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क्या पीएम मोदी छीन लेंगे कांग्रेस से उसका सबसे बड़ा हथियार?

पीएम मोदी अब कांग्रेस से उसका सबसे बड़ा हथियार छीनने वाले हैं! किसी मौके को कैसे भुनाते हैं, ये कोई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीखे। मौका भले ही राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के जवाब का हो, लेकिन मोदी इस मौके को चुनाव से पहले जनता तक अपनी बात पहुंचाने के लिए चतुराई से इस्तेमाल कर ही लेते हैं। अबतक के 10 साल के कार्यकाल की उपलब्धियां बयां कर देते हैं। आगे उनकी सरकार क्या करना चाहती है, मंशा क्या है, विजन क्या है, उसका खाका भी खींच देते हैं। विपक्ष की आलोचना का चुन-चुनकर जवाब देते हैं। पहले लोकसभा में और बाद में राज्यसभा में। पीएम मोदी ने बुधवार को राज्यसभा में अपनी स्पीच के दौरान मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस पर निर्मम हमले किए। लेकिन राज्यसभा में उनके भाषण का केंद्रीय बिंदु था आरक्षण के मुद्दे पर आक्रामक होती कांग्रेस पर तीखा हमला। वो भी उसी के हथियार से। नेहरू के कथित ‘आरक्षण विरोध’ से लेकर बाबा साहेब आंबेडकर के कथित अपमान के मुद्दे पर कांग्रेस को घेरा। पहली आदिवासी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के चुनाव से लेकर अति पिछड़े सीताराम केसरी के कथित अपमान तक के मुद्दे पर कांग्रेस को कोसा। पीएम मोदी ने आरक्षण के मुद्दे पर अपने हमलों से कैसे कांग्रेस के हथियार की धार को खत्म करने की कोशिश की है, इसकी चर्चा आगे करते हैं। पहले ये देख लेते हैं कि आखिर कांग्रेस लोकसभा चुनाव में आरक्षण को एक बड़ा हथियार कैसे बना रही है? कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी भारत जोड़ो न्याय यात्रा पर निकले हुए हैं। लगातार मोदी सरकार पर हमलावर हैं। जाति गणना की बात करते हैं। ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ का नारा बुलंद करते हैं। ओबीसी की बात करते हैं। एससी, एसटी आरक्षण बढ़ाने की बात करते हैं। आरक्षण पर 50 प्रतिशत की लिमिट खत्म करने की बात करते हैं। इसकी गारंटी देते हैं। आरक्षण पर राहुल गांधी के बयान को कांग्रेस के आधिकारिक एक्स अकाउंट से यह कहकर पोस्ट किया जाता है- आरक्षण पर 50 प्रतिशत की लिमिट खत्म कर देंगे, ये कांग्रेस की गारंटी है। क्लिप में राहुल गांधी कहते दिखते हैं, ‘मैं आपको गारंटी देके कह रहा हूं कि आजकल 50 प्रतिशत से ज्यादा रिजर्वेशन नहीं मिल सकता। मैं आपको गारंटी देके कह रहा हूं कि ये जो 50 प्रतिशत की लिमिट है, इसे कांग्रेस पार्टी की सरकार, I.N.D.I.A. की सरकार उठाकर फेंक देगी। और हम जो दलित हैं, आदिवासी भाई हैं, उनके रिजर्वेशन में कोई कमी नहीं आएगी और जो पिछड़ों का हक बनता है, वो उनको मिलेगा।’

चुनाव से पहले कांग्रेस खुद को दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के हितों का चैंपियन दिखाने की कोशिश कर रही है। वह सुप्रीम कोर्ट की तरफ से तय की गई अधिकतम आरक्षण की 50 प्रतिशत की सीमा को खत्म करने की गारंटी दे रही है। तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों में पहले से ही 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण का प्रावधान था। वैसे आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण के बाद पहले ही रिजर्वेशन की 50 प्रतिशत लिमिट पार हो चुकी है। बिहार सरकार ने जातिगत गणना के बाद आरक्षण में 15 प्रतिशत इजाफा किया है। अब सूबे में 75 प्रतिशत आरक्षण है। राहुल गांधी भी 50 प्रतिशत आरक्षण की लिमिट को खत्म करने की ‘गारंटी’ देकर दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। राहुल गांधी ने कुछ महीने पहले हुए 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी जातिगत गणना और आबादी के अनुपात में आरक्षण के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था लेकिन उन्हें कोई फायदा नहीं हुआ।

पीएम मोदी ने अपने भाषण में कांग्रेस पर चुन-चुनकर हमले किए। उन्होंने कहा, ‘जिस कांग्रेस ने जाति-पाति और भाषा के नाम पर देश को बांटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जिस कांग्रेस ने आतंकवाद और अलगाववाद को अपने हित में पनपने दिया। जिस कांग्रेस ने नॉर्थ ईस्ट को हिंसा, अलगाव और पिछड़ेपन में धकेल दिया। जिस कांग्रेस के राज में नक्सलवाद को देश के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बनाकर छोड़ दिया गया। जिस कांग्रेस ने देश की बहुत बड़ी जमीन दुश्मनों के हवाले कर दी। जिस कांग्रेस ने देश की सेना का आधुनिकीकरण होने से रोक दिया। वो कांग्रेस आज हमें राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा के लिए भाषण दे रहे हैं। जो कांग्रेस आजादी के बाद ही कन्फ्यूज रही कि उद्योग जरूरी है कि खेती जरूरी है, राष्ट्रीयकरण करना है या निजीकरण करना है। 10 साल में अर्थव्यवस्था को 12वें से 11 पर ही ला पाई, हम 10 साल में 5 नंबर पर लाए। ये कांग्रेस आर्थिक नीतियों पर लंबे-लंबे भाषण सुना रही है।’चुनाव से पहले ओबीसी वर्ग में अपनी पकड़ और मजबूत करने के लिए कर्पूरी ठाकुर को ‘भारत रत्न’ देने का दांव चलने वाले पीएम मोदी ने कांग्रेस को आरक्षण का जन्मजात विरोधी करार दिया। उस पर एससी, एसटी और ओबीसी के अपमान का आरोप लगाया। पिछले राष्ट्रपति चुनाव के बहाने पीएम मोदी ने कांग्रेस पर आदिवासी विरोधी होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, ‘देश में पहली बार एनडीए ने एक आदिवासी बेटी को राष्ट्रपति बनाने के लिए प्रस्ताव रखा, उनको उम्मीदवार बनाया। आपको हमसे वैचारिक विरोध हो, वह एक बात है। आपको हमसे वैचारिक विरोध होता, आपने सामने कैंडिडेट खड़ा किया होता तो मैं समझ सकता था। लेकिन वैचारिक विरोध नहीं था आपका क्योंकि हमारे यहां से गए व्यक्ति को आपने अपना उम्मीदवार बनाया। इसलिए वैचारिक विरोध नहीं था, आपका विरोध एक आदिवासी बेटी के लिए था।’ दरअसल, पिछले राष्ट्रपति चुनाव में सत्ताधारी एनडीए गठबंधन ने द्रौपदी मुर्मू को उम्मीदवार बनाया जो आदिवासी वर्ग से ताल्लुक रखती हैं। कांग्रेस की अगुआई में विपक्षी दलों ने यशवंत सिन्हा को अपना उम्मीदवार बनाया जो कभी बीजेपी के दिग्गज नेताओं में गिने जाते थे।

प्रधानमंत्री मोदी ने पंडित नेहरू को आरक्षण विरोधी बताते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने अफसरशाही में एससी, एसटी और ओबीसी की भर्ती ही रोक दी थी। पीएम ने कहा, ‘और आज जो आंकड़े गिनाते हैं न इतने यहां हैं, इतने यहां हैं, उसका मूल यहां है क्योंकि उस समय उन्होंने रोक दिया था कि रिक्रूटमेंट ही मत करो। अगर उस समय सरकार में भर्ती हुई होती और वो प्रमोशन करते-करते आगे बढ़ते तो आज यहां तक बढ़ते।’ यहां पर पीएम मोदी के निशाने पर राहुल गांधी थे जो लगातार आरोप लगाते रहते हैं कि केंद्र सरकार को चलाने वाले 90 अफसरों में सिर्फ 3 ही ओबीसी हैं।

पीएम मोदी ने कहा, ‘नेहरूजी ने जो कहा वह हमेशा से कांग्रेस के लिए पत्थर की लकीर होता है। दिखावे के लिए आप कुछ भी कहें लेकिन आपकी सोच कई उदाहरणों से सिद्ध होती हैं। कांग्रेस ने जम्मू-कश्मीर के एससी, एसटी और ओबीसी को उनके अधिकारों से वंचित रखा। आर्टिकल 370 को निरस्त किया तब जाकर इतने दशकों के बाद एससी, एसटी, ओबीसी को वो अधिकर मिले जो देश के लोगों को वर्षों से मिले हुए थे।’

क्या टीडीपी और अकाली दल भी बीजेपी में होंगे शामिल?

