Sunday, May 19, 2024
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पोंगल त्योहार कब और क्यों मनाया जाता है, क्या है इसका महत्व?

पोंगल त्योहार दक्षिण भारत में मनाया जाता है और इस बार 14 से 17 जनवरी को मनाया जा रहा है, यह त्योहार दक्षिण भारत में नए साल की तरह धूम धाम से मनाया जाता है और पोगल चार दिनों तक मनाया जाने वाला त्योहार है इस त्योहार में धान की फसल को एकत्र करने के बाद पोंगल त्योहार के रूप में अपनी खुशी प्रकट की जाती हैं, और ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि आने वाली फसलें भी अच्छी हों |

पोंगल पर समृद्धि लाने के लिए वर्षा, सूर्य देव, इंद्रदेव और मवेशियों को पूजा जाता है, 4 दिनों तक चलने वाले इस त्योहार के पहले दिन को ‘भोगी पोंगल‘ कहते हैं, दूसरे दिन को ‘सूर्य पोंगल‘, तीसरे दिन को ‘मट्टू पोंगल‘ और चौथे दिन को ‘कन्नम पोंगल, आज के दिन जहां उत्तर भारत में मकर संक्रांति मनाई जा रही है, वहीं दक्षिण भारत में धूमधाम से पोंगल का त्‍योहार मनाया जा रहा है मकर संक्रांति और लोहड़ी की तरह पोंगल भी फसल और किसानों का त्योहार है पोंगल का पर्व थाई महीने के पहले दिन मनाया जाता है |

यह महीना तमिल महीने का प्रथम दिन होता है। इस महीने के विषय में एक काफी प्रसिद्ध कहावत है भी है:

थाई पोरंदा वाज़ी पोरकुकुम

जिसका मतलब है थाई का यह महीना जीवन में एक नया परिवर्तन पैदा करता है। पोंगल का यह पर्व चार दिनों तक मनाया जाता है। यदि इस पर्व को समान्य रुप से देखा जाये, तो यह सर्दियों के फसलों के लिए, ईश्वर को दिये जाने वाले धन्यवाद के रुप में मनाया जाता है।चार दिनों तक मनाये जाने वाले इस पर्व में प्रकृति को विशेष धन्यवाद दिया जाता है इसके साथ ही पोंगल के पर्व पर सूर्य देव को जो प्रसाद चढ़ाया जाता है उसे भी पोंगल व्यंजन के नाम से जाना जाता है और इसके साथ ही पोंगल का एक दूसरा अर्थ ‘अच्छी तरह से उबालना’ भी है ।

यहीं कारण हैं कि इस व्यंजन को सूर्य के प्रकाश में आग पर अच्छे तरह से उबालकर बनाया जाता है। यह त्यौहार थाई माह यानि जनवरी से फरवरी के बीच आयोजित किया जाता है. इस मौसम के दौरान विभिन्न अनाज जैसे चाँवल, गन्ना, हल्दी और तमिलनाडु के कई अन्य खाना पकाने में अनिवार्य फसल काटी जाती हैं. तमिल कैलेंडर के हिसाब से पोंगल के लिए जनवरी माह के मध्य का समय साल का सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है ।

तमिलनाडु के इस सर्वोत्कृष्ट त्यौहार को आम तौर पर 14 – 15 जनवरी को मनाया जाता है, यह मौसमी चक्र के साथ मानवजाति को ठीक से अनाज की कटाई में मदद प्रदान करने के लिए भगवान से संतुष्टि की पेशकश करने का त्यौहार है. तमिलों का यह मानना है कि इस दिन “पिरान्धाल वाज़ही पिराक्कुम” कहने से परिवार की सभी समस्याएँ गायब हो जाती हैं चार दिन तक मनाए जाने वाले इस त्योहार में पहले दिन कूड़ा-कचरा जलाते हैं, दूसरे दिन माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है, तीसरे दिन खेती में उपयोग होने वाले मवेशियों को पूजा जाता है, और चौथे दिन काली जी की पूजा की जाती है ।

इस त्योहार में घरों की पुताई की जाती है व रंगोली बनाई जाती है, मवेशियों को सजाया जाता है, नए कपड़े और नए बर्तन खरीदे जाते हैं पोंगल में गाय के दूध में उफान को भी महत्वपूर्ण बताया गया है. माना जाता है कि दूध का उफान शुद्ध और शुभता का प्रतीक है, चाँवल और दूध के अलावा इस मिठाई की सामग्री में इलायची, किशमिश, हरा चना और काजू भी शामिल रहते है, यह व्यंजन बनाने की प्रक्रिया सूर्य देवता के सामने की जाती है. आमतौर पर बरामदे या आंगन में यह बनाया जाता है ।

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