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क्या बॉलीवुड हमेशा से करता है मुस्लिम तुष्टिकरण?

यह सवाल उठना है कि क्या बॉलीवुड हमेशा से मुस्लिम तुष्टिकरण करता है या नहीं! हाल ही में रिलीज हुई वेबसीरीज IC 814: द कंधार हाईजैक को लेकर बवाल मचा हुआ है। ये वेब सीरीज 1999 में इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC-814 के हाईजैक की सत्य घटना पर आधारित है। पूरी वेब सीरीज में कई बार 1999 के असली दृश्य भी दिखाए गए हैं, जो इस दावे को और मजबूत करते हैं कि ये सीरीज असली हाईजैक की घटना से पूरी तरह जुड़ी हुई है। इस हाईजैक को पांच आतंकवादियों ने अंजाम दिया था। विवाद की वजह यह है कि इस वेबसीरीज में आतंकवादियों के असली नामों को बदलकर उनके कोडनेम ‘भोला’ और ‘शंकर’ जैसे हिंदू नामों से दर्शाया गया है। जबकि आतंकियों के असली नाम कुछ और ही थे, जिनका पूरी सीरीज में कहीं जिक्र नहीं हुआ है। विवादों के बीच केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने नेटफ्लिक्स इंडिया की कंटेंट हेड को समन भेजा है सूत्रों के मुताबिक, मंत्रालय ने सोमवार को नेटफ्लिक्स इंडिया की कंटेंट हेड मोनिका शेरगिल को ‘आईसी : 814’ वेब सीरीज कंटेंट विवाद को लेकर मंगलवार को दिल्ली तलब किया है। साथ ही उन्होंने वेब सीरिज से जुड़े विवादित तथ्यों पर स्पष्टीकरण भी मांगा है। वेब सीरीज निर्माताओं पर आरोप है कि आतंकवादियों के असली मुस्लिम नामों को छिपाकर हिंदू नाम दिए गए हैं, जिससे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की कोशिश की गई है। दरअसल वेब सीरीज में आतंकियों के नाम भोला, शंकर,डॉक्टर, बर्गर और चीफ बताए गए हैं। सीरीज में बताया गया है कि ये आतंकियों के कोमनैम थे। लेकिन मेकर्स ने 6 एपिसोड की इस सीरीज में कहीं भी आतंकियों के असली नाम नहीं बताए हैं, जब कि आतंकियों के असली नाम पब्लिक डोमेन में मौजूद थे। सबसे ज्यादा विवाद आतंकियों के ‘भोला’ और ‘शंकर’ नाम को लेकर है।

कंधार हाई जैक के बाद भारत सरकार के गृहमंत्रालय ने जांच के बाद इस हमले की पूरी जानकारी दी थी। 6 जनवरी 2000 को दिए गए गृह मंत्रालय के एक बयान में हाई जैकर्स के असली नाम और उनके पते बताए गए थे। पांचों आतंकी मुस्लिम थे और पाकिस्तान के रहने वाले थे। विदेश मंत्रालय ने बताया कि इन हाईजैकर्स को चीफ, डॉक्टर, बर्गर, भोला और शंकर नाम से जाना जाता है। ये लोग आपस में इन्हीं नामों का इस्तेमाल करते बातचीत करते और पूरे हाई जैक को अंजाम दिया।

IC-814 वेबसीरीज को लेकर बीजेपी ने भी डायरेक्टर अनुभव सिन्हा पर निशाना साधा है। बीजेपी आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा, ‘आईसी-814 के हाईजैकर्स खूंखार आतंकवादी थे, जिन्होंने अपनी मुस्लिम पहचान छिपाने के लिए झूठे नामों का सहारा लिया। फिल्म निर्माता अनुभव सिन्हा ने उनके गैर-मुस्लिम नामों को आगे बढ़ाकर उनकी आपराधिक मंशा को वैध कर दिया। इसका नतीजा क्या होगा? दशकों बाद लोगों को लगेगा कि हिंदुओं ने IC-814 हाइजैक की थी। पाकिस्तानी आतंकी, जो सभी मुसलमान हैं उनके अपराधों को छिपाने के लिए वामपंथियों के एजेंडे ने काम किया। यह सिनेमा की ताकत है, जिसका कम्युनिस्ट 70 के दशक से ही आक्रामक तरीके से इस्तेमाल कर रहे हैं। यह सिर्फ भारत की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाएगा या कमजोर करेगा, बल्कि दोष को उन लोगों से दूर कर देगा, जो इस रक्तपात के लिए जिम्मेदार हैं।’

IC-814 वेबसीरीज के कास्टिंग डारेक्टर मुकेश छाबड़ा ने इस मुद्दे पर सफाई दी। उन्होंने कहा कि इस सीरीज के लिए मेकर्स ने भरपूर रिसर्च की है। अपराधियों ने एक-दूसरे के लिए नकली नामों का इस्तेमाल किया था। उन्होंने कहा कि मैं हाईजैकर्स के नामों से जुड़े बहुत सारे ट्वीट पढ़ रहा हूं। हमने भरपूर रिसर्च की है। वे एक-दूसरे को कोडमैन से पुकारते थे। आप उन्हें जो भी नाम देना चाहें।

भारत में फिल्मों और वेबसीरीज में पात्रों के नाम रखने को लेकर कोई खास नियम नहीं है। ये फैसला पूरी तरह फिल्ममेकर्स पर होता है। जब काल्पनिक फिल्में बनती हैं, तो दिक्कत नहीं होती। लेकिन ऐसी सत्य घटनाओं पर आधारित फिल्मों को लेकर यह अपेक्षा की जाती है कि निर्माता तथ्यों का सम्मान करें और धार्मिक या सांप्रदायिक भावनाओं को ठेस न पहुंचाएं। निर्माता अक्सर पात्रों के नामों को बदलने का फैसला लेते हैं ताकि कानूनी विवादों से बचा जा सके, या किसी विशेष समुदाय को ठेस न पहुंचे। लेकिन इस सीरीज पर तुष्टीकरण के आरोप लग रहे हैं। ये पहली ऐसी सीरीज नहीं है, जो विवादों में घिरी हो। पद्मावत, ताडंव, पठान, लैला, सेक्रेड गेम, पीके, ए सूटेबल बॉय और लक्ष्मी जैसी कई फिल्में और सीरीज पर मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप लग चुके हैं।

कुछ लोगों का कहना है कि वेब सीरीज में जिस तरह आतंकियों को हिंदू नाम दिए गए हैं, ये स्यूडो सेक्युलरिजम का उदाहरण है। इतनी बड़ी घटना पर सीरीज बनी और चालाकी से आतंकियों के असली नाम छुपा लिए गए। सीरीज के निर्माताओं की ये बैलेंसिंग पॉलिसी लोगों को पसंद नहीं आ रही। आखिर फिल्मी दुनिया इस तरह की बैलेंसिंग का नकाब क्यों चढ़ाना चाहती है। ये कुछ वैसी ही है, जैसा 2012 में केंद्र सरकार ने दंगे के लिए एक विधेयक में किया था। 2012 में केंद्र सरकार ने सांप्रदायिक हिंसा और दंगों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से “सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा रोकथाम विधेयक” प्रस्तावित किया था। इस विधेयक में सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों के रूप में केवल अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति, और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को मान्यता दी गई थी। इसे लेकर भी हिंदुओं में असंतोष पैदा हुआ क्योंकि जाहिर तौर पर ये विधेयक बहुसंख्यक समुदाय के खिलाफ पक्षपाती था और सांप्रदायिक हिंसा के मामलों में केवल बहुसंख्यकों हिंदुओं को दोषी ठहराने की कोशिश की गई।

कंधार हाईजैक के लिए क्या बोले रॉ के पूर्व चीफ?

