Friday, March 6, 2026
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आखिर क्या है लखनऊ का पिटबुल केस?

आज हम आपको लखनऊ का पिटबुल केस के बारे में बताने जा रहे हैं! लखनऊ के कैसरबाग स्थित बंगाली टोला में 12 जुलाई की सुबह 80 साल की सुशीला त्रिपाठी पर उनके पालतू फीमेल डॉग ने कथित रूप से हमला कर दिया। ज्यादा खून बह जाने के चलते उनकी जान चली गई। सुशीला के बेटे अमित एक जिम ट्रेनर हैं जो उस समय घर पर नहीं थे। हादसे के बाद पिटबुल ब्रीड की डॉगी को नगर निगम ने जब्त कर लिया है। उसे बिहेवियर स्टडी के लिए ह्यूमेन सोसाइटी इंटरनैशनल के सेंटर में रखा गया है। यह खबर लगातार चर्चा में बनी हुई है, जिसे सुनकर हर कोई हैरान है। पेट पैरंट्स, ऐक्टिविस्ट, डॉक्टर, एनजीओ और आम लोगों में बहस छिड़ गई है कि आखिर एक पालतू कुत्ता अपने ही परिवार के सदस्य की जान कैसे ले सकता है। किसी को ब्राउनी पिटबुल डॉगी के घर का नाम के प्रति हमदर्दी है तो कुछ उसे कातिल की नजर से देख रहे हैं। कोई इस हमले के लिए पिटबुल नस्ल के एग्रेसिव बिहेवियर को जिम्मेदार ठहरा रहा है तो कोई इसे बेहतर ट्रेनिंग और माहौल की कमी। सुशीला त्रिपाठी के बेटे अमित ने तीन साल पहले पिटबुल ब्रीड की डॉगी ब्राउनी को अडॉप्ट किया था। तब वह तीन महीने की थी। अमित ने मीडिया को बताया है कि इससे पहले कभी भी उसने हमें नुकसान नहीं पहुंचाया, उस दिन पता नहीं क्या हो गया। अमित खुद भी इस हादसे से हैरान हैं। वहीं एनजीओ का मानना है कि सिर्फ स्टेटस सिंबल के लिए डॉग नहीं रखने चाहिए, बल्कि उन्हें सही माहौल और ट्रेनिंग भी जरूरी है। लखनऊ स्थित एनजीओ जीव बसेरा की अध्यक्ष राखी किशोर कहती हैं, ‘कुछ विशेष ब्रीड के डॉग जैसे पिटबुल, रॉट वाइलर या फिर जर्मन शेफर्ड लोग इन्हें स्टेटस सिंबल के लिए पाल लेते हैं।’ वह आगे कहती हैं, ‘कुत्ता घर लाने से पहले जरूरी है आप उसे एक परिवार के सदस्य के रूप में देखें। हमें उस विशेष ब्रीड के बारे में जानकारी और बेसिक रिसर्च पूरी करनी चाहिए। पिटबुल जैसे डॉग को घर में फ्रेंडली और केयरिंग माहौल मिलना जरूरी है। इसके अलावा ट्रेनिंग पर भी बहुत ध्यान देना होता है, प्रफेशनल ट्रेनर्स रखें या फिर घर पर ही ट्रेनिंग दे रहे हैं तो जितने सदस्य हैं उनका कमांड उस पर रहे।’

नगर निगम लखनऊ ने अमेरिकन पिटबुल, रॉट वाइलर, साइबेरियन हस्की, डॉबरमैन, बॉक्सर और जर्मन शेफर्ड जैसे ब्रीड को घातक करार देते हुए इन्हें घर पर न पालने से बचने की सलाह दी है। ऐक्टिविस्ट कामना पांडेय इस पर कहती हैं कि ‘नगर निगम की इस अडवाइजरी से प्रतिकूल परिणाम हो सकते हैं। लोग अपने पालतू जानवरों के डर के चलते अगर छोड़ने लग गए तो ये भी क्रूरता और अवैध होगा।’ उन्होंने कहा, ‘इस तरह अडवाइजरी जारी करने के बजाय नगर निगम को ब्रीडिंग सेंटर को रेग्युलेट करना चाहिए। यहां पर ओनर से उसके बैकग्राउंड की कोई जानकारी या पूछताछ की जाती है और यह भी नहीं देखा जाता है विशेष ब्रीड का डॉग उनके घर के माहौल में रह भी पाएगा या नहीं। इसके अलावा पेट शॉप में अवैध तरीके से जानवर रखते हैं, उन पर भी ऐक्शन लिया जाना जरूरी है।’

यह सामने आया है कि सुशीला और उनके बेटे पड़ोसियों के विरोध के चलते पिटबुल को घर पर ही टहलाते थे। ऐक्टिविस्ट कामना पांडेय बताती हैं, ‘डॉग के गुस्सैल होने के कई कारण होते हैं। इनमें से एक वजह डॉग का लोगों से इंट्रैक्शन न होना भी शामिल है। पिटबुल जैसे बड़ी ब्रीड वाले डॉग को वॉक के लिए घर पर जगह कम पड़ती है, इन्हें बाहर ले जाना जरूरी है ताकि पर्याप्त एक्सरसाइज हो सके। इसे लेकर पशु कल्याण विभाग की ओर से सर्क्युलर भी जारी हो चुका है कि पार्कों में कुत्ता टहलाने पर बैन नहीं लगाया जा सकता है। हालांकि फिर भी विवाद की खबरें आती हैं।’ इस घटना के बाद पड़ोसियों में दहशत है। उनका कहना है कि जो कुत्ता अपने ही घर के सदस्य पर हमला कर सकता है, उससे डर लगना लाजिमी है। ब्राउनी को नगर निगम के जब्त किए जाने के बाद से लोग थोड़े राहत में हैं।

लखनऊनगर निगम के पशु कल्याण विभाग का कहना है कि यहां किसी भी ब्रीड के डॉग को पालने पर प्रतिबंध नहीं है फिर भी लोगों को आक्रामक ब्रीड वाले डॉग को पालने से बचना चाहिए। इसके साथ ही नगर निगम से देशी-विदेशी किसी भी तरह के डॉग को पालने के लिए लाइसेंस लेना जरूरी है। इसकी वैधता एक साल तक होती है। ऐसा न करने पर 5000 रुपये जुर्माने का प्रावधान है। नगर निगम के पशु कल्याण विभाग ने पाया कि ब्राउनी फीमेल डॉग है और उसका स्टरलाइजेशन (बधियाकरण) नहीं हुआ था। ऐसे में हार्मोनल इश्यू भी कभी-कभी डॉग के एग्रेसिव नेचर की वजह हो सकता है। अमित ने मीडिया को बताया कि ब्राउनी ने कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया। बस एक बार उनकी मां को दांत लगा था, इस पर जब अमित ब्राउनी पर गुस्सा हुए तो मां ने ही मना कर दिया कि उसने काटा नहीं है। जीव बसेरा की राखी किशोर कहती हैं, ‘मैं नहीं मानती कि कोई भी डॉग अगर भाग-भागकर सबको नहीं काट रहा है तो उसका दिमाग बिल्कुल ही आपे से बाहर हो चुका है। अगर सभी को काट रहा हो तब तो उसका इलाज करना चाहिए। न्यूरोलॉजिकल, मेंटल डिसीज या ट्रॉमा हो सकता है लेकिन अगर सिर्फ एक को काट रहा तो कोई वजह रही होगी जिससे वह ट्रिगर हुआ।’

नगर निगम ने ब्राउनी को हाउस ऑफ स्ट्रे एनिमल (एचएसआई) को सौंप दिया है। उसे इंदिरा नगर जरहरा स्थित एबीसी सेंटर में रखा गया है। पशु कल्याण विभाग के अधिकारी डॉ. अभिनव वर्मा ने बताया, ‘पहले दो दिन डॉगी थोड़ी परेशान रही, रो भी रही थी और लेकिन तीसरे दिन से सुधार हुआ है। अब वह खाना भी खा रही है। वह तीन साल से उस परिवार के साथ थी लेकिन एकदम से अटैचमेंट कम तो नहीं होगा। हमने इसे 14 दिन के लिए ऑब्जर्वेशन पर रखा गया है। इसके बाद उसे एनजीओ या ट्रेनर को सौंपा जाएगा। इसके लिए हमारी प्रक्रिया चल रही है।’ पशु कल्याण विभाग जॉइंट सेक्रेटरी डॉ. अरविंद कुमार राव ने कहा कि ‘फिलहाल ब्राउनी को ऐसी परिस्थितियों में अमित त्रिपाठी को नहीं सौंपा जाएगा। अमित चाहें तो नगर निगम से इजाजत लेकर उससे मिल सकते हैं लेकिन हमारे पास अभी उनका कोई कॉल नहीं आया।’

जब कंप्यूटर ने बदल दी भविष्य की बच्चियों की जिंदगी!

