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आखिर कौन है विलेज डिफेंस गार्ड्स?

आज हम आपको विलेज डिफेंस गार्ड्स के बारे में जानकारी देने वाले हैं! जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों के खिलाफ जंग में भारतीय सेना अब गांव वालों को भी ट्रेनिंग दे रही है। गांव वाले मतलब गांव के वे लोग जो विलेज डिफेंस गार्ड्स के सदस्य हैं। पहले इसे विलेज डिफेंस कमिटी कहा जाता था। इसमें गांव के लोग ही सदस्य होते हैं। जम्मू-कश्मीर पुलिस के साथ मिलकर सेना ने ट्रेनिंग देना शुरू किया है और इस वक्त करीब 600 लोगों की ट्रेनिंग चल रही है। सेना यूनिट लेवल पर विलेज डिफेंस गार्ड्स को ट्रेनिंग दे रही है। इसमें सेना के कोर बैटल स्कूल सरोल के इंस्ट्रक्टर्स भी मदद कर रहे हैं। विलेज डिफेंस गार्ड्स को वह जरूरी स्किल सिखाई जा रही हैं ताकि वह आतंकी खतरों से अपने गांव की रक्षा कर सकें। इससे रीजन का पूरा सिक्योरिटी नेटवर्क मजबूत होगा। उन्हें ऑटोमेटिक राइफल चलाना, स्क्वैड पोस्ट ड्रिल और कुछ टेक्टिस सिखाई जा रही है। ह्यूमन इंटेलिजेंस के तौर पर हो या फिर मददगार के तौर पर। सफल जुगलबंदी हिल काका में दिखी। पुंछ जिले के सूरनकोट के पास पीर पंजाल की पहाड़ियों में हिल काका का इलाका साल 2000 के आसपास आतंकियों का गढ़ बन गया था। हिल काका में गुर्जर-बकरवाल रहते हैं।राजौरी एरिया में 500 विलेज डिफेंस गार्ड्स को ट्रेंड किया जा चुका है। डोडा और किश्वाड़ में भी करीब 90-90 लोगों को ट्रेंड किया गया है। ट्रेनिंग के साथ ही उन्हें सेल्फ लोडिंग राइफल भी इश्यू की जा रही है।

गृह मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर में 30 सितंबर 1995 को विलेज डिफेंस कमेटी का गठन किया था, इसका मकसद जम्मू-कश्मीर में बॉर्डर के पास वाले इलाकों में लोगों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग देकर उन्हें आतंकियों से गांव की रक्षा करने के लिए सशक्त बनाना था। यह वह दौर था जब आतंक अपने चरम पर था। तब डोडा , उधमपुर , रियासी , राजौरी , पुंछ, कठुआ और सांबा जिलों में विलेज डिफेंस कमिटी बनाई गई। साल 2022 में इसका नाम बदलकर विलेज डिफेंस गार्ड्स कर दिया गया। इसमें गांव के कुछ लोग मेंबर होते हैं और ये जिले के एसपी या एसएसपी के निर्देश पर काम करते हैं। इसके मेंबर को एक गन और 100 राउंड दिए जाते हैं।

नई स्कीम के तहत जो सदस्य विलेज डिफेंस गार्ड्स को लीड कर रहा है उसे हर महीने सरकार की तरफ से 4500 रुपये और हर सदस्य को 4000 रुपये महीने दिए जाते हैं। एक ग्रुप में करीब 15 लोग होते हैं। इनके पास हथियारों का लाइसेंस होता है। पिछले कुछ वक्त में जम्मू रीजन में आतंकी वारदातों में बढ़ोतरी हुई, जिसके बाद विलेज डिफेंस गार्ड्स पर फिर से ज्यादा फोकस किया जाने लगा है। जम्मू-कश्मीर में चुनाव भी हैं तो बीजेपी ने भी वादा किया है कि विलेज डिफेंस गार्ड्स को ऑटोमेटिक राइफल्स दे कर और मजबूत किया जाएगा।

आतंकवादियों के खिलाफ सफल ऑपरेशन के लिए सेना को आवाम का साथ जरूरी है। चाहे ह्यूमन इंटेलिजेंस के तौर पर हो या फिर मददगार के तौर पर। सफल जुगलबंदी हिल काका में दिखी। पुंछ जिले के सूरनकोट के पास पीर पंजाल की पहाड़ियों में हिल काका का इलाका साल 2000 के आसपास आतंकियों का गढ़ बन गया था। हिल काका में गुर्जर-बकरवाल रहते हैं।

वहां पर 600-700 आतंकियों का ट्रेनिंग कैंप बन गया था। फिर सेना ने आतंकवादियों के खात्मे के लिए प्लान बनाया। 17 गुर्जर लड़कों को भी सेना ने ट्रेंड किया, इसका फायदा ये था कि ये लड़के इलाके के चप्पे चप्पे से वाकिफ थे। फिर 17 अप्रैल 2003 को ऑपरेशन लॉन्च किया गया, ऑपरेशन सर्प विनाश। हिल काका में 70 किलोमीटर के जंगल एरिया में आतंकियों ने अपना कब्जा जमाया था। बता दें कि रीजन का पूरा सिक्योरिटी नेटवर्क मजबूत होगा। उन्हें ऑटोमेटिक राइफल चलाना, स्क्वैड पोस्ट ड्रिल और कुछ टेक्टिस सिखाई जा रही है। राजौरी एरिया में 500 विलेज डिफेंस गार्ड्स को ट्रेंड किया जा चुका है। डोडा और किश्वाड़ में भी करीब 90-90 लोगों को ट्रेंड किया गया है। वहां करीब 700 आतंकवादी थे।गृह मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर में 30 सितंबर 1995 को विलेज डिफेंस कमेटी का गठन किया था, इसका मकसद जम्मू-कश्मीर में बॉर्डर के पास वाले इलाकों में लोगों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग देकर उन्हें आतंकियों से गांव की रक्षा करने के लिए सशक्त बनाना था। गुर्जर लड़कों ने और आर्मी ने मिलकर 83 आतंकी मारे और बाकी आतंकवादी पाकिस्तान भाग गए। आवाम और आर्मी की जुगलबंदी सफल हुई। वहां एक मेमोरियल भी बनाया गया है। जिसका नाम है जवान और आवाम मेमोरियल।

अमेरिका में जाकर आरएसएस के बारे में क्या बोले राहुल गांधी?

हाल ही में राहुल गांधी ने अमेरिका में जाकर आरएसएस के लिए एक बयान दे दिया है! राहुल गांधी अमेरिका में हैं और आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) पर हमला कर रहे हैं। उन्होंने आरएसएस की विचाराधारा को संकुचित और एकपक्षीय बताया है। उन्होंने इस बात की आलोचना की कि आरएसएस भारत को ‘एक’ विचार मानता है। राहुल कहते हैं कि भारत एक विचार नहीं बल्कि कई विचारों का सम्मिलन है। उन्होंने कहा, ‘आरएसएस का मानना है कि भारत एक विचार है। हमारा मानना है कि भारत बहुत सारे विचारों से मिलकर बना है। हमारा मानना है कि हर किसी को सपने देखने की इजाजत मिले, बिना किसी की परवाह के। बिना उसका धर्म-रंग देखे मौके मिलें।’ लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी पर भी हमला बोला। उन्होंने कहा कि दोनों संविधान को नुकसान पहुंचाने की चाहत रखते हैं जिसे इस बार के लोकसभा चुनावों के वक्त लोगों ने भांप लिया। राहुल ने कहा, ‘चुनाव में भारत के लाखों लोगों को साफ तौर से पता चला कि प्रधानमंत्री संविधान पर हमला कर रहे थे। मैं जो बाते कर रहा हूं वह संविधान में है। राज्यों का संघ, भाषा का सम्मान, धर्म का सम्मान।’ सवाल है कि क्या आरएसएस, बीजेपी या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ये नहीं मानते हैं कि भारत में कई राज्य हैं? क्या वो राज्यों को संविधान में मिले अधिकारों से वंचित कर रहे हैं? क्या आरएसएस-बीजेपी और मोदी भाषा का सम्मान, धर्म का सम्मान नहीं करते? अगर राहुल गांधी का जवाब हां में है तो वो किन पैमानों पर परखकर इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं? फिर सवाल यह भी कि क्या राहुल अपने तय पैमानों पर ही खुद को, कांग्रेस पार्टी को, उनके सहयोगी दलों को परखेंगे?

