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क्या सुभाष चंद्र बोस की जान के पीछे थे दो जासूस ?

आज हम आपको बताएंगे कि एक समय ऐसा था जब सुभाष चंद्र बोस की जान के पीछे दो जासूस थे! तब की बात है, जब दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हो चुका था। उस वक्त भारत पर राज करने वाली ब्रिटिश हुकूमत भी जंग में फंसी थी। तब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने इस मौके को भारत की आजादी के एक अवसर के रूप में देखा। बोस ने अंग्रेजी सरकार की दुश्मन जापान और जर्मनी की सरकारों से देश की आजादी के लिए मदद मांगनी शुरू कर दी। उनके इस कदम से अंग्रेजी सरकार इतना डर गई कि उसने ब्रिटिश खुफिया एजेंटों को सुभाष की हत्या का आदेश दे दिया। यह आदेश 1941 में दिया गया था। पर नेताजी को पकड़ना या उनकी हत्या करना इतना आसान नहीं था। नेताजी के ब्रिटिश एजेंटों और सरकार की आंखों में धूल झोंककर बच निकलने की कहानी जानते हैं। नेताजी ने सिंगापुर में ही आजाद भारत की अस्थायी सरकार बनाई, जहां आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहुंचे हैं।  एक आयरिश इतिहासकार यूनन ओ हैल्पिन के अनुसार, जब नेताजी ने जापान और जर्मनी से मदद लेने की कोशिश की तो ब्रिटिश सरकार ने उन्हें खत्म करने का आदेश दिया। ब्रिटिश खुफिया एजेंटों को यह आदेश दिया गया था कि मध्य पूर्व से होकर जर्मनी जाने की कोशिश कर रहे नेताजी को बीच रास्ते में ही ख़त्म कर दिया जाए। हालांकि, ये एजेंट अपने नापाक मंसूबे में कामयाब नहीं हो पाए।

ओ हैल्पिन ने गुप्त दस्तावेजों का हवाला देते हुए बताया कि ब्रिटिश एजेंट इस बात को लेकर परेशान थे कि नेताजी कहां गायब हो गए। दरअसल, नेताजी अंग्रेजी सरकार की मंशा भांप गए थे। वह जनवरी 1941 में अचानक लापता हो गए। ओ हैल्पिन का कहना है कि जब ब्रितानी सरकार को पता चल गया कि नेताजी दुश्मन देशों की मदद लेकर ब्रितानी हुकूमत को उखाड़ फेंकना चाहते हैं तो ख़ुफिया अधिकारियों को आदेश दिए गए कि उन्हें मार डाला जाए। हैल्पिन के अनुसार, ब्रिटिश सीक्रेट एजेंटों ने पहले यह सोचा कि नेताजी सुदूर पूर्व की ओर गए हैं। मगर, कुछ समय बाद ही उन्हें इटली के एक मैसेज से यह पता चला कि नेताजी उन्हें चकमा देकर काबुल पहुंच गए हैं और मध्य पूर्व के रास्ते जर्मनी जाने की तैयारी कर रहे हैं। इसके बाद तुर्की में मौजूद दो ब्रिटिश एजेंटों को लंदन स्थित मुख्यालय से निर्देश दिया गया कि वे सुभाष को जर्मनी पहुंचने से पहले ही मार डालें। मगर, यहां भी सुभाष एजेंटों से आगे निकल गए थे। ब्रिटिश जासूसों का प्लान फेल हो गया था। वो नेताजी तक नहीं पहुंच पाए क्योंकि नेताजी मध्य एशिया होते हुए रूस पहुंचे और वहां से फिर वह जर्मनी गए। उसके बाद वह सिंगापुर पहुंच गए, जहां से उन्होंने ब्रिटिश सरकार को चुनौती देनी शुरू की।

सिंगापुर बसाने वाले सर स्टैनफोर्ड रैफल्स जितने अहम हैं, उतने ही नेताजी भी सिंगापुर के इतिहास का हिस्सा हैं। सिंगापुर के लेखक असद लतीफ ने सुभाष पर आयोजित एक सेमिनार ‘सिंगापुर में नेताजी के दिन’ में कहा था कि स्वतंत्र सिंगापुर को बनाने में भारत की भूमिका में नेताजी केंद्रीय भूमिका में हैं। पेनांग, मलक्का और सिंगापुर 1830 से 1867 तक बंगाल प्रेसीडेंसी का एक हिस्सा था। दिलचस्प बात यह है कि 1867 तक सिंगापुर भारत सरकार के बंदरगाहों में कलकत्ता के बाद दूसरे स्थान पर था। दरअसल, सिंगापुर तब औपनिवेशिक भारत का हिस्सा था। असद की सुभाष पर लिखी किताब ‘नेताजी इन द इंडियन मेकिंग ऑफ सिंगापुर’ में कहा गया है कि अंग्रेजी राज ने लंदन के बजाय औपनिवेशिक सिंगापुर को तवज्जो दी। कोलकाता में जन्मी और सिंगापुर स्थित लेखिका नीलांजना सेनगुप्ता की किताब ‘ए जेंटलमैन्स वर्ड’के अनुसार, सिंगापुर में नेताजी ने एक बार दशहरा उत्सव के लिए कारोबारी समुदाय चेट्टियार के निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया था। वजह यह थी कि इसमें निचली जातियों के लोगों को प्रवेश की अनुमति नहीं थी। बाद में यही चेट्टियार समुदाय ने आजाद हिंद फौज को पैसों से मदद की थी।

5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल में सुप्रीम कमांडर के रूप में नेताजी सुभाष चंद्र बोस जी ने सेना को संबोधित करते हुए ‘दिल्ली चलो!’ का नारा दिया। 21 मार्च 1944 को दिल्ली चलो के नारे के साथ आजाद हिंद फौज का हिंदुस्तान की धरती पर आगमन हुआ था। जिस पर बाद में अंग्रेजों ने राजद्रोह का मुकदमा चलाया था। 21 अक्टूबर 1943 में सुभाष ने सिंगापुर में स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार आजाद हिंद सरकार की स्थापना की। उनकी इस सरकार को जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली और आयरलैंड जैसे 11 देशों की सरकार ने मान्यता दे दी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिए। नेताजी उन द्वीपों में गए और अंडमान का नया नाम शहीद द्वीप और निकोबार का स्वराज्य द्वीप रखा गया।

सुभाष ने 30 दिसंबर 1943 को इन द्वीपों पर स्वतन्त्र भारत का ध्वज भी फहरा दिया गया। इसके बाद नेताजी ने सिंगापुर एवं रंगून में आजाद हिंद फौज का मुख्यालय बनाया। 4 फरवरी 1944 को आजाद हिंद फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा आक्रमण कर कोहिमा, पलेल जैसे भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त करा लिया। इस बीच नेताजी की 18 अगस्त, 1945 को ताइपे जाते हुए हवाई यात्रा के दौरान दुर्घटना में मृत्यु हो गई। बाद में जापान के हार जाने की वजह से आजाद हिंद फौज के लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया।

क्या भारत ड्रोन के हमले का कर सकता है सामना?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत ड्रोन के हम लोग का सामना कर सकता है या नहीं! रूस के सारातोव शहर से आई तस्वीरों ने सबको अमेरिका पर हुए 9/11 अटैक की याद दिला दी। यूक्रेन ने रूस के इस शहर की ऊंची बिल्डिंग पर ड्रोन से हमला किया। ड्रोन इस इमारत पर जा टकराया जिसके बाद सब धुंआ धुंआ हो गया। रूस-यूक्रेन युद्ध में ड्रोन का खूब इस्तेमाल दिख रहा है। यह इस्तेमाल दोनों तरफ से हो रहा है। ड्रोन का खतरा सभी देशों की सेनाओं के लिए चुनौती बना रहा है। भारत ने भी इस खतरे से निपटने के लिए अपनी तैयारी बढ़ाई है और कैपेबिलिटी बढ़ाने के लिए कई नए सिस्टम लेने पर काम कर रहा है। मानवरहित एरियल सिस्टम (UAS) दो तरह के होते हैं। एक यूएवी जो साइज में किसी एयरक्राफ्ट की तरह ही होते हैं। और दूसरे ड्रोन कटैगरी के, जो साइज में छोटे होंते हैं। जो बड़े यूएवी हैं उन्हें डिटेक्ट करना आसान है क्योंकि इनके लिए वही सिस्टम काम आ जाता है जो किसी एयरक्राफ्ट को डिटेक्ट करने के लिए होता है साथ ही एयर डिफेंस का वही तरीका इन्हें नष्ट करने के लिए होता है जो एयरक्राफ्ट के लिए है। लेकिन ड्रोन साइज में छोटे होते हैं और अब ड्रोन कई तरह के हो गए है। इसमें कामिकाजी ड्रोन से लेकर स्वॉर्म ड्रोन तक हैं। यह कम ऊंचाई में उड़ान भरते हैं इसलिए ड्रोन को डिटेक्ट करने के साथ ही उन्हें नष्ट करना एक चुनौती है। अगर स्वॉर्म ड्रोन हों तो चुनौती और बढ़ जाती है क्योंकि स्वॉर्म ड्रोन बहुत सारे ड्रोन्स का झुंड होता है।

