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क्या दिल्ली में खुलेआम बिक रही है कैंसर की नकली दवा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या दिल्ली में कैंसर की नकली दवा खुलेआम बिक रही है या नहीं! पंजाब के एक व्यक्ति ने अपनी मां के लिए 16.20 लाख रुपये में 12 इंजेक्शन खरीदे थे। चंडीगढ़ की एक महिला ने अपनी दादी के लिए 13.50 लाख रुपये में 10 इंजेक्शन खरीदे थे। पश्चिम बंगाल का एक व्यक्ति था, जिसने अपने पिता के लिए 24 लाख रुपये में 24 इंजेक्शन खरीदे थे। एक और चंडीगढ़ की महिला थी, जिसने अपनी मां के लिए 13.50 लाख रुपये में 10 इंजेक्शन खरीदे थे। इस तरह आठ लोगों ने कैंसर से जूझ रहे अपने परिवार के लिए करीब 75 लाख रुपये के इंजेक्शन खरीदे थे। इन सब में एक चीज कॉमन थी। इन लोगों ने जो कैंसर के इलाज के रूप में जो उम्मीद खरीदी थी, वो इंजेक्शन की तरह ही नकली थी। राजधानी में करीब तीन महीने पहले कैंसर की नकली दवा बेचने वाले गिरोह का भंडाफोड़ हुआ। ऊपर जिन लोगों की चर्चा हुई है ये सभी ‘मौत के सौदागरों’ का शिकार हैं। दिल्ली पुलिस ने इस मामले में आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी है। पुलिस ने जांच के बाद नकली इंजेक्शन खरीद कर लगवाने वाले 8 लोगों को खोजने में सफलता पाई। दुख की बात है कि इन 8 मरीजों में से एक की कैंसर की नकली दवा से मौत भी हो गई। पुलिस ने आरोप पत्र में इन आरोपियों के बारे में विस्तृत जानकारी के साथ ही उनके नकली दवा बनाने से लेकर बेचने के बारे में चार्चशीट में खुलासा किया है। पुलिस ने जब इस गिरोह का भंडाफोड़ किया था तब उनके पास से नकली दवा से भरी हुई शीशियां भी जब्त की थी। उन नकली दवाओं की 140 शीशियों का बाजार में वास्तविक मूल्य लगभग 4 करोड़ रुपये था।

चार्जशीट के हवाले से कहा है कि बिहार के मधुबनी के एक व्यक्ति ने पुलिस को बताया कि उसकी पत्नी मुंह और फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित थी। उसका राजीव गांधी कैंसर संस्थान (RGCI) और पटना के बुद्ध कैंसर अस्पताल में इलाज चल रहा था। डॉक्टरों ने उसकी पत्नी को कीट्रुडा इंजेक्शन लगाने की सलाह दी थी। वह एक ऑनलाइन मार्केटप्लेस इंडियामार्ट के जरिए लव नरूला नाम के व्यक्ति के संपर्क में आया। नरूला ने उसे 90,000 रुपये में एक इंजेक्शन देने की पेशकश की। उसने अप्रैल से अगस्त 2022 के बीच 3.60 लाख रुपये में चार इंजेक्शन खरीदे। लेकिन जब उसकी पत्नी को बुद्ध कैंसर अस्पताल में दो इंजेक्शन दिए गए, तो उसकी हालत बिगड़ गई और 11 सितंबर, 2022 को उसकी मौत हो गई।

आरोपी दिल्ली और गुड़गांव के शीर्ष अस्पतालों में काम करते थे। आरोपपत्र के अनुसार, आरोपी कथित तौर पर फार्मासिस्ट या अस्पताल के कर्मचारियों से महत्वपूर्ण दवाओं की खाली शीशियां 3,000 से 6,000 रुपये में थे। इसके बाद इन शीशियों में नकली पदार्थ भरते थे। इन्हें बाद में फार्मासिस्ट और वेबसाइटों के जरिए 40,000 से 50,000 रुपये में बेच दिया जाता था। इस साल की शुरुआत में 12 मार्च को क्राइम ब्रांच के अंतर-राज्यीय सेल और दिल्ली सरकार के औषधि नियंत्रण विभाग द्वारा की गई छापेमारी के दौरान दिल्ली और गुड़गांव स्थित अस्पतालों के कर्मचारियों सहित सात आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था।

जांच के दौरान बाद में पांच अन्य को गिरफ्तार किया गया। आरोपियों की पहचान मास्टरमाइंड विफिल जैन, सूरज शाट नीरज चौहान, तुषार चौहान, परवेज, कोमल तिवारी, अभिनय सिंह , आदित्य कृष्णा, रोहित सिंह बिष्ट, जितेंद्र, माजिद खान, और साजिद के रूप में हुई थी। जांचकर्ताओं को चार आरोपियों से खरीदी गई दवा की खाली शीशियां भी मिली हैं जो दिल्ली और गुड़गांव के तीन प्रमुख कैंसर अस्पतालों के ऑन्कोलॉजी विभागों में काम कर रहे थे। 12 आरोपियों में से दो राजीव गांधी कैंसर संस्थान में फार्मासिस्ट के तौर पर काम करते थे।

रिपोर्ट में चार्जशीट के हवाले से बताया गया कि आरजीसीआई के अनुसार कोमल तिवारी और अभिनय सिंह साइटोटॉक्सिक मिक्सिंग यूनिट में तैनात थे। वे रोजाना साइटोटॉक्सिक दवाओं के मिक्सिंग के लिए जिम्मेदार थे। फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट (गुड़गांव में) ने कहा कि जितेन्द्र हेमटोलॉजी, हेमेटो-ऑन्कोलॉजी और बोन मैरो ट्रांसप्लांट विभाग में एक क्लीनिकल फार्मासिस्ट के रूप में काम कर रहा था। वह हेमटोलॉजी विभाग के तहत भर्ती मरीजों को दी जाने वाली ऑन्कोलॉजी दवाओं के मिक्सचर के लिए जिम्मेदार था। वेंकटेश्वर अस्पताल ने बताया कि रोहित सिंह बिष्ट ऑन्को-डेकेयर का ओवरऑल इंचार्ज था। कीमो दवा लेने वाले सभी मरीज बिष्ट की देखरेख में थे।

मिलेनियम कैंसर सेंटर ने पुलिस को बताया कि साजिद ऑन्कोलॉजी विभाग में तैनात था। वह मरीजों को दवा-मिक्सचर और कीमो एडमिनिस्ट्रेश के लिए जिम्मेदार था। पुलिस ने बताया कि सप्लायरों को शीशियां बेचने के अलावा आरोपियों ने नकली कैंसर रोधी इंजेक्शन की बिक्री को बढ़ावा देने के लिए ऑनलाइन बिजनेस प्लेटफॉर्म इंडियामार्ट का भी इस्तेमाल किया था। सात आरोपियों ने इंडियामार्ट पर खुद को रजिस्टर्ड कराया था।

आखिर क्या है दिल्ली के रिज एरिया में 1100 पेड़ों की कटाई का मामला?

