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बीजेपी में शामिल होने की अफवाह के बीच कमलनाथ का कहना है कि उन्होंने किसी से बात नहीं की है.

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बीजेपी में शामिल हो रहे हैं? रविवार को कमलनाथ ने इस सवाल पर मुंह खोला कि क्या अटकलें तेज हो गई हैं? क्या कहा आपने? शनिवार को कमल अपने बेटे नकुल के साथ दिल्ली गए थे। इसके बाद से उनके दलबदल की अटकलें तेज हो गई हैं. माना जा रहा है कि वह जल्द ही बीजेपी में शामिल हो सकते हैं. अटकलें शुरू हो गई हैं कि वह बीजेपी में शामिल हो रहे हैं. मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता कमल नाथ भी दिल्ली पहुंच गए हैं. पार्टी बदलने की अटकलों के बीच उन्होंने शनिवार के बाद रविवार को भी अपना मुंह खोला. अटकलें बढ़ गईं. रविवार को कमल ने कहा, ”मैंने आपसे कल कहा था कि अगर ऐसा कुछ होगा तो मैं सबसे पहले आपको बताऊंगा. मैंने किसी से बात नहीं की है.”

गौरतलब है कि शनिवार की तरह कमल ने पार्टी बदलने की अटकलों से इनकार नहीं किया। इसके बजाय, उन्होंने जानबूझकर सवाल को टाल दिया और अटकलों को बरकरार रखा। बीजेपी सूत्रों के मुताबिक वह सोमवार को आधिकारिक तौर पर बीजेपी में शामिल हो सकते हैं. कमल शनिवार को अपने बेटे और कांग्रेस सांसद नकुलनाथ के साथ दिल्ली गए थे। इससे पहले नकुल ने अपने एक्स (पूर्व में ट्विटर) हैंडल से ‘कांग्रेस’ की पहचान हटा दी थी। इससे सौदा लगभग पक्का हो गया। सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस के अंदर कमल को लेकर असंतोष है. उन्होंने राज्यसभा का टिकट मांगा. लेकिन शीर्ष नेतृत्व ने उनकी इच्छा पूरी नहीं की. इसके बाद कमल ने टीम छोड़ने का फैसला किया. हालांकि, कांग्रेस खेमे ने इन अटकलों को खारिज कर दिया. मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इस संदर्भ में कहा, ”इंदिरा गांधी का तीसरा बेटा कभी बीजेपी में शामिल हो सकता है? क्या इसका सपना भी देखा जा सकता है?” मध्य प्रदेश में कांग्रेस के अन्य नेताओं ने इन अटकलों को खारिज कर दिया है. शनिवार को दिल्ली पहुंचने पर कमल ने भाजपा में शामिल होने की अपनी योजना का खुलासा किए बिना संवाददाताओं से कहा, “आप ही हैं जो इतने उत्साहित हो रहे हैं, मैं नहीं।” अगर ऐसा कुछ होगा तो मैं आपको सबसे पहले बताऊंगा.” रविवार को भी उनका यही लहजा बरकरार रहा.

गौरतलब है कि पिछले साल मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बीजेपी ने लगभग ‘उड़ा’ दिया था. 230 सीटों में से बीजेपी को 163 सीटें मिलीं. कांग्रेस को सिर्फ 66 सीटें मिलीं. इसके बाद कथित तौर पर कमल को पार्टी के भीतर ही घेर लिया गया था। कमल को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटा दिया गया और उनकी जगह उनके ‘प्रतिद्वंद्वी’ कहे जाने वाले जीतू को लाया गया. उन्हें विपक्ष के नेता का पद भी नहीं मिला. इसके बाद कमल दल के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन ने खड़गे को राज्यसभा जाने की इच्छा बताई. लेकिन सूत्र ने दावा किया कि पार्टी ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई. अगर आखिरकार कमल नाथ बीजेपी में शामिल होते हैं तो कांग्रेस को आर्थिक नुकसान के साथ-साथ राजनीतिक नुकसान भी उठाना पड़ सकता है. इसे लेकर कांग्रेस के भीतर आशंका पैदा हो गई है. दूसरी ओर, बीजेपी भी कमल नाथ के साथ कांग्रेस पर राजनीतिक और आर्थिक दोनों हथियारों से हमला करने की कोशिश कर रही है.

कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, कमल लंबे समय से पार्टी के फंड कलेक्शन में अहम भूमिका निभा रहे हैं। पार्टी की ओर से उन्होंने मुंबई समेत पूरे देश के औद्योगिक हलकों से रिश्ते बनाये रखे. करीब दस साल पहले केंद्र की सत्ता गंवाने के बाद कांग्रेस का राजनीतिक प्रभाव कम हो गया है. तनाव के साथ भी. विभिन्न आंकड़ों के मुताबिक कॉरपोरेट चंदा लेने के मामले में बीजेपी कांग्रेस से कई गुना आगे है. ऐसे में अगर कमल नाथ बीजेपी में शामिल होते हैं तो शिल्पा महल और कांग्रेस के बीच संपर्क का आखिरी धागा भी टूट सकता है, ऐसा सूत्र का मानना ​​है.

मध्य प्रदेश में कांग्रेस के भीतर हमेशा तीन या चार गुट सक्रिय रहे हैं। बीजेपी के एक वर्ग के मुताबिक इन सभी समूहों का अस्तित्व अब सवालों के घेरे में है. उदाहरण के तौर पर उस राज्य के बीजेपी नेताओं का दावा है कि अर्जुन सिंह की मौत के बाद उनके गुट का पार्टी में कोई प्रभाव नहीं रह गया है. विभिन्न कारणों से दिग्विजय सिंह का भी महत्व कम हो गया। कमल और ज्‍योतिरादित्‍य शिंदे ने अपने ग्रुप को फॉलोअर्स के साथ सक्रिय रखा. इनमें 2020 में कमलनाथ से मतभेद के चलते ज्योतिरादित्य ने सरकार और पार्टी छोड़ दी। बीजेपी में शामिल हो गए. पद्म शिबिर को उम्मीद है कि अगर कमल भी बीजेपी में शामिल हो जाएं तो कांग्रेस को धक्का लग सकता है.

क्या दोबारा से बढ़ जाएगा किसान आंदोलन?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या किसान आंदोलन दोबारा से बढ़ जाएगा या नहीं! दिल्ली में किसानों के विरोध प्रदर्शन की घोषणा के बाद दिल्ली, पंजाब-हरियाणा से लेकर यूपी तक इसका असर देखने को मिल रहा है। किसानों के ‘दिल्ली चलो’ आह्वान पर कांग्रेस केंद्र सरकार पर हमलावर हो गई है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने किसानों का खुलकर समर्थन किया है। वहीं, कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने सीमाओं पर की जा रही तैयारी को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। प्रियंका गांधी ने कहा है कि किसानों को दिल्ली में प्रवेश करने से रोकने के लिए सड़कों पर बिछाई गई कीलें और कई बैरिकेडिंग पर कहा कि कीलें बिछाना अमृतकाल है या अन्याय काल। दूसरी तरफ पीएम मोदी ने कांग्रेस पर निशाना साधा है। पीएम मोदी ने साफ कहा कि कांग्रेस को सिर्फ चुनाव के समय ही गांव, गरीब और किसान याद आते हैं। संयुक्त किसान मोर्चा अराजनीतिक और किसान मजदूर मोर्चा ने फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य एमएसपी के संबंध में कानून बनाने समेत विभिन्न मांगों को लेकर केंद्र सरकार पर दबाव डालने के लिए 13 फरवरी को 200 से अधिक किसान यूनियनों के समर्थन से ‘दिल्ली चलो’ मार्च की घोषणा की है। पंजाब के किसान दिल्ली के आसपास के हाईवे को घेरने की तैयारी कर रहे हैं। 13 फरवरी को किसान दिल्ली की सीमा पर पहुंचने वाले हैं। दूसरी तरफ पंजाब पहुंचे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने किसानों को बधाई दी है कि उन्होंने केंद्र सरकार के लाए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ लड़ाई लड़ी जिसे बाद में केंद्र सरकार को वापस लेना पड़ा। पंजाब के समराला लुधियाना में एक सभा को संबोधित करते हुए मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि एक तय तरीके से किसानों को खत्म करने की साजिश रची जा रही थी। लेकिन आप लोगों के आंदोलन ने किसानी को बचा लिया। मल्लिकार्जुन खड़गे ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि देश में आजादी के बाद पहली बार, हर किसान पर 25,000 रुपए प्रति हेक्टेयर के हिसाब से टैक्स लगाया गया। उन्होंने आगे कहा कि ‘पीएम फसल बीमा योजना’ को निजी इंश्योरेंस कंपनी का मुनाफा योजना बनाया गया। उन्होंने मंच से कहा कि 2016 से 2022 के बीच बीमा कंपनियों ने 40,000 करोड़ रुपए कमाए।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को कहा कि उनकी सरकार आदिवासियों के हितों के लिए काम कर रही है, जबकि विपक्षी कांग्रेस को सिर्फ चुनाव के समय ही गांव, गरीब और किसान याद आते हैं। प्रधानमंत्री मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में आदिवासी समुदाय के लोगों की एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि कांग्रेस जब सत्ता में रहती है तो लोगों को लूटने का काम करती है और जब सत्ता से बाहर होती है तो लोगों को लड़वाने का काम करती है। उन्होंने कहा कि लूट और फूट कांग्रेस का ऑक्सीजन है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को केवल चुनाव के समय ही गांव, गरीब और किसान याद आते हैं।

