Thursday, March 12, 2026
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आखिर क्या होगी अमित शाह की नई कैबिनेट में जगह?

आज हम आपको बताएंगे कि अमित शाह की नई कैबिनेट में जगह क्या होगी! लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों के अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं। हार-जीत के बाद अब नई सरकार के गठन की तैयारियां तेज हो गई हैं। यह लगभग तय है कि अगली सरकार एनडीए की बनने जा रही है। इस बार बीजेपी की सरकार बनने जा रही है इस बात पर जोर कम है। इस बार जोर एनडीए पर है। वजह भी है पार्टी बहुमत से जो दूर है। दिल्ली में बुधवार एनडीए की बैठक हुई और इस बैठक में सर्वसम्मति से नरेंद्र मोदी नेता चुने गए। बैठक के बाद जो तस्वीर सामने आई उसके बाद उस पर चर्चा शुरू है।वहीं अमित शाह नरेंद्र मोदी के ठीक बगल में नजर आ रहे हैं। वहीं इस बार वाली तस्वीर में अमित शाह थोड़े दूर नजर आते हैं। इसके अलावा मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में पार्टी मीटिंग हो या फिर सरकार की बैठक, दोनों ही जगहों पर अमित शाह की मौजूदगी नरेंद्र मोदी के ठीक बगल में रहती थी। साथ ही तस्वीर से यह भी पता चल रहा है कि मोदी 3.0 में किसका कद बढ़ने वाला है। 2019 और 5 साल बाद 2024 एनडीए नेताओं की तस्वीर देखने से पता चलता है कि काफी कुछ बदल गया है। नरेंद्र मोदी के करीब दिखने वाले नेता अब दूर दिख रहे हैं।अब मोदी 3.0 में क्या यह क्रम टूट सकता है। बीजेपी के जीते हुए बड़े नेताओं में किस नेता की क्या भूमिका रहेगी, कौन मंत्री बनता है कौन नहीं, यह अगले कुछ दिनों में पता चल जाएगा लेकिन एक बात क्लियर है कि इस बार तस्वीर जरूर बदली होगी। वहीं जो दूर थे वह करीब दिख रहे हैं। बुधवार एनडीए नेताओं की मीटिंग हुई। मीटिंग की जो तस्वीर सामने आई उसमें पीएम मोदी के ठीक बगल में चंद्रबाबू नायडू और उसके बाद नीतीश कुमार खड़े दिखाई दे रहे हैं। इसके बाद एनडीए के दूसरे सहयोगी शिवसेना, एनसीपी के नेता नजर आ रहे हैं। तस्वीर में चिराग पासवान, अनुप्रिया पटेल और दूसरे एनडीए के सहयोगी नेता भी नजर आ रहे हैं। वहीं दूसरी ओर बीजपी के तीन नेता पीएम मोदी के पास खड़े हैं। मोदी के ठीक बगल में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, उसके बाद राजनाथ सिंह और फिर अमित शाह। पिछले कार्यकाल में नरेंद्र मोदी के ठीक बगल में अक्सर अमित शाह नजर आते थे लेकिन इस बार यहां दूरी बढ़ गई है। राजनीतिक गलियारों में इसके भी मायने मतलब निकाले जा रहे हैं।

वहीं अब दूसरी तस्वीर पर आते हैं। यह तस्वीर है साल 2019 की। बीजेपी अकेले बहुमत के दम पर सत्ता में आती है। एनडीए नेताओं की इस तस्वीर में कई ऐसे चेहरे नजर आ रहे हैं जो अब उसके साथ नहीं हैं। उद्धव ठाकरे अब बीजेपी के साथ नहीं हैं तो वहीं अकाली दल भी अब एनडीए का हिस्सा नहीं। कुछ ऐसे नेता भी हैं जो इस दुनिया में अब नहीं। वहीं अमित शाह नरेंद्र मोदी के ठीक बगल में नजर आ रहे हैं। वहीं इस बार वाली तस्वीर में अमित शाह थोड़े दूर नजर आते हैं। इसके अलावा मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में पार्टी मीटिंग हो या फिर सरकार की बैठक, दोनों ही जगहों पर अमित शाह की मौजूदगी नरेंद्र मोदी के ठीक बगल में रहती थी। अब मोदी 3.0 में क्या यह क्रम टूट सकता है। बीजेपी के जीते हुए बड़े नेताओं में किस नेता की क्या भूमिका रहेगी, कौन मंत्री बनता है कौन नहीं, यह अगले कुछ दिनों में पता चल जाएगा लेकिन एक बात क्लियर है कि इस बार तस्वीर जरूर बदली होगी।

इसके बाद एनडीए के दूसरे सहयोगी शिवसेना, एनसीपी के नेता नजर आ रहे हैं। तस्वीर में चिराग पासवान, अनुप्रिया पटेल और दूसरे एनडीए के सहयोगी नेता भी नजर आ रहे हैं। साथ ही तस्वीर से यह भी पता चल रहा है कि मोदी 3.0 में किसका कद बढ़ने वाला है। 2019 और 5 साल बाद 2024 एनडीए नेताओं की तस्वीर देखने से पता चलता है कि काफी कुछ बदल गया है। बता दें कि यह तस्वीर है साल 2019 की। बीजेपी अकेले बहुमत के दम पर सत्ता में आती है। एनडीए नेताओं की इस तस्वीर में कई ऐसे चेहरे नजर आ रहे हैं जो अब उसके साथ नहीं हैं। नरेंद्र मोदी के करीब दिखने वाले नेता अब दूर दिख रहे हैं।वहीं दूसरी ओर बीजपी के तीन नेता पीएम मोदी के पास खड़े हैं। मोदी के ठीक बगल में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, उसके बाद राजनाथ सिंह और फिर अमित शाह।

क्या धराशाही हो चुका है फलोदी सट्टा बाजार?

वर्तमान में फलोदी सट्टा बाजार अब पूरी तरह से धराशाही हो चुका है! लोकसभा चुनाव के नतीजों से एक दिन पहले 3 जून की शाम तक किसी को अंदाजा नहीं था कि अगले दिन आने वाला रिजल्ट इस तरह चौंकाएगा। लगभग सभी एग्जिट पोल बीजेपी को छप्पर फाड़ सीटें दे रहे थे। यहां तक कि कुछ एग्जिट पोल ने बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए को 400 का आंकड़ा छूते हुए भी बताया। खुद बीजेपी के नेता मान रहे थे कि पीएम मोदी का करिश्मा चलेगा और उन्हें बहुमत से ज्यादा सीटें मिलेंगी। लेकिन, 4 जून को जब चुनाव परिणाम आया तो सारे दावे फुस्स हो गए। एग्जिट पोल गलत साबित हुए। यहां तक कि हर चुनाव में भविष्यवाणी करने वाला राजस्थान का मशहूर फलोदी सट्टा बाजार भी फेल निकला।ना उसकी भविष्यवाणी राजस्थान के लिए सही निकली और ना ही देश की 543 लोकसभा सीटों के मामले में। आखिर क्या वजह रही कि जिस फलोदी सट्टा बाजार ने मध्य प्रदेश विधानसभा की सीटों के लिए एकदम सटीक भविष्यवाणी की, वो लोकसभा चुनाव में धराशाई हो गया। फलोदी सट्टा बाजार चुनाव, क्रिकेट मैच और मौसम के पूर्वानुमान के मामले में सटीक भविष्यवाणी के लिए जाना जाता है। इस बार फलोदी सट्टा बाजार ने देश और राजस्थान दोनों के लिए बीजेपी की सीटों को लेकर भविष्यवाणी की थी। हालांकि, दोनों ही जगह फलोदी सट्टा बाजार गलत साबित हुआ। मतगणना से एक दिन पहले सोमवार देर रात तक फलोदी सट्टा बाजार बीजेपी को 303 से लेकर 306 सीटें तक दे रहा था। अपनी इस भविष्यवाणी पर सट्टा बाजार ने 1:1 का भाव रखा था। इसका मतलब था कि 1 रुपये का दांव लगाने पर 1 रुपये का फायदा मिलेगा।

बीजेपी के साथ-साथ इसी तरह फलोदी सट्टा बाजार ने कांग्रेस को लेकर भी भविष्यवाणी की थी। सट्टा बाजार का अनुमान था कि कांग्रेस के खाते में 61 से 63 सीटें जाएंगी। कांग्रेस के लिए भी फलोदी सट्टा बाजार में 1:1 का भाव रखा गया था। देशभर की सीटों के अलावा फलोदी सट्टा बाजार में राजस्थान की सीटों पर भी दांव लगाए गए। सट्टा बाजार ने राजस्थान में बीजेपी के लिए ज्यादा से ज्यादा 20 और कम से कम 19 सीटों का अनुमान लगाया। वहीं, कांग्रेस के लिए सट्टा बाजार की भविष्यवाणी 6 सीटें रख रही थी!

