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क्या बीजेपी को समाप्त करना चाहती है आम आदमी पार्टी?

आम आदमी पार्टी अब बीजेपी को समाप्त करना चाहती है! लोकसभा चुनाव की हलचल के बीच दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने फुल कॉन्फिडेंस के साथ 2029 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का सफाया करने का दावा ठोका है। केजरीवाल के इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है कि आखिर केजरीवाल किस आधार पर बीजेपी को इतनी बड़ी चुनौती दे रहे हैं। केजरीवाल ने यह चुनौती किसी चुनावी सभा से नहीं बल्कि दिल्ली विधानसभा से दी है। दरअसल दिल्ली विधानसभा के बजट सत्र के दौरान केजरीवाल की ओर से लाया गया विश्वास प्रस्ताव शनिवार को ध्वनिमत से पारित हो गया। इस दौरान सदन में आम आदमी पार्टी के 62 में से 54 विधायक मौजूद थे। केजरीवाल ने कहा कि बीजेपी के लिए आम आदमी पार्टी सबसे बड़ी चुनौती है। अगर बीजेपी 2024 का चुनाव जीत जाती है तो 2029 में इस देश को BJP से मुक्ति AAP ही दिलाएगी। केजरीवाल के इस बयान के बाद आम आदमी पार्टी के चुनावी रिपोर्ट कार्ड को लेकर भी चर्चा तेज है। आइए जानते हैं केजरीवाल के इस कॉन्फिडेंस की वजह क्या हैं। साल 2022 में पंजाब फतह करने के बाद आम आदमी पार्टी का जोश काफी हाई है। दरअसल पंजाब विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 117 में से 92 सीटों पर कब्जा करके ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। इससे पहले ऐसी ही जीत 1997 में अकाली दल और बीजेपी की गठबंधन सरकार ने मिलकर हासिल की थी। यह 56 साल में किसी एक पार्टी की सबसे बड़ी जीत थी। चुनावों में AAP ने जहां तीन-चौथाई सीटें हासिल कीं। वहीं कांग्रेस ने 18, शिरोमणि अकाली दल ने 3, बीजेपी ने 2 और बसपा ने 1 सीट जीतीं। आम आदमी पार्टी आगामी लोकसभा चुनाव 2024 में भी पंजाब को लेकर काफी उत्साहित है। यही वजह है कि AAP पंजाब में इंडिया गठबंधन के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ रही है। पंजाब के सीएम भगवंत मान ने पंजाब में लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान किया है। भगवंत मान ने कहा कि वह पंजाब की 13 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेंगे। वह किसी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं करेंगे। पंजाब में आप 13 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। मान ने कहा कि AAP पंजाब में 13-0 से जीतेगी।

लोकसभा चुनाव से पहले दिल्ली विधानसभा से केजरीवाल ने अपना शक्ति प्रदर्शन किया। दिल्ली विधानसभा के बजट सत्र के दौरान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की ओर से लाया गया विश्वास प्रस्ताव शनिवार को ध्वनिमत से पारित हो गया। विश्वास प्रस्ताव के दौरान सदन में आम आदमी पार्टी (AAP) के 62 में से 54 विधायक मौजूद थे। मुख्यमंत्री ने सदन में विश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान कहा कि बीजेपी के लिए आम आदमी पार्टी सबसे बड़ी चुनौती है और यही वजह है कि उस पर चौतरफा हमले हो रहे हैं। उन्होंने पूर्व में आरोप लगाया था कि बीजेपी ने उनकी सरकार को गिराने के लिए आप विधायकों को तोड़ने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि भले ही बीजेपी इस साल का लोकसभा चुनाव जीत जाए लेकिन AAP 2029 के लोकसभा चुनाव में देश को बीजेपी से मुक्ति दिलाएगी। केजरीवाल इससे पहले भी दिल्ली विधानसभा से विश्वास मत पारित करवाकर विरोधियों को अपना दमखम दिखा चुके हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि केजरीवाल को दिल्ली की जनता पर पूरा भरोसा है। भरोसे की सबसे बड़ी वजह फ्री बिजली स्कीम है।

साल 2022 में आम आदमी पार्टी ने दिल्ली एमसीडी चुनाव में भारी मतों से शानदार जीत दर्ज की थी। इसी के साथ दिल्ली एमसीडी में 15 सालों से चला आ रहा बीजेपी का राज समाप्त हो गया था। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने 134 वार्डों में जीत हासिल की है। वहीं भारतीय जनता पार्टी ने 104 सीटों पर जीत दर्ज की है। कांग्रेस को महज 9 सीटें हासिल हुई हैं और 3 सीटें अन्य के खाते में गई हैं। इनमें से 12 वार्ड ऐसे हैं, जिन पर जीत-हार का अंतर 200 वोटों से भी कम का रहा। इन 12 में से 3 सीटें आप के खाते में तो 9 सीटों पर बीजेपी ने जीत दर्ज की थी।

दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप के राष्ट्रीय संयोजक ने कहा कि उनकी सरकार के पास सदन में बहुमत है लेकिन उसे विश्वास प्रस्ताव लाने की जरूरत है क्योंकि बीजेपी पार्टी के विधायकों को तोड़ने और उनकी सरकार को गिराने की कोशिश कर रही है। विश्वास प्रस्ताव पर मतदान के दौरान आप के 62 में से 54 विधायकों के ही मौजूद रहने पर केजरीवाल ने कहा कि आप के किसी विधायक ने दल नहीं बदला। उन्होंने कहा कि दो विधायक जेल में हैं, कुछ अस्वस्थ हैं तो कुछ शहर से बाहर हैं। उन्होंने कहा कि कई विधायकों ने बताया कि कैसे कथित तौर पर बीजेपी के लोगों ने उनसे संपर्क किया और पाला बदलने के लिए पैसे की पेशकश की।

दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के लिए 10 अप्रैल, 2023 का दिन खुशियां लेकर आया।इस दिन उनका पार्टी को बड़ी सफलता मिली। चुनाव आयोग ने आप को एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में मान्यता दे दी। साल 2022 में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आप को गुजरात विधानसभा चुनावों में पांच विधायकों के साथ एक बड़ा वोट शेयर मिला था।गुजरात में आम आदमी पार्टी का वोट शेयर करीब 12 फीसदी मिला। इससे पहले AAP पंजाब, गोवा और दिल्ली में खुद को एक राज्य पार्टी के रूप में स्थापित कर चुकी थी। राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिलते ही केजरीवाल ने केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला। पीएम मोदी और बीजेपी पर हमले तेज कर दिए। केजरीवाल को विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन की बैठकों में प्रथम पंक्ति में स्थान मिला।

केजरीवाल ने इस बात पर जोर दिया कि बीजेपी ने सोचा कि वह उन्हें गिरफ्तार करके आप को खत्म कर देगी। उन्होंने पूछा, ‘आप मुझे गिरफ्तार कर सकते हैं लेकिन आप केजरीवाल के विचारों को कैसे खत्म करेंगे?’ दिल्ली के मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि सेवा विभाग और नौकरशाही पर नियंत्रण के माध्यम से भाजपा उनकी सरकार के काम में बाधा डाल रही है। उन्होंने कहा, ‘वे राम भक्त होने का दावा करते हैं लेकिन उन्होंने हमारे अस्पतालों में गरीब लोगों के लिए दवाएं बंद कर दीं। क्या भगवान राम ने गरीब लोगों के लिए दवाएं बंद करने के लिए कहा था?’ केजरीवाल ने कहा कि उन्होंने अतीत में हमलों का सामना किया है, उन्हें थप्पड़ मारे गए, उन पर स्याही फेंकी गई और अब वे उन्हें गिरफ्तार करना चाहते हैं।

आखिर क्या है डॉक्टर स्वामीनाथन का किसानी फार्मूला?

आज हम आपको डॉक्टर स्वामीनाथन का किसानी फार्मूला बताने जा रहे हैं! एक बार फिर से स्वामीनाथन आयोग की चर्चा जोरों पर है। पंजाब, हरियाणा और कुछ और राज्यों के किसान आंदोलन की राह पर हैं। वे दिल्ली पहुंच रहे हैं। हालांकि केंद्र सरकार और कुछ राज्य सरकारें पूरी तरह से मुस्तैद है कि किसान दिल्ली नहीं पहुंच पाए। आंदोलनरत किसानों की कई मांगे हैं। उनमें से प्रमुख मांग है ‘सी2+50% फॉर्मूला’ के आधार पर एमएसपी तय करना। आपको पता है कि क्या है यह फार्मूला? सरकार जो मुख्य फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य या एमएसपी तय करती है, उसकी सिफारिश कृषि लागत एवं मूल्य आयोग करता है। इसमें ए2 , ए2 प्लस एफएल और सी2 फार्मूला है। ए2 में किसी खास फसल में लगी किसान की लागत शामिल होती है। मतलब कि बीज, खाद, कीटनाशनक, जन-मजदूरों की मजदूरी, जमीन का किराया और मशीनरी और फ्यूल की लागत शामिल होती है। ए2प्लस एफएल में ए2 वाली सभी चीजें तो शामिल होती ही हैं, साथ ही खेत में परिवार के सदस्यों द्वारा मुफ्त में किए गए काम का मूल्य भी शामिल होता है। सी2 में ए2प्लस एफएल के साथ ही खुद की जमीन है तो भी उसका किराया और फिक्स्ड कैपिटल पर देय ब्याज आदि भी शामिल है।