आने वाले समय में टीडीपी और अकाली दल भी बीजेपी में शामिल हो सकते हैं! आगामी लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करने के लिए बीजेपी ऐक्शन मोड पर काम कर रही है। पीएम मोदी ने खुद लोकसभा चुनाव की कमान थाम रखी है। पीएम मोदी का दावा है कि इस बार बीजेपी लोकसभा चुनाव में 370 और एनडीए 400 से ज्यादा सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब होगी। बीजेपी ने लोक सभा चुनाव में बड़ी जीत का परचम लहराने के लिए युद्ध स्तर पर तैयारी शुरू कर दी है। उसी कड़ी में बीजेपी क्षेत्रीय पार्टियों से गठबंधन बनाने की रणनीति बना रही है। बीजेपी ने लोकसभा चुनाव के मद्देनजर तेलुगु देशम पार्टी टीडीपी और शिरोमणि अकाली दल अकाली दल से बातचीत शुरू कर दी है। साथ ही राष्ट्रीय लोक दल रालोद के जयंत चौधरी के साथ सीटों को लेकर चर्चा चल रही है। टीडीपी के प्रमुख चंद्रबाबू नायडू ‘संभावनाएं तलाशने’ के लिए दिल्ली पहुंचे और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ गृह मंत्री अमित शाह से मिले। हालांकि बीजेपी पहले नायडू से नाराज थी, लेकिन अब वह उनका समर्थन हासिल करना चाहती है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां बीजेपी मजबूत नहीं है।

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बीजेपी अकाली दल के साथ भी फिर से गठबंधन कर सकती है। कृषि कानूनों के विरोध में अकाली दल एनडीए से बाहर हो गया था। सूत्रों का कहना है कि जयंत चौधरी के साथ बातचीत अच्छी चल रही है। वह समाजवादी पार्टी की ओ से दिए गए सीटों की संख्या से कम सीटों पर चुनाव लड़ने को तैयार हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात की। उन्होंने दोबारा एनडीए छोड़ने से इनकार किया। बीजेपी लोकसभा चुनाव में ज्यादा सीटें जीतने के लिए क्षेत्रीय पार्टियों से गठबंधन कर रही है। टीडीपी, अकाली दल और रालोद के साथ बातचीत जारी है। बिहार मेंबीजेपीऔर जेडीयू साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बुधवार को प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की। यह जनता दल यूनाइटेड जदयू प्रमुख कुमार के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल होने और बीजेपी के साथ मिलकर बिहार में सरकार बनाने के बाद, दोनों नेताओं की पहली मुलाकात थी। यह बैठक कुमार के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा 12 फरवरी को विधानसभा में विश्वास मत का सामना करने से पांच दिन पहले हुई है। बिहार में 28 जनवरी को ‘महागठबंधन’ को छोड़कर राजग में लौटने के बाद जदयू के नेता कुमार राष्ट्रीय राजधानी के अपने पहले दौरे के दौरान बीजेपी के अन्य शीर्ष नेताओं से भी मुलाकात करेंगे। बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा दोनों भाजपा से ने सोमवार को प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी। जदयू सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री कुमार की भाजपा के शीर्ष नेताओं के साथ बैठक के दौरान राज्य में राज्यसभा चुनाव से संबंधित मुद्दों पर भी चर्चा हो सकती है। बिहार में राज्यसभा की छह सीट खाली हो रही हैं, जिनके लिए 27 फरवरी को चुनाव होना है।

शायद यही अप्रोच बीजेपी और एनडीए को मजबूती प्रदान करता दिख रहा है। इंडिया गठबंधन में टूट की कहानी तभी से शुरू हो गई जब कांग्रेस को तीन राज्यों एमपी, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में करारी शिकस्त मिली। इसी के बाद पहले ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को आंखें दिखाना शुरू किया। सीट शेयरिंग तो दूर दीदी ने दो टूक कह दिया उनकी पार्टी टीएमसी अकेले लोकसभा चुनाव में उतरेगी। लोकसभा चुनाव से पहले जिस तरह से विपक्षी एकता का जिक्र शुरू हुआ उसकी पोल धीरे-धीरे खुलती चली गई। क्षेत्रीय पार्टियों ने कहीं न कहीं कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार करने से इनकार कर दिया। सीट शेयरिंग की चर्चा शुरू होती उससे पहले ही गठबंधन में टकराव बढ़ने लगा। अब स्थिति ये हो गई कि इंडिया अलायंस में शामिल दल ही इससे कटना शुरू हो गए हैं। इसके लिए कहीं न कहीं कांग्रेस को ही जिम्मेदार माना जा रहा। इस बात की जिक्र नीतीश कुमार ने भी किया था। नीतीश कुमार को लेकर चर्चा थी कि उन्हें संयोजक बनाया जा सकता है। हालांकि, कांग्रेस ने इस पर ग्रीन सिग्नल नहीं दिया। उन्होंने मल्लिकार्जुन खरगे का नाम आगे बढ़ाया। बस इसी से नीतीश का मन खट्टा हो गया। इसी तरह से ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और उधर जयंत चौधरी भी अलग राह लेने को मजबूर होते नजर आए।

इसके बाद इंडिया गठबंधन को लेकर जोर-शोर से जुटे नीतीश कुमार बिहार में लालू की पार्टी आरजेडी के महागठबंधन से अलग हो गए। उन्होंने एनडीए का साथ पकड़ लिया।

क्या एनडीए में जुड़ने वाले और भी कई दिग्गज नेता?

अब एनडीए में और भी कई दिग्गज नेता जुड़ने वाले हैं! आगामी लोकसभा चुनाव में अब चंद महीने ही बाकी हैं। ऐसे में सत्ताधारी एनडीए हो या फिर विपक्षी इंडिया अलायंस, दोनों ही खेमा अपनी तरकश के तीरों को सहेजने में जुटे हैं। हालांकि, बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए को शिकस्त के लिए एकजुट हुए 15 से ज्यादा पार्टियों का गठबंधन INDIA अब बिखरता नजर आ रहा है। जिस तरह से इस गठबंधन की नींव रखने में अहम योगदान देने वाले नीतीश कुमार इससे अलग हुए उसी से विपक्षी तैयारियों की पूरी पोल खुल गई। नीतीश ही नहीं अब तो जयंत चौधरी की आरएलडी भी एनडीए खेमे में जाती नजर आ रही। विपक्षी गठबंधन में जहां टूट दिख रही तो उधर बीजेपी नेतृत्व लगातार अपना कुनबा बढ़ाने पर जोर दे रहा। इसकी अहम वजह है कि पार्टी नेतृत्व का आगामी चुनाव को लेकर सेट किया गया टारगेट। पीएम मोदी ने लोकसभा में अपने संबोधन के दौरान बीजेपी के लिए 370 तो एनडीए के लिए 400 पार का टारगेट सेट किया है। इसे पाने के लिए पार्टी कोई कमी नहीं छोड़ना चाहती। शायद यही अप्रोच बीजेपी और एनडीए को मजबूती प्रदान करता दिख रहा है। इंडिया गठबंधन में टूट की कहानी तभी से शुरू हो गई जब कांग्रेस को तीन राज्यों एमपी, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में करारी शिकस्त मिली। इसी के बाद पहले ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को आंखें दिखाना शुरू किया। सीट शेयरिंग तो दूर दीदी ने दो टूक कह दिया उनकी पार्टी टीएमसी अकेले लोकसभा चुनाव में उतरेगी। इसके बाद इंडिया गठबंधन को लेकर जोर-शोर से जुटे नीतीश कुमार बिहार में लालू की पार्टी आरजेडी के महागठबंधन से अलग हो गए। उन्होंने एनडीए का साथ पकड़ लिया।