किसानों के 13 फरवरी को प्रस्तावित ‘दिल्ली चलो’ अभियान से पहले हरियाणा के अधिकारियों ने अंबाला के पास शंभू में पंजाब के साथ लगती सीमा को सील कर दिया है। दिल्ली कूच की मुहिम को रोकने के लिए जींद और फतेहाबाद जिलों की सीमाओं पर भी व्यापक इंतजाम किए गए हैं। शांति भंग होने की आशंका के चलते हरियाणा सरकार ने सात जिलों- अंबाला, कुरुक्षेत्र, कैथल, जींद, हिसार, फतेहाबाद और सिरसा में 11 से 13 फरवरी तक मोबाइल इंटरनेट सेवाएं और एक साथ कई एसएमएस करने की सेवा को निलंबित कर दिया है। किसानों को राष्ट्रीय राजधानी की ओर जाने से रोकने की हरियाणा के अधिकारियों की कोशिशों के बीच केंद्र ने उन्हें 12 फरवरी को उनकी मांगों पर चर्चा के लिए एक और बैठक आयोजित करने के वास्ते आमंत्रित किया है।

कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने किसानों के प्रस्तावित ‘दिल्ली चलो’ मार्च से पहले राष्ट्रीय राजधानी की सीमा के पास कुछ स्थानों पर अवरोधक और सड़कों पर कीलें लगाने की खबरों को लेकर रविवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधा। कांग्रेस महासचिव ने किसानों को दिल्ली में प्रवेश करने से रोकने के लिए सड़कों पर बिछाई गई कीलें और कई अवरोधक लगे होने का एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया। प्रियंका ने सवाल कि किसानों के साथ इस तरह का व्यवहार क्यों किया जा रहा है। वाड्रा ने कहा कि किसानों के रास्ते में कील-कांटे बिछाना अमृतकाल है या अन्यायकाल? इसी असंवेदनशील एवं किसान विरोधी रवैये ने 750 किसानों की जान ली थी। किसानों के खिलाफ काम करना, फिर उनको आवाज भी न उठाने देना – कैसी सरकार का लक्षण है?

किसानों के 13 फरवरी को ‘दिल्ली चलो मार्च’ के मद्देनजर रविवार को राष्ट्रीय राजधानी के उत्तर पूर्वी जिले में धारा 144 के तहत निषेधाज्ञा आदेश लागू किया गया, जिसके तहत बड़ी संख्या में लोगों के एकत्रित होने पर पाबंदी है। लगभग 200 किसान संघ द्वारा आयोजित ‘दिल्ली चलो मार्च’ के तहत उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब से बड़ी संख्या में किसानों के मंगलवार को राष्ट्रीय राजधानी की ओर कूच करने की संभावना है। एसीपी उत्तरपूर्व जॉय टिर्की की तरफ से जारी एक आदेश के अनुसार, ‘हमने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 निषेधाज्ञा आदेश लगायी है। सूचना मिली है कि कुछ किसान संगठनों ने अपने समर्थकों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून बनाने की अपनी मांगों को लेकर 13 फरवरी को दिल्ली में एकत्रित होने/कूच करने का आह्वान किया है। किसी को भी कानून एवं व्यवस्था की स्थिति को बिगाड़ने नहीं दिया जाएगा। आदेश में कहा गया है कि किसानों के अपनी मांग पूरी होने तक दिल्ली की सीमाओं पर धरना देने की आशंका है।

क्या साउथ इंडस्ट्री के हीरो अभिनेता विजय राजनीति में लेंगे एंट्री?

साउथ इंडस्ट्री के हीरो अभिनेता विजय ने राजनीति में एंट्री ले ली है! दिग्गज तमिल अभिनेता विजय ने राजनीति करेंगे। उन्होंने ‘तमिझगा वेत्रि कषगम टीवीके नाम से अपनी पार्टी का भी ऐलान कर दिया है। अभिनेता विजय ने लोकसभा चुनावों से पहले राजनीति में इंट्री लेकर सियासत को गरमा दिया है। अभिनेता विजय ने कहा कि उनकी पार्टी आगामी लोकसभा चुनाव में किसी दल का समर्थन नहीं करेगी। पार्टी 2026 का विधानसभा चुनाव लड़ेगी। केंद्रीय चुनाव आयोग में पार्टी का पंजीकरण होने के बाद अभिनेता विजय ने इस फैसले का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि फिल्मों के साथ वे राजनीति में अपनी जिम्मेदारी को निभाएंगे। विजय ने एक बयान में कहा कि राजनीति कोई पेशा नहीं, बल्कि पवित्र जनसेवा है। तमिझागा वेत्री कषगम का शाब्दिक अर्थ तमिलनाडु विजय पार्टी है। अभिनेता विजय के पार्टी पानी के बाद उनके प्रशंसकों ने जश्न मनाना शुरू कर दिया है। अभिनेता विजय के राजनीति में आने की अटकलें काफी समय से लगी रही थीं। तमिलनाडु के इतिहास में कई लोग अभिनय की दुनिया से राजनीति में कदम रख चुके हैं। इनमें सबसे प्रमुख एम जी रामचंद्रन और जे जयललिता का है। विजय ने कहा कि उनकी पार्टी आगामी लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेगी और न ही किसी का समर्थन करेगी क्योंकि हाल ही में हुई आम परिषद और कार्यकारी परिषद की बैठकों में ऐसा निर्णय लिया गया है। अभिनेता विजय ने अपने बयान में कहा कि मौजूदा राजनीति में भ्रष्टाचार हावी है। प्रशासन में गलत तौर-तरीके हावी हैं तो दूसरी तरफ बांटने की राजनीति की जा रही है। ऐसा जाति और धर्म के नाम पर किया जा रहा है। यह हमारी प्रगति और एकता की राह में बड़ी चुनौतियां है।

