Monday, January 12, 2026
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आखिर कैसी चल रही है भारत न्याय यात्रा की तैयारी?

आज हम आपको भारत न्याय यात्रा की तैयारी के बारे में जानकारी देने वाले हैं! कांग्रेस की ओर से आगामी 14 जनवरी से शुरू की जा रही भारत यात्रा मूल रूप से संविधान बचाने के लिए होगी, यह कहना था कांग्रेस के एक अहम पदाधिकारी का। पूरी यात्रा में कांग्रेस का जोर संविधान बचाने पर होगा। कांग्रेस के एक अहम सूत्र का कहना था कि हाल ही में पता चला है कि बीजेपी 2024 के बाद देश में संविधान में बड़ा बदलाव करने की योजना बना रही है। पार्टी की एक अहम मीटिंग में पीएम मोदी ने ऐसे संकेत भी दिए हैं। बीजेपी की इस मंशा के बाद यह जरूरी हो जाता है कि प्रमुख विपक्षी दल होने के नाते कांग्रेस संविधान और उसके मूल्यों को बचाने की कोशिश करे। कांग्रेस का मानना है कि संविधान की प्रस्तावना जिन चार स्तंभों न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता पर टिकी है, न्याय उसका पहला अंग है। इसलिए इस यात्रा को न्याय यात्रा नाम दिया गया है। कांग्रेस ने संकेत दिया कि यात्रा में कांग्रेस प्रमुखता से इस मुद्दे को उठाएगी। इसमें कांग्रेस सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक न्याय पर जोर देगी। यात्रा को लेकर आगामी 4 जनवरी को एक अहम मीटिंग बुलाई गई है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की अध्यक्षता में होने वाली इस मीटिंग में सभी राज्यों खासकर यात्रा से जुड़े 14 राज्यों के प्रभारी, प्रदेशाध्यक्ष व विधायक दल के नेताओं की मीटिंग होनी है, जिसमें यात्रा के रूट को अंतिम रूप दिया जाएगा। पार्टी के एक सीनियर नेता का कहना था कि जिन जिन राज्यों से होकर यात्रा गुजरेगी, वहां-वहां मौजूद घटक दल के साथियों के इससे जुड़ने की उम्मीद है। कांग्रेस की ओर से इसे लेकर घटक दलों से संपर्क भी किया जाएगा। वहीं कांग्रेस इस यात्रा के लिए सिविल सोसाइटी से भी बात कर रही है।न्याय उसका पहला अंग है। इसलिए इस यात्रा को न्याय यात्रा नाम दिया गया है। कांग्रेस ने संकेत दिया कि यात्रा में कांग्रेस प्रमुखता से इस मुद्दे को उठाएगी।अहम सूत्र के मुताबिक, आगामी 8 जनवरी के रूट की जानकारी साझा करने के साथ ही लोगो व टैगलाइन भी जारी की जाएगी। जबकि 12 जनवरी को यात्रा का थीम सॉन्ग लॉन्च होगा, जो हिंदी व अंग्रेजी के अलावा क्षेत्रीय भाषाओं में भी होगा।

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि न्याय यात्रा के दौरान रोज एक बड़ी सभा होगी और हर दिन लगभग पांच से सात किमी पैदल यात्रा चलेगी। सभा और पैदल यात्रा शहरों व कस्बों में होगी। राहुल गांधी की अगुवाई में होनी वाली इस यात्रा में भारत जोड़ो यात्रा की तरह रोज राहुल गांधी समाज के अलग-अलग तबके से संवाद करेंगे। यह संवाद ज्यादा बस में होगा, जिसकी अवधि आधे घंटे से एक घंटा कुछ भी हो सकती है। 2024 के बाद देश में संविधान में बड़ा बदलाव करने की योजना बना रही है। पार्टी की एक अहम मीटिंग में पीएम मोदी ने ऐसे संकेत भी दिए हैं। बीजेपी की इस मंशा के बाद यह जरूरी हो जाता है कि प्रमुख विपक्षी दल होने के नाते कांग्रेस संविधान और उसके मूल्यों को बचाने की कोशिश करे।इस यात्रा के दौरान कांग्रेस को लोगों जो फीडबैक मिलेगा, उसका इस्तेमाल कांग्रेस आगामी चुनाव के पार्टी के मेनिफेस्टो के बनाने में किया जाएगा। वहीं दूसरी ओर इस यात्रा में इंडिया गठबंधन के घटक दल भी उसी तरह शामिल होंगे, जैसे भारत जोड़ो यात्रा के दौरान हुए थे।

पार्टी के एक सीनियर नेता का कहना था कि जिन जिन राज्यों से होकर यात्रा गुजरेगी, वहां-वहां मौजूद घटक दल के साथियों के इससे जुड़ने की उम्मीद है। कांग्रेस की ओर से इसे लेकर घटक दलों से संपर्क भी किया जाएगा। वहीं कांग्रेस इस यात्रा के लिए सिविल सोसाइटी से भी बात कर रही है।न्याय उसका पहला अंग है। इसलिए इस यात्रा को न्याय यात्रा नाम दिया गया है। कांग्रेस ने संकेत दिया कि यात्रा में कांग्रेस प्रमुखता से इस मुद्दे को उठाएगी। इसमें कांग्रेस सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक न्याय पर जोर देगी। यात्रा को लेकर आगामी 4 जनवरी को एक अहम मीटिंग बुलाई गई है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की अध्यक्षता में होने वाली इस मीटिंग में सभी राज्यों खासकर यात्रा से जुड़े 14 राज्यों के प्रभारी, प्रदेशाध्यक्ष व विधायक दल के नेताओं की मीटिंग होनी है, चूंकि इस बार यात्रा बस से होगी, इसलिए इस बार यात्रा में ब्रेक की संभावना कम है। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान हर छह से सात दिन बाद यात्रा एक दिन का रेस्ट करती थी। बताया जाता है कि यात्रा हाइटेक बसों के जरिए होगी। वहीं रहने के लिए कंटेनर का इस्तेमाल किया जाएगा।

क्या सैम पित्रोदा के बयान पर कांग्रेस ने किया है किनारा?

हाल ही में कांग्रेस पार्टी ने सैम पित्रोदा के बयान पर किनारा कर लिया है! अयोध्या में राम लला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह से पहले देश में सियासी दलों के बीच ‘महाभारत’ छिड़ी हुई है। ऐसा माना जा रहा है लोकसभा चुनाव से पहले प्रभु राम की घर वापसी कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों के लिए बड़ी टेंशन बन गया है। दरअसल पहले लोकसभा चुनावों तक कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल बीजेपी को ‘राम मंदिर बनाएंगे, पर तारीख नहीं बताएंगे’ का तंज मारा था। विपक्षी पार्टी राम मंदिर को बीजेपी का चुनावी एजेंडा बताते थे। लेकिन अब 2024 से पहले तस्वीर एकदम बदल गई है। बीजेपी की केंद्र सरकार ने मंदिर बनाकर खड़ा कर दिया है। ऐसे में माना जा रहा है कि देश का हिंदू वोटर आगामी लोकसभा चुनाव 2024 में बीजेपी को आशीर्वाद के तौर पर खुलकर वोट दे सकता है। उधर कांग्रेस की टेंशन बढ़ गई है, क्योंकि कांग्रेस के पास हिंदू वोटर्स को रिझाने का कोई बड़ा हथियार नहीं बचा है। इस बीच इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा की राम मंदिर को लेकर गई टिप्पणी से कांग्रेस बुरी तरह घिर गई है। दरअसल पित्रोदा ने तो राम मंदिर को असली मुद्दा मानने से ही मना कर दिया है। हालांकि पित्रोदा ने यह भी कहा कि अयोध्या में राम मंदिर को लेकर उनके बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है और उनका मानना है कि धर्म एक व्यक्तिगत मामला है जिसे राजनीति के साथ नहीं मिलाया जाना चाहिए। लेकिन बीजेपी ने इस बयान को लेकर कांग्रेस पर हमला बोलना शुरू कर दिया है। कांग्रेस ने भी मौके की नजाकत को देखते हुए पूरे मामले से किनारा करते हुए कहा है कि यह पार्टी का आधिकारिक बयान नहीं है, यह उनका व्यक्तिगत बयान है।’ कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने स्पष्ट किया कि एएनआई के साथ एक इंटरव्यू में व्यक्त किए गए पित्रोदा के विचार उनके अपने थे और इसका पार्टी से कोई लेना देना नहीं है।’

