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जब अपनी जान पर खेल कर जाटों ने बचाया था हरियाणा!

आज हम आपको एक ऐसे समय की कहानी बताएंगे जब जाटों ने अपनी जान पर खेल कर हरियाणा को बचाया था! उज्बेकिस्तान के चरवाहा परिवार से आने वाले एक लंगड़े और क्रूर शासक ने जब हिंदुस्तान की ओर रुख किया तो उसका मकसद यहां पर राज करना नहीं था। मंगोल तैमूर ने हिंदुस्तान की अपार दौलत और भव्यता के बारे में काफी कुछ सुन रखा था। सुन्नी मुस्लिम तैमूर ने 1398 में भारत पर भटनेर किले को लूटने के बाद अपनी 92,000 तातार आर्मी के साथ तूफानी तरीके से सिरसा, फतेहाबाद, सुनाम, कैथल और पानीपत जैसे शहरों पर हमला किया। फारसी इतिहासकार शराफ अद्दीन अली यजदी के अनुसार, तैमूर ने इन शहरों को जमकर लूटा, उन्हें जला डाला।

जब तैमूर की तातार आर्मी सरसुती (सिरसा) पहुंची तो उसके खौफनाक आक्रमण से वहां के निवासी घर छोड़कर भाग गए। भागते हुए हजारों लोगों को तातार आर्मी ने मार डाला। यही हाल फतेहाबाद में भी किया गया। वहीं, अहरुनी में अहीरों ने तैमूर के सैनिकों का मुकाबला तो किया, मगर हार गए। इनमें से कइयों को मार डाला गया और कइयों को युद्धबंदी बना लिया गया। शहर को जलाकर राख कर दिया गया। जब तैमूर की आर्मी टोहाना पहुंची तो वहां जाटों ने जमकर मोर्चा संभाला, मगर वो इतनी बड़ी जल्लाद आर्मी के सामने ज्यादा देर टिक नहीं पाए। तातार आर्मी ने 2,000 जाटों को मार डाला। उनकी संपत्ति लूट ली। वहीं, उनकी पत्नियों और बच्चों को गुलाम बना लिया गया। आज स्पेशल स्टोरी की पहली किस्त में जानेंगे कैसे हरियाणा ने बाहरी आक्रमणों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, जो इतिहास में दर्ज है। इतिहासकार यजदी के अनुसार, तैमूर हरियाणा में जहां जाता, वो शहर जलाकर नष्ट कर देता। गांवों और खेतों को उजाड़ देता। पुरुषों के सिर काट दिए जाते और महिलाओं-बच्चों को गुलाम बना लिया जाता। इसकी वजह यह थी कि वह खुद को इस्लाम की तलवार कहा करता था। उसका मानना था कि वह अपने पूर्ववर्ती चंगेज खान की तरह पूरी दुनिया में इस्लाम का राज कायम करेगा। तैमूर की सेना ने कैथल में बड़े पैमाने पर नरसंहार और लूटपाट किया। वहां से वह असौंध आया, जो गांव और शहर छोड़कर दिल्ली भाग गए। तातार आर्मी के पानीपत पहुंचने से पहले तुगलकपुर किले और सलवान को अपने कब्जे में कर लिया। यहीं से उसने लोनी किले की ओर कूच किया।

तैमूर ने भारत पर अपने आक्रमण की वजह बताते हुए लिखा है कि हिंदुस्तान पर आक्रमण करने का मेरा मकसद काफिर हिंदुओं के खिलाफ धार्मिक युद्ध करना है, जिससे इस्लाम की सेना को भी हिंदुओं की दौलत और मूल्यवान चीजें मिल जाएं। कश्मीर में कटोर के नामी दुर्ग पर आक्रमण में पुरुषों को कत्ल कर दिया गया। उनके सिरों के मीनार खड़े कर दिए गए। फिर भटनेर के दुर्ग पर घेरा डाला गया।

तैमूर लिखता है कि ‘थोड़े ही समय में दुर्ग के तमाम लोग तलवार के घाट उतार दिए गए। घंटे भर में 10 हजार लोगों के सिर काटे गए। इस्लाम की तलवार ने काफिरों के रक्त में स्नान किया। दूसरा नगर सरसुती था जिस पर आक्रमण हुआ। सभी काफिर हिंदू कत्ल कर दिए गए। उनके स्त्री और बच्चे और संपत्ति हमारी हो गई। तैमूर ने जब जाटों के प्रदेश में प्रवेश किया तो उसने अपनी सेना को आदेश दिया कि ‘जो भी मिल जाए, उसका कत्ल कर दिया जाए। लंगड़ा होने की वजह से उसे तैमूर लंग कहा जाता था।

इतिहासकार जस्टिन मरोजी की किताब ‘टैमरलेन, सोर्ड ऑफ इस्लाम, कॉन्करर ऑफ द वर्ल्ड’ में लिखा है कि तैमूर की सेना तरह-तरह के इलाकों से गुजर रही थी, जिनके मौसम एक जैसे नहीं थे। मगर, उसकी तातार आर्मी को ऐसे मौसम की आदत हो गई थी। समरकंद से दिल्ली के बीच बर्फ से ढकी चट्टानें, गर्मी से झुलसा देने वाले रेगिस्तान और बंजर जमीन का बड़ा इलाका था, जहां सैनिकों के खाने के लिए एक दाना तक नहीं उगाया जा सकता था।

तैमूर की सेना काबुल होते हुए अक्तूबर में सतलुज नदी पर जाकर रुकी, जहां एक कमांडर सारंग खां ने उसका रास्ता रोका। मगर, तैमूर उस पर जीत हासिल कर ली। पंजाब, हरियाणा होते हुए दिल्ली पहुंचने से पहले रास्ते में तैमूर ने करीब एक लाख हिंदू लोगों को बंदी बना लिया। दिल्ली के पास पहुंचकर लोनी में तैमूर ने अपना आर्मी कैंप लगाया और यमुना नदी के पास एक टीले पर खड़े होकर हालात का जायजा लिया। उस वक्त दिल्ली की सल्तनत पर बेहद कमजोर सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद का राज था। कहा जाता है कि तैमूर ने पूरी दुनिया में करीब 1.7 करोड़ लोगों का कत्ल करवाया था। उसने तुर्की के खलीफा को पिंजरे में डलवा दिया था, जहां उसकी मौत हो गई थी।

तैमूर ने अपनी आत्मकथा’तुजुके तिमूरी’ में लिखा है कि मेरी सबसे बड़ी चिंता थे ताकतवर भारतीय हाथी। समरकंद में उनके बारे में सुन रखा था। ये हाथी बख्तरबंद होते थे, जिनकी पीठ पर हौदों में मशाल फेंकने वाले लोग, तीरंदाज और महावत बैठे रहते थे। यह भी सुना था कि इन हाथियों के दांतों में जहर लगा होता था, जो दुश्मन के पेट में घुसा देते थे। उन्होंने इन हाथियों को मारने के लिए एक नई चाल चली। उसने ऊंटों और घोड़ों पर घास लादकर उनमें आग लगा दी। जब ये घोड़े जंग के मैदान में आते तो हाथी भड़क उठते और अपनी ही सेना पर मौत बनकर टूट पड़ते। इससे तैमूर ने कई जंग आसानी से जीत ली।

यजदी का कहना है कि तैमूर जब दिल्ली आया तब तक उसकी तातार आर्मी के 15,000 सैनिक पहुंच चुके थे। विजयनगर की यात्रा करने वाले ईरानी इतिहासकार मोहम्मद कासिम फरिश्ता ने अपनी किताब ‘हिस्ट्री ऑफ द राइज ऑफ मोहमडन पावर इन इंडिया’ में लिखा है कि हिंदुओं ने जब देखा कि उनकी महिलाओं की इज्जत सरेआम नीलाम की जा रही है तो उन्होंने दरवाजा बंद कर अपने ही घरों में आग लगा दी। अपनी पत्नियों और बच्चों की हत्या कर तैमूर के सैनिकों पर टूट पड़े। इसके बाद तो दिल्ली में वो नरसंहार हुआ कि सड़कों पर लाशों के ढेर लग गए। तैमूर की पूरी सेना दिल्ली में घुस आई। कुछ ही घंटों की लड़ाई में दिल्ली ने दम तोड़ दिया।

उज्बेकिस्तान में तैमूर की कब्र पर लिखा है कि जब मैं अपनी मौत के बाद खड़ा हो जाऊंगा तो दुनिया कांप उठेगी। इसके साथ ही कब्र पर लिखा था, जो कोई भी मेरी कब्र को खोलेगा, उसे मुझसे भी भयानक दुश्मन मिलेगा। इस वजह से कई शासक आए, लेकिन उन्होंने कब्र को नुकसान नहीं पहुंचाया था। कहते हैं कि 1941 में रूस के शासक जोसेफ स्टालिन ने भी इस कब्र को खुदवाने की कोशिश की थी। कब्र खोदने के एक दिन बाद ही 11 जून 1941 को हिटलर ने सोवियत यूनियन पर हमला कर दिया था। इसके फिर से इस कब्र को दफना दिया गया। इसके कुछ समय बाद ही जर्मनी हार गया था। यह भी कहा जाता है कि ईरानी शासक नादिरशाह ने तैमूर की कब्र पर लगे एक खास पत्थर को ले गया, मगर उसका पतन शुरू हुआ तो उसने डर की वजह से उस पत्थर को फिर से कब्र पर लगा दिया।

विधानसभा चुनावों से पहले जानिए हरियाणा की अद्भुत कहानी!