भारतीय सेना के एक अधिकारी के मुताबिक दुश्मन के ड्रोन से निपटने के दो तरीके हैं। सॉफ्ट किल और हार्ड किल। हार्ड किल मतलब उसे पूरा नष्ट करना जबकि सॉफ्ट किल में उसके सिस्टम को जाम किया जाता है या गड़बड़ाया जाता है। हालांकि सॉफ्ट किल की अपनी सीमाएं हैं क्योंकि ड्रोन को जाम करने के लिए पूरे बैंडव्रिथ को जाम नहीं कर सकते और उसकी सटीक फ्रिक्वेंसी का पता नहीं चल पाता। साथ ही अगर स्वॉर्म ड्रोन है यानी ड्रोन का पूरा झुंड तो सॉफ्ट किल कैपेबिलिटी ऐसी नहीं होती है कि वह एक साथ सभी ड्रोन को जाम कर दे। अगर बैंड इनक्रिप्टेड है तो ये और भी मुश्किल हो जाता है।

जानकारों के मुताबिक रूस और यूक्रेन एक दूसरे के ड्रोन के खतरे से निपटने के लिए सॉफ्ट किल और हार्ड किल दोनों का कॉम्बिनेशन इस्तेमाल कर रहे हैं। सॉफ्ट किल टेंपरेरी होता है इसलिए दोनों का कॉम्बिनेशन ही सटीक रणनीति मानी जाती है। दुनिया भर में अभी ड्रोन से निपटने के लिए यानी हार्ड किल के लिए पांच तरह के सिस्टम हैं। पहला लेजर वेपन सिस्टम। दूसरा हाईपावर माइक्रोवेब गन्स, तीसरा ड्रोन किल सिस्टम यानी ड्रोन से ही ड्रोन को मार गिराया जाए, चौथा एंटी ड्रोन गन्स और पांचवा VMCDS यानी वीइकल माउंटेड काउंटर ड्रोन सिस्टम। इस सिस्टम से छोटे छोटे रॉकेट फायर होते हैं और यह स्वॉर्म ड्रोन (ड्रोन का पूरा झुंड) से निपटने में इफेक्टिव होते हैं।

भारतीय सेना के पास ड्रोन के खतरे से निपटने के लिए सॉफ्ट किल सिस्टम है, इन्हें इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट के तहत लिया गया था। सेना के पास ड्रोन जैमिंग सिस्टम हैं जो 10 किलोमीटर का तक ड्रोन को डिटेक्ट कर जाम कर सकते हैं। सेना के पास लो लेवल लाइट वेट रडार हैं जो कम ऊंचाई पर उड़ रहे ड्रोन को डिटेक्ट कर सकते हैं। सेना अब अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए एंटी ड्रोन्स गन्स भी ले रही है साथ ही इसके लिए स्मार्ट एम्युनिशन लेने की प्रकिया भी शुरू की गई है। सेना ने एंटी ड्रोन हाईपावर माइक्रोवेब सिस्टम के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (RFI) जारी किया है।

सेना ऐसे सिस्टम की तलाश में है जिसकी रेंज पांच किलोमीटर हो और जो छोटे ड्रोन और स्वॉर्म ड्रोन से निपटने में सक्षम हो। लेजर वेपन सिस्टम लेने कि लिए भी सेना प्रक्रिया को आगे बढ़ा रही है। सेना के पास अभी लो लेवल लाइट वेट रडार हैं लेकिन सेना अब इन्हें बड़ी संख्या में लेने की तैयारी कर रही है। सेना ऐसा ऑप्शन भी देख रही है जो हार्ड किल और सॉफ्ट किल दोनों को कॉम्बिनेशन हो। जानकारों का कहना है कि भारत को अपने पड़ोसी देशों की तैयारियों पर भी नजर रखनी होगी। टर्की ने हाई पावर माइक्रोवेब सिस्टम डिवेलप किया है और यह आने वाले वक्त में पाकिस्तान के पास आ ही जाएगा।

आखिर जम्मू कश्मीर के लिए बीजेपी का क्या है नया फार्मूला?

आज हम आपको बताएंगे कि जम्मू कश्मीर के लिए बीजेपी का नया फार्मूला क्या है! विधानसभा चुनाव के ऐलान के बाद भारतीय जनता पार्टी ने केंद्रशासित प्रदेश में सरकार बनाने की तगड़ी रणनीति बनाई है। बीजेपी इस चुनाव में किसी भी राजनीतिक दल से गठबंधन नहीं करेगी। पार्टी की नजर जम्मू की 43 विधानसभा सीटों पर टिकी हैं। बीजेपी को उम्मीद है कि जम्मू रीजन से उसे करीब 35-37 सीटें मिल सकती हैं। बता दें कि जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा खत्म हो गया। नए केंद्रशासित प्रदेश में नए सिरे से विधानसभा का परिसीमन हुआ। पहले जम्मू-कश्मीर में लद्दाख की चार सीटों के साथ 111 विधानसभा सीटें थी, मगर चुनाव 87 विधानसभा सीटों के लिए होती थीं। 24 सीटें पीओके का हिस्सा थी। बहुमत के लिए कश्मीर रीजन से जीतने वाले 8-10 निर्दलीय विधायकों पर दांव लगाएगी। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों के लिए ऐसे चेहरों को मौका देगी, जिनकी उम्र 40 साल से कम होगी। कश्मीर के लिए बीजेपी ने दूसरे दलों के अल्पसंख्यक नेताओं पर नजरें टिका दी हैं। रविवार को पीडीपी नेता और महबूबा मुफ्ती की सरकार में मंत्री रहे चौधरी जुल्फिकार अली पार्टी बीजेपी में शामिल हो गए। जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव के लिए तारीखों का ऐलान होते ही राजनीति सरगर्मी बढ़ गई है। केंद्रशासित प्रदेश में 18 सितंबर, 25 सितंबर और 1 अक्टूबर को वोट डाले जाएंगे। 4 अक्टूबर को तय हो जाएगा कि 10 साल बाद हो रहे चुनाव के बाद किसकी सरकार बनेगी। इस बीच बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रविंदर रैना ने कहा कि पार्टी इस विधानसभा चुनाव में किसी पार्टी से गठबंधन नहीं करेगी। कश्मीर घाटी में पार्टी 8-10 निर्दलीय उम्मीदवारों से बात कर रही है। उन्होंने कहा कि राज्य की पार्टी अपने दम पर कैंडिडेट उतारेगी और सरकार बनाएगी। रविवार को केंद्रीय मंत्री जी किशन रेड्डी, उधमपुर के सांसद जितेंद्र सिंह और भाजपा महासचिव तरुण चुग ने जम्मू में पार्टी नेताओं के साथ चुनावों की रणनीति पर चर्चा की।

राज्य प्रभारी तरुण चुग ने बताया कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में बहुत कुछ बदला है। गुज्जर बकरवाल, अनुसूचित जाति, पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थी और महिलाओं को लंबे समय बाद उनका हक मिला है। एम्स और रेलवे की कई परियोजनाओं ने जम्मू-कश्मीर की तस्वीर बदल दी है। इसका फायदा पार्टी को विधानसभा चुनाव में जरूर मिलेगा। जम्मू-कश्मीर में 10 साल बाद विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। 2014 के चुनाव में महबूबा मुफ्ती की पार्टी को 28 सीटें मिली थीं। बीजेपी को जम्मू क्षेत्र में 25 सीटें मिली थीं। नेशनल कॉन्फ्रेंस के हिस्से में 15 आई और कांग्रेस को 12 सीटों पर सफलता मिली थी। फिर पहली बार बीजेपी-पीडीपी ने मिलकर जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाई। हालांकि यह बेमेल गठबंधन का दौर नवंबर 2018 में खत्म हो गया और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया।