आज हम आपको दिल्ली के रिज एरिया में 1100 पेड़ों की कटाई का मामला बताने जा रहे हैं! दिल्ली में रिज क्षेत्र में पेड़ों की कटाई के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को नाराजगी व्यक्त की। शीर्ष अदालत ने पेड़ काटने के मामले में उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना की भूमिका पर अधिकारियों की तरफ से लगातार लीपापोती करने पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) को यह बताने का निर्देश दिया कि क्या पेड़ों को काटने का आदेश उपराज्यपाल की मौखिक अनुमति के आधार पर पारित किया गया था या एजेंसी ने स्वतंत्र रूप से यह निर्णय लिया था। सुप्रीम कोर्ट सड़क चौड़ीकरण परियोजना के लिए रिज वन में 1,100 पेड़ों की कथित कटाई को लेकर डीडीए के उपाध्यक्ष के खिलाफ स्वत:संज्ञान से अवमानना कार्यवाही की सुनवाई कर रहा था। जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने कहा कि पेड़ों की कटाई की अनुमति देने में दिल्ली के उपराज्यपाल ने विवेक का प्रयोग नहीं किया। पीठ ने कहा कि सुनवाई के पहले दिन ही उसे यह बता दिया जाना चाहिए था कि उपराज्यपाल ने पहले ही पेड़ों की कटाई के निर्देश जारी किये थे।

पीठ ने कहा कि हमें इस बात से परेशानी है कि हर किसी ने गलती की है। पहले दिन सभी को अदालत में आकर कहना चाहिए था कि हमसे गलती हुई है। लेकिन लीपापोती चलती रही। चार-पांच आदेशों के बाद डीडीए अधिकारी के हलफनामे के रूप में सच्चाई सामने आ जाती है। गलती तो सभी ने की है, उपराज्यपाल सहित सभी ने। खेदजनक स्थिति है।” सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसे इस मामले में उपराज्यपाल की भूमिका का एहसास तब हुआ जब अटार्नी जनरल आर. वेंकटरमणी स्वयं उपस्थित हुए और कहा, ‘यह पर्याप्त संकेत था’। शीर्ष अदालत ने कहा कि रिज क्षेत्र में पेड़ों की कटाई में दिल्ली सरकार भी समान रूप से दोषी है। सरकार को 422 पेड़ों को काटने की अवैध अनुमति देने का दोष स्वीकार करना चाहिए। कोर्ट ने AAP सरकार से कहा कि वह पेड़ों की इस अवैध कटाई की भरपाई के लिए कोई व्यवस्था बनाए।

डीडीए के उपाध्यक्ष की तरफ से दाखिल दो हलफनामों पर गौर करते हुए पीठ ने कहा कि प्रथम दृष्टया, हमें ऐसा प्रतीत होता है कि सभी संबंधित पक्षों की ओर से यह बताने में अनिच्छा थी कि तीन फरवरी, 2024 को उपराज्यपाल के मौके का दौरा करने के दौरान वास्तव में क्या हुआ था, जब पेड़ों को काटने का मौखिक आदेश दिया गया था। पीठ ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि उपराज्यपाल ने कहा है कि वृक्ष अधिनियम के तहत पेड़ों की कटाई की अनुमति उनके द्वारा दी गई मंजूरी के आधार पर पहले ही दी जा चुकी है। इसलिए डीडीए को मंजूरी के बारे में सूचित किया जाना चाहिए।

पीठ ने ठेकेदार को नोटिस जारी किया और स्पष्टीकरण मांगा कि किसके निर्देश पर पेड़ों की कटाई की गई। पीठ ने कहा, “सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि यद्यपि राज्य सरकार के सभी वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे, लेकिन उनमें से किसी ने भी यह नहीं बताया कि रिज क्षेत्र में पेड़ों को काटने के लिए न्यायालय की अनुमति लेने की आवश्यकता है और अन्य क्षेत्रों में पेड़ों को काटने के लिए वृक्ष अधिकारी की अनुमति लेने की आवश्यकता है।शीर्ष अदालत ने दिल्ली सरकार को एक हलफनामा दायर करने का भी निर्देश दिया जिसमें यह बताया जाए कि किसके आदेश पर लकड़ियां जब्त करने का आदेश दिया गया है और ठेकेदार से यह भी पूछा कि काटे गए पेड़ों का स्थान क्या है।बता दें कि जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने कहा कि पेड़ों की कटाई की अनुमति देने में दिल्ली के उपराज्यपाल ने विवेक का प्रयोग नहीं किया।

पीठ ने कहा कि सुनवाई के पहले दिन ही उसे यह बता दिया जाना चाहिए था कि उपराज्यपाल ने पहले ही पेड़ों की कटाई के निर्देश जारी किये थे।शीर्ष अदालत ने कहा कि रिज क्षेत्र में पेड़ों की कटाई में दिल्ली सरकार भी समान रूप से दोषी है। सरकार को 422 पेड़ों को काटने की अवैध अनुमति देने का दोष स्वीकार करना चाहिए। कोर्ट ने AAP सरकार से कहा कि वह पेड़ों की इस अवैध कटाई की भरपाई के लिए कोई व्यवस्था बनाए। पीठ ने कहा कि अधिकारियों को लगातार निगरानी रखने की योजना बनानी होगी ताकि अवैध रूप से पेड़ों की कटाई के मामले तुरंत अधिकारियों के संज्ञान में आ सकें।

आखिर मध्य प्रदेश सरकार ने सीबीआई पर क्यों का कसा शिकंजा?

हाल ही में मध्य प्रदेश सरकार ने सीबीआई पर शिकंजा कस दिया है! राज्य में किसी भी मामले में सीबीआई जांच के लिए राज्यों की अनुमित के मुद्दे पर बीजेपी को झटका लगता दिख रहा है। विपक्षी दलों के शासित राज्यों की तर्ज पर मध्यप्रदेश सरकार ने भी सीबीआई की जांच को संबंध में एक अहम फैसला किया है। मध्य प्रदेश सरकार ने का कहना है कि सीबीआई को अपने अधिकार क्षेत्र में जांच शुरू करने से पहले राज्य से लिखित सहमति की आवश्यकता होगी। इस संबंध में मंगलवार को एक अधिसूचना प्रकाशित की गई थी। यह आदेश राज्य में 1 जुलाई से प्रभावी माना जाएगा। पश्चिम बंगाल, केरल, पंजाब और तमिलनाडु पहले ही सीबीआई जांच की अनुमति को लेकर केंद्र सरकार का विरोध कर रहे हैं। जबकि राज्य ने अपने अधिकार क्षेत्र में मामलों की जांच के लिए संघीय एजेंसी को दी गई सहमति वापस ले ली है। बंगाल सरकार ने 2018 में ही सीबीआई को जांच के लिए दी गई अनुमति वापस ले लिया था।पश्चिम बंगाल और केंद्र सरकार का मामला तो हाल ही में सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा था। अब मध्यप्रदेश सरकार का यह फैसला आया है। मध्यप्रदेश में सीएम मोहन यादव की सरकार ने सीधे-सीधे तो सीबीआई के क्षेत्राधिकार या मामले की जांच को रोकने की बात तो नहीं कही है लेकिन उसने लिखित सहमति का ‘ब्रेक’ जरूर लगा दिया है। इसके साथ ही बीजेपी शासित मध्य प्रदेश उन राज्यों की लंबी सूची में शामिल हो गया है, जिनमें ज्यादातर विपक्षी दलों द्वारा शासित हैं। इनमें बंगाल, तमिलनाडु, पंजाब, केरल और तेलंगाना शामिल हैं। इन राज्यों में सीबीआई को जांच से पहले संबंधित सरकारों से अनुमति लेने की आवश्यकता है।

रिपोर्ट के अनुसार गृह विभाग के सूत्रों ने बताया कि केंद्र सरकार की तरफ से पारित तीन नए आपराधिक कानूनों में से एक भारतीय न्याय संहिता के कार्यान्वयन के बाद नए कानूनी ढांचे का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक था। सूत्रों ने कहा कि बदलावों का पालन करने के लिए अधिसूचना महत्वपूर्ण थी। सूत्रों ने कहा कि अन्य भाजपा शासित राज्यों द्वारा भी इसी तरह की अधिसूचनाएं पारित किए जाने की उम्मीद है। विशेष रूप से, सीबीआई को अब निजी व्यक्तियों, सरकारी अधिकारियों या राज्य के भीतर किसी भी संस्था की जांच करने के लिए मध्य प्रदेश प्रशासन से लिखित मंजूरी की आवश्यकता है। दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम की धारा 6 के अनुसार, सीबीआई को अपने अधिकार क्षेत्र में जांच करने के लिए राज्य सरकार से सहमति लेना आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट भी दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन (डीएसपीई) अधिनियम, 1946 के अनेक प्रावधानों का जिक्र करते हुए कह चुका है कि स्थापना, शक्तियों का प्रयोग, अधिकार क्षेत्र का विस्तार, डीएसपीई का नियंत्रण, सब कुछ भारत सरकार के पास है। ऐसे में विपक्षी दल केंद्र सरकार पर सीबीआई का बदले की भावना से प्रयोग का आरोप लगाते रहे हैं।

