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आखिर क्या है छत्रपति शिवाजी महाराज का बाघ नख?

आज हम आपको छत्रपति शिवाजी महाराज के बाघ नख  के बारे में जानकारी देने वाले हैं! हाल ही में लंदन के एक म्यूजियम से छत्रपति शिवाजी महाराज का बाघ नख भारत वापस लाया गया है! जिसके बाद सियासत भी शुरू हो गई है! लेकिन सवाल यह कि आखिर छत्रपति शिवाजी महाराज का यह बाघ नख आखिर क्या है? इसकी कहानी क्या है और यह लंदन कैसे पहुंचा? इस बारे में आपको पूरी जानकारी देंगे! 

आपको बता दें कि छत्रपति शिवाजी महाराज का बाघ नख ब्रिटेन की राजधानी लंदन से भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई पहुंच चुका है। पिछले साल महाराष्ट्र की एकनाथ शिंदे सरकार ने बाघ नख को वापस लाने के लिए कोशिशें शुरू की थीं। आखिरकार 17 जुलाई की सुबह बाघ नख लंदन से मुंबई एयरपोर्ट पहुंच गया। बता दें कि 1659 के युद्ध में छत्रपति शिवाजी महाराज ने इसी बाघ नख के एक प्रहार से अफजल का काम तमाम किया था और अपनी रक्षा की थी। मराठा साम्राज्य के भविष्य को इस घटना ने एक अलग ही दिशा में मोड़ दिया था। इतिहासकारों के अनुसार, 1659 में शिवाजी महाराज ने बीजापुर सल्तनत के सेनापति अफजल खान को बाघ नख से एक ही झटके में चीर दिया था। तब बीजापुर सल्तनत के प्रमुख आदिल शाह और शिवाजी के बीच युद्ध चल रहा था। अफजल खान ने छल से शिवाजी को मारने की योजना बनाई थी और उन्हें मिलने के लिए बुलाया था। शिवाजी ने अफजल खान के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया था। जब शामियाने में मुलाकात के दौरान उसने शिवाजी की पीठ में खंजर भोंकने की कोशिश की, तो पहले से ही सतर्क शिवाजी ने बाघ नख से एक ही बार में अफजल का पेट चीर दिया था। तब से शिवाजी का बाघ नख शौर्य का प्रतीक बना हुआ है। छत्रपति शिवाजी महाराज ने 1659 में आदिलशाही सल्तनत के सेनापति अफजल खान को जिस बाघ नख से मारा, महाराष्ट्र सरकार ने अपनी कोशिशों से उसे वापिस ला दिया है। यह बाघ नख ब्रिटेन के एक म्यूजियम में रखा हुआ था।  राज्य सरकार ने जी20 की बैठकों में इसका जिक्र किया था और ब्रिटेन सरकार ने इसे देने की हामी भरी थी। यह बाघ नख अब भारत आ रहे हैं। हालांकि इसे लेकर सियासत भी शुरू हो गई है और शिवसेना (UBT) के नेताओं ने इस बाघ नख के शिवाजी का बाघ नख होने पर सवाल उठाए हैं।

महाराष्ट्र के कोल्हापुर से इतिहास के जानकार इन्द्रजीत सावंत ने कहा है कि जो बाघ नख महाराष्ट्र सरकार लंदन से ला रही है वह असली नहीं है क्योंकि साल 1919 तक महाराष्ट्र में सातारा में शिवाजी महाराज के बाघ नख उनके वंशजों के महल में मौजूद थे। हालांकि 1919 के बाद से बाघ नखों का कोई पता नहीं था। जो बाघ नख महाराष्ट्र सरकार लाई है इसे एक अंग्रेज अधिकारी को भेंट में दिया गया था और बाद में इसे उन्होंने लंदन म्यूजियम को सौंप दिया था। इस तरह देखा जाए तो दोनों ही पक्षों के अपने-अपने दावे और अपनी-अपनी दलीलें हैं। बता दें कि 1659 में शिवाजी महाराज ने बीजापुर सल्तनत के सेनापति अफजल खान को बाघ नख से एक ही झटके में चीर दिया था। तब बीजापुर सल्तनत के प्रमुख आदिल शाह और शिवाजी के बीच युद्ध चल रहा था। अफजल खान ने छल से शिवाजी को मारने की योजना बनाई थी और उन्हें मिलने के लिए बुलाया था। शिवाजी ने अफजल खान के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया था। कहते हैं कि बाघ नख नाम के इस हथियार का इस्तेमाल सबसे पहले छत्रपति शिवाजी महाराज ने ही किया था। बाघ नख एक तरह का हथियार है, जो आत्मरक्षा के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसे इस तरह डिजाइन किया जाता है जिससे यह पूरी मुट्ठी में फिट हो सके। यह स्टील और दूसरी धातुओं से से तैयार किया जाता है। इसे चार नुकीली छड़ें होती हैं जो किसी बाघ के पंजे जैसी घातक और नुकीली होती है और इसके दोनों तरफ दो रिंग होती हैं। इसे हाथ की पहली और चौथी उंगली में पहनकर ठीक तरह से मुट्ठी में फिट किया जाता है। यह इतना घातक होता है कि एक ही वार में किसी को भी मौत के घाट उतार सकता है।हालांकि इसे लेकर सियासत भी शुरू हो गई है और शिवसेना के नेताओं ने इस बाघ नख के शिवाजी का बाघ नख होने पर सवाल उठाए हैं। तो यह है हमारे वीर छत्रपति शिवाजी महाराज के बाघ नख की कहानी!

अगर ट्रंप राष्ट्रपति बने तो भारत को क्या करना होगा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि अगर अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप बनते हैं तो भारत को क्या करना होगा! अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव पर दुनियाभर की नजरें लगी हुई हैं। चुनाव प्रचार के दौरान रिपब्लिकन उम्मीदवा डोनाल्ड ट्रंप और डेमोक्रेटस उम्मीदवार जो बाइडेन एक दूसरे के खिलाफ बढ़त बनाने में जुटे हैं। अमेरिका समेत दुनिया के छोटे-बड़े देशों की नजरें डोनाल्ड ट्रंप के भाषणों पर अधिक हैं। फिलहाल मीडिया रिपोर्ट में ट्रंप अपने प्रतिद्वंद्वी जो बाइडेन पर भारी पड़ते दिख रहे हैं। ऐसे में अगर राष्ट्रपति ट्रंप सत्ता में वापसी करते हैं तो कई देशों के लिए अमेरिका के साथ मौजूदा राजनयिक समीकरणों में बदलाव हो तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। ऐसे में सवाल है कि आखिर भारत को ट्रंप के दुबारा राष्ट्रपति बनने पर क्या कुछ करने की जरूरत होगी। अमेरिका में जिस तरह से ट्रंप भाषण दे रहे हैं उससे एक बात तो तय है कि राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रंप का संभावित दूसरा कार्यकाल में ‘कॉमन सेंस’ के आधार पर चलेगा। यह वहीं कॉमन सेंस है जिसका विचार मिल्वौकी, विस्कॉन्सिन में हाल ही में संपन्न रिपब्लिकन नेशनल कन्वेंशन का प्रमुख विषय था। माना जा रहा है कि ट्रंप के नेतृत्व में, रिपब्लिकन पार्टी कई मुद्दों पर पारंपरिक अमेरिकी आम सहमति को खत्म करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाएगी। इसमें मुक्त व्यापार, गठबंधन, खुली सीमाएं शामिल हैं। भारत सहित दुनिया के बाकी हिस्सों को अमेरिका के बारे में अपनी धारणाओं को बदलना होगा।

