Friday, March 6, 2026
Home Blog Page 672

जानिए फणीश्वरनाथ रेणु की अद्भुत कहानी!

आज हम आपको फणीश्वरनाथ रेणु की अद्भुत कहानी बताने जा रहे हैं! विश्व प्रसिद्ध आंचलिक साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु की पुण्यतिथि। आज के ही दिन 1977 में लंबी बीमारी से लड़ते हुए उनकी मौत हुई थी। चुनाव का समय है और कलम के धनी फणीश्वरनाथ रेणु की पुण्यतिथि भी। अपनी कालजई रचनाओं के जरिए हिन्दी साहित्य में अमिट छाप छोड़ने वाले फणीश्वरनाथ रेणु चुनावी समर में भी ताल ठोका था। हालांकि चुनावी समर लोकसभा नहीं बल्कि, विधानसभा का था। लेकिन चुनाव का अनुभव उनका काफी खट्टा रहा। 70 के दशक में बिहार विधानसभा चुनाव में छल-प्रपंच और अपनो से मिले धोखे के कारण उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा था। कहते हैं रेणु ने अपनी लेखनी से कथा के पात्र के माध्यम से तीन कसमें खाए थे, लेकिन अपनी वर्तमान जिंदगी में भी एक कसम खाई थी और वह थी चुनाव न लड़ने की कसम। कहा जाता है चुनाव न लड़ने की कसम रेणु की चौथी कसम थी।

रेणु की एक कहानी थी, मारे गए गुलफाम। जिस पर बनी थी तीसरी कसम फिल्म। फिल्म के पात्र हीरामन के रूप में राज कपूर और हीराबाई के रूप में वहीदा रहमान ने किरदार निभाया था। तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम कहानी का प्रकाशन 1956 में हुआ था। कथा संग्रह ठुमरी में यह कहानी है। करीबन 10 साल बाद 1966 में मारे गए गुलफाम पर फिल्म बनी तीसरी कसम। संवाद लेखन का काम जहां खोद फणीश्वरनाथ रेणु ने किया था। वहीं फिल्म के निदेशक बासु भट्टाचार्य और निर्माता शैलेंद्र थे। फिल्म को 1967 में सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फीचर फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था। इस फिल्म या कथा में पात्र हिरामन तीन कसमें खाता है। वह तीन कसमें थी अपनी बैलगाड़ी पर कभी तस्करी का माल नहीं लादेगा, दूसरी कसम थी अपनी बैलगाड़ी पर बांस की लदनी नहीं करेगा और तीसरी कसम थी वह अपनी बैलगाड़ी पर किसी नौटंकी वाली बाईजी नर्तकी को नहीं बिठायेगा।

फणीश्वरनाथ रेणु ने अपनी लेखनी में ये तीन कसमें तो खाई ही थी। लेकिन जिंदगी खासकर चुनाव में मिले तजुर्बा के आधार पर उन्होंने चौथी कसम खायी थी, कभी चुनाव न लड़ने की। दरअसल, रेणुजी ने अपने मित्रों के कहने पर 1972 में फारबिसगंज विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। रेणु पूरी ताकत के साथ चुनाव लड़े। चुनाव में उन्हें चुनाव चिह्न मिला था नाव छाप। उस समय उनका चुनावी नारा काफी प्रचलित हुआ था। वह और उनके समर्थक नारे लगाते थे- ‘कह दो गांव-गांव में, अबके इस बार वोट देंगे नाव में।’ चुनाव में उनका मुकाबला कांग्रेस के दिग्गज सरयू मिश्रा से था। चुनाव लड़ने के लिए जिन्होंने उकसाया था। वैसे मित्र और शुभचिंतकों ने अंतिम समय में सियासी पाला बदलने में गुरेज नहीं की। चुनावी कैंपेन के दौरान उनपर हमला भी हुआ। फलस्वरूप बिछाए गए चुनावी बिसात में खट्टे अनुभव के साथ चुनाव हार गए। हालांकि उनके बड़े बेटे पदम पराग राय वेणु ने अपने पिता के सपनों को साकार जरूर किया। वह 2010 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीते और पांच साल तक विधायकी की। लेकिन 2015 में भाजपा ने उनका टिकट काट दिया। इसके बाद भाजपा से वह जदयू में चले गए।

दरअसल, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ रेणु परिवार का मधुर संबंध रहा और कहा जाता है कि 2010 के विधानसभा चुनाव में जब भाजपा और जदयू साथ मिलकर चुनाव लड़े तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कहने पर ही भाजपा ने फारबिसगंज विधानसभा से उनको टिकट दिया था। अररिया में रेणु का गांव औराही हिंगना और उनका परिवार सियासत की एक बड़ी कड़ी मानी जाती है। दरअसल, उनकी जाति की संख्या काफी बड़ी है और हिन्दू वोट बैंक की मजबूत धुरी भी। फलस्वरूप मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पांच बार उनके गांव और घर आ चुके हैं। इतना ही नहीं हरेक दल के शीर्षस्थ नेता औराही हिंगना पहुंचकर रेणु और उसकी लेखनी को नजदीक से देखने और समझने के लिए पहुंचते हैं। कह सकते हैं सभी दलों को वर्तमान परिपेक्ष्य में रेणु से मोह है। लेकिन सियासी मैदान में छले रेणु के परिवार वालों को आज भी सियासी छलावा का मलाल है, जो गाहे बगाहे प्रदर्शित होता रहा है।

मनुष्यता को जीवंत रूप प्रदान करने वाले फणीश्वरनाथ रेणु की पहचान मैला आंचल से मिली। दर्जनों रचनाओं का सृजन करने वाले फणीश्वरनाथ रेणु का मन रिपोर्ताज लेखन में ही था। तभी तो 1950 से लेकर 1975 तक वह लगातार सामाजिक विषयों और कुरीतियों को लेकर अलग-अलग रिपोर्ताज लिखते रहे। चुनावी अखाड़े में विफल रेणु साहित्य जगत में सफल रहे और ऐसे विभूति को उनकी पुण्यतिथि पर शत शत नमन।

आखिर क्या है अलग-अलग देश में महिलाओं की राजनीति में अंतर?

आज हम आपको अलग-अलग देश में महिलाओं की राजनीति में अंतर बताने जा रहे हैं! भारत का पहला चुनाव 1950 के दशक के विश्व के सबसे चुनौतीपूर्ण प्रशासनिक कार्यों में से एक था। इसके अभूतपूर्व पैमाने और प्रचलित सामाजिक परिस्थितियों ने कई समस्याएं पैदा कीं। आपको यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि लगभग 28 लाख महिलाओं के नाम, जिनमें से अधिकांश हिंदी पट्टी में थीं, को मतदाता सूची से हटा दिया गया था क्योंकि वे पुरुषों से अपने संबंध से पहचानी जाना चाहती थीं- फलां की मां, चिलां की पत्नी, उनकी की बेटी आदि। वर्षों से मतदाताओं और प्रतिनिधियों के रूप में चुनावों में भारतीय महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, लेकिन प्रगति इतनी धीमी है कि आज भी भारत अधिकांश प्रमुख देशों से बहुत पीछे है। 1962 से मतदाताओं, उम्मीदवारों और सांसदों के लिए निरंतर लैंगिक आंकड़े उपलब्ध हो रहे हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि महिला मतदाताओं की संख्या में घोड़े की रफ्तार से वृद्धि हुई है, लेकिन उम्मीदवारों और सांसदों के रूप में उनका अनुपात घोंघे की गति से बढ़ा है। चुनाव आयोग और पार्टियों के प्रयासों से महिला मतदाताओं की हिस्सेदारी 1962 में 42% से बढ़कर 2019 में 48.2% हो गई, जो लगभग जनसंख्या में उनकी हिस्सेदारी के बराबर है। लेकिन उम्मीदवारों के बीच महिलाओं की हिस्सेदारी इसी अवधि में केवल 3.2% से बढ़कर 9% हुई। 2019 में 14% महिलाएं सांसद थीं जबकि उनकी कम-से-कम 33% हिस्सेदारी की उम्मीद की जाती है।

