Friday, March 13, 2026
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क्या अब रेलवे में मिलेगी सीनियर सिटीजंस को छूट?

अब रेलवे में सीनियर सिटीजंस को छूट मिल सकती है! केंद्र में एक बार फिर से नई सरकार का गठन हो चुका है। हालांकि, इस बार भी भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन या एनडीए की ही सरकार बनी है। लेकिन इस बार भाजपा सरकार में बहुमत नहीं बल्कि अल्पमत में है। सहयोगियों के भरोसे ही इस बार सरकार की नैया पार लगेगी। इसलिए माना जा रहा है आम जनता से जुड़े कुछ अलोकप्रिय फैसले जो पिछली सरकार में लिए गए थे, उन्हें बदला जा सकता है। इन्हीं फैसलों में शामिल है रेलगाड़ियों में सीनियर सिटीजन को छूट या कंशेसन देने का। इसे बदलने के लिए कांग्रेस के सिवगंगा तमिलनाडु से सांसद कार्ती चिदंबरम ने रेल मंत्री को पिछले दिनों एक पत्र भी लिखा है। पिछले आम चुनाव में कांग्रेस मजबूत होकर संसद में आई है। इसी पार्टी के सिवगंगा से सांसद कार्ती चिदंबरम ने रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव को एक चिट्ठी लिखी है। इसमें कहा गया है कि सीनियर सिटीजन को मिल रही छूट को एक बार फिर से बहाल करने की जरूरत है। उन्होंने इसके लिए कई तर्क दिए हैं। गौरतलब है कि साल 2022 के अगस्त में रेलवे पर संसद की स्थायी समिति ने भी सिफारिश की है कि ट्रेन में यात्रा के दौरान सीनियर सिटीजन को मिल रही छूट को बहाल करने पर विवेकपूर्ण तरीके से विचार किया जाना चाहिए।

रेल यात्रा में वरिष्ठ नागरिकों, युद्ध में जान गंवाने वाले सैनिकों की विधवा, खिलाड़ियों, किसानों, पत्रकारों, युवाओं आदि को बरसों से छूट मिल रही थी। लेकिन कोरोना काल में रेलवे ने साल 2020 के मार्च में ही यह छूट वापस ले ली थी। दरअसल उस समय कोरोना भारत में विकराल रूप ले रहा था। तब मार्च के अंतिम सप्ताह में देश भर में लॉकडाउन लगाया गया था। उससे ठीक पहले, 20 मार्च 2020 को एक आर्डर निकाल कर ट्रेन में मिलने वाली तमाम छूट को अगले आदेश के लिए निरस्त कर दिया गया था। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव सीनियर सिटीजन को फिर से छूट दिये जाने के सवाल पर बार-बार इंकार करते रहे हैं। उन्होंने बीती सरकार के दौरान संसद में भी बताया था कि टिकट किराए में कुछ श्रेणियों के लोगों को दी जाने वाली छूट या रियायतों को बहाल करने का अभी कोई प्रस्ताव नहीं है। कई बार पत्रकारों से औपचारिक-अनौपचारिक बातचीत में भी वह इसे फिर से बहाल करने से इंकार ही करते रहे हैं।

इस समय ट्रेन में मिलने वाले हर तरह के कंशेसन को खत्म नहीं किया गया है। इस समय दिव्यांगजनों की चार श्रेणियों, रोगियों और छात्रों की 11 श्रेणियों को छूट मिल रही है। लेकिन सीनियर सिटीजन, किसान या पत्रकार आदि के छूट को अभी तक बहाल नहीं किया गया है। कोरोना काल से पहले रेलवे के सभी ट्रेनों में सीनियर सिटीजन को टिकट के मूल किराये पर 50 फीसदी तक की छूट मिला करती थी। रेलवे में 60 वर्ष की उम्र पूरी कर चुके पुरुषों और 58 वर्ष या इससे अधिक उम्र की महिलाओं को सीनियर सिटीजन माना जाता है। कोरोना काल से पहले तक राजधानी एक्सप्रेस, शताब्दी, दूरंतो एक्सप्रेस समेत सभी मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों में पुरुषों को मूल किराये में 40 फीसदी जबकि महिलाओं को बेस फेयर में 50 फीसदी की छूट दी जाती थी।

ट्रेन में पहले कई तरह के कंशेसन मिलते थे। इनमें युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की विधवा, आतंकवादियों और उग्रवादियों के विरुद्ध कार्रवाई में शहीद हुए पुलिस कर्मियों और अर्द्धसैनिक की विधवा, आतंकवादियों और उग्रवादियों के विरुद्ध कार्रवाई में शहीद हुए पुलिस कर्मियों और अर्द्धसैनिक की विधवा, श्रीलंका में कार्रवाई के दौरान शहीद हुए आईपीकेएफ कर्मी की विधवा और 1999 में कारगिल में ऑपरेशन विजय में शहीद हुए जवानों की विधवा को सैकेंड क्लास और शयनयान श्रेणी में 75 फीसदी की छूट मिलती थी।

ट्रेन के यात्रा के लिए किसानों के लिए भी छूट का प्रावधान था। किसान यदि किसी कृषि/औद्योगिक प्रदर्शनी में जाते हैं तो उन्हें सेकेंड क्लास और शयनयान श्रेणी में 25 फीसदी, सरकार द्वारा प्रायोजित विशेष गाड़ियों में यात्रा करने वाले किसानों को सेकेंड क्लास और शयनयान श्रेणी में 33 फीसदी, बेहतर फार्मिंग/डेयरी अध्ययन/ प्रशिक्षण के लिए राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों का दौरा करने के लिए किसान एवं दुग्ध उत्पादकों को सेकेंड क्लास और शयनयान श्रेणी में 50 फीसदी की छूट मिलती थी।

राष्ट्रीय युवा परियोजना और मानव उत्थान सेवा समिति के शिविर में हिस्सा लेने के लिए जाने वाले युवाओं को सैकेंड क्लास और शयनयान श्रेणी में 50 फीसदी, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की नौकरी में इंटरव्यू के लिए जाने वाले बेरोजगार युवाओं को सेकेंड क्लास और शयनयान श्रेणी में 50 फीसदी की छूट मिलती थी। इसके अलावा स्काउटिंग ड्यूटी के लिए भारत स्काउट एवं गाइड्स के युवाओं को सेकेंड क्लास और शयनयान श्रेणी में 50 फीसदी की छूट मिलती थी।

क्या उड़ीसा में है वास्तविकता में लोकतंत्र?

उड़ीसा में हाल ही में एक वास्तविकता में लोकतंत्र की तस्वीर देखी गई है! ओडिशा में पहली बार बीजेपी सरकार बनी है। बीजेपी के नव निर्वाचित मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने आज शपथ ली। माझी के शपथ ग्रहण कार्यक्रम में बीजेपी के तमाम बड़े नेताओं समेत बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल हुए। ओडिशा के सीएम के शपथ ग्रहण समारोह से लोकतंत्र की एक बेहद खूबसूरत तस्वीर सामने आई, जब ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक मंच पर पहुंचे और बीजेपी के नेताओं ने उनका स्वागत किया। पटनायक को मंच पर बीजेपी के नेताओं के बीच कुर्सी दी गई। इससे भी खास बात ये है कि नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने पटनायक के घर जाकर उन्हें शपथ ग्रहण का न्योता दिया था। बीजेपी के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी शपथ ग्रहण से कुछ घंटे पहले ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से मिलने पहुंचे। माझी पटनायक के आवास ‘नवीन निवास’ पर पहुंचे, जहां उन्होंने औपचारिक रूप से पूर्व मुख्यमंत्री को शपथ ग्रहण का निमंत्रण दिया। नवीन पटनायक ने भी माझी का न्योता स्वीकार किया और समारोह में पहुंच गए।

