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चुनावी चंदे पर क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी चंदे पर बयान दे दिया है! सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में चुनावी बॉन्ड योजना और उससे जुड़े सभी संशोधनों को रद्द कर दिया है। केंद्र सरकार ने 2017 में इस योजना को शुरू किया था, जिसके तहत कोई भी व्यक्ति एसबीआई से चुनावी बॉन्ड खरीदकर किसी भी रजिस्टर्ड राजनीतिक दल को गुप्त चंदा दे सकता था। लेकिन अदालत ने माना कि यह योजना सूचना के अधिकार और समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है। अदालत ने पांच बड़े प्रशासनिक और विधायी अधिनियमों को असंवैधानिक घोषित किया है। इनमें पूरी चुनावी बॉन्ड योजना, जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 में किया गया वह संशोधन शामिल है जिसके तहत पार्टियों को चुनावी बॉन्ड के जरिए मिले चंदे की जानकारी चुनाव आयोग को देने से छूट मिली हुई थी। इसके अलावा, आयकर अधिनियम 1961 में किया गया वह संशोधन भी शामिल है जिसके तहत चुनावी बॉन्ड को ’20 हजार रुपये से ज्यादा के स्वैच्छिक योगदान’ की श्रेणी से बाहर रखा गया था, जिसके लिए पार्टियों को दानदाताओं का रिकॉर्ड रखना होता है। कंपनी अधिनियम 2013 में किया गया वह संशोधन भी शामिल है जिसके तहत कंपनियों को उन पार्टियों के बारे में जानकारी देने के हुए इस बात पर जोर दिया कि इसे मतदाताओं के सूचना के अधिकार का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। अदालत ने सरकार के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि इस योजना का उद्देश्य काले धन पर लगाम लगाना था। अदालत ने कहा कि इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए कम प्रतिबंधात्मक तरीके भी हैं।प्रावधान को हटा दिया गया था जिन्हें वो चंदा देते हैं। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी अधिनियम 2013 में किया गया वह संशोधन भी रद्द कर दिया जिसके तहत कॉरपोरेट चंदे की सीमा को हटा दिया गया था।

अदालत ने माना कि इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम सूचना के अधिकार का उल्लंघन करती है, जो कि बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अदालत ने कहा कि अगर नागरिकों को राजनीतिक दलों के फंडिंग के स्रोत के बारे में अंधेरे में रखा जाता है तो वे स्वतंत्र रूप से वोट देने के अपने अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकते। अदालत ने कंपनियों के लिए राजनीतिक दलों को चंदे की रकम अपने नेट एग्रिगेट प्रॉफिट के 7.5% तक सीमित कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि असीमित कॉरपोरेट चंदा और घाटे में चल रही कंपनियों को चंदा देने की अनुमति समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है। अदालत ने कहा कि इन प्रावधानों से पार्टियों पर कंपनियों का प्रभाव बढ़ता है और बदले में कुछ पाने की संभावना बढ़ जाती है। सर्वोच्च न्यायालय ने सूचना के अधिकार और निजता के अधिकार के बीच संतुलन बनाने के लिए आनुपातिकता परीक्षण पद्धति लागू किया। अदालत ने दानदाताओं की निजता की रक्षा के महत्व को स्वीकार करते हुए इस बात पर जोर दिया कि इसे मतदाताओं के सूचना के अधिकार का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। अदालत ने सरकार के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि इस योजना का उद्देश्य काले धन पर लगाम लगाना था। अदालत ने कहा कि इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए कम प्रतिबंधात्मक तरीके भी हैं।

इस फैसले ने सूचना के अधिकार को राजनीतिक दलों तक भी बढ़ा दिया है, जिससे मुख्य सूचना आयुक्त के 2013 के उस आदेश के खिलाफ मामला कमजोर हो गया है जिसमें कहा गया था कि राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण के रूप में नामित किया जाना चाहिए। अदालत ने चुनावी बॉन्ड योजना के विकल्प भी सुझाए हैं, जैसे कि चुनावी ट्रस्ट जो दानदाताओं को की पहचान गुप्त नहीं रखते और चुनावी खर्चों के लिए सार्वजनिक फंडिंग। निष्कर्ष के रूप में,जिसके तहत चुनावी बॉन्ड को ’20 हजार रुपये से ज्यादा के स्वैच्छिक योगदान’ की श्रेणी से बाहर रखा गया था, जिसके लिए पार्टियों को दानदाताओं का रिकॉर्ड रखना होता है। कंपनी अधिनियम 2013 में किया गया वह संशोधन भी शामिल है जिसके तहत कंपनियों को उन पार्टियों के बारे में जानकारी देने के प्रावधान को हटा दिया गया था जिन्हें वो चंदा देते हैं। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी अधिनियम 2013 में किया गया वह संशोधन भी रद्द कर दिया जिसके तहत कॉरपोरेट चंदे की सीमा को हटा दिया गया था। सर्वोच्च न्यायालय के इस ऐतिहासिक फैसले ने इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम और उससे जुड़े संशोधनों को रद्द कर दिया है, जिसमें सूचना के अधिकार और समानता के अधिकार के उल्लंघन का हवाला दिया गया है। इस फैसले के भारत में राजनीतिक दलों के फंडिंग और चुनावी प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ने वाले हैं।

आजादी के बाद उत्तराखंड बना भारत का पहला UCC राज्य, आखिर क्या है UCC?

हाल ही में उत्तराखंड आजाद भारत का पहला UCC धारक राज्य बन चुका है… जानकारी के लिए बता दे कि उत्तराखंड की विधानसभा में UCC विधेयक बिल यानि समान नागरिक संहिता विधेयक बिल पारित हो गया है… लेकिन एक सवाल कि आखिर समान नागरिक संहिता होती क्या है और यह कैसे सभी धर्म को एक बनाती है? तो आज हम आपको इसी बारे में जानकारी देने वाले हैं!