एचडी देवेगौड़ा के नेतृत्व वाली संयुक्त मोर्चा सरकार ने सितंबर 1996 में संसद में आरक्षण के लिए एक संविधान संशोधन विधेयक पेश किया था। फिर भी 1996 से 2019 तक हुए सात चुनावों में किसी भी बड़ी राष्ट्रीय पार्टी ने महिलाओं को 10% से ज्यादा टिकट नहीं दिए। हालांकि, कुछ दूसरी पार्टियों ने कुछ चुनावों में महिलाओं को 10% से अधिक टिकट दिए। औसत निकालें तो कांग्रेस पार्टी महिलाओं को कम से कम 10 में से 1 टिकट देती है, जबकि बसपा केवल 20 में से 1 टिकट देती है। भाजपा और सीपीआई में प्रत्येक का आंकड़ा 8% है जबकि सीपीएम 9% टिकट महिलाओं को देती है। कुल मिलाकर, इन पांच पार्टियों के उम्मीदवारों में महिलाओं का औसत 8.5% है।

सिर्फ 15 साल पहले 2009 में मध्य प्रदेश, झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान राज्यों में महिलाओं की मतदाताओं में हिस्सेदारी 45% से कम थी। इन राज्यों में महिला मतदाताओं की हिस्सेदारी में सबसे अधिक वृद्धि देखी गई है ताकि देश के बाकी हिस्सों के साथ तालमेल बिठाया जा सके। दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे कुछ राज्यों को छोड़कर अधिकांश राज्यों में महिलाओं की हिस्सेदारी आधी है, जहां के पुरुष रोजगार की तलाश में पलायन करते हैं। 11 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से अधिक है। 52.2% महिला मतदाता के साथ पुदुचेरी इस लिस्ट में टॉप पर है। इसके बाद मिजोरम, मेघालय और मणिपुर आते हैं। बड़े राज्यों में छत्तीसगढ़, तेलंगाना, केरल और तमिलनाडु में भी महिला मतदाता अधिक हैं।

महिला मतदाताओं को तो हर पार्टी लुभाना चाहती है। इसके लिए वो बसों में मुफ्त यात्रा, खाते में सीधे पैसे ट्रांसफर जैसी स्पेशल स्कीम का सहारा लिया जाता है, लेकिन उन्हें शायद ही चुनाव लड़ने का टिकट दिया जाए। दरअसल, छत्तीसगढ़ और त्रिपुरा को छोड़कर बाकी सभी राज्यों में तो विधायकों की संख्या वहां के सांसदों के मुकाबले भी कम है। लेकिन प्रगति इतनी धीमी है कि आज भी भारत अधिकांश प्रमुख देशों से बहुत पीछे है। 1962 से मतदाताओं, उम्मीदवारों और सांसदों के लिए निरंतर लैंगिक आंकड़े उपलब्ध हो रहे हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि महिला मतदाताओं की संख्या में घोड़े की रफ्तार से वृद्धि हुई है, लेकिन उम्मीदवारों और सांसदों के रूप में उनका अनुपात घोंघे की गति से बढ़ा है।वकील और कर्नाटक की पूर्व विधायक रह चुकीं प्रमीला नेगसराई कहती हैं कि पुरुष तो महिलाओं को सिर्फ प्राथमिक विद्यालय की शिक्षिका, नर्स और एयर होस्टेस तक ही देखना चाहते हैं। उन्हें विधायक बनाना भला कौन चाहता है? उन्होंने कहा, ‘जब तक आरक्षण लागू नहीं होगा, कोई बड़ा दल महिलाओं को चुनाव मैदान में नहीं उतारेगा।’

मानव विकास सूचकांक में हाई रैंकिंग वाले देशों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अधिक होता है। उदाहरण के लिए, न्यूजीलैंड में 50% से अधिक महिला सांसद हैं। स्पेन, फ्रांस, जर्मनी, यूके और इटली में भी निचले सदन में प्रत्येक में 30% से अधिक महिला प्रतिनिधि हैं। पुरुष तो महिलाओं को सिर्फ प्राथमिक विद्यालय की शिक्षिका, नर्स और एयर होस्टेस तक ही देखना चाहते हैं। उन्हें विधायक बनाना भला कौन चाहता है? उन्होंने कहा, ‘जब तक आरक्षण लागू नहीं होगा, कोई बड़ा दल महिलाओं को चुनाव मैदान में नहीं उतारेगा।’भारत न केवल इन अमीर देशों से बल्कि अपने पड़ोसियों नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान से भी पीछे है।

जब पूर्व वायुसेना कॉर्पोरल को चढ़ाया गया था संक्रमित खून!

एक समय ऐसा था जब पूर्व वायुसेना कॉर्पोरल को संक्रमित खून चढ़ाया गया था! सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की उस समीक्षा याचिका को खारिज कर दिया जिसमें सेना और वायु सेना को संयुक्त रूप से 1.5 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान करने के फैसले को चुनौती दी गई थी। यह राशि एक पूर्व वायु सेना कॉर्पोरल को दी जानी थी, जिसे 2002 में एक सैन्य अस्पताल में खून चढ़ाने के बाद एचआईवी हो गया था। सरकार ने पिछले साल 26 सितंबर को कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी जिसमें सेना और वायु सेना को सैन्य कर्मियों के लिए हाई सेफ्टी स्टैंडर्ड को सुनिश्चित करने में विफल रहने में मेडिकल लापरवाही का दोषी पाया गया था। 2016 में रिटायर हुए कॉर्पोरल को मुफ्त मेडिकल केयर और विकलांगता पेंशन सहित अन्य सुविधाएं देने का भी फैसला दिया गया था। 3 अप्रैल को, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस पीबी वराले ने आदेश में कहा कि समीक्षा के तहत कोर्ट के निर्णय और आदेश में कोई खामी नहीं है। न ही कोई स्पष्ट त्रुटि है, जिससे इसमें पुनर्विचार की आवश्यकता हो। वायुसेना के उस जवान ने, जिसकी पहचान कोर्ट ने गुप्त रखी है, छह महीने तक मुआवजे का भुगतान न किए जाने के बाद अवमानना याचिका दायर की थी। पिछले महीने, अदालत ने सरकार को निर्देश दिया था कि वह तुरंत उनकी विकलांगता पेंशन, मंथली अस्पताल विजिट के लिए 25,000 रुपये का भत्ता और अतिरिक्त राशि जारी करे।

पीड़ित एयरमैन 1996 में वायुसेना में भर्ती हुए थे और पाकिस्तान के साथ सैन्य कार्रवाई, ऑपरेशन पराक्रम के दौरान जुलाई 2002 में उन्हें सैन्य अस्पताल में दूषित खून चढ़ाया गया था। मुंबई के एक नौसेना अस्पताल में मई 2014 तक उन्हें एचआईवी का पता नहीं चला था। सितंबर में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के मूल फैसले में, जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस दीपांकर दत्ता ने सेना और वायुसेना को मेडिकल लापरवाही के लिए ‘विकृत रूप से उत्तरदायी’ ठहराया था। इसके साथ ही एचआईवी पॉजिटिव जवान को 1.5 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था।

कोर्ट ने ने उस समय वायुसेना को आर्मी से आधी राशि तक की रिम्बर्समेंट लेने की अनुमति दी गई थी (जो उस फील्ड अस्पताल की प्रभारी थी जहां खून चढ़ाया गया था)। 95 करोड़ रुपये की मांग करते हुए राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी। आयोग ने अगस्त 2021 में उसकी याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद उसने अपील की थी।जस्टिस भट ने लिखा कि इस तरह के व्यवहार से हुए नुकसान की भरपाई का कोई भी मुआवजा नहीं कर सकता, जिसने अपीलकर्ता की गरिमा की नींव हिला दी है। उसे सम्मान से वंचित कर दिया है और उसे न केवल हताश कर दिया है, बल्कि निराशावादी भी बना दिया है।

