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आखिर बीजेपी में क्यों नहीं ले पाए कमलनाथ एंट्री?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि कमलनाथ बीजेपी में एंट्री क्यों नहीं ले पाए! आखिरकार, न कोई आया और न कोई गया। कमलनाथ प्रकरण मध्य प्रदेश की सबसे नाटकीय राजनीतिक घटनाओं में से एक था, जो अंजाम तक नहीं पहुंचा। नौ बार के सांसद, पूर्व केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और राज्य में भगवा लहर के सामने खड़े एकमात्र मजबूत कांग्रेसी दिग्गज अपने बेटे नकुल को साथ लेकर भाजपा में शामिल होने वाले थे। तब मध्य प्रदेश में कांग्रेस के पास कुछ खास नहीं बच जाता। हालांकि, उन्होंने पार्टी नहीं छोड़ी। लेकिन बेतुकेपन के इस रंगमंच पर कब, क्या हो जाए, कोई नहीं बता सकता। कमलनाथ ने पत्रकारों से सवाल को एक ही पंक्ति के जवाब से निपटा दिया, ‘आप इतने उत्साहित क्यों हैं?’ ऐसे में केवल एक ही बात निश्चित है कि 29 सीटों वाले मध्य प्रदेश में लोकसभा चुनाव से पहले कभी भी, कुछ भी हो सकता है। मध्य प्रदेश कांग्रेस ढहती दीवारों का एक जर्जर भवन भर है। ‘वो कैसे कर सकते हैं? वो इंदिरा गांधी के तीसरे बेटे हैं।’ कमलनाथ के लिए आज ऐसा कहने वालों ने लगभग ठीक चार साल पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया के बारे में कहा था, ‘वो आखिर ऐसा कैसे कर सकते हैं, वो तो राहुल गांधी के करीबी दोस्त हैं?’ सिंधिया को बनाए रखने के लिए कांग्रेसियों का दिल नहीं पसीजा। नाथ के लिए फिलहाल काफी-खींचतान हुई। यह भी संभव है कि बीजेपी ने ही जोर नहीं लगाया हो।

नाथ के भाजपा में जाने से कांग्रेस पर सिंधिया की बगावत के मुकाबले कहीं ज्यादा असर पड़ेगा। कमलनाथ अगर भाजपाई हो जाते तो उन्हें गद्दार कहकर खारिज नहीं किया जा सकता था। उनका जाना एक ‘सेनापति’ की नाराजगी होती जिसने पराजित सेना से पीछा छुड़ा लिया। लेकिन ऐसे हालात बने कैसे? दिसंबर में कांग्रेस के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव हारने के बाद उनकी जगह युवा जीतू पटवारी को लाए जाने पर कमलनाथ की प्रतिक्रिया थी? उनकी प्रतिक्रिया क्या बेटे नकुल के राजनीतिक करियर को बचाने के लिए थी? 6 फरवरी को नकुलनाथ ने पारिवारिक लोकसभा क्षेत्र छिंदवाड़ा से खुद को उम्मीदवार घोषित कर दिया। कमलनाथ तुरंत बेटे के समर्थन में आ गए। उन्होंने कहा, ‘जैसे ही एआईसीसी उम्मीदवारों के नामों की घोषणा करेगी, नकुल की उम्मीदवारी तय हो जाएगी।’ यह सिर्फ जानकारी देने जैसा नहीं था कि कांग्रेस पार्टी छिंदवाड़ा से नकुल को उम्मीदवार बनाएगी, बल्कि यह दावेदारी थी।

8 से 18 फरवरी के बीच जो कुछ हुआ वह किनारे बैठकर समुद्र की गहराइयों का अंदाजा लेने जैसा था। प्रदेश कांग्रेस के लीगल हेड बीजेपी में शामिल हो गए। दिग्विजय सिंह और कमलनाथ, दोनों के करीबी और एमपी कांग्रेस के कोषाध्यक्ष के राज्यसभा के लिए नामित होने से पहले कई दिनों तक चर्चा चलती रही कि कमलनाथ राज्यसभा भेजे जा सकते हैं। पांच दिन बाद छिंदवाड़ा में दर्जनों कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने बीजेपी का दामन थाम लिया।

16 फरवरी को मध्य प्रदेश के बीजेपी चीफ ने घोषणा की कि पार्टी के दरवाजे नाथ पिता-पुत्र के लिए खुले हैं, और अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम से बहिष्कार से कई कांग्रेसी अपनी पार्टी से ‘आहत’ हैं। नकुल ने अपने सोशल मीडिया से कांग्रेस का लोगो हटा दिया। 18 फरवरी को जब पिता-पुत्र की जोड़ी दिल्ली पहुंची तो यह अभी नहीं तो कभी नहीं वाला क्षण था। क्या यह सिर्फ संयोग था? उनके खेमे ने ‘मान-सम्मान’ को ठेस पहुंचाने का राग अलापा। कमलनाथ वरिष्ठ अफवाहों को खारिज कर सकते थे। इसके बजाय, उन्होंने जंगल की आग को फैलने दिया। लेकिन इस आग की लपटें फिलहाल शांत दिख रही हैं। इसका साफ मतलब है कि कांग्रेसियों के लिए दरवाजे खुले होने की घोषणा के बावजूद भाजपा ने नाथ पिता-पुत्र के प्रति गर्मजोशी नहीं दिखाई। कैलाश विजयवर्गीय ने दो टूक कहा कि बीजेपी को नाथ की जरूरत नहीं है। 21 फरवरी को जब यह सीएम मोहन यादव छिंदवाड़ा आए तो नकुल ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। इसके तुरंत बाद सैकड़ों कांग्रेस कार्यकर्ता बीजेपी में शामिल हो गए। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि कांग्रेस का एक वर्ग फिर से मजबूत स्थिति में आ गया है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मध्य प्रदेश को 29-0 से जीतने का संकल्प लिया है। 2023 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी की जीत के अगले दिन, कमलनाथ बेटे नकुल के साथ शिवराज सिंह चौहान के दरवाजे पर पहुंचे। विडंबना यह है कि 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के तुरंत बाद सिंधिया ने एक शाम अपनी कार चौहान के आवास की ओर मोड़ दी थी। एक साल बाद वो बीजेपी के खेमे में चले गए।

भाजपा के लिए नाथ कोई बड़ी उपलब्धि नहीं हो सकते हैं, लेकिन एक बहुत मूल्यवान व्यक्ति जरूर हैं क्योंकि वो इंदिरा युग के कांग्रेस नेताओं में से आखिरी हैं। हालांकि, बीजेपी को नाथ को लेकर अपने सिख मतदाताओं को समझाना मुश्किल हो सकता है क्योंकि 1984 के दंगों की छाया अभी भी उन्हें परेशान करती है। क्या भाजपा अपने सबसे बड़े समर्थन आधारों में से एक को नाराज करने का जोखिम उठा सकती है, खासकर जब किसान फिर से मैदान में उतर गए हैं?

बीजेपी के लिए नाथ संपत्ति के बजाय बोझ भी साबित हो सकते हैं। कमलनाथ को राजभवन भी नहीं भेजा जा सकता है। वैसे भी, भाजपा मध्य प्रदेश में अपने दिग्गजों की लगातार बढ़ती संख्या, विशेषकर कांग्रेस से आए नेताओं की महत्वाकांक्षाओं से जूझ रही है। फिर सिंधिया के साथ नाथ का समीकरण भी देखना होगा। 2018 में मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव की जीत को राहुल गांधी ने ‘उत्साह पर अनुभव की जीत’ समझकर सीएम की कुर्सी कमलनाथ को सौंप दी तो ग्वालियर के वंशज सिंधिया निराश हो गए।

राज्यसभा सीट को लेकर कोने में धकेल दिए गए सिंधिया ने आखिर कह ही दिया, ‘अब बहुत हो गया।’ जुलाई 2020 में अपने सहयोगियों को शिवराज के नेतृत्व वाली भाजपा कैबिनेट में विभागों का बड़ा हिस्सा दिलाने के बाद सिंधिया दहाड़े, ‘कमलनाथ और दिग्विजय सुनो, टाइगर जिंदा है।’ तब नाथ ने उन्हें ‘पेपर टाइगर’, ‘सर्कस टाइगर’ कहकर उनका मजाक उड़ाया था। यदि अनुभव और उत्साह एक ही खेमे में वापस आ गए, तो भाजपा को यह भी लग सकता है कि ये कांग्रेसी क्षत्रप उनके यहां भी दो ध्रुव न बन जाएं।क्या तूफान खत्म हो गया है? किसी लिहाज से नहीं। राहुल गांधी की यात्रा 2 मार्च को एमपी पहुंचने की उम्मीद है। कमल नाथ प्रकरण अभी खत्म नहीं हुआ है।

हाल ही में आबू धाबी में क्या बोले पीएम मोदी?

