रम में वेनाड नहीं हैं.

केरल की 20 लोकसभा सीटों पर 26 अप्रैल को मतदान होगा। ऐसे में इस हफ्ते से दक्षिणी राज्य में चुनाव प्रचार और गर्मी बढ़ती जा रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को केरल में दो रैलियां कीं. मौजूदा कांग्रेस सांसद और उम्मीदवार राहुल भी इस दिन वायनाड पहुंचे और रोड-शो किया. इस चरण में उनका अभियान दो दिनों तक चलेगा. कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, बाद में वह फिर राज्य में पार्टी का प्रचार करने आएंगे. सीपीएम महासचिव येचुरी का केरल दौरा आज मंगलवार से शुरू हो रहा है. उन्हें कासरगोड, कन्नूर, वडकारा, कोधिकोड होते हुए उत्तर में पलक्कड़ जाना है। सीपीएम पोलित ब्यूरो सदस्य ए विजयराघवन उस सीट से उम्मीदवार रहे हैं. उनका पतनमथिट्टा उम्मीदवार, राज्य के पूर्व वित्त मंत्री टोनस इसाक के लिए प्रचार करने का भी कार्यक्रम है। येचुरी का दौरा तिरुअनंतपुरम में ख़त्म होगा. उत्तर से लेकर दक्षिण तक राहुल के गुंडागर्दी एजेंडे में नहीं है. पार्टी के एक पोलित ब्यूरो सदस्य के शब्दों में, ”केरल में वामपंथियों और कांग्रेस के बीच समझौते की कोई स्थिति नहीं है.” लेकिन अखिल भारतीय स्तर पर भाजपा विरोधी ‘भारत’ मंच के दो पक्ष हैं। इस समय अगर किसी एक पार्टी का शीर्ष नेता केंद्र में उनके खिलाफ प्रचार करेगा तो इससे और गलत संदेश जायेगा.

सीपीएम सूत्रों के मुताबिक, केरल के वेनाड को अपना उम्मीदवार चुनकर राहुल पहले ही ‘रणनीतिक गलती’ कर चुके हैं. इसके अलावा, अगर सीपीएम का कोई महासचिव वहां चुनाव प्रचार कर रहा है, तो कड़वाहट और अधिक बढ़ सकती है।

हालांकि सीपीएम के शीर्ष नेतृत्व ने कड़वाहट को कम करने की कोशिश की, फिर भी राहुल ने उस रात कोढ़ीकोड में केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन पर हमला किया। राहुल का सवाल, बीजेपी और आरएसएस विजयन पर जिस तरह निशाना साधते हैं, उस तरह क्यों नहीं निशाना साधते?

लेकिन राहुल की रियायत के बावजूद, येचुरी अपने दाहिने हाथ, एआईसीसी महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल के केंद्र में चुनाव प्रचार कर रहे हैं। सीपीएम सूत्रों का तर्क है कि पिछली बार केरल में अलाप्पुझा ही एकमात्र सीट थी जो उन्होंने जीती थी। वेणुगोपाल वहां कांग्रेस के पक्ष में खड़े हुए. सीपीएम को अपनी सीटों की सुरक्षा के लिए पूरी ताकत लगानी होगी! हालांकि, बंगाल कांग्रेस में भी वेणुगोपाल को लेकर बेचैनी और विडंबना है. 2016 में दोनों दलों के बीच सीट समझौते के दौरान राहुल ने इस राज्य में प्रचार किया था, पूर्व मुख्यमंत्री, सीपीएम नेता बुद्धदेव भट्टाचार्य कोलकाता में प्रचार मंच पर उनके साथ थे। हालांकि, बेनुगोपाल के संगठन महासचिव बनने के बाद 2021 में बंगाल में सीटों पर सहमति बनने के बाद भी राहुल प्रचार में नहीं आए. भले ही अखिल भारतीय कांग्रेस ने इस बार लोकसभा में सीपीएम के साथ समझौते की औपचारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन कांग्रेस के भीतर वेणुगोपाल के ‘केरल-डे’ को लेकर आलोचना हो रही है!

वायनाड में राहुल के खिलाफ एनी राजा सीपीआई की उम्मीदवार बनी हैं. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के सुरेंद्रन बीजेपी के लिए चुनाव लड़ रहे हैं. हालांकि, बीजेपी का दावा है कि कांग्रेस और लेफ्ट के बीच समझौता हो गया है. सीपीएम के पोलित ब्यूरो सदस्य बृंदा करात, सुबाशिनी अली, तपन सेन के भी लोकसभा चुनाव के प्रचार के लिए केरल के कई केंद्रों का दौरा करने की उम्मीद है। इस बीच, सुभासिनी को वेनार्ड लागोआ मलप्पुरम जाना है। उनका पतनमथिट्टा उम्मीदवार, राज्य के पूर्व वित्त मंत्री टोनस इसाक के लिए प्रचार करने का भी कार्यक्रम है। येचुरी का दौरा तिरुअनंतपुरम में ख़त्म होगा. उत्तर से लेकर दक्षिण तक राहुल के गुंडागर्दी एजेंडे में नहीं है. पार्टी के एक पोलित ब्यूरो सदस्य के शब्दों में, ”केरल में वामपंथियों और कांग्रेस के बीच समझौते की कोई स्थिति नहीं है.” लेकिन अखिल भारतीय स्तर पर भाजपा विरोधी ‘भारत’ मंच के दो पक्ष हैं। इस समय अगर किसी एक पार्टी का शीर्ष नेता केंद्र में उनके खिलाफ प्रचार करेगा तो इससे और गलत संदेश जायेगा.