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आखिर क्या है तिरुपति लडडू का चर्बी विवाद ?

आज हम आपको तिरुपति लडडू का चर्बी विवाद क्या है इसके बारे में जानकारी देने वाले हैं! तिरुपति बालाजी का मंदिर हिंदुओं का आस्था और भावना से जुड़ा एक ऐसा संगम है जिसके प्रसाद को खाकर करोड़ों भक्त खुद को धन्य मानते हैं। लेकिन कुछ दिन पहले मंदिर से मिलने वाले प्रसाद में जानवर की चर्बी होने का खुलासा हुआ। जिसके बाद से ये मामला काफी तूल पकड़ता जा रहा है। देशभर में इस मामले को लेकर आक्रोश का माहौल है। आइए जानते हैं कैसे तिरुपति मंदिर में मिलने वाला लड्डू विवादों में आ गया। दरअसल आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने पिछली वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP) सरकार पर लड्डू बनाने में इस्तेमाल होने वाले घी में बीफ टैलो, लार्ड और मछली के तेल के इस्तेमाल की अनुमति देने का आरोप लगाया है। नायडू ने गुजरात स्थित राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) की एक प्रयोगशाला रिपोर्ट का हवाला दिया। उन्होंने इसे केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि धार्मिक पवित्रता का अपमान भी बताया है।

राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह विवाद ऐसे समय पर आया है जब नायडू की तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) सत्ता में लौटी है। यह विवाद हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी अपील को मजबूत करने का मौका है। दूसरी ओर, YSRCP ने इन आरोपों का जोरदार खंडन किया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और TTD के पूर्व अध्यक्ष वाईवी सुब्बा रेड्डी ने नायडू पर राजनीतिक अवसरवाद का आरोप लगाया है। रेड्डी ने आंध्र के सीएम को चुनौती दी है कि वे अपने दावों को साबित करने के लिए भगवान वेंकटेश्वर के सामने शपथ लें।

ये पहली बार नहीं है जब तिरुपति लड्डू विवादों के केंद्र में हैं। पहले भी, लड्डू की तैयारी, वितरण और गुणवत्ता को लेकर मुद्दों पर बहस छिड़ चुकी है। पारंपरिक नुस्खा से विचलन और प्रसाद के कथित व्यावसायिक शोषण के बारे में शिकायतें मिली हैं। साल 2023 में तिरुपति लड्डू गुणवत्ता नियंत्रण के कारण चर्चा में आया था। उस वक्त यह बात सामने आई कि कर्नाटक मिल्क फेडरेशन (KMF) का प्रसिद्ध ‘नंदिनी’ घी अब लड्डू बनाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। KMF के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि उन्होंने तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) को घी की आपूर्ति के लिए निविदा प्रक्रिया में भाग लेने से इनकार कर दिया था। उनका कहना था कि वे कीमत (400 रुपये प्रति किलोग्राम) पर समझौता नहीं कर सकते।

नंदिनी घी दो दशकों से भी ज्यादा समय से तिरुपति लड्डू बनाने में एक महत्वपूर्ण सामग्री रहा है। जब एक दूसरी निजी कंपनी ने इसकी जगह ली, तो लड्डूओं के स्वाद और बनावट दोनों में गिरावट के बारे में भक्तों की शिकायतें बढ़ गईं। लड्डू की तैयारी में घी एक अहम भूमिका निभाता है। यह इस पवित्र मिठाई में समृद्धि और स्वाद जोड़ता है। नंदिनी के घी को इसकी उच्च गुणवत्ता के लिए जाना जाता था। विवाद बढ़ने पर फरवरी 2024 में, नायडू सरकार ने सत्ता में वापस आते ही लड्डूओं के पारंपरिक स्वाद को वापस लाने के लिए नंदिनी घी की वापसी सुनिश्चित की।