हाल ही में आबू धाबी में पीएम मोदी ने एक बयान दे दिया है! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अबू धाबी में पहले हिंदू मंदिर का उद्घाटन किया। इस दौरान उन्होंने अयोध्या में बने भव्य राम मंदिर का जिक्र करना नहीं भूले। उन्होंने कहा कि पिछले महीने ही अयोध्या में भव्य राम मंदिर का सदियों पुराना सपना पूरा हुआ। राम लला अपने भवन में विराजमान हुए हैं, पूरा भारत और हर भारतीय उस भाव में अभी तक लीन है। इसी दौरान पीएम मोदी ने कहा कि मैं जानता नहीं कि मैं मंदिरों के पुजारी की योग्यता रखता हूं या नहीं लेकिन मैं इसका गर्व अनुभव करता हूं कि मैं मां भारती का पुजारी हूं। उन्होंने कहा कि परमात्मा ने मुझे जितना समय दिया है, उसका हर एक पल और परमात्मा ने जो शरीर दिया है, उसका कण-कण सिर्फ और सिर्फ मां भारती के लिए है। 140 करोड़ देशवासी मेरे आराध्य देव हैं। अबू धाबी में BAPS हिंदू मंदिर के उद्घाटन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह मंदिर पूरी दुनिया के लिए सांप्रदायिक सौहार्द और एकता का प्रतीक होगा। मंदिर के निर्माण में यूएई सरकार की भूमिका सराहनीय है। मुझे विश्वास है कि यहां आने वाले समय में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आएंगे। इससे यूएई आने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ेगी और पीपल टू पीपल कनेक्ट भी बढ़ेगा। मैं इसके लिए UAE सरकार को बहुत धन्यवाद देता हूं।

पीएम मोदी ने कहा कि UAE ने एक सुनहरा अध्याय लिखा है। मंदिर के उद्घाटन में वर्षों की कड़ी मेहनत है और कई लोगों के सपने मंदिर से जुड़े हैं। स्वामीनारायण का आशीर्वाद भी जुड़ा है। हमारी संस्कृति, हमारी आस्था हमें विश्व कल्याण के इन संकल्पों का हौसला देती है। भारत इस दिशा में ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ के मंत्र पर काम कर रहा है। मुझे विश्वास है कि अबू धाबी के मंदिर की मानवीय प्रेरणा हमारे इन संकल्पों को ऊर्जा देगी, उन्हें साकार करेगी। हमें विविधता में बैर नहीं दिखता, हमे विविधता ही विशेषता लगती है।प्रधानमंत्री ने अबू धाबी में कहा कि ये समय भारत के अमृतकाल का समय है। ये हमारी आस्था और संस्कृति के लिए भी अमृतकाल का समय है।पीएम मोदी ने कहा कि अबू धाबी का ये विशाल मंदिर केवल एक उपासना स्थली नहीं है। ये मानवता की सांझी विरासत का प्रतीक है। ये भारत और अरब के लोगों के आपसी प्रेम का भी प्रतीक है। इसमें भारत और UAE के रिश्तों का एक आध्यात्मिक प्रतिबिंब है। अब तक जो यूएई बुर्ज खलीफा, फ्यूचर म्यूजियम, शेख जायद मस्जिद और दूसरी हाइटेक बिल्डिंग्स के लिए जाना जाता था, अब उसकी पहचान में एक और सांस्कृतिक अध्याय जुड़ गया है। मुझे विश्वास है कि आने वाले समय में यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु आएंगे। मुझे आशा है कि ये मंदिर भी मानवता के लिए बेहतर भविष्य के वसंत का स्वागत करेगा। ये मंदिर पूरी दुनिया के लिए सांप्रदायिक सौहार्द और वैश्विक एकता का प्रतीक बनेगा।अभी पिछले महीने ही अयोध्या में भव्य राम मंदिर का सदियों पुराना सपना पूरा हुआ है। रामलला अपने भवन में विराजमान हुए हैं। पूरा भारत और हर भारतीय उस प्रेम में उस भाव में अभी तक डूबा हुआ है। अयोध्या के हमारे उस परम आनंद को आज अबू धाबी में मिली खुशी की लहर ने और बढ़ा दिया है। ये मेरा सौभाग्य है कि मैं पहले अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर और फिर अब अबू धाबी में इस मंदिर का साक्षी बना हूं।

पीएम मोदी ने कहा कि अबू धाबी का ये विशाल मंदिर केवल एक उपासना स्थली नहीं है। ये मानवता की सांझी विरासत का प्रतीक है। ये भारत और अरब के लोगों के आपसी प्रेम का भी प्रतीक है। इसमें भारत और UAE के रिश्तों का एक आध्यात्मिक प्रतिबिंब है।मंदिर के निर्माण में यूएई सरकार की भूमिका सराहनीय है। मुझे विश्वास है कि यहां आने वाले समय में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आएंगे। इससे यूएई आने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ेगी और पीपल टू पीपल कनेक्ट भी बढ़ेगा। मैं इसके लिए UAE सरकार को बहुत धन्यवाद देता हूं। अब तक जो यूएई बुर्ज खलीफा, फ्यूचर म्यूजियम, शेख जायद मस्जिद और दूसरी हाइटेक बिल्डिंग्स के लिए जाना जाता था, अब उसकी पहचान में एक और सांस्कृतिक अध्याय जुड़ गया है। मुझे विश्वास है कि आने वाले समय में यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु आएंगे। मुझे आशा है कि ये मंदिर भी मानवता के लिए बेहतर भविष्य के वसंत का स्वागत करेगा। ये मंदिर पूरी दुनिया के लिए सांप्रदायिक सौहार्द और वैश्विक एकता का प्रतीक बनेगा।

आखिर किसानों का साथ क्यों दे रही है कांग्रेस क्या है उद्देश्य?

आज हम आपको बताएंगे कि किसानों का साथ कांग्रेस क्यों दे रही है और उसका उद्देश्य क्या है! फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी समेत कई दूसरी मांगों को लेकर किसान दिल्ली की ओर बढ़ रहे हैं। सरकार की ओर से किसानों के साथ बातचीत की कोशिश जारी है लेकिन बात अब तक बनी नहीं है। किसानों की कई मांगों को सरकार ने मान लिया है लेकिन तीन मांगों पर मामला अटका है। किसानों के दिल्ली कूच को देखते हुए हरियाणा से लेकर दिल्ली के बॉर्डर पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई है। किसानों को दिल्ली आने से रोकने के लिए भारी पुलिस बल की तैनाती की गई है। किसानों ने अपनी मांगों के समर्थन में 16 फरवरी को भारत बंद बुलाया है। इन सबके बीच कांग्रेस पूरी तरह से इस मुद्दे पर बीजेपी को घेरने में जुटी है। जिस गारंटी की मांग किसान कर रहे हैं उसका वह समर्थन कर रही है साथ ही बंद का भी समर्थन किया है। कांग्रेस पार्टी इस पूरे मुद्दे पर फ्रंटफुट पर खेलती नजर आ रही है। किसानों के दिल्ली चलो आंदोलन के बीच कांग्रेस ने ऐलान किया है कि इस साल होने वाले लोकसभा चुनाव के बाद वह सत्ता में आती है तो उसकी सरकार फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी प्रदान करेगी। इसके साथ ही कांग्रेस पार्टी ने सत्ता में आने पर स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू करने का भी ऐलान किया। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि लोकसभा चुनाव से पहले यह कांग्रेस की पहली गारंटी है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस घोषणा को लेकर कहा कि देश के किसानों के लिए ऐतिहासिक दिन। यह कदम 15 करोड़ किसान परिवारों की समृद्धि सुनिश्चित कर उनका जीवन बदल देगा। उन्होंने यह भी कहा कि हमारी एमएसपी पर कानूनी गारंटी किसानों के जीवन में 3 बड़े बदलाव लाएगी। फसल के सही दाम मिलने से किसान कर्ज की मुसीबत से छुटकारा पा जाएगा। कोई भी किसान आत्महत्या को मजबूर नहीं होगा। खेती मुनाफे का व्यवसाय होगा और किसान समृद्ध बनेगा।

लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस को एक के बाद एक कई झटके लग रहे हैं। विपक्षी गठबंधन इंडिया के कई साथी उसे छोड़कर जा चुके हैं और जो बचे हैं वह भी कांग्रेस को सीटों के लिए आंख दिखा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर एनडीए का कुनबा बढ़ रहा है और स्थिति मजबूत हो रही है। इन सबके बीच राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा शुरू है। चुनाव करीब है और कांग्रेस पार्टी किसी खास मुद्दे पर कांग्रेस को घेरने में नाकाम रही है। चुनावी जानकार कांग्रेस के इस वादे को चुनाव से जोड़कर देख रहे हैं क्योंकि एक वक्त सरकार में रहते कांग्रेस इसे नकार चुकी है। पिछली बार किसानों की मांग के आगे सरकार को झुकना पड़ा था और तीन कृषि कानून वापस हुए थे। किसानों का प्रदर्शन एक बार फिर शुरू है और कांग्रेस इस बार इस मुद्दे पर प्रदर्शनकारी किसानों के साथ पूरी तरह दिखना चाहती है। प्रदर्शनकारी किसानों में अधिक संख्या पंजाब के किसानों की है और इस राज्य में भी कांग्रेस AAP के सामने काफी कमजोर दिख रही है। ऐसे में इस मुद्दे पर वह पूरी तरह प्रदर्शनकारी किसानों के समर्थन में खुलकर आ गई है।

