Thursday, March 5, 2026
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आखिर वर्तमान में क्यों आत्महत्या कर रहे हैं डॉक्टर?

वर्तमान में कई डॉक्टर आत्महत्या करते जा रहे हैं! राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग एनएमसी के अनुसार, भारत में बड़ी संख्या में मेडिकल छात्र मानसिक परेशानियों का सामना कर रहे हैं, जिसमें आत्महत्या और ड्रॉपआउट की दर अधिक है। पिछले पांच वर्षों में 64 एमबीबीएस और 58 विभिन्न पोस्ट-ग्रैजुएट पाठ्यक्रमों में पढ़ने वाले 122 मेडिकल छात्रों ने आत्महत्या कर ली। इसके अतिरिक्त, इसी अवधि के दौरान देशभर के मेडिकल कॉलेजों से 1,270 छात्रों ने पढ़ाई छोड़ दी। एनएमसी ने सूचना के अधिकार आरटीआई के तहत पूछे गए सवालों के जवाब में ये आंकड़े दिए। रिपोर्ट बताती है कि आत्महत्या करने वाले 64 एमबीबीएस छात्रों में से एक और आत्महत्या करने वाले 58 स्नातकोत्तर मेडिकल छात्रों में से चार दिल्ली से थे। आरटीआई कार्यकर्ता डॉ. विवेक पांडे ने एनएमसी से यह जानकारी प्राप्त की। उन्होंने बताया कि जिन छात्रों ने पढ़ाई छोड़ी, उनमें से तीन एमबीबीएस कर रहे थे और 155 पीजी कोर्स में थे। ये सभी 2018 और 2022 के बीच के बैच के और दिल्ली से थे। फेडरेशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (FORDA) के अध्यक्ष डॉ. अविरल माथुर ने जोर देकर कहा कि ये आंकड़े गवाही हैं कि मेडिकल छात्रों को कितनी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। मेडिकल एजुकेशन की कठोर शर्तें छात्रों में तनाव पैदा करती हैं और उसे बढ़ाती हैं। ऐसे में पहचानना महत्वपूर्ण है कि इन आत्महत्याओं के अंतर्निहित कारण बहुआयामी हैं।

डॉ. माथुर के अनुसार, असीमित ड्यूटी आवर, आराम करने के पर्याप्त वक्त का अभाव, घटिए सीनियर्स के कारण बना दमघोंटू वातावरण और पीजी स्टूडेंट्स के लिए समय की कमी जैसे कारक शारीरिक थकान और मानसिक समस्याओं के आधार बनते हैं। उन्होंने कई संस्थानों में जोखिम वाले छात्रों की समस्याओं के समाधान के लिए उचित तंत्र और काउंसलिंग सर्विस के अभाव की भी चर्चा की। डॉ. माथुर ने आगे बताया कि परिवार की उम्मीदों से पैदा हुआ तनाव, पढ़ाई का बहुत ज्यादा बोझ और मरीजों के इलाज की जिम्मेदारियां छात्रों का जीवन बहुत कठिन बना देती हैं। अलग-अलग भाषा की पृष्ठभूमि के छात्रों के लिए भाषा की बाधाएं, मेडिकल एजुकेशन के शैक्षणिक और सामाजिक पहलुओं के अनुकूल होने में उनकी कठिनाइयों को और बढ़ा देती हैं। FAIMA डॉक्टर्स एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. रोहन कृष्णन ने मेडिकल छात्रों के बीच खतरनाक आत्महत्या दर के मुख्य कारणों में से एक के रूप में दंडात्मक प्रणाली की पहचान की। उन्होंने कहा कि छात्रों को पढ़ाई छोड़ने के डर से मनोवैज्ञानिक दबाव का सामना करना पड़ता है, क्योंकि ऐसा करने पर सख्त दंड का प्रावधान है। कुछ कॉलेजों में, जो छात्र प्रवेश के बाद छोड़ना चाहते हैं, उन्हें 50 लाख रुपये का जुर्माना भरना पड़ता है और अगले तीन साल तक परीक्षा नहीं दे सकते।

दिल्ली में केंद्र सरकार के मेडिकल कॉलेजों- लेडी हार्डिंग्स, सफदरजंग और आरएमएल और दिल्ली सरकार के मेडिकल कॉलेजों- मौलाना आजाद और यूसीएमएस यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइसेंज में छात्रों को एडमिशन के वक्त कोई बॉन्ड नहीं भरना पड़ता है, लेकिन आर्मी और ईएसआई के मेडिकल कॉलेजों में ऐसा प्रावधान है। डॉ. कृष्णन ने कहा कि सरकार और आयोग की यह नीतिगत विफलता उन छात्रों के लिए कोई रास्ता नहीं छोड़ती जो डॉक्टरी की पढ़ाई छोड़ना चाहते हैं। उन्होंने ऐसे छात्रों के लिए बिना जुर्माना पढ़ाई छोड़ने का विकल्प देने की वकालत की, जिसके लिए मेडिकल एजुकेशन पॉलिसी में सुधार की वाकई सख्त दरकार है।

चिकित्सा शिक्षा प्रणाली में सुधारों की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने पढ़ाई के तनावपूर्ण माहौल और आरटीआई से मिले आंकड़ों में झलकी मेडिकल स्टूडेंट्स की हालत पर चिंता जाहिर की। डॉ. द्विवेदी ने कहा कि इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए शैक्षणिक संस्थानों, क्लिनिकों-अस्पतालों, नीति निर्माताओं और छात्र संगठनों सहित सभी हितधारकों को सहयोग की भावना से आगे आना होगा। मेडिकल छात्रों को कितनी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। मेडिकल एजुकेशन की कठोर शर्तें छात्रों में तनाव पैदा करती हैं और उसे बढ़ाती हैं। सरकार और आयोग की यह नीतिगत विफलता उन छात्रों के लिए कोई रास्ता नहीं छोड़ती जो डॉक्टरी की पढ़ाई छोड़ना चाहते हैं। उन्होंने ऐसे छात्रों के लिए बिना जुर्माना पढ़ाई छोड़ने का विकल्प देने की वकालत की, जिसके लिए मेडिकल एजुकेशन पॉलिसी में सुधार की वाकई सख्त दरकार है।ऐसे में पहचानना महत्वपूर्ण है कि इन आत्महत्याओं के अंतर्निहित कारण बहुआयामी हैं।डॉ. माथुर ने भी ऐसा अनुकूल माहौल बनाने पर जोर दिया जिसमें मेडिकल स्टूडेंट्स घुटन महसूस करने की जगह उत्साह से लबरेज हों। उन्होंने चौतरफा कदम उठाने का आह्वान किया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी छात्र मेडिकल एजुकेशन में अच्छा प्रदर्शन करने की यात्रा में खुद को अकेला महसूस नहीं करे।

क्या वर्तमान के इंसान बनते जा रहे हैं जानवर?

वर्तमान के इंसान जानवर बनते जा रहे हैं! हाल ही में रिलीज हुई एनिमल मूवी का यह गीत इतने खून-खराबे के साथ पर्दे पर फिल्माया गया है, शायद ही कमजोर दिल के लोग इसे देख पाएं। हद तो तब हो जाती है जब फिल्म का हीरो विलेन की गर्दन को ISIS के आतंकी की तरह लहुलूहान कर देता है। यहां मसला एक फिल्म का नहीं है, बल्कि मिर्जापुर जैसी तमाम वेब सीरीज और पंजाबी एल्बम सॉन्ग में खुलेआम परोसी जा रही हिंसा का है। दरअसल अब पर्दे पर फिल्माए जा रहे क्राइम सीन आम जीवन में भी देखने को मिल रहे हैं। मामला अब गंभीर होता जा रहा है। ताजा उदाहरण आज ही देखने मिला है। दिल्ली में बेखौफ शूटर ने सैलून में घुसकर एक शख्स की खोपड़ी खोल दी है। इससे पहले फेसबुक लाइव के दौरान एक नेता की गोली मारकर हत्या का मामला सामने आया है। महाराष्ट्र में बीजेपी विधायक ने शिवसेना नेता को पुलिस स्टेशन के भीतर गोलियों से भून डाला। यह घटना डरा रही है।