कोर्ट के फैसले में कहा गया कि लोग देशभक्ति के जज्बे और काफी उत्साह के साथ सशस्त्र बलों में शामिल होते हैं। अपनी जान जोखिम में डालने और अपने जीवन के अंतिम बलिदान के लिए तैयार रहते हैं। वायु सेना जवान की पत्नी ने उसकी हालत के कारण उसे छोड़ दिया था। अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद, एयरमैन ने लापरवाही के लिए वायु सेना से 95 करोड़ रुपये की मांग करते हुए राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी। आयोग ने अगस्त 2021 में उसकी याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद उसने अपील की थी।

हाल ही में अवमानना कार्यवाही में, एमिकस क्यूरी वंशजा शुक्ला ने चेतावनी दी थी कि इम्यून सिस्टम हेल्थ का संकेत देने वाले याचिकाकर्ता की सीडी4 काउंट 256 के चिंताजनक स्तर तक गिर गई है। अगर यह 200 से नीचे चली जाती है, तो वह एड्स का मरीज बन जाएगा। समीक्षा के तहत कोर्ट के निर्णय और आदेश में कोई खामी नहीं है। न ही कोई स्पष्ट त्रुटि है, जिससे इसमें पुनर्विचार की आवश्यकता हो। वायुसेना के उस जवान ने, जिसकी पहचान कोर्ट ने गुप्त रखी है, छह महीने तक मुआवजे का भुगतान न किए जाने के बाद अवमानना याचिका दायर की थी। पिछले महीने, अदालत ने सरकार को निर्देश दिया था कि वह तुरंत उनकी विकलांगता पेंशन, मंथली अस्पताल विजिट के लिए 25,000 रुपये का भत्ता और अतिरिक्त राशि जारी करे।वंशजा शुक्ला ने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि केंद्र की ओर से उसे मुआवजा देने में देरी से उसके स्वास्थ्य और जिंदगी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया कि वह शेष मुआवजे को दो सप्ताह के भीतर अपनी रजिस्ट्री में जमा करे। साथ ही ये भी कहा कि वह 16 जुलाई को फैसले के अनुपालन की समीक्षा करेगी।

क्या बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण है पूर्वोत्तर की 25 सीट?

बीजेपी के लिए पूर्वोत्तर की 25 सीट बेहद महत्वपूर्ण है! 2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी की नजर सिर्फ और सिर्फ अपने 400 पार के मिशन पर है। ऐसे में पार्टी देश के हर हिस्से पर खास फोकस कर रही है। चाहे उत्तर भारत हो या साउथ का इलाका या फिर पूर्वोत्तर भारत। बीजेपी हर हिस्से में जमकर प्रचार अभियान चला रही है। ऐसे में बात करें नॉर्थ ईस्ट के आठ राज्यों की तो यहां 25 लोकसभा सीटें हैं जो जनादेश 2024 में अहम रोल निभाती है। ऐसे में उत्तर पूर्व के राज्यों की सियासी पार्टियां तो इस चुनाव को लेकर एक्टिव हैं ही बीजेपी और कांग्रेस भी के लिए भी इन राज्यों में जीत बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। असम के ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और मिजोरम की सत्ताधारी जोरम पीपुल्स मूवमेंट जैसी कुछ ‘न्यूट्रल’ पार्टियों को छोड़कर, पूर्वोत्तर की अधिकांश क्षेत्रीय पार्टियां बीजेपी के नेतृत्व वाले नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस की सदस्य हैं। इसे ऐसे भी कह सकते हैं ये पार्टियां केंद्र में बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा हैं। असम जातीय परिषद और पूर्व कार्यकर्ता अखिल गोगोई की रायजोर दल, कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडी अलायंस का हिस्सा हैं। 2019 लोकसभा चुनाव की स्थिति पर नजर डालें तो उस समय एनडीए ने नॉर्थ ईस्ट के राज्यों में जबरदस्त प्रदर्शन किया था। पार्टी ने 25 में से 19 संसदीय सीटें जीती थीं। एनडीए ने अब देशभर में 400 पार लोकसभा सीट का टारगेट रखा है, इसे पाने के लिए पार्टी को इन क्षेत्रों में और अच्छा प्रदर्शन करना होगा। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के मुताबिक, बीजेपी इस बार पूर्वोत्तर में 22 सीटें छूने का भरोसा है। इस क्षेत्र में 16 लोकसभा सीटों के लिए मतदान पहले चरण यानी 19 अप्रैल को होगा। इसमें अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में विधानसभा चुनाव भी साथ होगा। बाकी नौ संसदीय सीटों पर मतदान, जिसमें सभी असम की हैं, अगले दो चरणों में होने वाला है। बीजेपी को अरुणाचल प्रदेश में बढ़त हासिल है, यहां 60 विधानसभा सीटों में से 10 पहले ही निर्विरोध निर्वाचित हो चुके हैं। बाकी 50 विधानसभा सीटों में से अधिकांश पर उन्हें ही जीतने का भरोसा है।

सत्तारूढ़ सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा के साथ अपने गठबंधन को खत्म करने के बाद, बीजेपी सिक्किम में 32 विधानसभा सीटों और एकमात्र लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ रही है। जैसा कि मेघालय के मुख्यमंत्री और नेशनल पीपुल्स पार्टी एनपीपी के प्रमुख कॉनराड के. संगमा कहते हैं, चुनावी लड़ाई में सहयोगियों और अस्थायी प्रतिद्वंद्वियों का आमने-सामने होना असामान्य नहीं है। उदाहरण के लिए, एनपीपी अरुणाचल प्रदेश में दो लोकसभा सीटों के लिए बीजेपी उम्मीदवारों का समर्थन कर रही है। इनमें केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू भी शामिल हैं। हालांकि, राज्य में 23 विधानसभा सीटों पर ये पार्टी बीजेपी को टक्कर दे रही है।

मेघालय की बात करें तो यहां बीजेपी ने दावा किया कि उसका गठबंधन कांग्रेस से ज्यादा एकजुट है। बीजेपी ने असम में अपने सहयोगियों के साथ लोकसभा सीटों का बंटवारा करते हुए एक उदाहरण के तौर पर रखा है। पार्टी राज्य की 14 में से 11 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। दो सीट असम गण परिषद और एक यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल के लिए छोड़ा है। दूसरी ओर, कांग्रेस असम से 13 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि AJP एक सीट पर चुनाव लड़ रही है। लेफ्ट फ्रंट ने बारपेटा सीट से उम्मीदवार उतारने की अपील को कथित तौर पर नजरअंदाज किए जाने के बाद नाराजगी जताई। वहीं आम आदमी पार्टी ने दो सीटों पर चुनाव लड़ने का प्लान टाल दिया है। इंडी अलायंस में आपसी समझ के साथ पार्टी ने कांग्रेस और AJP कैंडिडेट के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ने का फैसला लिया। एनडीए की ओर से उत्तर पूर्वी राज्यों में क्लीन स्वीप के दावे को कांग्रेस ने खारिज किया है। गौरव गोगोई ने बीजेपी पर सवाल खड़े किए। गौरव गोगोई जोरहाट लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं।