पांच संभावित बदलावों के लिए भारतीय विदेश नीति के एलीट वर्ग को अमेरिका के बारे में अपने स्वयं के ‘कॉमन सेंस’ पर पुनर्विचार करना चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया है कि व्यापार और आर्थिक वैश्वीकरण रिपब्लिकन सम्मेलन ने बिना किसी हिचकिचाहट के ट्रम्प की वैश्वीकरण विरोधी प्रवृत्ति का समर्थन किया है। रिपब्लिकन पार्टी बाकी दुनिया को (घर पर काम करने वाले लोगों की कीमत पर) उत्पादन आउटसोर्सिंग बंद करना चाहता है। वह अमेरिका को फिर से एक विनिर्माण महाशक्ति बनाना” चाहता है। इसके लिए मुख्य साधन आयात पर शुल्कों में बड़ी बढ़ोतरी (सभी आयातों के लिए 10% और चीन से आयात के लिए 60%) की घोषित ट्रम्प योजना है। ब्लूमबर्ग को दिए एक इंटरव्यू में, ट्रम्प ने आयात को महंगा बनाने और अमेरिकी निर्यात को बढ़ावा देने के लिए डॉलर का अवमूल्यन करने की अपनी लंबे समय से चली आ रही इच्छा पर जोर दिया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया ने लंबे समय से यह मान लिया है कि अमेरिका दुनिया के निर्यात के लिए एक अथाह स्रोत है। यह विश्वास ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में कायम नहीं रह सकता। अमेरिकी संरक्षणवाद की शिकायत करना या WTO के नियमों के बारे में बात करना वाशिंगटन के साथ ज्यादा तालमेल नहीं बिठा पाएगा। WTO की बात करना, जैसा कि हमारे व्यापार नौकरशाह करते हैं। यह एक शक्तिशाली चक्रवात को रोकने के लिए मंत्र पढ़ने जैसा होगा। व्यापार के मुद्दे जो पहले कार्यकाल में ट्रंप के साथ भारत के जुड़ाव में एक महत्वपूर्ण अड़चन थे, अब एक गंभीर चुनौती बन जाएंगे। इसके समाधान के लिए भारत की अपनी व्यापार रणनीतियों पर फिर से विचार करना होगा।

रिपोर्ट के अनुसार सुरक्षा और गठबंधन सुरक्षा के मामले में, भारत यूरोप और एशिया में अमेरिका के उन सहयोगियों से बेहतर स्थिति में हो सकता है, जिन्हें अमेरिका के छोड़े जाने का डर है। रिपब्लिकन अमेरिका को दुनिया से अलग-थलग नहीं करना चाहते। वे अधिक पारस्परिकता चाहते हैं। पहली नजर में, एक गैर-सहयोगी के रूप में, भारत उस तर्क का हिस्सा नहीं है; लेकिन अमेरिका के साथ सैन्य साझेदारी आज भारत की डिफेंस कैलकुलस के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इसकी वजह है कि चीन अपनी सीमाओं पर हमेशा से ही आक्रामक रहा है। हालांकि भारत-अमेरिका के बीच तालमेल वास्तविक है, लेकिन दिल्ली अब तक इसे ठोस सैन्य व्यवस्था में बदलने में हिचकिचा रही है।

यह विचार कि दिल्ली किसी के साथ प्रतिबद्धता किए बिना सभी पक्षों के साथ खेल सकती है, ट्रंप के अधीन आगे बढ़ाना कठिन हो सकता है, जो अमेरिका के महाशक्ति संबंधों को हिला देने की योजना बना रहे हैं। इच्छुक और सक्षम साझेदारों की अमेरिकी खोज और अपनी व्यापक राष्ट्रीय शक्ति का निर्माण करने तथा एशियाई सुरक्षा को नया आकार देने में बड़ी भूमिका निभाने की भारत की इच्छा के बीच एक अच्छा तालमेल है। भारत पिछले एक दशक से भी अधिक समय से अमेरिका के साथ अधिक बोझ साझा करने की योजना को स्पष्ट करने में धीमा रहा है। यह अब नई दिल्ली के लिए एक तत्काल प्राथमिकता होनी चाहिए।

रिपब्लिकन बिडेन प्रशासन के “हरित संक्रमण” के व्यापक एजेंडे को खत्म करने के लिए दृढ़ हैं। ट्रंप औद्योगिक नीति के माध्यम से अमेरिका को “ऊर्जा महाशक्ति” बनाने का वादा कर रहे हैं। वह हाइड्रोकार्बन ड्रिलिंग के तेजी से विस्तार का समर्थन करने की योजना बना रहे हैं। ट्रंप के कार्यकाल में भारत ने अमेरिका की बड़ी तेल कंपनियों के साथ काम किया। दिल्ली के लिए उनके साथ फिर से जुड़ना समझदारी होगी। भारत के लिए ट्रंप का अमेरिका एक अधिक महत्वपूर्ण ऊर्जा साझेदार बन सकता है।

ट्रंप की तरफ से किए जा रहे व्यापक राजनीतिक पुनर्गठन के बीच भारत को अमेरिका के विभिन्न घरेलू राजनीतिक क्षेत्रों के साथ बातचीत बढ़ानी चाहिए। पूंजी के हितों से ऊपर मजदूर वर्ग के हितों को रखने, बड़े पैमाने पर अप्रवासन के खिलाफ श्रम को सुरक्षित करने, वैश्विक प्रतिबद्धताओं को कम करने और विदेशों में युद्धों से बचने के ट्रंप के तर्क रिपब्लिकन और डेमोक्रेट के बीच की खाई को पाटते हैं और राजनीतिक समर्थन के विविध स्रोत हैं।

जब कोरोना में हुई अतिरिक्त मौतों को स्वास्थ्य मंत्रालय ने नकारा!

हाल ही में स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोरोना में हुई अतिरिक्त मौतों को नकार दिया है! केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने ‘साइंस एडवांस’ पेपर में पब्लिश उस रिपोर्ट को सिरे से नकार दिया है, जिसमें भारत में कोविड महामारी के दौरान 2020 में 2019 के मुताबिक करीब 11.9 लाख ज्यादा मौतों का दावा किया गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने 2020 में अत्यधिक मृत्यु दर को पेश करने वाली इस रिपोर्ट को भ्रामक बताते हुए कहा है कि साइंस एडवांस पेपर के दावे अपुष्ट और अस्वीकार्य अनुमानों पर आधारित हैं। पेपर में अत्यधिक मौतों के आंकड़ों को तीन गुना तक बढ़ाकर बताया गया है। मंत्रालय का कहना है कि इस पेपर को पब्लिश करने वालों ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (एनएफएचएस-5) के विश्लेषण के लिए मानक पद्धति फॉलो करने का दावा किया है लेकिन उनकी पद्धति में गंभीर खामियां हैं। जबकि आंकड़े कहते हैं कि 2019 की तुलना में 2020 में मृत्यु पंजीकरण में 4.74 लाख की बढ़ोतरी हुई है।अगर हम उस सीआरएस डेटा को देखें तो 2020 में ज्यादा डेथ का नंबर 4.74 लाख है जबकि रिसर्च पेपर में 12 लाख का दावा किया गया है तो पहला आंकड़ा तो बिल्कुल गलत साबित हो जाता है। 2018 और 2019 में मृत्यु पंजीकरण में पिछले वर्षों की तुलना में 4.86 लाख और 6.90 लाख की बढ़ोतरी हुई थी। नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ. वी. के. पॉल का कहना है कि 2019 के मुकाबले 2020 में अत्यधिक मृत्यु दर की जानकारी सही नहीं है। ये जो स्टडी पब्लिश हुई है, उसमें 2020 में 2019 के मुकाबले ज्यादा मौतें होने की बात कही है लेकिन स्टडी करने वालों का तरीका बहुत ही कमजोर है। 