न्यूज एजेंसी एएनआई से बातचीत में सैम पित्रोदा ने पीएम नरेंद्र मोदी पर हमला करते हुए कहा था, ‘वह सिर्फ एक पार्टी के नहीं बल्कि सभी लोगों के प्रधानमंत्री हैं, यह संदेश भारत के लोग उनसे चाहते हैं। वह रोजगार, महंगाई, विज्ञान और तकनीक के साथ-साथ अन्य चुनौतियों के बारे में बात करें। यह जनता को तय करना है कि असली मुद्दे क्या हैं? क्या राम मंदिर असली मुद्दा है? या फिर बेरोजगारी असली मुद्दा है, क्या राम मंदिर असली मुद्दा है या फिर महंगाई असली मुद्दा है।’ उन्होंने कहा था, ‘मैं देख रहा हूं कि लोकतंत्र को कमजोर किया जा रहा है, मुझे संकेत मिल रहे हैं कि हम गलत दिशा में हैं और पूरा देश भगवान राम पर निर्भर हो गया है।’ हालांकि पित्रोदा ने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर को लेकर उनके बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर कांग्रेस हमेशा ही बीजेपी के निशाने पर रही है। बीजेपी का आरोप रहा है कि राम मंदिर निर्माण में कांग्रेस बाधा पहुंचाने की कोशिश करती रही है। बीजेपी कांग्रेस को हमेशा से हिंदू विरोधी पार्टी साबित करने की कोशिश करती है। ऐसे में अगर कांग्रेस सैम पित्रोदा के बयान का समर्थन करती है तो कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में भारी नुकसान हो सकता है। कांग्रेस राम मंदिर के मसले पर असमंजस की स्थिति में हैं। राजनीति जानकारों का कहना है कि अगर सोनिया गांधी या मल्लिकार्जुन खरगे प्राण प्रतिष्ठा समारोह में हिस्सा लेते हैं तो ये राजनीतिक रूप से बीजेपी के हमलों का काउंटर होगा। अयोध्या में कांग्रेस के बड़े नेताओं की मौजूदगी हिंदू वोटर्स के लिए बड़ा संदेश होगा। लेकिन कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह इंडिया गठबंधन का सबसे बड़ा घटक दल है। अगर कांग्रेस प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल होता है तो इससे इंडिया गठबंधन के अन्य सहयोगी नाराज हो सकते हैं, क्योंकि वृंदा करात समेत I.N.D.I.A गठबंधन में शामिल कुछ राजनीतिक दलों के प्रमुख राम मंदिर कार्यक्रम में शामिल होने से इनकार कर चुके हैं।

अयोध्या राम मंदिर का उद्घाटन कार्यक्रम 22 जनवरी को होना है, जिसके लिए देश के बड़े नेताओं को निमंत्रण दिया गया हैं। 22 जनवरी को राम मंदिर के उद्घाटन में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी और लोकसभा में विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी को न्योता भेजा गया हैं। लेकिन कयासबाजी का दौर लगातार जारी है कि लोकसभा चुनाव से ठीक पहले हो रहे राम मंदिर के उद्घाटन में क्या सोनिया गाधी जायेंगी या नहीं? इस बात पर अभी तक पार्टी फैसला नही कर पाई है, कांग्रेस की तरफ से एक आधिरारिक बयान जारी किया गया हैं। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा, ‘कांग्रेस अधयक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी को 22 जनवरी 2024 को अयोध्या के राम मंदिर के समारोह में शामिल होने का निमंत्रण मिला है वक्त आने पर फैसला किया जाएगा और सूचित किया जाएगा।’

राम मंदिर पर सैम पित्रोदा के बयान के बाद बीजेपी कांग्रेस पर हमलावर है। केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा, ‘प्राण प्रतिष्ठा समारोह से कांग्रेस में नुकसान, निराशा और भय की भावना पैदा हुई है। पित्रोदा की टिप्पणी से भगवान राम और हिंदुओं के प्रति पार्टी की एलर्जी का पता चलता है।’ वहीं, सुशील मोदी ने कहा, ‘उन्होंने ईवीएम और राम मंदिर पर भी सवाल उठाए, हो सकता है कि उन्हें भगवान में विश्वास न हो, भगवान राम और हमारे रीति-रिवाज बेरोजगारी जितने ही महत्वपूर्ण हैं। सैम पित्रोदा जैसे लोगों को हमारी संस्कृति के बारे में कोई जानकारी नहीं है।’

क्या जातिगत जनगणना के जरिए जीत पाएगी कांग्रेस?

कांग्रेस अब जातिगत जनगणना के जरिए जीतने का प्रयास कर रही है! विपक्षी दलों के गठबंधन I.N.D.I.A की मीटिंग में सीट शेयरिंग और दूसरे मुद्दों को 31 दिसंबर तक पूरा कर लेने पर जोर दिए जाने के बाद कांग्रेस के भीतर इन दिनों मंथन का दौर जारी है। कांग्रेस की ओर से बनाई गई मुकुल वासनिक की अध्यक्षता में गठबंधन समिति शुक्रवार व शनिवार को पूरे दिन अलग-अलग राज्यों के पदाधिकारियों से संपर्क व विचार विमर्श करती दिखी। सूत्रों के मुताबिक पांच सदस्यीय गठबंधन समिति एक-एक कर सभी राज्यों के प्रभारियों, प्रदेश अध्यक्ष व विधायक दल के नेता से मिल कर उनके राज्य में गठबंधन व तालमेल की संभावनाओं पर विचार कर रही है। इसमें समिति हर राज्य के प्रदेश इकाई का गठबंधन को लेकर मूड समझने की कोशिश करेगी मसलन किस राज्य में पार्टी गठबंधन चाहती है या नहीं, अगर चाहती है तो लोकसभा की कितनी सीटों पर तालमेल चाहती है, भले ही कांग्रेस में सीट बंटवारे को लेकर राज्यों से फीडबैक व राय लेने कवायद चल रही हो, लेकिन इस बारे में आखिरी फैसला कांग्रेस आलाकमान ही करेगी। इस मुद्दे पर कांग्रेस की सोच को सामने रखते हुए एक अहम पदाधिकारी का कहना था कि इंडिया गठबंधन को लेकर विभिन्न क्षेत्रीय दलों से हमारा तालमेल लोकसभा चुनावों के नजरिए से होगा।किन सीटों पर पार्टी मजबूत है, किन सीटों पर पिछले चुनाव में नंबर दो थी, हर सीट पर चुनावी समीकरण क्या हैं वगैरह। कांग्रेस के एक अहम सूत्र का कहना था कि पार्टी की गठबंधन समिति हर राज्य से मिले फीडबैक के आधार पर कांग्रेस अध्यक्ष को एक रिपोर्ट सौंपेगी, उसके बाद कांग्रेस पार्टी उस फीडबैक के आधार पर इंडिया गठबंधन में सीट बंटवारे पर बात करेगी। समिति अगले दो से तीन दिनों में अपनी रिपोर्ट कांग्रेस अध्यक्ष को दे देगी। आगामी 4 जनवरी को कांग्रेस अध्यक्ष चुनावों को लेकर सभी प्रदेश के नेताओं से मुलाकात करेंगे। जिसमें प्रदेश के प्रभारी, प्रदेश अध्यक्ष व विधायक दल के नेता मौजूद रहेंगे। कांग्रेस की ओर से इंडिया गठबंधन में कौन बात करेगा, फिलहाल यह तय नहीं है।

यह काम पार्टी की गठबंधन समिति करेगी या उसमें से कुछ सदस्य या फिर कोई अलग समिति बनेगी, अभी तय नहीं है। गौरतलब है कि भले ही कांग्रेस में सीट बंटवारे को लेकर राज्यों से फीडबैक व राय लेने कवायद चल रही हो, लेकिन इस बारे में आखिरी फैसला कांग्रेस आलाकमान ही करेगी। इस मुद्दे पर कांग्रेस की सोच को सामने रखते हुए एक अहम पदाधिकारी का कहना था कि इंडिया गठबंधन को लेकर विभिन्न क्षेत्रीय दलों से हमारा तालमेल लोकसभा चुनावों के नजरिए से होगा।

