Monday, March 16, 2026
Home Blog Page 570

दिल्ली के कोचिंग सेंटर्स के लिए क्या बोले उपराष्ट्रपति धनखड़?

हाल ही में उपराष्ट्रपति धनखड़ ने दिल्ली के कोचिंग सेंटर्स के लिए एक बयान दिया है! दिल्ली के एक कोचिंग सेंटर तीन UPSC कैंडिडेट्स की मौत का मुद्दा राज्यसभा में उठा। इस चर्चा में कोचिंग सेंटरों की भूमिका पर भी सवाल उठे। विपक्ष ने शिक्षा के निजीकरण और सरकारी स्कूलों की हालत पर भी चिंता जताई। राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए चर्चा की अनुमति दी। उन्होंने कहा कि यह मामला हमारे युवाओं, शहरी ढांचे और शासन से जुड़ा है।उन्होंने सुझाव दिया कि दिल्ली सरकार को सभी कोचिंग सेंटरों की सूची बनाकर यह जांच करनी चाहिए कि वे नियमों का पालन कर रहे हैं या नहीं। कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने देश में बढ़ते कोचिंग उद्योग पर चिंता जताई।कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने देश में बढ़ते कोचिंग उद्योग पर चिंता जताई। AAP नेता संजय सिंह ने आरोप लगाया कि दिल्ली के उपराज्यपाल राज्य सरकार को ठीक से काम नहीं करने दे रहे हैं। उन्होंने हालिया घटना को उन कई वर्षों की चूक का नतीजा बताया जब MCD में बीजेपी काबिज थी।उन्होंने इसके लिए 10 साल के NDA शासन को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि पिछले 10 साल से एक ऐसी सरकार सत्ता में है जिसने शिक्षा के पवित्र क्षेत्र का व्यवसायीकरण और निजीकरण कर दिया है। उपराष्ट्रपति धनखड़ ने चर्चा के दौरान कोचिंग सेंटरों पर भी तीखी टिप्पणी भी की। उन्होंने कहा कि कोचिंग एक ऐसा उद्योग बन गया है जहां मुनाफा ही सब कुछ है। अखबारों में हर दिन कोचिंग सेंटरों के पूरे पन्ने के विज्ञापन छपते हैं। इन विज्ञापनों की जांच होनी चाहिए। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा कि कोचिंग सेटर्स से जुड़े विज्ञापन पर खर्च होने वाला हर पैसा छात्रों से ही आता है।

हर नई इमारत छात्रों के पैसों से बनती है। ऐसे में इस पर लगाम लगाने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है। उन्होंने कोचिंग सेंटर्स की तुलना गैस चैंबर से किया है। धनखड़ ने कहा कि कोचिंग एक फलता-फूलता उद्योग बन गया है जहां मुनाफा बहुत ज्यादा है। हम हर दिन अखबारों में कोचिंग सेंटरों के पूरे पन्ने के विज्ञापन देखते हैं और इस तरह के विज्ञापनों की जांच करने की जरूरत है। वास्तव में एक ऐसे दृष्टिकोण की आवश्यकता है जो इसे दूर करने में एक लंबा रास्ता तय कर सके।

राज्यसभा में बीजेपी नेता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि दिल्ली के कोचिंग संस्थान में हुई घटना में दिल्ली सरकार और MCD की लापरवाही साफ दिखती है। उन्होंने सुझाव दिया कि दिल्ली सरकार को सभी कोचिंग सेंटरों की सूची बनाकर यह जांच करनी चाहिए कि वे नियमों का पालन कर रहे हैं या नहीं। कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने देश में बढ़ते कोचिंग उद्योग पर चिंता जताई। उन्होंने इसके लिए 10 साल के NDA शासन को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि पिछले 10 साल से एक ऐसी सरकार सत्ता में है जिसने शिक्षा के पवित्र क्षेत्र का व्यवसायीकरण और निजीकरण कर दिया है।

सुरजेवाला ने इस दौरान पिछले 10 सालों में बंद हुए सरकारी स्कूलों और खुलने वाले निजी स्कूलों का आंकड़ा पेश किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा का निजीकरण करने की कोशिश की जा रही है। TMC सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने कहा कि सदन को रेल हादसों, NEET, मणिपुर अशांति, असम बाढ़, किसान आत्महत्या और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर भी उतनी ही गंभीरता और तेजी से चर्चा करनी चाहिए जितनी कि विपक्ष की ओर से उठाए गए मुद्दों पर। बता दें कि उपराष्ट्रपति धनखड़ ने चर्चा के दौरान कोचिंग सेंटरों पर भी तीखी टिप्पणी भी की। उन्होंने कहा कि कोचिंग एक ऐसा उद्योग बन गया है जहां मुनाफा ही सब कुछ है। अखबारों में हर दिन कोचिंग सेंटरों के पूरे पन्ने के विज्ञापन छपते हैं। इन विज्ञापनों की जांच होनी चाहिए। राज्यसभा में बीजेपी नेता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि दिल्ली के कोचिंग संस्थान में हुई घटना में दिल्ली सरकार और MCD की लापरवाही साफ दिखती है।उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा कि कोचिंग सेटर्स से जुड़े विज्ञापन पर खर्च होने वाला हर पैसा छात्रों से ही आता है। AAP नेता संजय सिंह ने आरोप लगाया कि दिल्ली के उपराज्यपाल राज्य सरकार को ठीक से काम नहीं करने दे रहे हैं।हर नई इमारत छात्रों के पैसों से बनती है। ऐसे में इस पर लगाम लगाने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है। उन्होंने कोचिंग सेंटर्स की तुलना गैस चैंबर से किया है। उन्होंने हालिया घटना को उन कई वर्षों की चूक का नतीजा बताया जब MCD में बीजेपी काबिज थी।

संसद में बजट के भेदभाव के आरोप पर क्या बोली वित्त मंत्री?

हाल ही में संसद में बजट के भेदभाव के आरोप पर वित्त मंत्री ने एक बयान दे दिया है! वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मंगलवार बजट 2024-25 पर चर्चा का जवाब देते हुए विपक्षी दलों पर आंकड़ों के जरिए जोरदार हमला बोला। इस बार का बजट पेश होने के बाद अधिकांश विपक्षी दलों ने सदन के भीतर और बाहर यह कहा कि केवल दो राज्यों का बजट है बाकी राज्यों का नाम भी नहीं लिया गया। निर्मला सीतारमण ने कहा कि विपक्ष यह भ्रम फैला रहा है कि बजट में सिर्फ दो राज्यों का नाम लिया और बाकी राज्यों को कुछ नहीं मिला। वित्त मंत्री ने साल 2004 से लेकर 2014 तक के यूपीए के दस साल के बजट का एक आंकड़ा संसद में दिया। इन आंकड़ों के जरिए उन्होंने कांग्रेस समेत दूसरे विपक्षी दलों को आईना दिखाया। उन्होंने कहा जो यह आरोप लगा रहे हैं उन्हें पता भी है कि उनके बजट में क्या होता था।वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार के अर्थव्यवस्था के बेहतर प्रबंधन और बुनियादी ढांचे पर पूंजीगत व्यय के कारण कोविड महामारी के बाद भारत ने ऊंची वृद्धि हासिल की और आज हमारा देश दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है।आंकड़ों के जरिए निर्मला सीतारमण ने कहा कि यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में 2004-05 में तत्कालीन वित्त मंत्री ने 17 राज्यों का नाम नहीं लिया। क्या उन सभी 17 राज्यों को पैसा नहीं मिला। अगले साल 2005-2006 के बजट में 18 राज्यों का नाम नहीं था। उसके अगले साल 2006-2007 में 13 राज्यों का नाम नहीं गिनाया।

उसके बाद 2007-2008 में 16 राज्यों का नाम नहीं था भाषण में फिर उसके बाद अगले वित्त वर्ष में 2008-2009 में 13 राज्यों का नाम नहीं था। 2009-2010 में 26, 2010-2011 में 19,2012-2013 में 16 और 2013-2014 में 10 राज्यों का नाम बजट में शामिल नहीं था। क्या यूपीए कार्यकाल के पहले और यूपीए के दूसरे कार्यकाल में राज्यों का नाम नहीं था तो बजट नहीं मिला।