आरएसएस स्वयं को सामाजिक संस्था बताता है। आरएसएस के स्वयंसेवक भयंकर आपदा के वक्त प्रभावित इलाकों में जाते हैं और राहत कार्य में हिस्सा लेते हैं। आरएसएस के विभिन्न प्रभाग शिक्षा, समाज सेवा जैसे मानवतावादी कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। इतना ही नहीं, युद्ध के वक्त भी आरएसएस भारत और भारतीयों की सेवा में अपनी भूमिका ढूंढता है और उसे निभाता है। कई महापुरुषों ने आरएसएस की भारत भक्ति की प्रशंसा की है। इंदिरा गांधी ने तो स्वतंत्रता दिवस के परेड में आरएसएस को अपनी झांकी शामिल करने की अनुमति दी थी।

आरएसएस की राजनीतिक शाखा बीजेपी की देश में लगातार तीसरी बार सरकार बनी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ का नारा दिया है। आरएसएस भी सांप्रदायिक, भाषाई, जातीय, इलाकाई समेत तमाम पैमानों पर एकता सुनिश्चित करने का हरसंभव प्रयास करता रहता है। उसका एक प्रभाग ‘मुस्लिम मंच’ हिंदू-मुस्लिम एकता की दिशा में लंबे समय से कार्यरत है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत वक्त-वक्त पर गैर-हिंदू धर्मगुरुओं से मिलते रहते हैं।

राहुल गांधी कहते हैं कि आरएसएस महिलाओं से उम्मीद करता है कि वो कम बोलें और घर में रहें। कहते हैं ना प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम् (प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरूरत क्या)? भारत ही नहीं, दुनिया भर में वो कौन सा समुदाय है जो महिलाओं से कम बोलने और घरों में रखना चाहता है? राहुल अगर अपने चापलूसों के बजाय किसी भी सामान्य बुद्धि के व्यक्ति से पूछ लेते तो संभवतः एक ही जवाब मिलता। देश के कौन से इलाके में आरएसएस ने महिलाओं को बंधनों में जकड़ने की कोशिश की है? आरएसएस ने कब महिलाओं के लिए ‘जीवन की शर्तें’ तय की हैं या कोई ‘ये करो, ये नहीं करो’ का ‘फतवा’ जारी किया है? आरएसए कार्यकर्ताओं को कब महिलाओं पर अत्याचार करते देश ने देखा है? लेकिन जहां ये सब होता है, क्या राहुल कभी बोलने की हिम्मत जुटा पाएंगे? जवाब है- कभी नहीं। जहां महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले आधे दिमाग का लिखित ऐलान है, राहुल गांधी कभी उधर उंगली उठा पाएंगे? जवाब है नहीं- संभव, कल्पना से परे।

आरएसएस सांप्रदायिक है? हो सकता है। होगा भी। क्या राहुल गांधी को सांप्रदायिकता से दिक्कत है? हो सकता है। होगा भी। लेकिन क्या राहुल गांधी को मुस्लिम सांप्रदायिकता से भी दिक्कत है? बिल्कुल नहीं। अगर ऐसा होता तो वो सबसे पहले अपनी मां सोनिया गांधी से पूछते कि आखिर बटला हाउस एनकाउंटर में मारे गए आतंकियों के लिए उनके आंसू क्यों निकले थे? कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री रह चुके सलमान खुर्शीद ने ये दावा किया है, आरएसएस-बीजेपी ने आरोप नहीं लगाए। इसलिए उन आतंकियों के लिए सोनिया के रोने से ‘धर्मनिरपेक्ष’ राहुल को पीड़ा तो होनी चाहिए जिन्होंने दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की जान ले ली। क्या राहुल ने कभी सीमी, पीएफआई समेत तमाम मुस्लिम आतंकी संगठनों पर एक शब्द भी बोला है?

अगर ये महिलाओं को घरों की चहारदिवारियों में बंद रखना चाहते हैं तो मोदी सरकार ने कामकाजी महिलाओं के लिए वर्कप्लेस पर ज्यादा सुविधाओं की चिंता क्यों की और उनके लिए मातृत्व अवकाश बढ़ाकर छह हफ्ते क्यों कर दिया? सोचिए, जो महिलाओं को घरों में समेटकर रखना चाहता है, वो घर से निकलने वाली महिलाओं के लिए सुविधाएं बढ़ा रहा है! तमिलनाडु में हिंदी भाषियों, उत्तर भारतीयों के विरोध की राजनीति से ही जो दल सरकार में आता है, उस डीएमके से गठबंधन किसका है?

आखिर आरएसएस और बीजेपी में क्यों हो रही है तनातनी?

वर्तमान में आरएसएस और बीजेपी में तनातनी होती जा रही है! आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने एक बार फिर अपने बयानों से सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। भागवत के बयानों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना के तौर पर देखा जा रहा है। इस बार भागवत ने लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान मोदी के उस दावे पर परोक्ष रूप से निशाना साधा है, जिसमें उन्होंने खुद को ‘ईश्वर का एक साधन’ बताया था। पुणे में एक सभा को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा, ‘हमें खुद को भगवान नहीं समझना चाहिए। लोगों को तय करने दें कि आप भगवान हैं या नहीं।’ दरअसल मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान एक इंटरव्यू में कहा था, ‘जब मेरी मां जीवित थीं, तो मैं मानता था कि मेरा जन्म जैविक रूप से हुआ है। उनके निधन के बाद … मुझे विश्वास हो गया है कि भगवान ने मुझे भेजा है। यह ऊर्जा जैविक शरीर से नहीं आ सकती, बल्कि भगवान ने मुझे दी है … मैं भगवान का काम करने के लिए एक जरिया हूं। यह तीसरा मौका है जब लोकसभा चुनावों के बाद भागवत ने पीएम मोदी पर परोक्ष रूप से निशाना साधा है। हैरानी की बात यह है कि भागवत का यह बयान केरल के पलक्कड़ में आरएसएस की वार्षिक बैठक के बाद आया है, जिसमें बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा और बीएल संतोष भी शामिल हुए थे। इससे पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के आवास पर भी एक हाई लेवल बैठक हुई थी, जिसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, नड्डा और आरएसएस नेता मौजूद थे। भागवत के ताजा बयान से संकेत मिलता है कि इतनी बैठकों के बावजूद संघ और बीजेपी के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा।

मोदी ने राम मंदिर, अनुच्छेद 370 को निरस्त करना, तीन तलाक और समान नागरिक संहिता जैसे आरएसएस के मुख्य एजेंडे को तो लागू कर दिया है, लेकिन आरएसएस को उनके काम करने के तरीके से दिक्कत हो रही है। इसे संघ नेता ‘व्यक्तिवाद’ कहते हैं। संघ को एक नेता के हाथ में ज्यादा पावर को लेकर आपत्ति है। लोकसभा चुनाव में भी आरएसएस कार्यकर्ताओं ने पहले के चुनावों की तरह ज्यादा जोश और उत्साह के साथ बीजेपी का प्रचार नहीं किया था। कुछ लोग इसकी वजह बीजेपी के 400 पार के नारे से उपजे अतिउत्साह को मानते हैं। वहीं बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने लोकसभा चुनावों से पहले कहा था कि पार्टी को अब संघ के हाथ पकड़ने की जरूरत नहीं है। नड्डा का यह बयान शायद ही संघ को पसंद आया होगा।

लेकिन बीजेपी और आरएसएस दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। न बीजेपी आरएसएस के बिना रह सकती है और संघ पार्टी के बगैर। आरएसएस शायद ही कांग्रेस या विपक्ष की वापसी की कामना करेगा। क्योंकि संघ जानता है कि बीजेपी ने जो कुछ भी किया है उसे विपक्ष ध्वस्त कर सकता है। इसमें सरकार, नौकरशाही और शिक्षा जगत में प्रमुख पदों पर बैठे लोग अपने विचार परिवार के लोगों को आगे बढ़ाना भी शामिल है।

पलक्कड़ बैठक के बाद आरएसएस ने यह स्वीकार करते हुए कि भाजपा के साथ उसके मतभेद हैं, कहा कि इन्हें परिवार के भीतर सुलझा लिया जाएगा। भाजपा और संघ नेतृत्व के समक्ष तात्कालिक मुद्दा यह है कि नड्डा के बाद पार्टी अध्यक्ष कौन बनेगा और भागवत के बयान को इस पर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व पर दबाव बनाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी को स्पष्ट रूप से आरएसएस के विचारों और चिंताओं को ध्यान में रखना होगा। नए साल में बनने वाले पार्टी अध्यक्ष के लिए कई नामों पर चर्चा चल रही है। इसमें सुनील बंसल, विनोद तवड़े, देवेंद्र फडणवीस, भूपेंद्र यादव और धर्मेंद्र प्रधान शामिल हैं। अगर आगामी चार विधानसभा चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा तो क्या उसे अपने किसी वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी या शिवराज सिंह चौहान को कमान संभालने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

इसके अलावा आरएसएस ने पलक्कड़ में जाति जनगणना का समर्थन करके सभी को चौंका दिया। संघ ने जातिगत आंकड़ों का उपयोग केवल सामाजिक कल्याण के लिए करने और चुनावी राजनीति के लिए नहीं करने का आह्वान किया, जो संभव नहीं है। क्योंकि आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त दलित, आदिवासी और ओबीसी स्वाभाविक रूप से सत्ता संरचना में अधिक हिस्सेदारी की मांग करेंगे। इसके अलावा, अगर ओबीसी को पता चलता है कि वे आबादी का 65% हैं – जैसा कि पिछले साल बिहार में जाति सर्वेक्षण के दौरान हुआ था – तो वे सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में केवल 27% आरक्षण से संतुष्ट नहीं रहेंगे। जाति जनगणना को अपनी मंजूरी देकर आरएसएस भाजपा के बचाव में आ गया है। पार्टी को जाति जनगणना की विपक्ष की लगातार मांग से दिक्कत हो रही थी, जिसका लोकसभा चुनावों में असर दिखा था। भाजपा को जाति जनगणना पर फैसला लेना होगा। अभी तक वह इस पर अस्पष्ट रही है।

आखिर पाकिस्तान और ईरान में कैसे मारे गए थे रॉ के एजेंट?