नियम के मुताबिक राज्य में 6 महीने के अंदर चुनाव होने थे। 2019 में नरेंद्र मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया और लद्दाख को अलग केंद्र शासित राज्य बना दिया। जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा खत्म हो गया। नए केंद्रशासित प्रदेश में नए सिरे से विधानसभा का परिसीमन हुआ। पहले जम्मू-कश्मीर में लद्दाख की चार सीटों के साथ 111 विधानसभा सीटें थी, मगर चुनाव 87 विधानसभा सीटों के लिए होती थीं। 24 सीटें पीओके का हिस्सा थी।

परिसीमन के बाद केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में 114 विधानसभा सीटें हैं। बता दें कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों के लिए ऐसे चेहरों को मौका देगी, जिनकी उम्र 40 साल से कम होगी। कश्मीर के लिए बीजेपी ने दूसरे दलों के अल्पसंख्यक नेताओं पर नजरें टिका दी हैं। रविवार को पीडीपी नेता और महबूबा मुफ्ती की सरकार में मंत्री रहे चौधरी जुल्फिकार अली पार्टी बीजेपी में शामिल हो गए। आज भी 24 सीटें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) के लिए रिजर्व हैं। इसी बीच राज्य प्रभारी तरुण चुग ने बताया कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में बहुत कुछ बदला है। गुज्जर बकरवाल, अनुसूचित जाति, पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थी और महिलाओं को लंबे समय बाद उनका हक मिला है। एम्स और रेलवे की कई परियोजनाओं ने जम्मू-कश्मीर की तस्वीर बदल दी है। जम्मू-कश्मीर में 10 साल बाद विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। 2014 के चुनाव में महबूबा मुफ्ती की पार्टी को 28 सीटें मिली थीं। बीजेपी को जम्मू क्षेत्र में 25 सीटें मिली थीं। नेशनल कॉन्फ्रेंस के हिस्से में 15 आई और कांग्रेस को 12 सीटों पर सफलता मिली थी।बाकी बची 90 सीटों में से 43 जम्मू और 47 कश्मीर में हैं। चार अक्तूबर को चुनावों के परिणाम घोषित किए जाएंगे।

आखिर कैसे बनी रूस की बेलुगा व्‍हेल की सेना?

आज हम आपको बताएंगे कि रूस की बेलुगा व्‍हेल की सेना आखिर कैसे बनी! रूस की जासूस व्हेल ह्वाल्डिमिर नॉर्वे के तट के करीब मरी हुई मिली है। माना जा रहा है कि यह व्हेल किसी बोट से टकरा गई थी, जिसके कारण इसकी मौत हो गई। 14 फुट लंबी और 2,700 पाउंड वजनी इस व्हेल को रूस के जासूस के तौर पर देखा जाता रहा है। इस व्हेल को पहली बार 22 अप्रैल 2019 को इंगोय द्वीप के पास देखा गया था। इस दौरान यह व्हेल एक तंग हार्नेस पहने हुए थी। पश्चिमी देशों का दावा है कि यह व्हेल रूसी नौसेना के एक गुप्त मिशन का हिस्सा थी, लेकिन यह संभवत एक अभ्यास के दौरान उनके चंगुल से भाग निकली थी। इस व्हेल का ह्वाल्डिमिर नाम व्हेल के लिए इस्तेमाल होने वाले नॉर्वेजियन शब्द “ह्वाल” और रूसी राष्ट्रपति के नाम के पहले हिस्से “व्लादिमीर” का मिश्रण है। बेलुगा व्हेल आम तौर पर सुदूर ठंडे आर्कटिक महासागर में रहती हैं। हालांकि, ह्वाल्डिमिर इंसानों के बीच रहने की अभ्यस्त थी। रूस से निकलने के बाद यह व्हेल नॉर्वे के तट के पास रहती थी। पश्चिमी देश इस व्हेल की उपस्थिति से काफी सशंकित थे। नॉर्वे ने कुछ महीनों पहले अपने नागरिकों को चेतावनी दी थी कि वे इस जलीय जीव के ज्यादा करीब न जाएं। इससे उनकी जान को खतरा भी हो सकता है।

अमेरिकी नौसैनिक विशेषज्ञ एचआई शुटन ने बताया कि यह व्हेल कोला प्रायद्वीप के पास स्थित रूसी नौसेना के बेस पर रहती थी, वह उसके प्राकृतिक आवास आर्कटिक के किनारे पर स्थित है। यह पालतू थी और कई मौकों पर स्थानीय मछुआरों ने उसे पकड़ने की भी कोशिश की। जब इस व्हेल के शरीर पर लगे हार्नेस को हटाया गया तो उस पर रूस के सबसे बड़े व्यापारिक शहर सेंट पीटर्सबर्ग में बने होने के लेबल लगा था। ऐसा माना जाता है कि रूसी वैज्ञानिक शोध के दौरान इस तरह के हार्नेस का इस्तेमाल करते हैं।

रूसी नौसेना ने शीत युद्ध के दौरान अमेरिका समेत पश्चिमी देशों की जासूसी के लिए समुद्री जीवों को जासूसी की ट्रेनिंग देना शुरू किया था। यह व्हेल भी उसी प्रोग्राम का हिस्सा थी। हालांकि, रूसी नौसेना का यह प्रोजेक्ट सफल नहीं हो सका और बाद में इसे बंद कर दिया गया। इन समुद्री जीवों को मरमंस्क मरीन बायोलॉजिकल इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक ट्रेनिंग दिया करते थे। इनमें व्हेल, शॉर्क, कछुओं के अलावा भी कई दूसरे समुद्री जीव शामिल थे। इन सभी समुद्री जीवों को अपने इंस्ट्रक्टर से आदेश लेने और दुश्मन के इलाके में घुसकर उसकी जासूसी करने के लिए प्रशिक्षित किया गया था। इन सभी समुद्री जीवों के शरीर पर एक खास हार्नेस लगाया जाता था, जिसमें एक या एक से अधिक कैमरे लगे होते थे। ये कैमरे देखने में गो-प्रो जैसा था। इसका मतलब है कि ये कैमरे पानी के नीचे टोही मिशन में काम आ सकते थे। हालांकि पानी के अंदर और बाहर इनकी एक सीमित रेंज थी। इससे मिले वीडियो को देखकर रूसी सैन्य अधिकारी दुश्मन के सैन्य संसाधनों, ताकत और कमजोरी का पता लगाते थे। हालांकि, यह मिशन काफी खतरनाक होता था, क्योंकि समुद्री जीव कभी-कभी अपने इंस्ट्रक्टर के आदेश को मानने से इनकार कर देते थे।

बेलुगा, डॉल्फिन से बड़े होते हैं। नर बेलुगा व्हेल 5.5 मीटर (18 फीट) तक लंबे होते हैं और उनका वजन 1,600 किलोग्राम (3,530 पाउंड) तक होता है। वे आर्कटिक में जीवन के लिए अनुकूलित हैं, जिसमें बर्फीले पानी में रहना भी शामिल है। इसके लिए उनके पास अन्य समुद्री स्तनधारियों की तुलना में शारीरिक अंतर हैं, जिसमें इसका सफेद रंग प्रमुख है। इनके पिछले भाग पर दूसरे समुद्री जीवों की तरह पंख नहीं होता है। इनके सुनने की शक्ति दूसरे जीवों से कई गुना ज्यादा होती है। इनके नाक इको-लोकेशन में माहिर होती है, जिससे ये आसानी से अपने रास्ते का पता लगा लेते हैं।

बेलुगा व्हेल बाकी जीवों की तुलना में धीमे होते हैं, लेकिन ये 700 मीटर (2,300 फीट) तक गोता लगा सकते हैं। यह गहराई समुद्री गोताखोरों और अधिकांश पनडुब्बियों से ज्यादा है। हालांकि GUGI (महासागर अनुसंधान के मुख्य निदेशालय) द्वारा संचालित और सेवेरोमोर्स्क के पास ओलेन्या गुबा में स्थित परमाणु ऊर्जा से चलने वाले विशेष मिशन ‘डीप सी स्टेशन’ (AGS) जितना गहरा नहीं है। रूसी और अमेरिकी नौसेना दोनों ने अतीत में पानी के नीचे के कार्यों के लिए समुद्री स्तनधारियों का उपयोग करने का प्रयोग किया है, जिसमें सील, सीलियन और डॉल्फिन शामिल हैं।

आखिर क्या है स्वेज नहर का राज?

