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क्या अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मणिपुर जाना चाहिए?

यह सवाल उठाने आदमी है कि क्या अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मणिपुर जाना चाहिए या नहीं! लोकसभा में विपक्ष का नेता बनने के बाद राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फंसाने की पूरी कोशिश की है। वो पहले वायनाड चले गए तो पीएम मोदी को भी वहां जाना पड़ा। अब राहुल गांधी ने दिल्ली में रह रहे मणिपुर के लोगों से मुलाकात की। साथ ही उन्होंने पीएम मोदी से अपील करते हुए कहा कि उन्हें वहां का दौरा करना चाहिए। ये कोई पहला मौका नहीं है जब उन्होंने प्रधानमंत्री पर मणिपुर जाने का दबाव बनाया हो। सवाल ये उठ रहे कि क्या राहुल के दबाव में पीएम मोदी मणिपुर का दौरा करेंगे? ये सवाल इसलिए क्योंकि कांग्रेस की ओर से लगातार मणिपुर हिंसा का मुद्दा उठाया जाता रहा है। यही नहीं लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मणिपुर का दौरा भी किया था। राहुल गांधी ने जुलाई में मणिपुर दौरे के दौरान हिंसा पीड़ितों से मुलाकात की थी। उस समय भी उन्होंने पीएम मोदी से मणिपुर का दौरा करने की अपील की थी। अब उन्होंने दिल्ली में मणिपुर के लोगों से मुलाकात कर पीएम मोदी पर फिर दबाव बनाने की कोशिश की है। क्या राहुल गांधी की इस अपील और दबाव वाली रणनीति को पीएम मोदी स्वीकार करेंगे और मणिपुर का दौरा करेंगे?

राहुल गांधी ने 15 अगस्त को एक्स पर एक पोस्ट किया। उन्होंने कहा कि मैं दिल्ली में रहने वाले मणिपुरी लोगों के एक समूह से मिला, जिन्होंने अपने क्षेत्र में संघर्ष, प्रियजनों से अलग होने के दर्द और हिंसा के कारण उनके समुदायों पर पड़ने वाले शारीरिक और मानसिक बोझ के बारे में बात की। राहुल गांधी ने अपनी पोस्ट में मणिपुर के लोगों का दर्द बयां किया। साथ ही प्रधानमंत्री से वहां की फिर अपील कर दी।

मणिपुर में बीते एक साल से हालात गंभीर बने हुए हैं। हिंसा के कई मामले सामने आए, इसमें सैकड़ो लोगों की जान भी चली गई। इतना सब होने के बाद भी प्रधानमंत्री मोदी ने मणिपुर का एक भी दौरा नहीं किया। जिसको लेकर लगातार सवाल खड़े किए जाते रहे हैं। इसी बात को आधार बनाकर कांग्रेस सांसद राहुल गांधी लगातार पीएम मोदी पर सवाल उठाते रहे हैं। यही नहीं कई मौकों पर उन्होंने प्रधानमंत्री से मणिपुर दौरे का आग्रह भी किया। हालांकि, अभी तक पीएम मोदी ने मणिपुर का दौरा नहीं किया है।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी जब जुलाई में मणिपुर पहुंचे तो उन्होंने कहा था कि मैं आपका भाई बनकर आया हूं, पीएम मोदी कब समय निकालेंगे। कांग्रेस मणिपुर में शांति बहाली के लिए हर संभव प्रयास करेगी। मणिपुर की त्रासदी भयंकर है। राहुल गांधी ने ये भी कहा था कि प्रधानमंत्री को मणिपुर का दौरा करना चाहिए और लोगों की पीड़ा सुननी चाहिए, इससे उन्हें राहत मिलेगी। विपक्ष में होने के नाते मैं सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा कि वो मणिपुर पर फोकस बढ़ाएं।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने जुलाई में मणिपुर दौरे के दौरान हिंसा पीड़ितों से मुलाकात भी की थी। उन्होंने पीएम मोदी से मणिपुर का दौरा करने का अनुरोध भी कर दिया। जिसके बाद सवाल ये खड़ा हो रहा कि क्या राहुल गांधी के इस दबाव की रणनीति का पीएम मोदी जवाब देंगे? क्या प्रधानमंत्री मणिपुर का दौरा करेंगे? बता दें कि पिछले साल मई से अब तक पूर्वोत्तर राज्य में जातीय हिंसा के कारण बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए। ये लोग वहां बने राहत शिविरों में रह रहे। मणिपुर में जातीय हिंसा के चलते 200 से ज्यादा लोगों ने जान भी गवाई है। बता दें कि इसी बीच रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत का स्टैंड यह है कि दोनों देशों के आपसी बातचीत से निकला कोई ऐसा रास्ता ही एकमात्र समाधान हो सकता है जो दोनों को स्वीकार्य हो।

इसीलिए विदेश मंत्रालय कह रहा है कि भारत मध्यस्थता नहीं करेगा लेकिन एक-दूसरे के संदेश एक-दूसरे से साझा जरूर करेगा। पीएम मोदी ने रूस में राष्ट्रपति पुतिन से साफ-साफ शब्दों में कहा था कि युद्ध के मैदान में समाधान नहीं ढूंढा जा सकता है। अब वो राष्ट्रपति जेलेंस्की से भी दोटूक अंदाज में अपनी बात रख देंगे।जेलेंक्सी के ऑफिस की तरफ से जारी संदेश में कहा गया है कि हमारे द्विपक्षीय संबंधों के इतिहास में भारतीय प्रधानमंत्री का यह पहला दौरा है। इस दौरान हम द्विपक्षीय और परस्पर सहयोग के मुद्दों पर बातचीत करेंगे। यूक्रेन और भारत के बीच कई दस्तावेजों पर हस्ताक्षर की भी उम्मीद है।

क्या प्रणब मुखर्जी बनना चाहते थे प्रधानमंत्री?

आज हम आपको बताएंगे कि क्या प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री बनना चाहते थे या नहीं! चार साल पहले देश के पूर्व राष्ट्रपति, पूर्व वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी हम सबको छोड़कर चले गए थे। एक लंबा राजनीतिक जीवन जिसमें उन्होंने काफी शोहरत और नाम कमाया। एक वक्त पर पूर्व पीएम इंदिरा गांधी के नंबर 2 कहलाने वाले प्रणब दा के रिश्ते कुछेक मौकों पर छोड़कर सबसे मधुर ही रहे। प्रणब मुखर्जी को देश की राजनीति में सब मिला, लेकिन एक कसक हमेशा रही जो उनके इस संसार से विदा लेने के साथ सदा के लिए अधूरी रह गई। वह कसक थी देश का प्रधानमंत्री बनना। ऐसा भी नहीं था कि प्रणब दा को इतने सालों में मौके नहीं मिले, लेकिन शायद नियति ही कुछ और चाहती थी। आज हम उन तीन मौकों का जिक्र करेंगे, अगर वह भुना लिए जाते तो शायद प्रणब मुखर्जी भी देश के प्रधानमंत्रियों की लिस्ट में शुमार होते। साल 1984, अक्टूबर का वो महीना कांग्रेस पार्टी, गांधी परिवार और खुद प्रणब कभी उसे याद नहीं करना चाहेंगे। देश की पूर्व पीएम इंदिरा गांधी की उन्हीं के दो अंगरक्षकों सतवंत सिंह और बेअंत सिंह ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। आग की तरह फैली इस खबर का पता कोलकाता में बैठे प्रणब मुखर्जी को भी लगा। अपनी पुस्तक ‘द टर्बुलेंट इयर्स: 1980-1996’ में, प्रणब मुखर्जी ने दिल्ली की अपनी यात्रा के बारे में बताया है। उन्होंने पुस्तक के बहाने से बताया कि कोलकाता से उड़ान भरने के बाद राजीव गांधी कॉकपिट में गए और वापसी की घोषणा की। उन्होंने इंदिरा गांधी की बात करते हुए कहा कि वह अब नहीं रहीं। उस वक्त पीएम कैंडिडेट का स्थान खाली हो गया। समझ नहीं आ रहा था किसे मौका दिया जाए। उस वक्त वरिष्ठता की सूची में प्रणब मुखर्जी थे और वहीं पीएम के लिए स्वाभाविक दावेदार थे।

