Friday, March 13, 2026
Home Blog Page 610

क्या बीजेपी और आरएसएस में बढ़ चुका है विवाद?

खबरों की माने तो बीजेपी और आरएसएस में विवाद बढ़ चुका है! आरएसएस और बीजेपी के रिश्तों में तनाव है? लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद सबसे पहले संघ से जुड़ी पत्रिका ऑर्गनाइजर में रतन शारदा का लेख आया। इसमें बीजेपी के लिए साफ संदेश हैं। इन संदेशों के संकेतों पर अभी बात हो ही रही थी कि संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयानों ने स्थिति बहुत हद तक स्पष्ट कर दी। फिर संघ की मुस्लिम शाखा राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के प्रमुख इंद्रेश कुमार ने इस चर्चा को अगले स्तर पर पहुंचा दिया। उन्होंने इतना तगड़ा कटाक्ष किया कि अगले ही दिन सफाई देने पड़ गई। संघ से जुड़े विचारक रतन शारदा हों या फिर संघ प्रमुख मोहन भागवत या राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के मार्गदर्शक इंद्रेश कुमार, सभी की टिप्पणियों में एक कॉमन फीलिंग है- अहंकार। सभी ने येन केन प्रकारेण यही बताने और जताने की कोशिश की है कि लोकसभा चुनाव में लगे झटके के पीछे बेजीपी नेतृत्व का अहंकार सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। बाकी संघ प्रमुख ने कई तरह के सुझाव दिए। उन्होंने यह भी कहा कि राजनीति में विरोधी (दुश्मन) नहीं प्रतिपक्षी (प्रतिस्पर्धी) होते हैं। तो अगला सवाल यह उठता है कि क्या आरएसएस बीजेपी नेतृत्व को लेकर कोई बड़ा फैसला कर सकता है? आरएसएस-बीजेपी के बीच खींचतान की पुष्टि करते हुए बताया है कि इसका मतलब क्या है। वो कहती हैं कि बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने चुनावों के दौरान ही इंडियन एक्सप्रेस को ही दिए इंटरव्यू में आरएसएस को अखरने वाली बात कही थी। नड्डा ने कहा था कि बीजेपी अपने पांव पर खड़ी है और उसे आरएसएस की जरूरत नहीं है। आरएसएस भी इसका जवाब देने से नहीं चूका। उसने कहा कि बीजेपी कभी आरएसएस को अपना फील्ड फोर्स समझने की भूल नहीं करे। तो इसमें कोई संदेह नहीं कि लोकसभा चुनाव परिणामों ने आरएसएस-बीजेपी के रिश्ते में थोड़ी खटास तो ला दी है। लेकिन आगे दोनों करें भी तो क्या?

आरएसएस भले ही बीजेपी नेतृत्व के रवैये से नाराज हो, लेकिन उसे यह अच्छे से पता है कि इसी नेतृत्व ने उसके बरसों पुराने एजेंडों को पूरा किया है। उसे यह भी पता है कि यह इंदिरा के दौर की कांग्रेस नहीं है जिसके लिए दांव खेलकर बीजेपी को तात्कालिक तौर पर सबक सिखाया जा सके। यह अलग बात है कि आरएसएस चीफ भागवत ने विपक्ष को प्रतिस्पर्धी बताकर कांग्रेस के लिए एक संदेश दिया है, लेकिन उन्हें यह भी पता है कि राहुल गांधी की कांग्रेस कौन सी दिशा ली हुई है। आरएसएस इंदिरा गांधी को हिंदू लीडर मानता था। इस वजह से आरएसएस ने 1980 के चुनावों में इंदिरा गांधी की जीत सुनिश्चित करने में मदद की। 1984 में इंदिरा की हत्या के बाद आरएसएस का समर्थन राजीव गांधी को भी मिलता रहा। लेकिन 2024 की कांग्रेस, 1970-80 के दशक से बिल्कुल अलग है। राहुल गांधी धुर वामपंथी विचारधारा अपना रखी है और उनके परोक्ष नेतृत्व में कांग्रेस कभी हिंदू हितों की सोच भी नहीं सकती।

वैसे भी आरएसएस मौजूदी बीजेपी लीडरशिप से इतना भी खफा नहीं है कि वो विकल्प तलाशने पर विचार करे। वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी की मानें तो वह सिर्फ इतना चाहता है कि बीजेपी नेतृत्व ‘एकला चलो रे’ की नीति से हट जाए और बड़े मुद्दों पर सबको (विपक्ष को भी) साथ लेकर चले। आरएसएस की चाहत है कि अकेले दम पर सरकार बनाने में अक्षम साबित हुई बीजेपी में कद्दावर नेताओं की स्टेक बढ़े जो बीते 10 वर्षों में क्रमिक तौर पर घटता रहा है। आरएसएस यह भी नहीं भूल सकता है कि जम्मू-कश्मीर के लिए लागू आर्टिकल 370 को निरस्त करना हो या अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण से सदियों पुराना विवाद सुझलाने की बात, मोदी-शाह के नेतृत्व वाली बीजेपी ने ही संघ के मूल एजेंडों को पूरा किया है। मोदी सरकार ने चुनावों से पहले समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर भी स्थिति स्पष्ट कर दी थी कि अगली सरकार में इसे लागू किए जाने की तरफ गंभीरता से कदम बढ़ाए जाएंगे।

इन सबके बावजूद आरएसएस को बीजेपी से जो एक बड़ी शिकायत है, वो यह कि पार्टी का संगठन सरकार के हां में हां मिलाने वाला ‘यस मैन’ बन गया है। इसलिए आरएसएस के रिफॉर्म एजेंडे में यह बात सबसे ऊपर है कि बीजेपी संगठन को मोदी सरकार से अलग किया जाए। संगठन अपने फैसले खुद करे, सरकार के निर्देशों पर नहीं। हां, सरकार के साथ संगठन का सामंजस्य नितांत आवश्यक है और इसका ख्याल जरूर रखा जाएगा। वैसे भी जेपी नड्डा का कार्यकाल इसी महीने खत्म हो जाएगा। दूसरी तरफ, आरएसएस की मर्जी है कि वह योगी आदित्यनाथ की आभा उत्तर प्रदेश से बाहर भी पहुंचाई जाए। आरएसएस चीफ मोहन भागवत की यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ के साथ बंद कमरे में हुई बैठकें संभवतः इसी दिशा में हुईं। उधर, दत्तात्रेय होसबोले, अरुण कुमार, सुरेश सोनी जैसे आरएसएस नेताओं के साथ बीएल संतोष जेपी नड्डा, अमित शाह और राजनाथ सिंह जैसे बीजेपी लीडर्स के साथ हुई मीटिंग के भी अपने महत्व हैं।

आरएसएस की इन मंशाओं पर बीजेपी और मोदी क्या सोच रहे होंगे? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को लोकसभा चुनाव परिणामों ने बड़ा झटका दिया है। पीएम मोदी को अगले चुनावों में यह साबित करना ही होगा कि करिश्मा कर दिखाने की उनकी ताकत खत्म नहीं हुई है। इस वर्ष महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा और अगले वर्ष दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनाव पीएम मोदी को अपनी ताकत साबित करने के लिए काफी मुफीद मौका देंगे। इस मकसद में मोदी को आरएसएस का साथ चाहिए होगा। लोकसभा चुनावों में कई राज्यों में और कई क्षेत्रों में आरएसएस ने हाथ खींचे तो बीजेपी 240 तक सिमट गई है। मोदी आगामी विधानसभा चुनाव में ऐसा कुछ नहीं करना चाहेंगे जिससे आरएसएस फिर वेट एंड वॉच की मुद्रा ही अपना ले।

क्या बड़ी कंपनियों को भी घेर रहे हैं साइबर क्रिमिनल?