केंद्र में जब यूपीए की सरकार थी तब संसद में साल 2010 में एमएसपी से जुड़ा सवाल बीजेपी की ओर से पूछा गया था। इस सवाल के जवाब में तत्कालीन यूपीए सरकार की ओर से कहा गया था कि इससे अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा। बीजेपी नेता प्रकाश जावड़ेकर संसद में 16 अप्रैल 2010 को सवाल किया था कि क्या किसानों को एमएसपी दिए जाने के मसले पर सरकार स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने जा रही है। तत्कालीन राज्यसभा सांसद प्रकाश जावड़ेकर के सवाल पर उस वक्त के केंद्रीय कृषि मंत्री केवी थॉमस ने विस्तार से जवाब देते हुए बताया था कि इससे अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित होगी। प्रदर्शनकारी किसानों में अधिक संख्या पंजाब के किसानों की है और इस राज्य में भी कांग्रेस AAP के सामने काफी कमजोर दिख रही है। ऐसे में इस मुद्दे पर वह पूरी तरह प्रदर्शनकारी किसानों के समर्थन में खुलकर आ गई है।इस फैसले को लागू करना इतना आसान नहीं है। कांग्रेस इन मुद्दों से वाकिफ है लेकिन चुनाव से ठीक पहले वह इस मुद्दे पर बीजेपी को घेरना चाहती है। यही वजह है कि न केवल पार्टी की ओर से वादा किया जा रहा है बल्कि दूसरे मुद्दों पर भी साथ दिए जाने की बात कही जा रही है।

आखिर कैसा है पंजाब के किसानों का मॉडल?

आज हम आपको पंजाब किसानों का मॉडल बताने जा रहे हैं! पंजाब के शक्तिशाली किसान संघों के प्रति सहानुभूति न रखें जो फिर से संग्राम के रास्ते पर हैं। राजनेता भी आम चुनाव से ठीक पहले सरेंडर के जरिये किसानों के वोट खरीदने के प्रलोभन से सावधान रहें। किसानों की तरफ से लगातार बढ़ती सब्सिडी और समर्थन ने पंजाब को दिवालिया बना दिया है। किसानों की मांगों के आगे झुकना अन्य राज्यों को भी बर्बाद कर सकता है। एक समय पंजाब में प्रति व्यक्ति आय भारत में सबसे अधिक थी। अब स्थिति यह है कि किसानों को लाड-प्यार देने से पिछले तीन दशकों में लगातार गिरावट आई है। यह अखिल भारतीय औसत के बराबर ही रह गई है। किसान यूनियनों को देश के बाकी हिस्सों को इस दुखद रास्ते पर न ले जाने दें। पाठक भ्रमित हो सकते हैं। वे पूछेंगे कि क्या सरकारी मदद से हरित क्रांति शुरू करने और पंजाब को समृद्ध बनाने में मदद नहीं मिली? अब वही रणनीति उसकी बर्बादी का कारण कैसे बन सकती है? इसका जवाब है कि सब्सिडी दवाओं की तरह है। छोटी खुराक में, वे उत्तेजक हो सकते हैं जो प्रदर्शन में सुधार करते हैं। बड़ी मात्रा में, वे लत, गिरती उत्पादकता और वित्तीय संकट का कारण बनते हैं। पंजाब के सबसे प्रतिष्ठित कृषि विशेषज्ञ एसएस जोहल ने अनुमान लगाया कि राज्य के कर्ज का चार-पांचवां हिस्सा मुफ्त कृषि बिजली के कारण था। मुफ्त बिजली जल-गहन फसलों और भूजल के अत्यधिक पंपिंग को बढ़ावा देती है। इससे जलस्तर गिरता जाता है। लेकिन कोई भी सरकार किसानों को यह बताने की हिम्मत नहीं करती कि जो चीज अल्पावधि में मुनाफा बढ़ाती है, वह लंबे समय में आत्मघाती है।

48 फीसदी के लोन/जीडीपी अनुपात के साथ पंजाब अब भारत का सबसे अधिक ऋणग्रस्त राज्य है। अर्थशास्त्री बैरी आइचेंग्रीन और पूनम गुप्ता का अनुमान है कि 2027-28 तक यह बढ़कर 55 फीसदी हो जाएगा। संशोधित वित्तीय उत्तरदायित्व और लोन मैनेजमेंट पॉलिसी का लक्ष्य राज्य लोन को सकल घरेलू उत्पाद के 20% तक कम करना है। कोविड ने सभी राज्यों के अनुपात को खराब कर दिया था, लेकिन बाद में समझदार प्रबंधन ने लगभग सभी के अनुपात को कम कर दिया है। पंजाब विपरीत रास्ते पर जा रहा है। इसके विपरीत, गुजरात का अनुपात घटकर 20% रह गया है। यह 2027-28 में गिरकर 18% होने का अनुमान है। इससे राज्य के पास बुनियादी ढांचे और उत्पादक निवेश में निवेश करने के लिए पर्याप्त अतिरिक्त राजस्व बच जाता है। इसमें सभी राज्यों के मुकाबले सबसे कम फार्म प्रॉप्स हैं।

अर्थशास्त्र हमें बताता है कि अधिक कृषि आय भूमि की अधिक कीमतों में तब्दील हो जाती है। उनकी सभी शिकायतों के लिए, पंजाब में अधिक कृषि आय ने कृषि भूमि को भारत में सबसे महंगा बनाने में मदद की है। इसकी कीमत पंजाब के दूरदराज के क्षेत्रों में लगभग एक करोड़ प्रति एकड़ और मोहाली के पास 5 करोड़ रुपये प्रति एकड़ है। उद्योगों के पंजाब में प्रवेश न करने का एक बड़ा कारण भूमि की ऊंची कीमत है। टाटा ने 2008 में अपने नैनो संयंत्र के लिए पंजाब पर बहुत गंभीरता से विचार किया, लेकिन कर्ज में डूबा यह राज्य औद्योगिक भूमि पर सब्सिडी देने में असमर्थ था। गुजरात ने सस्ती, रियायती जमीन की पेशकश की। इसलिए टाटा वहां गया, और एक ऑटो हब को शुरू करने में मदद की। इसने कई अन्य ऑटो बड़ी कंपनियों को आकर्षित किया है। पंजाब के मुख्य सचिव ने मुझसे कटु शिकायत की कि गुजरात की भूमि सब्सिडी अनुचित प्रतिस्पर्धा है। लेकिन वह इस बात से इनकार नहीं कर सकते थे कि किसानों के लिए मुफ्त सुविधाओं ने राज्य को प्रतिस्पर्धा के लिए धन से वंचित कर दिया है।

किसान अधिक कृषि आय और औद्योगीकरण की कमी के बीच संबंध नहीं देखते हैं। वे औद्योगिक सब्सिडी की ओर इशारा करते हैं और पूछते हैं कि किसानों को अधिक क्यों नहीं मिलना चाहिए। इसका उत्तर यह है कि औद्योगिक सब्सिडी सकल घरेलू उत्पाद का एक छोटा, किफायती प्रतिशत है, लेकिन कृषि सब्सिडी बहुत बड़ी है। किसान स्वामीनाथन आयोग की तरफ से सुझाए गए मूल्य फार्मूले को लागू करने की मांग कर रहे हैं। इनमें फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य उत्पादन की लागत से 50% अधिक होना चाहिए। इसका तात्पर्य बिक्री का 33.33% शुद्ध लाभ है। क्या यह उचित है? नहीं, यह अपमानजनक है। अंबानी और अडानी पर क्रोनी कैपिटलिज्म का आरोप लगाया गया है। लेकिन रिलायंस इंडस्ट्रीज का शुद्ध लाभ बिक्री का 9.4% है। अडानी एंटरप्राइजेज के लिए यह 1.6% और टाटा स्टील के लिए 3.3% है।