 महाराष्ट्र का उदाहरण देते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि अगर बजट में इसके नाम की घोषणा नहीं की गई तो क्या महाराष्ट्र को नजरअंदाज कर दिया गया। वधावन बंदरगाह को 76,000 करोड़ रुपये आवंटित किये गये हैं। टीएमसी पर निशाना साधते हुए सीतारमण ने कहा कि कल टीएमसी ने बजट पर सवाल उठाया कि पश्चिम बंगाल को कुछ नहीं दिया गया है।

पीएम मोदी द्वारा दी गई कई योजनाएं बंगाल में लागू भी नहीं की गई हैं और अब आपके पास मुझसे पूछने की हिम्मत है। वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार के अर्थव्यवस्था के बेहतर प्रबंधन और बुनियादी ढांचे पर पूंजीगत व्यय के कारण कोविड महामारी के बाद भारत ने ऊंची वृद्धि हासिल की और आज हमारा देश दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है।

सीतारमण ने कहा हमारी आर्थिक वृद्धि न केवल बेहतर है बल्कि हम राजकोषीय घाटे को कम करने के रास्ते पर भी हैं। 2023-24 में देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत रही है और भारत ने दुनिया में सबसे तेजी से वृद्धि दर्ज करने वाले प्रमुख देश का दर्जा बरकरार रखा है। उन्होंने कहा हम राजकोषीय मजबूती के तहत 2025-26 में राजकोषीय घाटे को 4.5 प्रतिशत पर लाने के लक्ष्य की दिशा में बढ़ रहे हैं। चालू वित्त वर्ष में इसके 4.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है। बता दें कि यह आरोप लगा रहे हैं उन्हें पता भी है कि उनके बजट में क्या होता था।आंकड़ों के जरिए निर्मला सीतारमण ने कहा कि यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में 2004-05 में तत्कालीन वित्त मंत्री ने 17 राज्यों का नाम नहीं लिया। क्या उन सभी 17 राज्यों को पैसा नहीं मिला। अगले साल 2005-2006 के बजट में 18 राज्यों का नाम नहीं था। उसके अगले साल 2006-2007 में 13 राज्यों का नाम नहीं गिनाया। बता दें कि महाराष्ट्र का उदाहरण देते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि अगर बजट में इसके नाम की घोषणा नहीं की गई तो क्या महाराष्ट्र को नजरअंदाज कर दिया गया। वधावन बंदरगाह को 76,000 करोड़ रुपये आवंटित किये गये हैं। टीएमसी पर निशाना साधते हुए सीतारमण ने कहा कि कल टीएमसी ने बजट पर सवाल उठाया कि पश्चिम बंगाल को कुछ नहीं दिया गया है। इसका श्रेय बेहतर अर्थव्यवस्था प्रबंधन को जाता है। वित्त मंत्री ने विपक्षी दलों के सामाजिक क्षेत्रों के लिए आवंटन कम करने के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि बजट दस्तावेज इसके उलट बयां करता है। शिक्षा क्षेत्र के लिए 1.48 लाख करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। यह पिछले वित्त वर्ष से ज्यादा है।

आखिर संसद में क्यों उठा महाभारत का मुद्दा?

आज हम आपको बताएंगे कि संसद में महाभारत का मुद्दा क्यों उठा था! लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने बजट पर चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष को घेरने के लिए पौराणिक ग्रंथ महाभारत के कुरुक्षेत्र प्रकरण का जिक्र किया। राहुल ने बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को घेरने के लिए चक्रव्यूह के रूपकों का उपयोग किया। इसके जवाब में अगले दिन केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद शशि थरूर की पुस्तक का सहारा लेकर राहुल गांधी पर खूब निशाने साधे। ठाकुर ने थरूर की अंग्रेजी में लिखा उपन्यास- द ग्रेट इंडियन नॉवेल में कही गईं कुछ बातों को पढ़कर सुनाया और कहा कि थरूर ने अपने इस उपन्यास में आधुनिक युग के कौरव के रूप में जिसकी तरफ इशारा किया, वो कांग्रेस पार्टी है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी पढ़ते नहीं हैं, इस कारण वो नहीं जानते कि उनके ही सांसद शशि थरूर ने कांग्रेस पार्टी और राहुल के पूर्वजों के बारे में क्या-क्या लिखा है। ठाकुर ने कहा कि राहुल ने संविधान की वह प्रति भी नहीं पढ़ी है, जिसे लेकर वो इन दिनों घूम रहे हैं। उसकी भूमिका में भी कांग्रेस पार्टी और राहुल के पूर्वजों की घोर आलोचना की गई है। अनुराग ठाकुर ने थरूर के उपन्यास के तीन अलग-अलग पृष्ठों का उल्लेख किया। उन्होंने पेज नंबर 245 में देश के प्रथम प्रधानमंत्री और राहुल गांधी के नाना जवाहर लाल नेहरू की तरफ इशारा करते हुए उन्हें धृतराष्ट्र बताया। ठाकुर ने उपन्यास का कथन सदन में पढ़कर सुनाया, ‘भारत, जिसका नेतृत्व धृतराष्ट्र ने 15 अगस्त, 1947 को संभाला, नए जन्म की दर्दनाक प्रक्रिया से गुजरा ही था, वह फिर से इस अंतहीन चक्र में फंस गया।’ ठाकुर ने कहा कि 15 अगस्त, 1947 को प्रधानमंत्री के रूप में मोदी जी तो नहीं थे और यह कह रहे कि जिन्होंने 15 अगस्त, 1947 को सत्ता ली थी वो धृतराष्ट्र थे। तो धृतराष्ट्र किसको कहा गया?

केंद्रीय मंत्री ने उपन्यास की पृष्ठ संख्या 293 का हवाला देकर इंदिरा गांधी और उनके पुत्र संजय गांधी के बारे में थरूर के व्यक्त विचारों से सदन को रूबरू कराया। उन्होंने पूछा कि थरूर ने जिसे अवसरवादी समाजवादी कहा है, वो कौन थे? उन्होंने कहा, ‘ये फेबियन समाजवादी कौन थे, उसके बारे में किसी और ने नहीं आपके ही सांसद ने लिखा है। इसमें तो आगे इमरजेंसी की चर्चा भी है जिसे इंदिरा गांधी जी ने थोपा था।’ फिर उन्होंने उपन्यास के सातवें अध्याय का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें सिद्धार्थ शंकर रे को शकुनी की संज्ञा दी गई है। कांग्रेस नेता सिद्धार्थ शंकर रे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री थे।

ठाकुर ने फिर उपन्यास के पेज नंबर 366 का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि आपातकाल में प्रेस की स्वतंत्रता छीन ली गई, मौलिक अधिकार को खत्म किया गया, अभिव्यक्ति की आजादी खत्म की गई। उन्होंने कहा कि दु:शासन और दुर्योधन दोनों बहुत ही दुष्ट, दुश्मन और बदमाश हो सकते थे लेकिन उन्होंने भी कभी इमरजेंसी नहीं लगाई। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पूरे उपन्यास में में 74 बार कौरव और कौरव की पार्टी की चर्चा हुई, हरेक में कांग्रेस का चरित्र झलकता है राहुल जी राहुल जी सदन में हजारों साल पूर्व महाभारत की कहानी सुना रहे थे मगर उनकी अपनी पार्टी के पढ़े-लिखे एक विद्वान पूर्व मंत्री और सांसद आज के महाभारत की कहानी लिखते हुए बताते हैं कि कौन कौरव था, कौन शकुनी था, कौन धृतराष्ट्र था, कौन दु:शासन था, कौन दुर्योधन था कौन कर्ण था। जरूर पढ़िए सबके किरदार उसी में मिलने वाले हैं।

केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने प्रधानमंत्री की तुलना महाभारत के अभिमन्यु से किया। उन्होंने कहा कि आप जिस अभिमन्यु को गिराने की कोशिश पिछले 22 सालों से कर रहे हैं, गुजरात से लेकर दिल्ली तक आपके योद्धा और आपकी सरकारें निपट गईं, लेकिन आप उनको घेर नहीं पाए क्योंकि वो जनता के दिलों में बसे हैं। आज यहां 293 अभिमन्यु बैठे हैं। भले ही आपके पास कर्ण जैसे धुरंधर हों, शकुनी जैसे कुटिल रणनीतिकार हों, धर्म हमारे साथ है। भले ही आपके पास नारायणी सेना हो,ठाकुर ने कहा कि 15 अगस्त, 1947 को प्रधानमंत्री के रूप में मोदी जी तो नहीं थे और यह कह रहे कि जिन्होंने 15 अगस्त, 1947 को सत्ता ली थी वो धृतराष्ट्र थे। तो धृतराष्ट्र किसको कहा गया? लेकिन स्वयं भगवान कृष्ण हमारे साथ हैं। फिर उन्होंने एक भजन की दो पंक्तियां कहीं, ‘हमारे साथ श्री रघुनाथ तो किस बात की चिंता, शरण में रख दिया जब माथ तो किस बात की चिंता।’ अनुराग ठाकुर बोले, ‘हमारे साथ तो जनता रूपी रघुनाथ हैं और आगे भी रहने वाले हैं।’

आखिर क्या है भारत का LAC पर प्रोजेक्ट -3?

आज हम आपको बताएंगे कि भारत का LAC पर प्रोजेक्ट -3 आखिर क्या है! चीन के साथ सीमा विवाद के बीच भारत का जोर सीमावर्ती इलाकों में इंफ्रास्टक्रचर को मजबूत करने पर है। भारत वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत कर चीन को करारा जवाब देने में जुटा हुआ है। सीमा सड़क संगठन ने केंद्रीय लोक निर्माण विभाग और राष्ट्रीय परियोजना निर्माण निगम के साथ मिलकर रणनीतिक भारत-चीन सीमा सड़क परियोजना के तीसरे चरण की शुरुआत की है। इससे पूर्वी लद्दाख में सड़क नेटवर्क को बढ़ावा जिससे सुरक्षा बलों की आवाजाही में आसानी होगी। प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में मनाली से लेह तक कनेक्टिविटी सुधारने के लिए शिंकुन ला सुरंग की शुरुआत की। चीन से लगी सीमा पर सड़क निर्माण और गांव के विकास के लिए अधिक धनराशि दी गई है। आईसीबीआर के दूसरे चरण के तहत कुछ प्रमुख सड़कों पर काम अभी भी जारी है, लेकिन अधिकांश चरण पूरे हो चुके हैं। साथ ही ऑल वेदर में आवाजाही जारी रहने वाली सड़कें वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सुरक्षा बलों की तेज आवाजाही में मदद कर रही हैं। केंद्र प्रायोजित कार्यक्रम के तहत, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और लद्दाख में उत्तरी सीमा से सटे 19 जिलों के 46 ब्लॉकों में 2,967 गांवों को व्यापक विकास के लिए पहचाना गया है।पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिंकुन ला सुरंग के लिए पहला विस्फोट किया था। यह मनाली से लेह तक हर मौसम में आवाजाही सुनिश्चित करेगी। 4.1 किलोमीटर लंबी सुरंग से सशस्त्र बलों और उपकरणों की आवाजाही बढ़ने की उम्मीद है।

भारत और चीन लद्दाख, अरुणाचल, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम में 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं। पूर्वी लद्दाख के गलवान में चीनी सेना के साथ 2020 के गतिरोध के बाद, केंद्र सरकार ने सड़क निर्माण की स्पीड बढ़ा दी है। ICBR के तीसरे चरण के तहत नई सड़कों की पहचान की है। अधिकारियों के अनुसार, पहले दो चरणों की योजना 2000 के दशक की शुरुआत में बनाई गई थी।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत ने 2017-20 से प्रति वर्ष 470 किलोमीटर सड़कों की गति से ‘फॉर्मेशन कटिंग’ की है। इसमें नए अलाइनमेंट और खुदाई के काम शामिल हैं। यह 2017 तक के दशक में बनाए जा रहे 230 किलोमीटर प्रति वर्ष की तुलना में दोगुना से भी अधिक है। ICBR चरण I और II के तहत, 73 सड़कों की पहचान रणनीतिक के रूप में की गई थी। उनमें से 61 को BRO को सौंपा गया था। मामले के जानकार अधिकारी ने कहा कि पूर्वी लद्दाख में, फेज 3 के तहत पांच नई सड़कों की पहचान की गई है। इनका निर्माण BRO और CPWD द्वारा किया जाना है।

कई मामलों में सिंगल या डबल लेन वाली सड़कों को चार लेन में अपग्रेड किया गया है। हाल ही में, केंद्रीय बजट में 2024-25 के लिए बीआरओ को ₹6,500 करोड़ आवंटित किए गए। यह 2023-24 के आवंटन से 30% अधिक है। केंद्रीय गृह मंत्रालय को चीन की सीमा पर सीमावर्ती गांवों के विकास के लिए वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम के लिए ₹1,050 करोड़ अलॉट किए हैं। 2023 में, केंद्र सरकार ने इस कार्यक्रम के तहत 2022-23 से 2025-26 तक के लिए ₹4,800 करोड़ आवंटित किए थे, जिसमें सड़क संपर्क के लिए विशेष रूप से ₹2,500 करोड़ शामिल थे।

केंद्र प्रायोजित कार्यक्रम के तहत, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और लद्दाख में उत्तरी सीमा से सटे 19 जिलों के 46 ब्लॉकों में 2,967 गांवों को व्यापक विकास के लिए पहचाना गया है। बता दें कि साथ ही ऑल वेदर में आवाजाही जारी रहने वाली सड़कें वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सुरक्षा बलों की तेज आवाजाही में मदद कर रही हैं। पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिंकुन ला सुरंग के लिए पहला विस्फोट किया था। यह मनाली से लेह तक हर मौसम में आवाजाही सुनिश्चित करेगी। 4.1 किलोमीटर लंबी सुरंग से सशस्त्र बलों और उपकरणों की आवाजाही बढ़ने की उम्मीद है। भारत ने 2017-20 से प्रति वर्ष 470 किलोमीटर सड़कों की गति से ‘फॉर्मेशन कटिंग’ की है। इसमें नए अलाइनमेंट और खुदाई के काम शामिल हैं। यह 2017 तक के दशक में बनाए जा रहे 230 किलोमीटर प्रति वर्ष की तुलना में दोगुना से भी अधिक है।पहले चरण में, 662 गांवों को प्राथमिकता कवरेज के लिए पहचाना गया है। भारत और चीन लद्दाख, अरुणाचल, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम में 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं।इसमें अरुणाचल प्रदेश में 455 और लद्दाख में 35 गांव शामिल हैं। भारत और चीन के बीच 2017 के डोकलाम गतिरोध के बाद, सीमा पर बुनियादी ढांचे के निर्माण की धीमी गति को एक संसदीय पैनल ने हरी झंडी दिखाई थी।

आखिर सोनाक्षी सिन्हा की शादी में क्यों मचा बवाल?