जब पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक मंच पर पहुंचे तो केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान उन्हें सबके पास लेकर गए। यहां उनकी अगुवाई गृहमंत्री अमित शाह ने की। इसके बाद नितिन गडकरी और जेपी नड्डा ने उनका स्वागत किया। बीजेपी अन्य नेताओं योगी आदित्यनाथ, मोहन यादव और पुष्कर सिंह धामी ने भी उनसे नमस्कार किया। इसके बाद नवीन पटनायक को मंच पर कुर्सी दी गई। अमित शाह और धर्मेंद्र प्रधान के बीच में उन्हें सम्मान से बिठाया गया। थोड़ी देर बाद मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पहुंचे। पीएम मोदी ने नवीन पटनायक के साथ मुस्कुराते हुए गर्मजोशी के साथ मुलाकात की। वो कुछ सेकेंड तक उनका हाथ पकड़े बातचीत करते दिखे। इस दौरान दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक केमिस्ट्री साफ देखी जा सकती है। ये तस्वीर बताती है कि राजनीति में कोई दुश्मन नहीं होता और सभी नेताओं को उनसे यह सीखने की जरूरत है।

बता दें कि आदिवासी नेता और चार बार के विधायक मोहन चरण माझी ने बुधवार को ओडिशा के पहले भाजपा मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। शपथग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, कई केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री शामिल हुए। ओडिया आदिवासियों के हिंदूकरण ने उन्हें दलितों के खिलाफ खड़ा कर दिया है, जिनका ईसाई मिशनरी 19वीं शताब्दी से धर्म परिवर्तन कराते आए हैं। 2008 से अब तक कई बार धार्मिक हिंसा हुई है। 2008 में विहिप नेता की हत्या के बाद कंधमाल में ईसाई दलितों के खिलाफ दंगे हुए थे। भाजपा के लिए आदिवासी-दलित के बीच की खाई एक जीती हुई रणनीति थी: आदिवासी आबादी का 23% हैं, जबकि दलित सिर्फ 17% हैं। पटनायक की पिछली सफलता काफी हद तक ओडिशा के देश की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक होने पर टिकी थी। यह अर्थव्यवस्था विदेशी निवेश को आकर्षित करती थी और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर केंद्रित थी।

वरिष्ठ भाजपा नेता और पटनागढ़ से विधायक केवी सिंह देव तथा निमापारा विधानसभा क्षेत्र से पहली बार विधायक बनीं प्रभाती परिदा ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। पिछली विधानसभा में भाजपा के मुख्य सचेतक रहे माझी हाल में हुए विधानसभा चुनाव में चौथी बार विधानसभा के लिए चुने गए। उन्होंने क्योंझर विधानसभा क्षेत्र से जीत दर्ज की।

जनता मैदान में राज्यपाल रबघुबर दास ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। यह पहली बार है कि जब ओडिशा में भारतीय जनता पार्टी भाजपा की सरकार बनी है। बता दें कि ‘ओडिया हिंदू अस्मिता’ – ओडिया हिंदू गौरव का नारा लेकर भाजपा ने पटनायक को उनके ही मैदान में हरा दिया।

बीजद का सिर्फ ऊंची जाति के हिंदुओं पर भरोसा करना उल्टा पड़ा। ओडिशा में अनुसूचित जाति और जनजाति 40% हैं, जबकि अन्य पिछड़ी जातियों ओबीसी का भी 40% हिस्सा है। भाजपा ने आदिवासी समुदायों को हिंदुत्व के पाले में शामिल करके पूरे राज्य में काफी तेजी से पैठ बनाई, जिसके लिए पटनायक की ‘ओडिया अस्मिता’ ने, हिंदू गौरव को हवा देकर, अनजाने में ही आसान रास्ता बना दिया था। ज्यादातर आदिवासी वोट भाजपा को गए, जिसमें मयूरभंज जिले द्रौपदी मुर्मू का जन्मस्थान के वोट भी शामिल थे। मयूरभंज की आदिवासी महिला द्रौपदी मुर्मू ने दो साल पहले राष्ट्रपति बनकर अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की थी। समारोह में मोदी के अलावा भाजपा प्रमुख जेपी नड्डा, केंद्रीय मंत्री अमित शाह, राजनाथ सिंह, भूपेन्द्र यादव, धर्मेंद्र प्रधान, जुएल ओराम, अश्विनी वैष्णव और अन्य शामिल हुए।

आखिर क्या है मार्गदर्शक मंडल वाला विवाद?

आज हम आपको मार्गदर्शक मंडल वाला विवाद के बारे में बताने जा रहे हैं !एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद गुरुवार को अचानक पीएम नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगे। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इस तरह के ट्वीट आने लगे कि पीएम मोदी और राजनाथ सिंह को बीजेपी के मार्गदर्शक मंडल में भेज दिया गया है। विपक्षी दल कांग्रेस की केरल यूनिट में इस संबंध में ट्वीट किया। केरल कांग्रेस ने बीजेपी वेबसाइट का हवाला देते हुए दोनों नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में भेजे जाने की बात कही। केरल कांग्रेस ने एक्स पर ट्वीट में लिखा कि भाजपा की वेबसाइट के अनुसार मोदी और राजनाथ सिंह आधिकारिक तौर पर मार्गदर्शक मंडल में शामिल हो गए हैं। सीएएस एयर चीफ मार्शल वीआर चौधरी, सीएनएस एडमिरल दिनेश त्रिपाठी और अन्य अधिकारियों के साथ 100-दिवसीय योजना बैठक की।क्या यह संकेत है कि फ्लोर टेस्ट विफल होने जा रहा है और क्या यह आपदा के बाद पेज का ड्राई रन है? इसके बाद कई लोगों ने इस संबंध में ट्वीट किए। इसके बाद कई लोगों ने पीएम मोदी का मार्गदर्शक मंडल में स्वागत किया। वहीं, कुछ लोगों ने सवाल उठाए कि क्या पीएम मोदी अब अपने पद से इस्तीफा देंगे। वहीं, कुछ लोग सरकार के चलने पर भी सवाल उठाने लगे।

कांग्रेस और अन्य लोगों की तरफ से मोदी और राजनाथ सिंह के मार्गदर्शक मंडल में शामिल किए जाने को लेकर सफाई आई। पार्टी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने ट्वीट कर इस बारे में स्थिति स्पष्ट की। पूनावाला ने ट्वीट में कहा कि हकीकत यह है कि दोनों नेता साल 2014 से ही मार्गदर्शक मंडल का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि साल 2014 में अटल बिहारी वाजपेयी, नरेंद्र मोदी, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और राजनाथ सिंह को मार्गदर्शक मंडल का सदस्य बनाया गया था। शहजाद ने कहा कि भाजपा का प्रेस नोट उसी वेबसाइट पर है, लेकिन गालीबाज- कांग्रेस फर्जी खबरों की फैक्ट्री बन गई है। फर्जी वीडियो से लेकर सरासर झूठ तक! इस बात के फैक्ट चेक की उम्मीद मत कीजिए।

