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क्या फिल्मों में काम करने के लिए फिल्मी सितारे करते हैं उल्टी सीधी मांगे?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या फिल्मों में काम करने के लिए फिल्मी सितारे उल्टी सीधी मांगे करते हैं या नहीं! जाने-माने फिल्म निर्माता और फिल्म निर्देशक करण जौहर ने पिछले दिनों एक इंटरव्यू में बतौर प्रोड्यूसर अपना दर्द शेयर किया। उन्होंने कहा कि हिंदी सिनेमा में ढंग के ऐक्टर कम ही हैं, लेकिन वे भी सूरज, चांद और धरती की मांग करते हैं। हालत यह हो गई है कि जिन ऐक्टर्स की फिल्में 3.5 करोड़ की ओपनिंग नहीं ले पाती हैं, वे 35 करोड़ रुपए फीस मांग रहे हैं। बकौल करण आप उन्हें फिल्म साइन करने के लिए पैसा देते हैं। फिर फिल्म करने के लिए पैसा देते हैं। इसके अलावा दूसरे खर्चे भी आते हैं, लेकिन इस सबके बाद आपकी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कमाई नहीं कर पाती। बेशक करण का कहना काफी हद तक जायज है, क्योंकि बीते काफी अरसे से बेहद बुरे दौर से गुजर रहे बॉक्स ऑफिस पर फिल्में एक के बाद एक फ्लॉप हो रही हैं। इनमें बड़े स्टार और बड़े बजट की फिल्में भी शामिल हैं। खासकर कोरोना के बाद बॉक्स ऑफिस पर फिल्मों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो चुनिंदा फिल्मों को छोड़कर ज्यादातर फिल्में कुछ खास नहीं कर पाई हैं। बावजूद इसके चुनिंदा सितारों को छोड़कर ज्यादातर ऐक्टर्स की फीस में कोई कमी नहीं आई है। इंडस्ट्री के जानकारों की मानें तो तमाम सितारों ने अपनी फीस कम करने की बजाय कम फिल्मों में काम करने का ऑप्शन चुना है। यानी कि वे उन्हीं फिल्मों में काम करेंगे, जिसके लिए उन्हें मनमर्जी फीस मिलेगी। हालांकि बात सिर्फ फीस तक ही नहीं ठहरती। फीस के अलावा भी कलाकारों के दूसरे नखरे उठाने में प्रोड्यूसर की हालत खराब हो जाती है। पिछले दिनों एक और नामी फिल्म डायरेक्टर ने भी बड़े सितारों की ओर से फिल्म की शूटिंग के दौरान की जाने वाली उल्टी-सीधी मांगों पर नाराजगी जताई थी। खासकर उन्होंने बड़े सितारों द्वारा कई वैनिटी वैन की डिमांड किए जाने पर सवाल उठाया था।

वहीं करण ने फिल्मी दुनिया के एक और खतरनाक ट्रेंड पर चिंता जताई। करण ने कहा था ति बीते कुछ अरसे से देखने में आ रहा है कि अगर कोई एक्शन फिल्म हिट हुई तो हर कोई बस एक्शन फिल्म ही बनाना चाहता है। लेकिन इसी बीच अगर रोमांटिक फिल्म हिट हो गई, तो फिर हमें समझ नहीं आता कि हम क्या करें। बेशक इस मामले में भी करण काफी हद तक सही कह रहे हैं, क्योंकि मौजूदा दौर में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री वाले अच्छी स्क्रिप्ट की कमी शिद्दत से महसूस कर रहे हैं। बीते दिनों धड़ाधड़ फ्लॉप हुई फिल्मों की वजह भी उनकी कमजोर स्क्रिप्ट ही बताई गई थी।

हालांकि फिल्मवालों ने इससे कोई सबक नहीं लिया। स्क्रिप्ट में सुधार करने की बजाय वे हिट जॉनर की फिल्मों के सब्जेक्ट पर फिल्में प्लान कर रहे हैं। जबकि हकीकत यह है कि आज अगर किसी जॉनर की फिल्म हिट हुई है और आप उसी जॉनर पर फिल्म बनाना चाहते हैं, तो स्क्रिप्ट, प्री प्रॉडक्शन, शूटिंग से लेकर पोस्ट प्रॉडक्शन में कम से कम डेढ़- दो साल का वक्त लग जाएगा। यानी कि आप उस फिल्म को करीब दो साल बाद रिलीज कर पाएंगे। हो सकता है कि तब तक कोई और जॉनर हिट हो जाए। यही नहीं फिल्मों की रिलीज डेट को आगे बढ़ाए जाने से होने वाले नुकसान के बारे में बात करने पर प्रोड्यूसर व फिल्म बिजनेस एनालिस्ट गिरीश जौहर कहते हैं, ‘किसी फिल्म की रिलीज डेट आगे बढ़ने से उसकी लागत में बढ़ोत्तरी होती है। साथ ही दूसरी फिल्मों को भी उसके चलते नुकसान उठाना पड़ता है। हालांकि करण ने अपनी बात दुनिया के सामने रख तो दी है, लेकिन फिर कई बार उनका प्रॉडक्शन उस तारीख तक पूरा नहीं हो पाता, तो फिल्म की रिलीज डेट आगे पीछे करनी पड़ती है, जिसके चलते सबको नुकसान होता है।’ उन्होंने आगे कहा, ‘वैसे भी आजकल फिल्मों में वीएफएक्स का काफी इस्तेमाल होने लगा है। लेकिन अगर आप दो तीन महीने पुराने वीएफएक्स को अपडेट नहीं करेंगे, तो वह पुराना लगने लगता है।बेशक इस मामले में भी करण काफी हद तक सही कह रहे हैं, क्योंकि मौजूदा दौर में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री वाले अच्छी स्क्रिप्ट की कमी शिद्दत से महसूस कर रहे हैं। बीते दिनों धड़ाधड़ फ्लॉप हुई फिल्मों की वजह भी उनकी कमजोर स्क्रिप्ट ही बताई गई थी।लेकिन देखना यह दिलचस्प होगा कि यह कहां तलक जाएगी।

आखिर वर्तमान में फिल्मों की तारीख के क्यों बढ़ रही है आगे?

वर्तमान में फिल्मों की रिलीज की तारीख आगे बढ़ती जा रही है! फिल्मी दुनिया में चर्चा गर्म है कि बीते दिनों 15 अगस्त की रिलीज डेट से दिसंबर के लिए पोस्टपोन हुई सुपरस्टार अल्लू अर्जुन की फिल्म ‘पुष्पा 2’ अब इस साल रिलीज नहीं हो पाएगी। पहले जहां फिल्म का वीएफएक्स कार्य पूरा नहीं होना इसकी वजह बताई गई थी, वहीं अब कई दूसरे कारणों की चर्चा है। इससे पहले प्रभास की ‘कल्कि 2898 एडी’ और कमल हासन की ‘इंडियन 2’ समेत साउथ सिनेमा की बड़ी फिल्में भी पोस्टपोन हो चुकी हैं। वहीं जूनियर एनटीआर की ‘देवरा’ और चियान विक्रम की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘थंगलान’ की रिलीज को भी कई बार आगे बढ़ाया जा चुका है। बात अगर बॉलीवुड की करें, तो साल 2023 में सुपरस्टार शाहरुख खान की फिल्म ‘जवान’ को आखिरी मौके पर जून से सितंबर के लिए पोस्टपोन किया गया था। बेशक इस तरह आखिरी मौके पर बड़ी फिल्मों के पोस्टपोन होने के चलते न सिर्फ उन फिल्मों दूसरी फिल्मों का भी गेम बिगड़ जाता है। फिल्मी दुनिया के जानकार बताते हैं कि किसी भी बड़ी फिल्म की रिलीज से एक हफ्ता पहले और दो हफ्ता बाद तक कोई दूसरी बड़ी फिल्म रिलीज नहीं होती है। ऐसे में, अगर फिल्म की रिलीज डेट आखिरी मौके पर पोस्टपोन होती है, तो उससे न सिर्फ उसकी मौजूदा रिलीज डेट पर तीन हफ्ते की रिलीज विंडो खाली हो जाती है, बल्कि वह पोस्टपोन होकर जहां पहुंचती है, वहां पर भी दूसरी फिल्मों की रिलीज डेट आगे पीछे करनी पड़ती है।