4 जून को नतीजे घोषित हुए तो बीजेपी को केवल 240 सीटें मिलीं। इसके अलावा राजस्थान की 25 में से बीजेपी 14 सीटें ही जीत पाई। कांगेस ने टोटल 99 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की। राजस्थान में उसे 8 सीटें मिलीं। इस तरह फलोदी सट्टा बाजार बीजेपी और कांग्रेस दोनों की सीटों का अंदाजा लगाने में फेल निकला। ना उसकी भविष्यवाणी राजस्थान के लिए सही निकली और ना ही देश की 543 लोकसभा सीटों के मामले में। आखिर क्या वजह रही कि जिस फलोदी सट्टा बाजार ने मध्य प्रदेश विधानसभा की सीटों के लिए एकदम सटीक भविष्यवाणी की, वो लोकसभा चुनाव में धराशाई हो गया।

फलोदी सट्टा बाजार पर करीबी नजर रखने वाले एक सट्टेबाज का कहना है कि आखिरी मिनट तक बाजार में ऐसा कोई संकेत नहीं था कि बीजेपी 300 से कम सीटें जीतेगी। सट्टा बाजार के सर्वे में अगर 7-8 सीटों का ही अंतर आ जाए, तो बहुत बड़ी बात होती है। पीएम मोदी का करिश्मा चलेगा और उन्हें बहुमत से ज्यादा सीटें मिलेंगी। लेकिन, 4 जून को जब चुनाव परिणाम आया तो सारे दावे फुस्स हो गए। एग्जिट पोल गलत साबित हुए। यहां तक कि हर चुनाव में भविष्यवाणी करने वाला राजस्थान का मशहूर फलोदी सट्टा बाजार भी फेल निकला।एक और सट्टेबाज ने इस बारे में बताया कि सट्टा बाजार में राजनीतिक जानकारी के कई मजबूत सोर्स हैं। बता दें कि बीजेपी के साथ-साथ इसी तरह फलोदी सट्टा बाजार ने कांग्रेस को लेकर भी भविष्यवाणी की थी। सट्टा बाजार का अनुमान था कि कांग्रेस के खाते में 61 से 63 सीटें जाएंगी। कांग्रेस के लिए भी फलोदी सट्टा बाजार में 1:1 का भाव रखा गया था। देशभर की सीटों के अलावा फलोदी सट्टा बाजार में राजस्थान की सीटों पर भी दांव लगाए गए। यहां बड़ी और प्रमुख राजनीतिक पार्टियों से जुड़े लोग शामिल हैं। बता दें कि जिस फलोदी सट्टा बाजार ने मध्य प्रदेश विधानसभा की सीटों के लिए एकदम सटीक भविष्यवाणी की, वो लोकसभा चुनाव में धराशाई हो गया। फलोदी सट्टा बाजार चुनाव, क्रिकेट मैच और मौसम के पूर्वानुमान के मामले में सटीक भविष्यवाणी के लिए जाना जाता है। इस बार फलोदी सट्टा बाजार ने देश और राजस्थान दोनों के लिए बीजेपी की सीटों को लेकर भविष्यवाणी की थी। सट्टा बाजार इनसे मिले इनपुट के आधार पर ही भाव तय करता है। हालांकि, ट्रेंड के हिसाब इसमें उतार-चढ़ाव चलता रहता है।

आखिर क्या है 2024 के परिणाम के मायने?

आज हम आपको 2024 के परिणाम के मायने बताने जा रहे हैं! लोकसभा 2024 आम चुनावों के नतीजे आ चुके हैं और किसी भी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है। 2014 और 2019 में जहां बीजेपी अपने बलबूते पर ही आसानी से बड़ा बहुमत हासिल कर रही थी, वहीं इस बार बीजेपी बहुमत से दूर रह गई है और इस बार सही मायनों में एनडीए की सरकार नजर आएगी। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पिछले दस वर्षों के बाद पीएम नरेंद्र मोदी को पहली बार साझा सरकार चलाने का अनुभव हो और राजनीतिक तौर पर इसका असर संसद में भी नजर आएगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले पांच वर्षों में संसद में सार्थक चर्चा होगी और इससे जनता को फायदा होगा। 2024 का जनादेश लोकतंत्र की असली जीत है। साथ ही यह सभी पार्टियों के लिए संदेश है। बीजेपी के लिए भी संदेश है। उन्होंने कहा कि जनता ने बीजेपी के लिए स्पष्ट मत जाहिर किया है कि उनसे जुड़े मुद्दों की अनदेखी नहीं की जा सकती है। बीजेपी के हिसाब से बेशक मंदिर, धारा 370 जैसे मुद्दों ने बड़ा काम किया लेकिन ये सब अपनी जगह है लेकिन जनता के जो रोजमर्रा से जुड़े मुद्दे हैं, उनको भी तवज्जों मिलनी चाहिए। बेरोजगारी, महंगाई जैसे मुद्दों को नजरअंदाज करना आपके लिए नुकसानदेह हो सकता है, जो अभी देखने को मिल रहा है।

जिस तरह से हमने पहले देखा कि कानून बनाने, कई बिलों को पास करने में लंबी- चौड़ी चर्चा नहीं होती थी। कई बार एकतरफा फैसले लिए जाते थे, उससे हटकर अब संसद में एक स्वस्थ वाद- विवाद और चर्चा होगी। कुल मिलाकर यह एक अच्छा जनादेश है। सभी पार्टियों के लिए एक संदेश है। अब सवाल यह है कि पार्टियां उस संदेश को कैसे पढ़ती है, अब ये उनकी जवाबदेही है कि उस संदेश को पढ़े और उस पर अमल करें। अगर विपक्ष की बात करें तो विपक्ष के लिए भी संदेश है कि अगर आप जनता के मुद्दों को उठाते रहेंगे तो जनता आपका साथ देगी और जिस तरह से समाजवादी पार्टी, कांग्रेस व दूसरी पार्टियों का अच्छा प्रदर्शन रहा है, तो एक तरह से ये उनका हौंसला बढ़ाने वाला है। प्रो. कुमार ने एक सवाल के जवाब में यह जनादेश लोकतंत्र की जीत है। इसका एक और पहलू यह है कि अब नई लोकसभा में भी एक बहुमत की सरकार होगी, बहुमत की सरकार मतलब कि एनडीए गठबंधन की सरकार होगी लेकिन साथ ही एक मजबूत विपक्ष भी वहां खड़ा होगा। इससे देश की सत्ता को चलाने की जो व्यवस्था है, वो ज्यादा सुचारू रूप से चलती हुई दिखाई पड़ेगी।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि दस वर्षों के बाद पहली बार सही मायनों में बीजेपी एक तरह से गठबंधन सरकार चलाएगी, इससे पहले को कहने को साझा सरकार थी लेकिन बीजेपी का ही अपना बहुमत था। एक तरह से पहली बार पीएम मोदी को साझा सरकार चलाने का अनुभव होगा। सारे गठबंधन को साथ लेकर चलना होगा। बता दें कि उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले पांच वर्षों में संसद में सार्थक चर्चा होगी और इससे जनता को फायदा होगा। 2024 का जनादेश लोकतंत्र की असली जीत है। साथ ही यह सभी पार्टियों के लिए संदेश है। बीजेपी के लिए भी संदेश है। उन्होंने कहा कि जनता ने बीजेपी के लिए स्पष्ट मत जाहिर किया है कि उनसे जुड़े मुद्दों की अनदेखी नहीं की जा सकती है। बीजेपी के हिसाब से बेशक मंदिर, धारा 370 जैसे मुद्दों ने बड़ा काम किया लेकिन ये सब अपनी जगह है लेकिन जनता के जो रोजमर्रा से जुड़े मुद्दे हैं, इसका एक और पहलू यह है कि अब नई लोकसभा में भी एक बहुमत की सरकार होगी, बहुमत की सरकार मतलब कि एनडीए गठबंधन की सरकार होगी लेकिन साथ ही एक मजबूत विपक्ष भी वहां खड़ा होगा। इससे देश की सत्ता को चलाने की जो व्यवस्था है, वो ज्यादा सुचारू रूप से चलती हुई दिखाई पड़ेगी।बेरोजगारी, महंगाई जैसे मुद्दों को नजरअंदाज करना आपके लिए नुकसानदेह हो सकता है, जो अभी देखने को मिल रहा है।उनको भी तवज्जों मिलनी चाहिए। विपक्ष के साथ- साथ अपने सहयोगियों को भी साथ लेकर चलना चाहिए। इसी कारण यह कहा जा सकता है कि इश बार बातचीत का दौर ज्यादा दिखाई देगा। साझा सरकार चलाने के लिए सहयोगियों पार्टियों के साथ नियमित रूप से परामर्श व संवाद करना होगा। विपक्ष की भूमिका भी अहम रहेगी।