रॉ के पूर्व चीफ ने कंधार हाईजैक के लिए एक बयान दे दिया है! नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई ‘आईसी 814: द कंधार हाईजैक’ वेब सीरीज ने एक बार फिर देश को उस दिल दहला देने वाली घटना की याद दिला दी है, जिसे देश भूल चुका था। दरअसल 1999 में इंडियन एयरलाइन्स के विमान आईसी 814 को पाकिस्तानी आतंकवादियों ने हाईजैक कर लिया था और वे विमान को दिल्ली के बजाय अमृतसर, लाहौर और दुबई से होते हुए अफगानिस्तान के काबुल ले गए थे। नेटफ्लिक्स पर आई वेबसीरीज ने इस घटना को लेकर नए सिरे से बहस छेड़ दी है। इस बहस में सरकार और उस समय शामिल कई एजेंसियों की ओर से की गई कार्रवाई पर सवाल उठाए जा रहे हैं। 1999 में रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के प्रमुख रहे ए एस दुलत ने इंडिया टुडे टीवी से बातचीत में स्वीकार किया कि इस मामले में फैसले लेने में चूक हुई थी। दुलत ने कहा, ‘एक बार जब विमान अमृतसर में उतरा, तो हमारे पास यह सुनिश्चित करने का मौका था कि वह भारतीय क्षेत्र को न छोड़े। लेकिन जब यह अमृतसर से चला गया, तो सौदा करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था।’ उन्होंने आगे कहा, ‘कोई फैसला नहीं लिया गया। मैंने यह बात कई बार कही है, तब भी जब यह घटना हुई थी। अमृतसर में एक चूक हुई थी।’

दरअसल 24 दिसंबर, 1999 को काठमांडू से दिल्ली जा रही इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC 814 को पांच आतंकवादियों ने भारतीय हवाई क्षेत्र में प्रवेश करते ही अपहरण कर लिया था। विमान अमृतसर में ईंधन भरने के लिए उतरा और 50 मिनट तक वहां रुका रहा। इसके बावजूद, पंजाब पुलिस और केंद्रीय खुफिया बलों सहित अधिकारी इसका फायदा नहीं उठा सके। दुलत ने कहा, ‘हम सब वहां थे और हमें कोई फैसला लेना चाहिए था। मैं किसी को दोष नहीं देना चाहता, इतने सालों बाद यह उचित नहीं है। मैं भी उतना ही दोषी हूं जितना कोई और।’

पूर्व रॉ प्रमुख ने अपहरण की स्थिति पर पंजाब के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) सरबजीत सिंह के साथ अपनी लंबी बातचीत के बारे में बताया। उन्होंने कहा, ‘मेरी पंजाब के डीजीपी से लंबी बातचीत हुई, जिन्होंने मुझसे कहा कि वह केपीएस गिल नहीं हैं और वह अपनी नौकरी दांव पर नहीं लगाने जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री (प्रकाश सिंह बादल) ने उन्हें बताया कि वह अमृतसर में रक्तपात नहीं चाहते हैं। दिल्ली भी यही संकेत दे रहा था।’

डीजीपी ने कहा कि वे विमान पर धावा बोल सकते हैं, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि कितने हताहत हो सकते हैं। इसलिए रक्तपात के नाम पर कोई भी फैसला नहीं लेना चाहता था।’ दुलत ने कहा कि पंजाब पुलिस को यह बताया जाना चाहिए था कि विमान को अमृतसर नहीं छोड़ना चाहिए, जो नहीं हो सका। दिलचस्प बात यह है कि डीजीपी सरबजीत सिंह ने रिकॉर्ड पर कहा था कि अगर उन्हें दिल्ली से स्पष्ट निर्देश मिलते तो वह फैसला ले लेते। इस पर दुलत ने कहा, ‘मैं उनसे सहमत हूं। लेकिन उन्होंने क्या किया होता, यह मैं नहीं जानता। वह सही कह रहे थे जब उन्होंने कहा कि वह दिल्ली से निर्देशों का इंतजार कर रहे थे जो कभी नहीं आया।’

अपहरण में इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) की भूमिका के बारे में पूछे जाने पर, दुलत ने कहा कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी निश्चित रूप से शामिल थी। उन्होंने कहा, ‘इसमें आईएसआई की भूमिका निश्चित रूप से थी, इसमें कोई संदेह नहीं है। यही नहीं इस्लाम कबूल करने के अलावा हाईजैकर्स ने फ्लाइट के यात्रियों से चंदा मांगा। आतंकियों ने कहा कि गरीब अफगानिस्तान को उनकी आर्थिक मदद की जरूरत है। आतंकियों के कहने पर यात्रियों ने पैसे इकट्ठा किए और युद्धग्रस्त अफगानिस्तान की मदद के लिए 85 हजार रुपये सौंप दिए। गृह मंत्रालय के रिकॉर्ड के मुताबिक, IC 814 के पांचो हाईजैकर्स पाकिस्तानी थे। यह हमारी रिपोर्ट से सामने नहीं आया है, बल्कि एक पाकिस्तानी पत्रकार की रिपोर्ट भी है, जो उस समय कंधार में मौजूद था। उसने बताया कि आईएसआई ने पूरे ऑपरेशन को कैसे नियंत्रित किया, यह बहुत स्पष्ट रूप से समझ सकता है।’

उन्होंने तालिबान और अफगानिस्तान का नाम लेकर यात्रियों को गुमराह करने की कोशिश की होगी और पैसे मांगे। पूजा कटारिया ने आगे बताया कि 1999 के कंधार हाईजैक की ये भी कुछ अनसुनी कहानियां थी, जिसका जिक्र अनुभव सिन्हा की ‘IC 814: द कंधार हाईजैक’ में नहीं किया गया था।

आखिर क्या है IC 814 हाईजैक की डरावनी कहानी?

आज हम आपको IC 814 हाईजैक की डरावनी कहानी सुनाने जा रहे हैं! नेटफिलिक्स पर हाल ही में रिलीज हुई वेबसीरीज ‘IC 814: द कंधार हाईजैक’ को लेकर बवाल मचा हुआ है। इस सीरीज पर आतंकियों के हिंदू नाम दिखाने का आरोप लगा है। ये वेबसीरीज 1999 में हुए इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC 814 को हाईजैक करने की घटना पर आधारित है। काठमांडू से दिल्ली जा रही इस फ्लाइट को 5 आतंकियों ने हाईजैक कर तालिबानी कब्जे वाले अफगानिस्तान में के कंधार में रखा। हाईजैकर्स ने यात्रियों को इस्लाम धर्म कबूल करने के लिए भी मजबूर किया था। ये खुलासा उस फ्लाइट में सफर कर रहीं एक यात्री ने किया है। तालिबान और अफगानिस्तान का नाम लेकर यात्रियों को गुमराह करने की कोशिश की होगी और पैसे मांगे। पूजा कटारिया ने आगे बताया कि 1999 के कंधार हाईजैक की ये भी कुछ अनसुनी कहानियां थी, जिसका जिक्र अनुभव सिन्हा की ‘IC 814: द कंधार हाईजैक’ में नहीं किया गया था।इतना ही नहीं आतंकियों में सबसे क्रूर शाकिर था, जिसने एक यात्री रूपिन कट्याल का गला काट दिया था। आतंकी ने यात्रियों से कहा कि मुस्लिम धर्म हिंदू से बेहतर है इसलिए वे इसे कबूल कर लें।इस फ्लाइट को हाईजैक करने वाले पांच आतंकियों में एक शाकिर था, जिसका कोडनैम ‘डॉक्टर’ था। शाकिर ने नवविवाहित रूपिन कट्याल का गला रेत दिया, जो नेपाल में अपने हनीमून से लौट रहा था। इंडिया टुडे ने फ्लाइट में मौजूद यात्रियों में एक पूजा कटारिया ने हवाले से कई चौंकाने वाले खुलासे किए। उन्होंने बताया कि शाकिर ने IC 814 पर सवार फंसे हुए यात्रियों को कंधार में धर्मांतरण करने की कोशिश की। रूपिन और रचना कट्याल नेपाल में अपने हनीमून से लौटने वाले इकलौते नहीं थे, उस विमान में 26 अन्य कपल भी थे। पूजा कटारिया और उनके पति, राकेश भी फ्लाइट में सफर कर रहे थे। चंडीगढ़ की रहने वाली पूजा कटारिया ने उस घटना को याद करते हुए कहा कि शाकिर बहुत पढ़ा लिखा लग रहा था। उसने फ्लाइट में कई भाषण दिए, जिसमें यात्रियों से इस्लाम कबूल करने के लिए कहा गया। उसने कहा कि इस्लाम एक बहुत अच्छा धर्म है, हिंदू धर्म से बेहतर है। IC 814 की एक अन्य यात्री ने शाकिर द्वारा दिए गए भाषणों की पुष्टि की।