मसलन ‘पुष्पा 2’ के आने से पहले ‘सिंघम अगेन’ की रिलीज डेट आगे बढ़ी थी। लेकिन अब 15 अगस्त को ‘पुष्पा 2’ की जगह कई फिल्में रिलीज हो रही हैं। वहीं ‘पुष्पा 2’ दिसंबर में ‘छावा’ की रिलीज डेट पर पहुंच गई है। अगर यह तय समय पर रिलीज हुई, तो ‘छावा’ की रिलीज डेट भी बदल सकती है। इसी तरह बीते साल ‘जवान’ की रिलीज डेट आगे बढ़ने के चलते सिनेमावालों को जून में नुकसान उठाना पड़ा था। वहीं सितंबर में उसके आने के कारण ‘फुकरे’ की रिलीज डेट को आगे बढ़ाना पड़ा। बेशक फिल्मों की रिलीज डेट आगे बढ़ने से खुद उन फिल्मों पर भी अच्छा असर नहीं पड़ता। फिल्मी दुनिया के जानकार कहते हैं कि बार-बार फिल्मों की रिलीज डेट बदलने से फैंस के बीच कंफ्यूजन हो जाता है। दरअसल, फिल्म की पुरानी रिलीज डेट वाले पोस्टर भी इंटरनेट पर मौजूद रहते हैं। कई बार फैन उन्हें सही समझ लेते हैं।

फिल्मों की रिलीज डेट को आगे बढ़ाए जाने से होने वाले नुकसान के बारे में बात करने पर प्रोड्यूसर व फिल्म बिजनेस एनालिस्ट गिरीश जौहर कहते हैं, ‘किसी फिल्म की रिलीज डेट आगे बढ़ने से उसकी लागत में बढ़ोत्तरी होती है। साथ ही दूसरी फिल्मों को भी उसके चलते नुकसान उठाना पड़ता है। दरअसल, किसी भी बड़ी फिल्म को एक रिलीज डेट चाहिए होती है, जिस पर उनको बड़ी रिलीज विंडो मिल जाए। साल में गिनी चुनी बड़ी रिलीज डेट होने के चलते बड़े निर्माता काफी पहले ही उन डेट्स को अपनी फिल्मों के लिए बुक कर लेते हैं। लेकिन फिर कई बार उनका प्रॉडक्शन उस तारीख तक पूरा नहीं हो पाता, तो फिल्म की रिलीज डेट आगे पीछे करनी पड़ती है, जिसके चलते सबको नुकसान होता है।’ उन्होंने आगे कहा, ‘वैसे भी आजकल फिल्मों में वीएफएक्स का काफी इस्तेमाल होने लगा है। लेकिन अगर आप दो तीन महीने पुराने वीएफएक्स को अपडेट नहीं करेंगे, तो वह पुराना लगने लगता है। दरअसल, आजकल लोग ओटीटी पर दुनियाभर का कॉन्टेंट देखने लगे हैं। ऐसे में, डायरेक्टर के सामने इस बात की चुनौती रहती कि वह लोगों के सामने लेटेस्ट वीएफएक्स को पेश करे।’

वहीं ट्रेड एनालिस्ट कोमल नाहटा ने बताया, ‘ज्यादातर बड़ी फिल्में वीएफएक्स का काम पूरा नहीं होने के चलते ही पोस्टपोन होती हैं। बेशक वीएफएक्स के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।ऐसे में, अगर फिल्म की रिलीज डेट आखिरी मौके पर पोस्टपोन होती है, तो उससे न सिर्फ उसकी मौजूदा रिलीज डेट पर तीन हफ्ते की रिलीज विंडो खाली हो जाती है, बल्कि वह पोस्टपोन होकर जहां पहुंचती है, वहां पर भी दूसरी फिल्मों की रिलीज डेट आगे पीछे करनी पड़ती है। इसके दो दिन के काम में दो महीने भी लग सकते हैं। जबकि निर्माता अपनी फिल्म की रिलीज डेट काफी पहले फिक्स कर देता है। इसलिए वीएफएक्स का काम पूरा नहीं होने के चलते फिल्म पोस्टपोन होने में किसी की गलती नहीं है। हालांकि इससे दूसरी फिल्मों का रिलीज शेड्यूल जरूर बिगड़ जाता है।’

क्रिकेटर हार्दिक पांड्या के साथ अब तक क्या हुआ ?

आज हम आपको बताएंगे कि क्रिकेटर हार्दिक पांड्या के साथ अब तक उनकी जिंदगी में क्या हुआ है! एक अमीर लड़के के साथ मिलकर बच्चा पैदा करो, उससे शादी करो और फिर तलाक दे दो। बिना किसी लागत का जबर्दस्त स्टार्टअप आइडिया है…’, ‘वह अपने बेटे और 13 मिलियन डॉलर के साथ इंडिया छोड़कर चली गई, ताकि अपने घर सर्बिया में बिना कुछ किए ऐश की जिंदगी जी सके।’ हाल ही में क्रिकेटर हार्दिक पांड्या से अलग हुईं उनकी पूर्व पत्नी सर्बियन मॉडल नताशा स्‍टेनकोविक के लिए सोशल मीडिया पर ऐसे कॉमेंट्स की झड़ी लगी हुई है। खासकर जब से यह चर्चा शुरू हुई है कि नताशा अब हार्दिक की 70 फीसदी संपत्ति की हकदार होंगी, तब से कोई उन्हें गोल्ड डिगर करार दे रहा है, तो किसी के मुताबिक, वह हार्दिक के लायक ही नहीं थीं। सोचिए, ऐसे मौके पर, जबकि नताशा अपना घर टूटने के दर्द से जूझ रही हैं, यह ट्रोलिंग उनके लिए कितनी मुश्किल होगी, लेकिन यह कोई नई बात नहीं है। भारतीय समाज में अब भी टैबू माने जाने वाले तलाक के मामले में अक्सर औरतों पर ही उंगली उठती है। उन्हें कानून से मिले गुजारा भत्ते और एलिमनी के हक के लिए भी खूब शर्मिंदा किया जाता है। एलिमनी को लेकर नताशा की ट्रोलिंग देखकर 11 साल पहले हुए रितिक-सुजैन के तलाक का मामला ताजा हो जाता है। तब इसी तरह, सुजैन को रितिक से 380 करोड़ की भारी-भरकम एलिमनी मिलने की अफवाह तेज थी। तब भी लोगों ने सुजैन को खूब कटघरे में खड़ा किया था। जबकि, खुद रितिक ने इस खबर को गलत बताते हुए नाराजगी जताई थी। उन्होंने खुद ट्वीट किया कि सब मनगढ़ंत खबरें हैं, इससे उनके करीबियों को नीचा दिखाया जा रहा है और उनके सब्र का इम्तिहान लिया जा रहा है। बावजूद इसके, आज भी उनके तलाक को सबसे महंगा बताने वाली तमाम रिपोर्ट्स आती रहती हैं। इसके अलावा, करिश्मा कपूर को उनके पति संजय कपूर, सैफ अली खान से अमृता सिंह और आमिर खान से उनकी पहली पत्नी रीना दत्ता को मिली एलिमनी को लेकर भी ऐसी चर्चाएं चटखारे लेकर सुनाई जाती हैं।