राज्यों और केंद्रीय नजरिए में फर्क के मुद्दे पर उक्त नेता का कहना था कि इसे लेकर कई बार राज्यों का अपना अलग राय या नजरिया हो सकता है, लेकिन तालमेल में राज्यों की बजाय राष्ट्रीय फैक्टर अहम रहेगा, क्योंकि यह एक राष्ट्रीय गठबंधन है। उल्लेखनीय है कि 4 जनवरी को ही कांग्रेस की मेनिफेस्टो कमेटी की मीटिंग भी होनी है, जिसके अध्यक्ष पी चिदंबरम हैं। सूत्रों के मुताबिक, झारखंड, बिहार व महाराष्ट्र जैसे राज्यों में तालमेल को लेकर पहले ही बातचीत हो रही है। इसमें समिति हर राज्य के प्रदेश इकाई का गठबंधन को लेकर मूड समझने की कोशिश करेगी मसलन किस राज्य में पार्टी गठबंधन चाहती है या नहीं, अगर चाहती है तो लोकसभा की कितनी सीटों पर तालमेल चाहती है, किन सीटों पर पार्टी मजबूत है, समिति अगले दो से तीन दिनों में अपनी रिपोर्ट कांग्रेस अध्यक्ष को दे देगी। आगामी 4 जनवरी को कांग्रेस अध्यक्ष चुनावों को लेकर सभी प्रदेश के नेताओं से मुलाकात करेंगे। जिसमें प्रदेश के प्रभारी, प्रदेश अध्यक्ष व विधायक दल के नेता मौजूद रहेंगे। कांग्रेस की ओर से इंडिया गठबंधन में कौन बात करेगा, फिलहाल यह तय नहीं है।किन सीटों पर पिछले चुनाव में नंबर दो थी, हर सीट पर चुनावी समीकरण क्या हैं वगैरह। कांग्रेस के एक अहम सूत्र का कहना था कि पार्टी की गठबंधन समिति हर राज्य से मिले फीडबैक के आधार पर कांग्रेस अध्यक्ष को एक रिपोर्ट सौंपेगी, उसके बाद कांग्रेस पार्टी उस फीडबैक के आधार पर इंडिया गठबंधन में सीट बंटवारे पर बात करेगी।महाराष्ट्र के एक अहम नेता का कहना था कि लोकसभा चुनावों को लेकर हमारा जोर सीटों से ज्यादा जीत की संभावनाओं पर निर्भर करेगा। तालमेल विशुद्ध रूप से मेरिट पर होगा, कहां कौन जीत सकता है, क्योंकि हमारा मकसद बीजेपी को हराना है।

क्या राम मंदिर से जीत पाएगी बीजेपी?

बीजेपी अब लोकसभा चुनाव में राम मंदिर से ही जीत पाएगी! अयोध्या राम मंदिर में 22 जनवरी को रामलला का प्राण प्रतिष्ठा समारोह है। कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल अभी तक इसी उधेड़बुन में फंसे है कि राम मंदिर के उद्घाटन में जाना है या नहीं। देश की पूरी राजनीति राम मंदिर के आसपास आकर ठहर सी गई है। राम मंदिर को लोकसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। विपक्षी दलों को डर सता रहा है कि राम मंदिर बीजेपी को बड़ा चुनावी फायदा ना दे दे। वहीं बीजेपी भी राम मंदिर के जरिए हिंदू वोटर्स पर फोकस करने की रणनीति बना सकती है। राम मंदिर पर सियासत के बीच आज पीएम मोदी का अयोध्या दौरा भी काफी अहम है। दरअसल पीएम मोदी का यह दौरा अयोध्यावासियों के लिए किसी बड़ी सौगात से कम नहीं है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पीएम मोदी के इस दौरे से भी बीजेपी लोकसभा चुनावों में फायदा मिल सकता है, क्योंकि पीएम मोदी 15,700 करोड़ की परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन करेंगे। श्रीराम की नगरी से देश के विभिन्न शहरों के लिए भी सौगातों का पिटारा खुलेगा। पीएम मोदी देश के अलग अलग स्टेशनों से संचालित होने वाली छह वंदे भारत और दो अमृत भारत ट्रेनों को भी हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे। इससे पहले पीएम मोदी पुनर्विकसित अयोध्या धाम जंक्शन रेलवे स्टेशन को राष्ट्र को समर्पित करेंगे। प्रशासन की ओर से मिली जानकारी के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पुनर्विकसित अयोध्या धाम जंक्शन रेलवे स्टेशन राष्ट्र को समर्पित करेंगे।

पीएम मोदी श्री माता वैष्णो देवी कटरा-नई दिल्ली, अमृतसर-नई दिल्ली, कोयम्बटूर-बेंगलुरु, मंगलूरु-मडगांव, जालना-मुंबई एवं अयोध्या-आनंद विहार टर्मिनल के बीच छह वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेनों के साथ ही अयोध्या-दरभंगा और मालदा टाउन-बेंगलुरु के बीच दो अमृत भारत ट्रेनों को हरी झंडी दिखाएंगे। इसके अलावा पीएम मोदी महर्षि वाल्मीकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट अयोध्या धाम का उद्घाटन करेंगे। राम की नगरी अयोध्या में महर्षि वाल्मीकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट का उद्घाटन भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे। अयोध्या एयरपोर्ट की शुरुआत होते ही यूपी में एयरपोर्ट्स की संख्या 9 से बढ़कर 10 पहुंच जाएगी। वहीं यूपी को रफ्तार देने के लिए अगले दो महीनों में पांच और नए एयरपोर्ट की सौगात मिल जाएगी। इस तरह सालभर में एयरपोर्ट की संख्या 19 करने का लक्ष्य रखा गया है। यूपी को जल्द मिलने वाले एयरपोर्ट्स की सौगात का एलान मोदी सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कर दिया है। ये यूपी के विकास में बड़ी मील का पत्थर साबित होगा। इससे प्रदेशवासियों में भी खुशी है। यूपी सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें है। यूपी में विकास की तेज गति का मुद्दा बीजेपी आगामी लोकसभा चुनाव में भुना सकता है।

पीएम नरेंद्र मोदी के अयोध्या का दौरे से पहले शहर को ‘दिव्य रूप’ देने के लिए फूलों से सजाया जा रहा है। पुनर्विकसित मार्ग ‘राम पथ’ के मध्य में स्थापित बिजली के खंभों के चारों ओर नारंगी और पीले रंग के गेंदे के फूलों की माला लपेटी जा रही हैं। इन खंभों के शीर्ष पर बने डिजाइन धार्मिक प्रतीकों को दर्शाते हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से आए कई श्रमिक राम कथा पार्क में फूलों से कलात्मक आकार बना रहे हैं। सजावट के लिए भगवान राम, उनके धनुष एवं तीर, भगवान हनुमान, धार्मिक तिलक आदि की छवियों से प्रेरणा ली गई है। अयोध्या में फूलों से कई सजावटी डिजाइन बनाए गए हैं, जिनमें धनुष और तीर पकड़े हुए भगवान राम की पुष्प छवि भी शामिल है। इन सजावटी संरचनाओं का उपयोग राम पथ, धर्म पथ, हवाई अड्डे और रेलवे स्टेशन सहित अन्य स्थानों पर सजावट के लिए किया जाएगा। सैकड़ों कर्मचारी सजावट के काम में जुटे हैं और लगभग 300 क्विंटल फूल कोलकाता, दिल्ली, गाजीपुर और अन्य स्थानों से लाए गए हैं।

आज पीएम मोदी अयोध्या पहुंच रहे है। वह एयरपोर्ट से रेलवे स्टेशन तक करीब 8 किलोमीटर लंबा रोड शो निकालेंगे। रोड शो के दौरान 51 जगहों पर पीएम नरेंद्र मोदी का स्वागत होगा। अगले दो महीनों में पांच और नए एयरपोर्ट की सौगात मिल जाएगी। इस तरह सालभर में एयरपोर्ट की संख्या 19 करने का लक्ष्य रखा गया है। यूपी को जल्द मिलने वाले एयरपोर्ट्स की सौगात का एलान मोदी सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कर दिया है। ये यूपी के विकास में बड़ी मील का पत्थर साबित होगा। इससे प्रदेशवासियों में भी खुशी है।इसमें 12 जगहों पर संत-महंत उनका स्वागत करेंगे। 21 संस्कृत विद्यालयों के 500 वैदिक छात्र वेद मंत्र और शंख ध्वनि से स्वागत करेंगे। इन रोड शो वाले मार्गों को फूलों से सजाया गया है। इसमें थाईलैंड, मलेशिया, कोलकाता, बेंगलुरु, देहरादून, उत्तराखंड और दिल्ली से फूल और आगरा के पत्ते मंगाए गए हैं।