कृषि लागत और कीमतों पर समिति पहले से ही अन्य उपायों के अलावा, परिचालन लागत पर 50% लाभ पर विचार कर रही है, लेकिन भूमि और मशीनरी जैसी परिसंपत्तियों के अनुमानित मूल्य को शामिल नहीं करती है। फार्म यूनियनें इन संपत्तियों पर उचित रिटर्न चाहती हैं। लेकिन क्या 50% रिटर्न उचित है? रिलायंस का संपत्ति पर रिटर्न 4.78% है, जबकि अडानी एंटरप्राइजेज का रिटर्न 4.4% है। ऐसा क्या है जो दोनों उद्योगपतियों के पास है और किसानों के पास नहीं है। यह है अर्थव्यवस्था का पैमाना। उद्योगपति असीमित नई फैक्टरियां और ऑफिस बना सकते हैं, लेकिन कोई भी नई जमीन नहीं बना सकता। संयुक्त राज्य अमेरिका में औसत खेत का आकार 178 एकड़ है लेकिन भारत में केवल 2.6 एकड़ है। सिंचित खेतों पर हमारी भूमि की सीमा केवल 15 एकड़ है। विडंबना यह है कि फार्म यूनियन की मांगों में भूमि सीमा को सख्ती से लागू करना, गैर-आर्थिक जोत को एक गुण बनाना शामिल है। अमेरिका में, बमुश्किल 1.2% आबादी खेती करती है, फिर भी अमेरिका को भोजन देती है। बड़े पैमाने पर निर्यात भी करती है। भारत में आधी आबादी खेती करती है लेकिन सकल घरेलू उत्पाद का केवल 14% उत्पादन करती है।

अधिकांश किसान खेती छोड़ना चाहते हैं क्योंकि भूमि इतने सारे लोगों को सभ्य जीवन प्रदान नहीं कर सकती है। किसानों को खेती से बाहर निकालने पर फोकस होना चाहिए। इसका मतलब है उच्च शिक्षा और बुनियादी ढांचे में उत्पादक निवेश के माध्यम से उद्योग और सेवाओं में अधिक नौकरियां पैदा करना। सीमित संसाधनों को कृषि संबंधी मुफ्त चीजों में नहीं लगाया जाना चाहिए जो राज्यों को दिवालिया बना सकती हैं!

आखिर मौसम विभाग कैसे कर लेता है मौसम की सटीक भविष्यवाणी?

यह सवाल सभी के मन में आता होगा कि आखिर मौसम विभाग मौसम की सटीक भविष्यवाणी कैसे कर लेता है! दो दिन पहले तक यहां खिली धूप थी और सामान्य इंसान इस बारिश का अंदाजा तक नहीं लगा पाए। लेकिन हमारी तीसरी आंख ‘IMD’ को तो जैसे भविष्य का पता हो। उन्होंने हमें साफ-साफ बता दिया था कि दिल्ली-एनसीआर में तीन दिन बारिश की भविष्यवाणी होगी। सोमवार शाम तक तो मौसम ने कोई करवट नहीं ली लेकिन रात में जमकर बारिश हुई। यानी मौसम विभाग ने जो कहा वही हुआ। अब ऐसे में सवाल उठता है कि हाल के दिनों में आखिर IMD की लगभग हर भविष्यवाणी सच कैसे हो रही है। आखिर कैसे मौसम विभाग बारिश, गर्मी, लू, शीतलहर की भविष्यवाणी करता है? मौसम की भविष्यवाणी आसान शब्दों में कहें तो, विज्ञान और तकनीक का इस्तेमाल करके किसी जगह के आने वाले समय में हवा का हाल बताना है। लोग सदियों से अनौपचारिक रूप से मौसम का अंदाजा लगाते आए हैं, लेकिन आधिकारिक तौर पर इसे उन्नीसवीं सदी से किया जा रहा है। पहले हाथ से की जाने वाली मौसम भविष्यवाणी हवा के दबाव, मौसम के हाल और आसमान के हिसाब से होती थी, अब कंप्यूटर के मॉडल कई तरह के हवा के पहलुओं को ध्यान में रखते हैं। असली मौसम का डाटा एकत्र करके और भविष्य के बारे में विज्ञान की मदद से अंदाजा लगाकर भविष्यवाणी बनाई जाती है। इंसानों का अनुभव भी सही मॉडल चुनने में मदद करता है। मौसम की भविष्यवाणी अर्थव्यवस्था का हिस्सा है, उदाहरण के लिए, अमेरिका ने 2009 में मौसम की भविष्यवाणी के लिए $5.1 अरब डॉलर खर्च किए थे। आइए देखें कि मौसम की भविष्यवाणी का महत्व और उसे बताने के अलग-अलग तरीके क्या हैं।

IMD इस तरह की भविष्यवाणी अगले 1-2 दिनों के लिए करता है। मौसम हमारे रोजाना के जीवन, फसलों के उत्पादन पर बहुत प्रभाव डालता है। हालांकि, सटीक भविष्यवाणी बहुत महत्वपूर्ण है। विभिन्न विश्लेषणों के लिए भविष्यवाणी एक महत्वपूर्ण उपकरण है। ECMWF सबसे सटीक वैश्विक मॉडल है। ECMWF, GFS से काफी बेहतर काम करता है।  ये भविष्यवाणी 3-4 दिन से लेकर 2 हफ्ते तक के लिए होती है। बिजनेस बजट और विकास के क्षेत्र में ये बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इन्हीं पर आधारित कंपनी के बजट बनाए जाते हैं। अगर इस तरह की भविष्यवाणी सटीक नहीं होगी तो इसका गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं। ये भविष्यवाणी चार हफ्तों से अधिक समय के लिए होती है। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से संगठन के बड़े रणनीतिक फैसलों के लिए किया जाता है। ये भविष्यवाणियां बताती हैं कि लंबे समय में संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग कैसे किया जाए। ये विशिष्ट चीजों के बजाय सामान्य रुझानों पर ध्यान केंद्रित करती हैं। जब चीजें भविष्यवाणी के बिल्कुल विपरीत होती हैं, तो भविष्यवाणी करने वाले को दोष दिया जाता है और आलोचना का सामना करना पड़ता है।इसके अलावा मौसम विभाग अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट चित्रों के जरिए भी मौसम की सटीक भविष्यवाणी करता है। इन चित्रों के जरिए कोहरा से लेकर चक्रवाती तूफान के बारे में सही जानकारी दी जाती है।इनसेट 3DS से मिलेगी पुख्ता जानकारी

इसरो द्वारा कुछ दिन पहले छोड़े गए सैटेलाइट INSAT-3DS को लॉन्च किया है। आधुनिक तकनीकों से लैस यह सैटेलाइट मौसम पूर्वानुमान और प्राकृतिक आपदा चेतावनियों का अध्ययन करेगा। इसरो ने कहा कि 2,274 किलोग्राम वजनी सैटेलाइट भारतीय मौसम विज्ञान विभाग आईएमडी सहित पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत विभिन्न विभागों को सेवा प्रदान करेगा।

सिनोप्टिक विधि: यह विधि बड़े क्षेत्र के पिछले मौसम आंकड़ों के सिस्टेमैटिक अध्ययन पर आधारित होती है। इसमें वर्तमान स्थिति को पिछली परिस्थितियों से जोड़ा जाता है, और ये मानकर भविष्यवाणी की जाती है कि वर्तमान परिस्थिति भी पिछले की तरह ही व्यवहार करेगी। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से संगठन के बड़े रणनीतिक फैसलों के लिए किया जाता है। ये भविष्यवाणियां बताती हैं कि लंबे समय में संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग कैसे किया जाए। ये विशिष्ट चीजों के बजाय सामान्य रुझानों पर ध्यान केंद्रित करती हैं। मौसम भविष्यवाणी या न्यूमेरिकल वेदर अनुमान मौसम का अनुमान लगाने के लिए कंप्यूटर मॉडल का इस्तेमाल करती है। ये मॉडल मौसम संबंधी आंकड़ों हवा का तापमान, दबाव, आर्द्रता आदि का इस्तेमाल करके गणितीय समीकरणों की मदद से भविष्य की स्थिति का अनुमान लगाते हैं। मान लीजिए कि आपके मोबाइल ऐप पर बारिश होने की भविष्यवाणी दिख रही है। यह भविष्यवाणी इसी विधि से की गई हो सकती है। यह विधि मध्यम अवधि की भविष्यवाणी कुछ दिनों से लेकर कुछ हफ्तों तक के लिए सबसे सटीक मानी जाती है।

आखिर कब तक उड़ान भरेगा गगनयान मिशन?