तिरुपति लड्डूओं के सुरक्षा और स्वच्छता मानकों का मुद्दा 2016 में उठा था। उस वक्त कार्यकर्ता टी नरसिम्हा मूर्ति ने भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) में शिकायत दर्ज कराई थी। उनका आरोप था कि लड्डू बनाने में गंदी आदतों का इस्तेमाल किया जाता है। लड्डूओं में नट, बोल्ट और यहां तक कि पान पराग के कवर जैसी अजीब चीजें मिली थीं। याचिका में अनुरोध किया गया था कि खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के तहत लड्डूओं की गुणवत्ता, प्रमाणीकरण और बनाने के तरीकों का परीक्षण किया जाए।

इसके जवाब में, FSSAI ने 1 अगस्त, 2016 को बताया कि आंध्र प्रदेश सरकार और तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) के कार्यकारी अधिकारी को दावों की जांच करने और खाद्य सुरक्षा नियमों का अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। TTD ने शुरुआत में इसका विरोध किया। उनका तर्क था कि प्रसाद होने के कारण, लड्डू खाद्य सुरक्षा मानदंडों के अधीन नहीं थे। लेकिन FSSAI ने कहा कि मानव उपभोग के लिए बनी कोई भी चीज उसके दायरे में आती है। इसके कारण लड्डुओं को तैयार करने और उनका निरीक्षण करने के तरीके में आवश्यक बदलाव किए गए। इस प्रकार सुरक्षा के मुख्य मुद्दे को हल किया गया।

वहीं अप्रैल 2012 में, चित्तूर के 32 वर्षीय सुनार सूरे रेडप्पा को तिरुमाला मंदिर में दर्शन के बाद खरीदे गए 16 लड्डूओं में से एक में सोने की वस्तु मिली।रेड्डप्पा इतने खुश हुए कि उन्होंने इस खोज को भगवान वेंकटेश्वर के संकेत के रूप में लिया। यह संकेत उन्हें एक सुनार के रूप में अपना पेशा जारी रखने के लिए प्रेरित कर रहा था। बाली का वजन 400 मिलीग्राम था और इसकी कीमत लगभग 1,500 रुपये थी। टाइम्स ऑफ इंडिया से फोन पर उन्होंने बताया कि हमने शुक्रवार जैसे शुभ दिन पर पूजा की और लड्डू में यह पाया, यह एक आशीर्वाद की तरह लगा। इसी तरह कुछ सालों बाद एक भक्त को लड्डू में चाभी का छल्ला मिला।

आखिर भारत का नया टोल सिस्टम कैसे करेगा काम जानिए?

आज हम आपको भारत के नए टोल सिस्टम के बारे में जानकारी देने वाले हैं! भारत में अगले साल से एनएचएआई की टोल रोड पर शुरू हो रहे ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS) के तहत टोल टैक्स की चोरी करने वालों दोगुना खर्च करना पड़ सकता है। इसके लिए केंद्रीय सड़क, परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय कई स्तर पर तैयारियां कर रहा है। इसमें टोल की चोरी करने वाली गाड़ियों के पॉल्यूशन और फिटनेस सर्टिफिकेट तो रोक ही लिए जाएंगे, बल्कि उनसे डबल टोल भी वसूला जाएगा। इसके साथ ही एक्सप्रेस-वे के बीच में ऐसी स्पेशल मोबाइल वैन तैनात की जाएंगी, जो उन गाड़ियों के नंबर नोट करेगी। नियम तोड़ने वाले वाहनों के ऑन बोर्ड यूनिट यानी ऑटोमैटिक टोल टैक्स कटने वाला सिस्टम भी बंद किया जा सकता है। अधिकारियों ने बताया कि असल में दुबई, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया समेत अन्य विभिन्न देशों में चल रहे जीएनएसएस के तहत टोल लेने वाली प्रक्रिया से इतर भारत का सिस्टम थोड़ा अलग है। यहां फास्टैग से भी टोल चोरी करने की कोशिश करते हैं। ऐसे में कुछ गाड़ी वाले जीएनएसएस के तहत टोल लेने वाले सिस्टम में भी टोल की चोरी करने का प्रयास करेंगे। इनके लिए भारत मॉडल तैयार किया जा रहा है। 20 किलोमीटर की यात्रा तक कोई टोल नहीं देना होगा। सैटेलाइट से टोल लेने वाले इस जीएनएसएस सिस्टम का ट्रायल कुछ हाईवे पर हो चुका है। इसमें पायलट प्रोजेक्ट के रूप में कर्नाटक में एनएच-275 के बेंगलुरु-मैसूर खंड और हरियाणा में एनएच-709 के पानीपत-हिसार खंड पर ट्रायल किया गया था।जिसमें जो भी कार, बस, ट्रक या टोल देने वाली अन्य कोई भी गाड़ी वाला किसी भी रूप में टोल की चोरी करते पाया जाएगा। उसके खिलाफ सख्त से सख्त एक्शन लिया जाएगा।