इससे पहले राजनाथ सिंह ने गुरुवार को रक्षा मंत्रालय में पदभार संभाला। पद संभालने के बाद राजनाथ ने ट्वीट में लिखा, मैंने आज रक्षा मंत्रालय का कार्यभार पुनः संभाल लिया है। रक्षा मंत्रालय आत्मनिर्भरता की दिशा में काम करना जारी रखेगा। हमारे सशस्त्र बल भारत की बाह्य सुरक्षा को बनाए रखने में सराहनीय कार्य कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रेरक नेतृत्व में रक्षा मंत्रालय घरेलू रक्षा विनिर्माण को और मजबूत करेगा। साथ ही निर्यात को अभूतपूर्व ऊंचाइयों तक ले जाएगा। यही नहीं पिछले 10 वर्ष में मोदी सरकार ने पेपर लीक और धांधली से करोड़ों युवाओं का भविष्य बर्बाद किया है।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सवाल किया कि पहले सैकड़ों छात्रों को कृपांक क्यों दिए गए? उन्होंने एक बयान में आरोप लगाया कि ”एक तिहाई प्रधानमंत्री” की सरकार नीट से जुड़े विवाद और इसमें स्पष्ट रूप से हुए घोटाले से बचने की पूरी कोशिश कर रही है।कांग्रेस सांसद ने कहा कि कांग्रेस इस मामले में सीबीआई जांच चाहती है। यदि सरकार सीबीआई जांच के लिए तैयार नहीं है तो हम उच्चतम न्यायालय की निगरानी में जांच की मांग करते हैं…एनटीए के प्रमुख को हटाया जाए। गोगोई ने दावा किया, ”हमने अलग-अलग रिकॉर्डिंग सुनी है कि कैसे लाखों रुपये मांगे जा रहे हैं। एक ही सेंटर में बच्चों को एक जैसे नंबर मिल रहे हैं।उन्होंने दावा किया कि ऐसा होना एक बेहद घटिया स्थिति को दर्शाता है तथा यहां एनटीए और एनसीईआरटी दोनों की भूमिका चिंताजनक है। कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने आरोप लगाया कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस मामले पर चर्चा से भाग रहे हैं। गोगोई ने कहा, ”जिस एनटीए के नेतृत्व में यह पूरा घोटाला हुआ, आप उसी एजेंसी से मामले में जांच करने की बात कह रहे हैं। ऐसे में निष्पक्ष जांच की उम्मीद कैसे की जा सकती है?” उन्होंने कहा, ”परीक्षा केंद्र और कोचिंग सेंटर का एक गठजोड़ बन चुका है, जिसने आज हमारे मध्यम-गरीब वर्ग को हिला कर रख दिया है। रमेश का कहना था, ”सरकार ने उच्चतम न्यायालय को आश्वासन दिया है कि 1563 छात्रों को दिए गए कृपांक रद्द कर दिए जाएंगे। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रक्षा मंत्री के रूप में कार्यभार संभालने के बाद सीडीएस जनरल अनिल चौहान, सीओएएस जनरल मनोज पांडे, सीएएस एयर चीफ मार्शल वीआर चौधरी, सीएनएस एडमिरल दिनेश त्रिपाठी और अन्य अधिकारियों के साथ 100-दिवसीय योजना बैठक की।

आखिर बीजेपी ने कैसे दूर किया नवीन पटनायक का जादू ?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर बीजेपी ने नवीन पटनायक का जादू कैसे दूर किया! लोकसभा चुनाव के नतीजे 4 जून को आने के बाद, मोदी ने अपने विजय भाषण की शुरुआत ‘जय जगन्नाथ’ के नारे से की, जिसने भीड़ से निकल रहे ‘जय श्री राम’ के नारे को दबा दिया। मोदी ओडिशा में अपनी पार्टी की लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत का जश्न मना रहे थे। भाजपा ने राज्य की 21 में से 20 लोकसभा सीटें जीत लीं, 12 नई सीटें हासिल कीं और बीजू जनता दल (बीजद) को पूरी तरह से संसद से बाहर कर दिया। बीजेपी ने विधानसभा में भी बहुमत हासिल कर लिया। 147 में से 78 सीटें जीत ली। ओडिशा के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को हटा दिया, जिन्होंने लगभग 25 सालों तक राज्य चलाया था। मंगलवार को, पार्टी ने एक आदिवासी नेता, चार बार के विधायक मोहन चरण माझी को राज्य के नए मुख्यमंत्री के रूप में चुना। हालांकि बीजेडी की हार आंशिक रूप से सत्ता विरोधी लहर का नतीजा हो सकती है, लेकिन यह खुद बीजेडी ही है जिसने ओडिशा में बीजेपी के भव्य आगमन का मार्ग प्रशस्त किया।

पटनायक ने एक मजबूत क्षेत्रीय आंदोलन को मजबूत किया जिसने लंबे समय तक ओडिशा को नैशनल नैरेटिव से दूर रखा। गौरवशाली ओडिशा के उनके दृष्टिकोण में हिंदू पहचान सबसे आगे थी। बीजेडी ने पुरी में जगन्नाथ मंदिर के लिए एक तीर्थयात्रा कॉरिडोर पर 800 करोड़ रुपये खर्च किए। लेकिन यह ‘हिंदू ओडिया के लिए ओडिशा’ का तर्क भाजपा और उसके राजनीतिक हिंदुत्व के वर्चस्व के लिए मतदाताओं को तैयार कर गया। 2024 में, पार्टी ने बीजेडी को ठीक उसी बात को लेकर चुनौती दी कि राज्य की ‘शुद्ध’ हिंदू पहचान का सबसे अच्छा प्रतिनिधित्व कौन करता है और कौन सबसे उपयुक्त है।

पटनायक को कमजोर नेता के रूप में पेश करते हुए मोदी ने उनके स्वास्थ्य पर सवाल उठाया। उसकी जांच के लिए समिति बनाने का वादा किया। नवीन पटनायक उम्र में मोदी से 4 वर्ष बड़े हैं। चुनाव प्रचार के दौरान उनके एक वीडियो के सहारे मोदी ने उनके करीबी पांडियन को भी घेरा। पटनायक के सबसे करीबी विश्वासपात्र, तमिलनाडु में जन्मे पूर्व आईएएस अधिकारी वीके पांडियन पर मुख्यमंत्री की कठपुतली और एक तमिल घुसपैठिए होने का आरोप लगाया गया था। पांडियन को एक ‘बाहरी’ और ओडिशा की संपत्ति चुराने का प्रयास करने वाले एक राजनीतिक धोखेबाज के रूप में पेश किया गया था।

चुनाव आयोग ने पांडियन की पत्नी सुजाता कार्तिकेयन, जो एक नौकरशाह थीं, का तबादला कर दिया। सुजाता कार्तिकेयन मिशन शक्ति की अगुआ थीं और महिला स्वयं सहायता समूहों, स्वास्थ्य सेवा और पंचायत और लोकसभा सीटों में महिला आरक्षण बढ़ाने के जरिए महिलाओं को बीजेडी से जोड़ने में अहम भूमिका निभाती थीं। महिलाओं को लेकर बीजेडी की सफलता इस साल के राजनीतिक हिंदुत्व की लड़ाई में कारगर साबित नहीं हुई। ‘ओडिया हिंदू अस्मिता’ – ओडिया हिंदू गौरव का नारा लेकर भाजपा ने पटनायक को उनके ही मैदान में हरा दिया।

बीजद का सिर्फ ऊंची जाति के हिंदुओं पर भरोसा करना उल्टा पड़ा। ओडिशा में अनुसूचित जाति और जनजाति 40% हैं, जबकि अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) का भी 40% हिस्सा है। भाजपा ने आदिवासी समुदायों को हिंदुत्व के पाले में शामिल करके पूरे राज्य में काफी तेजी से पैठ बनाई, जिसके लिए पटनायक की ‘ओडिया अस्मिता’ ने, हिंदू गौरव को हवा देकर, अनजाने में ही आसान रास्ता बना दिया था। ज्यादातर आदिवासी वोट भाजपा को गए, जिसमें मयूरभंज जिले (द्रौपदी मुर्मू का जन्मस्थान) के वोट भी शामिल थे। मयूरभंज की आदिवासी महिला द्रौपदी मुर्मू ने दो साल पहले राष्ट्रपति बनकर अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की थी।