आज हम आपको बताएंगे कि स्वेज नहर का राज आखिर क्या है! यमन के हूती विद्रोहियों के हमलों ने स्वेज नहर से होने वाले व्यापार को लेकर टेंशन बढ़ा दी है। ये विद्रोही इजरायल-हमास युद्ध का नाम लेकर किसी भी कार्गो शिप पर हमला कर दे रहे हैं। इन हमलों में कई जहाज डूब भी चुके हैं। ऐसे में स्वेज नहर का इस्तेमाल कर व्यापार करने वाले देश टेंशन में हैं। यही कारण है कि भारत अब नए-नए विकल्पों की तलाश कर रहा है, जिससे वह स्वेज नहर को बाइपास कर सके और उसके व्यापार पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव न हो। यही कारण है कि भारत इन दिनों रूस के साथ मिलकर नॉर्थ सी रूट, उत्तरी समुद्री गलियारा पर काम कर रहा है। यह गलियारा भारत के चेन्नई को रूस के व्लादिवोस्तोक से कनेक्ट करेगा। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने गुरुवार को पूर्वी आर्थिक मंच ईईएफ को बताया कि रूस पश्चिम से पूर्व की ओर कार्गो के ट्रांसपोर्ट, तटीय और रेलवे बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और ट्रांसशिपमेंट सुविधाओं को विकसित करके नॉर्थ सी रूट एनएसआर को और विकसित करेगा। पिछले साल, नॉर्थ सी रूट के जरिए 36 मिलियन टन के रिकॉर्ड कार्गो को ट्रांसपोर्ट किया गया था। व्लादिवोस्तोक में नौवें पूर्वी आर्थिक मंच में शामिल एक भारतीय अधिकारी ने बताया कि नॉर्थ सी रूट आने वाले वर्षों में भारतीय हितों की अच्छी तरह से साध सकता है।

मॉस्को में भारतीय दूतावास में नौसेना अताशे कमोडोर ब्रिजिंदर सिंह सोढ़ी ने ‘उत्तरी समुद्री मार्ग (नॉर्थ सी रूट) और इसकी लॉजिस्टिक क्षमताएं’ नामक एक पैनल को बताया, “भारत इस विकास की कहानी का हिस्सा बनने के लिए उत्सुक है और हम अपने संयुक्त दृष्टिकोण को साकार करने के लिए रूसी एजेंसियों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।” सोढ़ी ने इस बात पर जोर दिया कि नई दिल्ली ने संपर्क मार्ग की क्षमता को अधिकतम करने के लिए ऊर्जा, बुनियादी ढांचे और जहाज निर्माण परियोजनाओं के विकास में विदेशी निवेशकों की भागीदारी की परिकल्पना की है।

उन्होंने बताया कि पिछले एक साल में नॉर्थ सी रूट से ट्रांसपोर्ट किए गए कुल 36 मिलियन टन माल में से लगभग 5 मिलियन टन का माल भारत से आया था। उन्होंने कहा कि इस विकास में “भू-आर्थिक शक्ति संतुलन को पूर्व की ओर स्थानांतरित करने की क्षमता” है। भारतीय अधिकारी ने कहा, “यूरोप और एशिया को जोड़ने में स्वेज नहर मार्ग के विकल्प के रूप में नॉर्थ सी रूट की संभावनाएं आज अधिक प्रासंगिक लगती हैं। लाल सागर में मालवाहक जहाजों पर हमले हो रहे हैं। ऐसे में नॉर्थ सी रूट यूरोप और एशिया के बीच प्रमुख समुद्री मार्गों को प्रतिस्थापित नहीं भी कर सके तो पूरक तो जरूर बन सकता है।”

रूस में नौसेना अताशे कमोडोर ब्रिजिंदर सिंह सोढ़ी ने नॉर्थ सी रूट को “21वीं सदी का प्रमुख परिवहन गलियारा” बताया। इसके अलावा उन्होंने कहा कि नॉर्थ सी रूट को अंतर्राष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारे (आईएनएसटीसी) से जोड़ने की संभावना भारत के लिए लाभदायक अवसर प्रस्तुत करती है। उन्होंने कहा कि रूस के नदी परिवहन और रेलवे बुनियादी ढांचे के विकास के माध्यम से दोनों गलियारों को जोड़ना संभव होगा। सिंह ने कहा, “नॉर्थ सी रूट को संभावित चेन्नई-व्लादिवोस्तोक कॉरिडोर के साथ पूर्व से जोड़ा जा सकता है, जिस पर हमारे दोनों देशों के बीच चर्चा एक उन्नत चरण में पहुंच गई है… यह सर्कुलर रूट को पूरा कर सकता है जो एशिया, यूरेशिया और आर्कटिक क्षेत्रों को कवर करेगा।”

नॉर्थ सी रूट (NSR) को उत्तरी समुद्री मार्ग के नाम से भी जाना जाता है। यह 5,600 किलोमीटर (3,500 मील) लंबा एक शिपिंग मार्ग है। उत्तरी समुद्री मार्ग (NSR) यूरेशिया के पश्चिमी भाग और एशिया-प्रशांत क्षेत्र के बीच सबसे छोटा शिपिंग मार्ग है। प्रशासनिक रूप से, उत्तरी समुद्री मार्ग बैरेंट्स और कारा समुद्र (कारा जलडमरूमध्य) के बीच की सीमा से शुरू होता है और बेरिंग जलडमरूमध्य (केप देझनेव) में समाप्त होता है। NSR आर्कटिक महासागर (कारा, लाप्टेव, पूर्वी साइबेरियाई और चुकची समुद्र) के समुद्रों में फैला हुआ है। पूरा मार्ग आर्कटिक जल में और रूस के अनन्य आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) के भीतर स्थित है, और इसे नॉर्थईस्ट पैसेज कहा जाता है, जो कनाडा के नॉर्थवेस्ट पैसेज के समान है।लाल सागर में मालवाहक जहाजों पर हमले हो रहे हैं। ऐसे में नॉर्थ सी रूट यूरोप और एशिया के बीच प्रमुख समुद्री मार्गों को प्रतिस्थापित नहीं भी कर सके तो पूरक तो जरूर बन सकता है।” उत्तरी समुद्री मार्ग में बैरेंट्स सागर शामिल नहीं है, और इसलिए यह अटलांटिक तक नहीं पहुंचता है।

आखिर बीजेपी से फिर से कैसे जुड़े जम्मू कश्मीर के राम माधव?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि बीजेपी से फिर से राम माधव कैसे जुड़ गए! बीजेपी नेता राम माधव की पांच साल वापसी हुई है। पार्टी ने उन्हें जम्मू-कश्मीर चुनाव का प्रभारी बनाया है। एक लंबे अंतराल के बाद उनकी वापसी को राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। राम माधव की वापसी आरएसएस और बीजेपी के रिश्तों के नजरिए से भी अहम है। खासतौर पर 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी के प्रदर्शन के बाद संघ की ओर से आलोचना के बाद राम माधव को जिम्मेदारी मिली है। बीजेपी ने अनुच्छेद 370 हटाने के बाद होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए माधव को यह जिम्मेदारी सौंपी है। माधव को जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर में बीजेपी को मजबूत बनाने का श्रेय दिया जाता है। 2020 में उन्हें पार्टी के पदों से हटा दिया गया था। माधव आरएसएस के सीनियर नेता हैं। उन्होंने अपने ट्वीट में बीजेपी और आरएसएस नेतृत्व का आभार व्यक्त किया है। राम माधव ने अपने ट्वीट में लिखा, ‘संघ मेरी मां है। हम आम तौर पर इसके बारे में सार्वजनिक रूप से ज्यादा बात नहीं करते हैं। लेकिन मुझे पार्टी के काम पर लौटने के लिए संघ नेतृत्व द्वारा दिए गए अपवाद को स्वीकार करना चाहिए (और) नए कार्यभार में मुझे जो पूर्ण समर्थन मिला है।” 60 साल के माधव कट्टर संघ नेता हैं और 2020 में किनारे कर दिए जाने के बाद राजनीतिक सुर्खियों में अपनी वापसी पर शायद ही इससे ज्यादा कुछ कह सकते थे।