आखिर फिल्मी अंदाज में हो रहीं हत्याओं का जिम्मेदार कौन है? यह सवाल अब उठने लगा है। इस सवाल के जवाब में जितनी देरी होगी, उतनी ही जघन्य हत्याओं के मामलों में इजाफा होगा। समाज के अधिकांश बुद्धिजीवी मानते हैं कि इन हत्याओं के पीछे फिल्में और क्राइम वेब सीरीज हैं। उनका तर्क है कि फिल्मों में हीरो को सरेआम मर्डर करते हुए दिखाया जाता है। यह फिल्में और वेब सीरीज अपराध का महिमामंडन करती है। अपराध को ग्लैमर की तरह पेश करती हैं। जिसका सीधा असर लोगों के दिमाग पर पड़ता है। खासतौर पर युवाओं के दिमाग पर। उन्हें लगता है कि हत्या का मॉर्डन स्टाइल कूल है। लेकिन वह इस बात को भूल जाते हैं कि रील और रियल लाइफ में जमीन और आसमान का फर्क है, और अपराध की दुनिया में फंस जाते हैं। सोशल मीडिया साइट्स भी बढ़ते अपराध के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं, क्योंकि सोशल साइट्स पर भी हिंसा को बढ़ावा देने वाली रील दिनभर वायरल होती हैं। हाल ही में पब्लिक प्लेस में हुए मर्डर के कुछ वीडियो तो रोंगटे खड़े करने वाले हैं। मुंबई में कैमरे पर दनादन फायरिंग और शिवसेना उद्धव गुट के एक नेता की लाइव हत्या का मंजर दहला देने वाला है। फेसबुक पर जिस किसी ने यह खौफनाक वीडियो देखा वह दंग रह गया। लाइव मर्डर की तस्वीरों को देखकर हर कोई दहल गया। मुंबई में हुए इस मर्डर में शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट के पूर्व नगर सेवक अभिषेक घोषालकर को गोली मारी गई और वो भी फेसबुक लाइव के दौरान।ऐसा मर्डर शायद ही इससे पहले कभी देखा गया हो। वहीं हाल ही में महाराष्ट्र के उल्हासनगर में हिल लाइन पुलिस स्टेशन के अंदर बीजेपी विधायक गणेश गायकवाड़ ने कथित तौर पर शिवसेना नेता महेश गायकवाड़ को गोली मार दी। दोनों नेताओं के बीच कथित तौर पर जमीन को लेकर विवाद चल रहा था।

श्री राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुखदेव सिंह गोगामेड़ी की बीते साल 5 दिसंबर को जयपुर में गोली मार कर हत्या कर दी गई। सुखदेव सिंह को जयपुर के श्यामनगर इलाके में गोली मारी गई। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर भी वायरल हुआ था। वीडियो में बदमाश फिल्मी स्टाइल में फायरिंग करते हुए सुखदेव सिंह गोगामेड़ी को मौत के घाट उतार देते हैं। सुखदेव सिंह का राजनीति में काफी अच्छा वर्चस्व था। गोगामेड़ी की हत्या की जिम्मेदारी लॉरेंस बिश्नोई गैंग के साथी रोहित गोदारा ने ली।

दिल्ली में बीते साल हत्या की एक घटना को कुछ तरह से अंजाम दिया गया जिसे देखकर हर किसी के रोंगटे खड़े हो गए। हत्या की यह घटना तब सुर्खियों में आई जब इसका सीसीटीवी फुटेज वायरल हुआ। दिल्ली के वेलकम इलाके की मजदूर कॉलोनी में घटी हत्या की इस घटना की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सीसीटीवी फुटेज में एक लड़का गली के अंदर से कुछ घसीटकर लाते हुए दिखाई देता है। पहले तो वह कोई भारी सामान जैसा दिखता है, लेकिन बाद में पता चलता है कि वह किसी व्यक्ति की लाश को घसीट कर ला रहा है। इसके बाद लड़का उस शख्स के ऊपर ताबड़तोड़ चाकुओं से हमला करता है। सीसीटीवी फुटेज में वह करीब 100 बार चाकुओं से हमला करता दिखाई देता है। जब शख्स के जिस्म में कोई हरकत नहीं होती है तो उसे मरा समझकर लड़का डांस करता है। दिल्ली में सरेराह इस तरह की हत्या ने लोगों को झकझोर के रख दिया।

रियल दुनिया के अपराध से पहले फिल्मों और बेव सीरीज में दिखाई जा रही हिंसा पर रोक लगाना बेहद जरूरी हो गया है। लेकिन सवाल खड़ा होता है कि सेंसर बोर्ड के होते हुए फिल्मों और वेब सीरीज में इतनी हिंसा कैसे दिखाई जा रही है। यहां सरकार की भूमिका पर भी सवालियां निशान लगता है। उधर समाजिक संगठन का भी इस दिशा में कोई प्रयास नहीं हैं। समाज और सरकार के सुस्त रवैये की वजह से फिल्मों में जघन्य अपराध के सीन खुलेआम परोसे जा रहे हैं। ताज्जुब की बात तो यह है कि लोग इन फिल्मों को खूब सराहा भी रहे हैं। ऐसी फिल्मों का कारोबार भी 500-600 करोड़ से ज्यादा का हैं। लेकिन हमें इस बात पर ध्यान देना होगा कि हम हिंसा को ग्लैमर की तरह परोसने वाली जिन फिल्मों का समर्थन कर रहे हैं, वहीं समाज में भयानक रूप धारण करके वापस आ रही हैं।

जानिए लॉरेंस बिश्नोई की पूरी जिंदगी की कहानी!

आज हम आपको लॉरेंस बिश्नोई की जिंदगी की कहानी सुनाने जा रहे हैं! जब सलमान खान को मारेंगे तो पता चल ही जाएगा, यहीं उसे जोधपुर में मारेंगे। साल 2018 जून महीने का एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें खुले तौर पर बॉलीवुड के दबंग खान को जान से मारने की बात करने वाले इस शख्स के बारे में लोगों को पहली बार पता चला। नाम था लॉरेंस बिश्नोई। जी हां वही लॉरेंस बिश्नोई जिसने पिछले साल मशहूर पंजाबी सिंगर सिद्धू मूसेवाला को जान से मरवाया था। हाल ही में हरियाणा के इनलो चीफ नफे सिंह राठी की भी हत्या करवाने का इल्जाम इसके सिर पर है। कहते हैं कि साल 2018 के इस वीडियो के बाद से ही सबको पता चला कि वह है कौन। शुरू से ही लॉरेंस के अंदर खुद की धाक और नाम बनाने की धुन सवार थी। आज के समय में जुर्म की दुनिया का बेताज बादशाह बना बैठा लॉरेंस बिश्नोई के नाम से लोग खौफ खाते हैं। इसका खुद के नाम से एक गैंग चलता है। नाम है लॉरेंस बिश्नोई गैंग। जेल की चाहरदीवारी से यह गैंग के साथियों की मदद से न जाने कितने क्राइम रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करा चुका है। लॉरेंस बिश्नोई या उसके गैंग से किसी को भी दुश्मनी भारी ही पड़ी है। फिर वह चाहे दुनिया के किसी भी कोने में हो, उसका अंत तय है। आज हम लॉरेंस बिश्नोई गैंग की क्राइम कुंडली निकालेंगे। पता लगाएंगे कि आखिर कैसे एक पुलिस कॉन्सटेबल का बेटा जुर्म से लड़ने के बजाया जुर्म का आका बन गया। पंजाब के फिरोजपुर के अबोहार में पुलिस कॉन्सटेबल लविंदर सिंह के घर एक लड़के ने जन्म लिया। आज से करीब 31 साल पहले यानी साल 1993। पिता पुलिस में थे और घर में पढ़ाई लिखाई का माहौल था। स्कूली शिक्षा के बाद कॉलेजी पढ़ाई करने राजधानी चंडीगढ़ भेज दिया गया। वहां डीएवी कॉलेज से बीए की डिग्री भी ले ली। वहां छात्र संघ के चुनाव में भी खड़ा हुआ लेकिन हार गया। चुनाव में हार के बाद से ही जैसे उसकी दूसरी दुनिया शुरू होने वाली थी। हार की टीस के बाद जिसकी जीत हुई, उससे इसके झगड़े शुरू हो गए। दोनों के बीच चंडीगढ़ में गोलीबारी हो गई। इसके बाद एक और कारण था। कारण था उसकी गर्लफ्रेंड। लॉरेंस बिश्नोई अपनी गर्लफ्रेंड से बेहद प्यार करता था। स्कूल का साथ चंडीगढ़ के डीएवी कॉलेज तक आ गया। वहां जब चुनाव जीतने वाली टीम से उसकी लड़ाई चल रही थी तभी उसके गर्लफ्रेंड की मौत हो गई। किसी ने कहा कि लड़की की चलती कार में आग लगने से मौत हो गई तो किसी ने कहा कि लॉरेंस के दुश्मन गैंग ने जानबूझकर उसे मार दिया। यहीं से लॉरेंस बिश्नोई ने जुर्म की दुनिया में एंट्री ली। रंगदारी और वसूली से शुरुआत हुई और बाद में वह इसमें रमता चला गया। मानो उसके बचपन का सपना पूरा हो रहा था। उसे तो अपराध की काली दुनिया में अपना नाम बनाना था।