विजय ने कहा कि लोग बदलाव चाहते हैं। लोग ऐसी सरकार चाहते हैं जो निस्वार्थ, पारदर्शी, जाति और धर्म-मुक्त, दूरदर्शी और भ्रष्टाचार-मुक्त प्रशासन प्रदान करे। अभिनेता विजय की इंट्री से भले ही 2024 में कोई दिक्कत न हो, लेकिन 2026 के चुनावों में जरूर उनका दल पुरानी स्थापित पार्टियों के वोट बैंक में सेंधमारी कर सकता है। अभिनेता विजय ने राजनीति में आने का फैसला हाल-फिलहाल में नहीं किया है। वे लंबे समय से इस पर काम कर रहे थे। उन्होंने राज्य की 234 विधानसभा सीटों पर सर्वे के साथ तमाम राजनीति विश्लेषकों से भी मशविरा किया था! 49 साल के अभिनेता विजय का पूरा नाम जोसेफ विजय चंद्रशेखर है। मद्रास अब चेन्नै में 22 जून, 1974 को जन्में विजय ने एक्टिंग की दुनिया बतौर बाल कलाकार कदम रखा था। 1984 में उन्होंने महज 10 साल की उम्र में वेत्री नाम की फिल्म में अभिनय किया था। चार दशक से साउथ के सिनेमा में सक्रिय विजय करोड़ों रुपये की संपत्ति रखते हैं। 2023 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उनके परस 474 करोड़ रुपये संपत्ति थी। अभिनेता विजय के राजनीति में कदम रखने से राज्य में सत्ताधारी डीएमके के साथ एआईडीएमके को नुकसान हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान है कि 2026 के चुनावों अभिनेता विजय करीब 12 फीसदी वोट हासिल कर सकते हैं। उनके चुनाव मैदान में आने से भी पार्टी का वोट बैंक खिसकेगा। हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि वोटों में किसी भी तरह के विभाजन से डीएमके को फायदा होगा।

 एक्टर विजय ने ऐसे वक्त पर पार्टी का ऐलान किया है राज्य में डीएमके सत्ता में है और AIADMK खेमों में बंटी हुई है। अभिनय से राजनीति में आए विजयकांत का निधन हो चुका है। रजनीकांत स्वास्थ्य कारणों से अब राजनीति में सक्रिय नहीं है, तो वहीं केंद्र की सत्ता का काबिज बीजेपी राज्य में पूर्व आईपीएस अधिकारी के अन्नामलाई को मोर्चे पर लगाकर राज्य में अपनी पैठ बनाने में जुटी है। अभिनेता विजय की पार्टी के ऐलान के बीच चर्चा यह भी हो रही है कि 2026 को चुनावों में लड़ाई युवा और नए चेहरों के बीच होगी। अभिनेता विजय ने अपने बयान में कहा कि मौजूदा राजनीति में भ्रष्टाचार हावी है। प्रशासन में गलत तौर-तरीके हावी हैं तो दूसरी तरफ बांटने की राजनीति की जा रही है। ऐसा जाति और धर्म के नाम पर किया जा रहा है। यह हमारी प्रगति और एकता की राह में बड़ी चुनौतियां है।राज्य में डीएमके का चेहरा उदयनिधि और बीजेपी की तरफ से अन्नामलाई के साथ इस फेहरिस्त में अभिनेता विजय का नाम भी शामिल होगा। एआईडीएमके कैसे आगे बढ़ेगी? इसकी तस्वीर लोकसभा चुनावों में साफ होने की उम्मीद है। लंबे वक्त पर बीजेपी के साथ रही AIADMK अब एनडीए का हिस्सा नहीं है।

क्या केंद्र के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं दक्षिण के राज्य?

वर्तमान में दक्षिण के राज्य केंद्र के खिलाफ प्रदर्शन करते जा रहे हैं! दिल्ली के जंतर-मंतर पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने बुधवार को अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों और कांग्रेस विधायकों के साथ धरना दिया। उसी जगह पर केरल के मुख्यमंत्री ने गुरुवार को धरना दिया। उनके साथ दिल्ली और पंजाब के मुख्यमंत्री के अलावा वाम दलों के दूसरे बड़े नेता तो थे ही, जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री औ्रर नैशनल कॉन्फ्रेंस लीडर फारुख अब्दुल्ला भी थे। यानी यह किसी एक राज्य के मुख्यमंत्री का प्रदर्शन भर नहीं रहा। प्रदर्शन पर भले दो राज्यों के मुख्यमंत्री बैठे हों, ऐसी शिकायतें दूसरी तरफ से भी आ रही हैं। दक्षिणी राज्यों की ही बात करें तो तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन भी ऐसी शिकायतें करते रहे हैं। उन्होंने इसी सप्ताह केरल के मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर उनके प्रदर्शन के प्रति अपना समर्थन जताया।

साउथ के ये तीनों राज्य मिलती-जुलती सी शिकायतें पेश कर रहे हैं। मुख्य रूप से उनका कहना है कि केंद्र सरकार ने उनके कर्ज लेने पर पाबंदियां लगा दी हैं और 15वें वित्त आयोग की सिफारिशों के चलते उन्हें मिलने वाला फंड भी कम हो गया है। ध्यान रहे केंद्र पर फंड मुहैया कराने में पक्षपात का आरोप अन्य राज्य भी लगा रहे हैं। मसलन, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी केंद्र पर मनरेगा का फंड रोकने का आरोप लगाते हुए इसी महीने की दो तारीख को कोलकाता में धरने पर बैठी थीं। मगर साउथ के राज्यों से उठती आवाजें अलग संदर्भ ले रही हैं। दक्षिणी राज्यों में 2026 में जनगणना के बाद प्रस्तावित डीलिमिटेशन को लेकर भी चिंता है। उत्तर भारत के राज्यों में जनगणना तेजी से बढ़ी है, जबकि दक्षिणी राज्यों की जनसंख्या 1970 के बाद से ही कमोबेश स्थिर रही है। ऐसे में माना यह जा रहा है कि डीलिमिटेशन की वजह से लोकसभा में उत्तर भारत की सीटों की संख्या दक्षिण के मुकाबले बहुत ज्यादा हो सकती है। इसे उत्तर के संभावित वर्चस्व के रूप में पेश करने की कोशिश कुछ हलकों में हो रही है।

हालांकि इन सभी शिकायतों के जवाब में केंद्र सरकार के अपने तर्क हैं, लेकिन इन विरोध-प्रदर्शनों से एक परसेप्शन बन रहा है, जिसके निहितार्थ चुनावी राजनीति से आगे जाते हैं। इसलिए केंद्र सरकार का यह कहना काफी नहीं कि राजनीतिक कारणों से देश को उत्तर और दक्षिण में बांटा जा रहा है। इसमें सच का अंश हो, तब भी राज्यों को विश्वास में लेने और लेते हुए दिखने के विशेष प्रयास समय रहते होने चाहिए। बता दें कि उत्तर के राज्य हों या फिर दक्षिण के दूसरे राज्य तमिलनाडु की सियायत बाकी प्रदेशों से थोड़ी अलग है। तमिलनाडु में सितारों के राजनीति में आने का एक लंबा इतिहास रहा है। अब तमिल अभिनेता विजय ने राजनीति में आने का ऐलान करते हुए अपनी पार्टी बनाई है। क्या सुपरस्टार की छवि रखने वाले विजय को नई पारी में जीत मिलेगी? क्या वे नायक बनकर उभरेंगे या फिर मौजूदा दलों के लिए बाधा बनकर उभरेंगे? यह तो वक्त ही बताएगा। 2024 के आम चुनावों से पहले विजय ने पार्टी का ऐलान करके राज्य की राजनीति को गरमा दिया है, हालांकि उन्होंने साफ किया है कि उनकी पार्टी लोकसभा चुनाव नहीं बल्कि 2026 में विधानसभा चुनाव लड़ेगी। तमिलनाडु की राजनीति में सितारों की इंट्री नई नहीं है। एमजीआर, के करुणानिधि और जयललिता ने लगभग 50 वर्षों तक राज्य की राजनीति पर शासन किया। अभी भी करुणानिधि द्वारा बनाई गई डीएमके सत्ता में है। एम के स्टालिन राज्य के मुख्यमंत्री हैं। उनके बेटे उदयनिधि स्टालिन को उनके उत्तराधिकारी के तौर पर भी देखा जा रहा है, हाल के महीने में यह भी चर्चा सामने आई थी कि उन्हें राज्य का उप मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है।