अभी जो एमएसपी तय करने की प्रणाली है, उससे किसान खुश नहीं हैं। उनका कहना है कि इससे उनकी लागत भी नहीं निकल पाती है। इसलिए, किसानों की माली हालत सुधारने के लिए 18 नवंबर 2004 को केंद्र सरकार ने एक आयोग का गठन क‍िया था। यही आगे चलकर स्वामीनाथन आयोग के नाम से लोकप्र‍िय हो गया। आयोग ने दो साल में सरकार को पांच रिपोर्ट सौंपी थीं। उन रिपोर्टों में 201 स‍िफार‍िशें शामिल थीं।स्वामीनाथन कमीशन की र‍िपोर्ट को लागू करने का मसला जनहित याचिका के रूप में सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा है। उसके उत्तर में वर्तमान सरकार ने सुप्रीम कोर्ट ने यह कह द‍िया था क‍ि केंद्र के पास ज‍ितने व‍ित्तीय संसाधन उपलब्ध हैं, उससे सी-2 वाली बात पर अमल करना व्यवहार‍िक नहीं है। इसे लागू क‍िया नहीं जा सकता। इन सिफारिशों में सबसे चर्च‍ित स‍िफार‍िश न्यूनतम समर्थन मूल्य से संबंध‍ित थी। इसमें किसानों को फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य ‘सी2+50% फॉर्मूले’ पर तय करने को कहा गया था। मतलब कि सी2 की लागत तो मिले ही साथ ही उस पर 50 फीसदी अतिरिक्त राशि मिले जो कि खेती का मुनाफा कहलाए।

किसान चाहते हैं कि एमएसपी तय करने के लिए स्वामीनाथन आयोग का फार्मूला अमल में लाया जाए। दरसअल, किसान इसलिए भी उग्र हैं क्योंकि एमएसपी तय करने में स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश मानना वर्तमान सरकार का चुनावी वादा रहा है। साल 2018 में सरकार ने दावा भी कर द‍िया था क‍ि उसने स्वाम‍ीनाथन आयोग की स‍िफार‍िशों को लागू कर दिया है। लेकिन अभी भी इसका इंतजार हो रहा है। स्वामीनाथन कमीशन की र‍िपोर्ट को लागू करने का मसला जनहित याचिका के रूप में सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा है। उसके उत्तर में वर्तमान सरकार ने सुप्रीम कोर्ट ने यह कह द‍िया था क‍ि केंद्र के पास ज‍ितने व‍ित्तीय संसाधन उपलब्ध हैं, उससे सी-2 वाली बात पर अमल करना व्यवहार‍िक नहीं है। इसे लागू क‍िया नहीं जा सकता।

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में भूमि सुधारों पर भी जोर दिया था। इस रिपोर्ट में भूमिहीनों को जमीन देने की बात कही गई थी। अन्य बातों के साथ-साथ यह भी सिफारिश की थी कि “जहां कहीं भी व्यवहार्य हो भूमिहीन कृषक परिवारों को प्रति परिवार न्यूनतम एक एकड़ भूमि उपलब्ध कराई जानी चाहिए। यह जमीन उन्हें घरेलू बगीचा, पशुपालन के लिए स्थान उपलब्ध कराएगी।” स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश थी कि कृषि को राज्यों की सूची के बजाय समवर्ती सूची में लाया जाए। इससे फायदा यह होगा कि केंद्र तथा राज्य दोनों सरकारें किसानों की मदद के लिए आगे आएंगी। बता दें कि किसी खास फसल में लगी किसान की लागत शामिल होती है। मतलब कि बीज, खाद, कीटनाशनक, जन-मजदूरों की मजदूरी, जमीन का किराया और मशीनरी और फ्यूल की लागत शामिल होती है। ए2प्लस एफएल में ए2 वाली सभी चीजें तो शामिल होती ही हैं, साथ ही खेत में परिवार के सदस्यों द्वारा मुफ्त में किए गए काम का मूल्य भी शामिल होता है। सी2 में ए2प्लस एफएल के साथ ही खुद की जमीन है तो भी उसका किराया और फिक्स्ड कैपिटल पर देय ब्याज आदि भी शामिल है। साथ ही दोनों सरकारों के बीच समन्वय बनाया जा सकेगा। आयोग ने किसानों के लिए कृषि जोखिम फंड बनाने की सिफारिश की थी, ताकि प्राकृतिक आपदाओं के आने पर किसानों को तुरंत मदद मिल सके।

क्या किताबी नंबर्स के लिए बढ़ रहा है छात्रों पर दबाव?

वर्तमान में किताबी नंबर्स के लिए छात्रों पर दबाव बढ़ रहा है! जब हर कोई अंतरिम बजट 2024-25 में बड़े आंकड़ों को देखने में व्यस्त है, जिसे हमेशा भरोसेमंद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रस्तुत किया है, एक और आंकड़ा पूरे भारत में चिंता बढ़ा रहा है। कोटा में पिछले साल 27 छात्रों की दुखद मौत हुई। इसके बाद इस साल दो सप्ताह के भीतर तीन और छात्रों की मौत हो गई। आत्महत्याओं ने सिस्टम को हिलाकर रख दिया है। जेईई, NEET, यूपीएससी जैसी परीक्षाओं को पास करने के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा करते समय उत्पन्न होने वाली कठोर उम्मीदों और असहनीय दबाव के प्रति हमारी आंखें खोल दी हैं। हालांकि परिस्थितियाँ उनके विपरीत हैं। लाखों छात्र ऐसी परीक्षाओं की तैयारी के लिए समय, प्रयास और धन का निवेश करते हैं। अपने असंभव सपनों को साकार करने में असमर्थ, कुछ लोग दबाव के आगे झुक जाते हैं। उनमें से एक के लिखे हृदय विदारक नोट में कहा गया, यही आखिरी विकल्प है। ऐसे में सवाल है कि नंबर जिंदगी से ज्यादा महत्वपूर्ण कैसे और कब हो गए? हाल ही में कई फिल्मफेयर पुरस्कार जीतने वाली फिल्म ’12वीं फेल’ हमें उन लाखों आशावानों की मानसिकता को समझने में मदद करती है। ये लोग उस जादुई यूपीएससी लाइन को इस उम्मीद को पार करने के लिए भीख मांगने, उधार लेने, चोरी करने, भूखे मरने के लिए तैयार हैं। उन्हें यह लगता है कि यह उन्हें कठिन जीवन से बचाएगा और सम्मान, स्वीकार्यता, यहां तक कि उच्च सम्मान भी प्रदान करेगा। यह जीवनी गरीबी से जूझ रहे एक ऐसे छात्र के आघात और अंततः जीत का वर्णन करती है, जो परीक्षा में सफल होने का फैसला करता है, चाहे कुछ भी हो। यह एक प्रामाणिक और भावुक कथा है – जितनी आश्चर्यजनक है उतनी ही हृदय विदारक भी। एक्टर विक्रांत मैसी ने फिल्म में वास्तविक जीवन के आईपीएस अधिकारी मनोज कुमार शर्मा की भूमिका निभाई है। मनोज शर्मा के विस्मयकारी दृढ़ संकल्प ने एक किताब का रूप लिया। उससे प्रेरित होकर लेखक, निर्देशक, निर्माता विधु विनोद चोपड़ा ने एक बेहद मार्मिक फिल्म में बदल दिया। यह डकैतों से प्रभावित चंबल में एक ईमानदार क्लर्क के बेटे शर्मा की कहानी है। यह हमारी शिक्षा/सामाजिक व्यवस्था में गहरे दबे कई मुद्दों और भयावह असमानताओं से निपटती है। उदाहरण के लिए, परीक्षा के दौरान नकल से भी।

यह उन लाखों छात्रों का अंतिम सपना है, जो कोचिंग कक्षाओं में दाखिला लेते हैं और कठोर यूपीएससी परीक्षाओं के लिए अर्हता प्राप्त करने के लिए वर्षों तक कड़ी मेहनत करते हैं। इसके जरिये एक खूनी घोटाला उजागर हुआ है। फिल्म के नायक के लिए परीक्षा के अलावा और भी बहुत कुछ दांव पर है। यह नायक भ्रष्ट पुलिस वालों और निर्दयी नेताओं की तरफ से नियंत्रित जाति-ग्रस्त गांव में पला-बढ़ा है। गौरी भैया नाम के एक चरित्र का स्पष्ट रूप से उकेरा गया चित्र, जो एक असफल यूपीएससी उम्मीदवार है, जो नायक का मार्गदर्शन करता है। यह एक सम्मोहक ट्रैक है, जो संदेह और गुस्से से रहित है। ‘रीस्टार्ट’ उनके जर्जर सेट-अप का आदर्श वाक्य है, जहां वह अपने प्रेरक समूह से सिलेबस पर बने रहने और आगे बढ़ने पर लेजर जैसे फोकस के साथ काम करने का आग्रह करते हैं।

उन छात्रों की प्रचंड भूख को समझना मुश्किल है जो अपनी महत्वाकांक्षा हासिल करने के लिए इतना कुछ त्याग देते हैं। और सोचने वाली बात यह है कि परीक्षा में बैठने वाले 10 लाख लोगों में से केवल 180 आईएएस अधिकारियों का चयन किया जाता है। लेकिन एक बार जब कोई व्यक्ति इसमें शामिल हो जाता है, तो उसके बाद वह पीछे मुड़कर नहीं देखता। दस वर्षों तक काम करने के बाद एक आईएएस अधिकारी का वेतन लगभग 12 लाख प्रति वर्ष है, लेकिन उसके पास जो शक्ति है, उसका आकलन करना कठिन है। सरकार के शक्तिशाली पहिये यूपीएससी अधिकारियों की बदौलत घूमते रहते हैं, जो शासन के खेल को उन राजनेताओं की तुलना में कहीं अधिक गहराई से जानते हैं, जिन्हें वे रिपोर्ट करते हैं। यह सिर्फ पैसा नहीं है जो इतने सारे छात्रों को भीड़भाड़ वाले क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा करने के लिए आकर्षित करता है। यह एक आईपीएस अधिकारी के वर्दी पहनने का मौका भी है। छात्र अपना पसीना बहाकर, नींद से वंचित, भूखे और अकेले रहकर, दिन में 16 से 18 घंटे एकाग्रचित्त होकर पढ़ाई करते हैं, जिसकी अक्सर घातक कीमत चुकानी पड़ती है।

कोचिंग क्लास कल्चर उत्पीड़ित उम्मीदवारों की बौद्धिक और भावनात्मक क्षमता से कहीं अधिक की मांग करके बहुत से युवाओं की जान ले रही है। यह केवल छात्र हॉस्टल में पंखे बदलने या बालकनियों में जाल लगाने से मानसिक स्वास्थ्य संकट या गुणवत्तापूर्ण संस्थानों की कमी का समाधान नहीं होने वाला है। इसके परिणामस्वरूप प्रवेश के लिए भारी मारामारी होती है। हमें न सिर्फ लक्षणों से बल्कि इस बीमारी से निपटने की जरूरत है। यह केवल रिस्टार्ट करने नहीं बल्कि पुनर्विचार करने का समय है। संभवतः इससे अधिक मूल्यवान क्या हो सकता है कि एक अनमोल जीवन को अचानक केवल इसलिए समाप्त कर दिया जाए क्योंकि शैक्षणिक विफलता और शर्मिंदगी मौत से भी बदतर लगती है?