वर्तमान में साइबर क्रिमिनल बड़ी कंपनियों को भी घेर रहे हैं! हाल ही में पुणे स्थित एक रियल एस्टेट फर्म को ₹4 करोड़ का चूना लगा, जब साइबर अपराधियों ने कंपनी के चेयरमैन के रूप में एक अकाउंट अधिकारी को धोखा देकर कंपनी के फंड को फर्जी बैंक खातों में ट्रांसफर कर दिया। एक बहुराष्ट्रीय कंपनी की लोकल यूनिट में में फाइनेंस कंट्रोलर करोड़ों रुपये के इसी तरह के घोटाले का शिकार हो गया, जब चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर छुट्टी पर थे। फिशिंग हमले अधिक एडवांस हो गए हैं। साइबर अपराधी ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने के लिए बड़े लोगों पर नजर रख रहे हैं। एक्सपर्ट्स ने कहा कि पिछले एक साल में, उन्होंने तथाकथित व्हेलिंग अटैक या सीईओ धोखाधड़ी की घटनाओं में कम से कम दो से तीन गुना वृद्धि देखी है। इसमें घोटालेबाज सोशल इंजीनियरिंग का यूज करके टॉप कॉर्पोरेट अधिकारी बन जाते हैं। इसके बाद वे कर्मचारियों को पैसे भेजने, संवेदनशील डेटा प्रदान करने, गिफ्ट कार्ड खरीदने या नेटवर्क एक्सेस की अनुमति देने के लिए धोखा देते हैं। इन घटनाओं से अक्सर वित्तीय नुकसान, डेटा ब्रीच और कुछ मामलों में कंपनियों के लिए ऑर्गनाइजेशन रेपुटेशन को नुकसान होता है।

ईवाई इंडिया के फोरेंसिक एंड इंटीग्रिटी सर्विसेज के पार्टनर रंजीत बेल्लारी ने कहा कि यह एक बड़ा नेक्सस है; संगठित आपराधिक गिरोह इसमें सक्रिय हैं। उन्होंने कहा कि हम पिछले सात-आठ सालों से सोशल इंजीनियरिंग धोखाधड़ी की जांच कर रहे हैं, लेकिन सीईओ/सीएक्सओ-स्तर के अधिकारियों को निशाना बनाने वालों की संख्या में हाल ही में बढ़ोतरी हुई है। बेल्लारी का कहना है कि धोखेबाज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे बॉट-आधारित अटैक कर रहे हैं। इसमें अधिकारियों के सोशल मीडिया प्रोफाइल और अन्य उपलब्ध कंटेंट की स्टडी करके बहुत ही विश्वसनीय मेल तैयार कर रहे हैं जो वैलिड लगते हैं। बेल्लारी ने कहा कि ये हमले आंशिक रूप से कम अवेयरनेस के कारण प्रभावी हैं। इसलिए भी क्योंकि धोखेबाजों को एहसास हो गया है कि सीनियर अधिकारियों से मिले ईमेल पर कर्मचारियों से ऐक्शन करवाना आसान है। धोखे से बचने की पहली लाइन है कि आपको किसी व्यक्ति पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए। कंपनियां अब कर्मचारियों के लिए अवेयरनेस सेशन भी करवा रही हैं। हालांकि, अधिकत मामलों में, यह रिएक्विट होने के बजाय प्रोएक्टिव होता है।

कई मामलों में, कंपनियां और व्यक्ति इस फैक्ट को छिपाने की कोशिश करते हैं कि उनके साथ धोखाधड़ी की गई है। इसका अर्थ है कि मामलों की वास्तविक संख्या रिपोर्ट की गई संख्या से कई गुना अधिक होने की संभावना है। केवल कॉर्पोरेट कर्मचारी ही नहीं, बल्कि IIM जैसे इंस्टीट्यूट के फैकल्टी को भी हैकर्स से निदेशक या शीर्ष अधिकारियों के रूप में ईमेल या व्हाट्सएप मैसेज मिले।

कथित तौर पर उनकी तरफ से भेजे गए मेल कई फैकल्टी मेंबर्स को भेजे गए थे। इसमें गिफ्ट कार्ड खरीदने और डिटेल भेजने के लिए कहा गया था। निदेशक ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि यह एक बार नहीं बल्कि कई बार हुआ है। हमने अब और अधिक सख्त सिस्टम लागू कर दिए हैं। उन्होंने कहा कि मुझे फिर से निशाना बनाए जाने की आशंका है। उन्होंने बताया कि अन्य संस्थानों में उनके कई साथियों को भी इसी समस्या का सामना करना पड़ा है। ग्रांट थॉर्नटन भारत में पार्टनर और लीडर-साइबर अक्षय गार्केल के अनुसार, कभी-कभी किसी बड़ी कंपनी (जिसका सालाना रेवेन्यू 50,000-100,000 करोड़ रुपये होता है) के लिए यह सोचना बेहतर होता है कि नियोक्ता ब्रांड को नुकसान पहुंचाने के बजाय छोटी रकम, जैसे कि 3-4 करोड़ रुपये तक, को राइटऑफ कर देना बेहतर है। उन्होंने कहा कि ऐसा कहने के बाद, कानून प्रवर्तन एजेंसियों को सभी मामलों के बारे में सूचित किया जाना चाहिए।लगभग हर कोई साइबर हमलों के प्रति संवेदनशील है। इसकी वजह है कि ऐप्स और वेब साइट्स की तरफ से जुटाई गई पर्सनल जानकारी लीक हो सकती है। इससे घोटालेबाजों को कॉन्फिडेंशियल जानकारी तक एक्ससे मिल सकता है।इन घटनाओं से अक्सर वित्तीय नुकसान, डेटा ब्रीच और कुछ मामलों में कंपनियों के लिए ऑर्गनाइजेशन रेपुटेशन को नुकसान होता है। धोखाधड़ी का पता लगाने वाली कंपनी IDfy के सीईओ अशोक हरिहरन ने कहा कि उनकी कंपनी को भी निशाना बनाया गया था। एक महीने पहले ही, कंपनी के 650 कर्मचारियों में से 50-60 को हरिहरन से एक ईमेल मिला था। उन्होंने कहा कि धोखाधड़ी का पता लगाने के बिजनेस में होने के कारण, कोई भी इसके झांसे में नहीं आया, लेकिन ऐसी घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं।

आखिर कैसे हुआ कंचनजंगा ट्रेन हादसा?

आज हम आपको बताएंगे कि हाल ही में हुआ कंचनजंगा ट्रेन हादसा आखिर कैसे हुआ! पश्चिम बंगाल में सियालदह जाने वाली कंचनजंगा एक्सप्रेस सोमवार सुबह न्यू जलपाईगुड़ी के पास हादसे का शिकार हो गई। उसे एक मालगाड़ी ने पीछे से टक्कर मार दी। कंचनजंगा एक्सप्रेस यहां खड़ी थी, जब पीछे से आ रही मालगाड़ी ने उसे टक्कर मार दी। मालगाड़ी से टक्कर होने के बाद ट्रेनों की 3 बोगियां पटरी से उतर गई। बताया जा रहा है कि ट्रेन के लोको पायलट ने सिग्नल को नजरअंदाज किया था। रेलवे बोर्ड की चेयरमैन जया वर्मा सिन्हा ने बताया कि कंचनजंगा ट्रेन का एक्सीडेंट हुआ है। ट्रेन हादसे के बाद हर बार इसकी चर्चा होती है, मगर बीते 20-22 साल से कवच को इंस्टॉल नहीं किया जा सका।कोहरे और धुंध में भी कई बार ट्रेन हादसे होते हैं। इसे रोकने के लिए जीपीएस आधारित फॉग पास डिवाइस बनाया गया है। यह डिवाइस सिग्नल, लेवल क्रॉसिंग गेट्स के बारे में पहले ही बता देता है।मालगाड़ी के ड्राइवर ने यात्री ट्रेन को टक्कर मारी। शुरुआती जानकारी से पता चला है कि मालगाड़ी के चालक ने सिग्नल की अनदेखी की थी। इस वजह से पैसेंजर ट्रेन के सबसे पीछे का गार्ड का डिब्बा पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया और आगे दो पार्सल वैन के डिब्बे थे, जो क्षतिग्रस्त हुए। आइए- समझते हैं कि भारत में ट्रेन हादसों की क्या वजहें होती हैं। रेलवे का संचालन करने, मेनटेन करने, ट्रेनों और ट्रैक को मैनेज करने वाले रेलवे का स्टाफ कई बार थकान, उपेक्षा, नाराजगी, भ्रष्टाचार से जूझता रहता है, जिससे उसके सेफ्टी नियमों और प्रक्रियाओं को नजरअंदाज करने का खतरा ज्यादा रहता है। यही मानवीय भूल या लापरवाही की बड़ी वजह बनती है।

