Home Blog Page 932

क्या भारत बन पाएगा दुनिया का रेलवे पावर हाउस?

भारत अब दुनिया का रेलवे पावर हाउस बन सकता है! केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट भाषण में रेल को लेकर सरकार की गंभीरता और उत्साह की घोषणा की और कहा कि यात्रियों के यात्रा अनुभव को बेहतर बनाने और तेज गति देने के उद्देश्य से, जिससे यात्रा का समय कम हो जाए, अब रेल मंत्रालय 40,000 सामान्य रेल बोगियों को वंदे भारत मानकों में परिवर्तित करेगी. यह भारत के रेलवे बुनियादी ढांचे के लिए एक महत्वपूर्ण बढ़ावा है, जो केंद्र सरकार के पूंजीगत व्यय का एक केंद्रीय घटक है. सीतारमण ने पीएम गति शक्ति योजना के तहत लॉजिस्टिक्स दक्षता और कनेक्टिविटी में सुधार के लिए तीन प्रमुख आर्थिक रेलवे कॉरिडोर कार्यक्रमों के कार्यान्वयन की भी घोषणा की! बाद में रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा है कि मेरा उद्देश्य भारत के रेलवे नेटवर्क को जर्मनी के बराबर अपग्रेड करना है. ताकि एक्सपोर्ट का मार्केट खुल सके. हमारा ध्यान वर्ल्ड क्लास रेल पर है.

वंदे भारत बोगी स्टैंडर्ड बोगियों से समग्र वजन को कम करते हैं, जिससे सामान्य बोगियों की तुलना में तेज त्वरण और मंदी की अनुमति मिलती है. ऐसे बोगियों का निर्माण इंटीग्रल कोच फैक्ट्री, चेन्नई द्वारा किया जाता है, जिसका स्वामित्व और संचालन भारतीय रेलवे के पास है. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि सामान्य बोगियों को वंदे भारत मानकों के अनुरूप अपग्रेड करने में लगभग 15,000 करोड़ रुपये की लागत आएगी और इसे लागू करने में 5 साल लगेंगे.

इस बीच, तीन प्रमुख आर्थिक रेलवे गलियारा कार्यक्रमों का उद्देश्य रसद दक्षता में सुधार करना और लागत कम करना और ऊर्जा, खनिज, सीमेंट, बंदरगाह कनेक्टिविटी और उच्च यातायात घनत्व गलियारों पर ध्यान केंद्रित करना है. हमने ऐसे तकरीबन 450-460 प्रोजेक्ट्स की पहचान की है , जिसमें कुछ में दोहरीकरण करना है, कुछ में मल्टी ट्रैकिंग करना शामिल है. करीब-करीब 40 हजार किलोमीटर नए रेलवे ट्रैक बनेंगे. इस प्रोजेक्ट को अमृत चतुर्भुज का रूप दिया गया है, और लक्ष्य है इसे जर्मनी के नेटवर्क बराबर अपग्रेड करना!

रेलमंत्री ने कहा कि अब तक के अनुभवों में हमारे पास वंदे भारत का अनुभव है, अमृत भारत का अनुभव है. इन दोनों अनुभवों से वंदे भारत के कोच को और भी अपग्रेड करेंगे. रेलवे में कैपेसिटी बढ़ाना सबसे बड़ी जरूरत थी. ट्रेन में 700 करोड़ को ट्रैवल कर रहे हैं इसको बढ़ा कर 1000 करोड़ करना लक्ष्य है. ऐसे में तीन साल बाद वंदे भारत को एक्सपोर्ट करना शुरू करेंगे. वंदे भारत और कवच पर सरकार का मुख्य रूप से फोकस है, मसलन सुरक्षित यात्रा सरकार का केंद्र बिंदु है. केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बुलेट ट्रेन को भी 28 भूकंपमापी स‍िस्‍टम सिस्मोमीटर से लैस करने की घोषणा की है.

परिणामस्वरूप उच्च-यातायात गलियारों में भीड़भाड़ कम होने से यात्री ट्रेनों के संचालन में सुधार करने में भी मदद मिलेगी, जिसके परिणामस्वरूप सुरक्षा और उच्च यात्रा गति होगी. समर्पित माल ढुलाई गलियारों के साथ, ये तीन आर्थिक गलियारा कार्यक्रम सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि में तेजी लाएंगे और रसद लागत को कम करेंगे, रेल मंत्री वैष्णव ने कहा कि अगले 6-8 वर्षों में इन गलियारों के लिए 40,000 किमी नई पटरियां बिछाई जाएंगी और पूरे कार्यक्रम पर अनुमानित 11,000 करोड़ रुपये की लागत आएगी. वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए, रेलवे को आवंटित अनुमानित बजट चालू वित्त वर्ष 24 के लिए 2.6 लाख करोड़ रुपये के संशोधित अनुमान की तुलना में थोड़ा अधिक 2.65 लाख करोड़ रुपये है. FY25 के लिए कुल बजट आवंटन में से 13,000 करोड़ रुपये का वित्तपोषण उधार के माध्यम से किया जाएगा, जो चालू वित्तीय वर्ष के लिए 20,000 करोड़ रुपये के संशोधित अनुमान से 35 प्रतिशत की भारी कमी है. इसके अलावा, वित्त वर्ष 2015 में रेलवे की वाणिज्यिक लाइनों पर अनुमानित पूंजी परिव्यय वित्त वर्ष 2014 के 2.4 लाख करोड़ रुपये के संशोधित अनुमान की तुलना में बढ़ाकर 2.52 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है.

अंतरिम बजट के अनुसार, चालू वित्त वर्ष के लिए संशोधित अनुमान 24.3 लाख करोड़ रुपये की तुलना में रेल मंत्रालय को 25.5 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं. FY24 के लिए संशोधित अनुमान पिछले साल बजट में घोषित 24.1 लाख करोड़ रुपये से थोड़ा अधिक है. वित्त वर्ष 2015 में रेलवे की रणनीतिक लाइनों पर अनुमानित पूंजी परिव्यय भी वित्त वर्ष 2014 के 101 करोड़ रुपये के संशोधित अनुमान से बढ़कर 107 करोड़ रुपये हो गया है, जो 75 करोड़ रुपये के प्रारंभिक अनुमान से काफी अधिक है. भारत की पहली बुलेट ट्रेन के प्रोजेक्‍ट को पूरा करने का काम भी जोर शोर से क‍िया जा रहा है. बुलेट ट्रेन को सबसे पहले मुंबई-अहमदाबाद के बीच संचाल‍ित क‍िया जाएगा, ज‍िसका ट्रायल रन संभवत: 2026 में होगा!

क्या ज्ञानवापी मामला जाएगा सुप्रीम कोर्ट?

अब ज्ञानवापी मामला सुप्रीम कोर्ट भी जा सकता है! उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिला कोर्ट के आदेश के बाद ज्ञानवापी परिसर स्थित व्यासजी तहखाने का दरवाजा खोल दिया गया। 31 सालों के बाद वहां पूजा- अर्चना शुरू कर दी गई है। 4 नवंबर 1993 को तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार के आदेश पर वाराणसी प्रशासन ने व्यासजी तहखाने को सील कर दिया था। इसके बाद से लगातार मंदिर के गेट को खोलने और नियमित पूजा करने की सुविधा देने का मामला जिला कोर्ट में चल रहा था। 31 दिसंबर को वाराणसी जिला जज डॉ. अजय कृष्ण विश्वेश ने इस मामले में बड़ा फैसला देते हुए हिंदू पक्ष को पूजा का अधिकार दे दिया। व्यासजी तहखाने के रिसीवर वाराणसी डीएम को एक सप्ताह में पूजा शुरू कराने का आदेश दिया गया। इस मामले को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता डॉ. सैयद कासिम रसूल इलियास ने एक मीडिया इंटरव्यू में बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा है कि ज्ञानवापी केस को सुप्रीम कोर्ट ले जाने की तैयारी है। पूजा शुरू कराकर इस मामले में दबाव बढ़ाया जाएगा। केस को प्रभावित किए जाने की तैयारी है। यही प्लान है। डॉ. इलियास ने वाराणसी कोर्ट के फैसले के बाद प्रशासन की सक्रियता को चौंकाने वाला करार दिया। दरअसल, वाराणसी की जिला अदालत की ओर से हिंदू वादियों को ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के दक्षिणी तहखाने में प्रार्थना करने की अनुमति दी गई थी। वाराणसी प्रशासन ने इस फैसले के कुछ ही घंटों के भीतर वहां पर पूजा- पाठ शुरू करा दी। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का कहना है कि आदेश और उसके बाद की घटनाएं दुर्भाग्यपूर्ण और चौंकाने वाली हैं। एआईएमपीएलबी के प्रवक्ता और वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. सैयद कासिम रसूल इलियास ने इस मामले को बाबरी विवाद से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद मामले में 22 दिसंबर 1949 को अंदर मूर्ति स्थापित करने के बाद परिसर में ताला लगा दिया गया था। इसे 1 फरवरी 1986 को खोला गया।