एक समय ऐसा था जब पाकिस्तान और ईरान में रॉ के एजेंट मारे गए थे! हर देश अपने मतलब वाले दूसरे देशों की हलचल पर नजर रखता है। आखिर वहां हो क्या रहा है? क्या तैयारी की जा रही है? अगर वे दुश्मन मुल्क हैं या फिर प्रतिद्वंद्वी तब तो और भी ज्यादा नजर रखी जाती है। कहीं वे कुछ ऐसा तो नहीं प्लान कर रहे जो हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा या राष्ट्रीय हितों के लिए खतरा है? इसीलिए देशों की अपनी खुफिया एजेंसी होती हैं जो गुप्त और संवेदनशील सूचनाएं जुटाती हैं। इसके कई तरीके होते हैं- ह्यूमन इंटेलिजेंस, सिग्नल्स इंटेलिजेंस, इमेजरी या सैटलाइट इंटेलिजेंस, ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस…। इनमें सबसे मुश्किल है ह्यूमन इंटेलिजेंस जिसके लिए विदेश में विश्वसनीय एसेट तैयार किए जाते हैं जो आपके लिए संवेदनशील सूचनाएं जुटाते हैं। लेकिन क्या किसी देश में शीर्ष पर बैठे लोग ही विदेश में अपने एजेंट्स की जानकारी, नाम-पता संबंधित देश को देश सकते हैं? आपका जवाब होगा नहीं, हरगिज नहीं। लेकिन वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह ने एक टीवी कार्यक्रम में पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी और पूर्व प्रधानमंत्री आईके गुजराल को लेकर बड़ा दावा किया है। उन्होंने दावा किया कि दोनों ने ईरान और पाकिस्तान को वहां सक्रिय भारतीय एजेंटों के नाम-पता समेत पूरी जानकारी दे दी थी, जिसका नतीजा हुआ कि वे सारे के सारे एजेंट मारे गए। इन झटकों से भारतीय खुफिया एजेंसियां अभी तक पूरी तरह नहीं उबर पाई हैं। इसके अलावा सिंह ने दावा किया कि 2009 में मिस्र के शर्म अल शेख में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कबूल किया था कि भारत पाकिस्तान के बलूचिस्तान में गड़बड़ी कर रहा है। उन्होंने इसे आजादी के बाद भारत की सबसे भयंकर भूल करार दिया। एक कार्यक्रम में एंकर ने चर्चा के दौरान कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले से (2016 में) पाकिस्तान के बलूचिस्तान का नाम लिया था। इससे पहले शायद भारत सरकार की तरफ से कभी बलूचिस्तान या बलूचों के बारे में बात नहीं की गई थी। इस पर पैनल में शामिल सीनियर जर्नलिस्ट प्रदीप सिंह ने कहा कि ऐसा नहीं है। डॉक्टर मनमोहन सिंह ने शर्म अल शेख में बलूचिस्तान पर बयान दिया था। उन्होंने कहा, ‘मनमोहन सिंह ने शर्म-अल शेख में जो बयान दिया, समस्या तो वहां से शुरू हुई। उन्होंने कहा कि हमारे भी लोग बलूचिस्तान में गड़बड़ कर रहे हैं। वहां से पाकिस्तान को एक मुद्दा मिल गया कि देखिए हमारे ऊपर आप कश्मीर में गड़बड़ी का आरोप लगाते हैं और आप खुद ये बलूचिस्तान में करा रहे हैं। आजादी के बाद इससे बड़ी भयंकर गलती शायद दूसरी नहीं हुई।’

मनमोहन सिंह के शर्म अल शेख वाले बयान का जिक्र करते हुए प्रदीप सिंह ने एक और पूर्व प्रधानमंत्री आईके गुजराल और पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को लेकर भी बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा कि गुजराल साहब ने तो पाकिस्तान को भारत की खुफिया एजेंसी रिसर्च ऐंड ऐनालिसिस विंग ( R&AW ) के सभी एजेंट के नाम और पता कागज पर लिखकर दे दिया और वे सभी मार दिए गए। उन्होंने कहा, ‘गुजराल साहब जब प्राइम मिनिस्टर बने तब उन्होंने R&AW के जितने एजेंट्स थे, हमारे एसेट्स थे उन सभी का पता पाकिस्तान को दे दिया। सबके सब मारे गए।’

सीनियर जर्नलिस्ट के दावे बड़े जरूर हैं मगर सनसनीखेज नहीं। उनके दावों की हकीकत चाहे जो हो लेकिन भारत के इतिहास में ऐसे उदाहरण पहले से मौजूद हैं जब शीर्ष पदों पर बैठे जिम्मेदार लोगों ने ऐसी गलतियां कीं, जिससे भारतीय खुफिया एजेंसियों को बहुत ही तगड़े झटके लगे। पूर्व प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई तो पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के बारे में बड़ी मुश्किल से जुटाई गई संवेदनशील सूचना के बारे में पाकिस्तान के ही शासक को बता दिया था। नतीजा ये हुआ कि पाकिस्तान में सक्रिय भारत के सारे एजेंट और एसेट को वहां की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई ने मरवा दिया।

दरअसल, 70 के दशक में पाकिस्तान परमाणु बम बनाने की दिशा में तेजी से काम कर रहा था। इस बात की भनक भारत को लग गई। दरअसल, इस्लामाबाद के नजदीक कहूटा में पाकिस्तान के वैज्ञानिक किसी महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। वैज्ञानिक जिस सैलून में अपना बाल कटवाने जाते थे, भारतीय एजेंट ने वहां से कटे बालों को सैंपल के तौर पर चुरा लिया और भारत भेज दिया। यहां बालों की जब लैब में हुई जांच में जो जानकारी आई वो होश उड़ाने वाली थी। बालों में रेडियोएक्टिव रेडिएशन के सबूत मिले। इससे भारत को पता चल गया कि कहूटा में पाकिस्तानी वैज्ञानिक जिस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं वह तो उनकी न्यूक्लियर प्लांट है। फिर क्या था, पाकिस्तान के न्यूक्लियर प्लांट और उसकी परमाणु योजना के बारे में डीटेल जानकारी के लिए भारत ने वहां अपने खुफिया नेटवर्क को सक्रिय कर दिया।

1977 में रॉ के एजेंट के हाथ कहूटा न्यूक्लियर प्लांट का पूरा का पूरा ब्लू प्रिंट ही लग गया। इस बीच इमर्जेंसी के बाद हुए चुनाव में इंदिरा गांधी सत्ता से बाहर हो गईं और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार आ गईं। उधर एजेंट ने कहूटा न्यूक्लियर प्लांट का ब्लूप्रिंट देने के लिए भारत से 10 हजार डॉलर की मांग की। लेकिन ब्लूप्रिंट के लिए पैसा देना तो दूर, मोरारजी देसाई ने तो सीधे पाकिस्तान के तत्कालीन सैन्य शासक जिया-उल-हक को फोन करके बता दिया कि उन्हें सब पता है कि कहूटा में क्या चल रहा है। आप परमाणु बम बना रहे हो। इसके बाद तो हक के कान खड़े हो गए और उसने आईएसआई को भारतीय एजेंटों की पहचान करने और उन्हें खत्म करने के काम पर लगा दिया। भारत के हाथ पाकिस्तानी न्यूक्लियर प्लांट का ब्लूप्रिंट भी नहीं मिला और वहां उसके सारे एसेट्स भी मार दिए गए।