आज हम आपको बताएंगे कि गगनयान मिशन उड़ान कब भरेगा! भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो अपने गगनयान मिशन पर काम रही है। चंद्रयान और आदित्य एल-1 की सफलता के बाद ये मिशन इसरो को और ऊंचाइयों पर पहुंचाएगा। गगनयान भारत का पहला मानव मिशन होगा। इसरो ने गगनयान मिशन के लिए ‘सीई-20 क्रायोजेनिक इंजन’ तैयार कर लिया है। बुधवार को इसरो ने इस इंजन का सफल परीक्षण भी किया। गगनयान मानव अंतरिक्ष मिशन के लिए एलवीएम लॉन्चिंग पैड के ‘क्रायोजेनिक चरण’ को शक्ति प्रदान करता है। इसरो ने कहा कि सीई-20 क्रायोजेनिक इंजन मानव मिशन के लिए अंतिम परीक्षणों में सफल रहा। इंजन की टेस्टिंग से इसकी की क्षमता का पता चलता है। इसरो के मुताबिक, पहली मानव रहित उड़ान ‘एलवीएम3 जी1’ के लिए पहचाना गया सीई-20 इंजन सभी जरूरी परीक्षणों से गुजरा। अब मिशन के अगले चरण के लिए इसरो तैयार है। भारत का पहला मानव मिशन गगनयान की खासियत क्या हैं, और ये कैसे स्पेस जगत में इसरो की धाक और मजबूत करेगा? आइए समझते हैं। गगनयान मिशन ISRO द्वारा विकसित भारत के मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस मिशन में तीन अंतरिक्ष मिशन शामिल हैं। इन तीन मिशनों में से 2 मानवरहित होंगे, जबकि एक मानव युक्त मिशन होगा। गगनयान मिशन भारत का पहला मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन है। इस मिशन के तहत तीन चालक दल के सदस्यों को 400 किलोमीटर की कक्षा में तीन दिनों के मिशन के लिए लॉन्च करना और उन्हें सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाना है। इसरो ने इस मिशन की टेस्टिंग पिछले साल की थी। वहीं बुधवार को इसरो ने इसके क्रायोजेनिक इंजन की टेस्टिंग की। इस मिशन में ह्यूमन स्पेस फ्लाइट सेंटर का खास योगदान है।

इसरो के गगनयान मिशन में तीन एस्ट्रोनॉट को अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। ये तीनों एस्ट्रोनॉट तीन दिनों तक 400 किलोमीटर की पृथ्वी की कक्षा में रहेंगे और फिर वापस पृथ्वी पर आएंगे। इसरो के गगनयान मिशन साल 2025 तक लॉन्च होगा। हालांकि इसके शुरुआती चरणों को इसी साल यानी 2024 तक पूरा किया जा सकता है। इसमें दो मानवरहित मिशन को अंतरिक्ष में भेजना शामिल है। जब ये मिशन सफल होंगे उसके बाद ही एस्ट्रोनॉट को अंतरिक्ष में भेजा जाएगा।

गगनयान मिशन पांच चरणों में पूरा होगा। इसका अंतिम चरण तब खत्म होगा जब एक अंतरिक्ष यान में तीन इंसान को बैठाकर अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। इससे पहले इसरो कई स्तरों पर यह सुनिश्चित करना चाहता है कि इस मिशन में कोई कमी न रह जाए। इसलिए पिछले साल एजेंसी ने टेस्ट फ्लाइट किया, जिसके जरिए ये टेस्ट किया गया कि इंसानों को ले जाने वाला कैप्सूल सुरक्षित रूप से धरती पर वापस लौट सकता है। मिशन के चरणों में सबसे पहले कई ड्रॉप टेस्ट इंटीग्रेटेड एयर ड्रॉप टेस्ट किए गए हैं और यह सुनिश्चित किया गया है कि हवा से जमीन पर कैप्सूल गिरने से क्या कोई नुकसान हो रहा है या नहीं। इसके बाद मिशन के तहत पैड एबॉर्ट टेस्ट और टेस्ट व्हीकल उड़ानों की टेस्टिंग की जाएगी।

HSFC (ह्यूमन स्पेस फ्लाइट सेंटर) का मुख्य काम इसरो के गगनयान कार्यक्रम को आगे बढ़ाना है। इसमें पूरे भारत में इसरो के केंद्रों, रिसर्च लैब्स, विश्वविद्यालयों और उद्योगों को जोड़कर काम किया जाता है। HSFC इंसानों को अंतरिक्ष भेजने से जुड़े कामों का प्रमुख केंद्र है, इसलिए वे सुरक्षा और विश्वसनीयता के मानकों का पालन करते हैं। वे नई तकनीकों पर रिसर्च करते हैं, जैसे अंतरिक्ष में सांस लेने के लिए जरूरी सिस्टम, इंसानों के लिए जरूरी डिजाइन, अंतरिक्ष जीव विज्ञान, अंतरिक्ष यात्रियों की ट्रेनिंग और अंतरिक्ष के लिए उपयुक्त उपकरण बनाना। ये सब आने वाले समय में इंसानों को अंतरिक्ष में लंबे समय तक रखने, अंतरिक्ष स्टेशन बनाने और चांद, मंगल और आसपास के ग्रहों पर जाने के मिशन के लिए बहुत जरूरी हैं।

गगनयान मिशन के लिए जिन एस्ट्रोनॉट को भेजा जाएगा उनकी बेंगलुरु में स्थित स्पेस यात्री ट्रेनिंग फैसिलिटी में खास ट्रेनिंग चल रही है। उन्हें मिशन से जुड़ी हर जरूरी जानकारी की क्लास, फिजिकल फिटनेस, सिम्युलेटर और स्पेस सूट की ट्रेनिंग दी जाती है। ट्रेनिंग में थ्योरी, गगनयान के सिस्टम को समझना, जीरो ग्रेविटी में काम करना और रहना, अंतरिक्ष में जीवित रहना और सुरक्षित वापसी की ट्रेनिंग, उड़ान के तरीके सीखना और सिम्युलेटर पर अभ्यास करना शामिल है। इसके अलावा डॉक्टरों की सलाह, नियमित उड़ान अभ्यास और योग भी ट्रेनिंग का हिस्सा हैं।

कौन है गगनयान मिशन पर जाने वाले अंतरिक्ष यात्री?

आज हम आपको बताएंगे कि आखिर गगनयान मिशन पर कौन से अंतरिक्ष यात्री जा रहे हैं! 40 वर्षों में पहली बार, भारतीयों का एक छोटा समूह हमारे वायुमंडल से परे खतरनाक सफर पर जाने के लिए तैयार है। पीएम मोदी ने एक दिन पहले चार टेस्ट पायलटों – प्रशांत नायर, अजीत कृष्णन, अंगद प्रताप और शुभांशु शुक्ला को सम्मानित किया – जो 1984 में सोयुज टी-11 पर राकेश शर्मा की ऐतिहासिक यात्रा के बाद बाहरी अंतरिक्ष में जाने वाले पहले भारतीय बनने वाले हैं। कल का कार्यक्रम महत्वाकांक्षी गगनयान कार्यक्रम के लिए एक औपचारिक मील का पत्थर था, जिसका लक्ष्य भारत को उन चार देशों में से एक बनाना है जो स्वतंत्र रूप से मानव अंतरिक्ष उड़ान कर सकते हैं। गगनयान मिशन के बारे में सबसे पहले पीएम मोदी ने 2018 में स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से ऐलान किया था। तब उन्होंने ‘अंतरिक्ष में तिरंगा फहराने’ के लिए 2022 की समयसीमा तय की थी जब भारतीय स्वतंत्रता के 75वें वर्ष को मनाया जा रहा होगा। योजना सरल थी। भारतीयों को लगभग तीन दिनों के लिए पृथ्वी की कक्षा में रखना और उन्हें सुरक्षित वापस लाना। हालांकि, इसे पूरा करने के लिए मानव-रेटेड लॉन्च वाहन से लेकर कक्षीय कैप्सूल तक कई जटिल नई क्षमताओं की जरूरत होगी।

गगनयान के लिए भारत के नए अंतरिक्ष यात्रियों के लिए उन्नत प्रशिक्षण की भी आवश्यकता होगी। 2019 में, 12 चुने हुए IAF टेस्ट पायलटों की प्रारंभिक रोस्टर को बेरहमी से घटाकर चार उम्मीदवारों तक सीमित कर दिया गया था। अगले वर्ष, चार पायलट उन्नत प्रशिक्षण के लिए रूस गए। हालांकि, जैसा कि नियति को मंजूर था, कोविड फैल गया, जिससे न केवल रूस में प्रशिक्षण में देरी हुई, बल्कि भारत में प्रमुख प्रणालियों के विकास और सत्यापन में भी देरी हुई। कोविड की वजह से 2022 की समय सीमा पहुंच से बाहर हो गई। आखिरकार चारों पायलटों ने अपना प्रशिक्षण पूरा कर लिया। इसरो भी लगातार प्रगति करता रहा। जनवरी में, अंतरिक्ष एजेंसी के अध्यक्ष एस. सोमनाथ ने घोषणा की कि 2024 “गगनयान की तैयारी का वर्ष” होगा। यह त्वरित विकास का वादा और जटिल व जोखिम भरे प्रयास को आगे बढ़ाने में आने वाली कठिनाइयों को स्वीकार करने का वादा था।

गगनयान भले ही कितना भी साहसी क्यों न हो, यह मानव अंतरिक्ष उड़ान के लिए भारत की योजनाओं में केवल पहला कदम है। अगला कदम 2035 तक एक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन को स्थापित करना और 2040 तक एक भारतीय को चंद्रमा पर भेजना है। साथ में, ये योजनाएं इसरो की प्राथमिकताओं में व्यावहारिक और मितव्ययी मिशनों से लेकर राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से जुड़े उच्च-प्रोफ़ाइल कार्यक्रमों में क्रमिक बदलाव का प्रमाण हैं। अन्य देशों में मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रमों की तरह, यह बदलाव कुछ निष्पक्ष आलोचना को आकर्षित कर सकता है। मानव अंतरिक्ष उड़ान के विरोधियों का कहना है कि आधुनिक प्रोसेसर, रोबोटिक्स और संचार द्वारा समर्थित मानवरहित मिशन चालक दल के मिशन के समान अधिकांश वैज्ञानिक कार्य कर सकते हैं, जिसकी लागत भी बहुत कम होगी। मानव अंतरिक्ष उड़ान के रक्षकों का तर्क है कि लोग अपूरणीय हैं, क्योंकि अप्रत्याशित परिस्थितियों में अनुकूलन और सुधार करने की मानवीय क्षमता को अभी तक मशीनों द्वारा दोहराया नहीं जा सकता है।