फैजाबाद जिला कोर्ट ने दर्शन की अनुमति देने के लिए ताले खोलने का आदेश दिया था। उस समय भी मुस्लिम पक्ष को सुने बिना फैसला सुनाया गया था। उस समय दूरदर्शन के जरिए बड़े पैमाने पर प्रचार किया कि रामलला की पूजा की जा सकती है। कल रात ज्ञानवापी में जो हुआ वह बिल्कुल वैसा ही प्रतीत होता है। एआईएमपीएलबी के प्रवक्ता ने कहा कि बाबरी मामले में जब स्वामित्व का मुकदमा अदालत में लंबित था। उस समय भी मस्जिद के अंदर दर्शन और पूजा अर्चना शुरू की गई थी। ठीक ऐसा ही बुधवार को ज्ञानवापी में भी हुआ। कोर्ट में एक आवेदन दायर किया गया था और कोर्ट ने व्यासजी तहखाने के अंदर पूजा करने का आदेश दिया। कोर्ट ने प्रशासन को व्यवस्था करने के लिए सात दिन का समय दिया। लेकिन, देर रात तक सारी व्यवस्थाएं कर ली गईं और पूजा शुरू कर दी गई। भले मामले में सुनवाई जारी रहेगी, लेकिन यह स्थिति गलत है।

एआईएमपीएलबी के प्रवक्ता डॉ. इलियास ने कहा कि कोर्ट के आदेश से परिसर में तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है। एक वर्ग वहां पूजा के लिए जाएगा। दूसरा पक्ष मस्जिद में नमाज के लिए पहुंचेगा। इससे संघर्ष की स्थिति बन सकती है। उन्होंने कहा कि हिंदू पक्ष का यहां दावा कितना मजबूत होगा ये ईश्वर जानें। लेकिन, वर्तमान स्थिति सही नहीं है। वहां पर पूजा की इजाजत दिए जाने से पहले इस सवाल पर निर्णय लेने की जरूरत है कि क्या मस्जिद किसी और चीज के ऊपर बनाई गई है। इस सवाल का जवाब तय किए बिना वहां पर पूजा की इजाजत कैसे दी जा सकती है?

एआईएमपीएलबी के प्रवक्ता ने बाबरी मस्जिद पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि हमने बाबरी मामले में कोर्ट के आदेश को नहीं माना था। हमारी ओर से एक समीक्षा याचिका दायर की थी, लेकिन इसे खारिज कर दिया गया। उसके बाद हमारे पास कोई विकल्प नहीं बचा था। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने फैसला तो दिया, लेकिन बाबरी मामले में न्याय नहीं किया। ज्ञानवापी मामले में ऐसा फैसला हमें कैसे स्वीकार्य हो सकता है? उन्होंने कहा कि आपके पास कोई सबूत न होने के बावजूद भी आप पूजा शुरू कर देते हैं? जब तक ये मामला सुप्रीम कोर्ट में जाएगा, तब तक काफी पानी बह चुका होगा। तहखाना में पूजा जारी रहेगी और इससे केस पर असर पड़ेगा। यह एक सोची- समझी योजना है।

डॉ. इलियास ने सभी दलों पर बड़ा आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सभी विपक्षी दल अवसरवादी हैं। उन्हें डर है कि अगर वे इस मामले में कुछ भी बोलेंगे तो हिंदू उनसे नाराज हो जायेंगे। आपको इंसाफ के बारे में बोलना चाहिए। जो सही है वह कहो। मौन रहना किसी भी मुद्दे का समाधान नहीं है। विपक्षी दल कहेंगे कि वे अदालत के फैसले के खिलाफ कुछ नहीं कर सकते। लेकिन वे कम से कम तब टिप्पणी कर सकते हैं जब अदालत कोई गलत निर्णय देती है। यह कहना गलत होगा कि जो कुछ भी हो रहा है, सभी हिंदू उसका समर्थन करते हैं। मंदिर- मस्जिद विवाद पैदा किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि बात मथुरा और काशी तक ही सीमित नहीं है। लखनऊ की टीले वाली मस्जिद जैसी कई अन्य मस्जिदों पर भी दावे किए गए हैं। अगर यही सिलसिला जारी रहा तो कल मंदिरों पर भी बौद्धों की ओर से दावा किया जाएगा। हम देश को किस दिशा में ले जा रहे हैं?

प्रवक्ता ने कहा कि यह दावा भी गलत है कि 1993 तक ज्ञानवापी दक्षिणी तहखाने में प्रार्थना और पूजा की जाती थी। यह पूजा स्थल अधिनियम की भावना के भी खिलाफ है। विरोधी पक्ष को अपील दायर करने का समय दिया जाना चाहिए था। मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जाएगा। हालांकि, जब आप अंतरिम फैसले के आधार पर वहां पूजा की इजाजत दे देते हैं, तो मामले में फैसला करने के लिए क्या बचता है? सबसे पहले, मस्जिद के नीचे क्या मौजूद है, इसे अदालत में साबित किया जाना चाहिए। ऐसे फैसलों के बाद पूरा मामला ही अर्थहीन हो जाता है।

एआईएमपीएलबी के प्रवक्ता ने कहा कि अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद जिला अदालत और हाई कोर्ट में मुकदमा लड़ेगी। मामला जब सुप्रीम कोर्ट में आएगा तो एआईएमपीएलबी हस्तक्षेप करने पर विचार करेगा। अभी तक हमारी कानूनी टीम अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद से संपर्क में है। हम उन्हें कानूनी राय के साथ मदद करेंगे। इस मामले में एआईएमपीएलबी कोई पार्टी नहीं है, लेकिन बोर्ड एक पार्टी है। मामला मस्जिद से जुड़ा है। अभी यह कहना कठिन है। हमारा मानना है कि जब भी प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 को लागू किया जाएगा तो वहां ऐसी कोई बात नहीं होनी चाहिए। यह साबित हो चुका है कि ज्ञानवापी मस्जिद कई साल पुरानी है। यह दावा करना गलत है कि इसे औरंगजेब ने बनवाया था, क्योंकि रिकॉर्ड कहते हैं कि मस्जिद का निर्माण बहुत पहले हुआ था।

डॉ. इलियासी ने कहा कि इसका जीर्णोद्धार औरंगजेब के शासनकाल के दौरान ही किया गया था। इस्लाम में यह धार्मिक आदेश है कि आप किसी दूसरे की ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा करके या किसी मंदिर या किसी अन्य पूजा स्थल को तोड़कर मस्जिद नहीं बना सकते। इसलिए यह आरोप गलत है कि मुसलमानों ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई। बाबरी मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि इसका निर्माण किसी मंदिर को तोड़कर किया गया था।

आखिर कब होगा अजीत पवार गुट का फैसला?

आज हम आपको बताएंगे कि अजीत पवार गुट का फैसला आखिर कब होगा! सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी विधायकों की अयोग्यता पर फैसला लेने के लिए स्पीकर को 15 फरवरी तक का वक्त दिया है। शरद पवार गुट की तरफ से अजित पवार के साथ गए विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान स्पीकर नारवेकर की तरफ से सॉलिसिटर जनरल वकील तुषार मेहता ने कोर्ट से 3 सप्ताह का समय मांगा था, जिसके बाद कोर्ट ने उन्हें 15 दिन का समय दिया है। चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। इस दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से कहा कि विधायकों की अयोग्यता पर आदेश पारित करने के लिए 15 फरवरी तक का समय दिया जाए। इस पर कोर्ट ने कहा कि अयोग्यता पर फैसले के लिए 15 दिनों का समय दिया है। नार्वेकर ने पिछले दिनों शिवसेना के विधायकों पर अपना फैसला दिया था। जिसे उद्धव ठाकरे गुट ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। पहले सुप्रीम कोर्ट ने स्पीकर को इस मामले में फैसला करने के लिए 31 जनवरी तक का समय दिया था।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि स्पीकर राहुल नार्वेकर शिवसेना के मतभेद पर दायर अयोग्यता याचिकाओं पर फैसले लेने में व्यस्त थे, ऐसे में कोर्ट द्वारा दी गई 31 तारीख पर आदेश का पालन करना संभव नहीं हैं। ऐसे में अतरिक्त समय दिया जाए। शरद गुट के नेता और महाराष्ट्र एनसीपी के प्रमुख जयंत पाटिल ने यह याचिका दाखिल की है। पिछले साल अजित पवार बीजेपी की अगुवाई वाले महायुति सरकार में शामिल हो गए थे। अजित गुट के विधायकों की अयोग्यता का मामला जहां स्पीकर के सामने विचाराधीन है तो वहीं एनसीपी किसकी है। यह मामला चुनाव आयोग में फैसले के लिए लंबित है।