भले ही कांग्रेस को नॉर्थ ईस्ट में अपने अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद हो लेकिन अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा में पार्टी लगभग खत्म हो चुकी है। 2019 में पार्टी ने जिन चार सीटों पर जीत दर्ज की थी, उनमें से तीन असम में हैं जबकि कालियाबोर सीट का अस्तित्व 2023 में परिसीमन के बाद समाप्त हो गया। बारपेटा और नागांव सीटों का आकार और डेमोग्राफी बदल चुकी है। चौथी सीट, मेघालय के शिलांग में, पूर्व केंद्रीय मंत्री विंसेंट एच. पाला के लिए करो या मरो की लड़ाई है, जो सीधे चौथे कार्यकाल पर नजर गड़ाए हुए हैं।

मणिपुर की बात करें तो कांग्रेस राज्य की दो लोकसभा सीटें जीतने को लेकर संघर्ष कर रही है। इनर मणिपुर, जो इम्फाल घाटी के अधिकांश हिस्से को कवर करता है, और बाहरी मणिपुर, जो ट्राइबल हिल्स तक फैला हुआ है। पार्टी को राज्य के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के खिलाफ लोगों के गुस्से को देखते हुए इन सीटों पर जीत की उम्मीद जग रही। हालांकि, बीजेपी की सहयोगी नागा पीपुल्स फ्रंट बाहरी मणिपुर को जीतने के लिए बेहद आश्वस्त दिख रही। वो भी ऐसे समय में जब इस इलाके के आधा निर्वाचन क्षेत्र में कुकी समुदाय का प्रभुत्व है। इस समुदाय ने सरकार के अन्याय का विरोध करने के लिए चुनाव बहिष्कार का फैसला किया है। जोरहाट सीट को छोड़कर, असम में कांग्रेस के लिए एक बड़ी चिंता बारपेटा और नागांव निर्वाचन क्षेत्रों को बनाए रखना है। इस सीट पर वह AIUDF के साथ मुस्लिम वोटों के लिए फाइट करती नजर आएगी। पार्टी इसे बीजेपी की ‘बी-टीम’ बता रही है। AIUDF प्रमुख बदरुद्दीन अजमल धुबरी सीट को बरकरार रखना चाहते हैं।

क्या वर्तमान में मटन और मछली पर भी हो रही है राजनीति?

वर्तमान में मटन और मछली पर भी राजनीति हो रही है! राजद नेता तेजस्वी यादव के नवरात्रि के दौरान मछली खाने वाले वायरल वीडियो का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। बीजेपी इस मुद्दे को लेकर राजद और विपक्षी दलों पर हमलावर हैं। इस बीच पीएम मोदी ने भी चुनावी जनसभा में इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया है। पीएम मोदी ने शुक्रवार को लालू यादव, RJD नेता तेजस्वी यादव और राहुल गांधी के त्योहारों के समय नॉनवेज खाने वाले वीडियो पर निशाना साधा। जम्मू-कश्मीर के उधमपुर में चुनावी रैली में पीएम ने राहुल का नाम लिए बगैर कहा कि सावन के महीने में एक सजायाफ्ता मुजरिम के घर जाकर वो मटन बना रहे थे। ये लोग ऐसा जानबूझकर ऐसा करते हैं, ताकि देश की मान्यताओं पर हमला हो। उन्होंने कहा, ‘कानून और मोदी किसी को कुछ भी खाने से नहीं रोकते हैं। सबको स्वतंत्रता है कि जब मन करे वेज और नॉनवेज खाएं। लेकिन इन लोगों की मंशा ऐसा विडियो बनाकर देश के लोगों को चिढ़ाने की होती है।’ पीएम मोदी ने तेजस्वी यादव पर निशाना साधते हुए कहा, ‘नवरात्रि के दिनों में नॉनवेज खाने का वीडियो दिखाकर, लोगों की भावनाओं को चोट पहुंचाकर ये किसको खुश करने का खेल कर रहे हैं। इस वीडियो के बाद जमकर विवाद हुआ था। पिछले साल सावन के महीने में लालू यादव से दिल्ली में मिलने पहुंचे राहुल गांधी ने भी मटन खाया था और मटन बनाने और खाने का वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया था। उस समय भी लालू और राहुल के इस वीडियो पर खूब सियासी हंगामा हुआ था।आज जब मैं ये बोल रहा हूं, उसके बाद ये लोग मुझ पर गालियों की बौछार कर देंगे। लेकिन, जब बात बर्दाश्त से बाहर हो जाती है, तो लोकतंत्र में मेरा दायित्व बनता है कि मैं देश को सभी चीजों का सही पहलू बताऊं। ये लोग ऐसा जानबूझकर इसलिए करते हैं, ताकि इस देश की मान्यताओं पर हमला हो। ये इसलिए होता है, ताकि एक बड़ा वर्ग इनके वीडियो देखकर असहज होता रहे। समस्या इस अंदाज से है कि तुष्टिकरण से आगे बढ़कर ये इनकी मुगलिया सोच है। लेकिन, ये लोग नहीं जानते हैं कि जनता जब जवाब देती है तो शाही परिवार के युवराजों को बेदखल होना पड़ जाता है।’

चैत्र नवरात्रि के पहले दिन राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक वीडियो शेयर किया था, जिसमें वह वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी के साथ मछली खाते हुए दिखाई दिए थे। इस वीडियो के बाद जमकर विवाद हुआ था। पिछले साल सावन के महीने में लालू यादव से दिल्ली में मिलने पहुंचे राहुल गांधी ने भी मटन खाया था और मटन बनाने और खाने का वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया था। ये लोग नहीं जानते हैं कि जनता जब जवाब देती है तो शाही परिवार के युवराजों को बेदखल होना पड़ जाता है।’उस समय भी लालू और राहुल के इस वीडियो पर खूब सियासी हंगामा हुआ था।

राजद नेता तेजस्वी यादव के नवरात्रि के दौरान मछली खाने के वीडियो जारी करने पर पीएम मोदी की टिप्पणी पर राजद नेता तेजस्वी यादव ने कहा, ‘मैं इतने दिनों से नौकरी रोजगार महंगाई के बारे में बोल रहा हूं उसका कोई हिसाब नहीं दे रहे हैं।सबको स्वतंत्रता है कि जब मन करे वेज और नॉनवेज खाएं। लेकिन इन लोगों की मंशा ऐसा विडियो बनाकर देश के लोगों को चिढ़ाने की होती है।’ पीएम मोदी ने तेजस्वी यादव पर निशाना साधते हुए कहा, ‘नवरात्रि के दिनों में नॉनवेज खाने का वीडियो दिखाकर, लोगों की भावनाओं को चोट पहुंचाकर ये किसको खुश करने का खेल कर रहे हैं। आज जब मैं ये बोल रहा हूं, उसके बाद ये लोग मुझ पर गालियों की बौछार कर देंगे। मैं हिसाब मांग रहा हूं कि आपने 10 साल में बिहार के लिए क्या किया? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 10 साल का हिसाब दें। वे (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) इधर-उधर की बात ना करें, मुद्दे की बात करें। मुद्दे की बात पर क्यों चुप्पी साधी है?’