इस्लाम कबूल करने के अलावा हाईजैकर्स ने फ्लाइट के यात्रियों से चंदा मांगा। आतंकियों ने कहा कि गरीब अफगानिस्तान को उनकी आर्थिक मदद की जरूरत है। आतंकियों के कहने पर यात्रियों ने पैसे इकट्ठा किए और युद्धग्रस्त अफगानिस्तान की मदद के लिए 85 हजार रुपये सौंप दिए। गृह मंत्रालय के रिकॉर्ड के मुताबिक, IC 814 के पांचो हाईजैकर्स पाकिस्तानी थे। उन्होंने तालिबान और अफगानिस्तान का नाम लेकर यात्रियों को गुमराह करने की कोशिश की होगी और पैसे मांगे। पूजा कटारिया ने आगे बताया कि 1999 के कंधार हाईजैक की ये भी कुछ अनसुनी कहानियां थी, जिसका जिक्र अनुभव सिन्हा की ‘IC 814: द कंधार हाईजैक’ में नहीं किया गया था।

डायरेक्टर अनुभव सिन्हा के निर्देशन में बनी IC 814 वेबसीरीज विवादों में है। इस वेबसीरीज में आतंकियों के नाम को लेकर बवाल मचा हुआ है। सीरीज में आतंकियों के नाम ‘चीफ’, ‘डॉक्टर’, ‘शंकर’, ‘भोला’ और ‘बर्गर’ बताया गया है, जो दरअसल इनके कोडनैम थे। सरकार के रेकॉर्ड के अनुसार इन आतंकियों के असली नाम इब्राहिम अतहर, शाहिद अख्तर सईद, गुलशन इकबाल, सनी अहमद काजी, डिफेंस एरिया, मिस्त्री जहूर इब्राहिम, अख्तर कॉलोनी और शाकिर था। ये सभी आतंकी पाकिस्तान के थे। विरोध के बाद सरकार ने नेटफिलिक्स की इंडिया हेड को तलब किया है।

आतंकियों के नामों के विवाद के अब खुलासा हुआ है कि उन्होंने धर्म परिवर्तन की कोशिश की और अफगानिस्तान के लिए चंदा मांगा। इन घटनाओं को पूरी सीरीज में नहीं दिखाया गया है। ऐसे में फिल्म निर्माताओं पर सवाल उठना लाजमी है। बता दें कि इस आतंकियों में सबसे क्रूर शाकिर था, जिसने एक यात्री रूपिन कट्याल का गला काट दिया था। आतंकी ने यात्रियों से कहा कि मुस्लिम धर्म हिंदू से बेहतर है इसलिए वे इसे कबूल कर लें।इस फ्लाइट को हाईजैक करने वाले पांच आतंकियों में एक शाकिर था, जिसका कोडनैम ‘डॉक्टर’ था। इस्लाम कबूल करने के अलावा हाईजैकर्स ने फ्लाइट के यात्रियों से चंदा मांगा। आतंकियों ने कहा कि गरीब अफगानिस्तान को उनकी आर्थिक मदद की जरूरत है।आखिर उन्होंने वेबसीरीज के लिए किस तरह रिसर्च की थी या फिर निर्माताओं ने जानबूझ कर इन घटनाओं को छिपा लिया। सीरीज में आतंकियों के अच्छे व्यवहार को तो दिखाया गया है, लेकिन यात्रियों का पक्ष गायब दिखा।

बुलडोजर एक्शन के बारे में क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोजर एक्शन के बारे में एक बयान दे दिया है! सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई किसी आपराधिक मामले में आरोपी है तो सिर्फ इस कारण उसके घर डेमोलिस नहीं किए जा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने अहम टिप्पणी में कहा है कि कोई अगर दोषी भी करार दिया जा चुका है तो भी उसके घर नहीं तोड़े जा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अवैध निर्माण को प्रोटेक्शन नहीं है लेकिन डेमोलिशन एक्शन नियम के तहत ही हो सकता है। दिल्ली सहित अन्य राज्यों में हुए बुलडोजर के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस बात पर चिंता जाहिर की है कि आरोपियों को सजा देने के लिए डेमोलेशन का सहारा लिया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि कैसे किसी आरोपी के घर को डेमोलिश किया जा सकता है? यहां तक कि किसी दोषी करार दिए गए शख्स के घर को भी डेमोलिश नहीं किया जा सकता। साथ ही सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस गवई ने यह भी कहा कि अवैध कंस्ट्रक्शन को भी कोर्ट प्रोटेक्शन नहीं दे सकती है। इस मामले में कुछ गाइडलाइंस की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देशभर के राज्यों के लिए क्यों न एक गाइडलाइंस बनाई जाए? जस्टिस गवई ने कहा कि अगर कोई अवैध निर्माण भी है तो भी डेमोलेशन की कार्रवाई कानून में तय नियम के तहत ही हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विश्वनाथन ने कहा है कि हो सकता है कि एक पिता का उदंड बेटा हो लेकिन इस आधार पर अगर घर को डेमोलिश किया जाता है तो फिर यह सही नहीं है।

किसी क्राइम के आरोपी को सजा देने के तौर पर देशभर के कई राज्यों की अथॉरिटी उनके घरों को डेमोलिश करती है। इस तरह की चिंताओं के समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह देशव्यापी गाइडलाइंस बनाने का प्रस्ताव रख रही है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच के सामने कई राज्यों में बुलडोजर एक्शन के खिलाफ गुहार लगाई गई है। सुप्रीम कोर्ट में पक्षकारों ने सुझाव दिया है कि शीर्ष अदालत इस मामले में गाइडलाइंस बनाए। इस मामले में तमाम सुझाव सीनियर एडवोकेट नचिकेता जोशी एकत्र कर कोर्ट के सामने पेश करें। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई दो हफ्ते बाद के लिए टालते हुए कहा है कि इस मामले में जो मुद्दे उठाए गए हैं। इसके निपटारे के लिए कोशिश की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पैन इंडिया बेसिस पर मामले में गाइडलाइंस जारी किया जा सकता है।