इससे पहले पश्चिम बंगाल सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत केंद्र के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक मूल वाद दायर किया था। इसमें आरोप लगाया गया था कि सीबीआई प्राथमिकियां दर्ज कर रही है और जांच कर रही है, जबकि राज्य ने अपने अधिकार क्षेत्र में मामलों की जांच के लिए संघीय एजेंसी को दी गई सहमति वापस ले ली है। बंगाल सरकार ने 2018 में ही सीबीआई को जांच के लिए दी गई अनुमति वापस ले लिया था।

सीबीआई को जांच की अनुमति वापस लिए जाने की राज्यों की कार्यवाई पर पिछले साल दिसंबर में तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। केंद्र सरकार ने कहा था कि सीबीआई को अनुमति लेने की आवश्यकता होने से मामलों की जांच करने की उसकी शक्तियां गंभीर रूप से सीमित हो गई हैं। एक संसदीय पैनल ने कहा था कि एक कानून बनाने की आवश्यकता है ताकि एजेंसी राज्य के ‘हस्तक्षेप’ के बिना मामलों की जांच कर सके। बता दें कि सीएम मोहन यादव की सरकार ने सीधे-सीधे तो सीबीआई के क्षेत्राधिकार या मामले की जांच को रोकने की बात तो नहीं कही है लेकिन उसने लिखित सहमति का ‘ब्रेक’ जरूर लगा दिया है। इसके साथ ही बीजेपी शासित मध्य प्रदेश उन राज्यों की लंबी सूची में शामिल हो गया है, जिनमें ज्यादातर विपक्षी दलों द्वारा शासित हैं। साथ ही, पैनल ने यह भी माना कि सीबीआई के कामकाज में निष्पक्षता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है ताकि राज्य भेदभाव की शिकायत न करें।

क्या मोदी सरकार अब संघ की नाराजगी को कर रही है दूर?

वर्तमान में मोदी सरकार अब संघ की नाराजगी को दूर करती जा रही है! 1966 को दिल्ली अभी जगी भी नहीं थी कि बड़ी संख्या में साधु और संन्यासी संसद भवन के सामने जमा होने लगे थे। ज्यादातर लोगों को यह अंदाजा भी नहीं था कि आखिर क्या बात हो गई कि संसद के सामने हजारों की भीड़ जुट गई। शुरुआत में दिल्ली पुलिस भी नहीं समझ पाई कि आखिर ये माजरा क्या है? पुलिस ने भीड़ को हटाने के लिए आंसू गैस छोड़े, लाठियां भी भांजी, मगर भीड़ टस से मस नहीं हुई। संसद भवन गेट के सामने पुलिस और साधुओं का यह संघर्ष तब भड़क उठा, जब प्रदर्शनकारियों के फेंके पत्थरों से एक पुलिसवाले की मौत हो गई। दोपहर करीब 1:30 बजे तक माहौल पूरा गरमा गया और पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए गोलीबारी करनी शुरू कर दी। संसद के समक्ष जमा यह भीड़ गौ हत्या पर राष्ट्रीय कानून बनाने के लिए सरकार पर दबाव बना रही थी। इस प्रदर्शन को तब भारतीय जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का समर्थन हासिल था। 1966 में इसी आरएसएस को लेकर तब इंदिरा गांधी सरकार ने एक पाबंदी लगा दी थी। उन्होंने सरकारी कर्मचारियों को इसकी शाखाओं और कार्यक्रमों में जाने पर रोक लगा दी थी। आज 58 साल बाद मोदी सरकार ने यह रोक हटा दी है। इसके बाद से भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने हैं। नवंबर 1966 को तपस्वियों , नागा साधुओं की अगुवाई में हुए प्रदर्शनों में आधिकारिक रूप से 8 लोगों की मौत की बात बताई गई और सैकड़ों लोग घायल हो गए। हालांकि, कई दूसरे गैर सरकारी आंकड़ों में सैकड़ों लोगों के मारे जाने की बात कही गई। उस वक्त यह अनुमान लगाया गया कि प्रदर्शनों के दौरान वाहनों और दफ्तरों में तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाओं में कुल करीब 100 करोड़ रुपए की संपत्ति को नुकसान पहुंचा था। इन प्रदर्शनों के दौरान कांग्रेस के प्रमुख नेता के कामराज का घर और ऑल इंडिया रेडियो का दफ्तर भी निशाना24 जनवरी, 1966 को इंदिरा के प्रधानमंत्री बनने के बाद जेपी यानी समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण से उनके रिश्ते कई वर्षों तक बहुत मधुर बने रहे यह उनके बीच हुए पत्र व्यवहारों से भी पता चलता है। उन पत्रों में उनके रिश्तों की प्रगाढ़ता तो पता चलती ही है, एक दूसरे पर विश्वास भी झलकता है और देश के मुद्दों को लेकर चिंता भी। जेपी उन्हें सलाह देने से गुरेज नहीं करते थे। मसलन, गोवध पर प्रतिबंध के मुद्दे पर दोनों के बीच हुए पत्र व्यवहार में इसकी झलक दिखती है। इंदिरा के प्रधानमंत्री बनने के कुछ महीने बाद गोवध पर प्रतिबंध को लेकर चल रहे आंदोलन को लेकर जेपी ने उन्हें 21 सितंबर, 1966 को एक पत्र लिखा और आग्रह किया:

‘मैं आपका ध्यान एक अत्यंत गंभीर होती स्थिति की ओर दिलाने के लिए लिख रहा हूं। आप गोवध पर प्रतिबंध को लेकर लंबे समय से चल रहे आंदोलन के बारे में जानती हैं। संसद के पिछले सत्र में भी यह मुद्दा उठा था। मुझे पता चला है कि जगतगुरु शंकराचार्यों जैसे शीर्ष हिंदू नेताओं ने इस वर्ष 20 नवंबर से आमरण अनशन करने का फैसला किया है। मैं समझ सकता हूं कि इस हताशापूर्ण कदम पर पूरी गंभीरता से विचार किया गया है। आप कल्पना कर सकती हैं कि इसके क्या गंभीर परिणाम हो सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में यह एक सामान्य बात हो गई है कि सरकार तब तक कोई कार्रवाई नहीं करती, जब तक कि स्थिति गंभीर न हो जाए। ….नतीजतन अक्सर सरकार को दबाव में कुछ ऐसे अस्वस्थकर कदम उठाने पड़ते हैं, जिनसे लोगों की नजर में सरकार की छवि नीचे गिरती है।…मैं समझ नहीं पाता कि हिंदू बहुल भारत जैसे देश में जहां गोवध को लेकर सही हो या गलत तीव्र भावनाएं हैं, वहां कानूनी प्रतिबंध क्यों नहीं लग सकता।

जेपी के इस पत्र का इंदिरा ने 13 अक्टूबर, 1966 को जवाब दिया। छोटे से पत्र में इंदिरा ने देर से जवाब देने के लिए अफसोस जताया और लिखा, ‘सरकार इस समस्या के सारे पहलुओं पर विचार कर रही है।’ इंदिरा ने इस पत्र का समापन इस तरह किया, ‘मुझे यह जानकार दुख हुआ कि हाल ही में आप इफ्लुएंजा से पीड़ित थे। उम्मीद है आप पूरी तरह स्वस्थ होंगे।’