क्या हाफिज सईद को भारत के हवाले करेगा पाकिस्तान?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पाकिस्तान हाफिज सईद को भारत के हवाले करेगा या नहीं! भारत सरकार ने एक बार फिर पाकिस्तान से लश्कर-ए-तैयबा के सरगना हाफिज सईद को वापस भारत लाने की मांग की है। आतंकी सरगना 2008 के मुंबई धमाकों के मास्टरमाइंड होने सहित कश्मीर में फिदायीन हमला करवाने और कथित मनी लॉन्ड्रिंग सहित कई मामलों का गुनहगार है। भारत पड़ोसी देश से उसे अपने यहां बुलवाकर मुकदमा चलाना चाहता है। लेकिन पाकिस्तान ठहरा पाकिस्तान। सब पता होने के बाद भी वह ऐसे पेश आता है जैसे उसे कुछ पता ही न हो। पता हो तो भी वह भारत को हाफिज सईद को सौंपने से पीछे ही हटता रहा है। विदेश मंत्रालय की ओर से एक बार फिर पड़ोसी मुल्क से हाफिज सईद को सौंपने का अनुरोध किया गया है। पाकिस्तान की ओर से इस अनुरोध पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। लेकिन वहां की एक पत्रकार का एक ट्वीट साफ बताता है कि पाकिस्तान अभी हाफिज सईद को सौंपने के मूड में नहीं है। लेकिन हो न हो भारत ने आंतकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के सरगना को मांगकर सीमा पार टेंशन दे दी है। पाकिस्तान भी जानता है कि उसके लिए भारत के अनुरोध को यूं नकार देना आसान नहीं होगा। पाकिस्तान के पास भारत का हाफिज सईद वाला अनुरोध पहुंच गया है लेकिन, वहां के विदेश मंत्रालय ने कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। हालांकि वहां के पत्रकार एजाज सैयद के ट्वीट से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पाक अभी हाफिज सईद को सौंपने के पक्ष में नहीं है। पाकिस्तानी पत्रकार ने बताया कि तकनीकी तौर पर हाफिज सईद के प्रत्यर्पण से वहां की शहबाज शरीफ की सरकार ने इनकार कर दिया है। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा कि पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मुमताज जहरा बलोच ने बताया है कि भारत से पाकिस्तान को एक अनुरोध मिला है। लेकिन ध्यान देना जरूरी है कि पाकिस्तान और भारत के बीच कोई द्विपक्षीय प्रत्यर्पण संधि मौजूद नहीं है। हालांकि पाकिस्तान ने जिस आसानी से इससे इनकार किया है, पड़ोसी मुल्क के लिए इतना आसान नहीं है। वजह है भारत की विश्व पटल पर बढ़ती ताकत जिसका लोहा शक्तिशाली देश अमेरिका भी मानता है।

पाकिस्तान से भारत की इस मांग पर जवाब देते नहीं बन रहा है। दबी छुपी में पत्रकार तो विदेश मंत्रालय का प्रवक्ता का बयान आया है पर इसपर आधिकारिक कुछ नहीं है। हाफिज सईद पर पाकिस्तान क्या करेगा इसकी निम्नलिखित संभावनाएं हैं, पाकिस्तान हाफिज सईद को जेल में ही रखेगा। यह पाकिस्तान की सबसे अधिक संभावना वाली कार्रवाई है। पाकिस्तान हाफिज सईद को प्रत्यर्पित करने से इनकार करेगा और उसे अपने कानूनी तंत्र के तहत ही न्याय दिलाएगा।

पाकिस्तान हाफिज सईद को रिहा कर देगा। यह एक कम संभावना वाली कार्रवाई है, लेकिन इसे पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता है। पाकिस्तान में हाफिज सईद के समर्थकों की एक बड़ी ताकत है। अगर पाकिस्तान सरकार हाफिज सईद को प्रत्यर्पित करती है, तो इससे पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो सकती है। पाकिस्तान हाफिज सईद के खिलाफ मुकदमों में रियायतें दे सकता है। यह भी एक संभावना है। पाकिस्तान हाफिज सईद को भारत को प्रत्यर्पित करने से बचने के लिए उसके खिलाफ मुकदमे में रियायतें दे सकता है। उदाहरण के लिए, पाकिस्तान हाफिज सईद को जेल से बाहर रहने की अनुमति दे सकता है या उसे कम सजा दे सकता है।

पाकिस्तान हाफिज सईद को भारत को कई कारणों से नहीं सौंपता है। इनमें से कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं…. पाकिस्तान में हाफिज सईद के समर्थकों की एक बड़ी ताकत है। अगर पाकिस्तान सरकार हाफिज सईद को प्रत्यर्पित करती है, तो इससे पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो सकती है। पाकिस्तान को आतंकवाद का खतरा बना हुआ है। पाकिस्तान सरकार का मानना है कि हाफिज सईद को प्रत्यर्पित करने से पाकिस्तान में आतंकवाद को बढ़ावा मिल सकता है। भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध तनावपूर्ण हैं। पाकिस्तान का मानना है कि हाफिज सईद को प्रत्यर्पित करने से भारत-पाकिस्तान संबंध और खराब हो सकते हैं। पाकिस्तान सरकार का तर्क है कि उसके पास हाफिज सईद के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं और उसे पाकिस्तान में ही न्याय मिलना चाहिए। पाकिस्तान ने हाफिज सईद पर आतंकी वित्तपोषण के दो मामलों में 33 साल की जेल की सजा सुनाई है। हालांकि, वह जेल से बाहर भी कई बार देखा गया है।

भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि सा कि आप जानते हैं, इस व्यक्ति पर भारत में कई मामले दर्ज हैं। वह संयुक्त राष्ट्र द्वारा आतंकवादी घोषित भी है। इस संबंध में, हमने पाकिस्तान सरकार को एक खास मामले में मुकदमे का सामना करने के लिए उसे भारत लाने के लिए एक अनुरोध भेजा है, साथ ही उसके समर्थन में आवश्यक दस्तावेज भी दिए हैं। यह आखिरी संदेश कुछ हफ्ते पहले पाकिस्तान को भेजा गया था।

जब कांग्रेस ने लोकसभा में रच दिया था इतिहास!

आज कहानी ऐसे इतिहास की जब कांग्रेस ने लोकसभा में इतिहास रच दिया! 31 अक्टूबर 1984 की वो तारीख। देश के इतिहास में काले दिन के समान थी। रामगढ़ में पहली सभा को संबोधित करने के बाद, राजीव गांधी कंठी पहुंचे, जहां उन्होंने दिन की दूसरी सभा को संबोधित करना शुरू ही किया था। तभी सुबह 9.30 बजे पुलिस वायरलेस पर एक संदेश मिला, इंदिरा गांधी पर हमला, तुरंत दिल्ली लौट जाओ… विमान के उड़ने के तुरंत बाद, राजीव कॉकपिट में चले गए। इसके बाद भारी मन से बार निकले और कहा- वह नहीं रहीं। सुनते ही चारों और सन्नाटा छा गया। देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अब इस दुनिया में नहीं रहीं। बेटे राजीव के लिए यह क्षण और भी भावुक और विकट था। कुछ दिन पहले ही उन्होंने अपने भाई संजय को विमान क्रैश में खोया था। और यहीं से राजीव गांधी के पहली बार देश का प्रधानमंत्री बनने की इबारत लिखी जा चुकी थी। 24, 27 और 28 दिसंबर 1984 को तीन चरणों में हुए चुनावों ने तस्वीर ही बदल दी। 29 दिसंबर यानी आज ही के दिन जब नतीजे आए तो कांग्रेस ने रिकॉर्ड अंतर से जीत दर्ज की। 514 लोकसभा सीटों में देश की सबसे पुरानी पार्टी को 404 वोट मिले थे। इंदिरा गांधी की मौत के बाद से राजीव जैसे टूट से गए थे। उनके लिए कोई पद, कोई कुर्सी मायने नहीं रख रही थी। बेटा जिसने अपने भाई को खोया, गम से उबर भी नहीं पाया और माता इंदिरा का देहांत हो गया। ऐसे मुश्किल वक्त में कोई उनसे कोई कैसे कहे कि आप पीएम की कुर्सी संभाल लो। इंदिरा गांधी की मौत से कांग्रेस के प्रति लोगों की सहानुभूति ही थी कि 29 दिसंबर 1984 को कांग्रेस को बंपर जीत नसीब हुई थी। पर राजीव से प्रधानमंत्री पद संभालने के लिए कहेगा कौन? पूर्व राष्ट्रपति और वित्त मंत्री रहे प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब द टर्बुलेंट ईयर्स: 1980-96 में बताया कि हमने चर्चा शुरू की कि आगे क्या किया जाए। मैंने प्रधानमंत्री नेहरू और बाद में शास्त्री के कार्यकाल के दौरान उनके निधन के समय के उदाहरणों का हवाला दिया क्रमशः 27 मई 1964 और 11 जनवरी 1966। दोनों ही मामलों में, वरिष्ठतम मंत्री गुलजारी लाल नंदा के साथ अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में एक अंतरिम सरकार बनाई गई थी। चर्चा के अंत में, यह तय किया गया कि हम राजीव गांधी से अनुरोध करेंगे कि वे इस असाधारण परिस्थिति से उबरने के लिए पूर्ण प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभालें।