ओडिया आदिवासियों के हिंदूकरण ने उन्हें दलितों के खिलाफ खड़ा कर दिया है, जिनका ईसाई मिशनरी 19वीं शताब्दी से धर्म परिवर्तन कराते आए हैं। 2008 से अब तक कई बार धार्मिक हिंसा हुई है। 2008 में विहिप नेता की हत्या के बाद कंधमाल में ईसाई दलितों के खिलाफ दंगे हुए थे। भाजपा के लिए आदिवासी-दलित के बीच की खाई एक जीती हुई रणनीति थी: आदिवासी आबादी का 23% हैं, जबकि दलित सिर्फ 17% हैं। पटनायक की पिछली सफलता काफी हद तक ओडिशा के देश की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक होने पर टिकी थी। यह अर्थव्यवस्था विदेशी निवेश को आकर्षित करती थी और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर केंद्रित थी।

बीजद गरीबों की पार्टी होने का दावा तो करती थी, लेकिन आर्थिक सफलता ने आदिवासियों और दलितों को उनकी जमीन से बेदखल कर दिया। उनके पवित्र पहाड़ नियमगिरी के आसपास के इलाकों से डोंगरिया कोंधों को जबरन हटाने का कुख्यात वेदांता विस्थापन इसका सिर्फ एक उदाहरण है। खनिज संपन्न जाजपुर जिले के सुकिंदा शहर में, आदिवासी निवासियों ने अवैध खनन का मुद्दा न उठाने के लिए बीजद के खिलाफ वोट दिया। पटनायक के प्रशासन ने अवैध खनन को रोका नहीं, जिससे शहर का भूजल दूषित हो गया। भले ही निवेश बढ़ रहे हों, लेकिन कुपोषण इस क्षेत्र में पुरानी समस्या बनी हुई है। आदिवासी अब भी दिहाड़ी मजदूरी के लिए पलायन करते हैं। यहां तक कि इकोटूरिज्म भी संरक्षण के बजाय संसाधनों को निकालने वाला साबित हुआ, जिसमें आदिवासी समुदायों को इसके लाभ से दूर रखा गया।

जब तीसरी बार भी सुरक्षा सलाहकार बनाए गए अजीत डोभाल!

हाल ही में अजीत डोभाल को तीसरी बार भी सुरक्षा सलाहकार बना दिया गया है! अजित डोभाल को एक बार फिर से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाया गया है। डोभाल को लगातार तीसरी बार यह जिम्मेदारी दी गई है। मोदी सरकार के शपथ ग्रहण के बाद से यह कयास लगाए जा रहे थे कि डोभाल को फिर से यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलेगी या कोई और इस पद पर आएगा। हालांकि, मोदी ने एक बार फिर से अपने पुराने तुरुप के इक्के पर ही भरोसा जताया है। 2014 में सत्ता में आने के बाद पीएम मोदी ने डोभाल को पहली बार राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया था। 2019 में उन्हें एक बार फिर से पांच साल के लिए इस पद पर नियुक्ति दी गई थी। पिछले एक दशक में डोभाल ने मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। 2014 में, अजीत डोभाल ने इराक के तिकरित में एक अस्पताल में फंसी 46 भारतीय नर्सों की रिहाई सुनिश्चित की। वे एक शीर्ष-गुप्त मिशन पर गए और 25 जून, 2014 को इराक गए, ताकि जमीनी स्थिति को समझ सकें। 5 जुलाई 2014 को नर्सों को भारत वापस लाया गया। NSA के कार्य पोर्टफोलियो में प्रधानमंत्री की ओर से रणनीतिक और संवेदनशील मुद्दों की देखरेख करना शामिल है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद NSC का वरिष्ठ अधिकारी होता है। एनएसए की नियुक्ति कैबिनेट की नियुक्ति समिति द्वारा की जाती है। इस समिति की अध्यक्षता भारत के प्रधानमंत्री करते हैं।भारत का राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार चीन के साथ प्रधानमंत्री के विशेष वार्ताकार और सुरक्षा मामलों पर पाकिस्तान और इजराइल के दूत के रूप में भी कार्य करता है। भारत सरकार ने 2019 में एनएसए अजित डोभाल को एनएसए बनाने के साथ ही कैबिनेट रैंक दिया था।भारत की तरफ से सितंबर 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक और फरवरी 2019 में पाकिस्तान में सीमा पार बालाकोट हवाई हमले डोभाल की देखरेख में किए गए थे। उन्होंने डोकलाम गतिरोध को समाप्त करने में भी मदद की। इसके अलावा पूर्वोत्तर में उग्रवाद से निपटने के लिए निर्णायक कदम उठाए। 1945 में उत्तराखंड में जन्मे, वे भारत के सबसे कम उम्र के पुलिस अधिकारी थे जिन्हें कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया था। यह सैन्य कर्मियों के लिए एक वीरता पुरस्कार है।

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद NSC का वरिष्ठ अधिकारी होता है। एनएसए की नियुक्ति कैबिनेट की नियुक्ति समिति (एसीसी) द्वारा की जाती है। इस समिति की अध्यक्षता भारत के प्रधानमंत्री करते हैं। यह राष्ट्रीय सुरक्षा नीति और रणनीतिक मामलों पर भारत के प्रधानमंत्री के मुख्य सलाहकार के रूप में कार्य करते हैं। ये भारत के प्रधानमंत्री के विवेक पर काम करते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सभी खुफिया रिपोर्ट प्राप्त करता है और उन्हें प्रधानमंत्री के समक्ष प्रस्तुत करता है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को भारत के आंतरिक और बाहरी खतरों और अवसरों से संबंधित सभी मामलों पर नियमित रूप से प्रधानमंत्री को सलाह देने का काम सौंपा गया है। NSA के कार्य पोर्टफोलियो में प्रधानमंत्री की ओर से रणनीतिक और संवेदनशील मुद्दों की देखरेख करना शामिल है। भारत का राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार चीन के साथ प्रधानमंत्री के विशेष वार्ताकार और सुरक्षा मामलों पर पाकिस्तान और इजराइल के दूत के रूप में भी कार्य करता है। भारत सरकार ने 2019 में एनएसए अजित डोभाल को एनएसए बनाने के साथ ही कैबिनेट रैंक दिया था।

भारत में 1998 में इस पद की स्थापना की गई थी। इसके बाद से से नियुक्त सभी एनएसए भारतीय विदेश सेवा या भारतीय पुलिस सेवा से संबंधित हैं। अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान ब्रजेश मिश्रा पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे। वे 22 मई 2004 तक इस पद पर रहे। इसके बाद मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में आईएफएस अधिकारी जेएन दीक्षित को यह जिम्मेदारी सौंपी गई। बता दें कि 2019 में उन्हें एक बार फिर से पांच साल के लिए इस पद पर नियुक्ति दी गई थी। पिछले एक दशक में डोभाल ने मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। 2014 में, अजीत डोभाल ने इराक के तिकरित में एक अस्पताल में फंसी 46 भारतीय नर्सों की रिहाई सुनिश्चित की। वे एक शीर्ष-गुप्त मिशन पर गए और 25 जून, 2014 को इराक गए, ताकि जमीनी स्थिति को समझ सकें। इसके बाद 3 जनवरी 2005 से 23 जनवरी 2010 तक आईपीएस एमके नारायणन इस पद पर रहे। उनके बाद 24 जनवरी 2010 से 28 मई 2014 तक आईएफएस शिवशंकर मेनन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे। साल 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अजित डोभाल को इस पद पर नियुक्त किया गया।

संसद के आगामी सत्र के लिए क्या है ज्वलंत मुद्दा ?