कंप्यूटर ने भविष्य की बच्चियों की जिंदगी बदल कर रख दी है! 13 साल की लक्ष्मी के लिए स्कूल की राह ही मुश्किलों भरी थी। घर पर उसका समय शराबी पिता की मार से मां को बचाने में ही गुजर जाता था। गणित के पेपर में बेहतर नंबर लाना उसके लिए सपना पूरा होने जैसा है। 14 साल की जैसमीन 6वीं क्लास के एंट्रेस में नंबर तक याद नहीं रख पाती थी लेकिन अब वह क्लासमेट्स को स्क्वैयर रूट यानी वर्गफुट के सवाल हल करवा रही हैं। 11 साल की बच्ची भूमि के पिता अब दुनिया में नहीं हैं। उसे मैथ से इतना लगाव हो चुका है कि वह इस सब्जेक्ट में टीचर बनना चाहती है। 12 साल की कविता पहले पढ़ाई से जी चुराती थी लेकिन अब मैथ, साइंस और अंग्रेजी फेवरिट विषय हैं। ऐसे ही अपनी मां को खो चुकीं सान्या पढ़ाई कर वकील बनना चाहती हैं। एक समय इन सभी बच्चियों की पढ़ाई छूटने की कगार पर आ गई थी लेकिन अब करियर के रास्ते आगे बढ़ते नजर आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश के कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय (KGBV) ने इनकी किस्मत बदल दी। इन स्कूल्स में 6वीं से 8वीं क्लास तक की पढ़ाई होती है। जो बच्चे बुनियादी सवालों पर लड़खड़ाते थे क्योंकि उन्हें कभी भी कोई विषय ठीक से नहीं सिखाया गया था। जिस मैथ और इंग्लिश से डर लगता था, उनके लिए सीखने का तरीका अब मनोरंजन की चीज हो गई। कम्प्यूटर के साथ ही स्किल्स भी मजबूत हो रहे हैं। हाल के साल में KGBV में लड़कियों के पास होने का प्रतिशत भी बढ़ा है। गौतमबुद्धनगर के दादरी ब्लॉक के नागला की निवासी लक्ष्मी की जिंदगी का उद्देश्य अपनी मां की जिंदगी को बेहतर बनाना है। एक समय किताब छूने से भी परहेज करने वाली लक्ष्मी को अब पढ़ाई से लगाव हो गया है। उसकी आंखों में सिविल सेवा में जाने का सपना तैर रहा है। वहीं दनकौर के KGBV में पढ़ने वाली 14 साल की तनु भी पुलिस सेवा में जाना चाहती है। वह चाहती है कि बच्चियों बेखौफ होकर घरों से बाहर निकले और गांव-कस्बे में भी कोई लड़कियों को परेशान ना कर पाए।

लखनऊ के मलिहाबाद KGBV में लड़कियों के मैथ विषय में पास होने का प्रतिशत 2021 में 25 प्रतिशत से बढ़कर 2022 में 80 प्रतिशत हो गया है। वहीं 2023 में यह 100 प्रतिशत तक पहुंच गया। आठवीं तक पढ़ाई के बाद नौवीं क्लास में पढ़ाई करने का प्रतिशत भी बढ़ा है। सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े समाज की लड़कियों को पढ़ाई में आगे बढ़ाने के उद्देश्य से 2004-05 में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय की शुरुआत की गई थी। इससे ग्रामीण इलाकों में साक्षरता दर में सुधार दर्ज किया गया है। यहां छठवीं से 12वीं क्लास तक पढ़ाई होती है, जिसे अब बढ़ाकर 12वीं तक किया जा रहा है। अभी प्रदेश में 746 KGBV स्कूल संचालित हैं।

मलिहाबाद KGBV में पढ़ाई कर रही जैसमीन बताती है कि हमें शुरू से हमेशा यही बताया गया कि गणित तो लड़कों के पढ़ने का विषय है। स्कूल भी जाना तय नहीं था। आज यह महसूस होता है कि केवल शिक्षा ही हमें गरीबी से मुक्ति दिला सकती है। वह सुबह स्कूल के कम्प्यूटर लैब में वर्कशीट तैयार करती हैं। वार्डेन नीलिमा सिंह ने बताया कि जैसमीन के अंदर पहले कॉन्फिडेंस ही नहीं था। वह कई बार पूछने पर कुछ बोलती थी। लेकिन अब यह हाल है कि वह हेड गर्ल है और प्रार्थना सभा से लेकर कम्प्यूटर क्लास तक की जिम्मेदारी संभालती है।

बाराबंकी के KGBV के आठवीं क्लास में पढ़ने वाली नेहा यादव अब नौंवीं क्लास की पढ़ाई करने जा रही है। वह बताती हैं कि मैथ से अब लगाव हो गया है। वर्ग और घन के सवाल हल करने में मजा आता है। ऐसा ही कहना है मऊ की 13 साल की राजनंदिनी का। KGBV में टॉप करने वाली बच्ची का कहना है कि कस्तूरबा स्कूल ने मेरी जिंदगी बदल दी। अब उनका सपना कॉलेज में जाकर इंजिनियरिंग की पढ़ाई करना है।

उत्तर प्रदेश में स्कूली शिक्षा महानिदेशक कंचन वर्मा ने बताया कि KGBV में बच्चियों को साइंस, मैथ की पढ़ाई के साथ डिजिटली भी मजबूत करने की दिशा में काम किया जा रहा है। हमारी कोशिश है कि कस्तूरबा की बच्चियों को टेक्नॉलजी और इंजिनियरिंग की दिशा में मजबूत किया जाए। बेसिक कॉन्सेप्ट को मजबूत करने पर काम किया जा रहा है। सर्वे के मुताबिक KGBV की बच्चियां स्किल्स में भी मजबूत हो रही हैं। उत्तर प्रदेश राज्य के पाठ्यक्रम के साथ ही खान अकैडमी के सहयोग से कोर्स मॉड्यूल प्रॉजेक्ट में टाटा ट्रस्ट भी सहयोगी है।

क्या 2004 वाली रणनीति पर काम कर रही है कांग्रेस?

कांग्रेस वर्तमान में 2004 वाली रणनीति पर काम कर रही है! लोकसभा चुनाव में महज कुछ दिनों का वक्त बचा है। लगभग सभी पार्टियों ने अपने उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है। ऐसा पहली बार हो रहा है जब लोकसभा चुनाव में देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस सबसे कम सीटों पर लड़ रही है। पुरानी कहावत ‘बीस साल बाद’ को दोहराते हुए कांग्रेस लोकसभा चुनाव में अपनी सबसे कम सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए कमर कस रही है। सोमवार को चुनाव की योजना की घोषणा करते हुए, इस कांग्रेस पार्टी ने 2004 के साथ तुलना की, जब उसने सहयोगियों के पक्ष में चुनाव लड़ने में कम उम्मीदवार उतारे और बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए को सत्ता से हटा दिया था। उसे उम्मीद है कि 20 साल बाद कहानी खुद को दोहराएगी। कांग्रेस 2024 के चुनावों में लगभग 330 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है। यह 2004 की तुलना में काफी कम है, जब उसने 417 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जो तब तक की सबसे कम संख्या थी। कांग्रेस के प्रवक्ता जयराम रमेश ने कहा कि इस बार महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में I.N.D.I.A गठबंधन के सहयोगियों को शामिल करने के लिए कांग्रेस ने कम उम्मीदवारे उतारे हैं। एनसीपी-शिवसेना, लेफ्ट और समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन के कारण पार्टी इन राज्यों में पहले जितनी सीटों पर चुनाव नहीं लड़ रही है।

जयराम रमेश ने कहा, ‘मेरे शब्दों पर गौर करें, 2004 में जो स्थिति थी, वही 2024 में भी है। हमने जानबूझकर इन तीन राज्यों में कम सीटें चुनी हैं, क्योंकि हम एक मजबूत और प्रभावी गठबंधन बनाना चाहते थे। कांग्रेस और I.N.D.I.A गठबंधन को इन चुनावों में स्पष्ट जनादेश मिलेगा। हमें किसी नई पार्टी की जरूरत नहीं होगी और एनडीए के उलटफेर करने वालों को फिर से पलटी नहीं खानी पड़ेगी।’ उन्होंने कहा कि इससे पूर्वोत्तर के सभी क्षेत्रीय दलों के लिए भाजपा को छोड़कर कांग्रेस का समर्थन करने का रास्ता भी तैयार हो जाएगा।