खेला बंगाल और बिहार में ही नहीं हुआ। यूपी में भी इंडिया अलायंस की तैयारियों को जोर का झटका लगता दिख रहा है। अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के साथ नजर आने वाले जयंत चौधरी की आरएलडी अब एनडीए का रुख करती दिख रही। ऐसी चर्चा है कि जल्द ही सीट बंटवारे की डील फाइनल होते ही जयंत भी एनडीए में चले जाएंगे। मायावती पहले ही अकेले लोकसभा चुनाव में उतरने का ऐलान कर चुकी हैं। इस तरह से इंडिया अलायंस में बिखराव जारी है।

लोकसभा चुनाव से पहले जिस तरह से विपक्षी एकता का जिक्र शुरू हुआ उसकी पोल धीरे-धीरे खुलती चली गई। क्षेत्रीय पार्टियों ने कहीं न कहीं कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार करने से इनकार कर दिया। सीट शेयरिंग की चर्चा शुरू होती उससे पहले ही गठबंधन में टकराव बढ़ने लगा। अब स्थिति ये हो गई कि इंडिया अलायंस में शामिल दल ही इससे कटना शुरू हो गए हैं। इसके लिए कहीं न कहीं कांग्रेस को ही जिम्मेदार माना जा रहा। इस बात की जिक्र नीतीश कुमार ने भी किया था। नीतीश कुमार को लेकर चर्चा थी कि उन्हें संयोजक बनाया जा सकता है। हालांकि, कांग्रेस ने इस पर ग्रीन सिग्नल नहीं दिया। उन्होंने मल्लिकार्जुन खरगे का नाम आगे बढ़ाया। बस इसी से नीतीश का मन खट्टा हो गया। इसी तरह से ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और उधर जयंत चौधरी भी अलग राह लेने को मजबूर होते नजर आए।

अब बात करें बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए की तो यहां स्थिति बिल्कुल अलग है। अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के बाद जिस तरह का माहौल देश में नजर आ रहा। उससे बीजेपी काफी एक्टिव दिख रही। उसे लग रहा माहौल उनके हक में है। बावजूद इसके पार्टी कोई कमी नहीं छोड़ना चाहती। यही वजह है कि बीजेपी लगातार नए-नए साथियों को अपने खेमे में लेकर आ रही है। नीतीश कुमार के बाद अब चर्चा है कि आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी भी बीजेपी के साथ आ सकती है। बीजेपी के कुनबा बढ़ाने के पीछे है पार्टी का टारगेट 400 पार का है।

बीजेपी की तैयारी महाराष्ट्र को लेकर भी कुछ अलग है। चर्चा है कि राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस भी एनडीए में आ सकती है। इसके साथ ही बीजेपी नेतृत्व दक्षिण के राज्यों तमिलनाडु में भी नए-नए गठबंधन की प्लानिंग कर रही। पार्टी नेतृत्व को ये अंदाजा है कि हिंदी भाषी राज्यों में उन्हें बड़ी जीत तो मिल सकती है। हालांकि, 370 का टारगेट पाने के लिए उन राज्यों में भी बीजेपी को अच्छा प्रदर्शन करना होगा जहां उनकी स्थिति कमजोर है। यही वजह है कि पार्टी अपने साथ नए दोस्तों को जोड़ने से पीछे नहीं हट रही। बीजेपी नेतृत्व को भी लग रहा कि इस चुनाव में उनके पास ये टारगेट हासिल करने का अच्छा मौका है। ऐसे में वो कोई कोर-कसर छोड़ने के मूड में नहीं है।

बीजेपी नेतृत्व की चाह यही है कि वो किसी भी कीमत पर पीएम मोदी के 400 पार के टारगेट को हासिल करना चाहते हैं। पार्टी को आगामी चुनाव में अपनी जीत का भरोसा तो है लेकिन वो इससे कहीं आगे प्लानिंग कर रहे। यही वजह है कि पीएम मोदी लगातार कांग्रेस नेतृत्व को घेर रहे। बुधवार को राज्यसभा में पीएम मोदी ने एक बार फिर कांग्रेस नेतृत्व पर करारा अटैक किया। प्रधानमंत्री ने दो टूक कहा कि ‘इनका हाथ जहां भी लगता है, उसका डूबना तय। कांग्रेस के पास अपने ही नेताओं की गारंटी और नीतियां नहीं हैं लेकिन वह मोदी की गारंटियों पर सवाल उठा रही।’

आखिर क्या है आरक्षण के अंदर आरक्षण की प्रक्रिया?

आज हम आपको आरक्षण के अंदर आरक्षण की प्रक्रिया बताने जा रहे हैं! केंद्र ने आरक्षण के अंदर आरक्षण देने के लिए अनुसूचित जाति एससी और अनुसूचित जनजाति एसटी के उप-वर्गीकरण का बुधवार को उच्चतम न्यायालय में समर्थन किया और कहा कि वह सैकड़ों वर्षों के भेदभाव से पीड़ित लोगों के लिए सकारात्मक कार्रवाई के रूप में आरक्षण नीति के प्रति प्रतिबद्ध है। प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सात-न्यायाधीशों की संविधान पीठ 2004 के अपने फैसले की वैधता की जांच कर रही है जिसमें कहा गया था कि राज्यों के पास कोटा देने के लिए एससी और एसटी को आगे उप-वर्गीकृत करने की शक्ति नहीं है। दलीलें रखते हुए केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने ईवी चिन्नैया फैसले का विरोध किया और कहा कि उप-वर्गीकरण आरक्षण के पीछे के वास्तविक उद्देश्य को आगे बढ़ाता है। मेहता ने कहा है कि आरक्षण के पीछे सरकार का वैध उद्देश्य उन पिछड़े वर्गों का समर्थन करना है जिनका सदियों से भेदभाव का इतिहास रहा है और अवसर की समानता प्रदान करना है।

चिन्नैया फैसले में कहा गया था कि अनुसूचित जातियों का कोई भी ‘उप-वर्गीकरण’ संविधान के अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार का उल्लंघन होगा। न्यायालय के 2004 के फैसले में कहा गया था कि केवल संसद, न कि राज्य विधानसभाएं, संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत एससी मानी जाने वाली जातियों को राष्ट्रपति की सूची से बाहर कर सकती हैं। शीर्ष अदालत इन सवालों की जांच कर रही हैं क्या अन्य पिछड़ा वर्ग ओबीसी के मामले की तरह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति श्रेणियों के अंदर उप-वर्गीकरण की अनुमति दी जानी चाहिए और क्या राज्य विधानसभाएं इस कवायद को करने के लिए राज्यों को सशक्त बनाने वाले कानून पेश करने में सक्षम हैं।मेहता ने कहा कि 2004 के फैसले ने राज्य को आरक्षण के क्षेत्र को उचित रूप से उप-वर्गीकृत करके उचित नीति बनाने के लिए अक्षम कर दिया और अवसर की समानता की संवैधानिक गारंटी को कम कर दिया।उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार सैकड़ों वर्षों से भेदभाव झेल रहे लोगों को समानता दिलाने के लिए सकारात्मक कार्रवाई के तहत पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की घोषित नीति के लिए प्रतिबद्ध है।सॉलिसिटर जनरल ने अपनी लिखित दलीलों में विभिन्न निर्णयों का उल्लेख किया और अदालत के विचारार्थ कई प्रस्ताव प्रदान किए।