इसी तरह पूर्व प्रधानमंत्री आईके गुजराल ने तो पाकिस्तान के लिए बनी R&AW की स्पेशल विंग को ही भंग कर दिया। भारतीय एजेंसियों को आदेश दे दिया गया कि वे पाकिस्तान में कोई भी कोवर्ट ऑपरेशन न चलाए। गुजराल के आदेश पर R&AW को पाकिस्तान में अपने पूरे नेटवर्क को खत्म करने के लिए मजबूर होना पड़ा। गुजराल की इस गलती की कीमत भारत ने करगिल युद्ध के तौर पर चुकाई। दो साल बाद ही 1999 में भारत को करगिल में पाकिस्तानी सैनिकों की घुसपैठ के बारे में पता चला और दोनों देशों के बीच युद्ध हुआ। पाकिस्तानी सेना लंबे समय से तैयारी कर रही थी और भारतीय इलाकों में घुसकर बंकर वगैरह बना लिए थे। वहां भारी हथियार पहुंचा लिए थे। वह इतने बड़े पैमाने पर तैयारी कर रहा था लेकिन भारत को इसकी भनक तक नहीं लगी। हमें तो करगिल में पाकिस्तान के नापाक मंसूबों के बारे में तब पता चला जब चरवाहों ने जानकारी दी कि पाकिस्तानी सेना भारतीय इलाकों में घुसी हुई है।

क्या आने वाले समय में पाकिस्तान से भारत के रिश्ते सुधरेंगे?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या आने वाले समय में पाकिस्तान से भारत के रिश्ते सुधरेंगे या नहीं! आपकी जानकारी के लिए बता दे कि एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाक्रम में, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने आधिकारिक तौर पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस अक्टूबर में इस्लामाबाद आने का निमंत्रण दिया है। यह निमंत्रण आगामी शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शासनाध्यक्षों की परिषद की बैठक से जुड़ा है। हालांकि, इन दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक रूप से तनावपूर्ण संबंधों को देखते हुए, मोदी के पाकिस्तान आने की संभावना काफी दूर की कौड़ी लगती है। भारत के साथ चल रहे तनाव के कारण पिछले आठ वर्षों में सार्क शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने के इस्लामाबाद के असफल प्रयासों से इसका उदाहरण मिलता है। भारत ने भी पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी को 2023 में गोवा में आयोजित विदेश मंत्रियों की बैठक के लिए निमंत्रण भेजा था। मोदी को पाकिस्तान से मिला निमंत्रण भी एससीओ के इसी बहुपक्षीय ढांचे के अनुरूप एक औपचारिकता है। यही वजह है कि पाकिस्तान निमंत्रण भेजने के बावजूद एससीओ मीटिंग में पीएम मोदी की मौजूदगी की उम्मीद नहीं कर रहा है। पाकिस्तान की इस आशंका की वजह सिर्फ भारत से उसका तनावपूर्ण रिश्ता ही नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकार प्रमुखों की बैठकों के बजाय एससीओ राष्ट्राध्यक्षों की परिषद के शिखर सम्मेलनों में भाग लेने की अपनी परंपरा बनाई है। सरकार प्रमुखों की बैठकों में विदेश मंत्री एस. जयशंकर भाग लिया करते हैं।

मोदी एससीओ राष्ट्राध्यक्षों के शिखर सम्मेलनों में नियमित रूप से भाग लेते रहे हैं, हालांकि इस साल की शुरुआत में संसद सत्र चालू होने के कारण वो कजाकिस्तान में आयोजित शिखर सम्मेलन में शामिल नहीं हो पाए थे। फिर भी, उन्होंने कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट टोकायेव को शिखर सम्मेलन के लिए भारत के समर्थन का आश्वासन दिया, जो इस सुरक्षा केंद्रित गठबंधन के प्रति भारत के समर्पण को दर्शाता है। इस ब्लॉक में कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान जैसे मध्य एशियाई देशों के साथ-साथ चीन, रूस और ईरान शामिल हैं।

भारत ने 2005 में एक पर्यवेक्षक के रूप में एससीओ में शामिल होने और 2017 में पाकिस्तान के साथ पूर्ण सदस्यता प्राप्त करने के बाद से संगठन में सक्रिय भूमिका निभाने का प्रयास किया है। अफगानिस्तान से अमेरिका की तेज वापसी की पृष्ठभूमि को देखते हुए यह जुड़ाव भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत क्वाड और एससीओ, दोनों में अपनी भागीदारी के माध्यम से अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (स्ट्रैटिजिक अटॉनमी) का प्रयोग करना चाहता है। इसके अलावा, एससीओ के चार्टर में जम्मू-कश्मीर जैसे द्विपक्षीय मामलों पर चर्चा पर प्रतिबंध है। इस कारण भी भारत को एससीओ शामिल होने में कोई परेशानी नहीं है।

भारत एससीओ का समर्थन तो करता है, लेकिन बिना शर्त नहीं। जयशंकर ने आतंकवाद से लड़ने के लिए समूह के मूल मिशन को बारीकी से उजागर किया है। भारत कभी पाकिस्तान का स्पष्ट उल्लेख नहीं करता है, लेकिन इस मुद्दे पर विचार और व्यवहार में दोहरेपन के खिलाफ सतर्क करता रहता है। मोदी ने भी आतंकवाद के संकट का समाधान ढूंढने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने पाकिस्तान में नामित आतंकवादी संगठनों से जुड़े व्यक्तियों के संबंध में संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध पर चीन के प्रभाव पर भी संकेतों में बात की है।

भारत एससीओ के भीतर कनेक्टिविटी के महत्व को पहचानता है। भारत की सोच बिल्कुल स्पष्ट है कि इस तरह की पहलों को सदस्य राज्यों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना चाहिए। यह विषय विशेष रूप से चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे को लेकर बहुत महत्वपूर्ण है जो पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) से होकर गुजरता है। दिलचस्प है कि भारत एससीओ का एकमात्र सदस्य है जो चीन की बेल्ट एंड रोड पहल का समर्थन करने से परहेज करता है क्योंकि उसने कथित चीनी प्रभुत्व के कारण एससीओ ढांचे के तहत प्रस्तावित आर्थिक रणनीतियों में शामिल होने से इनकार कर दिया है।

पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त जी. पार्थसारथी का मानना है कि जयशंकर को सरकार प्रमुखों की बैठक में आगे बढ़ना चाहिए, लेकिन द्विपक्षीय चर्चाओं के बारे में कोई भी निर्णय मौजूदा परिस्थितियों पर निर्भर होना चाहिए। वर्तमान में, पाकिस्तान गंभीर आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहा है, जिसमें आंतरिक और बाहरी दोनों तरह की वित्तीय स्थिरता का अभाव है। उसे अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी को लेकर निराश उम्मीदों का भी सामना करना पड़ रहा है। यूएई और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों के साथ इस्लामाबाद के कूटनीतिक संबंध भी भारत की ओर मुड़ गए हैं, जिससे इस क्षेत्र में उसका प्रभाव कम हो गया है। अब जम्मू-कश्मीर के विधानसभाचुनाव होने वाले हैं। भारत सरकार जल्द ही उसके पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल कर सकती है। पाकिस्तान कहता है कि इन कदमों से जम्मू-कश्मीर की जनता के आत्मनिर्णय का अधिकार खत्म नहीं होता है। हालांकि, इस मोर्चे पर भारत से और अधिक की मांग करना कई लोगों को आधारहीन लगता है। भारत सरकार ने अपना दृढ़ रुख बनाए रखा है। उसका तर्क है कि चर्चा के लिए बचा एकमात्र मामला कश्मीर के एक हिस्से पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा है।

2015 में बातचीत की बहाली के असफल प्रयास से भारत और पाकिस्तान के बीच पर्याप्त द्विपक्षीय संपर्क की कमी रही है। हालांकि 2021 में नियंत्रण रेखा पर युद्धविराम पर सफलत बातचीत हुई थी, लेकिन इसके असर से संबंधों की बहाली नहीं हो सकी। इसका मुख्य कारण कश्मीर को लेकर पाकिस्तान की वो अपेक्षाएं हैं जो कभी पूरी नहीं हो सकतीं। उम्मीद की जा रही थी कि शरीफ भाइयों के पाकिस्तान की सत्ता में वापसी से भारत के साथ तनाव कम हो सकता है। हालांकि, इस दिशा में ठोस प्रगति अभी भी मृग मरीचिका ही है। इस कारण, मौजूदा माहौल में आशा की कोई किरण नहीं दिख रही है।

क्या आने वाले समय में अमेरिका जा सकते हैं पीएम मोदी?