दरअसल, 7 नवंबर की सुबह भारतीय जनसंघ, हिंदू महासभा और आर्य समाज के समर्थन प्राप्त राख से सने, त्रिशूलधारी अघोरी नगा साधु संसद भवन के सामने जमा हो गए। फ्रांसीसी पॉलिटिकल साइंटिस्ट क्रिस्टोफ जैफरलॉट ने इसे आजादी के बाद का सबसे लोकप्रिय जन आंदोलन बताया। द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार उस दिन माहौल ‘सामान्य और करीब-करीब उत्सव जैसा था, जिसमें गायों की अहमियत बताई जा रही थी। पहले वक्ता स्वामी करपात्री जी महाराज थे। हालांकि, जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने करपात्री जी को आंदोलन को वापस लेने की अपील की थी, मगर भीड़ स्वामी रामेश्वरानंद की जय कहते हुए उग्र हो उठी थी। ये भारतीय जनसंघ के करनाल से चुने गए सांसद थे, जिन्होंने भीड़ से संसद में जबरन घुसने और सबक सिखाने की अपील की थी। इसी के बाद पुलिस और भीड़ में संघर्ष शुरू हो गया। बाद में इस आंदोलन में 500 तपस्वियों समेत 1500 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। लेखक सुदीप ठाकुर इतिहासकार रामचंद्र गुहा के हवाले से बताते हैं कि जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वामी से अपील की कि वह आंदोलन वापस ले लें, मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

गौरक्षा को लेकर पहला संगठित गौरक्षा आंदोलन सिख धर्म के कूकाओं द्वारा शुरू किया गया था। यह एक सुधारवादी समूह था, जिन्होंने 1800 के दशक के आखिर में ब्रिटिश राज के दौरान गायों की सुरक्षा के विचार को फैलाया। आर्य समाज ने इस भावना को राष्ट्रीय आंदोलन में बदलने में जबरदस्त भूमिका निभाई। इस संस्था ने बड़े पैमाने पर गौहत्या को अपराध घोषित करने की पैरवी की। देश में पहली गौरक्षिणी सभा (गौरक्षा परिषद) की स्थापना 1882 में पंजाब प्रांत में की गई थी।

4 जून को लोकसभा चुनाव के नतीजे आए। इन नतीजों में भाजपा 400 के पार के नारे को पूरा नहीं कर पाई। उसे बहुमत से 32 कम यानी महज 240 सीटें ही मिलीं। इसके कुछ दिन बाद 10 जून को नागपुर में संघ के एक कार्यक्रम आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि जो मर्यादा का पालन करते हुए कार्य करता है, गर्व करता है, मगर लिप्त नहीं होता, अहंकार नहीं करता, वही सही अर्थों मे सेवक कहलाने का अधिकारी है। भागवत ने मणिपुर के हालात का जिक्र करते हुए भी कहा था कि मणिपुर एक साल से शांति की राह देख रहा है। बीते 10 साल से राज्य में शांति थी, लेकिन अचानक से वहां गन कल्चर बढ़ गया। जरूरी है कि इस समस्या को प्राथमिकता से सुलझाया जाए। इसके बाद से यह अटकलें लग रही थीं कि भाजपा और उसके शीर्ष नेतृत्व की कार्यशैली से संघ काफी नाराज है।

क्या पश्चिम बंगाल सरकार हिंदुओं के साथ कर रही है भेदभाव?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पश्चिम बंगाल सरकार हिंदुओं के साथ भेदभाव कर रही है या नहीं! बांग्लादेश में स्टूडेंट मूवमेंट चल रहा है। इस कारण वहां अराजकता की स्थिति पैदा हो गई है। इस माहौल से भागकर बहुत से बांग्लादेशी भारत की ओर कूच कर रहे हैं। ऐसे में बांग्लादेश की सीमा से सटे प्रदेश पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बांग्लादेशियों को खुला निमंत्रण दे दिया है। उन्होंने कहा कि जो भी बांग्लादेशी संकट की इस घड़ी में उनके राज्य में आएगा, उनका स्वागत किया जाएगा। केंद्र सरकार में बैठी और प. बंगाल में मुख्य विपक्षी की भूमिका निभार रही बीजेपी ने ममता के इस बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। प्रदेश में बीजेपी के सह-प्रभारी अमित मालवीय ने कहा कि ममता बनर्जी राज्य और केंद्र के बीच कामकाज और दायित्वों के बंटवारे की सीमा का उल्लंघन कर रही हैं। उन्होंने ममता पर मुस्लिम तुष्टीकरण और हिंदू विरोध का भी आरोप लगाया है। सीएम ममता बनर्जी ने शहीद दिवस पर अपनी पार्टी की रैली में ये तो कहा कि बांग्लादेश में जो हो रहा है, वो उनका आंतिरक मामला है, लेकिन हम शरणार्थियों का स्वागत करेंगे। ममता ने अपने बयान में संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) के दिशानिर्देशों का भी हवाला दिया। ममता ने कहा, ‘यूएन गाइडलाइंस के मुताबिक बांग्लादेश में अपने घरों से निकाले गए उन सभी शरणार्थियों का हम स्वागत करेंगे जो हमारे राज्य में शरण लेना चाहते हैं।’ उन्होंने बंगाल के लोगों से किसी उकसावे में नहीं आने की अपील की है।

पश्चिम बंगाल सरकार की मुखिया की तरफ से आया बयान निश्चित रूप से बांग्लादेशियों को भारत में शरण लेने को प्रोत्साहित करेगा। प. बंगाल की सीमा पर अवैध घुसपैठ के मामले रिपोर्ट होते रहते हैं। अगर बांग्लादेशी अवैध तरीके से जान पर खेलकर भारत आने की फिराक में रहते हैं तो सरकार की तरफ से स्वागित किए जाने की खबर पाकर तो उनमें शरणार्थी बनने की होड़ मच सकती है। दूसरी तरफ, घुसपैठ कर आ चुके बांग्लादेशियों को शरणार्थी बताकर वैधता दी जाने की भी आशंका है। संभवतः इसी आशंका में बीजेपी ने ममता बनर्जी के बयान की आलोचना की है।

पश्चिम बंगाल के बीजेपी सह-प्रभारी और पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अमित मालवीय ने ममता के बयान को एक अवैध घुसपैठियों को प. बंगाल, झारखंड और दूसरे पड़ोसी राज्यों में सेटल करने की कुत्सित योजना है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म एक्स पर लिखा, ‘ममता बनर्जी एक दिन कहती हैं कि हिंदू शरणार्थियों को हम आने की अनुमति नहीं देंगे। हिंदू शरणार्थी तो धार्मिक प्रताड़ना झेलकर सीएए के अंदर अवैध तरीके से भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करना चाहते हैं। लेकिन ममता कहती हैं कि अगर वो दबाव बनाएंगे तो हम अवैध रोहिंग्याओं को ट्रेनें जलाने, सड़कें जाम करने और लोगों की हत्या करने को कहेंगे क्योंकि रोहिंग्या टीएमसी को वोट करते हैं। दूसरी तरफ ममता कहती हैं कि बांग्लादेशियों का भारत में स्वागत है।’

मालवीय ने ममता से पूछा कि आखिर उन्हें विदेशियों को न्योता देने का अधिकार किसने दिया? उन्होंने लिखा, ‘शरणार्थियों और नागरिकता का मामला सिर्फ और सिर्फ केंद्र सरकार के अधीन है। बता दें कि सीएम ममता बनर्जी ने शहीद दिवस पर अपनी पार्टी की रैली में ये तो कहा कि बांग्लादेश में जो हो रहा है, वो उनका आंतिरक मामला है, लेकिन हम शरणार्थियों का स्वागत करेंगे। ममता ने अपने बयान में संयुक्त राष्ट्र संघ के दिशानिर्देशों का भी हवाला दिया। इस मामले में राज्य सरकारों का कोई हक नहीं बनता है। यह विपक्षी इंडी अलायंस की दुर्भवानपूर्ण योजना है कि अवैध बांग्लादेशियों को बंगाल से झारखंड में बसाया जाए ताकि वो चुनावों में जीत दर्ज कर सकें।’ यही नहीं पश्चिम बंगाल में बढ़ती मुस्लिम आबादी को लेकर बेगूसराय के सांसद गिरिराज सिंह ने ममता बनर्जी सरकार पर हमला बोला है. बीजेपी नेता गिरिराज सिंह ने डायरेक्ट एक्शन डे की याद दिलाते हुए बंगाल के लोगों को हिंदुओं को संगठित होने को कहा है. उन्होंने कहा कि आज पश्चिम बंगाल में हिंदू अपने अस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़ रहे हैं.