उसी दिन शाम को उपराष्ट्रपति आर वेंकटरामन ने दूरदर्शन पर देश को संबोधित करते हुए एक साथ दो घोषणाएँ कीं – इंदिरा जी का निधन हो गया है और राजीव के नेतृत्व में नई सरकार बन गई है। इसके तुरंत बाद, नवंबर में प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने चुनावों की घोषणा की। लोकसभा की 514 सीटों के लिए मतदान 24, 27 और 28 दिसंबर 1984 को होना था। असम और पंजाब में आतंकवादियों के चलते गड़बड़ी के कारण वहां चुनाव नहीं कराए गए। इन दोनों राज्यों का चुनाव बाद में 1985 में हुआ।

देशवासियों ने 24,27 और 28 दिसंबर को हुए मतदान में लोगों ने इंदिरा के नाम और उनके कामों को याद करते हुए वोट दिया। कांग्रेस ने 514 सीटों में से 404 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया। विशेषज्ञों ने यह माना कि कांग्रेस की ऐसी बड़ी जीत इंदिरा जी के असामयिक और दुखद निधन के बाद राजीव के लिए बनी सहानुभूति लहर के कारण हुई। उत्तर भारत में अपनी पकड़ मजबूत करते हुए, कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में 85 में से 83 सीटें, बिहार में 54 में से 48 सीटें, हरियाणा में सभी 10 और राजस्थान में 25 सीटें जीतीं थीं। दक्षिण में, पार्टी ने कर्नाटक में 28 में से 24 सीटें, केरल में 20 में से 13 सीटें, तमिलनाडु में 39 में से 25 सीटें जीतीं। अन्य राज्यों में जहां सबसे ज्यादा लोकसभा क्षेत्र हैं, कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश में 42 में से 30, गुजरात में 26 में से 24, मध्य प्रदेश में 40 और महाराष्ट्र में 48 में से 43 सीटें जीतीं।

प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब में बताया कि पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपना दबदबा बनाए रखा, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया ने 42 में से 18 सीटें जीतीं, जबकि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया ने 3 सीटें जीतीं थीं। देश भर में कांग्रेस के पक्ष में लहर के बावजूद, पार्टी राज्य से 16 सीटें ही जीत पाई। 1977 में सरकार में अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करने में असफल रहने के बाद जनता गठबंधन के 1979 में टूटने के बाद गठबंधन में टूट फूट हो गई। आपातकाल के बाद जनता पार्टी में विलीन हुआ जनसंघ 1980 में फिर से एकत्रित हुआ और भारतीय जनता पार्टी बनाई। नवगठित पार्टी 1984 में लड़े अपने पहले चुनाव में कोई खास निशान नहीं छोड़ पाई और उसने 224 सीटों में से केवल 2 सीटें जीतीं, जिस पर उसने चुनाव लड़ा था और उसके 108 उम्मीदवारों को उनकी जमानत भी जब्त कर ली गई थी।

क्या अब मुस्लिम धर्म में होगी दो या तीन शादियाँ?

ये सवाल उठना लाजमी है कि क्या अब मुस्लिम धर्म में दो या तीन शादियाँ होंगी या नहीं! मुस्लिम पुरुष को बहुविवाह का अधिकार है लेकिन उसे प्रत्येक पत्नी को समान तरह से रखना होगा। हाई कोर्ट ने कहा है कि इस्लामिक कानून के तहत पुरुष को बहु विवाह की इजाजत है और उसे एक समान तरह से पत्नियों को ट्रीट करना होगा और अगर वह ऐसा करने में विफल रहता है तो यह क्रुएल्टी के दायरे में आएगा। पति की ड्यूटी है कि वह अपनी पत्नी का सही तरह से देखभाल करे। इस मामले में मद्रास हाई कोर्ट ने उक्त व्यवस्था देते हुए फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बहाल रखा है जिसमें फैमिली कोर्ट ने क्रुएल्टी के ग्राउंड पर पहली पत्नी के फेवर में तलाक की डिक्री पारित की थी। हाई कोर्ट ने इस तथ्य पर गौर किया कि पति और उसके परिवार वालों ने शुरुआत में पहली पत्नी के साथ प्रताड़ना की थी और बाद में मुस्लिम पुरुष ने दूसरी शादी कर ली थी और फिर उसके साथ वह रहने लगा था। हाई कोर्ट ने कहा कि पुरुष ने अपनी पहली पत्नी और दूसरी पत्नी को एक तरह से ट्रीट रख रखाव नहीं किया, जबकि इस्लामिक कानून के तहत पुरुष के लिए यह बाध्यता है कि वह पत्नियों को एक तरह से रखे। इस्लामिक कानून के तहत मुस्लिम पुरुष बहु विवाह कर सकता है लेकिन पत्नियों को एक तरह से रखना होगा। हाई कोर्ट ने कहा कि पहली पत्नी का जो बयान था उसमें कहा गया कि उसके पति ने उसके साथ प्रताड़ना की थी और यह भी कहा कि जब वह प्रेगनेंट थी उस दौरान पति और उसके परिजनों ने उसके साथ गलत व्यवहार किया और उसके साथ क्रुएल्टी की और ऐसा खाना खिलाया गया जिससे उसे एलर्जी थी।

उसकी प्रेगनेंसी के दौरान सही तरह से साड़ी न पहने जाने के कारण सास ने ताने मारे। जब एक बार उसका गर्भपात हुआ तो उसकी ननद ने इसे कहा कि वह बच्चा जन्म देने के काबिल नहीं है। तमाम प्रताड़ना से तंग आकर उसने पति का घर छोड़ दिया था। उसके पति ने उसके बाद दूसरी शादी कर ली और दूसरी पत्नी के साथ रह रहा है। वहीं पति ने तमाम आरोपों को निराधार बताया। तमाम परिस्थितियों और तथ्यों के आधार पर हाई कोर्ट ने कहा कि पहली पत्नी ने यह तथ्य साफ किया है कि पति ने उसके साथ समान व्यवहार नहीं किया जैसा कि दूसरी पत्नी के साथ कर रहा है।