सिर्फ सिलेब्रिटीज ही नहीं, बल्कि आम परिवारों में भी गुजारा भत्ता या एलिमनी की मांग करने वाली औरतों को काफी बुरा-भला कहा जाता है। जबकि, असल में यह उनका कानूनी अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट की सीनियर एडवोकेट रेखा अग्रवाल बताती हैं कि आम तलाक के केसेज में भी मेंटेनेंस और एलिमनी की बात आने पर ऐसी ही बातें कही जाती हैं कि इतने पैसे लूट ले गई। शादी ही इसलिए की थी, उनको कंगाल करके चली गई। जबकि, ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह उसका कानूनी हक है। हिंदू मैरिज ऐक्ट और स्पेशल मैरिज ऐक्ट, दोनों में कानून ने अलगाव के मामले में गुजारा भत्ता यानी मेंटेनेंस और तलाक के बाद एलिमनी का अधिकार दिया हुआ है, पर ऐसा नहीं है कि लड़की जो मांगेंगी उसे मिल जाएगा। उसके लिए लड़के-लड़की दोनों को अपनी चल-अचल संपत्ति और आमदनी बतानी पड़ती है। कोर्ट लड़के की संपत्ति, आदमनी, उस पर कौन-कौन आश्रित है, अगर बच्चा है तो वह किसके साथ रह रहा है, इन सब मापदंडों के आधार पर गुजारा भत्ता और एलिमनी तय करता है। ऐसा नहीं है कि तलाक के बाद बीवी अपने आप 50 पर्सेंट लेकर चली जाएगी। यहां एक अहम बात यह भी है कि तलाक भी दो तरह के होते हैं। पहला म्यूचुअल होता है, जिसमें दोनों पक्ष सहमति से सब चीजें तय करते हैं। वहीं, दूसरा कोर्ट में लड़ा जाता है। जो केस लड़ा जाता है, उसमें कोर्ट दोनों पार्टियों के दावे सुनकर, उनकी चल-अचल संपत्ति के आधार पर भत्ता या एलिमनी तय करती है। जबकि, म्यूचुअल में कोर्ट की कोई भूमिका ही नहीं होती। उसमें तो लड़की चाहे तो 1 रुपये भत्ता ना ले या लड़का चाहे तो अपना सब उसके नाम कर दे।

आम लोगों के एलिमनी के केसेज के बारे में रेखा अग्रवाल कहती हैं, ‘कानून में ये अधिकार बहुत सोच-समझकर, जांच-परखकर बनाए गए हैं। इनमें कई अलग-अलग प्रावधान है। जैसे, इन सिलेब्रिटीज के भत्ते या एलिमनी इसलिए ज्यादा होती हैं, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, लड़की अपने पति के घर में जिस तरह की जिंदगी जी रही थी, तलाक के बाद भी उसे वैसे ही जीने का हक है। वहीं, अगर वह खुद कमाती है, सेटल्ड है, तो उसकी एलिमनी कम हो जाती है। वैसे, सिलेब्स से इतर आम मामलों में ज्यादातर औरतों की भत्ता पाने में एड़ियां घिस जाती हैं। कोर्ट केस सालों तक चलते हैं। फिर थक-हारकर औरतें जितनी एलिमनी मांगती हैं, उसके आधे में समझौता कर लेती हैं। उस पर आम तौर पर अगर कपल की बेटी है, तो पिता उसे लेने को तैयार नहीं होते। ज्यादातर मामलों में मां ही उसकी कस्टडी लेती है। बच्चा पांच साल से छोटा है, तब भी उसकी कस्टडी मां को मिलती है। सोचिए, अगर ऐसे में उस महिला को भत्ता या एलिमनी भी ना मिले तो उसकी आगे की जिंदगी कितनी जटिल हो जाएगी।’

नताशा को एलिमनी के रूप में हार्दिक की 70 पर्सेंट संपत्ति दिए जाने की खबरों के बीच हार्दिक का एक पुराना विडियो भी खूब वायरल हो रहा है, जिसमें वह बता रहे हैं कि उन्होंने अपनी सारी संपत्ति अपने मां के नाम की हुई है, ताकि भविष्य में उन्हें अपनी पत्नी (तलाक होने पर) को 50 पर्सेंट हिस्सा ना देना पड़े। लेकिन रेखा कहती हैं, हमारे यहां कानून में कहीं ऐसा नहीं लिखा कि लड़की 50 फीसदी संपत्ति ले जाएगी। ऐसा अमेरिका में होता है कि तलाक के केस में पति और पत्नी दोनों की संपत्ति ऑटोमैटिकली आधी-आधी बंट जाती है। रिपोर्ट्स की मानें, तो यूएस में यह ट्रेंड भी देखने को मिला है कि वहां औरतें तलाक से मिली एलिमनी की बदौलत कम सैलरी के बावजूद मर्दों से ज्यादा अमीर हैं।

आखिर दिल्ली की राजनीति से क्यों नाराज है ममता बनर्जी?

वर्तमान में ममता बनर्जी दिल्ली की राजनीति से बेहद नाराज नजर आ रही है! हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव और बंगाल में हुए विधानसभा उपचुनावों में तृणमूल कांग्रेस को भारी जीत मिली है। यह एक औपचारिक कहानी है, लेकिन इसके पीछे बंगाली भावना का छिपा हाथ है जो केंद्र में शासन करने वाली पार्टी को सहज रूप से खारिज कर देती है। 1967 के बाद से, 1972 और 1977 के बीच थोड़े समय के लिए (तब भी कांग्रेस को शासन करने के लिए CPI की जरूरत थी), बंगाल ने केंद्र में बैठी पार्टी को नकार दिया है। यह एक तरह की वह स्थिति है जहां एक ही घटना के बारे में वहां मौजूद दो लोग अलग-अलग राय रखते हैं। दिल्ली से चाहे कोई भी शासन करे, बंगाल में विपक्ष का दृढ़ निश्चय रहेगा। पहले, जब भारत में हर जगह कांग्रेस लोकप्रिय विकल्प थी, तब बंगाल ने CPM को चुना। इसी तरह, आज, भाजपा विंध्य के उत्तर में शानदार प्रदर्शन कर रही है, लेकिन बंगाल में अंतिम पायदान से पहले ही पिछड़ जाती है। ऐसा लगता है कि बंगाल जीतने के लिए केंद्र की पार्टी को दिल्ली को छोड़ना होगा। यह वास्तव में एक पहेली है।

तमिलनाडु के विपरीत, बंगाल में कभी भी अलगाववादी क्षण नहीं आया। इसके अलावा, कुछ तमिल लोगों के विपरीत, रावण यहां अभी भी एक राक्षस राजा है। बंगाल में हिंदू प्रार्थनाएं भी हर जगह की तरह ही होती हैं। लेकिन कुछ महत्वपूर्ण अंतर भी हैं। बंगाल देश के बड़े हिस्से से अलग है क्योंकि यहां कोई मध्ययुगीन नायक नहीं है। कोई राजेंद्र चोल नहीं, कोई महाराणा प्रताप नहीं, कोई छत्रपति शिवाजी नहीं, कोई महाराजा रणजीत सिंह नहीं। पूरे बंगाल में मध्ययुगीन योद्धा राजा की तलवार चलाने वाली कोई मूर्ति नहीं है।

इसके बजाय, समकालीन बंगाली वीर प्रतिमा की शुरुआत राजा राम मोहन राय द्वारा पुस्तक पकड़े जाने से होती है। फिर स्वामी विवेकानंद हैं जिन्हें शिकागो में विश्व धर्म संसद में उनके उत्साहवर्धक भाषण और हिंदू धर्म में आध्यात्मिकता को पुनर्जीवित करने के लिए याद किया जाता है। फिर, टैगोर हैं। मध्ययुगीन अतीत से मुक्त, बंगाल उन वर्गों और स्तरों को अधिक स्वीकार करता है जो पूर्व-आधुनिक भावनाओं से मुक्त हैं। विवेकानंद ने जाति पर हमला किया, वेदांत का प्रचार किया, भगवा पहना, लेकिन टैगोर की तरह ही, अन्य धर्मों के बारे में भी उत्साहपूर्वक बात की। फिर, बंगाली भाषा, अपनी बहुप्रशंसित स्थिति के बावजूद, तमिल या संस्कृतनिष्ठ हिंदी की तरह कोई प्राचीन परंपरा नहीं रखती है। समकालीन बंगाली में, लगभग 200 साल की ऐतिहासिक गहराई है। यह सांस्कृतिक नवीनता एक वरदान है, क्योंकि बंगाल की राजनीति के पास अब मध्ययुगीन होने का कोई कारण नहीं है। एक और असामान्य विशेषता यह है कि बंगाल में कभी भी ब्राह्मण विरोधी जाति आंदोलन नहीं हुआ। ऐसा शायद इसलिए है क्योंकि बंगाल में सिर्फ ब्राह्मणों के बजाय तीन उच्च जातियां हैं, ब्राह्मण, कायस्थ और बैद्य (पारंपरिक आयुर्वेद)। इससे किसी एक को निशाना बनाना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि एक के बजाय आप तीन को देख सकते हैं।