मामले की सुनवाई के दौरान राज्यों ने सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ के ईवी चिन्नैया फैसले की समीक्षा की मांग की। बेंच ने साल 2004 में फैसला सुनाया था कि सभी अनुसूचित जाति समुदायों को बहिष्कार, भेदभाव और अपमान का सामना करना पड़ा। शताब्दियों ने एक सजातीय वर्ग का प्रतिनिधित्व किया, जो उप-वर्गीकृत होने में असमर्थ था। सर्वसम्मति का प्रदर्शन न केवल पक्षपातपूर्ण झगड़ों की पृष्ठभूमि के कारण हुआ, बल्कि इसलिए भी कि, हाल तक, राजनीतिक वर्ग सभी अनुसूचित जातियों के समान न होने की वास्तविकता को स्वीकार करने से सतर्क दिखाई दे रहा था। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस बीआर गवई, विक्रम नाथ, बेला एम त्रिवेदी, पंकज मिथल, मनोज मिश्रा और सतीश सी शर्मा की पीठ के समक्ष बहस करते हुए वेंकटरमणी ने कहा कि चिन्नैया फैसले में अनुसूचित जाति समुदायों के बीच गहरी असमानता को नजरअंदाज किया गया। साथ ही गलती से उन्हें एक सजातीय समूह के रूप में माना गया। अटॉर्नी जनरल ने कहा कि एक बार जब केंद्र और संसद ने एक समुदाय को एससी सूची में शामिल कर लिया, तो राज्यों को समूहों के बीच कोटा को तर्कसंगत बनाकर इन समुदायों के बीच असमानता को समाप्त करने के लिए उपाय करने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए।

एससी समुदायों के उप-वर्गीकरण के लिए केंद्र सरकार के समर्थन पर अस्पष्टता की गुंजाइश को खत्म करते हुए, मेहता ने कहा कि केंद्र सैकड़ों वर्षों से भेदभाव से पीड़ित लोगों को समानता लाने के लिए सकारात्मक कार्रवाई के उपाय के रूप में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की घोषित नीति के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि बड़ी श्रेणी में उनके सामाजिक और शैक्षणिक अभाव की गंभीरता के आधार पर कोटा लाभों के श्रेणीबद्ध वितरण के लिए एससी का उप-वर्गीकरण एक कम प्रभाव सुनिश्चित करेगा। यह केंद्र और राज्यों को सामाजिक न्याय के उच्च संवैधानिक आदर्श को आगे बढ़ाने के लिए नीतियां बनाने के लिए उचित स्वतंत्र भूमिका प्रदान करेगा, जो अवसर की वास्तविक समानता हासिल करना चाहता है। मेहता ने कहा कि उप-वर्गीकरण का अभाव आरक्षित श्रेणी के भीतर असमानता को कायम रखता है। इसके साथ ही और सरकारों को इस संबंध में एक उचित नीति तैयार करने से रोकता है। उन्होंने कहा कि राज्य केवल सरकारी उच्च शिक्षा संस्थानों में सीमित संख्या में सीटें और नौकरियों में पद आरक्षित कर सकता है। सामाजिक समानता प्राप्त करने के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए आरक्षित सीटों और नौकरियों की सीमित संख्या को तर्कसंगत रूप से वितरित करना महत्वपूर्ण है।

क्या लोकसभा चुनाव में 400 पार जा पाएगा एनडीए?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या लोकसभा चुनाव में 400 पार एनडीए जा पाएगा या नहीं! आगामी लोकसभा चुनाव में कौन बाजी मारेगा, हर किसी के मन में यही सवाल है। क्या बीजेपी सच में इस बार 370 का टारगेट पूरा करने में सफल रहेगी? पीएम मोदी ने जिस तरह से लोकसभा में एनडीए के लिए 400 पार की भविष्यवाणी की, उसे लेकर चर्चा का दौर तेज है। इस सियासी घमासान के बीच एक सर्वे सामने आया है, जिसमें ये जानने की कोशिश हुई कि आखिर देश का मिजाज अभी क्या है? अभी चुनाव होने पर एनडीए को कितनी सीटें आएंगी, कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन का क्या हाल रहेगा। एनडीए गठबंधन को भी पिछले चुनाव के मुकाबले बढ़त नजर आ रही। हालांकि, गठबंधन 400 के टारगेट से थोड़ा पीछे दिख रहा। सर्वे में एनडीए को 366 सीट की संभावना जताई गई है। वहीं सर्वे में इंडिया गठबंधन को 104 और अन्य को 73 सीट आती दिख रही है। तमिलनाडु की 39 सीटों पर गौर करें तो सर्वे के मुताबिक, डीएमके-कांग्रेस साथ मिलकर 36 सीटें लाती नजर आ रही हैं। बीजेपी यहां एक सीट जीत सकती है, वहीं एआईएडीएमके के खाते में 2 सीटें जा सकती हैं। केरल में आज चुनाव हुए तो यहां की 20 सीटें इंडिया गठबंधन के कब्जे में जाती नजर आ रही। यहां बीजेपी का खाता नहीं खुल रहा।अप्रैल में होने वाले लोकसभा चुनाव में अभी तीन महीने का वक्त है। ऐसे में ताजा सर्वे से ये अनुमान लग रहा कि शायद एनडीए के 400 पार का टारगेट पूरा हो सकता है।

एनडीए गठबंधन पीएम मोदी के नेतृत्व में 400 के करीब जाता नजर आ रहा है। बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के वोट शेयर में 4 फीसदी का इजाफा नजर आ रहा है। इंडिया गठबंधन इस चुनाव में एक बार फिर बहुमत से काफी दूर नजर आ रहा है। ओडिशा और तेलंगाना में बीजेपी को ज्यादा सीटें आने के आसार इस सर्वे से नजर आ रहे। बिहार में भी बीजेपी को नीतीश कुमार आने का फायदा मिलता दिख रहा है। बीजेपी को दक्षिण के राज्यों में कहीं न कहीं कुछ बढ़त नजर आ रही। 25 हजार नए वोटरों से और एक लाख 56 लोगों से बात की गई। उनसे बात करने के बाद ही सर्वे के ये आंकड़े सामने आए हैं। अलग-अलग राज्यों की बात करें तो छत्तीसगढ़ में इस सर्वे के मुताबिक, बीजेपी सभी 11 सीटों पर जीत हासिल करती नजर आ रही। यहां कांग्रेस का खाता भी नहीं खुल रहा। तमिलनाडु की 39 सीटों पर गौर करें तो सर्वे के मुताबिक, डीएमके-कांग्रेस साथ मिलकर 36 सीटें लाती नजर आ रही हैं। बीजेपी यहां एक सीट जीत सकती है, वहीं एआईएडीएमके के खाते में 2 सीटें जा सकती हैं। केरल में आज चुनाव हुए तो यहां की 20 सीटें इंडिया गठबंधन के कब्जे में जाती नजर आ रही। यहां बीजेपी का खाता नहीं खुल रहा।

कर्नाटक की बात करें तो यहां बीजेपी बड़ी बढ़त लेती दिख रही। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है बावजूद इसके सूबे की 28 लोकसभा सीट में से 21 पर बीजेपी आगे नजर आ रही। दूसरे नंबर पर कांग्रेस है जिसे 5 सीट मिलती दिख रही। जेडीएस को दो सीट आती नजर आ रही। बता दें कि एनडीए गठबंधन को भी पिछले चुनाव के मुकाबले बढ़त नजर आ रही। हालांकि, गठबंधन 400 के टारगेट से थोड़ा पीछे दिख रहा। सर्वे में एनडीए को 366 सीट की संभावना जताई गई है। वहीं सर्वे में इंडिया गठबंधन को 104 और अन्य को 73 सीट आती दिख रही है। अप्रैल में होने वाले लोकसभा चुनाव में अभी तीन महीने का वक्त है। ऐसे में ताजा सर्वे से ये अनुमान लग रहा कि शायद एनडीए के 400 पार का टारगेट पूरा हो सकता है। बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के वोट शेयर में 4 फीसदी का इजाफा नजर आ रहा है। इंडिया गठबंधन इस चुनाव में एक बार फिर बहुमत से काफी दूर नजर आ रहा है। ओडिशा और तेलंगाना में बीजेपी को ज्यादा सीटें आने के आसार इस सर्वे से नजर आ रहे। बिहार में भी बीजेपी को नीतीश कुमार आने का फायदा मिलता दिख रहा है।बिहार की बात करें तो नीतीश कुमार एनडीए में आने से गठबंधन को मजबूती मिली है। हालांकि, सर्वे के मुताबिक, एनडीए को अभी चुनाव होने पर बिहार में 35 सीटें आ सकती हैं। इंडिया गठबंधन के खाते में 5 सीटें जाती नजर आ रही। पिछले लोकसभा चुनाव में एनडीए ने यहां 39 सीटें जीती थीं। एक सीट पर कांग्रेस ने बाजी मारी थी।

लोकसभा चुनाव से पहले आखिरी बार क्या बोले पीएम मोदी?