लॉरेंस बिश्नोई 2018 से पहले एक मामूली अपराधी था। उसने अपना एक गैंग बनाना शुरू किया। नाम रखा 007। यह नाम जासूस जेम्स बॉन्ड के फेमस 007 से लिया गया था। इसके बाद साल 2018 में उसने राजस्थान के दो बिजनेसमेन से फिरौती-रंगदारी मांगी। एक ने बिना डरे लॉरेंस को मना कर दिया। उसने पुलिस को शिकायत कर दी। लॉरेंस बिश्नोई गैंग गिरफ्तार हो गया। इसके बाद उसे अजमेर जेल में डाला गया। तब तक भी उसे कोई नहीं जानता था। फिर उसने जेल से सोशल मीडिया पर एक्टिव होना शुरू हुआ। कई पोस्ट करने लगा। इससे पहले गैंगस्टर आनंदपाल से नजदीकी बना ली थी। लॉरेंस ने अपने गुर्गे संपत नेहरा को काम सौंपा कि तुम्हें मुंबई में सलमान खान को जान से मारना है।

संपत ने गैलेक्सी अपार्टमेंट की रेकी की लेकिन बैंगलोर में वह किसी और मामले में पकड़ा गया। पुलिस को उसने सब सच बता दिया। इसके बाद लॉरेंस बिश्नोई पर सलमान खान मामले में अलग से मुकदमा चला। तभी उसने कहा था कि अभी तो किया नहीं है… जब सलमान खान को मारेंगे तो पता चल ही जाएगा। सलमान के पहले वह यूथ कांग्रेस के जिलाध्यक्ष व गोलेवाला जोन से जिला परिषद सदस्य गुरलाल सिंह पहलवान की हत्या करवा चुका था। उसने सोशल मीडिया पर इसे कबूला भी था। असल में सलमान खान पर काले हिरण को मारने का आरोप था। लॉरेंस बिश्नोई समाज से आता था और उस समाज के लोग काले हिरण को पूजते हैं। यहीं से लोगों को पता चला कि यह लॉरेंस बिश्नोई है।

लॉरेंस बिश्नोई गैंग का नाम हाई प्रोफाइल किलिंग में ही जुड़ा है। पहले मशहूर पंजाबी सिंगर सिद्धू मूसेवाला फिर राजपूत करणी सेना के नेता सुखदेव सिंह गोगामेड़ी और अब नफे सिंह राठी। सिद्धू मूसेवाला की साल 2022 में हत्या की गई थी। सिद्धू अपनी गाड़ी से रोजाना की तरह बाहर निकला था। उस दिन गलती से सिक्योरिटी नहीं ली थी। बस इसी का फायदा उठाकर उसकी गाड़ी को निशाना बनाया गया और ताबड़तोड़ गोलियों से भून दिया गया। यह लॉरेंस के के लिए पहला हाई प्रोफाइल मर्डर था। इसके बाद पिछले साल 2023 दिसंबर में लॉरेंस बिश्नोई गैंग ने राजस्थान करणी सेना के प्रमुख सुखदेव सिंह गोगामेड़ी को ऑफिस में घुसकर कई राउंड गोलियों से मार डाला। अब नफे सिंह राठी पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर मर्डर कर दिया गया। हालांकि उसे नफे सिंह राठी की मौत का जिम्मेदार बताया जा रहा है। अभी इसपर हत्या की जिम्मेदारी नहीं ली गई है।

लॉरेंस बिश्नोई को देश ही नहीं विदेश से भी मदद मिलती है। इस गैंग के लोग विदेश से भी धंधा चला रहे हैं। लॉरेंस बिश्नोई गैंग में इस समय संदीप उर्फ काला जठेड़ी, अनिल छिप्पी, राजू बसौदी जैसे कई गैंगस्टर हैं। विदेश से गोल्डी बराड़, लिपिन नेहरा और रोहित गोदारा का नाम भी है। इस गैंग की एक बाक और है कि इसके लोग जुर्म भी तत्काल कुबूल कर लेते हैं। यह सोशल मीडिया पोस्ट से यह बताने और जताो की कोशिश करते हैं कि लोग उनसे डर के रहें नहीं तो अंजाम ऐसा ही होगा।

आखिर कहां से चुनाव लड़ेंगे राहुल गांधी?

यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर राहुल गांधी कहां से चुनाव लड़ेंगे! लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी इस बार केरल को अलविदा कह सकते हैं। केरल में एलडीएफ ने राहुल गांधी की वायनाड सीट के साथ ही शशि थरूर की तिरुवनंतपुरम सीट से उम्मीदवार की घोषणा कर दी है। ऐसे में माना जा रहा है कि राहुल गांधी इस बार वायनाड सीट से चुनाव नहीं लड़ेंगे। हालांकि, राहुल गांधी के वायनाड से चुनाव नहीं लड़ने की खबरें पहले भी आई थीं। एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि राहुल गांधी इस बार तेलंगाना के साथ ही यूपी की रायबरेली या अमेठी से चुनाव मैदान में उतर सकते हैं। हालांकि, कांग्रेस की तरफ से इस संबंध में अभी तक स्थिति साफ नहीं की गई है। राहुल गांधी ने भी अपनी तरफ से अमेठी में स्मृति ईरानी के खिलाफ चुनाव लड़ने के मुद्दे पर कुछ नहीं कहा है। इंडिया गठबंधन में शामिल सीपीआई एम ने केरल की चार सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। खास बात है कि चार में राहुल गांधी की वायनाड और पार्टी नेता शशि थरूर की तिरुवनंतपुरम सीट भी शामिल है। सीपीआई ने पार्टी महासचिव डी राजा की पत्नी और वरिष्ठ सीपीआई नेता एनी राजा को वायनाड निर्वाचन क्षेत्र से मैदान में उतारा गया है। हालांकि, इंडिया गठबंधन की तरफ से अभी केरल में सीटों की शेयरिंग को लेकर अभी कोई समझौता सामने नहीं आया है। इस बीच एक घटक की तरफ से उम्मीदवारों की घोषणा को इंडिया गठबंधन में दरार की तरफ भी देखा जा रहा है। वहीं, राजनीतिक के जानकार इसे वाम दलों की तरफ से कांग्रेस पर दबाव बनाने की रणनीति बताया जा रहा है। न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग आईयूएमएल की तरफ से मौजूदा दो के बजाय तीन सीटें आवंटित करने के दबाव के बीच गांधी वायनाड निर्वाचन क्षेत्र छोड़ने पर विचार कर रहे हैं। राहुल गांधी साल 2019 में यूपी की अमेठी के साथ ही केरल की वायनाड सीट से चुनाव लड़े थे। अमेठी में स्मृति ईरानी के हाथों राहुल गांधी को हार का सामना करना पड़ा था। वहीं, वायनाड में राहुल को जीत मिली थी। अब एलडीएफ के उम्मीदवार उतारने के बाद चर्चा शुरू हो गई है कि राहुल गांधी वायनाड से नहीं लड़ेंगे। सीपीआई ने पार्टी के दिग्गज नेता और पूर्व सांसद पन्नियन रवींद्रन को भी तिरुवनंतपुरम से टिकट देने की घोषणा कर दी है। यहां से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर अभी सांसद हैं। में अपने पर्याप्त मुस्लिम मतदाता आधार को देखते हुए, IUML वायनाड से अपना उम्मीदवार खड़ा करना चाहता है।