प्लास्टिक प्रदूषण रोकने का सबसे आसान तरीकाl

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प्रदेश में मानसून के दिन नजदीक आ गए हैं। सरकार और नागरिक समाज दोनों ही इस बात से भली-भांति परिचित हैं कि सीवेज में प्लास्टिक थैलियों का उपयोग बहुत खतरनाक है। पर्यावरण के बारे में हाल की सभी चर्चाओं में प्लास्टिक प्रदूषण की चर्चा को आसानी से सबसे आगे रखा जा सकता है। आश्चर्य की बात है कि इसके बावजूद नागरिक समाज सरकार की असीम उदासीनता से ग्रस्त है। भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जारी एक अधिसूचना के अनुसार, राज्य पर्यावरण विभाग ने 31 दिसंबर, 2022 से 120 माइक्रोन से कम मोटाई वाले प्लास्टिक के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था। देश के बाकी हिस्सों के साथ इस राज्य में भी प्लास्टिक के कप, प्लेट, चम्मच, स्ट्रॉ जैसी एकल उपयोग वाली प्लास्टिक वस्तुओं के उपयोग पर प्रतिबंध है। लेकिन अगर आसपास देखें तो पता चलता है कि इनमें से ज्यादातर बंदिशें किताबों में ही सिमट कर रह गई हैं। जिलों, खासकर कोलकाता में प्रतिबंधित प्लास्टिक सामग्रियों का उपयोग किया जा रहा है। यानी निगरानी में बहुत बड़ा अंतर है. सबसे बढ़कर, इस संबंध में राज्य-केंद्र प्रतिद्वंद्विता भी जारी है। कलकत्ता नगर पालिका का दावा है कि प्लास्टिक के उपयोग पर अंकुश लगाने के लिए केंद्र को सबसे पहले प्रतिबंधित प्लास्टिक फैक्ट्रियों को बंद करना होगा। समस्या यह है कि यह अंतर पिघल रहा है और पर्यावरण हर दिन कुछ अधिक ही विनाश की ओर बढ़ रहा है।

प्रदेश में मानसून के दिन नजदीक आ गए हैं। सरकार और नागरिक समाज दोनों ही इस बात से भली-भांति परिचित हैं कि सीवेज में प्लास्टिक थैलियों का उपयोग बहुत खतरनाक है। हाल ही में मेयर फिरहाद हकीम ने विश्व पर्यावरण दिवस के एक कार्यक्रम में कहा था कि जिस तरह से प्लास्टिक का इस्तेमाल बढ़ रहा है, आने वाले दिनों में मिट्टी प्लास्टिक से ढक जाएगी. पानी मिट्टी के माध्यम से नीचे नहीं जा पाता। लेकिन यह जानकारी होने के बावजूद काम कहां है? केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के निर्देश मिलने के बाद नगर पालिका ने शुरुआत में विक्रेताओं से 500 रुपये और खरीदारों से 50 रुपये वसूलने का फैसला किया। यह जुर्माना वसूलने का काम कहां और कहां तक ​​पूरा हुआ, इसका भी हिसाब देना जरूरी है. जिस पहली दुकान-बाजार पर छापा पड़ा, क्या नगर पालिका में पहले जैसा उत्साह है? अगर प्लास्टिक नालों में फंस गया तो इससे न सिर्फ शहरवासियों को पानी की समस्या होगी. यह प्लास्टिक हर साल मानसून की शुरुआत से लेकर सर्दियों के मध्य तक कोलकाता के ‘डेंगू राजधानी’ बनने के उत्प्रेरकों में से एक है। इसे ध्यान में रखते हुए क्या नगर पालिका को और अधिक सक्रिय होने की आवश्यकता नहीं थी?

अपने कर्तव्य की उपेक्षा को छुपाने के लिए बहाने ढूँढना राज्य प्रशासन की पुरानी प्रथा है। प्लास्टिक फैक्ट्रियों को बंद करने के प्रति केंद्र सरकार की उदासीनता निश्चित रूप से एक प्रशंसनीय कारण है। लेकिन जब समस्या बढ़ती जा रही है तो यह पूछना अनुचित नहीं होगा कि इस संबंध में केंद्र के साथ सहमति क्यों नहीं बन पाई है. अगर प्रशासन ऐसा नहीं कर सकता तो फिर कौन करेगा? इसी तरह, प्रतिबंधित प्लास्टिक के उपयोग के लिए स्पष्ट दंड होने के बावजूद नागरिकों की अज्ञानता पर बार-बार मौखिक रूप से उंगली उठाना कितना उचित है? ध्यान रखें, नगर पालिकाएं सबसे पहले अपनी खामियां ढूंढती हैं। एक साल तक आरोप लगते रहे.

पहाड़ और मैदान का रिश्ता बहुत पुराना है. लेकिन यह मुख्य रूप से पर्यटन है। उससे भी आगे बढ़कर इस बार मैदान की एक्ट्रेस-कलाकारों ने एक नया रिश्ता कायम किया.

कोलकाता की अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता संगीता सिंह ने सेवा जागरूकता का संदेश देने के लिए वनकर्मियों से लेकर वन अधिकारियों तक को पोस्टकार्ड में शुभकामनाएं भेजीं। युवा कलाकार अतनु रॉय ने उस पोस्ट कार्ड पर पहाड़ों और वन्य जीवन की रंगीन तस्वीरें बनाईं। 5 जून पर्यावरण दिवस है. आगामी पर्यावरण दिवस से पहले, संगीता ने हरियाली और वन्य जीवन के बारे में जागरूकता का संदेश देने के लिए एक नया तरीका चुना। वह एक स्वयंसेवी संस्था चलाते हैं. संगीता ने कहा, ‘विभिन्न कार्यक्रमों के साथ पर्यावरण दिवस समारोह आयोजित किया जाता है। लेकिन पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी निभा रहे वनकर्मियों और वनकर्मियों के बारे में कोई नहीं जानता, न जानता है. उनके काम का सम्मान करने के लिए पोस्टकार्ड पर शुभकामनाएं।

पोस्टकार्ड पर सभी रंगीन चित्र. किसी के पास पहाड़ हैं, किसी के पास पांडा हैं, किसी के पास बंदर हैं। अंदर एक छोटा सा संदेश लिखा है, ‘प्रकृति की रक्षा की जिम्मेदारी लेने के लिए धन्यवाद।’ कलाकार अतनु ने कहा कि उन्होंने कार्टून की तरह ही पहाड़ों और वन्य जीवन के बारे में संदेश देने के लिए चित्र बनाए हैं। चित्र में कहीं पहाड़ हैं, कहीं देवदार के जंगल हैं, कहीं पहाड़ी फूल हैं और कुछ अन्य जंगली जानवर हैं जो पहाड़ों में देखे जा सकते हैं। कलाकार भी पर्यावरण जागरूकता की पहल में भाग लेकर खुश हैं।

दार्जिलिंग, जलदापाड़ा, कार्शियांग समेत वन विभाग के सात-आठ कार्यालयों में शुभकामना संदेश जा चुके हैं. इसे कुछ अन्य स्थानों पर भेजा जाएगा।

हालाँकि, पर्यावरण की रक्षा के अलावा, संगीता ने कुछ मुद्दों पर चिंता व्यक्त की। कई पर्यटक पहाड़ों पर जाकर प्लास्टिक, बोतलें, चिप्स के पैकेट जहां-तहां फेंक देते हैं. इससे न केवल पर्यावरण बल्कि वन्य जीवन को भी नुकसान पहुंच रहा है। उन्होंने सभी से इस संबंध में सावधानी बरतने का आह्वान किया है.