बीजेपी ने न सिर्फ उस सीनियर आरएसएस नेता की ओर रुख किया है जिसने पार्टी को जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के सीमावर्ती क्षेत्रों में पैर जमाने में मदद की, जो कभी उसकी पहुंच से बाहर थे, बल्कि पार्टी ने उन्हें अपने सबसे महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों में से एक के लिए फिर से जम्मू-कश्मीर भेज दिया है। चाहे सही हो या गलत, अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद पहले विधानसभा चुनावों के नतीजों को जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को रद्द करने के मोदी सरकार के दांव पर एक वोट के रूप में देखा जाएगा।

ज्यादातर बीजेपी नेता स्वीकार करते हैं कि राम माधव को वापस लाने के फैसले में जम्मू-कश्मीर में उनके रिकॉर्ड की अहम भूमिका थी। हालांकि कुछ लोगों ने कहा कि यह 2014 से पार्टी के पास मौजूद फायदों के बावजूद इस क्षेत्र में एक मजबूत नेतृत्व बनाने में पार्टी की विफलता को दर्शाता है, लेकिन कुछ को संदेह है कि गुलाम नबी आज़ाद जैसे राजनीतिक नेताओं के साथ अपने घनिष्ठ संबंधों के साथ, माधव ही सबसे अच्छे व्यक्ति हैं जो बीजेपी के लिए जम्मू-कश्मीर में संख्या सुरक्षित कर सकते हैं। अपने ट्वीट में, माधव ने कहा कि वह उन्हें चुनने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बेहद आभारी हैं, और आगे कहा कि बातचीत से मुझे एहसास हुआ कि अनुच्छेद 370 को ऐतिहासिक रूप से निरस्त करने के बाद, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के माध्यम से सत्ता की बागडोर उन्हें सौंपकर जम्मू-कश्मीर के लोगों को सुशासन प्रदान करना उनका एकमात्र और राजनीतिक मिशन है।’ माधव ने कहा कि वह केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के भी आभारी हैं, और उन्हें आगामी चुनावों और पार्टी के लिए भरोसेमंद समझा, साथ ही बीजेपी अध्यक्ष जे पी नड्डा का भी आभार व्यक्त किया।

पार्टी के एक सूत्र ने कहा कि यह एक चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी है, जहां माधव अपनी काबिलियत साबित कर सकते हैं। सूत्र ने कहा कि बीजेपी का चुनावी प्रभाव जम्मू क्षेत्र तक ही सीमित है, जहां केंद्र शासित प्रदेश की 90 में से 43 सीटें हैं… जब तक पार्टी घाटी में ठोस संबंध विकसित नहीं कर लेती, तब तक सरकार बनाना पार्टी के लिए संभव नहीं है। पार्टी नेतृत्व को पता है कि माधव इसके लिए सबसे अच्छे दांव हैं।

राम माधव ने 2014 में जम्मू-कश्मीर में बीजेपी की चुनावी सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भाजपा 25 सीटों के साथ पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (28 सीटों) के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी और नेशनल कॉन्फ्रेंस (15 सीटों) से आगे रही थी। 2008 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी के पास सिर्फ 11 सीटें थीं। जम्मू-कश्मीर में त्रिशंकु विधानसभा के बाद राज्यपाल शासन के दौरान, राम माधव ने ही पीडीपी के साथ न्यूनतम साझा कार्यक्रम तैयार करवाया था ताकि मुफ्ती मोहम्मद सईद को मुख्यमंत्री बनाकर गठबंधन सरकार बनाई जा सके। यह माधव ही थे जिन्होंने 2015 में बीजेपी और अप्रत्याशित सहयोगी पीडीपी के बीच समझौता कराया था, जिसके कारण दोनों दलों ने गठबंधन सरकार बनाई। बढ़ते तनाव के बोझ तले 2019 में गठबंधन टूट गया और तब से जम्मू-कश्मीर केंद्र के शासन में है।

सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने NSA अजीत डोभाल के साथ सुरक्षा और राजनीतिक स्थिति पर विचार-विमर्श करने के बाद माधव को वापस लाने और उन्हें जम्मू-कश्मीर चुनाव का प्रभार देने का फैसला किया। अगर जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक द्वारा उन पर लगाए गए रिश्वतखोरी के आरोपों का साया मंडराता है, तो इसके कोई खास संकेत नहीं हैं। मूल रूप से आंध्र प्रदेश के रहने वाले, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा और राजनीति विज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएट माधव 20 साल की उम्र से पहले ही आरएसएस के प्रचारक बन गए थे और उन्होंने एक ऐसे नेता के रूप में ख्याति अर्जित करके संघ के भीतर अपनी जगह बनाई जो हमेशा एक सौंपे गए मिशन को पूरा करते थे।

क्या जम्मू कश्मीर में राम माधव निभा पायेंगे अपनी जिम्मेदारी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या जम्मू कश्मीर में राम माधव अपनी जिम्मेदारी निभा पायेंगे या नहीं! भारतीय जनता पार्टी 2014 में सत्ता में आई थी, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस ने राम माधव को भाजपा को सौंप दिया था। राम माधव, आरएसएस का जाना-माना चेहरा थे। भाजपा को अपने नेता सौंपना संघ की पुरानी परंपरा रही है, लेकिन भाजपा में राम माधव का उदय असामान्य था। शुरुआती सफलताओं के बाद उन्हें राजनीतिक रूप से दरकिनार कर दिया गया। राम माधव ने 5 साल के लंबे अंतराल के बाद वापसी की। भाजपा ने केंद्रीय मंत्री जी किशन रेड्डी के साथ राम माधव को जम्मू-कश्मीर के लिए चुनाव प्रभारी नियुक्त किया है। राम माधव ने कुछ हफ्ते पहले ही एक लेख में बताया था कि 2024 का लोकसभा चुनाव परिणाम ‘विनम्रता के आह्वान के लिए जनादेश’ है। जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव 10 साल बाद और अनुच्छेद 370 को हटाकर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने के बाद पहली बार होंगे।

राम माधव ने 2014 में जम्मू-कश्मीर में भाजपा की चुनावी सफलताओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भाजपा 25 सीटों के साथ 28 सीटों वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई थी। बीजेपी को नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) की 15 सीटों के मुकाबले बड़ी जीत मिली थी। याद रहे कि 2008 के पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा के पास सिर्फ 11 सीटें थीं। जम्मू-कश्मीर में त्रिशंकु विधानसभा के बाद राज्यपाल शासन के दौरान राम माधव ने पीडीपी के साथ न्यूनतम साझा कार्यक्रम तैयार करवाया था, ताकि मुफ्ती मोहम्मद सईद के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनाई जा सके।

बीजेपी राम माधव के इसी अनुभव का फायदा उठाना चाहती है क्योंकि जम्मू-कश्मीर में 18 सितंबर से विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। हालांकि, यह तीसरी कहानी है। पहली कहानी एक ‘बाल कार्यकर्ता’ के उदय की है, जो आपातकाल के दौरान छिपे हुए आरएसएस नेताओं तक संदेश पहुंचाता था। बाद में, वह खुद एक संघ का एक कुशल नेता बन गया। आरएसएस के बारे में लोगों की धारणा से राम माधव की छवि अलग है। रंगीन खादी के कुर्ते, नए जमाने के स्मार्टफोन और धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने वाले राम माधव आरएसएस का नया चेहरा बन गए। उन्हें दिल्ली में आरएसएस का प्रवक्ता बनाया गया था। 2014 के चुनाव में भाजपा की जोरदार जीत के बाद उन्हें बीजेपी महासचिव बनाया गया। भाजपा में आरएसएस के सदस्य पार्टी और संगठन को एकजुट होकर काम करने में मदद करते हैं।