माना जा रहा है कि राहुल गांधी तेलंगाना के अलावा यूपी की अमेठी या रायबरेली सीट में से किसी एक सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। सोनिया गांधी ने इस बार रायबरेली से चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया है। ऐसे में माना जा रहा है कि राहुल अपने परिवार की पारंपरिक सीट से चुनावी मैदान में उतर सकते हैं। अमेठी को लेकर खबर है कि राहुल गांधी यहां से चुनाव लड़ने को लेकर उतने उत्साहित नहीं दिख रहे हैं। दूसरी तरफ चुनाव हारने के बाद राहुल अमेठी में कम दिलचस्पी दिखाई दिखाई है। वहीं, एक चर्चा यह भी है कि यहां से वरुण गांधी भी चुनाव लड़ सकते हैं। हालांकि, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच समझौते में यह सीट कांग्रेस के खाते में गई है। ऐसे में अगर सहमति बनती है तो आखिरी समय में वरुण गांधी यहां समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ सकते हैं।

राहुल गांधी साल 2019 में यूपी की अमेठी के साथ ही केरल की वायनाड सीट से चुनाव लड़े थे। अमेठी में स्मृति ईरानी के हाथों राहुल गांधी को हार का सामना करना पड़ा था। वहीं, वायनाड में राहुल को जीत मिली थी। अब एलडीएफ के उम्मीदवार उतारने के बाद चर्चा शुरू हो गई है कि राहुल गांधी वायनाड से नहीं लड़ेंगे। सीपीआई ने पार्टी के दिग्गज नेता और पूर्व सांसद पन्नियन रवींद्रन को भी तिरुवनंतपुरम से टिकट देने की घोषणा कर दी है। यहां से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर अभी सांसद हैं। में अपने पर्याप्त मुस्लिम मतदाता आधार को देखते हुए, IUML वायनाड से अपना उम्मीदवार खड़ा करना चाहता है।सीपीआई ने पार्टी के दिग्गज नेता और पूर्व सांसद पन्नियन रवींद्रन को भी तिरुवनंतपुरम से टिकट देने की घोषणा कर दी है। यहां से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर अभी सांसद हैं।

क्या अगले 5 साल होने वाले हैं भारत के लिए खास?

अगले 5 साल भारत के लिए बेहद खास होने वाले हैं! प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत में बढ़ रहे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश एफडीआई और करदाताओं की बढ़ती संख्या सहित अन्य आंकड़ों का हवाला देते हुए सोमवार को कहा कि पिछले 10 वर्ष में सरकार के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ा है और इन्हीं मजबूत आधारों पर भारत आने वाले पांच वर्ष में एक बड़ी छलांग लगाने के लिए तैयार है। एक न्यूज चैनल के कार्यक्रम में उन्होंने यह दावा भी किया कि साल 2014 के बाद उनके नेतृत्व वाली सरकार के विकास मॉडल से ग्रामीण भारत भी सशक्त हुआ है। पिछली सरकार के 10 वर्षों के दौरान भारत ने एफडीआई में केवल 300 बिलियन डॉलर आकर्षित किए। हमारी सरकार के 10 वर्षों में, भारत ने 640 बिलियन डॉलर का एफडीआई प्राप्त किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि डिजिटल क्रांति, कोविड-19 महामारी के दौरान टीकों में विश्वास और 10 वर्षों में करदाताओं की बढ़ती संख्या साबित करते हैं कि सरकार के प्रति लोगों में विश्वास बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि 2014 में लोगों ने म्यूचुअल फंड में 9 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया था जबकि 2024 में म्यूचुअल फंड में 52 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश हुआ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोग देश की क्षमता में विश्वास करते हैं। भारत एक बड़ी छलांग लगाने के लिए तैयार है तो उसके पीछे 10 साल का एक पावरफुल लॉन्चपैड है। प्रधानमंत्री ने कहा कि इसलिए देश के अधिकांश लोगों ने भी ये मान लिया था कि देश तो अब ऐसे ही चलेगा।पिछले 10 वर्ष में ऐसा क्या बदला कि आज हम यहां पहुंचे हैं? ये बदलाव है सोच का, ये बदलाव है आत्मविश्वास का, भरोसे का। ये बदलाव है सुशासन का है।हमारे तीसरे कार्यकाल में भारत के सामर्थ्य को नई ऊंचाई तक पहुंचाना है। विकसित भारत की संकल्प यात्रा में आने वाले पांच वर्ष हमारे देश की प्रगति और प्रशस्ति के वर्ष हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि आज 21वीं सदी के भारत ने छोटा सोचना छोड़ दिया है। आज वह जो करता है, वह सर्वश्रेष्ठ और सबसे बड़ा होता है। आज भारत की उपलब्धियां देखकर दुनिया हैरान है। दुनिया, भारत के साथ चलने में अपना फायदा देख रही है।पूर्ववर्ती सरकारों, खासकर कांग्रेस पर निशाना साधते हुए मोदी ने कहा कि आजादी के बाद दशकों तक जिन्होंने सरकार चलाई, उनका भारतीयता के सामर्थ्य पर ही विश्वास नहीं था। उन्होंने भारतीयों के सामर्थ्य को कम करके आंका। तब लाल किले से कहा जाता था कि हम भारतीय निराशावादी हैं, पराजय भावना को अपनाने वाले हैं। लाल किले से ही भारतीयों को आलसी कहा गया, मेहनत से जी चुराने वाला कहा गया। उन्होंने कहा कि जब देश का नेतृत्व ही निराशा से भरा हुआ हो तो फिर देश में आशा का संचार कैसे होता। प्रधानमंत्री ने कहा कि इसलिए देश के अधिकांश लोगों ने भी ये मान लिया था कि देश तो अब ऐसे ही चलेगा।पिछले 10 वर्ष में ऐसा क्या बदला कि आज हम यहां पहुंचे हैं? ये बदलाव है सोच का, ये बदलाव है आत्मविश्वास का, भरोसे का। ये बदलाव है सुशासन का है।

मोदी ने कहा कि 2014 के बाद से सरकार ने गांव को ध्यान में रखकर इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया, गांव और शहर के बीच कनेक्टिविटी बेहतर हुई और रोजगार के नए अवसर तैयार किए गए तथा महिलाओं की आय बढ़ाने के साधन विकसित किए गए। विकास के इस मॉडल से ग्रामीण भारत सशक्त हुआ है। पहले की सरकारों की एक और सोच यह थी कि वे देश की जनता को अभाव में रखना पसंद करती थीं। बता दें कि 2014 में लोगों ने म्यूचुअल फंड में 9 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया था जबकि 2024 में म्यूचुअल फंड में 52 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश हुआ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोग देश की क्षमता में विश्वास करते हैं। भारत एक बड़ी छलांग लगाने के लिए तैयार है तो उसके पीछे 10 साल का एक पावरफुल लॉन्चपैड है। हमारे तीसरे कार्यकाल में भारत के सामर्थ्य को नई ऊंचाई तक पहुंचाना है। विकसित भारत की संकल्प यात्रा में आने वाले पांच वर्ष हमारे देश की प्रगति और प्रशस्ति के वर्ष हैं। अभाव में रह रही जनता को यह लोग चुनाव के समय थोड़ा बहुत देकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते थे। उसके चलते ही देश में एक वोट बैंक पॉलिटिक्स का जन्म हुआ यानी सरकार केवल उसके लिए काम करते थी जो उन्हें वोट देता था। तो इस प्रकार कहीं ना कहीं अगले 5 साल भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण होने वाले हैं! 

अमेज़न प्राइम वीडियो पर रिलीज़ हुई वेब सीरीज़ पोचर की समीक्षा.