आज हम आपको बताएंगे कि सोनाक्षी सिन्हा की शादी में बवाल क्यों मचा था! सोनाक्षी सिन्हा और जहीर इकबाल की शादी लगातार खबरों में है। इस अंतरधार्मिक शादी को लेकर सोनाक्षी और उनके परिवार को काफी ट्रोलिंग और विवाद का सामना करना पड़ा। देखा जाए तो इंटरफेथ मैरिज बॉलिवुड में नई बात नहीं है। मगर अब सोशल मीडिया के जमाने में इस तरह की शादियों को ट्रोल्स अपना निशाना बनाने में आगे रहते हैं। हाल ही में सोनाक्षी सिन्हा और जहीर शेख ने इंटरफेथ मैरिज करके जाने-माने मशहूर शायर-गीतकार साहिर लुधियानवी की इन पंक्तियों को साकार क्या किया, सोशल मीडिया पर ट्रोलर्स और हेटर्स की ट्रोलिंग और फब्तियों का ऐसा सिलसिला चल निकला कि शादी के बाद इन लोगों को कॉमेंट सेक्शन बंद करना पड़ा। हालांकि इस जोड़े ने अपनी शादी के लिए किसी धार्मिक रिचुअल को न चुन कर रजिस्टर मैरिज का रास्ता अख्तियार किया, बावजूद इसके ट्रोल्स ने इनकी शादी को लव-जेहाद का नाम दिया। पिता शत्रुघ्न सिन्हा को लेकर मीम्स भी बने कि ‘रामायण (उनके निवासस्थान) में मुसलमान की एंट्री हुई है’ हालांकि सोशल मीडिया पर एक वर्ग ऐसा भी था, जो #शादीमुबारक चला रहा था, मगर बीते कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर इस शादी को कुछ ज्यादा ही हाइलाइट किया गया। इंटरफेथ मैरिज बॉलिवुड हमेशा से होती आई हैं। सुनील दत्त -नरगिस के बाद शाहरुख खान-गौरी खान, सैफ अली खान-करीना कपूर, संजय दत्त -मान्यता दत्त, रितेश देशमुख -जेनेलिया डिसूजा, कुणाल खेमू-सोहा अली खान जैसे अनेकों उदाहरण हैं, जो आज अपनी शादी में खुश हैं। मगर आज के दौर में सोनाक्षी सरीखा कोई इस तरह की शादी का रास्ता चुनता है, तो तुरंत ट्रोल्स के निशाने पर आ जाता है।

मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखने वाली स्वरा भास्कर भी फहाद अहमद से शादी करने पर बुरी तरह से ट्रोल हो चुकी हैं। वे कहती हैं, ‘ये सच है कि आज सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग, गाली-गलौज, हैंडल के पीछे छिपकर लोगों को प्रताड़ित करने का जो चलन है, वो इंडिविजुअल की निजता पर प्रहार है। ऐसी शादियां नई बात नहीं हैं, मगर आज सोशल मीडिया के कारण इन्हें मुद्दा बना दिया जाता है। मैंने और फहाद ने जब शादी की तो किसी को बताया नहीं था, मगर शादी के बाद जब फोटो लीक हो गई, तो उस वक्त हमें भी सोशल मीडिया पर बहुत ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा। हालांकि बधाई देने वाले भी कम नहीं थे। मैं और फहाद खुशकिस्मत थे, जो हमें परिवार का का समर्थन मिला। हमारी स्पेशल मैरिज एक्ट की शादी में तीन विटनेस में से पहले विटनेस मेरे पिताजी थे। परिवारों के समर्थन के बलबूते पर ही हम सोशल मीडिया की सारी नकारात्मकता को हैंडल कर पाए। हमारे देश और समाज में एक अडल्ट कपल को कानूनी तौर पर पूरी स्वतंत्रता है कि वो अपने निजी जीवन के फैसले ले सके। वे किससे शादी करते हैं, किस रीति-रिवाज से शादी करते हैं, कोर्ट में करते हैं या मंदिर अथवा निकाह, ये उनका व्यक्तिगत मामला है और इस पर मुझे नहीं लगता किसी की राय होनी चाहिए।’

आज से तकरीबन 20 साल पहले निर्देशक मोहित हुसैन से अंतरधार्मिक विवाह करने वाली अभिनेत्री छवि मित्तल ब्रेस्ट कैंसर की जंग भी जीत चुकी हैं। वे कहती हैं, ‘हम अगर पब्लिक फिगर है, तो इसका ये मतलब बिलकुल नहीं कि सोशल मीडिया हमारी लाइफ को नियंत्रित करे। सोनाक्षी सिन्हा और जहीर की शादी उनकी पर्सनल चॉइस है। मैंने और मोहित ने जब शादी की थी, उस वक्त सोशल मीडिया नहीं था, तो हमारी शादी को लेकर उस तरह से किसी ने बात नहीं की। मेरे सास-ससुर ने आज से पचास साल पहले इंटरफेथ शादी की थी। मेरी सास गुजराती जैन हैं और ससुर मुस्लिम। मैं एक परंपरागत परिवार से थी, तो समस्या परिवार से ही थी, मगर चूंकि हमारा परिवार पढ़ा-लिखा है, तो मेरे परिवार ने मेरे पति मोहित से मिलकर आपस में सारे डाउट्स क्लियर कर लिए थे। हमने उस जमाने में रजिस्टर मैरिज, निकाह और फेरे जैसी तीन तरह से शादी करके सभी को खुश कर दिया था। मगर मैं मानती हूं कि आज की तारीख में अगर मैंने इंटरफेथ मैरिज की होती, तो उतना आसान नहीं होता। हमारे वक्त तो इंटरनेट, सोशल मीडिया था ही नहीं। फिर उस जमाने में सेकुलरिज्म भी ज्यादा था। आज तो बहुत कुछ बदल गया है।’

वाकई आजकल बहुत कुछ बदल गया है। सोशल मीडिया के जमाने में सेलेब्स को इसका प्रेशर भी खूब झेलना पड़ता है। अब यह सोनाक्षी की शादी में माता-पिता शत्रुघ्न सिन्हा और पूनम सिन्हा भी शामिल हुए, मगर इसके पहले जब अटकलें लगाई जा रही थीं कि शत्रु शादी में शामिल नहीं होंगे, तो शत्रु ने खुद अफवाहों को खारिज करते हुए कहा, ‘मैं शादी में ज़रूर शामिल होऊंगा। उसकी खुशी मेरी खुशी है। उसे अपने साथी और अपनी शादी की दूसरी बातें तय करने का पूरा अधिकार है।’ भाई कुश ने भी सामने आकर बयान दिया कि बहन की शादी में शामिल था।’ वही जब ट्रोल्स और हेटर्स अपनी हद पार करने लगे तो शत्रुघ्न सिन्हा को अपनी चुप्पी तोड़ते हुए एक इंटरव्यू में कहना पड़ा, ‘आनंद बक्शी साहब ने ऐसे प्रोफेशनल प्रोटेस्टर्स के बारे में लिखा है, ‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना, मैं इसमें ये जोड़ना चाहूंगा कि कहने वाले अगर बेकार, बेकाम-काज के हों, तो कहना ही काम बन जाता है। मेरी बेटी ने कुछ भी गैर कानूनी या असंवैधानिक नहीं किया है।’ अपनी शादी के विवाद पर खामोश बैठीं सोनाक्षी ने भी अप्रत्यक्ष रूप से ट्रोल्स को करारा जवाब दिया है। ग्राफिक आर्टिस्ट प्रसाद भट्ट ने हाल ही में सोनाक्षी और जहीर की फोटो शेयर करते हुए लिखा, प्यार यूनिवर्सल रिलिजन है, सोनाक्षी सिन्हा और जहीर इकबाल को खुशनुमा जिंदगी की बहुत-बहुत बधाई।