संगीता ने कहा कि यह एक समग्र पहल है क्योंकि पर्यावरण को बचाने के लिए हर कोई आगे आता है।

सात्विक-चिराग की जोड़ी बैडमिंटन में शीर्ष स्थान से बाहर, सिंधु, प्रणय एकल में शीर्ष 10 में

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इंडोनेशिया ओपन से हटने और कई टूर्नामेंटों में अच्छा प्रदर्शन करने में नाकाम रहने के बाद भारतीय जोड़ी ने शीर्ष स्थान खो दिया। सात्विक-चिराग तीसरे स्थान पर खिसक गये हैं. भारत के सात्विकसाईराज रोनकीरेड्डी और चिराग शेट्टी की जोड़ी ने बैडमिंटन विश्व रैंकिंग में अपना शीर्ष स्थान खो दिया है। वे पिछले सप्ताह इंडोनेशियाई ओपन से हट गए थे। इसके बाद मंगलवार को जारी पुरुष युगल रैंकिंग में सात्विक-चिराग की जोड़ी तीसरे स्थान पर खिसक गई.

नई शीर्ष वरीयता प्राप्त चीन की लियांग वेई केंग-वांग चांग की जोड़ी है। डेनमार्क की किम एस्ट्रुप-आंद्रेस रामुसेन की जोड़ी रैंकिंग में दूसरे स्थान पर पहुंच गई है। पिछले महीने सात्विक-चिराग की जोड़ी थाईलैंड ओपन चैंपियनशिप जीतकर नंबर वन बनी थी. लेकिन इंडोनेशियाई ओपन नहीं खेलने के कारण उन्हें हार का सामना करना पड़ा। बता दें कि भारतीय जोड़ी ने पिछले साल इंडोनेशिया में चैंपियनशिप जीती थी. इससे पहले वे ऑस्ट्रेलियन ओपन से हट गए थे. भारतीय जोड़ी मई के पहले सप्ताह में सिंगापुर ओपन के पहले दौर में हार गई थी। पुरुष एकल रैंकिंग में भारत के एचएस प्रणय शीर्ष 10 में आ गए हैं। लक्ष्य सेन रैंकिंग में 14वें नंबर पर हैं. किदांबी श्रीकांत चार पायदान पीछे 32वें नंबर पर हैं. वहीं महिला सिंगल्स रैंकिंग में पीवी सिंधु 10वें नंबर पर हैं. महिला युगल में तनीषा क्रैस्टो-अश्विनी पोनप्पा 19वें स्थान पर हैं।

पीवी सिंधु सिंगापुर ओपन के प्री-क्वार्टर फाइनल से बाहर हो गईं। गुरुवार को कैरोलिना मारिन से हार के साथ सिंधु का सफर खत्म हो गया. पहला गेम जीतने के बावजूद भारतीय शटलर मैच हार गए। मारिन ने यह गेम 11-21, 21-11, 22-20 से जीता।

मारिन और सिंधु अब तक 17 बार एक-दूसरे से भिड़ चुकी हैं। इसमें से 12 बार सिंधु हार चुकी हैं. सिंधु ने आखिरी बार 2018 में स्पेनिश शटलर के खिलाफ जीत हासिल की थी। मलेशिया ओपन के फाइनल में सिंधु ने मारिन को 22-20, 21-19 से हराया। तब से वह विश्व चैम्पियनशिप, इंडोनेशिया मास्टर्स, मलेशिया ओपन और डेनमार्क ओपन हार चुके हैं। इस बार वह सिंगापुर में हार गये.

सिंधु ने इस साल के सिंगापुर ओपन के पहले मैच में लाइन जारसेल्ट को हराया था। सिंधु ने सीधे सेटों में जीत हासिल की. मारिन के खिलाफ पहले गेम में भी उन्होंने दबदबा दिखाया. लेकिन अगले गेम में मारिन ने मैच में वापसी की. सिंधु हार गईं. आखिरी गेम में मुकाबला बराबरी का था. गेम में सिंधु 15-10 से आगे हो गईं. यहां से सिंधु गेम में 18-15 से आगे थीं। लेकिन अंत में मारिन ने गेम जीत लिया. उन्होंने मैच जीत लिया. सिंधु ने 2022 के बाद से कोई ट्रॉफी नहीं जीती है. पिछली बार उन्होंने सिंगापुर ओपन जीता था. पेरिस ओलंपिक सामने हैं. दो बार के ओलंपिक पदक विजेता इस प्रतियोगिता में एक और पदक जीतने की कोशिश करेंगे।

पीवी सिंधु मलेशिया ओपन चैंपियन नहीं बन पाईं. भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी दो साल के ट्रॉफी सूखे को नहीं तोड़ सके. फाइनल में वह दुनिया के सातवें नंबर के खिलाड़ी चीन के वांग झी से 21-16, 5-21, 16-21 से हार गए। फिर भी पेरिस ओलंपिक से पहले सिंधु का फॉर्म में लौटना भारत के लिए राहत की बात है. सिंधु ने आखिरी बार 2022 में झे को हराकर सिंगापुर ओपन जीता था।

रविवार को हुए फाइनल में सिंधु ने आक्रामक मूड में शुरुआत की. दो बार के ओलंपिक पदक विजेता ने विपक्षी टीम को दबाव में रखा। सिंधु ने पहला गेम 21-16 से जीता. दबाव में ज़ी ने सर्विस में कई गलतियाँ कीं। दूसरे गेम की शुरुआत में सिंधु फिर कुछ दबाव में आ गईं. एक समय भारतीय खिलाड़ी 1-5 से पिछड़ गये थे. उसके बाद वह लड़ाई में वापस नहीं लौट सके। झी ने यह गेम एक तरह से 21-5 के अंतर से जीतकर मैच बराबर कर लिया. तीसरे गेम की शुरुआत में सिंधु एक बार फिर आक्रामक मूड में थीं. हालाँकि चीनी प्रतिद्वंद्वी ने भी बराबरी का मुकाबला किया. एक समय 11-3 से आगे चल रहीं सिंधु 13-15 अंक से पिछड़ गईं. इसके बाद सिंधु मुश्किल से ही कोई प्रतिरोध कर सकीं. अंत में वह 16-21 के अंतर से गेम हार गए और फाइनल में जगह बना ली। उम्मीद जगाने के बावजूद भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी अंतिम बचाव नहीं कर सके।

पीवी सिंधु सिंगापुर ओपन के प्री-क्वार्टर फाइनल से बाहर हो गईं। गुरुवार को कैरोलिना मारिन से हार के साथ सिंधु का सफर खत्म हो गया. पहला गेम जीतने के बावजूद भारतीय शटलर मैच हार गए। मारिन ने यह गेम 11-21, 21-11, 22-20 से जीता।

हमास कैंप से 245 दिन बाद बचाया गया

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इज़राइल के युद्धकालीन कैबिनेट मंत्रियों में से एक बेनी गेंजर की पार्टी नेशनल यूनियन पार्टी ने हाल ही में इज़राइली संसद को भंग करने और चुनाव कराने के लिए एक विधेयक पेश किया है। शनिवार को हमास से चार इजरायली बंधकों को छुड़ाने के लिए चलाए गए ऑपरेशन में इजरायली बलों ने 274 से अधिक फिलिस्तीनियों को वस्तुतः मार डाला। घायलों की संख्या अनगिनत है. गाजा सोमवार को भी धमाकों से दहल उठा. पिछले 24 घंटों में कम से कम 40 लोगों की मौत हो गई है. इजराइल ने नहीं रोका हमला!