कांग्रेस के दावों के अलावा, पार्टी द्वारा चुनाव लड़ी जा रही सीटों की संख्या में भारी गिरावट 2014 के बाद उसके राजनीतिक हाशिए पर चले जाने और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के उदय का सीधा नतीजा है। पिछले 10 सालों में, कांग्रेस ने यूपी, बिहार, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में अपनी जीत की संभावना में भारी गिरावट देखी है, जो कुल लोकसभा सीटों का 40% से अधिक हिस्सा हैं।

देश में बदले राजनीतिक समीकरणों ने कांग्रेस को सहयोगियों का विकल्प चुनने पर मजबूर कर दिया है। महाराष्ट्र में पार्टी की महत्वपूर्ण जागीरें छोड़ना और बिहार में अपनी पसंद की सीटें हासिल करने में विफलता इसकी कमजोर सौदेबाजी की ताकत के संकेत हैं। इस अवधि में नई क्षेत्रीय पार्टियों का उदय और पुराने स्थानीय संगठनों का मजबूत होना भी देखा गया है, जिससे भाजपा से मुकाबला करने के लिए इसके विकल्प और भी कम हो गए हैं। उदाहरण के लिए कांग्रेस आंध्र प्रदेश में 23 सीटों पर लड़ रही है, जबकि सीपीएम और सीपीआई के लिए एक-एक सीट छोड़ी गई है। लेकिन ये सभी आंकड़े काल्पनिक हैं, क्योंकि कांग्रेस के पास ऐसे राज्य में कोई मौका नहीं है जहां टीडीपी और सत्तारूढ़ वाईएसआरसीपी मुख्य पार्टियां हैं। कांग्रेस को अंदरूनी दबाव के बावजूद कोई सहयोगी नहीं मिल पाया।

कुछ महीने पहले तक कांग्रेस को उम्मीद थी कि वह राष्ट्रीय स्तर पर कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगी। उसने नवंबर 2023 में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और तेलंगाना में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले I.N.D.I.A के सहयोगियों के साथ सीट बंटवारे पर बातचीत टाल दी थी। पार्टी के रणनीतिकारों को उम्मीद थी कि राज्य चुनावों में उसके प्रत्याशित अच्छे प्रदर्शन से – जहां उसका सीधा मुकाबला भाजपा से था – उसकी टिकट बंटवारे के फॉम्युले की शक्ति बढ़ेगी और वह सहयोगियों के साथ अधिक सीटों के लिए डील कर सकती है। हालांकि, ऐसा नहीं हुआ। उत्तरी राज्यों में कांग्रेस की हार ने आरजेडी, एनसीपी, शिवसेना (यूबीटी), एसपी, लेफ्ट आदि जैसे सहयोगियों के साथ उसकी स्थिति को कमजोर कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप बिहार, महाराष्ट्र, यूपी और बंगाल में उसके लिए चुनाव लड़ने के लिए कम सीटें बचीं। पार्टी को दिल्ली, गुजरात और हरियाणा में आप के साथ भी हाथ मिलाना पड़ा।

हालांकि कांग्रेस का मानना है कि सहयोगी दलों के साथ हाथ मिलाना, जो उसके अनुसार भाजपा के साथ गठबंधन नहीं कर सकते – भगवा आर्मी के खिलाफ उसकी संभावनाओं को अधिकतम करने में सहायक रहा है। एक सीनियर अधिकारी ने कहा, ‘हमने बहुत सोच-समझकर त्याग किया है। क्योंकि यह बहुत महत्वपूर्ण चुनाव है, न केवल विपक्ष के लिए बल्कि देश के लिए भी।’

क्या अब मुस्लिम युवाओं में भी बढ़ रहा है आईएएस बनने का ट्रेंड?

वर्तमान में अब मुस्लिम युवाओं में भी आईएएस बनने का ट्रेंड बढ़ रहा है! देश में आईएएस-आईपीएस जैसे उच्च पदों पर अब ज्यादा संख्या में मुसलमान काबिज हो रहे हैं। इससे पहले आम तौर पर यह माना जाता रहा है कि आजादी के 75 साल बाद भी शैक्षिक रूप से मुस्लिम पिछड़े हैं और देश के रसूखदार पदों पर उनकी मौजूदगी न के बराबर है। यह बात 2016 तक काफी हद तक हकीकत के करीब भी रही है, मगर अब ऐसा नहीं है। हाल ही में संघ लोक सेवा आयोग की जारी सिविल सर्विसेज मेरिट लिस्ट, 2023 में 50 से ज्यादा मुस्लिम कैंडिडेट्स ने जगह पाई है। इनमें से 5 तो ऐसे हैं, जिन्हें टॉप-100 में जगह मिली है। उल्लेखनीय है कि शाह फैसल ने 2010 में IAS टॉप करके कश्मीरियों समेत पूरे देश के मुस्लिम युवाओं को प्रेरणा दी थी। इसके बाद 2015 में कश्मीर के अतहर आमिर ने UPSC में दूसरी रैंक हासिल की थी। वहीं, 2017 में मेवात के अब्दुल जब्बार भी चयनित हुए थे। वे इस क्षेत्र से पहले मुसलमान सिविल सर्वेंट हैं। और अब 2023 में दिल्ली से पढ़ाई करने वालीं नौशीन ने सिविल सेवा परीक्षा में 9वीं रैंक हासिल की है, जो मुस्लिम समुदाय के लड़के-लड़कियों को देश की सर्वोच्च सेवा में सफल होने के लिए राह दिखाएगा।

सिविल सेवा परीक्षा, 2023 में कुल सफल 1,016 अभ्यर्थियों में से 52 मुस्लिम कैंडिडेट्स ने जगह बनाई। इनमें से 5 यानी रूहानी, नौशीन, वारदाह खान, जुफिशान हक और फैबी राशिद ने टॉप-100 में जगह बनाने में कामयाब रहे। टॉप-10 में नौशीन को 9वीं रैंक मिली है। मुस्लिम युवाओं का सिविल सेवाओं के प्रति रुझान हाल के वर्षों में बढ़ा है। 2012 में सिविल सेवाओं में सफल मुस्लिम कैंडिडेट 30 थे। वहीं, 2013 में सफल मुस्लिम कैंडिडेट 34, 2014 में 38, जबकि 2015 में 36 थे। उस वक्त भी मुस्लिम युवाओं की सफलता दर तकरीबन 5 फीसदी थी।

इससे पहले 2022 की सिविल सेवा परीक्षा में कुल 933 अभ्यर्थी आईएएस-आईपीएस और केंद्रीय सेवाओं के लिए चुने गए थे। इनमें से महज 29 कैंडिडेट्स मुस्लिम कम्युनिटी से थे। जो कुल सफल लोगों में से करीब 3.1 फीसदी रहे। इस बार यानी 2023 की सिविल सेवा परीक्षा में 51 मुस्लिम कैंडिडेट्स सफल रहे, उनका कुल सफल लोगों में प्रतिशत 5 फीसदी से ज्यादा ही रहा है। सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट नवंबर, 2006 में सौंपी थी, जिसमें यह कहा गया था कि मौजूदा वक्त में 3,209 IPS ऑफिसर हैं, जिनमें से 128 यानी करीब 4 फीसदी ही मुस्लिम हैं। वहीं, जनवरी, 2016 में सेवारत 3,754 IPS ऑफिसरों में से 120 यानी कुल का 3.19 फीसदी ही मुस्लिम ऑफिसर हैं।

देश में मुस्लिमों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक पिछड़ेपन का हाल जानने के लिए कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने जाने-माने मानवाविधकार समर्थक जस्टिस राजिंदर सच्चर की अगुवाई में 2005 में सच्चर कमेटी गठित की थी। इस कमेटी की 403 पन्नों की रिपोर्ट लोकसभा में 30 नवंबर, 2006 को पेश की गई थी। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि एससी, एसटी और अल्पसंख्यक आबादी वाले गांवों और आवासीय इलाकों में स्कूल, आंगनवाड़ी, स्वास्थ्य केंद्र, सस्ते राशन की दुकान, सड़क और पेयजल जैसी सुविधाओं की काफी कमी है। यहां तक कि मुस्लिम समुदाय की हालत अनुसूचित जाति और जनजाति से भी खराब है।

2006 में प्रशासनिक सेवाओं में मुस्लिमों की भागीदारी काफी कम रही थी। उस वक्त देश में 3 फीसदी आईएएस, 4 फीसदी आईपीएस ही मुसलमान थे। वहीं, पुलिस फोर्स में मुस्लिमों की हिस्सेदारी 7.63 फीसदी, जबकि रेलवे में महज 4.5 प्रतिशत थी। उस वक्त कुल सरकारी नौकरियों में मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व महज 4.9 फीसदी ही था।

सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया था कि मुस्लिमों के बीच शैक्षिक रूप से पिछड़ापन है। खास तौर पर हायर एजुकेशन के मामले में भी मुस्लिम काफी पीछे रहे हैं। इस वजह से सिविल सेवाओं में भी उनकी भागीदारी मामूली रही है। अब चूंकि उनकी प्राइमरी, सेकेंडरी लेवल और हायर एजुकेशन में भागीदारी बढ़ी है तो नतीजा उच्च पदों पर कामयाबी के रूप में भी दिख रहा है। बता दें कि सिविल सेवा परीक्षा में 51 मुस्लिम कैंडिडेट्स सफल रहे, उनका कुल सफल लोगों में प्रतिशत 5 फीसदी से ज्यादा ही रहा है। सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट नवंबर, 2006 में सौंपी थी, जिसमें यह कहा गया था कि मौजूदा वक्त में 3,209 IPS ऑफिसर हैं, जिनमें से 128 यानी करीब 4 फीसदी ही मुस्लिम हैं। ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन इन इंडिया (2018-19) के अनुसार, हायर एजुकेशन के मामले में मुस्लिम स्टूडेंट्स की भागीदारी 5.2 फीसदी रही। यह स्थिति अनुसूचित जाति (5.5%) और अनुसूचित जाति (14.9%) से काफी कम है। यह स्थिति तब है, जब भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार, अनुमानित रूप से मुस्लिमों की आबादी 17.22% थी। ऐसे में स्कूली शिक्षा में मुस्लिमों की भागीदारी बढ़ानी होगी, तभी उनकी हर क्षेत्र में तरक्की की राह खुलेगी।

क्या छत्तीसगढ़ में अब नक्सलियों पर लगेगी बंदिश?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब छत्तीसगढ़ में नक्सलियों पर बंदिश लगेगी या नहीं! लोकसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग से पहले छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित कांकेर जिले में मंगलवार सुरक्षाबलों ने मुठभेड़ में 29 नक्सलियों को ढेर कर दिया। इनमें 50 लाख रुपये के दो इनामी टॉप नक्सली कमांडर शंकर राव और ललिता शामिल हैं। नक्सलियों के खिलाफ ऐसी सफलता न केवल पिछले दस वर्षों बल्कि छत्तीसगढ़ बनने के बाद पहली बार है। इस मामले में सुरक्षाबलों को 15 अप्रैल की रात 5 इनपुट मिले थे और इनमें से दो इनपुट एकदम सटीक थे। इस इनपुट के मुताबिक बड़ी संख्या में नक्सलियों और इनके कमांडरों के होने का पता लगा था। नक्सलियों के खिलाफ इसे सुरक्षाबलों की सबसे बड़ी कार्रवाई क्यों माना जा रहा है इसके पीछे कई वजह है। इससे पहले 2 अप्रैल को 23 नक्सली मार गिराए गए थे। नक्सलियों के साथ यह मुठभेड़ बीएसएफ और जिला रिजर्व गार्ड यानी डीआरजी की जॉइंट टीम के साथ हुई। इस घटना के साथ ही इस साल अब तक कांकेर समेत बस्तर इलाके के सात जिलों में सुरक्षा बलों के साथ नक्सलियों की हुई मुठभेड़ में 79 नक्सलियों को मार गिराया गया है। नक्सलियों के खिलाफ किसी एक ऑपरेशन में सुरक्षा बलों की यह सबसे बड़ी सफलताओं में से एक है। सुरक्षा बलों के लिए ये मुठभेड़ कई मायनों में अहम है। यह सफल ऑपरेशन जंगल के बीच अबूझमाड़ के अंदर सुरक्षा बलों के प्रवेश का प्रतीक है। छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ इलाके को नक्सलियों का कोर इलाका माना जाता है। पिछले तीन दशकों से यह इलाका सुरक्षाबलों के लिए चुनौती बना हुआ है। जंगलों और पहाड़ों के बीच का यह इलाका नक्सलियों के लिए अभेद्य गढ़ बन गया। इस मुठभेड़ ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि पिछले कई वारदातों में शामिल नक्सलियों का सफाया हो गया है।

अबूझमाड़ की पहाड़ियां और जंगल दक्षिणी छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में लगभग 4,000 वर्ग किमी के क्षेत्र में फैली हुई हैं, गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक नक्सल प्रभावित इलाकों की संख्या 38 है। प्रभावित जिलों की सबसे अधिक संख्या छत्तीसगढ़ में है, इसके बाद ओडिशा झारखंड मध्य प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र ,केरल, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश का नंबर आता है। कांकेर में जिस तरीके से सुरक्षाबलों ने ऑपरेशन में तेजी दिखाई है उससे इस बात के साफ संकेत मिलते हैं कि आने वाले वक्त ऐसे और भी ऑपरेशन हो सकते हैं। मुख्य रूप से कांकेर के ठीक दक्षिण में नारायणपुर, बीजापुर और दंतेवाड़ा जिलों को कवर करती हैं। पहाड़ी इलाका, जंगल, सड़क, बुनियादी सुविधाओं का न होना और सशस्त्र विद्रोहियों की उपस्थिति से इस इलाके का एक बड़ा हिस्सा अब तक सरकारी सर्वेक्षण के दायरे से बाहर रहा है। यदि इसके भूभाग की बात करें तो इस इलाके का क्षेत्रफल गोवा जैसे राज्य से बड़ा है। इन जंगलों का उपयोग नक्सलियों द्वारा आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले से ओडिशा (पूर्व में) आने- जाने के लिए एक गलियारे के रूप में किया जाता है।

साल के आखिरी में पिछले साल राज्य में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से कांकेर और पूर्व में नारायणपुर से अबूझमाड़ के दो मुख्य प्रवेश बिंदुओं पर कुछ नए पुलिस कैंप बनाए गए। अबूझमाड़ में एक बेस कैंप स्थापित किया गया और माना जा रहा है कि इससे मौजूदा ऑपरेशन संभव हो सका। कुछ ही दिन पहले एक चुनावी रैली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि भारत में अब केवल नक्सलवाद की पूंछ बची है, जो छत्तीसगढ़ में है। मैं वादा करता हूं कि अगर नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने तो तीन साल में नक्सलवाद खत्म कर दूंगा।

गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक नक्सल प्रभावित इलाकों की संख्या 38 है। प्रभावित जिलों की सबसे अधिक संख्या छत्तीसगढ़ में है, छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ इलाके को नक्सलियों का कोर इलाका माना जाता है। पिछले तीन दशकों से यह इलाका सुरक्षाबलों के लिए चुनौती बना हुआ है। जंगलों और पहाड़ों के बीच का यह इलाका नक्सलियों के लिए अभेद्य गढ़ बन गया। इस मुठभेड़ ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि पिछले कई वारदातों में शामिल नक्सलियों का सफाया हो गया है।इसके बाद ओडिशा झारखंड मध्य प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र ,केरल, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश का नंबर आता है। कांकेर में जिस तरीके से सुरक्षाबलों ने ऑपरेशन में तेजी दिखाई है उससे इस बात के साफ संकेत मिलते हैं कि आने वाले वक्त ऐसे और भी ऑपरेशन हो सकते हैं।

क्या बिहार में जीत जातिगत आधारित होगी ?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बिहार में जीत जातिगत आधारित होगी या नहीं! क्या बिहार में इस बार राजनीतिक दल लोकसभा का चुनाव कुछ अलग तरीके से लड़ रहे हैं। आखिर क्यों पुराने समीकरण इस बार नहीं दिखाई पड़ रहे जैसा पहले के चुनावों में दिखता था। बीजेपी की ओर से इस बार बिहार में ऐसा क्या किया गया है कि विपक्षी दल खासकर आरजेडी की ओर से जाति जनगणना पर पहले वाला जोर नहीं दिखाई पड़ रहा। आरजेडी की रणनीति में भी इस बार सिर्फ M और Y समीकरण ही नहीं है। 19 अप्रैल को पहले चरण की वोटिंग है और अब तक हुए चुनाव प्रचार और टिकटों के बंटवारे को देखा जाए तो यह तस्वीर साफ है कि चुनाव भले ही लोकसभा का है लेकिन हर सीट के लिए अलग समीकरण खासकर जातिगत समीकरण। बिहार में इस बार पिछड़ा बनाम अगड़ा के व्यापक ढांचे में जाति वैसे शामिल नहीं है जैसा कि हाल तक बिहार में समझा जाता था। जो पैटर्न दिखाई पड़ रहा है उससे ऐसा लगता है कि एक चुनावी क्षेत्र से दूसरे चुनावी क्षेत्र तक जाते-जाते जाति वाला समीकरण कुछ अलग तरीके से चल रहा है। बिहार में जाति वाले मिथक को तोड़ने का प्रयास बीजेपी की ओर से एक दशक पहले ही शुरू हो गया था। पारंपरिक जातिगत आधिपत्य को तोड़ने की क्षमता का एहसास करने वाली बीजेपी ने एक दशक पहले व्यक्तिगत समूहों तक अपनी पहुंच शुरू की थी। देखा जाए तो बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष और डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी के साथ-साथ बीजेपी के सहयोगी उपेन्द्र कुशवाहा दोनों कुशवाहों का प्रतिनिधित्व करते हैं, तो कुर्मियों को जद (यू) के नीतीश कुमार के माध्यम से एक छतरी के नीचे लाया गया है। एलजेपी (रामविलास) नेता चिराग पासवान के जरिए दुसाध जाति जबकि मुसहरों का प्रतिनिधित्व एनडीए के सहयोगी और बिहार के पूर्व सीएम जीतन राम मांझी कर रहे हैं।