मानवीय चूक या लापरवाही में अक्सर गलत सिग्नल दे देना, मिस कम्युनिकेशन, ओवर स्पीडिंग या खामियों को नजरअंदाज कर जाना जैसी बातें शामिल होती हैं।कई बार रेलवे के स्टाफ को पर्याप्त ट्रेनिंग या कम्युनिकेशन स्किल्स नहीं मिल पाती है। इससे उनके प्रदर्शन और कोऑर्डिनेशन पर असर पड़ता है। ट्रेनों की आवाजाही और दिशानिर्देश को कंट्रोल करने वाले सिग्नलिंग सिस्टम का फेल होना भी हादसे की वजह बनता है। इसके पीछे तकनीकी खामी, पावर की कटौती या मानवीय गलती भी होती है। गलत सिग्नल देने से ट्रेन गलत ट्रैक पर आ जाती है, जिससे उसके किसी दूसरी ट्रेन से टक्कर होने की आशंका बढ़ जाती है। बीते साल ओडिशा ट्रेन हादसे की अहम वजह यही थी। कई बार ट्रेन एक्सीडेंट की वजह मानव रहित क्रॉसिंग भी होते हैं। हालांकि, देश में ज्यादातर जगहों पर ये पुरातन व्यवस्था दूर की जा चुकी है, मगर कुछ जगहों पर यह अब भी चल रही है। 2018-19 में पूरे देश में सभी ट्रेन एक्सीडेंट में से 16 फीसदी की वजह यही मानव रहित क्रॉसिंग हैं।

रेलवे की ढांचागत खामियां भी अक्सर ट्रेन हादसों की वजह बनती हैं। इनमें ट्रैक का खराब होना, जर्जर पुल या बिजली के तारों का टूटना जैसी समस्याएं। दरअसल, इसके पीछे समय-समय पर मरम्मत न होना, ज्यादा पुराना होना, हिंसक प्रदर्शन या प्राकृतिक आपदाओं में ये चीजें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। दरअसल, रेलवे के ज्यादातर ढांचे 19वीं और 20वीं सदी के बने हुए हैं। इन्हें आधुनिक समय के हिसाब और नए मानकों के मुताबिक अपग्रेड नहीं किया जाता है तो ऐसे हादसे हो सकते हैं। रेलवे को कई जगहों पर फंड की कमी से भी जूझना पड़ता है। साथ ही भ्रष्टाचार भी बड़ा मसला है, जिससे रेलवे को दो-चार होना पड़ता है।रेलवे के कई रूट इतने व्यस्त रहते हैं कि वहां 100 फीसदी संचालन क्षमता के बावजूद भी काम प्रभावित होता है। दरअसल, इन बिजी रूट्स पर ओवरलोडिंग और काम का बोझ काफी ज्यादा रहता है।

रेलवे ने राष्ट्रीय रेल संरक्षा कोष बनाया गया है। 2017-18 में 1 लाख करोड़ रुपए के फंड से इसकी शुरुआत की गई थी। इसके तहत ट्रैक की मरम्मत, सिग्नलिंग प्रोजेक्ट्स, ब्रिज रिहैबिलेटेशन वगैरह की जाती है। यह एक स्वदेशी विकसित ऑटोमेटिक ट्रेन प्रोटेक्शन यानी कवच है, जिसके इंस्टॉल करने की बात बीते कई सालों से की जा रही है। ट्रेन हादसे के बाद हर बार इसकी चर्चा होती है, मगर बीते 20-22 साल से कवच को इंस्टॉल नहीं किया जा सका।कोहरे और धुंध में भी कई बार ट्रेन हादसे होते हैं। इसे रोकने के लिए जीपीएस आधारित फॉग पास डिवाइस बनाया गया है। यह डिवाइस सिग्नल, लेवल क्रॉसिंग गेट्स के बारे में पहले ही बता देता है। यह लोको पायलट को भी जोरदार आवाज के साथ अलर्ट करता है।

आखिर क्या है पॉप और मोदी जी का विवाद ?

आज हम आपको पॉप और मोदी जी का विवाद बताने जा रहे हैं! केरल कांग्रेस ने एक तस्वीर के लिए माफी मांगी है जो उसके राज्य इकाई द्वारा शेयर की गई थी, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पोप फ्रांसिस को G7 शिखर सम्मेलन में दिखाया गया था। हालांकि, पार्टी ने यह भी कहा कि उसे प्रधानमंत्री मोदी को निशाना बनाने में कोई हिचकिचाहट नहीं है। यह माफी तब आई जब बीजेपी ने इस पोस्ट पर आपत्ति जताई और कांग्रेस पर ईसाई समुदाय का अपमान करने का आरोप लगाया। बता दें कि मोदी के साथियों की सांप्रदायिक मानसिकता को समझ सकेंगे। सुरेन्द्रन और उनके साथी ईसाइयों को ऐसे लोगों के समूह के रूप में नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, जिनमें कोई आत्म-सम्मान नहीं है और जैसे ही वे सांप्रदायिक जहर फैलाते हैं, वे उसे इंजेक्ट कर देते हैं।” इस पोस्ट में उस बैठक की तस्वीर थी और उसके साथ कैप्शन लिखा था, ‘आखिरकार, पोप को भगवान से मिलने का मौका मिला।’ जो प्रधानमंत्री द्वारा हाल ही में दिए गए एक बयान की ओर इशारा कर रहा था। बीजेपी की केरल राज्य इकाई के प्रमुख के. सुरेंद्रन ने इस पोस्ट की निंदा की और कांग्रेस पर प्रधानमंत्री मोदी की तुलना भगवान यीशु से करने का आरोप लगाया। कोई भी कांग्रेस कार्यकर्ता पोप का अपमान करने के बारे में दूर-दूर तक नहीं सोच सकता, जिन्हें दुनिया भर के ईसाई भगवान के समान मानते हैं। हालांकि, कांग्रेस को नरेंद्र मोदी का मजाक उड़ाने में कोई हिचक नहीं है, जो खुद को भगवान बताकर इस देश के आस्थावानों का अपमान करते हैं।”उन्होंने इसे ईसा मसीह को अत्यधिक सम्मान देने वाले ईसाइयों के लिए अस्वीकार्य और अपमानजनक बताया। कांग्रेस ने कहा कि अगर इस पोस्ट से ईसाइयों की भावनाएं आहत हुई हैं, तो हम इसके लिए बिना शर्त माफी मांगते हैं।सुरेंद्रन ने एक पोस्ट में कहा, ‘कांग्रेस का यह ट्वीट प्रधानमंत्री मोदी की तुलना भगवान यीशु से करता है। यह बिल्कुल अनुचित है और ईसाई समुदाय का अपमान है, जो यीशु का सम्मान करते हैं। यह शर्मनाक है कि कांग्रेस इस स्तर पर उतर आई है।’