मामले में पलटवार करते हुए कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि हमने यह ट्रैक नहीं किया है कि किस नेता ने किस महीने में क्या खाया। बल्कि इसके उलट हम पोषण के डेटा को ट्रैक कर रहे हैं। X पर पोस्ट कर जयराम ने दावा किया कि प्रधानमंत्री के गृह राज्य गुजरात में पांच साल से कम उम्र के दस में से आठ बच्चे एनीमिया से पीड़ित हैं।

क्या बीजेपी पर मुसलमान का अविश्वास पड़ सकता है भारी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बीजेपी पर मुसलमान का अविश्वास भारी पड़ सकता है! लोकसभा चुनाव में पहले फेज की वोटिंग में अब चंद दिन ही बाकी हैं। ऐसे में सभी पार्टियां जमकर प्रचार अभियान में जुटी हैं। हालांकि, चुनाव से पहले ही मुस्लिम वोटों को लेकर स्थिति साफ होती नजर आ रही। केंद्र की सत्ता पर काबिज बीजेपी ने भले ही 400 पार का टारगेट सेट किया है, बावजूद इसके पार्टी को ये लगता है कि उसे मुस्लिम समुदाय के वोटों की जरूरत नहीं है। उसका ‘400 पार’ का लक्ष्य मुसलमानों पर निर्भर नहीं है। विपक्ष का रवैया इसके विपरीत नजर आ रहा। उन्हें लग रहा कि बीजेपी का जो स्टैंड है ऐसे में मुस्लिम वोटर हमें तो भला किसके लिए वोट करेंगे? उन्हें ये निश्चित रूप से लगता है कि मुस्लिम मतदाता बीजेपी को वोट नहीं देंगे। उन्हें 1983 से 1990 तक दिल्ली के मुख्य कार्यकारी पार्षद जग प्रवेश चंद्रा की टिप्पणियां याद आ रही हैं। भले ही उन्होंने कठोर शब्दों का इस्तेमाल किया, लेकिन उन्होंने कहा कि पार्टियां अपने वोटों के लिए मुसलमानों का शोषण करती हैं, लेकिन एक बार सत्ता में आने के बाद, वे शासन में प्रतिनिधित्व के लिए इस समुदाय की आकांक्षाओं को भूल जाती हैं। आजादी के लगभग आठ दशक बीत चुके हैं, मुसलमानों ने भारत के प्रति अपनी वफादारी व्यक्त की और मुहम्मद अली जिन्ना के पाकिस्तान को खारिज कर दिया। वो भी ये मानते हुए कि वे हिंदू-बहुल भारत में समृद्ध होंगे। हालांकि, उन्हें उनका हक नहीं मिला है। इसके बजाय, उनकी वफादारी पर अक्सर संदेह किया जाता है। यह विडंबना है।

भारत रत्न मौलाना अबुल कलाम आजाद ने कहा था कि मुसलमानों ने विभाजन को इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि वे हदीस मंत्र में विश्वास करते हैं, हुब्बुल वतनी, निस्फुल इमान : मातृभूमि के प्रति प्रेम मुस्लिम आस्था का आधा हिस्सा है। संघ परिवार और मुसलमानों के बीच संबंध तनावपूर्ण बने हुए हैं, खासकर चुनावों के दौरान ये कुछ ज्यादा ही नजर आ रहा। ऐसा इसलिए क्योंकि यह आपसी अविश्वास से दर्शाते हैं। बीजेपी का कहना है कि हर चुनाव में, मुस्लिम समुदाय उस कैंडिडेट को वोट देने का आह्वान करता है जो पार्टी को हरा सकता है। इसके नेताओं का ये तर्क लोकतंत्र में ठीक नहीं है। मुसलमानों को यह समझना होगा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में, किसी भी राजनीतिक दल को अछूत नहीं माना जाना चाहिए।

2014 और 2019 में बीजेपी की शानदार जीत के बाद अब पार्टी हैट्रिक की प्लानिंग में जुटी है। ऐसे में मुस्लिम समुदाय केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के अपनी तरफ थोड़ा आगे बढ़ने का इंतजार कर रही है। इस समुदाय का यही कहना है कि आखिर बीजेपी विश्वसनीय और सक्षम मुस्लिम उम्मीदवारों को क्यों नहीं खड़ा करती? भले ही हम बीजेपी को वोट दें, पार्टी कभी हमारे वोट को स्वीकार नहीं करेगी। उन्होंने पूछा कि आखिर हमें क्या करना होगा जब बीजेपी अपने राजनीतिक प्लान में उन्हें भी शामिल करेगी। क्या यह कहना कि केंद्रीय योजनाओं में हमारे साथ भेदभाव नहीं किया जाता, इसका उत्तर हो सकता है?

मोहम्मद अखलाक की लिंचिंग से लेकर बिलकिस बानो और उनके परिवार के साथ किए गए व्यवहार तक, मुसलमानों ने सांप्रदायिक हिंसा के भयानक केस देखे हैं। उन्होंने बिलकिस बानो मामले के आरोपियों को माला पहनाते, वॉट्सऐप पर नफरती संदेशों भेजने, अपने समुदाय के कुछ लोगों के घरों पर बुलडोजर एक्शन और उर्दू-माध्यम के स्कूलों की संख्या में कमी देखी है। उनके समुदाय से शायद ही कोई सर्वोच्च पदों पर हो, चाहे वह कैबिनेट हो या कोई शीर्ष बोर्डरूम। ऐसे में बीजेपी के लिए मुसलमानों को टिकट देना एक महत्वपूर्ण कदम होगा। यह पुष्टि करेगा कि उनकी भारत में रहने की कहानी धर्मों से परे है। भारतीय लोकतंत्र की ताकत इसकी समावेशिता है। यह एक सकारात्मक संकेत देगा और विभिन्न धर्मों के बीच कटुता को कम करेगा।

मुसलमानों को भी कुछ कदम आगे बढ़ाने की जरूरत है। उन्हें बीजेपी में सक्षम और विश्वसनीय उम्मीदवारों के लिए अपना समर्थन घोषित करना चाहिए। उन्हें वोट देना चाहिए। खासकर उन लोगों को जिन्होंने घृणा को त्याग दिया है। विकास की बात करते हैं और विचारधारा से परे जाने की कोशिश करते हैं। मुसलमानों के पास वास्तविक मांगों का एक चार्टर होना चाहिए, इसमें बच्चों के लिए किफायती शिक्षा प्रदान करना, मदरसों का आधुनिकीकरण, पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं और आर्थिक सहायता शामिल हैं। उन्हें तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ब्रिगेड से कठिन प्रश्न पूछने चाहिए कि उन्होंने मुस्लिम समुदाय के उत्थान और शासन में उनका प्रतिनिधित्व देने के लिए क्या किया है। आखिर ‘इंडिया’ ब्लॉक में प्रमुख मुस्लिम नेता कहां हैं? यह एक सामान्य बात लग सकती है लेकिन दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी के लिए यह तय करने का समय आ गया है कि उन्हें दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में राजनीति से जुड़ने की जरूरत है। पीछे हटना कोई विकल्प नहीं है। यह आज के भारत में पलने वाली मुसलमानों की पीढ़ी के साथ अन्याय होगा। ताकत की अपनी स्थिति को देखते हुए, बीजेपी पर भी एक कदम से अधिक आगे बढ़ने की जिम्मेदारी है।

क्या वर्तमान में म्यांमार से बिगड़ चुके हैं हालात?

अगर वर्तमान की बात करें तो वर्तमान में म्यांमार में हालात बिगड़ चुके हैं! सेना की ओर से तख्तापलट कर सत्ता पर कब्जा होने के बाद से म्यांमार में लोकतंत्र की बहाली की मांग को लेकर व्यापक हिंसक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इस बीच भारत ने म्यांमार के सिटवे में अनिश्चित सुरक्षा स्थिति के मद्देनजर वहां स्थित अपने वाणिज्य दूतावास से कर्मचारियों को यांगून में शिफ्ट कर दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत म्यांमारकी स्थिति पर करीब से नजर रख रहा है।प्रतिरोधी बलों ने पहले ही भारत, चीन और बांग्लादेश की सीमा के पास कई प्रमुख व्यापारिक स्थानों पर कब्जा कर लिया है। एक फरवरी, 2021 को सेना द्वारा तख्तापलट कर सत्ता पर कब्जा करने के बाद से म्यांमार में लोकतंत्र की बहाली की मांग को लेकर व्यापक हिंसक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।रखाइन राज्य और कई अन्य क्षेत्रों में पिछले साल अक्टूबर से सशस्त्र जातीय समूहों और म्यांमार सेना के बीच गंभीर लड़ाई छिड़ी हुई है। रखाइन राज्य और कई अन्य क्षेत्रों में पिछले साल अक्टूबर से सशस्त्र जातीय समूहों और म्यांमार सेना के बीच गंभीर लड़ाई छिड़ी हुई है।