दिल्ली के जहांगीरपुरी इलाके में डेमोलिशन की कार्रवाई का मुद्दा उठाते हुए जमीयत-उलेमा-ए-हिंद की ओर से दुष्यंत दवे ने कहा कि अप्रैल 2022 में कई डेमोलेशन किए गए। उन्होंने कहा कि हिंसा और दंगे में शामिल होने के आरोप लगाए गए और उन आरोपियों के घर अप्रैल 2022 में दंगे के बाद डेमोलिश किए गए। याची के वकील दवे ने पिछली सुनवाई में सितंबर 2023 में दलील दी थी कि हाल में समय में राज्यों की अथॉरिटी द्वारा उन लोगों के घर डेमोलिश की जा रही है जो किसी मामले में आरोपी हैं। दवे ने कहा था कि यह जीवन और लिबर्टी के अधिकार का हनन है और ऐसे में उनके घर को दोबारा बनाया जाए।

वहीं एडवोकेट चंद्र उदय सिंह ने कहा कि उदयपुर में एक शख्स का घर इसलिए तोड़ा गया क्योंकि उसके किरायेदार का बेटा आरोपी था। सुनवाई के दौरान यूपी सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि राज्य सरकार का स्टैंड साफ है और सिर्फ किसी मामले के आरोपी होने भर से डेमोलेशन की कार्रवाई नहीं की जा सकती है। किसी का कोई निर्माण इसलिए नहीं गिराई किया जा सकता है क्योंकि वह आपराधिक मामले में आरोपी है। याचिका में जिन मामलों में उठाया गया है, उनमें यूपी सरकार की ओर से पहले से ही अवैध निर्माण के मामले में कई नोटिस जारी हो चुका है और म्युनिसिपल लॉ का पालन करते हुए ही डेमोलेशन की कार्रवाई की गई है।

सुप्रीम कोर्ट में 2022 में कई अर्जी दाखिल की गई थी। दिल्ली के जहांगीरपुरी इलाके में अप्रैल, 2022 में डेमोलेशन एक्शन हुआ था। इस पर रोक के लिए याचिका दायर की गई थी और सुप्रीम कोर्ट ने डेमोलेशन ड्राइव पर रोक लगा दी थी। याचिकाकर्ता ने अपनी अर्जी में कहा हुआ है कि अथॉरिटी किसी भी मामले में सजा के तौर पर डेमोलेशन की कार्रवाई नहीं कर सकती है। इस मामले में राज्यसभा की पूर्व सांसद और सीपीआई(एम) नेता बृंदा करात ने दिल्ली के जहांगीर पुरी इलाके में होने वाली डेमोलेशन एक्शन को चुनौती दी थी। इलाके में शोभा यात्रा के दौरान अप्रील में हिंसा भड़क गई थी जिसके बाद अथॉरिटी ने डेमोलेशन एक्शन शुरू की थी। सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचा था और फिर सुप्रीम कोर्ट ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर रोक लगा दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने आखिर ED को क्यों लगाई फटकार?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने ED को फटकार लगा दी है! सुप्रीम कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय से सवाल किया कि क्या मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में आरोपियों को दस्तावेज देने से इनकार करना उनके मौलिक अधिकारों का हनन नहीं है? कोर्ट ने केंद्रीय एजेंसी से यह भी पूछा कि क्या ईडी केवल तकनीकी आधार पर ही आरोपियों को दस्तावेज देने से मना कर सकती है? यह मामला दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, आप नेता मनीष सिसोदिया और BRS नेता के. कविता समेत कई बड़े नेताओं से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस से जुड़ा है।सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल 2022 के सरला गुप्ता बनाम ED केस की सुनवाई के दौरान उठाया। यह मामला इस बात से जुड़ा है कि क्या जांच एजेंसी आरोपी को उन अहम दस्तावेजों से वंचित कर सकती है, जिन पर वो मनी लॉन्ड्रिंग मामले में केस चलने से पहले के फेज में भरोसा कर रही है। जस्टिस ए.एस. ओका, जस्टिस ए. अमानुल्लाह और जस्टिस ए.जी. मसीह की पीठ ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में दस्तावेजों की आपूर्ति से जुड़ी अपील पर सुनवाई की। पीठ ने ED से पूछा कि क्या एजेंसी की ओर से मनी लॉन्ड्रिंग जांच के दौरान जब्त किए गए दस्तावेजों को आरोपी को देने से इनकार करना उनके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है?

सर्वोच्च अदालत ने कहा कि समय बदल रहा है। हमारा मकसद न्याय देना है। क्या हम इतने कठोर हो जाएंगे कि जब कोई व्यक्ति केस का सामना कर रहा हो, तो हम कहें कि दस्तावेज सुरक्षित हैं? क्या यह जस्टिस होगा? कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसे कई मामले हैं जिनमें जमानत दी जाती है, लेकिन आजकल मजिस्ट्रेट के मामलों में लोगों को जमानत नहीं मिल रही है। समय बदल रहा है। क्या हम इतने कठोर हो सकते हैं?बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पूछा कि क्या आरोपी को सिर्फ तकनीकी आधार पर दस्तावेज देने से मना किया जा सकता है? जस्टिस अमानुल्लाह ने पूछा कि सब कुछ पारदर्शी क्यों नहीं हो सकता? ED की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने जवाब दिया कि अगर आरोपी को पता है कि दस्तावेज हैं, तो वह पूछ सकता है। लेकिन अगर उसे नहीं पता और सिर्फ अनुमान है, तो वह इस पर जांच नहीं करवा सकता। इस पर कोर्ट ने पूछा कि कैसे होगा दस्तावेजों पर भरोसा? क्या यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन नहीं होगा? जो जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है।

कोर्ट ने आगे कहा कि PMLA मामले में, आप हजारों दस्तावेज प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन आप उनमें से केवल 50 पर ही भरोसा करते हैं। आरोपी को हर दस्तावेज याद नहीं हो सकता। फिर वह पूछ सकता है कि मेरे घर से जो भी दस्तावेज बरामद हुआ है, वह दिया जाए। इस पर सरकारी वकील ने कहा कि आरोपी के पास दस्तावेजों की एक सूची है और जब तक यह जरूरी और उचित न हो, तब तक वह उन्हें नहीं मांग सकता। उन्होंने कहा कि मान लीजिए कि वह हजारों पन्नों के दस्तावेजों के लिए आवेदन करता है, तो क्या करें? इस पर पीठ ने कहा कि यह मिनटों का मामला है, इसे आसानी से स्कैन किया जा सकता है।

अदालत ने कहा कि अगर कोई आरोपी जमानत या मामले को खारिज करने के लिए दस्तावेजों पर निर्भर है, तो उसे ये मांगने का अधिकार है। हालांकि, सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि नहीं, ऐसा कोई अधिकार नहीं है। वह अदालत से इस पर गौर करने का अनुरोध कर सकते हैं। मान लीजिए कि ऐसा कोई दस्तावेज नहीं है और यह स्पष्ट रूप से दोषसिद्धि का मामला है और वह केवल मुकदमे में देरी करना चाहता है, तो यह अधिकार नहीं हो सकता। इसके बाद अदालत ने मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया है। बता दें कि जांच एजेंसी आरोपी को उन अहम दस्तावेजों से वंचित कर सकती है, जिन पर वो मनी लॉन्ड्रिंग मामले में केस चलने से पहले के फेज में भरोसा कर रही है। जस्टिस ए.एस. ओका, जस्टिस ए. अमानुल्लाह और जस्टिस ए.जी. मसीह की पीठ ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में दस्तावेजों की आपूर्ति से जुड़ी अपील पर सुनवाई की। कई हाई-प्रोफाइल विपक्षी नेताओं को भ्रष्टाचार विरोधी कानून के तहत केंद्रीय एजेंसियों के गिरफ्तार किए जाने के बाद PMLA बार-बार जांच के दायरे में आया है।