क्या फिल्मों में काम करने के लिए फिल्मी सितारे करते हैं उल्टी सीधी मांगे?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या फिल्मों में काम करने के लिए फिल्मी सितारे उल्टी सीधी मांगे करते हैं या नहीं! जाने-माने फिल्म निर्माता और फिल्म निर्देशक करण जौहर ने पिछले दिनों एक इंटरव्यू में बतौर प्रोड्यूसर अपना दर्द शेयर किया। उन्होंने कहा कि हिंदी सिनेमा में ढंग के ऐक्टर कम ही हैं, लेकिन वे भी सूरज, चांद और धरती की मांग करते हैं। हालत यह हो गई है कि जिन ऐक्टर्स की फिल्में 3.5 करोड़ की ओपनिंग नहीं ले पाती हैं, वे 35 करोड़ रुपए फीस मांग रहे हैं। बकौल करण आप उन्हें फिल्म साइन करने के लिए पैसा देते हैं। फिर फिल्म करने के लिए पैसा देते हैं। इसके अलावा दूसरे खर्चे भी आते हैं, लेकिन इस सबके बाद आपकी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कमाई नहीं कर पाती। बेशक करण का कहना काफी हद तक जायज है, क्योंकि बीते काफी अरसे से बेहद बुरे दौर से गुजर रहे बॉक्स ऑफिस पर फिल्में एक के बाद एक फ्लॉप हो रही हैं। इनमें बड़े स्टार और बड़े बजट की फिल्में भी शामिल हैं। खासकर कोरोना के बाद बॉक्स ऑफिस पर फिल्मों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो चुनिंदा फिल्मों को छोड़कर ज्यादातर फिल्में कुछ खास नहीं कर पाई हैं। बावजूद इसके चुनिंदा सितारों को छोड़कर ज्यादातर ऐक्टर्स की फीस में कोई कमी नहीं आई है। इंडस्ट्री के जानकारों की मानें तो तमाम सितारों ने अपनी फीस कम करने की बजाय कम फिल्मों में काम करने का ऑप्शन चुना है। यानी कि वे उन्हीं फिल्मों में काम करेंगे, जिसके लिए उन्हें मनमर्जी फीस मिलेगी। हालांकि बात सिर्फ फीस तक ही नहीं ठहरती। फीस के अलावा भी कलाकारों के दूसरे नखरे उठाने में प्रोड्यूसर की हालत खराब हो जाती है। पिछले दिनों एक और नामी फिल्म डायरेक्टर ने भी बड़े सितारों की ओर से फिल्म की शूटिंग के दौरान की जाने वाली उल्टी-सीधी मांगों पर नाराजगी जताई थी। खासकर उन्होंने बड़े सितारों द्वारा कई वैनिटी वैन की डिमांड किए जाने पर सवाल उठाया था।

वहीं करण ने फिल्मी दुनिया के एक और खतरनाक ट्रेंड पर चिंता जताई। करण ने कहा था ति बीते कुछ अरसे से देखने में आ रहा है कि अगर कोई एक्शन फिल्म हिट हुई तो हर कोई बस एक्शन फिल्म ही बनाना चाहता है। लेकिन इसी बीच अगर रोमांटिक फिल्म हिट हो गई, तो फिर हमें समझ नहीं आता कि हम क्या करें। बेशक इस मामले में भी करण काफी हद तक सही कह रहे हैं, क्योंकि मौजूदा दौर में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री वाले अच्छी स्क्रिप्ट की कमी शिद्दत से महसूस कर रहे हैं। बीते दिनों धड़ाधड़ फ्लॉप हुई फिल्मों की वजह भी उनकी कमजोर स्क्रिप्ट ही बताई गई थी।

हालांकि फिल्मवालों ने इससे कोई सबक नहीं लिया। स्क्रिप्ट में सुधार करने की बजाय वे हिट जॉनर की फिल्मों के सब्जेक्ट पर फिल्में प्लान कर रहे हैं। जबकि हकीकत यह है कि आज अगर किसी जॉनर की फिल्म हिट हुई है और आप उसी जॉनर पर फिल्म बनाना चाहते हैं, तो स्क्रिप्ट, प्री प्रॉडक्शन, शूटिंग से लेकर पोस्ट प्रॉडक्शन में कम से कम डेढ़- दो साल का वक्त लग जाएगा। यानी कि आप उस फिल्म को करीब दो साल बाद रिलीज कर पाएंगे। हो सकता है कि तब तक कोई और जॉनर हिट हो जाए। यही नहीं फिल्मों की रिलीज डेट को आगे बढ़ाए जाने से होने वाले नुकसान के बारे में बात करने पर प्रोड्यूसर व फिल्म बिजनेस एनालिस्ट गिरीश जौहर कहते हैं, ‘किसी फिल्म की रिलीज डेट आगे बढ़ने से उसकी लागत में बढ़ोत्तरी होती है। साथ ही दूसरी फिल्मों को भी उसके चलते नुकसान उठाना पड़ता है। हालांकि करण ने अपनी बात दुनिया के सामने रख तो दी है, लेकिन फिर कई बार उनका प्रॉडक्शन उस तारीख तक पूरा नहीं हो पाता, तो फिल्म की रिलीज डेट आगे पीछे करनी पड़ती है, जिसके चलते सबको नुकसान होता है।’ उन्होंने आगे कहा, ‘वैसे भी आजकल फिल्मों में वीएफएक्स का काफी इस्तेमाल होने लगा है। लेकिन अगर आप दो तीन महीने पुराने वीएफएक्स को अपडेट नहीं करेंगे, तो वह पुराना लगने लगता है।बेशक इस मामले में भी करण काफी हद तक सही कह रहे हैं, क्योंकि मौजूदा दौर में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री वाले अच्छी स्क्रिप्ट की कमी शिद्दत से महसूस कर रहे हैं। बीते दिनों धड़ाधड़ फ्लॉप हुई फिल्मों की वजह भी उनकी कमजोर स्क्रिप्ट ही बताई गई थी।लेकिन देखना यह दिलचस्प होगा कि यह कहां तलक जाएगी।

आखिर वर्तमान में फिल्मों की तारीख के क्यों बढ़ रही है आगे?

वर्तमान में फिल्मों की रिलीज की तारीख आगे बढ़ती जा रही है! फिल्मी दुनिया में चर्चा गर्म है कि बीते दिनों 15 अगस्त की रिलीज डेट से दिसंबर के लिए पोस्टपोन हुई सुपरस्टार अल्लू अर्जुन की फिल्म ‘पुष्पा 2’ अब इस साल रिलीज नहीं हो पाएगी। पहले जहां फिल्म का वीएफएक्स कार्य पूरा नहीं होना इसकी वजह बताई गई थी, वहीं अब कई दूसरे कारणों की चर्चा है। इससे पहले प्रभास की ‘कल्कि 2898 एडी’ और कमल हासन की ‘इंडियन 2’ समेत साउथ सिनेमा की बड़ी फिल्में भी पोस्टपोन हो चुकी हैं। वहीं जूनियर एनटीआर की ‘देवरा’ और चियान विक्रम की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘थंगलान’ की रिलीज को भी कई बार आगे बढ़ाया जा चुका है। बात अगर बॉलीवुड की करें, तो साल 2023 में सुपरस्टार शाहरुख खान की फिल्म ‘जवान’ को आखिरी मौके पर जून से सितंबर के लिए पोस्टपोन किया गया था। बेशक इस तरह आखिरी मौके पर बड़ी फिल्मों के पोस्टपोन होने के चलते न सिर्फ उन फिल्मों दूसरी फिल्मों का भी गेम बिगड़ जाता है। फिल्मी दुनिया के जानकार बताते हैं कि किसी भी बड़ी फिल्म की रिलीज से एक हफ्ता पहले और दो हफ्ता बाद तक कोई दूसरी बड़ी फिल्म रिलीज नहीं होती है। ऐसे में, अगर फिल्म की रिलीज डेट आखिरी मौके पर पोस्टपोन होती है, तो उससे न सिर्फ उसकी मौजूदा रिलीज डेट पर तीन हफ्ते की रिलीज विंडो खाली हो जाती है, बल्कि वह पोस्टपोन होकर जहां पहुंचती है, वहां पर भी दूसरी फिल्मों की रिलीज डेट आगे पीछे करनी पड़ती है।

मसलन ‘पुष्पा 2’ के आने से पहले ‘सिंघम अगेन’ की रिलीज डेट आगे बढ़ी थी। लेकिन अब 15 अगस्त को ‘पुष्पा 2’ की जगह कई फिल्में रिलीज हो रही हैं। वहीं ‘पुष्पा 2’ दिसंबर में ‘छावा’ की रिलीज डेट पर पहुंच गई है। अगर यह तय समय पर रिलीज हुई, तो ‘छावा’ की रिलीज डेट भी बदल सकती है। इसी तरह बीते साल ‘जवान’ की रिलीज डेट आगे बढ़ने के चलते सिनेमावालों को जून में नुकसान उठाना पड़ा था। वहीं सितंबर में उसके आने के कारण ‘फुकरे’ की रिलीज डेट को आगे बढ़ाना पड़ा। बेशक फिल्मों की रिलीज डेट आगे बढ़ने से खुद उन फिल्मों पर भी अच्छा असर नहीं पड़ता। फिल्मी दुनिया के जानकार कहते हैं कि बार-बार फिल्मों की रिलीज डेट बदलने से फैंस के बीच कंफ्यूजन हो जाता है। दरअसल, फिल्म की पुरानी रिलीज डेट वाले पोस्टर भी इंटरनेट पर मौजूद रहते हैं। कई बार फैन उन्हें सही समझ लेते हैं।