कोई गाड़ी वाला अगर अपने अकाउंट में बिना पैसे रखे गाड़ी को टोल रोड पर ले आएगा तो उसकी गाड़ी को बीच में कहीं रोका तो नहीं जाएगा। मगर जब भी वह अपनी गाड़ी का पॉल्यूशन या फिटनेस कराएगा तब पहले उसे टोल भरना होगा। ऐसी गाड़ी बिना टोल भरे बेची भी नहीं जा सकेंगी। टोल चोरी करने वाली ऐसी तमाम गाड़ी वालों से हर्जाने के रूप में डबल टोल वसूला जाएगा। बार-बार टोल चोरी करने वाली गाड़ी वालों के खिलाफ बड़ी पेनल्टी भी लगाने का प्रावधान किया जा रहा है।

इसके अलावा उन गाड़ियों को पकड़ना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। जो गाड़ी वाले अपनी गाड़ियों में लगे ओबीयू को ही बंद कर देंगे या हटाकर हाईवे पर चलेंगे। ऐसी गाड़ियों को पकड़ने के लिए खास सॉफ्टवेयर से लैस मोबाइल वैन हाईवे के बीच-बीच में लगाई जाएंगी। जो ऐसी गाड़ियों के नंबर नोट कर उनके रजिस्ट्रेशन नंबर पर डबल टोल के साथ चालान उनके घर भेजेंगी। शुरूआत में मोबाइल वैन लगाई जाएंगी, बाद में इस खास सॉफ्टवेयर से लैस कैमरे एक्सप्रेस-वे पर लगाने शुरू कर दिए जाएंगे। इसलिए सैटेलाइट सिस्टम में टोल चोरी करना गाड़ी वालों के लिए खासा महंगा पड़ेगा।

बता दे कि फिलहाल सैटेलाइट से टोल लेने वाला सिस्टम केवल कमर्शियल गाड़ियों पर लागू होगा। नॉटिफिकेशन के मुताबिक, नेशनल परमिट वाले वाहनों को छोड़कर कोई अन्य वाहन चालक अगर नेशनल हाईवे, बाईपास, टनल या ब्रिज का इस्तेमाल करता है, जो जीपीएस आधारित टोल सिस्टम से लैस है, तो इसे प्रत्येक दिशा में 20 किलोमीटर की यात्रा तक कोई टोल नहीं देना होगा। सैटेलाइट से टोल लेने वाले इस जीएनएसएस सिस्टम का ट्रायल कुछ हाईवे पर हो चुका है। इसमें पायलट प्रोजेक्ट के रूप में कर्नाटक में एनएच-275 के बेंगलुरु-मैसूर खंड और हरियाणा में एनएच-709 के पानीपत-हिसार खंड पर ट्रायल किया गया था।

इस तकनीक में टोल के लिए ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS) का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके लिए गाड़ियों में ऑन-बोर्ड यूनिट्स (OBU) और ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS) लगा होगा। बता दें कि फास्टैग से भी टोल चोरी करने की कोशिश करते हैं। ऐसे में कुछ गाड़ी वाले जीएनएसएस के तहत टोल लेने वाले सिस्टम में भी टोल की चोरी करने का प्रयास करेंगे। इनके लिए भारत मॉडल तैयार किया जा रहा है। जिसमें जो भी कार, बस, ट्रक या टोल देने वाली अन्य कोई भी गाड़ी वाला किसी भी रूप में टोल की चोरी करते पाया जाएगा। ये सिस्टम मौजूदा फास्टटैग से अलग होगा। जब एक बार देशभर में ये सिस्टम शुरू हो जाएगा तो कहीं भी टोल नाके की जरूरत नहीं होगी। जब वाहन हाईवे पर एंट्री लेगा और जहां एग्जिट करेगा, उसके हिसाब से टोल कट जाएगा।

आखिर क्या है MQ-9B किलर ड्रोन की खासियत?