प्रणब मुखर्जी ने पुस्तक में लिखा है कि मैंने प्रधानमंत्री नेहरू और बाद में शास्त्री के समय के उदाहरणों का हवाला दिया, जब वे कार्यालय में थे (क्रमशः 27 मई 1964 और 11 जनवरी 1966)। दोनों उदाहरणों को बाद उस वक्त गुलजारी लाल नंदा, को सबसे वरिष्ठ मानते हुए एक अंतरिम सरकार का गठन किया गया था। यह दृष्टिकोण उस समय के राजनीतिक पर्यवेक्षकों की सामान्य समझ के अनुरूप था। यह ऐसा समय नहीं था जब कांग्रेस में गांधी परिवार ने पार्टी या पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार में निर्विवाद नेतृत्व का दावा हासिल कर लिया था।

उन्होंने अपनी किताब में लिखा कि मैं राजीव को विमान के पीछे ले गया और उनसे प्रधानमंत्री पद संभालने का अनुरोध किया। उनका मुझसे तुरंत सवाल था, ‘क्या आपको लगता है कि मैं यह पद संभाल सकता हूं?’ ‘हाँ,’ मैंने उनसे कहा, ‘हम सभी आपकी मदद करने के लिए हैं। आपको सभी का समर्थन मिलेगा।’ हालांकि, दिल्ली में उतरने के बाद और राष्ट्रपति ज्ञानी जौल सिंह द्वारा राजीव गांधी को शपथ दिलाने से पहले, कुछ बदल गया। राजीव गांधी ने प्रणब मुखर्जी को कांग्रेस के समीकरण से बाहर कर दिया। प्रणब मुखर्जी और राजीव गांधी दोनों ने बाद में इसे असत्य के आधार पर पनपी गलतफहमी को जिम्मेदार ठहराया।

1980 के दशक के अंत में कथित बोफोर्स गन घोटाले पर अपने भरोसेमंद सहयोगी वीपी सिंह के विद्रोह के बाद प्रणब मुखर्जी राजीव गांधी से साथ फिर वापस आ गए। राजीव गांधी 1989 में सत्ता से बाहर हो गए लेकिन अगली दो सरकारें अल्पकालिक थीं और 1991 का लोकसभा चुनाव कुछ ही समय में था। प्रणब मुखर्जी फिर से कांग्रेस में नंबर दो थे और यह व्यापक रूप से अनुमान लगाया गया था कि यदि राजीव गांधी जीत हासिल करते हैं तो वे अगले वित्त मंत्री होंगे। तभी राजीव गांधी की हत्या चुनाव प्रचार के दौरान कर दी गई। कांग्रेस ने 1991 के चुनावों में लगभग बहुमत हासिल किया, जिसका श्रेय सहानुभूति वोट को दिया गया। प्रणब मुखर्जी फिर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों की सूची में शीर्ष पर दिखाई दिए, लेकिन कुछ साल पहले अत्यधिक महत्वाकांक्षी होने का आरोप लगने के बाद, प्रणब मुखर्जी ने इस बार धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की।

कांग्रेस 2004 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) की मुख्य पार्टी के रूप में सत्ता में आई। सोनिया गांधी भाजपा के उग्र विरोध के बावजूद प्रधानमंत्री बनने के लिए पूरी तरह तैयार दिख रही थीं। उन्होंने अंततः कुर्सी से इनकार कर दिया और मनमोहन सिंह उनके आग्रह पर प्रधानमंत्री बने। प्रणब मुखर्जी मनमोहन सिंह कैबिनेट में मंत्री के रूप में कार्य किया। यह एक अजीब मोड़ था। इंदिरा गांधी सरकार में वित्त मंत्री के रूप में, प्रणब मुखर्जी ने मनमोहन सिंह को RBI गवर्नर नियुक्त करने का आदेश पर हस्ताक्षर किया था। इस फैसले के बाद प्रणब मुखर्जी को इस बार मनमोहन सिंह के अंडर काम करना था। मनमोहन सिंह अमेरिका के साथ परमाणु समझौते पर लेफ्ट के साथ परेशानी में पड़ गए थे। मनमोहन सिंह ने वाम दबाव के आगे झुकने की तुलना में परमाणु समझौते पर सत्ता खोना ही बेहतर माना।

चुनाव पूर्व दिनों में अटकलें थीं कि प्रणब मुखर्जी अगले प्रधानमंत्री हो सकते हैं और मनमोहन सिंह राष्ट्रपति भवन से सेवानिवृत्त हो सकते हैं, लेकिन जब चुनाव परिणाम आया तो कांग्रेस 200-अंक के पार हो गई और वाम मोर्चा कमजोर हो गया। मनमोहन सिंह ने अपने पद को पांच साल और बरकरार रखा और यह प्रणब मुखर्जी थे, जो राष्ट्रपति भवन से सेवानिवृत्त हुए। प्रणब मुखर्जी ने इंडिया टुडे टीवी को दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि मैं अपनी सीमाएं और अपना स्थान जानता था। चाहे मैं लोकसभा का सदस्य था या नहीं, मेरी दूसरी कमी यह थी कि मैं हिंदी में पारंगत नहीं था, और मेरा मानना है कि भारत के प्रधानमंत्री बनने के लिए, किसी को हिंदी में पारंगत होना चाहिए, जनता की भाषा।

क्या रूस यूक्रेन युद्ध होने वाला है समाप्त?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या रूस यूक्रेन का युद्ध समाप्त होने वाला है या नहीं! नरेंद्र मोदी भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं जो पहली बार यूक्रेन का दौरे पर जा रहे हैं। 1991 में सोवियत संघ के विघटन से यूक्रेन अस्तित्व में आया था। तब से किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने यूक्रेन का दौरा नहीं किया है। पीएम मोदी पिछले महीने 8-9 जुलाई को रूस में थे। उन्होंने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ 22वें भारत-रूस वार्षिक सम्मेलन में भाग लिया था। पश्चिमी देशों को पीएम मोदी का यह रुख नहीं भाया। हालांकि, मोदी अब यूक्रेन भी जा रहे हैं। रूस और यूक्रेन के बीच पीएम मोदी के दौरे के बीच सिर्फ डेढ़ महीने का अंतर है। तो क्या इसके पीछे कोई बड़ा संकेत है? क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ढाई साल पहले शुरू हुए रूस-यूक्रेन युद्ध के अंत की स्क्रिप्ट तैयार कर ली है? क्या उन्होंने अपनी स्क्रिप्ट पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुहर लगवा ली और अब यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के सामने इसे पेश करने जा रहे हैं? ये सवाल इसलिए काफी गंभीर हैं क्योंकि दुनिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आस जता चुकी है कि वो चाहें तो रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म करवाने की राह तैयार कर सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस हों या अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी समेत कई ताकतवर देशों के राष्ट्राध्यक्ष, सभी ने वक्त-वक्त पर यह इच्छा जरूर जताई कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूस-यूक्रेन युद्ध को खत्म करवाने की पहल करें। सभी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य और रूस-यूक्रेन के बीच मध्यस्था के पूरी तरह मुफीद माना है। लेकिन सूत्रों का कहना है कि भारत रूस-यूक्रेन के बीच कोई मध्यस्थता नहीं करेगा। हां, दोनों देशों को एक-दूसरा के संदेश जरूर आदान-प्रदान कर सकता है और वो करेगा भी। ये कूटनीति की भाषा है। कूटनीति की दुनिया में ऐसे ही नपे-तुले और बिल्कुल सधे शब्दों का सहारा लिया जाता है। जैसा कि दुनियाभर के ताकतवर नेता खुलकर स्वीकार करते हैं कि मोदी विश्व पटल पर एक प्रभावी शख्सियत हैं तो फिर वो रूस गए, इसलिए किसी दबाव में सिर्फ संतुलन साधने के लिए यूक्रेन तो नहीं जा रहे होंगे? बस डेढ़ महीने के अंतर पर दोनों देशों की यात्रा के पीछे मकसद कुछ तो बड़ा होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 23 अगस्त को यूक्रेन पहुंचेंगे और वहां राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की से मुलाकात करेंगे। 20 फरवरी, 2022 को शुरू हुए युद्ध के बाद जेलेंस्की से कभी फोन पर बात तो कभी अन्य कार्यक्रमों में मुलाकात तो हुई, लेकिन मोदी कभी यूक्रेन नहीं गए। पिछले महीने जेलेंस्की के चीफ ऑफ स्टाफ एंद्री यरमक ने भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एनएसए अजित डोभाल के साथ फोन पर हुई बातचीत में कहा था कि पीएम मोदी यूक्रेन में शांति स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत का स्टैंड यह है कि दोनों देशों के आपसी बातचीत से निकला कोई ऐसा रास्ता ही एकमात्र समाधान हो सकता है जो दोनों को स्वीकार्य हो। इसीलिए विदेश मंत्रालय कह रहा है कि भारत मध्यस्थता नहीं करेगा लेकिन एक-दूसरे के संदेश एक-दूसरे से साझा जरूर करेगा। पीएम मोदी ने रूस में राष्ट्रपति पुतिन से साफ-साफ शब्दों में कहा था कि युद्ध के मैदान में समाधान नहीं ढूंढा जा सकता है। अब वो राष्ट्रपति जेलेंस्की से भी दोटूक अंदाज में अपनी बात रख देंगे। जेलेंक्सी के ऑफिस की तरफ से जारी संदेश में कहा गया है कि हमारे द्विपक्षीय संबंधों के इतिहास में भारतीय प्रधानमंत्री का यह पहला दौरा है। इस दौरान हम द्विपक्षीय और परस्पर सहयोग के मुद्दों पर बातचीत करेंगे। यूक्रेन और भारत के बीच कई दस्तावेजों पर हस्ताक्षर की भी उम्मीद है।