हालांकि यह बहस संभवत: अनसुलझी रहेगी, लेकिन यह मुद्दा चूक गया है। मानव अंतरिक्ष उड़ान का औचित्य वैज्ञानिक नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से खतरनाक मिशन पर किसी देश के सर्वश्रेष्ठ और प्रतिभाशाली लोगों को भेजने का निर्णय इस बात का प्रमाण है कि वह अंतरिक्ष गतिविधि को कितनी गंभीरता से लेता है। ये दिखाता है कि राजनेता भविष्य के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को प्रेरित करने के लिए ऐसे मिशनों की शक्ति को सहजता से समझ लेते हैं। ऐसे मिशन किसी देश की तकनीकी क्षमता का स्पष्ट प्रदर्शन हैं। अंत में, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम ऐतिहासिक रूप से उच्च-प्रौद्योगिकी उद्योगों के लिए लक्षित वित्तीय प्रोत्साहन के रूप में कार्य करते हैं, जिससे देशों को तकनीकी प्रगति करने और प्रतिभा को आकर्षित करने में मदद मिलती है। उदाहरण के लिए, अपोलो कार्यक्रम ने न केवल अमेरिका में उभरते माइक्रोप्रोसेसर उद्योग को बढ़ावा दिया, बल्कि वेल्क्रो फास्टनरों जैसी रोजमर्रा की वस्तुओं को भी जन्म दिया। दरअसल, भारत का मानव अंतरिक्ष उड़ान का सपना ऐसे कार्यक्रमों का समर्थन करने और रिमोट-सेंसिंग उपग्रह बनाने जैसी इसरो की अधिक नियमित अंतरिक्ष गतिविधियों को संभालने के लिए देश के निजी क्षेत्र की क्षमता पर एक अंतर्निहित दांव है।

भारत इस तस्वीर में कहां फिट बैठता है? गगनयान के साथ इसरो का एक लक्ष्य व्यावसायिक अवसरों की तलाश करना होगा, ताकि कार्यक्रम अंततः अपने लिए भुगतान करना शुरू कर दे। हालांकि यह अमेरिकी कंपनियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा की उम्मीद कर सकता है, इसरो मानव अंतरिक्ष उड़ान के लिए विस्तारित बाजार में भी एक खिलाड़ी बन सकता है, जो वाणिज्यिक अंतरिक्ष स्टेशनों को विश्वसनीय परिवहन प्रदान करता है और अंतरिक्ष पर्यटकों को सीटें प्रदान करता है। मानव अंतरिक्ष उड़ान बाज़ार भी पृथ्वी पर वापस आने के अवसर प्रदान करता है। इसरो का मानव अंतरिक्ष उड़ान केंद्र और आईएएफ का इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोस्पेस मेडिसिन भारत में एक अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण केंद्र के लिए भ्रूण के रूप में काम कर सकता है जिसमें निजी क्षेत्र भारी मात्रा में शामिल है। कल सम्मानित किए गए चार टेस्ट पायलट अग्रणी हैं, लेकिन उनका अनुसरण कई अन्य लोगों द्वारा किया जाना चाहिए जो तिरंगे को कक्षा में और उससे आगे ले जाते हैं।

क्या चीन से पल्ला झाड़ना भारत के लिए भी नुकसानदायक है?

चीन से पल्ला झाड़ना भारत के लिए भी नुकसानदायक साबित हो सकता है! भारत और चीन के बीच बीते काफी समय से तनातनी है। इसके बावजूद दोनों ट्रेड डिप्‍लोमेसी से बंधे हैं। कारोबार ने इन्‍हें जकड़ कर रखा है। इस बीच भारत सरकार चीन से आयात पर सीमा शुल्क बढ़ाने के अपने फैसले के लिए आलोचनाओं का सामना कर रही है। सरकार के भीतर ही कुछ विभाग मानते हैं कि टैरिफ का इस्‍तेमाल कूटनीतिक हथियार के रूप में बहुत सोच-विचार कर होना चाहिए। वे इसके लिए किसी हड़बड़ी के पक्ष में नहीं हैं। इसकी वजह है। ऐसी चिंताएं हैं कि भारत की मैन्‍यूफैक्‍चरिंग-फोकस्‍ड स्‍कीमों जैसे प्रोडक्‍शन-लिंक्ड इंसेंटिव पीएलआई स्‍कीम पर इसका प्रत‍िकूल असर हो सकता है। चीन अभी भी भारत के 14 फीसदी आयात का प्रतिनिधित्व करता है। ड्रैगन न केवल इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, टेक्‍सटाइल्‍स और चमड़े सहित तमाम उद्योगों के लिए कच्‍चा माल मुहैया करता है। अलबत्‍ता, पूंजीगत सामान भी उपलब्‍ध कराता है। भारत में औसत टैरिफ 2014 में 13 फीसदी से बढ़कर 2022 में 18.1 फीसदी हो गया है। इससे भारत वियतनाम, थाईलैंड और मैक्सिको जैसे देशों की तुलना में कम प्रतिस्पर्धी हो गया है। सरकार को घरेलू उद्योगों को संरक्षण देने के लिए ऊंचे टैरिफ का इस्‍तेमाल करती है। इसे लागू किए जाने के बाद उसे तमाम मंत्रालयों के विरोध का सामना करना पड़ा है। 2020 में गलवान में हुई झड़प के बाद चीनी आयात पर अंकुश का असर अब इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों पर दिखने लगा है। इसके कारण घरेलू उत्पादन में कमी आई है। भारतीय मैन्‍यूफैक्‍चर्ड वस्‍तुओं का प्रतिस्पर्धात्मक लाभ घटा है।  एप्पल इंक जैसी कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले लॉबी समूहों ने चिंता जाहिर की है कि भारत के ऊंचे टैरिफ चीन से सप्‍लाई चेन को हतोत्साहित करते हैं। वियतनाम, थाईलैंड और मैक्सिको जैसे देशों ने कम्‍पोनेंट पर कम टैरिफ रखा है। ये उन व्यवसायों को लुभा रहे हैं जो चीन से दूर जाना चाहते हैं।

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने ज्‍यादा टैरिफ के कारण ऊंची उत्पादन लागत के बारे में चिंता जताई है। सर्किट बोर्ड, चार्जर और पूरी तरह से एसेम्‍बल्‍ड फोन सहित पुर्जों पर शुल्क में कमी की गुहार लगाई है। कुछ कटौती पर सहमति बनी है। इसे देखते हुए सरकार ने कई आईटी वस्तुओं पर शुल्क कम कर दिया है।

चीन से निम्न-गुणवत्ता वाले आयात पर अंकुश लगाने के प्रयास में भारत ने क्‍वालिटी कंट्रोल ऑर्डर क्यूसीओ लागू किए हैं। ये एमएसएमई के लिए जरूरी कच्‍चे माल तक पहुंच को प्रतिबंधित करते हैं। टैरिफ वार्ता में शामिल एक सरकारी अधिकारी ने माना है कि भारत के आयात शुल्‍क अन्य देशों की तुलना में ज्‍यादा हैं। अधिकारी ने भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास और वैश्विक बाजारों के साथ बेहतर एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए टैरिफ में धीरे-धीरे कमी की जरूरत पर बल दिया है। आयात पर अंकुश के नकारात्मक प्रभाव पर भी प्रकाश डाला गया है। इसमें कहा गया कि इससे एक्‍सपोर्ट ऑर्डर छूट जाते हैं। घरेलू उद्योगों के लिए यह किसी सजा जैसा होता है। इसे अर्थव्यवस्था के हित में नहीं माना जाता है। जहां घरेलू उद्योगों का समर्थन करना अहम है। वहीं, बहुत लंबे समय तक संरक्षण टिकाऊ नहीं है।

भारत का चीन के कुल व्यापार में न के बराबर हिस्सा है। लेकिन, वह फार्मास्यूटिकल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे प्रमुख क्षेत्रों में चीनी आयात पर बहुत ज्‍यादा निर्भर करता है। टैरिफ को धीरे-धीरे कम करना और ग्‍लोबल बाजारों के साथ बेहतर एकीकरण भारत के विकास और निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए ज्‍यादा लाभकारी नजरिया हो सकता है।