न ही ये तीनों उच्च जातियां अनुष्ठानिक कारणों से शीर्ष पर हैं। उनका उत्थान इसलिए है क्योंकि वे सांख्यिकीय रूप से ‘भद्रलोक’ या सभ्य लोगों की श्रेणी का प्रतिनिधित्व करते हैं। फिर भी, जाति किसी को भी ‘भद्रलोक’ होने से नहीं रोकती है, जब तक कि वह व्यक्ति सुसंस्कृत हो और टैगोर का पाठ कर सकता हो। बंगाल की आज की राजनीतिक विरोधाभासी स्थिति का मूल कारण गांधी और नेहरू द्वारा सुभाष बोस को दरकिनार करना है, लेकिन यह सब कुछ नहीं है। इसके साथ ही, कुछ अजीबोगरीब परिस्थितियां हैं, जो ‘भद्रलोक’ बौद्धिक अहंकार से संबंधित नहीं हैं। इसने कम्युनिस्टों को इस राज्य में धीरे-धीरे गति प्राप्त करने की अनुमति दी। विभाजन के दौरान, पाकिस्तान से आने वाली ट्रेनों की तरह, चटगांव मेल हिंदू शवों को भारत लेकर आई। बचे हुए शरणार्थियों में से लगभग 70% को भीड़भाड़ वाले कोलकाता में ठूंस दिया गया। पंजाबी शरणार्थियों का प्रदर्शन बेहतर रहा। उत्तर में, खाली सरकारी जमीन आसानी से उपलब्ध थी। साथ ही भाग रहे मुसलमानों ने भी 45 लाख एकड़ जमीन खाली कर दी थी।

पंजाब के विपरीत, बंगाली शरणार्थी 1947 के बाद भी लगातार आते रहे। ढाका, सिलहट, नोआखली और बारिसल में 1950 के दंगों ने शरणार्थियों के एक नए समूह को प्रेरित किया। 1981 तक शरणार्थियों की संख्या बढ़कर लगभग 80 लाख हो गई। ये पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थियों की कुल संख्या के करीब थी, लेकिन फिर भी यह दिल्ली को उत्साहित नहीं कर सका। वास्तव में, नेहरू ने पहले मुख्यमंत्री बीसी रॉय को बंगाली-हिंदू शरणार्थियों को पूर्वी पाकिस्तान वापस भेजने के लिए कहा था। इसने हर पार्टी में बंगाली-हिंदुओं को झकझोर दिया। वामपंथियों ने इस दिल्ली विरोधी आक्रोश को सबसे जोरदार तरीके से व्यक्त किया। भले ही इस रुख का मार्क्सवाद से कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन इसने वामपंथियों को बाकी लोगों से ऊपर उठाने में मदद की।

1959 में जब बंगाल में अनाज की कमी हुई, तो ज्योति बसु के नेतृत्व में कम्युनिस्टों ने मूल्य वृद्धि और अकाल प्रतिरोध समिति की स्थापना की। एक बार फिर, इस संकट के दौरान बंगाल को लगा कि दिल्ली ने उसे छोड़ दिया है। लेकिन अब तक कम्युनिस्टों को पर्याप्त नेट अभ्यास मिल चुका था क्योंकि उन्होंने 1943 के बंगाल अकाल में भी राहत कार्य किया था। तृणमूल को बंगाल में उसके दिल्ली विरोधी रवैये के कारण जल्दी ही स्वीकार कर लिया गया। जब 2014 में भाजपा जीती, तो उसे कुछ बंगाली समर्थन मिला क्योंकि वह दिल्ली में कदम रखने वाली नई पार्टी थी। लेकिन जब बीजेपी दिल्ली की सत्ता में आई, तो बंगाल पीछे हट गया। तर्कहीन? अनुचित? हो सकता है, लेकिन कौन फैसला कर रहा है? याद रखें, बंगाल सल्तनत 1342 में दिल्ली से अलग होने वाली सभी सल्तनतों में से पहली थी।

क्या ममता बनर्जी का माइक बंद किया गया था?

हाल ही में ममता बनर्जी ने कहा कि उनका माइक आयोग नीति की मीटिंग में बंद किया गया था! पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शनिवार को दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में आयोजित नीति आयोग की बैठक छोड़कर बाहर निकल आईं। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष की एकमात्र प्रतिनिधि होने के बावजूद उन्हें भाषण के दौरान बीच में ही रोक दिया गया। ममता बनर्जी की तरफ से उनका माइक बंद किए जाने का आरोप भी लगाया गया। हालांकि, सरकारी सूत्रों ने उनके आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि ममता को बोलने के लिए दिया गया समय समाप्त हो गया था। ममता ने कहा कि पांच मिनट के बाद उनका माइक्रोफोन बंद कर दिया गया, जबकि अन्य मुख्यमंत्रियों को अधिक देर तक बोलने की अनुमति दी गई। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने कहा कि यह अपमानजनक है। मैं आगे से किसी भी बैठक में हिस्सा नहीं लूंगी। बैठक से बाहर आने के बाद उन्होंने कहा कि मैं बैठक का बहिष्कार करके बाहर आई हूं। (आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री) चंद्रबाबू नायडू को बोलने के लिए 20 मिनट दिए गए। असम, गोवा, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों ने 10 से 12 मिनट तक अपनी बात रखी। मुझे पांच मिनट बाद ही बोलने से रोक दिया गया। यह अनुचित है।

सरकारी सूत्रों ने कहा कि यह कहना गलत है कि ममता का माइक्रोफोन बंद कर दिया गया था। उन्होंने कहा कि घड़ी के अनुसार, उनके बोलने का समय समाप्त हो गया था। सूत्रों ने बताया कि वर्णानुक्रम के अनुसार, ममता की बोलने की बारी दोपहर के भोजन के बाद आती, लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार के आधिकारिक अनुरोध पर उन्हें सातवें वक्ता के रूप में बोलने की अनुमति दी गई, क्योंकि उन्हें जल्दी कोलकाता लौटना था। पीआईबी की फैक्ट चेक यूनिट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर ममता बनर्जी के बयान को शेयर करते हुए कहा, “यह दावा किया जा रहा है कि नीति आयोग की 9वीं गवर्निंग काउंसिल की बैठक के दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री का माइक्रोफोन बंद कर दिया गया था। ये दावा भ्रामक है। घड़ी ने केवल यह दिखाया कि उनके बोलने का समय समाप्त हो गया था। यहां तक कि इसे चिह्नित करने के लिए घंटी भी नहीं बजाई गई।

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ममता बनर्जी के इस दावे का खंडन किया कि नीति आयोग की बैठक के दौरान उनका माइक बंद कर दिया गया था। उन्होंने टीएमसी सुप्रीमो पर ‘झूठ पर आधारित कहानी’ गढ़ने का आरोप लगाया। सीतारमण ने कहा कि “मुख्यमंत्री ममता बनर्जी नीति आयोग की बैठक में शामिल हुईं। हम सभी ने उनकी बात सुनी। हर मुख्यमंत्री को समय दिया गया था और यह हर टेबल के सामने मौजूद स्क्रीन पर दिखाया गया था। उन्होंने मीडिया में कहा कि उनका माइक बंद कर दिया गया था। यह पूरी तरह से झूठ है। यही नहीं बता दे कि 18वीं लोकसभा पहले ही अपने दूसरे सत्र में प्रवेश कर चुकी है, लेकिन सीट आवंटन अभी तक तय नहीं हो सका है। दिग्गजों का कहना है कि इस मुद्दे को सुलझाने में समय लगता है क्योंकि अलग-अलग पार्टियों की स्पीकर से अलग-अलग मांगें होती हैं, और अड़चन काफी हद तक आगे की पंक्ति की सीटों को लेकर होती है।