आपको बता दें कि आजादी के बाद देश का पहला समान नागरिक संहिता विधेयक उत्तराखंड 2024 विधानसभा में पास हो गया। दो दिन लंबी चर्चा, बहस और तर्कों के बाद बुधवार की शाम सदन में विधेयक ध्वनिमत से पास हुआ। विपक्ष ने चर्चा के दौरान बिल प्रवर समिति को भेजने की सिफारिश की थी। उसका यह प्रस्ताव भी ध्वनिमत से खारिज हो गया। इसके बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि इस बिल से समाज का भेदभाव, कुरीतियां खत्म होंगी। कहा, इस कानून में संशोधन की भी गुंजाइश होगी। पास होने के बाद अब बिल राज्यपाल के माध्यम से राष्ट्रपति को भेजा जाएगा, जहां से मुहर लगने के बाद यह कानून राज्य में लागू हो जाएगा। सभी विधिक प्रक्रिया और औपचारिकताएं पूरी करने के बाद यूसीसी लागू करने वाला उत्तराखंड देश का पहला राज्य बनेगा। लेकिन एक सवाल कि आखिर यह UCC यानि समान नागरिक संहिता क्या होती है… तो आज हम आपको यही बताने वाले हैं… आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यूनिफॉर्म सिविल कोड में देश में सभी धर्मों, समुदायों के लिए एक सामान, एक बराबर कानून बनाने की वकालत की गई है. आसान भाषा में बताया जाए तो इस कानून का मतलब है कि देश में सभी धर्मों, समुदाओं के लिए कानून एक समान होगा. यानी मजहब और धर्म के आधार पर मौजूदा अलग-अलग कानून एक तरह  से निष्प्रभावी हो जाएंगे…. यूनिफॉर्म सिविल कोड संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत आती है. इसमें कहा गया है कि राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगे. इसी अनुच्छेद के तहत इस यूनिफॉर्म सिविल कोड को देश में लागू करने की मांग की जा रही है. इसके पीछे जनसंख्या को बिगड़ने से रोकना और जनसांख्यिकी को नियंत्रित करने की तर्क दी जाती है… यह मुद्दा एक सदी से भी ज्यादा समय से राजनीतिक नरेटिव और बहस के केंद्र बना हुआ है. बीजेपी ने हमेशा इसे अपने प्राइमरी एजेंडे में शामिल किया है. बीजेपी 2014 में सरकार बनने से ही UCC को संसद में कानून बनाने पर जोर दे रही है. 2024 चुनाव आने से पहले इस मुद्दे ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है. बीजेपी सत्ता में आने पर UCC को लागू करने का वादा करने वाली पहली पार्टी थी और यह मुद्दा उसके 2019 के लोकसभा चुनाव घोषणापत्र का हिस्सा था…. आइए जानते हैं कि UCC क्या है… तो बता दे कि विवाह, तलाक, गोद लेने और संपत्ति में सभी के लिए एक नियम रखेगा UCC… यही नहीं परिवार के सदस्यों के आपसी संबंध और अधिकारों में समानता.. जाति, धर्म या परंपरा के आधार पर नियमों पर समानता.. एवं सभी धर्मों के लिए समान नियम और कानून रखता है, समान नागरिक संहिता… बता दे कि सिविल कोड की उत्पत्ति औपनिवेशिक भारत में हुई जब ब्रिटिश सरकार ने 1835 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें अपराधों, सबूतों और अनुबंधों से संबंधित भारतीय कानून के संहिताकरण में एकरूपता की आवश्यकता पर बल दिया गया, विशेष रूप से सिफारिश की गई कि हिंदुओं और मुसलमानों के व्यक्तिगत कानूनों को संहिताकरण के बाहर रखा जाए। भारत में जाति और धर्म के आधार पर अलग-अलग कानून और मैरिज एक्ट हैं। इसके कारण सामाजिक ढ़ांचा बिगड़ा हुआ है। यही कारण है कि देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड की मांग उठती रही है जो सभी जाति, धर्म, वर्ग और संप्रदाय को एक ही सिस्टम में लेकर आए। एक कारण यह भी है कि अलग-अलग कानूनों के कारण न्यायिक प्रणाली पर भी असर पड़ता है। वर्तमान समय में लोग शादी, तलाक आदि मुद्दों के निपटारे के लिए पर्सनल लॉ बोर्ड ही जाते हैं। इसका एक खास उद्देश्य महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों सहित अम्बेडकर द्वारा परिकल्पित कमजोर वर्गों को सुरक्षा प्रदान करना है, साथ ही एकता के माध्यम से राष्ट्रवादी उत्साह को बढ़ावा देना है। जब यह कोड बनाया जाएगा तो यह उन कानूनों को सरल बनाने का काम करेगा जो वर्तमान में धार्मिक मान्यताओं जैसे हिंदू कोड बिल, शरीयत कानून और अन्य के आधार पर अलग-अलग हैं। UCC के तहत शादी, तलाक, संपत्ति, गोद लेने जैसे मामले शामिल होते हैं… हर धर्म में शादी, तलाक के लिए अब एक ही कानून होगा…जो कानून हिंदुओं के लिए, वहीं दूसरों के लिए भी होगा… अब बिना तलाक के एक से ज्यादा शादी नहीं कर पाएंगे. यही नहीं शरीयत के मुताबिक जायदाद का बंटवारा नहीं होगा… अब ये सभी चीज़े समान नागरिक संहिता के अनुसार होगी…. जैसे ही समान नागरिक संहिता का नाम आता है लोगों के मन में थोड़ा सा विश्वास कम हो जाता है… तो आज हम आपको बताते हैं कि समान नागरिक संहिता से क्या-क्या परिवर्तित नहीं होगा… तो आपको बता दें कि धार्मिक मान्यताओं पर कोई फर्क नहीं ना ही धार्मिक रीति-रिवाज पर असर पड़ेगा….ऐसा नहीं है कि शादी पंडित या मौलवी नहीं कराएंगे.. सारे काम वैसे ही होंगे जैसे पहले होते हैं बस नियम और कानून बदल जाएंगे… साथ ही खान-पान, पूजा-इबादत, वेश-भूषा पर भी प्रभाव नहीं पड़ेगा… यानी सीधी सी बात यह है कि समान नागरिक संहिता सभी नागरिकों को समान नियम पालन करने के लिए कहता है… जिसमें शादी, विरासत, तलाक एवं गोद लेने जैसे मामले शामिल है… आपको यह जानकारी कैसी लगी, अपना जवाब हमारे कमेंट बॉक्स में जरूर दीजिएगा!

आखिर क्या है तोशाखाना मामला? जिसके तहत पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को हुई जेल?

हाल ही में पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान और उनकी बीवी को 14 साल की जेल हो चुकी है…. यह मामला तोशाखाना मामला है… जिसके तहत पूर्व प्रधानमंत्री को और उनकी धर्मपत्नी को सजा मिली है… लेकिन एक सवाल कि आखिर यह तोशाखाना मामला क्या है? जिसके तहत पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को 14 साल की सजा सुनाई गई है… तो आज हम आपको इसी मामले के बारे में जानकारी देने वाले हैं!

आपको बता दें कि पाकिस्तान के पूर्व प्रधान मंत्री इमरान खान और उनकी पत्नी को सरकारी उपहारों की अवैध बिक्री से संबंधित एक मामले में 14 साल जेल की सजा सुनाई गई है, इस्लामाबाद में भ्रष्टाचार विरोधी अदालत के जरिए जारी फैसले में यह भी कहा गया है कि दंपति को अगले 10 सालों के लिए सार्वजनिक पद संभालने के लिए अयोग्य ठहराया जाएगा. दोनों पर ₹787 मिलियन का जुर्माना भी लगाया गया है. यह सजा 71 साल के खान और उनकी पार्टी के उपाध्यक्ष शाह महमूद कुरैशी को आधिकारिक रहस्यों का खुलासा करने के लिए मंगलवार को 10 साल की जेल की सजा मिलने के एक दिन बाद सुनाई गयी है पाकिस्तान के सूचना मंत्री के अनुसार, घड़ियों में सबसे कीमती, “मास्टर ग्राफ़ सीमित संस्करण” की अनुमानित कीमत $300,000 हैउनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) ने बुधवार को कहा,”खान पर प्रधानमंत्री रहते हुए महंगे सरकारी उपहार अपने पास रखने का आरोप लगाया गया है.”.. रिपोर्ट के मुताबिक, इस्लामाबाद में भ्रष्टाचार विरोधी अदालत के जरिए जारी फैसले में यह भी कहा गया है कि दंपति को अगले 10 सालों के लिए सार्वजनिक पद संभालने के लिए अयोग्य ठहराया जाएगा. दोनों पर ₹787 मिलियन का जुर्माना भी लगाया गया है. यह सजा 71 साल के खान और उनकी पार्टी के उपाध्यक्ष शाह महमूद कुरैशी को आधिकारिक रहस्यों का खुलासा करने के लिए मंगलवार को 10 साल की जेल की सजा मिलने के एक दिन बाद सुनाई गयी है….

आइए अब आपको बताते हैं कि आखिर यह मामला है क्या? तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि तोशखाना नियम – राज्य के खजाने से उपहारों से संबंधित है – कहते हैं कि सरकारी अधिकारियों को तब तक उपहार रखने की अनुमति है जब तक वे उनके लिए कीमत चुकाते हैं. हालांकि, उपहार पहले जमा किए जाने चाहिए. यानी ये उपहार पहले सरकार के खजाने में जाने चाहिए. तोशाखाना कैबिनेट डिवीजन के अंतर्गत एक विभाग है जो सभी सार्वजनिक अधिकारियों को मिले उपहारों और महंगी चीज़ों को रखता है. नियम कहते हैं कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति 30,000 पीकेआर से कम कीमत वाले उपहार अपने पास रख सकते हैं… बता दें कि विवाद पहली बार तब उजागर हुआ जब पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) के तहत बनी गठबंधन सरकार ने अगस्त 2022 में खान के खिलाफ मामला दर्ज किया. PML-N ने दावा किया कि खान ने तोशाखाना को दिए गए उपहारों के बारे में जानकारी का खुलासा नहीं किया और इसका सहारा भी लिया. कुछ उपहारों की “अवैध” बिक्री भी की. जब खान 2018 में सत्ता में आए थे तो उन्होंने अन्य देशों से मिले उपहारों का खुलासा करने के संबंध में प्रतिरोध दिखाया और कहा कि इससे विदेशी संबंधों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है….