जानिए फूलन देवी के बारे में अद्भुत किस्से!

आज हम आपको फूलन देवी के बारे में अद्भुत किस्से बताने जा रहे हैं! दस्यु सुंदरी कही जाने वाली फूलन देवी के डकैत बनने की असल वजह आज भी बहुत कम लोग ही जानते हैं। बेहमई कांड के बाद बनी बैंडेट क्वीन फिल्म देखकर लोगों के मन में यही है कि फूलन के साथ गैंगरेप हुआ तो उसने बंदूक उठा लिया और डकैत बन गई। जबकि ऐसा नहीं है। फूलन के परिवारिक भाई ने उसकी पैतृक जमीन पर कब्जा कर लिया तो उसने विरोध किया। उन्होंने फूलन पर चोरी का आरोप लगाकर पुलिस से पकड़वाया। कई दिनों थाने में रखा गया। बस यहीं से उसने बीहड़ में उतरने का फैसला किया। उस वक्त बीहड़ में डकैतों का बोलबाला था जिसमें कई नामी डकैत मल्लाह थे जो फूलन की बिरादरी के थे। 43 वर्ष बाद बुधवार को बेहमई कांड पर फैसला आया तो लोगों के बीच बेहमई की घटना को लेकर चर्चा शुरु हो गई है। ऐसे में लोग ये भी जानना चाहते हैं कि बेहमई कांड की असली वजह क्या थी। चूकि बेहमई कांड को लेकर कई तरह की अफवाहें हैं। वहीं फिल्म इंडस्ट्री ने तो इस घटना की असल कहानी से हटकर पर्दे पर नई कहानी खड़ी कर दी। इस बात से बेहमई क्षेत्र के ठाकुर बिरादरी के कई बार मायके आई लेकिन यहां से उसे फिर ससुराल भेज दिया जाता। अंत वह ससुराल से भाग निकली। बीहड़ रास्तों में उसकी मुलाकात डकैत विक्रम मल्लाह से हुई। बस यहीं से उसने बीहड़ में रहने का मन बना लिया। विक्रम मल्लाह के गिरोह ने फूलन की ससुराल में हमला किया था। में खासी नाराजगी है। अगर अब इसकी पड़ताल के लिए कोई गांव जाता है तो कड़ी नाराजगी झेलनी पड़ती है। बेहमई कांड पर बात की जालौन के वरिष्ठ पत्रकार केपी सिंह से। केपी सिंह ऐसे स्थानीय पत्रकार हैं जो बीहड़ क्षेत्र की हर छोड़ी बड़ी घटना से वाकिफ हैं।

केपी सिंह ने बताया कि 10 अगस्त 1963 को उत्तर प्रदेश के जालौन के गुढ़ा गांव में फूलन देवी का जन्म हुआ था। बेहद गरीबी में गुजर कर रहे इस पर परिवार के पास मात्र एक एकड़ जमीन थी। जिस पर फूलन के चाचा के बेटे मैयादीन मल्लाह ने कब्जा कर लिया। फूलन इसका जमकर विरोध किया। इस बीच फूलन के दोगुने से भी अधिक उम्र के व्यक्ति पुत्तीलाल से उसकी शादी करा दी गई। जमीन कब्जाने के दौरान फूलन ने मैयादीन को बेइज्जत किया था जिसका बदला लेने के लिए उसने फूलन पर शादी के बाद चोरी का आरोप लगाया उसे कई दिनों तक थाने में रखा गया वहां मारपीट के बाद चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। बस इसी बात से फूलन के मन में सिस्टम के प्रति नाराजगी पैदा हुई।इधर उम्र से काफी बड़े पति पुत्तीलाल ने फूलन का उत्पीडऩ शुरु किया तो वह कई बार मायके आई लेकिन यहां से उसे फिर ससुराल भेज दिया जाता। अंत वह ससुराल से भाग निकली। बीहड़ रास्तों में उसकी मुलाकात डकैत विक्रम मल्लाह से हुई। बस यहीं से उसने बीहड़ में रहने का मन बना लिया। विक्रम मल्लाह के गिरोह ने फूलन की ससुराल में हमला किया था।

बीहड़ में डकैतों के बोलबाला को खत्म करने के लिए कानपुर के एक पुलिस इंस्पेक्टर ने अधिकारियों के निर्देश पर तानाबाना बुना। ठाकुर बिरादरी के इंस्पेक्टर ने अपनी जाति के ही डकैत लालाराम, श्रीराम से संपर्क साधा। इन डकैत दोनों भाइयों ने विक्रम मल्लाह व उसके एक साथी को मार दिया था। कहते इसके बाद विक्रम मल्लाह गिरोह की सदस्य रहीं फूलन को पकड़ कर ले गए। उसे बेहमई में रखा कहा जाता है वहां डकैतों ने फूलन के साथ अत्याचार किया। तब फूलन ने देखा कि बेहमई के लोग लालाराम व श्रीराम की बहुत मदद करते हैं। इसी बात से उसके मन में इस गांव के प्रति नफरत हो गई।

फूलन देवी के 11 साल तक जेल में रहने के बाद मुलायम सिंह की सरकार ने 1993 में उस पर लगे सभी मुकदमे वापस लेने का फैसला किया। इसके बाद 1994 में वह जेल से बाहर आ गई। वर्ष 1996 में सपा की टिकट पर मिर्जापुर से सांसद बन गईं। तब फूलन ने देखा कि बेहमई के लोग लालाराम व श्रीराम की बहुत मदद करते हैं। इसी बात से उसके मन में इस गांव के प्रति नफरत हो गई।वर्ष 1999 के चुनावा में वह फिर से सांसद बन गईं। 25 जुलाई 2001 को शेर सिंह राणा उनसे दिल्ली के अशोका रोड स्थित आवास पर मिलने गया। वहां गेट पर गोली मारकर फूलन देवी की हत्या कर दी।

आखिर मोदी सरकार ने अब तक क्या-क्या किया?

आज हम आपको बताएंगे कि मोदी सरकार ने अब तक क्या-क्या किया है! स्केल भी और स्पीड भी।’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने शासन का मूल मंत्र इसे ही बताते हैं। वो जोर देकर कहते हैं कि जो हो भव्य हो और लेट-लतीफी बिल्कुल नहीं। मोदी सरकार के दो कार्यकाल में विभिन्न बुनियादी ढाचों के विकास पर गौर करेंगे तो पीएम के इस मंत्र का मतलब समझ आ जाएगा। सड़क हो या रेल या फिर हवाई अड्डे, ‘पीएम गति शक्ति नैशनल मास्टर प्लान’ के तहत हर क्षेत्र में बहुत तेज प्रगति हुई है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी की छवि ही मोदी सरकार के नगीने की हो गई है। उन्होंने हाइवेज और एक्सप्रेसवेज के निर्माण का रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बना दिए। स्थिति ये है कि विपक्ष के नेता भी गडकरी की खुले मन से प्रशंसा करते हैं। मोदी सरकार के 10 साल की उपलब्धियों के आकलन की सीरीज में आज बात इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर की। पिछले 10 सालों में देश के इन्फ्रास्ट्रक्चर में जबरदस्त बदलाव देखने को मिले हैं। रेलवे और हाईवे को आधुनिक बनाने से लेकर जलमार्गों और हवाई परिवहन को नया स्वरूप देने तक, मोदी सरकार ने बुनियादी ढांचे के विकास पर पूरा जोर लगाया है। नितिन गडकरी के नेतृत्व में देश में रोड नेटवर्क पर जबर्दस्त काम हुआ है। यह तो मोदी सरकार के विरोधी भी खुले दिल से स्वीकार करते हैं। बीते 10 वर्षों में देश के सड़क और राजमार्ग क्षेत्र ने अभूतपूर्व विकास और प्रगति देखी है। सरकार का दावा है कि पिछले एक दशक में 55 हजार किलोमीटर से ज्यादा हाईवे का निर्माण हुआ है। भारतमाला परियोजना जैसे प्रॉजेक्ट न केवल संपर्क को बेहतर बना रहे हैं बल्कि अछूते क्षेत्रों, आर्थिक केंद्रों और पर्यटन स्थलों की जरूरतों को भी पूरा कर रहे हैं। पीएम गति शक्ति योजना और नैशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन जैसी पहलों के माध्यम से मल्टी-मोडल कनेक्टिविटी को प्राथमिकता देकर सरकार इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रॉजेक्ट्स को तेजी से पूरा कर रही है।