आज हम आपको संसद के आगामी सत्र के लिए ज्वलंत मुद्दे के बारे में बताने जा रहे हैं! कांग्रेस ने चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए आयोजित ‘राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा -स्नातक’ (नीट-यूजी), 2024 में कथित धांधली को लेकर केंद्र सरकार पर युवाओं का भविष्य बर्बाद करने का आरोप लगाया। पार्टी ने कहा कि 24 जून से आरंभ हो रहे संसद के सत्र के दौरान इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया जाएगा। मुख्य विपक्षी ने यह कहा कि कांग्रेस इस मामले में सीबीआई जांच चाहती है, लेकिन अगर सरकार इसके लिए तैयार नहीं है तो फिर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच होनी चाहिए। कांग्रेस इस मामले में लगातार यह मांग कर रही है। कांग्रेस ने यह मांग भी की है कि एनटी के महानिदेशक को उनके पद से हटाया जाए। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने आरोप लगाया कि इस सरकार में ‘पैसे दो, पेपर लो’ का खेल खेला जा रहा है। खरगे ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ” नीट परीक्षा में केवल कृपांक की समस्या नहीं थी। धांधली हुई है, पेपर लीक हुए हैं, भ्रष्टाचार हुआ है। नीट परीक्षा में बैठे 24 लाख़ छात्र-छात्राओं का भविष्य मोदी सरकार के कारनामों से दांव पर लग गया है। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार एनटीए के कंधों पर अपनी कारगुज़ारियों का दारोमदार रखकर, अपनी जवाबदेही से पीछा नहीं छुड़ा सकती। कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा, ”पूरे नीट घोटाले में कांग्रेस पार्टी उच्चतम न्यायालय की निगरानी में एक निष्पक्ष जांच की मांग करती है। जांच के बाद दोषियों को कड़ी-से कड़ी सज़ा दी जाए और लाखों छात्र-छात्राओं को मुआवज़ा देकर उनका साल बर्बाद होने से बचाया जाए।

उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 10 वर्ष में मोदी सरकार ने पेपर लीक और धांधली से करोड़ों युवाओं का भविष्य बर्बाद किया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सवाल किया कि पहले सैकड़ों छात्रों को कृपांक क्यों दिए गए? उन्होंने एक बयान में आरोप लगाया कि ”एक तिहाई प्रधानमंत्री” की सरकार नीट से जुड़े विवाद और इसमें स्पष्ट रूप से हुए घोटाले से बचने की पूरी कोशिश कर रही है। रमेश का कहना था, ”सरकार ने उच्चतम न्यायालय को आश्वासन दिया है कि 1563 छात्रों को दिए गए कृपांक रद्द कर दिए जाएंगे। लेकिन सवाल उठता है कि पहले कृपांक दिए ही क्यों गए? कांग्रेस महासचिव ने कहा, ”यह प्रतीत होता है कि पेपर में भौतिकी का एक प्रश्न था जिसमें चार विकल्प दिए गए थे। एनसीईआरटी की कक्षा 12वीं की नयी पाठ्यपुस्तक के अनुसार, चार में से एक विकल्प सही था। लेकिन पुरानी पाठ्यपुस्तक के आधार पर दूसरे विकल्प को भी सही माना जा सकता है। जिन छात्रों ने बाद वाले पर टिक लगाया और उनके अलावा जिन छात्रों का पेपर वितरण में देरी आदि के कारण समय बर्बाद हुआ, उन्हें कृपांक दिए गए।

उन्होंने दावा किया कि ऐसा होना एक बेहद घटिया स्थिति को दर्शाता है तथा यहां एनटीए और एनसीईआरटी दोनों की भूमिका चिंताजनक है। कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने आरोप लगाया कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस मामले पर चर्चा से भाग रहे हैं। गोगोई ने कहा, ”जिस एनटीए के नेतृत्व में यह पूरा घोटाला हुआ, आप उसी एजेंसी से मामले में जांच करने की बात कह रहे हैं। ऐसे में निष्पक्ष जांच की उम्मीद कैसे की जा सकती है?” उन्होंने कहा, ”परीक्षा केंद्र और कोचिंग सेंटर का एक गठजोड़ बन चुका है, जिसने आज हमारे मध्यम-गरीब वर्ग को हिला कर रख दिया है। ‘पैसे दो-पेपर लो’ जैसी सांठगांठ की जांच एनटीए कैसे कर पायेगा ? इसमें एनटीए का कोई न कोई अधिकारी शामिल है। ऐसे में एनटीए निष्पक्ष जांच कैसे करेगा?’

कांग्रेस सांसद ने कहा कि कांग्रेस इस मामले में सीबीआई जांच चाहती है। यदि सरकार सीबीआई जांच के लिए तैयार नहीं है तो हम उच्चतम न्यायालय की निगरानी में जांच की मांग करते हैं…एनटीए के प्रमुख को हटाया जाए। गोगोई ने दावा किया, ”हमने अलग-अलग रिकॉर्डिंग सुनी है कि कैसे लाखों रुपये मांगे जा रहे हैं। एक ही सेंटर में बच्चों को एक जैसे नंबर मिल रहे हैं। इस मामले पर सरकार का रवैया कमजोर रहा है और वह इस मुद्दे से भाग रही है।जिन छात्रों ने बाद वाले पर टिक लगाया और उनके अलावा जिन छात्रों का पेपर वितरण में देरी आदि के कारण समय बर्बाद हुआ, उन्हें कृपांक दिए गए। लेकिन देश के मुद्दों को उठाना विपक्ष का कर्तव्य है और हम सदन के अंदर अपने 24 लाख छात्रों की आवाज जोर-शोर से उठाएंगे।”

क्या अब राज्यसभा की जंग को जीत पाएगी बीजेपी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब बीजेपी राज्यसभा की जंग जीत पाएगी या नहीं! लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद राज्यसभा की 10 सीटें खाली हो गई हैं। राज्यसभा सचिवालय की तरफ से इन रिक्त हुई सीटों की अधिसूचित कर दिया गया है। इस सीटों के सदस्यों ने हाल ही में लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज की है। ऐसे में आगामी राज्यसभा चुनाव में एक बार फिर से एनडीए बनाम इंडिया में मुकाबला देखने को मिलेगा। दो राज्यों महाराष्ट्र और हरियाणा में ये टक्कर कड़ी होगी। हालांकि, पांच राज्यों में उच्च सदन की रिक्त सीटों पर भाजपा के उम्मीदवारों के जीतने की संभावना है। चुनाव आयोग ने अभी तक इन 10 सीटों के लिए राज्यसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा नहीं की है। हालांकि, जिन 10 सीटों पर चुनाव होंगे उनमें से 7 भाजपा, 2 कांग्रेस और एक राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के पास थी। कांग्रेस और राजद दोनों ही इंडिया ब्लॉक के प्रमुख घटक हैं। लोकसभा चुनाव जीतने वालों में बीजेपी के राज्यसभा सांसदों में तीन केंद्रीय मंत्री असम से सर्बानंद सोनोवाल, मध्यप्रदेश से ज्योतिरादित्य सिंधिया और महाराष्ट्र से पीयूष गोयल शामिल हैं। वहीं, खाली सीटों में से असम, बिहार और महाराष्ट्र में दो-दो और हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान और त्रिपुरा में एक-एक सीट है।