लंबे समय से बिहार में लालू यादव की पार्टी आरजेडी केवल दो समूह मुसलमानों और यादवों के साथ जाती रही है। अब आरजेडी की मजबूरी कहें या उसकी रणनीति जिसके बाद MY समीकरण में बदलाव आया है। बिहार की बदली सियासत को तेजस्वी के इस बयान से भी समझा जा सकता है। तेजस्वी यादव ने कुछ दिनों पहले कहा कि कुछ लोग कहते हैं कि आरजेडी MY(मुस्लिम-यादव ) की पार्टी है। मैं कहता हूं MY के साथ ही आरजेडी BAAP की भी पार्टी है। तेजस्वी यादव ने कहा कि BAAP का अर्थ है B से बहुजन, A से अगड़ा (अगड़ी जाति), A से आधी आबादी (महिला), और P Poor यानी गरीब।

तेजस्वी अब वह कहते हैं कि हम ए टु जेड पार्टी हैं। मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी और मल्लाहों के बीच उसके आधार का इंडिया गठबंधन में प्रवेश एक बोनस है, साथ ही ओबीसी और दलित समर्थन भी है जो राजद की सहयोगी सीपीआई (एमएल) भी है। इन जातीय गणनाओं के बीच चर्चा में आने वाले एकमात्र राष्ट्रीय नेता मोदी हैं। राजद की उम्मीदवार सूची भी उसके नए दृष्टिकोण को दर्शाती है, जिसमें जाति समूहों के कई नाम शामिल हैं जिन पर भाजपा की नजर है। उदाहरण के लिए, पार्टी जिन 23 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, उनमें से चार पर कुशवाहा जाति के उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। पहले चरण में राजद के कुशवाहा उम्मीदवार औरंगाबाद में अभय कुमार कुशवाहा और नवादा में श्रवण कुशवाहा हैं। गया से, एक आरक्षित सीट पर राजद ने कुमार सर्वजीत पासवान को मैदान में उतारा है, इस उम्मीद में कि वह कुछ पासवान वोटों को आरजेडी की ओर खीचेंगे और इसे एमवाई समीकरण में जोड़ देंगे। मांझी गया से पिछले तीन लोकसभा चुनाव हारे हैं। इस बार, उन्हें उम्मीद है कि वे भाजपा के पारंपरिक उच्च जाति के वोटों के साथ-साथ अपने मुसहर वोटों और पासवान वोटों का एक बड़ा हिस्सा भी जोड़ लेंगे।

माना जाता है कि गया में पासवान और मुसहर दलितों के दो सबसे बड़े समूह हैं, जिनकी लगभग 30% आबादी है। बिहार की चौथी सीट औरंगाबाद में 19 अप्रैल को मतदान है, जहां आरजेडी ने लड़ाई को दिलचस्प बना दिया है। पहले बीजेपी के लिए आसान सीट के रूप में इसे देखा जा रहा था, उसने अपने तीन बार के सांसद सुशील कुमार सिंह को उतारा है। सुशील सिंह जो कि एक राजपूत हैं वहीं राजद से अभय कुमार कुशवाह हैं। यादवों के अलावा कुशवाहों की भी महत्वपूर्ण उपस्थिति है, हालांकि राजपूत वोटर्स की संख्या अधिक है। पहले चरण के साथ शुरू यह लड़ाई आगे के चरणों में और दिलचस्प होगी।

आखिर उत्तर प्रदेश की किन सीटों के सहारे जीत रहे हैं अखिलेश यादव?

आज हम आपको बताएंगे कि अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश की किन सीटों के सहारे जीत रहे हैं! लोकसभा चुनाव का पहला चरण 19 अप्रैल को है। वेस्‍ट यूपी की आठ सीटों पर इस दिन मतदान होगा। सात चरणों में होने वाले लोकसभा चुनाव का रिजल्‍ट 4 जून को आएगा। एक तरफ जहां अपने प्रत्‍याशियों के चयन में बीजेपी काफी स्‍पष्‍ट नजर आ रही है, वहीं सपा और बसपा में ऊहापोह की स्थिति है। अखिलेश यादव और मायावती अब तक कई बार अपने घोषित प्रत्‍याशियों का टिकट काट चुके हैं। उनकी जगह पर नए प्रत्‍याशियों के नाम का ऐलान किया गया है। इन दोनों दलों को जिताऊ प्रत्‍याशी ढूंढने में भी काफी मशक्‍कत करनी पड़ रही है। हम आपको यूपी की उन सात लोकसभा सीटों के बारे में बताएंगे जहां सपा ने बसपा से आए नेताओं को अपना खेवनहार बनाया है। सपा को इन जिलों में पार्टी का कोई ऐसा नेता नहीं मिला जिस पर शीर्ष नेतृत्‍व भरोसा जता सके। सबसे पहले गाजीपुर लोकसभा सीट की बात करते हैं। माफिया मुख्‍तार अंसारी के बड़े भाई अफजाल अंसारी 2019 में यहां से बसपा के टिकट से जीतकर सांसद बने थे। 2024 लोकसभा चुनाव में वह सपा के पाले में आ गए हैं। सपा ने उनको यहां से अपना उम्‍मीदवार घोषित कर दिया है। गाजीपुर की राजनीति के धुरी के केंद्र माने जाने वाले अफजाल अंसारी को टिकट देकर सपा ने बीजेपी के सामने कड़ी चुनौती पेश की है। अफजाल अंसारी अब तक 10 बार चुनाव लड़ चुके हैं जिसमें से सात बार जीत चुके हैं। वह पांच बार के विधायक और दो बार सांसद रह चुके हैं। 2019 में बसपा के टिकट से चुनाव मैदान में उतरे अफजाल अंसारी ने तत्‍कालीन रेल राज्‍यमंत्री मनोज सिन्‍हा को हराकर खलबली मचा दी थी।

श्रावस्‍ती लोकसभा सीट के निवर्तमान सांसद राम शिरोमणि वर्मा 2019 चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन के तहत बसपा के प्रत्‍याशी थे। उन्‍होंने बीजेपी उम्‍मीदवार और तत्‍कालीन सांसद दद्दन मिश्रा को भारी मतों से हराया था। गत 23 मार्च को बसपा ने राम शिरोमणि वर्मा और उनके भाई राम सुरेश वर्मा को निष्‍कासित कर दिया था। दोनों नेताओं के ऊपर बसपा ने अनुशासनहीनता का आरोप लगा यह कार्रवाई की थी। बसपा से निकाले जाने के बाद राम शिरोमणि वर्मा सपा के पाले में आ गए। अब अखिलेश यादव ने उन पर भरोसा जताया है।

सपा ने इस बार डुमरियागंज सीट से बाहुबली हरिशंकर तिवारी के बड़े बेटे भीष्‍म शंकर उर्फ कुशल तिवारी पर दांव खेला है। भीष्‍म शंकर तिवारी 2009 लोकसभा चुनाव में बसपा के टिकट पर जीतकर संसद पहुंच चुके हैं। तिवारी ने बीजेपी के शरद त्रिपाठी को करीब 30 हजार मतों से हराया था। 2014 के लोकसभा चुनाव में शरद त्रिपाठी ने हार का बदला लेते हुए भीष्‍म शंकर तिवारी को हरा दिया था। 2024 लोकसभा चुनाव में भीष्‍म शंकर तिवारी सपा के टिकट से मैदान में हैं। करीब 35 सालों से सियासत में सक्रिय लालजी वर्मा की मतदाताओं पर मजबूत पकड़ मानी जाती है। 2007 में बसपा के प्रदेश अध्‍यक्ष रहे लालजी वर्मा को अंबेडकरनगर से अपना प्रत्‍याशी बनाकर अखिलेश यादव ने पूर्वांचल में पीडीए समीकरण साधने का प्रयास किया है। पहली बार 1997 में लालजी वर्मा जेल राज्‍यमंत्री बने। 2002 में बसपा और बीजेपी की गठबंधन सरकार में भी वह मंत्री रहे। 2022 विधानसभा चुनाव से पहले लालजी वर्मा अपने मित्र राम अचल राजभर के साथ सपा में शामिल हुए थे।