इज़राइल के युद्धकालीन कैबिनेट मंत्रियों में से एक बेनी गेंजर की पार्टी नेशनल यूनियन पार्टी ने हाल ही में इज़राइली संसद को भंग करने और चुनाव कराने के लिए एक विधेयक पेश किया है। बेनी ने कैबिनेट छोड़ दी. हालाँकि इसके बाद इजराइल के प्रधानमंत्री इस खुलासे के अनुरूप लगातार हमले कर रहे हैं कि ”उनके जीवनकाल में फिलिस्तीन को आजादी नहीं मिलेगी.”

इस बीच सोमवार को हमास सशस्त्र बल के एक नेता ने अमेरिका से युद्ध समाप्त करने की अपील की. हमास के वरिष्ठ नेता सामी अबू ज़ुहरी ने एक बयान में कहा, “संयुक्त राज्य अमेरिका से अनुरोध किया गया है कि वे किसी भी तरह से इज़राइल को युद्ध रोकने के लिए मना सकते हैं।” हमास युद्ध रोकने के किसी भी कदम का स्वागत करता है। गाजा के स्वास्थ्य मंत्रालय का दावा है कि 7 अक्टूबर के हमले में हमास ने 1,200 लोगों को मार डाला। 250 लोगों को जेल में डाल दिया गया. जवाब में इजराइल ने 37,000 से ज्यादा फिलिस्तीनियों को मार डाला. भांग का लगभग सफाया हो जाएगा।

इसी माहौल में विदेश सचिव एंथनी ब्लिंकन ने युद्धविराम और बंधकों की रिहाई पर चर्चा के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका की ओर से आठवीं बार मध्य पूर्व में कदम रखा है। हालाँकि, उनका मानना ​​है कि हमास की वजह से युद्धविराम के फैसले में बार-बार देरी हो रही है। उन्होंने सोमवार को मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी से मुलाकात की। उनकी अगली मुलाकात नेतन्याहू से है. मीडिया सूत्रों के मुताबिक ब्लिंकन गंज से भी मुलाकात करेंगे. वह इस सप्ताह जॉर्डन और कतर का भी दौरा करेंगे।

इज़राइल के युद्धकालीन कैबिनेट मंत्रियों में से एक बेनी गेंजर की पार्टी नेशनल यूनियन पार्टी ने हाल ही में इज़राइली संसद को भंग करने और चुनाव कराने के लिए एक विधेयक पेश किया है। 245 दिन. कोई नहीं जानता था कि वह कहाँ है, कैसा है, जीवित है या नहीं। पिछले साल 7 अक्टूबर को फिलिस्तीनी आतंकवादी समूह हमास द्वारा दक्षिणी इज़राइल में नोवा म्यूजिक फेस्टिवल से उनका अपहरण कर लिया गया था। आठ महीने बाद, इज़राइल रक्षा बलों (आईडीएफ) ने मध्य गाजा के नुसरत शिविर में हमास शिविर से 26 वर्षीय नोआ अरघमनी को बचाया। अपने परिवार के पास लौट आये.

नोआ को आखिरी बार एक वीडियो फुटेज में देखा गया था जो वायरल हो गया था। नूह और उसके प्रेमी, अविनाटल ओर, दोनों को हमास ने कैद कर लिया था। वीडियो में नोहा को जबरन मोटरसाइकिल पर बैठाकर ले जाया जा रहा है. जीवित रहने के लिए बेताब, युवती अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रही थी। चीखना, रोना. कोई लाभ नहीं। उन्हें अगले 245 दिनों तक गाजा में कैद रखा गया। आईडीएफ ने शनिवार को नुसेरात शिविर पर छापा मारा। नूह को वहां से बचाया गया। उनके साथ, तीन अन्य कैदियों को रिहा कर दिया गया – एंड्री कोज़लोव, अल्मोग मेर जान और श्लोमी ज़िव।

बचाव के बाद, नूह को तेल अवीव के एक अस्पताल में ले जाया गया। नोरा की मां लियोरा वहां भर्ती हैं. वह कैंसर से पीड़ित हैं. जीवन के अंतिम पड़ाव पर खड़े हैं. नूर के अपहरण के बाद उसकी शारीरिक स्थिति और भी खराब हो गई। बहुत दिनों के बाद माँ-बेटी का पुनः मिलन हुआ।

कैदियों की रिहाई की खबर सुनने के लिए आज हजारों इजरायली मध्य तेल अवीव के बंधक चौक पर एकत्र हुए। वे उत्सव मनाते हैं। उन्होंने बाकी कैदियों की रिहाई की मांग की. गाजा में अब भी 116 कैदी हैं. हालाँकि, सेना को संदेह है कि उनमें से 41 अब जीवित नहीं हैं।

इजरायल के प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और राष्ट्रपति इसहाक हर्ज़ोग ने फोन पर नूह को बधाई दी। नेतन्याहू ने कहा, “हमने एक पल के लिए भी उम्मीद नहीं छोड़ी है।” मुझे नहीं पता कि आप इस पर विश्वास करते हैं या नहीं, लेकिन हमें विश्वास था कि आप जीवित थे। यह सच है। हम बहुत खुश थे।”

आईडीएफ ने कल से मध्य गाजा के नुसेरात शिविर में एक अभियान शुरू किया है। हमले आज भी जारी हैं. मरने वालों की संख्या 274 से ज्यादा हो गई है. कम से कम 698 घायल हुए। अल-अक्सा अस्पताल के डॉक्टरों का कहना है, ”रक्त वाहिका सूख गई है.” अस्पताल में प्रवेश करना बूचड़खाने जैसा लगता है।” घायलों को इलाज के लिए ले जाने की कोई जगह नहीं है। कुछ लोग बेहद संकट में हैं. डॉक्टरों पर शवों और घायल मरीजों का बोझ है। स्थानीय पत्रकार बता रहे हैं कि मरने वालों की संख्या बढ़ेगी. नुसेरात शिविर अब ईंट-लकड़ी-पत्थर के मलबे का ढेर बन गया है। कंक्रीट स्लैब के नीचे कई और लोगों के दबे होने की आशंका है. स्थानीय प्रशासन, स्वयंसेवी संगठनों के कार्यकर्ता मलबे को हटाने और शवों और घायलों, यदि कोई हो, को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। इस बीच रेड अलर्ट प्रभावी है, इजरायली वायुसेना फिर से नुसेरा पर हवाई हमला कर सकती है.

दुनिया के लगभग सभी देश इजराइल की निंदा करते हैं. यूरोपीय संघ, संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच भी विरोध कर रहे हैं. पोप फ्रांसिस ने तत्काल शांति समझौते का आह्वान किया है। हालाँकि, इज़राइल अपनी स्थिति पर अड़ा हुआ है। उनके शब्दों में, हमास के अंत तक युद्ध नहीं रुकेगा।

तीसरी मोदी सरकार में बंगाल से कौन-कौन मंत्री? राज्य भाजपा में चार नामों को लेकर अटकलें तेज़

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मोदी की पहली कैबिनेट में राज्य से दो राज्य मंत्री थे. दूसरी बार पहली बार से दो लोग थे, लेकिन बाद में चार नये लोगों को राज्य मंत्री बनाया गया. इस बार मंत्रालय का बंटवारा इतना आसान नहीं है. हालाँकि, कई अटकलें हैं। बंगाल से बीजेपी के पास सिर्फ 12 सांसद हैं. लेकिन उनसे एक या दो मंत्री हो सकते हैं. यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि किसकी किस्मत खराब होगी। हालांकि पद्मा खेमे में कुछ नामों को लेकर जोरदार चर्चा चल रही है. दावा है कि चार लोगों की ‘संभावना’ ज्यादा है.