सूत्रों ने कहा कि विपक्ष वर्तमान में अधिक से अधिक सहयोगियों को अपने साथ करने के लिए आगे की लाइन में अधिक सीटों के लिए स्पीकर पर दबाव बना रहा है।अन्य मुख्यमंत्रियों को अधिक देर तक बोलने की अनुमति दी गई। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने कहा कि यह अपमानजनक है। मैं आगे से किसी भी बैठक में हिस्सा नहीं लूंगी। बैठक से बाहर आने के बाद उन्होंने कहा कि मैं बैठक का बहिष्कार करके बाहर आई हूं। हर मुख्यमंत्री को बोलने के लिए उनका उचित समय दिया गया था। केंद्रीय वित्त मंत्री ने कहा, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया है कि उनका माइक बंद कर दिया गया था, जो सच नहीं है..इसके अलावा विपक्ष में समाजवादी पार्टी और डीएमके के लिए भी प्रमुख पदों की जरूरत है। उम्मीद है कि शिवसेना (यूबीटी) को भी आगे बैठाया जा सकता है।टीएमसी एक सूत्र ने कहा कि अभी बातचीत चल रही है। बैठने की व्यवस्था जल्द ही फाइनल हो जानी चाहिए। 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद, विपक्ष सदन में अधिक संख्या में लौटा है।उन्हें झूठ पर आधारित कहानी गढ़ने के बजाय इसके पीछे की सच्चाई बतानी चाहिए।

क्या लोकसभा में अब अलग जगह बैठेगी टीएमसी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब लोकसभा में टीएमसी अलग बैठेगी! क्या लोकसभा में ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के सांसदों की सीटिंग अरेंजमेंट बदलने जा रही है? चर्चा तो कुछ ऐसी ही है। लोकसभा में सीटों को लेकर टीएमसी और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के बीच अलग से बातचीत चल रही है। टीएमसी ‘इंडिया’ गठबंधन का हिस्सा है लेकिन फिर भी वो अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश कर रही है। टीएमसी बीजेपी विरोधी पार्टी के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहती है। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने ‘इंडिया’ गठबंधन को सीटिंग प्लान दिया है, लेकिन इसमें टीएमसी को शामिल नहीं किया गया है। हालांकि ममता बनर्जी की पार्टी विपक्षी गठबंधन का हिस्सा है और उम्मीद है कि वह उसी ग्रुप में बैठेगी। लेकिन अलग सीटों की बात से पता चलता है कि टीएमसी स्वतंत्र रूप से इसके लिए बातचीत कर रही है, भले ही वे एक ही पंक्ति में हों। संसद के जानकार और राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि निचले सदन में बैठने की व्यवस्था गठबंधन के अनुसार की जाती है, न कि पार्टियों के अनुसार। सत्ताधारी गठबंधन के सदस्यों और विपक्ष के बीच स्पष्ट विभाजन के लिए, जो पार्टियों के बीच समन्वय के साथ-साथ सदन के प्रबंधन में मदद करता है। सूत्रों ने कहा कि ‘इंडिया’ ब्लॉक स्पीकर से एक ग्रुप के रूप में बात कर रहा है। हालांकि, विपक्ष वर्तमान में अधिक से अधिक सहयोगियों को अपने साथ करने के लिए आगे की लाइन में अधिक सीटों के लिए स्पीकर पर दबाव बना रहा है। कांग्रेस को आगे की पंक्ति में और सीटें चाहिए। इसके अलावा विपक्ष में समाजवादी पार्टी और डीएमके के लिए भी प्रमुख पदों की जरूरत है। उम्मीद है कि शिवसेना यूबीटी को भी आगे बैठाया जा सकता है।अब ऐसा प्रतीत होता है कि तृणमूल कांग्रेस कुछ अलग से प्लान कर रही है। इसे बंगाल की सत्ताधारी पार्टी के खुद को बीजेपी विरोधी ताकत के रूप में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा। ये स्पीकर चुनाव के दौरान और पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी के बयानों में भी स्पष्ट था।

महत्वपूर्ण रूप से, तृणमूल ने पिछले सत्र में आपातकाल पर प्रस्ताव के खिलाफ कांग्रेस के विरोध का समर्थन नहीं किया था। हालांकि, कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों ने भी कांग्रेस का साथ नहीं दिया, उनके पास यह बहाना था कि वे आपातकाल के शिकार थे। लेकिन 1970 के दशक में टीएमसी आलाकमान कांग्रेस का हिस्सा थी। टीएमसी ने शनिवार को नीति आयोग की बैठक में भी यह कहते हुए हिस्सा लिया कि बैठक के बहिष्कार पर ‘इंडिया’ गुट के साथ कोई समन्वय नहीं है।

हालांकि 18वीं लोकसभा पहले ही अपने दूसरे सत्र में प्रवेश कर चुकी है, लेकिन सीट आवंटन अभी तक तय नहीं हो सका है। दिग्गजों का कहना है कि इस मुद्दे को सुलझाने में समय लगता है क्योंकि अलग-अलग पार्टियों की स्पीकर से अलग-अलग मांगें होती हैं, और अड़चन काफी हद तक आगे की पंक्ति की सीटों को लेकर होती है। सूत्रों ने कहा कि विपक्ष वर्तमान में अधिक से अधिक सहयोगियों को अपने साथ करने के लिए आगे की लाइन में अधिक सीटों के लिए स्पीकर पर दबाव बना रहा है। कांग्रेस को आगे की पंक्ति में और सीटें चाहिए। इसके अलावा विपक्ष में समाजवादी पार्टी और डीएमके के लिए भी प्रमुख पदों की जरूरत है। उम्मीद है कि शिवसेना यूबीटी को भी आगे बैठाया जा सकता है।

टीएमसी एक सूत्र ने कहा कि अभी बातचीत चल रही है। बैठने की व्यवस्था जल्द ही फाइनल हो जानी चाहिए।बता दें कि सत्ताधारी गठबंधन के सदस्यों और विपक्ष के बीच स्पष्ट विभाजन के लिए, जो पार्टियों के बीच समन्वय के साथ-साथ सदन के प्रबंधन में मदद करता है। सूत्रों ने कहा कि ‘इंडिया’ ब्लॉक स्पीकर से एक ग्रुप के रूप में बात कर रहा है। हालांकि, अब ऐसा प्रतीत होता है कि तृणमूल कांग्रेस कुछ अलग से प्लान कर रही है। 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद, विपक्ष सदन में अधिक संख्या में लौटा है। कांग्रेस ने खुद अपनी संख्या लगभग दोगुनी कर ली है। लेकिन 1970 के दशक में टीएमसी आलाकमान कांग्रेस का हिस्सा थी। टीएमसी ने शनिवार को नीति आयोग की बैठक में भी यह कहते हुए हिस्सा लिया कि बैठक के बहिष्कार पर ‘इंडिया’ गुट के साथ कोई समन्वय नहीं है।एक मोटे अनुमान के अनुसार, विपक्ष के सदन के लगभग 40 फीसदी हिस्से को कवर करने की उम्मीद है।

आखिर क्या है पीएम मोदी का प्रोजेक्ट परी?

आज हम आपको पीएम मोदी के नए प्रोजेक्ट परी के बारे में जानकारी देने वाले हैं! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को 112वीं बार ‘मन की बात’ के जरिए देशवासियों को संबोधित किया। एक बार फिर जन सरोकार से जुड़े मुद्दों पर राय रखी और मैथ्स ओलंपियाड में भारत की धाक जमाने वाले छात्रों से बात की। पीएम ने अहोम सम्राज्य के चराईदेव मैदाम और प्रोजेक्ट परी से जुड़ी जानकारी भी साझा की। पीएम मोदी ने कहा कि एक प्रयास है- प्रोजेक्ट परी। अब आप परी सुनकर कन्फ्यूज मत होईएगा। ये परी स्वर्गीय कल्पना से नहीं जुड़ी बल्कि धरती को स्वर्ग बना रही है। पीएम मोदी ने परी प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी भी दी। उन्होंने कहा कि परी यानि पब्लिक आर्ट ऑफ इंडिया। प्रोजेक्ट परी, पब्लिक आर्ट को लोकप्रिय बनाने के लिए उभरते कलाकारों को एक मंच पर लाने का बड़ा माध्यम बन रहा है। आप देखते होंगे सड़कों के किनारे, दीवारों पर अंडरपास में बहुत ही सुंदर पेटिंग्स बनी हुई दिखती हैं। ये पेटिंग्स और ये कलाकृतियां यही कलाकार बनाते हैं जो परी से जुड़े हैं। इससे जहां हमारे सार्वजनिक स्थानों की सुंदरता बढ़ती है, वहीं हमारे कल्चर को और ज्यादा पॉपुलर बनाने में भी मदद मिलती है।