सत्ता में रहते हुए, खान ने पाकिस्तान चुनाव आयोग (ईसीपी) को एक पत्र लिखकर कम से कम चार उपहार बेचने की बात स्वीकार की थी. हालांकि, उन्होंने दावा किया कि उन्होंने सरकार को कीमत का एक प्रतिशत भुगतान करके उन्हें खरीदा है. इन गिफ्ट में मंहगे कफलिंक्स, रोलेक्स घड़ियां, अंगूठी और महंगे पेन थे. बता दे कि खान पर प्रधानमंत्री रहते हुए महंगे सरकारी उपहार अपने पास रखने का आरोप लगाया गया है.”.. रिपोर्ट के मुताबिक, इस्लामाबाद में भ्रष्टाचार विरोधी अदालत के जरिए जारी फैसले में यह भी कहा गया है कि दंपति को अगले 10 सालों के लिए सार्वजनिक पद संभालने के लिए अयोग्य ठहराया जाएगा. दोनों पर ₹787 मिलियन का जुर्माना भी लगाया गया है. यह सजा 71 साल के खान और उनकी पार्टी के उपाध्यक्ष शाह महमूद कुरैशी को आधिकारिक रहस्यों का खुलासा करने के लिए मंगलवार को 10 साल की जेल की सजा मिलने के एक दिन बाद सुनाई गयी है पाकिस्तान के सूचना मंत्री के अनुसार, घड़ियों में सबसे कीमती, “मास्टर ग्राफ़ सीमित संस्करण” की अनुमानित कीमत $300,000 है…. यानी सीधी सी बात यह है कि अब इमरान खान का शासन खत्म हो चुका है, जब वह प्रधानमंत्री बने थे तो लगा था कि शायद वह भारत के लिए एक अच्छा पड़ोसी मुल्क साबित होंगे… लेकिन जैसा कि पाकिस्तान की रंगत और नियत है, वैसा ही हमें भी देखने को मिला… खैर, यह था पाकिस्तान का सबसे चर्चित तोशाखाना मामला… आपको यह जानकारी कैसी लगी, अपना जवाब हमारे कमेंट बॉक्स में जरूर दीजिएगा!

आखिर क्या है ज्ञानवापी परिसर में स्थित व्यास जी तहखाना? जिसमें जिला अदालत ने दी पूजा करने की अनुमति!

हाल ही में वाराणसी की जिला अदालत के द्वारा ज्ञानव्यापी परिसर में स्थित व्यास जी तहखाने में पूजा करने की हिंदू पक्ष को अनुमति दे दी गई है… जिसके बाद हिंदू पक्ष खुश नजर आ रहा है… लेकिन एक सवाल कि आखिर ज्ञानवापी परिसर में स्थित यह व्यास जी तहखाना आखिर है क्या और इसमें कब से पूजा बंद हुई थी और यह अदालत की लड़ाई कब से चलती आ रही है? तो आज हम आपको उस पूरे घटनाक्रम के बारे में जानकारी देने वाले हैं!

आपको बता दें कि ज्ञानवापी मामले में बुधवार को बड़ा फैसला आया है। वाराणसी जिला अदालत ने हिंदू पक्ष को ज्ञानवापी परिसर में मौजूद व्यास तहखाने में पूजा करने की इजाजत दे दी है। अब व्यास परिवार तहखाने में पूजा पाठ करेगा। सोमनाथ व्यास का परिवार 1993 तक तहखाने में पूजा पाठ करता था। बता दें कि ज्ञानवापी परिसर में मौजूद व्यासजी तहखाना में पूजा की मांग को लेकर वर्षों से अदालती लड़ाई चल रही है। ताजा फैसले में बताया गया कि वादी हिंदू पक्ष ने बताया कि मंदिर भवन के दक्षिण दिशा में स्थित तहखाने में मूर्ति की पूजा होती थी। दिसम्बर 1993 के बाद पुजारी व्यासजी को इस प्रांगण के बेरिकेट वाले क्षेत्र में प्रवेश करने से रोक दिया गया। इस कारण तहखाने में होने वाले राग-भोग आदि संस्कार भी रुक गये। हिंदू पक्ष ने दलील दी कि इस बात के पर्याप्त आधार है कि वंशानुगत आधार पर पुजारी व्यासजी ब्रिटिश शासन काल में भी वहां कब्जे में थे।  व्यासजी ने दिसम्बर 1993 तक वहां भवन में पूजा अर्चना की है। पूजारी द्वारा पूजा किया जाना नियंत्रित करे और उसका प्रबंध करे। न्यायालय में 17 जनवरी 2024 को पारित एक आदेश में रिसीवर की नियुक्ति तो कर दी लेकिन तहखाने में पूजा-अर्चना के संबंध में कोई आदेश पारित नहीं किया। हिंदू पक्ष ने अपनी दलील में कहा था कि तहखाने में मौजूद मूर्तियों की पूजा नियमित रूप से की जानी आवश्यक है।बाद में तहखाने का दरवाजा हटा दिया गया। हिन्दू धर्म की पूजा से सम्बन्धित सामग्री बहुत सी प्राचीन मूर्तियां और धार्मिक महत्व की अन्य सामग्री उस तहखाने में मौजूद हैं। हिंदू पक्ष ने कहा कि राज्य सरकार और जिला प्रशासन ने बगैर किसी विधिक अधिकार के तहखाने के भीतर पूजा दिसम्बर 1993 से रोक दी। 

हिंदू पक्ष ने अदालत से अनुरोध किया कि वह रिसीवर को नियुक्त करे जो तहखाने में पूजारी द्वारा पूजा किया जाना नियंत्रित करे और उसका प्रबंध करे। न्यायालय में 17 जनवरी 2024 को पारित एक आदेश में रिसीवर की नियुक्ति तो कर दी लेकिन तहखाने में पूजा-अर्चना के संबंध में कोई आदेश पारित नहीं किया। हिंदू पक्ष ने अपनी दलील में कहा था कि तहखाने में मौजूद मूर्तियों की पूजा नियमित रूप से की जानी आवश्यक है।

जिसके बाद बुधवार को जिला जज की कोर्ट ने अपने एक आदेश में व्यासजी के तहखाने में पूजा की अनुमति दे दी। ज्ञानवापी स्थित व्यासजी के तहखाने में पूजा किए संबंधी आवेदन पर जिला जज डॉ. अजय कृष्ण विश्वेश की अदालत में दोनों पक्ष की तरफ से मंगलवार को बहस पूरी कर ली गई थी। अदालत ने इस प्रकरण में बुधवार को अपना आदेश सुनाया। तहखाने में पूजा करने की अनुमति मिल गई है। हिंदू पक्ष के वकील सुभाष नंदन चतुर्वेदी ने कहा व्यासजी के तहखाने में पूजा करने का अधिकार दिया गया है और कोर्ट ने एक सप्ताह के भीतर आदेश का अनुपालन करने का आदेश जिला अधिकारी को दिया है। वादी अधिवक्ताओं ने कहा है कि व्यासजी के तहखाने को डीएम की सुपुर्दगी में दिया गया है। अधिवक्ताओं के अनुरोध पर कोर्ट ने नंदी के सामने की बैरिकेडिंग को खोलने की अनुमति दी है। बता दें कि ज्ञानवापी मामले में बुधवार को बड़ा फैसला आया है। वाराणसी जिला अदालत ने हिंदू पक्ष को ज्ञानवापी परिसर में मौजूद व्यास तहखाने में पूजा करने की इजाजत दे दी है। अब व्यास परिवार तहखाने में पूजा पाठ करेगा। सोमनाथ व्यास का परिवार 1993 तक तहखाने में पूजा पाठ करता था। बता दें कि ज्ञानवापी परिसर में मौजूद व्यासजी तहखाना में पूजा की मांग को लेकर वर्षों से अदालती लड़ाई चल रही है। ऐसे में अब तहखाने में 1993 के पहले के जैसे पूजा के लिए अदालत के आदेश से आने- जाने दिया जाएगा। तो यह था वह फैसला जो वाराणसी जिला अदालत के द्वारा ज्ञानवापी परिसर में स्थित व्यास जी तहखाना के लिए दिया गया है…. खैर, आपको इस बारे में जानकर कैसा लगा अपना जवाब हमारे कमेंट बॉक्स में जरूर दीजिएगा!