इससे पहले बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने दावा करते हुए कहा था कि झारखंड के संथाल परगना, बिहार और पश्चिम बंगाल के कुछ क्षेत्रों में अवैध रूप से बांग्लादेशी घुसपैठियों के कारण मुस्लिम आबादी बढ़ रही है, जिस वजह से हिंदुओं के गांव के गांव खाली हो रहे हैं. सोशल मीडिया पर उन्होंने लिखा, ‘जिन्ना के अनुयायी सोहराबर्दी ने 1946 में ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ पर बंगाल में लगभग 30,000 हिंदुओं का नरसंहार किया था. गोपाल पाठा ने हिंदुओं को संगठित किया और नरसंहार को रोकने की कोशिश की. अगर आज बंगाल में गोपाल पाठा जैसे लोग नहीं खड़े होंगे तो हिंदुओं को पश्चिम बंगाल खाली करना पड़ेगा. आज पश्चिम बंगाल में हिंदू अपने अस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़ रहे हैं.

क्या अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में आएगा नया मोड़?

आने वाले समय में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में नया मोड़ आ सकता है! अमेरिका में पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप पर हुए जानलेवा हमले के बाद चुनाव के इतने करीब डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार और राष्ट्रपति जो बाइडेन रेस से पीछे हट गए। ट्रंप और बाइडेन के बीच प्रेसिडेंशियल डिबेट के बाद से ही कई अटकलों ने जोर पकड़ा था। हमले के बाद ट्रंप की बढ़ी रेटिंग्स ने इस बात का अहसास दिलवा ही दिया था। अपनी दावेदारी वापस लेने के बाद बाइडेन ने हैरिस का नाम भी आगे कर दिया, हालांकि हैरिस के लिए राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी इतनी आसान भी नहीं, इसमें कई तरह के टेक्निकल पेच हैं। बाइडेन का विकल्प कौन होगा ? इस पर औपचारिक मुहर अगस्त मध्य में डेमोक्रेटिक पार्टी के नेशनल कन्वेंशन लगेगी, जब पार्टी डेलीगेट्स उम्मीदवार के औपचारिक तौर पर वोट करेंगे, बाइडेन की घोषणा के बाद जिस तरह के रिएक्शन पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और डेमोक्रेटिक नेशनल कमेटी के चेयरपर्सन जेमी हैरीसन की ओर से सामने आए, उससे ये साफ है कि कमला हैरिस के पास भले ही राष्ट्रपति बाइडेन का समर्थन हो, लेकिन फिलहाल पार्टी के बड़े नेता मोटे तौर पर इस तरह के समर्थन के कम से कम संकेत तो देना नहीं चाहते। डेमोक्रेटिक पार्टी की रूल बुक कहती है कि डेलिगेट उन लोगों के सेंटिमेंट को सामने रखना चाहेंगे, जिन्होंने उन्हें चुना है। बता दें कि बाइडेन के पास ज्यादातर प्राइमरी डेलीगेट्स का समर्थन हासिल है।

हालांकि तकनीकी तौर डेलीगेट्सअपना उम्मीदवार चुनने के लिए आजाद हैं। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार अमिताभ सिंह कहते हैं कि अभी भी टेक्निकली डेमोक्रेटिक पार्टी से उम्मीदवार बाइडेन ही हैं। बाइडेन को पहले उम्मीदवारी से औपचारिक तौर पर मुक्त होना है, उसके बाद ही दूसरे उम्मीदवारों पर बात हो सकती है। दरअसल 1967 से पहले ये होता था कि जो पार्टी के शीर्ष नेताओं का प्रभाव बहुत ज्यादा होता था, लेकिन अब रूल बुक में बहुत सारी चीजें लिखित हैं,जिन्हें दिशानिर्देशों की तरह लिया जा है। अभी भी चार हजार प्राइमरी से जो ड्मोक्रेट चुन के आते हैं, वोट करते हैं कि कौन अध्यक्ष चुना जाएगा, ऐसे में वो विकल्प अभी खुला हुआ है और ये साफ है कि औपचारिक तौर पर बतौर उम्मीदवार रिलीज होने पर डेलीगेट्स अपना फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हैं कि वो कमला हैरिस को चुनें, या फिर किसी और उम्मीदवार को।

अगर बाइडेन की पार्टी के किसी नेता को लगता है कि वो कमला हैरिस से बेहतर साबित हो सकते हैं, और हैरिस ट्रंप के खिलाफ दूसरे संभावित उम्मीदवारों के मुकाबले में कमजोर हो सकती हैं तो ऐसे में उन्हें 600 डेलिगेट्स के सिग्नेचर हासिल करने होंगे। इसके बाद वो बतौर उम्मीदवार नामित हो जाएंगे, जिसके बाद उनका मुकाबला कमला हैरिस से करना होगा। यानी किसी भी उम्मीदवार को डेमोक्रेटिक पार्टी के करीब 3900 प्राइमरी डेलीगेट्स के बहुमत को अपने पक्ष में लेना होगा। ऐसे में अगर कई डेलीगेट्स को नामांकन मिलता है, और किसी को बहुमत नहीं मिलता है, तो ऐसे में ‘ब्रोकर्ड कन्वेंशन’ आयोजित होगा। जिसमें डेलीगेट्स कई राउडंस में वोट कर सकते हैं जिससे कि एक उम्मीदवार चुना जा जा सके।

ध्यान देने वाली बात ये भी है कि मध्यस्थता वाला यानि ब्रोकर्ड कन्वेंशन पिछली बार 1952 में हुआ था जब इलिनियोस के गवर्नर एडेल स्टीवनसन ने बार बार ये कहा था कि वो चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं, लेकिन कन्वेंशन में एक जोरदार भाषण दिया। पहले राउंड में किसी एक विजेता के सामने ना आने पर इसके बाद डी आइजनहावर ने ना सिर्फ नामांकन हासिल किया था बल्कि स्टीवनसन को हरा भी दिया था। एक ऐसे विकल्प की संभावना सामने जताई जा रही है कि प्री कन्वेंशन वर्चुअल वोट भी हो सकता है, क्योंकि राष्ट्रपति के पास कैंपेनिंग के लिए वक्त कम ही बचा है।

31 मई को दाखिल हुए कागजों के मुताबिक बाइडेन हैरिस कैंपेन से अब तक पार्टी के पास 91 मिलियन डॉलर इकट्ठा हो चुके हैं। जानकार कहते हैं कि क्योंकि डोनर्स ने ये धन तकनीकी तौर पर बाइडेन और हैरिस के साझा कैंपेन के लिए दिया था, ऐसे में बाइडेन के उम्मीदवारी वापस लेने के बाद मसला इस फंड को डोनर्स को वापस करने को लेकर भी है। अब जबकि चुनाव में 100 से कुछ ज्यादा दिन ही बचे हैं,ऐसे में अगर कोई और हैरिस की जगह बतौर उम्मीदवार होता है तो उस पर जीरो बैलेंस के साथ कैंपने का खतरा भी मंडरा रहा है। यही वजह है कि हैरिस ने अभी से अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल पर डोनर्स से फंड देने की मुहिम शुरू कर दी है। हालांकि हैरिस की उम्मीदवारी के पक्ष में ये बात है कि क्योंकि फंड का अकाउंट वहां के चुनाव आयोग में राष्ट्पति बाइडेन के साथ साथ साथ हैरिस के नाम पर भी है, ऐसे में अगर कोई दूसरा उम्मीदवार आता है तो उसे फंड रेजिंग शुरुआत से करनी होगी।

संविधान हत्या दिवस पर क्या बोले संजय रावत?