भारतमाला परियोजना: 83,677 किमी नए राजमार्ग बनाने और 57,923 किमी मौजूदा राजमार्गों में सुधार करने का एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम। इससे राजमार्ग निर्माण की गति में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है, जो 2014 से पहले 12 किमी की तुलना में प्रति दिन 37 किमी तक पहुंच गई है। पीएम ग्राम सड़क योजना इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों को हर मौसम में कनेक्टिविटी प्रदान करना है। इस योजना के तहत, 5.3 लाख किमी से अधिक ग्रामीण सड़कें बनाई गई हैं, जिससे ग्रामीण सड़क कनेक्टिविटी लगभग 99% तक बढ़ गई है। समर्पित माल ढुलाई गलियारे: इन उच्च गति, उच्च क्षमता वाली माल ढुलाई रेलवे का उद्देश्य लॉजिस्टिक्स एफिसिएंसी में सुधार करना है। कई गलियारे निर्माणाधीन हैं, जिनमें ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्राइट कॉरिडोर और वेस्टर्न डेडिटेकेटेड फ्राइट कॉरिडोर शामिल हैं। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे: दिल्ली को राजस्थान के लालसोट से जोड़ने वाले पहले 246 किलोमीटर लंबे हिस्से का उद्घाटन फरवरी में किया गया था। 2024 में पूरा होने पर पूरा एक्सप्रेसवे 1,386 किमी तक फैल जाएगा, जिससे दिल्ली और मुंबई के बीच यात्रा का समय 24 घंटे से घटकर केवल 12 घंटे रह जाएगा। वडोदरा-मुंबई एक्सप्रेसवे: इस एक्सप्रेसवे का उद्देश्य वडोदरा और मुंबई के बीच कनेक्टिविटी को बढ़ाना, सुगम परिवहन और आर्थिक विकास को सुविधाजनक बनाना है। चारधाम कनेक्टिविटी हाइवे: उत्तराखंड में यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ के पवित्र हिंदू तीर्थ स्थलों तक कनेक्टिविटी में सुधार करने के लिए एक महत्वपूर्ण परियोजना। अन्य राजमार्ग विस्तार: 2025 तक सरकार की योजना मौजूदा 1,61,350 किमी नेटवर्क में 38,650मोदी सरकार के बीते 10 वर्षों में रेलवे का कायाकल्प करने की दिशा में कई कदम उठाए गए हैं। बात रेलवे लाइनों के इलेक्ट्रिफिकेशन की हो या रेलवे स्टेशनों के जीर्णोद्धार की, नई ट्रेनें चलाने की हो या यात्री सुविधाओं में विस्तार की, रेलवे ने चौतरफा प्रगति की है। सरकार का दावा है कि 25 हजार किलोमीटर से अधिक नए रेलवे ट्रैक बिछाए गए हैं, जो कई विकसित देशों में रेलवे लाइनों की कुल लंबाई से अधिक है। दावा यह भी है कि रेलवे विद्युतीकरण 94% तक बढ़ गया है, मानव रहित रेलवे क्रॉसिंग हटा दिए गए हैं और सुरक्षा उपायों को बढ़ाया गया है। बायो-टॉयलेट्स, जीपीएस-आधारित ट्रैकिंग सिस्टम और ऑनलाइन रिजर्वेशन प्लैटफॉर्मों की शुरुआत ने यात्रियों के अनुभव को क्रांतिकारी रूप से बदल दिया है, जिससे ट्रेन यात्रा को सुरक्षित, स्वच्छ और अधिक कुशल बनाया गया है। डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर जैसी पहल और वंदे भारत एक्सप्रेस और नमो भारत जैसी स्वदेशी सेमी-हाई स्पीड ट्रेनों ने रेल यात्रा का अनुभव बेहतर कर दिया है। अब सोशल मीडिया के जरिए यात्री ट्रेनों में असुविधाओं की शिकायत करते हैं और उस पर तुरंत एक्शन भी होता है। हालांकि, यह भी सच है कि रेलवे के क्षेत्र में अभी बहुत काम करना बाकी है। खासकर, नई दिल्ली से कोलकाता के बीच ज्यादातर ट्रेनों में टिकट मिलना आज भी काफी मुश्किल है। इस लाइन पर ट्रैक जोड़ने के सिवा कोई चारा नहीं दिखता है जिस पर अब तक सरकार की तरफ से कोई पहल नहीं हुई है।किमी राजमार्ग जोड़ने की है।

मोदी सरकार ने फिजिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर के अलावा डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर पर भी खास जोर दिया है। यूपीआई के रूप में भारत का पेमेंट सिस्टम दुनिया में सबसे आधुनिक और सबसे श्रेष्ठ है। इतना ही नहीं, सरकारी काम हो या पढ़ाई-लिखाई, हर क्षेत्र में डिजिटल सिस्टम को तेजी से बढ़ावा मिला है। मोदी सरकार का उद्देश्य है कि आम नागरिकों को सरकारी दफ्तरों में जाने की नौबत नहीं आए। इसी क्रम में अब अदालतों की सुनवाई का भी ऑनलाइन प्रसारण होने लगा है। कई मामलों में मुद्दई की अदालत में पेशी भी डिजिटल मोड में ही होने लगी है। सरकार का दावा है कि भारत भारतनेट और डिजिटल इंडिया जैसी योजनाओं के जरिए एक मजबूत डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की दिशा में तेजी से काम हो रहा है।

क्या अब अखिलेश यादव भी बनवाएंगे हिंदू मंदिर ?

अब अखिलेश यादव भी हिंदू मंदिर बनवाने जा रहे हैं! अयोध्या में राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह के साथ उत्तर प्रदेश में राजनीति की बिसात ‘मंदिर की पिच’ पर बिछती दिख रही है। भाजपा पहले से ही इस पिच पर खेलने की धुरंधर है। वह योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में राम मंदिर से लेकर प्रदेश भर में हिंदुत्व की राजनीति का जमीन तक प्रसार करने में जुटी हुई है। गांव-गांव से लोगों को मंदिर के दर्शन के लिए लाया जा रहा है। दूसरी तरफ राम को लेकर जनमानस में आस्था का ऐसा असर है कि भाजपा ही नहीं दूसरी पार्टियों के नेता भी मंदिर दर्शन को पहुंच रहे हैं। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा में अखिलेश यादव का रुख को लेकर है। एक तरफ वह मंदिर कार्यक्रम को ‘भाजपाई’ बताकर दूरी बनाए रहे। सपा सदस्यों ने विधानसभा में राम मंदिर प्रस्ताव का विरोध किया। स्वामी प्रसाद मौर्य तो प्राण प्रतिष्ठा पर ही सवाल उठाते रहे। वहीं दूसरी तरफ पहली बार समाजवादी पार्टी के दफ्तर में लोगों ने शालीग्राम शिला का स्वागत देखा। खुद अखिलेश यादव अपनी पत्नी डिंपल के साथ पूजा अर्चना करते नजर आए। पता चला वह इटावा में केदारेश्वर मंदिर बना रहे हैं तो क्या है ये पूरी कवायद? दरअसल राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह से ही अखिलेश यादव का रुख लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। विश्व हिंदू परिषद की तरफ से अखिलेश यादव को न्योता दिया गया लेकिन अखिलेश यादव ने साफ कहा कि उन्हें न्योता नहीं मिला है। उन्होंने कूरियर नंबर तक मांग लिया। फौरन बाद विश्व हिंदू परिष्ज्ञद की तरफ से अखिलेश को भेजे गए निमंत्रण पत्र का कूरियर नंबर सार्वजनिक कर दिया गया। तो अखिलेश यादव की तरफ से श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को पत्र भेजा गया, जिसमें उन्होंने न्योता देने के लिए ट्रस्ट को शुक्रिया कहा। साथ ही कहा कि वह समारोह में शामिल नहीं होंगे लेकिन बाद में परिवार के साथ रामलला के दर्शन पूजन के लिए आएंगे। अखिलेश यादव के इस रुख पर भाजपा उन्हें घेरती नजर आई। उधर काग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने भी रामलला के निमंत्रण पर अयोध्या आने से मना कर दिया। कांग्रेस हाईकमान की तरफ से बयान आया कि ये कार्यक्रम पूरी तरह से भाजपा और विश्व हिंदू परिषद का है, इसलिए इसमें वो शामिल नहीं होंगे।

लेकिन राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह से ऐन पहले अयोध्या में अलग ही नजारा देखने को मिला। मकर संक्रांति के मौके पर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय, दीपेंद्र हुड्डा, अविनाश पांडेय, अखिलेश प्रताप सिंह आदि नेता अयोध्या पहुंचे और सरयू में स्नान किया। इस दौरान दीपेंद्र हुड्डा ने कहा कि हमारा मानना है कि राम सबके हैं। यह पहली बार नहीं है जब मैं अयोध्या आया हूं, एक साल पहले मैं रामलला की पूजा करने आया था। वहीं अजय राय ने कहा कि आज हम भगवान राम के दर्शन करेंगे, मकर संक्रांति के शुभदिन हमने सरयू में पवित्र स्नान किया।