कोलकाता रेप मर्डर केस के बारे में सुप्रीम कोर्ट क्या बोला?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता रेप मर्डर केस के बारे में एक बयान जारी किया है! कोलकाता के अस्पताल में डॉक्टर के साथ रेप और मर्डर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए देश भर के डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ की सेफ्टी को लेकर गंभीर चिंता जाहिर की हैं। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि मुद्दा सिर्फ कोलकाता केस का नहीं है बल्कि देश भर के डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ के सेफ्टी से जुड़ा मसला है। हम फिर से नई घटना का इंतजार नहीं कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के डॉक्टरों की सेफ्टी सहित अन्य मामलों के परीक्षण का फैसला किया है। सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल टास्क फोर्स का गठन किया है साथ ही सीबीआई से कहा है कि वह मामले की छानबीन संबंधित स्टेटस रिपोर्ट गुरुवार को पेश करे। सुप्रीम कोर्ट मामले में सिस्टमैटिक तौर पर कई मुद्दों को देखने का फैसला किया है और अगली सुनवाई के लिए 23 अगस्त की तारीख तय कर दी है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने कोलकाता में आरजी कर अस्पताल की डॉक्टर से रेप और मर्डर के बाद मामले में संज्ञान लिया और मंगलवार को सुनवाई के दौरान कहा कि हमने मामले में संज्ञान लेने का फैसला इसलिए किया है क्योंकि यह मामला सिर्फ कोलकाता तक सीमित नहीं है। यह मामला सिस्टमैटिक मुद्दा है और देश भर के डॉक्टरों और मेडिकल पेशेवरों के सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। शीर्ष अदालत ने कहा कि हम देश भर के डॉक्टरों और खासकर महिला डॉक्टरों और स्टाफ के सेफ्टी को लेकर चिंतित हैं। यह सब नौकरी के नेचर और जेंडर के कारण ज्यादा खतरे की स्थिति है। ऐसे में हमारे पास एक नैशनल प्रोटोकॉल की जरूरत है ताकि सेफ कंडीशन बनाया जा सके। अगर महिलाओं को काम करने के लिए सेफ कंडीशन नहीं दिया जाता है और वह अपने आप को सुरक्षित महसूस नहीं करती हैं तो यह उनके समानता के अधिकार और समान अवसर प्रदान करने के अधिकारों का उल्लंघन होगा।हमें सेफ्टी सुनिश्चित करने के लिए अभी कदम उठाने होंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम नेशनल टास्क फोर्स बनाएंगे और उसमें देश भर के डॉक्टर होंगे जो देश भर के मेडिकल पेशेवरों महिला डॉक्टरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या तरीका अपनाया जाए इसको लेकर सिफारिश पेश करेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महाराष्ट्र, केरल, तेलंगाना आदि राज्यों ने डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा रोकने के लिए कानून बनाए हैं लेकिन यह कानून संस्थान में डॉक्टरों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी में कहा कि ज्यादा से ज्यादा महिलाएं काम पर जाएं तो ऐसी स्थिति में देश एक और रेप जैसी घटना का इंतजार नहीं कर सकती है कि ग्राउंड स्थिति में तब बदलाव होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने के लिए नेशनल टास्क फोर्स का गठन किया है। टास्क फोर्स की अगुवाई वाइस एडमिरल आरती सरीन, डायरेक्टर जनरल मेडिकल सर्विस नेवी करेंगी। इसमें कुल 10 सदस्य बनाए गए हैं। नेशनल टास्क फोर्स मेडिकल प्रोफेशनल्स की सेफ्टी , वर्किंग कंडीशन और उनके बेहतरी के लिए सिफारिश पेश करेगा। तीन हफ्ते में एनटीएफ अंतरिम रिपोर्ट देगा और दो महीने में फाइनल रिपोर्ट पेश करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से अस्पताल के प्रिंसिपल के कंडक्ट को लेकर सवाल किया साथ ही केस दर्ज करने में देरी को लेकर सवाल किया और जिस तरह से अस्पताल में तोड़फोड़ मचाई कई और क्राइम सीन को प्रभावित किया गया उसको लेकर तमाम सवाल सुप्रीम कोर्ट ने उठाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को लेकर भी गंभीर चिंता जाहिर की है कि विक्टिम के नाम, फोटोग्राफ और वीडियो क्लिप और डेड बॉडी को मीडिया में दिखाया गया। चीफ जस्टिस ने कहा कि यह बेहद गंभीर चिंता का मसला है। इस दौरान पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने कहा कि पुलिस के मौके पर पहुंचने से पहले ही फोटोग्राफ लिए गए थे और उसे सर्कुलेट कर दिया गया।चीफ जस्टिस ने कहा कि जब अपराध के बारे में जानकारी सुबह के समय ही हो गई थी। अस्पताल के प्रिंसिपल ने इस घटना को आत्महत्या बताने की कोशिश की। यहां तक कि पेरेंट्स को विक्टिम की बॉडी तक देखने के लिए कुछ घंटे इंतजार करना पड़ा। सिब्बल ने तक कहा कि इस तरह की जानकारी गलत फैलाई गई है। राज्य सरकार रेकॉर्ड पर सही तथ्यों की जानकारी पेश करेगी।

चीफ जस्टिस ने इस पर सवाल किया कि प्रिंसिपल ने जब केजी कर अस्पताल से इस्तीफा दिया तो उन्हें किसी और अस्पताल में कैसे चार्ज दिया गया? बेंच ने केस दर्ज करने के टाइमिंग पर भी सवाल किया। सिब्बल ने कहा कि अप्राकृतिक मौत के बारे में तुरंत केस दर्ज कर लिया गया था। एफआईआर दर्ज करने में कोई देरी नहीं हुई। चीफ जस्टिस ने तब सवाल किया कि ऑटोप्सी उसी दिन एक बजे दोपहर से लेकर पौने पांच बजे तक चली। डेड बॉडी पेरेंट्स को रात 8.30 बजे दी गई और केस रात के पौने बारह बजे दर्ज किया गया। चीफ जस्टिस ने कहा कि रात पौने बारह बजे केस दर्ज किया गया? शिकायती कौन था? सिब्बल ने कहा कि पैरेंट्स की शिकायत पर केस दर्ज हुआ। चीफ जस्टिस ने कहा कि क्या अस्पताल में कोई नहीं था जो केस दर्ज करवाता। डॉक्टर अस्पताल में थी और अस्पताल अथॉरिटी की जिम्मेदारी बनती है।

बंगाल सरकार के अधिकारियों के बारे में क्या बोली केंद्र सरकार?

हाल ही में केंद्र सरकार ने बंगाल सरकार के अधिकारियों के लिए एक बयान दे दिया है! बहुचर्चित और शर्मनाक कोलकाता डॉक्टर केस के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 20 अगस्त को आरजी कर मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल में सीआईएसएफ की तैनाती का फैसला दिया था। लेकिन अब सीआईएसएफ का दावा है कि उसे पश्चिम बंगाल सरकार से सहयोग नहीं मिल रहा। इस मुद्दे पर अब केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची है और पश्चिम बंगाल के अधिकारियों के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की गुजारिश की है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की दलील है कि अधिकारी 20 और 22 अगस्त को दिए गए कोर्ट के आदेश को लागू कराने में ‘असहयोग’ कर रहे हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि पश्चिम बंगाल सरकार, RG कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में सुरक्षा देने वाले CISF के प्रति ‘असहयोगात्मक रवैया’ अपना रही है। शीर्ष अदालत ने अस्पताल परिसर में एक डॉक्टर के साथ हुए बर्बर रेप और मर्डर के बाद CISF को सुरक्षा का जिम्मा सौंपा था। गृह मंत्रालय ने इसे ‘सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की जानबूझकर अवज्ञा’ करार दिया और कहा कि उच्च पदस्थ CISF अधिकारियों की तरफ से कोलकाता पुलिस आयुक्त के साथ बार-बार बैठकें की गईं। गृह मंत्रालय की तरफ से भी राज्य के मुख्य सचिव को पत्र लिखा गया लेकिन इसके बावजूद, अर्धसैनिक बल के जवानों को पर्याप्त आवास और सुरक्षा उपकरण मुहैया करने के लिए ‘राज्य सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है।’