हाल ही में संजय रावत ने संविधान हत्या दिवस पर अपना बयान दिया है! केंद्र सरकार ने 25 जून को संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। 1975 में कांग्रेस पार्टी के लगाए गए इस आपातकाल का बचाव शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने किया है। उन्होंने बीजेपी पर निशाना साधा और कहा कि अगर अटल बिहारी वाजपेयी ऐसी ही स्थिति में प्रधानमंत्री होते, तो वह भी भारत में इमरजेंसी लगाते। उन्होंने कहा कि शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस ने आपातकाल का खुलकर समर्थन किया था। संजय राउत ने कहा कि आपातकाल इसलिए लगाया गया था क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला था। भारत सरकार ने शुक्रवार को घोषणा की कि 25 जून को 1975 में इंदिरा गांधी सरकार घोषित आपातकाल की याद में हर साल संविधान हत्या दिवस के रूप में याद किया जाएगा। उनके पास काम नहीं है इसलिए वे देश के लोगों को भटका रहे हैं। उनका दिमाग ठिकाने नहीं है।’ पीएम मोदी को निशाने पर लेते हुए संजय राउत ने कहा, ‘अगर हम आपातकाल की बात करें तो पिछले 10 वर्षों में मोदी सरकार का हर दिन संविधान की हत्या के लिए चिह्नित किया जाएगा।’संजय राउत ने कहा, ‘उनके पास (बीजेपी) कोई काम नहीं बचा है।’

संजय राउत ने कहा, ’50 साल हो गए हैं और लोग आपातकाल को भूल चुके हैं। इस देश में आपातकाल क्यों लगाया गया था? कुछ लोग देश में अराजकता फैलाना चाहते हैं। रामलीला मैदान से खुला ऐलान किया गया, हमारे जवानों और सेना को कहा गया कि सरकार के आदेश का पालन न करें। तो ऐसी स्थिति में अगर अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री होते तो वे भी आपातकाल लगा देते।’

उद्धव ठाकरे की शिवसेना नेता ने कहा, ‘यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला था, कुछ लोग देश में बम बना रहे थे और जगह-जगह बम फोड़ रहे थे। मैं आपको बताना चाहता हूं कि अमित शाह को आपातकाल के बारे में कुछ नहीं पता है। नकली शिवसेना (शिंदे) के साथ बाला साहब ठाकरे की तारीफ करने वालों ने आपातकाल का समर्थन किया है। बाला साहब ठाकरे ने उस समय आपातकाल का खुलकर समर्थन किया था। आरएसएस ने भी इसका समर्थन किया था।’

संजय राउत ने कहा, ‘शिवसेना नेता बाला साहब ठाकरे ने 1975 में आपातकाल का खुलकर समर्थन किया था। उन्होंने इंदिरा गांधी का खुलकर समर्थन किया था। मुंबई में उनका स्वागत किया गया था। उन्होंने आपातकाल का समर्थन किया क्योंकि उन्हें लगा कि देश में अराजकता को नियंत्रित करने की जरूरत है। इसमें क्या गलत था?…बीजेपी के 10 साल के शासन में जो हुआ उसे याद रखा जाएगा। वे संविधान के रक्षक भी नहीं हैं।’राउत ने आगे कहा,’यह सब होने के बाद देश में जनता पार्टी की सरकार सत्ता में आई। अटल बिहारी वाजपेई पीएम बने, उन्हें नहीं लगा कि संविधान की हत्या हुई है। लेकिन वे (बीजेपी) कौन हैं? उनके पास काम नहीं है इसलिए वे देश के लोगों को भटका रहे हैं। उनका दिमाग ठिकाने नहीं है।’ पीएम मोदी को निशाने पर लेते हुए संजय राउत ने कहा, ‘अगर हम आपातकाल की बात करें तो पिछले 10 वर्षों में मोदी सरकार का हर दिन संविधान की हत्या के लिए चिह्नित किया जाएगा।’

इससे पहले 26 जून को लोकसभा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लगाए गए आपातकाल की निंदा करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया था। अध्यक्ष ओम बिरला ने इस कृत्य की निंदा करते हुए प्रस्ताव पढ़ा और कहा कि 25 जून 1975 को भारत के इतिहास में हमेशा एक काले अध्याय के रूप में जाना जाएगा। बता दें कि शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस ने आपातकाल का खुलकर समर्थन किया था। संजय राउत ने कहा कि आपातकाल इसलिए लगाया गया था क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला था। भारत सरकार ने शुक्रवार को घोषणा की कि 25 जून को 1975 में इंदिरा गांधी सरकार घोषित आपातकाल की याद में हर साल संविधान हत्या दिवस के रूप में याद किया जाएगा।उद्धव ठाकरे की शिवसेना नेता ने कहा, ‘यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला था, कुछ लोग देश में बम बना रहे थे और जगह-जगह बम फोड़ रहे थे। मैं आपको बताना चाहता हूं कि अमित शाह को आपातकाल के बारे में कुछ नहीं पता है। 1975 में लगाए गए आपातकाल के 50 साल पूरे होने के अवसर पर, बिरला ने उन सभी लोगों की ताकत और दृढ़ संकल्प की प्रशंसा की, जिन्होंने आपातकाल का कड़ा विरोध किया, लड़ाई लड़ी और भारत के लोकतंत्र की रक्षा की।

क्या अब आपातकाल को पाठ्यक्रम में किया जाएगा शामिल?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब आपातकाल को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा या नहीं! राज्यसभा में सोमवार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक सदस्य ने आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की बहाली के लिए हुए प्रयासों की तुलना स्वतंत्रता संग्राम में हुए संघर्ष से करते हुए इस कालखंड के इतिहास को स्कूल एवं कॉलेज के पाठ्यक्रमों में शामिल किए जाने की मांग उठाई। उच्च सदन में शून्यकाल के दौरान इस मुद्दे को उठाते हुए भाजपा के नरेश बंसल ने कहा कि आपातकाल को अगर सही तरीके से पाठ्य पुस्तकों में स्थान दिया जाए तो देश में लोकतांत्रिक शक्तियों का विकास होगा और प्रजातंत्र की जड़ें भी मजबूत होंगी। आपातकाल को भारत के लोकतंत्र का ‘काला अध्याय’ करार देते हुए उन्होंने कहा कि इसे कभी बुलाया नहीं जा सकता क्योंकि उस समय के ‘रक्षक ही भक्षक’ बन गए थे। उन्होंने कहा कि देश में 1975 में आपातकाल के दौरान की गई ज्यादतियों और इस दमन का विरोध करने वालों की ओर से की गई लड़ाई को समझाने वाला एक अध्याय स्कूल एवं कॉलेज के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।बंसल ने कहा कि सभी छात्रों के लिए पाठ्य पुस्तकों में एक पाठ होना चाहिए कि आपातकाल क्या था, इसे कैसे और क्यों लगाया गया। छात्रों को आपातकाल के बारे में जानना चाहिए। उन बलिदानियों के संघर्ष को वर्तमान और भावी पीढ़ी जान सके, इसलिए आपातकाल की संपूर्ण कथा बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल की जानी चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि आपातकाल को अगर सही तरीके से पाठ्य पुस्तकों में स्थान दिया जाए तो लोकतांत्रिक शक्तियों का विकास होगा और प्रजातंत्र की जड़ें मजबूत होंगी।