इससे पहले जेलेंस्की ने मोदी के पुतिन के साथ गले मिलने पर मायूसी का इजहार किया था। उन्होंने कहा था कि शांति के प्रयासों को इससे बड़ा झटका लगा है। दरअसल, तब रूसी मिसाइल से यूक्रेन में बच्चों का एक अस्पताल ध्वस्त हो गया था। रूसी हमले में 37 लोग मारे गए थे जिनमें तीन बच्चे भी थे जबकि 13 बच्चों समेत 170 लोग घायल हो गए थे।अजित डोभाल के साथ फोन पर हुई बातचीत में कहा था कि पीएम मोदी यूक्रेन में शांति स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। जेलेंस्की का जख्म ताजा था और उन्होंने मोदी-पुतिन को गले मिलती तस्वीर देखी तो एक्स पर पोस्ट के जरिए मायूसी का इजहार किया। तब अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता ने भी भारत का रूस के साथ संबंध पर चिंता व्यक्त की थी।

क्या धीरे-धीरे अपने बैकफुट पर आ रही है मोदी सरकार?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मोदी सरकार धीरे-धीरे अपने बैकफुट पर आ रही है या नहीं! मोदी सरकार बैकफुट पर आ चुकी है? लगातार रहे उलटफेर या यू-टर्न से तो यही संकेत मिलता है। फिर चाहे वो अनुसूचित जातियों में क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को वापस लेना हो या फिर लेटरल एंट्री पर यू-टर्न। सरकार के इस रुख को देखकर तो लगता है यही लगता है जैसे कुछ लोग मजाकिया अंदाज में कहते हैं कि सरकार को’दलित ब्राह्मणों’ को नाराज करने का डर है। सरकार के यू टर्न लेने के बाद यही सवाल उठ रहा है कि अब राष्ट्र प्रथम के बीजेपी के एजेंडे का क्या हुआ? इसके अलावा भी कई ऐसे विवादास्पद मुद्दे भी हैं जो ठंडे बस्ते में पड़े हुए हैं। समान नागरिक संहिता (यूसीसी), वक्फ बोर्ड संशोधन विधेयक 2024, डिजिटल इंडिया अधिनियम और नई औद्योगिक नीति सहित कई आर्थिक सुधारों को टाला जा सकता है। इसके बजाय, सरकार को जाति जनगणना के लिए विपक्ष की मांगों का सामना करना होगा। वहीं दूसरी ओर किसानों ने फिर से आंदोलन और विरोध प्रदर्शन करने की बात कही है। इधर बेरोजगारी और आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे युवा भी सरकार के खिलाफ खड़े हो रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रणनीति विदेशी मोर्चे पर ध्यान केंद्रित करने की है। ये बात रूस, यूक्रेन की हालिया यात्राओं और सितंबर में होने वाली अमेरिका दौरे से पता चलता है। हालांकि इन उपायों के आंशिक रूप से ही सफल होने की संभावना है।

दरअसल मोदी की असली ताकत उनकी चुनावी जीत और लोगों के समर्थन से आती है। विदेशी नेताओं को गले लगाने और दुनिया में भारत के बढ़ते महत्व के कुछ हद तक बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों से नहीं। कौन इस बात से इनकार कर सकता है कि चुनावी तौर पर वे बैकफुट पर हैं, उतने मजबूत नहीं हैं, जितने वे होना चाहते थे? तो फिर, इससे बाहर निकलने का रास्ता क्या है? क्या बीजेपी को फिर से मजबूत होने के लिए मध्यावधि चुनाव का विकल्प देखना चाहिए। लेकिन ये सफल होगा इसकी क्या गारंटी। बीजेपी ज़बरदस्त जनादेश के साथ सत्ता में वापस आने की कोशिश करेगी। जैसा कि गुजरात के 2002 के दंगों के बाद हुए चुनावों में हुआ था। जहां मोदी ने दोबारा प्रचंड बहुमत हासिल किया था। हमें याद होगा कि मोदी ने उस साल की शुरुआत में हुए गुजरात दंगों के बाद नए जनादेश का आह्वान किया था।

27 फरवरी को अयोध्या से कार सेवकों को ले जा रही एक ट्रेन को गोधरा में आग लगा दी गई। जिस डिब्बे में कार सेवक फंसे थे, उसे जला दिया गया, जिससे लगभग 60 लोग मारे गए। इसके बाद हुए दंगों में एक हजार से ज्यादा लोग मारे गए और कई हजार लोग विस्थापित हुए। राज्य में 12 दिसंबर को फिर से चुनाव हुए। मोदी भारी बहुमत के साथ सत्ता में लौटे, भारतीय जनता पार्टी ने 182 विधानसभा सीटों में से 127 सीटें जीतीं। वे गुजरात के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले 14वें मुख्यमंत्री बने, उन्होंने दिसंबर 2012 में अभूतपूर्व तीसरा कार्यकाल जीता और मई 2014 में भारत के 14वें प्रधानमंत्री के रूप में केंद्र में आए। इसके अलावा केंद्रीय चुनाव राज्य चुनावों की तुलना में कहीं अधिक जटिल होते हैं। हर राज्य की अलग-अलग प्राथमिकताएं और मजबूरियां हैं। 28 राज्यों और आठ केंद्र शासित प्रदेशों में नैरेटिव मैनेज करना कोई मजाक नहीं है। पार्टी और उसके कैडर भी कुछ महीने पहले हुए आम चुनावों से थक चुके हैं। इसलिए, भले ही मध्यावधि चुनाव हों, हम अभी इसके करीब भी नहीं हैं। लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि अभी कोई एक बड़ा मुद्दा नहीं है जिस पर मोदी संसद को भंग कर सकें और नया जनादेश मांग सकें।

इन दिनों सरकार देश के भीतर हो रही अशांति और विरोध से तो जूझ ही रही है, साथ ही देश की सीमाओं के बाहर भी हालात ठीक नहीं है। बांग्लादेश में तेजी से बिगड़ते हालात चिंता का विषय हैं। वहां बढ़ते इस्लामीकरण और भारत विरोधी गतिविधियां बड़ी चुनौती बनती जा रही है। इसी तरह, यूक्रेन और इजरायल में युद्धों के साथ दुनियाभर में अस्थिरता है। सत्ता में वापस आने के लिए मोदी को 2019 में बालाकोट जैसी छोटी सी स्ट्राइक की जरूरत नहीं होगी, बल्कि इंदिरा गांधी द्वारा 1971 में पाकिस्तान के विभाजन और बांग्लादेश की मुक्ति के पैमाने पर एक बहुत बड़ा हमला करना होगा।

क्या मोदी और उनके मंत्रिमंडल में इतना बड़ा और दुस्साहसी काम करने की हिम्मत है? निश्चित रूप से, यह भारत की शैली नहीं रही है, न केवल एक गणतंत्र के रूप में, बल्कि पहले भी। हमने शायद ही कभी अपने दुश्मनों पर हमला किया हो। हम हमलों से खुद को बचाने के लिए जरूर खड़े होते हैं। आजादी से पहले भी भारत पर राज करने वाले मुगल और अंग्रेज अपनी ऊर्जा को हमारी सीमाओं की रक्षा करने या आंतरिक विजय पर खर्च करते थे न कि दूसरे देशों पर हमला करने पर। हालांकि अंग्रेजों ने 1885 में बर्मा पर हमला किया और उसे जीत लिया, लेकिन उनके अफगानिस्तान अभियान को बहुत कम सफलता मिली।

वर्तमान की न्याय सभा के बारे में क्या बोले पीएम मोदी?