लोकसभा चुनाव से पहले पीएम मोदी ने अपना आखिरी भाषण दे दिया है! लोकसभा के बाद अब राज्यसभा में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्षी पार्टी कांग्रेस पर जमकर अटैक किए। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान पीएम मोदी ने कांग्रेस को हर मोर्चे पर घेरा। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर कांग्रेस के मौजूदा अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे तक उन्होंने किसी को भी नहीं बख्शा। राहुल गांधी का नाम लिए बिना ‘युवराज’ कहकर तंज कसा। पीएम मोदी ने कहा कि पार्टी ने अपने युवराज को एक स्टार्टअप बना दिया है। वो स्टार्टर नहीं नॉन स्टार्टर हैं। वो न लिफ्ट हो रहे हैं न लॉन्च हो रहे हैं। राज्यसभा में करीब डेढ़ घंटे के अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने मानो लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पर अटैक का फाइनल ट्रेलर ही दिखा दिया। पीएम मोदी ने कहा कि आजादी के बाद इतने लंबे समय तक देश की सत्ता पर काबिज रहने वाली पार्टी के पतन और गिरावट को लेकर उनके मन में संवेदनाए हैं। वह ‘प्रार्थना’ करेंगे कि वह अगले आम चुनाव में 40 सीट बचा ले। राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री ने कांग्रेस पर देश को उत्तर और दक्षिण में बांटने का भी आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस ‘जन्मजात’ आरक्षण की विरोधी रही है।

प्रधानमंत्री ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के एक बयान का हवाला देते हुए कहा कि वह प्रार्थना करेंगे कि आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 40 सीट ही बचा ले। तृणमूल प्रमुख ने कहा कि था कि आम चुनाव में कांग्रेस 40 सीट भी नहीं जीत पाएगी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की सोच भी ‘आउटडेटेड’ (पुरानी) हो गई है। जब उसकी सोच ही ‘आउटडेटेड’ हो गई है तो उसने अपना कामकाज भी ‘आउटसोर्स’ कर लिया है। देखते ही देखते इतनी पुरानी पार्टी… इतने दशकों तक देश पर राज करने वाले दल का ऐसा पतन, ऐसी गिरावट हमें खुशी नहीं हो रही है। आपके प्रति हमारी संवेदनाए हैं।

पीएम मोदी ने आगे कहा, ‘जिस कांग्रेस ने सत्ता के लालच में सरेआम लोकतंत्र का गला घोंट दिया था। जिस कांग्रेस ने दर्जनों बार लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारों को रातों-रात बर्खास्त कर दिया था। जिस कांग्रेस ने अखबारों पर भी ताले लगाने की कोशिश की थी, अब उसने देश को तोड़ने का विमर्श गढ़ना शुरू कर दिया है। अब देश को उत्तर-दक्षिण में तोड़ने के बयान दिए जा रहे। प्रधानमंत्री ने कहा कि जिस कांग्रेस ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को पूरी तरह कभी आरक्षण नहीं दिया। जिसने सामान्य वर्ग के गरीबों को कभी आरक्षण नहीं दिया। जिसने बाबा साहब को भारत रत्न के योग्य नहीं माना और केवल अपने परिवार को भारत रत्न देते रहे, वह अब हमें उपदेश दे रहे हैं। वो अब हमें सामाजिक न्याय का पाठ पढ़ा रहे हैं। जिस कांग्रेस के अपने नेता की कोई गारंटी नहीं है, वो मोदी की गारंटी पर सवाल उठा रहे हैं।

पीएम मोदी ने कहा कि मैं कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे जी का विशेष आभार व्यक्त करना चाहता हूं। उन्होंने किसी का नाम लिए बिना कहा कि लोकसभा में तो कभी कभी मनोरंजन का मौका मिल जाता है। किंतु आजकल कम मिलता है क्योंकि वे दूसरी ड्यूटी पर हैं। लेकिन लोकसभा में मनोरंजन की जो कमी थी वह आपने (खरगे ने) पूरी कर दी। मोदी ने कहा कि खरगे ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को 400 सीटें पाने का आशीर्वाद दिया है और वह चाहें तो अब इस आशीर्वाद को वापस ले सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने दावा किया कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू कहते थे कि अगर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग ओबीसी को नौकरी में आरक्षण मिला तो सरकारी कामकाज का स्तर गिर जाएगा। एक बार नेहरू जी ने मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिखी थी, जिसमें लिखा था कि ‘मैं किसी भी आरक्षण को पसंद नहीं करता और खासकर नौकरी में आरक्षण तो कतई नहीं। मैं ऐसे किसी भी कदम के खिलाफ हूं जो अकुशलता को बढ़ावा दे, जो दोयम दर्जे की तरफ ले जाए।’ पीएम मोदी ने कहा कि वह इसी के आधार पर कहते हैं कि कांग्रेस ‘आरक्षण की जन्मजात विरोधी’ है।

प्रधानमंत्री के संबोधन के दौरान विपक्षी सदस्यों की ओर से टोका-टोकी किए जाने पर मोदी ने कहा कि वह बड़े धैर्य और नम्रता के साथ उनके एक-एक शब्द को सुनते रहे हैं। लेकिन आप आज भी न सुनने की तैयारी के साथ आए हैं। परंतु मेरी आवाज को विपक्ष दबा नहीं सकता। देश की जनता ने इस आवाज को ताकत दी है, इसलिए मैं भी इस बार पूरी तैयारी के साथ आया हूं। इससे पहले, प्रधानमंत्री जब राज्यसभा में पहुंचे तो सत्ता पक्ष के सदस्यों ने खड़े होकर और मेजे थपथपाकर उनका स्वागत किया। इस दौरान कुछ सदस्यों ने ‘जय श्री राम’ के नारे भी लगाए।

क्या स्वास्थ्य सेवाओं को बदल देगा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस स्वास्थ्य सेवाओं को बदल सकता है या नहीं! आज AI अगर सबसे असरदार तरीके कहीं अपनी छाप छोड़ रहा है तो वह है स्वास्थ्य सेवा। भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं और विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी से जूझता मेडिकल सेक्टर काम के बोझ तले दबा है। ऐसे में AI भारत की स्वास्थ्य सेवा के लिए वरदान साबित हो सकता है, बशर्ते इसका उपयोग मानवीय दृष्टिकोण और तकनीकी तालमेल के साथ जरूरत के अनुसार हो। भारत में मेडिकल सेक्टर में AI की प्रासंगिकता पश्चिमी देशों से कहीं ज्यादा है। अस्पतालों में लगातार बढ़ती भीड़, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, अच्छे विशेषज्ञ डॉक्टरों और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की कमी विकराल होती समस्या है।देश के सबसे बड़े अस्पतालों में से एक दिल्ली के AIIMS में ही देखें तो यहां मामूली सर्जरी के लिए भी मरीज को तीन से छह महीने तक इंतजार करना पड़ता है। कई बड़ी सर्जरी के लिए तो एक साल या उससे भी अधिक इंतजार करना पड़ सकता है। मामूली पैथोलॉजिकल जांच के लिए भी मरीजों को कई दिनों की लाइन में लगना पड़ता है। अगर दिल्ली के AIIMS की यह दशा है तो बाकी अस्पतालों का अंदाजा लगाया जा सकता है। छोटे शहरों और कस्बों की हालत और खराब है। प्राथमिक चिकित्सा सेवा हो या प्राइवेट अस्पताल, सबकी हालत कमोबेश ऐसी ही है।

 AI से इन समस्याओं को बहुत हद तक कम किया जा सकता है। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। दिल्ली या दूसरे महानगरों में अगर कोई मरीज एक्स-रे कराता है तो इसकी रिपोर्ट उसे घंटों बाद मिलती है। छोटे शहरों में तो कई दिन लग जाते हैं क्योंकि हर जगह रेडियोलॉजिस्ट उपलब्ध नहीं होते। AI ने इस मुश्किल को काफी आसान कर दिया है। इसकी मदद से एक्स-रे फिल्म के साथ ही रिपोर्ट भी मशीन से प्रिंट होकर निकलेगी। दिल्ली का AIIMS यह प्रयोग कर चुका है, जिसमें AI की मदद से टीबी के मरीज की छाती के एक्स-रे की जांच की गई, जो डॉक्टरों की जांच के हिसाब से सटीक पाई गई। इस प्रयोग ने टीबी उन्मूलन के 2025 के सरकारी लक्ष्य के प्रति उम्मीद जगा दी है।