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पुलिस ने बेपरवाह लहजे में कहा कि जो लोग कंक्रीट के जंगलों में रहते हैं, उन्हें जंगल के हाथियों की मौत से कोई फर्क नहीं पड़ता. जब लोग मरते थे, तब भी ऐसा ही होता था। वन विभाग की कर्मचारी माला ने प्रदूषण के खतरे वाले क्षेत्र में रहने वाले दिल्ली शहर की पुलिस को पारिस्थितिकी तंत्र समझाने की हिम्मत नहीं की। शहरी लोगों के लिए हाथी बिल्कुल जंगली चीज़ हैं। दूसरी ओर, दूसरे लोग, जो हाथियों के झुंड के लिए अपनी खाद्य फसलों को नष्ट करना जानते हैं। फिर भी वह समझता है कि वन्यजीवों को मारना कितना बड़ा अपराध है। इसलिए उस अपराध में शामिल होने के बाद भी व्यक्ति अपराध का खंडन करने के प्रलोभन से ग्रस्त रहता है। दोनों किरदार प्राइम वीडियो की ‘पॉचर’ सीरीज के हैं। ‘डेल्ही क्राइम’ के बाद, रिची मेहता ने केरल में हाथी दांत के अवैध शिकार के बारे में एक श्रृंखला बनाई। विषय की गहराई के कारण आलिया भट्ट इस सीरीज से जुड़ी हैं। सच्ची घटनाओं पर आधारित काल्पनिक थ्रिलरों की भीड़ में, ‘पोचर’ विचार के लिए भोजन देता है। सवाल यह है कि शहरी स्वार्थ का अंत कहां है?

कहानी कुछ इस तरह है – 2015 में, केरल के मलयत्तूर क्षेत्र में एक निचले स्तर के वन कार्यकर्ता अरुकु ने बताया कि शिकारी फिर से सक्रिय हो गए हैं। 18 हाथियों को मार डाला गया और उनके दाँत काट दिये गये। लेकिन वन विभाग अंधेरे में है. अरुकु स्वयं भी अस्थायी लालच में शामिल हो गया। लेकिन अंतरात्मा की पीड़ा ने उसे सहन नहीं किया। यह खबर सुनकर राज्य का वन विभाग हैरान रह गया। इस परियोजना में वन्यजीव अपराध ब्यूरो सहित कई एजेंसियां ​​शामिल हैं। माला (निमिषा सजयन), एलन (रोशन मैथ्यू), नील (दिव्येंदु भट्टाचार्य) शिकारियों को पकड़ने के लिए दिन-रात काम करते हैं।

केरल भर में कई राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, बायोस्फीयर रिजर्व। प्रकृति ने इस साम्राज्य को उजाड़ दिया है। लेकिन भगवान के देश को लूटने के लिए बदमाशों की भी कमी नहीं है. सरकारी सूत्रों के मुताबिक, 1995 के बाद से केरल में हाथियों का अवैध शिकार नहीं हुआ है। लेकिन 2015 में हाथी दांत के अवैध शिकार का मामला फिर सामने आया. चीन हाथीदांत का सबसे बड़ा खरीदार था। धीरे-धीरे इस देश में भी खरीददार बढ़ने लगे। अरबों रुपये मूल्य के विदेशी हाथीदांत उत्पाद। लकड़ी से बनने लगी गणेश जी की मूर्ति! केरल वन विभाग ने दिल्ली के एक कारोबारी के पास से 500 किलो से ज्यादा हाथी दांत बरामद किया है. तब एहसास हुआ कि तस्करी का दायरा कितना व्यापक है.

‘पोचर’ सिर्फ शिकार की कहानी नहीं कहता. यह प्रकृति के साथ मानव संबंध की कहानी भी बताता है। अपराधियों को पकड़ने के लिए अपनी जान देने वाली माला वास्तव में चोर के अपराध से पीड़ित है। उनके अपने पिता भी एक शिकारी थे। टीम लीडर नील बनर्जी कैंसर से लड़ रहे हैं। एलन खुलकर यह नहीं कह सकता कि घर पर उसका असली काम क्या है। मन्त्रगुप्ति इसी कार्य में है। निमिषा, रोशन और दिव्यांदु, इन तीन एक्टर्स पर ये सीरीज खड़ी है। उनका स्वाभाविक, सहज अभिनय दर्शकों को कहानी से जोड़ता है। सहायक कलाकार भी सराहनीय हैं। स्थानीय लोगों को पात्र के रूप में प्रस्तुत करने से इसे और अधिक विश्वसनीयता मिलती है। लेकिन अवसरों के बावजूद कानी कश्रुति जैसी अभिनेत्रियों का सही उपयोग नहीं किया गया।

इस सीरीज का हरा कैनवास आंखों को सुकून देता है। एक दृश्य से दूसरे दृश्य में जाते समय रूपक के रूप में वन्य जीवन का उपयोग सराहनीय है। निर्देशक ने कहानी को धाराप्रवाह बताया है. थ्रिलर में सस्पेंस भी है. लेकिन कुछ मामलों में यह मुश्किल है. स्थानीय शिकारियों को नियंत्रित करने वाले छिपे रहते हैं। दिल्ली की कारोबारी पूनम वर्मा को गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन क्या ये काम बिना प्रशासनिक और राजनीतिक समर्थन के संभव है? वह सब निहित रहता है. संदिग्ध अपना मुंह बहुत आसानी से खोल देते हैं!

पोचर में जो दिखाया गया है वह वास्तव में हिमशैल का सिरा है। केरल के अलावा अन्य राज्यों में भी वन्यजीव खतरे में हैं। शिकार गिरोह की मोटी रकम पकड़े जाने के बाद भी जब सीबीआई प्रमुख आकर बेपरवाह अंदाज में कहते हैं कि उनके हाथ में बड़ी जांच है, तो समझ आता है कि मादक पदार्थ जैसे अपराधों के आगे वन्यजीवों की हत्याएं बिल्कुल भी महत्वपूर्ण नहीं हैं। हथियारों की तस्करी, आतंकवाद। पर्यावरण केवल पाठ्यपुस्तकों और सेमिनारों के लिए है। “जंगल वापस दो” मुख्यतः मन के विस्तार का विषय है।

अंबानी की शादी में परफॉर्म करने के लिए रिहाना को मिल रही है कितनी फीस?

जामनगर में रिहाना! अनंत और राधिका के प्री-वेडिंग फंक्शन में गाने के लिए कितना चार्ज कर रहा है पॉप सिंगर? मुकेश अंबानी के सबसे छोटे बेटे अनंत और उनकी मंगेतर राधिका की प्री-वेडिंग सेरेमनी में हॉलीवुड पॉप-सिंगर रिहाना शामिल होंगी। वह कितने पैसे ले रहा है? अम्बानियों का समारोह मतलब शाही है। मौका कोई भी हो, जश्न तो होता ही है। मुकेश अंबानी के सबसे छोटे बेटे अनंत अंबानी और उनकी मंगेतर राधिका मर्चेंट की शादी 12 जुलाई को होगी। मुकेश-नीता नहीं चाहते कि उनके छोटे बेटे की शादी के जश्न में कोई कमी हो। इसलिए शादी से छह महीने पहले ही त्योहार शुरू हो गया है. अनंत-राधिका का प्री-वेडिंग सेलिब्रेशन शुक्रवार 1 मार्च से जामनगर में शुरू हो गया है। अनंत-राधिका की प्री-वेडिंग सेरेमनी में हॉलीवुड, बॉलीवुड और दक्षिणी सिनेमा जगत शामिल होगा। इस प्री-वेडिंग इवेंट में हॉलीवुड पॉप-सिंगर रिहाना मंच की शोभा बढ़ाएंगी।

शुक्रवार से कार्यक्रम जोर शोर से शुरू हो जाएगा। इसलिए रिहाना गुरुवार को टीम के साथ जामनगर पहुंचीं। एयरपोर्ट से निकलने के बाद उन्होंने फोटोग्राफर्स के कैमरे के सामने पोज दिए. राधिका और अनंत के प्री-वेडिंग फंक्शन में रिहाना क्या गाएंगी इसकी लिस्ट सामने नहीं आई है। हालाँकि, यह भी सुनने में आ रहा है कि पॉप सिंगर सबसे लोकप्रिय गानों में से एक ‘डायमंड’ गाएंगे। अम्बानियों के पास अपने आयोजनों के लिए कोई निश्चित बजट नहीं है। हालाँकि, कई लोग इस बात को लेकर उत्सुक हैं कि रिहाना अंबानी से कितने पैसे ले रही है। सूत्रों के मुताबिक रिहाना इस इवेंट में गाने के लिए करीब 66 से 77 करोड़ रुपये चार्ज कर रही हैं. रिहाना की सैलरी आमतौर पर इतनी ही होती है. लेकिन इस मामले में थोड़ा और, क्योंकि कुछ जरूरी संगीत वाद्ययंत्र और स्टेज सजावट की कुछ जरूरी चीजें रिहाना खुद लेकर आई हैं. इसीलिए पारिश्रमिक भी बढ़ गया है.