असम की दोनों राज्यसभा सीटों और त्रिपुरा, मध्य प्रदेश और राजस्थान में एक-एक सीट को बरकरार रखने के लिए भाजपा के पास संबंधित विधानसभाओं में पर्याप्त संख्या है। बिहार में, भाजपा और राजद दोनों एक-एक सीट जीतने में सक्षम होंगे। विधानसभा में एनडीए और इंडिया गठबंधन की संख्या पर्याप्त है। हालांकि, महाराष्ट्र और हरियाणा में खाली सीटों के लिए होने वाले चुनावों में भाजपा को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। 90 सदस्यीय हरियाणा विधानसभा की मौजूदा ताकत अब घटकर 87 हो गई है। भाजपा के पास जहां 41 सदस्य हैं, वहीं कांग्रेस के पास 29 सदस्य हैं। कांग्रसे के मुलाना विधायक वरुण चौधरी अंबाला से लोकसभा के लिए चुने गए। दुष्यंत चौटाला के नेतृत्व वाली जेजेपी, जिससे भाजपा ने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले नाता तोड़ लिया था, के पास 10 विधायक हैं। दूसरी तरफ, पांच निर्दलीय विधायक और इंडियन नेशनल लोकदल (आईएनएलडी) और हरियाणा लोकहित पार्टी (एचएलपी) के एक-एक विधायक हैं। बादशाहपुर से निर्दलीय विधायक राकेश दौलताबाद का पिछले महीने निधन हो गया था। एक अन्य निर्दलीय विधायक रंजीत सिंह ने भाजपा में शामिल होने और हिसार से इसके टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए अपनी विधानसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। वह कांग्रेस के जय प्रकाश से हार गए थे।

हरियाणा में निर्दलीय विधायक नयन पाल रावत और एचएलपी विधायक गोपाल कांडा के समर्थन के कारण भाजपा की संख्या 43 हो जाती है। शेष 44 विधायक कम से कम कागजों पर तो विपक्षी खेमे में दिखाई देते हैं, जिनमें कांग्रेस के 29 और जेजेपी के 10 विधायक शामिल हैं। शेष चार निर्दलीय विधायकों में से तीन विधायकों सोमबीर सांगवान (दादरी), रणधीर सिंह गोलेन (पुंडरी) और धर्मपाल गोंडर (नीलोखेड़ी) ने कांग्रेस को समर्थन देने का ऐलान किया है। मेहम से एक और निर्दलीय विधायक बलराज कुंडू ने न तो भाजपा को और न ही कांग्रेस को समर्थन दिया है। इनेलो के अभय चौटाला ने भी अभी तक किसी पार्टी को समर्थन देने का ऐलान नहीं किया है। कांग्रेस को उम्मीद है कि अगर उसे सभी विपक्षी विधायकों का समर्थन मिल गया तो वह हरियाणा में भाजपा को हरा सकती है, हालांकि यह संभव नहीं दिखता। जून 2022 में हरियाणा से दो सीटों के लिए होने वाले राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के पास पर्याप्त संख्या थी, लेकिन उसके तत्कालीन उम्मीदवार अजय माकन क्रॉस वोटिंग के कारण फिर भी जीत नहीं सके थे।

महाराष्ट्र में भी बीजेपी के लिए मुकाबला कठिन होने वाला है क्योंकि उसके दोनों एनडीए सहयोगी – एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना और अजीत पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) – ने केंद्र में नई एनडीए सरकार में कैबिनेट बर्थ न मिलने पर असहमति जताई है। सात लोकसभा सीटें जीतने वाली शिवसेना इस बात से नाखुश है कि कम सीटों वाले अन्य एनडीए सहयोगियों को कैबिनेट बर्थ मिल गई है। एनसीपी को एक राज्य मंत्री (एमओएस) पद की पेशकश की गई थी, जिसे उसने स्वीकार नहीं किया क्योंकि पार्टी कैबिनेट पद चाहती थी। शिवसेना को एक राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) का पद मिला है। महाराष्ट्र में इंडिया गठबंधन में कांग्रेस, शरद पवार की एनसीपी (सपा) गुट और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) शामिल हैं। कांग्रेस के जिन नेताओं के लोकसभा में चुने जाने से राज्यसभा में दो सीटें खाली हुई हैं उनमें के सी वेणुगोपाल राजस्थान और दीपेंद्र हुड्डा हरियाणा शामिल हैं।

क्या साउथ को पूरी तरह हासिल करके रहेगी बीजेपी?

बीजेपी अब आने वाले समय में साउथ को पूरी तरह हासिल करके ही रहेगी! लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी का हाथ साउथ में थोड़ा कमजोर माना जा रहा था लेकिन जब 4 जून को चुनाव के नतीजे सामने आए तो बीजेपी ने कर्नाटक, तेलंगाना के साथ ही आंध्र प्रदेश में भी अच्छा प्रदर्शन किया। हालांकि तमिलनाडु में बीजेपी के हाथ निराशा लगी और वहां पर बीजेपी और उसके सहयोगी दल एक भी सीट नहीं जीत पाए। ऐसे में जब चंद्रबाबू नायडू आंध्र प्रदेश के सीएम पद की शपथ ले रहे थे तो उस वक्त स्टेज पर कुछ ऐसा हुआ। जिसके अब कई मायने निकाले जा रहे हैं। आंध्र प्रदेश के सीएम पद की शपथ ग्रहण समारोह में मंच पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तमिलनाडु भाजपा की पूर्व प्रमुख और तेलंगाना की पूर्व राज्यपाल तमिलिसाई सौंदरराजन को सार्वजनिक तौर पर अनुचित टिप्पणी करने पर नसीहत देते हुए दिखाई दिए। दरअसल कुछ दिन पहले ही एक यूट्यूब चैनल को दिए इंटरव्यू में तमिलिसाई सौंदरराजन ने कहा था कि अगर पार्टी का एआईएडीएमके के साथ गठबंधन बरकरार रहता, तो पार्टी का प्रदर्शन बेहतर होता। उन्होंने आगे कहा कि हाल ही में, चुनावों के बाद पहली बार आंध्र प्रदेश में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिली तो उन्होंने मुझे चुनाव के बाद की कार्रवाई और सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में पूछने के लिए बुलाया। मैं उन्हें विस्तार में बता रही थी लेकिन समय की कमी के कारण उन्होंने मुझे राजनीतिक और निर्वाचन क्षेत्र के काम को गहनता से करने की सलाह दी।ऐसे कई तत्व पार्टी में शामिल हो गए हैं और कुछ जिलों में पदों पर आसीन हो गए हैं। ऐसी प्रथाओं को रोका जाना चाहिए, और पार्टी के लिए कड़ी मेहनत करने वाले सामान्य कार्यकर्ताओं को उनका उचित स्थान मिलना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि मुझे लगता है कि वह (अन्नामलाई) एक बुरे नेता हैं। बिल्कुल नहीं अलग-अलग नेता अलग-अलग तरीके से फैसले लेते हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस इंटरव्यू के कुछ दिनों बाद ही उन्हें चेतावनी दी है।

भाजपा के सोशल मीडिया सेल के राज्य उपाध्यक्ष कार्तिक गोपीनाथ ने इसे कैप्शन के साथ सोशल मीडिया पर साझा किया कि यह अमित शाह जी की तमिलिसाई अक्का को कड़ी चेतावनी जैसा लगता है लेकिन इस ‘सार्वजनिक’ चेतावनी का कारण क्या हो सकता है? अनुचित सार्वजनिक टिप्पणी? बता दें कि कार्तिक गोपीनाथ अन्नामलाई के करीबी माने जाते हैं।