हाल ही में पीएम मोदी ने वर्तमान की न्याय सभा के लिए एक बयान दे दिया है! पहली बार देश में कानूनी ढांचे में बदलाव किया गया। नए क्रिमिनल लॉ ने गुलामी और शासक की सोच से आजादी दिलाई। राजद्रोह जैसे अपराध खत्म किए गए। कानून में सिर्फ सजा नहीं, सुरक्षा भी अहम। महिलाओं और बच्चों के अपराध रोकने के लिए सख्त कानून बने हैं।’ ये बातें शनिवार को पीएम नरेंद्र मोदी ने कही। दो दिनों तक चलने वाले जिला न्यायपालिका के राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में पीएम पहुंचे थे। पीएम मोदी ने कहा, ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और डिजिटल साक्ष्य को सबूत के तौर पर मान्यता मिली। अब इलेक्ट्रॉनिक मोड से समन भेजने की व्यवस्था की गई है। इन प्रयासों से मुकदमों की पेंडेंसी पर काबू पाया जाएगा।’ सुप्रीम कोर्ट की स्थापना के 75 साल पूरे होने पर पीएम ने डाक टिकट और सिक्का भी जारी किया। नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘जो विमर्श हो रहा है, उससे जस्टिस टू ऑल का रास्ता मजबूत होगा।’ मोदी ने कहा कि कोर्ट को आधुनिक बनाने के प्रयास हो रहे हैं। न्याय आसानी से मिले, इसके लिए लगातार काम हो रहा है। देश के विकास का सार्थक पैरामीटर यह होता है कि सामान्य लोगों का जीवन स्तर बेहतर हो। इसके लिए सरल और सुगम न्याय मुख्य अवयव हैं। यह तभी संभव होगा जब जिला अदालत तकनीक से लैस होगा। अभी देश की जिला अदालतों में साढ़े चार करोड़ केस पेंडिंग है।

पीएम मोदी ने आगे कहा कि एक दशक में न्यायालय के इन्फ्रास्ट्रक्चर को ठीक करने के लिए काफी काम हुआ है और आठ हजार करोड़ उस पर खर्च किए गए हैं। इस दौरान साढ़े आठ हजार कोर्ट रूम और 11 हजार रेजिडेंशियल होम बने हैं। तकनीक से काम लिया जा रहा है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मदद करेगी। न्यायिक प्रक्रिया में तेजी आई है और देश में अदालतें डिजिटल हो रही है। सुप्रीम कोर्ट की ई कमिटी की इसमें अहम भूमिका है। इससे पेंडिंग केसों का आंकलन हो सकेगा। इस मौके पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जस्टिस व जिला अदालतों के जज आदि मौजूद थे।

जिला न्यायपालिका के दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में अपने संबोधन में चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि जिला अदालतें भारतीय न्याय व्यवस्था का बैकबोन है और न्याय के शासन की अहम कड़ी है। उन्होंने कहा कि जिला न्यायपालिका को सबसे निचली अदालत कहने से बचना होगा, बल्कि जिला अदालत नागरिकों के न्याय के लिए पहला दरवाजा है। जिला अदालत में जिस गुणवत्ता से काम होगा और लोगों को न्याय मिलेगा उससे ही लोगों का न्यायपालिका के प्रति भरोसे का आकलन हो सकेगा। उन्होंने कहा कि जिला अदालतों के कंधे पर अहम जिम्मेदारी है और इसी कारण वह बैकबोन के रोल में है।

इस दौरान चीफ जस्टिस ने कहा कि 2023-24 में रेकॉर्ड बड़ी संख्या में डिजिटलाइज हुए हैं और कहा कि 46.48 करोड़ पेज डिजिटल बनाए जा चुके हैं। साथ ही कहा कि ई कोर्ट प्रोजेक्ट के तहत 3500 कोर्ट कॉम्पेक्स और 22 हजार कोर्ट रूम का कंप्यूटराइजेशन हो रहा है। देश भर की जिला अदालतों में 2.3 करोड़ केस की सुनवाई विडियो कॉफ्रेंसिंग के जरिये हुई है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट का तमाम क्षेत्रिये भाषाओं (संविधान की अनुसूची में दर्ज भाषाओं) में ट्रांसलेशन किया जा रहा है और ऐशे 73 हजार जजमेंट का ट्रांसलेशन हो चुका है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस समारोह का आयोजन दिल्ली में किया जा रहा है।

जिला न्यायपालिका के दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा बीजेपी के राज्यसभा सांसद ने कहा कि संविधान और रिजर्वेशन को कोई खतरा नहीं है। यह पीएम और चीफ जस्टिस के हाथों में बिल्कुल सेफ है। संविधान और रिजर्वेशन को खतरा बताने वाले लोग चुनावी फायदे के लिए ऐसा कर रहे हैं और लोगों को बरगला रहे हैं। मिश्रा ने इस मौके पर कहा कि पीएम मोदी विश्व के बेहतरीन पीएम हैं। रूस और यूक्रेन संकट में भी पीएम मोदी का सपोर्ट मांगा जा रहा है। पश्चिम बंगाल में डॉक्टर के साथ रेप की घटना को उन्होंने दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लेकर सेफगार्ड करने का प्रयास किया है राज्य जहां फेल हुई वहीं सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया। संविधान और रिजर्वेशन को कोई खतरा नहीं है और यह पीएम और चीफ जस्टिस के हाथों में बिल्कुल सेफ है।

क्या मोदी सरकार गठबंधन में चल रही है खींचतान?

वर्तमान में मोदी सरकार गठबंधन में खींचतान नजर आ रही है! केंद्र की सत्ताधारी बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन में क्या सबकुछ ठीक नहीं चल रहा? महाराष्ट्र से लेकर बिहार तक सियासी गलियारों से जैसी खबरें आ रहीं कम से कम वो तो यही इशारा कर रही। पहले बात करें बिहार की तो वहां रेलवे स्टेशन के नाम बदलने की मांग को लेकर बीजेपी और जेडीयू आमने-सामने आते दिख रहे। इसकी शुरुआत कैसे हुई आगे बताएंगे उधर बिहार से ही एनडीए में शामिल एलजेपी रामविलास के मुखिया चिराग पासवान भी लगातार अलग फॉर्म में दिख रहे। जातीय जनगणना, लैटरल एंट्री से पोस्टिंग पर उन्होंने बीजेपी नेतृत्व से अलग रुख दिखाया। इससे सवाल खड़े होने लाजमी है कि आखिर पीएम मोदी के ‘हनुमान’ की प्लानिंग क्या है। वहीं बात करें महाराष्ट्र की तो वहां चुनाव से ठीक पहले अजित पवार की एनसीपी नाराज दिख रही। ऐसा हुआ शिंदे गुट की शिवसेना के एक नेता की ओर से दिए गए विवादित बयान से, आखिर पूरा मामला क्या है जिससे चुनाव से ठीक पहले महायुति की एकजुटता पर सवाल खड़े होने लगे हैं। महाराष्ट्र में बीजेपी, शिवसेना (शिंदे गुट), एनसीपी (अजित पवार गुट) एक साथ महायुति गठबंधन में सरकार चला रही है। इसी बीच स्वास्थ्य मंत्री और शिवसेना (शिंदे गुट) के नेता तानाजी सावंत ने गुरुवार को ऐसा बयान दिया जिस पर घमासान तेज हो गया। उन्होंने कहा कि वह कैबिनेट की बैठकों में अजित पवार के बगल में बैठते तो हैं लेकिन बाहर आने के बाद उन्हें उल्टी आने जैसा महसूस होता है। सावंत ने गुरुवार को एक कार्यक्रम में कहा कि वह एक कट्टर शिव सैनिक हैं और एनसीपी के नेताओं के साथ उनकी कभी नहीं बनी। भले ही कैबिनेट बैठकों में हम एक-दूसरे के बगल में बैठते हों, लेकिन बाहर आने के बाद मुझे उल्टी सी आने लगती है। बस जैसे ही उनका ये बयान सामने आया एनसीपी अजित पवार खेमे ने नाराजगी जाहिर कर दी।