AI की खासियत यह भी है कि इसे इस तरह से डिजाइन और प्रशिक्षित किया गया है कि यह मेडिकल रेकॉर्ड्स, तस्वीरें, फिल्में और वंशानुगत जानकारियों का बारीकी से अध्ययन करे। इससे रोग को जल्दी पकड़ने में आसानी होती है, जो आम तौर पर कई बार डॉक्टरों से छूट जाते हैं। उदाहरण के लिए, एक्स-रे और MRI की जांच में AI टूल विसंगतियों को तुरंत पकड़ लेता है, खासकर कैंसर और न्यूरो की गंभीर बीमारियों में। AI की मदद से नई दवाओं की खोज में भी मदद मिलती है। IIT, मद्रास ने हाल ही में एक ऐसा AI मॉडल तैयार किया है जो डायबिटिक रेटिनोपैथी को समय रहते पकड़ सके। भारत में मधुमेह रोगियों की संख्या लगातार बढ़ रही है और उन मरीजों में रेटिनोपैथी आम समस्या है। लगातार अनियंत्रित डायबिटीज रोगी की आंखों को प्रभावित करता है जो बाद में रेटिनोपैथी का रूप ले लेता है। AI के माध्यम से ऐसे मरीजों की जांच कर समय रहते आगाह किया जा सकता है ताकि उसे अंधापन से बचाया जा सके।

भारत में इस तकनीक की मदद से सरकार संक्रामक रोगों को ट्रैक करने और उसका पता लगाने का काम कर रही है। इसमें कोविड-19 जैसी महामारी भी है। लोगों तक स्वास्थ्य संबंधी सूचनाएं पहुंचाने के लिए सरकार AI युक्त चैटबॉट्स का इस्तेमाल कर रही ,है जिसमें विभिन्न भारतीय भाषाओं में मरीजों के सवालों के जवाब जिए जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी AI युक्त चिकित्सा समाधान पर काम चल रहा है। अभी यह शुरुआत है, इस पर बहुत काम होना बाकी है। यह तभी पूर्ण रूप से विकसित हो पाएगा जब इसकी स्वीकार्यता बढ़ेगी- मरीजों और स्वास्थ्य कर्मियों में भी। इसकी मदद से एक्स-रे फिल्म के साथ ही रिपोर्ट भी मशीन से प्रिंट होकर निकलेगी। दिल्ली का AIIMS यह प्रयोग कर चुका है, जिसमें AI की मदद से टीबी के मरीज की छाती के एक्स-रे की जांच की गई, जो डॉक्टरों की जांच के हिसाब से सटीक पाई गई। इस प्रयोग ने टीबी उन्मूलन के 2025 के सरकारी लक्ष्य के प्रति उम्मीद जगा दी है।इसके लिए सबसे पहले उस धारणा को तोड़ना होगा कि यह तकनीक स्वास्थ्य सेवा से जुड़े प्रफेशनल्स को रिप्लेस करने के लिए नहीं बल्कि उनकी कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए है। मानवीय संवेदना हमेशा सर्वोच्च है जिसे रिप्लेस नहीं किया जा सकता, खासकर जब मामला मरीज और उससे जुड़े संवेदनशील डेटा का हो।

आरक्षण के लिए क्या थे जवाहरलाल नेहरू के विचार?

आज हम आपको बताएंगे कि आरक्षण के लिए जवाहरलाल नेहरू के विचार क्या थे! लोकसभा चुनाव से पहले संसद में अपने आखिरी संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर कांग्रेस पर तगड़ा अटैक किया। राज्यसभा में धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का जवाब देते हुए पीएम मोदी ने कहा कि जिस कांग्रेस ने कभी ओबीसी को पूरा आरक्षण नहीं दिया। जिसने कभी सामान्य वर्ग के गरीबों को आरक्षण नहीं दिया, जिसने बाबा साहब अंबेडकर को भारत रत्न के लायक नहीं समझा। वे अब उपदेश दे रहे हैं और हमें सामाजिक न्याय का पाठ पढ़ा रहे हैं। इसी दौरान पीएम मोदी ने पूर्व पीएम नेहरू की एक चिट्ठी का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि आरक्षण को लेकर नेहरू ने ये चिट्ठी मुख्यमंत्रियों को लिखी थी। पीएम मोदी ने उस लेटर का कुछ हिस्सा संसद में पढ़ा भी। आइये जानते हैं पीएम मोदी ने अपने संबोधन में नेहरू को लेकर क्या कहा। इसके साथ ही पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू की चिट्ठी में क्या था बताते हैं आगे। पीएम मोदी ने राज्यसभा में पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की उस समय राज्यों के मुख्यमंत्रियों को लिखी चिट्ठी का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि नेहरू ने लिखा था- ‘मैं किसी भी आरक्षण को पसंद नहीं करता और खासकर नौकरी में आरक्षण तो कतई नहीं। मैं ऐसे किसी भी कदम के खिलाफ हूं जो अकुशलता को बढ़ावा दे, जो दोयम दर्जे की तरफ ले जाए।’ पीएम मोदी ने आगे कहा कि मैं कहता हूं कि कांग्रेस जन्म से ही आरक्षण के खिलाफ है। नेहरू जी कहते थे कि अगर एससी/एसटी, ओबीसी को नौकरी में आरक्षण मिला तो सरकारी कामकाज का स्तर गिर जाएगा। आज जो ये आंकड़े गिनाते हैं, उसका मूल यही है। अगर उस समय सरकार में भर्ती हुई होती, तो वो प्रमोशन के बाद आगे बढ़ते और आज यहां पहुंचते।’ पीएम मोदी ने नेहरू के जिस पत्र का जिक्र किया आखिर उसका संदर्भ क्या था और जानिए उन्होंने इसमें क्या लिखा था।

आजादी के दो महीने बाद यानी 15 अक्टूबर 1947 से जवाहर लाल नेहरू ने प्रांतीय सरकारों के प्रमुखों और बाद में विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखना शुरू किया। उन्होंने अपनी मौत से चार महीने पहले 21 दिसंबर, 1963 तक चिट्ठी लिखने का अभ्यास जारी रखा। राजनीतिक विचारों को प्रदर्शित किया गया। नागरिकता और लोकतंत्र से लेकर अंतर्राष्ट्रीय संबंधों तक कई विषयों को शामिल किया गया। कानूनी जानकार माधव खोसला की ओर से मुख्यमंत्रियों को नेहरू के पत्रों के संकलन को संपादित किया गया। इसके अनुसार, 27 जून 1961 को लिखे एक पत्र में पूर्व प्रधानमंत्री ने आरक्षण की बात की थी। उस समय 1950 में तैयार किए गए संविधान के अनुच्छेद 334 में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और एंग्लो-इंडियन समुदाय को 10 साल की अवधि के लिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में आरक्षण दिया गया था। इस अनुच्छेद को बाद में 1969, 1980, 1989, 1999 में संशोधित किया गया था। जैसा कि वर्तमान में है, आरक्षण को एससी/एसटी समुदायों के लिए 80 साल और एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए 70 साल तक बढ़ा दिया गया है।

रिजर्वेशन को लेकर लिखे गए इस पत्र में पूर्व पीएम नेहरू ने ‘जाति या समूह को दिए जाने वाले आरक्षण और विशेषाधिकारों की पुरानी आदत से बाहर निकलने’ की बात से आगाज किया था। उन्होंने कहा कि हाल ही में मुख्यमंत्रियों की एक बैठक में यह तय किया गया था कि कोई भी मदद आर्थिक आधार पर दी जानी चाहिए न कि जाति के आधार पर। उन्होंने आगे कहा, ‘यह सच है कि हम अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति की मदद के लिए कुछ नियमों और परंपराओं से बंधे हैं। वे मदद के पात्र हैं, लेकिन फिर भी, मैं किसी भी प्रकार के आरक्षण को नापसंद करता हूं, विशेषकर सर्विस में। मैं ऐसी किसी भी चीज के खिलाफ कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करता हूं जो अक्षमता और दोयम दर्जे के मानकों की ओर ले जाती है। मैं चाहता हूं कि मेरा देश हर चीज में प्रथम श्रेणी का देश बने। जिस पल हम दोयम दर्जे को प्रोत्साहित करते हैं, हम खो जाते हैं।’