दूसरी तरफ दिलचस्प ये रहा कि अखिलेश यादव ने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से ऐन पहले एक्स पर एक वीडियो शेयर कर लिखा- उस पावन हृदय में बसते हैं सियाराम, जो करता रीति-नीति-मर्यादा का मान। जनता अखिलेश को अभी समझने का प्रयास ही कर रही थी कि यूपी विधानसभा में राम मंदिर प्रस्ताव पर सपा विधायकों के रुख ने कन्फ्यूजन और बढ़ा दिया। दरअसल प्रस्ताव पर सपा के 14 विधायकों ने विरोध में हाथ उठाया। इसके बाद भाजपा विधायक इन विधायकों का नाम सार्वजनिक करने की मांग करने लगे। मामले ने तूल पकड़ा तो अगले ही दिन विधानसभा में सपा विधायक स्वामी ओमवेश खड़े हुए और उन्होंने सफाई दी कि उन्होंने विरोध में हाथ नहीं उठाए थे। मैंने समर्थन में हाथ उठाया था। मेरे साथ ज्यादती हुई। गलत तरीके से मेरा नाम छापा गया है। मैं रोजाना श्रीराम के हवन करने के बाद प्रभु का नारा लगाता हूं। कार्यवाही से मेरा नाम हटाया जाए। एक तरफ स्वामी ओमवेश खुद को राम भक्त साबित करते नजर आए तो दूसरी तरफ सपा के वरिष्ठ नेता स्वामी प्रसाद मौर्या प्राण प्रतिष्ठा पर ही सवाल खड़े करते नजर आए।

इसी बीच यूपी विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना और सीएम योगी आदित्यनाथ के आग्रह पर सभी विधायकों का अयोध्या भ्रमण कराया गया और वहां सभी ने रामलला के दर्शन किए। खास बात ये थी कि विधायकों को लग्जरी बसों से लखनऊ से अयोध्या ले जाया गया। इस दौरान राष्ट्रीय लोकदल, बसपा और कांग्रेस के विधायक भी भाजपा विधायकों के साथ दर्शन करने गए। लेकिन सिर्फ समाजवादी पार्टी के विधायक ही नदारद रहे।

एक तरफ राम मंदिर मुद्दे पर सपा का ये रुख देने को मिला, वहीं दूसरी तरफ अखिलेश यादव अपने गृह जनपद इटावा में केदारेश्वर मंदिर का निर्माण करा रहे हैं। इसे लेकर बाकायदा शालीग्राम शिला लखनऊ में सपा मुख्यालय पहुंची। उसका धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ स्वागत किया गया। ये वीडियो खुद अखिलेश यादव ने शेयर किया और लिखा कि श्री शालिग्राम भगवान का आगमन देश-प्रदेश के लिए मंगलकारी एवं जन-जन के लिए कल्याणकारी हो, इस पावन कामना के साथ हृदय से स्वागत। अगले दिन अखिलेश यादव अपनी पत्नी डिंपल यादव के साथ सपा दफ्तर में शालीग्राम की पूजा अर्चना करते नजर आए। यही नहीं उनके साथ जया बच्चन और शिवपाल यादव सहित तमाम सपा नेता भी इस दौरान मौजूद रहे। सपा नेता मनोज पांडेय ने बताया कि अखिलेश यादव इटावा लायन सफारी के पास केदारनाथ की तर्ज पर केदारेश्वर मंदिर बनवा रहे हैं। करीब 10 एकड़ में बन रहे इस मंदिर में शिवलिंग के लिए नेपाल से शाालीग्राम शिला मंगाई गई है। नेपाल से ये शिला पहले लखनऊ पहुंची। यहां से वह इटावा ले जाई जा रही है।

इस बीच राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह का मुद्दा सामने आया तो अखिलेश पहले तो उसे नकराते नजर आए लेकिन चूंकि मंदिर को लेकर आस्था ओबीसी समाज में सबसे ज्यादा है लिहाजा उन्होंने अब संतुलन बनाने की कोशिश शुरू की है। अब वे पूरा ख्याल रख रहे हैं कि खुद को आस्थावान दिखा दें लेकिन एक सेक्युलर हिंदू के तौर पर ही, ताकि अल्पसंख्यक वोट उनसे दूर न जाए। यही कारण है कि वह एक तरफ राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह को भाजपा और संघ का कार्यक्रम कहकर नकार रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अपने जिले में केदारेश्वर मंदिर की स्थापना कर रहे हैं। राम मंदिर के लिए नेपाल से शिला आई थी, उसी तरह केदारेश्वर मंदिर के लिए नेपाल से शालिग्राम की शिला लाई गई है।

दूसरी तरफ कांग्रेस भी कहीं न कहीं इसी पशोपेश में घिरी नजर आ रही है। यूपी में कांग्रेस अपना जनाधार पूरी तरह खोज चुकी है। अजय राय की अगुवाई में अब वापस खड़ी होने का प्रयास कर रही है। पार्टी हाईकमान ने भले ही राम मंदिर समारोह में आने से मना किया लेकिन कांग्रेसी नेता अपने ढंग से राम का पूजन करते नजर जरूर आए। कांग्रेस विधायक भी विधानसभा स्पीकर के न्यौते पर रामलला का दर्शन किए। साफ पता चल रहा है कि यूपी में ‘हिंदुत्व राजनीति’ की तपिश सभी राजनीतिक दल महसूस कर रहे हैं। इसी कारण वह ‘मैं भी हिंदू’ की तर्ज पर संतुलन बिठाते नजर आ रहे हैं।

क्या कर्नाटक सरकार में हो रही है कलह?

वर्तमान में कर्नाटक सरकार में कलह हो रही है! कर्नाटक कांग्रेस की विधायकों को बोर्ड और निगमों में नियुक्त करके खुश करने की रणनीति उल्टी पड़ गई है। कई विधायकों ने नामांकन खारिज कर दिया है और कैबिनेट मंत्री पद की मांग की है। राज्य की राजनीति में आक्रामक हो चुकी बीजेपी इस घटनाक्रम पर पैनी नजर रखे हुए है। विशेषज्ञों के मुताबिक ‘ऑपरेशन लोटस’ को अंजाम देने में अनुभवी पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा को राज्य बीजेपी मामलों में प्रमुखता मिलने से कांग्रेस को चिंताजनक स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। सूत्र यह भी बताते हैं कि कई वरिष्ठ विधायक और मंत्री लिंगायतों की उपेक्षा, अधिक डिप्टी सीएम नियुक्त करने, 2.5 साल के बाद गार्ड बदलने और आलाकमान की मनमानी के बारे में बयान जारी करते हैं, लेकिन पार्टी प्रतिक्रिया के डर से कार्रवाई नहीं कर रही है। इससे भी ज्यादा पार्टी नेतृत्व को ‘ऑपरेशन लोटस’ के मंडराते खतरे की चिंता है। सूत्रों ने कहा कि भारत के साधन संपन्न राज्यों में से एक में अपनी स्थिति को खतरे में डालने की किसी भी संभावना से बचने के लिए, आलाकमान ने शीर्ष नेतृत्व की खुली अवज्ञा को सहन करने और सहने का फैसला किया है। इस कैच-22 स्थिति के बीच, बोर्डों और निगमों में नियुक्तियों को लेकर कांग्रेस विधायकों के विद्रोह ने कर्नाटक में पार्टी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कांग्रेस पार्टी के सूत्रों ने पुष्टि की है कि वरिष्ठ विधायक हंपनागौड़ा बदरली और एस.एन. सुब्बा रेड्डी ने उनकी नियुक्तियों को खारिज कर दिया है। मंत्री पद के प्रबल दावेदार तीन बार के विधायक सुब्बा रेड्डी ने अपने समर्थकों की बैठक बुलाई है और निर्णय लेने के लिए तैयार हैं। उन्होंने नियुक्ति आदेश सीएम कार्यालय को वापस भेज दिया।

सुब्बा रेड्डी को कर्नाटक बीज निगम का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। कांग्रेस नेतृत्व पांच बार के विधायक हंपनागौड़ा बदरली को संतुष्ट करने में भी विफल रहा है, जिसने उन्हें राज्य औद्योगिक बुनियादी ढांचा विकास निगम का अध्यक्ष बनाया था। सूत्रों ने कहा कि अकेले उत्तरी कर्नाटक क्षेत्र में 10 से अधिक विधायक, जिनमें से कई प्रमुख नेता हैं, अपनी नियुक्तियों से नाखुश हैं। अधिकांश विधायक फंड नहीं मिलने से असंतुष्ट हैं क्योंकि कांग्रेस सरकार गारंटी योजनाओं को वितरित करने पर ध्यान केंद्रित करती है। कांग्रेस सरकार ने 26 जनवरी को 34 बोर्डों और निगमों में नियुक्तियों की घोषणा की और जल्द ही बोर्डों और निगमों के लिए 45 की एक और सूची की घोषणा करने की तैयारी कर रही है।

उधर, कांग्रेस के दिग्गज नेता शमनूर शिवशंकरप्पा का बयान है कि येदियुरप्पा के बेटे बीजेपी सांसद बी.वाई. राघवेंद्र आगामी लोकसभा चुनाव जीत जाना चाहिए, ने पार्टी को शर्मसार कर दिया है। प्रदेश अध्यक्ष एवं उपमुख्यमंत्री डी.के.शिवकुमार ने डैमेज कंट्रोल मोड में कहा कि उनकी पार्टी शिवमोग्गा सीट पर चुनाव लड़ने जा रही है, जिसका प्रतिनिधित्व वर्तमान में सांसद राघवेंद्र कर रहे हैं। येदियुरप्पा और प्रमुख भाजपा नेताओं ने कांग्रेस के दिग्गज नेता के बयानों का स्वागत किया और शमनूर शिवशंकरप्पा को बधाई दी, इससे कांग्रेस पार्टी काफी नाराज हुई। कर्नाटक में सीएम सिद्धारमैया के समर्थन वाले कांग्रेस मंत्रियों ने हाल ही में आलाकमान की मनमानी को चुनौती दी और उसकी आलोचना की, जिसे राज्य में सत्ता परिवर्तन के संबंध में आने वाले दिनों में सामने आने वाले घटनाक्रम के अग्रदूत के रूप में देखा जा रहा है।