राम माधव ने जम्मू-कश्मीर में अपने अच्छे प्रदर्शन से पहले असम में दो साल तक काम किया और भाजपा को 126 में से 86 सीटों के साथ वहां की सत्ता में लाने में मदद की। असम को पहली बार सर्बानंद सोनोवाल के रूप में भाजपा का मुख्यमंत्री मिला। सोनोवाल ने भी खुद को पार्टी के लिए पूरी तरह समर्पित कर दिया था। पूर्वोत्तर परंपरागत रूप से कांग्रेस का गढ़ रहा है, लेकिन सोनोवाल के मुख्यमंत्री बनते ही एक-एक अन्य प्रदेशों में भी भाजपा की सरकारें बनने लगीं। बताया जाता है कि जम्मू-कश्मीर में उन्होंने पीडीपी-भाजपा सरकार को पटरी पर ला दिया। उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की मृत्यु के बाद उनकी बेटी और मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती से बातचीत की। असम और जम्मू-कश्मीर में शानदार प्रदर्शन के बाद राम माधव भाजपा के सबसे प्रमुख और शीर्ष नेताओं में से एक बनकर उभरे थे।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली अमेरिकी यात्रा के लिए भी ज्यादातर जमीनी काम किए थे। 2019 के आम चुनाव से पहले एक इंटरव्यू में उन्होंने आशंका जताई थी कि भाजपा के लिए अपने दम पर स्पष्ट बहुमत हासिल करना मुश्किल होगा और उसे अपने एनडीए सहयोगियों पर निर्भर रहना होगा। हालांकि, पार्टी ने अकेले 303 सीटें लाई थीं, बहुमत से बहुत ज्यादा।

आरएसएस भाजपा नेतृत्व की आलोचना करता रहा है, खासकर 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की सीटों में गिरावट के बाद। चुनाव परिणामों के कुछ दिनों बाद जून में नागपुर में एक कार्यक्रम के दौरान आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के खिलाफ तीखी टिप्पणी की थी। भागवत की टिप्पणी ऐसे समय में आई थी, जब इस बात पर गहन चर्चा हो रही थी कि क्या आरएसएस ने वास्तव में अपने हाथ पीछे खींच लिए थे और चुनाव के दौरान भाजपा का तहे दिल से समर्थन नहीं किया था। यह बात खास तौर पर उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे दो राज्यों में कही गई, जहां भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा।

राम माधव की वापसी ऐसे समय में हुई है, जब कुछ विशेषज्ञ आरएसएस को खुद को मजबूत करने की कोशिश करते हुए देख रहे हैं। भाजपा के बहुमत के बिना सत्ता में लौटने के बाद कई आरएसएस नेताओं ने इसकी आलोचना की थी। राम माधव ने भी एक कड़ा लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने चुनाव परिणामों को ‘विनम्रता के लिए जनादेश’ बताया था। भाजपा से पांच साल के वनवास के बाद राम माधव की वापसी पार्टी की व्यावहारिक राजनीति की ओर इशारा करती है। पार्टी जम्मू-कश्मीर में उनके जादू को देख चुकी है और उसे वहां ऐतिहासिक चुनाव में अच्छे प्रदर्शन के लिए उनकी जरूरत है।

क्या जम्मू कश्मीर के मुसलमान करेंगे भाजपा पर भरोसा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या जम्मू कश्मीर के मुसलमान बीजेपी पर भरोसा करेंगे या नहीं! जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के लिए सोमवार को बीजेपी की पहली लिस्ट आई। पार्टी ने पहले 44 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की, लेकिन कुछ ही देर में इसे वापस ले लिया गया। बाद में पार्टी की तरफ से 15 उम्मीदवारों की नई संशोधित लिस्ट जारी की गई। इस नई लिस्ट में सभी 15 उम्मीदवार पहले जारी की गई लिस्ट वाले ही हैं। जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा ने सोमवार को कैंडिडेट की दोबारा लिस्ट जारी की है। इनमें पहले फेज के 15 प्रत्याशियों का नाम है। इसमें कोई बदलाव नहीं है। इससे पहले पार्टी ने सुबह 10 बजे 44 नामों की लिस्ट जारी की थी, जिसे 1 घंटे में ही वापस ले लिया था। करीब 11 बजे पार्टी ने सोशल मीडिया हैंडल X से अपनी लिस्ट डिलीट कर दी। हटाई गई लिस्ट में 3 चर्चित चेहरे दो पूर्व डिप्टी CM निर्मल सिंह, कविंद्र गुप्ता और जम्मू-कश्मीर के पार्टी अध्यक्ष रविंद्र रैना का नाम नहीं था। दरअसल, जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बीजेपी की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक हुई, जिसमें केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा सहित पार्टी की टॉप लीडरशिप ने शिरकत की। इस दौरान जम्मू-कश्मीर की 90 विधानसभा सीटों में बहुमत हासिल करने की रणनीति पर चर्चा हुई। माना जा रहा है कि भाजपा यह चुनाव मुस्लिम प्रत्याशियों और मुस्लिम वोटरों के भरोसे जीतने की योजना भी बनाई है। अभी जारी 15 प्रत्याशियों की लिस्ट में कम से कम 8 मुस्लिम हैं। आइए-एक्सपर्ट से समझते हैं क्या है भाजपा का चुनावी गणित।

भाजपा की सूची में आठ मुस्लिम और सात हिंदू प्रत्याशी हैं, जिनमें से एक सीट पर महिला प्रत्याशी को उतारा गया है। जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 24 सीटों पर मतदान होगा। भाजपा ने अभी 15 सीटों के ही नाम जारी किए हैं। फिलहाल, पहले चरण की नौ सीटों के प्रत्याशियों का ऐलान होना अभी बाकी हैं। जम्मू कश्मीर में पहले चरण की वोटिंग 18 सितंबर को होनी है।

भारतीय जनता पार्टी ने किश्तवाड़ सीट से BJP के दिग्गज नेताओं में से एक अनिल परिहार की भतीजी शगुन परिहार को मैदान में उतारा है। शगुन परिहार अजित परिहार की बेटी हैं। भाजपा ने किश्तवाड़, डोडा और भद्रवाह जिले में अनिल परिहार का दबदबा देखते हुए शगुन परिहार को मैदान में उतारा है। हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकियों ने 1 नवंबर 2018 को किश्तवाड़ में हिंदुओं की दबंग आवाज रहे भाजपा नेता अनिल परिहार और उनके भाई अजित परिहार की हत्या कर दी थी। अनिल परिहार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सक्रिय सदस्‍य थे। साल 2008 में अनिल परिहार को पैंथर्स पार्टी से टिकट मिला था, लेकिन वे हार गए थे। इसके बा वह भाजपा में शामिल हो गए। उन्होंने अपने इलाके में भाजपा को मजबूत करने में सहयोग दिया।

आखिरी बार 2014 में जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव हुए थे। तब BJP और PDP ने गठबंधन सरकार बनाई थी। 2018 में गठबंधन टूटने के बाद सरकार गिर गई थी। इसके बाद राज्य में 6 महीने तक राज्यपाल शासन (उस समय जम्मू-कश्मीर संविधान के अनुसार) रहा। इसके बाद राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। राष्ट्रपति शासन के बीच ही 2019 के लोकसभा चुनाव हुए, जिसमें BJP भारी बहुमत के साथ केंद्र में लौटी। इसके बाद 5 अगस्त 2019 को BJP सरकार ने अनुच्छेद 370 खत्म करके राज्य को दो केंद्र-शासित प्रदेशों (जम्मू-कश्मीर और लद्दाख) में बांट दिया था। इस तरह जम्मू-कश्मीर में 10 साल बाद विधानसभा चुनाव हो रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर में भाजपा ने अकेले दम पर ताल ठोंकने का फैसला किया है। कांग्रेस ने नेशनल कॉन्फ्रेंस से हाथ मिला लिया है। इस बार इंडिया गठबंधन ज्यादा मजबूत स्थिति में होगी। ऐसे में भाजपा को इंडिया गठबंधन से लड़ने के लिए कुछ अलग ही दांव चलना पड़ेगा। संभव हो कि वह लोकसभा चुनाव, 2024 में आजमाई गई सफल रणनीति को विधानसभा चुनाव में भी दोहराए।

भाजपा ने 2024 के आम चुनाव में जम्मू रीजन की जम्मू और उधमपुर सीट पर उम्मीदवार उतारे थे जबकि श्रीनगर, बारमूला और अनंतनाग सीट पर चुनाव नहीं लड़ी थी। बीजेपी के इस दांव से बारामूला में एनसी नेता उमर अब्दुल्ला और पीडीपी की महबूबा मुफ्ती जैसी दिग्गज नेता चुनाव हार गई थीं। निर्दलीय शेख अब्दुल रशीद उर्फ इंजीनियर रशीद सांसद बनने में सफल रहे। इस बार के विधानसभा चुनाव में भी कश्मीर रीजन के मुस्लिम बहुल कई सीटों पर खुद चुनाव मैदान में उतरने के बजाय निर्दलीय कैंडिडेट को समर्थन करने का प्लान बनाया है।

दिल्ली यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. राजीव रंजन गिरि कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर में बीजेपी को सत्ता हासिल करने के लिए कुल 90 में से 46 सीटें में जीतनी होंगी। वह अपना पूरा दम जम्मू क्षेत्र की 43 में से 35 से 37 सीटें जीतने पर लगा रही है। 2014 में जम्मू रीजन में बीजेपी ने सभी दलों का सफाया कर दिया था। उस वक्त भाजपा पीडीपी के बाद विधानसभा सीटें जीतने वाली दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी। ऐसे में इस बार भी भाजपा की जम्मू क्षेत्र की 43 सीटों के लिए पूरे दम के साथ चुनाव लड़ने की तैयारी में है। वहीं, कश्मीर क्षेत्र में 10 से 12 सीटें जीतने की योजना है।

आखिर जम्मू कश्मीर में बीजेपी ने क्यों किया उम्मीदवारों की लिस्ट में परिवर्तन?