पीएम मोदी ने कहा कि उदाहरण के लिए दिल्ली के भारत मंडपम को ही लीजिए। यहां देश भर के अद्भुत ऑर्ट वर्क आपको देखने को मिल जाएंगे। दिल्ली में कुछ अंडरपास और फ्लाईओवर पर भी आप ऐसे खूबसूरत पब्लिक ऑर्ट देख सकते हैं। मैं कला और संस्कृति प्रेमियों से आग्रह करूंगा कि वे भी पब्लिक आर्ट पर और काम करें। ये हमें अपनी जड़ों पर गर्व करने की सुखद अनुभूति देगा।

मन की बात’ में पीएम ने पेरिस ओलंपिक का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इस समय पूरी दुनिया में पेरिस ओलंपिक छाया हुआ है। ओलंपिक हमारे खिलाड़ियों को विश्व पटल पर तिरंगा लहराने का मौका देता है, देश के लिए कुछ कर गुजरने का मौका देता है। आप भी अपने खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाएं, चीयर फॉर भारत। उन छात्रों से भी बात की जिन्होंने मैथ ओलंपियाड में देश का नाम रोशन किया है। उन्होंने कहा, स्पोर्ट्स की दुनिया के इस ओलंपिक से अलग, कुछ दिन पहले मैथ्स की दुनिया में भी एक ओलंपिक हुआ है। इंटरनेशनल मैथमेटिक्स ओलंपियाड, इस ओलंपियाड में भारत के स्टूडेंट्स ने बहुत शानदार प्रदर्शन किया है। इसमें हमारी टीम ने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए चार गोल्ड मेडल और एक सिल्वर मेडल जीता है। इसमें 100 से ज्यादा देशों के युवा हिस्सा लेते हैं और हमारी टीम टॉप पांच में आने में सफल रही। पीएम मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में इंटरनेशनल मैथमेटिक्स ओलिंपियाड विजेताओं से फोन पर बात की।

पीएम मोदी ने आगे कहा कि ‘मन की बात’ में, अब मैं उस विषय को साझा करना चाहता हूं, जिसे सुनकर हर भारतवासी का सिर गर्व से ऊंचा हो जाएगा। लेकिन, इसके बारे में बताने से पहले मैं आपसे एक सवाल करना चाहूंगा। क्या आपने चराईदेउ मैदाम का नाम सुना है? अगर नहीं सुना, तो अब आप ये नाम बार-बार सुनेंगे और बड़े उत्साह से दूसरों को बताएंगे। असम के चराईदेउ मैदाम को यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल किया जा रहा है। इस लिस्ट में यह भारत की 43वीं, लेकिन नार्थ ईस्ट की पहली साइट होगी। आपके मन में ये सवाल जरूर आ रहा होगा कि चराईदेव मैदाम आखिर है क्या, और ये इतना खास क्यों है।

प्रधानमंत्री ने बताया कि चराईदेउ का मतलब है शाइनिंग सिटी ऑन द हिल यानी पहाड़ी पर एक चमकता शहर। ये अहोम राजवंश की पहली राजधानी थी। अहोम राजवंश के लोग अपने पूर्वजों के शव और उनकी कीमती चीजों को पारंपरिक रूप से मैदाम में रखते थे। चराईदेव मैदाम, टीले नुमा एक ढांचा होता है, जो ऊपर मिट्टी से ढका होता है और नीचे एक या उससे ज्यादा कमरे होते हैं। ये मैदाम, अहोम साम्राज्य के दिवंगत राजाओं और गणमान्य लोगों के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है। अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रकट करने का ये तरीका बहुत यूनिक है। इस जगह पर सामुदायिक पूजा भी होती थी।

पीएम मोदी ने बताया कि अहोम साम्राज्य के बारे में दूसरी जानकारियां आपको और हैरान करेंगी। 13वीं शताब्दी के शुरू होकर ये साम्राज्य 19वीं शताब्दी की शुरुआत तक चला। इतने लंबे कालखंड तक एक साम्राज्य का बने रहना बहुत बड़ी बात है। शायद अहोम साम्राज्य के सिद्धांत और विश्वास इतने मजबूत थे, कि उसने इस राजवंश को इतने समय तक कायम रखा। मुझे याद है कि इसी वर्ष 9 मार्च को मुझे अदम्य साहस और शौर्य के प्रतीक, महान अहोम योद्धा लसित बोरफुकन की सबसे ऊंची प्रतिमा के अनावरण का सौभाग्य मिला था। इस कार्यक्रम के दौरान, अहोम समुदाय आध्यात्मिक परंपरा का पालन करते हुए मुझे अलग ही अनुभव हुआ था। लसित मैदाम में अहोम समुदाय के पूर्वजों को सम्मान देने का सौभाग्य मिलना मेरे लिए बहुत बड़ी बात है। अब चराईदेउ मैदाम के वर्ल्ड हेरिटेज साइट बनने का मतलब होगा कि यहां पर और अधिक पर्यटक आएंगे। आप भी भविष्य के अपने ट्रेवल प्लॉन में इस साइट को जरूर शामिल करिएगा।

आखिर कब सुधरेगा भारत का सिस्टम?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर भारत का सिस्टम कब सुधरेगा! सेना में भर्ती होकर देश के लिए कुर्बान होने का जज्बा रखते थे, आपने ‘अग्रिवीर योजना’ लाकर हमारे दिल को चोट पहुंचाई, हम चुप रहे। कभी रेलवे का एग्जाम लीक हुआ, कभी यूपी पुलिस भर्ती का पेपर लीक हुआ, लेकिन हम अपनी किस्मत का दोष समझकर चुप बैठ गए। परंतु सिस्टम हमारे पीछे हाथ धोकर पड़ गया है। देश की बड़ी परीक्षा नीट का भी पेपर लीक हो जाता है। हम सड़कों पर उतरे, सिस्टम से लड़े और सीबीआई जांच शुरू हो गई। सिस्टम से लड़ते-लड़ते थक चुके हैं। लेकिन कमजोर नहीं हुए हैं। हमें फिर से संघर्ष करना है। सिस्टम को सुधारने के लिए सिस्टम में आना है। प्लीज हमें बख्श दो, आज देश के हर छात्र और नौजवान के दिल और जुबान से बस ये ही अपील निकल रही होगी। दरअसल अब मामला बहुत आगे निकल गया है। देश के युवाओं की जान पर बन आई है। आईएएस और आईपीएस बनकर देश को सुधारने का सपना देखने वाले छात्र कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में डूबकर मर रहे हैं। बिजली के खंभों का कंरट उन्हें मौत की नींद सुला रहा है। किसी के पिता खेती करते हैं, किसी के पिता मामूली सी नौकरी करते हैं, किसी के पिता मजदूरी करते हैं… लेकिन आपको इस बात से कहां फर्क पड़ता है। आपको तो बस सियासत करनी है। दिल्ली के राजेंद्र नगर इलाके में भारी बारिश होती है। कोचिंग सेंटर के बेसेमेंट में बनी लाइब्रेरी में अचानक फोर्स से सीवर का पानी घुस जाता है। 10 मिनट के अंदर गंदे पानी की भेंट तीन नौजवानों के सपने चढ़ जाते हैं। और शासन और प्रशासन दावा करता है कि जांच शुरू हो गई है। दोषियों को छोड़ा नहीं जाएगा। खबरों में पढ़ते हैं दिल्ली सरकार मे मंत्री आतिशी ने मुख्य सचिव नरेश कुमार को इस घटना की जांच करने और 24 घंटे के भीतर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया। अरे भाई , ये इतना सारा ज्ञान घटना के बाद क्यों आता है। दिल्ली सरकार कहती है केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है। केंद्र सरकार के प्रतिनिधि कहते हैं दिल्ली सरकार चोर है। बारिश से पहले सीवरेज ठीक नहीं कराए। उधर कोचिंग सेंटर का मालिक बस अपने फायदे के बारे में सोचता है और बच्चों को मौत के मुंह में बिठाकर देश का सबसे बड़ा अफसर बनाने के सपने दिखाता है। दरअसल सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले बच्चे मिडिल क्लास से ताल्लुक रखते हैं। अगर वो किसी हादसे के शिकार हो भी जाते हैं, तो क्या फर्क पड़ता है। बस अपने घर का बच्चा इन चक्करों में ना फंसे। ये ही सोच है जो युवाओं की मौत का कारण बन रही है।