पीएम मोदी एक बार फिर आने वाले समय में अमेरिका के दौरे पर जा सकते हैं! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी महीने अमेरिका के दौरे पर जा रहे हैं। लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद ये उनकी पहली यूएस यात्रा होगी। पीएम मोदी अमेरिका जाने से पहले पिछले दो महीनों में यूक्रेन और रूस का दौरा कर चुके हैं। रूस और यूक्रेन की यात्रा के बाद उनका ये अमेरिका दौरा बेहद अहम माना जा रहा है। प्रधानमंत्री 21 सितंबर को डेलावेयर के विलमिंगटन में क्वाड (QUAD) शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। विलमिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन का गृहनगर है। विलमिंगटन होने वाले क्वाड शिखर सम्मेलन में इस अलायंस के सभी मौजूदा नेताओं का एक साथ आखिरी जमावड़ा होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि बाइडेन और जापान के फुमियो किशिदा दोनों ही अपने पद से हट रहे हैं। बाइडेन ने हाल ही में ऐलान किया है कि वह दूसरी बार राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव नहीं लड़ेंगे। किशिदा ने भी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रमुख के रूप में फिर से चुनाव नहीं लड़ने की अपनी योजना स्पष्ट कर दी है। प्रधानमंत्री मोदी लगातार 11 साल से पीएम पद की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। वो क्वाड समिट में शामिल अन्य चार लोगों में वरिष्ठ नेता है। यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत 2025 में इस शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा।

डेलावेयर शिखर सम्मेलन क्वाड गठबंधन के गठन के 20 साल पूरे होने का प्रतीक होगा। बाइडेन का विलमिंगटन में एक घर है और वह सीनेटर रहने के दौरान एमट्रैक से वाशिंगटन आते-जाते थे। कई मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने शुरू में शिखर सम्मेलन के लिए कैलिफोर्निया में सनीलैंड्स एस्टेट पर विचार किया था। 2013 में, जहां तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चीन के नवनियुक्त राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मेजबानी की थी। चीनी नेता ने उस समय ‘प्रमुख देशों के संबंधों का एक नया मॉडल’ प्रस्तावित किया था। इसमें तय किया गया था कि वाशिंगटन डीसी और बीजिंग दोनों किसी भी संघर्ष या टकराव के लिए सहमत नहीं होंगे।

डेलावेयर में क्वाड शिखर सम्मेलन के बाद, पीएम मोदी 22-23 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र के फ्यूचर शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए न्यूयॉर्क जाएंगे। 22 सितंबर को, प्रधानमंत्री लॉन्ग आइलैंड के 16,000 सीटों वाले नासाउ वेटरन्स मेमोरियल कोलिजियम में ‘मोदी और यूएस प्रोग्रेस टुगेदर’ शीर्षक से एक मेगा कम्यूनिटी इवेंट को संबोधित करेंगे। हालांकि, पीएम मोदी संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित नहीं करेंगे। विदेश मंत्री एस जयशंकर 28 सितंबर को भारत की ओर से संबोधित करेंगे। पीएम मोदी की ये अमेरिका यात्रा राष्ट्रपति चुनाव से कुछ महीने पहले हो रही है, जहां रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प का सामना डेमोक्रेट उम्मीदवार कमला हैरिस से है!

यही नहीं एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाक्रम में, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने आधिकारिक तौर पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस अक्टूबर में इस्लामाबाद आने का निमंत्रण दिया है। यह निमंत्रण आगामी शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शासनाध्यक्षों की परिषद की बैठक से जुड़ा है। हालांकि, इन दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक रूप से तनावपूर्ण संबंधों को देखते हुए, मोदी के पाकिस्तान आने की संभावना काफी दूर की कौड़ी लगती है। भारत के साथ चल रहे तनाव के कारण पिछले आठ वर्षों में सार्क शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने के इस्लामाबाद के असफल प्रयासों से इसका उदाहरण मिलता है।

भारत ने भी पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी को 2023 में गोवा में आयोजित विदेश मंत्रियों की बैठक के लिए निमंत्रण भेजा था। मोदी को पाकिस्तान से मिला निमंत्रण भी एससीओ के इसी बहुपक्षीय ढांचे के अनुरूप एक औपचारिकता है। यही वजह है कि पाकिस्तान निमंत्रण भेजने के बावजूद एससीओ मीटिंग में पीएम मोदी की मौजूदगी की उम्मीद नहीं कर रहा है। पाकिस्तान की इस आशंका की वजह सिर्फ भारत से उसका तनावपूर्ण रिश्ता ही नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकार प्रमुखों की बैठकों के बजाय एससीओ राष्ट्राध्यक्षों की परिषद के शिखर सम्मेलनों में भाग लेने की अपनी परंपरा बनाई है। सरकार प्रमुखों की बैठकों में विदेश मंत्री एस. जयशंकर भाग लिया करते हैं।

मोदी एससीओ राष्ट्राध्यक्षों के शिखर सम्मेलनों में नियमित रूप से भाग लेते रहे हैं, हालांकि इस साल की शुरुआत में संसद सत्र चालू होने के कारण वो कजाकिस्तान में आयोजित शिखर सम्मेलन में शामिल नहीं हो पाए थे। फिर भी, उन्होंने कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट टोकायेव को शिखर सम्मेलन के लिए भारत के समर्थन का आश्वासन दिया, जो इस सुरक्षा केंद्रित गठबंधन के प्रति भारत के समर्पण को दर्शाता है। इस ब्लॉक में कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान जैसे मध्य एशियाई देशों के साथ-साथ चीन, रूस और ईरान शामिल हैं।

जानिए आखिर कौन है नेटफ्लिक्स की कंटेट हेड मोनिका शेरगिल?

आज हम आपको नेटफ्लिक्स की कंटेंट हेड मोनिका शेरगिल के बारे में जानकारी देने वाले हैं!पॉपुलर ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स एक बार फिर सुर्खियों में है। कंधार विमान अपहरण कांड पर बनी एक वेब सीरीज IC-814 पर विवाद छिड़ा है। 24 दिसंबर 1999 को पांच आतंकवादियों ने इंडियन एयरलाइंस के विमान IC-814 को हाइजैक कर लिया था। यह विमान काठमांडू से नई दिल्‍ली आ रहा था और इसमें 176 यात्री सफर कर रहे थे। आतंकवादी विमान को अफगानिस्तान के कंधार ले गए थे। दिल्ली हाईकोर्ट में दायर एक जनहित याचिका में इस वेब सीरीज को बैन करने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि इस सीरीज में तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है और आतंकवादियों के हिंदू नाम दिखाए गए हैं। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने इस मामले में नेटफ्लिक्स से जवाब मांगा है। साथ ही नेटफ्लिक्स इंडिया की कंटेंट हेड मोनिका शेरगिल को समन भेजा गया है और उन्हें आज सफाई देने के लिए बुलाया गया है।   मोनिका शेरगिल का जन्म उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में हुआ था। बचपन में उन्हें टीवी देखने का काफी शौक था। यह दूरदर्शन और ब्लैक एंड वाइट टीवी का जमाना था। दूरदर्शन पर उनका पसंदीदा शो The World This Week था। इसमें उन्हें दुनिया-जहान की खबरें देखने को मिलती थी। Forbes के साथ एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि वह हमेशा लोगों को कहानी बताना पसंद था। इसी सपने को उन्होंने अपना करियर बनाया। मेरठ से स्कूली पढ़ाई खत्म करने के बाद उन्होंने दिल्ली के मिरांडा हाउस कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। इसके बाद उन्होंने पत्रकारिता का कोर्स किया।

मोनिका ने संवाददाता और प्रॉड्यूसर के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की। 1990 के दशक में उन्होंने कई डॉक्यूमेंट्रीज बनाईं। इस दौरान उन्होंने जोखिम वाली रिपोर्टिंग भी की। इनमें धनबाद में अवैध खनन, मध्य प्रदेश में जंगलों की कटाई और गुजरात में गैरकानूनी केमिकल फैक्ट्रीज पर डॉक्यूमेंट्रीज शामिल हैं। नेटफ्लिक्स के साथ जुड़ने से पहले वह पांच साल तक वायकॉम18 डिजिटल वेंचर्स में कंटेंट हेड रहीं। मोनिका सात साल से अधिक समय तक स्टार इंडिया में क्रिएटिव कंसल्टेंट रहीं। साथ ही उन्होंने सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन में बतौर क्रिएटिव डायरेक्टर काम किया।