फिल्मों की रिलीज डेट को आगे बढ़ाए जाने से होने वाले नुकसान के बारे में बात करने पर प्रोड्यूसर व फिल्म बिजनेस एनालिस्ट गिरीश जौहर कहते हैं, ‘किसी फिल्म की रिलीज डेट आगे बढ़ने से उसकी लागत में बढ़ोत्तरी होती है। साथ ही दूसरी फिल्मों को भी उसके चलते नुकसान उठाना पड़ता है। दरअसल, किसी भी बड़ी फिल्म को एक रिलीज डेट चाहिए होती है, जिस पर उनको बड़ी रिलीज विंडो मिल जाए। साल में गिनी चुनी बड़ी रिलीज डेट होने के चलते बड़े निर्माता काफी पहले ही उन डेट्स को अपनी फिल्मों के लिए बुक कर लेते हैं। लेकिन फिर कई बार उनका प्रॉडक्शन उस तारीख तक पूरा नहीं हो पाता, तो फिल्म की रिलीज डेट आगे पीछे करनी पड़ती है, जिसके चलते सबको नुकसान होता है।’ उन्होंने आगे कहा, ‘वैसे भी आजकल फिल्मों में वीएफएक्स का काफी इस्तेमाल होने लगा है। लेकिन अगर आप दो तीन महीने पुराने वीएफएक्स को अपडेट नहीं करेंगे, तो वह पुराना लगने लगता है। दरअसल, आजकल लोग ओटीटी पर दुनियाभर का कॉन्टेंट देखने लगे हैं। ऐसे में, डायरेक्टर के सामने इस बात की चुनौती रहती कि वह लोगों के सामने लेटेस्ट वीएफएक्स को पेश करे।’

वहीं ट्रेड एनालिस्ट कोमल नाहटा ने बताया, ‘ज्यादातर बड़ी फिल्में वीएफएक्स का काम पूरा नहीं होने के चलते ही पोस्टपोन होती हैं। बेशक वीएफएक्स के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।ऐसे में, अगर फिल्म की रिलीज डेट आखिरी मौके पर पोस्टपोन होती है, तो उससे न सिर्फ उसकी मौजूदा रिलीज डेट पर तीन हफ्ते की रिलीज विंडो खाली हो जाती है, बल्कि वह पोस्टपोन होकर जहां पहुंचती है, वहां पर भी दूसरी फिल्मों की रिलीज डेट आगे पीछे करनी पड़ती है। इसके दो दिन के काम में दो महीने भी लग सकते हैं। जबकि निर्माता अपनी फिल्म की रिलीज डेट काफी पहले फिक्स कर देता है। इसलिए वीएफएक्स का काम पूरा नहीं होने के चलते फिल्म पोस्टपोन होने में किसी की गलती नहीं है। हालांकि इससे दूसरी फिल्मों का रिलीज शेड्यूल जरूर बिगड़ जाता है।’

क्रिकेटर हार्दिक पांड्या के साथ अब तक क्या हुआ ?

आज हम आपको बताएंगे कि क्रिकेटर हार्दिक पांड्या के साथ अब तक उनकी जिंदगी में क्या हुआ है! एक अमीर लड़के के साथ मिलकर बच्चा पैदा करो, उससे शादी करो और फिर तलाक दे दो। बिना किसी लागत का जबर्दस्त स्टार्टअप आइडिया है…’, ‘वह अपने बेटे और 13 मिलियन डॉलर के साथ इंडिया छोड़कर चली गई, ताकि अपने घर सर्बिया में बिना कुछ किए ऐश की जिंदगी जी सके।’ हाल ही में क्रिकेटर हार्दिक पांड्या से अलग हुईं उनकी पूर्व पत्नी सर्बियन मॉडल नताशा स्‍टेनकोविक के लिए सोशल मीडिया पर ऐसे कॉमेंट्स की झड़ी लगी हुई है। खासकर जब से यह चर्चा शुरू हुई है कि नताशा अब हार्दिक की 70 फीसदी संपत्ति की हकदार होंगी, तब से कोई उन्हें गोल्ड डिगर करार दे रहा है, तो किसी के मुताबिक, वह हार्दिक के लायक ही नहीं थीं। सोचिए, ऐसे मौके पर, जबकि नताशा अपना घर टूटने के दर्द से जूझ रही हैं, यह ट्रोलिंग उनके लिए कितनी मुश्किल होगी, लेकिन यह कोई नई बात नहीं है। भारतीय समाज में अब भी टैबू माने जाने वाले तलाक के मामले में अक्सर औरतों पर ही उंगली उठती है। उन्हें कानून से मिले गुजारा भत्ते और एलिमनी के हक के लिए भी खूब शर्मिंदा किया जाता है। एलिमनी को लेकर नताशा की ट्रोलिंग देखकर 11 साल पहले हुए रितिक-सुजैन के तलाक का मामला ताजा हो जाता है। तब इसी तरह, सुजैन को रितिक से 380 करोड़ की भारी-भरकम एलिमनी मिलने की अफवाह तेज थी। तब भी लोगों ने सुजैन को खूब कटघरे में खड़ा किया था। जबकि, खुद रितिक ने इस खबर को गलत बताते हुए नाराजगी जताई थी। उन्होंने खुद ट्वीट किया कि सब मनगढ़ंत खबरें हैं, इससे उनके करीबियों को नीचा दिखाया जा रहा है और उनके सब्र का इम्तिहान लिया जा रहा है। बावजूद इसके, आज भी उनके तलाक को सबसे महंगा बताने वाली तमाम रिपोर्ट्स आती रहती हैं। इसके अलावा, करिश्मा कपूर को उनके पति संजय कपूर, सैफ अली खान से अमृता सिंह और आमिर खान से उनकी पहली पत्नी रीना दत्ता को मिली एलिमनी को लेकर भी ऐसी चर्चाएं चटखारे लेकर सुनाई जाती हैं।

सिर्फ सिलेब्रिटीज ही नहीं, बल्कि आम परिवारों में भी गुजारा भत्ता या एलिमनी की मांग करने वाली औरतों को काफी बुरा-भला कहा जाता है। जबकि, असल में यह उनका कानूनी अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट की सीनियर एडवोकेट रेखा अग्रवाल बताती हैं कि आम तलाक के केसेज में भी मेंटेनेंस और एलिमनी की बात आने पर ऐसी ही बातें कही जाती हैं कि इतने पैसे लूट ले गई। शादी ही इसलिए की थी, उनको कंगाल करके चली गई। जबकि, ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह उसका कानूनी हक है। हिंदू मैरिज ऐक्ट और स्पेशल मैरिज ऐक्ट, दोनों में कानून ने अलगाव के मामले में गुजारा भत्ता यानी मेंटेनेंस और तलाक के बाद एलिमनी का अधिकार दिया हुआ है, पर ऐसा नहीं है कि लड़की जो मांगेंगी उसे मिल जाएगा। उसके लिए लड़के-लड़की दोनों को अपनी चल-अचल संपत्ति और आमदनी बतानी पड़ती है। कोर्ट लड़के की संपत्ति, आदमनी, उस पर कौन-कौन आश्रित है, अगर बच्चा है तो वह किसके साथ रह रहा है, इन सब मापदंडों के आधार पर गुजारा भत्ता और एलिमनी तय करता है। ऐसा नहीं है कि तलाक के बाद बीवी अपने आप 50 पर्सेंट लेकर चली जाएगी। यहां एक अहम बात यह भी है कि तलाक भी दो तरह के होते हैं। पहला म्यूचुअल होता है, जिसमें दोनों पक्ष सहमति से सब चीजें तय करते हैं। वहीं, दूसरा कोर्ट में लड़ा जाता है। जो केस लड़ा जाता है, उसमें कोर्ट दोनों पार्टियों के दावे सुनकर, उनकी चल-अचल संपत्ति के आधार पर भत्ता या एलिमनी तय करती है। जबकि, म्यूचुअल में कोर्ट की कोई भूमिका ही नहीं होती। उसमें तो लड़की चाहे तो 1 रुपये भत्ता ना ले या लड़का चाहे तो अपना सब उसके नाम कर दे।