भारत के साथ लगी सीमा के पास म्यांमार के कई प्रमुख कस्बों और क्षेत्रों में नवंबर के बाद से दोनों पक्षों के बीच लड़ाई जारी है। इससे मणिपुर और मिजोरम की सुरक्षा पर संभावित प्रभाव को लेकर भारत में चिंताएं बढ़ गई हैं। तीन भारतीयों के अपहरण की खबरों पर जायसवाल ने कहा, ‘हमारे दूतावास को मामले की जानकारी है। वे इस पर काम कर रहे हैं और उम्मीद है कि हम उन्हें बाहर निकालने में सफल होंगे।’ यह भी कहा कि मांडले में भारतीय वाणिज्य दूतावास काम कर रहा है। तीन भारतीय युवकों के अपहरण की खबरों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि भारतीय दूतावास इस मामले पर काम कर रहा है और उम्मीद है कि जल्द उनकी घर वापसी होगी।म्यांमार के कई हिस्सों में सैन्य जुंटा और प्रतिरोधी बलों के बीच तेज लड़ाई छिड़ी हुई है। प्रतिरोधी बल पहले ही कई कस्बों पर कब्जा कर चुके हैं। जुंटा विरोधी ताकतों ने पिछले हफ्ते म्यावड्डी में कई सैन्य ठिकानों और एक कमांड सेंटर पर नियंत्रण बना लिया है। जायसवाल ने कहा कि म्यांमार में सुरक्षा स्थिति ‘अनिश्चित’ बनी हुई है और यह बिगड़ती जा रही है। उन्होंने यांगून में शिफ्ट कर दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत म्यांमारकी स्थिति पर करीब से नजर रख रहा है। रखाइन राज्य और कई अन्य क्षेत्रों में पिछले साल अक्टूबर से सशस्त्र जातीय समूहों और म्यांमार सेना के बीच गंभीर लड़ाई छिड़ी हुई है।साप्ताहिक प्रेस वार्ता में कहा, ‘हम म्यांमारमें, खासकर रखाइन राज्य में सुरक्षा स्थिति पर करीबी नजर रख रहे हैं। हमारे नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।’

जायसवाल ने कहा, ‘हमने सिटवे में भारत के महावाणिज्य दूतावास से अपने कर्मचारियों को अस्थायी रूप से यांगून स्थानांतरित कर दिया है। मांडले में हमारा वाणिज्य दूतावास पूरी तरह काम कर रहा है।’ म्यावड्डी में जुंटा विरोधी ताकतों के नियंत्रण को महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह थाईलैंड के साथ व्यापार के लिए म्यांमार का मुख्य पारगमन बिंदु है। प्रतिरोधी बलों ने पहले ही भारत, चीन और बांग्लादेश की सीमा के पास कई प्रमुख व्यापारिक स्थानों पर कब्जा कर लिया है। एक फरवरी, 2021 को सेना द्वारा तख्तापलट कर सत्ता पर कब्जा करने के बाद से म्यांमार में लोकतंत्र की बहाली की मांग को लेकर व्यापक हिंसक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।रखाइन राज्य और कई अन्य क्षेत्रों में पिछले साल अक्टूबर से सशस्त्र जातीय समूहों और म्यांमार सेना के बीच गंभीर लड़ाई छिड़ी हुई है।

भारत के साथ लगी सीमा के पास म्यांमार के कई प्रमुख कस्बों और क्षेत्रों में नवंबर के बाद से दोनों पक्षों के बीच लड़ाई जारी है। भारत के साथ लगी सीमा के पास म्यांमार के कई प्रमुख कस्बों और क्षेत्रों में नवंबर के बाद से दोनों पक्षों के बीच लड़ाई जारी है। इससे मणिपुर और मिजोरम की सुरक्षा पर संभावित प्रभाव को लेकर भारत में चिंताएं बढ़ गई हैं। तीन भारतीयों के अपहरण की खबरों पर जायसवाल ने कहा, ‘हमारे दूतावास को मामले की जानकारी है।इससे मणिपुर और मिजोरम की सुरक्षा पर संभावित प्रभाव को लेकर भारत में चिंताएं बढ़ गई हैं। तीन भारतीयों के अपहरण की खबरों पर जायसवाल ने कहा, ‘हमारे दूतावास को मामले की जानकारी है। वे इस पर काम कर रहे हैं और उम्मीद है कि हम उन्हें बाहर निकालने में सफल होंगे।’

क्या देश में मिल चुका है सर्वाइकल कैंसर का इलाज?

वर्तमान में देश में सर्वाइकल कैंसर का इलाज मिल चुका है! सर्वाइकल कैंसर की जांच अब देसी किट से संभव होगी। एम्स सहित तीन अन्य सेंटरों पर देश में बनी इस किट का ट्रायल शुरू कर दिया गया है। एम्स के डायरेक्टर डॉ. एम श्रीनिवास, कैंसर सेंटर की चीफ डॉ. सुषमा भटनागर, डॉ. नीरजा भाटला की उपस्थिति में जांच किट का ट्रायल रन शुरू किया गया। इस किट की सफलता देश में सर्वाइकल कैंसर की जांच में मददगार साबित होगी। अभी महंगी किट की वजह से जांच प्रभावित होती है। इसलिए सस्ती दर पर देसी किट लाने की तैयारी है। एम्स की तरफ से दी गई जानकारी के अनुसार करीब 1,27,526 महिलाएं हर साल देश में सर्वाइकल कैंसर से पीड़ित होती हैं। इनमें से करीब 79,906 महिलाओं की मौत हो जाती है। नैशनल इंस्टिट्यूट फॉर रिसर्च इन रिप्रोडक्टिव एंड चाइल्ड हेल्थ (NIRRCH) शामिल हैं। उन्होंने कहा कि यह एक डायग्नोस्टिक किट है। अब यह देखना है कि यह कितनी कारगर है। 2030 तक महिलाओं में 70 पर्सेंट स्क्रीनिंग का टारगेट रखा गया है। वहीं लड़कियों में 90 पर्सेंट तक वैक्सीनेशन का टारगेट है।ब्रेस्ट कैंसर के बाद महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर सबसे अधिक हो रहा है। यह स्थिति तब है, जब इस कैंसर के खिलाफ वैक्सीन तक उपलब्ध है। लेकिन समय पर जांच नहीं होने की वजह से इस बीमारी का पता नहीं चल पाता है। गंभीर स्थिति में बीमारी का पता चलने पर मौत का खतरा बढ़ जाता है।

एम्स की कैंसर सेंटर की चीफ डॉ. सुषमा भटनागर ने बताया कि यह लो कॉस्ट एचपीवी टेस्ट किट है। यह ट्रायल मल्टी सेंटर हो रहा है। इनमें एम्स के अलावा नोएडा स्थित नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ कैंसर प्रिवेंशन एंड रिसर्च (NICPR) और मुंबई स्थिति आईसीएमआर का सेंटर नैशनल इंस्टिट्यूट फॉर रिसर्च इन रिप्रोडक्टिव एंड चाइल्ड हेल्थ (NIRRCH) शामिल हैं। उन्होंने कहा कि यह एक डायग्नोस्टिक किट है। अब यह देखना है कि यह कितनी कारगर है। 2030 तक महिलाओं में 70 पर्सेंट स्क्रीनिंग का टारगेट रखा गया है। वहीं लड़कियों में 90 पर्सेंट तक वैक्सीनेशन का टारगेट है।