सूत्रों ने बताया कि मौजूदा नियुक्तियों में सीएम सिद्धारमैया का पलड़ा भारी है और आलाकमान को उनकी बात माननी पड़ी। राजनीतिक हलके भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि सीएम सिद्धारमैया के वफादारों द्वारा राष्ट्रीय नेतृत्व की मनमानी पर आपत्ति उनके खिलाफ किसी भी कदम पर पार्टी आलाकमान के लिए एक सूक्ष्म संदेश है। डिप्टी सीएम शिवकुमार, जो सीएम बनने के लिए धैर्यपूर्वक अपना दावा पेश करने का इंतजार कर रहे हैं, और लोकसभा चुनाव में पार्टी के लिए सबसे अधिक सीटें जीतने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं, आंतरिक कलह को प्रबंधित करके कार्य हासिल करने के प्रति आश्वस्त हैं। उन्होंने कहा कि बोर्डों और निगमों में नियुक्तियां सभी की राय को ध्यान में रखकर ही की जाती हैं। शिवकुमार ने यह भी कहा कि विपक्ष के कई लोग हैं, जो कांग्रेस के प्रति निष्ठा बदलना चाहते हैं।

सूत्रों ने कहा कि भाजपा कांग्रेस पार्टी के घटनाक्रम से खुश है और लोकसभा चुनाव के बाद सत्तारूढ़ सरकार को गिराने के लिए हरसंभव प्रयास किया जाएगा।

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बी.वाई. विजयेंद्र ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पार्टी कर्नाटक में ‘ऑपरेशन लोटस’ में शामिल नहीं हो रही है। लेक‍िन राजनीतिक हलकों ने कहा कि यह कांग्रेस के लिए एक चेतावनी होनी चाहिए, क्योंकि राजनेता अक्सर जो करना चाहते हैं, उसके विपरीत कहते हैं। विजयेंद्र ने जद (एस)-कांग्रेस सरकार के पतन को सुनिश्चित करने और 2019 में अपने पिता येदियुरप्पा को सीएम पद पर नियुक्त करने में प्रमुख भूमिका निभाई। महाराष्ट्र में जिस तरह से शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन सरकार को खत्म किया गया था, उसी तरह से बीजेपी ने कांग्रेस सरकार को खत्म करने पर बहुत पहले ही काम शुरू कर दिया था। निकट भविष्य में होने वाली घटनाओं को लेकर दोनों खेमों में असमंजस की स्थिति है।

पीवी नरसिम्हा राव से बीजेपी को क्या होगा फायदा?

आज हम आपको बताएंगे कि पीवी नरसिम्हा राव को भारत रत्न देने से बीजेपी को क्या फायदा होगा! लोकसभा चुनाव के ऐलान से पहले ही बीजेपी ने विपक्षी दलों को धराशाही करने का मन बना लिया है। बीजेपी का फोकस 400 सीटों पर है, जिसके चलते बीजेपी एक के बाद एक दांव चल रही है। इसी कड़ी में बीजेपी ने शुक्रवार को तेलंगाना और आंध्र को चुनावी तौर पर साधने की कोशिश की है। केंद्र की एनडीए सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित करने का फैसला किया है। 2019 में दिग्गज कांग्रेस नेता और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न मिलने के बाद बीजेपी ने एक और दिग्गज कांग्रेस नेता और पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि नरसिम्हा राव को भारत रत्न देने के पीछे 2024 लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी की एक सोची-समझी राजनीतिक चाल है। इस फैसले से बीजेपी ने गांधी परिवार को निशाने पर लिया है। दरअसल पीएम मोदी कई बार कांग्रेस और गांधी परिवार पर राव को अपमानित करने का आरोप लगा चुके हैं। ऐसे में जिसका कांग्रेस ने सम्मान नहीं किया, उसका सम्मान बीजेपी कर रही है। वहीं दूसरी तरफ बीजेपी इस फैसले के जरिए राव के गृह राज्य आंध्र प्रदेश के मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश भी कर रही है। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह, पी वी नरसिम्हा राव और मशहूर वैज्ञानिक व देश में हरित क्रांति के जनक डॉ एम एस स्वामीनाथन को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को खुद ‘एक्स’ पर पोस्ट के जरिए यह घोषणा करते हुए तीनों के योगदान की सराहना की। इस साल अब तक 5 लोगों को भारत रत्न देने की घोषणा हुई है, जो कि अब तक की सर्वाधिक संख्या है। कुछ दिनों पहले ही सरकार ने जननायक कर्पूरी ठाकुर और पूर्व उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के लिए भारत रत्न की घोषणा की थी।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ‘एक प्रतिष्ठित विद्वान और राजनेता के रूप में नरसिम्हा राव ने विभिन्न पदों पर रहते हुए भारत की व्यापक सेवा की। उन्हें आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और कई वर्षों तक संसद सदस्य और विधान सभा सदस्य के रूप में किए गए कार्यों के लिए भी याद किया जाता है।’ मोदी ने कहा कि उनके दूरदर्शी नेतृत्व ने भारत को आर्थिक रूप से उन्नत बनाने, देश की समृद्धि और विकास के लिए एक ठोस नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा, ‘प्रधानमंत्री के रूप में नरसिम्हा राव का कार्यकाल महत्वपूर्ण कदमों से भरा था, जिसने भारत को वैश्विक बाजारों के लिए खोला और इससे आर्थिक विकास के एक नए युग की शुरूआत हुई।’ प्रधानमंत्री ने कहा कि इसके अलावा, भारत की विदेश नीति, भाषा और शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान एक नेता के रूप में उनकी बहुमुखी विरासत को रेखांकित करता है। उन्होंने कहा, ‘नरसिम्हा राव ने न केवल महत्वपूर्ण परिवर्तनों के माध्यम से भारत को दिशा दी बल्कि उसकी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को भी समृद्ध किया।’ संयुक्त आंध्र प्रदेश में जन्में नरसिम्हा राव वर्ष 1991 से 1996 तक भारत के प्रधानमंत्री पद पर रहे थे।

कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी ने पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव को ‘भारत रत्न’ दिए जाने की घोषणा का शुक्रवार को स्वागत किया। सोनिया गांधी ने कहा, ‘मैं इसका घोषणा स्वागत करती हूं। क्यों नहीं?’ प्रधानमंत्री बनने से पहले राव विदेश मंत्री, गृह मंत्री और रक्षा मंत्री सहित कई अन्य महत्वपूर्ण पदों पर भी रहे। वे 1971 से 73 तक आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। राव का जन्म 28 जून 1921 को करीमनगर में हुआ था जो अब तेलंगाना का हिस्सा है। नरसिम्हा राव भले ही भारत के आर्थिक सुधार के जनक मानते जाते हैं, लेकिन उनकी गांधी परिवार से दूरी जगजाहिर थी, लेकिन उनका गांधी परिवार से दूरी जगजाहिर थी। यहां तक की बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बार-बार कांग्रेस पर नरसिम्हा राव की उपेक्षा करने और उनकी जयंती नहीं मनाने का आरोप लगाया है। उनके विरोधियों का एक तर्क ये भी है कि 2004 में राव के पार्थिव शरीर को कांग्रेस मुख्यालय में ले जाने की अनुमति नहीं दी गई थी, जिसका इस्तेमाल वो कांग्रेस पर निशाना साधने के लिए करते हैं। दिसंबर 2004 में, जब राव का निधन हुआ, उनके पार्थिव शरीर को कांग्रेस मुख्यालय के मुख्य द्वार के बाहर रखा गया था और उन्हें अंदर जाने की अनुमति नहीं दी गई थी। हालांकि सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह जैसे वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि दी गई थी, लेकिन यह कांग्रेस मुख्यालय के बाहर ही किया गया था। जब से राव का निधन हुआ, उनके परिवार को लगता है कि गांधी परिवार ने उनके साथ उचित व्यवहार नहीं किया।

नरसिम्हा राव, अविभाजित आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के बड़े नेता और दक्षिण भारत से पहले प्रधानमंत्री बनने वाले व्यक्ति थे। पीएम मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि देते हुए इसे भुलाया नहीं था। पीएम मोदी ने ट्वीट किया, ‘नरसिम्हा राव को आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री, केंद्र मंत्री और कई वर्षों तक सांसद और विधायक के रूप में उन्होंने जो काम किया, उसके लिए भी उन्हें याद किया जाता है।’ यह घटनाक्रम तब सामने आया है जब बीजेपी दक्षिण में अपना दायरा बढ़ाना चाहती है, पार्टी लोकसभा सीटों के मामले में उत्तरी राज्यों में लगभग पूरी तरह से स्थापित है। बीजेपी दक्षिण भारत में तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में अपनी सीटों का एक बड़ा हिस्सा हासिल करने पर ध्यान दे रही है।बीजेपी चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी और अभिनेता-राजनेता पवन कल्याण की जन सेना पार्टी जेएसपी के साथ भी लगातार संपर्क में है।

लोकसभा चुनाव में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है। BJP इस चुनाव में 400 सीटों का लक्ष्य लेकर तैयारियों में जुटी है। 2019 के लोकसभा चुनाव में BJP ने 303 सीटें जीती थी। पीएम नरेंद्र मोदी के नाम और नैशनलिज्म की लहर पर सवार BJP ने 2014 के लोकसभा चुनाव से भी ज्यादा सीट और वोट पर्सेंट हासिल किया। 2014 में 31% वोट और 282 सीटें मिली थीं। 2019 में वोट पर्सेंट बढ़कर 37 हो गया। अब जबकि BJP ने 400 सीटें जीतने का टारगेट रखा है तो जाहिर है कि उसे वोट पर्सेंट भी बढ़ाना होगा, साथ ही नई सीटों पर, जहां बीजेपी पहले नहीं जीती थी, वहां भी जीत हासिल करनी होगी।

तेलंगाना के उपमुख्यमंत्री मल्लू भट्टी विक्रमार्क और भारत राष्ट्र समिति बीआरएस के अध्यक्ष एवं तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव को ‘भारत रत्न’ पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की शुक्रवार को सराहना की। विक्रमार्क ने देश के विकास में नरसिम्हा राव के शानदार योगदान को याद करते हुए कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया जाना तेलंगाना और कांग्रेस के लिए गर्व की बात है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री को यह पुरस्कार देने के लिए केंद्र को धन्यवाद दिया और कहा कि नरसिम्हा राव द्वारा रखी गई आर्थिक सुधारों की नींव के कारण भारत आज दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर उभरा है। उन्होंने एक विज्ञप्ति में कहा, ‘मुझे लगता है कि महान राजनेता और बहुभाषाविद् नरसिम्हा राव को भारत रत्न मिलना कांग्रेस और तेलंगाना के लिए गर्व की बात है।’ चन्द्रशेखर राव केसीआर ने कहा कि धरती पुत्र नरसिम्हा राव के लिए भारत रत्न पुरस्कार तेलंगाना के लोगों को दिया गया सम्मान है। उन्होंने एक विज्ञप्ति जारी कर कहा, ‘केसीआर, बीआरएस की मांग का सम्मान करते हुए पी वी नरसिम्हा राव को भारत रत्न से सम्मानित करने के लिए केंद्र को धन्यवाद देते हैं।’

जानिए आर्थिक क्रांति की शुरुआत करने वाले नरसिम्हा राव के बारे में सब कुछ!