अंबानी के सबसे छोटे बेटे अनंत अंबानी और उनकी मंगेतर राधिका मर्चेंट की शादी 12 जुलाई को होगी। इससे पहले प्री-वेडिंग सेरेमनी 1 मार्च से 3 मार्च तक गुजरात के जामनगर में होगी. पूरा जामनगर उनके लिए तैयार किया गया है. इस बीच नीता अंबानी ने अपने बेटे की शादी के मौके पर जामनगर में 14 नए मंदिर बनवाए हैं। इस बीच बॉलीवुड स्टार ने मुंबई से जामनगर के लिए फ्लाइट पकड़ ली है. भारत के ‘अरबपति’ मुकेश अंबानी के सबसे छोटे बच्चे अनंत और एंकर हेल्थकेयर के सीईओ विनोद मर्चेंट की बेटी राधिका मर्चेंट की शादी का कई लोग इंतजार कर रहे हैं। मुकेश अंबानी दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक हैं। राधिका के पिता विनोद मर्चेंट भी पीछे नहीं हैं. उनके पास करीब 755 करोड़ की संपत्ति है. लेकिन राधिका ने अनंते के बारे में क्यों सोचा?

राधिका और अनंत एक-दूसरे को बचपन से जानते थे। अनंत को अक्सर अपनी अच्छी दोस्त राधिका के साथ कई इवेंट्स में देखा जाता था। हालांकि, प्रियंका चोपड़ा और निक जोनास की शादी से अनंत के साथ राधिका की शादी की अटकलें तेज हो गई हैं। जोधपुर में प्रियंका निक की शादी में अंबानी परिवार के साथ राधिका भी मौजूद थीं। मुंबई में दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह के रिसेप्शन में राधिका अंबानी भी परिवार के साथ पहुंचीं। राधिका ने न्यूयॉर्क से अर्थशास्त्र की पढ़ाई की और पारिवारिक व्यवसाय से जुड़ गईं। इसके अलावा वह एक क्लासिकल डांसर हैं. अनंत की मां नीता अंबानी ने हमेशा राधिका को रोककर रखा। अलग-अलग समय पर राधिका इवेंट में पहुंची हैं जहां वह डांस परफॉर्म करेंगी. अंबानी परिवार को शुरू से ही राधिका पसंद है। लेकिन यही एकमात्र कारण नहीं है. राधिका और अनंत दोनों पशु प्रेमी हैं। इससे वे करीब आ गये। अनंत ने हाल ही में जानवरों के संरक्षण और उनके कल्याण को ध्यान में रखते हुए ‘वंतारा’ पहल शुरू की है। सब कुछ जामनगर में किया गया। उस पहल से राधिका भी जुड़ी हैं. जानवरों के बारे में उन दोनों के विचारों में यह पहला कदम था।

अनंत ने कहा, ”मैं अपनी इस पहल में अकेला नहीं हूं. मेरे साथ राधिका भी है. जानवरों को लेकर उनके कई विचार हैं. परिवार के आशीर्वाद से हम जल्द ही एक होने वाले हैं।’ वास्तव में जामनगर हमेशा से मेरी पसंदीदा जगह रही है। सप्ताहांत यहाँ बिताने का प्रयास करें। पहले तो राधिका शिकायत करती थी. लेकिन अब मैं इस पहल से और अधिक जुड़ गया हूं।

अंबानी परिवार के सबसे छोटे बेटे की शादी का जश्न जामनगर से शुरू हो गया है. इस कार्यक्रम में फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग, गूगल की मूल कंपनी अल्फाबेट के सीईओ सुंदर पिचाई, माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स, वॉल्ट डिज़नी के सीईओ बॉब इगर, मॉर्गन स्टेनली के सीईओ टेड पीक, इवांका ट्रम्प और कई विदेशी कंपनी के नेताओं के शामिल होने की उम्मीद है।

अंकिता लोखंडे ने भयावह कास्टिंग काउच अनुभव को किया याद .

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एक्ट्रेस अंकिता लोखंडे ‘बिग बॉस 17’ के घर में आने के बाद से ही प्रैक्टिस कर रही हैं। ‘बिग बॉस’ के घर में पति विक्की जैन के साथ उनका लगातार झगड़ा शो के दौरान एक हॉट टॉपिक था। कई लोग इसे ‘सामान्य’ नहीं मान सके. कई लोगों ने सोचा कि यह सब प्रतियोगिता जीतने के लिए अंकिता की एक चाल थी। लेकिन अंकिता ‘बिग बॉस’ नहीं जीत पाईं. उन्हें चौथे स्थान से लौटना पड़ा. लेकिन इससे अंकिता की प्रैक्टिस नहीं रुकी. हाल ही में उन्होंने ‘कास्टिंग काउच’ को लेकर अपने अनुभव के बारे में बताकर प्रैक्टिस में वापसी की है. 19 साल की उम्र में उन्हें काम के बदले शारीरिक संबंध का ऑफर दिया गया। एक्ट्रेस आज भी उस घटना के बारे में सोचकर सिहर उठती हैं। अंकिता ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वह 18-19 साल की उम्र से ही स्क्रीन पर एक्टिंग करना चाहती थीं। वह अलग-अलग जगहों पर ऑडिशन देते रहे। अंकिता एक साउथ फिल्म के लिए ऑडिशन देने गई थीं. बाद में अंकिता को फोन पर बताया गया कि वह ऑडिशन में पास हो गई है। उसे बुलाया गया। लेकिन वहां जाते वक्त एक्ट्रेस को एक अप्रिय अनुभव का सामना करना पड़ा.

अंकिता ने कहा, ”मुझे फोन पर बताया गया कि आप ऑडिशन में पास हो गए हैं. यह सुनकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई! मुझसे कहा गया कि मैं वहां जाऊं और अनुबंध पर हस्ताक्षर करूं. मैं चला गया था वहां जाने के बाद फिल्म प्रोड्यूसर ने मुझे एक अलग कमरे में बुलाया. उसने मुझे जो बताया उसे सुनने के बाद मेरे कान खड़े हो गए।” तभी काम मिल सकता है. यह सुनने के बाद मैं वहां से भाग गया.”

हाल ही में अंकिता लोखंडे ने अपने पति विक्की जैन के साथ ‘बिग बॉस 17′ के घर में एंट्री की। कई लोगों ने सोचा था कि रियलिटी शो के मंच पर दर्शक उनकी शादीशुदा जिंदगी का खूबसूरत पक्ष देखेंगे। लेकिन हुआ ऐन उलटा। सार्वजनिक रूप से विक्की का अपमान करने से लेकर उनके चरित्र पर कीचड़ उछालने तक, अंकिता ने कोई कसर नहीं छोड़ी। कमी मत रखना विक्की. शो में रहते हुए अंकिता पर तंज कसा गया. बाहरी लोगों के सामने अंकिता को अपमानित किया. नेटिज़न्स के एक बड़े वर्ग का दावा है कि अंकिता के पति का चरित्र भी विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है। उनका वैवाहिक कलह व्यवहार का विषय बन गया। कभी-कभी ऐसा सुनने में आता है कि विक्की, अंकिता से शादी नहीं करना चाहते थे। आखिरकार शो छोड़ने के बाद एक्ट्रेस उस कमेंट पर राजी हो गईं.