इंडिया सेल्युलर एंड इलेक्ट्रॉनिक्स एसोसिएशन की स्‍टडी से पता चलता है कि इलेक्ट्रॉनिक सेगमेंट में चीन, थाईलैंड, वियतनाम और मैक्सिको की तुलना में भारत में कच्‍चे माल पर सबसे ज्‍यादा टैरिफ है। ऊंचे टैरिफ उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहे हैं। वियतनाम और थाईलैंड जैसे देशों से बराबरी के लिए टैरिफ में कमी की मांग की गई है। एल्यूमीनियम, पॉलिमर और पेट्रोकेमिकल्स जैसे वस्तुओं पर आयात शुल्क लगाना उद्योग की ताकत को कम करता है। ऐसी वस्‍तुओं में भारत काफी संपन्‍न है। ज्‍यादा आयात शुल्क भारतीय निर्यात को भी कम प्रतिस्पर्धी बनाता है। इससे घरेलू मैन्‍यूफैक्‍चरिंग में खामियों को बढ़ावा मिलता है। एनडीए सरकार ने 2016 से आयात शुल्क में कई बढ़ोतरी लागू की है। यह आयात शुल्क को कम करने के पिछले ट्रेंड से अलग है। वाणिज्य मंत्रालय इस बात से इनकार करता है कि ये शुल्क बढ़ोतरी संरक्षणवादी है। उसका दावा है कि यह वैश्विक रुझानों के अनुरूप हैं। भारत ने हाल के वर्षों में द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) पर हस्ताक्षर करने में रुचि दिखाई है। हालांकि, विश्लेषकों ने आगाह किया है कि कुछ प्रस्तावित सीमा शुल्क बढ़ोतरी डब्ल्यूटीओ-अनिवार्यता के करीब है या उससे अधिक हो गई है।

क्या अपने ही लोगों से हार चुके हैं अखिलेश यादव?

वर्तमान में अखिलेश यादव अपने ही लोगों से पूरी तरह हार चुके हैं! राज्यसभा चुनाव में इस बार उत्तर प्रदेश में 10 सीटों के लिए हुए मतदान के दौरान समाजवादी पार्टी में जमकर उथल-पुथल मच गई। पीडीए पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक की राजनीति कर रहे अखिलेश यादव अपनी ही सियासत में फंसे नजर आए। टीम मैनेजेंट में भाजपा उनसे कहीं आगे निकल गई। स्थिति ये हुई कि कई करीबी साथी अखिलेश का हाथ छुड़ाकर एनडीए के साथ चले गए। एक विधायक तो ऐसी रहीं कि जिन्होंने भले ही सपा से किनारा न किया हो लेकिन अपने नेता अखिलेश की इच्छा की बजाए अपनी पसंद के नेता को वोट किया। इस चुनाव में भाजपा 8 सीटें जीतने में कामयाब रही, वहीं समाजवादी पार्टी को सिर्फ दो सीटों से संतोष करना पड़ा। पूरे चुनाव में अकेले हारने वाले नेता सपा प्रत्याशी रिटायर्ड ब्यूरोक्रैट आलोक रंजन रहे। दरअसल राज्यसभा के लिए प्रत्याशियों का ऐलान हुआ तो माना जा रहा था कि अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी आसानी से 3 सीटें अपने नाम कर लेगी। लेकिन इसके बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में जो भूचाल आया, वो अलग ही कहानी लिखता चला गया। पहले अखिलेश के करीबी पुराने साथी और इंडिया गठबंधन में शामिल राष्ट्रीय लोकदल के जयंत चौधरी ने किनारा कर लिया। उन्होंने एनडीए जाने का फैसला किया। इसके साथ ही अखिलेश की राज्यसभा चुनाव की गुणा-गणित उलझनी शुरू हो गई। दरअसल जयंत चौधरी की रालोद के पास 9 विधायक थे, इनका समर्थन मिलते ही भाजपा ने ऐन वक्त राज्यसभा के लिए आठवें प्रत्याशी के रूप में संजय सेठ का नाम आगे कर दिया। भाजपा ने पूरी रणनीति के साथ ये दांव खेला। दरअसल संजय सेठ पुराने समाजवादी रहे, उन्होंने सपा से राज्यसभा सदस्य रहते हुए भाजपा का दामन थामा था। भाजपा ने उस समय उन्हें फौरन राज्यसभा भेज दिया था लेकिन कार्यकाल खत्म होने के बाद से ही वह वेटिंग में चल रहे थे।

इधर अखिलेश यादव ने सपा के 3 प्रत्याशियों के नाम का ऐलान किया तो पार्टी के अंदर ही मोर्चा खुल गया। दरअसल अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए की राजनीति कर रहे हैं। प्रदेश में घूम-घूमकर पीडीए को न्याय दिलाने, उनका हक दिलाने की बात कर रहे हैं। लेकिन राज्यसभा प्रत्याशी के रूप में अपर कास्ट जया बच्चन, आलोक रंजन का नाम आगे आया। तीसरे नाम के रूप में जरूर उन्होंने दलित नेता रामजी लाल सुमन काे प्रत्याशी बनाया। लेकिन नाम का ऐलान होते ही सबसे ज्यादा विरोध अपना दल कमेरावादी की नेता और सपा से विधायक चुनी गईं पल्लवी पटेल की तरफ से आया। उन्होंने साफ कर दिया कि वह पीडीए प्रत्याशी को ही वोट करेंगीं।

आज वोटिंग के दिन तक पल्लवी पटेल के आने या न आने को लेकर संशय बना हुआ था। वोट डालने पहुंचे अखिलेश यादव से जब पूछा गया कि क्या पल्लवी सपा उम्मीदवार को वोट करेंगी तो उन्होंने अंतरात्मा की बात छेड़ दी। अखिलेश ने कहा कि वे अभी तक नहीं आई हैं तो वे जानें। मैं किसी की अंतरात्मा के बारे में नहीं जानता। लेकिन थोड़े समय के बाद पल्लवी पटेल वोट डालने आईं। उनसे जब मीडिया ने पूछा तो उन्होंने कहा कि मैं ही पीडीए हूं, मेरे वजूद में धोखा नहीं है। मैं धोखा और गद्दारी नहीं कर सकती। मैंने पीडीए को वोट किया है। मैंने खुलकर और दिखा कर पीडीए उम्मीदवार रामजी लाल सुमन को वोट किया है।

वहीं दूसरी तरफ प्रत्याशी ऐलान के साथ ही बदायूं से पुराने कद्दावर नेता सलीम इकबाल शेरवानी भी अखिलेश यादव से खफा हो गए। उन्होंने इस्तीफा भेजकर सपा मुखिया अखिलेश यादव पर मुस्लिमों की उपेक्षा का आरोप लगा दिया। दरअसल बदायूं से पहले धर्मेंद्र यादव फिर शिवपाल यादव का लोकसभा टिकट फाइनल होने के बाद सलीम शेरवानी कैंप ये मानकर चल रहा था कि उन्हें राज्यसभा भेजा जा सकता है। लेकिन राज्यसभा प्रत्याशियों का ऐलान हुआ और मुस्लिम प्रत्याशी नहीं होने के बाद आरोप सामने आ गया।

अगर सपा के बागी विधायकों की बात करें तो इनमें ज्यादातर की जाति को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा रही। इनमें मनोज पांडेय समाजवादी पार्टी का ब्राह्मण चेहरा माने जाते थे। वोटिंग से ऐन पहले उन्होंने चीफ व्हिप पद से इस्तीफा दे दिया। इसी तरह राकेश पांडेय, राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह, विनोद चतुर्वेदी ने भी क्रॉस वोटिंग की। लेकिन ये अकेले नहीं थे, इनके साथ गायत्री प्रजापति की पत्नी महाराजी देवी, पूजा पाल और आशुतोष मौर्य भी एनडीए के पाले में खड़े नजर आए। जानकारों के अनुसार अखिलेश यादव की पीडीए पॉलिटिक्स, राम मंदिर मुद्दे पर उनकी बयानबाजी, स्वामी प्रसाद मौर्य के विवादित बयानबाजी आदि जैसे कई मुद्दे रहे, जिसके कारण पार्टी में असंतोष पनप रहा था। राज्यसभा चुनाव के दौरान इन नेताओं को मौका मिल गया।

जानकारों का मानना है कि अखिलेश यादव की इस पोस्ट की सियासी धार तेज तब होती, अगर वह इस मौके को बेहतर तरीके से हैंडल करते। वह ज्यादा बेहतर मैनेजमेंट के साथ भाजपा का मुकाबला कर सकते थे। एक राय ये भी आई कि अगर अखिलेश यादव तीनों प्रत्याशी पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) से उतारते तो भले ही भाजपा सेंध लगाती लेकिन लोकसभा चुनाव के लिए उनकी रणनीति को राजनीतिक धार मिल जाती। उनके पास अपने वोटराें को संदेश देने का मौका होता। और तब उनकी इस एक्स पोस्ट का भी मतलब निकलता। क्योंकि आज जो सपा के एकमात्र प्रत्याशी हारे हैं, वह आलोक रंजन हैं और अपर कास्ट से हैं। दिलचस्प ये भी है कि जिस तरह चुनाव में जया बच्चन और राम जी लाल सुमन को क्रमश: 41 और 40 वोट मिले, उससे साफ है कि अखिलेश यादव ने खुद इनकी जीत सुनिश्चित करने के लिए आलोक रंजन के हिस्से के वोट भी ट्रांसफर कराए। और ये तो अखिलेश यादव की रणनीतिक चूक ही मानी जाएगी कि उनके इतने विधायक पाला बदलने की तैयारी में थे और उन्हें भनक तक नहीं लगी। मनोज पांडेय तो उन नेताओं में थे, जो अखिलेश यादव की अनुपस्थिति में विधानसभा में मोर्चा संभालते थे। उन्हें पार्टी का चीफ व्हिप बनाया और ऐन वक्त वह भी गच्चा दे गए।