आखिर क्या है आम बजट और अंतरिम बजट में अन्तर? इस साल क्यों पेश किया जा रहा है अंतरिम बजट?

1 फरवरी, 2024 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के द्वारा अंतरिम बजट पेश किया गया… लेकिन अगर आम सालों की बात की जाए, तो हर साल आम बजट पेश किया जाता है, लेकिन इस साल अंतरिम बजट पेश किया गया है… तो सवाल यह कि आखिर आम बजट और अंतरिम बजट में अंतर क्या होता है? और इस साल अंतरिम बजट क्यों पेश किया गया है? तो आज हम आपको इसी बारे में जानकारी देने वाले हैं!

आपको बता दें कि जिस साल देश में आम चुनाव होने होते हैं उस वर्ष सरकार अंतरिम बजट का उपयोग देश की मशीनरी को बिना किसी अड़चन के आगे बढ़ाने के लिए करती है। भारत सरकार हर साल फरवरी के पहले दिन केंद्रीय आम बजट पेश करती है और यह बजट आगामी वित्तीय वर्ष के लिए एक वित्तीय ब्लूप्रिंट के रूप में कार्य करता है। हालांकि, 2024 में होने वाले आम चुनावों के कारण, केंद्र सरकार इस साल पूर्ण बजट पेश नहीं करेगी, बल्कि इस बार 1 फरवरी को अंतरिम बजट पेश किया गया! आई अब आपको आम बजट यानी पूर्ण वित्तीय बजट के बारे में और अंतरिम बजट के बारे में जानकारी देते हैं… तो आपको बता दें कि वार्षिक बजट हर साल फरवरी में पेश किया जाता है और यह आगामी वित्तीय वर्ष के लिए 1 अप्रैल से 31 मार्च तक का पूर्ण वित्तीय विवरण होता है। इस दस्तावेज़ में करों और अन्य उपायों के माध्यम से सरकार के राजस्व स्रोतों की एक व्यापक सूची शामिल होती है। इसके अलावे इसमें बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और रक्षा जैसे विभिन्न क्षेत्रों में किए जाने वाले, सुझाए गए व्यय भी शामिल होते हैं।यह दस्तावेज आने वाले पूरे वित्तीय वर्ष के लिए देश के लिए एक विस्तृत वित्तीय रोडमैप प्रदान करता है, देश के वित्तीय लक्ष्यों व नीतिगत पहलों को निर्धारित करता है और देश के आर्थिक ढांचे को आकार देता है। नियमित बजट में पारित होने से पहले व्यापक संसदीय बहस, जांच, संशोधन और चर्चा भी की जाती है। तो ये होता है आम बजट…. आइए अब आपको अंतरिम बजट के बारे में बताते है…. बता दें कि देश में जिस वर्ष आम चुनाव होते हैं उस साल सरकार अंतरिम बजट का उपयोग देश की मशीनरी को बिना किसी अड़चन के आगे बढ़ने में मदद करने के लिए करती है। अंतरिम बजट भी फरवरी में पेश किया जाता है, हालांकि, यह आने वाले पूरे वित्तीय वर्ष के बजाय, चालू वित्त वर्ष के बचे महीनों को कवर करता है। अंतरिम बजट यह सुनिश्चित करने के लिए पेश किया जाता है कि वेतन, पेंशन और कल्याण कार्यक्रमों जैसी आवश्यक सेवाएं निर्बाध रूप से जारी रह सकें। अंतरिम बजट में सरकार किसी भी बड़ी नीतिगत घोषणा या कराधान में किसी बड़े बदलाव से बचती है, ताकि चुनावी मौसम से पहले मतदाताओं को किसी भी तरह से प्रभावित करने से बचा जा सके। अंतरिम बजट निवर्तमान सरकार के कार्यकाल के शेष महीनों के लिए एक अस्थायी वित्तीय रोडमैप के रूप में कार्य करता है। अंतरिम बजट में शामिल अनुमोदन प्रक्रिया भी कम जटिल है। इस पर बहुत अधिक संसदीय चर्चा भी नहीं होती है। यानी अंतरिम बजट आसानी से पेश किया जा सकता है…. हालांकि, एक बार चुनाव संपन्न होने और नया वित्तीय वर्ष शुरू होने के बाद, नई सरकार के गठन और आधिकारिक रूप से कार्यभार संभालने से पहले एक छोटी अवधि होती है। इस महत्वपूर्ण अवधि में सिस्टम कैसे काम करता है यह भी जानना जरूरी है। इसके लिए लेखानुदान की जानकारी जरूरी है। चुनाव संपन्न होने और नई सरकार के शपथ ग्रहण के बाद देश के सिस्टम में निरंतरता सुनिश्चित करने और प्रशासन व संचालन में किसी भी प्रकार की रुकावट से बचने के लिए ‘लेखानुदान’ का इस्तेमाल किया जाता है। यह सुविधा देश का प्रशासनिक और आर्थिक इंजन चलता रहे यह सुनिश्चित करने के लिए है। यह एक अस्थायी उपाय है और नई सरकार को एक सीमित अवधि के लिए भारत की समेकित निधि से धन का उपयोग (आमतौर पर दो महीने के लिए) करने का अधिकार देता है। इसका प्रावधान इस लिए किया गया है ताकि वेतन और जारी कल्याण कार्यक्रमों जैसे तत्काल खर्चों का प्रबंधन किया जा सके। यह उपाय पूर्ववर्ती सरकार के बजट या अंतरिम बजट पर आधारित होता है। तो यह है आम बजट और अंतरिम बजट में अंतर… आपको यह जानकारी कैसी लगी अपना जवाब हमारे कमेंट बॉक्स में जरूर दीजिएगा!

आखिर क्या होती है Z+, Y+ और Z सिक्योरिटी? और किसे दी जाती है यह VVIP सुरक्षा?

हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान की सुरक्षा बढ़ा दी है। उनकी सुरक्षा की कैटेगरी बढ़ाकर ‘जेड प्लस’ कर दी गई है। राज्यपाल खान के खिलाफ केरल के कोल्लम जिले में शनिवार को स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) के कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया। उनके ऐसा करने पर खान अपने वाहन से बाहर निकले। फिर प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर सड़क किनारे एक दुकान के सामने बैठ गए। इस घटना के बाद ही उनकी सिक्‍योरिटी बढ़ाने का फैसला लिया गया।  लेकिन इसी बीच यह सवाल उठा कि आखिर यह VVIP सिक्योरिटी क्या होती है? (Z, Z+, Y+) इन सिक्योरिटी को ऐसी कैटिगरीज कैसे मिलती है…? तो आज हम आपको इन्हीं संदर्भ में जानकारी देने वाले हैं! 