2014 में बीजेपी के टिकट पर राज्य से दो सांसद बने. सुरेंद्र सिंह अहलूवालिया दार्जिलिंग से और बाबुल सुप्रिया आसनसोल से जीते. दोनों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य मंत्री बनाया था. इसके बाद 2019 में राज्य में नतीजे पहले से बेहतर रहे, लेकिन मंत्रियों की संख्या नहीं बढ़ी. उस बार 18 जीते. उनमें से बाबुल को दोबारा मंत्री बनाया गया. लेकिन वह राज्य मंत्री भी हैं. रायगंज सांसद देबाश्री चौधरी को राज्य मंत्री बनाया गया। बाबुल अब तृणमूल में चले गये हैं और राज्य के मंत्री हैं. वहीं, देबाश्री कोलकाता दक्षिण सीट से नई-नई हारीं हैं। हालाँकि, बाबुल और देबाश्री पूरे कार्यकाल के लिए केंद्र में मंत्री नहीं रह सके। जुलाई 2021 में केंद्रीय कैबिनेट के फेरबदल में उन दोनों को हटा दिया गया और बंगाल से चार नये लोगों को मंत्री बनाया गया. चार सांसद अलीपुरद्वार से जॉन बारला, कूचबिहार से निशीथ प्रमाणिक, बांकुरा से सुभाष सरकार और बनगांव से शांतनु ठाकुर हैं। इस बार बीजेपी ने बराला को टिकट नहीं दिया. निशित और सुभाष नहीं जीते. अहलूवालिया, जो पूर्व में मंत्री थे, भी आसनसोल निर्वाचन क्षेत्र से हार गए। परिणामस्वरूप शांतनुई बंगाल से एकमात्र मंत्री हैं।

पिछली बार बीजेपी ने चार मंत्री बनाये थे. बारला को मूल रूप से उत्तर बंगाल के प्रतिनिधि के रूप में मंत्रालय मिला था। साथ ही, एक ईसाई होने के नाते वह अल्पसंख्यक भी हैं। और राजसमाज को प्रसन्न करने के लिए निशीथ को मंत्रालय दे दिया गया। जंगलमहल के प्रतिनिधि होने के अलावा, सुभाष को भाजपा के ‘आदि’ नेता के रूप में मंत्रालय मिला। और समाज के प्रतिनिधि के रूप में शांतनु मतुआ.

बीजेपी के अंदरखाने अटकलें हैं कि इस बार बंगाल से दो मंत्री बनाए जाने की संभावना है. हालाँकि कई लोग तीन लोगों के बारे में बात करते हैं, लेकिन इसकी संभावना कम है। हालांकि, राज्य बीजेपी नेताओं को लगता है कि शांतनु को मंत्रालय से नहीं हटाया जाएगा. क्योंकि, इस चुनाव में भले ही नतीजे खराब आएं, लेकिन मतुआ वोट बीजेपी के कब्जे में है. इस बात को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं कि इस बार उत्तर बंगाल से किसी को मंत्री बनाया जाएगा या नहीं. बता दें कि बीजेपी ने दिल्ली में जो 12 सीटें जीती हैं उनमें से छह उत्तर बंगाल में और छह सीटें दक्षिण बंगाल में हैं. उत्तर बंगाल से किसी को मंत्री बनाए जाने की संभावना के मामले में अलीपुरद्वार के मनोज तिग्गा सबसे आगे हैं। राज्य विधानसभा में मदारीहाट से विधायक चीफ कॉन्स्टेबल मनोज पुराने बीजेपी नेता हैं. जलपाईगुड़ी के डॉक्टर सांसद जयंतकुमार रॉय भी मैदान में हैं. निर्धारित वोटों के आधार पर उन्हें मंत्रालय दिया जा सकता है. लेकिन कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि इस बार बालुरघाट के विजेता सुकांत मजूमदार को पूर्ण मंत्री के रूप में प्रदेश अध्यक्ष पद पर भेजा जा सकता है। लेकिन इसकी संभावना कम है. क्योंकि, आपदा के बाद पार्टी जिस तरह से विरोध प्रदर्शनों को लेकर संगठनात्मक फेरबदल कर रही है, उससे स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है.

अटकलें लगाई जा रही हैं कि दक्षिण बंगाल से शांतनु को मंत्री बनाए जाने के बाद एक और व्यक्ति को मंत्रालय दिया जा सकता है. वह पूर्व न्यायाधीश अभिजीत गंगोपाध्याय हैं जो तमलुक से जीते हैं। अभिजीत पहली बार भाजपा के ‘वीआईपी’ उम्मीदवार के रूप में राजनीति में उतरे थे। हालांकि उन्हें मंत्री बनाए जाने की संभावना है, लेकिन पार्टी के अंदर बिष्णुपुर से दूसरी बार जीते सौमित्र खान को मंत्री बनाने की मांग भी हो रही है. कई लोगों का कहना है कि जिस तरह सौमित्र ने चुनाव जीतने के बाद राज्य नेतृत्व की आलोचना की लेकिन केंद्रीय नेतृत्व को लेकर चुप्पी साध ली, वह केंद्रीय नेतृत्व को संदेश दे रहे हैं. दूसरी ओर, तृणमूल ने नेतृत्व की सराहना की और पार्टी पर ‘दबाव’ भी बनाए रखा. हालांकि, 2019 में जीत के बाद जब भी मोदी कैबिनेट में फेरबदल हुआ तो सौमित्र ही मंत्रालय के दावेदार थे. उन्होंने टीम को कई तरह से वह संदेश भी दिया. लेकिन काम नहीं हुआ. इस बार जंगलमहल में बीजेपी का रिजल्ट पहले की तुलना में ‘खराब’ रहा है. सौमित्र की फूट जाएगी किस्मत? हालांकि, कई लोगों का कहना है कि पुरुलिया के ज्योतिर्मय महतो को सौमित्र द्वारा संगठनात्मक प्रभार में वापस रखा जा सकता है।

मंत्रालय को लेकर और भी नाम सामने आ रहे हैं. लेकिन सबसे ज्यादा अटकलें मनोज, जयंतकुमार, शांतनु और अभिजीत को लेकर हैं. यह पहली बार है कि मोदी गठबंधन राजनीति के ‘दायित्वों’ का पालन करते हुए सरकार बनाएंगे। वह चाहकर भी अपनी पार्टी के अधिक सांसद नहीं चुन सकते।

‘मोदी-शाह ने शेयरों में निवेश करने को कहकर निवेशकों को प्रभावित किया’! जांच के लिए तृणमूल ने सेबी से संपर्क किया

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साकेत का आरोप है कि मोदी-शाह ने लोकसभा में बीजेपी की जीत का संकेत देते हुए लोगों से शेयर बाजार में निवेश करने को कहा. उन्हें यह जांचना होगा कि इस टिप्पणी के जरिए कोई हेराफेरी हुई है या नहीं. नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने निवेशकों को शेयर बाजार में निवेश करने के लिए कहकर प्रभावित किया! तृणमूल ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के खिलाफ इसी तरह की शिकायतें लेकर बाजार नियामक सेबी से संपर्क किया। बंगाल की सत्ताधारी पार्टी ने सेबी चेयरपर्सन माधवी पुरी बुच को पत्र लिखकर पूरी जांच की मांग की है। इससे पहले, तृणमूल ने 5 जून को सेबी को एक पत्र भेजा था। पार्टी के राज्यसभा सांसद साकेत गोखल ने इस बात की जांच की मांग की कि क्या फर्जी बूथ रिटर्न सर्वेक्षणों के जरिए शेयर बाजार सूचकांक में हेरफेर किया गया था या नहीं। मंगलवार को तृणमूल एक नई शिकायत लेकर सेबी के पास पहुंची। साकेत ने भी पार्टी की ओर से यह शिकायत की थी.

उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी-शाह ने लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत का स्पष्ट संकेत देकर लोगों से शेयर बाजार में निवेश करने को कहा। उन्हें यह जांचना चाहिए कि इस टिप्पणी के जरिए शेयर बाजार में कोई हेराफेरी तो नहीं हो रही है. इसके अलावा, क्या मोदी, शाह या भाजपा से जुड़ी किसी कंपनी को 3 जून और 4 जून को शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव से फायदा हुआ, इसकी भी जांच की जानी चाहिए। गौरतलब है कि मोदी ने कहा था कि 4 जून के बाद शेयर बाजार इतना दौड़ेगा कि उसकी सांसें थम जाएंगी। शाह ने आम लोगों को 4 जून से पहले शेयर खरीदने की सलाह भी दी. उनका कहना था कि 4 जून के बाद बाजार में तेजी आएगी. वास्तव में, बूथफेरैट सर्वेक्षण में भारी सीटों की जीत के साथ मोदी सरकार की वापसी का संकेत मिलने के बाद सूचकांक अभूतपूर्व ऊंचाई पर पहुंच गया। लेकिन उम्मीदें पूरी न होने के कारण नतीजे वाले दिन सेंसेक्स 4000 अंक से ज्यादा गिर गया। निवेशकों को 31 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.