एक्टर विजय ने ऐसे वक्त पर पार्टी का ऐलान किया है राज्य में डीएमके सत्ता में है और AIADMK खेमों में बंटी हुई है। अभिनय से राजनीति में आए विजयकांत का निधन हो चुका है। रजनीकांत स्वास्थ्य कारणों से अब राजनीति में सक्रिय नहीं है, तो वहीं केंद्र की सत्ता का काबिज बीजेपी राज्य में पूर्व आईपीएस अधिकारी के अन्नामलाई को मोर्चे पर लगाकर राज्य में अपनी पैठ बनाने में जुटी है। अभिनेता विजय की पार्टी के ऐलान के बीच चर्चा यह भी हो रही है कि 2026 को चुनावों में लड़ाई युवा और नए चेहरों के बीच होगी। राज्य में डीएमके का चेहरा उदयनिधि और बीजेपी की तरफ से अन्नामलाई के साथ इस फेहरिस्त में अभिनेता विजय का नाम भी शामिल होगा। एआईडीएमके कैसे आगे बढ़ेगी? इसकी तस्वीर लोकसभा चुनावों में साफ होने की उम्मीद है। लंबे वक्त पर बीजेपी के साथ रही AIADMK अब एनडीए का हिस्सा नहीं है।

अभिनेता विजय ने अपनी पार्टी का नाम ‘तमिलका वेत्री कड़गम’ रखा है। इसे संक्षिप्त में टीवीके कहा जा रहा है। जिसका मोटे तौर पर मतलब है कि तमिलनाडु विजय पार्टी है। उनके राजनीति में आने पर समर्थकों में जश्न देखा गया। विजय के राजनीति में आने पर सत्तारूढ़ द्रमुक और विपक्षी बीजेपी ने अभिनेता को नई पारी के लिए शुभकामनाएं दी हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन के बेटे उदयनिधि स्टालिन भी फिल्मों में काम कर चुके हैं अब वे राज्य के खेल मंत्री हैं। तमिलनाडु के सितारे पहले जहां राजनीति में सफल रहे हैं तो वहीं हाल के सालों में पुराना इतिहास बदला है। कमल हासन ने मक्कल निधि मय्यम की शुरुआत की। रजनीकांत ने पिछले दशक में रजनी मक्कल मंद्रम का गठन किया था। जहां कमल हासन अभी भी राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं, वहीं रजनीकांत ने स्वास्थ्य कारणों से राजनीति छोड़ दी है। ऐसे में सवाल है कि एक्टर विजय क्या वाकई में रुपहले पर्दे की तरह राजनीति में जलवा बिखेर पाएंगे।

क्या वर्तमान में बढ़ रहा है उत्तर बनाम दक्षिण?

वर्तमान में उत्तर बनाम दक्षिण बढ़ता ही जा रहा है!आम चुनाव से पहले एक बार फिर देश में उत्तर बनाम दक्षिण का सियासी दंगल शुरू हो गया है। दक्षिण के राज्य बीजेपी की अगुआई वाली केंद्र सरकार पर उनकी उपेक्षा और संसाधनों को छीनने का आरोप लगाकर आंदोलन कर रहे हैं। कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु जैसे राज्यों की सत्तारूढ़ सरकार पिछले कुछ दिनों से संसद से सड़क तक इस मुद्दे पर उतरीं। उनके आरोपों पर केंद्र सरकार और बीजेपी ने भी पलटवार किया। दरअसल, विपक्ष को मुद्दे पर आम चुनाव में सियासी प्रीमियम दिख रहा है।  पिछले कुछ दिनों से दक्षिण भारत के अधिकतर राज्य एकजुट होते दिख रहे हैं। इन राज्यों ने जहां एक ओर केंद्र के सामने अपनी मांगें रखने का फैसला किया है, वहीं दूसरी ओर ये सोशल मीडिया पर भी कैंपेन चला रहे हैं। सोशल मीडिया पर ‘माई टैक्स, माई राइट’ नाम से एक कैंपेन भी चल रहा है। इन तमाम राज्यों का आरोप है कि केंद्र सरकार उनके राज्य के साथ वित्तीय अन्याय कर रही है। कर्नाटक की सरकार तो इस मसले पर विरोध करने के लिए दिल्ली के जंतर-मंतर तक आ गई और दूसरे राज्य भी अभी आंदोलन तेज करने की कोशिश कर रहे हैं।

केंद्र सरकार ने वित्तीय भेदभाव से साफ इनकार किया, साथ ही इस विरोध को देशविरोधी करार दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने पहली बार इस मुद्दे पर संसद के अंदर खुलकर बात भी की। उन्होंने इससे जुड़े तमाम मसलों पर लोगों के बीच अपना पक्ष रखने की कोशिश की। इस बहस पर कहा कि ‘उनके विभाजनकारी अजेंडे से सावधान रहें, 70 साल की आदत इतनी आसानी से नहीं जाएगी।’ आम चुनाव से पहले इस मसले के उठने के पीछे सियासी आकलन है। नरेंद्र मोदी की अगुआई में इस बार मिशन साउथ पर फोकस है। तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में विस्तार के लिए बहुत आक्रामक रूप से काम जारी है। साथ ही अगर आम चुनाव में मिशन 400 का टागरेट पूरा करना है तो दक्षिण के इन राज्यों में बीजेपी को बेहतर करना होगा। कर्नाटक में 2019 के प्रदर्शन को भी दोहराना होगा, जहां पार्टी ने राज्य की 28 लोकसभा सीटों में से 27 में जीत हासिल की थी।

बीजेपी की इसी कोशिश को देखते हुए विपक्षी दलों ने पार्टी को दक्षिण विरोधी साबित करने की कोशिश भी इस आंदोलन के माध्यम से की। साथ ही कांग्रेस की अगुआई में विपक्ष को लगता है कि अगर दक्षिण में बीजेपी को रोक दिया गया और उत्तर में थोड़ा बेहतर प्रदर्शन हुआ तो बीजेपी को कमजोर किया जा सकता है। लेकिन बीजेपी को लगता है कि ऐसे मुद्दे उठाकर नरेंद्र मोदी की अगुआई में बीजेपी को दक्षिण में लोगों से और संवाद करने का मौका मिल रहा है। ऐसा नहीं है कि हाल के सालों में पहली बार उत्तर बनाम दक्षिण का यह मसला उठा है। दो साल बाद होने वाले परिसीमन को लेकर अभी से यह विवाद गर्म है। नए परिसीमन के बाद देश में करीब 900 नए सांसद हो सकते हैं। माना जा रहा है कि 543 सीट से 900 सीटें जो बढ़ेगी, उसमें 80 फीसदी से अधिक बिहार, यूपी, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में बढ़ेगी और दक्षिण का प्रतिनिधित्व उस अनुरूप नहीं बढ़ेगा। इसका बड़ा असर राष्ट्रीय राजनीति पर हो जाएगा और दक्षिण के राज्यों की सियासी अहमियत कम हो जाएगी। तभी दक्षिण के राज्यों के नेताओं ने चेतावनी दी थी कि अगर परिसीमन के बाद दक्षिण के राज्यों को उनका हक नहीं मिला तो पूरे दक्षिण भारत में एक मजबूत जन आंदोलन का जन्म होगा और सभी इस असमानता के खिलाफ एकजुट होकर लड़ेंगे।

पिछले दिनों कहा गया था कि वित्तीय आयोग की अनुशंसा में कहा गया था कि केंद्र और राज्य के बीच टैक्स और कमाई के बीच की हिस्सेदारी का आधार 2011 की जनगणना होगी। इस बंटवारे के लिए कई मानक होते हैं जिनमें सबसे अहम फैक्टर राज्य की आबादी होती है। अब तक 1971 की आबादी का आधार इसके लिए बनाया जाता रहा है। लेकिन आयोग की अनुशंसा के बाद विवाद शुरू हो गया। तब भी दक्षिण के राज्यों का तर्क था कि 2011 की जनगणना का आधार बनाने पर उनका हिस्सा कम हो जाएगा और जनसंख्या वृद्धि को रोकने की दिशा में उठाए प्रभावी कदम की सजा उन्हें मिलेगी।

2011 जनगणना से उत्तर के राज्यों का हिस्सा अचानक बढ़ जाएगा। क्योंकि 1971 से 2011 के बीच इन राज्यों की आबादी तेजी से बढ़ी है जबकि दक्षिण के राज्यों की आबादी बढ़ने का अनुपात उससे कम रहा। इस मुद्दे ने दक्षिण के सभी राज्यों को अभूतपूर्व तरीके से एक कर दिया था। अधिकतर दलों ने इसे दक्षिण की अस्मिता को भी जोड़ दिया था।

समान नागरिक संहिता को लेकर क्या है सरकार का विचार?