गृह मंत्रालय ने स्थिति को तनावपूर्ण बताते हुए कहा कि ऐसे समय में जब डॉक्टरों, खासकर महिला डॉक्टरों और स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता हो, राज्य सरकार का असहयोगात्मक रवैया न केवल आश्चर्यजनक है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का स्पष्ट उल्लंघन भी है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की सहमति से CISF की तैनाती का निर्देश दिया था। गृह मंत्रालय ने कहा, ‘बार-बार अनुरोध के बावजूद पश्चिम बंगाल की निष्क्रियता एक व्यवस्थित बीमारी का लक्षण है, जहां अदालत के आदेशों के तहत काम करने वाली केंद्रीय एजेंसियों के साथ ऐसा असहयोग आम बात है। यह न केवल अवमानना है, बल्कि उन सभी संवैधानिक और नैतिक सिद्धांतों के खिलाफ है, जिनका पालन एक राज्य को करना चाहिए।’

केंद्र ने ममता बनर्जी सरकार पर जानबूझकर असहयोगात्मक रवैया अपनाने और बाधाएं पैदा करने और सुप्रीम कोर्ट की स्वत: संज्ञान की कार्यवाही को खतरे में डालने का आरोप लगाया है। गृह मंत्रालय ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 22 अगस्त से आरजी कर अस्पताल में एक महिला अधिकारी के नेतृत्व में 54 महिलाओं सहित 184 कर्मियों वाली CISF की दो कंपनियां तैनात की गई हैं। चूंकि राज्य सरकार द्वारा अस्पताल के पास उनके ठहरने की कोई व्यवस्था नहीं की गई थी, इसलिए जवान CISF परिसर में रह रहे हैं और अस्पताल पहुंचने के लिए एक घंटे का सफर तय करते हैं।

गृह मंत्रालय ने कहा कि पर्याप्त परिवहन सुविधाओं और सुरक्षा उपकरणों के लिए मंत्रालय द्वारा राज्य के मुख्य सचिव के साथ इस मुद्दे को उठाने के बावजूद, राज्य सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। गृह मंत्रालय ने कहा, ‘आवास, सुरक्षा उपकरणों की अनुपलब्धता और परिवहन की कमी के कारण, ड्यूटी पर तैनात कर्मियों, विशेषकर महिला कर्मियों को विभिन्न स्थानों से अस्पताल पहुंचने के लिए यात्रा करने के बाद अपने कर्तव्यों का पालन करने में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।’इसी बीच शीर्ष अदालत ने कहा कि हम देश भर के डॉक्टरों और खासकर महिला डॉक्टरों और स्टाफ के सेफ्टी को लेकर चिंतित हैं। यह सब नौकरी के नेचर और जेंडर के कारण ज्यादा खतरे की स्थिति है। ऐसे में हमारे पास एक नैशनल प्रोटोकॉल की जरूरत है ताकि सेफ कंडीशन बनाया जा सके। अगर महिलाओं को काम करने के लिए सेफ कंडीशन नहीं दिया जाता है और वह अपने आप को सुरक्षित महसूस नहीं करती हैं तो यह उनके समानता के अधिकार और समान अवसर प्रदान करने के अधिकारों का उल्लंघन होगा।हमें सेफ्टी सुनिश्चित करने के लिए अभी कदम उठाने होंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम नेशनल टास्क फोर्स बनाएंगे और उसमें देश भर के डॉक्टर होंगे जो देश भर के मेडिकल पेशेवरों महिला डॉक्टरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या तरीका अपनाया जाए इसको लेकर सिफारिश पेश करेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महाराष्ट्र, केरल, तेलंगाना आदि राज्यों ने डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा रोकने के लिए कानून बनाए हैं लेकिन यह कानून संस्थान में डॉक्टरों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

 

आखिर अपने शिकार को कैसे अंजाम देता है एक भेड़िया?

आज हम आपको बताएंगे कि एक भेड़िया अपने शिकार को कैसे अंजाम देता है! उत्तर प्रदेश के बहराइच में भेड़ियों का आतंक बढ़ता ही जा रहा है। सोमवार रात को भेड़िए ने 5 साल की बच्ची पर हमला कर उसे घायल कर दिया। लोगों का शोर सुनकर भेड़िया बच्ची को छोड़कर भाग गया। बच्ची की जान तो बच गई, मगर उसे बुरी हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया है। दहशत के माहौल में रहने को मजबूर बहराइच में भेड़ियों ने अब तक 9 बच्चों समेत 10 लोगों को मार डाला। आदमखोर बन चुके इन भेड़ियों को पकड़ने के लिए 5 वन प्रभागों बहराइच, कतर्नियाघाट वाइल्ड लाइफ, श्रावस्ती, गोंडा और बाराबंकी की तकरीबन 25 टीमें लगी हुई हैं। स्टोरी में एक्सपर्ट्स से जानते हैं कि भेड़िए कौन होते हैं। इनका नेचर क्या होता है और कब ये आदमखोर बन जाते हैं। वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड के अनुसार, भेड़िए शिकार के मामले में बेहद खूंखार होते हैं और अजीब भी। वो अपनी भूख मिटाने के लिए एक-एक दिन में 20 से 25 किलोमीटर तक चल लेते हैं। भेड़िए 20 किलोमीटर दूर से ही अपने शिकार की गंध पहचान लेते हैं।

भेड़िए के जबड़े इतने खतरनाक होते हैं कि ये एक बार में शिकार पर हमला करके उसका 9 किलो मांस चबा सकते हैं। उनके कैनाइन दांत इतने खतरनाक होते हैं कि वो शिकार के मांस को फाड़ते हुए उसकी हड्डियां का चूरा बना डालते हैं और उसके बोन मैरो को पल भर में चट कर डालते हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर और वन्य जीव पर्यावरण पर काम करने वाली डॉ. सना रहमान के अनुसार, भेड़िया वैसे तो कुत्ते की दिखने वाला जानवर है, मगर साइंटिफिक रूप से यह कैनिडाई परिवार का सदस्य है। एक जमाने में भेड़िए पूरे यूरेशिया, उत्तरी अफ्रीका और उत्तर अमेरिका में पाए जाते थे। इंसान की आबादी में बढ़ोतरी की वजह से इनका क्षेत्र सिमटता चला गया। कहा जाता है कि जिन भेड़ियों को पालतू बना लिया गया, उन्हीं से कुत्तों की नस्ल का विकास हुआ। आमतौर पर भेड़िए का शिकारी स्वभाव ऐसा होता है कि उसे पाला नहीं जा सकता है। फिलहाल इनकी 30 उप प्रजातियां हैं।

शिकार के मामले में ये बस इंसान और शेर से ही पीछे हैं। भेड़ियों का शिकार करने का तरीका बेहद सामाजिक होता है। यह अकेले शिकार नहीं करते, बल्कि झुंड बनाकर हिरण-गाय जैसे जानवरों का शिकार करते हैं। भेड़िए की स्पीड वैसे तो 70 किलोमीटर प्रति घंटे तक है। यह 16 फीट तक छलांग लगा सकता है और 20 मिनट तक तेजी से पीछा कर सकता है। भेड़िए का पैर इतना बड़ा और लचीला होता है कि वह हर तरह के ऊबड़-खाबड़ इलाकों में भी आसानी से घूम-फिर सकता है।