आपको बता दें कि देश में सरकार द्वारा कुछ लोगों को सुरक्षा दी जाती है। ये सुरक्षा उन लोगों को दी जाती है, जिन्हें किसी तरह का खतरा होता है। सुरक्षा एजेंसी व्यक्ति की जान के खतरे को देखती हैं और उसके आधार पर सुरक्षा दी जाती है। भारत में आमतौर पर पांच तरह की वीवीआईपी सुरक्षा दी जाती हैं। ये हैं Z+, Z, Y+, Y और X श्रेणी की सुरक्षा। बता दे कि यह सभी श्रेणियां इनकी सिक्योरिटी लेवल और कैपेबिलिटी के अनुसार दी जाती है…. बात अगर Z+ सिक्योरिटी की करें तो भारत में Z+ सुरक्षा सर्वोच्च श्रेणी की सुरक्षा मानी जातती है। Z+ सुरक्षा में संबंधिक व्यक्ति के पास 10 से ज्यादा एनएसजी कमांडो और पुलिस कर्मी समेत 55 ट्रेंड जवान तैनात किए जाते हैं। ये सभी कमांडो 24 घंटे व्यक्ति के चारों तरफ पैनी नजर रखते हैं। सुरक्षा में लगा हर एक कमांडो मार्शल आर्ट का स्पेशलिस्ट होता है। इसके साथ ही इस जत्थे में आधुनिक हथियार भी होते हैं। भारत में Z+ सुरक्षा पाने वालों में पीएम मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत एवं अंबानी परिवार समेत कई बड़े चेहरे शामिल हैं।वहीं Z+ के बाद सबसे सुरक्षित सिक्योरिटी में Z सुरक्षा का नाम आता है। ये Z+ से थोड़ी अलग है। इसमें संबंधित व्यक्ति के आसपास 6 से 6 NSG कमांडो और पुलिस कर्मियों समेत 22 जवान तैनात रहते हैं। ये सुरक्षा दिल्ली पुलिस, ITBP या सीआरपीएफ के जवानों द्वारा दी जाती है। भारत में बाबा रामदेव समेत कई अभिनेताओं और नेताओं के पास ये सुरक्षा है। Z सिक्योरिटी के बाद Y+ सुरक्षा का नाम आता है। इस सुरक्षा घेरे में 11 सुरक्षा कर्मी शामिल होते हैं। इसमें 1 या 2 कमांडो और 2 पीएसओ शामिल होता है। इसके साथ ही इस जत्थे में पुलिसकर्मी भी शामिल होते हैं। उपेंद्र कुशवाहा को सरकार ने यही सुरक्षा प्रदान की है। वहीं बात Y श्रेणी की करे तो Y श्रेणी की सुरक्षा में 1 या 2 कमांडो और पुलिस कर्मियों सहित 8 जवानों का सुरक्षा कवच प्रदान किया जाता है। इसमें सुरक्षा के रूप में दो पर्सनल सिक्योरिटी ऑफिसर (पीएसओ) भी प्रदान किया जाता है। भारत में इस श्रेणी की सुरक्षा पाने वाले लोगों की संख्या काफी ज्यादा है। अब बात X श्रेणी की.. तो बता दें कि X श्रेणी की सुरक्षा में संबंधित व्यक्ति के साथ 2 सशस्त्र पुलिस कर्मियों को तैनात किया जाता है। यह सुरक्षा पर्सनल सिक्योरिटी ऑफिसर द्वारा प्रदान की जाती है। भारत में काफी संख्या में लोगों को इस श्रेणी की सुरक्षा मिलती है।

आइए अब आपको बताते हैं कि इन सभी VIPs को यह सिक्योरिटी कौन देता है? तो आपकी जानकारी के लिए बता दे कि भारत में वीवीआईपी लोगों को कई सुरक्षा एजेंसी द्वारा सिक्योरिटी दी जाती है। इसमें SPG, NSG, ITBP और CRPF जैसी एजेंसी शामिल हैं। इस सुरक्षा को लेने के लिए सरकार को एप्लीकेशन देनी होती है, इसके बाद खुफिया एजेंसी व्यक्ति को होने वाले खतरे का अंदाजा लगाती हैं और उसके बाद ही सुरक्षा तय की जाती है। गृह सचिव और डायरेक्टर जनरल और चीफ सेक्रेटरी की कमेटी तय करती है कि किस व्यक्ति को कौन सी सुरक्षा दी जाए। यही नहीं आपको बता दें कि Z+ सुरक्षा पर एक व्‍यक्ति पर महीने में 40 से 45 लाख रुपये का खर्च आता है। इस सुरक्षा का खर्च केंद्रीय गृह मंत्रालय उठाता है। हालांकि, अंबानी परिवार का उदाहरण लें तो वही इसका खर्च उठाता है। बता दें कि प्रधानमंत्री को मिलने वाले एसपीजी यानी स्पेशल प्रोटेक्‍शन ग्रुप के बाद Z+ सुरक्षा दूसरा सबसे सख्‍त कवर माना जाता है। खैर, आपको इन समस्त सुरक्षाओं के बारे में जानकर कैसा लगा, अपना जवाब हमारे कमेंट बॉक्स में जरूर दीजिएगा!

उत्तर प्रदेश का जेईई अभ्यर्थी कोटा में लापता हो गया.

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कोटा में फिर लापता हुआ छात्र, फोन बंद, एक सप्ताह बाद भी नहीं मिला बेटा कोटा में छात्रों के लापता होने का मामला कोई नया नहीं है। पिछले एक सप्ताह में कोटा से दो और छात्रों के लापता होने की सूचना मिली है. पुलिस सूत्रों के मुताबिक, सोमवार सुबह तक उनका कोई पता नहीं चला. विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए हर साल लाखों छात्र राजस्थान कोटा आते हैं। ‘कोचिंग हब’ के नाम से मशहूर कोटा पिछले कुछ सालों से छात्रों की ‘आत्महत्याओं’ के कारण सुर्खियों में है। लेकिन कुछ दिनों से ‘आत्महत्या’ नहीं बल्कि छात्रों के लापता होने की घटनाएं हो रही हैं. बताया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश का रहने वाला पीयूष कपासिया नाम का छात्र पिछले मंगलवार से नहीं मिल रहा है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पीयूष जेईई की तैयारी के लिए कोटा गए थे। पिछले दो साल से कोटार इंद्रा विहार स्थित एक हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रहा था। ‘लापता’ छात्र के पिता महेशचंद ने बताया कि 13 फरवरी की सुबह पीयूष ने अपनी मां को फोन किया. दोनों के बीच कुछ देर तक बातचीत हुई. इसके बाद से पीयूष फोन पर उपलब्ध नहीं थे. महेशचंद के शब्दों में, ”तब से हम अपने बेटे को बार-बार फोन कर रहे हैं. लेकिन उसका फोन बंद है.

इसके बाद महेश ने पीयूष से संपर्क किया जहां वह कोटा में रहता था। न तो घर का मालिक और न ही पीयूष के दोस्त कुछ बता सके। पीयूष के पिता ने पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस सूत्रों के मुताबिक शिकायत मिलने के बाद तलाश शुरू की गई. लापता छात्र के दोस्तों और परिचितों से पूछताछ की जा रही है। वह कैसे गायब हुआ, छात्र डिप्रेशन का शिकार था या नहीं, पुलिस हर बात की जांच कर रही है। उन्हें उम्मीद है कि पीयूष जल्द ही मिल जायेगा. कोटा में ऐसी घटनाएं नई नहीं हैं. पिछले एक सप्ताह में कोटा से दो और छात्रों के लापता होने की सूचना मिली है. अभी एक सप्ताह पहले 16 साल की एक छात्रा इसी तरह कोचिंग क्लास जाने के बाद लापता हो गई थी. सीसीटीवी फुटेज में उसे कोटा के पास एक जंगल में प्रवेश करते हुए दिखाया गया है। उसके बाद से उसका पता नहीं चला है.