भारत में नेटफ्लिक्स की सफलता का श्रेय मोनिका शेरगिल को ही दिया जाता है। हालांकि उनके लिए यह सफर आसान नहीं था। जब उन्होंने नेटफ्लिक्स इंडिया जॉइन किया तो उससे पहले कंपनी ने केवल दो सीरीज Sacred Games और Delhi Crime बनाई थीं। मोनिका ने टीम बनाने पर काम किया। इसके बाद Monica, O My Darling, Jamtara: Season 2 और RRR ने सफलता के झंडे गाड़ दिए। रेगुलेटरी फाइलिंग्स के मुताबिक फाइनेंशियल ईयर 2023 में कपंनी का रेवेन्यू 24 फीसदी बढ़कर 2,214 करोड़ रुपये रहा जबकि नेट प्रॉफिट 75 परसेंट बढ़कर 35 करोड़ रुपये पहुंच गया। नेटफ्लिक्स ने 2016 में भारतीय बाजार में एंट्री मारी थी। 2018 में इसका रेवेन्यू 58 करोड़ रुपये था जो 2019 में 471 करोड़ रुपये, 2020 में 924 करोड़ रुपये, 2021 में 1529 करोड़ रुपये और 2022 में 1837 करोड़ रुपये रहा।

बता दे कि अनुभव सिन्‍हा के डायरेक्‍शन में बनी वेब सीरीज ‘IC 814: द कंधार हाईजैक’ लगातार आलोचनाओं का श‍िकार हो रही है। सीरीज में विमान का अपहरण करने वाले आतंकियों के नाम ‘शंकर’ और ‘भोला’ बताए जाने पर विवाद हो रहा है। एक ओर जहां सोशल मीडिया पर इसका जमकर विरोध हो रहा है और सीरीज के बायकॉट की मांग हो रही है, वहीं अब भारत सरकार भी इस ओर एक्‍शन में आ गई है। न्‍यूज एजेंसी ANI के मुताबिक, केंद्र सरकार ने ओटीटी प्‍लेटफॉर्म नेटफ्ल‍िक्‍स के कंटेंट हेड को दिल्‍ली तलब किया है। विजय वर्मा, नसीरुद्दीन शाह, पंकज कपूर और अरविंद स्‍वामी जैसे दिग्‍गजों से सजी ‘IC 814’ सीरीज साल 1999 में इंडियन एयरलाइंस की विमान संख्‍या 814 के कुख्यात अपहरण पर आधारित है। मेकर्स का दावा है कि उन्‍होंने भारतीय विमानन इतिहास के इस कभी नहीं भूल पाने वाली वारदात को फैक्‍ट्स के आधार पर बनाया है। लेकिन सीरीज में दो हाईजैकर्स के हिंदू नाम रखे जाने पर विवाद हो गया है।

नेपाल के काठमांडू से चलकर दिल्‍ली को आने वाले इस विमान का उड़ान भरने के कुछ ही मिनटों बाद अपहरण कर लिया गया था। इस विमान में चालक दल के साथ कुल 180 लोग सवार थे। विमान को हाईजैक करने के बाद पहले अमृतसर, फिर लाहौर होते हुए दुबई और फिर कंधार ले जाया गया था। वेब सीरीज में चारों अपहरणकर्ताओं को चीफ, डॉक्टर, बर्गर, भोला और शंकर कोडनेम के साथ दिखाया गया है। जबकि असल घटना में आतंकियों ने भोला और शंकर नाम का इस्‍तेमाल नहीं किया था। सोशल मीडिया पर लोगों का कहना है कि निर्माताओं ने जानबूझकर हिंदू नाम चुने हैं और तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया है। इस विवाद के कारण इंटरनेट की दुनिया में गरमागरम बहस छ‍िड़ गई है।

यह वेब सीरीज ‘IC 814: द कंधार हाईजैक’ पत्रकार श्रींजॉय चौधरी और हाईजैक विमान के पायलट कैप्‍टन देवी शरण द्वारा लिखी गई किताब ‘फ्लाइट इनटू फियर: द कैप्टन स्टोरी’ पर आधारित है। सीरीज में विजय वर्मा, नसीरुद्दीन शाह, पंकज कपूर और अरविंद स्वामी के अलावा मनोज पाहवा, अनुपम त्रिपाठी, दीया मिर्जा, पत्रलेखा, अमृता पुरी, दिव्येंदु भट्टाचार्य और कुमुद मिश्रा की प्रमुख भूमिकाओं में हैं। यह सीरीज बीते हफ्ते 29 अगस्‍त 2024 को रिलीज हुई है।

आखिर कैसे शुरू हुआ IC 814 कंधार हाइजैक का विवाद?

आज हम आपको बताएंगे कि आखिर IC 814 कंधार हाईजैक का विवाद कैसे शुरू हुआ ! आक्रोश पैदा करना कितना मुश्किल है? यह वास्तव में काफी आसान है, वास्तव में, अगर आपके पास एक ट्रोल आर्मी है जो तथ्यों को दरकिनार करने और प्रचार को एक शक्तिशाली हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए तैयार है। यह और भी आसान है अगर आप बीजेपी के नेशनल इंफोर्मेशन और टेक्नोलॉजी विभाग के प्रमुख हैं। अमित मालवीय ने ठीक यही किया जब उन्होंने नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई काठमांडू से कंधार तक आईसी 814 के अपहरण पर सीरीज के तुरंत बाद एक्स पर एक ट्वीट किया। हिंदुत्व से जुड़ी किसी भी चीज पर हमेशा मुखर रहने वाले मालवीय ने सीरीज को हिंदू-मुस्लिम बाइनरी में फ्रेम करना चुना। उन्होंने ट्वीट किया कि आईसी 814 के अपहरणकर्ता खूंखार आतंकवादी थे जिन्होंने अपनी मुस्लिम पहचान छिपाने के लिए फर्जी नाम अपनाए थे। फिल्म निर्माता अनुभव सिन्हा ने उनके गैर-मुस्लिम नामों को आगे बढ़ाकर उनके आपराधिक इरादे को वैध बनाया। नतीजा? दशकों बाद, लोग सोचेंगे कि हिंदुओं ने आईसी 814 का अपहरण किया। यह न केवल लंबे समय में भारत के सुरक्षा तंत्र को कमजोर करेगा / सवालों के घेरे में लाएगा, बल्कि सभी रक्तपात के लिए जिम्मेदार धार्मिक समूह से दोष भी हटा देगा। इस ट्वीट ने सोशल मीडिया पर और भी आक्रोश पैदा कर दिया। इसका यही उद्देश्य था।

हमें सूत्रों के माध्यम से यह बताने वाली बहुत सी आवाजें थीं कि इस सीरीज ने ‘धार्मिक भावनाओं’ को ठेस पहुंचाई है। इस ठेस के कारण सूचना और प्रसारण सचिव ने नेटफ्लिक्स के कंटेंट के इंचार्ज वाइस प्रेसीडेंट को तलब किया। सचिव को शायद दिल से पता था कि विवाद को हवा दी गई थी, जबकि यह सर्वविदित है कि अपहरणकर्ताओं ने ‘भोला’, ‘बर्गर’ और ‘शंकर’ जैसे उपनामों का इस्तेमाल किया था। किताबों में भी यही नाम दर्ज हैं। सरकार की अपनी वेबसाइट इस तथ्य की गवाही देती है, लेकिन नहीं, तथ्यों को प्रचार के रास्ते में कैसे आने दिया जा सकता है? हां, प्रोपगैंडा वाला शक्तिशाली हथियार।

समस्या यह है कि इसका इस्तेमाल उदारतापूर्वक और हमेशा ‘धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने’ के नाम पर किया जा रहा है। अमेजन प्राइम वीडियो को तब इसका खामियाजा भुगतना पड़ा जब उसने तांडव नामक शो बनाया। देवी-देवताओं को ‘गलत तरीके से पेश’ किए जाने को लेकर बहुत हंगामा हुआ। फिर से, सोशल मीडिया के युग में, जहां राजनीतिक ट्रोल आर्मी जज और जूरी के रूप में तैयार होकर आती हैं, यह हमारी सांस्कृतिक जड़ें हैं जो चोट खा रही हैं। ट्रोल आर्मी दृढ़, सेलेक्टिव और केवल तभी नाराज होने में तेज हैं जब यह उनके अनुकूल हो। आईसी 814: कंधार अपहरण पर अनावश्यक विवाद केवल ताजा उदाहरण है कि कैसे सत्तारूढ़ पार्टी के पक्षपातपूर्ण सदस्यों द्वारा राजनीतिक कहानियों को ‘हाइजैक’ करने का प्रयास किया जाता है।