2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने 288 सदस्यों वाली विधानसभा में 53 सीटों पर जीत हासिल की थी। एनसीपी में टूट के बाद काफी विधायक अजित पवार के साथ चले गए थे। अभी अजित पवार के साथ पार्टी 41 विधायक हैं, जबकि शरद पवार के साथ सिर्फ 12 विधायक है। महाराष्ट्र की सरकार को कुल 185 विधायकों का समर्थन है, जबकि विपक्ष में सिर्फ 77 विधायक हैं। बता दें कि शिवसेना विधायकों की अयोग्यता पर स्पीकर के फैसले के बाद अब सभी की नजरें राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विधायकों की अपात्रता के मामले में टिकी हैं। अजित पवार की अगुवाई वाली एनसीपी गुट के मुख्य मुख्य सचेतक अनिल पाटिल ने शरद पवार के अध्यक्ष बनने को गैरकानूनी कहा है। पाटिल ने महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर के समक्ष एक हलफनामा प्रस्तुत किया है। इसमें कहा गया है कि शरद पवार का एनसीपी के रूप में चुनाव अध्यक्ष अवैध था। यह पार्टी संविधान के अनुरूप नहीं था। नार्वेकर इन दिनों एनसीपी के प्रतिद्वंद्वी गुटों द्वारा दायर अयोग्यता याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे हैं। राहुल नार्वेकर ने अगली सुनवाई के लिए 23 जनवरी की तारीख तय की है।

जलगांव से राकांपा विधायक अनिल पाटिल एकनाथ शिंदे सरकार में राहत एवं पुनर्वास मंत्री हैं। पाटिल ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए शरद पवार गुट के 10 विधायकों को अयोग्य घोषित करने के लिए स्पीकर के समक्ष अलग-अलग याचिकाएं दायर की हैं, जबकि शरद पवार गुट के राज्य राकांपा अध्यक्ष जयंत पाटिल ने विरोधी गतिविधियों के लिए अजीत पवार के नेतृत्व वाले विधायकों को अयोग्य घोषित करने के लिए 40 याचिकाएं दायर की हैं। अजित गुट के मुख्य सचेतक पाटिल ने हलफनामे में कहा है कि पार्टी को शरद पवार द्वारा चलाया और प्रशासित किया जा रहा था। यह पार्टी के संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन है। हलफनामें में कहा गया है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए शरद पवार का दावा भी एक कथित चुनाव पर आधारित है, जो कभी आयोजित नहीं किया गया था, तो वहीं दूसरी तरफ शरद पवार समूह का आरोप है कि चुनाव हुआ था।

पाटिल ने आरोप लगाया कि पार्टी संगठन को तानाशाही तरीके से चलाया जा रहा है, जहां शरद पवार पार्टी के मामलों को अपनी सनक और इच्छा के अनुसार चलाते हैं और पार्टी में किसी अन्य नेता को पार्टी के मामलों में कुछ भी कहने की अनुमति नहीं है। इसके अलावा, पाटिल ने कहा कि राज्य अध्यक्षों और राष्ट्रीय समिति और कार्यसमिति सहित सभी समितियों का चुनाव होना था, लेकिन शरद पवार ने वास्तव में अपनी कथित क्षमता में सभी राज्य अध्यक्षों को अध्यक्ष के रूप में नामित किया है। अनिल पाटिल ने दावा किया है रेकॉर्ड के अनुसार पिछले साल 30 जून को अजित पवार पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए थे। इस सबंध में चुनाव आयोग को भी सूचित किया गया था। सुप्रीम कोर्ट शिवसेना के मामले की तरफ इस मामले में भी स्पीकर से अयोग्यता की याचिकाओं पर फैसला लेने को कहा है।

इस बार के बजट पर क्या बोले शशि थरूर?

आज हम आपको बताएंगे कि इस बार के बजट पर कांग्रेस नेता शशि थरूर ने क्या बयान दिया है! कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे पहले से तय होने के भारतीय जनता पार्टी के दावे को खारिज करते हुए गुरुवार को कहा कि पिक्चर अभी बाकी है और अंतरिम बजट मोदी सरकार का अंतिम बजट लगता है। थरूर ने जीडीपी को गवर्नेंस, डेवलपमेंट और परफॉर्मेंस बताने के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की आलोचना भी की और कहा कि इस व्यवस्था के तहत जी का मतलब गवर्नमेंटल इंट्रूजन एंड टैक्स टेररिज्म , डी का मतलब डेमोग्रेफिक बिट्रेयल और पी का मतलब पावर्टी एंड राइजिंग इनिक्वालिटी है। थरूर ने अंतरिम केंद्रीय बजट को निराशाजनक करार देते हुए कहा कि बेरोजगारी की बात वित्त मंत्री के भाषण से पूरी तरह गायब थी। उन्होंने दावा किया कि आम आदमी के जीवन में सुधार के मामले में सरकार को एफ ग्रेड फेल मिलता है। थरूर ने कहा, मुद्रास्फीति, विशेष रूप से खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि इतनी चौंकाने वाली है कि नीचे की 20 प्रतिशत आबादी बाजार में उन्हें खरीदने में असमर्थ है, जबकि वे एक या दो साल पहले खरीद सकते थे।

यह आम भारतीय के जीवन की वास्तविकता है, यही कारण है कि सरकार चाहती है कि लोग राम मंदिर के लिए गर्व करते हुए वोट करें या बालाकोट, पुलवामा की घटना को लेकर पाकिस्तान पर कथित प्रहार के लिए गर्व के आधार पर वोट दें। पूर्व केंद्रीय मंत्री का कहना था कि भाजपा को 2019 में इसी तरह सफलता मिली थी। उन्होंने कहा, इस बार राम मंदिर मुद्दा बनने जा रहा है और इसमें कोई संदेह नहीं है कि अबू धाबी मंदिर को जोड़ा जााएगा। स्पष्ट रूप से सरकारें ऐसा करने के लिए नहीं चुनी जाती हैं, सरकारें आम लोगों के जीवन में सुधार के लिए चुनी जाती हैं। क्या इस सरकार ने ऐसा किया? मैं कहूंगा कि उस विशेष मानदंड पर वह सरकार पूरी तरह विफल है।

यही नहीं तृणमूल कांग्रेस टीएमसी ने अंतरिम बजट को लोकसभा चुनाव से पहले ‘चुनावी शिगूफा’ करार दिया। टीएमसी ने बीजेपी से राजनीतिक नौटंकी बंद करने और मानव कल्याण को प्राथमिकता देने का आग्रह किया। टीएमसी की वरिष्ठ नेता और पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य ने किसानों की आत्महत्याओं का जिक्र करते हुए केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी की निंदा की। भट्टाचार्य ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में प्रतिदिन औसतन 30 किसान आत्महत्या करते हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, बजट में अन्नदाता के कल्याण के लिए आपका दावा पिछले पांच सालों में 53,478 किसानों की आत्महत्या का मजाक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिखावा बंद करें और राजनीति के बजाय जीवन को प्राथमिकता दें।

सूर्योदय योजना पर चर्चा के दौरान सीतारमण की ओर से अयोध्या में राम मंदिर के संदर्भ का हवाला देने पर भट्टाचार्य ने केंद्र सरकार पर लोगों का ध्रुवीकरण करने का प्रयास करने का आरोप लगाया। टीएमसी भवन में संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए भट्टाचार्य ने कहा कि हमने हमेशा कहा है कि मंदिर, मस्जिद और चर्च हो सकते हैं लेकिन जब आप बजट के दौरान मंदिर का उल्लेख करती हैं, तो यह स्पष्ट है कि आप इसे राजनीतिक एजेंडे के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं। सीतारमण ने कहा कि प्रधानमंत्री सूर्योदय योजना से एक करोड़ परिवारों को हर महीने 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली मिलेगी और उन्हें सालाना 18,000 रुपये तक की बचत करने में मदद मिलेगी। केंद्रीय वित्त मंत्री ने कहा कि यह योजना अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के ऐतिहासिक दिन पर लिए गए प्रधानमंत्री के संकल्प को पूरा करती है।