आम लोगों के एलिमनी के केसेज के बारे में रेखा अग्रवाल कहती हैं, ‘कानून में ये अधिकार बहुत सोच-समझकर, जांच-परखकर बनाए गए हैं। इनमें कई अलग-अलग प्रावधान है। जैसे, इन सिलेब्रिटीज के भत्ते या एलिमनी इसलिए ज्यादा होती हैं, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, लड़की अपने पति के घर में जिस तरह की जिंदगी जी रही थी, तलाक के बाद भी उसे वैसे ही जीने का हक है। वहीं, अगर वह खुद कमाती है, सेटल्ड है, तो उसकी एलिमनी कम हो जाती है। वैसे, सिलेब्स से इतर आम मामलों में ज्यादातर औरतों की भत्ता पाने में एड़ियां घिस जाती हैं। कोर्ट केस सालों तक चलते हैं। फिर थक-हारकर औरतें जितनी एलिमनी मांगती हैं, उसके आधे में समझौता कर लेती हैं। उस पर आम तौर पर अगर कपल की बेटी है, तो पिता उसे लेने को तैयार नहीं होते। ज्यादातर मामलों में मां ही उसकी कस्टडी लेती है। बच्चा पांच साल से छोटा है, तब भी उसकी कस्टडी मां को मिलती है। सोचिए, अगर ऐसे में उस महिला को भत्ता या एलिमनी भी ना मिले तो उसकी आगे की जिंदगी कितनी जटिल हो जाएगी।’

नताशा को एलिमनी के रूप में हार्दिक की 70 पर्सेंट संपत्ति दिए जाने की खबरों के बीच हार्दिक का एक पुराना विडियो भी खूब वायरल हो रहा है, जिसमें वह बता रहे हैं कि उन्होंने अपनी सारी संपत्ति अपने मां के नाम की हुई है, ताकि भविष्य में उन्हें अपनी पत्नी (तलाक होने पर) को 50 पर्सेंट हिस्सा ना देना पड़े। लेकिन रेखा कहती हैं, हमारे यहां कानून में कहीं ऐसा नहीं लिखा कि लड़की 50 फीसदी संपत्ति ले जाएगी। ऐसा अमेरिका में होता है कि तलाक के केस में पति और पत्नी दोनों की संपत्ति ऑटोमैटिकली आधी-आधी बंट जाती है। रिपोर्ट्स की मानें, तो यूएस में यह ट्रेंड भी देखने को मिला है कि वहां औरतें तलाक से मिली एलिमनी की बदौलत कम सैलरी के बावजूद मर्दों से ज्यादा अमीर हैं।

आखिर दिल्ली की राजनीति से क्यों नाराज है ममता बनर्जी?

वर्तमान में ममता बनर्जी दिल्ली की राजनीति से बेहद नाराज नजर आ रही है! हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव और बंगाल में हुए विधानसभा उपचुनावों में तृणमूल कांग्रेस को भारी जीत मिली है। यह एक औपचारिक कहानी है, लेकिन इसके पीछे बंगाली भावना का छिपा हाथ है जो केंद्र में शासन करने वाली पार्टी को सहज रूप से खारिज कर देती है। 1967 के बाद से, 1972 और 1977 के बीच थोड़े समय के लिए (तब भी कांग्रेस को शासन करने के लिए CPI की जरूरत थी), बंगाल ने केंद्र में बैठी पार्टी को नकार दिया है। यह एक तरह की वह स्थिति है जहां एक ही घटना के बारे में वहां मौजूद दो लोग अलग-अलग राय रखते हैं। दिल्ली से चाहे कोई भी शासन करे, बंगाल में विपक्ष का दृढ़ निश्चय रहेगा। पहले, जब भारत में हर जगह कांग्रेस लोकप्रिय विकल्प थी, तब बंगाल ने CPM को चुना। इसी तरह, आज, भाजपा विंध्य के उत्तर में शानदार प्रदर्शन कर रही है, लेकिन बंगाल में अंतिम पायदान से पहले ही पिछड़ जाती है। ऐसा लगता है कि बंगाल जीतने के लिए केंद्र की पार्टी को दिल्ली को छोड़ना होगा। यह वास्तव में एक पहेली है।

तमिलनाडु के विपरीत, बंगाल में कभी भी अलगाववादी क्षण नहीं आया। इसके अलावा, कुछ तमिल लोगों के विपरीत, रावण यहां अभी भी एक राक्षस राजा है। बंगाल में हिंदू प्रार्थनाएं भी हर जगह की तरह ही होती हैं। लेकिन कुछ महत्वपूर्ण अंतर भी हैं। बंगाल देश के बड़े हिस्से से अलग है क्योंकि यहां कोई मध्ययुगीन नायक नहीं है। कोई राजेंद्र चोल नहीं, कोई महाराणा प्रताप नहीं, कोई छत्रपति शिवाजी नहीं, कोई महाराजा रणजीत सिंह नहीं। पूरे बंगाल में मध्ययुगीन योद्धा राजा की तलवार चलाने वाली कोई मूर्ति नहीं है।

इसके बजाय, समकालीन बंगाली वीर प्रतिमा की शुरुआत राजा राम मोहन राय द्वारा पुस्तक पकड़े जाने से होती है। फिर स्वामी विवेकानंद हैं जिन्हें शिकागो में विश्व धर्म संसद में उनके उत्साहवर्धक भाषण और हिंदू धर्म में आध्यात्मिकता को पुनर्जीवित करने के लिए याद किया जाता है। फिर, टैगोर हैं। मध्ययुगीन अतीत से मुक्त, बंगाल उन वर्गों और स्तरों को अधिक स्वीकार करता है जो पूर्व-आधुनिक भावनाओं से मुक्त हैं। विवेकानंद ने जाति पर हमला किया, वेदांत का प्रचार किया, भगवा पहना, लेकिन टैगोर की तरह ही, अन्य धर्मों के बारे में भी उत्साहपूर्वक बात की। फिर, बंगाली भाषा, अपनी बहुप्रशंसित स्थिति के बावजूद, तमिल या संस्कृतनिष्ठ हिंदी की तरह कोई प्राचीन परंपरा नहीं रखती है। समकालीन बंगाली में, लगभग 200 साल की ऐतिहासिक गहराई है। यह सांस्कृतिक नवीनता एक वरदान है, क्योंकि बंगाल की राजनीति के पास अब मध्ययुगीन होने का कोई कारण नहीं है। एक और असामान्य विशेषता यह है कि बंगाल में कभी भी ब्राह्मण विरोधी जाति आंदोलन नहीं हुआ। ऐसा शायद इसलिए है क्योंकि बंगाल में सिर्फ ब्राह्मणों के बजाय तीन उच्च जातियां हैं, ब्राह्मण, कायस्थ और बैद्य (पारंपरिक आयुर्वेद)। इससे किसी एक को निशाना बनाना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि एक के बजाय आप तीन को देख सकते हैं।

न ही ये तीनों उच्च जातियां अनुष्ठानिक कारणों से शीर्ष पर हैं। उनका उत्थान इसलिए है क्योंकि वे सांख्यिकीय रूप से ‘भद्रलोक’ या सभ्य लोगों की श्रेणी का प्रतिनिधित्व करते हैं। फिर भी, जाति किसी को भी ‘भद्रलोक’ होने से नहीं रोकती है, जब तक कि वह व्यक्ति सुसंस्कृत हो और टैगोर का पाठ कर सकता हो। बंगाल की आज की राजनीतिक विरोधाभासी स्थिति का मूल कारण गांधी और नेहरू द्वारा सुभाष बोस को दरकिनार करना है, लेकिन यह सब कुछ नहीं है। इसके साथ ही, कुछ अजीबोगरीब परिस्थितियां हैं, जो ‘भद्रलोक’ बौद्धिक अहंकार से संबंधित नहीं हैं। इसने कम्युनिस्टों को इस राज्य में धीरे-धीरे गति प्राप्त करने की अनुमति दी। विभाजन के दौरान, पाकिस्तान से आने वाली ट्रेनों की तरह, चटगांव मेल हिंदू शवों को भारत लेकर आई। बचे हुए शरणार्थियों में से लगभग 70% को भीड़भाड़ वाले कोलकाता में ठूंस दिया गया। पंजाबी शरणार्थियों का प्रदर्शन बेहतर रहा। उत्तर में, खाली सरकारी जमीन आसानी से उपलब्ध थी। साथ ही भाग रहे मुसलमानों ने भी 45 लाख एकड़ जमीन खाली कर दी थी।