मायावती सरकार में मंत्री रहे बाबू सिंह कुशवाहा अब टीम अखिलेश का अहम हिस्‍सा हैं। राष्‍ट्रीय ग्रामीण स्‍वास्‍थ्‍य मिशन घोटाले में वह लंबे समय तक जेल में भी रह चुके हैं। 2011 में बाबू सिंह कुशवाहा ने बसपा से बगावत कर दी थी। इसके बाद बसपा ने उन्‍हें बाहर का रास्‍ता दिखा दिया। एक समय था जब मायावती सरकार में बाबू सिंह कुशवाहा की तूती बोला करती थी। 1997 में पहली बार बसपा ने उन्‍हें विधान परिष्‍ज्ञद सदस्‍य बनाया। 2003 में जब बसपा की सरकार बनी तो कुशवाहा को पंचायती राज मंत्री बनाया गया। 2016 में कुशवाहा ने अपनी जन अधिकारी पार्टी भी बनाई थी। 2014 में बाबू सिंह कुशवाहा की पत्‍नी शिवकन्‍या सपा के टिकट से गाजीपुर से चुनाव लड़ी थीं पर उन्‍हें मनोज सिन्‍हा ने 32 हजार वोटों से हरा दिया था।

बसपा सरकार में दो बार मंत्री रह चुके आरके चौधरी को सपा ने मोहनलालगंज लोकसभा सीट से टिकट दिया है। फैजाबाद में जन्मे आरके चौधरी ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत बहुजन समाज पार्टी से की थी। वह इसके संस्थापक सदस्य भी थे। इसके साथ ही वो कांशीराम के बेहद करीबी भी रहे हैं। वह मोहनलाल गंज सीट से 3 बार लोकसभा चुनाव में अपनी किस्मत अपना चुके हैं। हालांकि, तीनों बार उन्होंने हार का मुंह देखना पड़ा। 2019 में वह मायावती के साथ मनमुटाव के चलते कांग्रेस में शामिल हो गए और लोकसभा चुनाव लड़ा। इसके बाद उन्होंने अखिलेश यादव की साइकिल पर सवार होने का फैसला किया और समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए।

सपा ने सलेमपुर सीट से पूर्व सांसद और पार्टी के राष्‍ट्रीय महासचिव रहे वरिष्‍ठ नेता रमाशंकर राजभर को अपना प्रत्‍याशी बनाया है। राजभर 2009 में बसपा से सांसद चुने गए थे। 2017 में वह बसपा छोड़कर सपा में शामिल हो गए थे। 2009 में राजभर ने तत्‍कालीन सांसद हरिकेवल प्रसाद को हराया था। इससे पहले 2004 के चुनाव में भी रमाशंकर राजभर बसपा के टिकट से सलेमपुर में चुनाव लड़े थे पर बीजेपी के हरिकेवल प्रसाद ने उन्‍हें हरा दिया था। 2024 के चुनाव में रमाशंकर राजभर का मुकाबला हरिकेवल प्रसाद के पुत्र और वर्तमान बीजेपी सांसद रविंद्र कुशवाहा से है।

क्या उत्तर प्रदेश की रियासतें इस बार चुनाव से दूर हैं?

उत्तर प्रदेश की रियासतें इस बार चुनाव से दूरी बनाए हुए हैं! राजनीतिक दल इस लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के पूर्व राजघरानों के सदस्यों को उन सीट से मैदान में उतारने में कम रुचि दिखा रहे हैं, जहां पहले उनका प्रभाव था। अमेठी के पूर्व राजा संजय सिंह, पडरौना (कुशीनगर) के कुंवर आरपीएन सिंह, प्रतापगढ़ के कालाकांकर की पूर्व राजकुमारी रत्ना सिंह और जामो (अमेठी) के कुंवर अक्षय प्रताप सिंह ‘गोपाल जी’ चुनावी समर में नहीं हैं। इसी तरह पूर्व विधायक एवं भदावर (आगरा) के पूर्व राजा महेन्द्र अरिदमन सिंह और रामपुर की बेगम नूरबानो और नवाब काज़िम अली भी चुनावी रण में नहीं हैं। ऐसे में उनके किलों में भी वैसी रंगत नहीं है, जैसी उनके उम्मीदवार होने पर दिखती रही है।सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक कौशल कुमार शाही ने बताया कि कई पूर्व राजाओं और राजकुमारों ने अपनी रियासतों के विलय के बाद राजनीति में कदम रखा। उन्होंने कहा,’लेकिन इस चुनाव में कई पूर्व राजाओं को चुनाव लड़ने का मौका न मिलने से उनके किलों की रौनक फीकी लग रही है।’ कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए ‘अमेठी रियासत’ के पूर्व राजा और पूर्व केंद्रीय मंत्री संजय सिंह इस बार चुनाव मैदान में नहीं हैं। उनके एक करीबी ने बताया,’महाराज संजय सिंह को इस बार उम्मीद थी कि उन्हें सुलतानपुर में भाजपा उम्मीदवार बनाएगी, लेकिन पार्टी ने मेनका गांधी को फिर से प्रत्याशी घोषित कर दिया।”पूर्व राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने 1998 में भाजपा के टिकट पर अमेठी संसदीय सीट से चुनाव जीता था और 2009 में कांग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर सुलतानपुर से सांसद बने थे। संजय सिंह 2019 में कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर सुलतानपुर में मेनका गांधी से चुनाव हार गये थे! 

प्रतापगढ़ जिले के कालाकांकर रियासत की पूर्व राजकुमारी एवं पूर्व सांसद रत्ना सिंह के लिए चुनाव लड़ने की संभावना खत्म हो गयी है, क्योंकि भाजपा ने यहां अपने मौजूदा सांसद संगम लाल गुप्ता को फिर उम्मीदवार बनाया है। रत्ना सिंह कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुई थी। प्रतापगढ़ में 2019 में कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर तीसरे स्थान पर रहीं रत्ना सिंह ने यहां से 1996, 1999 और 2009 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीता था, लेकिन 2014 में अपना दल (एस) के कुंवर हरिवंश सिंह और 2019 में संगम लाल गुप्ता से पराजित हो गई थीं। वह कुछ वर्ष पहले भाजपा में शामिल हो गयीं। उधर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रामपुर लोकसभा क्षेत्र की पूर्व सांसद और भूतपूर्व नवाब परिवार की बेगम नूर बानो 84 साल की उम्र में भी विपक्षी दलों के समूह ‘इंडिया’ गठबंधन’ की प्रमुख घटक कांग्रेस से टिकट की दावेदार थीं। लेकिन सीट बंटवारे में यह सीट सपा के हिस्से में जाने से उनकी दावेदारी खत्म हो गयी।

कांग्रेस से निकाले गए उनके पुत्र नवाब काज़िम अली भी इस बार चुनावी समर से दूर हैं जबकि सत्तारूढ़ भाजपा की सहयोगी अपना दल (एस) के नेता और काज़िम के पुत्र नवाब हैदर अली खां ‘हमजा मियां’ भी मौका नहीं पा सके। 2014 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले काज़िम अली रामपुर में तीसरे स्थान पर रहे थे। राजनीतिक टिप्पणीकार राजीव तिवारी ने को बताया कि भाजपा ने ज्यादातर अपने पुराने उम्मीदवारों और सांसदों पर ही दांव लगाया है जबकि कांग्रेस के साथ गठबंधन में सपा को अधिक सीटें मिलने के कारण, कांग्रेस के साथ रहने वाले पूर्व राजघरानों के सदस्यों को टिकट नहीं मिल पाया है।