भट्टाचार्य ने कहा कि बजट में लोगों को मूर्ख बनाने के लिए झूठ और प्रहसन के अलावा कुछ भी नहीं है। उन्होंने कहा कि यह बजट और इसकी घोषणाएं चुनावी शिगूफा के अलावा कुछ नहीं हैं। इस बजट में आम लोगों को देने के लिए कुछ भी नहीं है। केंद्र को जवाब देना चाहिए कि उसने राज्य का वित्तीय बकाया क्यों रोक रखा है। भट्टाचार्य ने कहा कि बजट में युवाओं की चिंताओं को दूर करने और महंगाई से निपटने पर ध्यान नहीं दिया गया है। उन्होंने कहा कि वित्त मंत्री ने दावा किया कि महंगाई दर मध्यम है, लेकिन खाद्य महंगाई दरों पर करीब से नजर डालने पर एक अलग कहानी सामने आती है। प्रधानमंत्री मोदी ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए अंतरिम आम बजट को ‘ऐतिहासिक, समावेशी और नवोन्मेषी’ करार दिया तथा कहा कि यह बजट 2047 के ‘विकसित भारत’ की नींव को मजबूत करने की गारंटी है।

रेलवे के लिए कैसा रहा इस बार का बजट?

इस बार का बजट रेलवे के लिए भी काफी खास रहा है! इस साल के अंतरिम बजट में रेलवे पर विशेष ध्यान दिया गया है। विशेष ध्यान इसलिए क्योंकि इस साल पिछले साल के मुकाबले 15 हजार करोड़ रुपये ज्यादा आवंटित किए गए हैं। इस साल रेलवे को दो लाख 55 हजार करोड़ रुपये की सौगात मिली है। इस रकम से रेलवे के तीन नए कॉरिडोर और 40 हजार पुराने डिब्बों को वंदे भारत ट्रेन के सुविधाजनक कोच में बदला जाएगा। आइए समझिए कहां और कितना आवंटन बढ़ा है। अंतरिम बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने घोषणा की है कि देश में तीन मेजर इकॉनमिक रेलवे कॉरिडोर बनाए जाएंगे। इनमें से एक कॉरिडोर, एनर्जी, मिनरल और सीमेंट का होगा। दूसरा, पोर्ट कनेक्टिविटी कॉरिडोर और तीसरा, हाई स्पीड डेंसिटी कॉरिडोर। इस प्रोजेक्ट को पीएम गतिशक्ति योजना में मल्टि मॉडल कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट के तहत आगे बढ़ाया जाएगा। इससे ना केवल लॉजिस्टिक्स क्षमता बढ़ेगी, बल्कि लागत में भी कमी आएगी।

इकॉनमिक कॉरिडोर बनने से आम जनता को भी फायदा होगा। अभी एक ही रेलवे लाइन पर पैसेंजर ट्रेन और गुड्स ट्रेन का ऑपरेशन होता है। रेलवे की आमदनी का मुख्य जरिया माल गाड़ी है जबकि पैसेंजर ट्रेन में देश के माननीय चलते है। इसलिए दोनों को समय से चलाना जरूरी है। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है। इसलिए रेलवे ने डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर बना कर माल गाड़ी के ऑपरेशन को बेहतर किया। अब तीन इकॉनमिक कॉरिडोर बनाने की बात है। इससे जिन रेल रूट पर ट्रेनों का बहुत अधिक ट्रैफिक है। वहां पर ट्रैफिक लोड कम होगा, जिससे यात्री ट्रेनों की संख्या और स्पीड बढ़ने में भी मदद मिलेगी। ट्रेनों की संख्या बढ़ने से यात्रियों का सफ़र सुहाना होगा। और अधिक यात्री सफर कर सकेंगे। माना जा हरा है कि इन तीनों कॉरिडोर से देश की जीडीपी ग्रोथ बढ़ेगी और लॉजिस्टिक कॉस्ट कम होगी।

रेलवे के रिटायर्ड मेंबर ट्रैफिक श्री प्रकाश का कहना है कि तीन नए आर्थिक कॉरिडोर बनने से कई तरह के फायदे सामने आएंगे। इसमें जब माल ढुलाई के लिए अलग-अलग स्तर पर तीन कॉरिडोर देश को और मिल जाएंगे, तब दूसरी तरफ इसका बड़ा फायदा यात्री ट्रेनों की संख्या और स्पीड बढ़ने के रूप में भी मिलेगा। जब गाड़ियों को रास्ता मिलेगा तो गाड़ियां समय से चलाने में मदद मिलेगी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ट्रेनों के 40 हजार सामान्य कोच को वंदे भारत ट्रेनों के मानकों जैसा कन्वर्ट करने की घोषणा की है। इससे ज़ाहिर है कि यात्रियों की सुविधा का ख्याल किया जा रहा है। एक्सपर्ट का कहना है कि आने वाले समय में ट्रेनों से सफर करने वाले यात्रियों और माल ढुलाई के लिए रेलवे ट्रेनों की संख्या बढ़ाने और हाई स्पीड ट्रैक बिछाने के साथ ही यात्रियों को और अधिक सुविधाएं मिलेंगी। इससे ट्रेनों में टिकटों के लिए होने वाली मारा-मारी भविष्य में पूरी तरह से खत्म नहीं भी होगी तो काफी हद तक कम ज़रूर होगी। साथ ही देश में आने वाले समय में वंदे भारत ट्रेनों की अधिक से अधिक सेवाएं ली जाएंगी।

साल 2021 का बजट रेलवे के लिए ऐतिहासिक था। उस साल पहली बार रेलवे को बजट से एक लाख करोड़ से अधिक रकम आवंटित की गई थी। इसके बाद से हर साल लगातार रेलवे का बजट आवंटन एक लाख करोड़ रुपये से अधिक ही रहा है। साल 2022 के बजट में यह बढ़ कर एक लाख 40 हजार करोड़ हुआ तो 2023 में यह दो लाख 40 हजार करोड़ रहा। इस बार रेलवे को दो लाख 55 हजार करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जोकि 15 हज़ार करोड़ रुपये अधिक हैं।

केंद्र सरकार ने दिल्ली में रेलवे के विकास के लिए 2577 करोड़ रुपये का बजट दिया है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव का कहना है कि दिल्ली में रेलवे को पहले की सरकार की तुलना में 25 गुना ज्यादा फंड दिया गया है। मंत्री का कहना है कि यूपीए सरकार के दौरान 2009-14 के बीच औसतन केवल 96 करोड़ का बजट था, इसमें अब बहुत बड़ा इजाफा किया गया है, ताकि रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर में तेजी से विकास किया जा सके। जानकारी के अनुसार बजट में दिल्ली के आनंद विहार टर्मिनल के विस्तार की घोषणा की गई है। इसके अलावा दिल्ली से अलवर के बीच 104 किलोमीटर की नई रेल लाइन बिछाई जाएगी। दिल्ली-सहारनपुर बाईपास के बीच 175 किलोमीटर का ट्रैक बिछाया जाएगा। इसके अलावा नई दिल्ली से तिलक ब्रिज के बीच पांचवी और छठी लाइन बिछाई जाएगी। यह लाइन 2.65 किलोमीटर की होगी। दिल्ली सब्जी मंडी और दिल्ली मेन के बीच अतिरिक्त लाइन बिछाए जाने की भी योजना है।

रेलवे ने इस बार मुंबई में यात्री सुविधाओं को बढ़ावा देने के साथ ही मौजूदा रेल ओवर ब्रिज का काम पूरा करने के लिए ठीकठाक राशि का प्रस्ताव दिया है। पश्चिम रेलवे को सड़क सुरक्षा के लिए 1196 करोड़ रुपये का बजट में प्रस्ताव है। इसमें से प्रभादेवी, दादर और विरार-वैतरणा रोड ओवरब्रिज को दोबारा बनाया जाना है। मध्य रेलवे को सड़क सुरक्षा के लिए 756 करोड़ राशि का बजट में प्रस्ताव है। इसमें विक्रोली और दिवा रेल ओवर ब्रिज और दिवा-वसई, दिवा-पनवेल लाइन पर आरओबी का प्रस्ताव है। यात्री सुविधाओं के लिए बजट में पश्चिम रेलवे के लिए 1135 करोड़ और मध्य रेलवे के लिए 1022 करोड़ रुपये का प्रस्ताव है। इनमें स्टेशनों पर एस्केलेटर्स, लिफ्टस, प्लैटफॉर्म रूफ और फुटओवर ब्रिज के काम होने हैं। बजट में महाराष्ट्र की रेलवे परियोजनाओं के लिए करीब 15,500 करोड़ रुपये का प्रस्ताव है।