आखिर राज्यसभा चुनाव में कैसे जीत पाई बीजेपी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि राज्यसभा चुनाव में बीजेपी कैसे जीत पाई! तीन राज्यों में 15 राज्यसभा सीटों पर आए नतीजों ने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को तगड़ा झटका दिया है। भारतीय जनता पार्टी बीजेपी ने चुनाव जीतने के लिए ऐसा चक्रव्यूह बनाया जिसमें विपक्षी दल उलझकर रह गए। कुल 56 सीटों में से 41 सीटों पर कैंडिडेट निर्विरोध चुने गए थे। बीजेपी ने यूपी में एसपी और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस को चौंकाते हुए दो अतिरिक्त सीट जीत ली। दरअसल, इसके लिए बीजेपी ने बड़ी तैयारी की थी। ये एक दिन की घटना नहीं है। बीजेपी ने विपक्ष की कमजोर नस को भांपा और फिर चक्रव्यूह की रचना कर दी। यूपी में 10 सीटों के लिए राज्यसभा चुनाव होना था। आंकड़ों के हिसाब से यहां बीजेपी 7 और एसपी 3 कैंडिडेट जिता सकती थी। लेकिन बीजेपी ने ऐन वक्त पर अपना आठवां कैंडिडेट उतार दिया। इससे मामला रोचक हो गया। बीजेपी के इस दांव से एसपी के लिए मुश्किल हो गई। बीजेपी ने आठवें कैंडिडेट की घोषणा के साथ ही मिशन में जुट गई। बीजेपी के आठवें कैंडिडेट संजय सेठ की जीत में राम मंदिर का मुद्दा काफी अहम रहा। पार्टी ने सबसे पहले वैसे विधायकों पर नजर टिकाई जो 22 जनवरी को राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का खुलकर समर्थन किया था। इनमें एसपी के विधायक राकेश सिंह, अभय सिंह, विनोद चतुर्वेदी और मनोज पांडेय शामिल थे। राज्यसभा चुनाव रिजल्ट के बाद अभय सिंह ने एक्स पर लिखा, ‘वोटिंग पारदर्शी तरीके से हुई। हमने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर वोट दिए। जब राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा हुई और विधानसभा अध्यक्ष ने सभी विधायकों को रामलला के दर्शन के लिए बुलाया तब एसपी ने अपने विधायकों को वहां जाने से रोक दिया। ये सही नहीं था।

बीजेपी की तरफ से मोर्चा खुद सीएम योगी आदित्यनाथ ने संभाल रखा था। उनके अलावा वरिष्ठ मंत्री सुरेश खन्ना, जेपीएस राठौर, यूपी बीजेपी चीफ भूपेंद्र चौधरी और संगठन महासचिव धर्मपाल भी इस मिशन में शामिल थे। बीजेपी के एक नेता ने बताया कि वैसे विधायक जो अपनी पार्टी की चुप्पी के बाद भी राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का पुरजोर समर्थन किया, उनसे संपर्क साधा गया। इसके बाद ज्यादातर ने बीजेपी के आठवें कैंडिडेट को समर्थन करने का ऐलान किया। एसपी के सात विधायक अभय सिंह, राकेश प्रताप सिंह, राकेश पांडेय, विनोद चतुर्वेदी, मनोज पांडेय, आशुतोष मौर्य और पूजा पाल थे। महाराना प्रजापति तबीयत खराब होने की बात कहकर वोट देने नहीं पहुंचीं। एसपी विधायकों के वोट पक्की करने के बाद बीजेपी ने राजा भैया का रुख किया। सीएम योगी खुद राजा भैया से मिले और उसके कुछ देर बाद ही कुंडा के विधायक ने बीजेपी कैंडिडेट को समर्थन देने का ऐलान कर दिया। इसके बाद बीजेपी ने बीएसपी के एकमात्र विधायक उमाशंकर सिंह को साधा। सूत्रों ने बताया कि सिंह ने बीएसपी चीफ को बीजेपी को वोट देने के लिए मनाया और अंत में मायावती ने भी उमाशंकर सिंह को बीजेपी कैंडिडेट को वोट देने के लिए हरी झंडी दे दी। इस तरह बीजेपी ने यूपी में 8 सीटों पर जीत दर्ज कर ली।

हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के पास 40 विधायक हैं जबकि बीजेपी के पास महज 25 विधायक थे। तकनीकी रूप से बीजेपी के पास राज्यसभा कैंडिडेट को जिताने के लिए पर्याप्त नंबर तक नहीं थे। राज्यसभा में जीत के लिए 35 विधायकों की संख्या चाहिए। ऐसे में कांग्रेस के पास जीत के लिए नंबर आसान था। लेकिन बताया जा रहा है कि बीजेपी को कांग्रेस में चल रही अंदरूनी खींचतान की भनक थी। भगवा दल ने चुपचाप नाराज विधायकों से संपर्क साधना शुरू किया। संकेत मिलते ही बीजेपी ने हिमाचल से भी कैंडिडेट हर्ष महाजन का ऐलान कर दिया। कांग्रेस के 6 विधायकों और 3 निर्दलीय ने राज्यसभा में क्रॉस वोटिंग कर दी और पूरा खेल ही बदल गया। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि उसके 6 विधायकों का बीजेपी ने अपहरण कर लिया। हालांकि, गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस अपने अंदरूनी मतभेद के कारण हारी है।

बीजेपी ने वैसी जगह ये जीत दर्ज की है जहां कुछ भी उसके फेवर में नहीं था। दरअसल, उसके कैंडिडेट हर्ष महाजन पहले कांग्रेस में ही हुआ करते थे। वो आजतक कोई चुनाव नहीं हारे हैं। बीजेपी ने कांग्रेस से आए ही नेता को खड़ा कर सत्तारूढ़ दल को सकपका दिया। इसके बाद पूर्व सीएम जयराम ठाकुर ने कांग्रेस में सेंध लगाने का मिशन शुरू किया। हर्ष ने भी इसके लिए पूरी ताकत झोंक दी। चुनाव वाले दिन तक कांग्रेस को अपने कैंडिडेट अभिषेक मनु सिंघवी के जीत का भरोसा था। लेकिन क्रॉस वोटिंग के खेल में कांग्रेस पिछड़ गई। बीजेपी ने कांग्रेस में नाराज चल रहे विधायकों को अपने कैंडिडेट हर्ष महाजन के पक्ष में वोटिंग करने के लिए मना लिया। इसके अलावा 3 निर्दलीय को भी भगवा दल ने साध लिया। इसके साथ ही बीजेपी को 9 अतिरिक्त वोट मिल गए। गिनती के आखिर में सिंघवी और हर्ष को 34-34 वोट मिले।

सब राज्य में मुकाबला टाइ हो गया तो परिणाम के लिए ड्रॉ की जरूरत आन पड़ी। लेकिन यहां किस्मत ने कांग्रेस के साथ खेल कर दिया। चुनाव संचालन नियम, 1961 के नियम 75, 4 के तहत कैंडिडेट को बराबर वोट मिले की स्थिति में ड्रॉ का सहारा लिया जाता है। इसके लिए रिटर्निंग अफसर कैंडिडेट के नाम वाली पर्चियों को एक बॉक्स में रखता है। पर्ची निकालने से पहले उसे अच्छे तरह मिला दिया जाता है। लेकिन यहां ये जानकर आप चौंक जाएंगे कि जिस कैंडिडेट के नाम वाले की पर्ची बाहर निकलती है वो चुनाव हार जाता है और जिसके नाम की पर्ची पेटी में रह जाती है वो मुकाबला जीत जाता है। सिंघवी के साथ यही हुआ, पेटी से उनके नाम की पर्ची निकली और वो मुकाबला हार गए।

15 में से 10 सीटों पर जीत में बीजेपी की रणनीति काफी कारगर रही। उधर, एसपी कैंडिडेट आलोक रंजन और कांग्रेस कैंडिडेट सिंघवी की हार के पीछे पार्टी की अंदरूनी कलह भी जिम्मेदार रही है। एसपी अपने विधायकों को साध नहीं पाई वहीं कांग्रेस के विधायक हिमाचल के सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू से नाराज चल रहे थे। नाराजगी इतनी थी कि उन्होंने बीजेपी को वोट किया।