दिल्ली के करोल बाग मेट्रो स्टेशन पर भारी पुलिस बल तैनात है। ओल्ड राजेंद्र नगर में शनिवार को एक कोचिंग संस्थान के बेसमेंट में पानी भर जाने से हुई 3 छात्रों की मौत के विरोध में प्रदर्शन करने के लिए एकत्र हुए छात्रों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। न्यूज चैनल और न्यूज वेबसाइट्स पर अब ऐसी ही खबरें देखने को मिल रही है। दरअसल एक सिस्टम के आगे बेबस छात्र कितना संघर्ष करेगा। कभी पेपर लीक हो जाता है तो वह सड़कों पर उतरकर पुलिस के डंडे खाता है। कभी अग्निवीर स्कीम के विरोध में वो सिस्टम से लड़ता है। अब अपने जीवन के लिए सरकार से गुहार लगा रहा है। लेकिन सरकार सुनने को तैयार नहीं है। युवा आज की तारीख में राजनीति का केंद्र बिंदु बन गए हैं। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, हर कोई युवाओं के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेक रहा है। छात्रों और नौजवानों की हालत रोजाना खराब होती जा रही है। जब कोई युवा खिलाड़ी देश के लिए मेडल जीतता है तो पूरे देश को उस पर गर्व होता है। लेकिन जब वहीं नौजवान गटर के पानी की भेंट चढ़ जाता है तो सिस्टम मौन हो जाता है।

बीते 2-3 सालों से देश का युवा सड़क पर है। उसकी मेहनत पर सिस्टम पानी फेर रहा है। दुनिया में भारत सबसे ज्यादा युवा आबादी वाला देश है। लेकिन वो युवा आबादी बहुत मजबूर है। बीटेक, बीबीए, एमबीए और एमटेक करने के बाद भी उसके पास प्राइवेट नौकरी तक नहीं है। उसके बावजूद भारत का युवा हिम्मत वाला है। वह लगातार संघर्ष कर रहा है। रात दिन एक करके अपनी तकदीर बदलना चाहता है। लेकिन उसे अब संघर्ष भी नहीं करने दिया जा रहा है। जीवनभर की कमाई जुटाकर मां-बाप अपने बच्चों को बड़ा आदमी बनाना चाहते हैं। लेकिन देश की राजधानी में ही जब सपने पानी में डूबकर खत्म हो रहे हैं तो देश के अन्य राज्यों का क्या हाल होगा। पूरी दुनिया एआई के दौर में पहुंच गई है। लेकिन दुर्भाग्य है कि आज भी भारत का सिस्टम ‘जमी जमाई व्यवस्था‘ से बाहर नहीं आना चाहता है। तीन घरों के चिराग डूबकर मर जाते हैं, और सरकार इस बात की जांच करती है कि पानी आखिर बेसमेंट तक कैसे पहुंचा। यहां गलती सरकार की है, सिस्टम की है या कोचिंग सेंटर मालिक की, इसका पता चल भी जाए तो क्या होगा। असल मुद्दा तो ये है कि युवाओं को जो बिना अपराध के हर रोज सजा मिल रही है, इसका स्थायी हल कैसे खोजा जाए। अभी भी मौका है संभला जा सकता है। अगर देर हो गई तो हर रोज किसी सीवर या नाली में टूटते सपनों की सिसकियां ही सुनाई देंगी।

क्या फसल बीमा बन सकता है किसानों की सुरक्षा का कवच?

आने वाले समय में फसल बीमा किसानों की सुरक्षा कवच बन सकता है! जलवायु परिवर्तन को लेकर हम ऐसी चिंताजनक स्थिति में आ खड़े हुए हैं, जिसका हमारी पृथ्वी पर बेहद गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। पूरी दुनिया में तापमान के लगातार बढ़ने से विभिन्न घटनाएं देखने को मिल रही हैं, जो दुनिया के लगभग हर हिस्से को प्रभावित करने का कारण बन रही हैं। मौसम का अपने चरम पर पहुंचना आम होता जा रहा है, जो लोगों के जीवन और आजीविका को तेजी से प्रभावित कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की नवीनतम रिपोर्ट से पता चलता है कि पेरिस समझौते के तहत किए गए वादे नाकाफी हैं और पृथ्वी की तापमान को इसी सदी में पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2.5 से लेकर 2.9 डिग्री सेल्सियस तक तक बढ़ा सकते हैं। जलवायु का यह चिंताजनक परिवर्तन हम सभी को प्रभावित करेगा और हमारी आर्थिक गतिविधियों को भी बाधित करेगा, जिससे हमारा अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। खेती भी इस स्थिति से बच नहीं पाएगी। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का विश्लेषण करने के लिए नेशनल इनोवेशंस इन क्लाइमेट रेसिलिएंट एग्रीकल्चर प्रोजेक्ट के तहत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने एक अध्ययन किया है।

वर्ष 2050 और 2080 तक वर्षा आधारित चावल की पैदावार में तकरीबन 2.5% तक की कमी देखी जा सकती है, सिंचित चावल की पैदावार वर्ष 2050 तक 7% और वर्ष 2080 तक 10% घट सकती है, वर्ष 2100 तक गेहूं की पैदावार 6 से 25% तक कम हो सकती है, वर्ष 2100 तक मक्के की पैदावार 18 से 23% तक कम हो सकती है! एक अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2015 और 2021 के बीच बाढ़ और बहुत ज्यादा बारिश की वजह से भारत 3.39 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि खो चुका है। इसके अलावा, सूखे के कारण अन्य 3.5 करोड. हेक्टेयर फसल क्षेत्र नष्ट हो चुका है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने भारत के 573 ग्रामीण जिलों में कृषि जोखिम मूल्यांकन किया। इसमें पाया गया कि 109 जिले जलवायु प्रभावों के कारण गंभीर समस्याओं का सामना कर रहे हैं, जो ‘बहुत अधिक जोखिम’ श्रेणी में हैं और 201 जिले ‘जोखिम’ श्रेणी में हैं। इस सच से कोई भी अनजान नहीं है कि अति मौसमी घटनाएं प्रबल होती जा रही हैं और बार-बार हो रही हैं, जिससे कृषि और फसल उत्पादन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा है। यह स्थिति किसानों को कर्ज और गरीबी की गर्त में धकेल सकती है।

फसल के नुकसान और उसके नतीजे में होने वाली वित्तीय कठिनाई को कम करने का एक तरीका फसल बीमा है। क्षेमा का नया फसल बीमा उत्पाद, ‘सुकृति’ और ‘प्रकृति’ किसानों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करते हैं। सुकृति एक स्वनिर्धारित फसल बीमा योजना है, जिसकी शुरुआती कीमत 499 रुपए प्रति एकड़ है। यह बीमा 100 से अधिक फसलों को कवर करता है। यह किसानों को 9 जोखिमों की पूर्वनिर्धारित सूची से एक प्रमुख और एक न्यून जोखिम चुनने का संयोजित विकल्प प्रदान करता है। यह सुविधा सुनिश्चित करती है कि किसान जलवायु, क्षेत्र, उनके खेत के स्थान, ऐतिहासिक प्रतिमान आदि घटकों पर आधारित ऐसे जोखिमों का चयन करें, जो वास्तव में उन्हें नुकसान पहुंचा सकते हैं।

चक्रवात, बाढ़, जलप्रिय फसलों के लिए लागू नहीं, ओलावृष्टि और भूकंप, भूस्खलन, बिजली गिरने से लगी आग, जानवरों के हमले, बंदर, खरगोश, जंगली सुअर, हाथी और विमान दुर्घटना जैसी न्यून आपदाओं के लिए सुकृति बीमा योजना के तहत सुरक्षा प्रदान की जाती है। किसान अपने वित्तीय हितों की रक्षा के लिए अतिरिक्त प्रीमियम का भुगतान करके अपना कवरेज बढ़ा सकते हैं। वे अपने घर से क्षेमा ऐप पर पंजीकरण करके आसानी से बीमा खरीद सकते हैं। ऐप पर नीति विवरण और क्षतिग्रस्त फसलों की तस्वीरें या वीडियो अपलोड करके भी क्लेम कर सकते हैं। क्षेमा त्वरित दावा निपटान सुनिश्चित करने के लिए जियो टैगिंग, सैटेलाइट इमेजरी और एआई बेस्ड एल्गोरिदम जैसी उन्नत तकनीक का उपयोग करता है।