क्या अब लोन की किश्त भी घटने वाली है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब लोन की किस्त भी घटने वाली है या नहीं! अंतरिम बजट में फिस्कल डेफिसिट, सरकारी उधारी और कैपिटल एक्सपेंडिचर के मोर्चे पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जो बातें सामने रखी हैं, उनसे रुपये और इंफ्रास्ट्रक्चर को जरूरी सपोर्ट मिलने के साथ ब्याज दरों में कमी की राह भी बन सकती है। सीतारमण ने अगले वित्त वर्ष में फिस्कल डेफिसिट को जीडीपी के 5.1 प्रतिशत तक रखने की बात की और कहा कि मौजूदा वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा 5.9 प्रतिशत के बजाय 5.8 पर रहने का अनुमान है। उन्होंने कहा कि सरकारी उधारी मौजूदा के मुकाबले अगले वित्त वर्ष में कम होगी जिससे प्राइवेट इनवेस्टमेंट बढ़ाने में मदद मिलेगी। मौजूदा वित्त वर्ष में 17 लाख 34 हजार 773 करोड़ रुपये के रिवाइज्ड एस्टिमेट के मुकाबले अगले वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा 16 लाख 85 हजार 494 करोड़ रुपये तक रखने का लक्ष्य दिया गया है। राजस्व के मिलने और खर्च के अंतर यानी फिस्कल डेफिसिट के इंतजाम के लिए सरकार बॉन्ड जारी कर बाजार से उधार लेती है। सीतारमण ने कहा, ‘2024-25 में ग्रॉस मार्केट बॉरोइंग्स 14.13 लाख करोड़ और नेट मार्केट बॉरोइंग्स 11.75 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है। ये दोनों ही मौजूदा वित्त वर्ष से कम होंगी।’

रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के चीफ इकनॉमिस्ट डीके जोशी ने कहा, ‘जेपी मॉर्गन इंडेक्स में इंडिया बॉन्ड्स के शामिल होने के साथ ग्लोबल इकॉनमी के साथ हमारा इंटीग्रेशन बढ़ रहा है। हमारे फिस्कल एकाउंट्स पर दुनिया का ध्यान बढ़ रहा है। ऐसे में फिस्कल डेफिसिट घटाना अच्छी बात है। इससे सरकारी उधारी कम होने से इंटरेस्ट रेट घटने का चांस बढ़ गया है। निवेशकों के लिए काम की बात यह है कि जब भी ब्याज दरें घटेंगी, लॉन्ग ड्यूरेशन बॉन्ड्स पर मार्क टु मार्केट फायदा हो सकता है। अनुमान यही है कि इंटरेस्ट रेट घटने पर सात-साढ़े सात पर्सेंट वाला 10 साल का सरकारी बॉन्ड अगले एक साल में आपको 12-13 पर्सेंट का मार्क टु मार्केट प्रॉफिट दे सकता है।‘ कम फिस्कल डेफिसिट वाला बजट होने से महंगाई बढ़ने का चांस भी घटता है। ऐसा बजट आरबीआई का काम आसान कर देता है। तीसरी बात यह है कि प्राइवेट सेक्टर ही नहीं, बल्कि सरकार के लिए भी उधार जुटाने की लागत घट जाती है। बॉन्ड यील्ड घटने से इसका पता चलता है।’ सरकार ने आरबीआई को जिम्मा दिया है कि महंगाई दर को 2 से 6 प्रतिशत के बीच रखा जाए। अभी रेपो रेट 6.5 प्रतिशत पर है। महंगाई घटने पर आरबीआई रेपो रेट घटा सकता है।

सक्षम वेल्थ प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर समीर रस्तोगी ने कहा, ‘फिस्कल डेफिसिट घटना मैक्रो फंडामेंटल्स के लिए अच्छी बात है। इससे रुपये को भी सपोर्ट मिलेगा। यह बॉन्ड मार्केट के लिए तो अच्छा है ही, आने वाले दिनों में इक्विटी मार्केट्स को भी इससे फायदा होगा। सरकारी उधारी कम होने से इंटरेस्ट रेट घटने का चांस बढ़ गया है। निवेशकों के लिए काम की बात यह है कि जब भी ब्याज दरें घटेंगी, लॉन्ग ड्यूरेशन बॉन्ड्स पर मार्क टु मार्केट फायदा हो सकता है। अनुमान यही है कि इंटरेस्ट रेट घटने पर सात-साढ़े सात पर्सेंट वाला 10 साल का सरकारी बॉन्ड अगले एक साल में आपको 12-13 पर्सेंट का मार्क टु मार्केट प्रॉफिट दे सकता है।‘

वित्त मंत्री ने FY25 के लिए कैपिटल एक्सपेंडिचर 11 प्रतिशत बढ़ाकर 11.11 लाख करोड़ रुपये करने का ऐलान किया। हालांकि रिवाइज्ड एस्टिमेट के मुताबिक, मौजूदा वित्त वर्ष के लिए कैपेक्स 9.5 लाख करोड़ होगा, जो बजट एस्टिमेट से 50 हजार करोड़ रुपये कम है। बैंक ऑफ बड़ौदा के चीफ इकनॉमिस्ट मदन सबनवीस ने कहा, ‘फिस्कल डेफिसिट का 5.1 पर्सेंट का टारगेट व्यावहारिक है। बता दें कि मौजूदा वित्त वर्ष में 17 लाख 34 हजार 773 करोड़ रुपये के रिवाइज्ड एस्टिमेट के मुकाबले अगले वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा 16 लाख 85 हजार 494 करोड़ रुपये तक रखने का लक्ष्य दिया गया है। राजस्व के मिलने और खर्च के अंतर यानी फिस्कल डेफिसिट के इंतजाम के लिए सरकार बॉन्ड जारी कर बाजार से उधार लेती है। सीतारमण ने कहा, ‘2024-25 में ग्रॉस मार्केट बॉरोइंग्स 14.13 लाख करोड़ और नेट मार्केट बॉरोइंग्स 11.75 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है। ये दोनों ही मौजूदा वित्त वर्ष से कम होंगी।’ सरकार के पास जितनी राजकोषीय गुंजाइश है, उसमें से कैपेक्स के लिए पर्याप्त इंतजाम किया गया है। यह अडिशनल टोटल आउटले के करीब 40 प्रतिशत है। इंफ्रा पर खर्च बढ़ने से स्टील, सीमेंट और कैपिटल गुड्स इंडस्ट्रीज पर पॉजिटिव इफेक्ट दिखेगा। प्राइवेट सेक्टर इनवेस्टमेंट बढ़ाएगा। राज्यों को केंद्र से करीब 1.3 लाख करोड़ रुपये मिलेंगे। इससे उनकी ओर से भी खर्च बढ़ने की संभावना है।’

क्या लोकसभा चुनाव जीतने का है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आत्मविश्वास?

लोकसभा चुनाव जीतने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आत्मविश्वास है! कल के बजट में एक बाद कॉमन थी। बजट सत्र से पहले पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा था कि उनकी सरकार ही पूर्ण बजट पेश करेगी। दूसरी तरफ बजट भाषण में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जोर देकर कहा कि जब जुलाई हमारी सरकार पूर्ण बजट पेश करेगी तो विकासित भारत का विस्तृत रोडमैप पेश किया जाएगा। यही नहीं, अंतरिम बजट में मोदी सरकार ने कोई लोकलुभावन घोषणा भी नहीं की। तो बड़ा सवाल है कि आखिर केंद्र की भारतीय जनता पार्टी बीजेपी, जिसे कुछ ही दिनों में आम चुनाव में जाना है, इतना भरोसे में कैसे है? दरअसल, इस भरोसा के पीछे तमाम वजहें हैं लेकिन एक जो सबसे अहम है वो है बिखरा विपक्ष। इसके अलावा सरकार के तमाम वो सुधार जिससे उसे भरोसा है कि देश की जनता लगातार तीसरी बार उसे ही चुनेगी। पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी दोनों ही 2024 के चुनाव के लिए मजबूत दावे कर रहे हैं। इसके पीछे जो सबसे कारण है वो है राम मंदिर का निर्माण। भगवा दल का सबसे अहम चुनावी मुद्दा 22 जनवरी को अयोध्या में पूरा हो चुका है। खुद पीएम मोदी मुख्य यजमान बनकर राम मंदिर में बाल राम की प्राण प्रतिष्ठा कर चुके हैं। राम के लहर पर बीजेपी उत्तर भारत में विपक्ष पर बड़ी बढ़त की तैयारी में है। पार्टी इसके लिए कोशिश भी शुरू कर चुकी है। कई राज्यों से आम लोगों को राम मंदिर के दर्शन के लिए लाया जा रहा है। विपक्ष भी दबी जुबान में ये मान रहा है कि भगवा दल को इसका फायदा हो सकता है।