समान नागरिक संहिता को लेकर सरकार ने अपना विचार बना लिया है! उत्तराखंड की बीजेपी सरकार ने समान नागरिक संहिता यानी UCC विधेयक पास कर दिया है। राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि उत्तराखंड UCC लागू करने वाला पहला राज्य बन रहा है और उम्मीद है कि इसके बाद दूसरे राज्य भी इस दिशा में आगे बढ़ेंगे। समान नागरिक संहिता बीजेपी का मुद्दा रहा है और चुनावी वादे में से एक रहा है। लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी शासित कम से कम एक राज्य में UCC लागू कर बीजेपी यह संदेश दे रही है कि पार्टी अपने सभी चुनावी वादे पूरे करती है। बीजेपी और बीजेपी का वैचारिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूरे देश में समान नागरिक संहिता की वकालत करता रहा है और यह बीजेपी और संघ दोनों का बड़ा मुद्दा रहा है। भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1951 में कहा था कि एक देश में दो निशान, दो प्रधान और दो विधान नहीं चलेंगे। यह नारा जम्मू-कश्मीर में दिया गया था। बीजेपी नेता कई मौकों पर इसका जिक्र भी करते रहे हैं। दरअसल, पूरे देश में एक साथ समान नागरिक संहिता से पहले बीजेपी इसे लेकर एक माहौल तैयार करना चाहती थी। इसी वजह से ही कई बार संसद में बीजेपी सदस्य प्राइवेट मेंबर बिल के तौर पर समान नागरिक संहिता का बिल लेकर आए। पिछले साल मध्य प्रदेश में एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि एक परिवार में दो कानून कैसे चलेंगे। इसके बाद इस पर चर्चा होने लगी कि बीजेपी लोकसभा चुनाव में इसे बड़ा मुद्दा बना सकती है। UCC को लेकर लॉ कमिशन काम कर रहा है और लोगों से भी सुझाव मांगे गए।

बीजेपी शासित राज्य में UCC लागू करके बीजेपी दो चीजें हासिल कर रही है। एक तो यह कि राज्य में लागू होने के बाद यह एक तरह से पायलट प्रॉजेक्ट की तरह होगा और उसमें क्या कुछ बदलाव की जरूरत है, क्या कहीं कोई दिक्कत आ रही है, इन सब मसलों पर विचार किया जा सकता है। साथ ही बीजेपी यह संदेश भी देना चाहती है कि उन्होंने अपना समान नागरिक संहिता का वादा पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। बीजेपी शासित राज्य एक के बाद एक इसे लागू कर सकते हैं। UCC को लेकर जब लॉ कमिशन ने लोगों की राय लेनी शुरू की तब आदिवासी समुदाय की तरफ से इसका विरोध हुआ था और कहा गया था कि उन्हें इससे छूट मिलनी चाहिए। उत्तराखंड में जो समान नागरिक संहिता विधेयक पास हुआ है उसमें आदिवासी समुदाय को छूट दी गई है।

उत्तराखंड छोटा राज्य है। जहां मुस्लिम आबादी भी कम है। मुस्लिम आबादी यहां करीब 13 पर्सेंट ही है, वह भी राज्य के तराई वाले इलाके में है। हिंदुओं का एक तरह से उत्तराखंड गढ़ है। इसे देवभूमि कहा जाता है और यहां चारधाम हैं। बीजेपी को उम्मीद थी कि यहां इसका कुछ खास विरोध भी नहीं होगा। बीजेपी देखना चाहती है कि छोटे राज्य में लागू कराकर इसे लेकर कैसी प्रतिक्रियाएं मिलती हैं। आदिवासी समुदाय को इससे बाहर रखा गया है तो क्या इसका कोई असर होगा या फिर अगर मामला कोर्ट जाता है तो क्या यह वहां टिक पाएगा या किस तरह के तर्क रखे जा सकते हैं, ये सब भी पता चलेगा। गुजरात, असम, सहित कुछ और राज्यों की बीजेपी सरकार भी UCC लाने की बात कह चुकी हैं।

वादों की गंभीरताबीजेपी ने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल-370 हटाने, महिला आरक्षण बिल, राम मंदिर निर्माण जैसे अपने चुनावी वादे पूरे कर लिए हैं और UCC भी बीजेपी का चुनावी वादा था। लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी यह संदेश देना चाहती है कि वह अपने इस वादे को लेकर भी गंभीर है। UCC को बीजेपी महिला अधिकारों के साथ भी जोड़ रही है और इसी तरह इसका प्रचार कर रही है। UCC को लेकर जब लॉ कमिशन ने लोगों की राय लेनी शुरू की तब आदिवासी समुदाय की तरफ से इसका विरोध हुआ था और कहा गया था कि उन्हें इससे छूट मिलनी चाहिए। उत्तराखंड में जो समान नागरिक संहिता विधेयक पास हुआ है उसमें आदिवासी समुदाय को छूट दी गई है।वह मुस्लिम महिलाओं के इसके फायदे बता रही है, साथ ही महिला सशक्तीकरण के लिए इसे जरूरी बता रही है। बीजेपी का मानना है कि महिलाएं उनका एक बड़ा वोट बैंक बन गया है और वह इसे धर्म-जाति से अलग एक समुदाय के रूप में देखते हैं।

आखिर किन-किन सीटों से चुनाव लड़ेगा गांधी परिवार?

आज हम आपको बताएंगे कि आखिर गांधी परिवार किन-किन सीटों से चुनाव लड़ेगा! कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के राज्यसभा जाने की अटकलें तेज हो गई हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, सोनिया गांधी हिमाचल प्रदेश या राजस्थान से राज्यसभा के लिए चुना जा सकता है। सूत्रों का कहना है कि स्वास्थ्य कारणों से सोनिया गांधी लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगी। ऐसे में संसद में बने रहने के लिए और कुछ अन्य मुद्दों को सुलझाने के लिए राज्यसभा सीट उनके लिए एक अच्छा विकल्प हो सकता है। उधर सोनिया गांधी के राज्यसभा में जाने के बाद रायबरेली से प्रियंका गांधी के चुनाव लड़ने की संभावना है। प्रियंका गांधी लंबे समय से उत्तर प्रदेश में सक्रिय रही हैं। विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने यूपी में काफी मेहनत की थी। दरअसल, 27 फरवरी को होने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर सोमवार शाम अहम मीटिंग हुई। इसमें सोनिया गांधी को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की खाली हो रही राज्यसभा सीट ऑफर करने पर चर्चा हुई।प्रियंका गांधी ने आज तक कभी चुनाव नहीं लड़ा है। रायबरेली की सीट कांग्रेस की सबसे सुरक्षित सीट मानी जाती है। 1952 के पहले लोकसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस यहां सिर्फ तीन बार हारी है। 77 वर्षीय सोनिया गांधी पहली बार 1999 में कांग्रेस के गढ़ रायबरेली से लोकसभा के लिए चुनी गई थीं। तब से वह इस सीट से लगातार जीतती आ रही हैं। रायबरेली की पड़ोसी लोकसभा सीट अमेठी भी कभी कांग्रेस का गढ़ हुआ करती थी। 2004 से राहुल गांधी इसका प्रतिनिधित्व करते थे, लेकिन 2019 में भारतीय जनता पार्टी ने यह सीट जीत ली। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने गांधी परिवार से जोरदार मुकाबला कर अमेठी सीट पर कब्जा कर लिया।