आज गुरुवार देर रात तेलंगाना की पूर्व राज्यपाल तमिलिसाई सुंदरराजन ने ट्वीट करके उस वायरल वाडियो पर सफाई दी कि कल जब मैं चुनावों के बाद पहली बार आंध्र प्रदेश में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिली तो उन्होंने मुझे चुनाव के बाद की कार्रवाई और सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में पूछने के लिए बुलाया। मैं उन्हें विस्तार में बता रही थी लेकिन समय की कमी के कारण उन्होंने मुझे राजनीतिक और निर्वाचन क्षेत्र के काम को गहनता से करने की सलाह दी।

लोकसभा चुनाव 2024 में बीजेपी के लिए दक्षिण में नए पोस्टर ब्वॉय बनकर उभरे के अन्नामलाई की तारीफ खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एनडीए संसदीय दल की बैठक में की थी। ऐसे में जब तमिलनाडु बीजेपी के अध्यक्ष अन्नामलाई से 36 का आंकड़ा रखने वाली बीजेपी नेता तमिलिसाई सौंदरराजन ने एक इंटरव्यू में लोकसभा चुनाव में बीजेपी की हार का ठीकरा अन्नामलाई पर फोड़ा तो बीजेपी के कई नेताओं ने इसका विरोध किया। इसके साथ ही अन्नामलाई के समर्थकों ने विरोध में उतर गए। उसके बाद ही शपथ समारोह में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तमिलिसाई सौंदर्यराजनको नसीहत देते आए थे। दरअसल बीजेपी अपनी ही पार्टी के अंदर किस भी तरह का मनमुटाव नहीं चाहती है। बता दें कि अमित शाह तमिलनाडु भाजपा की पूर्व प्रमुख और तेलंगाना की पूर्व राज्यपाल तमिलिसाई सौंदरराजन को सार्वजनिक तौर पर अनुचित टिप्पणी करने पर नसीहत देते हुए दिखाई दिए। दरअसल कुछ दिन पहले ही एक यूट्यूब चैनल को दिए इंटरव्यू में तमिलिसाई सौंदरराजन ने कहा था कि अगर पार्टी का एआईएडीएमके के साथ गठबंधन बरकरार रहता, तो पार्टी का प्रदर्शन बेहतर होता। जिसकी वजह से पार्टी का मिशन साउथ का खेल बिगड़ जाए। उन्हें विस्तार में बता रही थी लेकिन समय की कमी के कारण उन्होंने मुझे राजनीतिक और निर्वाचन क्षेत्र के काम को गहनता से करने की सलाह दी।इसलिए ही गृह मंत्री अमित शाह ने तमिलिसाई सौंदरराजन को भरे स्टेज पर फटकार लगाई थी कि अगर पार्टी के अंदर ही ऐसे टकराव होते रहेंगे तो वो अपने इस मिशन को कैसे आगे बढ़ा पाएगी।

जब लाल कृष्ण आडवाणी से मिलने पहुंचे मोदी !

हाल ही में पीएम मोदी लालकृष्ण आडवाणी से मिलने पहुंचे हैं! लोकसभा चुनाव जीतने और एनडीए गठबंधन द्वारा प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब बीजेपी के वयोवृद्ध और दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी के घर उनसे मिलकर उनका आशीर्वाद लेने पहुंचे। दिन के करीब ढाई बजे थे। सिर पर चिलचिलाती धूप और बेसुध कर देने वाली गर्मी में जब तमाम सड़कें सूनी नजर आ रही थीं यकायक गाड़ियों का एक लंबा काफिला पृथ्वीराज रोड के बंगला नंबर–30 के सामने आ रुकता है। काफिले को देखकर बंगले के दरवाजे बड़े अदब से खुल जाते हैं और काफिले की एक बड़ी गाड़ी अंदर पोर्टिको की ओर बढ़ जाती है। गाड़ी के रुकते ही उससे बाहर निकलते हैं आज के प्रधानमंत्री और उस वक्त के कार्यवाहक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। सामने घर की दहलीज पर स्वागत के लिए विराजमान थीं गृहस्वामी लालकृष्ण आडवाणी स्वागत प्रणाम के बाद प्रतिभा मोदी जी को घर के अंदर ले जाती हैं। यही–कोई 15–20 फुट लंबी ड्योढी पार करके बाईं ओर बने कमरे में जैसे ही नरेंद्र मोदी प्रवेश करते हैं, कमरे के एक कॉर्नर पर दाईं ओर उनके सामने चिरपरिचित मुस्कान से स्वागत करते लालकृष्ण आडवाणी बैठे थे। आडवाणी जी आमतौर पर इसी कुर्सी बैठकर मुलाकातियों से मिलते हैं। घर आए मोदी को देख आडवाणी उठ खड़े हुए। नमस्कार और एक–दूजे का हालचाल पूछने के बाद चुनाव जीतने और एनडीए का नेता चुने जाने पर बधाइयां भी हुईं। तमाम चर्चा भी चलती रही और साथ में मुंह मीठा कराने की रस्म और चायपानी का सिलसिला भी हुआ। दोनों ने बड़ी प्रसन्नता से बातें कीं। शायद एक लंबे अंतराल के बाद ऐसा हो रहा था।की सुपुत्री प्रतिभा आडवाणी।

बातचीत कुछ इस माहौल, कुछ इस अंदाज में हो रही थी कि बाहर की भीषण कुदरती गर्मी और देशभर में चली चुनावी सरगर्मी के उस माहौल में मुलाकात के इस कमरे में एसी की ठंडक के बीच भी दिलों और आपसी रिश्तों में गर्माहट का अहसास वहां मौजूद लोगों को आसानी से हो रहा था। सब मुलाकाती गदगद थे। आडवाणी परिवार के साथ समय बिताने के दौरान नरेंद्र मोदी ने उन्हें बताया कि इस बार का चुनाव कैंपेन कैसा रहा। उन्होंने अपने वरिष्ठ नेता को यह जानकारी भी दी कि चुनाव के दौरान मुख्य रूप से क्या–क्या हुआ। चुनाव परिणाम का क्या सिलसिला रहा इस पर भी दोनो के बीच बात हुई। आडवाणी जी की एक खासियत है। वह बोलते बहुत कम हैं। सामने वाला जो उन्हें बताना चाहे चुपचाप ध्यान से सुनते रहते हैं। हां, कुछ विशेष उत्सुकता हो तो फिर वह पूछते जरूर हैं। यह इन पंक्तियों के लेखक का बरसों का अनुभव है।दोनों की मुलाकात के दौरान बीजेपी नेता लालकृष्ण की बेटी प्रतिभा आडवाणी भी उपस्थित थीं। प्रतिभा न सिर्फ उनकी बेटी हैं बल्कि जब से आडवाणी जी की पत्नी कमला आडवाणी का निधन हुआ है वह अपना कैरियर आदि सबकुछ एक तरफ रखकर, हर वक्त उनका ख्याल रखने वाली उनकी परिचारिका की भूमिका भी निभा रही हैं।

यह पूछने पर कि घर मिलने आए मोदी जी से आपकी क्या–क्या बात हुई तो प्रतिभा ने कहा कि मोदी जी के हमारे परिवार से पारिवारिक रिश्ते हैं तो जैसे घर–परिवार के बारे में परिवारजनों से बातें होती हैं उसी टाइप की बातें हुईं। उन्होंने घर–परिवार का हालचाल जाना। कितनी देर रुके होंगे आपके घर मोदी जी, इस पर प्रतिभा ने बताया कि मौका ऐसा था कि वह जल्दी में थे, उन्हें और जगह भी जाना था। ज्यादा कुछ खा भी नहीं सके। बस उनका मुंह मीठा कराया और हल्के–फुल्के जलपान का ही मौका मिल पाया।