पीएम मोदी का सामना करने के लिए इंडिया गठबंधन बनाया गया था। लेकिन चुनाव आते-आते इसके मुख्य कर्ता-धर्ता ही बीजेपी में शामिल हो गए। बिहार में नीतीश के बीजेपी में शामिल होने के बाद राज्य में भगवा दल को बढ़त हासिल हो गई है। दूसरी तरफ ममता बनर्जी ने भी कांग्रेस का हाथ बंगाल में छोड़ दिया है। यानी एक वक्त जो लग रहा था कि इसबार पीएम मोदी को तगड़ी टक्कर मिल सकती है। उसकी सूरत फिलहाल तो नजर नहीं आ रही है। यही नहीं, विपक्ष तो अभी कई राज्यों में सीट शेयरिंग पर भी अटका है। दूसरी तरफ बीजेपी को कुछ राज्यों में छोड़ दें ज्यादातर जगहों पर अकेले ही लड़ना है। ऐसे में कमजोर और बिखरे विपक्ष के कारण उसे ज्यादा परेशानी नहीं होगी।

इसके अलावा बीजेपी को राम मंदिर निर्माण का बड़ा फायदा मिलने वाला है। पार्टी के घोषणापत्र में हर बार राम मंदिर का मुद्दा रहता था। विपक्ष तो बीजेपी एक समय तंज कसता था कि मंदिर वही बनाएंगे लेकिन तारीख नहीं बताएंगे। अब 22 जनवरी को राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद बीजेपी काफी जोश में है। पार्टी को इसका फायदा पूरे उत्तर भारत में मिलने की उम्मीद है। पार्टी इसके अलावा आर्टिकल 370 का भी जमकर जिक्र करती है। यानी राम के जरिए भगवा दल को जीत की आस दिख गई है। शायद इसीलिए बजट में को लोकलुभावन योजना भी नहीं दिखी।

पीएम नरेंद्र मोदी अपने लगभग हर कार्यक्रम और सभा में इसका जिक्र जरूर करते हैं। कोरोना के काल से 80 करोड़ों लोगों को केंद्र सरकार मुफ्त अनाज मुहैया करा रही है। यही लाभार्थी हैं जो बीजेपी के कोर वोटर भी बन गए हैं। इसी की बदौलत बीजेपी ने कई राज्यों में चुनावी बिसात बिछाई और उसे कामयाबी भी मिली। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी अपने बजट भाषण में इसका जिक्र किया था। बीजेपी ऐसे लाभार्थियों के जरिए मजबूती के साथ आगे बढ़ने का तरीका ढूंढ चुकी है।

पीएम मोदी सरकारी योजनाओं को लागू करने में बिचौलियों के नहीं रहने की बात अक्सर करते हैं। यानी सरकारी लाभ सीधे जरूरतमंदों के खाते में जाता है। बिचौलिया गायब। चाहे किसान सम्मान निधि की बात हो या अन्य मदों में डायरेक्ट ट्रांसफर। सरकार अपने बेहतर गर्वनेंस मॉडल के जरिए भ्रष्टाचार रोकने का दावा करती है। इसके अलावा बीजेपी भाई-भतीजावाद से खुद को दूर रखने का वादा करती है। पार्टी सामाजिक न्याय के जरिए जीत का रास्ता सुनिश्चित करने के लिए जोर लगा रही है। निर्मला ने अपने बजट भाषण में कहा कि हमारे शासन में पारदर्शिता है, इस बात का भरोसा है कि पात्र लोगों तक फायदे पहुंचाए जा रहे हैं। संसाधनों का उचित वितरण होता है। समाज में चाहे किसी का भी दर्जा हो, सभी को अवसर मिलते हैं। हम व्यवस्थागत असमानताओं को दूर कर रहे हैं… हम केवल खर्च पर ध्यान नहीं देते, बल्कि परिणामों पर जोर देते हैं, ताकि सामाजिक-आर्थिक बदलाव लाया जा सके।

पीएम मोदी ने ओबीसी जाति जनगणना की काट ढूंढने के लिए चार जातियों का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था गरीब, महिलाएं, युवा और किसान उनके चार जातियां हैं। इस बार के बजट में भी इन चारों जातियों के लिए निर्मला ने कुछ न कुछ जरूर दिया है। यानी बीजेपी ने 2024 के लिए अपने वोटर वाला लक्ष्य भी तय कर लिया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इन सभी समूहों की जरूरतों, आकांक्षाओं और कल्याण को पूरा करना सरकार की “सर्वोच्च प्राथमिकता” बताई। उन्होंने कहा कि जब वे आगे बढ़ते हैं तो देश आगे बढ़ता है। इन चारों वर्गों को अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए सरकार के समर्थन की आवश्यकता होती है और वो प्राप्त भी करते हैं।

जुलाई में पेश करेंगे पूर्ण बजट के पीछे पीएम मोदी के भरोसे के कुछ कारण तो आप जान ही गए हैं। इसके अलावा भी बीजेपी अन्य कल्याणकारी योजनाओं के जरिए जीत का मार्ग प्रशस्त करने की कोशिश में लग गई है। बीजेपी के लिए चुनाव का सबसे बड़ा चेहरा पीएम मोदी हैं। वो कुछ दिनों में पूरी तरह से चुनावी माहौल में खुद उतर जाएंगे। ऐसे में बिखरा विपक्ष और पीएम मोदी की छवि के बीच टक्कर होगी। जनता इन्हीं में से किसी एक चुनेगी।

क्या जनसंख्या नियंत्रण बन सकता है महत्वपूर्ण मुद्दा?

अब जनसंख्या नियंत्रण महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकता है! गुरुवार को पेश अंतरिम बजट की सबसे अहम बातों में एक रहा जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में सरकार का अब निर्णायक पहल करने का संकेत। वित्त मंत्री निर्मला ने कहा कि सरकार जनसंख्या वृद्धि और डेमोग्राफिक चेंज से पैदा होने वाली चुनौतियों से निबटने के लिए एक कमिटी का गठन करेगी। उन्होंने कहा कि समिति को ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य के संबंध में इन चुनौतियों से व्यापक रूप से निपटने के लिए सिफारिशें करने का काम सौंपा जाएगा। इसका साफ संदेश गया कि अगर मोदी सरकार तीसरे टर्म में आती है तो उनके अजेंडे में यह एक सबसे अहम बात होगी। ऐसा नहीं है कि वित्त मंत्री ने अचानक बजट में इस बारे में संकेत दिया। पिछले दिनों पीएम नरेन्द्र मोदी खुद इस दिशा में बोल चुके हैं। उन्होंने पिछले दिनों जनसंख्या नियंत्रण बजट की बात को सार्वजनिक बहस का मुद्दा बनाने की पहल की। पीएम मोदी ने लाल किले से कहा था कि हमारे यहां जो जनसंख्या विस्फोट हो रहा है, ये आने वाली पीढ़ी के लिए संकट पैदा करता है। सबसे पहले जनसंख्या के आंकड़ों को पेश करना होगा जिससे इस पहल को जस्टिफाय किया जा सके। 2011 के बाद देश में जनगणना नहीं हुई है। तब के आंकड़े ने संकेत दिया था कि देश में आबादी के बढ़ने की दर में कमी आई है। यह ट्रेंड हर धर्मों में समान रूप से दिखा था। उसमें यह बात सामने आई थी कि जनसंख्या वृद्धि का सीधा संबंध गरीबी और अशिक्षा से है। पूर्व में तमाम सरकारों ने इस मोर्चे पर पहले करने की इच्छा जरूर दिखाई, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी।पीएम ने जनसंख्या विस्फोट को सबसे बड़ा चिंताजनक ट्रेंड बताते हुए छोटे परिवार की परिकल्पना को देशभक्ति से जोड़ा था। दरअसल जनसंख्या नियंत्रण बीजेपी और संघ दोनों के लिए सबसे अहम एजेंडा रहा है। सरकार और पार्टी के अंदर मानना है कि राम मंदिर, धारा 370 सहित कई अहम मुद्दे सुलझ गए हैं। इसके बाद 2024 में अगर सत्ता में आती है तो जनसंख्या नियंत्रण का काम आगे लाया जाएगा।इस दिशा में बेहतर कानून के विकल्प तलाशने को कहा था। अब बजट में वित्त मंत्री ने एक कमिटी गठन का प्रस्ताव देकर ठोस संकेत दे दिया कि इस संवदेनशील मसले पर सरकार निर्णायक तरीके से आगे बढ़ने को तैयार है।