हाल ही में जम्मू कश्मीर में बीजेपी ने उम्मीदवारों की लिस्ट में परिवर्तन कर दिया है! जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी ने सोमवार को 44 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी की थी। लिस्ट जारी होते ही विरोध होने लगा। नतीजतन पार्टी ने लिस्ट वापस ले ली। एक्स पर पोस्ट की गई लिस्ट को डिलीट कर दिया गया। बाद में नई लिस्ट जारी की गई। पहले 15 उम्मीदवारों की और फिर एक दूसरी लिस्ट जारी की गई जिसमें सिर्फ एक नाम है- कोकरनाग से चौधरी रोशन हुसैन गुज्जर। आखिर ऐसा क्या हुआ जो बीजेपी को एक ही घंटे में उम्मीदवारों की लिस्ट वापस लेनी पड़ी? आइए समझते हैं। बीजेपी ने जिस लिस्ट को वापस लिया, उसमें 44 नाम थे जिनमें सभी तीनों चरण की वोटिंग वाली सीटों के नाम थे। इसमें पहले चरण की 15 सीटों, दूसरे चरण की 10 और तीसरे चरण की 19 सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम का ऐलान किया गया था। जम्मू क्षेत्र से 36 और कश्मीर घाटी के 8 उम्मीदवारों के नाम का ऐलान किया गया था जिसमें दो कश्मीरी पंडित वीर सराफ और अशोक भट्ट के नाम भी शामिल थे। लिस्ट आते ही बीजेपी कार्यकर्ता विरोध करने लगे। पैराशूट उम्मीदवारों को लेकर कार्यकर्ताओं का गुस्सा फूट पड़ा। प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र रैना के ऑफिस के बाहर नाराज कार्यकर्ता प्रदर्शन करने लगे। उग्र कार्यकर्ताओं की भीड़ को देखकर रविंद्र रैना को अपने आप को केबिन में लॉक करना पड़ा। उनके दफ्तर की सुरक्षा बढ़ा दी गई। कार्यकर्ताओं में आक्रोश था कि दूसरे दलों से आए नेताओं को क्यों तरजीह दी गई? पार्टी के निष्ठावान नेताओं की उपेक्षा क्यों की गई? दिलचस्प बात ये है कि बीजेपी को जिस लिस्ट को वापस लेना पड़ा, उसमें रविंद्र रैना का भी नाम नहीं था।

विरोध के बाद बीजेपी ने पहले जारी की गई लिस्ट को वापस ले लिया और 15 उम्मीदवारों के नाम की संशोधित लिस्ट जारी की। ये लिस्ट सिर्फ पहले चरण के उम्मीदवारों की थी। वापस ली गई लिस्ट में भी पहले चरण के इन्हीं 15 सीटों और इन्हीं नामों का ऐलान हुआ था। यानी बीजेपी ने एक तरह से सिर्फ दूसरे और तीसरे चरण वाली सीटों की लिस्ट वापस ली। बाद में बीजेपी ने एक उम्मीदवार के नाम वाली दूसरी लिस्ट जारी की। दक्षिण कश्मीर की कोकरनाग विधानसभा सीट से चौधरी रोशन हुसैन गुज्जर को टिकट दिया गया है। वापस ली जा चुकी लिस्ट में इस सीट के लिए उम्मीदवार के नाम का ऐलान नहीं किया गया है। कोकरनाग विधानसभा सीट पर भी पहले चरण में 18 सितंबर को वोटिंग है।

जम्मू-कश्मीर की 90 विधानसभा सीटों के लिए कुल तीन चरणों में वोटिंग होनी है। पहले चरण में 24 सीटों पर 18 सितंबर को, दूसरे चरण में 26 सीटों पर 25 सितंबर को और तीसरे चरण की 40 सीटों पर 1 अक्टूबर को वोट डाले जाएंगे। नतीजे 4 अक्टूबर को आएंगे। बीजेपी ने शुरुआती ऊहापोह के बाद आखिरकार पहले चरण की 24 सीटों में से 16 सीटों पर उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं। पहले चरण के लिए पर्चा दाखिल करने की अंतिम तिथि 27 अगस्त है। यानी अब समय बिलकुल नहीं है, मंगलवार को ही पर्चा भरा जा सकेगा। बीजेपी ने शुरुआती लिस्ट भले ही वापस ले ली लेकिन ये शायद ही नाराज कार्यकर्ताओं को शांत कर सकेगी। वजह ये है कि संशोधित पहली लिस्ट में पहले चरण के लिए जिन 15 नामों का ऐलान किया गया है, वे सभी वापस ली गई लिस्ट में भी थे। हां, अब ये देखना दिलचस्प होगा कि दूसरे और तीसरे चरण के लिए बीजेपी जब अपनी लिस्ट जारी करती है तो उसमें भी वही नाम रहते हैं जो वापस ली गई लिस्ट में थे या फिर बदलाव होगा। वैसे जिस तरह बीजेपी को 44 उम्मीदवारों वाली लिस्ट वापस लेनी पड़ी उससे संकेत मिलता है कि दूसरे और तीसरे चरण वाली सीटों के लिए जो नई लिस्ट आएगी, उसमें बदलाव देखने को मिल सकते हैं। वैसे कहा तो ये भी जा रहा है कि बीजेपी को सिर्फ पहले चरण के लिए ही उम्मीदवारों के नाम का ऐलान करना था लेकिन गलती से दूसरे और तीसरे चरण वाले उम्मीदवारों का नाम भी लिस्ट में जारी कर दिया गया। इसलिए पार्टी ने उसे वापस ले लिया।

बीजेपी ने जैसे ही 44 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की, बीजेपी कार्यकर्ता भड़क गए। लिस्ट में कई बड़े चेहरों के नाम गायब थे। पूर्व उप मुख्यमंत्रियों निर्मल सिंह और कवींद्र गुप्ता के नाम नदारद थे। प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष रविंद्र रैना का नाम भी गायब था। पूर्व मंत्री सत पाल शर्मा, प्रिया सेठी और श्याम लाल चौधरी का नाम नदारद था। दिलचस्प बात ये है कि केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह के भाई देवेंद्र राणा का नाम वापस ली जा चुकी लिस्ट में शामिल था जो नैशनल कॉन्फ्रेंस छोड़कर बीजेपी में आए थे। लिस्ट में कई ऐसे नाम थे जो नैशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी, पैंथर्स पार्टी और कांग्रेस को छोड़कर आए थे। देवेंद्र राणा की तरह ही नैशनल कॉन्फ्रेंस छोड़कर बीजेपी में आए पूर्व मंत्री मुश्ताक बुखारी को सुरनकोट सीट से टिकट दिया गया था। पीडीपी से आए मुर्तजा खान को मेंढर से टिकट मिला था। कांग्रेस छोड़कर आए पूर्व मंत्री श्याम लाल शर्मा को जम्मू नॉर्थ से उम्मीदवार घोषित किया गया था।