पिछले शनिवार को भी एक छात्र के लापता होने की सूचना मिली थी। 18 साल का छात्र युवराज शनिवार सुबह 7 बजे कोचिंग क्लास में जाने के लिए हॉस्टल से निकला था. उसके बाद से वह नहीं मिला है. पुलिस ने जांच की तो पता चला कि युवराज नाम का छात्र कोचिंग क्लास जाने से पहले हॉस्टल के कमरे में मोबाइल फोन छोड़ गया था. सोमवार सुबह तक उसका कोई पता नहीं चला। एक के बाद एक ऐसी घटनाओं से पुलिस भी हिल गई है. एक छात्र की मौत का मामला बार-बार खबरों में आया है. सबसे ज्यादा आत्महत्या के मामले सामने आए हैं. पिछले साल कोटा में हर महीने औसतन कम से कम 2 छात्रों की मौत हुई थी. वहीं नए साल में डेढ़ महीने के अंदर वहां चार लोगों की मौत हो गई. कोटा प्रशासन ने ‘आत्महत्या’ को रोकने के लिए कई कदम उठाए हैं. छात्रों की मानसिक स्वास्थ्य जांच पर जोर दिया जाता है। हालांकि, कोटा में आत्महत्या की घटनाओं को रोकने में कोई सफलता नहीं मिली. अगर ‘एंटी-हैंगिंग डिवाइस’ होती तो शायद उसका बच्चा बच जाता। लेकिन कोटा में आत्महत्या करने वाले छात्र की मां ने हॉस्टल अधिकारियों से सवाल किया कि डिवाइस वहां क्यों नहीं थी. सत्रह वर्षीय शुभम चौधरी का शव बुधवार को राजस्थान के कोटा में एक छात्रावास से बरामद किया गया। उसकी मौत के बाद परिजनों ने इसकी शिकायत जिला प्रशासन और हॉस्टल अधिकारियों से की.

शुभम छत्तीसगढ़ का रहने वाला है. ज्वाइंट एंट्रेंस के लिए कोटा में पढ़ाई कर रहा था। लेकिन बुधवार को जैसे ही उनका शव बरामद हुआ, कोटा में हंगामा मच गया. लगातार छात्र आत्महत्याओं के मामले में राज्य और जिला प्रशासन की ओर से कई कदम उठाए गए हैं. विद्यार्थियों के लिए काउंसलिंग की व्यवस्था की गई है। उनकी मानसिक स्थिति की जांच के लिए एक विशेष टीम का गठन किया गया है. लेकिन उसके बाद भी आत्महत्याएं जारी हैं.

शुभम की मौत के बाद उसके परिजनों ने शिकायत की कि प्रशासन द्वारा घोषित सभी उपाय पूरी तरह विफल रहे. यदि छात्रावास अधिकारी और जिला प्रशासन सावधान रहते तो शायद शुभम का यह हश्र नहीं होता। शुभम की मां का आरोप है कि हॉस्टल में ‘चींटी लटकाने वाली डिवाइस’ रखने का आदेश दिया गया था. लेकिन शुभम तो हॉस्टल में था, ऐसी कोई व्यवस्था क्यों नहीं थी? इतना ही नहीं, शुभम ने पूरी रात खाना भी नहीं खाया था. घर से बाहर नहीं निकले. वार्डन ने इस मामले पर ध्यान क्यों नहीं दिया?

आईपीएल से पहले, एमएस धोनी ने कप्तान के रूप में सर्वकालिक महान टीम का खुलासा हुआ.

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इस साल का आईपीएल अगले महीने से शुरू होने जा रहा है. इससे पहले प्रतियोगिता की सफलता का जश्न मनाने के लिए सर्वश्रेष्ठ टीम का चयन किया गया। 15 लोगों की एक टीम चुनी जाती है. उस टीम में सात विदेशी हैं. लेकिन नियमों के मुताबिक पहली एकादश में चार से ज्यादा विदेशियों को नहीं खिलाया जा सकता.

ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाज डेविड वार्नर और विराट कोहली को दो सलामी बल्लेबाजों के रूप में चुना गया है। ‘यूनिवर्स बॉस’ क्रिस गेल तीसरे नंबर पर खेलेंगे. मध्यक्रम में सुरेश रैना, एबी डिविलियर्स, सूर्यकुमार यादव और महेंद्र सिंह धोनी हैं। हार्दिक पंड्या, रवींद्र जड़ेजा और कीरोन पोलार्ड तीन ऑलराउंडर बने हुए हैं. राशिद खान, सुनील नरेन और युजवेंद्र चहल तीन स्पिनर हैं। लसिथ मलिंगा और यशप्रीत बुमरा दमदार गेंदबाजों में से हैं.

आईपीएल की शुरुआत 2008 में हुई थी. इस बार उनके 16 साल पूरे हो रहे हैं. इस टीम का कप्तान धोनी को चुना गया है. उन्होंने पांच ट्रॉफियां जीती हैं और उनकी टीम चेन्नई सुपर किंग्स सबसे सफल है। कोलकाता की ओर से नरेन को एकमात्र मौका मिला. धोनी को कप्तान क्यों चुना गया, इस पर दक्षिण अफ्रीका के पूर्व गेंदबाज डेल स्टेन ने कहा, “उन्हें नेतृत्व करना ही था।” वर्ल्ड कप, आईपीएल, चैंपियंस ट्रॉफी सब जीते. वह एक जातीय नेता हैं. टीम के क्रिकेटरों से सर्वश्रेष्ठ निकलवाने में उनका कोई मुकाबला नहीं है।” रिटायरमेंट के बाद भी मनोज तिवारी भारत के विश्व कप विजेता कप्तान पर गुस्सा और गर्व महसूस करते हैं। रविवार से मनोज बंगाल पूर्व क्रिकेटर हैं। आज ही के दिन मनोज ने ईडन में बिहार के खिलाफ जीत हासिल कर अपने क्रिकेट करियर को अलविदा कहा था. उस दिन महेंद्र सिंह ने धोनी को लेकर अपना गुस्सा जाहिर किया था.

धोनी के नेतृत्व में ही मनोज ने भारतीय टीम में डेब्यू किया था. मनोज ने 2008 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ डेब्यू किया था. ब्रिस्बेन में उन्हें ब्रेट ली ने 2 रन पर आउट कर दिया. बारिश के कारण मैच नहीं खेला जा सका. लेकिन अगले मौके के लिए मनोज को तीन साल इंतजार करना पड़ा। 2011 में मनोज को दोबारा भारतीय टीम की जर्सी पहनने का मौका मिला. इसके बाद शतक लगाने के बाद भी उन्हें भारतीय टीम से बाहर होना पड़ा. मनोज मैन ऑफ द मैच भी रहे। लेकिन उसके बाद छह महीने तक कोई मौका नहीं आया. ये मलाल आज भी मनोज को है.

रविवार को क्रिकेट से अपनी विदाई पर मनोज ने कहा, ”मेरा सपना देश के लिए खेलना था। मैंने मैंने देश जीत लिया. शतक लगाने के बाद मैं मैच का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बन गया।’ लेकिन उसके बाद मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ी. मैं जिस अवसर का हकदार था, वह छीन लिया गया। वह उदासी बनी रहेगी. लेकिन इसके बारे में ज्यादा मत सोचो. लेकिन अगर कभी मुझे धोनी से बात करने का मौका मिला तो मैं जरूर पूछूंगा कि मुझे बाहर क्यों रखा गया? मैं कारण जानना चाहता हूं।” मनोज ने देश के लिए 15 मैच खेले. उन्होंने 12 वनडे और तीन टी20 मैच खेले। उन्होंने वनडे क्रिकेट में 287 रन बनाए. उन्होंने पांच विकेट भी लिये. लेकिन 2015 के बाद मनोज को राष्ट्रीय टीम में बुलावा नहीं आया.

महेंद्र सिंह धोनी आईपीएल की तैयारी में जुटे हैं. भारत के विश्व कप विजेता कप्तान प्रैक्टिस में तल्लीन. उनकी एक तस्वीर वायरल हो गई है. धोनी अपने बचपन के दोस्त की कंपनी के स्टीकर के साथ प्रैक्टिस करते नजर आ रहे हैं. लेकिन ऐसी घटनाएं नई नहीं हैं. धोनी ने इससे पहले उस संस्था के लोगो के साथ खेला था जिसने धोनी की बल्लेबाजी में मदद की थी। धोनी ने ऐसा करने के लिए करोड़ों रुपये का मोह छोड़ दिया. ऐसा कंपनी के मालिक ने कहा.