उस समय देश में 14 राज्यों में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 चल रहा था और रिसचर्स ने केवल कुछ महीनों का ही डेटा एकत्र किया है जबकि सर्वे में पूरे साल का डेटा लिया जाता है। सरकार इस बात को बिल्कुल नहीं मानती है कि 2019 के मुकाबले 2020 में 11.9 या 12 लाख ज्यादा डेथ ज्यादा हुई है। भारत में सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (सीआरएस) का एक पुख्ता सिस्टम है। रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया ने इसे कानूनी रूप से लागू किया है। देश में जितनी भी मौतें होती हैं, उस डेटा को रजिस्टर में लिखा जाता है। पहले स्टेट में रजिस्टर्ड होता है और उसके बाद केंद्र के पास रिपोर्ट आती है। अगर हम उस सीआरएस डेटा को देखें तो 2020 में ज्यादा डेथ का नंबर 4.74 लाख है जबकि रिसर्च पेपर में 12 लाख का दावा किया गया है तो पहला आंकड़ा तो बिल्कुल गलत साबित हो जाता है।

2019 में 92% और 2020 में 99.9% डेथ रजिस्ट्रर्ड हुई हैं। कोविड के दौरान 2020 में जो 4.74 लाख ज्यादा मौतें हुई हैं, उसमें कोविड के कारण हुई मौतें भी शामिल हैं। सरकार ने कोविड के दौरान ग्राउंड लेवल पर डेटा जुटाया है और पूरा अनुमान लगाया है। 2020 में कोविड के कारण हुई मौतों की संख्या करीब 1.49 लाख है, जो 4.74 लाख में ही शामिल है। सभी ज्यादा मौतें केवल कोविड के कारण नहीं हो सकती हैं और भारत का डेटा भी यही कहता है। साइंस जर्नल की स्टडी में अनुमान से कहीं ज्यादा आकलन दिखाया गया है जो सचाई से मेल नहीं खाता है। डॉ. पॉल का कहना है कि इस प्रकाशित किए गए पेपर में इस तरह के विश्लेषण की आवश्यकता के लिए गलत तर्क दिया गया है और दावा किया गया है कि भारत सहित निम्न और मध्यम आय वाले देशों में महत्वपूर्ण पंजीकरण प्रणाली कमजोर है। बता दें कि 2018 और 2019 में मृत्यु पंजीकरण में पिछले वर्षों की तुलना में 4.86 लाख और 6.90 लाख की बढ़ोतरी हुई थी। नीति आयोग के सदस्य. वी. के. पॉल का कहना है कि 2019 के मुकाबले 2020 में अत्यधिक मृत्यु दर की जानकारी सही नहीं है। यह सत्य से बहुत दूर है। उस समय देश में 14 राज्यों में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 चल रहा था और रिसचर्स ने केवल कुछ महीनों का ही डेटा एकत्र किया है जबकि सर्वे में पूरे साल का डेटा लिया जाता है। सरकार इस बात को बिल्कुल नहीं मानती है कि 2019 के मुकाबले 2020 में 11.9 या 12 लाख ज्यादा डेथ ज्यादा हुई है।भारत में नागरिक पंजीकरण प्रणाली (सीआरएस) अत्यधिक मजबूत है और 99% से अधिक मृत्यु की जानकारी देती है।अगर हम उस सीआरएस डेटा को देखें तो 2020 में ज्यादा डेथ का नंबर 4.74 लाख है जबकि रिसर्च पेपर में 12 लाख का दावा किया गया है तो पहला आंकड़ा तो बिल्कुल गलत साबित हो जाता है। यह रिपोर्टिंग वर्ष 2015 में 75 प्रतिशत से लगातार बढ़कर वर्ष 2020 में 99 प्रतिशत से अधिक हो गई है।

जब किरेन रिजिजू ने बुलाई सर्वदलीय बैठक!

हाल ही में किरेन रिजिजू ने सर्वदलीय बैठक बुलाई थी! संसद का मानसून सत्र सोमवार से शुरू होने वाला है, जिसमें वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण मंगलवार को केंद्रीय बजट पेश करेंगी। इस सत्र के दौरान विपक्ष भी ‘नीट’ पेपरलीक और रेल सुरक्षा जैसे मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। यह सत्र सोमवार से शुरू होगा और 12 अगस्त तक चलेगा, जिसमें 19 बैठकें होंगी। बजट सत्र से पहले केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने सर्वदलीय बैठक बुलाई है। इस बैठक में संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू सभी दलों के नेताओं से मुलाकात करेंगे। इस दौरान बजट सत्र में उठने वाले मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। सरकार इस सत्र में छह विधेयक पेश कर सकती है, जिसमें 90 साल पुराने एयरक्राफ्ट एक्ट को बदलने वाला विधेयक भी शामिल है। इसके अलावा, केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के बजट के लिए भी संसद से मंजूरी मांगी जाएगी। 22 जुलाई से शुरू होने वाला संसद का ये सत्र 12 अगस्त को समाप्त होगा। इस दौरान 19 बैठकें होंगी। विधेयक को भी पेश करने, विचार करने और पारित करने के लिए सूचीबद्ध किया है। गुरुवार को जारी लोकसभा बुलेटिन में कहा गया कि प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में काम कर रहे विभिन्न संगठनों की भूमिका में अधिक स्पष्टता और तालमेल लाना है।यह बजट सत्र कई मायनों में महत्वपूर्ण है। यह मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का आखिरी पूर्ण बजट होगा। गुरुवार को जारी लोकसभा बुलेटिन में कहा गया कि प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में काम कर रहे विभिन्न संगठनों की भूमिका में अधिक स्पष्टता और तालमेल लाना है।इसके साथ ही, 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले यह आखिरी पूर्ण बजट भी होगा। ऐसे में माना जा रहा है कि सरकार इस बजट में कई बड़े ऐलान कर सकती है। इस सत्र में सरकार की ओर से छह विधेयक पेश किए जाने की उम्मीद है। इनमें 90 साल पुराने विमान अधिनियम को बदलने वाला विधेयक भी शामिल है। इस सत्र में जम्मू-कश्मीर के बजट के लिए संसद की मंजूरी भी मिलेगी। इस केंद्रशासित प्रदेश में फिलहाल विधानसभा अस्तित्व में नहीं है और केंद्र का शासन है।

सीतारमण सोमवार को संसद में आर्थिक सर्वेक्षण भी पेश करेंगी। वित्त मंत्री सीतारमण 23 जुलाई को आम बजट पेश करने वाली हैं। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजीजू ने आज संसद में राजनीतिक दलों के नेताओं की एक बैठक बुलाई है, ताकि उन मुद्दों को समझा जा सके जिन्हें वे सत्र के दौरान उठाना चाहते हैं। ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के नेतृत्व वाले बीजू जनता दल ने घोषणा की है कि वह एक मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाएगा और संसद में राज्य के हित के मुद्दों को आक्रामक तरीके से उठाएगा।

बीजेपी संसदीय दल के अध्यक्ष चुने गए नवीन पटनायक ने अपनी पार्टी के सांसदों से ओडिशा को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग उठाने को कहा है। इस सत्र में वित्त विधेयक के अलावा सरकार ने आपदा प्रबंधन (संशोधन) विधेयक को भी पेश करने, विचार करने और पारित करने के लिए सूचीबद्ध किया है। गुरुवार को जारी लोकसभा बुलेटिन में कहा गया कि प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में काम कर रहे विभिन्न संगठनों की भूमिका में अधिक स्पष्टता और तालमेल लाना है।