आज हम आपको आर्थिक क्रांति की शुरुआत करने वाले नरसिम्हा राव के बारे में बताने जा रहे हैं! एक दौर था, जब ‘भारत रत्न’ से सम्मानित होने का गौरव गिनी-चुनी महान हस्तियों को मिलता था। आज के हालात देखकर लगता है कि इसका इस्तेमाल चुनावी फायदे की खातिर हो रहा है। इस साल भारत रत्न से सम्मानित होने वालों में लालकृष्ण आडवाणी, कर्पूरी ठाकुर, एमएस स्वामीनाथन, चरण सिंह और पीवी नरसिंह राव शामिल हैं। इनमें राव इस सम्मान के सबसे अधिक हकदार थे और चरण सिंह सबसे कम। चरण सिंह यूपी के जाट किसान नेता थे। यूपी की सियासत पर पचास के दशक में अगड़ी जातियों का दबदबा था। राजनीतिक आकांक्षा रखने वाले चरण सिंह उस दबदबे को किसी भी कीमत पर खत्म करना चाहते थे। उन्होंने ‘आया राम गया राम’ वाले सियासी दौर की अगुआई की। यह वह दौर था, जब जन-प्रतिनिधि निजी फायदे के लिए सरकारें गिरा रहे थे। दलबदल की बदौलत चरण सिंह 1967 और 1970 में कुछ समय के लिए यूपी का मुख्यमंत्री बनने में भी कामयाब रहे।

इमरजेंसी के दौरान उन्हें दूसरे गैर-कांग्रेसी नेताओं के साथ जेल में डाला गया। 1977 में जब इंदिरा विरोधी मंच के जरिये जनता पार्टी को लोकसभा चुनाव में जीत मिली तो पहले वह गृह मंत्री और बाद में उप-प्रधानमंत्री बने। चरण सिंह इस पर भी खुश नहीं हुए और 1979 में फिर दलबदल कर इंदिरा के सहयोग के दम पर प्रधानमंत्री पद की कुर्सी हथियाने में कामयाब हुए। बगैर सिद्धांतों की राजनीति की यह इंतहा थी। लोगों ने जनता पार्टी को इंदिरा विरोध के नाम पर चुना था। लेकिन चरण सिंह ने इस बात को ताक पर रखकर उन्हीं की मदद ली और प्रधानमंत्री बने। यह बात और है कि इस कुर्सी पर वह ज्यादा दिनों तक नहीं रह पाए क्योंकि इंदिरा ने कुछ ही हफ्तों में समर्थन वापस ले लिया। इसलिए चरण सिंह की सबसे बड़ी सफलता यही कही जा सकती है कि कोई सिद्धांत न हो तो दलबदल कर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक की कुर्सी पाई जा सकती है।

नरसिंह राव की बात अलग है। वह देश के बेहतरीन प्रधानमंत्रियों में थे। 1991 में वह इस कुर्सी पर तब बैठे, जब राजीव गांधी की हत्या हो गई और सोनिया गांधी ने राजनीति में आने से इनकार कर दिया। उस वक्त कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने ‘कमजोर राव’ को इसलिए चुना क्योंकि उन्हें जरूरत पड़ने पर हटाया जा सकता था। राव तब अल्पमत की सरकार का नेतृत्व कर रहे थे। उनकी पार्टी के पास बहुमत नहीं था और विरोधियों के साथ आने पर उसके गिरने का डर बना हुआ था। 1991 में भारत के पास विदेशी मुद्रा भंडार खत्म हो गया और उसे वित्तीय मदद के लिए IMF के पास जाना पड़ा। यह वह दौर है, जब सोवियत संघ बिखर चुका था। इन हालात में समाजवादी धारा वाली कांग्रेस को अपनी सोच बदलने की जरूरत थी। राव की दिक्कत यह थी कि वह ऐसी कमजोर सरकार के नेता थे, जिसकी विचारधारा दुनिया में प्रभाव गंवा चुकी थी। सख्त से सख्त नेता के लिए यह मुश्किल घड़ी थी। वहीं, राव की सियासत में बड़ी हैसियत नहीं थी, न ही उनके पास संसद में बहुमत था।

देश को दिवालिया होने से बचाने के लिए उन्हें सोना गिरवी रखने का फैसला करना पड़ा। लेकिन राव चतुर राजनेता थे। उन्होंने मौके का फायदा उठाकर देश में आर्थिक सुधारों की शुरुआत कर दी। इसी की बदौलत भारत मिरैकल इकॉनमी जादुई अर्थव्यवस्था बना। राव का मास्टरस्ट्रोक टेक्नॉक्रैट मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाना था। व्यापक आर्थिक सुधार तब देश की जरूरत थी। राव ने मनमोहन से कहा था, ‘अगर सुधार कामयाब होते हैं तो हम दोनों उसका श्रेय लेंगे। लेकिन अगर ये नाकाम होते हैं तो हम इसके लिए आपको दोष देंगे और वित्त मंत्री के पद से हटा देंगे।’ विपक्षी दल तब आरोप लगाते थे कि राव सरकार वर्ल्ड बैंक और IMF के निर्देश पर सारे आर्थिक सुधार कर रही है। उनका यह भी कहना था कि सत्ता में आने पर वे इन सुधारों को वापस ले लेंगे। लेकिन ये सुधार कामयाब हुए और इसकी बदौलत 1994 से 1997 के बीच देश की GDP ग्रोथ 7 प्रतिशत रही। इसलिए राव के बाद जो भी सरकारें सत्ता में आईं, उन्होंने आर्थिक सुधारों को जारी रखा।

1991 में सबसे बड़ा रिफॉर्म औद्योगिक क्षेत्र में लाइसेंस-परमिट राज का खात्मा था। इसकी घोषणा तत्कालीन उद्योग मंत्री ने मनमोहन सिंह के पहला बजट पेश करने से कुछ घंटे पहले की। इसलिए अखबारों ने अगले दिन जब बजट के साथ इसकी खबर दी तो लोगों को लगा कि दोनों के ही पीछे मनमोहन सिंह का हाथ है।

सवाल यह है कि तब उद्योग मंत्री कौन थे और इस क्रांतिकारी सुधार के पीछे कौन था? असल में यह नरसिंह राव ही थे। उद्योग मंत्रालय उनके पास था, लेकिन वह खुद को इस जोखिम भरे सुधार से जोड़ना नहीं चाहते थे। खैर, उनकी यह रणनीति काम आई। पार्टी के अंदर के आलोचकों के निशाने पर आने से वह बच गए और आर्थिक उदारीकरण में कामयाब रहे। अफसोस कि 1996 लोकसभा चुनावों में उनकी हार हुई। आलोचक कहते हैं कि राव ने BJP को बाबरी मस्जिद तोड़ने दी। लेकिन आज यह बात जाहिर है कि BJP की हिंदुत्व की राजनीति आखिर इसमें कामयाब होती। बाबरी मस्जिद की जगह देर-सबेर राम मंदिर बनना तय था। 1998 में सोनिया गांधी ने टूट से बचाने के लिए कांग्रेस का नेतृत्व संभालना मंजूर किया। 2004 और 2009 में उन्होंने कांग्रेस को जीत भी दिलाई। लेकिन गांधी परिवार को यह बात कभी पसंद नहीं आई कि देश में आर्थिक क्रांति की शुरुआत एक गैर-गांधी नेता ने की थी। इसलिए गांधी परिवार ने पार्टी के इतिहास से राव का नाम मिटाने की कोशिश की। आज हालात ऐसे हैं कि गांधी परिवार ही गुमनामी की दहलीज पर है।

क्या वर्तमान की राजनीति हो चुकी है सरकारी नौकरी?