इससे पहले, मशहूर ज्वेलरी ब्रांड तनिष्क को एक दिल को छू लेने वाला विज्ञापन वापस लेना पड़ा था। इसमें एक मुस्लिम परिवार अपनी गर्भवती हिंदू बहू के लिए पारंपरिक गोद भराई की तैयारी कर रहा था। वीडियो विज्ञापन में बहू को ऐसे परिवार में शादी करते हुए दिखाया गया था जो उसे अपने बच्चे की तरह प्यार करता है। इसे ‘लव जिहाद’ का मामला बताया गया, जो अंतरधार्मिक विवाहों के लिए एक प्रचार शब्द है। फैबइंडिया से जुड़ा दूसरा उदाहरण याद है, जो एक समान रूप से लोकप्रिय एथनिक कपड़ों का ब्रांड है? हिंदुत्व ट्रोल आर्मी सीधे उन पर टूट पड़ी क्योंकि उन्होंने दिवाली के समय ‘जश्न-ए-रिवाज’ नाम से एक कलेक्शन निकाला था। लेकिन नहीं, परंपरा का जश्न अपमानजनक माना गया। फैबइंडिया ने हिंदू त्योहार को नीचा दिखाने के आरोप के बाद जल्दबाजी में विज्ञापन वापस ले लिया।

पुण्य और पाप का अनौपचारिक मंत्रालय जब चाहे तब बोलता है और अपने राजनीतिक आकाओं की बातों में आने से नहीं डरता। इसलिए, जब महाराष्ट्र की ट्रेन में एक बूढ़े व्यक्ति को केवल इस संदेह पर डांटा जाता है और थप्पड़ मारा जाता है कि उसने अपनी बेटी के घर ले जाने वाले टिफिन में गोमांस रखा है, तो कोई बुरा नहीं मानता। जब मुसलमानों को धार्मिक मार्गों पर अपना नाम प्रदर्शित करने के लिए मजबूर किया जाता है, तो कोई बुरा नहीं मानता। निश्चित रूप से, केवल प्रशंसा ही होती है जब कश्मीर फाइल्स, केरल स्टोरी और आर्टिकल 370 जैसी फिल्में न केवल बनाई जाती हैं बल्कि राजनीतिक रूप से सुविधाजनक समय पर रिलीज भी की जाती हैं। कौन सही समझ वाला व्यक्ति यह नहीं जानता कि आईसी 814 अपहरण की योजना आईएसआई ने बनाई थी और मसूद अजहर का भाई अपहरणकर्ताओं में शामिल था?

मेरे और कई अन्य लोगों के लिए, यह बनावटी आक्रोश शायद इस तथ्य से ध्यान हटाने का प्रयास था कि बीजेपी के पहले पीएम अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार ने विमान में सवार यात्रियों के बदले में सबसे खतरनाक आतंकवादियों को सौंप दिया था। सरकार कई मामलों में विफल रही। उसके पास संभावित अपहरण के बारे में खुफिया जानकारी नहीं थी। जब विमान ईंधन भरने के लिए अमृतसर में उतरा तो वह उसे भारतीय धरती से जाने से नहीं रोक पाई। वह अपहृत विमान में सवार यात्रियों के परिवारों को शांत करने में असमर्थ थी। शुरू में उसने उन्हें सूचित करना जरूरी नहीं समझा। परिवारों के लिए ब्रीफिंग सत्र तभी शुरू हुआ जब उन्होंने शोर मचाया जिसे सरकार अनदेखा नहीं कर सकती थी।

कोडनेम के इस्तेमाल पर पैदा किए गए गुस्से और आक्रोश को नजरअंदाज करने के बजाय, सरकार को यह याद रखना चाहिए कि अजहर पाकिस्तान और तालिबान दोनों के लिए इतना महत्वपूर्ण था कि वे उसे छुड़ाने के लिए अपहरण की साजिश रचने की हद तक चले गए। 1999 का अपहरण 24 साल पुराना है, लेकिन अजहर पाकिस्तान के डीप स्टेट के लिए एक संपत्ति बना हुआ है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से बेहतर यह बात कोई नहीं जानता। वह कंधार में मुख्य वार्ताकार थे। वह जानते हैं कि सरकार के लिए सौदेबाजी करना कितना मुश्किल था। ट्रोल आर्मी अपने अगले लक्ष्य की तलाश में आगे बढ़ेगी लेकिन सुरक्षा ऐसा मुद्दा नहीं है जिसे पहले ही ‘हाईजैक’ कर लिया जाना चाहिए था। आईसी 814 का अपहरण कर लिया गया था। यह एक तथ्य है। इसके इर्द-गिर्द विवाद स्पष्ट रूप से भ्रामक राजनीतिक जानकारी है।

महीने-दर-महीने एक ही ब्रश का उपयोग करना? संक्रमण से बचने के लिए आपको अपना टूथब्रश कितनी बार बदलना चाहिए?

यदि आप दिन में दो बार अपने दाँत ब्रश करते हैं, तो ब्रश के बारे में सोचने का समय किसके पास है! दांतों की लापरवाही से कई तरह की शारीरिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं। और दांतों की इस लापरवाही का सबसे बड़ा कारण पुराने टूथब्रश का इस्तेमाल भी हो सकता है। बहुत से लोगों को यह याद नहीं होगा कि उन्होंने आखिरी बार अपना टूथब्रश कब बदला था। मन में आता है कि ब्रश को तब तक बदल लें जब तक वह पूरी तरह से बेकार न हो जाए। जब दांतों का इनेमल क्षतिग्रस्त हो जाता है तो हमें चिंता होती है। दूसरी ओर, टूथब्रश की परवाह न करें। यदि आप दिन में दो बार अपने दाँत ब्रश करते हैं, तो ब्रश के बारे में सोचने का समय किसके पास है! दांतों की लापरवाही से कई तरह की शारीरिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं। और दांतों की इस लापरवाही का सबसे बड़ा कारण पुराने टूथब्रश का इस्तेमाल भी हो सकता है।

टूथब्रश को हर दो से तीन महीने में बदलना चाहिए। हालाँकि, इसका उपयोग कैसे किया जाता है इसके आधार पर समय कम हो सकता है। लेकिन बेहतर होगा कि एक टूथब्रश का इस्तेमाल तीन महीने से ज्यादा न किया जाए। यदि आवश्यक हो तो मोबाइल या कैलेंडर में तारीख नोट कर लें। इसके अलावा, किसी बीमारी, विशेषकर वायरल बीमारी से उबरने के बाद टूथब्रश बदलना महत्वपूर्ण है। वायरल बुखार, खांसी, जुकाम से ठीक होने के बाद जितनी जल्दी हो सके टूथब्रश बदल लेना चाहिए। क्योंकि बीमारी ठीक होने पर भी बीमारी के कीटाणु टूथब्रश पर चिपक सकते हैं। ऐसे में 2-3 महीने से पहले ब्रा बदल लें। कई लोगों में ब्रश चबाने की भी प्रवृत्ति होती है। लेकिन उनके ब्रश 1 महीने में खराब हो सकते हैं. इसलिए यह अवश्य जांच लें कि ब्रश के ब्रिसल्स अच्छे हैं या नहीं।

ब्रश की देखभाल कैसे करें?

1) अधिकांश घरों में सभी सदस्यों के ब्रश एक ही कंटेनर में रखे जाते हैं। इस तरह ब्रश रखने से कीटाणु एक व्यक्ति के ब्रश से दूसरे व्यक्ति के ब्रश में फैल सकते हैं। यदि किसी कंटेनर में भंडारण कर रहे हैं, तो ब्रश पर ढक्कन का उपयोग करना सुनिश्चित करें।

2) ब्रश को बेसिन के पास या बाथरूम में नहीं रखना चाहिए। ऐसी नम और आर्द्र जलवायु में रोगजनकों के फैलने का खतरा भी बहुत अधिक होता है।

3) ब्रश को नियमित रूप से साफ करें. सप्ताह में कम से कम एक बार उपयोग करने से पहले ब्रश को गर्म पानी से धोएं। इससे बैक्टीरियल संक्रमण का खतरा कम हो जाएगा. इसके अलावा, ब्रश को कुछ मिनटों के लिए माउथवॉश घोल में भिगोने से ब्रश कीटाणुरहित हो जाएगा।

दांतों को चमकदार बनाने के घरेलू उपाय, कौन सी सामग्री का उपयोग करें?
अपने दांतों से दाग हटाने के लिए सिर्फ टूथपेस्ट पर निर्भर न रहें। घरेलू तरकीबें भी पेचीदा हो सकती हैं। यहां कुछ घरेलू उपचार दिए गए हैं। चमचमाते दांतों वाली एक खूबसूरत मुस्कान सामने वाले को अपना दिमाग भुला सकती है। इसलिए मैं अपने दांतों में अतिरिक्त चमक चाहता हूं। दांतों पर विभिन्न कारणों से दाग पड़ जाते हैं। ऐसा नियमित ब्रश करने से भी हो सकता है। हालाँकि, आपको अपने दांतों से दाग हटाने के लिए केवल टूथपेस्ट पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। घरेलू तरकीबें भी पेचीदा हो सकती हैं। यहां कुछ घरेलू उपचार दिए गए हैं।