लेडी हार्डिंग अस्पताल में अब कैंसर के इलाज के लिए आधुनिक मशीन का इस्तेमाल शुरू कर दिया गया है। वहीं हाई एनर्जी लीनियर एक्सेलरेटर (लीनेक) मशीन से ब्रेन ट्यूमर के इलाज में फायदा होगा। यहां आम गरीब मरीजों का कैंसर का इलाज आधुनिक मशीन की मदद से मुफ्त में की जाएगी। प्राइवेट में इन मशीनों के जरिए थेरेपी लेना काफी महंगा पड़ता है।अस्पताल में 25 साल पहले बने रेडिएशन आंकोलॉजी डिपार्टमेंट में अब जाकर रेडियोथेरेपी की सुविधा शुरू की गई है। 13 करोड़ की लागत से रेडिएशन एंड आंकोलॉजी ब्लॉक में हाई डोज ब्रेकीथेरेपी और सिटी सिम्युलेटर इंस्टॉल किया गया है। वहीं, ब्रेन ट्यूमर जैसे कैंसर के इलाज के लिए 22 करोड़ की लागत से लीनेक मशीन मंगाई जा रही है।

अस्पताल के मेडिकल डायरेक्टर डॉक्टर सुभाष गिरी ने बताया कि अस्पताल में रेडिएशन एंड आंकोलॉजी डिपार्टमेंट तो 25 साल पहले बनी थी, लेकिन यहां पर इलाज की आधुनिक सुविधाओं का अभाव था। लगभग पांच साल पहले रेडिएशन एंड आंकोलॉजी ब्लॉक बनाई गई। 5 मंजिले इस भवन में अब कैंसर के इलाज के लिए सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अब इस ब्लॉक में कैंसर के इलाज को बेहतर किया जा रहा है। यहां मैन पावर की कमी नहीं है। जानकारी के अनुसार करीब 1,27,526 महिलाएं हर साल देश में सर्वाइकल कैंसर से पीड़ित होती हैं। इनमें से करीब 79,906 महिलाओं की मौत हो जाती है। ब्रेस्ट कैंसर के बाद महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर सबसे अधिक हो रहा है। आंकोलॉजी ब्लॉक में हाई डोज ब्रेकीथेरेपी और सिटी सिम्युलेटर इंस्टॉल किया गया है। वहीं, ब्रेन ट्यूमर जैसे कैंसर के इलाज के लिए 22 करोड़ की लागत से लीनेक मशीन मंगाई जा रही है।यह स्थिति तब है, जब इस कैंसर के खिलाफ वैक्सीन तक उपलब्ध है। लेकिन समय पर जांच नहीं होने की वजह से इस बीमारी का पता नहीं चल पाता है।

गंभीर स्थिति में बीमारी का पता चलने पर मौत का खतरा बढ़ जाता है।डॉक्टर ने कहा कि रेडियोथेरेपी के शुरू होने से यूट्रस कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में फायदा होगा। वहीं हाई एनर्जी लीनियर एक्सेलरेटर (लीनेक) मशीन से ब्रेन ट्यूमर के इलाज में फायदा होगा। यहां आम गरीब मरीजों का कैंसर का इलाज आधुनिक मशीन की मदद से मुफ्त में की जाएगी। प्राइवेट में इन मशीनों के जरिए थेरेपी लेना काफी महंगा पड़ता है।

आखिर देश के पहले आम चुनाव में कितनी थी बैलट बॉक्स? जानिए पूरी कहानी!

एक समय ऐसा था जब बैलेट बॉक्स की कीमत ₹4 हुआ करती थी,आज हम आपको आजाद भारत में हुए पहले आम चुनाव में बैलेट बॉक्स और उसके संदर्भ में बनाई गई कहानी के बारे में जानकारी देने वाले हैं! आपको बता दे कि देश में जब पहले लोकसभा चुनाव की तैयारी चल रही थी, तब यह मसला उठा कि बैलट बॉक्स का इंतजाम कैसे होगा। यह भी कि ये बॉक्स किस साइज के रखे जाएं। इलेक्शन कमिशन की चिंता यह थी कि बैलट बॉक्स ऐसा होना चाहिए, जिसमें कोई छेड़छाड़ न की जा सके। उसे देखकर वोटरों को चुनाव प्रक्रिया पर भरोसा जगे। साथ ही बैलट बॉक्स इस्तेमाल करने में सहूलियत हो। 2 लाख से अधिक पोलिंग बूथों के लिए करीब 20 लाख बैलट बॉक्स की जरूरत थी। लिहाजा ये बहुत महंगे न हों, इसका भी ध्यान रखना था। इसी के साथ इलेक्शन कमिशन ने तय किया कि सभी बैलट बॉक्स उसकी ओर से तय नाप-जोख के हिसाब से स्टील के बनाए जाएंगे। बॉक्स ऐसे बनें, जिनमें अलग से ताले लगाने की जरूरत न हो। हर बॉक्स 8 इंच ऊंचा, 9 इंच लंबा और 7 इंच चौड़ा होना था। बॉक्स 20 गेज वाले स्टील से बनाए जाने थे। यही नहीं बता दे कि बॉक्स बनाने में स्टील की जरूरत को देखते हुए निर्वाचन आयोग ने इंडस्ट्री एंड सप्लाई मिनिस्ट्री से अनुरोध किया था कि उन इकाइयों को स्टील मुहैया कराया जाए, जिन्हें राज्य सरकारों ने बैलेट बॉक्स बनाने का ऑर्डर दिया है। ये बॉक्स बनाने में 8 हजार 165 टन स्टील लगा था। विधानसभाओं और लोकसभा के चुनाव एकसाथ हो रहे थे, लिहाजा अलग-अलग रंगों के बॉक्स रखे गए। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि उस समय देश में साक्षरता बहुत कम थी। मतदाताओं को रंग पहचानने में कोई दिक्कत न हो, इसलिए बैलेट बॉक्स पर संबंधित रंग का बैकग्राउंड सफेद रखा गया था। 

डिजाइन ऐसी रखी गई कि बॉक्स का कोई भी हिस्सा बाहर की ओर न निकला हो। चुनाव आयोग ने तय किया कि लोकसभा चुनाव में बैलेट बॉक्स ऑलिव ग्रीन, मीडो ग्रीन, पेल ग्रीन और ब्रुंसविक ग्रीन कलर के होंगे। विधानसभा चुनावों के लिए चॉकलेट, महोगनी, टीक, डार्क टैन और ब्रॉन्ज कलर चुने गए। इस बात का फैसला राज्यों पर छोड़ दिया गया कि वे अपने यहां किन रंगों के बैलेट बॉक्स का उपयोग करेंगे। राज्यों को सुझाव दिया गया था कि वे अपनी जरूरत के सारे बैलेट बाॉक्स किसी एक ही फर्म से तैयार कराएं ताकि उनकी डिजाइन एक जैसी रहे। आयोग का यह निर्देश इस मायने में मददगार रहा कि एक राज्य के सभी मतदानकर्मियों को इन बैलेट बॉक्स के जरिए ट्रेनिंग देने में भी आसानी हुई।

इससे बक्सों को एक-दूसरे के साथ पैक करने में आसानी होती थी! बता दे कि बॉक्स बनाने के लिए कई कंपनियों से डिजाइन और प्राइस कोट मंगाए गए। बता दें कि पहले आम चुनाव में करीब 20 लाख बैलेट बॉक्स का इस्तेमाल किया गया था। मद्रास सहित कुछ इलाकों में लकड़ी के बॉक्स भी इस्तेमाल में लाए गए, लेकिन ज्यादातर राज्यों में चुनाव आयोग के निर्देश के अनुसार स्टील के बॉक्स ही मतदान केंद्रों में रखे गए थे। वोटर्स की सुविधा के लिए अलग-अलग रंगों के बॉक्स का इस्तेमाल किया गया क्योंकि लोकसभा के साथ कुछ विधानसभाओं के भी चुनाव कराए गए थे। इन कम्पनियों में मेसर्स गोदरेज एंड बॉएस ने प्रति बॉक्स 5 रुपये, हैदराबाद ऑलविन मेटल्स लिमिटेड ने 4 रुपये 15 आना, बंगो स्टील फर्नीचर लिमिटेड कलकत्ता ने 4 रुपये 6 आना और ओरिएंटल मेटल प्रेसिंग वर्क्स बॉम्बे ने 4 रुपये 15 आना का प्राइस कोट किया था। 