आज हम आपको विधानसभा चुनावों से पहले हरियाणा की एक अद्भुत कहानी बताने जा रहे हैं! दिल्ली सल्तनत में एक गुलाम ने राज किया था। साल 1266 की बात है, जब यह गुलाम गयासुद्दीन मोहम्मद बलबन के नाम से अमीर मुसलमानों के सहयोग से दिल्ली गद्दी पर बैठा। बलबन इल्बरी तुर्क था, जो सुल्तान इल्तुतमिश का तुर्की का गुलाम था। बलबन को एक अमीर ख्वाजा जमालुद्दीन बसरी ने ने तुर्की से खरीदा था और उसे अपने साथ दिल्ली लाया। जब इल्तुतमिश ने ग्वालियर जीता तो उसने बलबन को खरीद लिया। अपनी योग्यता के बदौलत ही बलबन इल्तुतमिश और उसकी बेटी रजिया सुल्तान के दौर में अमीर-ए-शिकार जैसे उच्च पदों पर पहुंच गया। वह सुल्तान नसीरूद्दीन महमूद के समय में अमीर-ए-हाजिब बन बैठा और पूरे शासन की बागडोर अपने हाथ में ले ली। फिर 1266 में वह दिन भी आ गया, जब उसे दिल्ली की गद्दी नसीब हुई। वह इतना क्रूर और बेरहम था कि उसने हरियाणा के बागी और स्वतंत्र रहने वाले मेवातियों को कई बार कुचल डाला। जानते हैं मेवातियों के दिल्ली सल्तनत से लोहा लेने की कहानी। बलबन इतना नस्लभेदी आदमी था कि उसने प्रशासन में सिर्फ कुलीन लोगों को ही नियुक्त किया। वह कहता था कि जब मै किसी तुच्छ परिवार के व्यक्ति को देखता हूं तो मेरी नसों में खून खौलने लग जाता है। वह मेवातियों को भी बेहद नफरत भरे अंदाज में देखता था। वह उनका पूरी तरह सफाया करना चाहता था। दिल्ली की सल्तनत को सुरक्षित रखने और शांति बनाए रखने के लिए वह मेवातियों को धूल चटाना चाहता था, मगर वह अपने इस मंसूबे में कभी कामयाब नहीं हो पाया। मेवाती उसकी आंख की हमेशा किरकिरी बने रहे।

आधुनिक हरियाणा के फरीदाबाद, गुरुग्राम, महेंद्रगढ़ और राजस्थान के अलवर जिलों को मेवात क्षेत्र कहा जाता है। इस क्षेत्र में रहने वाले लोग मेवाती कहलाते हैं। दिल्ली सल्तनत के दौरान सुल्तानों की मनमानियों के खिलाफ इन मेवातियों ने बागी तेवर दिखाए। मेवातियों ने दिल्ली के सुल्तानों की नींद हराम कर दी थी। सल्तनत के दौर के एक इतिहासकार मिनहाज के अनुसार, दिल्ली के तीसरे सुल्तान यानि नसीरूदीन महमूद के गद्दी पर बैठते ही मेवातियों ने अपने नेता मालवा के नेतत्व में विद्रोह कर दिया। हांसी के पास सुल्तान के एक कमांडर के खिलाफ आक्रमण किया और उसके ऊंटों पर लदे सामान लूटकर ले गए।

इतिहासकाज के अनुसार, जनवरी 1260 ई० में जब सुल्तान को मंगोलों के आक्रमणों से फुरसत मिली तो उसने उलूग खां यानी बलबन को बागी मेवातियों को सबक सिखाने भेजा। बलबन ने मेवात क्षेत्र में घेरा डाल दिया। उसने सैनिकों के बीच यह ऐलान किया कि जो भी किसी मेवाती का सिर लेकर आएगा उसे चांदी का एक टका मिलेगा। जिंदा पकड़कर लाने वाले को दो टके दिए जाएंगे। 20 दिन की लड़ाई के बाद मेवाती हार गए। 250 मेवाती पकड़े गए, जिन्हें हाथियों के पैरों के नीचे कुचलवा दिया गया।

एक इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी की किताब तारीखे-फिरोजशाही के अनुसार, मेवातियों के सरदार मलका की खाल उतरवाकर उसमें भूसा भर दिया गया और उसे दिल्ली दरवाजे के पास लटका दिया गया। बरनी कहता है कि उसने अपनी जिंदगी में इतना भयंकर दृश्य कभी नहीं देखा था, जितना दिल्ली द्वार हौज-ए-रानी पर देखा। हालांकि, इसके बाद भी मेवाती बागी बने रहे। बलबन ने मेवातियों के विद्रोह का दमन करने और पंजाब क्षेत्र में शांति कायम करने के बाद’जिल्ले-इलाही’ की उपाधि धारण की। उसने तुर्क प्रभाव को कम करने के लिए फारसी परंपरा पर आधारित ‘सिजदा’ (घुटने पर बैठकर सम्राट के सामने सिर झुकाना) और ‘पाबोस’ (पांव को चूमना) के प्रचलन को अनिवार्य कर दिया। वह अपने दरबार में वजीरों, अमीरों और सिपहसालारों को खड़ा रहने को मजबूर करता था। उसके सामने कोई बैठ नहीं सकता है। दरबार में सब खड़े ही रहते थे।

सुल्तान बनते ही बलबन ने मेवात के जंगलों को साफ करवाया क्योंकि इनमें मेवाती युद्ध के बाद छिप जाते थे। बरनी लिखता है कि बलबन ने सुल्तान बनने के बाद मेवात पर आक्रमण किए और वहीं डेरा डाले रखा। एक साल तक मेवातियों को ढूंढ़-ढ़ूढ़कर मौत के घाट उतारा जाता रहा। कहते हैं कि दिल्ली से मेवात तक खंभों पर मेवातियों के सिर काटकर रख दिए गए थे। वहीं, मेवातियों ने भी बलबन के 1 लाख सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था। हालांकि, मेवातियों का विद्रोह इसके बाद भी नहीं थमा।

बलबन ने मेवात में स्थाई शांति कायम करने के लिए गोपालगीर में एक किला बनवाया और अपनी एक छोटी सैन्य टुकड़ी वहां रख दी। कई जगहों पर थाने बनवाए गए। बलबन खुद इसका दौरा करता था। बलबन के शासन के अंतिम दिनों में मेवाती फिर विद्रोही हो गए। एक अंग्रेज इतिहासकार सर वुलजले हेग कहते हैं कि कड़े दमनकारी कदमों के बाद भी बलबन मेवात को पूरी तरह शांत नहीं कर सका।

दिल्ली सल्तनत के दौर में सिकंदर लोदी के शासनकाल में आलम खां मेवाती दिल्ली के दरबार का एक महत्वपूर्ण अमीर था। इब्राहिम लोदी के समय में हसन खां मेवाती ने अपने आपको स्वतंत्र घोषित कर दिया। उसने एक बड़े राज्य की स्थापना की जिसमें मेवात यानी गुरुग्राम, फरीदाबाद, नारनौल और अलवर के आसपास के क्षेत्र शामिल थे। उसके पास 10,000 मेवातियों की एक सेना थी। वह एक तरफ दिल्ली के सुल्तानों से दोस्ती बनाए रखता था तो दूसरी ओर वह राजस्थान के राजपूत सरदारों से भी गठजोड़ बनाए रखता था। हसन खां दिल्ली सल्तनत का हमेशा वफादार बना रहा। यहां तक कि उसने पानीपत की लड़ाई में इब्राहिम लोदी का साथ दिया। हालांकि, यह जंग इब्राहिम लोदी हार गया था।

आखिर पानीपत की लड़ाई में कैसे हारे मराठा? जानिए पूरी कहानी!