यह पूछने पर कि मोदी जी का नए चुनाव के बाद आपके घर आकर आप लोगों को मिलना बड़ा खास था, इस पर आप क्या कहना चाहेंगी तो प्रतिभा आडवाणी ने कहा कि मेरे लिए बड़ी खुशी की बात थी दोनों को मिलते देखना। दादा अपने पिता को वह दादा कहती हैं और उनको मोदी मिलते देखकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। मोदी जी आए, बड़ा सुखद लगा। दादा भी उनके आने से काफी प्रसन्न थे। हम दोनों को खुशी हुई कि वह चुनाव जीते और हमारे यहां मिलने आए। वहां लगभग आधा घंटा रुकने के बाद मोदी ने अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेता आडवाणी का आशीर्वाद लिया और उनसे विदा लेकर अपने अगले गंतव्य की ओर रवाना हो गए। जैसा कि सब जानते ही हैं कि बाद में वह पार्टी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी और पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से भी मिलने गए।

नई सरकार के सामने क्या है चुनौती?

आज हम आपको नई सरकार की चुनौतियां बताने जा रहे हैं! लोकसभा चुनाव संपन्न होने के साथ अब नई सरकार का गठन होने जा रहा है। नई सरकार के सामने कई प्रमुख नीतिगत मुद्दों होंगे। इन नीतिगत मुद्दों में जीएसटी में सुधार, महंगाई, सार्वजनिक वित्त, खाद्य कीमतें और निवेश को बढ़ावा देना आदि कई शामिल हैं। सरकार को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। नई सरकार को पहले भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं और वैश्विक आर्थिक स्थिति के कारण सुधारों में तेज़ी लाने की जरूरत हो सकती है। लेकिन केंद्र में गठबंधन सरकार होने की वजह से यह आसान नहीं हो सकता है। निजीकरण और जीएसटी पर पुनर्विचार जैसे कुछ मुद्दों पर आम सहमति की जरूरत होती है। आईए आपको बताते हैं ऐसे कौन से मुद्दे हैं, जिसपर नई सरकार को ध्यान देने की जरूरत होगी। पांच स्लैब वाले जीएसटी रेट स्ट्रक्चर का तुरंत रीव्यू नहीं किया जा सकता है। इसके लिए 12% और 18% स्लैब को मर्ज करने की जरूरत हो सकती है, जिससे हाई ब्रैकेट में आने वाली वस्तुओं और सेवाओं पर शुल्क में बढ़ोतरी की जरूरत होगी। यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर राजनीतिक सहमति बनाना आसान नहीं हो सकता है।

निजीकरण को कुछ समय के लिए टाला जा सकता है। आरबीआई के 2.1 लाख करोड़ रुपये के मेगा लाभांश और मजबूत जीएसटी राजस्व से केंद्र की वित्तीय स्थिति अच्छी रहेगी, लेकिन केंद्र को सब्सिडी व्यवस्था को और बेहतर बनाने के लिए धीमी गति से काम करना पड़ सकता है। हालांकि लीकेज को रोकने के लिए टेक्नोलॉजी का ज्यादा इस्तेमाल ऐसा है जो नहीं बदलेगा। साल 2021-22 में 85 बिलियन डॉलर के उच्चतम स्तर पर पहुंचने के बाद, लगातार दो वर्षों से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का वार्षिक फ्लो गिर रहा है। यह 2023-24 में 71 बिलियन डॉलर पर पहुंच गया है। आर्थिक मंत्रालयों ने 2030 और 2047 के लिए विशिष्ट लक्ष्यों के साथ कार्य योजनाएं बनाई हैं। अगर नई सरकार में आम सहमति बनती है, तो मंत्रालय-वार कार्य योजना का अनावरण किया जा सकता है।सरकार से इलेक्ट्रिक वाहनों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सहित कई क्षेत्रों में निवेश व्यवस्था को और ज्यादा आकर्षक बनाने की उम्मीद है।

हालांकि कुल मिलाकर महंगाई में कमी आई है। लेकिन अभी भी खाद्य कीमतें अस्थिर और उच्च बनी हुई हैं। सरकार कीमतों को मौसम से बचाने और गर्मी और बाढ़ जैसे जलवायु-प्रेरित झटकों से बचाने के लिए कदम उठा सकती है। वहीं नवीनतम जीडीपी डेटा कृषि क्षेत्र में सापेक्षिक ठहराव को दर्शाता है। सिंचाई और उत्पादकता बढ़ाने के लिए AI के उपयोग पर ध्यान केंद्रित करने वाले सुधारों की उम्मीद है। चुनाव परिणाम किसानों की आय बढ़ाने की चुनौतीपूर्ण लेकिन आसन्न आवश्यकता की ओर इशारा करते हैं।

उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना ने स्मार्टफोन और अन्य उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने में मदद की है, लेकिन इसे खिलौने और जूते जैसे अन्य क्षेत्रों में विस्तारित करने की मांग की गई है। निर्यात उत्पादन के लिए चीन से बाहर निकलने के इच्छुक कंपनियों और क्षेत्रों पर अधिक ध्यान केंद्रित करने के लिए पीएलआई को और बेहतर बनाने की उम्मीद है। बता दें कि पारंपरिक नीतिगत बहसें विभिन्न क्षेत्रों में बजट आवंटन की ‘टॉप लाइन’ पर अधिक ध्यान केंद्रित करती हैं, न कि इस बात पर कि आवंटन नागरिकों के जीवन को कैसे बेहतर बनाते हैं। हालांकि, यह ध्यान हमें एक अधिक महत्वपूर्ण मुद्दे से विचलित करता है। सार्वजनिक व्यय की प्रभावशीलता में सुधार करना – चाहे हम जिस पर भी खर्च करें। बजट बहसें शून्य होती हैं क्योंकि किसी भी क्षेत्र के लिए बढ़ा हुआ आवंटन अन्य क्षेत्रों में कटौती (या अधिक ऋण) की कीमत पर आता है। वहीं चुनाव की तारीखों की घोषणा से पहले, कई नए आर्थिक कानून बनाने की प्रक्रिया चल रही थी। क्रिप्टोकरेंसी, एआई, डेटा सुरक्षा के बेहतर विनियमन पर विचार किया जा रहा है।

अधिकांश अर्थशास्त्रियों को उम्मीद नहीं है कि 2024-25 की जीडीपी वृद्धि 2023-24 में 8.2% की वृद्धि को दोहराएगी। लेकिन मौजूदा वैश्विक आर्थिक माहौल में 7% की वृद्धि दर सुनिश्चित करना भी आसान नहीं होगा। इस एजेंडे के लिए व्यापक राजनीतिक सहमति और दीर्घकालिक दृष्टि की आवश्यकता होगी। हमारे परमाणु और अंतरिक्ष कार्यक्रमों से लेकर डिजिटल बुनियादी ढांचे के माध्यम से कल्याणकारी फायदे पहुंचाने तक भारत की महान उपलब्धियों में कई राजनीतिक दलों और सरकारों के दशकों के प्रयास लगे हैं।अपेक्षित कदमों में ऊर्जा संक्रमण के लिए एक रोड मैप और इंफ्रा निवेश को बढ़ावा देना शामिल है। आर्थिक मंत्रालयों ने 2030 और 2047 के लिए विशिष्ट लक्ष्यों के साथ कार्य योजनाएं बनाई हैं। अगर नई सरकार में आम सहमति बनती है, तो मंत्रालय-वार कार्य योजना का अनावरण किया जा सकता है।