वर्तमान की राजनीति अब सरकारी नौकरी जैसी लगती है! सकर्मक क्रिया- राजनीतिक रूप से इतना हिलना कि पेंडुलम को शर्मिंदा होना पड़े। पिछले हफ्ते, टर्नकोट शब्दकोष में एक और शब्द जोड़ा गया जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जिन्होंने एक दशक से कुछ अधिक समय में चार बार पाला बदला है। नीतीश कुमार ने इंडिया गठबंधन को बैकफुट पर रखते हुए अपनी पार्टी का समर्थन बीजेपी को देने का वादा कर दिया है। नीतीश की कलाबाजियों ने उन्हें पहले ही ‘पलटूराम’ कुमार का उपनाम दे दिया था। बिहार में एक और ‘मौसम वैज्ञानिक’ राम विलास पासवान थे, जिन्हें मौसम को भांप लेने और जो भी उन्हें मंत्री पद देता था, उसे स्वीकार करने की उनकी क्षमता के कारण यह सम्मान मिला था। मूल उपनाम ‘आया राम, गया राम’ हरियाणा से आया है और अभी भी प्रचलन में है क्योंकि दलबदल एक ऐसी समस्या है जिससे राजनीतिक दल छुटकारा नहीं पा सकते हैं। शर्म के इस हॉल में सबसे पहले प्रवेश करने वाले हरियाणा के विधायक गया लाल ने 1967 में निर्दलीय चुनाव जीता था। वह एक दिन में चार बार पार्टियां बदलने में कामयाब रहे थे। कांग्रेस से जनता पार्टी में, फिर कांग्रेस में, फिर नौ घंटे के बाद जनता पार्टी में। इसके बाद फिर से कांग्रेस में वापसी। तत्कालीन पार्टी नेता राव बीरेंद्र सिंह, जिन्होंने गया लाल को कांग्रेस में शामिल करने की योजना बनाई थी, उन्हें एक संवाददाता सम्मेलन में ले आए। उस समय उन्होंने घोषणा की कि ‘गया राम अब आया राम हैं। उसके दो सप्ताह के भीतर, वह संयुक्त मोर्चे में चले गS। आर्य सभा और भारतीय लोक दल अन्य पार्टियां भी थीं, जिनके साथ वह बीच में गए थे। यह केवल पाला बदलने के घटना की शुरुआत थी। 1967 से 1972 की अवधि में, कुल 4,000 विधायकों में से लगभग 2,000 ने दलबदल किया और एक दल से दूसरे दलों में शामिल हुए। विधायी प्रक्रियाओं में सुधार लाने के उद्देश्य से दिल्ली स्थित एक गैर-लाभकारी संगठन, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार, संसद में 142 दलबदल की घटना हुई हैं जबकि बाकी दलबदल विभिन्न राज्य विधानसभाओं के हैं।

राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार का कहना है कि भारतीय राजनीति में दलबदल कोई नई बात नहीं है, लेकिन पिछले पांच-सात वर्षों में पाला बदलने वालों की संख्या बढ़ी है। राजनेता अब राजनीति को एक करियर के रूप में देखते हैं। वे कहते हैं कि एक पार्टी एक कंपनी की तरह होती है, यदि आप व्यक्तिगत विकास नहीं देखते हैं तो आप पार्टी बदलते हैं जैसे आप नौकरी बदलते हैं। चुनावी और राजनीतिक सुधार पर काम करने वाले एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के संस्थापक सदस्य जगदीप एस छोकर कहते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक विचारधारा का कोई महत्व नहीं रह गया है। राजनीतिक मान्यताओं पर सीमाएं धुंधली होने के साथ, सीमा पार करना एक ‘न्यू नॉर्मल’ बन गया है। ‘नेता, राजनेता, नागरिक: भारत की राजनीति को प्रभावित करने वाले पचास आंकड़े’ सहित कई पुस्तकों के लेखक रशीद किदवई कहते हैं कि पहले किसी कांग्रेस या वामपंथी राजनेता के लिए भाजपा के खेमे में जाना अकल्पनीय था लेकिन अब यह सच नहीं है। यह पार्टियों और मतदाताओं दोनों को स्वीकार्य है।

चुनावी मौसम में दलबदल की रफ्तार और बढ़ जाती है। असंतुष्ट उम्मीदवार जो अपनी पार्टी की तरफ उपेक्षित महसूस करते हैं वे अवसरों की तलाश में रहते हैं। ऐसे में पार्टियां उन लोगों को चुन लेती हैं जो ‘जीतने योग्य’ होते हैं। उदाहरण के लिए, 2023 में, कर्नाटक के एक भाजपा विधायक, जगदीश शेट्टार, जिन्होंने थोड़े समय के लिए मुख्यमंत्री का पद भी संभाला था, ने चुनाव से पहले टिकट से इनकार किए जाने के बाद अप्रैल में पार्टी छोड़ दी। वह कांग्रेस में शामिल हो गए लेकिन हुबली-धारवाड़ निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव हार गए। नौ महीने कांग्रेस में रहने के बाद वह भाजपा में लौट आए। वह अकेले नहीं हैं। पंजाब में, कांग्रेस विधायक बलविंदर सिंह लाडी दिसंबर 2021 में भाजपा में शामिल हो गए। छह दिन बाद, कांग्रेस के सीएम चरणजीत सिंह चन्नी ने टिकट के वादे पर लाडी को फिर से कांग्रेस में शामिल होने के लिए मना लिया। हालांकि, कांग्रेस को उस निर्वाचन क्षेत्र के लिए एक और उम्मीदवार मिल गया, जिसमें लाडी ने रुचि व्यक्त की थी। इसलिए उन्होंने घोषणा की कि उन्हें ‘पार्टी व्यवस्था में घुटन’ महसूस हो रही थी और उन्होंने तुरंत दो महीने से भी कम समय में इसे छोड़ कर बीजेपी में शामिल हो गए। कभी-कभी, इसके साथ नाटकीयता भी हो सकती है। जैसे कि जब सपा के संस्थापक सदस्य अंबिका चौधरी, जो 2017 में बसपा में शामिल हो गए थे। वे 2021 में अपने समर्थकों के साथ सपा में लौट आए और प्रेस कॉन्फ्रेंस में वास्तविक आंसू बहाए। दिनेश त्रिवेदी, रीता बहुगुणा जोशी और जगदंबिका पाल जैसे अन्य लोग हैं जिन्होंने कई पार्टियों को कवर किया है। रीता बहुगुणा जोशी ने अपना राजनीतिक सफर 1985 में सपा सदस्य के रूप में शुरू किया था लेकिन बाद में कांग्रेस में शामिल हो गईं। वह अक्टूबर 2016 में बीजेपी में शामिल हो गईं। इसी तरह, यूपी के राजनेता जगदंबिका पाल ने विद्रोही अखिल भारतीय इंदिरा कांग्रेस तिवारी में शामिल होने के लिए कांग्रेस छोड़ दी। 1997 में, उन्होंने अखिल भारतीय लोकतांत्रिक कांग्रेस का गठन किया लेकिन 2014 में भाजपा में शामिल हो गए।

चुनाव के बाद की हरकतों ने उस चीज को जन्म दिया है जिसे ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ कहा जाता है। यह आमतौर पर तब किया जाता है जब विधायकों को उस पार्टी द्वारा घेरने की आवश्यकता होती है जो विधान सभा में अपना बहुमत साबित करना चाहती है। ऐसे में यह आशंका रहती है कि विधायक प्रतिद्वंद्वी दलों या समूहों के साथ पर्दे के पीछे बातचीत कर सकते हैं। शनिवार को, झामुमो विधायकों को, बेशकीमती चीतों की तरह, उनके ‘पोचिंग’ को रोकने के लिए रांची से हैदराबाद के एक होटल में ले जाया जा रहा था। गोवा में 2022 के विधानसभा चुनावों से पहले, कांग्रेस ने अपने चुनावी उम्मीदवारों को ‘तीर्थयात्रा’ पर भेजा। 2019 के दलबदल की यादें अभी भी ताजा होने के कारण, पार्टी आलाकमान और भी उच्च शक्तियों तक पहुंच गया। कुछ उम्मीदवारों को महालक्ष्मी मंदिर और होली क्रॉस श्राइन ले जाया गया। जबकि समूह के अन्य लोगों को हमजा शाह दरगाह में यह प्रतिज्ञा दिलाने के लिए ले जाया गया कि यदि वे चुने गए, तो वे दलबदल नहीं करेंगे। लेकिन चुनाव नतीजे आने के बाद भगवान का डर भी आखिरी वक्त की तकरार को नहीं रोक सका। किदवई का कहना है कि चुनाव लड़ने की लागत भी एक भूमिका निभाती है। एक उम्मीदवार पर जीतने का दबाव होता है ताकि वह चुनाव लड़ने की लागत वसूल कर सके। यह दल बदलने के लिए एक प्रोत्साहन है। सूत्रों का कहना है कि संसदीय चुनाव लड़ने के लिए अनुमानित 5 करोड़ रुपये और विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए 2 करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं।

भारत में एक दल-बदल विरोधी कानून है जो व्यक्तिगत सांसदों/विधायकों को एक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाने से दंडित करता है, लेकिन सांसदों/विधायकों के एक समूह दो-तिहाई को दल-बदल के लिए जुर्माना लगाए बिना किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय करने की अनुमति देता है। कानून राजनीतिक दलों को दलबदलू विधायकों को प्रोत्साहित करने या स्वीकार करने के लिए दंडित नहीं करता है। यह बात नीतीश कुमार जैसे लोगों पर भी लागू नहीं होती। छोकर कहते हैं कानून ने हमारे राजनेताओं की नवीनता की आशा नहीं की थी। यह खुदरा व्यापार पर रोक लगाता है लेकिन थोक व्यापार की अनुमति देता है। संजय कुमार दल बदलने वाले उम्मीदवारों को अगला चुनाव लड़ने से रोकने का सुझाव देते हैं। छोकर कहते हैं, दबाव डालने का दूसरा तरीका यह है कि दलबदलुओं को विधायिका से हटा दिया जाए और उनकी सीट खाली घोषित कर दी जाए। वे कहते हैं कि किसी विशेष पार्टी के प्रतिनिधि के रूप में चुने जाने के बाद दलबदल करना मतदाताओं की तरफ से उस उम्मीदवार पर व्यक्त किए गए भरोसे के साथ बहुत गंभीर विश्वासघात है। साथ ही, सभी राजनीतिक दलों के वित्त को पारदर्शी बनाया जाना चाहिए।