भारतीय वायुयान विधेयक, 2024 नागरिक उड्डयन क्षेत्र में व्यापार करने में आसानी के लिए सक्षम प्रावधान प्रदान करने की खातिर 1934 के विमान अधिनियम को बदलने का प्रयास करता है। बजट सत्र में उठने वाले मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। सरकार इस सत्र में छह विधेयक पेश कर सकती है, जिसमें 90 साल पुराने एयरक्राफ्ट एक्ट को बदलने वाला विधेयक भी शामिल है। इसके अलावा, केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के बजट के लिए भी संसद से मंजूरी मांगी जाएगी।सत्र के दौरान पेश और पारित किए जाने वाले अन्य विधेयकों में स्वतंत्रता पूर्व के कानून की जगह लेने वाला बॉयलर विधेयक, कॉफी (संवर्धन और विकास) विधेयक और रबर संवर्धन और विकास विधेयक शामिल हैं। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कार्य मंत्रणा समिति (बीएसी) का भी गठन किया है। सीतारमण सोमवार को संसद में आर्थिक सर्वेक्षण भी पेश करेंगी। वित्त मंत्री सीतारमण 23 जुलाई को आम बजट पेश करने वाली हैं। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजीजू ने आज संसद में राजनीतिक दलों के नेताओं की एक बैठक बुलाई है, ताकि उन मुद्दों को समझा जा सके जिन्हें वे सत्र के दौरान उठाना चाहते हैं।बीएसी संसदीय कामकाज का एजेंडा तय करती है।

जब जिंदल ग्रुप के अधिकारी पर महिला ने लगाया छेड़खानी का आरोप!

हाल ही में एक महिला ने जिंदल ग्रुप के अधिकारी पर छेड़खानी का आरोप लगाया है! एक महिला ने आरोप लगाया है कि जिंदल ग्रुप की तरफ से प्रोमोटेड फर्म के एक शीर्ष अधिकारी ने कोलकाता से अबू धाबी की उड़ान के दौरान उसके साथ छेड़छाड़ की। इतनी ही नहीं महिला ने कथित अधिकारी पर फोन में पोर्न दिखाने का भी आरोप लगाया। अपने आरोपों की जानकारी उसने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर शेयर किा। इस पर सांसद और जिंदल स्टील के अध्यक्ष नवीन जिंदल ने कहा कि उन्होंने अपनी टीम को मामले की जांच करने का आदेश दिया है। रिपोर्ट के अनुसार आरोपी ओमान स्थित वल्कन ग्रीन स्टील का सीईओ है। एक्स पर एक पोस्ट में, महिला, ने लिखा, ‘कोलकाता से अबू धाबी (बोस्टन के लिए ट्रांजिट) की फ्लाइट में मेरे साथ हुई एक घटना को साझा कर रही हूं। स्टाफ ने अबू धाबी में पुलिस को भी सूचित किया जो विमान के गेट खुलते ही इंतजार कर रहे थे। मैं शिकायत नहीं कर सकती थी क्योंकि मैं बोस्टन के लिए अपनी कनेक्टिंग फ्लाइट मिस कर देती।मैं एतिहाद के कर्मचारियों और अबू धाबी पुलिस द्वारा मुझे प्रदान किए गए समर्थन के लिए बहुत आभारी हूं। महिला की प्रोफाइल में हार्वर्ड में इंडिया कॉन्फ्रेंस की सह-अध्यक्ष बताया गया है। उसने आरोप लगाया कि वह ‘एक उद्योगपति के बगल में’ बैठी थी। महिला ने उसे ‘जिंदल स्टील का सीईओ’ बताया।

महिला ने लिखा कि उसकी उम्र लगभग 65 साल होगी। उसने मुझे बताया कि वह अब ओमान में रहता है, लेकिन अक्सर यात्रा करता है।सांसद नवीन जिंदल तक पहुंचाने का प्रयास कर रही हूं, ताकि उन्हें पता चले कि नेतृत्व में किस तरह के लोग हैं। मुझे इस बात का भी डर है कि यह उत्पीड़क सत्ता में बैठे हुए अपनी महिला कर्मचारियों के साथ कैसा व्यवहार कर रहा होगा। उसने मुझसे बातचीत शुरू की – हमारी जड़ों, परिवार आदि के बारे में बहुत सामान्य बातचीत की। वह राजस्थान के चुरू से है… बातचीत मेरे हॉबी पर होने लगी। उसने पूछा कि क्या मुझे फिल्में देखना पसंद है और मैंने कहा कि हां, जरूर। फिर उसने मुझे बताया कि उसके फोन में कुछ मूवी क्लिप हैं। महिला ने आरोप लगाया कि उसने अपना फोन और इयरफोन निकालकर मुझे पोर्न दिखाया। इसके बाद वह अश्लील तरीके से मुझे छूने लगा।

महिला ने आगे लिखा कि इससे ‘मैं सदमे और डर से जम गई थी। मैं आखिरकार वॉशरूम भाग गई और एयर स्टाफ से शिकायत की। शुक्र है कि एतिहाद की टीम बहुत सक्रिय थी और उसने तुरंत कार्रवाई की। उन्होंने मुझे अपने बैठने की जगह पर बैठाया और मुझे चाय और फल दिया। स्टाफ ने अबू धाबी में पुलिस को भी सूचित किया जो विमान के गेट खुलते ही इंतजार कर रहे थे। मैं शिकायत नहीं कर सकती थी क्योंकि मैं बोस्टन के लिए अपनी कनेक्टिंग फ्लाइट मिस कर देती।

महिला ने कहा कि मुझे अगले गेट तक ले जाया गया ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वह मेरे पास न आए। जब पुलिस ने उससे सवाल पूछे तो उसने इनकार भी नहीं किया। महिला ने लिखा कि मैं यह इसलिए शेयर कर रही हूं क्योंकि मैं सभी को याद दिलाना चाहती हूं कि ऐसा कुछ किसी के साथ भी हो सकता है। बता दें कि आरोपी ओमान स्थित वल्कन ग्रीन स्टील का सीईओ है। एक्स पर एक पोस्ट में, महिला, ने लिखा, ‘कोलकाता से अबू धाबी बोस्टन के लिए ट्रांजिट की फ्लाइट में मेरे साथ हुई एक घटना को साझा कर रही हूं। मैं एतिहाद के कर्मचारियों और अबू धाबी पुलिस द्वारा मुझे प्रदान किए गए समर्थन के लिए बहुत आभारी हूं। महिला ने लिखा कि उसकी उम्र लगभग 65 साल होगी। उसने मुझे बताया कि वह अब ओमान में रहता है, लेकिन अक्सर यात्रा करता है। उसने मुझसे बातचीत शुरू की – हमारी जड़ों, परिवार आदि के बारे में बहुत सामान्य बातचीत की।मैं इस घटना को जिंदल स्टील के संस्थापक, सांसद नवीन जिंदल तक पहुंचाने का प्रयास कर रही हूं, ताकि उन्हें पता चले कि नेतृत्व में किस तरह के लोग हैं।महिला ने आरोप लगाया कि उसने अपना फोन और इयरफोन निकालकर मुझे पोर्न दिखाया। इसके बाद वह अश्लील तरीके से मुझे छूने लगा। मुझे इस बात का भी डर है कि यह उत्पीड़क सत्ता में बैठे हुए अपनी महिला कर्मचारियों के साथ कैसा व्यवहार कर रहा होगा।

आखिर नाम की तख्ती से यूपी में क्यों बढ़ रहा है विवाद?