फसल बीमा किसानों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है। समय के साथ यह कृषि में उच्च निवेश और बेहतर प्रथाओं को प्रोत्साहित करता है, जिससे अंततः समग्र कृषि को बढ़ावा मिलता है। इसलिए, किसानों के लिए महत्वपूर्ण है कि वे इस खरीफ सीजन में बीज, उर्वरक और उपकरण के साथ ही साथ फसल बीमा भी खरीदें। बता दें कि इस सच से कोई भी अनजान नहीं है कि अति मौसमी घटनाएं प्रबल होती जा रही हैं और बार-बार हो रही हैं, जिससे कृषि और फसल उत्पादन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा है। यह स्थिति किसानों को कर्ज और गरीबी की गर्त में धकेल सकती है। इससे न सिर्फ प्रतिकूल जलवायु घटनाओं से उनकी आय सुरक्षित रहेगी बल्कि उन्हें अपनी कृषि यात्रा को समृद्धि की ओर अग्रसर करने में भी मदद मिलेगी।

आखिर क्या है उत्तर प्रदेश में फल सब्जी की दुकानों पर नेम प्लेट मामला जानिए?

आज हम आपको उत्तर प्रदेश में फल सब्जी की दुकानों पर नेम प्लेट के मामले के बारे में बताने जा रहे हैं! हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा कावड़ यात्रियों की आस्था और धर्म को सुरक्षित रखने के लिए फल सब्जी की दुकानों पर नेम प्लेट लगाने की बात कही थी! जिसके बाद कावड़ यात्रियों के मार्ग पर आने वाली सभी खाने पीने के दुकानदारों के द्वारा अपना नाम और पहचान अपनी दुकान के सामने लगा लिए गए… इसके बाद विपक्ष के द्वारा सियासत शुरू कर दी गई! आपको हम इस पूरी घटना और विवाद के बारे में जानकारी देंगे!  आपको बता दे कि कांवड़ियों की संख्या में बढ़ोतरी के साथ ही गुरुवार को पुरकाजी से बुढ़ाना मोड़ तक अलग-अलग जगह दुकानदारों ने अपने नाम दुकानों के बाहर प्रदर्शित किए। मिठाई, कोल्ड ड्रिंक्स और खाने-पीने के सामान की दुकानों के बाहर नाम लिखे गए।

फल विक्रेताओं ने भी नाम वाले बैनर लटकाए हैं। वहीं पुलिस के फैसले ने तूल पकड़ा तो भाजपा नेताओं के बयान आने शुरू हो गए। सरधना के पूर्व विधायक संगीत सोम और खतौली के पूर्व विधायक विक्रम सैनी ने पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर पर निशाना साधा। इसके बाद मामले ने तूल पकड़ लिया, इस पर सियासी बहस शुरू हो गई है। इसे लेकर एआईएमआईएम के अध्यक्ष असद्उद्दीन ओवैसी ने एक्स पर पोस्ट कर पलटवार किया। गीतकार जावेद अख्तर ने भी एक्स पर पोस्ट करते हुए टिप्पणी की है। बता दें कि मुख्यमंत्री योगी ने कांवड़ यात्रियों के लिए बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि पूरे यूपी में कांवड़ मार्गों पर खाने-पीने की दुकानों पर संचालकों-मालिकों का नाम पहचान लिखनी होगी।

उन्होंने कहा कि कांवड यात्रियों की आस्था की शुचिता बनाए रखने के लिए यह फैसला लिया गया है। इसके अलावा हलाल सर्टिफिकेशन वाले प्रोडक्ट बेचनेवालों पर भी कड़ी कार्रवाई होगी। उधर, इस फैसले का अखिलेश यादव और मायावती ने कड़ा विरोध किया है। इसी बीच असदुद्दीन ओवैसी ने एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा है कि उत्तर प्रदेश पुलिस के आदेश के अनुसार अब हर खाने वाली दुकान या ठेले के मालिक को अपना नाम बोर्ड पर लगाना होगा, ताकि कोई कांवड़िया गलती से मुसलमान की दुकान से कुछ न खरीद ले। इसे दक्षिण अफ्रीका में अपारथाइड कहा जाता था और हिटलर की जर्मनी में इसका नाम जुडेनबोयकोट था। बता दें कि यशवीर आश्रम बघरा के संचालक स्वामी यशवीर महाराज ने अधिकारियों से मिलकर कांवड़ मार्ग की दुकानों के दुकानदारों के नाम प्रदर्शित करने की मांग रखी थी। उन्होंने एसएसपी अभिषेक सिंह से भी मुलाकात की थी।

कांवड़ यात्रा रूट पर नेम प्लेट लगाने का विवाद उत्तर प्रदेश से गहराया है। मुजफ्फरनगर प्रशासन की ओर से सबसे पहले कांवड़ रूट पर लगने वाली दुकानों पर नेम प्लेट लगाने का आदेश जारी किया गया। इस नेम प्लेट पर दुकानदार और इसमें काम करने वाले कर्मियों के नाम की जानकारी देने को कहा गया। इस आदेश के बाद मुजफ्फरनगर में विरोध शुरू हो गया। अखिलेश यादव से लेकर मायावती और एआईएमआई प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी तक प्रशासन के खिलाफ बयान देने लगे। हालांकि, मुजफ्फरनगर प्रशासन के आदेश को सहारनपुर और शामली में भी लागू कर दिया गया। विवाद गहराया तो योगी सरकार पर कार्रवाई का दबाव बढ़ा। योगी सरकार ने इस मामले में चौंकाने वाला फैसला लेते हुए प्रदेश के सभी रूटों पर दुकानों के आगे नेम प्लेट का आदेश जारी कर दिया।कौशल विकास राज्यमंत्री कपिल देव अग्रवाल ने भी विकास भवन में हुई बैठक के दौरान यह मुद्दा उठाया था। पुलिस ने इसके बाद कांवड़ मार्ग पर व्यवस्था लागू करानी शुरू कर दी थी। एआईएमआईएम के प्रमुख असदउद्दीन ओवैसी की एक्स पर पोस्ट के बाद अन्य लोगों ने भी बृहस्पतिवार को मोर्चा संभाल लिया। सुप्रीम कोर्ट ने कांवड़ यात्रा रूट पर नेम प्लेट लगाए जाने से संबंधित याचिका में 22 जुलाई को अंतरिम आदेश जारी किया गया था। कोर्ट ने कांवड़ यात्रा की शुरुआत के साथ ही रूट पर नेम प्लेट लगाने संबंधी आदेश पर रोक लगाने का आदेश दिया। दरअसल, दुकानदारों की ओर से दायर याचिका में आर्थिक चोट पहुंचाने वाला यह आदेश बताया गया।

कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कांवड़ यात्रा रूट पर बने होटल, ढाबे और रेस्टोरेंट्स को शाकाहारी या मांसाहारी का बोर्ड लगाने का आदेश दिया। दुकान के मालिक या कर्मियों के नाम लिखने को अनिवार्य किए जाने पर रोक लगा दी गई। अब योगी सरकार की ओर से कोर्ट में पेश किए गए जवाब में कानून व्यवस्था बनाए रखने और आस्था पर चोट न पड़ने देने को लेकर इस प्रकार का आदेश जारी किए जाने की बात कही है। कोर्ट अन्य सरकारों का जवाब आने के बाद 29 जुलाई को मामले में आगे की सुनवाई हुई।यानी सीधी सी बात यह है कि उत्तर प्रदेश में अब कोई भी गलत तरीके से फल सब्जी और खाने-पीने के समान नहीं बेच पाएगा,

क्योंकि अधिकतर मामलों में यह देखा गया है कि धर्म विरोधी लोगों के द्वारा एक दूसरे के धर्म को नीचा दिखाने के लिए कई आपत्तिजनक कार्य किए जाते हैं… जिसके बाद हिंसा भड़क सकती है…. इसलिए उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा ऐसी हिंसा से बचने के लिए पहले से ही प्रिकॉशन ले लिए गए हैं!