उन्होंने आगे कहा, ‘कांग्रेस केरल का एक्स हैंडल, जो या तो कट्टरपंथी इस्लामवादियों या अर्बन नक्सलियों द्वारा चलाया जा रहा है, राष्ट्रीय नेताओं के खिलाफ अपमानजनक और अपमानित करने वाली सामग्री पोस्ट करता रहता है। अब, इसने सम्मानित पोप और ईसाई समुदाय का मजाक उड़ाने तक गिर गया है। यह निश्चित है कि केरल के AICC महासचिव केसी वेणुगोपाल को इस बारे में पता है। सवाल ये है कि राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे भी इसके समर्थन में हैं?’ इस घटना के बाद केरल कांग्रेस ने सफाई दी और इस बात पर जोर दिया कि किसी भी धर्म का अपमान करना उनकी परंपरा का हिस्सा नहीं है। उन्होंने सभी धर्मों और आस्थाओं को एकजुट करने और लोगों के बीच मैत्रीपूर्ण माहौल को बढ़ावा देने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

केरल कांग्रेस ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, ‘कोई भी कांग्रेस कार्यकर्ता पोप का अपमान करने के बारे में दूर-दूर तक नहीं सोच सकता, जिन्हें दुनिया भर के ईसाई भगवान के समान मानते हैं। हालांकि, कांग्रेस को नरेंद्र मोदी का मजाक उड़ाने में कोई हिचक नहीं है, जो खुद को भगवान बताकर इस देश के आस्थावानों का अपमान करते हैं।”

कांग्रेस ने बिना शर्त मांगी माफी, इसमें कहा गया है, ‘इस तरह से लोग नरेन्द्र मोदी के बेशर्म राजनीतिक खेल को पोप के अपमान के रूप में चित्रित करने के सुरेन्द्रन और मोदी के साथियों की सांप्रदायिक मानसिकता को समझ सकेंगे। सुरेन्द्रन और उनके साथी ईसाइयों को ऐसे लोगों के समूह के रूप में नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, केरल राज्य इकाई के प्रमुख के. सुरेंद्रन ने इस पोस्ट की निंदा की और कांग्रेस पर प्रधानमंत्री मोदी की तुलना भगवान यीशु से करने का आरोप लगाया। उन्होंने इसे ईसा मसीह को अत्यधिक सम्मान देने वाले ईसाइयों के लिए अस्वीकार्य और अपमानजनक बताया। सुरेंद्रन ने एक पोस्ट में कहा, ‘कांग्रेस का यह ट्वीट प्रधानमंत्री मोदी की तुलना भगवान यीशु से करता है। यह बिल्कुल अनुचित है और ईसाई समुदाय का अपमान है, जो यीशु का सम्मान करते हैं। यह शर्मनाक है कि कांग्रेस इस स्तर पर उतर आई है।’जिनमें कोई आत्म-सम्मान नहीं है और जैसे ही वे सांप्रदायिक जहर फैलाते हैं, वे उसे इंजेक्ट कर देते हैं।” कांग्रेस ने कहा कि अगर इस पोस्ट से ईसाइयों की भावनाएं आहत हुई हैं, तो हम इसके लिए बिना शर्त माफी मांगते हैं।

क्या बांग्लादेश के साथ बढ़ रहा है भारत का रिश्ता ?

वर्तमान में भारत का रिश्ता बांग्लादेश के साथ बढ़ता जा रहा है! पीएम मोदी के शपथ समारोह में हिस्सा लेने के लिए हाल ही में दिल्ली आई बांग्लादेश की पीएम शेख हसीना 21 जून को भारत आ रही है। ये 15 दिनों में दूसरी बार है जब शेख हसीना नई दिल्ली के दौरे पर होंगी। दरअसल भारत दौरे के बाद बांग्लादेशी पीएम का चीन जाने का भी कार्यक्रम है। ऐसे में इस दौरे को बांग्लादेश सरकार की ओर से इसे भारत और चीन के बीच बैलेंसिंग एक्ट की दिशा में की जाने वाली एक कोशिश की तरह देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि इस दौरान दोनों के प्रधानमंत्री द्विपक्षीय संबंधों के व्यापक दायरे पर चर्चा और समीक्षा करेंगे। वहीं इसके अलावा रेल,एनर्जी कनेक्टिविटी और दूसरे कई अहम मुद्दों पर भी बात हो सकती है। हालांकि जानकार कह रहे हैं कि इस दौरान दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच तीस्ता मास्टर प्लान को लेकर भी बात हो सकती है। दरअसल फिर से बांग्लादेश में फिर से सत्ता आने के बाद शेख हसीना ने हाल ही में अपनी देश की संसद में तीस्ता मास्टर प्लान को लागू करने के मद्देनजर चीन से कर्ज हासिल करने को लेकर बयान दिया है। पहले से लंबित इस प्रोजेक्ट को लेकर चीन ने फिर से रूचि दिखाई है। हालांकि बीते मई महीने में विदेश सचिव विनय क्वात्रा भी बांग्लादेश दौरे पर थे, उनके साथ मुलाकात के बाद बांग्लादेश के विदेश मंत्री हसन महमूद ने ये कहा बी था कि तीस्ता पर बांध बनाने को लेकर भारत भी वित्तीय मदद देना चाहता है।

चीन मामलों के जानकार हर्ष पंत कहते हैं कि ये स्वाभाविक है कि इस मसले पर चीन के प्रस्ताव को लेकर कोई कदम उठाने से पहले शेख हसीना भारत से किसी तरह की स्पष्टता की उम्मीद कर रही होंगी, और ये मुद्दा उनके भारत दौरे में शीर्ष नेतृत्व के साथ उठ सकता है। वो कहते हैं कि ‘जहां पर भी भारत और पड़ोसी देशों के बीच अलग दृष्टिकोण होने की गुंजाइश होती है, वहां चीन घुसने की कोशिश करता है। खासकर भारत की वजह से तीस्ता का मामला काफी लटका हुआ है, जिसे लेकर बांग्लादेश में इस मसले पर भारत को लेकर एक नकारात्मक अप्रोच है, लोगों को ऐसा लगता है कि भारत इसे सुलझा नहीं रहा है। हालांकि 2014 के दौरान भारत -बांग्लादेश इसे सुलझाने के बेहद करीब पहुंच गए थे, लेकिन ममता बनर्जी के विचार इसे लेकर अलग थे। इसलिए आगे नहीं बढ़ पाया। दरअसल हमारे यहां मसला राज्य और केंद्र सरकार के बीच के क्षेत्राधिकार से जुड़ा है।

वो आगे कहते हैं कि चीन अपने नए ऑफर के जरिए संकेत देना चाहता है कि वो बांग्लादेश के साथ है। हालांकि हसीना ये जानती हैं कि अगर वो चीन के साथ जाती हैं तो भारत के लिहाज से ये असहज करने वाली स्थिति होगी। यही वजह है कि उन्होंने इस मसले पर थोड़ा दबाव बनाने के लिए ही संसद में बयान दिया होगा। यही वजह है कि चीन जाने से पहले वो भारत आकर ये स्पष्टता चाह रही होंगी कि आखिर भारत इसमें क्या चाह रहा है ? आखिर वो नहीं चाहेंगी कि इस मसले पर भारत के साथ संबंधों में खटास आए क्योंकि अगर तीस्ता के मसले को छोड़ दिया जाए तो दोनों देशों के रिश्ते बहुत अच्छे चल रहे हैं। लेकिन ये भी साफ है कि शेख हसीना के ऊपर अंदरूनी तौर पर बहुत प्रेशर है। ऐसे में भारत को चीन को यहां से दरकिनार करने के लिए प्रो एक्टिव अप्रोच अपनानी होगी।

ऐसा ही कुछ अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार राजीव डोगरा भी कहते हैं, वो कहते हैं कि बांग्लादेश पिछले साल के मुकाबले एक बदली हुई स्थिति में है। पहले आर्थिक तौर वो एक उभरती हुई इकोनमी की भूमिका में था, लेकिन बदले आर्थिक हालातों ने लोगों में सरकार के खिलाफ गुस्से को बढ़ाया है वहीं इस्लामिक पार्टियां भी सर उठा रही हैं। ऐसे में कोई भी सरकार ऐसी कोशिश करती है, कि आर्थिक हालातों को बेहतर किया जाए। वहीं ऐसी स्थिति के लिए चीन अपना बैंक खुला ही रखता है। वो इस कोशिश में रहता है कि कैसे आर्थिक मदद के की एवज में किस तरह देशों पर अपना प्रभाव बढ़ाया जाए। वहीं बांग्लादेश भी अपने विकल्प खुले ही रखता है। एक बड़ी बात ये भी है कि म्यांमार बॉर्डर पर जो हो रहा है, उसमें भी चीन का हाथ माना जा रहा है, कुल मिलाकर बांग्लादेश चीन को नाराज नहीं करना चाहता।