दरअसल पिछले तीन दशक से जनसंख्या नियंत्रण के लिए क्या-क्या प्रभावी कदम उठाए जा सकते हैं इस बार बहस जारी है। 1991 में सीनियर कांग्रेस नेता के करुणाकरण के नेतृत्व में एक कमिटी ने जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में जो सुझाव दिए थे उसमें जनप्रतिनिधियों के लिए यह शर्त अनिवार्य रूप से लागू करने को कहा गया था कि उनके दो से अधिक बच्चे नहीं हों। लेकिन वह प्रस्ताव लागू नहीं हो सका। हालांकि टुकड़ों-टुकड़ों में कुछ राज्यों ने पंचायत स्तर पर इसकी कोशिश जरूर की। उसी रिपोर्ट से इनपुट लेते हुए मोदी सरकार ने भी पिछले दिनों कानून मंत्रालय को इस दिशा में बेहतर कानून के विकल्प तलाशने को कहा था। अब बजट में वित्त मंत्री ने एक कमिटी गठन का प्रस्ताव देकर ठोस संकेत दे दिया कि इस संवदेनशील मसले पर सरकार निर्णायक तरीके से आगे बढ़ने को तैयार है।

जनसंख्या नियंत्रण पर हालांकि आगे बढ़ने की बात जरूर की गई है, लेकिन आगे का रास्ता सहज नहीं है। सबसे पहले जनसंख्या के आंकड़ों को पेश करना होगा जिससे इस पहल को जस्टिफाय किया जा सके। 2011 के बाद देश में जनगणना नहीं हुई है। तब के आंकड़े ने संकेत दिया था कि देश में आबादी के बढ़ने की दर में कमी आई है। यह ट्रेंड हर धर्मों में समान रूप से दिखा था। उसमें यह बात सामने आई थी कि जनसंख्या वृद्धि का सीधा संबंध गरीबी और अशिक्षा से है। पूर्व में तमाम सरकारों ने इस मोर्चे पर पहले करने की इच्छा जरूर दिखाई, बता दे कि पिछले तीन दशक से जनसंख्या नियंत्रण के लिए क्या-क्या प्रभावी कदम उठाए जा सकते हैं इस बार बहस जारी है। 1991 में सीनियर कांग्रेस नेता के करुणाकरण के नेतृत्व में एक कमिटी ने जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में जो सुझाव दिए थे उसमें जनप्रतिनिधियों के लिए यह शर्त अनिवार्य रूप से लागू करने को कहा गया था कि उनके दो से अधिक बच्चे नहीं हों। लेकिन वह प्रस्ताव लागू नहीं हो सका। हालांकि टुकड़ों-टुकड़ों में कुछ राज्यों ने पंचायत स्तर पर इसकी कोशिश जरूर की। लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी। साथ ही यह ऐसा संवेदनशील मामला है जहां कोई सरकार सीधे कानून बनाकर आगे बढ़ना नहीं चाहेगी।

वित्त मंत्री के बजट को पूरा समझिए!

आज हम आपको वित्त मंत्री के बजट को पूरा समझने वाले हैं! वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पहले ही कह दिया था, माफ करना- अंतरिम बजट में कोई धमाका नहीं होगा, बस सरकार आमदनी-खर्च का हिसाब दे देगी। वह अपनी बात पर कायम रहीं। बजट में कोई फुलझड़ी नहीं थी लेकिन आप इसे उनकी आलोचना मत समझिए, यह तो उनकी प्रशंसा है। निर्मला के अंतरिम बजट से अर्थशास्त्री झूम उठे हैं। उन्होंने इसमें रेवड़ियां नहीं बांटीं और राजकोषीय घाटे में कमी का वादा किया। राजकोषीय घाटे का मतलब है, सरकार की आमदनी से अधिक खर्च। निर्मला ने बताया कि वित्त वर्ष 2024 में यह घाटा GDP का 5.8 प्रतिशत रहा, जबकि पिछले बजट में इसके लिए 5.9 प्रतिशत का अनुमान रखा गया था। सरकार ऐसा इसलिए कर पाई क्योंकि उसे अच्छी आमदनी हुई। उन्होंने बताया कि वित्त वर्ष 2025 में यह 5.1 प्रतिशत रहेगा और उससे अगले साल 4.5 प्रतिशत। कोरोना महामारी, यूक्रेन युद्ध और अल निनो जैसी चुनौतियों के बीच यह बात खास मायने रखती है। कुछ आलोचक कह सकते हैं कि राजस्व घाटा तो वित्त वर्ष 2024 में GDP का 2.8 प्रतिशत रहा, जिसे कभी खत्म करने की बात कही गई थी और अगले वित्त वर्ष में भी यह 2 प्रतिशत रहने वाला है। कुछ अर्थशास्त्री यह भी कहेंगे कि सरकारी खजाने की सेहत तभी अच्छी मानी जाती है, जब प्राथमिक घाटा खत्म हो जाए। राजकोषीय घाटे में से सरकार की ब्याज देनदारी निकालने बाद जो रकम बचती है, उसे प्राथमिक घाटा कहते हैं। प्राथमिक घाटा शून्य हो तो उसका मतलब है कि सरकार जो भी उधार ले रही है, वह उससे निवेश करेगी। वित्त वर्ष 2024 में प्राथमिक घाटा 2.3 प्रतिशत रहा, लेकिन अगले साल इसके 1.5 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। शायद यह आने वाले वर्षों में खत्म हो जाए।

सवाल यह भी है कि राजकोषीय घाटे को लेकर अंतरिम बजट से जो अच्छी खबर आई, उसका शेयर बाजार पर पॉजिटिव असर क्यों नहीं पड़ा? असल में मार्केट टैक्स छूट की उम्मीद कर रहा था, जो पूरी नहीं हुई और बजट से पहले शेयर बाजार में यूं भी अच्छी तेजी आ चुकी थी। इसलिए गुरुवार को इसमें मामूली गिरावट आई और निफ्टी 50 इंडेक्स 0.13 प्रतिशत नीचे बंद हुआ।

कई जानकारों को लग रहा था कि वित्त मंत्री कुछ रेवड़ियों का ऐलान करेंगी। यूं तो अंतरिम बजट में ऐसा नहीं करना चाहिए, लेकिन पहले के कुछ वित्त मंत्रियों ने इस बंधन को नहीं माना था। 5 साल पहले पीयूष गोयल ने अंतरिम बजट पेश किया था और तब उन्होंने पर्सनल इनकम टैक्स से छूट की सीमा को बढ़ाकर 5 लाख रुपये कर दिया था। उन्होंने सैलरीड क्लास के लिए स्टैंडर्ड डिडक्शन में छूट के साथ अन्य रियायतें भी दी थीं। उन्होंने दावा किया था कि इससे मध्यवर्ग के 3 करोड़ करदाताओं को फायदा होगा, जो BJP का वोट बैंक माने जाते हैं।

गोयल के बजट से कुछ सप्ताह पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों को सालाना 6,000 रुपये देने की घोषणा की थी। इसे तेलंगाना की रायतू बंधु, ओडिशा की KALIA और राहुल गांधी की चुनाव जीतने पर हर किसान परिवार को 72,000 रुपये देने के वादे के मुकाबले में लाया गया था। रायतू बंधु योजना के तहत तेलंगाना में हर कटाई सीजन में किसानों को 4,000 रुपये प्रति एकड़ और KALIA के तहत ओडिशा के ग्रामीण इलाकों में रहने वालों को 10,000 रुपये का भुगतान किया जाता है। 2019 में BJP को भरोसा नहीं था कि वह आम चुनाव जीत जाएगी। दरअसल, कुछ महीने पहले मध्य भारत के तीन राज्यों में हुए चुनाव में वह हार गई थी। यूं तो मोदी अक्सर कहते हैं कि चुनाव रेवड़ियां बांटकर नहीं, परफॉरमेंस से जीते जाते हैं। इसके बावजूद BJP को तब रेवड़ियां बांटनी पड़ी थीं, भले ही दूसरी पार्टियों की तुलना में उसने कम फ्रीबीज दिए।