आज हम आपको बताएंगे कि पानीपत की लड़ाई में मराठा कैसे हारे थे! पानीपत की तीसरी लड़ाई के बारे में इतिहासकार जीएस सरदेसाई ने अपनी किताब ‘न्यू हिस्ट्री ऑफ मराठा’ में लिखा है- इस युद्ध ने यह निश्चित नहीं किया कि भारत पर कौन शासन करेगा, बल्कि यह निश्चित किया कि भारत पर कौन शासन नहीं करेगा। यानी मराठे हिंदुस्तान की सत्ता से बाहर हो गए। दिल्ली की जो गद्दी उन्हें मिली थी, उन्होंने इसे महज 5 घंटे की लड़ाई के बाद गंवा दिया। 14 जनवरी, 1761 को हुए पानीपत के इस तीसरे युद्ध में मराठा सेना का प्रतिनिधित्व सदाशिवराव भाऊ और अफगान सेना का नेतृत्व अहमदशाह अब्दाली ने किया जिसमें मराठा सेना की पराजय हुई। हरियाणा की चौथी किस्त में जानते हैं पानीपत की वो लड़ाई, जिसने एक बार फिर हिंदुस्तान को अंतहीन बर्बादी की राह में झोंक दिया। पानीपत के तीसरा युद्ध दरअसल 18वीं शताब्दी के मध्य में मराठों और अफगानों के बीच चल रहे युद्धों की श्रंखला का अंतिम और निर्णायक युद्ध था। 10 जनवरी 1760 को अहमद शाह अब्दाली ने मराठा सेनापति दत्ताजी की हत्या कर दिल्ली पर कब्जा कर लिया। मराठों की यह हार ही इस युद्ध का कारण बनी। इस हार की खबर सुनकर पेशवा बालाजीराव ने अब्दाली की शक्ति नष्ट करने के लिए अपने चचेरे भाई सदाशिव राव भाऊ के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी। इस सेना ने 2 अगस्त 1760 को दिल्ली को अब्दाली के कब्जे से आजाद करा लिया। अब्दाली इस हार से तिलमिला उठा लेकिन वह यमुना पार करने में सक्षम ना था, इसलिए हार स्वीकार करने के लिए विवश हो गया। हालांकि यह विजय मराठों के लिए अशुभ सबित हुई।

मराठों की इस जीत के बाद भरतपुर के जाट राजा सूरजमल मराठा गठबंधन से अलग हो गए, जो पानीपत की हार का बड़ा कारण बना। दरअसल, सूरजमल और उसकी सेना छापामार जंग लड़ती थी, जिससे दुश्मन के पैर उखड़ जाते थे। अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने गद्दारी करते हुए 18 जुलाई, 1760 को अब्दाली से जा मिला। दिल्ली के चारों ओर ऐसी किलेबंदी कर दी गई कि दिल्ली फतह करने के ढाई माह बाद तक मराठे वहां से निकल नहीं पाए। वहां पैसों और खाने-पीने की कमी हो गई। धनाभाव के कारण दिल्ली में ठहरना संभव नहीं था।

मराठों ने रणनीति के तहत दिल्ली से आगे बढ़ते हुए कुंजपुरा की चौकी की ओर चल दिए और 17 अक्टूबर को इस चौकी पर अपना कब्जा जमा लिया। दिल्ली के बाद कुंजपुरा के हाथ से निकल जाने से अब्दाली तिलमिला उठा। कुंजपुरा पर उसने दोबारा हमला किया और इसे जीतने में सफल रहा। इतिहासकारों के अनुसार, पानीपत और उसके आसपास के इलाके में उस दौर में भयंकर अकाल पड़ा। मराठा सेना भूख और धन की कमी से परेशान हो उठी। सेना की हालत खराब होते देख मराठों ने अब्दाली से बातचीत करनी शुरू कर दी। हालांकि, रूहेलखंड के सरदार नजीबउद्दौला की वजह से यह बातचीत सफल नहीं हो पाई।

आखिरकार मराठों को 14 जनवरी, 1761 का पानीपत का युद्ध करना पड़ा। इस युद्ध में मराठों की कुल सेना 45,000 थी और अब्दाली के पास 65,000 सैनिक थे। मराठे घुड़सवार और तोपखाने में बेहतर थे। वहीं, अब्दाली की पैदल सेना बेहतर थी। दोनों सेनाओं के बीच 14 जनवरी, 1761 को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक चला। इसमें 2 बजे तक मराठों का पलड़ा भारी रहा क्योंकि इब्राहीम खान गार्दी का तोपखाना दुश्मन पर मौत बनकर टूट पड़ा था।

इतिहासकारों के अनुसार, दोपहर 2 बजे तक ऐसा लग रहा था कि मराठे पानीपत युद्ध को जीत रहे थे। क्योंकि अब्दाली की सेना हर मोर्चे पर हार रही थी। मगर, उसी समय पेशवा के पुत्र विश्वास राव को गोली लग गई। वह मौके पर ही शहीद हो गए। मराठा सेना बिखर पड़ी। पेशवा के पुत्र और सेना के प्रमुख विश्वासराव जंबूरक तोपखाने की चपेट में आ गए थे। लड़ाई के चश्मदीद रहे मोहम्मद शामलू ने बताया था कि किस तरह विश्वास राव को जंबूरक (घूमने वाली बंदूक) की गोली सिर पर लगी।

मराठों का इतिहास लिखने वाले एक और विद्वान काशीराज पंडित ने पानीपत की हार के बाद लिखा है। काशीराज पंडित पानीपत के इस युद्ध के प्रत्यक्षदर्शी थे। उन्होंने कूट संदेश के रूप में पेशवा बालाजी बाजीराव को पानीपत के तृतीय युद्ध के विषय में लिखा कि दो मोती विलीन हो गए। 27 सोने की मुहरें लुप्त हो गईं और चांदी-तांबे की तो पूरी गणना ही नहीं की जा सकती। दो मोती का मतलब था सदाशिवराव भाऊ और विश्वासराव भाऊ। 27 सोने की मुहरों का मतलब था कि उच्च पदस्थ सरदार और चांदी-तांबे का मतलब है कि अनगिनत सैनिकों की हत्या कर दी गई। अफगानी जंबूरक तोपें वजन में हल्की थीं और इनका प्रयोग ऊंटों पर रख कर भी किया जा रहा था। ये हल्की तोपें इधर से उधर स्थानांतरित किए जाने के लिए सुविधाजनक थीं। इन्हीं जंबूरक तोपों ने अब्दाली को युद्ध में वापस पहुंचाया। जंबूरक बल ने मराठा केंद्र पर गोलियां चलाईं और कई लोगों को हताहत किया।

दोपहर 3 बजे तक युद्ध समाप्त हो गया था। इसके बाद से रात 11 बजे तक अब्दाली के सैनिकों ने मराठों और उनकी औरतों का बड़े पैमाने पर कत्लेआम किया। ढाई लाख मराठों में से 6000 ने शुजा व काशीराज के तंबुओं में शरण ली। होलकर के 15000 सैनिक पश्चिम की ओर भागकर जान बचा पाए। हजारों घायल थके मराठे बंदी बनाकर कड़कती ठंड में मैदान में घेरकर बिठाए गए। सुबह 10 बजे कुंजपुरा में नजावत खां के पुत्र दलेरखां और कुतुबशाह के पुत्र अब्दाली के सामने जा खड़े हुए। 15 जनवरी को कत्लेआम की इजाजत मांगी गई। अब्दाली ने 5 घंटे का समय दिया और अपने सैनिकों के साथ अब्दाली शिविर में कैद मराठों पर टूट पड़े।

तिरुपति लड्डू विवाद से घी सप्लायर को नुकसान, सैंपल जांच में गुणवत्ता पर सवाल

जगनमोहन ने रद्द की तिरूपति मंदिर यात्रा, चंद्रबाबू ने लगाया अपने कार्यकाल के दौरान प्रसादी लड्डू में जानवरों की चर्बी मिलाने का आरोप
चंद्रबाबू ने तिरूपति के प्रसादी लड्डू को लेकर ‘विवादित’ टिप्पणी की. उनकी शिकायत थी कि जगन के शासनकाल में तिरुमाला के प्रसादी लड्डू बनाने में इस्तेमाल होने वाले घी में जानवरों की चर्बी मिलाई जाती थी।
वाईआरएस कांग्रेस प्रमुख और आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस जगनमोहन ने तिरुपति मंदिर जाने की अपनी योजना रद्द कर दी है। उनका यह फैसला तिरूपति प्रसादी लड्डू में जानवरों की चर्बी मिलाने के आरोपों के बीच आया है. पार्टी ने जानकारी दी है कि जगनमोहन के दौरे के दौरान अप्रिय घटनाओं से बचने के लिए कार्यक्रम रद्द कर दिया गया है.

मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने तिरूपति के प्रसादी लड्डू को लेकर ‘विवादित’ टिप्पणी की है. उनकी शिकायत थी कि जगन के शासनकाल में तिरुमाला के प्रसादी लड्डू बनाने में इस्तेमाल होने वाले घी में जानवरों की चर्बी मिलाई जाती थी। उन्होंने गुजरात की एक सरकारी प्रयोगशाला की जुलाई की रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि तिरूपति बेंकटेश्वर मंदिर के प्रसादी लड्डुओं में ‘शुद्ध’ घी के साथ जानवरों की चर्बी मिलाई जा रही है. यहीं से विवाद शुरू हुआ. वाईएसआर कांग्रेस ने पहले आरोपों से इनकार किया था और चंद्रबाबू की टिप्पणियों को “राजनीति से प्रेरित” बताया था।

जगन ने जानवरों की चर्बी मिलाने के आरोप से इनकार करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भी लिखा. उन्होंने आरोप लगाया कि चंद्रबाबू ने तिरूपति मंदिर की गरिमा और पवित्रता को नष्ट करने की कोशिश की. जगन ने यहां तक ​​दावा किया कि चंद्रबाबू ने ऐसे आरोप लगाकर ‘पाप’ किया है. इसके बाद उनकी टीम ने ‘प्रायश्चित’ के लिए तिरूपति मंदिर यात्रा का आह्वान किया.

हालांकि, जगन ने यह कहते हुए अपना कार्यक्रम रद्द करने का फैसला किया है कि कार्यक्रम में अव्यवस्था हो सकती है और आगंतुकों की सुरक्षा में खलल पड़ सकता है. उनके शब्दों में, ”राज्य में शैतान का शासन चल रहा है. सरकार मेरी आगामी तिरूपति यात्रा को रोकने की कोशिश कर रही है। पुलिस ने मेरी पार्टी के नेताओं के खिलाफ नोटिस जारी किया है। नोटिस में कहा गया है, ”हमें तिरूपति मंदिर जाने की कोई अनुमति नहीं है.”

जगन ने आगे आरोप लगाया कि सरकार ने असली मुद्दे पर भ्रम पैदा करने के लिए लड्डू-विवाद खड़ा किया है. उन्होंने जोर देकर कहा, ”मुख्यमंत्री (चंद्रबाबू नायडू) ने झूठा दावा किया कि तिरूपति प्रसादी लड्डू जानवरों की चर्बी से बनाए जाते हैं। इससे मंदिर की पवित्रता धूमिल हो गई है।

इस बार तिरुपति मंदिर के प्रसादी लड्डू विवाद में घी सप्लाई करने वाली कंपनी को कारण बताओ नोटिस भेजा गया है. स्वास्थ्य मंत्रालय ने सोमवार को संगठन को नोटिस भेजा. तिरूपति के प्रसादी लड्डुओं पर विवाद के बीच स्वास्थ्य मंत्रालय ने चार घी आपूर्तिकर्ताओं से नमूने एकत्र किए थे। इन्हें गुणवत्ता नियंत्रण के लिए प्रयोगशाला भेजा गया। समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, प्रयोगशाला परीक्षण में चार कंपनियों में से एक के घी के नमूने की गुणवत्ता पर सवाल उठाया गया है। इसके बाद कंपनी को कारण बताओ नोटिस भेजा गया.

तिरूपति मंदिर के प्रसादी लड्डुओं में जानवरों की चर्बी मिलाने का आरोप लगा है। इस आरोप को लेकर दक्षिणी राज्य में हंगामा मच गया है. प्रसादी के लड्डुओं में ‘शुद्ध’ घी के साथ जानवरों की चर्बी मिलाई जाती थी। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने हाल ही में गुजरात की एक सरकारी प्रयोगशाला की रिपोर्ट का हवाला देते हुए यह दावा किया। उन्होंने आरोप लगाया कि यह घटना पूर्व मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी के कार्यकाल में हुई थी. हालाँकि, जगन की टीम ने आरोपों से इनकार किया था। लेकिन विवाद नहीं रुका. विवाद के बीच केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू को एक विस्तृत रिपोर्ट भेजी थी.

ये तिरूपति लड्डू विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है. एक वकील ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में केस दाखिल किया. उन्होंने आरोप लगाया कि प्रसादी के लड्डुओं में जानवरों की चर्बी मिलाने से हिंदुओं की भावनाएं आहत हुई हैं. इस प्रसाद को पवित्र आशीर्वाद मानने वाले अनगिनत भक्त भावनात्मक रूप से आहत हैं। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि मंदिर प्रशासन की लापरवाही के कारण लड्डू विवाद पैदा हुआ. उन्होंने अनुरोध किया कि हिंदू धर्म की पवित्रता की रक्षा के लिए कदम उठाए जाने चाहिए.

जापानी युद्धपोत ने पहली बार ताइवान जलडमरूमध्य में प्रवेश किया! इस बार चीन से टकराव?

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पिछले हफ्ते, एक चीनी विमानवाहक पोत सहित दो युद्धपोत ताइवान के पास जापानी जलक्षेत्र में प्रवेश कर गए। कयास लगाए जा रहे हैं कि टोक्यो का यह कदम प्रतिक्रिया स्वरूप है. चीन-ताइवान विवाद के बीच इस बार एक जापानी युद्धपोत ‘विवादित’ ताइवान जलडमरूमध्य में घुस गया। टोक्यो का दावा है कि इस तरह का कदम अंतरराष्ट्रीय जल में अपने जहाजों को चलाने के अधिकार पर जोर देना है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह पहली बार है कि कोई जापानी युद्धपोत ताइवान जलडमरूमध्य में दाखिल हुआ है।

जापानी विध्वंसक सज़ानमी ने गुरुवार को पूर्वी चीन सागर से ताइवान जलडमरूमध्य में प्रवेश किया। पिछले बुधवार को 180 किमी लंबे जलडमरूमध्य में ऑस्ट्रेलियाई और न्यूजीलैंड के सैन्य जहाजों को देखा गया था। संयोग से, तीनों देशों को अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में ‘अमेरिका के करीबी’ और ‘चीन विरोधी’ के रूप में जाना जाता है।

पिछले हफ्ते, एक विमानवाहक पोत सहित दो चीनी युद्धपोत ताइवान के पास जापानी जलक्षेत्र में प्रवेश कर गए। इससे पहले अगस्त में चीनी वायुसेना का एक निगरानी विमान जापान के हवाई क्षेत्र में घुस गया था. टोक्यो ने दोनों मामलों में विरोध किया। लेकिन जवाब में बीजिंग ने कहा कि उन्होंने ऐसा अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक किया है. यह स्थिति चीन की गतिविधियों पर जापान की प्रतिक्रिया मानी जा रही है।

पिछले मई में चीनी सेना ने गुरुवार को बिना किसी पूर्व घोषणा के “द्वीप” ताइवान की सीमा के पास सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया। इसके बाद उस इलाके में संघर्ष का नया माहौल बन गया है. संयोग से, बीजिंग ने पिछले दो वर्षों में कई बार ताइवान जलडमरूमध्य के माध्यम से ताइवान के जल और हवाई क्षेत्र में प्रवेश करके अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन किया है। अगस्त 2022 में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की अध्यक्ष नैंसी पेलोसी की ताइवान यात्रा के बाद चीन की आपत्तियों को खारिज करने के बाद नया तनाव पैदा हो गया। उस समय चीनी युद्धक विमान लगातार ताइवान के हवाई क्षेत्र का उल्लंघन करने लगे।

चीन-ताइवान संकट के दौरान, अमेरिका के सातवें बेड़े से संबंधित कई युद्धपोत ताइवान जलडमरूमध्य में प्रवेश कर गए। उसके बाद तनाव को अस्थायी तौर पर कम करने के लिए दोनों पक्ष कुछ हद तक लचीले हुए थे, लेकिन इस साल ताइवान के आम चुनाव में कट्टर चीन विरोधी डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (डीपीपी) की जीत के बाद टकराव का एक नया माहौल बन गया है. चीन का दावा है कि ताइवान उनके देश का ‘विद्रोही क्षेत्र’ है. वे ताइवान को चीनी मुख्य भूमि में मिलाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, यहां तक ​​कि यदि आवश्यक हो तो बलपूर्वक भी। इसके उलट ताइवान की मौजूदा सरकार अपनी बात पर अड़ी हुई है.

सीमा से कुछ दूरी पर चीनी युद्धक विमान! उनकी छवि सैटेलाइट तस्वीरों में कैद हुई थी. इसे हाल ही में एक निजी भू-राजनीतिक विश्लेषक फर्म द्वारा प्रकाशित किया गया था। संगठन के मुताबिक, चीन ने सिक्किम सीमा से कम से कम 150 किमी दूर चीन के कब्जे वाले तिब्बत के शिगात्से हवाई अड्डे पर छह उन्नत जे-20 युद्धक विमान तैनात किए हैं। शिगात्से तिब्बत का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। 27 मई के बाद से वहां लड़ाकू विमान देखे जा रहे हैं. यह हवाई अड्डा पश्चिम बंगाल के हासीमारा सैन्य अड्डे से 290 किमी से भी कम दूरी पर है। संयोग से, हासीमारा में भारत का दूसरा राफेल एयर बेस है।

देश में इस वक्त लोकसभा चुनाव चल रहे हैं। चुनाव नतीजे 4 जून को. उससे पहले चीन के अचानक उठाए गए कदम ने चिंता पैदा कर दी है. हालाँकि, विदेश मंत्रालय ने अभी तक इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है। हालाँकि, वे जो जानते हैं वह स्पष्ट है। चीनी हवाई अड्डे पर साल भर J-20 लड़ाकू विमान तैनात नहीं होते हैं। शिगात्से हवाई अड्डे की ऊंचाई 12,408 फीट है। इसका उपयोग वायुसेना अड्डों के साथ-साथ नागरिक क्षेत्रों में भी किया जाता है। वहां पूरे साल जे-10 लड़ाकू विमान और केजे-500 विमान रखे जाते हैं। हालाँकि, J-20 फाइटर जेट पहला है। वहां Y-20 मालवाहक विमान भी देखा गया. माना जाता है कि उस विमान के जरिए सेना को जरूरी सामग्रियों की आपूर्ति की जाती है.