कांग्रेस की मध्य प्रदेश कांग्रेस इकाई ने पार्टी की पूर्व प्रमुख सोनिया गांधी से राज्यसभा में राज्य का प्रतिनिधित्व करने की अपील की है। राज्य इकाई के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सोमवार को बताया कि वरिष्ठ नेता कमलनाथ ने हाल ही में दिल्ली में सोनिया गांधी से मुलाकात की और उनसे प्रदेश इकाई की मांग पर विचार करने का आग्रह किया। पटवारी ने एक बयान में कहा, ‘मध्य प्रदेश कांग्रेस चाहती है कि सोनिया जी राज्यसभा में राज्य का प्रतिनिधित्व करें। राज्य के सभी वरिष्ठ नेता और विधायक इस मांग पर एकमत हैं।’ उन्होंने कहा, ‘राज्य में कांग्रेस पार्टी को लगता है कि अतीत में प्रधानमंत्री का पद अस्वीकार करने वाली सोनिया जी अगर मध्य प्रदेश से राज्यसभा में जाएंगी तो लोगों की आवाज मजबूत होगी।’ पटवारी ने यह भी कहा कि अगर कमलनाथ राज्यसभा सदस्य बनने के इच्छुक हैं तो राज्य इकाई उनका समर्थन करेगी। मध्य प्रदेश से राज्यसभा में मौजूदा पांच सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। इन पांच सीटों में से चार पर सत्तारूढ़ भाजपा और एक पर विपक्षी कांग्रेस का कब्जा है। प्रदेश की 230 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के 163 और कांग्रेस के 66 विधायक हैं। विधानसभा में अपने सदस्यों की संख्या के आधार पर कांग्रेस मध्य प्रदेश से एक राज्यसभा सीट जीत सकती है। चुनाव आयोग के अनुसार, 56 सीटों के लिए राज्यसभा का द्विवार्षिक चुनाव 27 फरवरी को होगा।

बता दे कि दूसरी ओर लोकसभा चुनाव से पहले संसद का यह आखिरी सत्र है। ऐसे में सरकार ने मंगलवार को सर्वदलीय बैठक की। रक्षा मंत्री और लोकसभा में सदन के उपनेता राजनाथ सिंह, संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी और संसदीय कार्य राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बैठक में सरकार का प्रतिनिधित्व किया। संसद भवन परिसर में हुई इस बैठक में उपस्थित नेताओं में कांग्रेस के नेता कोडिकुनिल सुरेश, तृणमूल कांग्रेस के सुदीप बंदोपाध्याय शामिल हुए। इनके अलावा डीएमके नेता टी आर बालू, शिवसेना के राहुल शेवाले, समाजवादी पार्टी के नेता एसटी हसन, जेडीयू नेता रामनाथ ठाकुर और टीडीपी के जयदेव गल्ला शामिल थे।राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का बैठक में प्रतिनिधित्व कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने किया। विधानसभा में अपने सदस्यों की संख्या के आधार पर कांग्रेस मध्य प्रदेश से एक राज्यसभा सीट जीत सकती है। चुनाव आयोग के अनुसार, 56 सीटों के लिए राज्यसभा का द्विवार्षिक चुनाव 27 फरवरी को होगा।उन्होंने इस दौरान असम में राहुल गांधी के नेतृत्व वाली ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ पर ‘हिंसक हमले’ और उस पर राज्य सरकार की लगाई गई पाबंदियों का मुद्दा उठाया। राज्यसभा में कांग्रेस के उप नेता प्रमोद तिवारी ने कहा कि देश में ‘अघोषित तानाशाही’ कायम है। अंतरिम बजट सत्र से पहले कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने कहा कि जिस तरह से आर्थिक रूप से देश को बर्बाद किया जा रहा है, मैंने वो मुद्दा उठाया है।

अपने कार्यकाल के दौरान कौन-कौन से सांसद थे लोकसभा से जुदा?

आज हम आपको बताएंगे कि अपने कार्यकाल के दौरान कौन-कौन से सांसद लोकसभा से जुदा थे! हाल ही में संसद का बजट सत्र संपन्न हुआ। इसी के साथ संसद की 17वीं लोकसभा में आखिरी सत्र संपन्न हो गया। इन पांच सालों में तमाम सांसदों ने बताैर प्रतिनिधि अपने अपने इलाके के लोगों के सरोकार, मुृद्दे और आवाज को सदन में उठाने की कोशिश की। लेकिन लोकसभा के 543 सांसदों में से कुछ ऐसे भी थे, जिन्होंने संसदीय गतिविधि में न के बराबर भाग लिया। इनमें प्रमुख नाम ‘गदर’ व ‘गदर2’ जैसी फिल्मों के हीरो सनी देओल और पूर्व मंत्री व सांसद रह चुके शत्रुघ्न सिन्हा भी शामिल हैं।लोकसभा सूत्रों के मुताबिक, बंगाल से टीएमसी सांसद दिब्येंदु अधिकारी, कर्नाटक से बीजेपी सांसद व पूर्व राज्य मंत्री अनंत कुमार हेगड़े, बीजेपी सांसद वी श्रीनिवास प्रसाद और बीजेपी सांसद बी एन बचे गौडा, पंजाब से बीजेपी सांसद सनी देओल, असम से बीजेपी सांसद प्रदान बरुआ ऐसे सांसद हैं, जो लोकसभा के अपने पांच साल के कार्यकाल में सदन में एक शब्द भी नहीं बोले। इन लोगों ने किसी भी संबोधन व चर्चा में भाग नहीं लिया। हालांकि इन सांसदों ने भले मौखिक रूप से कोई भागीदारी न दिखाई हो, लेकिन लिखित रूप से भागीदारी जरूर दिखाई। इन लोगों ने लिखित सवाल या लिखित रूप से अपनी भागीदारी जरूर दिखाई।

 वहीं दूसरी ओर संसद में तीन सांसद ऐसे भी थे, जिन्होंने सदन में लिखित या मौखिक किसी भी रूप में अपनी भागीदारी दर्ज नहीं कराई। इनमें बॉलिवुड से नेता बने वेस्ट बंगाल से टीएमसी सांसद शत्रुघ्न सिन्हा, यूपी से बीएसपी सांसद अतुल राय और कर्नाटक से बीजेपी सांसद व पूर्व राज्य मंत्री रमेश सी जिगजिगानी शामिल हैं। गौरतलब है कि शत्रुघ्न सिन्हा जहां 2022 में ही चुन कर लोकसभा पहुंचे। वहीं राय लोकसभा चुनाव जीतने के तुरंत बाद आपराधिक मामले में जेल चले गए, जहां वह चार साल तक लगातार जेल में रहे। पिछले साल अगस्त में ही उनकी रिहाई हुई। जबकि जिगजिगानी के लिए कहा जाता है कि वह अपनी सेहत के चलते लोकसभा में सक्रिय नहीं रह पाए।लोकसभा से मिली जानकारी के मुताबिक, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 17वीं लोकसभा के आखिरी सत्र से पहले तमाम ऐसे सांसदों को लेकर कोशिश की कि जो लोग एक बार भी सदन में नहीं बोले हैं, उन्हें बोलने का मौका दिया। कहा जाता है कि सनी देओल को दो बार बोलने के लिए कहा गया, लेकिन वह दोनों बार ही बिना बोले चले गए।