पंजाब के विपरीत, बंगाली शरणार्थी 1947 के बाद भी लगातार आते रहे। ढाका, सिलहट, नोआखली और बारिसल में 1950 के दंगों ने शरणार्थियों के एक नए समूह को प्रेरित किया। 1981 तक शरणार्थियों की संख्या बढ़कर लगभग 80 लाख हो गई। ये पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थियों की कुल संख्या के करीब थी, लेकिन फिर भी यह दिल्ली को उत्साहित नहीं कर सका। वास्तव में, नेहरू ने पहले मुख्यमंत्री बीसी रॉय को बंगाली-हिंदू शरणार्थियों को पूर्वी पाकिस्तान वापस भेजने के लिए कहा था। इसने हर पार्टी में बंगाली-हिंदुओं को झकझोर दिया। वामपंथियों ने इस दिल्ली विरोधी आक्रोश को सबसे जोरदार तरीके से व्यक्त किया। भले ही इस रुख का मार्क्सवाद से कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन इसने वामपंथियों को बाकी लोगों से ऊपर उठाने में मदद की।

1959 में जब बंगाल में अनाज की कमी हुई, तो ज्योति बसु के नेतृत्व में कम्युनिस्टों ने मूल्य वृद्धि और अकाल प्रतिरोध समिति की स्थापना की। एक बार फिर, इस संकट के दौरान बंगाल को लगा कि दिल्ली ने उसे छोड़ दिया है। लेकिन अब तक कम्युनिस्टों को पर्याप्त नेट अभ्यास मिल चुका था क्योंकि उन्होंने 1943 के बंगाल अकाल में भी राहत कार्य किया था। तृणमूल को बंगाल में उसके दिल्ली विरोधी रवैये के कारण जल्दी ही स्वीकार कर लिया गया। जब 2014 में भाजपा जीती, तो उसे कुछ बंगाली समर्थन मिला क्योंकि वह दिल्ली में कदम रखने वाली नई पार्टी थी। लेकिन जब बीजेपी दिल्ली की सत्ता में आई, तो बंगाल पीछे हट गया। तर्कहीन? अनुचित? हो सकता है, लेकिन कौन फैसला कर रहा है? याद रखें, बंगाल सल्तनत 1342 में दिल्ली से अलग होने वाली सभी सल्तनतों में से पहली थी।

क्या ममता बनर्जी का माइक बंद किया गया था?

हाल ही में ममता बनर्जी ने कहा कि उनका माइक आयोग नीति की मीटिंग में बंद किया गया था! पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शनिवार को दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में आयोजित नीति आयोग की बैठक छोड़कर बाहर निकल आईं। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष की एकमात्र प्रतिनिधि होने के बावजूद उन्हें भाषण के दौरान बीच में ही रोक दिया गया। ममता बनर्जी की तरफ से उनका माइक बंद किए जाने का आरोप भी लगाया गया। हालांकि, सरकारी सूत्रों ने उनके आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि ममता को बोलने के लिए दिया गया समय समाप्त हो गया था। ममता ने कहा कि पांच मिनट के बाद उनका माइक्रोफोन बंद कर दिया गया, जबकि अन्य मुख्यमंत्रियों को अधिक देर तक बोलने की अनुमति दी गई। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने कहा कि यह अपमानजनक है। मैं आगे से किसी भी बैठक में हिस्सा नहीं लूंगी। बैठक से बाहर आने के बाद उन्होंने कहा कि मैं बैठक का बहिष्कार करके बाहर आई हूं। (आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री) चंद्रबाबू नायडू को बोलने के लिए 20 मिनट दिए गए। असम, गोवा, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों ने 10 से 12 मिनट तक अपनी बात रखी। मुझे पांच मिनट बाद ही बोलने से रोक दिया गया। यह अनुचित है।

सरकारी सूत्रों ने कहा कि यह कहना गलत है कि ममता का माइक्रोफोन बंद कर दिया गया था। उन्होंने कहा कि घड़ी के अनुसार, उनके बोलने का समय समाप्त हो गया था। सूत्रों ने बताया कि वर्णानुक्रम के अनुसार, ममता की बोलने की बारी दोपहर के भोजन के बाद आती, लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार के आधिकारिक अनुरोध पर उन्हें सातवें वक्ता के रूप में बोलने की अनुमति दी गई, क्योंकि उन्हें जल्दी कोलकाता लौटना था। पीआईबी की फैक्ट चेक यूनिट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर ममता बनर्जी के बयान को शेयर करते हुए कहा, “यह दावा किया जा रहा है कि नीति आयोग की 9वीं गवर्निंग काउंसिल की बैठक के दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री का माइक्रोफोन बंद कर दिया गया था। ये दावा भ्रामक है। घड़ी ने केवल यह दिखाया कि उनके बोलने का समय समाप्त हो गया था। यहां तक कि इसे चिह्नित करने के लिए घंटी भी नहीं बजाई गई।

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ममता बनर्जी के इस दावे का खंडन किया कि नीति आयोग की बैठक के दौरान उनका माइक बंद कर दिया गया था। उन्होंने टीएमसी सुप्रीमो पर ‘झूठ पर आधारित कहानी’ गढ़ने का आरोप लगाया। सीतारमण ने कहा कि “मुख्यमंत्री ममता बनर्जी नीति आयोग की बैठक में शामिल हुईं। हम सभी ने उनकी बात सुनी। हर मुख्यमंत्री को समय दिया गया था और यह हर टेबल के सामने मौजूद स्क्रीन पर दिखाया गया था। उन्होंने मीडिया में कहा कि उनका माइक बंद कर दिया गया था। यह पूरी तरह से झूठ है। यही नहीं बता दे कि 18वीं लोकसभा पहले ही अपने दूसरे सत्र में प्रवेश कर चुकी है, लेकिन सीट आवंटन अभी तक तय नहीं हो सका है। दिग्गजों का कहना है कि इस मुद्दे को सुलझाने में समय लगता है क्योंकि अलग-अलग पार्टियों की स्पीकर से अलग-अलग मांगें होती हैं, और अड़चन काफी हद तक आगे की पंक्ति की सीटों को लेकर होती है।

सूत्रों ने कहा कि विपक्ष वर्तमान में अधिक से अधिक सहयोगियों को अपने साथ करने के लिए आगे की लाइन में अधिक सीटों के लिए स्पीकर पर दबाव बना रहा है।अन्य मुख्यमंत्रियों को अधिक देर तक बोलने की अनुमति दी गई। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने कहा कि यह अपमानजनक है। मैं आगे से किसी भी बैठक में हिस्सा नहीं लूंगी। बैठक से बाहर आने के बाद उन्होंने कहा कि मैं बैठक का बहिष्कार करके बाहर आई हूं। हर मुख्यमंत्री को बोलने के लिए उनका उचित समय दिया गया था। केंद्रीय वित्त मंत्री ने कहा, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया है कि उनका माइक बंद कर दिया गया था, जो सच नहीं है..इसके अलावा विपक्ष में समाजवादी पार्टी और डीएमके के लिए भी प्रमुख पदों की जरूरत है। उम्मीद है कि शिवसेना (यूबीटी) को भी आगे बैठाया जा सकता है।टीएमसी एक सूत्र ने कहा कि अभी बातचीत चल रही है। बैठने की व्यवस्था जल्द ही फाइनल हो जानी चाहिए। 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद, विपक्ष सदन में अधिक संख्या में लौटा है।उन्हें झूठ पर आधारित कहानी गढ़ने के बजाय इसके पीछे की सच्चाई बतानी चाहिए।