पति ने पहली पत्नी का सही तरह से देखभाल नहीं किया। पहली पत्नी ने क्रुएल्टी ग्राउंड पर तलाक की मांग की और कहा कि उसके साथ दूसरी पत्नी की तरह उसके पति ने व्यवहार नहीं किया और एक तरह से देखभाल नहीं की। फैमिली कोर्ट ने पहली पत्नी के फेवर में तलाक की डिक्री पारित की। इसके बाद मामला हाई कोर्ट में आया था। हाई कोर्ट की बेंच ने कहा कि पति अपने वैवाहिक दायित्व के निर्वहन में विफल रहा है। पति की ड्यूटी है कि वह अपनी पत्नी का सही तरह से देखभाल करे। अगर पत्नी किसी कारण से नाराज होकर अलग भी होती है तो वह प्रयास करे कि वह उसे वापस लाए। इस मामले में ऐसा कोई प्रयास नहीं हुआ और असलियत यह है कि पति ने पहली पत्नी की सही तरह से देखभाल नहीं की और दूसरी शादी कर ली। ऐसे में पहली पत्नी के साथ पति ने क्रुएल्टी की है और इसी कारण पहली पत्नी अपने मायके चली गई। बता दें कि हाई कोर्ट ने इस मामले में फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बहाल रखा है जिसमें क्रूरता के ग्राउंड पर पहली पत्नी के फेवर में तलाक की डिक्री पारित की गई थी। हाई कोर्ट ने इस तथ्य पर गौर किया कि पति और उसके परिवार वालों ने शुरुआत में पहली पत्नी को प्रताड़ित किया। गर्भावस्था में भी उसके साथ सही व्यवहार नहीं हुआ। इससे तंग आकर पहली पत्नी ने ससुराल छोड़ दिया। बाद में मुस्लिम पुरुष ने फिर शादी कर ली और दूसरी पत्नी के साथ वह रहने लगा था। हाई कोर्ट ने कहा कि पुरुष ने अपनी पहली पत्नी और दूसरी पत्नी को एक तरह से ट्रीट नहीं किया, जबकि इस्लामिक कानून के तहत पुरुष के लिए यह बाध्यता है कि वह पत्नियों को एक तरह से रखे।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि क्रूरता के मामलों में अदालत को वैवाहिक संबंध बहाल करने का आदेश पारित करने से पहले अन्य परिस्थितियों पर भी गौर करना चाहिए। इसके साथ ही कोर्ट ने एक व्यक्ति की वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें अलग रह रही पत्नी के कहने पर पारिवारिक अदालत द्वारा अपनी शादी को तोड़ने को चुनौती दी गई थी। न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति शिव शंकर प्रसाद की खंडपीठ ने हेमसिंह उर्फ टिंचू द्वारा दायर पहली अपील को खारिज करते हुए कहा कि एक बार क्रूरता साबित होने पर तलाक मांगा जा सकता है। हालांकि, उसके बाद पार्टियां अपना आचरण कैसा रखेंगी, यह एक प्रासंगिक तथ्य हो सकता है।

पाकिस्तान और भारत के लिए क्या बोले जूलियो रिबेरो?

हाल ही में जूलियो रिबेरो ने पाकिस्तान और भारत के लिए एक बयान दे दिया है! भारत में भी एक वर्ग वर्ष 2014 से ही भेड़िया आने की रट लगा रहा है। कोई दावा कर रहा है कि भेड़िया आ चुका है, कोई कहता है अभी आया भले ही नहीं हो लेकिन आएगा जरूर। जूलियो रिबेरो भी इसी भविष्यवक्ता श्रेणी के रुदाली हैं। मुंबई पुलिस कमिश्नर रह चुके हैं। उनका दावा है कि भारत एक दिन पाकिस्तान बन जाएगा, अंतर रहेगा तो बस इतना कि पाकिस्तान इस्लामी आतंकवाद का गढ़ है जबकि भारत में हिंदू कट्टरपंथ का जोर होगा। उन्होंने भविष्य के भारत को नाम भी दे दिया है- भगवामय पाकिस्तान। अब रिबेरो को कौन समझाए कि वैचारिक संघर्ष में हार-जीत लगी रहती है, लेकिन पछाड़ खाने के बाद इस स्तर की हताशा ठीक नहीं कि बुद्धि घुटनों में आ जाए। रिबेरो को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के क्रिया-कलापों और उनकी सरकार की नीतियों से गहरा विरोध है। बहुत क्षुब्ध जान पड़ते हैं बीते दिनों के कमिश्नर साहब। वो कहते हैं, ‘पाकिस्तान में हिंदू और ईसाई दोयम दर्जे के नागरिक के तौर पर खौफ में जी रहे हैं। ऐसा यहां भारत में भी हो सकता है। मुझे यही डर है। भारत भगवामय पाकिस्तान हो जाएगा।’ वो प्रधानमंत्री मोदी की दिल्ली में ईसाई समुदाय के साथ हुई बातचीत का हवाला देकर कहते हैं कि ये सब तो केरल के ईसाइयों के बहलाने का तिकड़म है। रिबेरो कहते हैं, ‘वो पीएम मोदी केरल के बड़े ईसाई समुदाय को लुभाने में जुटे हैं। एक बिशप तो उनका शिकार हो गया। मुझे लगता है कि चूंकि एक बिशप फंदे में आ गया तो दूसरे भी आ सकते हैं। देखते हैं वो पीएम मोदी क्या करना चाहते हैं। हमारे दोस्त भी समझने लगे हैं कि ये सभी चीजें सिर्फ वोट के लिए हैं।’

यहां तक के बयान से तो साफ झलकता है कि रिबेरो साहब भविष्य को अच्छी तरह पढ़ चुके हैं। उन्हें पीएम मोदी की मंशा और भारत के भविष्य का अच्छे से पता चल चुका है, लेकिन आगे के बयान में वो खुद ही संदेह जताने लगते हैं। वो कहते हैं, ‘उम्मीद की जा रही है कि क्रिसमस मेसेज संभवतः पीएम मोदी का दिल बदलने का संकेत है। अगर ऐसा है तो यह अच्छी चीज होगी। लेकिन मुझे इसमें संदेह है क्योंकि इरादा तो एक भगवामय पाकिस्तान बनाने का ही है।’ रिबेरो जी लगे हाथ यह भी बता देते कि पीएम मोदी को क्या करना चाहिए जिससे कि उन्हें विश्वास हो कि उनका इरादा सिर्फ ईसाई समुदाय में पार्टी की पैठ बढ़ाने भर नहीं है? वैसे तो पीएम के लिए ऐसी क्या मजबूरी होगी कि वो रिबेरो साहब को संतुष्ट करने की सोचें भी? अगर पीएम उन्हें तवज्जो दे दें तब तो पता नहीं देश में रातोंरात कितने रिबेरो उग जाएंगे। फिर भी सवाल है कि आखिर रिबेरो साहब को कैसे यकीन हो कि भारत, भगवामय पाकिस्तान बनने के रास्ते पर नहीं है और पीएम मोदी अल्पसंख्यक समुदाय से सिर्फ उनका वोट पाने के लिए राब्ता नहीं करते? कांग्रेस पार्टी और करीब-करीब सभी क्षेत्रीय दल खुद को अल्पसंख्यकों का हितैषी होने का ही दावा करते हैं। एक भी पार्टी तो नहीं जो खुद को अल्पसंख्यकों का रहनुमा नहीं बताती। एक बीजेपी ही तो हिंदु-हितों का संरक्षक होने के प्रतीकात्मक संकेत देने की हिम्मत कर पाती है। तो रिबेरो साहब को यह बताना चाहिए कि मुसलमानों और ईसाइयों का वोट लेने वाली कांग्रेस और क्षेत्रीय पार्टियों ने उन्हें किस तरक्की के सिंहासन पर बिठाया है? जब दशकों से गैर-बीजेपी दल अल्पसंख्यकों के वोट बैंक लपकने के तिकड़म करते रहे और बदले में ‘दोयम दर्जे’ की जिंदगी दी तो रिबेरो साहब को बुरा क्यों नहीं लग रहा? अब पीएम मोदी ने ईसाइयों से बात की तो इसमें भी उनकी मंशा पर सवाल है।

दरअसल, रिबेरो अब तक समझ ही नहीं पाए या समझकर भी खुद को या फिर दुनिया को धोखे में रखना चाहते हैं कि मोदी सरकार का तो एक महत्वपूर्ण एजेंडा ही है- तुष्टीकरण का विरोध। यह कहती है- सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास लेकिन तुष्टीकरण किसी का नहीं। आईपीएस रहे रिबेरो यह नहीं समझते हों, ऐसा लगता तो नहीं। वैसे कई बार बहुत बड़ा समझा जाने वाला व्यक्ति वक्त आने पर सच में बहुत बौना साबित होता है तो रिबेरो की समझ को लेकर कुछ दावा नहीं किया जा सकता है। संभव है कि वो आईपीएस तो बन गए, लेकिन कुछ मायनों में उन्होंने अपने विवेक का विस्तार नहीं होने दिया हो। संभव है कि छोटी सोच के साथ जीने में ही उन्हें मजा आ रहा हो। खैर, उनकी सोच उन्हें मुबारक लेकिन कोई बौना पहाड़ की ऊंचाई पर उंगली उठाने लगे तो उसकी अक्ल ठिकाने लगाना हर जिम्मेदार व्यक्ति का दायित्व होता है।