वर्तमान में यूपी में नाम की तख्ती से विवाद बढ़ता ही जा रहा है! कांवड़ यात्रा के रास्ते पर खान-पान की सामग्री बेचने वाले सभी दुकानदारों को अपने और अपने कर्मचारियों के नाम बताने होंगे। उत्तर प्रदेश प्रशासन के इस आदेश को मुसलमान विरोधी बताया जा रहा है। ये तो चोर की दाढ़ी में तिनका वाली बात हो गई। जब प्रशासन ने किसी धर्म, समुदाय, जाति विशेष का नाम नहीं लिया, उसने सबके लिए आदेश जारी किया है तो फिर इससे मुसलमानों को नुकसान होगा, यह कैसे पता चला? बिल्कुल आसान जवाब है। ये सब जानते हैं कि मुसलमान किस हद तक अनैतिक और अमानवीय हरकतों में जुटे हैं। आए दिन पेशाब, थूक और पता नहीं किन-किन तरकीबों से अपवित्र करके खाने-पीने के सामान बेचने की इनकी घटिया हरकतों के वीडियोज सामने आते रहते हैं। मुसलमान जहां हैं, वहां बस दो ही मानसिकता के साथ काम कर रहे हैं। पहली- गैर-मुस्लिमों को जैसे भी हो सके, प्रताड़ित करो, उनका धर्म भ्रष्ट करो और दूसरी- तरह-तरह के जिहाद से उनका धर्म परिवर्तन करवाओ। अब तो लगातार मिल रहे प्रमाणों से यह साबित सा हो गया है कि मुसलमान न हिंदुओं के साथ सामंजस्य चाहते हैं और ना हिंदुस्तान को अपना मानते हैं। लेकिन उनकी मांग यह है कि हिंदू समावेशी विचारों से तनिक भी नहीं भटकें, धर्मनिरपेक्षता का दामन न छोड़ें। फिर पारदर्शिता से परहेज क्यों? किसकी दुकान है, यह बताने में क्या हर्ज? क्यों बात-बात में इस्लाम को खतरे में देखने वाला मुसलमान अपने होटलों, ढाबों के नाम हिंदू देवी-देवताओं पर रखेगा? उत्तर प्रदेश और कांवड़ यात्रा के मार्ग ही नहीं, पूरे देश में अगर कोई कुछ छिपाकर कारोबार कर रहा है तो क्या वह गुनाह नहीं है?

अगर, यह सच है कि मुसलमान खाने-पीने के सामानों में थूक रहे हैं, पेशाब कर रहे हैं और यह बीमारी किसी एक इलाके की नहीं, देश के कोने-कोने में देखी जा रही है तो फिर कोई किस मुंह से कहता है कि दुकानदारों को नेम प्लेट लगाने का फरमान हिटलरशाही है। अगर यह हिटलरशाही है तो यही सही, लेकिन हिंदू थूक चाटकर और पेशाब पीकर समावेशी और धर्मनिरपेक्ष भावना का झंडाबरदार नहीं बना रह सकता। जो कोई भी यूपी प्रशासन के आदेश की निंदा कर रहा है, वो इस बात की चर्चा तक नहीं करता कि हां, कुछ मुसलमान अमानवीय हरकतें करते हैं। भला ये क्यों चर्चा करें? इन्हें जिहादी मानसिकता से क्या परेशानी? जिसे पेशाब पीना पड़े, थूका हुआ खाना पड़े, वो जानें। इन्हें तो बस लोकतंत्र, संविधान, धर्मनिरेपक्षता, समावेशिता, सहिष्णुता के नारों से जिहादियों का बचाव करना है, जिहाद की आंच तेज करनी है। दूसरी तरफ, धर्मगुरु के वेष में भी हिंदू हाय हुसैन के नारे के साथ अपने शरीर को जख्मी कर रहा है। एकता प्रदर्शित करने का इससे बड़ा और क्या प्रमाण चाहते हो?

दरअसल, ये लोकतंत्र, संविधान, मानवाधिकार, धर्मनिरपेक्षता आदि का इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ युद्ध के औजारों की तरह करते हैं। दुनिया के उस लोतांत्रिक और समावेशी देश का नाम बता दें जहां मुसलमान पलायन करके गए और उस देश का कायाकल्प कर दिया। इसके उलट एक भी देश नहीं जहां पलायन कर गए मुसलमानों की ठीकठाक आबादी होते ही शांति बरकरार रह सकी। इंग्लैंड इसका जीता-जागता उदाहरण है। ये मुसलमान ही हैं जिन्होंने यूरोप के उन देशों की नाक में भी दम करने से परहेज नहीं किया जिन्होंने संकट के वक्त इनके लिए अपनी बाहें पसारीं। ये इतने पतित हैं कि जिन माहौल, जिन हालात से पीछा छुड़ाकर भागे, वही माहौल और हालात उन देशों में भी बना देते हैं जहां इन्होंने शरण ली हुई है। वो तो दूसरे देश हैं, यहां भारत में रहने वाले मुसलमान ही अक्सर ऐसा व्यवहार करते दिख जाते हैं कि मानो किसी दुश्मन देश को युद्ध में हराकर जीत का जश्न मना रहे हों। तिरंगे का अपमान करेंगे और फिलिस्तीनी झंडे को ऐसे लहराएंगे जैसे निजाम-ए-मुस्तफा का ऐलान कर रहे हों। भारत माता की जय कहने से इस्लाम संकट में आ जाता है और संसद में जय फिलिस्तीन का नारा काफी हर्षोल्लास से लेते हैं।

कहते हैं पढ़ाई से, जीवन स्तर ऊंचा होने से कट्टरता कम हो जाती है। लेकिन मुसलमानों पर यह फॉर्म्युला भी काम नहीं आता है। बाकियों को छोड़ दीजिए जो शिक्षा की रोशनी बांटते हैं, वो मुसलमान कट्टरता के किस घुप्प अंधेरों से घिरे हैं इसका प्रमाण अभी-अभी दिल्ली में मिला है। यहां मुस्लिम शिक्षकों ने बच्चों को धर्म परिवर्तन के लिए डराया। जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में एक कर्मचारी का आरोप है कि मुस्लिम उनपर धर्म परिवर्तन करने का दबाव बना रहे हैं। मुसलमान चाहे आईएएस बन जाएं या यूएस चले जाएं, क्रिकेट खेल रहे हों या कोई फिल्म स्टार हो, पत्रकार हो या लेखक, जो जहां है जिहाद में लगा हुआ है। सबका तरीका अलग हो सकता है, लेकिन जिहाद में अपनी भागीदारी जरूर सुनिश्चित कर रहा है। कोई सीधा कत्ल करके तो कोई जिहादी संगठनों की फंडिंग करके, कोई टीवी चैनल पर बैठकर जिहादियों का बचाव करके तो कोई लेख लिखकर। ये बहुरूपिये जिहाद में या तो सीधे शामिल हैं या परोक्ष रूप से।

क्या अब अतिरिक्त फौजियों के जरिए आतंकवादियों को खत्म करेगी सरकार?