बंसल ने कहा कि भावी पीढ़ी को इस ‘काले अध्याय’ से परिचित कराने के लिए स्वतंत्रता संग्राम की तरह लोकतंत्र बहाली के संघर्ष के इतिहास को भी स्कूल एवं कॉलेज पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आपातकाल लगाकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत के संविधान का गला घोंट दिया था और देश के लोकतंत्र पर कलंक लगाया था। आपातकाल में नागरिक स्वतंत्रता का हनन, सहमति का दमन और लोकतांत्रिक सिद्धांतों को कुचला गया था। इसके साथ ही हजारों लोगों को बिना कारण के जेलों में ठूंस दिया गया। देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए अनेक लोगों ने बलिदान दिया।उन्होंने कहा कि आपातकाल का वह समय लोकतांत्रिक सेनानियों के लिए एक दुस्वप्न है जिसे याद कर आज भी उनकी आंखें नम हो जाती है।

उन्होंने कहा कि मौजूदा विपक्ष के ज्यादातर नेता भी आपातकाल के दौरान की गई ज्यादतियों के शिकार हुए थे। ज्ञातव्य है कि देश में 25 जून 1975 को आपातकाल लगाया गया था। यह 21 मार्च 1977 यानी 21 महीने तक लागू रहा। हाल ही में केंद्र सरकार ने 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाए जाने की घोषणा की है। यही नहीं राज्यसभा सदस्य बंसल ने कहा कि वर्ष 1975 में देश पर थोपा गया आपातकाल लोकतंत्र के माथे पर काला दाग है। 21 माह तक चले आपातकाल के दौरान नागरिक स्वतंत्रता का हनन, असहमति का दमन और लोकतांत्रिक सिद्धांतों का हनन हुआ था। हजारों लोग बिना कारण जेलों में ठूंस दिए गए। तब लोकतंत्र बचाने को हजारों लोग बलिदान हुए।उन्होंने कहा कि केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने लोकतंत्र के साथ जब जो विश्वासघात किया, उसे कभी माफ नहीं किया जा सकता। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि आपातकाल के दौरान की गई ज्यादतियों और दमन का विरोध करने वालों की ओर से की गई लड़ाई को समझाने वाला एक अध्याय स्कूल-कालेजों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।

आपातकाल को भारत के लोकतंत्र का काला अध्याय करार देते हुए उन्होंने कहा कि इसे कभी बुलाया नहीं जा सकता क्योंकि उस समय के रक्षक ही भक्षक बन गए थे. उन्होंने ये भी कहा कि देश में 1975 में आपातकाल के दौरान की गई ज्यादतियों और इस दमन का विरोध करने वालों की ओर से की गई लड़ाई को समझाने वाला एक अध्याय स्कूल एवं कॉलेज के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए. भावी पीढ़ी को इस काले अध्याय से परिचित कराने के लिए स्वतंत्रता संग्राम की तरह लोकतंत्र बहाली के संघर्ष के इतिहास को भी स्कूल एवं कॉलेज पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए.उन्होंने कहा कि आपातकाल लगाकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत के संविधान का गला घोंट दिया था और देश के लोकतंत्र पर कलंक लगाया था. आपातकाल में नागरिक स्वतंत्रता का हनन, सहमति का दमन और लोकतांत्रिक सिद्धांतों को कुचला गया था. इसके साथ ही हजारों लोगों को बिना कारण के जेलों में ठूंस दिया गया. देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए अनेक लोगों ने बलिदान दिया.

बजट सत्र से पहले संसद में क्या हुआ था?

आज हम आपको बताएंगे कि बजट सत्र से पहले संसद में क्या-क्या हुआ था! संसद के आगामी बजट सत्र की तैयारियों के लिए सरकार ने रविवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में सर्वदलीय बैठक बुलाई। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ बैठक आयोजित की। इसमें सत्र के दौरान उठाए जाने वाले मुद्दों पर चर्चा की गई। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने ट्वीट किया कि बैठक के दौरान जेडी(यू) नेताओं ने बिहार के लिए विशेष श्रेणी का दर्जा मांगा, जबकि वाईएसआरसीपी ने आंध्र प्रदेश के लिए भी यही मांग की। गौरतलब है कि टीडीपी नेता इस मुद्दे पर चुप रहे। जयराम रमेश ने ट्वीट किया, कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में आज हुई सर्वदलीय बैठक में जेडी(यू) नेता ने बिहार के लिए विशेष श्रेणी का दर्जा मांगा। लोकसभा और राज्यसभा दोनों में इसे बाधित किया गया था, राजनाथ सिंह जी ने आज अपील की है कि यह संसदीय लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। बता दें कि सरकार छह विधेयक पेश कर सकती है। इसमें 90 साल पुराने विमान अधिनियम को बदलने का प्रस्ताव भी शामिल है। केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर के लिए बजट के लिए संसद की मंजूरी भी मांगेगी, जो वर्तमान में संघीय शासन के अधीन है। उन्होंने कहा कि जब पीएम बोल रहे हों, तो सदन और देश को इसे सुनना चाहिए।वाईएसआरसीपी नेता ने आंध्र प्रदेश के लिए विशेष श्रेणी का दर्जा मांगा। हैरानी की बात है कि टीडीपी नेता इस मामले पर चुप रहे।

रमेश के अनुसार, सर्वदलीय बैठक में 24 विभाग-संबंधित स्थायी समितियों के गठन तथा उन पर समुचित ध्यान दिए जाने के लिए सर्वसम्मति से समर्थन किया गया।हाल ही में लोकसभा में उपनेता नियुक्त किए गए कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा में गड़बड़ी, ईडी और सीबीआई जैसी केंद्रीय एजेंसियों के कथित दुरुपयोग के बारे में चिंता जताई। उन्होंने डिप्टी स्पीकर के पद की मांग दोहराई। समाजवादी पार्टी के सांसद राम गोपाल यादव ने उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा के दौरान खाद्य पदार्थों की दुकानों पर नाम-प्लेट लगाने के उत्तर प्रदेश सरकार के हालिया निर्देश पर प्रकाश डाला।

 संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने चर्चा को बेहद रचनात्मक बताया। उन्होंने भाग लेने वाले सभी दलों के फ्लोर नेताओं का आभार व्यक्त किया। किरेन रिजिजू ने कहा कि हमारी चर्चा बहुत उपयोगी रही। मैं सभी दलों के फ्लोर नेताओं को धन्यवाद देना चाहता हूं, जिन्होंने अच्छे सुझाव दिए हैं। बैठक में भाजपा सहित 44 दलों ने हिस्सा लिया। हमने सभी फ्लोर नेताओं से सुझाव लिए हैं। संसद को सुचारू रूप से चलाना, सरकार और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपील की कि हम लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। जब कोई सदस्य संसद में बोलता है, तो हमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और न ही बीच में बोलना चाहिए। विशेष सत्र में, जब पीएम मोदी राष्ट्रपति के धन्यवाद प्रस्ताव पर भाषण दे रहे थे, तो लोकसभा और राज्यसभा दोनों में इसे बाधित किया गया था, राजनाथ सिंह जी ने आज अपील की है कि यह संसदीय लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। उन्होंने कहा कि जब पीएम बोल रहे हों, तो सदन और देश को इसे सुनना चाहिए।