वहीं दूसरी ओर लोकसभा चुनाव से पहले संसद का यह आखिरी सत्र है। ऐसे में सरकार ने मंगलवार को सर्वदलीय बैठक की। रक्षा मंत्री और लोकसभा में सदन के उपनेता राजनाथ सिंह, संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी और संसदीय कार्य राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बैठक में सरकार का प्रतिनिधित्व किया। संसद भवन परिसर में हुई इस बैठक में उपस्थित नेताओं में कांग्रेस के नेता कोडिकुनिल सुरेश, तृणमूल कांग्रेस के सुदीप बंदोपाध्याय शामिल हुए। इनके अलावा डीएमके नेता टी आर बालू, शिवसेना के राहुल शेवाले, समाजवादी पार्टी के नेता एसटी हसन, जेडीयू नेता रामनाथ ठाकुर और टीडीपी के जयदेव गल्ला शामिल थे।राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का बैठक में प्रतिनिधित्व कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने किया। उन्होंने इस दौरान असम में राहुल गांधी के नेतृत्व वाली ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ पर ‘हिंसक हमले’ और उस पर राज्य सरकार की लगाई गई पाबंदियों का मुद्दा उठाया। राज्यसभा में कांग्रेस के उप नेता प्रमोद तिवारी ने कहा कि देश में ‘अघोषित तानाशाही’ कायम है। अंतरिम बजट सत्र से पहले कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने कहा कि जिस तरह से आर्थिक रूप से देश को बर्बाद किया जा रहा है, मैंने वो मुद्दा उठाया है।

प्रमोद तिवारी ने कहा कि असम सरकार राहुल गांधी की यात्रा पर हिंसक हमले करवा रही है। इस सरकार को लगभग 10 साल तो बीत गए। किसान की आय को दोगुना करना तो दूर, लागत निकाल पाना मुश्किल है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 17वीं लोकसभा के आखिरी सत्र से पहले तमाम ऐसे सांसदों को लेकर कोशिश की कि जो लोग एक बार भी सदन में नहीं बोले हैं, उन्हें बोलने का मौका दिया। कहा जाता है कि सनी देओल को दो बार बोलने के लिए कहा गया, लेकिन वह दोनों बार ही बिना बोले चले गए।इसी तरह से जैसे विरोधियों पर ED, CBI और IT की रेड हो रही है वो शर्मनाक और लोकतंत्र के खिलाफ है। इसी बीच संसदीय कार्यमंत्री प्रह्लाद जोशी ने बड़ी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि इस सत्र से ठीक पहले सभी निलंबित सांसदों का निलंबन रद्द कर दिया जाएगा।

पेटीएम के चक्कर में किस कंपनी की हुई वाहवाही?

आज हम आपको बताएंगे कि पेटीएम के चक्कर में आखिर किस कंपनी की वाहवाही हो चुकी है! बीते 31 जनवरी को बैंकिंग सेक्टर के रेगुलेटर रिजर्व बैंक ने पेटीएम पेमेंट बैंक पर बड़ी कार्रवाई का ऐलान किया था। इसके बाद से ही पेटीएम की स्थिति खराब हो गई है। पिछले एक सप्ताह से शेयर बाजार में पेटीएम के शेयरों की पिटाई ही हो रही है। इस बीच खबर आई है कि रिजर्व बैंक और पेटीएम तनातनी मामले में कुछ अन्य वॉलेट्स की बल्ले-बल्ले हो गई है। बीते 31 जनवरी के बाद देखें तो फोनपे, गूगल पे और मोबिक्विक ऐप का डाउनलोड खूब बढ़ा है। ऐप इंटेलीजेंस प्लेटफार्म ऐपट्वीक के आंकड़ों के मुताबिक रिजर्व बैंक और पेटीएम की तनातनी में सबसे बड़ा लाभार्थी फोनपे रहा है। 31 जनवरी 2024 के बाद से वालमार्ट की कंपनी फोनपे के डाउनलोड में 40 फीसदी से भी ज्यादा की बढ़ोतरी देखी गई है। सिर्फ एक से छह फरवरी के बीच में ही गूगल प्ले स्टोर और ऐपल के ऐप स्टोर से फोनपे का 3.75 मिलियन डाउनलोड हुआ है। इसी दौरान गूगल पे ऐप का डाउनलोड भी 14 फीसदी बढ़ा है। मोबिक्विक का डाउनलोड भी करीब दूना हो गया है। उक्त अवधि के दौरान MobiKwik का 280,588 डाउनलोड हुआ।

ऐप इंटेलीजेंस प्लेटफार्म एप्पट्वीक का आंकड़ा बताता है कि 31 जनवरी 2024 के बाद पेटीएम का डाउनलोड करीब 32 फीसदी घटा है। इस अवधि में पेटीएम ऐप का डाउनलोड महज 998301 रहा है। आरबीआई की इस कार्रवाई से पहले इसका एक सप्ताह का डाउनलोड 1.48 मिलियन रहा था। मार्केट इंटेलीजेंस फर्म सेंसर टॉवर Sensor Tower के आंकड़े के अनुसार सप्ताह दर सप्ताह के हिसाब से पिछले सप्ताह पेटीएम ऐप का डाउनलोड 20 फीसदी घटा है। वहीं फोनपे और गूगलपे में औसत 52 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। फोनपे के कुल डाउनलोड में तो 76 फीसदी की बढ़ोतरी दिखी है। फिनटेक कंपनी MobiKwik ने इस बीच अपना वर्कफोर्स एक्सपेंशन करना शुरू कर दिया है। हाल ही में कंपनी ने मोहित नारायण को चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर के रूप में एलिवेट किया है। कंपनी के पेमेंट गेटवे डिवीजन में हरविंदर सिंह चड्ढा को लाया गया है। पेटीएम पेमेंट बैंक पर आरबीआई के शिकंजे के बीच उसके प्रतिस्पर्धी एयरटेल पेमेंट बैंक भी अपने विस्तार का ताना-बाना बुन रहा है। बताया जाता है कि अगली तिमाही के दौरान बैंक अपने सेल्सफोर्स में पांच गुने की बढ़ोतरी करने वाला है। इस समय बाजार में कंपनी के तीन हजार से भी ज्यादा सेल्सपीपल काम कर रहे हैं। इस समय एयरटेल पेमेंट बैंक के 10 लाख से भी जयादा मर्चेंट लाइव हैं।इसी के साथ कंपनी ने अपने साउंडबॉक्स प्रोडक्ट मोबिक्विक वाइब का छोटे कारोबारियों के बीच डिप्लायमेंट बढ़ा दिया है। साथ ही पीओएस मशीनों की संख्या भी बढ़ा रहा है। खबर मिली है कि कंपनी हार्डवेयर इनवेस्टमेंट में 702.85 मिलियन रुपये का योगदान कर रहा है।

बाजार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पिछले आठ दिनों में मोबिक्विक के ऐप इंस्टालमेंट में शत-प्रतिशत का इजाफा हुआ है। यह सब आर्गेनिक ग्रोथ बताया जाता है। यही नहीं, ऑफलान मर्चेंट जीएमवी भी 30 फीसदी बढ़ा है। ऑनलाइन मर्चेंट जीएमवी में 25 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है जबकि यूपीआई ट्रांजेक्शन भी 50 फीसदी बढ़ा है।पेटीएम पेमेंट बैंक पर आरबीआई के शिकंजे के बीच उसके प्रतिस्पर्धी एयरटेल पेमेंट बैंक भी अपने विस्तार का ताना-बाना बुन रहा है। बताया जाता है कि अगली तिमाही के दौरान बैंक अपने सेल्सफोर्स में पांच गुने की बढ़ोतरी करने वाला है। इस समय बाजार में कंपनी के तीन हजार से भी ज्यादा सेल्सपीपल काम कर रहे हैं। इस समय एयरटेल पेमेंट बैंक के 10 लाख से भी जयादा मर्चेंट लाइव हैं।