अब सरकार अतिरिक्त फौजियों के जरिए आतंकवादियों को खत्म करने के प्लान बना रही है! जम्मू क्षेत्र में लगातार हो रही आतंकी वारदातों को देखते हुए भारतीय सेना ने वहां अतिरिक्त 3,000 सैनिकों की तैनाती कर दी है। सूत्रों के मुताबिक इसी हफ्ते सेना ने जम्मू क्षेत्र में एक ब्रिगेड हेडक्वॉर्टर, तीन बटालियन और कुछ पैरा एसएफ की टीम को भी भेज दिया है। एक बटालियन में करीब 800 सैनिक होते हैं। इसी तरह एक पैरा एसएफ टीम में करीब 40 कमांडो होते हैं। इस तरह करीब 2,500 सैनिक और करीब 500 पैरा कमांडो को जम्मू भेजा गया है। इसके साथ ही सीएपीएफ (सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्स) ने भी जम्मू क्षेत्र में अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती कर दी है। सैनिकों की कमी और ईस्टर्न लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन के साथ तनाव का असर जम्मू क्षेत्र में दिखाई दिया और वहां आतंकियों को फिर से पनपने का मौका मिला। आतंकियों ने सैनिकों की कमी का फायदा उठाते हुए खुद का खड़ा ही नहीं किया बल्कि अब जम्मू क्षेत्र में वे सिक्यॉरिटी फोर्स के लिए बड़ा सिरदर्द बन गए हैं। भारतीय सेना में करीब चार साल पहले ही एक लाख सैनिकों को कम करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई थी। टारगेट रखा गया था कि 2027 तक यह संख्या कम हो जाएगी। संसद की रक्षा मामलों की स्टैंडिंग कमिटी को भी तब इसकी जानकारी दी गई थी कि तकनीक का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं इसलिए मैन पावर कम किया जा रहा है।चार साल पहले जब ईस्टर्न लद्दाख में चीन के साथ एलएसी पर तनाव बढ़ा और स्थिति हिंसक झड़प तक पहुंच गई तब यहां से यूनिफॉर्म फोर्स को हटाकर LAC पर भेज दिया गया। यहां से एक डिविजन जितने सैनिकों को कम किया गया। यानी करीब 10-12 हजार सैनिक यहां से कम हुए।

जम्मू क्षेत्र में चार साल पहले सेना की करीब चार डिविजन जितनी संख्या थी। यूनिफॉर्म फोर्स को एलएसी भेजने से यहां तीन डिविजन रह गई। यहां अभी राष्ट्रीय राइफल (आरआर) की रोमियो फोर्स और डेल्टा फोर्स है। ये पूरी तरह से काउंटर इनसर्जेंसी-काउंटर टेररिजम (सीआईसीटी) टास्क को देख रही है। एक फोर्स में एक डिविजन जितने यानी करीब 12 हजार सैनिक हैं। सेना की दो और डिविजन जम्मू क्षेत्र में है। एक डिविजन का टास्क एलओसी देखना है और दूसरी डिविजन का टास्क एलओसी भी है और सीआईसीटी भी है।

सूत्रों के मुताबिक भारतीय सेना में इस वक्त करीब 1 लाख 80 हजार सैनिकों की कमी है। कोविड की वजह से दो साल तक सैनिकों की भर्ती ही नहीं हुई। इस दौरान हर साल 60 हजार सैनिक रिटायर हुए। इस लिहाज से कोविड वाले दो सालों में करीब 1 लाख, 20 हजार सैनिक रिटायर हुए। 2022 से अग्निवीर की भर्ती हुई और पहले और दूसरे साल दोनों बार 40 – 40 हजार अग्निवीर भर्ती किए गए। इन दो सालों में करीब 1 लाख, 40 हजार सैनिक रिटायर हुए क्योंकि 2022-23 में करीब 80 हजार सैनिक रिटायर हुए जबकि भर्ती हुए 80 हजार। इस तरह सेना में करीब 1 लाख, 80 हजार सैनिकों की कमी है।

जम्मू में हुए आतंकी हमलों के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या तकनीक सैनिकों की कमी पूरी कर सकती है? भारतीय सेना में करीब चार साल पहले ही एक लाख सैनिकों को कम करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई थी। टारगेट रखा गया था कि 2027 तक यह संख्या कम हो जाएगी। संसद की रक्षा मामलों की स्टैंडिंग कमिटी को भी तब इसकी जानकारी दी गई थी कि तकनीक का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं इसलिए मैन पावर कम किया जा रहा है। लेकिन एलएसी पर तनाव बढ़ने के बाद से वहां 50 हजार सैनिक डटे हुए हैं। जम्मू से हटाकर कई सैनिकों को वहां भेजा गया। बता दें कि सैनिकों की कमी और ईस्टर्न लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के साथ तनाव का असर जम्मू क्षेत्र में दिखाई दिया और वहां आतंकियों को फिर से पनपने का मौका मिला। आतंकियों ने सैनिकों की कमी का फायदा उठाते हुए खुद का खड़ा ही नहीं किया बल्कि अब जम्मू क्षेत्र में वे सिक्यॉरिटी फोर्स के लिए बड़ा सिरदर्द बन गए हैं। जिन जगहों पर सैनिकों की संख्या कम की गई वहां आतंकियों को फिर से पनपने का मौका मिल रहा है। वहां जिस तरह की भौगोलिक स्थितियां हैं वहां जो काम सैनिक कर सकते हैं वह काम तकनीक से नहीं हो सकता। क्या सैनिकों की संख्या कम करने के फैसले पर फिर से विचार किया जाना चाहिए?

भारत और रूस के संबंधों पर क्या बोल रहा है अमेरिका?

हाल ही में अमेरिका ने भारत और रूस के संबंधों पर एक बयान दिया है! अमेरिका के बाइडन प्रशासन ने कहा है कि रूस के साथ अपने संबंधों को लेकर चिंताओं के बावजूद भारत वाशिंगटन का रणनीतिक साझेदार बना रहेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 22वीं भारत-रूस शिखर वार्ता के लिए मॉस्को के दो दिवसीय दौरे पर गए थे। यूक्रेन में जारी युद्ध के बीच रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ उनकी बातचीत पर पश्चिमी देशों की करीबी नजर थी। मंगलवार को पुतिन से बातचीत में मोदी ने उनसे कहा कि यूक्रेन संघर्ष का समाधान युद्ध के मैदान पर संभव नहीं है और शांति के प्रयास बम और बंदूकों के बीच सफल नहीं होते हैं। अमेरिकी रक्षा विभाग के मुख्यालय पेंटागन और विदेश विभाग के प्रवक्ताओं ने रूस के साथ भारत के रिश्तों और मोदी के मॉस्को दौरे से जुड़े सवालों पर मंगलवार को अलग-अलग प्रतिक्रिया दी। पेंटागन के प्रेस सचिव मेजर जनरल पैट राइडर ने वाशिंगटन में संवाददाताओं से बातचीत में कहा, “भारत और रूस के बीच काफी लंबे समय से रिश्ते हैं। अमेरिका के नजरिये से, भारत एक रणनीतिक साझेदार है, जिसके साथ हम रूस से उसके रिश्तों सहित पूर्ण और स्पष्ट बातचीत करना जारी रख रहे हैं। चूंकि, यह इस हफ्ते होने वाले नाटो शिखर सम्मेलन से संबंधित है, इसलिए निश्चित रूप से, आपकी तरह ही दुनिया का ध्यान भी इस पर केंद्रित है।”

वहीं दूसरी ओर, अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर ने अपने दैनिक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि अमेरिका “रूस से भारत के रिश्तों को लेकर अपनी चिंताओं के बारे में” बिल्कुल स्पष्ट रहा है। उन्होंने कहा, “हमने अपनी चिंताओं को निजी तौर पर सीधे भारत सरकार के समक्ष जाहिर किया है और हम ऐसा करना जारी रख रहे हैं। इसमें बदलाव नहीं हुआ है।” व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव केरीन जीन-पियरे ने कहा कि भारत एक रणनीतिक साझेदार है जिसके साथ अमेरिका पूरी तरह और खुलकर संवाद करता है जिसमें रूस के साथ उनके संबंध शामिल हैं। उन्होंने मंगलवार को अपने दैनिक संवाददाता सम्मेलन में कहा, ”हमने पहले भी इस बारे में बात की है। इसलिए हमारा मानना है कि यह महत्वपूर्ण है कि जब यूक्रेन की बात हो तो भारत समेत सभी देश एक स्थायी और न्यायसंगत शांति को साकार करने के प्रयासों का समर्थन करें।”