वो आगे कहते हैं कि बांग्लादेश के पीएम के हालिया बयान को डिप्लोमेसी की उस क्लासिक राजनियक कदम की तरह देखा जाना चाहिए, जिसके मुताबिक ये दबाव बनाया जाता है कि एक डील में दो पक्ष रूचि ले रहे हैं। वो ये भी कहते हैं कि भारत के लिए ये जानना अहम है कि चीन इस प्रोजेक्ट में इतनी रूचि क्यों दिखा रहा है ? हालांकि रणनीतिक लिहाज से ये कितना अहम है, इसे लेकर हर्ष पंत कहते हैं कि तीस्ता का मास्टर प्लान जो सामने रखा गया है उसके डेवलपमेंटल पैरामिटर पर अगर ये बनकर तैयार होता है तो रणनीतिक तौर पर भारत के लिए एक चुनौती हैं। क्योंकि चिकन नेक कॉरिडोर वैसे भी भारत के लिए रणनीतिक लिहाज से संवेदनशील मामला तो है ही। अगर चीन इस मास्टर प्लान में इन्वेस्ट करता है, तो भारत के लिए कई समस्याएं भविष्य में कई समस्याएं खड़ी हो सकती है। भारत के लिए चीन और ढाका दोनों तरफ से समारिक चिंता का विषय बन सकता है।

क्या राहुल गांधी चुनावों के बाद बन चुके हैं हीरो?

वर्तमान में राहुल गांधी चुनावों के बाद हीरो बन चुके हैं! लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों के तहत भले ही केंद्र में तीसरी बार मोदी सरकार बनी हो, लेकिन सही मायने में लॉटरी तो कांग्रेस की लगी है। चुनाव के नतीजों के बाद राहुल गांधी देश में हीरो बनकर उभरे हैं। राहुल गांधी ने वायनाड और रायबरेली दोनों सीटों पर बड़ी जीत हासिल की है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि जो कांग्रेस अपने अस्तिस्व को बचाने को लेकर जद्दोजहद में लगी हो, उसके हाथ 99 सीटें लगना किसी संजीवनी से कम नहीं है। इस बार के चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया है और 52 सीटों से 99 सीटों पर पहुंच गई है। हालांकि, कांग्रेस अपना शतक पूरा नहीं कर सकी। ऐसे में कांग्रेस को आगे की सफलताओं के लिए कड़ा संघर्ष जारी रखना होगा। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 99 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया है। ये जीत कांग्रेस के लिए संजीवनी से कम नहीं है। इस जीत ने साबित कर दिया है कि भारतीय राजनीति में अभी भी लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हैं। पहले ऐसा लगता था कि कांग्रेस भले ही कुछ राज्यों के चुनाव जीत ले, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में उसकी वापसी मुश्किल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के आगे कांग्रेस कमजोर दिख रही थी। लेकिन लोकसभा चुनाव के नतीजों ने इस मिथक को तोड़ दिया है। कांग्रेस ने सिर्फ दक्षिण ही नहीं, बल्कि उत्तर भारत में भी अपनी पकड़ मजबूत की है। यहां तक कि बीजेपी के गढ़ माने जाने वाले इलाकों में भी कांग्रेस ने अपनी जगह बनाई है।

बड़ा सवाल ये है कि कांग्रेस इस जीत को आगे कैसे बढ़ाएगी? पिछले 10 सालों में जब-जब पार्टी को कामयाबी मिली, वो आगे नहीं बढ़ पाई छोटी-मोटी जीत से कुछ खास फर्क नहीं पड़ता। अगर कांग्रेस 2029 में वापसी करना चाहती है और 200 सीटें जीतकर सरकार बनाना चाहती है, तो उसे अपनी जीत का सिलसिला जारी रखना होगा। कुछ आंकड़े बताते हैं कि जहां-जहां भारत जोड़ो यात्रा निकली, वहां कांग्रेस को फायदा हुआ। कुल मिलाकर, यह कहना गलत नहीं होगा कि दोनों यात्राओं से कांग्रेस को वोट और सीटें दोनों जगह बढ़त मिली। यात्राओं ने पार्टी के निराश कार्यकर्ताओं में जोश भरा।

एक-दो दिन के विरोध प्रदर्शन काफी नहीं हैं। पार्टी को हफ्तों और महीनों तक चलने वाले लंबे अभियानों की जरूरत है। इस विशाल देश के 140 करोड़ विविध लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए यही कारगर तरीका है। खासकर तब जब मीडिया आपको उचित कवरेज न दे। ये काम 2028 तक नहीं टाला जा सकता। कांग्रेस पार्टी को हमेशा एक राष्ट्रीय अभियान चलाते रहना चाहिए, भले ही वह राज्य चुनावों में कैसा भी प्रदर्शन कर रही हो। राज्य चुनावों के दौरान राष्ट्रीय अभियानों को रोकने के बजाय, राष्ट्रीय अभियान को राज्य अभियानों का पूरक माना जाना चाहिए। हर साल एक बड़ा राष्ट्रीय अभियान चलाने से कोई यह नहीं कहेगा कि ‘कांग्रेस क्या कर रही है?’ और जनता से जुड़कर विपक्ष की भूमिका निभाती रहेगी। इस अभियान का नेतृत्व आदर्श रूप से राहुल गांधी को करना चाहिए, भले ही यह पहली भारत जोड़ो यात्रा जितना कठिन न हो। गांधी की भागीदारी ने सुनिश्चित किया कि पार्टी के सभी लोग गुटबाजी को दरकिनार कर यात्रा को अपना सर्वश्रेष्ठ दें।

जीत की राह आसान बनाने के लिए जरूरी है कि ज्यादा से ज्यादा राज्यों में जीत हासिल की जाए। सबसे पहले नज़र महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और झारखंड पर होगी। पहले दो राज्यों में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहा है। ऐसा लगता है कि पार्टी दोनों राज्यों में सरकार बनाने में कामयाब हो सकती है। लेकिन, भाजपा भी हार मानने वालों में से नहीं है। वो महाराष्ट्र और हरियाणा में हार से बचने की पूरी कोशिश करेगी। इसलिए, कांग्रेस को ये नहीं सोचना चाहिए कि दोनों राज्य उसकी मुट्ठी में हैं। ज्यागा आत्मविश्वास से गलतियां हो सकती हैं। हरियाणा में पार्टी को एकजुट होकर चुनाव लड़ना होगा। उन्हें ये साबित करना होगा कि कांग्रेस सिर्फ जाटों की पार्टी नहीं है। पार्टी के अंदरूनी गुटबाजी को खत्म करना बहुत ज़रूरी है। कांग्रेस को अपने अभियान से ये सुनिश्चित करना होगा कि जाट विरोधी वोट एकजुट ना हो सकें।महाराष्ट्र में कांग्रेस ने सबसे बड़ी पार्टी बनकर सबको चौंका दिया है। इससे महाराष्ट्र कांग्रेस, उद्धव ठाकरे और शरद पवार पर दबाव बनाने की कोशिश कर सकती है, जिनकी पार्टियों ने कठिन परिस्थितियों में अच्छा प्रदर्शन किया है। महाराष्ट्र विकास अघाड़ी गठबंधन को अपना न्यूनतम कार्यक्रम और उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना चाहिए। महाराष्ट्र कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में फिर से सबसे बड़ी पार्टी बनने का लक्ष्य रखना चाहिए।

राजस्थान में अशोक गहलोत की कल्याणकारी योजनाओं का असर दिखा। भाजपा को उम्मीद थी कि उसे 150 सीटें मिलेंगी, लेकिन उसे 2023 के विधानसभा चुनावों में लगभग 120 सीटें ही मिल पाईं। राजस्थान में हर 5 साल में सरकार बदलती रहती है। लेकिन अगर भाजपा को मध्य प्रदेश जैसी बड़ी जीत मिल जाती, तो कांग्रेस लोकसभा चुनाव में 12 सीटें नहीं जीत पाती। राजस्थान से सीख मिलती है कि सिर्फ एक चुनाव के बारे में नहीं सोचना चाहिए। कांग्रेस को अगले दो-तीन चुनावों को ध्यान में रखकर रणनीति बनानी चाहिए। कांग्रेस को अपनी गति बनाए रखने के लिए यही करना होगा!