मीडिया सूत्रों के मुताबिक, जे-20 बेहद आधुनिक लड़ाकू विमान है। अधिकतम गति 2468 किमी प्रति घंटा है। ये एक विशेष प्रकार के ‘स्टील्थ’ लड़ाकू विमान हैं, यानी बहुत शक्तिशाली रडार के बिना इनका पता नहीं लगाया जा सकता है। इन्हें आमतौर पर चीन के पूर्वी हिस्से में तैनात किया जाता है। इनमें से छह विमानों को अचानक भारतीय सीमा के इतने करीब तैनात करने की वजह पर सवाल खड़े हो गए हैं. इससे पहले यह विमान 2020 और 2023 में शिनजियांग में देखा गया था। हालाँकि, इतनी बड़ी राशि पहले कभी तैनात नहीं की गई है। कुछ राजनयिकों का दावा है कि भारतीय सीमा के पास शायद 250 से ज्यादा युद्धक विमान तैनात किए गए हैं. राडार पर नहीं पकड़ा गया.

इन युद्धक विमानों की मदद से ही चीन तस्करी में माहिर हो गया है। J-20 में कई सेंसर हैं। यहां तक ​​कि यह विमान चीन की सबसे आधुनिक मिसाइलें (हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलें) भी ले जा सकता है। इसमें सबसे लंबी दूरी तक मार करने वाली पीएल-15 मिसाइल शामिल है, जो 300 किमी की दूरी तक वार कर सकती है. भारत अब J-20 लड़ाकू विमानों को रोकने के लिए राफेल पर निर्भर है। भारत के पास 36 राफेल लड़ाकू विमान हैं, जिनमें से आठ फिलहाल अमेरिका के साथ अलास्का में अभ्यास कर रहे हैं। भारत 26 और राफेल खरीदने के लिए फ्रांस से बातचीत कर रहा है। हासीमारा में भारत के 16 राफेल लड़ाकू विमान तैनात हैं।

लोकसभा चुनाव के संदर्भ में विशेषज्ञों का मानना ​​है कि चीन बहुत धीमी गति से भारत को चारों तरफ से घेरने की कोशिश कर रहा है। पिछले पांच वर्षों में, भारत तिब्बत सहित भारत के करीबी क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। एक नया वायु सेना बेस बनाया जा रहा है। पुराने अड्डों को भी सुधारा जा रहा है। नियमित लड़ाकू विमानों का परीक्षण भी चल रहा है.

पहले से ही 2020 में गलवान संघर्ष, 2022 में तवांग के पास वास्तविक सीमा रेखा के पास फिर से भारत-चीन संघर्ष और अब सिक्किम सीमा के पास चीनी युद्धक विमानों की तैनाती – तनाव बढ़ रहा है! केंद्र की बीजेपी सरकार के विरोधियों का दावा है कि बार-बार पाकिस्तान को भारत का दुश्मन बताने के बावजूद केंद्र चीन के बारे में ऐसा कुछ कहती नजर नहीं आ रही है. इस बार भी विदेश मंत्रालय की चुप्पी ने बेचैनी बढ़ा दी.

तीन गोरे जीवन से बाहर हो गए! सुनील शेट्टी ने सिखाया साठ के बाद भी जवानी बरकरार रखने का मूल मंत्र

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अच्छे स्वास्थ्य में, वर्तमान पीढ़ी का कोई भी अभिनेता गोल कर सकता है। कौन सा गुप्त मंत्र साठ के बाद भी जवानी को बरकरार रखता है? उम्र तिरसठ। समझने का एक तरीका है! मस्कुलर फिट लुक. बाल और दाढ़ी जो चिपक गए हैं। हृष्ट-पुष्ट दिखने में उम्र बढ़ने का कोई संकेत नहीं है। वह अब भी नियमित रूप से सुबह जल्दी उठते हैं और व्यायाम करते हैं। भोजन को मापें. अच्छे स्वास्थ्य में, वर्तमान पीढ़ी का कोई भी अभिनेता गोल कर सकता है। ये हैं सुनील शेट्टी. कौन सा गुप्त मंत्र साठ के बाद भी जवानी को बरकरार रखता है? सुनील ने राज बता दिया.

80 प्रतिशत आहार, 10 प्रतिशत व्यायाम और बाकी 10 प्रतिशत आदतें – इन तीन मंत्रों ने सुनील को तिरसठ साल की उम्र में भी फिट और मस्कुलर बनाए रखा है। बात यहीं ख़त्म नहीं होती. बुढ़ापे से बचने के लिए उनके पास एक और तरकीब भी है। यानी एक्टर ने जिंदगी से ‘तीन सफेद’ चावल, नमक और चीनी को हटा दिया है.

हालाँकि चावल ख़त्म हो चुका है, लेकिन नमक और चीनी के बिना आज की पीढ़ी कल्पना भी नहीं कर सकती। तलने का मतलब है अतिरिक्त नमक. चाहे पिज्जा-बर्गर हों या चिप्स, प्रोसेस्ड फूड, पैकेज्ड फूड, नमक हर जगह है। और शुगर शरीर में जहर की तरह प्रवेश कर जाती है। पैकेज्ड फ्रूट जूस हो या सॉफ्ट ड्रिंक, मिठाई से लेकर केक-पेस्ट्री, कुकीज, कैडबरी सभी चीनी से भरपूर हैं। और जितनी अधिक चीनी शरीर में प्रवेश करती है, उतनी ही विभिन्न बीमारियाँ उसे जकड़ने लगती हैं। रक्त शर्करा बढ़ रही है, गुर्दे की बीमारी, यकृत रोग और यहां तक ​​कि अतिरिक्त चीनी तंत्रिका रोग का कारण बन रही है।

सुनील की सलाह, अगर आप अपना वजन कम करना चाहते हैं और जवानी बरकरार रखना चाहते हैं तो आपको इन तीन सफेद खाद्य पदार्थों को अपने जीवन से हटा देना चाहिए। एक प्लेट चावल या कुछ भी खाने से आपका वजन कम नहीं होगा, ज्यादा नमक खाने से आपका दिल खराब हो जाएगा, कोलेस्ट्रॉल आपकी आंखों को खराब कर देगा और ज्यादा चीनी का मतलब है मधुमेह, जो युवाओं को भी प्रभावित करता है। इसलिए अगर आप बढ़ती उम्र को रोकना चाहते हैं तो आपको डाइट, एक्सरसाइज के साथ-साथ सुनील की तरह कुछ आदतों को भी छोड़ना होगा। और उनमें से एक है खाई खाई बातिक। चाहे यह कितना भी लुभावना क्यों न हो, नमक या मीठा खाना न खाएं।

इस संबंध में पोषण विशेषज्ञ शंपा चक्रवर्ती सलाह देती हैं कि सफेद चावल की जगह ब्राउन चावल या ओट्स, दलिया, क्विनोआ जैसे अनाज बेहतर हैं। चीनी की जगह शहद या गुड़ का इस्तेमाल किया जा सकता है. लेकिन शरीर इसे समझता है। कृत्रिम चीनी बिल्कुल नहीं खानी चाहिए। अगर आपको कॉफी की लत है तो चाय पीने के बाद शराब या ग्रीन टी, बिना दूध और चीनी वाली ब्लैक कॉफी। आटे के बिस्किट खाने से बिल्कुल काम नहीं चलेगा. अगर आप चाय या कॉफी के साथ बिस्कुट खाना चाहते हैं तो क्रीमक्रैकर बिस्कुट या पतले अरारोट बिस्कुट खा सकते हैं. या फिर आप तीन से चार भीगी हुई मूंगफली खा सकते हैं. सूखे भुने चने भी काम आएंगे. अगर आप स्नैक्स खाना चाहते हैं तो तला हुआ खाना न खाएं बल्कि फल, दही खाएं, प्रोबायोटिक्स से तला हुआ खाना खाने की इच्छा कम हो जाएगी। मीठे पेय को डिटॉक्स पेय से बदलें। फलों या सब्जियों के छोटे टुकड़ों में काटा गया पानी किसी भी पैक किए गए पेय की तुलना में अधिक स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक होता है। इस प्रकार धीरे-धीरे आदत विकसित करनी चाहिए।

क्या अनुष्का शर्मा के मां बनने के बाद इस बार माता-पिता बनने वालों की लिस्ट में कन्नूर लोकेश राहुल-अथिया शेट्टी का नाम शामिल हो गया है? पिछले साल जनवरी में राहुल और अथिया ने हाथ मिलाया था। विराट और अनुष्का नए माता-पिता हैं। इस बार राहुल-अथिया बनने वाले हैं नए मेहमान! और अथिया के पिता सुनील शेट्टी ने कोई जानकारी लीक की?