इनके अलावा उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से कई कंपनियों ने प्राइस कोट किए थे। यही नहीं गोदरेज कंपनी के एक अधिकारी के मुताबिक, कंपनी की अन्य वस्तुओं के निर्माण पर इसका कोई असर नहीं पड़ा था. इसका मतलब था मजदूरों ने बैलेट बॉक्स तैयार करने के लिए अतिरिक्त घंटों में काम किया था. कंपनी के पास ओरिजिनल ऑर्डर 12.24 लाख बैलेट बॉक्स का आया था, लेकिन फैक्ट्री में 12.83 लाख बैलेट बॉक्स तैयार कर लिए थे. अधिकारी के मुताबिक, अन्य कंपनियों को भी इसी काम के लिए ऑर्डर दिए गए थे, लेकिन जब वे पूरा नहीं कर सके तो वे ऑर्डर भी गोदरेज को मिल गए. उनमें इंपीरियल सर्जिकल कंपनी लखनऊ, गणेशदास रामगोपाल एंड संस लखनऊ, पीपल आयरन एंड स्टील इंडस्ट्रीज कानपुर और दिल्ली आयरन एंड स्टील कंपनी गाजियाबाद जैसी इकाइयां शामिल थीं। राज्यों को यह छूट दी गई थी कि इलेक्शन कमिशन की ओर से तय डिजाइन के अनुसार वे किसी भी यूनिट से बैलट बॉक्स बनवा सकते हैं। इसी दौरान पहले आम चुनाव में बैलट बॉक्स तैयार करने पर कुल 1 करोड़ 22 लाख 87 हजार 349 रुपये खर्च हुए थे।

आखिर क्या है रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन की खासियत?

आज हम आपको रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन की खासियत बताने जा रहे हैं! आप रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन के बारे में तो जरुर जानते होंगे, वर्तमान में यूक्रेन और रूस के युद्ध की वजह से उनका नाम खबरों में आता ही रहता है, लेकिन आज हम आपको व्लादिमिर पुतिन की उन खासियतों के बारे में बताने जा रहे हैं, जो शायद ही किसी राष्ट्रपति में होगी… जूडो में ब्लैक बेल्ट से लेकर उनमें कई प्रकार की खूबियां है, आपको बता दें कि आज के समय में दुनिया में जब भी किसी ताकतवर देश का नाम लिया जाता है तो रूस का नाम जरूर आता है. इसकी वजह बहुत सी है, लेकिन सबसे ज्यादा ध्यान देने वाली बात ये है कि अभी के समय जो इंसान रूस को चला रहा वो खुद में एक ऐसी शख्सियत है, जिसका लोग सारी दुनिया में नाम लेते हैं. उस इंसान का नाम है व्लादिमीर पुतिन. व्लादिमीर पुतिन दुनिया के सबसे ताकतवर देशों में एक के राष्ट्रपति हैं. पुतिन की बोल्ड पर्सनालिटी दुनियाभर में चर्चा का विषय बनी रहती है… उनके धाक का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि दुनिया का सुपर पावर कहे जाने वाला अमेरिका भी पुतिन की बातों पर सोचने पर मजबूर हो जाता है. 

व्लादिमीर पुतिन का पूरा नाम व्लादिमीर व्लादिमीरोविच पुतिन है और उनका जन्म 7 अक्टूबर, 1952 को लेनिनग्राद, रूस, यूएसएसआर, जो अब सेंट पीटर्सबर्ग, रूस में है वहां हुआ. रूस के राष्ट्रपति बनने से पहले वो रूसी खुफिया अधिकारी रह चुके हैं और रूस देश के प्रधानमंत्री भी रह चुके हैं… बता दें कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को वर्कआउट करने में बहुत मजा आता है. वो अक्सर वक्त निकालकर वर्कआउट करते हैं…. ये बहुत कम लोगों को पता है कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जूडो में ब्लैक बेल्ट हैं. पुतिन ने जूडो का अभ्यास करना शुरू किया जब वो मात्र 11 साल के थे. फिर 3 साल के बाद  उन्होंने 14 साल की उम्र में सैम्बो (एक रूसी मार्शल आर्ट) पर अपना ध्यान केंद्रित किया था..रूस में पुतिन सबसे पहले 7 मई 2000 में राष्ट्रपति बने, इसके लिए उन्होंने बकायाद चुनाव लड़ा और अपने नजदीकी प्रतिद्वंदी को 53 फीसदी वोट लेकर हरा दिया….  .. रूसी राष्ट्रपति की शुरुआती जिंदगी बहुत ही साधारण तरीके से गुजरी है. वो बचपन में एक छोटे से अपार्टमेंट में शेयरिंग कमरे में रहते थे. विश्व युद्ध के बाद पुतिन के पिता ने एक कारखाने में काम किया और उनकी मां ने सड़कों पर झाडू भी लगाई है …. 

यहि नहीं पुतिन ने अपनी कानून की डिग्री पूरी करने के तुरंत बाद एक प्रशासनिक पद पर केजीबी में शामिल हो गए. उन्होंने नकली नाम ‘प्लाटोव’ के तहत केजीबी के विदेशी खुफिया संस्थान में मास्को में अध्ययन किया…. पुतिन को केजीबी में काम छोड़ने के बाद 1994 में डिप्टी मेयर का पोस्ट मिला. मेयर का पद छोड़ने के बाद उन्होंने प्रेसिडेंटियल स्टाफ के तौर पर काम किया. वह साल 1999 में रूस के पीएम बने…. रूस को चला रहा वो खुद में एक ऐसी शख्सियत है, जिसका लोग सारी दुनिया में नाम लेते हैं. उस इंसान का नाम है व्लादिमीर पुतिन. व्लादिमीर पुतिन दुनिया के सबसे ताकतवर देशों में एक के राष्ट्रपति हैं. पुतिन की बोल्ड पर्सनालिटी दुनियाभर में चर्चा का विषय बनी रहती है… उनके धाक का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि दुनिया का सुपर पावर कहे जाने वाला अमेरिका भी पुतिन की बातों पर सोचने पर मजबूर हो जाता है, . रूस में पुतिन सबसे पहले 7 मई 2000 में राष्ट्रपति बने, इसके लिए उन्होंने बकायाद चुनाव लड़ा और अपने नजदीकी प्रतिद्वंदी को 53 फीसदी वोट लेकर हरा दिया…. 

रूसी राष्ट्रपति पुतिन का घर बहुत ही बड़ा है. उनके घर का नाम है पुतिन पैलेस, जो रूस में काला सागर के तट पर स्थित क्रास्नोडार क्राय में है….उन्हें दो बार नोबेल पीस पुरस्कार  के लिए भी नॉमिनेट किया जा चुका है. एक बार साल 2014 और दूसरी बार 2021 के दौरान….बता दें कि राष्ट्रपति पुतिन को जानवरों से खासा लगाव है. इनके पास बहुत से पालतू कुत्ते हैं….. रूसी राष्ट्रपति एक बार  ऑनलाइन कॉमिक्स सीरीज सुपर पुतिन में फीचर हो चुके हैं, जो आतंक से लड़ते हुए लोगों की मदद करता है…. इसी के साथ इन्हें सुपर स्पीड कार चलाने का भी बहुत शौक है. वो एक बार फॉर्मूला वन रेस कार 150 किलोमीटर के रफ्तार से चला चुके हैं…. रूसी राष्ट्रपति की जर्मन भाषा पर बहुत अच्छी पकड़ है. वो बहुत फर्राटेदार जर्मन बोलते है, तो यह है रूस के राष्ट्रपति की कुछ खास बातें!