हाल ही में अंकिता कॉमेडियन भारती सिंह के पॉडकास्ट पर पहुंचीं और अपने पति के प्लान के बारे में बताया. उनके शब्दों में, ”दरअसल, विक्की मुझसे शादी नहीं करना चाहता था. हमारा जीने का तरीका अलग है. ऊपर से मैं मुंबई में रहता हूं. वह बिलासपुर की किसी लड़की से शादी करना चाहते थे।” बिग बॉस में रहते हुए अंकिता ने कहा था कि विक्की उन्हें छोड़कर बेघर हो गए हैं। उस वक्त अंकिता ने कहा था, ”मुझे वह पूरे एक साल तक नहीं मिला. इसके बाद जब वह वापस आए तो हमें पता चला कि हम शादी कर रहे हैं।’ मुझे एहसास हुआ कि यह मेरी गलती थी कि विक्की ने मुझे छोड़ दिया।”

आख़िरकार विक्की ने अंकिता से शादी कर ली। विकी के शब्दों में, ”दरअसल, अंकिता ने मुझे कभी कुछ कहने ही नहीं दिया। जब हम मिले तो वह शादी के लिए तैयार थी। मैं भी शादी करना चाहता था, आखिरकार हमारी शादी हो गई।’

छोटे पर्दे के सीरियल ‘पवित्र रिश्ता’ में काम करने के दौरान अंकिता को को-स्टार सुशांत सिंह राजपूत से प्यार हो गया। उनके साथ उनका सात साल तक रिश्ता रहा. सुशांत के बॉलीवुड में कदम रखने के बाद रिश्ते और भी खराब हो गए। 2020 में सुशांत का निधन हो गया। अंकिता ने 2021 में विक्की के साथ सात फेरे लिए। ‘बिग बॉस’ का ताजा सीजन एक महीने पहले खत्म हो गया है। पिछले साल अक्टूबर से शुरू हुए ‘बिग बॉस’ के दौरे के दौरान कई तरह की घटनाएं चर्चा में रही हैं. सबसे ज्यादा चर्चा अंकिता लोखंडे और उनके पति विक्की जैन के रिश्ते की हुई है. दर्शकों को याद है कि अंकिता ने ‘बिग बॉस’ के घर में क्या किया था। हर एपिसोड की शुरुआत अंकिता और विक्की की लड़ाई और बहस से हुई। अपने बेटे को अपमानित होते देख विक्की की मां ने भी अंकिता को चेतावनी दी थी. लेकिन अंकिता ने अपनी सास की बात नहीं मानी. ‘बिग बॉस’ के घर में अंकिता और विक्की के रिश्ते में ऐसा मोड़ आया कि अलग होने की नौबत आ गई। लेकिन फिर भी उन्होंने कुछ नहीं कहा तो ‘बिग बॉस’ खत्म होने के बाद सलमान खान उनकी समस्या का समाधान करने के लिए खुद इवेंट में गए। सलमान सलाह देते हैं कि रिश्ते को कैसे ठीक किया जाए। हाल ही में अंकिता और विक्की ने इस बारे में खुलकर बात की.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राजभवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की.

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मोदी से क्या बात करनी है? बैठक को संबोधित करते हुए ममता ने कहा, ‘राजनीति कम, कहानियां ज्यादा’ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी प्रोटोकॉल का पालन करते हुए राजभवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने गई थीं। आनंदबाजार ऑनलाइन द्वारा लिखित। शुक्रवार शाम प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद राजभवन से बाहर निकलते हुए मुख्यमंत्री ममता ने कहा.

शुक्रवार को आरामबाग में बैठक के बाद प्रधानमंत्री मोदी दोपहर में कोलकाता के राजभवन पहुंचे. इसके बाद मुख्यमंत्री ममता राजभवन में मोदी से मिलने पहुंचीं. बैठक के बाद ममता ने मीडिया से कहा कि अभी मतदान की घोषणा नहीं हुई है. जब प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति राज्य में आते हैं तो यह एक शिष्टाचार भेंट होती है. इसीलिए मैं प्रधानमंत्री से मिलने गया. ममता ने कहा, ”मैं राजभवन आते ही प्रधानमंत्री से मिली. मैंने राज्य के बारे में भी बात की. और मैंने कहानी बताई. यहां राजनीति की बातें कम, कहानियां ज्यादा हैं.

मुख्यमंत्री से पूछा गया कि क्या केंद्र के ‘बकाये’ को लेकर प्रधानमंत्री से कोई चर्चा हुई. उन्होंने कहा, ”हां, मुझे उस सब के बारे में क्या कहने के लिए कहा गया है।” ममता ने आगे कहा, ”हमें जो भी कहना है, हम राजनीति के मंच पर कहेंगे। यह मेरी शिष्टाचार भेंट है और प्रोटोकॉल का पालन किया जा रहा है।” पीएम मोदी शनिवार को कृष्णानगर में एक सार्वजनिक बैठक करेंगे। उनका छह मार्च को राज्य वापस आने का कार्यक्रम है। बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, वे उस दिन बारासात में बैठक करेंगे. कई लोगों का मानना ​​है कि संदेशखलीकांड के माहौल में इसका बहुत महत्व है. तृणमूल सूत्रों के मुताबिक, बारासात में मोदी की सभा के अगले दिन 7 मार्च को महिला तृणमूल का कार्यक्रम है. सूचना 8 मार्च, महिला दिवस। उस कार्यक्रम में पार्टी नेता ममता के शामिल होने की संभावना है. इस संबंध में उन्होंने कहा, ”अभी तक कुछ भी तय नहीं किया गया है.” कुछ सड़ रहे हैं. जब सही होगा तो पार्टी बता देगी.” राज्य के बजट में सरकारी कर्मचारियों के लिए डीए का ऐलान किया गया. नवान्न ने शुक्रवार को इसकी अधिसूचना प्रकाशित की. सरकारी कर्मचारियों को अगले साल मई से बढ़ी हुई सैलरी मिलेगी. वित्त राज्य मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य ने घोषणा की कि इस चरण में महंगाई भत्ता चार प्रतिशत बढ़ाया जाएगा।

राज्य सरकार के कर्मचारियों को मई से बढ़ा हुआ वेतन मिलेगा. नवान्न ने शुक्रवार को डीए को लेकर अधिसूचना जारी कर दी. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पिछले साल दिसंबर में डीए में बढ़ोतरी की घोषणा की थी. चंद्रिमा ने मुख्यमंत्री की घोषणा को औपचारिक रूप से बजट में शामिल किया। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार के कर्मचारियों का महंगाई भत्ता मई से चार फीसदी और बढ़ जायेगा. मई से डीए में एक और बढ़ोतरी होने पर राज्य सरकार के कर्मचारियों को कुल 14 फीसदी महंगाई भत्ता मिलेगा।

वहीं, केंद्र सरकार के कर्मचारियों को फिलहाल 46 फीसदी की दर से महंगाई भत्ता मिलता है. परिणामस्वरूप, केंद्र-राज्य डीए अंतर बना रहा। मई से राज्य सरकार के कर्मचारियों का DA बढ़कर 14 फीसदी हो जाएगा. दिसंबर में डीए बढ़ोतरी की घोषणा करते हुए, ममता ने केंद्र-राज्य विभाजन को समझाया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के मामले में डीए अनिवार्य है. लेकिन राज्य सरकारों के मामले में ऐसा नहीं है। राज्य में डीए वैकल्पिक है. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए डीए में चार फीसदी बढ़ोतरी से सरकार पर 2,400 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा। बढ़े हुए डीए से राज्य के 14 लाख सरकारी कर्मचारियों को फायदा होगा.

तृणमूल सरकार कर्मचारी महासंघ के संयोजक प्रताप नाइक ने कहा कि वे नवान्न के इस डीए अधिसूचना का स्वागत करते हैं। बंगाली टीचर्स एंड एजुकेशन वर्कर्स एसोसिएशन के नेता स्वपन मंडल ने कहा, ”चूंकि केंद्र ने पहले ही चार प्रतिशत डीए की घोषणा कर दी थी, इसलिए अंतर 36 प्रतिशत रह गया। राज्य सरकार को लोकसभा चुनाव से पहले डीए का कम से कम 20 फीसदी बकाया चुकाना चाहिए, न कि पूरी राशि।” तृणमूल सूत्रों के मुताबिक, बारासात में मोदी की सभा के अगले दिन 7 मार्च को महिला तृणमूल का कार्यक्रम है. सूचना 8 मार्च, महिला दिवस। उस कार्यक्रम में पार्टी नेता ममता के शामिल होने की संभावना है. इस संबंध में उन्होंने कहा, ”अभी तक कुछ भी तय नहीं किया गया है.” कुछ सड़ रहे हैं. जब सही होगा तो पार्टी बता देगी.” राज्य के बजट में सरकारी कर्मचारियों के लिए डीए का ऐलान किया गया. नवान्न ने शुक्रवार को इसकी अधिसूचना प्रकाशित की.