आखिर बीजेपी कैसे साधेगी एनडीए गठबंधन?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि बीजेपी आखिर कैसे एनडीए गठबंधन को साधेगी! केंद्र में तीसरी बार एनडीए सरकार बन गई है। पीएम मोदी समेत मंत्रिमंडल को शपथ लिए हुए भी करीब दो हफ्ते का वक्त बीत चुका है। अब सबकी निगाहें लोकसभा स्पीकर की कुर्सी पर है। बीजेपी 18वीं लोकसभा स्पीकर का पद अपने पास ही रखना चाहती है। कायदे से ये पद बीजेपी को ही मिलना चाहिए, क्योंकि एनडीए गठबंधन में सबसे बड़ा दल बीजेपी ही है। बीजेपी के पास 240 सीटें हैं। लेकिन बीजेपी के सहयोगी जेडीयू और टीडीपी भी ने भी स्पीकर पद की मांग की है। सूत्रों के अनुसार, बीजेपी एनडीए के सहयोगी दल को उपसभापति का पद देने का प्रस्ताव कर सकती है। जानकारी के अनुसार बीजेपी ने केंद्रीय रक्षा मंत्री और पार्टी के सीनियर नेता राजनाथ सिंह को एनडीए के सहयोगी दल जेडीयू और टीडीपी के साथ इस महत्वपूर्ण संसदीय भूमिका पर बातचीत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है ताकि सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चल सके।सहयोगियों को एक सहमति वाले उम्मीदवार को अंतिम रूप देना चाहिए। जबकि नीतीश कुमार की जेडीयू ने कहा कि वह बीजेपी के फैसले का समर्थन करेंगे। जेडीयू नेता केसी त्यागी ने कहा कि उनकी पार्टी और टीडीपी एनडीए का हिस्सा हैं और लोकसभा स्पीकर के पद के लिए बीजेपी द्वारा नामित उम्मीदवार का समर्थन करेंगे।

लोकसभा का नया स्पीकर 26 जून को चुना जाएगा। लोकसभा सचिवालय के मुताबिक, स्पीकर पद के लिए उम्मीदवारों के प्रस्ताव का नोटिस एक दिन पहले दोपहर तक जमा करना होगा। बता दें किकेसी त्यागी ने कहा, ‘स्पीकर हमेशा सत्तारूढ़ पार्टी का होता है क्योंकि उनकी संख्या भी सबसे अधिक होती है। इस बीच, टीडीपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता पट्टाभिराम कोम्मारेड्डी ने कहा कि उम्मीदवार को एनडीए के सहयोगियों द्वारा संयुक्त रूप से तय किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘एनडीए के सहयोगी मिलकर बैठेंगे और तय करेंगे कि हमारा स्पीकर उम्मीदवार कौन होगा। एक बार सहमति बनने के बाद, हम उस उम्मीदवार को पेश करेंगे और सभी सहयोगी, जिसमें टीडीपी भी शामिल है, उस उम्मीदवार का समर्थन करेंगे।’सूत्रों के अनुसार, अगर विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A को उपसभापति पद नहीं मिलता है, तो विपक्ष स्पीकर के पद के लिए उम्मीदवार खड़ा कर सकता है। एनडीए के सहयोगी टीडीपी और जेडीयू ने स्पीकर के पद की मांग की है इन खबरों को खारिज करते हुए, एक सीनियर पार्टी नेता ने समाचार एजेंसी आईएएनएस को बताया कि यह मामला पहले आंतरिक रूप से विचार किया जाएगा और फिर सहयोगियों के साथ चर्चा कर सहमति बनाई जाएगी।

जबकि आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी ने कहा कि एनडीए के सहयोगियों को एक सहमति वाले उम्मीदवार को अंतिम रूप देना चाहिए। जबकि नीतीश कुमार की जेडीयू ने कहा कि वह बीजेपी के फैसले का समर्थन करेंगे। जेडीयू नेता केसी त्यागी ने कहा कि उनकी पार्टी और टीडीपी एनडीए का हिस्सा हैं और लोकसभा स्पीकर के पद के लिए बीजेपी द्वारा नामित उम्मीदवार का समर्थन करेंगे।

केसी त्यागी ने कहा, ‘स्पीकर हमेशा सत्तारूढ़ पार्टी का होता है क्योंकि उनकी संख्या भी सबसे अधिक होती है। इस बीच, टीडीपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता पट्टाभिराम कोम्मारेड्डी ने कहा कि उम्मीदवार को एनडीए के सहयोगियों द्वारा संयुक्त रूप से तय किया जाना चाहिए। बीजेपी एनडीए के सहयोगी दल को उपसभापति का पद देने का प्रस्ताव कर सकती है। जानकारी के अनुसार बीजेपी ने केंद्रीय रक्षा मंत्री और पार्टी के सीनियर नेता राजनाथ सिंह को एनडीए के सहयोगी दल जेडीयू और टीडीपी के साथ इस महत्वपूर्ण संसदीय भूमिका पर बातचीत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है ताकि सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चल सके।बता दें कि केसी त्यागी ने कहा, ‘स्पीकर हमेशा सत्तारूढ़ पार्टी का होता है क्योंकि उनकी संख्या भी सबसे अधिक होती है। इस बीच, टीडीपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता पट्टाभिराम कोम्मारेड्डी ने कहा कि उम्मीदवार को एनडीए के सहयोगियों द्वारा संयुक्त रूप से तय किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘एनडीए के सहयोगी मिलकर बैठेंगे और तय करेंगे कि हमारा स्पीकर उम्मीदवार कौन होगा।उन्होंने कहा, ‘एनडीए के सहयोगी मिलकर बैठेंगे और तय करेंगे कि हमारा स्पीकर उम्मीदवार कौन होगा। एक बार सहमति बनने के बाद,जेडीयू ने कहा कि वह बीजेपी के फैसले का समर्थन करेंगे। जेडीयू नेता केसी त्यागी ने कहा कि उनकी पार्टी और टीडीपी एनडीए का हिस्सा हैं और लोकसभा स्पीकर के पद के लिए बीजेपी द्वारा नामित उम्मीदवार का समर्थन करेंगे। हम उस उम्मीदवार को पेश करेंगे और सभी सहयोगी, जिसमें टीडीपी भी शामिल है, उस उम्मीदवार का समर्थन करेंगे।’

क्या अब प्रियंका गांधी लड़ेंगे वायनाड से उपचुनाव?