नेहरू ने तब तर्क दिया कि ‘पिछड़े समूह की मदद करने का एकमात्र वास्तविक तरीका अच्छी शिक्षा, विशेष रूप से ‘तकनीकी शिक्षा’ के अवसर देना है। उन्होंने कहा, ‘बाकी सब कुछ किसी न किसी प्रकार की बैसाखी जैसे हैं। जो शरीर या स्वास्थ्य की ताकत में इजाफा नहीं करते। नेहरू ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने इस संबंध में दो निर्णय लिए हैं। सार्वभौमिक मुफ्त प्रारंभिक शिक्षा, और छात्रवृत्ति। ‘मैं प्रतिभाशाली और सक्षम लड़कों और लड़कियों पर जोर देता हूं क्योंकि वे ही हमारे मानकों को ऊंचा उठाएंगे। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस देश में संभावित प्रतिभा का विशाल भंडार है, बशर्ते हम उसे अवसर दे सकें। लेकिन अगर हम सांप्रदायिक और जाति के आधार पर आरक्षण के लिए जाते हैं, तो हम प्रतिभाशाली और सक्षम लोगों को पीछे छोड़ देते हैं। दूसरे दर्जे या तीसरे दर्जे के बने रह जाते हैं।’

पंडित नेहरू ने पत्र के निष्कर्ष में कहा कि ‘मुझे यह जानकर दुख हुआ कि सांप्रदायिक विचारों के आधार पर आरक्षण का यह व्यवसाय कितना आगे बढ़ गया है। मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि पदोन्नति भी कभी-कभी सांप्रदायिक या जातिगत विचारों पर आधारित होती है। इस रास्ते में न केवल मूर्खता है, बल्कि आपदा भी है। आइए हम पिछड़े समूहों की हर तरह से मदद करें, लेकिन दक्षता की कीमत पर कभी नहीं।’

एंटोनियो लोपेज हबास का कहना है कि वे आईएसएल 2023-24 में पहला स्थान हासिल करना चाहते हैं.

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आईएसएल में नंबर दो टीम के खिलाफ मैच से पहले मोहन बागान के कोच ने कहा, लक्ष्य नंबर एक पर रहना है। लेकिन आगे एफसी गोवा जैसा कड़ा मुकाबला है. आपको खेलने के लिए गोवा के मैदान पर जाना होगा. इससे पहले टीम के कोच ने कहा था कि शीर्ष स्थान उनका लक्ष्य है. कोलकाता डर्बी में ड्रॉ के बावजूद, मोहन बागान अगले मैच में हैदराबाद को हराकर आईएसएल में जीत की राह पर लौट आया। लेकिन अब उनके पास राहत की सांस लेने का कोई रास्ता नहीं है. आगे एफसी गोवा जैसा कड़ा मुकाबला। वह भी गोवा के मैदान पर खेला जाना है. अंक तालिका में दूसरे स्थान पर मौजूद गोवा को हराना उसे नंबर एक बनने से रोकेगा, जबकि मोहन बागान के पास भी तीसरे नंबर पर पहुंचने का मौका है। कोच एंटोनियो लोपेज हबास ऐसा करना चाहते हैं।

आईएसएल की लीग-शील्ड जीतने पर मोहन बागान को अगले साल सीधे एएफसी चैंपियंस लीग 2 में खेलने का मौका मिलेगा। कट्टर प्रतिद्वंद्वी ईस्ट बंगाल को पहले ही उस प्रतियोगिता का प्ले-ऑफ खेलने का मौका मिल चुका है। तो इस दिन हबास ने साफ कहा, ”मेरा लक्ष्य हर मैच जीतना है. तभी हम पहले स्थान पर खेल सकते हैं।’ मुझे दूसरे या तीसरे स्थान के बारे में कोई जानकारी नहीं है. मैंने खिलाड़ियों से कहा कि पहला स्थान मेरा लक्ष्य है. फुटबॉल में हर दिन अलग हो सकता है। कभी ड्रा, कभी हार. लेकिन हम हर मैच में तीन अंक ध्यान में रखकर खेलेंगे।’ इसके लिए सभी को मदद करनी चाहिए. टीम की एकजुटता वास्तविक है. विशिष्ट रणनीतियाँ भी होनी चाहिए।

मोहन बागान के लिए अच्छी खबर यह है कि तीन फुटबॉलर अगले मैच के लिए वापसी कर रहे हैं. गोवा मैच के लिए लिस्टन कोलासो, दीपक टांगरी, अरमांडो सादिकुरा की पहली एकादश में वापसी। अनवर अली भी लगभग फिट हैं. इस दिन हबास ने अनवर के बारे में कहा, ”अनवर 80-85 फीसदी फिट हैं. अच्छी जगह पर है. खेलने की सम्भावना है. लेकिन मैं मंगलवार को फैसला करूंगा कि खेलना है या नहीं।”

हैदराबाद मैच के दूसरे हाफ में ह्यूगो बुमोस की जगह आए जॉनी काउको ने कुछ समय खेला। हाबास ने सोमवार को अभ्यास के दौरान उनसे अलग से बात की। क्या कावको गोवा मैच में शुरू से खेलेंगे? हाबास ने जवाब दिया, “धीरे-धीरे उसे अधिक समय तक खेलो। पूरा मैच एक साथ नहीं खेला जा सकता. मैं हर दिन जितना संभव हो उतना खेलने की कोशिश करूंगा।”

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कार्ल मैकहुग, जो पहले मोहन बागान के लिए खेलते थे, अब गोवा टीम में हैं। लिस्टन, उसके पास काउबर्ड के भागने को रोकने की क्षमता है। हाबास खुद भी उन्हें अच्छे से जानते हैं. लेकिन वह बुधवार के मैच से पहले यह सब नहीं सोचना चाहते. कहा, ”मैकहुग को टीम में वापस लाने की चर्चा काफी पहले से चल रही थी। वह एक पेशेवर फुटबॉलर हैं. मैं अब उसके बारे में नहीं सोचना चाहता. कोई योजना होनी चाहिए. लेकिन हमारा मुख्य लक्ष्य मैच जीतना है. मैं कार्ल को अच्छी तरह जानता हूं. लेकिन फुटबॉल ग्यारह बनाम ग्यारह है. किसी एक व्यक्ति के ख़िलाफ़ नहीं खेलना।”

हैदराबाद मैच में युवा अभिषेक सूर्यवंशी ने सबका ध्यान खींचा. वह मोहन बागान की जर्सी में अधिक मैच खेलना चाहते हैं। एडिन ने कहा, ”जूनियर से सीनियर टीम तक पहुंचना आसान नहीं है. अब जब मैं सीनियर टीम में नियमित रूप से खेल रहा हूं, तो मैं हर दिन कुछ नया सीखने की कोशिश करता हूं। मैं उन लोगों से सीखने की कोशिश कर रहा हूं जो मेरी भूमिका निभाते हैं। मैं खुद को उनके जैसी जगह पर ले जाने की कोशिश कर रहा हूं।” मोहन बागान के फुटबॉलर और प्रशंसक इस सीजन में आईएसएल के पहले दौर में एफसी गोवा से मिली 1-4 की शर्मनाक हार का दर्द अभी तक नहीं भूले हैं। दोनों टीमें अगले बुधवार को फिर से भिड़ने वाली हैं। इस बार लड़ाई ज्यादा कठिन है. सबसे पहले मोहन बागान को गोवा में खेलना होगा. दूसरा, ह्यूगो बुमोस से अलगाव और साथ ही टीम में कई फुटबॉलरों का घायल होना। रविवार को अभ्यास के दौरान सुहैल बट के टखने में भी चोट लग गई.