पियरे ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा, ”हमारे सभी सहयोगियों के लिए इसका एहसास करना महत्वपूर्ण है। और इसलिए हम यह भी मानते हैं कि रूस के साथ भारत का दीर्घकालिक संबंध उसे राष्ट्रपति पुतिन से अपने क्रूरतापूर्ण युद्ध, यूक्रेन में एक अकारण युद्ध को समाप्त करने का आग्रह करने की क्षमता देता है। इसे खत्म करना राष्ट्रपति पुतिन की जिम्मेदारी है। राष्ट्रपति पुतिन ने युद्ध शुरू किया और राष्ट्रपति पुतिन युद्ध समाप्त कर सकते हैं।” भारत रूस के साथ अपनी ‘विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी’ का दृढ़ता से बचाव करता रहा है और उसने यूक्रेन संघर्ष के बावजूद संबंधों में गति बनाए रखी है। नई दिल्ली ने यूक्रेन पर 2022 में रूस के आक्रमण की अभी तक निंदा नहीं की है। भारत लगातार बातचीत और कूटनीति के माध्यम से संघर्ष के समाधान की वकालत करता आया है।

राइडर ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि अगर राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (मोदी की) इस यात्रा को कुछ ऐसे पेश करें, जिससे किसी तरह यह दिखाया जा सके कि वह बाकी दुनिया से अलग-थलग नहीं हैं, तो कोई भी आश्चर्यचकित होगा। सच तो यह है कि राष्ट्रपति पुतिन के युद्ध का विकल्प चुनने से रूस बाकी दुनिया से अलग-थलग हो गया है और उसे इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है।” उन्होंने कहा, “उन्हें आक्रामकता की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है और तथ्य इस बात की गवाही देते हैं। इसलिए, हम भारत को रणनीतिक साझेदार के तौर पर देखना जारी रखेंगे। हम उनके साथ ठोस बातचीत करना जारी रखेंगे।”

इस दौरान एक संवाददाता ने कहा कि पुतिन उतने अलग-थलग नहीं दिख रहे हैं, क्योंकि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रमुख अभी मॉस्को में हैं और उनसे गर्मजोशी से मिल रहे हैं। इस पर राइडर ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने हाल में यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की से भी मुलाकात की थी और उन्हें आश्वस्त किया था कि भारत यूक्रेन युद्ध के शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन करने के लिए वह सबकुछ करना जारी रखेगा, जो उसके बस में है।

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि हमें यकीन है कि भारत यूक्रेन में स्थायी और न्यायसंगत शांति कायम करने के प्रयासों का समर्थन करेगा और पुतिन को संयुक्त राष्ट्र चार्टर तथा संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता के सिद्धांतों का पालन करने के महत्व से अवगत कराएगा।” मिलर ने कहा कि अमेरिका “भारत से यूक्रेन की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता को बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों के आधार पर देश में स्थायी और न्यायसंगत शांति कायम करने के प्रयासों का समर्थन करने का लगातार आग्रह करता है। और यह मुद्दा ऐसा है, जिस पर हम भारत से बातचीत जारी रखेंगे।”

आखिर स्पेस में कैसे अपने दिन काट रही है सुनीता विलियम्स?

आज हम आपको बताएंगे कि सुनीता विलियम्स स्पेस में अपने दिन कैसे काट रही है! नासा के अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर स्पेस में फंसे हुए हैं। फिलहाल वह स्पेस में अपने अतिरिक्त समय का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में प्रयोग करने और इमरजेंसी ड्रिल करने में बिता रहे हैं। नासा की ओर से बताया गया है कि भारतीय मूल की सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर 5 जुलाई को बोइंग के स्टारलाइनर यान से स्पेस में पहुंचे थे। स्पेस में फंस जाने के बाद दोनों भारहीन वातावरण में पौधों को प्रभावी ढंग से पानी देने के तरीकों की खोज जारी रखे हुए हैं। दोनों अंतरिक्ष यात्रियों ने हार्मनी मॉड्यूल के जरिए परीक्षण किया कि विभिन्न आकारों के रूट मॉडल और पौधे माइक्रोग्रैविटी में पानी कैसे अवशोषित करेंगे। सुनीता और बुच का समय कैसे बीत रहा है, इसे नासा की ओर से दी गई अपडेट के जरिए समझा जा सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, नासा ने 16 जुलाई को कहा था कि बुच विल्मोर और सुनीता विलियम्स ने अपने दिन का अधिकांश समय सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण के भारहीन वातावरण में मिट्टी के बिना उगने वाले पौधों को पानी देने के तरीकों का परीक्षण करने में बिता रहे हैं। वे कक्षा में अतिरिक्त समय मिलने की शिकायत नहीं कर रहे हैं, और स्टेशन चालक दल की मदद करने का आनंद ले रहे हैं।नासा के मुताबिक विलियम्स ने सबसे पहले हार्मनी मॉड्यूल में प्लांट वाटर मैनेजमेंट हार्डवेयर स्थापित किया और फिर परिणामों की वीडियो रिकॉर्ड करते हुए कई विधियों का परीक्षण किया। विल्मोर ने अंतरिक्ष यान और अंतरिक्ष आवासों पर विभिन्न प्रकार के पौधों को प्रभावी ढंग से पोषण देने के तरीके सीखने के लिए हाइड्रोपोनिक्स और वायु परिसंचरण तकनीक के लिए भी परीक्षण किए।

नासा ने 15 जुलाई को साझा किए गए अपडेट में बताया गया था कि स्टारलाइनर पायलट सुनीता विलियम्स और कमांडर बुच विल्मोर ने अल्ट्रासाउंड 2 डिवाइस का उपयोग करके नसों के स्कैन में भाग लिया। दोनों ने बारी-बारी से एक-दूसरे की गर्दन, कंधे और पैर की नसों की इमेजिंग की। जमीन पर मौजूद डॉक्टरों ने वास्तविक समय में इस प्रक्रिया की निगरानी की। इसके बाद विल्मोर ने नासा के फ्लाइट इंजीनियर मैथ्यू डोमिनिक की नसों को स्कैन किया, जिससे शोधकर्ताओं को यह समझने में मदद मिली कि माइक्रोग्रैविटी मानव शरीर को कैसे प्रभावित करती है। इस बीच सुनीता विलियम्स ने अलग-अलग अध्ययनों पर काम किया। उनका प्रारंभिक शोध माइक्रोग्रैविटी में उच्च गुणवत्ता वाले ऑप्टिकल फाइबर के निर्माण पर केंद्रित था। विलियम्स ने अंतरिक्ष में उगाए गए पौधों को पानी देने और पोषण देने के दौरान गुरुत्वाकर्षण की कमी को दूर करने की जांच की।

विलमोर और विलियम्स ने फ्लुड सिस्टम सर्विस का उपयोग करने की प्रक्रियाओं की भी समीक्षा की है, जो अंतरिक्ष स्टेशन पर प्रणालियों पर तरल पदार्थ को निकालता और प्रसारित करता है। दोनों अंतरिक्ष यात्रियों ने सुबह के समय हृदय और श्वास सेंसर से जुड़े हुए व्यायाम साइकिल पर बारी-बारी से पैडल चलाया। इसने उनकी एरोबिक क्षमता को मापा।

अंतरिक्ष यात्री बुच विल्मोर और सुनी विलियम्स नासा के बोइंग क्रू फ्लाइट टेस्ट मिशन के चालक दल के सदस्य हैं। उन्हें कुछ सप्ताह पहले वापस आ जाना चाहिए था। उनकी परीक्षण उड़ान आठ दिनों तक चलनी चाहिए थी, ये समयसीमा 14 जून को समाप्त हो गई। हीलियम रिसाव और थ्रस्टर की विफलता ने अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर उनके आगमन को पटरी से उतार दिया। इससे दोनों को योजना से ज्यादा समय तक स्पेस में रहना पड़ रहा है।