आज भी दर्जनों वीडियोज सोशल मीडिया पर तैर रहे हैं जिनमें मुसलमान हिंदुओं और यहां तक कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को धमकियां दे रहे हैं। यहां तक कि कई छोटे-छोटे मुसलमान बच्चे भी हिंदुओं को खुलेआम काफिर कहते हैं और उनसे नफरत का बेहिचक इजहार करते हैं। नूपुर शर्मा कांड में कम से कम आठ हिंदुओं की गर्दनें काट ली जाती हैं। यहां एक बड़ा मुस्लिम नेता कहता है कि 15 मिनट के लिए पुलिस को हटा लो फिर देखो हिंदुओं का क्या होता है। फिर आम हिंदू क्या, मुसलमानों का जत्था पुलिस को नहीं बख्शता, वो निडर होकर पत्थरबाजी करता है। अगर यह मुसलमानों की दोयम दर्जे की जिंदगी का प्रतीक है तो रिबेरो की समझ पर तरस खाने के सिवा कोई और कर भी क्या सकता है।

रिबेरो एक भी उदाहरण तो दें कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय ने अपवाद के तौर पर भी ऐसा कुछ किया है जो भारत का अल्पसंख्यक हर दिन कर रहा है। पाकिस्तान में हिंदुओं और ईसाइयों ने कितने मुसलमानों की गर्दनें उतारीं, कितनी मुस्लिम बच्चियों को टुकड़े-टुकड़े करके सूटकेस में भर दिए? पूरे उत्तर पूर्वी भारत को ईसाई बना दिया गया है। आज पंजाब में हिंदुओं का धर्मांतरण करवाकर ईसाई बनाने का अभियान जोरों पर है, फिर भी यहां इसाइयों पर दोयम दर्जे के नागरिक होने का खतरा है। रिबेरो साहब! ये भारत है, भगवामय भारत जिसमें आप ऐसे बेसिर-पैर की बातें करके हिंदुओं के खिलाफ एजेंडा चला सकते हैं।

आपको भी पता है कि भारत के भगवामय पाकिस्तान होने जैसी कोई आशंका नहीं है, वरना सत्ताधारी दल आपके बयानों का जवाब नहीं दे रहा होता, सीधे पाकिस्तानी स्टाइल में इलाज कर देता। इसलिए रिबेरो साहब और आप जैसों को सलाह है- भेड़िया-भेड़िया की फालतू रट छोड़िए वरना गलती से भी भेड़िया आ गया तो आगे की कहानी मालूम ही है। हां, आप अपने एजेंडे को हवा देते रहकर भी बेफिक्री की जिंदगी बिता सकते हैं क्योंकि कोई सच्चा देशभक्त भगवामय भारत को तो दिल में बसाएगा लेकिन इस पर पाकिस्तान की थोड़ी सी छाप भी पड़ने नहीं देगा।

जब हवस पूरी करने के लिए पिता ही बन गया जल्लाद?

हाल ही में एक ऐसी खबर आई जिसमें हवस पूरी करने के लिए एक पिता ही जल्लाद बन गया! उसकी बहुत ही प्यारी इकलौती बेटी थी। बड़े नाजों से उसे पाल रहा था। दुनिया की हर खुशी अपनी बेटी को देना चाहता था। लेकिन करोड़ों के कर्ज में डूबा वह कारोबारी हैवान बन गया। कर्ज न चुकाना पड़े, इसके लिए उसने खतरनाक प्लान बनाया। घर छोड़ने का प्लान। प्लान ये कि नई जगह पर नई पहचान के साथ नए सिरे से जिंदगी की शुरुआत। लेकिन 10 साल की बेटी का क्या होगा? पत्नी तो किसी तरह गुजारा कर लेगी लेकिन बेटी। फिर क्या था। जिन हाथों से कभी बेटी को गोद में उठाकर खिलाया था, उन्हीं हाथों से उस हैवान ने अपने जिगर के टुकड़े का ही गला घोंट दिया। उसके बेजान पड़े शरीर को नदी में फेंक आया। शातिराना अंदाज में अपने गुनाह के हर निशां को मिटाने की कोशिश की। अगर उस बेटी की आत्मा बात करती होती तो उस हैवान से जरूर पूछती- पापा मेरा कसूर क्या था? अब उस हैवान को अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई है। वैगा हत्याकांड की ये पूरी कहानी दिल को झकझोर कर रख देने वाली है। 21 मार्च 2021 का दिन। 10 साल की वैगा को उसका पिता सानू मोहन अलपुज्जा में अपने रिश्तेदार के यहां से अपने साथ लेकर निकलता है। वह पत्नी को रिश्तेदार के यहां ही छोड़ देता है कि वह अपने एक अंकल के यहां जा रहा। वैगा के साथ वह किसी अंकल के यहां जाने के बजाय कोच्चि के कंगरापादी स्थित अपने फ्लैट पहुंचता है। कुछ देर बाद वह अपार्टमेंट से बाहर जाता दिखता है। उसके बाद से ही दोनों लापता हो जाते हैं। उनका कोई सुराग नहीं मिलता। रिश्तेदार उसी दिन दोनों की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराते हैं। अगले दिन यानी 22 मार्च को कोच्ची के मुट्टार नदी में वैगा की तैरती हुई लाश मिलती है। सानू मोहन गायब था। पुलिस जांच में जुटती है। शक की सूई सानू की ओर घूमती है जो लापता था। पता चला कि वह केरल से भाग चुका है। वह सबसे पहले कोयंबटूर पहुंचा। वहां से कर्नाटक भाग गया। पुलिस करीब एक महीने तक उसकी तलाश करती रही। आखिरकार 18 अप्रैल 2021 को उसे कर्नाटक के करवार में गिरफ्तार कर किया गया।

पूछताछ में उसने अपनी बेटी की हत्या की जो कहानी बताई वह रोंगटे खड़े कर देने वाली थी। 21 मार्च को वैगा जब सानू मोहन के साथ निकली तो उसे क्या पता था कि उसके पिता के दिमाग में क्या चल रहा है। उसे क्या पता था कि हैवान पिता उसकी जान लेने की प्लानिंग बना रहा है। रास्ते में उसने बेटी को कोकाकोला पीने के लिए दिया लेकिन उसमें वह शराब मिला रखा था। फ्लैट पहुंचते-पहुंचते वैगा नशे के आगोश में चली गई। वहां पहुंचते ही सानू ने वैगा का गला घोंट डाला। हत्या के बाद उसने बेटी के बेजान शरीर को चादर में लपेटा और रात के अंधेरे में उसे ठिकाने लगाने के लिए अपनी कार से निकल गया। उसने अपने और बेटी के फोन को भी नष्ट कर दिया। रात करीब साढ़े 10 बजे के करीब उसने वैगा की लाश को मुट्टार नदी में फेंक दिया।

पुलिस के मुताबिक, सानू ने वैगा की हत्या के बाद फरार होने और नए सिरे से जिंदगी जीने का प्लान बनाया था ताकि वह कर्ज चुकाने से बच जाए। जांचकर्ताओं को भटकाने के लिए उसने खुदकुशी की कोशिश का नाटक तक किया। उसने पुलिस को बताया कि वैगा को मारने के बाद उसने खुद भी जान देने की कोशिश की लेकिन पुलिस जांच में साफ हुआ कि वह झूठी कहानी बना रहा है।

इस सनसनीखेज हत्याकांड ने पूरे केरल को हिला दिया था। पुलिस ने 9 जुलाई 2021 को सानू के खिलाफ कोर्ट में 236 पन्नों की चार्जशीट पेश की। उस पर बेटी का अपहरण करने, हत्या करने, सबूत मिटाने, नशीला पदार्थ देने जैसे आरोप तय किए गए। एर्नाकुलम के स्पेशल पॉक्सो कोर्ट ने बुधवार को इस मामले में फैसला सुनाया। कोर्ट ने सानू के खिलाफ लगे सभी आरोपों को सच पाया। अभियोजन पक्ष ने हैवान पिता को फांसी की सजा देने की मांग की लेकिन कोर्ट ने हत्या के जुर्म में उसे उम्रकैद की सजा सुनाई। इसके अलावा बाकी के आरोपों में उसे अलग-अलग कुल 28 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई जिनमें सबसे लंबी सजा 10 साल की है। जज के सोमन ने अपने आदेश में कहा है कि दोषी पहले 28 साल कैद की सजा भुगतेगा और उसके बाद उम्रकैद की सजा होगी। यानी पहले वह उम्रकैद से इतर सबसे लंबी 10 साल की सजा काटेगा और उसके बाद उम्रकैद की सजा शुरू होगी। कोर्ट ने सानू पर 1,70,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है। उसने अदालत से इस आधार पर सजा में नरमी की भीख भी मांगी कि उसकी 70 साल की बूढ़ी मां की देखभाल करने वाला कोई नहीं है लेकिन अदालत ने उसकी ये दलील खारिज कर दी।