 पेटीएम संकट से पहले की बात करें तो इसमें अमरीकी कंपनियों का ही बर्चस्व है। ये दो कंपनियां हैं वालमार्ट की कंपनी फोनपे और गूगल का लोकल पेमेंट सर्विस। 31 जनवरी 2024 के बाद से वालमार्ट की कंपनी फोनपे के डाउनलोड में 40 फीसदी से भी ज्यादा की बढ़ोतरी देखी गई है। सिर्फ एक से छह फरवरी के बीच में ही गूगल प्ले स्टोर और ऐपल के ऐप स्टोर से फोनपे का 3.75 मिलियन डाउनलोड हुआ है। इसी दौरान गूगल पे ऐप का डाउनलोड भी 14 फीसदी बढ़ा है। मोबिक्विक का डाउनलोड भी करीब दूना हो गया है। उक्त अवधि के दौरान MobiKwik का 280,588 डाउनलोड हुआ।हर महीने यूपीआई वॉल्यूम में इनकी on an average 80-85% की हिस्सेदारी है। एनपीसीआई NPCI के आंकड़े बताते हैं कि दिसंबर 2023 के दौरान यूपीआई वॉल्यूम में PhonePe की हिस्सेदारी 46% की रही। इसके बाद गूगल पे Google Pay की हिस्सेदारी 36% की और पेटीएम पेमेंट बैंक Paytm Payments Bank की हिस्सेदारी 13% की रही।

क्या वर्तमान में युवाओं में भी हो रहा है प्रोस्टेट कैंसर?

वर्तमान में युवाओं में भी प्रोस्टेट कैंसर का खतरा बढ़ता ही जा रहा है! मुंबई के मरीन ड्राइव के रहने वाले एस. निखिल ने 18 महीने पहले कोविड महामारी के बाद पहली बार पूरे शरीर का चेकअप करवाया था। निखिल ने अपने दोस्तों के कहने पर यह चेकअप कराया था। निखल के पूरे शरीर का चेकअप होने के बाद जो रिपोर्ट सामने आई वो वाकई चौंकाने वाली थी। उनकी रिपोर्ट में प्रोस्टेट-विशिष्ट एंटीजन पीएसए का स्तर बहुत अधिक पाया गया। सरल भाषा में बताएं तो निखिल को प्रॉस्टेट कैंसर था। पीएसए असल में इसी कैंसर का संकेत देने वाला एक प्रोटीन होता है। पेशे से बिजनेसमैन निखिल बताते हैं कि मैं उस वक्त 55 साल का था, स्वस्थ था, लगभग हर रोज टेनिस खेलता था और ऐसा कोई लक्षण नहीं था जिससे मुझे शक हो कि मुझे प्रॉस्टेट कैंसर भी हो सकता है। निखिल को कैंसर होने का एक और कारण यह था कि उन्हें कोई लक्षण नहीं दिख रहे थे। आम तौर पर यह बीमारी 70-80 साल के बुजुर्गों को होती है। लेकिन जांच के बाद डॉक्टरों को पता चला कि उन्हें आठवें चरण का प्रॉस्टेट कैंसर है, जिसका जल्द ऑपरेशन जरूरी था। यूरो-ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. अनूप रमानी और डॉ. अमित जोशी के मुताबिक, निखिल का मामला एक नए चलन को दर्शाता है, जिसमें प्रॉस्टेट कैंसर होने की उम्र घट रही है। दुर्भाग्य से, इन युवाओं में कैंसर का ज्यादा तेजी से बढ़ने वाला रूप पाया जाता है। टाटा मेमोरियल सेंटर, परेल और खारघर में प्रोफेसर डॉ. जोशी, बताते हैं कि पहले तक मुझे शायद 15 दिन में या एक महीने में एक बार 50 साल के मरीज मिलते थे, लेकिन अब हर ओपीडी में कम उम्र के मरीज आ रहे हैं। डॉ. रमानी का कहना है कि उन्होंने करीब 6 साल पहले इस बदलाव को देखा था। उन्होंने कहा कि कुछ तो बदला हुआ है। यह लाइफस्टाइल से जुड़ी आदतें जैसे धूम्रपान और शराब पीना, जेनेटिक कारण या फिर पीएसए टेस्ट की आसानी से उपलब्धता हो सकती है। कम से कम पढ़े-लिखे और आर्थिक रूप से सक्षम लोगों में, हर साल पीएसए टेस्ट करवाने जैसी स्वस्थ्य जांच की आदतें भी युवाओं में इस कैंसर को जन्म दे सकती हैं।

मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु जैसे शहरों में प्रॉस्टेट कैंसर पुरुषों में होने वाले शीर्ष 10 कैंसर में से एक है। मुंबई में, यह 1990 में पुरुषों में आठवें सबसे आम कैंसर से बढ़कर 2014 में तीसरे नंबर पर पहुंच गया है। 4 फरवरी को विश्व कैंसर दिवस पर WHO के आंकड़ों के अनुसार, 2022 में भारत में 37,948 पुरुष प्रॉस्टेट कैंसर से प्रभावित हुए हैं। जो देश में दर्ज 14 लाख नए कैंसर मामलों में लगभग 3% है। डॉ. रमानी ने कहा कि भारत में सबसे बड़ी समस्या मृत्यु दर अधिक होना है। अमेरिका में, 80% प्रॉस्टेट कैंसर के रोगियों का जल्दी पता चल जाता है और 20% बहुत देर से आते हैं। भारत में यह आंकड़े उलट हैं।

आमतौर पर प्रॉस्टेट कैंसर बहुत धीमी गति से बढ़ता है, इसलिए कई मामलों में लक्षण दिखने से पहले ही किसी व्यक्ति की अन्य प्राकृतिक कारणों से मृत्यु हो सकती है। लेकिन 40 या 50 साल के उम्र में होने वाले प्रॉस्टेट कैंसर की अलग खासियत होती है। यह अधिक तेजी से फैलता है। डॉ. जोशी बताते हैं, कम उम्र के प्रॉस्टेट कैंसर वाले मरीज हमारे पास आते हैं तब तक कैंसर अधिक तेजी से बढ़ रहा होता है और अंगों में फैल चुका होता है।’ यह उसी तरह है जैसे कम उम्र की महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का अधिक तेज बढ़ने वाला रूप पाया जाता है। उन्होंने कहा कि कुछ जेनेटिक फैक्टर या आणविक प्रक्रियाएं इसके लिए जिम्मेदार हो सकती हैं, लेकिन अभी तक इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला है। कम उम्र में प्रॉस्टेट कैंसर के बढ़ते मामलों का पता लगाने के लिए डॉ. जोशी की टीम ने टाटा मेमोरियल सेंटर के खारघर शाखा में एक अध्ययन शुरू किया है। लेकिन डॉ. जोशी कहते हैं कि 50 साल से अधिक उम्र के सभी पुरुषों को पीएसए टेस्ट करवाने की सलाह नहीं दी जा सकती।

पूरे विश्व में भारत समेत, कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं। टाटा मेमोरियल सेंटर के निदेशक शैक्षणिक डॉ. श्रीपाद बनावली ने बताया, ‘पहले जब मैं मरीजों का मेडिकल हिस्ट्री लेता था, तो कोई भी मरीज ये नहीं कहता था कि उनके परिवार में किसी और को कैंसर हुआ है। लेकिन अब लगभग हर मरीज के परिवार में कोई न कोई कैंसर का मरीज होता है।’ कैंसर के मामले पूरी दुनिया में बढ़ रहे हैं और साथ ही कम उम्र में होने वाले कैंसर के मामलों में भी वृद्धि हो रही है, जिसमें प्रॉस्टेट कैंसर भी शामिल है। सितंबर 2023 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि पिछले 30 वर्षों में 50 से कम आयु वर्ग के लोगों में कैंसर होने की दर में 79% की वृद्धि हुई है। 1990 में जहां 1.8 मिलियन कैंसर का पता चला था, वहीं 2019 में यह संख्या बढ़कर 3.3 मिलियन हो गई।