भेड़ियों के बच्चों को कोई उठा लाए तो वह पूरे इलाके को ही तबाह कर देते हैं। ये शिकार के दौरान बुजुर्ग भेड़िए को साथ नहीं ले जाते हैं। भूरे या ग्रे भेड़ियों का दुनिया में सबसे ज्यादा राज चलता है। जो नॉर्थ पोल के बर्फीले इलाकों, जंगलों, रेगिस्तान और घास के मैदानों में पाए जाते हैं। भेड़ियों का रंग अलग-अलग होता है। ज्यादातर काले, सफेद और भूरे रंग के होते हैं। आमतौर पर कोई भेड़िया 13 साल तक जीवित रह सकता है और 10 साल तक बच्चे पैदा करने में सक्षम होता है। भेड़िए 20 किलोमीटर दूर से अपने शिकार की गंध सूंघ लेते हैं। ये 10 किमी दूर बैठे अपने साथियों को शिकार के बारे में बताने के लिए तेज-तेज आवाजें निकालते हैं। जो बताता है कि भोज तैयार है, आ जाओ। भेड़िए की खास बात यह होती है कि वह अपनी चार उंगलियों पर ही तेजी से भाग सकता है। वह पांवों की गद्दियों का इस्तेमाल नहीं करता है।

भेड़ियों का स्वभाव भले ही हिंसक हो, मगर उनका एक पहलू ये भी होता है कि वो अपने जीवनसाथी के प्रति जिंदगीभर वफादार होते हैं। यहां तक कि इस मामले में उन्हें रोमियो-जूलियट भी कहा जाता है। वो जितना हिंसक होते हैं, उतना ही वो जुनूनी हद तक प्यार करने वाले भी होते हैं। इसीलिए नर भेड़िए को अल्फा वुल्फ भी कहा जाता है। कोई भी जानवर आदमखोर तब बनता है, जब उनका इलाका खत्म होने लगता है। वो जंगलों और पहाड़ों से होकर मैदानों में चले आते हैं, जहां उन्हें आसानी से भेड़, बकरियां या गायें मिल जाती हैं। अपनी भूख मिटाने के लिए वे इंसान के बच्चे या जानवर के शिकार में अंतर नहीं करते हैं। वह अपने शिकार को शिकार करने वाली जगह पर नहीं खाता है। इसके लिए वह शिकार को लेकर 1-2 किलोमीटर दूर तक ले जाता है, जहां वह अपने शिकार को इत्मीनान से खाता है। ऐसे में वह इंसान के बच्चों को ज्यादातर निशाना बनाते हैं, जो प्रतिरोध नहीं कर पाते हैं। रात में खुले में सो रहे बच्चों को मुंह में दबाकर भाग जाते हैं।

संविधान की सुरक्षा और न्यायपालिका के लिए क्या बोले पीएम मोदी?

हाल ही में पीएम मोदी ने न्यायपालिका और संविधान की सुरक्षा के लिए एक बयान दे दिया है! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय को संविधान का संरक्षक माना जाता है और आपातकाल से लेकर अन्य मौकों पर न्यायपालिका ने इस जिम्मेदारी को बेहतरीन तरीके से निभाया है। महिलाओं की सुरक्षा के मामले को उठाते हुए पीएम ने कहा है कि महिलाओं के प्रति अत्याचार और बच्चों की सुरक्षा समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है। महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध में जल्द न्याय मिलेगा तो इससे महिलाओं को अपनी सुरक्षा को लेकर भरोसा बढ़ेगा। पीएम मोदी ने दो दिनों तक चलने वाले जिला न्यायपालिका के राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए ये बातें कही। इस मौके पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जस्टिस और जिला अदालतों के जज आदि मौजूद थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को संविधान का संरक्षक माना जाता है। वह इसका दायित्व बाखूबी निभाता रहा है और लोगों ने भी न्यायपालिका के प्रति विश्वास दिखाया है। आजादी के बाद न्यायपालिका ने न्याय की भावनाओं की रक्षा की है। आजादी के बाद आपातकाल का काला दौर भी आया और तब न्यायपालिका ने संविधान की रक्षा का काम किया था। जब भी मौलिक अधिकारों पर प्रहार हुआ तब न्यायपालिका ने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए अहम भूमिका निभाई। जब भी देश की सुरक्षा का सवाल खड़ा हुआ तब कोर्ट ने राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखकर राष्ट्र की एकता की रक्षा की है।

प्रधानमंत्री ने महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचार और बच्चों की सुरक्षा का मामला उठाया और कहा कि समाज के लिए यह गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचार के मामले में जितनी जल्दी उन्हें न्याय मिलेगा महिलाओं को अपनी सुरक्षा को लेकर उतना ही ज्यादा भरोसा पैदा होगा। उन्होंने कहा कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों से निपटने के लिए कई कड़े कानून हैं और त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली में बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।

सुप्रीम कोर्ट की स्थापना के 75 साल पूरे होने के मौके पर इसके यादगार सफर के लिए उन्होंने बधाई दी और कहा कि पिछले 10 साल में न्यायपालिका के इन्फ्रास्ट्रक्चर को बेहतर करने के प्रयास किए गए हैं। कोर्ट को आधुनिक बनाने के लिए प्रयास किए गए हैं। न्याय आसानी से मिले, इसके लिए लगातार काम हो रहा है। 140 करोड़ देशवासियों का सपना है कि भारत आधुनिक बने और नया भारत बने और देश की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए यहां जो विमर्श हो रहा है वह काम करेगा। देश के विकास का सार्थक पैरामीटर यह होता है कि सामान्य लोगों का जीवन स्तर बेहतर हो और यही देखना होता है। इसके लिए सरल और सुगम न्याय मुख्य अवयव हैं। यह तभी संभव होगा जब जिला अदालत तकनीक से लैस होगा। अभी देश की जिला अदालतों में साढ़े चार करोड़ केस पेंडिंग है। एक दशक में न्यायालय के इन्फ्रास्ट्रक्चर को ठीक करने के लिए काफी काम हुआ है और आठ हजार करोड़ उस पर खर्च किए गए हैं। इस दौरान साढ़े आठ हजार कोर्ट रूम और 11 हजार रेजिडेंशियल होम बने हैं। तकनीक से काम लिया जा रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मदद करेगी। न्यायिक प्रक्रिया में तेजी आई है और देश में अदालतें डिजिटल हो रही है। सुप्रीम कोर्ट की ई-कमिटी की इसमें अहम भूमिका है। इससे पेंडिंग केसों का आंकलन हो सकेगा।

पीएम ने कहा कि पहली बार देश में कानूनी ढांचे में बदलाव किया गया। क्रिमिनल लॉ नया बनाया गया है। नए क्रिमिनल लॉ ने शासक और गुलाम जैसे सोच से आजादी दिलाई है। नए कानून में राजद्रोह जैसे अपराध से संबंधित कानून खत्म कर दिए गए हैं। कानून में सिर्फ सजा का प्रावधान नहीं है बल्कि सुरक्षा देना भी अहम है। महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध को रोकने के लिए सख्त कानून बने हैं। पहली बार मामूली अपराध के मामले में कम्युनिटी सर्विस को जोड़ा गया है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और डिजिटल साक्ष्य को सबूत के तौर पर मान्यता मिली है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में इलेक्ट्रॉनिक मोड से समन भेजने की व्यवस्था की गई है। इन प्रयासों से पेंडेंसी पर काबू पाया जा सकेगा। पीएम ने कहा कि जो विमर्श हो रहा है इससे जस्टिस टू ऑल का रास्ता मजबूत हो सकेगा। इस दौरान पीएम मोदी ने सुप्रीम कोर्ट की स्थापना के 75 साल पूरे होने के मौके पर डाक टिकट भी जारी किया। साथ ही इस पर सिक्का भी जारी किया गया।

पीएम मोदी विश्व के बेहतरीन पीएम हैं। रूस और यूक्रेन संकट में भी पीएम मोदी का सपोर्ट मांगा जा रहा है। पश्चिम बंगाल में डॉक्टर के साथ रेप की घटना को उन्होंने दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लेकर सेफगार्ड करने का प्रयास किया है। राज्य सरकार जहां फेल हुईं, वहीं सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया। उन्होंने संविधान खतरे में होने की बात करने वाले नेताओं पर निशाना साधा और कहा कि चुनावी फायदे के लिए इस तरह की बयानबाजी हो रही है कि संविधान और रिजर्वेशन खतरे में है। जबकि ऐसे बयानबाजी से लोगों को बरगलाने का जो प्रयास है वह खतरे वाली बात है। संविधान और रिजर्वेशन को कोई खतरा नहीं है और यह पीएम और चीफ जस्टिस के हाथों में बिल्कुल सेफ है।

आखिर पीएम मोदी का सिंगापुर और ब्रुनेई का दौरा क्यों है खास?