हाल ही में सुनील ‘डांस दीवाने’ शो में माधुरी दीक्षित के साथ जज की सीट पर नजर आ रहे हैं। वहां प्रस्तोता भारती सिंह ने उनसे मजाकिया अंदाज में पूछा, “आप दादा होंगे तो कैसा व्यवहार करेंगे?” क्योंकि, आप जैसा दादा मिलना किस्मत की बात है!” इस पर अभिनेता के जवाब से अथिया की प्रेग्नेंसी की अटकलें फैल गईं। सुनील ने भारती के सवाल का जवाब देते हुए कहा, ”जब मैं अगले सीजन में आऊंगा तो दादाजी की तरह चलूंगा.” इसके बाद चर्चा है कि क्या अथिया प्रेग्नेंट हैं? पिता सुनील ने दिया ये संकेत? हालाँकि, न तो अथिया और न ही राहुल ने इस मामले पर कोई टिप्पणी की है।

2019 में एक दोस्त राहुल-अथियार के माध्यम से। उसके बाद करीब चार साल का प्यार. आख़िरकार उन्होंने 2023 में शादी कर ली। एक साल हो गया, लेकिन क्या इस बीच ये स्टार जोड़ी कोई खुशखबरी देने वाली है? हालांकि, वे हमेशा लाइमलाइट से दूर रहना चाहते हैं। लेकिन, क्या प्रेग्नेंसी की खबरें सच हैं? या फिर सुनील सिर्फ मजाक कर रहा था? इसको लेकर कोहरा बरकरार है.

क्या बच्चे का वजन नियंत्रण से बाहर हो रहा है?

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छोटी उम्र से ही बच्चे के आहार पर अतिरिक्त ध्यान देना जरूरी है। शिशु को जितना कम निश्चित खाद्य पदार्थ खिलाया जा सके, उतना बेहतर है। बच्चों में मोटापे की समस्या बढ़ती जा रही है। अगर बचपन से ही मोटापे का सेवन किया जाए तो शरीर का मेटाबॉलिक रेट कम हो जाता है। शरीर में तरह-तरह की बीमारियाँ घर कर जाती हैं। टाइप 2 डायबिटीज, पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम, हार्मोनल असंतुलन जैसी कई बीमारियां जीवन से जुड़ी हैं। इसलिए छोटी उम्र से ही बच्चे के आहार पर अतिरिक्त ध्यान देना जरूरी है। शिशु को जितना कम निश्चित खाद्य पदार्थ खिलाया जा सके, उतना बेहतर है।

1) मैगी बच्चों का बहुत पसंदीदा भोजन है. उन्हें मैगी मिले तो और कुछ नहीं चाहिए. इस भोजन में लगभग कोई पोषण मूल्य नहीं है। बल्कि इसमें नमक की मात्रा बहुत अधिक होती है, जो बच्चों के स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है।

2) पैकेज्ड जूस और सॉफ्ट ड्रिंक में शुगर की मात्रा अधिक होती है, जो मोटापे की समस्या को बढ़ा सकती है। इसलिए बेहतर है कि बच्चे को ऐसे पेय न पिलाएं। इससे वजन बढ़ने के अलावा और भी कई समस्याएं होने का खतरा रहता है।

3) बच्चों को तला हुआ खाना बहुत पसंद होता है. हालाँकि, ऐसे खाद्य पदार्थों में ट्रांसफैट और कैलोरी अधिक होती है। अगर आप वजन कम करना चाहते हैं तो यह खाना बिल्कुल न दें।

चुपचाप ईर्ष्यालु दृष्टि से देखो। डकसाइट पर सुंदरी. जब वे नए कार्यालय में कदम रखते थे तो पुरुष सहकर्मी उत्साह बढ़ाने के लिए इधर-उधर घूमते थे। लेकिन एक साल के अंदर तस्वीर बदल गई. एक वर्ष के भीतर, वह किशोर से बड़ा लड़का बन गया। शरीर पर वसा की एक मोटी परत जम जाती है। चीनी युवती का वजन सिर्फ काम के दबाव के कारण एक साल में 20 किलो बढ़ गया है। दक्षिणी चीन के गुआंग्डोंग प्रांत में ओयांग वेनजिंग एक साल पहले की तस्वीर से पहचान में नहीं आ रहा है। एक चौबीस साल की जवान औरत छुपी हुई थी. वजन 60 किलो था. लेकिन नए ऑफिस में ज्वाइन करने के बाद वह धीरे-धीरे निखरने लगे। दोस्त और रिश्तेदार इस पर हँसते और कानाफूसी करते हैं। कई लोग कम खाने, व्यायाम करने की सलाह देते हैं। लेकिन ओयुयांग को पहले तो कुछ समझ नहीं आया कि आखिर पूरे शरीर में चर्बी का जमाव क्यों बढ़ रहा है? साल के अंत में उनका वजन करीब 20 किलो बढ़ गया और उनका वजन 80 किलो तक पहुंच गया।

डॉक्टरों से बात करने के बाद ओयांग को एहसास हुआ कि काम के अत्यधिक दबाव के कारण उसके शरीर में चर्बी जमा हो गई है। लंबे समय तक काम करने, काम से संबंधित तनाव और अनियमित जीवनशैली के कारण वह मोटा हो गया।

ओयांग ने मीडिया को बताया कि उनके पास कार्यस्थल पर कोई खास काम नहीं है। सारा काम तो करना ही था. दिन-रात काम करना पड़ता था. खाने या घर जाने का कोई निश्चित समय नहीं था. धीरे-धीरे वह मोटा होने लगा। एक साल में 20 किलो वजन बढ़ गया। शारीरिक एवं मानसिक रूप से परेशान रहेंगे। हालाँकि, ओयांग ए ने यह भी कहा कि उन्होंने पिछले जून में अपनी नौकरी छोड़ दी थी। मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित किया।

वसा की कुछ मात्रा शरीर के लिए फायदेमंद होती है। लेकिन कई लोगों को इस बात का अंदाज़ा नहीं है कि यह किसी व्यक्ति के लिए कितना है। यह समस्या हृदय रोग का कारण बनती है। टाइप 2 मधुमेह या रक्तचाप की समस्या होना कोई असामान्य बात नहीं है। हाल ही में हुए एक अध्ययन में एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। ऐसा कहा गया है कि मोटापे का सीधा संबंध कैंसर से है।

प्रत्येक 10 कैंसर रोगियों में से 4 का वजन अधिक है। इतना ही नहीं वैज्ञानिकों का कहना है कि मोटापे से 30 तरह के कैंसर होने का खतरा रहता है। स्वीडन के माल्मो में लुंड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने चार दशकों से अधिक की अवधि में 4 मिलियन से अधिक लोगों का अध्ययन किया। 2016 के एक कैंसर अध्ययन में पाया गया कि मोटापा स्तन, बृहदान्त्र, गुर्दे और अग्नाशय के कैंसर से जुड़ा हुआ है। जब मधुमेह के कारण हार्मोनल संतुलन गड़बड़ा जाता है तो कैंसर होने का खतरा एक कदम और बढ़ जाता है। बाद में इस मोटापे के कारण कैंसर के शरीर के अन्य महत्वपूर्ण हिस्सों जैसे मस्तिष्क, गर्दन, गले, लिंग तक फैलने की प्रवृत्ति दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है।

पूजा में अपनाएंगी ये 5 मेकअप टिप्स तो मिलेगी हीरोइनों जैसी त्वचा

अगर ओपन पोर्स की समस्या बढ़ जाए तो कई बार मेकअप इसे कवर नहीं कर पाता। इस समस्या में मेकअप त्वचा के साथ अच्छे से घुलना नहीं चाहता। आगे पूजा करो. जिन लोगों को वास्तव में यह समस्या है, उनके लिए मेकअप त्वचा को चिकनी और चमकदार कैसे बना सकता है? बरसात के मौसम में कभी धूप तो कभी बारिश होती है। इस समय कई लोगों को त्वचा संबंधी समस्याओं से जूझना पड़ता है। त्वचा की सतह पर कई छोटे-छोटे छिद्र होते हैं। ये छिद्र त्वचा को सांस लेने की अनुमति देते हैं। नमी बरकरार रखता है. त्वचा को ठंडा रखता है. ये इतने छोटे होते हैं कि इन्हें नंगी आंखों से नहीं देखा जा सकता। लेकिन कई बार माथे, नाक और गालों पर मौजूद रोमछिद्र बड़े हो जाते हैं और छेद जैसे दिखने लगते हैं। त्वचा शिथिल और वृद्ध दिखती है। अगर त्वचा के रोमछिद्र बड़े हों तो उनमें धूल जम जाती है। हार्मोनल समस्याएं, अत्यधिक धूम्रपान या आनुवंशिकी भी बढ़े हुए छिद्रों का कारण बन सकती हैं। त्वचा को गंदा रखने पर भी यह समस्या देखने को मिल सकती है। नतीजतन, त्वचा हर समय तैलीय बनी रहती है। फिर मुहांसे और दाने की समस्या भी बढ़ जाती है।

अगर ओपन पोर्स की समस्या बढ़ जाए तो कई बार मेकअप इसे कवर नहीं कर पाता। इस समस्या में मेकअप त्वचा के साथ अच्छे से घुलना नहीं चाहता। आगे पूजा करो. जिन लोगों को वास्तव में यह समस्या है, उनके लिए मेकअप त्वचा को चिकनी और चमकदार कैसे बना सकता है?