एनसीपी ने महाराष्ट्र के सीएम एकनाथ शिंदे से तानाजी सावंत पर एक्शन की मांग कर दी। उधर शरद पवार की एनसीपी ने भी मौके का फायदा उठाने की कोशिश की। एनसीपी (एसपी) के प्रवक्ता महेश तापसे ने दावा किया कि अजित पवार अपना आत्मसम्मान खो चुके हैं। एनसीपी के साथ गठबंधन को लेकर शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के भीतर असंतोष बढ़ रहा है। मैंने कभी नहीं सोचा था कि राकांपा में कभी अत्यधिक सम्मान पाने वाले अजित दादा सत्ता के लिए अपने स्वाभिमान से समझौता कर लेंगे। उन्होंने कहा कि अजित पवार को सरकार में शामिल करने को लेकर शिवसेना के सदस्यों में बढ़ती बेचैनी अब सावंत की टिप्पणी से स्पष्ट रूप से सामने आ गई है। मंत्री तानाजी सावंत के बयान ने अजित दादा की राजनीतिक प्रतिष्ठा को पूरी तरह खत्म कर दिया है और फिर भी उनकी अपनी पार्टी के सदस्य चुप हैं। उन्होंने ये भी दावा किया कि मौजूदा हालात को देखते हुए एनसीपी अजित गुट को महाराष्ट्र में आगामी विधानसभा चुनावों में 25 सीट भी नहीं मिलेंगी और इसी हताशा के कारण ऐसा अपमानजनक व्यवहार किया गया है।

अब बात बिहार की करें तो लोकसभा चुनाव से ठीक पहले महागठबंधन छोड़कर एनडीए में लौटे नीतीश कुमार की पार्टी ने तेवर तल्ख कर लिए हैं। ये तब हुआ जब बीजेपी नेता और नीतीश कुमार सरकार में मंत्री नीरज सिंह बबलू ने बिहार के बख्तियारपुर रेलवे स्टेशन का नाम बदलने की डिमांड कर दी। उन्होंने कहा कि बिहार में भी रेलवे स्टेशन और शहरों के नाम बदलना जरूरी है। इस पर जेडीयू ने करारा पलटवार किया। जेडीयू ने कहा कि बीजेपी नेता को इतिहास का ज्ञान नहीं है, इसलिए ऐसी डिमांड कर रहे हैं। फिलहाल अचानक सामने आए इस मुद्दे से जेडीयू-बीजेपी में घमासान की आहट महसूस होने लगी है।

अब बात खुद को पीएम मोदी का ‘हनुमान’ बताने वाले चिराग पासवान की। पीएम मोदी की हर बात का समर्थन करने वाले चिराग पासवान पिछले कुछ दिनों से सरकार के खिलाफ मुखर नजर आ रहे। केंद्र सरकार में मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान ने जातीय जनगणना पर बीजेपी के रुख से अलग राय पेश की है। चिराग पासवान ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सपा मुखिया अखिलेश यादव की जातिगत जनगणना वाली मांग का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि हमारी पार्टी चाहती है जाति जनगणना होनी चाहिए। इससे पहले चिराग ने यूपीएससी में लेटरल एंट्री वाले मामले पर भी मुखर विरोध जताया था। इसी से सवाल उठ रहे कि आखिर चिराग पासवान के मन में चल क्या रहा।

कुल मिलाकर देखा जाए तो महाराष्ट्र से लेकर बिहार तक एनडीए में सब ठीक नहीं होने का इशारा साफ नजर आ रहा। सवाल ये कि आखिर बीजेपी नेतृत्व क्या इन मामलों में जल्द कोई बड़ा फैसला लेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि जम्मू-कश्मीर और हरियाणा में विधानसभा चुनाव की तारीखें आ चुकी हैं। जल्द ही महाराष्ट्र और झारखंड में भी विधानसभा चुनाव हैं। ऐसे में अजित पवार की नाराजगी से पार्टी को महाराष्ट्र में नुकसान हो सकता है। उधर झारखंड चूंकि बिहार का पड़ोसी राज्य है। ऐसे में बीजेपी चाहेगी कि जेडीयू और चिराग पासवान का साथ उन्हें इन राज्यों में मिले। ऐसा नहीं भी होता है तो भी केंद्र की मोदी सरकार की स्थिरता के लिए इन सभी को एकजुट रहना जरूरी होगा।

क्या रूस यूक्रेन की जंग रुकवा कर रहेंगे पीएम मोदी?

यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या पीएम मोदी रूस यूक्रेन की जंग रुकवा कर रहेंगे या नहीं! रूस-यूक्रेन के बीच आज से 29 महीने पहले यानी लगभग ढाई साल पहले शुरू हुआ युद्ध अभी भी पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। आलम यह रहा कि युद्ध के दौरान रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की के बीच अब तक एक बैठक भी नहीं हुई है। दोनों ओर से एक दो बार बातचीत का दौर शुरू हुआ(मंत्री स्तर पर),लेकिन नाकाफी रहा। यूक्रेन और रूस दोनों को इस युद्ध की कीमत चुकानी पड़ी है। अब दुनिया के बाकी देश भी चाहते हैं कि इसका अंत होना चाहिए। भारत की भी यही चाहत है। इसके लिए खुद प्रधानमंत्री मोदी ने अब मोर्चा संभाल लिया है। पहले यूक्रेन में राष्ट्रपति जेलेंस्की से मुलाकात और अब आज प्रेसिडेंट पुतिन से फोन पर बात, यह बताने के लिए काफी है कि पीएम जंग रुकवाने की मुहिम में लग गए हैं। उनके प्रयास से युद्धरत दोनों नेताओं जेलेंस्की और पुतिन को आमने-सामने बातचीत के लिए एक मेज पर लाने की संभावना बहुत अधिक है। पीएम मोदी ने 27 अगस्त को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से फोन पर बात की। दोनों शीर्ष नेताओं की बातचीत पर जानकारी देते हुए विदेश मंत्रालय ने बताया कि मोदी ने पुतिन के साथ टेलीफोन पर बातचीत के दौरान पिछले महीने 22वें भारत-रूस द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए अपनी ‘रूस की सफल यात्रा’ को याद किया। विदेश मंत्रालय ने आगे बताया कि दोनों नेताओं ने रूस-यूक्रेन संघर्ष पर विचारों का आदान-प्रदान किया। प्रधानमंत्री ने यूक्रेन की अपनी हालिया यात्रा के अनुभवों को भी साझा किया। उन्होंने दोनों देशों के बीच जारी संघर्ष के स्थायी और शांतिपूर्ण समाधान के लिए सभी हितधारकों के बीच संवाद और कूटनीति के महत्व के बारे में बात की।

एक दिन पहले उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से भी फोन पर बात की थी। ये कॉल उनके यूक्रेन की यात्रा के तुरंत बाद आया था। राष्ट्रपति बाइडन से भी बातचीत के दौरान मोदी ने यूक्रेन में शांति और स्थिरता लाने की वकालत की थी। पीएम ने यह भी स्पष्ट किया था कि वह यूक्रेन में शांति और स्थिरता को पूर्ण समर्थन देगा। पीएम मोदी हाल ही में यूक्रेन की यात्रा से लौटे हैं। उनकी वोलोदिमीर जेलेंस्की के साथ की तस्वीरों ने कईयों का ध्यान खींचा था। पीएम मोदी यहां यूक्रेन के लोगों का दर्द बांटने के साथ युद्ध का हल निकालने भी गए थे। भारत के कूटनीति की एक बानगी देखिए कि मोदी के यूक्रेन पहुंचते ही जेलेंस्की की आंखों में जैसे उम्मीद की किरण आ गई थी। जेलेंस्की के साथ अपनी बैठक के दौरान, पीएम मोदी ने राज्यों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने के लिए भारत की प्रतिबद्धता दोहराई, इस बात पर जोर देते हुए कि युद्ध का समाधान बातचीत और कूटनीति के माध्यम से किया जाना चाहिए। मोदी ने स्पष्ट किया कि भारत तटस्थ नहीं है, बल्कि दृढ़ता से शांति के पक्ष में है।

यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादिमीर जेलेंस्की ने कहा कि शांति शिखर सम्मेलन के लिए, मैं वास्तव में मानता हूं कि दूसरा शांति शिखर सम्मेलन होना चाहिए। यह अच्छा होगा यदि इसे वैश्विक दक्षिण के देशों में से किसी एक में आयोजित किया जा सके। मैंने प्रधानमंत्री मोदी से कहा कि हम भारत में वैश्विक शांति शिखर सम्मेलन कर सकते हैं। यह एक बड़ा देश है, यह एक महान लोकतंत्र है। भारत वैश्विक दक्षिण का निर्विवाद लीडर के रूप में उभरा है।

पीएम मोदी की यूक्रेन की हालिया यात्रा और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के साथ बाद में फोन कॉल ने उम्मीद जगाई है कि वह युद्धरत देशों के नेताओं के बीच वार्ता की सुविधा प्रदान कर सकते हैं। पुतिन और जेलेंस्की के बीच आमने-सामने की बातचीत अगर हुई तो यूक्रेन-रूस युद्ध, जो अब अपने तीसरे वर्ष में है, को समाप्त करने के लिए इसे एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। मोदी की कीव यात्रा से छह सप्ताह पहले उन्होंने रूस की यात्रा की थी और राष्ट्रपति पुतिन से द्विपक्षीय वार्ता भी की थी। पिछले सप्ताह अपनी यूक्रेन यात्रा के बाद, पीएम मोदी ने सोमवार को अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से फोन पर बात की। दोनों नेताओं ने यूक्रेन की स्थिति सहित विभिन्न क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा की और विचारों का आदान-प्रदान किया था। मोदी ने एक्स हैंडल पर कहा कि मैंने जल्द से जल्द शांति और स्थिरता की वापसी के लिए भारत का पूर्ण समर्थन दोहराया।

मोदी के दोनों युद्धरत नेताओं को बातचीत की मेज पर लाने के प्रयासों को एक शांतिपूर्ण समाधान खोजने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है। पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत की हालिया राजनयिक मुद्रा ने यूरोप में चल रहे युद्ध के शांतिपूर्ण समाधान में भारत की भूमिका की अटकलों को जन्म दिया है। स्विस राजदूत राल्फ हेकनर ने सोमवार को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक साक्षात्कार में पीएम मोदी की तारीफ की थी। उन्होंने कहा कि अब भारत को आगे बढ़ने और अपने प्रभाव का उपयोग करने के लिए देखना है। चुनाव के बाद, पीएम मोदी इटली और रूस में थे, वे पोलैंड गए, फिर यूक्रेन गए, इसलिए यह देखना बहुत अच्छा है कि यह सरकार अब कूटनीति की दिशा में बेहतर काम कर रही है।

आखिर क्यों खास था यूक्रेन में पीएम मोदी का शांति सम्मेलन?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि यूक्रेन में पीएम मोदी का शांति सम्मेलन आखिर क्यों खास था! पीएम मोदी ने शुक्रवार को कीव में यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की को गले लगाया। इसके साथ पीएम मोदी ने जेलेंस्की के कंधे पर अपना हाथ बेहद मजबूती के साथ रखा। दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों को लेकर लंबी बात की। विदेश मंत्री डॉ जयशंकर ने बताया कि इस बातचीत का बड़ा हिस्सा रूस- यूक्रेन संघर्ष और उसके समाधान पर चर्चा को लेकर था। डॉ जयशंकर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में के जरिए कहा कि दोनों नेताओं के बीच खुली और सकारात्मक बातचीत हुई। जयशंकर ने कहा कि पीएम मोदी ने इस संघर्ष को लेकर भारत का रुख कई बार सार्वजनिक मंचों पर रखा है। पीएम मोदी ने दो साल पहले ही कह दिया था कि मौजूदा वक्त युद्ध का नहीं है और हाल फिलहाल में भी उन्होंने फिर दोहराया था कि संघर्ष का समाधान युद्ध के मोर्चे से नहीं निकलेगा, बल्कि डायलॉग और डिप्लोमेसी के जरिए ही इस संघर्ष का हल निकालना होगा और दोनों पक्षों को सामना मिलजुल कर समाधान की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। पीएम ने ये भी कहा कि सभी पक्षों के बीच गंभीर वार्ताओं की जरूरत है, जिससे की इस तरह के समाधान निकलें जिनकी बडी स्वीकार्यता हो। इस दौरान पीएम ने स्थाई शांति कायम किए जाने को लेकर भारत की ओर से हर तरह से मदद करने की प्रतिबद्धता को दोहराया है।

जयशंकर ने कहा कि भारत समाधान निकाले जाने को लेकर सक्रिय भूमिका निभाता रहा है। उन्होंने इस दौरान साल 2022 में ब्लैक सी ग्रेन कोरिडोर को खोले जाने तुर्की की ओर से हुई पहल का जिक्र किया। डॉ जयशंकर ने कहा कि भारत ने सार्वजनिक मंचों पर हमेशा ही तनाव के बढ़ने के खतरों लेकर अपना रुख साफ जाहिर किया है। दोनों प्रधानमंत्रियों के साथ बातचीत में पीएम मोदी ने राष्ट्रपति जेलेंस्की को ग्लोबल साउथ के देशों के साथ हुई उनकी बातचीत के बारे में जानकारी दी। राष्ट्रपति जेलेंस्की को ये बताया गया कि इस युद्ध के कैसे प्रभाव हो सकते हैं। इसके साथ ही पीएम ने इस मसले पर दूसरे देशों के साथ हुई उनकी चर्चा के अलावा राष्ट्रपति पुतिन के साथ हुई बातचीत के बारे में भी जानकारी दी।

पीएम मोदी ने राष्ट्रपति जेलेस्की के विचार भी जानना चाहे कि जमीनी सच्चाई और कूटनीतिक स्तर पर उनके विचार इस बारे में क्या है। डॉ जयशंकर ने कहा कि यूक्रेनी पक्षों की ओर उनकी ग्लोबल पीस समिट को लेकर विस्तार से बात की गई। यूक्रेनी राष्ट्रपति की ओर से कहा गया कि यूक्रेन इस समिट में भारत की ओर से ज्यादा एक्टिव रोल चाहता है। डॉ जयशंकर ने कहा कि भारत ने इस समिट के पहले एडिशन में हिस्सा लिया था। हालांकि ये यूक्रेन की ओर से की गई पहल है, जिसके कुछ हिस्सों पर हम सहमत हैं और कुछ हिस्सों से नहीं। जयशंकर ने कहा कि भारत ये मानता है कि अगर इस तरह की कोई भी पहल होती है, तो वो दोतरफा होनी चहिए, और ये सिर्फ भारत नहीं, कई देशों का मानना है।

जयशंकर ने कहा कि यूक्रेनी राष्ट्रपति को उन बिंदुओं के बारे में बताया कि जिसके बारे में शायद यूक्रेनी पक्ष नहीं जानता हो। इस दौरान प्रधानमंत्री की ओर से कई विचार पेश किए गए, पीएम मोदी ने अपनी रूस के साथ वार्ता को लेकर भी डिस्कस किया गया। उन्होंने कहा कि यहां से हमें भी कई बिंदू मिले हैं। इस बात में कोई शक नहीं है कि ये एक जटिल समस्या है और सिर्फ भारत ही नहीं दूसरे देशों का मानना है कि इसके समाधान के कई विकल्प हो सकते हैं। विदेश मंत्री ने कहा कि राष्ट्रपति जेलेंस्की ने क्षेत्रीय अखंडता, संप्रभुता और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के प्रति सम्मान को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की। उन्होंने ये भी कहा कि बातचीत का एक हिस्सा मिलिट्री सिचुएशन और शांति को लेकर उठाए जाने वाले कई कदमों को लेकर हुई। इसके अलावा पीएम मोदी की ओर से यूक्रेनी राष्ट्रपति को भारत आने का न्योता भी दिया गया। जेलेंस्की को गले लगाने से जुड़े एक सवाल के जवाब में जयशंकर ने कहा कि गले लगाना भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। पीएम और जेलेंस्की के बीच ये चौथी मुलाकात थी।