संसद का बजट सत्र सोमवार, 22 जुलाई से शुरू होने वाला है। इसमें 12 अगस्त तक 19 बैठकें होंगी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण मंगलवार को केंद्रीय बजट पेश करेंगी, जबकि सोमवार को संसद में आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया जाएगा। बता दें कि जयराम रमेश ने ट्वीट किया, कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में आज हुई सर्वदलीय बैठक में जेडीयू नेता ने बिहार के लिए विशेष श्रेणी का दर्जा मांगा। वाईएसआरसीपी नेता ने आंध्र प्रदेश के लिए विशेष श्रेणी का दर्जा मांगा। हैरानी की बात है कि टीडीपी नेता इस मामले पर चुप रहे। यही नहीं सर्वदलीय बैठक में 24 विभाग-संबंधित स्थायी समितियों के गठन तथा उन पर समुचित ध्यान दिए जाने के लिए सर्वसम्मति से समर्थन किया गया।

हाल ही में लोकसभा में उपनेता नियुक्त किए गए कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा में गड़बड़ी, ईडी और सीबीआई जैसी केंद्रीय एजेंसियों के कथित दुरुपयोग के बारे में चिंता जताई। इस दौरान सरकार छह विधेयक पेश कर सकती है। इसमें 90 साल पुराने विमान अधिनियम को बदलने का प्रस्ताव भी शामिल है। केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर के लिए बजट के लिए संसद की मंजूरी भी मांगेगी, जो वर्तमान में संघीय शासन के अधीन है।

क्या नेपाल के नए प्रधानमंत्री के कारण भारत की बढ़ेगी टेंशन?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या नेपाल के नए प्रधानमंत्री के कारण भारत की टेंशन बढ़ेगी या नहीं! नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल ‘प्रचंड’ शुक्रवार को संसद में विश्वासमत हासिल नहीं कर पाए। पिछले सप्ताह उनकी सरकार से कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल-यूनिफाइड मार्क्सवादी लेनिनवादी (सीपीएन-यूएमएल) ने अपना समर्थन वापस ले लिया था। इस घटनाक्रम के बाद पूर्व प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली के नेतृत्व में नयी सरकार के गठन का मार्ग प्रशस्त हो गया है। देश की 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में 69 वर्षीय प्रचंड को 63 वोट मिले, जबकि विश्वासमत प्रस्ताव के विरोध में 194 वोट पड़े। विश्वासमत हासिल करने के लिए कम से कम 138 वोट की जरूरत थी। प्रतिनिधि सभा के 258 सदस्यों ने मतदान में भाग लिया, जबकि एक सदस्य अनुपस्थित रहा। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी-माओइस्ट सेंटर (सीपीएन-एमसी) के अध्यक्ष प्रचंड 25 दिसंबर, 2022 को पद संभालने के बाद चार बार विश्वासमत हासिल करने में सफल रहे, लेकिन इस बार उन्हें असफलता मिली। प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष देव राज घिमिरे ने प्रचंड के विश्वासमत प्रस्ताव को संविधान के अनुच्छेद 100 खंड 2 के अनुसार मतदान के लिए रखा। मतदान पूरा होने के बाद उन्होंने घोषणा की कि प्रधानमंत्री प्रचंड विश्वासमत हासिल करने में असफल रहे।

अध्यक्ष घिमिरे अब राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल को सूचित करेंगे, जो संविधान के अनुच्छेद 76 खंड 2 के अनुसार दो या दो से अधिक राजनीतिक दलों को नयी सरकार के लिए दावा पेश करने के लिए आमंत्रित करेंगे। इससे नेपाली कांग्रेस और सीपीएन-यूएमएल के लिए नयी गठबंधन सरकार बनाने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। पूर्व प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली के नेतृत्व वाली सीपीएन-यूएमएल ने सदन में सबसे बड़ी पार्टी नेपाली कांग्रेस के साथ सत्ता-साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद पिछले सप्ताह प्रचंड के नेतृत्व वाली सरकार से समर्थन वापस ले लिया था।

नेपाली कांग्रेस के पास प्रतिनिधि सभा में 89 सीट हैं, जबकि सीपीएन-यूएमएल के पास 78 सीट हैं। इस तरह दोनों की संयुक्त संख्या 167 है, जो निचले सदन में बहुमत के लिए आवश्यक 138 से कहीं अधिक है। नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा पहले ही अगले प्रधानमंत्री के रूप में ओली का समर्थन कर चुके हैं। देउबा और ओली ने प्रचंड के नेतृत्व वाली सरकार को अपदस्थ करने और नयी गठबंधन सरकार बनाने के लिए सोमवार को सात सूत्री समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।

समझौते के अनुसार, ओली और देउबा प्रतिनिधि सभा की शेष अवधि के दौरान बारी-बारी से प्रधानमंत्री पद साझा करेंगे। पहले चरण में ओली डेढ़ साल के लिए प्रधानमंत्री बनेंगे और उसके बाद बाकी अवधि के लिए देउबा प्रधानमंत्री रहेंगे। प्रचंड की पार्टी के पास प्रतिनिधि सभा में 32 सीट हैं। वह सीपीएन-यूएमएल के समर्थन से 25 दिसंबर 2022 को तीसरी बार प्रधानमंत्री निर्वाचित हुए थे। प्रचंड को नेपाल के संविधान के अनुच्छेद 76 खंड 2 के अनुसार प्रधानमंत्री चुना गया था, जिसमें दो या दो से अधिक दलों के समर्थन से प्रधानमंत्री चुनने का प्रावधान है। बता दें कि ओली के पिछले कार्यकाल में भारत-नेपाल सीमा विवाद चरम पर था। उनकी सरकार ने नेपाल का नया राजनीतिक नक्शा प्रकाशित किया था, जिसमें भारत के कालापानी, लिंपियाधुरा, लिपुलेख जैसे कई इलाकों को नेपाल का हिस्‍सा बताया गया था। ओली ने कई सार्वजनिक भाषणों में भारत से जमीन का वह हिस्सा वापस लेने का दंभ भी भरा था। उन्होंने यहां तक कहा था कि नेपान उन हिस्सों को वापस लेने में सक्षम है। तब भारत ने नेपाल के इस नक्शे पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी। शुक्रवार दोपहर प्रतिनिधि सभा का सत्र शुरू होते ही प्रचंड ने साझा सिद्धांतों के बजाय ‘‘डर के चलते’’ गठबंधन बनाने को लेकर नेपाली कांग्रेस और सीपीएन-यूएमएल की तीखी आलोचना की तथा उन पर देश को पीछे की ओर धकेलने का आरोप लगाया।

यही नहीं ओली ने अपने गठबंधन सहयोगी नेपाली कांग्रेस के साथ नयी गठबंधन सरकार में शामिल किए जाने वाले मंत्रियों की सूची तैयार करने को लेकर शनिवार को विचार विमर्श किया। नेपाली कांग्रेस और यूएमएल के करीबी सूत्रों ने बताया, ‘‘राष्ट्रपति सोमवार सुबह नए प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल के अन्य सदस्यों को शपथ दिला सकते हैं। ओली के एक करीबी सूत्र ने बताया कि कुल 21 मंत्रालयों में से नेपाली कांग्रेस को नौ मंत्रालय और सीपीएन-यूएमएल को आठ मंत्रालय मिलेंगे, साथ ही प्रधानमंत्री का पद भी मिलेगा। सूत्र ने बताया, ‘‘गृह, विदेश, वित्त और ऊर्जा जैसे प्रमुख पदों को एनसी और यूएमएल के बीच बांटा जाएगा। नेपाली कांग्रेस को गृह मंत्रालय मिलने की संभावना है, जबकि वित्त मंत्रालय यूएमएल को मिलेगा।’