1) ओपन पोर्स की समस्या होने पर सामान्य प्राइमर नहीं बल्कि जेल प्राइमर का इस्तेमाल करना चाहिए। इस प्राइमर का उपयोग करने के बाद त्वचा चिकनी दिखती है।

2) ऐसे में मैट फाउंडेशन का इस्तेमाल करना चाहिए। फाउंडेशन का इस्तेमाल बहुत ज्यादा न करें, बल्कि बहुत कम करें। बहुत ज्यादा लगाने से मेकअप कभी भी स्मूथ नहीं लगेगा।

3) पूरे चेहरे पर कोई कंसीलर नहीं। कंसीलर का प्रयोग केवल आंखों के नीचे, होठों के आसपास या काले धब्बों वाले क्षेत्रों पर करें।

4) मेकअप को सेटिंग पाउडर से सेट करना चाहिए. लेकिन पाउडर का प्रयोग बहुत कम करें।

5) खुले रोमछिद्रों वाली जगह पर हाइलाइटर का इस्तेमाल करना न भूलें.

पूजा के परिधान पहनकर प्रियजनों का दिल जीतना चाहते हैं? अगर आपकी लिपस्टिक आकर्षक है और इसे पहनने के तरीके में नयापन है तो पांच लोगों की भीड़ में भी हर किसी को आपकी मौजूदगी का अहसास होगा! हाल ही में बॉलीवुड से लेकर टॉलीवुड तक हीरोइनें भड़कीले रंगों की बजाय न्यूड शेड्स की लिपस्टिक लगाती नजर आ रही हैं। हाफ फैशन में नो मेकअप लुक के साथ लिपस्टिक के न्यूड शेड्स की लोकप्रियता भी बढ़ रही है। दूसरे शब्दों में कहें तो युवतियां लिपस्टिक लगाने के बारे में ज्यादा कुछ बताना नहीं चाहतीं। क्या आप न्यूड शेड लिपस्टिक के शौकीन हैं? अगर आप पूजा में अनन्या बनना चाहती हैं तो अपने कलेक्शन में कोई भी पांच न्यूड कलर की लिपस्टिक रख सकती हैं, यहां जानिए उसका ठिकाना.

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आखिर कितना आगे बढ़ चुका है तिरुपति प्रसादी का चर्बी कांड?

आज हम आपको बताएंगे कि तिरुपति प्रसादी का चर्बी कांड आखिर कितना आगे बढ़ चुका है! पिछले कुछ दिनों से, आंध्र प्रदेश के तिरुपति में श्री वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर के पास कभी नहीं गए हिंदू यह याद करने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिरी बार उनके पड़ोसी या परिवार के सदस्य मंदिर से कब प्रसाद लाए थे। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू के इस दावे ने पूरे देश को चौंका दिया है कि मंदिर के प्रसिद्ध लड्डू बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले घी में अन्य चीजों के अलावा टैलो (गोमांस की चर्बी) और लार्ड (सूअर की चर्बी) मिलावट की गई थी। हालांकि, राजनीतिक रूप से जुड़े इस खुलासे ने जवाबों से अधिक सवाल खड़े कर दिए हैं।  पिछली बार जब किसी ने सूअर की चर्बी और गाय की चर्बी शब्द एक साथ बोले थे, तो क्रांति हुई थी। माना जाता है कि सूअर और गाय की चर्बी से भरे कारतूसों ने 1857 के विद्रोह को भड़काया था। इसलिए, ऐसे दावे बहुत जिम्मेदारी के साथ किए जाने चाहिए। हालांकि, नायडू का दावा एक रिपोर्ट पर आधारित है जो मंदिर के घी में चर्बी और चर्बी की मौजूदगी का ‘संकेत’ देती है, लेकिन इसकी पुष्टि नहीं करती है। वास्तव में, इस रिपोर्ट में कई परिस्थितियों को सूचीबद्ध किया गया है, जिसके तहत इन आक्रामक एनिमल फैट की मौजूदगी के बिना ऐसे परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि गायों को तेल के केक खिलाए जाते हैं, तो उनके दूध और घी की संरचना बदल सकती है। इसलिए, सवाल उठता है कि क्या नायडू को 100% सुनिश्चित हुए बिना संभावित रूप से भड़काऊ रिपोर्ट प्रसारित करनी चाहिए थी? चूंकि लैब टेस्ट जुलाई में किए गए थे, इसलिए उनकी सरकार के पास घी के नमूनों का आगे विश्लेषण करने के लिए पर्याप्त समय था।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने तिरुपति विवाद को गंभीरता से लिया है। उन्होंने कहा कि उन्होंने नायडू से आगे की कार्रवाई के लिए लैब रिपोर्ट भेजने को कहा है। यह एक अच्छी बात लगती है अगर आपको नहीं पता कि यह परीक्षण वडोदरा स्थित सेंटर फॉर एनालिसिस एंड लर्निंग इन लाइवस्टॉक एंड फूड (CALF) की तरफ से किया गया था। 2017 में, यह दूध और मिल्क प्रोडक्ट का विश्लेषण करने के लिए भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा प्रमाणित भारत की एकमात्र लैब थी। यह लैब केमिकल, माइक्रोबाइलोजिकल और जेनेटिक टेस्ट कर सकता है। लेकिन नड्डा को नायडू से गुजरने की क्या जरूरत है, जब यह प्रयोगशाला राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड द्वारा संचालित है। यह बोर्ड केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के अधीन है? वास्तव में, वे फैक्स-फैक्स खेलने के बजाय, जब नायडू ने अपना खुलासा किया था, तो वे लैब के वैज्ञानिकों को एक राउंड टेबल चर्चा के लिए दिल्ली बुला सकते थे।

सवाल है कि जब मंदिर में कथित तौर पर खराब घी मिला, तब नायडू की टीडीपी विपक्ष में थी। इसके नेताओं का दावा है कि भक्त महीनों से शिकायत कर रहे थे कि लड्डू बदबूदार थे और उनका स्वाद खराब था। जब उन्होंने देखा कि पिछली राज्य सरकार इन शिकायतों पर ध्यान नहीं दे रही थी, तो टीम नायडू ने राज्य चलाने के लिए चुने जाने से पहले उसी लैब में लड्डू का एक डिब्बा क्यों नहीं भेजा? केंद्र में अपनी सहयोगी बीजेपी के साथ यह काफी आसान होना चाहिए था। यह अजीब लगता है कि नायडू जैसे चतुर राजनेता ने पिछली वाईएसआरसीपी सरकार को शर्मिंदा करने के लिए इस मुद्दे का इस्तेमाल नहीं किया।

कॉमन सेंस कहता है कि भारत में खाद्य पदार्थ की कीमतें बढ़ रही हैं। आरबीआई भी इस बात से सहमत है। तो फिर मंदिर के अधिकारियों को कैसे विश्वास हुआ कि 2023 में ₹320 प्रति किलो गाय के दूध से बना घी प्राप्त करना संभव है? अनुमान है कि लार्ड-इन-लड्डू का मौसम तब शुरू हुआ जब मंदिर ने कर्नाटक मिल्क फेडरेशन (केएमएफ) के प्रतिष्ठित नंदिनी ब्रांड को छोड़कर पिछले साल अगस्त में ओपन टेंडर के माध्यम से सस्ते विकल्पों की तरफ रुख कर लिया।। केएमएफ ने 2015 में ₹324 प्रति किलो की रेट कोट किया था, जब महाराष्ट्र स्थित निजी डेयरी गोविंद मिल्क एंड मिल्क प्रोडक्ट्स को ₹276 प्रति किलो का रेट कोट कर तिरुपति का ऑर्डर हासिल कर लिया। आठ साल बाद, जब, इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, गाय का घी निर्माताओं को लगभग ₹500 प्रति किलो खर्च होता है, एक निजी कंपनी ने ₹320 प्रति किलो घी की पेशकश की, और मंदिर बोर्ड ने इस पर विश्वास किया!