2019 विश्व कप में धोनी उस संस्था के लोगो के साथ खेल रहे थे जिसने उन्हें अपना क्रिकेट करियर शुरू करने में मदद की थी। उस कंपनी की मालिक सोमी कोहली ने कहा, ”धोनी ने मुझसे कोई पैसा नहीं मांगा. उन्होंने मुझसे एक बल्ला भेजने को कहा जिस पर मेरी कंपनी का लोगो लगा हो। मैंने उसे समझाने की कोशिश की. अगर उसने मेरा लोगो नहीं लगाया तो उसे दूसरी कंपनी से करोड़ों रुपये का ऑफर था। लेकिन उन्होंने मेरी कंपनी का लोगो लगाने का फैसला किया. मैंने धोनी की पत्नी, मां, पिता से उन्हें मनाने के लिए कहा। लेकिन उन्हें किसी भी तरह से राजी नहीं किया जा सका. उन्होंने मेरी कंपनी का लोगो लगाया.”

रेलवे ने रणजी ट्रॉफी के इतिहास में त्रिपुरा पर सबसे सफल लक्ष्य का पीछा करने का रिकॉर्ड बनाया.

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रेलवे ने रणजी ट्रॉफी में नई मिसाल कायम की. चौथी पारी में 5 विकेट पर 378 रन बनाए और त्रिपुरा को हरा दिया. इससे पहले किसी भी टीम ने इतने रनों का पीछा करते हुए रणजी ट्रॉफी नहीं जीती है. सौराष्ट्र का जीत के रनों का रिकॉर्ड टूटा.

रणजी ट्रॉफी के आखिरी मैच में रिद्धिमान सहारा पहली पारी में 44 रनों की बढ़त के बाद हार गए. अगरतला में त्रिपुरा को पहली पारी में 149 रन पर आउट करने के बाद रेल की पहली पारी 105 रन पर समाप्त हुई। दूसरी पारी में त्रिपुरा के बल्लेबाजों ने अच्छी बल्लेबाजी की. रिद्धिमान की टीम ने सुदीप चट्टोपाध्याय के 95, गणेश सतीश के 62, एके सरकार के 48 और राणा दत्त के नाबाद 47 रनों की बदौलत 333 रन बनाए. इसके बाद जीत के लिए 378 रन का लक्ष्य था. मैच की चौथी पारी में रेलवे के बल्लेबाजों ने 5 विकेट खोकर रन बटोरे.

उनकी जीत में सलामी बल्लेबाज प्रथम सिंह ने अहम भूमिका निभाई. वह 169 रन बनाकर नाबाद रहे. उनके बल्ले से 16 चौके और 1 छक्का निकला. पांचवें नंबर पर मोहम्मद सैफ ने भी शतक लगाया. उनके बल्ले से 14 चौकों की मदद से 106 रनों की पारी निकली. चौथे विकेट की साझेदारी में पहले और सैफ ने 175 रन जोड़े. इन्हीं की जोड़ी ने रणजी ग्रुप स्टेज के आखिरी मैच में रेलवे की जीत का आधार बनाया था. अंत में अरिंदम घोष 40 रन और कप्तान उपेन्द्र यादव 27 रन बनाकर नाबाद रहे.

2019-20 सीजन में सौराष्ट्र ने उत्तर प्रदेश के खिलाफ चौथी पारी में 4 विकेट पर 372 रन बनाकर जीत हासिल की. रेल ने रणजी ट्रॉफी में उनका रिकॉर्ड तोड़ दिया. सूची में तीसरे स्थान पर असम की 2008-09 सीज़न में सर्विसेज के खिलाफ 4 विकेट पर 371 रन की जीत थी। विराट कोहली, रवि शास्त्री का सस्पेंशन खत्म होने के बाद से रिद्धिमान साहा भारतीय टीम से बाहर हैं. सीएबी अधिकारियों से दूरी के कारण रिद्धिमान ने बंगाल छोड़ दिया और अब त्रिपुरा के क्रिकेटर हैं। राष्ट्रीय टीम से बाहर किए जाने के बावजूद, अपना गृह राज्य छोड़ने के बाद भी विकेटकीपर-बल्लेबाज का क्रिकेट कौशल कम नहीं हुआ है। रिद्धिमान ने गोवा के खिलाफ रणजी ट्रॉफी मैच में यह साबित कर दिया।

रिद्धिमान 2023-24 सीज़न में त्रिपुरा का नेतृत्व कर रहे हैं। गोवा के कप्तान दर्शन मिसाल ने टॉस जीतकर पहले फील्डिंग की। पहले बल्लेबाजी करते हुए त्रिपुरा के बल्लेबाजों ने मौका नहीं छोड़ा। तीसरे नंबर पर आये श्रीदाम पाल ने 112 रन बनाये. बाद में रिद्धिमान छठे नंबर पर बल्लेबाजी करने उतरे और त्रिपुरा की पारी को संभाला। अनुभवी विकेटकीपर-बल्लेबाज निश्चित शतक से चूक गए। मोहित रेडकोर की गेंद पर आउट होने से पहले रिद्धिमान के बल्ले से 97 रनों की बेहतरीन पारी निकली। उन्होंने 154 गेंदों की पारी में 14 चौके लगाए. अंत में त्रिपुरा ने गोवा के खिलाफ 484 रन बनाए.

बल्लेबाजी के अलावा, सिलीगुड़ी मूल निवासी ने विकेटकीपर और कप्तान की भूमिका में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। उनकी चतुर गेंदबाजी परिवर्तन और क्षेत्ररक्षण योजना से गोवा की पहली पारी दबाव में थी। अर्जुन तेंदुलकर ने 53 रन पर 4 विकेट खो दिए. 39 साल के विकेटकीपर ने विकेट के पीछे एक अच्छा कैच भी लपका. रिद्धिमान को पहले ही भारतीय टीम की योजनाओं से बाहर कर दिया गया है. टेस्ट टीम में लोकेश राहुल, इशान किशन विकेटकीपर के तौर पर नजर आ रहे हैं. ऋषभ पंत भी ठीक होकर 22 गज की दूरी पर लौटने का इंतजार कर रहे हैं. फिर भी इंग्लैंड के खिलाफ पांच टेस्ट मैचों की श्रृंखला से पहले रिद्धिमान की 97 रन की पारी राष्ट्रीय चयनकर्ताओं के लिए विकल्प बढ़ा सकती है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में वापसी की कोई संभावना नहीं है, लेकिन घरेलू क्रिकेट में रिद्धिमान की ईमानदारी की कमी नहीं है। वह अगले आईपीएल में गुजरात टाइटंस के लिए भी खेलेंगे.

वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप का फाइनल अचानक आ गया. हालांकि, उन्हें पहले ग्यारह में मौका नहीं मिला। भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने संकेत दिया है कि आने वाले दिनों में रेड बॉल क्रिकेट के लिए उनके नाम पर विचार किया जाएगा। लेकिन ईशान किशन रेड बॉल क्रिकेट नहीं खेलना चाहते? दलीप ट्रॉफी में न खेलने का फैसला करने का युवा विकेटकीपर का क्या मतलब था?