2024 लोकसभा चुनाव से पहले हालात बिल्कुल अलग हैं। BJP को आम चुनाव में जीत का भरोसा है। मोदी की अप्रूवल रेटिंग 90 प्रतिशत तक है। किसी अन्य लोकतांत्रिक देश के लीडर के लिए ऐसी रेटिंग सपना है। कुछ समय पहले हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी को शानदार जीत मिली। मध्य प्रदेश में तो सत्ता में रहते हुए भी उसकी सीटें बढ़ गईं। आज उसे सत्ता विरोधी लहर का डर नहीं है इसलिए 5 साल पहले भले ही गोयल के लिए रेवड़ी बांटना राजनीतिक मजबूरी थी, निर्मला के सामने ऐसी मजबूरी नहीं है। BJP को परफॉरमेंस के दम पर लोकसभा चुनाव जीतने का यकीन है। इसलिए अंतरिम बजट में जब वह अपनी सरकार की एक के बाद एक उपलब्धियां बता रही थीं तो उनकी पार्टी के सांसद हर बड़े दावे पर मेजें थपथपा रहे थे। उन्होंने यह वादा भी किया कि पिछले 10 वर्षों में BJP के नेतृत्व में देश ने क्या हासिल किया है और उससे पहले के दशक में कांग्रेस सरकार ने क्या हासिल किया था, इस पर रिपोर्ट कार्ड पेश करेंगी।

आज भारत दुनिया के बड़े देशों में सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है। पहले अग्रिम अनुमान में बताया गया कि वित्त वर्ष 2024 में देश की ग्रोथ 7.3 प्रतिशत रह सकती है, जो एक साल पहले 7.2 प्रतिशत थी। ऐसे वक्त में, जब दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्था डूब रही हो, तब इतनी शानदार ग्रोथ की सराहना की जानी चाहिए। मसलन, भारत के पड़ोसी देशों- पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश को इधर IMF के पास मदद के लिए जाना पड़ा। यूं तो नेताओं की फेंकने की आदत होती है, लेकिन निर्मला के पास वाकई इसका अधिकार है।

मध्यम वर्ग को साधना, मोदी सरकार का क्या है उद्देश्य?

मध्यम वर्ग को साधना, मोदी सरकार का एक उद्देश्य माना जा रहा है! BJP सरकार के दूसरे टर्म के अंतिम बजट लेखानुदान में उम्मीद के अनुरूप ही सब कुछ रखा गया। लोकलुभावन फैसलों से जरूर परहेज था, लेकिन अपने मजबूत वोट बैंक का ख्याल रखा गया और आगे का रोडमैप भी पेश करने की कोशिश की गई। इन सबके बीच अगले दो-तीन महीने में होने वाले आम चुनाव से पहले BJP का जीत का आत्मविश्वास भी इस बजट में दिखा। अंतरिम बजट आने के एक दिन पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि उनकी ही सरकार इस साल जुलाई में भी पूर्ण बजट पेश करेगी। लेकिन इसके साथ सियासी जोखिम मोल न लेने की मंशा भी साफ नुमायां हुई। इस अंतरिम बजट में पिछले 10 सालों का आर्थिक रिपोर्ट कार्ड पेश करने की कोशिश की गई। कुल मिलाकर देखा जाए तो मोदी सरकार ने संदेश दिया है कि आर्थिक रूप से कुछ बड़ा करने का काम इस साल पूर्ण बजट से ही शुरू होगा। दरअसल, पिछले कई मौकों पर खुद पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने तीसरे टर्म की प्राथमिकता के बारे में विस्तार से बात की है। इसके सियासी मायने भी निकाले जाते रहे हैं। मोदी 2.0 के पहले बजट में संदेश दिया गया कि रॉबिन हुड सरकार की छवि बनाए रखने के प्रयास जारी रहेंगे। 2014 में सत्ता में आने के बाद मोदी 1.0 के पहले बजट में रिफॉर्म पर फोकस किया गया, लेकिन बाद में विपक्ष ने ‘सूट-बूट की सरकार’ कहकर हमले किए। नरेंद्र मोदी की सरकार को तब इसका सियासी नुकसान भी उठाना पड़ा। उसके बाद से इस सरकार का पूरा फोकस खास तौर से दो तबकों पर आकर टिक गया- गरीब और महिलाएं। गरीबों को मुफ्त राशन देकर अपने पाले में किया गया। महिलाओं को भी अलग-अलग तरीके से कुछ न कुछ देने की कोशिश की जाती रही। अब सरकार ने एक नए तबके – नियो मिडल क्लास यानी नव मध्य वर्ग पर ध्यान देना शुरू किया है। कहा जा रहा है कि अगले कुछ सालों में वोटर का सबसे बड़ा तबका यही होगा। अगर पिछले ढाई दशक के नरेंद्र मोदी के राजनीतिक सफर को गौर से देखें, तो उन्होंने इस नए वोट बैंक को ठोस रूप देने के लिए कई सफल सियासी प्रयोग किए हैं। छोटे-छोटे कस्बों में रहने वाले गरीब और मिडल क्लास के बीच रहने वाली आबादी को उन्होंने अपने फोकस में लिया। उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी सरकारी स्कीमें लेकर आए और इनके जरिए न केवल नया जनाधार साधा बल्कि एक नया सामाजिक समीकरण भी बनाया। OBC को अपने साथ जोड़ने के विशेष प्रयास किए। इस बार भी बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आवास योजना और ऐसी कुछ अन्य योजनाओं का विस्तार करने की मंशा जता दी। फिर भी सच यही है कि इस बजट में सियासी तौर पर कोई बड़ा एलान नहीं किया गया और यह बात राजनीतिक पंडितों को चौंका रही है। इसकी वजह यह है कि एक तरह से यह आम राय बन चुकी थी कि दूसरे टर्म के अंतिम बजट में कुछेक बड़ी घोषणाएं तो जरूर होंगी।

अब जबकि केंद्र सरकार ने इस बजट में लोकलुभावन फैसले से परहेज किया, तो विपक्ष को स्वाभाविक ही इसमें अपने लिए अवसर दिखेगा। I.N.D.I.A. में बिखराव से लेकर राम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा तक जिस तरह से विपक्षी खेमा बैकफुट पर दिख रहा है, उसके मद्देनजर BJP काडर में उत्साह है। इसकी काट के रूप में अब विपक्ष चुनाव से पहले लोकलुभावन वादे पेश कर सकता है। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों ने यह संकेत पहले से ही दे दिया है कि इस बार वे जनता के सामने कई लोकलुभावन वादे लेकर जाएंगे। अगले कुछ दिनों में विपक्ष की इस मोर्चे पर पहल दिख सकती है। वैसे देखने लायक तो यह भी होगा कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में BJP किस तरह से विपक्ष की इस पहल का जवाब देती है। हालांकि इस दिशा में शुरुआत हो चुकी है। इसका सबूत यह है कि BJP लोगों के बीच ‘मोदी की गारंटी’ से लैस होकर जा रही है। वह कहते हैं कि मोदी गारंटी पूरा करता है जबकि विपक्ष महज घोषणा तक ही सीमित रहता है। BJP को इससे चुनावी फायदे की उम्मीद है तो उसकी अपनी वजहें भी हैं।

दरअसल, यह सामान्य ट्रेंड रहा है कि मौजूदा सरकार की घोषणाओं का जनता पर असर अधिक होता है। पिछले साल मध्य प्रदेश चुनाव के दौरान कांग्रेस ने महिलाओं को हर महीने 1500 रुपये देने का एलान किया, लेकिन इस वादे के बाद ही तत्कालीन सीएम शिवराज सिंह चौहान ने हर महीने 1200 रुपये देने की लाडली योजना लॉन्च कर दी। इसका बड़ा असर हुआ और कांग्रेस के 1500 रुपये के वादे पर BJP के 1200 रुपये की योजना का क्रियान्वयन भारी पड़ा। उसी तरह कांग्रेस ने 2019 में 12000 रुपये सालाना वाली न्याय योजना का वादा किया था। तब भी अंतरिम बजट में 6000 रुपये सालाना किसान सम्मान निधि का एलान किया गया और चुनाव से पहले इसकी पहली किस्त दे भी दी गई। इसका बड़ा असर हुआ और कांग्रेस को उसके वादों का लाभ नहीं मिला। हालांकि इन सबके बीच मिडल क्लास ऐसा तबका है, जो संभवत: इन सबसे पीछे छूटता दिख रहा है। गुरुवार को बजट पेश होने के बाद सोशल मीडिया पर इसकी झलक भी दिखी। 2019 में जब इस तबके में निराशा थी तो उसे दूर करने के लिए इनकम टैक्स स्लैब में छूट मिली थी। लेकिन इस बार मिडल क्लास को कोई बड़ी छूट नहीं मिली।