प्रियंका गांधी अब वायनाड से उपचुनाव में लड़ सकती है! लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा के वायनाड से चुनाव लड़ने की अटकलें लगाई गई थीं। हालांकि प्रियंका ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया, जिसके चर्चाओं का बाजार शांत हो गया था। वायनाड से फिर से राहुल गांधी ने चुनाव लड़ा और जीते। लेकिन वो रायबरेली से भी चुनाव जीत चुके हैं। इसके बाद अब वो वायनाड सीट छोड़ सकते हैं। ऐसे में फिर एक बार वायनाड से प्रियंका गांधी के चुनाव लड़ने की चर्चा तेज हो गई है। सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस वायनाड उपचुनाव में प्रियंका गांधी को उम्मीदवार बना सकती है। प्रियंका गांधी के चुनाव लड़ने की चर्चा उस वक्त और तेज हो गई, जब राहुल गांधी ने मंगलवार को कहा कि अगर उनकी बहन वाराणसी में प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ चुनाव लड़तीं, तो मोदी दो-तीन लाख वोटों से हार जाते। बता दें कि राहुल गांधी वायनाड और रायबरेली सीट पर बड़े अंतर से जीते हैं। 2019 के लोकसभा चुनावों से ही प्रियंका गांधी के चुनाव लड़ने की चर्चा चल रही है। उस वक्त कयास लगाए जा रहे थे कि प्रियंका वाराणसी सीट से पीएम मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ सकती हैं। इसके बाद 2020 में यूपी विधानसभा चुनावों के दौरान प्रियंका गांधी ने खुद कहा था कि वह यूपी में चुनाव लड़ने से इनकार नहीं कर रही थीं। उस वक्त वो यूपी कांग्रेस की महासचिव थीं। इस बयान के साथ उन्होंने ये भी इशारा किया कि वो कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार हो सकती हैं। हालांकि कुछ ही घंटों बाद उन्होंने अपने बयान से दूरी बना ली और कहा कि वो मजाक कर रही थीं।

लोकसभा चुनाव 2024 से पहले सोनिया गांधी ने रायबरेली छोड़ दी। इस सीट पर वो 2004 से सांसद थीं। इस बार सोनिया गांधी राज्यसभा पहुंच गई हैं। सोनिया गांधी के रायबरेली सीट छोड़ने के बाद ये तय माना जा रहा था कि इस सीट पर प्रियंका गांधी चुनाव लड़ेंगी। खबरों में इस बात को कहा गया कि प्रियंका गांधी रायबरेली से चुनाव लड़ेंगी और राहुल गांधी अमेठी से। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी राहुल-प्रियंका के चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थी। उन्होंने इसका फैसला दोनों भाई-बहनों पर छोड़ दिया था। खरगे ने कहा था कि वो चाहते हैं कि दोनों चुनाव लड़ें। अगर कांग्रेस के मजबूत गढ़ों से चुनाव नहीं लड़ते हैं, तो इससे पार्टी कार्यकर्ताओं, I.N.D.I.A गठबंधन के दलों और एनडीए के बीच गलत संदेश जाएगा।

हालांकि प्रियंका गांधी ने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया। उनके करीबी सूत्रों ने बताया कि प्रियंका ने चुनाव न लड़ने का फैसला इसलिए किया क्योंकि अगर वो चुनाव जीत जातीं, तो संसद में गांधी परिवार के तीन सदस्य हो जाते, जिससे बीजेपी के परिवारवाद के आरोपों को बल मिलता। प्रियंका गांधी ने भले ही लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन उन्होंने अपना ज्यादातर वक्त रायबरेली और अमेठी में बिताया। इन दोनों ही सीटों पर कांग्रेस को बड़ी जीत मिली। यूपी में कांग्रेस की एक सीट से बढ़कर 6 हो गई। चुनावी नतीजों के बाद, राहुल गांधी ने यूपी के लोगों को धन्यवाद दिया और इस जीत में अपनी बहन की भूमिका की सराहना की।

प्रियंका गांधी वायनाड से उपचुनाव लड़ना इस बात पर निर्भर करेगा कि राहुल गांधी इस सीट को छोड़ते हैं या नहीं। दरअसल 2019 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी अमेठी से हार गए थे और वायनाड सीट के बदौलत संसद पहुंचे थे। ऐसे में वायनाड छोड़कर रायबरेली चुनने का फैसला आसान नहीं होगा। राहुल ने खुद कहा कि वो दुविधा में हैं और इसे लेकर अभी तक कोई फैसला नहीं ले पाए हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि वो जो भी फैसला लेंगे, वो दोनों लोकसभा क्षेत्रों के लोगों को खुश करेगा। इस बयान को इस बात का इशारा माना जाने लगा कि राहुल खुद रायबरेली सीट को चुनेंगे और अपनी बहन को वायनाड से उम्मीदवार बनाएंगे।

राहुल के वायनाड सीट छोड़ने को लेकर दो कांग्रेस नेताओं ने भी बयान दिए हैं। अमेठी से नवनिर्वाचित सांसद किशोरी लाल शर्मा ने राहुल गांधी से रायबरेली से सांसद रहने की अपील की, तो वहीं केरल कांग्रेस कमेटी के प्रमुख के. सुधाकरण ने संकेत दिया है कि नेता वायनाड लोकसभा सीट छोड़ सकते हैं। बता दें कि राहुल गांधी के सीट खाली करने के छह महीने के भीतर उपचुनाव होंगे।

क्या G7 के बाद सुधर सकते हैं भारत और कनाडा के रिश्ते?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या G7 के बाद भारत और कनाडा के रिश्ते सुधर सकते हैं या नहीं! हरदीप सिंह निज्जर की हत्या और पीएम ट्रूडो के खालिस्तानियों को समर्थन देने के बाद से भारत और कनाडा के रिश्ते ठीक नहीं हैं। अलग-अलग मंचों से दोनों देशों ने इसे व्यक्त भी किया है,लेकिन अब लगता है दोनों देशों के बीच बढ़ती कड़वाहट कम हो सकती है। इटली में हाल ही में हुए जी7 समिट में पीएम मोदी और कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की मुलाकात हुई। मोदी से मिलने के बाद जस्टिन ट्रूडो के तेवर नरम पड़े हैं। कनाडा के पीएम ने भारत के साथ महत्वपूर्ण मुद्दों पर साथ काम करने की इच्छा जताई है। जी7 समिट में मोदी संग बैठक के बाद ट्रूडो ने इसके बारे में पूछे गए सवालों के दौरान काफी सतर्क दिखे। उनसे निज्जर के मुद्दे को उठाने पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने इससे कन्नी काट ली। ट्रूडो ने कहा कि कानून के शासन को बनाए रखते हुए भी साझेदारों के साथ काम करना महत्वपूर्ण है। शुक्रवार को इटली में जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों नेताओं की संक्षिप्त मुलाकात हुई थी। खुद मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक तस्वीर पोस्ट की जिसमें दोनों नेता हाथ पकड़े हुए बातचीत कर रहे हैं।

शनिवार की सुबह इटली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि मैं इस महत्वपूर्ण, संवेदनशील मुद्दे के विवरण में नहीं जाऊंगा, जिस पर हमें आगे काम करने की जरूरत है, लेकिन आने वाले समय में कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दों से निपटने के लिए साथ मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता जताई गई है। कनाडा ने जोर देकर कहा है कि फिलहाल भारत के साथ उसका सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा निज्जर हत्याकांड के अपराधियों को न्याय के कटघरे में लाना है।

भारत आधिकारिक तौर पर यह लगातार कहा है कि कनाडा ने अपने आरोपों के समर्थन में कोई सबूत या जानकारी नहीं दी है, जिसकी जांच भारतीय एजेंसियां कर सकें। यह प्रतिक्रिया अमेरिका के लगाए गए ऐसे ही आरोपों पर भारत की प्रतिक्रिया से बिलकुल अलग है। उसमें एक भारतीय अधिकारी जो जाहिर तौर पर कनाडाई जांच में भी शामिल हैकी कथित संलिप्तता के बारे में बताया गया था, जो अमेरिकी धरती पर एक अन्य खालिस्तान नेता गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की नाकाम कोशिश में शामिल था। भारत सरकार ने अमेरिकी आरोपों की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति गठित की है, जिसमें कहा गया है कि अमेरिकियों की साझा की गई जानकारी का भारत की सुरक्षा पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि भारत जांच के निष्कर्षों के बारे में चुप है, लेकिन अगले सप्ताह इस मुद्दे पर चर्चा की उम्मीद है, क्योंकि अमेरिकी एनएसए जेक सुलिवन बातचीत के लिए भारत आ रहे हैं। अमेरिका भारत पर कनाडा की जांच का समर्थन करने के लिए भी दबाव बना रहा है।