इससे पहले शुक्रवार को पीएम मोदी कीव पहुंचे। रूस के राष्ट्रपति पुतिन से गले मिलने के छह हफ्ते बाद पीएम मोदी ने शुक्रवार को कीव में पीएम मोदी ने राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की को गले लगाया। यहां दोनों नेताओं ने यूक्रेन के नेशनल म्यूज़ियम में शहीद प्रदर्शनी का दौरा भी किया इस दौरे का मकसद रूस-यूक्रेन में चल रहे युद्ध के दौरान जान गंवाने वाले बच्चों की स्मृति को याद और श्रद्धाजंलि देना था। पीएम ने इसे लेकर अपने एक्स हैंडल पर पोस्ट भी किया। पीएम ने लिखा कि संघर्ष विशेष तौर पर छोटे बच्चों के लिए विनाशकारी है। मेरी संवेदना उन बच्चों के परिवारों के साथ है जिन्होंने अपनी जान गंवाई है। दोनों नेताओं ने इस दौरान मल्टीमीडिया मार्टिरोलॉजी चिल्ड्रन में खिलौने रखे और बच्चों के सम्मान में एक क्षण का मौन भी रखा। वहीं पीएम जेलेंस्की ने भी कहा कि कीव में दोनों नेताओं ने उन बच्चों की स्मृति का सम्मान किया, जिनकी जान रूसी आक्रमण में चली गई थी । उन्होंने आगे कहा कि हर देश में बच्चे सुरक्षा में रहने के हकदार हैं। यूक्रेनी राष्ट्रपति से मिलने से पहले पीएम मोदी ने गांधी प्रतिमा पर भी पुष्पाजंलि अर्पित इससे पहले रेल फोर्स वन से 10 घंटे की ट्रेन यात्रा कर कीव पहुंचे।

भारत और यूक्रेन के बीच बातचीत का बड़ा हिस्सा संघर्ष से जुड़े समाधान को लेकर था। लेकिन इसके अलावा भी दोनों देशों के बीच कई दूसरे क्षेत्रों पर चर्चा हुई। दोनों देशों ने 4 करारों पर हस्ताक्षर किए। जिनमें से एक एग्रीकल्चर और फूड इंडस्ट्री से जुड़ा है। इसके अलावा एक समझौता मेडिकल प्रोडक्ट रेगुलेशन को लेकर भी हुआ। यूक्रेन में हाई इंपैक्ट कम्यूनिटी डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स को लेकर भी एक करार पर दोनों देशों ने हस्ताक्षर किए हैं। इसके साथ साथ साल 2024 से लेकर 2028 तक दोनों देशों के बीच संस्कृति से जुड़े एक करार पर समझौता हुआ।

ग्लोबल साउथ समिट में क्या बोले भारतीय विदेश मंत्री?

हाल ही में भारतीय विदेश मंत्री ने ग्लोबल साउथ समिट में एक बयान दे दिया है! भारत ने तीसरी बार वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट का वर्चुअल फॉर्मेट में आयोजन किया। इस समिट में इस बार भारत समेत कुल 123 देशों ने हिस्सा लिया और ग्लोबल साउथ की साझी चिंताओं और प्राथमिकताओं पर बात की। समिट में 21 देशों के राष्ट्राध्यक्ष… 118 मंत्री और 34 विदेश मंत्रियों ने शिरकत की, इस तरह से देखा जाए तो 173 देशों ने इसमें मौजूदगी जताई। हालांकि पाकिस्तान इसका हिस्सा नहीं था। विदेश मंत्री डॉ जयशंकर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि समिट की टाइमिंग बेहद अहम है क्योंकि इसके बाद न्यूयॉर्क में फ्यूचर ऑफ द समिट होनी हैं, ऐसे में ग्लोबल साउथ के जिन मुद्दों पर यहां चर्चा हुई है, उन पर वहां भी चर्चा होनी है। इस समिट में लीडर्स समिट के अलावा मंत्रिस्तरीय के 10 सेशन्स हुए थे। एस जयशंकर ने बताया कि समिट में कुल 21 राष्ट्राध्यक्षों ने अपने विचार सामने रखे। उन्होंने कहा कि इस सेशन में सब ने ये माना कि ग्लोबल साउथ के मुद्दों को आवाज देने से जुड़ी भारत की पहल काबिल-ए-तारीफ है, इसके साथ ही कुछ देशों ने उम्मीद जताई कि ये पहल आगे भी जारी रहेगी। विदेश मंत्री ने लीडर्स सेशन में चर्चा उभर कर आए मुद्दों का भी जिक्र किया। इनमें भोजन, स्वास्थ्य, हेल्थ और एनर्जी सुरक्षा से जुड़े मुद्दे ऊपर रहे, इसके अलावा बहुपक्षवाद, वैश्विक संस्थाओं में सुधार के अलावा गाजा के संघर्ष को लेकर भी चिंता जाहिर की गई।

विदेश मंत्री ने एक सवाल के जवाब में कहा कि कई देशों ने बिना किसी देश का नाम लिए इस बात का जिक्र किया कि कर्ज का बोझ इन देशों के सामने ब़ड़ी चुनौती है। इसके अलावा नई टेक्नोलॉजी की वजह से सामने आई चुनौतियों को लेकर भी सभी देशों ने चिंता जाहिर की, जिसमें साइबर और एआई से जुड़ी चुनौतियां शामिल थी। ग्लोबल साउथ के विकासशील देशों ने माना कि इन देशों को आपस में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करनी चाहिए। इसके अलावा क्लाइमेट चेंज के अलावा आर्थिक असमानता और बेरोजगारी के मुद्दे पर भी चर्चा हुई। विदेश मंत्री ने कहा कि इस दौरान बहुपक्षवाद एक अहम थीम की तरह उभर कर सामने आई, जिसमें यूएन समेत दूसरी वैश्विक संस्थाओं में रिफॉर्म्स पर सबने जोर दिया।

विदेश मंत्री ने कहा कि इसके अलावा गाजा के संघर्ष को लेकर भी कई देशों ने चिंता जताई। उन्होंने कहा कि इसके अलावा यूक्रेन-रूस के मामले को भी देशों ने उठाया, कई देशों ने माना कि गाजा का मुद्दा ज्यादा गभीर है, इसके अलाव देशों ने रणनीतिक स्वायत्ता, संप्रभुता और घरेलू मामलों में दखलअंदाजी के मामले पर भी चर्चा की। डॉ जयशंकर ने कहा कि विदेश मंत्री लेवल के नियम पर आधारित वर्ल्ड ऑर्डर, संप्रभुता का मुद्दा उठाया। इस दौरान डॉ जयशंकर ने बताया कि समिट एक विदेश मंत्री ने तो यहां तक कहा कि मौजूदा इंटरनेशनल वर्ल्ड ऑर्डर ‘एनमिल फार्म’ की तरह है, जहां सब देश समान हैं, लेकिन कुछ देश दूसरों से ज्यादा समान हैं। विदेश मंत्री ने कहा कि भारत ने जी 20 के एजेंडे को ग्लोबल साउथ की ओर शिफ्ट किया था और इस मंच पर पावर प्ले जैसा कुछ नहीं है, क्योंकि सब ऐसा महसूस करते हैं कि उनके मुद्दों की कहीं सुनवाई नहीं होती, लेकिन यहां एक दूसरे को सुनने का अवसर मिलता है। उन्होंने बताया कि इस कई दौरान देशों ने आतंकवाद और चरमपंथ की चुनौती एक दूसरे के साथ साझे किए।

एनर्जी सेक्योरिटी के मसले पर डॉ जयशंकर ने कहा कि कुछ देशों ने प्रतिबंधों का जिक्र किया, लेकिन इसके मद्देनज़र देश विशेष को लेकर कोई बात नहीं हुई। डॉ जयशंकर ने कहा कि ग्लोबल साउथ के देशों की भारत को लेकर अपेक्षाएं हैं, वो मानते हैं कि भारत एक रिस्पांडर की तरह भारत लगातार सामने आया है। पड़ोसी देश बांग्लादेश की सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद युनूस के संबोधन के बारे में विदेश मंत्री ने कहा कि उन्होंने कोविड की चुनौतियों और जिओ पॉलिटिकल मुद्दों पर चर्चा की। इसके साथ ही उन्होंने अपने देश के हालात के बारे में भी बात की।