सानू की अपने क्षेत्र में एक बड़े कारोबारी की पहचान थी लेकिन वह कर्ज पर कर्ज लेता रहा। करोड़ों रुपये का कर्ज चुकाने से बचने के लिए उसने ऐसा खतरनाक प्लान बनाया कि अपने ही हाथों से फूल सी बेटी को मार डाला। अब उस हैवान पिता की बाकी जिंदगी जेल में बीतने वाली है। अगर पिता ही हैवान बन जाए तो कोई वैगा भला कैसे कहेगी- अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजौ। खैर कोर्ट के फैसले से वैगा की आत्मा को शांति जरूर मिली होगी।

क्या 2024 में भी भारत की अर्थव्यवस्था में आएगा उछाल?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत की अर्थव्यवस्था में 2024 में भी उछाल आएगा या नहीं! 2023 में दुनिया ने कई उतार-चढ़ाव देखे। व्यापार में तनाव, बढ़ती ब्याज दरें और राजनीतिक झगड़ों के बावजूद कोई बड़ा आर्थिक हादसा नहीं हुआ और दुनिया ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया। एसएंडपी ग्लोबल को उम्मीद है कि 2022 के 3.4% की तुलना में 2023 में दुनिया का कुल सकल घरेलू उत्पाद जीडीपी 3.3% बढ़ेगा। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका मंदी से बच गया और 2023 में 2.5% की अच्छी वृद्धि होने का अनुमान है। दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन की जीडीपी में सुधार हुआ क्योंकि कोविड प्रतिबंध हटा दिए गए और सरकार ने बाजार की मजबूती की दिशा में कई बड़े कदम उठाए। 2023 की विकास गाथा भारत के नाम रही है, जिसकी जीडीपी अनुमान से अधिक दर से बढ़ी है। आरबीआई ने इस वित्तीय वर्ष 2023-24 में 7% के जीडीपी ग्रोथ का अनुमान लगाया है। भारत की अर्थव्यवस्था के विकास को वैश्विक विकास से कुछ तेजी मिली, लेकिन सरकार समर्थित इन्वेस्टमेंट साइकल, रियल एस्टेट और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में पुनरुद्धार ने भी बढ़ोतरी में योगदान दिया। लेकिन 2023 के अंत में माहौल फिर से अनिश्चित हो गया है। हमारा अनुमान है कि 2024 में वैश्विक अर्थव्यवस्था धीमी पड़ेगी, लेकिन उसके बाद फिर गति पकड़ेगी। इस वित्तीय वर्ष के दूसरे भाग में भारत की वृद्धि पहली छमाही के 7.6% के बाद धीमी होकर 6.3% हो जाएगी। फिर अगले वित्त वर्ष 2024-25 में इसके 6.4% पर होने की उम्मीद है। उच्च ब्याज दरें, फिस्कल कंसॉलिडेशन और धीमी वैश्विक वृद्धि हमारी आर्थिक विकास की रफ्तार धीमा करेंगे।

वैश्विक अर्थव्यवस्था, विशेष रूप से अमेरिका, धीमी पड़ेगी क्योंकि ब्याज दरों में बढ़ोतरी का चरम प्रभाव 2024 की पहली छमाही में महसूस किया जाएगा। यह निर्यात मांग के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका अब भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और हमारे साथ उसका ट्रेड सरप्लस है। उभरती एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के अपेक्षाकृत लचीले रहने का अनुमान है, लेकिन इन अर्थव्यवस्थाओं में हमारे निर्यात का हिस्सा घट गया है। राहत की बात है कि अधिकांश बहुपक्षीय पूर्वानुमान धीमी वृद्धि के बावजूद 2024 में गुड्स ट्रेड में तेजी का संकेत दे रहे हैं।

दुनियाभर में ब्याज दरें और महंगाई भले ही अपने शीर्ष पर पहुंच गई हों, फिर भी केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में जल्दी कटौती करने में सावधानी बरतेंगे क्योंकि महंगाई अब भी उनके लक्ष्यों से ऊपर है। भारत सरकार ने महामारी के बाद बुनियादी ढांचे के निर्माण में तेज वृद्धि के लिए सरकारी खर्च में काफी बढ़ोतरी की और राज्यों को उनके निवेश प्रयासों को बढ़ाने के लिए ब्याज मुक्त कर्ज भी दिया। अगले वित्त वर्ष में सरकार वित्तीय सुदृढ़ीकरण के लिए सरकारी खर्च कम करेगी तब निवेश की जिम्मेदारी निजी क्षेत्र को अपने कंधों पर उठानी होगी। इसके लिए अधिकारियों को निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए निवेश के माहौल को और बेहतर बनाने की कोशिशों में तेजी लाने की जरूरत है। कंपनियों की मजबूत स्थिति, मैन्युफैक्चरिंग में बढ़ता कैपिसिटी यूटिलाजेशन और प्रॉडक्शन लिंक्ड इन्सेंटिव्स योजना पीएलआई स्कीम प्राइवेट इन्वेस्टमेंट में तेजी लाते हैं।

एल निनो का खतरा 2024 तक बढ़ने की आशंका के साथ मौसम खाद्य उत्पादन और महंगाई पर एक प्रमुख प्रभाव बना रहेगा। कृषि में दूसरी तिमाही में केवल 1.2% की वृद्धि हुई और पूरे वित्त वर्ष में भी वृद्धि कम रहने की आशंका है क्योंकि खरीफ फसल उत्पादन गिरने का अनुमान है और रबी फसल जलाशयों में कम पानी के दुष्प्रभाव का सामना कर सकता है। इस साल नवंबर तक वैश्विक औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक औसत से 1.5°C अधिक हो गया है, इसलिए 2023 इतिहास में सबसे गर्म वर्ष बनने वाला है। इसलिए जलवायु अनुकूलन और शमन के उपाय आने वाले समय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होंगे। लगातार बढ़ती खाद्य कीमतें अर्थव्यवस्था के दूसरे हिस्सों में फैल सकती हैं और महंगाई को और बढ़ा सकती हैं। इसलिए फ्यूल और कोर इन्फ्लेशन के कम स्तर पर रहने के बावजूद आरबीआई महंगाई को नियंत्रण में रखने का दावा नहीं करेगा। ब्याज दरों में कटौती अगले साल अप्रैल-जून की तिमाही में ही हो सकती है।

अब तक जियो-पॉलिटिकल घटनाओं ने भारतीय अर्थव्यवस्था को कमजोर नहीं किया है, लेकिन हाल ही में पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से इसका टेस्ट होगा क्योंकि व्यापार लागत बढ़ने लगी है और कच्चे तेल पर दबाव पड़ सकता है। 2024 में अमेरिका और भारत सहित रिकॉर्ड 40 देशों में आम चुनाव होने वाले हैं। इससे अनिश्चितताओं में एक राजनीतिक पहलू जुड़ जाता है, खासकर इसलिए क्योंकि इनमें से कई देश बड़ी आबादी वाले और आर्थिक रूप से प्रभावशाली हैं। वैश्विक कर्ज अब जीडीपी का लगभग 3.5 गुना है। उच्च ब्याज दरें और धीमी विकास, वित्तीय दुर्घटनाओं की संभावना को बढ़ाते हैं।कुल मिलाकर 2024 के वैश्विक आर्थिक परिदृश्य पर आम राय कम मुद्रास्फीति और सकारात्मक जीडीपी ग्रोथ सॉफ्ट लैंडिंग की ओर इशारा करता है। लेकिन इतनी अनिश्चितताओं के बीच यह भी कोई पक्का भविष्य नहीं है। देशों और व्यापारों को सावधानी बरतनी चाहिए और आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार रहना चाहिए। भारत फिलहाल स्वस्थ कंपनी, बैंक बैलेंस शीट और विदेशी मुद्रा भंडार के कारण अच्छा प्रदर्शन कर रहा है।