नासा के वाणिज्यिक चालक दल कार्यक्रम निदेशक स्टीव स्टिच ने पिछले सप्ताह एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि सुनीता और उनके साथी जुलाई के अंत तक वापस आ सकते हैं। नासा का लक्ष्य उन्हें अगस्त के मध्य में स्पेसएक्स द्वारा नए चालक दल को भेजने से पहले वापस लाना है। भारहीन वातावरण में मिट्टी के बिना उगने वाले पौधों को पानी देने के तरीकों का परीक्षण करने में बिता रहे हैं। नासा के मुताबिक विलियम्स ने सबसे पहले हार्मनी मॉड्यूल में प्लांट वाटर मैनेजमेंट हार्डवेयर स्थापित किया और फिर परिणामों की वीडियो रिकॉर्ड करते हुए कई विधियों का परीक्षण किया।दोनों अंतरिक्ष यात्रियों ने कहा कि वे पृथ्वी पर थ्रस्टर परीक्षण पूरा होने के बाद वापस लौटने की उम्मीद करते हैं। उन्होंने कहा कि वे कक्षा में अतिरिक्त समय मिलने की शिकायत नहीं कर रहे हैं, और स्टेशन चालक दल की मदद करने का आनंद ले रहे हैं।

क्या जर्मनी के सहारे रूस को दबाना चाहता है अमेरिका?

अमेरिका अब जर्मनी के सहारे रूस को दबाना चाहता है! रूस ने जर्मनी में अमेरिका की लंबी दूरी के पारंपरिक हथियारों की तैनाती की योजना पर जबरदस्त नाराजगी जताई है। रूसी उप विदेश मंत्री सर्गेई रयाबकोव ने अमेरिका की इस योजना के जवाब में परमाणु मिसाइलों की नई तैनाती से इनकार नहीं किया है। इंटरफैक्स समाचार एजेंसी ने रयाबकोव के हवाले से कहा कि रूस के कलिनिनग्राद क्षेत्र की रक्षा एक विशेष फोकस है। कलिनिनग्राद नाटो सदस्यों पोलैंड और लिथुआनिया के बीच में है। यहां रूसी नौसेना के उत्तरी बेड़े का मुख्यालय भी है। एजेंसी ने कहा कि उन्होंने मॉस्को में संवाददाताओं से कहा कि “मैं किसी भी विकल्प से इनकार नहीं कर रहा हूं।” अमेरिका ने पिछले सप्ताह कहा था कि वह नाटो और यूरोपीय रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करने के लिए 2026 से जर्मनी में हथियारों की तैनाती शुरू करेगा जिसमें एसएम-6, टॉमहॉक और नई हाइपरसोनिक मिसाइलें शामिल होंगी। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पिछले महीने कहा था कि मॉस्को छोटी और मध्यम दूरी की भूमि-आधारित मिसाइलों का उत्पादन फिर से शुरू करेगा और जरूरत पड़ने पर उन्हें कहां तैनात करना है, यह तय करेगा।सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि नियोजित तैनाती हथियारों की दौड़ का हिस्सा है जो यूक्रेन में युद्ध को लेकर तीव्र तनाव के समय पहले से ही जटिल खतरों की श्रृंखला को और बढ़ा देती है।जहां से वे अलास्का या यहां तक कि कैलिफोर्निया को भी निशाना बना सकते हैं। रूस की अधिकांश मिसाइल प्रणालियां पारंपरिक या परमाणु वारहेड से सुसज्जित होने में सक्षम हैं।

इंटरफैक्स ने रयाबकोव के हवाले से कहा कि रूस अमेरिका के कदम का सबसे प्रभावी जवाब देने के लिए विकल्पों की सबसे व्यापक संभव श्रृंखला में से चुनेगा, जिसमें लागत के मामले में भी शामिल है। उन्होंने कहा कि रूस का सबसे पश्चिमी भाग कलिनिनग्राद, जो इसके बाकी भूभाग से कटा हुआ है, ” उस पर लंबे समय से हमारे विरोधियों की गंदी नजर बनी हुई है।” रयाबकोव ने कहा, “आक्रामक योजनाओं को बढ़ावा देने वाले और हमें कुछ ऐसे कदम उठाने के लिए उकसाने की कोशिश करने वालों को पीछे धकेलने के लिए हर संभव प्रयास करने के हमारे 100% दृढ़ संकल्प के मामले में कलिनिनग्राद कोई अपवाद नहीं है, जो किसी के लिए भी अवांछनीय हैं और आगे की जटिलताओं से भरे हुए हैं।”

रूस और अमेरिका जिन मिसाइलों को तैनात करने पर विचार कर रहे हैं, वे मध्यम दूरी के जमीनी हथियार हैं, जिन्हें 1987 की यू.एस.-सोवियत संधि के तहत प्रतिबंधित किया गया था। यू.एस. ने 2019 में रूस पर उल्लंघन का आरोप लगाते हुए संधि से बाहर निकल गया, जिसका मास्को ने खंडन किया। सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि नियोजित तैनाती हथियारों की दौड़ का हिस्सा है जो यूक्रेन में युद्ध को लेकर तीव्र तनाव के समय पहले से ही जटिल खतरों की श्रृंखला को और बढ़ा देती है।

कलिनिनग्राद में रूसी परमाणु मिसाइलों की तैनाती नाटो देशों के साथ इसकी सीधी निकटता के कारण पश्चिम को एक शक्तिशाली संकेत भेजेगी। लेकिन संयुक्त राष्ट्र निरस्त्रीकरण अनुसंधान संस्थान के एक हथियार नियंत्रण विशेषज्ञ एंड्री बकलिट्स्की ने कहा कि कलिनिनग्राद में रूसी मिसाइल लांचर संभवतः नाटो खुफिया और निगरानी के लिए “हर सेकंड” दिखाई देंगे, इसलिए ऐसी तैनाती “दिखावा” के बराबर होगी। बता दें कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पिछले महीने कहा था कि मॉस्को छोटी और मध्यम दूरी की भूमि-आधारित मिसाइलों का उत्पादन फिर से शुरू करेगा और जरूरत पड़ने पर उन्हें कहां तैनात करना है, यह तय करेगा।

रूस की अधिकांश मिसाइल प्रणालियां पारंपरिक या परमाणु वारहेड से सुसज्जित होने में सक्षम हैं। इस सप्ताह की शुरुआत में एक टेलीफोन साक्षात्कार में, इंटरफैक्स ने रयाबकोव के हवाले से कहा कि रूस अमेरिका के कदम का सबसे प्रभावी जवाब देने के लिए विकल्पों की सबसे व्यापक संभव श्रृंखला में से चुनेगा, जिसमें लागत के मामले में भी शामिल है। बता दें कि रूस और अमेरिका जिन मिसाइलों को तैनात करने पर विचार कर रहे हैं, वे मध्यम दूरी के जमीनी हथियार हैं, जिन्हें 1987 की यू.एस.-सोवियत संधि के तहत प्रतिबंधित किया गया था। यू.एस. ने 2019 में रूस पर उल्लंघन का आरोप लगाते हुए संधि से बाहर निकल गया, जिसका मास्को ने खंडन किया। उन्होंने कहा कि रूस अपने मॉस्को या लेनिनग्राद क्षेत्रों में या सुदूर पूर्व में चुकोटका में भी मिसाइलों को तैनात कर सकता है, जहां से वे अलास्का या यहां तक कि कैलिफोर्निया को भी निशाना बना सकते हैं।