क्या भारत से अभी भी द्वेष रखता है चीन?

चीन अभी भी भारत से द्वेष रखता है! 2024 के मध्य में जब पांच साल का चुनावी चक्र खत्म होगा, तो भारत सरकार अपनी नई नीतिगत प्राथमिकताओं पर ध्यान केंद्रित करेगी, जिसमें चीन भी शामिल है। चीन हमारी सीमा पर स्थित एक शक्तिशाली देश है। चीन के विशेषज्ञ रिचर्ड मैकग्रेगर ने हाल ही में इस बात पर जोर दिया कि चीन अपनी धीमी अर्थव्यवस्था के बावजूद वैश्विक विनिर्माण में एक प्रमुख खिलाड़ी बना हुआ है और वह आने वाले दशकों तक एक रणनीतिक शक्ति बना रहेगा। चीन पर नई नीति तैयार करने में चार बातों पर गौर करना जरूरी होगा। 1988 से दोनों देशों का स्थापित द्विपक्षीय ढांचा 2019 में चीन की तरफ से बुनियादी समझ के घोर उल्लंघन के कारण टूट गया है। 1988 का समझौता कहता है कि कोई भी पक्ष यथास्थिति को बदलने के लिए बलप्रयोग या धमकियों का सहारा नहीं लेगा। 2013 से वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन की तरफ से ग्रे-जोन वॉरफेयर में वृद्धि, जून 2020 में गलवान घाटी में दुखद संघर्ष में परिणत हुई, जिससे दोनों देशों को सीमा पर भारी सुरक्षा बलों की तैनाती करनी पड़ गई। यह स्पष्ट नहीं है कि चीन अपने ग्रे-जोन वॉरफेयर को कम करने और रिश्ते में स्थिरता बहाल करने को तैयार है या नहीं। जब तक चीन विश्वास बहाली के लिए ठोस कदम नहीं उठाता है, तब तक यही स्थिति एक नए द्विपक्षीय ढांचे को आकार देने में न्यू नॉर्मल बन सकती है।

चीन गलवान हिंसा के बाद भी भारत को इतिहास के नजरिए से ही देख रहा है। चीन, भारत के साथ समान शर्तों पर जुड़ने को तैयार नहीं दिख रहा है, विदेश नीति में भारत की स्वतंत्र एजेंसी को कम आंकता है और मानता है कि भारत, चीन के प्रति द्वेष से प्रेरित होकर ही किसी भी देश के साथ कोई भी साझेदारी करता है। भारत को अन्य देशों के साथ गठबंधन करने से रोकने के प्रयास में चीन लगातार दबावपूर्ण रणनीति अपना रहा है। हालांकि, इतिहास ने दिखाया है कि ऐसी रणनीति भारत को वश में करने या अन्य देशों के साथ साझेदारी करने से रोकने में सफल नहीं रही है। यह स्पष्ट नहीं है कि चीन अपना नजरिया बदलकर भारत के साथ समानता के आधार पर एक नया द्विपक्षीय ढांचा स्थापित करने को तैयार है या नहीं।यह विचार करना महत्वपूर्ण है कि क्या चीन के प्रति बदलती वैश्विक और क्षेत्रीय धारणाएं उसे थोड़ी उदारता अपनाने को मजबूर कर पाएंगी। इस बारे में बहस चल रही है कि क्या चीन अपने चरम पर पहुंच गया है या सिर्फ तात्कालिक मुश्किलों का सामना कर रहा है। कुछ भी हो, महामारी के बाद चीन के प्रति वैश्विक धारणाएं बदली तो हैं। अमेरिका में चीन के प्रति रवैया सख्त होता जा रहा है। पश्चिमी देशों के तकनीकी प्रतिबंध चीन को प्रभावित कर रहे हैं। यूरोपीय देश कम करने के लिए भले ही अमेरिका जितना उत्साहित न हों, लेकिन उनकी कंपनियां भी चीन में नए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश एफडीआई को कम कर रही हैं।

मूल रूप से, महामारी के दौरान चीन ने आवश्यक उत्पादों की आपूर्ति को मानवीय सोच की बजाय व्यापारिक लाभ के तौर पर देखा जिससे अंतरराष्ट्रीय जगत में चिंता पैदा हो गई है कि वैश्विक संकट के दौरान चीन पर कितना भरोसा किया जा सकता है। चीन के पड़ोसी देश उसके व्यवहार को लेकर अधिक सतर्क हैं और इसलिए अपने रिश्तों के भविष्य को लेकर कम आशावादी हैं।

चीनी अर्थव्यवस्था कई ढांचागत समस्याओं का सामना कर रही है। जनसंख्या संबंधी लाभ घटने लगा है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लगातार भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के बावजूद, अचानक कोविड नीति में बदलाव और चीन की सेना में उच्चतम स्तरों पर भ्रष्टाचार का सामने आना, राजनीतिक तंत्र पर उनके पूर्ण नियंत्रण पर सवाल खड़ा करता है। हालांकि जैसा कि मैकग्रेगर ने कहा, चीन भले ही बौना नहीं हो गया, लेकिन उसे अब विशालकाय भी नहीं माना जा सकता है। चीनी नेतृत्व अंतरराष्ट्रीय धारणा में बदलाव से अवगत है। उसके लिए स्थितरता कम हो रही है और कमजोरियां बढ़ रही हैं। उनका नेतृत्व उन राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दों की जटिलता को स्वीकार करता है जिनका वे सामना कर रहे हैं।

हाल ही में फॉरेन पॉलिसी में प्रकाशित एक लेख में हैल ब्रैंड्स और माइकल बेक्ली कहते हैं कि जब अनुकूल अल्पकालिक सैन्य संभावनाएं, निराशाजनक दीर्घकालिक रणनीतिक और आर्थिक दृष्टिकोण से मेल खाती हैं, तो चीन जैसी संशोधनवादी शक्तियां युद्ध का रास्ता अपनाने में भी भलाई समझती हैं। महामारी के बाद चीन दूसरों के प्रति अधिक आक्रामक या सौहार्दपूर्ण बनेगा, इसका सावधानीपूर्वक विश्लेषण करने की आवश्यकता है।

अंत में, 2024 में चीन किस रास्ते पर आगे बढ़ेगा, यह नवंबर में होने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के अनिश्चित परिणाम के बाद ही समझ में आने लगेगा। एक अमेरिकी दृष्टिकोण यह है कि फिलहाल का संबंध एक अस्थायी संतुलन में है, जहां मुद्दों का समाधान नहीं हो पाया है। राष्ट्रपति बाइडेन और ट्रम्प, दोनों ने व्यापक रूप से अमेरिका के लिए चीन की रणनीतिक चुनौती को रेखांकित किया है, लेकिन नीतिगत विवरणों पर कोई द्विदलीय आम सहमति नहीं है। राष्ट्रपति पद की दौड़ में कौन जीतेगा, साथ ही नवंबर के बाद अमेरिकी नीति क्या होगी, इस पर स्पष्टता का अभाव उनकी चिंताओं को बढ़ा रहा है।

बाइडेन और ट्रम्प में से कोई जीतें, नवंबर के बाद भारत-अमेरिका साझेदारी सकारात्मक रास्तों पर चलती रहेगी। सवाल यह है कि क्या चीन इस तथ्य के परे यह देख पा रहा है कि भारत बदल रहा है और इसे अतीत के नजरिए से नहीं देखा जा सकता है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में आम चुनाव हो रहे हैं, जिसके लिए हमारी सीमाओं पर सतर्कता जरूरी है। अगले कुछ महीनों में जोखिम प्रबंधन सबसे अहम रहेगा। हालांकि, चुनाव खत्म होने के बाद दोनों देशों के लिए सामान्य संबंधों को फिर से बनाने के तरीकों पर विचार करना समझदारी भरा हो सकता है। दो प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं और परमाणु हथियार संपन्न पड़ोसियों के बीच संबंध अनिश्चित काल तक मौजूदा स्थिति में नहीं रह सकते। भारत सरकार ने एलएसी पर चीन के दबावपूर्ण व्यवहार से निपटने में अपना संकल्प सही तरीके से दिखाया है। भविष्य में वह बिना किसी ढिलाई के उचित बातीचत के अवसरों पर विचार कर सकती है। खुली बातचीत और निवारण आगे का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।