आज हम आपको बताएंगे कि पीएम मोदी का सिंगापुर और ब्रुनेई का दौरा आखिर क्यों खास है!प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार को ब्रुनेई दारुस्सलाम और सिंगापुर की तीन दिवसीय यात्रा पर रवाना हो गए। भारत-ब्रुनेई दारुस्सलाम के राजनयिक संबंधों ने 40 साल पूरे कर लिए हैं। इस अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ब्रुनेई दारुस्सलाम के सुल्तान हाजी हसनल बोल्किया से मिलने पहुंच रहे हैं। पीएम मोदी 4 सितंबर को ब्रुनेई से सिंगापुर के लिए रवाना होंगे। वहां पहुंचकर वे सिंगापुर के राष्ट्रपति थर्मन शानमुगरत्नम, प्रधानमंत्री लॉरेंस वोंग और अन्य वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात करेंगे। उन्होंने कहा कि कम्युनकेशन की सुरक्षित, संरक्षित और मुक्त समुद्री लाइनों को बनाए रखने के लिए भारत और सिंगापुर के बीच विचारों के मिलान पर जोर दिया।जानते हैं कि आखिर पीएम मोदी के ब्रूनेई और सिंगापुर की यात्रा से भारत को क्या फायदा होगा। पीएम मोदी के सिंगापुर दौरे पर समुद्री सुरक्षा को लेकर बातचीत से चीन की टेंशन बढ़ना तय है।  भारत और ब्रुनेई दारुस्सलाम के बीच राजनयिक संबंध 1984 में स्थापित हुए थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तेल से संपन्न देश ब्रुनेई की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं। पीएम की इस यात्रा के दौरान रक्षा साझेदारी पर विशेष जोर होगा। इसकी वजह है कि दोनों पक्ष रक्षा क्षेत्र में एक संयुक्त कार्य समूह स्थापित करने के इच्छुक हैं। अधिकारियों ने बताया कि भारत और ब्रुनेई रक्षा, व्यापार और निवेश, ऊर्जा, स्पेस टेक्नोलॉजी, स्वास्थ्य, क्षमता निर्माण, संस्कृति के साथ-साथ लोगों के बीच आदान-प्रदान सहित सहयोग के विविध क्षेत्रों में एक दूसरे जुड़े हैं।

ब्रूनेई के सुल्तान हाजी हसनल बोल्किया ने 1992 और 2008 में भारत की राजकीय यात्रा की थी। साथ ही 2012 और 2018 में आसियान-भारत स्मारक शिखर सम्मेलन में भाग लिया था। 2018 में, सुल्तान हाजी हसनल बोल्किया अन्य आसियान नेताओं के साथ गणतंत्र दिवस परेड के मुख्य अतिथि थे। वर्तमान में, ब्रुनेई में लगभग 14,000 भारतीय रहते हैं। ब्रुनेई में बड़ी संख्या में डॉक्टर और शिक्षक भारत से हैं। इन लोगों ने ब्रुनेई की अर्थव्यवस्था और समाज में अपने योगदान के लिए सद्भावना और सम्मान अर्जित किया है।

दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों का विस्तार हो रहा है। यह सहयोग नियमित आधिकारिक स्तर के रक्षा आदान-प्रदान, नौसेना और तट रक्षक जहाजों की यात्रा, ट्रेनिंग और संयुक्त अभ्यास और एक-दूसरे की रक्षा प्रदर्शनियों/प्रदर्शनियों में भागीदारी आदि के माध्यम से है। दोनों देशों के रक्षा मंत्रालयों के अधिकारियों ने जनवरी 2021 में एक वर्चुअल बैठक की थी। रक्षा सहयोग पर समझौता ज्ञापन को 2021 में पांच साल की अवधि के लिए रिन्यू किया गया था। पहली बार, दो भारतीय रक्षा कंपनियों, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और एमकेयू लिमिटेड ने 1-2 जून, 2024 को 63वीं सशस्त्र सेना वर्षगांठ के अवसर पर ब्रुनेई सशस्त्र बलों की तरफ से आयोजित रक्षा उद्योग प्रदर्शनी में भाग लिया। दोनों पक्षों की तरफ से ऊर्जा क्षेत्र में संबंधों को आगे बढ़ाने के साथ-साथ अंतरिक्ष क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की भी उम्मीद है।

पीएम मोदी ब्रूनेई के बाद सिंगापुर पहुंचेंगे। प्रधानमंत्री यहां सिंगापुर के उद्योगपतियों के साथ एक बिजनेस राउंडटेबल सम्मेलन में भी भाग लेंगे। इस दौरान खाद्य सुरक्षा, डिजिटलीकरण, कौशल, स्वास्थ्य, एडवांस विनिर्माण और कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में कई समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर होने की भी उम्मीद है। विदेश मंत्रालय के सचिव (ईस्ट) जयदीप मजूमदार के अनुसार, प्रधानमंत्री की सिंगापुर यात्रा में समुद्री सुरक्षा पर चर्चा पर भी ध्यान केंद्रित किया जाएगा। मजूमदार ने बताया कि मोदी और उनके सिंगापुर समकक्ष के बीच आसियान-भारत मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए), समुद्री सुरक्षा और म्यांमार की स्थिति पर चर्चा होने की संभावना है।

उन्होंने कहा कि कम्युनकेशन की सुरक्षित, संरक्षित और मुक्त समुद्री लाइनों को बनाए रखने के लिए भारत और सिंगापुर के बीच विचारों के मिलान पर जोर दिया। सिंगापुर के लिए, कम्युनिकेशन की सुरक्षित समुद्री लाइनों को बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भारत और ब्रुनेई दारुस्सलाम के बीच राजनयिक संबंध 1984 में स्थापित हुए थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तेल से संपन्न देश ब्रुनेई की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं। पीएम की इस यात्रा के दौरान रक्षा साझेदारी पर विशेष जोर होगा।इसलिए, इन मुद्दों पर निस्संदेह चर्चा होगी। सिंगापुर भारत का सबसे बड़ा आसियान व्यापार साझेदार है। ब्रूनेई के सुल्तान हाजी हसनल बोल्किया ने 1992 और 2008 में भारत की राजकीय यात्रा की थी। साथ ही 2012 और 2018 में आसियान-भारत स्मारक शिखर सम्मेलन में भाग लिया था।इसके अलावा एफडीआई का सबसे बड़ा स्रोत है, जो वित्त वर्ष 24 में 11.77 बिलियन डॉलर था। भारत और सिंगापुर ने आखिरी बार 2015 में संबंधों को रणनीतिक साझेदारी में बढ़ाया था।