कल्पना करें, अगर मंदिर के लड्डू की जगह आप कॉफी बना रहे होते और आप दुनिया की सबसे मशहूर कॉफी चेन होते, तो क्या आप सबसे सस्ती कॉफी बीन्स खरीदते या सबसे बढ़िया कॉफी बीन्स? नायडू ने कहा है कि तिरुपति के भगवान वेंकटेश्वर आंध्र प्रदेश के लोगों की ‘सबसे बड़ी संपत्ति’ हैं। तो, अगर आप भगवान के ट्रस्टी हैं और आपका काम उनका प्रसाद बनाना है, तो क्या आपका मार्गदर्शक सिद्धांत सबसे कम कीमत वाला होना चाहिए या उच्चतम गुणवत्ता वाला? खासकर तब जब लड्डू भक्तों को भी बेचे जाते हैं और उन पर जीआई (भौगोलिक संकेत) टैग होता है। साथ ही इससे करोड़ों की कमाई होती है? फिलहाल, मंदिर ने 475 रुपये प्रति किलो की दर से नंदिनी घी खरीदना फिर से शुरू कर दिया है, लेकिन क्या इसके बाद भी इसका ध्यान क्वालिटी पर रहेगा?

इससे एक और सवाल उठता है। मंदिर भारतीय जीवनशैली का केंद्र हैं। हर गांव में एक या उससे ज्यादा मंदिर होते हैं। हर हाउसिंग सोसाइटी में एक मंदिर होता है। शहरों में कई बड़े मंदिर हैं, और इनमें से कुछ बड़े मंदिरों में प्रसाद और सामुदायिक भोजन बनाने के लिए नियमित रसोई होती है। पड़ोस के मंदिरों के विपरीत, जिनके कभी-कभार होने वाले ‘लंगर’ की देखरेख समुदाय के सदस्य करते हैं, बड़े मंदिरों को अवैयक्तिक समितियों द्वारा चलाया जाता है, जो गुणवत्ता से ज़्यादा लागत के बारे में चिंतित हो सकते हैं। क्या उन्हें नियमित रूप से अपने प्रसाद और अन्य फूड सैंपल को टेस्ट के लिए लैब में जमा करने की आवश्यकता होनी चाहिए?

अब जबकि आरोप लगाए जा चुके हैं और संदेह के बीज बो दिए गए हैं, सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि हम कब तक निश्चित उत्तर की उम्मीद कर सकते हैं? एक सप्ताह, एक महीना या दो महीने? सभी टेस्ट करने और पूरी तरह से सुनिश्चित होने में कितना समय लगेगा कि तिरुपति लड्डू बनाने के लिए इस्तेमाल किए गए घी में चर्बी, चरबी और मछली का तेल मिलाया गया था?

क्या तिरुपति मंदिर के लड्डू प्रसादी में सच में मिलता है मांस?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या तिरुपति मंदिर के लड्डू प्रसादी में सच में मांस मिलता है या नहीं! लैब रिपोर्ट में तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम के लड्डू में इस्तेमाल होने वाले घी में जानवरों का वसा होने की पुष्टि होने के बाद हिंदू समाज स्तब्ध है। इस बीच मंदिर के एक पूर्व पुजारी ने दिल दहला देनेवाला दावा किया है। पूर्व पुजारी रमना दीक्षितुलु ने कहा कि भगवान वेंकटेश्वर के इस मंदिर में पिछले पांच सालों से घटिया किस्म का घी लड्डू बनाने के लिए आ रहा था। तब उन्होंने अधिकारियों से इसकी शिकायत की थी, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। तो क्या आंध्र प्रदेश की पिछली सरकार में मंदिर में घटिया घी से लड्डू बनाकर भक्तों की आस्था का मजाक जानबूझकर और लंबे समय से बनाया जा रहा था? तिरुपति मंदिर में प्रसाद के रूप में वितरित किए जाने वाले लड्डू को ‘श्रीवारी लड्डू’ भी कहा जाता है। यह 300 से अधिक वर्षों से मंदिर का मुख्य प्रसाद रहा है। तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) की नई सरकार बनी तो मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने आरोप लगाया कि पिछली वाईएसआरसीपी सरकार लड्डू में मिलावट कर रही थी। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री ने दावा किया कि शुद्ध घी के स्थान पर पशु वसा का उपयोग किया जा रहा था, जिससे चिंताएं पैदा हुईं। नायडू ने मंगलगिरि में एक एनडीए की बैठक के दौरान कहा, ‘कई शिकायतों के बाद भी अधिकारी प्रसाद की पवित्रता बनाए रखने में विफल रहे।’ उन्होंने आगे कहा, ‘उन्होंने बुरा व्यवहार किया है… भगवान को चढ़ाया जाने वाला प्रसाद भी अशुद्ध है। न केवल मिलावटी सामग्री का उपयोग किया जाता है, बल्कि उन्होंने घी के बजाय पशु वसा का भी उपयोग किया है।’

वहीं, तिरुमाला मंदिर के पूर्व पुजारी रमना दीक्षितुलु ने शुक्रवार को कहा, ‘प्रसाद बनाने में इस्तेमाल होने वाले गाय के घी में बहुत सारी अशुद्धियां थीं और वह खराब क्वॉलिटी का था। मैंने यह बात कई साल पहले नोटिस की थी। मैंने इसे संबंधित अधिकारियों और ट्रस्ट बोर्ड के अध्यक्ष के सामने रखा, लेकिन उन्होंने तनिक भी परवाह नहीं की। तब मैंने अकेले संघर्ष किया था, लेकिन अब बातें फैल गई हैं।’ उन्होंने कहा, ‘ध्यान रखा जाना चाहिए कि ऐसे घोर पाप मंदिर में न दोहराए जाएं। यह एक पवित्र मंदिर है जिसमें करोड़ों भक्तों की बड़ी आस्था और भक्ति है।’ उन्होंने कहा कि नए प्रशासन ने सरकारी डेयरियों से शुद्ध घी मंगवाना शुरू कर दिया है। उन्होंने कहा, ‘नई सरकार ने सत्ता संभाली है और सभी गड़बड़ियों को दूर करने का वादा किया है। वे पहले ही सरकारी डेयरियों से गाय का शुद्ध घी खरीद चुके हैं और अब शुद्ध घी से खाने की सामग्री तैयार कर रहे हैं।’

नायडू सरकार ने घी की लैब टेस्टिंग गुजरात स्थित राष्ट्रीय डेयरी बोर्ड से करवाई और रिपोर्ट में पशु वसा की पुष्टि हुई। घी के नमूने में ‘बीफ टैलो, सुअर की चर्बी और मछली के तेल की मौजूदगी का पता चला है। नमूना 9 जुलाई, 2024 को लिया गया था और रिपोर्ट 16 जुलाई को आई थी। रिपोर्ट में संभावित बाहरी वसा की जानकार दी गई थी, जिनमें सोयाबीन, सूरजमुखी, जैतून, रेपसीड, अलसी, गेहूं के बीज, मक्का के बीज, बिनौला, मछली का तेल, नारियल और ताड़ की गिरी का तेल, ताड़ का तेल, बीफ टैलो और लार्ड शामिल हैं। ध्यान रहे कि टीडीपी से पहले आंध्र प्रदेश में वाएसआर कांग्रेस की सरकार थी और जगनमोहन रेड्डी प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। पूर्व पुजारी के दावे से सवाल खड़ा हो सकता है कि क्या जगनमोहन सरकार ने जानबूझकर हिंदुओं की आस्था से खिलवाड़ का सिलसिला शुरू किया और जब तक सत्ता में रही तब तक करोड़ों हिंदुओं की पवित्रता भंग करती रही?

बता दे कि नायडू सरकार ने सत्ता में वापस आते ही लड्डूओं के पारंपरिक स्वाद को वापस लाने के लिए नंदिनी घी की वापसी सुनिश्चित की।

तिरुपति लड्डूओं के सुरक्षा और स्वच्छता मानकों का मुद्दा 2016 में उठा था। उस वक्त कार्यकर्ता टी नरसिम्हा मूर्ति ने भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण में शिकायत दर्ज कराई थी। उनका आरोप था कि लड्डू बनाने में गंदी आदतों का इस्तेमाल किया जाता है। लड्डूओं में नट, बोल्ट और यहां तक कि पान पराग के कवर जैसी अजीब चीजें मिली थीं। याचिका में अनुरोध किया गया था कि खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के तहत लड्डूओं की गुणवत्ता, प्रमाणीकरण और बनाने के तरीकों का परीक्षण किया जाए।