इसके बाद तृणमूल ने 5 जून को सेबी से संपर्क किया. साकेत ने सेबी अध्यक्ष माधवी पुरी बुच को पत्र लिखकर इस बात की पूरी जांच करने की मांग की थी कि क्या फर्जी बूथ रिटर्न सर्वेक्षणों के माध्यम से सूचकांक में धांधली की गई थी। तृणमूल सांसदों ने तर्क दिया कि लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण के बाद बूथ सर्वेक्षणों ने भाजपा और एनडीए के लिए भारी जीत की भविष्यवाणी की थी। नतीजा ये हुआ कि 3 जून को सेंसेक्स 2500 अंक चढ़ गया. कई निवेशकों ने भारी मुनाफा कमाया. लेकिन मतदान नतीजों के दिन 4 जून को सूचकांक 4389 अंक गिर गया। निवेशकों को 31 लाख करोड़ का नुकसान. तृणमूल ने आरोप लगाया कि बूथफेरैट सर्वेक्षण में शामिल एक एजेंसी को भाजपा ने अपना सर्वेक्षण करने के लिए नियुक्त किया था। एजेंसी ने मीडिया के लिए भी सर्वेक्षण किया। तृणमूल ने इस बात की जांच की मांग की कि क्या एजेंसी ने जानबूझकर भाजपा की जीत का संकेत दिया था और क्या किसी एजेंसी ने बाजार के उतार-चढ़ाव से लाभ उठाया था। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इसे लेकर चिंता जताई.

संयोग से, कांग्रेस ने पहले शेयर बाजार में निवेशकों को 30 लाख करोड़ रुपये के नुकसान को लेकर मोदी-शाह की जोड़ी पर निशाना साधा था।

महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव में बीजेपी हार गई. पद्मा के शीर्ष नेता देवेंद्र फड़नवीस, जो राज्य की एकनाथ शिंदे सरकार के उपमुख्यमंत्री भी हैं, अपनी जिम्मेदारी से इस्तीफा देना चाहते थे। लेकिन अमित शाह ने उस त्यागपत्र को स्वीकार नहीं किया. शुक्रवार को जब देवेन्द्र ने उसके घर जाकर इस बारे में बात की तो शाह ने उसे झिड़क दिया। सूत्रों के मुताबिक, शाह ने उनसे कहा कि अगर वह अभी इस्तीफा देंगे तो महाराष्ट्र में बीजेपी कार्यकर्ता और हताश हो जाएंगे.

पिछले लोकसभा चुनाव में एनडीए ने महाराष्ट्र की 48 में से 41 सीटें जीती थीं। उस समय एनडीए में बीजेपी और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली अविभाजित शिवसेना शामिल थी. इस साल वह समीकरण बदल गया है. अब एनडीए के सहयोगी दल शिंदे की शिवसेना और अजित पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी हैं। इस साल नए एनडीए गठबंधन ने महाराष्ट्र में 17 सीटें जीतीं. जिसमें से बीजेपी को सिर्फ नौ सीटें मिलीं. दूसरी ओर, विपक्षी गठबंधन भारत ने महाराष्ट्र में अच्छा प्रदर्शन किया है. उन्हें 30 सीटें मिलीं. महाराष्ट्र में बीजेपी के शीर्ष नेता देवेंद्र फड़णवीस मंगलवार को नतीजे आने के 24 घंटे के अंदर ही खराब नतीजों की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेते हुए इस्तीफा देना चाहते थे. हालाँकि, शाह ने उस त्याग पत्र को स्वीकार नहीं किया।

क्या अब बीजेपी को राजनीति बदलने की जरूरत है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब बीजेपी को राजनीति बदलने की जरूरत है या नहीं! लोकसभा चुनावों के नतीजे सामने आ चुके हैं। इस बार के चुनावों में बीजेपी को अपने दम पर बहुमत नहीं मिल पाया है। हालांकि एनडीए गठबंधन को बहुमत मिल चुका है। लेकिन मोदी और बीजेपी के 400 पार का नारा बेअसर साबित हो चुका है। लोकसभा चुनाव के जो नतीजे सामने आए हैं, उन्हें देखकर हर कोई हैरान है। नतीजों के बाद कुछ विश्लेषकों का कहना है कि मोदी को खुद को बदलने की जरूरत है। पिछले कुछ सालों में हुए चुनाव में दो बातें उभरी हैं, जिन्होंने भारतीय चुनावों पर जानकारों की राय को आकार दिया है। पहली बात, जो 1977 के ऐतिहासिक चुनाव के बाद से लगातार अंतराल पर साबित हुई है, वह यह है कि भारत में ‘सुरक्षित सीट’ शब्द एक गलत नाम है। दूसरी बात, जो कई दशकों से साबित भी हुई है, वह यह है कि जनमत सर्वे की सटीकता संदिग्ध है। इस चुनाव में एग्जिट पोल भी अनिश्चितताओं की इस सूची में शामिल हो गए हैं।

समय से पहले ही जीत की ओर अग्रसर बीजेपी नेतृत्व द्वारा लोकसभा में 400 सीटों की बाधा को पार करने की अपनी मंशा की घोषणा करना एक बात है। एक ऐसी उपलब्धि जो केवल एक बार 1984 में संभव हुई थी, और वह भी असाधारण परिस्थितियों में। हालांकि, यह अनुमान लगाना अलग बात है कि दो कार्यकाल के बाद भारी बहुमत की संभावना को मतदाता किस तरह से देखेंगे। हो सकता है कि सत्ताधारी दल को जनमत सर्वे से गुमराह किया गया हो, जिसमें एक उम्मीदवार के साथ राष्ट्रपति चुनाव का सुझाव दिया गया हो। हो सकता है कि बाजारों की उम्मीदें एग्जिट पोल के आशावाद से आकार ले रही हों, जिसमें मोदी के लिए पूरे भारत में लहर का सुझाव दिया गया हो। वास्तविकता जो भी हो, यह निवेशक वर्गों के लिए एक काला दिन था, और भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए एक गंभीर वास्तविकता की जांच थी, जो सुबह जश्न मनाने के मूड में निकले थे।

पिछले 10 सालों में जब से मोदी ने सत्ता संभाली है, भारत न केवल स्थिरता का आदी हो गया है, बल्कि केंद्र बिना झिझक बड़े फैसले लेने का भी आदी हो गया है। बीजेपी को अपने दम पर बहुमत न देकर और एनडीए को बहुमत देकर जनता ने मोदी सरकार की बिना झिझक फैसले लेने की बात को त्याग दिया है। इसके बजाय, उन्होंने अधिक से अधिक हिचकिचाहट और अनिश्चितता का विकल्प चुना है। हालांकि जनता ने इंडी गठबंधन को भी नहीं चुना है। क्या यह सिर्फ उन लोगों के हितों पर विचार करने के लिए एक चेतावनी थी जो विकासशील भारत की गति के साथ तालमेल नहीं रख पा रहे थे या एक धीमी गति से चलने वाले दृष्टिकोण का जश्न मनाने वाला एक बड़ा दार्शनिक संदेश था, इसका आकलन मोदी को करना होगा क्योंकि वह अपने तीसरे कार्यकाल की शुरुआत एक शांत नोट पर करना चाहते हैं। वह और उनके विचार-विमर्श चुनाव परिणामों का कैसे आकलन करते हैं, इसका निकट भविष्य पर असर पड़ेगा।

फिर भी, भाजपा के लिए यह चुनाव आंशिक रूप से ही असफल रहा। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और महाराष्ट्र में हार के कारण यह 272-बहुमत का आंकड़ा पार करने में विफल रही। पहले तीन राज्यों में यह शासन की विफलता और प्रमुख जातियों और दलितों की चिंताओं को दूर करने में असमर्थता थी। महाराष्ट्र में, विपक्ष को खत्म करके जीत सुनिश्चित करने की कोशिश ने नैतिक घृणा को जन्म दिया, जिसका शरद पवार जैसे चालाक नेता अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने में सफल रहे। इस चुनाव में भाजपा की मनमानी की छाप अच्छी नहीं दिखी है, और मोदी को सुधारात्मक नरम रुख के बारे में सोचना होगा। इसके लिए भाजपा की राज्य इकाइयों को सामान्य राजनीति की ओर लौटना होगा और जांच एजेंसियों पर कम निर्भर होना होगा।