पीला

पीला रंग संक्रामक रोगों का कारण है। हालाँकि, यह दांतों को सफेद करने के लिए भी उपयुक्त है। हल्दी में एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीमाइक्रोबियल गुण होते हैं। हल्दी मसूड़े की सूजन जैसी दंत रोगों को ठीक करने में भी कारगर है। दांतों को सफेद करने के लिए हल्दी का उपयोग कैसे करें? एक चम्मच हल्दी को पानी या नारियल के तेल में मिलाकर दांतों पर अच्छी तरह मलें। कुछ मिनटों के बाद धो लें। दांतों का पीलापन कम हो जाएगा।

तुलसी

तुलसी सर्दी और खांसी के लिए सबसे भरोसेमंद उपचारों में से एक है। लेकिन दांतों को चमकदार बनाए रखने के लिए तुलसी का जोड़ा अच्छा रहता है। तुलसी दांतों पर पनपने वाले बैक्टीरिया को नष्ट कर देती है। नतीजतन, दांत कैविटी जैसी समस्याओं से बचे रहते हैं। तुलसी के पत्तों को सुखाकर उसका पाउडर बनाकर माजन से मालिश की जा सकती है। आपको लाभ होगा.

नीम

दांतों की देखभाल में नीम वास्तव में फायदेमंद है। दांतों को मजबूत रखने के लिए नीम का कोई विकल्प नहीं है। हालाँकि, बहुत से लोग नहीं जानते कि नीम दांतों को सफेद करने में मदद कर सकता है। नीम की कुछ पत्तियों को सुखाकर माजन में मिला लें। नीम की पत्ती के पाउडर से दांत साफ करने से दांत चमकने लगते हैं।

क्या आप रात को नींद में कराहते हैं? क्या यह किसी गंभीर बीमारी का लक्षण है या कोई अन्य अंतर्निहित कारण है?

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बहुत से लोग नींद में बात करते हैं। यदि पहली नज़र में यह विशेष रूप से परेशान करने वाला नहीं लगता है, तो इस प्रथा के पीछे अन्य कारण भी हैं। जो व्यक्ति नींद में बोलता है वह सबसे पहले अपने साथी से सीखता है। लेकिन विश्वास नहीं हुआ. संदेह था कि ऐसा हो सकता है. हालाँकि, शोध करने और नेट पर सर्फिंग करने के बाद, मुझे पता चला कि नींद में बातें करना मौजूद है। बहुत से लोग नींद में खर्राटे लेते हैं। इसे अकेले समझना संभव नहीं है. ये तो तब पता चलता है जब कोई दूसरा बताता है. जाहिर तौर पर यह कोई समस्या नहीं है. हालाँकि, इस प्रथा के पीछे कई कारण हैं। इन्हें जानना जरूरी है.

1) प्रतिदिन एक निश्चित समय पर सोयें, एक निश्चित समय पर जागें। तभी ये समस्या थोड़ी कम हो सकती है.

2) वयस्कों को प्रतिदिन सात से आठ घंटे की नींद की आवश्यकता होती है। अगर आप पर्याप्त नींद लेंगे तो यह आदत धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी। ऐसा नींद की कमी और अत्यधिक थकान के कारण हो सकता है।

3) रात को सोने से पहले भारी भोजन करने से भी यह समस्या होती है। उसे भी कम कर सकें तो अच्छा है. हल्का खाना खाने से नींद में बात करने की समस्या कम हो जाती है। इसके अलावा रात के समय हल्का खाना खाने से पाचन संबंधी परेशानियां भी नहीं होती हैं।

4) शाम के समय चाय या कॉफी जैसे पेय पदार्थों से गहरी नींद नहीं आती है। इससे नींद में बात करने की प्रवृत्ति बढ़ती है। अगर नींद गहरी हो तो इस तरह की समस्या कोई खास नहीं होती।

5) क्या आप सोने से पहले फोन करते हैं? इससे नींद में भी खलल पड़ता है. सोने से कम से कम आधे घंटे पहले मोबाइल फोन का इस्तेमाल बंद कर दें। इससे नींद में बात करने की आदत कम हो जाएगी।

ऑफिस में काम का दबाव हो या न हो, आंखों में हर समय चक्कर आता रहता है। बॉसर सुनकर भी गुर्राना कम नहीं करना चाहता। मन और शरीर में बोरियत व्याप्त हो जाती है। कभी-कभी झिमुनी काम पर आती है। फिर मन काम में लग जाता है. दोनों आंखें खुलीं. ऐसा लगभग हर दिन होता है. इस स्थिति को कॉफी पीने और कुछ कदम चलने से अस्थायी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन अगर आपको ऑफिस आने के बाद नींद आ जाएगी तो काम थोड़ा खराब हो जाएगा. कई बार पर्याप्त नींद न लेने पर भी ऐसा होता है। यदि ऐसा है, तो कई अन्य लक्षण प्रकट होंगे। क्या रहे हैं?

1) अगर नींद ठीक से न हो तो याददाश्त काम नहीं आती। क्या आप कभी-कभी भूल जाते हैं? यदि हां, तो नींद की कमी हो सकती है। अगर नींद पर्याप्त न हो तो शरीर पर कई तरह के प्रभाव पड़ते हैं।

2) पानी की बोतल ऑफिस डेस्क के बगल में रखें। काम के दौरान कभी-कभी पानी पीते रहें। अभी भी संतुष्ट नहीं हैं? शरीर को पर्याप्त आराम न मिलने पर ऐसा हो सकता है।

3) बुखार, सर्दी-खांसी नहीं जाती? नींद की कमी से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो सकती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने का मतलब है कि शरीर का बीमारियों से ग्रस्त होना। ऐसे में डॉक्टर से सलाह लेना बहुत जरूरी है।

4) कई लोगों को काम के दौरान कॉफी पीने की आदत होती है। यह अस्थायी रूप से शरीर और दिमाग को मजबूत बनाता है। लेकिन इसका स्वास्थ्य पर लंबे समय तक कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अत्यधिक कैफीन नींद की कमी का कारण बनता है। मूड सातवें पर सवार होता है। अगर मूड हर वक्त खराब रहता है तो यह नींद की कमी की ओर इशारा करता है।
बहुत से लोग रात को सोना नहीं चाहते। दिन भर अथक परिश्रम करने के बावजूद रात को अनिद्रा हो जाती है। आंखों पर पट्टी बांधना सबसे मुश्किल काम हो जाता है. लेकिन स्वस्थ रहने के लिए एक वयस्क को रोजाना कम से कम 7-8 घंटे सोना जरूरी है। अनिद्रा का असर शरीर पर पड़ता है। नींद की कमी के कारण शरीर में कई तरह की बीमारियां घर कर लेती हैं। लेकिन अगर आप कुछ आदतें अपना लें तो जादू की छड़ी छूते ही नींद आ जाएगी। मन निद्रालोक में खोया रहेगा।

1) टीवी, लैपटॉप या फोन का उपयोग करने में बिताया जाने वाला समय कम करें। इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन पर नजर रखने से दिमाग सतर्क और सक्रिय रहता है। बिस्तर पर जाने से कम से कम एक घंटा पहले खुद को ऐसी स्क्रीन से दूर कर लें। अगर आपको कुछ करना है तो आप थोड़ी दूरी से हल्का संगीत बजा सकते हैं। लेकिन हेडफोन लगाकर न सोएं।

2) आप जो खाते हैं उससे नींद भी जुड़ी होती है। कैफीन युक्त खाद्य पदार्थ खाने से आप कई घंटों तक जागते रह सकते हैं। कॉफी और चॉकलेट में यह घटक होता है। इसलिए सोने से कम से कम 6 घंटे पहले इस तरह का खाना बंद कर देना चाहिए। इसके अलावा, रात का खाना जितना संभव हो उतना हल्का रखना बेहतर है, अधिक तेल और मसालों वाला खाना खाने से पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं और नींद में देरी हो सकती है।

3) सोते समय कई लोगों को तरह-तरह की चिंताएं सताती रहती हैं। और यही चिंता अनिद्रा का कारण बनती है। सोने से पहले इन समस्याओं को अपने दिमाग से निकालने की कोशिश करें। ऐसा करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि प्रतिदिन बिस्तर पर जाने से पहले अपनी चिंताओं को लिखें। आप न केवल चिंताएँ लिख सकते हैं, बल्कि यह भी लिख सकते हैं कि अगले दिन के लिए क्या काम बचा है। इससे कम से कम कुछ देर के लिए सिर हल्का हो सकता है।