आगरा के भदावर राजघराने के अरिदमन सिंह बाह विधानसभा सीट से छह बार के पूर्व विधायक हैं और प्रदेश सरकार में मंत्री भी रहे हैं। उन्होंने 2009 का लोकसभा चुनाव भाजपा उम्मीदवार के रूप में लड़ा लेकिन हार गए। उनकी पत्नी रानी पक्षालिका सिंह अभी भी बाह से भाजपा की विधायक हैं, लेकिन उन्होंने 2009 में फतेहपुर सीकरी की लोकसभा सीट पर भाजपा उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा लेकिन तीसरे स्थान पर रहीं। पक्षालिका सिंह 2014 का लोकसभा चुनाव सपा के टिकट पर फतेहपुर-सीकरी सीट से हार गईं थी। प्रतापगढ़ के राजा अजीत प्रताप सिंह और मांडा के भूतपूर्व राजघराने के सदस्य एवं पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के वंशज अब राजनीति में सक्रिय नहीं हैं। बता दें कि पूर्व राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने 1998 में भाजपा के टिकट पर अमेठी संसदीय सीट से चुनाव जीता था और 2009 में कांग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर सुलतानपुर से सांसद बने थे। संजय सिंह 2019 में कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर सुलतानपुर में मेनका गांधी से चुनाव हार गये थे!  राजा अजीत प्रताप सिंह ने 1962 और 1980 में प्रतापगढ़ से लोकसभा चुनाव जीता। उनके बेटे अभय प्रताप सिंह ने 1991 में सीट जीती लेकिन पोते अनिल प्रताप सिंह कई प्रयासों के बावजूद असफल रहे।

आखिर क्यों हो रही है इजराइल और ईरान में लड़ाई?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इजराइल और ईरान में लड़ाई क्यों हो रही है! नूरा कुश्ती फारसी मूल का एक टर्म है। यह गंगा के मैदानों में व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता है। फारस आज का ईरान है। मोटे तौर पर नूरा कुश्ती का मतलब ‘आपसी रजामंदी से की लड़ाई या लड़ने का दिखावा करना’ है। नूरा कुश्ती में शामिल पक्ष एक-दूसरे से अंदर ही अंदर मिले होते हैं लेकिन दर्शकों को भ्रम होता है कि उठा-पटक के सारे दांव-पेच सही हैं। अब जब ईरान ने इजरायल पर सैकड़ों ड्रोन और मिसाइल हमले किए तो दुनियाभर के फाइनैंशल मार्केट प्रार्थना कर रहे हैं कि पश्चिम एशिया में बड़ा उथल-पुथल न मचे और यह विभिन्न पक्षों के बीच नूरा कुश्ती ही हो। हमले के बाद अब तक की गतिविधियों से लग भी रहा है कि यह नूरा कुश्ती हो सकती है। शायद यही कारण है कि हमले के बाद सोमवार को तेल की कीमतों में गिरावट आ गई है। ईरान ने दुनिया के कई देशों को बता दिया था कि वह इजरायल पर हमला करने वाला है। आखिर भारत सहित कई देशों ने हमले के ठीक पहले इजरायल की यात्रा को लेकर एडवाइजरी जारी कर दी थी। हमले की पहले से इतनी पक्की जानकारी मिल गई थी कि इजरायल अपने स्कूल-कॉलेज आदि को बंद कर दिया था। शनिवार की रात जब हमले हुए तो न केवल इजरायल का एयर डिफेंस सिस्टम तैयार था, बल्कि क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी, ब्रिटिश और फ्रांसीसी सेनाओं के साथ उसका समन्वय भी था। इतना ही नहीं, सऊदी अरब और जॉर्डन की हवाई सुरक्षा भी इजरायल के लिए उपलब्ध थी।

यह मॉडल नया नहीं है। इस साल की शुरुआत में ईरान और पाकिस्तान के बीच भी इसी तरह की झड़प हुई थी। बलूचिस्तान में कथित आतंकी शिविरों पर ईरानी मिसाइल हमलों के जवाब में पाकिस्तान ने ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान क्षेत्र में ठिकानों पर बमबारी की। दोनों पक्षों ने तुरंत ही जवाबी हमले को पीछे छोड़ते हुए तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक बातचीत शुरू कर दी।

दुनिया बमुश्किल यूक्रेन और गाजा के दो युद्ध क्षेत्रों के प्रति खुद को सहज कर पाई। ऐसे में अगर ईरान-इजरायल के युद्ध से पश्चिम एशिया में नया बवाल खड़ा हुआ तो दुनिया निश्चित रूप से चिंतित होगी। यह चिंता फाइनैंशल मार्केट्स में दिखने भी लगी है। शुक्रवार को ईरानी हमलों की आशंका में जोखिम वाली संपत्तियों, शेयरों और क्रिप्टो करेंसियों में गिरावट आई, जबकि सोना और अमेरिकी डॉलर जैसी सुरक्षित संपत्तियों के भाव बढ़े। बड़े संघर्ष का वित्तीय बाजार पर निश्चित रूप से व्यापक असर हो सकता है, जिसमें तेल की कीमतों में उछाल सबसे ज्यादा प्रभावी हो सकती है। दुनियाभर को होने वाली ऑइल सप्लाई में पश्चिम एशिया का योगदान लगभग एक तिहाई है। इसमें रूस से होने वाली आपूर्ति का 15-20% हिस्सा भी जोड़ दें, जिसे पश्चिमी देशों से थोपे गए प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है। कोई आश्चर्य नहीं कि पिछले कुछ हफ्तों से तेल की कीमतें 90 डॉलर से ऊपर चल रही हैं।

वैश्विक स्तर पर मंहगाई नियंत्रण में आ गई है, भले ही केंद्रीय बैंकों की उम्मीद से धीमी गति से। तेल की ऊंची कीमतें इस प्रवृत्ति को और भी धीमा कर सकती हैं। यह वास्तव में संबंधित वेरियेबल्स, वैश्विक ब्याज दरों को बिगाड़ सकती है। जोखिम वाले एसेट्स, खास तौर पर इक्विटी, सालभर की तेजी के मध्य में हैं, जो कम से कम आंशिक रूप से नीतिगत दरों में कटौती की उम्मीदों पर आधारित है। खास तौर पर यूएस फेड से इंट्रेस्ट रेट में कटौती की काफी उम्मीद है। ब्याज दरों के घटने की इन उम्मीदों पर पानी फिरा तो रिस्क वाले ऐसेट्स के मौजूदा वैल्युएशनल लेवल्स पर सवाल उठेंगे। इसका खास असर इक्विटी पर देखने को मिलेगा।

दूसरा प्रतिकूल कारक ग्लोबल सप्लाई चेन पर पड़ने वाला प्रभाव है। अदन की खाड़ी/लाल सागर/अरब सागर के रूट पर हूती समुद्री लुटेरों से निपटने का भी टेंशन बना हुआ है। इससे दुनिया के सामूहिक नौसैनिक संसाधनों पर दबाव पड़ा है, अकेले भारतीय नौसेना ने इस प्रयास में एक दर्जन जहाज तैनात किए हैं।

क्षेत्र के दो बड़े देशों के बीच पूरा-पूरा युद्ध की नौबत से सप्लाई चेन बुरी तरह से बाधित होंगी, लागतें बढ़ेंगी और निश्चित रूप से वैश्विक महंगाई बढ़ेगी। ईरान ने बड़ा कदम उठाते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने का फैसला किया तो इसका विनाशकारी परिणाम होगा। तेल की कीमतों में वृद्धि भारतीय अर्थव्यवस्था में आई खुशहाली को प्रभावित कर सकती है। तेल की ऊंची कीमतों से व्यापार घाटा बढ़ता है, मुद्रास्फीति बढ़ती है, रुपये पर दबाव बढ़ता है, विदेशी निवेश प्रवाह कम होता है और राजकोष पर दबाव पड़ता है। तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर की वृद्धि से भारत के चालू खाता घाटे में लगभग 0.5% की वृद्धि होती है। खपत पहले से ही कमजोर है, इसलिए इसका अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े आधार निवेश, विशेष रूप से सार्वजनिक निवेश पर महत्वपूर्ण नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

अच्छी खबर यह है कि अतीत में भारत के कैपिटल मार्केट्स ने तेल की कीमतों पर लगने वाले झटकों के प्रति काफी लचीलापन दिखाया है। 2006 में लेबनान युद्ध (इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच) से लेकर 2012 में इजरायल के ऑपरेशन पिलर ऑफ डिफेंस (गाजा में) और 2014 में उसी थिएटर में एक और ऑपरेशन तक, जब तेल की कीमतें बढ़ीं तो भारतीय बाजारों पर कोई खास असर नहीं पड़ा।