हालांकि बीजेपी को इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखना होगा। कुल मिलाकर, उत्तरी और पश्चिमी भारत के अपने अन्य गढ़ों में भाजपा का प्रदर्शन शानदार था। गैर-पारंपरिक क्षेत्रों में अपनी छाप छोड़ने की इसकी महत्वाकांक्षा तमिलनाडु में पूरी तरह सफल नहीं हुई, लेकिन तेलंगाना, ओडिशा में भाजपा की सफलता के पैमाने और केरल की द्विध्रुवीय सर्वसम्मति को प्रभावित करने की इसकी क्षमता का अनुमान कौन लगा सकता था? बंगाल में निराशा हुई, एक ऐसा राज्य जहां मोदी ने अतिरिक्त प्रयास किया था। हालांकि, हार उस स्तर पर नहीं थी कि बंगाल मिशन को पूरी तरह से त्याग दिया जाए। संगठनात्मक बदलाव, नेतृत्व की स्पष्ट नीति और अधिक सांस्कृतिक रूप से बारीक नजरिया 2026 के विधानसभा चुनावों के लिए फायदेमंद साबित हो सकते हैं।

भले ही उनके एजेंडे के कुछ ज़्यादा कट्टरपंथी पहलुओं को शायद पीछे रखना पड़े, लेकिन अगर मोदी नाटकीय ढंग से खुद को फिर से गढ़ने का विकल्प चुनते हैं, तो वे फ़ैसले को गलत समझेंगे। उनका सामना कांग्रेस के एक सक्रिय इकॉसिस्टम से होगा जो बीजेपी को हराना चाहता है। मीडिया भी कम दोस्ताना हो जाएगा। यह कोई नई बात नहीं है। गुजरात के सीएम के तौर पर भी उन्हें ऐसी ही चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। आने वाले महीनों में देश का ध्यान इस बात पर रहेगा कि वे खतरों को अवसरों में कैसे बदलते हैं।

विकसित भारत और जीते हुए चुनाव के बारे में क्या बोले मोदी?

हाल ही में मोदी ने विकसित भारत और जीते हुए चुनाव के बारे में एक बयान दिया है! प्रधानमंत्री आवास पर बुधवार को हुई एनडीए की बैठक में सभी दलों ने सर्वसम्मति से नरेंद्र मोदी को अपना नेता चुन लिया है। पीएम आवास, 7 लोक कल्याण मार्ग पर हुई बैठक में एनडीए नेताओं ने प्रस्ताव पारित कर कहा, ‘भारत के 140 करोड़ देशवासियों ने पिछले 10 वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार की जनकल्याणकारी नीतियों से देश को हर क्षेत्र में विकसित होते देखा है। बहुत लंबे अंतराल, लगभग 6 दशक के बाद भारत की जनता ने लगातार तीसरी बार पूर्ण बहुमत से सशक्त नेतृत्व को चुना है। हम सभी को गर्व है कि 2024 का लोकसभा चुनाव एनडीए ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एकजुटता से लड़ा और जीता। हम सभी एनडीए के नेता नरेंद्र मोदी को सर्वसम्मति से अपना नेता चुनते हैं।’ एनडीए की बैठक के बाद पीएम मोदी ने कहा कि वे गठबंधन के साथियों के साथ मिलकर 140 करोड़ देशवासियों की सेवा को तैयार हैं और विकसित भारत के निर्माण के लिए काम करेंगे। प्रस्ताव में आगे कहा गया है कि, “मोदी जी के नेतृत्व में एनडीए सरकार भारत के गरीब-महिला-युवा-किसान और शोषित, वंचित व पीड़ित नागरिकों की सेवा करने के लिए प्रतिबद्ध है।प्रधानमंत्री मोदी को बधाई देते हुए उनके नेतृत्व में आस्था भी व्यक्त की। असम गण परिषद से अतुल बोरा, आजसू से सुदेश महतो, जेडीयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह एवं जेडीयू के राष्ट्रीय महासचिव संजय झा सहित एनडीए में शामिल अन्य सहयोगी दलों के भी कई नेता मौजूद रहे।पीएम मोदी के बगल में एक तरफ चंद्रबाबू नायडू, नीतीश कुमार और एकनाथ शिंदे और दूसरी तरफ जेपी नड्डा, राजनाथ सिंह और अमित शाह बैठे नजर आए। भारत की विरासत को संरक्षित कर देश के सर्वांगीण विकास हेतु एनडीए सरकार भारत के जन-जन के जीवन स्तर में सुधार लाने के लिए कार्य करती रहेगी।”

एनडीए की बैठक के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स ट्विटर पर पोस्ट करते हुए कहा, हमारे मूल्यवान एनडीए सहयोगियों से मुलाकात की। हमारा गठबंधन राष्ट्रीय प्रगति को आगे बढ़ाएगा और क्षेत्रीय आकांक्षाओं को पूरा करेगा। हम भारत के 140 करोड़ लोगों की सेवा करेंगे और विकसित भारत के निर्माण की दिशा में काम करेंगे।’ प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में पीएम आवास पर हुई बैठक में भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, बिहार के मुख्यमंत्री एवं जेडीयू नेता नीतीश कुमार, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एवं शिवसेना (शिंदे गुट) के नेता एकनाथ शिंदे, टीडीपी मुखिया चंद्रबाबू नायडू, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) से चिराग पासवान, एनसीपी (अजित पवार गुट) से प्रफुल्ल पटेल एवं सुनील तटकरे, अपना दल (एस) से अनुप्रिया पटेल, आरएलडी से जयंत चौधरी, जेडीएस से एचडी कुमारस्वामी, जनसेना पार्टी से पवन कल्याण, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा से जीतन राम मांझी, असम गण परिषद से अतुल बोरा, आजसू से सुदेश महतो, जेडीयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह एवं जेडीयू के राष्ट्रीय महासचिव संजय झा सहित एनडीए में शामिल अन्य सहयोगी दलों के भी कई नेता मौजूद रहे।

एनडीए की बैठक में भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने गुलदस्ता भेंटकर और सभी नेताओं ने तालियां बजाकर प्रधानमंत्री मोदी का अभिनंदन किया। बैठक में मौजूद सभी दलों के नेताओं ने जीत के लिए प्रधानमंत्री मोदी को बधाई देते हुए उनके नेतृत्व में आस्था भी व्यक्त की। पीएम मोदी के बगल में एक तरफ चंद्रबाबू नायडू, नीतीश कुमार और एकनाथ शिंदे और दूसरी तरफ जेपी नड्डा, राजनाथ सिंह और अमित शाह बैठे नजर आए।

बताया जा रहा है कि एनडीए की नई सरकार का शपथ ग्रहण समारोह 8 जून को हो सकता है। इससे पहले 7 जून को भाजपा संसदीय दल की बैठक में भाजपा के सभी सांसद मिलकर नरेंद्र मोदी को पार्टी के संसदीय दल के नेता के तौर पर चुनेंगे। इसके बाद एनडीए के सभी सांसदों की बैठक होगी, जिसमें नरेंद्र मोदी को एनडीए संसदीय दल का नेता चुना जाएगा। विकसित भारत के निर्माण के लिए काम करेंगे। प्रस्ताव में आगे कहा गया है कि, “मोदी जी के नेतृत्व में एनडीए सरकार भारत के गरीब-महिला-युवा-किसान और शोषित, वंचित व पीड़ित नागरिकों की सेवा करने के लिए प्रतिबद्ध है।इसके अगले दिन 8 जून को नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ लेंगे। इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में पीएम आवास में केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में वर्तमान लोकसभा (17वीं लोकसभा) को भंग करने की सिफारिश को मंजूरी दी गई थी, जिसे राष्ट्रपति ने मंजूर करते हुए वर्तमान लोकसभा को भंग कर दिया है!