इसके पीछे एक और कहानी है. पूर्वी पार्टी का चुनाव बुधवार को हुआ. रिद्धिमान साहा को लेने की बात चल रही थी. लेकिन उन्होंने खुद इस बात की जानकारी दी कि चूंकि उनके लिए भारतीय टीम में वापसी का कोई मौका नहीं है, इसलिए बेहतर होगा कि उन्हें दिलीप की टीम में न रखा जाए. वहां युवाओं को अवसर दिया जाए. चयनकर्ता ईशान से जानना चाहते हैं कि वह खेलेंगे या नहीं. लेकिन वह भी दिलीप का किरदार निभाने के लिए राजी नहीं हुए. झारखंड के विकेटकीपर ने घरेलू क्रिकेट में लाल गेंद से नहीं खेलने का फैसला किया. उनकी जगह विकेटकीपर के तौर पर बंगाल के अभिषेक पोर्डेल और झारखंड के कुमार कुशाग्र को मौका मिला है. पूर्वी क्षेत्र दो युवा विकेटकीपरों के साथ दलीप को खिलाने जा रहा है।

एक पूर्वी चयनकर्ता ने समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा, ”ऋद्धि का कहना है कि आने वाले दिनों में भारतीय टीम में जिन लोगों के नाम पर विचार किया जा रहा है, उनके लिए दिलीप ही प्रतिस्पर्धी खिलाड़ी हैं. अगर मुझे भारतीय टीम में मौका नहीं मिला तो मैं दिलीप को खिलाऊंगा तो मेरा क्या होगा? इससे युवाओं को मौका दिया जाए। ईशान और भरत टेस्ट विश्व कप टीम में थे। भरत या तो दक्षिणी क्षेत्र में खेलेंगे. तो पूछा गया कि ईशान खेलेंगे या नहीं. लेकिन वह खेलना नहीं चाहता था. इसलिए अभिषेक को हमारी तीसरी पसंद के रूप में चुना गया।”

हिंदी सीरीज आर्या सीजन 3 की समीक्षा.

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यह आख़िरकार आत्मज्ञान और राहत का, और एक टूटी हुई, अंधेरी दुनिया का वादा है। यबनिका के गिरने के दृश्य को भी कई मोड़ों के साथ व्यवस्थित किया गया है। लेकिन आखिरी मोड़ ऐसा है कि तर्क भ्रमित हो जाता है. श्रृंखला की टैगलाइन, द फाइनल ब्लो। इसे अंतिम ज्ञानोदय भी कहा जा सकता है। आर्या सरीन (सुष्मिता सेन) ने पूरी सीरीज में अनगिनत बार जो ‘चॉइस’ कही, ”वह लड़कियों को बचाने के लिए ड्रग के धंधे में आई।” आखिरी सीन तक उसे लगने लगा कि उसने गलती की है। अरिया के तीसरे सीज़न के चौथे एपिसोड में निर्माता राम माधवानी और संदीप मोदी बताते हैं कि ऐसा क्यों है।

सुष्मिता सेन की ‘अरिया’ इस बात का सटीक उदाहरण है कि कैसे एक सीरियल धीरे-धीरे खराब हो सकता है। पहले सीज़न में सुष्मिता का किरदार तर्कसंगत था। यह दूसरे सीज़न के बीच में ही गायब हो गया। आर्या ने ड्रग कारोबार की कमान अपने हाथ में ले ली है। तब से वह लेडी डॉन रही हैं। एक-एक करके विरोधी आते हैं और आर्य की ‘योजना’ में फंस जाते हैं। डिज़्नी प्लस हॉटस्टार तीसरा सीज़न दो भागों में लेकर आया है। लेकिन मेकर्स अपने तय शेड्यूल से बाहर नहीं गए. कहानी इसी तरह घूमती रहती है. तीसरे सीज़न के पहले भाग में सूरज रायज़ादार (इंद्रनील सेनगुप्ता) से भिड़ंत होती है। दूसरे भाग में नलिनी साहिबा (इला अरुण)। इस बार भी प्रतिद्वंद्वी की अंतिम स्थिति क्या होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. लेकिन आरिया का क्या? क्या उसके तीन बच्चे उस भावनात्मक उथल-पुथल से बच सकते हैं जिससे वे गुज़र रहे हैं? बाहरी शत्रुओं से लड़ना सरल है। लेकिन अगर घर के लोग ही इसके खिलाफ खड़े हो जाएं तो यह सबसे ज्यादा असहाय महसूस करती है। तीसरे सीज़न के बारे में यह अच्छी बात है। आर्या के तीनों बच्चे धीरे-धीरे अपनी मां के खिलाफ हो जाते हैं। बेबसी के मंजर पर फूट-फूट कर रोने वाली आर्या का गुस्सा हकीकत के बेहद करीब है. बाकी तो बस मोटा करना है.

इस सीरीज की दमदार पेसिंग ही इसकी ताकत थी. अंतिम चरण में भी उसने खुद को बचा लिया. लेकिन इसमें खामियां और तर्क की कमी है। जैसे ही शेखावत की मृत्यु होती है, उसका भरोसेमंद गुर्गा संपत (विश्वजीत प्रधान) स्वामी के दुश्मन आर्य की ओर मुड़ जाता है। यह अन्य ‘खबरों’ पर आक्रोश क्यों भड़काता है? आरिया को अपनी बुद्धि के कारण पुलिसकर्मी बनने में इतनी देर क्यों हो गई? मुझे समझ नहीं आता कि आरिया सर्दी, गर्मी और बरसात में लंबा कोट क्यों पहनती है! हाथ में सिगार या वाइन का गिलास होना अनिवार्य है, वरना स्टाइल तो मिट्टी है!

पटकथा सुष्मिता को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। भले ही यूनिस खान (विकाश कुमार) या आर्य की दोस्त माया (माया सराओ) जो पहले सीज़न में महत्वपूर्ण थे, कम से कम मजबूत पात्र थे, बाद के एपिसोड में उनकी उपस्थिति फीकी पड़ गई। विकास और माया दोनों का अभिनय प्रशंसा के पात्र हैं। लेकिन ये भी सोचने वाली बात है कि जिस पर मेकर्स ने पूरी सीरीज थोप दी है, वो उस दबाव को झेलने के लिए कितना उपयुक्त है. सुष्मिता की परफॉर्मेंस में दो या तीन से ज्यादा एक्सप्रेशन देखने को नहीं मिले। सीरीज में उन्हें एक जगह देखना भी अलग है. सुष्मिता की प्राकृतिक खूबसूरती को दबा दिया गया है.

वादे किये और टूटे, यही अँधेरी दुनिया का नियम है। यबनिका के गिरने के दृश्य को भी कई मोड़ों के साथ व्यवस्थित किया गया है। लेकिन आखिरी मोड़ ऐसा है कि तर्क भ्रमित हो जाता है. लेकिन अंत राहत देने वाला है. पिछले एक साल में सुष्मिता सेन का नाम कई वजहों से चर्चा में आया है। उन्होंने जीवन में कई फैसले लिए, जो कई लोगों के लिए अभ्यास का विषय थे। सुष्मिता ने 21 साल की उम्र में मां बनने का फैसला किया। समाज में उन्हें अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ा। उनके माता-पिता से भी उनकी राय पूछी जाती है क्योंकि वे इतनी कम उम्र में बच्चे को गोद लेने का फैसला कर रहे हैं। इस पर कोर्ट के जज ने भी सवाल उठाया था. ऐसे में एक्ट्रेस के माता-पिता वहीं थे. पुराने दिनों का एक इंटरव्यू बार-बार सामने आया। सुष्मिता ने कहा, ”एक साल के बच्चे के लिए आवेदन कर रही हूं। शादी कभी नहीं की बच्चे पैदा करने में सक्षम होना… इतना आसान नहीं था। रेने के मेरे पास आने के छह महीने बाद अदालत का काम शुरू हुआ। मैंने अपने पिता से कहा कि मैं घर से बाहर निकलते ही कार चलाऊं। मैं बच्चे को लेकर भाग जाऊंगी।” वह लगभग रो पड़ा। सुनवाई शुरू हुई. जज ने हीरोइन के पिता से पूछा कि क्या वह उसे पसंद करते हैं। जज ने कहा कि इससे लड़की की शादी की योजना भी बाधित हो सकती है। जवाब में सुष्मिता के पिता ने कहा, ”वह किसी की पत्नी बनने नहीं आई थी. उन्होंने मातृत्व को स्वयं चुना।” आख़िरकार कोर्ट में सुष्मिता की जीत हुई। रेने जीवन भर के लिए सेन परिवार से जुड़ गईं।