शनिवार रात युवा भारती में हैदराबाद एफसी पर 2-0 की जीत के साथ चार मैचों के बाद जीत की राह पर लौटने के बावजूद कोच एंटोनियो लोपेज हबास की चिंताएं कम नहीं हो रही हैं। ब्रेंडन हैमिल के गोवा के खिलाफ खेलने की लगभग संभावना नहीं है। चिंतित हाबास कहते हैं, ”एफसी गोवा के खिलाफ मैच से पहले हमारे पास केवल तीन दिन हैं।” ब्रेंडन के लिए इतने कम समय में तैयार होना लगभग असंभव है।” क्या अनवर अली और आशीष राय खेल सकते हैं? हरे-मैरून स्पेनिश कोच ने जवाब दिया, ”केवल डॉक्टर ही इस सवाल का जवाब दे सकते हैं।” प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद, राहत की खबर यह है कि लिस्टन कोलासो, अरमांडो सादिकु और दीपक टांगरी निर्वासन से मुक्त होकर टीम में लौट रहे हैं। हबास ने कहा, ”दीपक, सादिकु और लिस्टन का निर्वासन खत्म हो गया है. हमारे सभी मैच अब मजबूत विरोधियों के खिलाफ हैं। शायद इसीलिए उन्होंने हैदराबाद के खिलाफ 61वें मिनट में सहल अब्दुल समद को मैदान पर उतारा और जॉनी काउको को बाहर कर दिया।

ह्यूगो बुमोस को बाहर करने के बाद हाबास ने जॉनी की जगह ली। 2022 में यूरो में फिनलैंड के लिए खेलने वाला मिडफील्डर घुटने की चोट के कारण मैदान से बाहर चला गया. हबास ने जॉनी की भरपूर प्रशंसा करते हुए कहा, “जॉनी की वापसी हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है।” अगले मैचों में उन्हें उनकी जरूरत है.’ जॉनी को जल्दबाजी नहीं की जा सकती. क्योंकि, लंबे समय बाद वह मैदान में उतर रहे हैं. लेकिन जॉनी पूरी तरह से स्वस्थ हैं. उन्हें उस पर भरोसा है.

पीएम नरेंद्र मोदी ने मध्य प्रदेश में 7,550 करोड़ रुपये की विकास परियोजनाओं की शुरुआत की.

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बजट सत्र की समाप्ति के बाद कोई अर्ध-अवधि का विश्राम नहीं है। बीजेपी के स्टार प्रचारक नरेंद्र मोदी एक बार फिर लोकसभा चुनाव प्रचार में कूद पड़े हैं. रविवार को उन्होंने मध्य प्रदेश के झाबुआ में एक सार्वजनिक बैठक में लोगों के कल्याण के लिए 7,550 करोड़ रुपये की विकास परियोजना का उद्घाटन किया।

चुनाव की घोषणा होने तक मोदी सरकार की बुनियाद में कोई कमी नहीं छोड़ना चाहते. राजनीतिक हलकों का मानना ​​है कि एक पत्थर से दो शिकार करना संभव है। सबसे पहले, चुनाव से पहले बड़ी सरकारी परियोजनाओं की घोषणा करके उस राज्य या जिले में सरकार की छवि को चमकाया जा सकता है। दूसरे, सरकारी बुनियादी ढांचे की कीमत पर संबंधित बस्तियों के सामने रोड शो और भाषण जैसे राजनीतिक अभियान आयोजित किए जा सकते हैं। रविवार को प्रधानमंत्री ने झाबुआ की सीमा से लगे राजस्थान और गुजरात के लोगों को भी संदेश दिया और कहा, ‘हमारे लिए दलित-आदिवासी समाज वोट बैंक नहीं, देश का गौरव हैं. सम्मान आपका और विकास भी आपका. ये मोदी की गारंटी है. आपके सपने, आपके बच्चों के सपने, युवाओं के सपने पूरा करना – यही मोदी का संकल्प है।”

मोदी ने कहा कि इस दिन संसद में कांग्रेस के अलावा विपक्षी नेता भी कह रहे हैं कि एनडीए चार सौ के पार जाएगी! इससे पहले हाल ही में समाप्त हुए बजट सत्र में भी मोदी को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का मजाक उड़ाते हुए यह कहते हुए सुना गया था, “खड़गेजी ने एनडीए को 400 सीटों का आशीर्वाद दिया। मैंने आपका आशीर्वाद मन में ले लिया।” बातचीत का सूत्र यह है कि खड़गे ने पहले कहा था, ”आपके पास प्रचंड बहुमत है. अभी एनडीए के पास 330 से 335 सांसद हैं. और इस बार तो चार सौ पार हो रहे हैं।” कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, खड़गे का आशय यह था कि बीजेपी का नारा चार सौ होना चाहिए. लेकिन क्योंकि उन्होंने यह बात अलग तरीके से कही, इसलिए मोदी लगातार प्रचार में उनका इस्तेमाल कर रहे हैं. आज भी उन्होंने वही बात दोहराई. इसके बाद उन्होंने कल अमित शाह की भविष्यवाणी को दोहराते हुए दावा किया, ”मुझे यकीन है कि बीजेपी की पद्म प्रतिका 370 सीटें पार कर जाएंगी.” प्रधानमंत्री ने दावा किया कि वह लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार करने झाबुआ नहीं आये हैं. वह हाल के विधानसभा चुनावों में भारी समर्थन के लिए लोगों को धन्यवाद देने के लिए एक ‘सेवक’ के रूप में आए थे।

आज झाबुआ पहुंचने से पहले इंदौर एयरपोर्ट पर बीजेपी नेताओं ने प्रधानमंत्री का स्वागत किया. इसके बाद मोदी हेलीकॉप्टर से झाबुआ पहुंचे. राज्य में नई सरकार के गठन के बाद यह उनका मध्य प्रदेश का पहला दौरा है। इसके बाद प्रधानमंत्री ने ‘आदिवासी महाकुंभ’ सम्मेलन में हिस्सा लिया. एक रोड शो भी हुआ. रोड शो में प्रधानमंत्री के साथ मुख्यमंत्री मोहन यादव और केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा भी नजर आये.

झाबुआ की जनसभा से मोदी ने कांग्रेस पर हमला बोला और दावा किया, ”कांग्रेस ने इतने सालों तक शासन किया है. उन्हें काम करने की अनुमति दी गई, लेकिन केवल एक सौ एक स्कूल खोले गए। भाजपा सरकार ने पिछले दस वर्षों में चार गुना अधिक निजी स्कूल खोले हैं अगर एक भी आदिवासी बच्चा शिक्षा के अभाव में वंचित रह जाए तो यह मुझे स्वीकार्य नहीं है।” हमारी सरकार ने वन संपदा अधिनियम में संशोधन करके इन समुदायों को उनका वन अधिकार वापस दिलाया है। इतने सालों से आदिवासी परिवारों में हर साल सैकड़ों लोग मर रहे थे, खासकर एनीमिया से। कांग्रेस ने इतने सालों तक केंद्र और राज्य दोनों जगह सरकार चलायी है. लेकिन उन्होंने यहां के युवाओं और बच्चों के बारे में नहीं सोचा. उन्होंने मौत को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया.” इतना ही नहीं उन्होंने सीधे तौर पर नरेंद्र मोदी की तुलना राम से कर दी. भले ही उन्होंने ऐसा नहीं किया, लेकिन आज अमित शाह ने लोकसभा में खड़े होकर बताया कि राम के सारे गुण नरेंद्र मोदी में हैं. ऐसे ‘सर्वगुण संपन्न’ प्रधानमंत्री का इंतजार पूरा देश कई वर्षों से कर रहा था. और इसलिए राम मंदिर का निर्माण और राम लला की प्राण प्रतिष्ठा नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के बिना संभव नहीं थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 22 जनवरी को अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन करने और राम लला को विराजमान करने के बाद सवाल उठा कि क्या भारत ने बहुलवाद और तानाशाही की राह पर एक और कदम बढ़ा दिया है?

अमित शाह ने आज संसद में खड़े होकर दलील दी कि दुनिया के किसी भी देश में बहुसंख्यक समुदाय ने अपने धर्म के लिए इतना लंबा इंतजार नहीं किया है. इसने भारत के ‘लोकतांत्रिक मूल्यों’ और ‘धर्मनिरपेक्ष चरित्र’ को पूरी दुनिया के सामने स्थापित किया है। राम मंदिर के लिए संघर्ष 1528 से शुरू हुआ. 1858 से कानूनी लड़ाई शुरू हुई. वह संघर्ष 22 जनवरी को राम मंदिर के उद्घाटन और राम लला के निधन के साथ समाप्त हुआ। सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों के फैसले के बाद ‘सौहार्दपूर्ण माहौल’ में राम मंदिर का निर्माण हुआ.