इससे पहले विदेश मंत्रियों के सेशन में हिस्सा लेते हुए विदेश मंत्री ने एक बार फिर वैश्विक संस्थाओं में रिफॉर्म्स की वकालत की। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब ग्लोबल ऑर्डर चुनौतियों से दो चार हुआ तो इन संस्थाओं की ओर से समाधान सामने नहीं आए, इसके साथ ही जयशंकर ने विकासशील देशों के लिए कम कीमत की फाइनेंसिंग और क्रिटिकल टेक्नोलॉजी की भी वकालत की। विदेश मंत्री ने कहा कि भारत ने जी 20 के जरिए बहुपक्षवाद और इंटरनेशनल बैंकों में सुधार की जरूरत पर हमेशा ही बल दिया, ऐसे में इस मांग को आगे बढ़ाए जाने को लेकर हमें एक ग्रुप के तौर पर भी आगे बढ़ना होगा। विदेश मंत्री ने कहा कि भारत लगातार संयुक्त राष्ट्र, वर्ल्ड बैंक और इंटरनेशनल मोनेटरी फंड जैसी संस्थाओं में सुधार की वकालत करता रहा है। इन संस्थाओं को मौजूदा दुनिया की सच्चाइयों का आइना बनना चाहिए। विदेश मंत्री ने क्लाइमेट चेंज, एनर्जी ट्रांसिशन, बहुपक्षवाद, आर्थिक लचीलापन और लोकतांत्रिक डिजिटल बदलावों पर जोर दिया।

भारत और बांग्लादेश के लिए क्या बोले भारतीय विदेश मंत्री ?

हाल ही में भारतीय विदेश मंत्री ने भारत और बांग्लादेश के लिए एक बयान दिया है! विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि भारत और बांग्लादेश के रिश्ते हमेशा से एक जैसे नहीं रहे हैं। उन्होंने कहा कि 1971 में बांग्लादेश की आजादी के बाद से दोनों देशों के रिश्तों में उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं। जयशंकर ने ये बातें शुक्रवार को एक किताब विमोचन के मौके पर कही। जयशंकर ने कहा कि भारत को बांग्लादेश के साथ अपने रिश्ते बनाते समय दोनों देशों के हितों का ध्यान रखना होगा। उन्होंने कहा कि किसी भी देश के लिए उसके पड़ोसी देश हमेशा एक अबूझ पहेली की तरह होते हैं। उनकी टिप्पणियां बांग्लादेश में सरकार विरोधी अभूतपूर्व प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में आईं जिसके कारण शेख हसीना के नेतृत्व वाली सरकार गिर गई और वह पांच अगस्त को भारत आ गईं। तीन सप्ताह से अधिक समय तक भारत में हसीना की मौजूदगी ने उस देश में अटकलों को जन्म दिया है। आठ अगस्त से, मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में सलाहकारों की एक टीम वाली एक अंतरिम सरकार बांग्लादेश में है। भारत के पूर्व राजदूत राजीव सीकरी द्वारा लिखित पुस्तक ‘स्ट्रेटजिक कॉनड्रम: रीशेपिंग इंडियाज फॉरेन पॉलिसी’ अपने पड़ोसी देशों के साथ देश के संबंधों और उससे जुड़ी चुनौतियों के बारे में बात करती है।

जयशंकर ने कहा कि वह किताब के शीर्षक और उस कारण जिसकी वजह से लेखक ने इसे (शीर्षक को) ‘पहेली’ के रूप में प्रस्तुत किया उस पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं। उन्होंने कहा, ‘और, मैं चाहता हूं कि आप उस ‘पहेली’ शब्द पर विचार करें… क्योंकि, आम तौर पर राजनयिक दुनिया में, इसे एक रिश्ते के रूप में, परिदृश्य के रूप में, कथानकों के रूप में व्यक्त किया जाएगा, लेकिन परिभाषा के अनुसार ‘पहेली’ भ्रामक है, यह कठिन है, यह एक रहस्य की तरह है, यह एक चुनौती हो सकती है। और, सबसे बढ़कर, यह एक निश्चित जटिलता व्यक्त करती है।’

विदेश मंत्री ने कहा, ‘और, मुझे बहुत खुशी है कि उन्होंने ऐसा किया। जैसा कि कभी-कभी, जब हम विदेश नीति पर बहस करते हैं, तो हमारे बहुत ही स्याह और सफेद विकल्पों की ओर फिसलने का खतरा होता है। लोग इसे सरल बनाते हैं…।’ केंद्रीय मंत्री ने कहा, ‘अब, यदि हम पहेली पर नजर डालें, तो दुनिया के हर देश के लिए पड़ोसी हमेशा एक पहेली होते हैं क्योंकि दुनिया के हर देश के लिए पड़ोसी रिश्ते ‘सबसे कठिन’ होते हैं।’ उन्होंने कहा, ‘इनका कभी भी समाधान नहीं किया जा सकता। वे लगातार जारी रहने वाले रिश्ते हैं जो हमेशा समस्याएं पैदा करेंगे।’ जयशंकर ने कहा, ‘तो, जब लोग कभी-कभी कहते हैं कि बांग्लादेश में यह हुआ, यह मालदीव में हुआ, मुझे लगता है कि उन्हें वैश्विक तौर पर देखने की जरूरत है। और, मुझे बताएं, दुनिया में कौन सा देश है जिसके सामने अपने पड़ोसियों जुड़ी चुनौतियां और जटिलताएं नहीं हैं। मैं समझता हूं कि पड़ोसी होने के नाते यह स्वाभाविक है कि ऐसा होगा।’ बांग्लादेश के मुद्दे पर विदेश मंत्री ने कहा कि स्पष्ट कारणों से इन संबंधों में बहुत रुचि है। उन्होंने कहा, ‘बांग्लादेश के साथ, उसकी आजादी के बाद से, हमारे रिश्ते उतार-चढ़ाव वाले रहे हैं। यह स्वाभाविक है कि हम मौजूदा सरकार के रुख के हिसाब से रवैया अपनाएं।’

जयशंकर ने कहा, ‘लेकिन, हमें यह भी मानना होगा कि राजनीतिक परिवर्तन हो रहे हैं और राजनीतिक परिवर्तन विघटनकारी हो सकते हैं। स्पष्ट रूप से हमें यहां हितों की पारस्परिकता को देखना होगा।’ भारत-म्यांमा संबंधों पर उन्होंने कहा कि म्यांमा ‘एक ही समय में प्रासंगिक और असंबद्ध’ है। अपने संबोधन में उन्होंने क्षेत्रीयकरण के बारे में भी बात की और कहा, ‘भारत के सामने यह प्रश्न है कि हम क्षेत्रीयकरण किसके साथ और किन शर्तों पर करें।’जयशंकर ने कहा, ‘किसी पहेली को देखने का मूल मंत्र यह होना चाहिए कि हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा कहां है, उस रिश्ते में लाभ या जोखिम क्या है। क्या यह व्यापक राष्ट्रीय शक्ति के विकास में मदद करता है और क्या यह हमारी पसंद की स्वतंत्रता का विस्तार करता है।’ उन्होंने कहा कि दूसरा, प्रमुख शक्तियां हैं। उन्होंने कहा, ‘प्रमुख शक्तियां एक पहेली होंगी क्योंकि वे उनके हितों की व्यापकता के कारण प्रमुख हैं। उनका हमेशा एक एजेंडा होगा, जो भारत के साथ टकाराव का होगा, लेकिन अलग-अलग स्तर पर अलग भी होगा।’

जयशंकर ने कहा, ‘चीन के मामले में, आपके पास ‘दोहरी पहेली‘ है, क्योंकि यह एक पड़ोसी और एक प्रमुख शक्ति है। इसलिए, चीन के साथ चुनौतियां इस दोहरी परिभाषा में उपयुक्त बैठती हैं।’ विदेश मंत्री ने अपने संबोधन में कहा, ‘भारत को पूरे पड़ोस के लिए एक उत्थान शक्ति बनना चाहिए।’ जयशंकर ने कहा कि यह किताब ‘सामान्य विशेषज्ञों के लिए लिखी गई है, यह विदेश मंत्रालय द्वारा, विदेश मंत्रालय के लिए लिखी गई किताब नहीं है’। उन्होंने कहा, ‘मुझे लगता है कि विदेश नीति के रहस्यों को उजागर करना आज बहुत महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ वर्षों में मेरा अपना प्रयास विदेश नीति को विदेश मंत्रालय और दिल्ली से बाहर ले जाना रहा है, और वास्तव में इस पर एक बड़ी बातचीत शुरू करने का प्रयास करना है।’