पहले लिस्ट जारी करने और फिर कुछ ही देर में उसे वापस लेने से बीजेपी को नुकसान भी संभव है। अब फाइनल लिस्ट में अगर उन नेताओं के नाम नहीं रहते जो वापस ली जा चुकी लिस्ट में जगह पाए थे तो वे इसे टिकट देकर काट देने की तरह देखेंगे। ये असंतोष को जन्म दे सकता है। उन सीटों पर पार्टी में बगावत देखी जा सकती है। और अगर पहले चरण वाली सीटों की तरह ही दूसरे और तीसरे चरण के लिए भी संशोधित लिस्ट में वही पुराने चेहरे रहते हैं तो उन कार्यकर्ताओं की नाराजगी बरकरार रहेगी जो शुरुआती लिस्ट आते ही विरोध में उतर गए थे। हालांकि, लिस्ट वापस लेने से बीजेपी को नुकसान ही हो, जरूरी नहीं। लोकसभा चुनाव के दौरान तो समाजवादी पार्टी ने कई सीटों पर अपने पहले घोषित किए जा चुके उम्मीदवारों को बदल दिया था। नतीजे भी उसके हिसाब से काफी अच्छे आए थे। अब देखना ये है कि बीजेपी जम्मू-कश्मीर में चुनावी जंग शुरू होने से पहले ही अपनी लड़खड़ाहट को कैसे संभालती है। निगाह इस पर रहेगी कि क्या सपा की तरह ठोक-बजाकर, सोच-समझकर उम्मीदवार बदलने का रिस्क लेगी या कार्यकर्ताओं के असंतोष को नजरअंदाज कर उन्हीं नामों पर दांव खेलेगी, जो वापस ली जा चुकी लिस्ट में थे।

क्या हरियाणा चुनाव के लिए बीजेपी को संभाल कर चलना होगा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हरियाणा चुनाव के लिए बीजेपी को संभाल कर चलना होगा या नहीं! हरियाणा विधानसभा चुनाव को लेकर बीजेपी ने जैसे ही उम्मीदवारों की पहली लिस्ट घोषित की मानो पार्टी में घमासान ही मच गया। 67 उम्मीदवारों की पहली सूची आने के बाद पार्टी में सिरफुटौव्वल शुरू हो गई। जिन नेताओं को बीजेपी से टिकट की उम्मीद थी उन्होंने मोर्चा खोल रखा है। पहली लिस्ट के बाद हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी का साथ छोड़ने वाले नेताओं की लाइन लग गई है। पार्टी छोड़ने वालों में कैबिनेट मंत्री से लेकर कई पूर्व विधायक भी शामिल हैं। बीजेपी किसान मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष ने भी पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। इसमें हरियाणा के कैबिनेट मंत्री चौधरी रणजीत सिंह चौटाला का नाम भी शामिल है। उन्होंने रानिया विधानसभा से टिकट नहीं देने पर नाराजगी जताई। यही नहीं रणजीत चौटाला ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान करते हुए बीजेपी की टेंशन बढ़ा दी है। रणजीत चौटाला ही नहीं कई और दिग्गजों ने बीजेपी छोड़ने का फैसला लिया है। चुनावी रण से ठीक पहले ये कहीं से भी पार्टी के लिए अच्छी खबर नहीं मानी जा सकती। हालांकि, बीजेपी नेतृत्व ने जिस तरह से टिकट बंटवारा किया है उसके पीछे खास प्लानिंग मानी जा रही है। पार्टी ने इसी साल जून में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन को देखते हुए टिकट बंटवारा किया है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस बार लोकसभा चुनाव में राज्य की 10 में से 5 सीट पर ही बीजेपी कब्जा जमाने में सफल रही। बाकी बची 5 सीटें कांग्रेस के खाते में गईं। इससे पहले 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने यहां सभी 10 सीटों पर कब्जा जमाया था। 2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी के प्रदर्शन को देखते हुए पार्टी कोई कमी नहीं छोड़ना चाहती। इसके पीछे एंटी इंकम्बेंसी फैक्टर भी अहम है।

राज्य में पार्टी विरोधी लहर को देखते हुए बीजेपी नेतृत्व हर कदम बहुत फूक-फूक कर रहा है। यही वजह है टिकट बंटवारे में पार्टी ने सियासी समीकरण का ध्यान रखा है। इसका खुलासा खुद पार्टी के प्रदेश प्रभारी बिप्लब देब ने किया। उन्होंने गुरुवार को कहा कि उम्मीदवारों की सूची तैयार करने में सामाजिक समीकरणों का पूरा ध्यान रखा गया है। हर समाज को प्रतिनिधित्व दिया गया है। त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि हरियाणा में विधानसभा की कुल 90 सीटें हैं। इन सभी सीटों पर जीत का परचम लहराने के लिए हमारी पार्टी तैयार है। पहली लिस्ट में 14 पिछड़ा वर्ग के प्रतिनिधि शामिल हैं। सभी सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए प्रत्याशियों का चयन किया गया है।

बिप्लब देब ने कहा कि हमने दलित समुदाय से जुड़े लोगों को भी जगह दी है। इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि किसी भी समाज का व्यक्ति वंचित न रहे। हर समाज को राजनीति में अपनी भागीदारी निभाने का मौका मिले। उन्होंने ये भी बताया कि पार्टी ने नौ मौजूदा विधायकों के भी टिकट काटे हैं। इनमें मंत्री भी शामिल हैं। मौजूदा समय में राजनीतिक समीकरण को ध्यान में रखते हुए हमने यह कदम उठाया है, लिहाजा कोई भी उसे निजी तौर पर न ले।

90 सदस्यीय हरियाण विधानसभा चुनाव में बीजेपी का टारगेट जीत की हैट्रिक लगाने पर है। यही वजह है कि पार्टी कोई रिस्क नहीं लेना चाहती। ऐसे में पार्टी ने चौंकाने वाला फैसला लेते हुए सूबे के सीएम नायब सिंह सैनी की सीट भी बदल दी। सैनी को उम्मीद थी कि एक बार फिर वो करनाल सीट से दावेदारी करेंगे। ये सीट मनोहर लाल खट्टर के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी। लोकसभा चुनाव से पहले एमएल खट्टर ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्हें लोकसभा चुनाव मैदान में उतारा गया था। ऐसे में नायब सिंह सैनी को सूबे का सीएम बनाया गया। यही नहीं वो जाटलैंड की मजबूत पकड़ के चलते करनाल से जीत दर्ज करने में सफल रहे। हालांकि, अब पार्टी ने सैनी को लाडवा से चुनाव में उतारा है। वहीं करनाल से बीजेपी ने जगमोहन आनंद को टिकट दिया है। वो पूर्व सीएम मनोहर लाल खट्टर के मीडिया सलाहकार भी रहे हैं।

हरियाणा चुनाव में बीजेपी ने जो पहली लिस्ट जारी की उनमें कई पूर्व सांसदों के साथ ही जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) छोड़कर पार्टी में शामिल होने वाले नेताओं के भी टिकट कटे हैं। वहीं पार्टी के कई बड़े नाम भी उम्मीदवारों की सूची से गायब हैं। हिसार के बीजेपी जिला उपाध्यक्ष तरुण जैन ने पार्टी से नाता तोड़ दिया। उन्होंने कमल गुप्ता को टिकट दिए जाने पर नाराजगी जताते हुए पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। बीजेपी व्यापार प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक नवीन गोयल ने पार्टी को अलविदा कह दिया। वो गुरुग्राम विधानसभा से टिकट के प्रबल दावेदार माने जा रहे थे। हालांकि पार्टी ने गुरुग्राम से मुकेश शर्मा को प्रत्याशी बनाया है। नवीन गोयल ने गुरुग्राम से निर्दलीय चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है।

बीजेपी किसान मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रहे और पूर्व विधायक सुखविंदर मांढी का चरखी-दादरी जिले के बाढड़ा से टिकट कट गया। ऐसे में उनके समर्थकों ने सड़क पर उतरकर आक्रोश व्यक्त किया। उमेद सिंह पातुवास को यहां से टिकट दिए जाने पर सुखविंदर मांढी के समर्थकों ने बीजेपी के खिलाफ प्रदर्शन किया। बीजेपी से इस्तीफा देने वालों की लिस्ट में सुनील राव, आदित्य चौटाला, सावित्री जिंदल, सोनीपत से पूर्व कैबिनेट मंत्री कविता जैन के नाम शामिल हैं। लक्ष्मण नापा ने रतिया से टिकट नहीं मिलने के बाद बीजेपी से इस्तीफा दे दिया। वो जल्द ही कांग्रेस दामन थाम सकते हैं। बीजेपी ने रतिया से सुनीता दुग्गल को टिकट दिया है। हरियाणा बीजेपी ओबीसी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व मंत्री कर्णदेव कंबोज ने इंद्री विधानसभा सीट से टिकट कटने के बाद सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। हालांकि, बीजेपी में इस्तीफों की झड़ी के बीच पार्टी कैसे इस चुनौती से पार पाएगी, ये देखना दिलचस्प होगा।