कनाडा के मामले में, भले ही वरिष्ठ खुफिया अधिकारी जांच के बारे में संपर्क में हैं, लेकिन भारत सरकार के सूत्रों का कहना है कि मामले पर कनाडा से कोई आधिकारिक या औपचारिक संचार नहीं हुआ है, जिसमें अब तक की गई 4 गिरफ्तारियां भी शामिल हैं। जी7 में ट्रूडो से मुलाकात की उम्मीद करते हुए, भारत सरकार ने शिखर सम्मेलन से ठीक पहले कहा था कि कनाडा के साथ उसका मुख्य मुद्दा चरमपंथियों को दी जाने वाली राजनीतिक जगह है।

जी7 में अपने भाषण में ट्रूडो ने यह भी कहा कि हमें दुनिया भर के विभिन्न भागीदारों के साथ बातचीत जारी रखने की जरूरत है, भले ही हम कानून के शासन के लिए खड़े होने के दौरान चुनौतियों को उजागर करते हों। ट्रूडो और वरिष्ठ कनाडाई अधिकारियों ने भारत के साथ संबंधों को महत्व दिया है, जिसमें भारत द्वारा स्वतंत्र और खुले भारत-प्रशांत को सुरक्षित करने में निभाई जा सकने वाली भूमिका भी शामिल है, लेकिन उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया है कि भारत के साथ उनकी तत्काल प्राथमिकता कनाडाई नागरिक निज्जर की हत्या के लिए जवाबदेही तय करना है।

हालांकि ट्रूडो ने शनिवार देर रात तक मोदी के एक्स पर पोस्ट पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी, लेकिन उनके कार्यालय ने तुरंत बातचीत की पुष्टि करते हुए कहा कि ट्रूडो ने मोदी को उनके दोबारा चुने जाने पर बधाई दी और नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों पर संक्षिप्त चर्चा की। प्रवक्ता ने कहा कि बेशक इस समय हमारे दोनों देशों के बीच महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। आप समझ सकते हैं कि हम इस समय कोई और बयान नहीं देंगे।

आखिर आतंक के खिलाफ क्या सरकार लेगी सख्त एक्शन?

आने वाले समय में आतंकी खिलाफ सरकार अब सख्त एक्शन लेने वाली है! जम्मू-कश्मीर में हुए आतंकी हमलों के बाद स्थिति की समीक्षा के लिए आज (16 जून को) केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने एक उच्च स्तरीय बैठक की। इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी भी इस मुद्दे पर हाई लेवल बैठक कर चुके हैं। आज बैठक में अमित शाह के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल और सेना, अर्धसैनिक बलों, जम्मू-कश्मीर पुलिस और खुफिया एजेंसियों के अधिकारी मौजूद रहे। शाह ने 29 जून से शुरू होने जा रही वार्षिक अमरनाथ तीर्थयात्रा की तैयारियों की भी समीक्षा की। सूत्रों ने बताया कि गृह मंत्री को जम्मू-कश्मीर के मौजूदा हालात के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई और आने वाले दिनों में सुरक्षाबल वहां आतंकवाद रोधी अभियान तेज कर सकते हैं। सूत्रों ने बताया कि पिछले शुक्रवार को हुई एक बैठक में शाह को जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा स्थिति, अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा पर सुरक्षाबलों की तैनाती, घुसपैठ की कोशिशों, आतंकवाद रोधी अभियानों की स्थिति और केंद्र शासित प्रदेश में सक्रिय आतंकवादियों के बारे में जानकारी दी गई थी। आतंकवादियों ने पिछले चार दिनों में जम्मू-कश्मीर के रियासी, कठुआ और डोडा जिलों में चार स्थानों पर हमले किए, जिनमें नौ तीर्थयात्रियों और सीआरपीएफ के एक जवान की मौत हो गई तथा सात सुरक्षाकर्मी और कई अन्य घायल हो गए।

कठुआ जिले में सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में दो संदिग्ध पाकिस्तानी आतंकवादी भी मारे गए और उनके पास से भारी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद बरामद हुआ। आतंकवादियों ने नौ जून को तीर्थयात्रियों की एक बस पर उस समय गोलीबारी की जब यह शिव खोरी मंदिर से कटरा की ओर जा रही थी। इस बस में उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली के श्रद्धालु सवार थे। गोलीबारी के बाद बस गहरी खाई में गिर गई थी जिसमें नौ लोगों की मौत हो गई थी और 41 अन्य घायल हो गए थे। आतंकवादियों ने 11 जून को भद्रवाह में राष्ट्रीय राइफल्स और पुलिस की संयुक्त चौकी पर गोलीबारी की थी। आतंकवादियों ने 12 जून को डोडा जिले के गंडोह क्षेत्र में एक तलाशी दल पर हमला किया था जिसमें एक पुलिसकर्मी सहित सात सुरक्षाकर्मी घायल हो गए थे। इन हमलों के मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी ने 13 जून को गृह मंत्री के साथ सुरक्षा बलों की तैनाती तथा आतंकवाद रोधी अभियानों पर चर्चा की।

प्रधानमंत्री ने जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल से भी वार्ता की थी और केंद्र शासित प्रदेश की स्थिति के बारे में जानकारी ली थी। ये घटनाएं दक्षिण कश्मीर हिमालय में अमरनाथ गुफा मंदिर की वार्षिक तीर्थयात्रा से पहले हुई हैं। यह यात्रा 29 जून से शुरू होने वाली है और 19 अगस्त तक जारी रहेगी। अमरनाथ के लिए तीर्थयात्री जम्मू कश्मीर में दो मार्गों-बालटाल और पहलगाम से यात्रा करते हैं। सूत्रों ने बताया कि पिछले साल 4.28 लाख से अधिक लोगों ने गुफा मंदिर की यात्रा की और इस बार यह आंकड़ा पांच लाख तक जा सकता है। बता दें कि कठुआ जिले में सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में दो संदिग्ध पाकिस्तानी आतंकवादी भी मारे गए और उनके पास से भारी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद बरामद हुआ।

आतंकवादियों ने नौ जून को तीर्थयात्रियों की एक बस पर उस समय गोलीबारी की, जब यह शिवखोड़ी मंदिर से कटरा की ओर जा रही थी। इस बस में उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली के श्रद्धालु सवार थे। इन हमलों के मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी ने 13 जून को गृह मंत्री के साथ सुरक्षा बलों की तैनाती तथा आतंकवाद रोधी अभियानों पर चर्चा की। प्रधानमंत्री ने जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल से भी वार्ता की थी और केंद्र शासित प्रदेश की स्थिति के बारे में जानकारी ली थी। ये घटनाएं दक्षिण कश्मीर हिमालय में अमरनाथ गुफा मंदिर की वार्षिक तीर्थयात्रा से पहले हुई हैं।गोलीबारी के बाद बस गहरी खाई में गिर गई थी, जिसमें नौ लोगों की मौत हो गई थी और 41 अन्य घायल हो गए थे। सभी तीर्थयात्रियों को आरएफआईडी कार्ड दिए जाने की संभावना है ताकि उनकी वास्तविक स्थिति का पता लगाया जा सके और सभी को पांच लाख रुपये का बीमा कवर दिया जाएगा। बता दें कि आतंकवादियों ने 11 जून को भद्रवाह में राष्ट्रीय राइफल्स और पुलिस की संयुक्त चौकी पर गोलीबारी की थी। आतंकवादियों ने 12 जून को डोडा जिले के गंडोह क्षेत्र में एक तलाशी दल पर हमला किया था जिसमें एक पुलिसकर्मी सहित सात सुरक्षाकर्मी घायल हो गए थे। इन हमलों के मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी ने 13 जून को गृह मंत्री के साथ सुरक्षा बलों की तैनाती तथा आतंकवाद रोधी अभियानों पर चर्चा की। तीर्थयात्रियों को ले जाने वाले प्रत्येक जानवर के लिए 50,000 रुपये का बीमा कवर भी होगा।