क्या उत्तर प्रदेश के पहले चरण में जीत पाएगी एनडीए?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि उत्तर प्रदेश के पहले चरण में एनडीए जीत पाएगी या नहीं! उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर राजनीति गरमाई हुई है। लोकसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान 19 अप्रैल को है। 17 अप्रैल की शाम को चुनावी प्रचार अभियान का शोर थम जाएगा। इससे पहले तमाम राजनीतिक दल अपनी बात जनता तक पहुंचने में जुटे हुए हैं। हर कोई जनता को रिझाने में जुटा हुआ है। मिशन-80 के दावे के साथ प्रदेश के चुनावी मैदान में उतरी भारतीय जनता पार्टी के लिए पहला चरण सबसे महत्वपूर्ण होने वाला है। दरअसल, उत्तर प्रदेश की जिन आठ लोकसभा सीटों पर 19 अप्रैल को मतदान होना है, पिछले चुनाव के दौरान पांच सीटों पर भारतीय जनता पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था। ऐसे में पार्टी ने इस चरण में पूरा जोर लगाया है। पीएम नरेंद्र मोदी स्वयं चुनावी मैदान में उतरे हैं। भाजपा के लिए यह चरण कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा पीएम नरेंद्र मोदी की रैलियों से देखा जा सकता है। पीएम नरेंद्र मोदी ने अब तक पश्चिमी यूपी को साधने के लिए चार कार्यक्रमों में भाग लिया है। मेरठ से चुनावी रैली की शुरुआत करने के बाद पीएम मोदी सहारनपुर और पीलीभीत में जनसभा को संबोधित कर चुके हैं। वहीं, गाजियाबाद में रोड शो के जरिए उन्होंने पश्चिमी यूपी से खुद को जोड़ने की कोशिश की है। वहीं, अखिलेश यादव ने यूपी में अपने चुनावी अभियान का आगाज पीलीभीत से किया। वहीं, मायावती ने भी पश्चिमी यूपी में रैलियों के जरिए बसपा के अभियान को गति देने का प्रयास किया है। माना जा रहा है कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव बुधवार को सहारनपुर में रोड शो के जरिए पहले चरण के प्रचार अभियान का समापन एक इम्पैक्ट के साथ छोड़ने का प्रयास करेंगे। पश्चिमी यूपी की आठ सीटों पर पहले चरण के चुनाव को लेकर पूरा जोर लगाया है। भाजपा इस बार राष्ट्रीय लोक दल के साथ चुनावी मैदान में उतरी है। पीएम मोदी के चेहरे के साथ दावा इस बार पिछले चुनाव के रिजल्ट को पूरी तरह से ढकने का है। पीएम नरेंद्र मोदी के साथ-साथ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्‌डा, सीएम योगी आदित्यनाथ, यूपी भाजपा अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी लगातार चुनावी रैलियों को संबोधित कर रहे हैं। इनके अलावा विपक्षी गठबंधन की रणनीति को मात देने के लिए आरएलडी अध्यक्ष जयंत चौधरी भी लगातार रैलियों को संबोधित कर रहे हैं। क्षेत्रों में घूमकर एनडीए की जीत का गणित तैयार करने में जुटे हैं।

विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. के बैनर तले सपा और कांग्रेस कैंडिडेट की कोशिश लगातार भाजपा को पछारने की है। अखिलेश यादव की ओर से लगातार माहौल बनाया जा रहा है। वहीं, मायावती भी पश्चिमी यूपी को मथ रही हैं। उनके भतीजे और बसपा में उनके उत्तराधिकारी आकाश आनंद भी लगातार रैलियों के जरिए खोए जनाधार को जुटाने की कोशिश में हैं।

सहारनपुर लोकसभा सीट पर त्रिकोणीय मुकाबले के आसार जताए जा रहे हैं। नक्कशीदार लकड़ी के लिए मशहूर सहारनपुर से किसकी किसकी किस्मत को नक्काशीदार यहां के मतदाता बनाएंगे, यह 19 अप्रैल को तय होगा। भाजपा ने लोकसभा सीट से पूर्व सांसद राघव लखनपाल को एक बार फिर उम्मीदवार बनाया है। राघव ने 2014 में सहारनपुर लोकसभा सीट से जीत दर्ज की थी। हालांकि, 2019 में यह सीट सपा-बसपा गठबंधन के तहत बसपा के पाले में गई। बसपा के फजलुर्हमान ने इस सीट से जीत दर्ज की। इस बार, विपक्षी गठबंधन के तहत यह सीट कांग्रेस के खाते में गई है। कांग्रेस ने यहां से इमरान मसूद को मैदान में उतारा है। इमरान मसूद ने पीएम मोदी को लेकर बोटी-बोटी वाले बयान से सुर्खियां बटोरी। वे राघव को कड़ी टक्कर देते दिख रहे हैं।

बसपा ने यहां से माजिद अली को टिकट दिया है। मुस्लिम कैंडिडेट के जरिए बसपा ने इमरान मसूद की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। वहीं, भाजपा की ओर से केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव को सहारनपुर, बिजनौर और नगीना जैसी सीटों के लिए रणनीति तैयार करने की जिम्मेदारी दी थी। बसपा के कैंडिडेट ने चुनावी मुकाबला दिलचस्प बना दिया है। भाजपा-कांग्रेस की जंग में क्या बसपा बाजी मारेगी? या फिर कांग्रेस-बसपा उम्मीदवारों के बीच बंटते विपक्षी वोट भाजपा की जीत की राह बनाएंगे? समीकरण इसी समीकरण के आसपास घूम रहा है।

मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट पर इस बार ठाकुरों की नाराजगी सत्ताधारी भाजपा के लिए चुनौती बन सकती है। भाजपा के डॉ. संजीव बालियान यहां पर वर्ष 2014 से सांसद है। 2019 के लोकसभा चुनाव में काफी कम अंतर से जीत दर्ज करने में कामयाब हुए थे। इस चुनाव में सपा-बसपा और रालोद ने भाजपा के सामने कड़ी चुनौती पेश की थी। इस बार जयंत चौधरी भाजपा के साथ हैं। डॉ. संजीव बालियान एक बार फिर चुनावी मैदान में हैं। उनके सामने चुनावी मैदान में उतरे सपा कैंडिडेट हरेंद्र मलिक मुस्लिम, जाट और बालियान से नाराज वोटरों को साधने में जुटे हैं। हरेंद्र मलिक पिछली बार कांग्रेस के टिकट पर चुनावी मैदान में उतरे थे। बसपा ने यहां से दारा सिंह प्रजापति को चुनावी मैदान में उतार दिया है। मायावती की इस रणनीति ने दलित वोटरों को साधने की कोशिश की है। ऐसे में मुश्किलें डॉ. संजीव बालियान की बढ़ती दिख रही है।

मुरादाबाद लोकसभा सीट पर इस बार हसन फैक्टर काम कर सकता है। दरअसल, सपा ने डॉ. एसटी हसन का टिकट काट दिया। डॉ. हसन ने लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा के सर्वेश सिंह से सीट छीनी थी। अखिलेश यादव ने आखिरी वक्त में टिकट काटकर बिजनौर से पूर्व विधायक रुचि वीरा को चुनावी मैदान में उतार दिया। इसके बाद डॉ. हसन की नाराजगी भी सामने आई है। वहीं, भाजपा ने एक बार फिर सर्वेश सिंह को चुनावी मैदान में उतारा। रुचि वीरा को आजम खान की करीबी के तौर पर देखा जाता है। बसपा ने यहां से इरफान सैफी को चुनावी मैदान में उतार कर मुस्लिम वोट बैंक को साध्सने की कोशिश की है। ऐसे में सपा उम्मीदवार की चुनौती बढ़ती दिख रही है।

रामपुर में होने वाले चुनावों में पिछले तीन दशकों में आजम फैक्टर हावी दिखता था, लेकिन इस बार चुनाव से वह अलग हैं। पिछली बार उन्होंने इस सीट पर जीत दर्ज की थी। लेकिन, कोर्ट से सजा के ऐलान के बाद उनकी सांसदी और विधायिकी चली गई। अभी भी वे जेल में बंद हैं। रामपुर सीट पर भाजपा ने एक बार फिर घनश्याम सिंह लोधी पर दांव लगाया है। घनश्याम लोधी ने लोकसभा उप चुनाव 2022 में जीत दर्ज की थी। आजम खान की नाराजगी के बाद भी अखिलेश ने रामपुर सीट पर मौलाना मोहिबुल्लाह नदवी को उम्मीदवार बना दिया। इसके बाद सपा में आजम बनाम अखिलेश यादव दो फाड़ होते दिख रहे हैं। 19 अप्रैल को होनेवाले मतदान पर इसका असर दिख सकता है। वहीं, बसपा कैंडिडेट जीशान खान अपनी अलग उम्मीदों के साथ चुनावी मैदान में हैं। 52 फीसदी मुस्लिम मतदाता वाली इस लोकसभा सीट पर अखिलेश से नाराज मुस्लिम समाज का साथ मिलने की उम्मीद बसपा प्रत्याशी को है।