आज हम आपको MQ-9B किलर ड्रोन की खासियत बताने जा रहे हैं! पीएम मोदी इस वक्त अमेरिका के दौरे पर हैं। इस दौरान पीएम मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के साथ द्विपक्षीय वार्ता में ड्रोन डील के रोड मैप की चर्चा की। अमेरिका ने भी भारत के 31 MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन की खरीदने के फैसले का स्वागत किया है। ये डील दोनों देशों के रक्षा साझेदारी को बढ़ावा देगा, जिसमें सैन्य इंटरऑपरेबिलिटी, इंटेलिजेंस-शेयरिंग, स्पेस और साइबर सहयोग शामिल हैं। बता दें कि भारत-अमेरिका के बीच ये ड्रोन डील अक्टूबर में होगी। जिसमें भारत अमेरिका से नौसेना, सेना और वायुसेना के लिए ड्रोन खरीदेगा। भारत अमेरिका से 31 MQ-9B ‘हंटर-किलर’ प्रीडेटर ड्रोन खरीदने जा रहा है। यह डील लगभग 3.9 बिलियन डॉलर की है। यह डील दोनों देशों के बीच रक्षा साझेदारी का हिस्सा है। इसके तहत दोनों देश अपनी सेनाओं के बीच तालमेल मजबूत होगा। इसके साथ ही दोनों देशों की सेना खुफिया जानकारी साझा करेगी। भारत और अमेरिकी की इस डील पर चीन की नजर बनी हुई है।

बता दें कि यह डील सरकारी स्तर पर होगी, जिसमें भारत 31 ऊंचाई और लंबी दूरी तक उड़ान भरने वाले रिमोट से चलने वाले विमान (RPA) खरीदेगा। इसमें 15 सी गार्जियन ड्रोन नौसेना के लिए और 8-8 स्काई गार्जियन थल सेना और वायुसेना के लिए होंगे। मोदी-बाइडेन वार्ता के बाद जारी एक संयुक्त बयान में कहा गया कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने 31 जनरल एटॉमिक्स MQ-9Bs और उनसे जुड़े उपकरणों की खरीद के लिए भारत द्वारा की जा रही प्रगति का स्वागत किया, जिससे सभी क्षेत्रों में भारत की सशस्त्र सेनाओं की खुफिया, निगरानी और टोही (ISR) क्षमताओं में वृद्धि होगी। बता दें कि अभी तक ऐसी किसी संयुक्त परियोजना पर मुहर नहीं लग पाई है, लेकिन मोदी और बाइडेन ने रोडमैप तैयार कर लिया गया है।

MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन एक अत्याधुनिक मानवरहित हवाई वाहन (UAV) है, जिसे रिमोट से संचालित किया जाता है। इसे प्रीडेटर के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह हथियारों से लैस होता है। यह ड्रोन हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस (HALE) की श्रेणी में आता है और 40 घंटे से अधिक समय तक उड़ान भर सकता है। MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन एक अत्यंत उन्नत तकनीक वाला ड्रोन है जो अपनी कई खास विशेषताओं के लिए जाना जाता है। यह 50,000 फीट से अधिक की ऊंचाई तक उड़ सकता है और इसकी अधिकतम गति 442 किलोमीटर प्रति घंटा है। इसकी लंबी रेंज 1850 किलोमीटर है और यह 2177 किलोग्राम तक का भार उठा सकता है। इस ड्रोन को लेजर गाइडेड मिसाइल, एंटी टैंक मिसाइल और एंटी शिप मिसाइल जैसे विभिन्न प्रकार के हथियारों से लैस किया जा सकता है।यह ड्रोन निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने और आक्रामक अभियानों के लिए उपयोग किया जाता है। अमेरिका ने 2022 में अलकायदा के नेता अयमान अल-जवाहिरी को मार गिराने के लिए इसी ड्रोन का उपयोग किया था।

यही नहीं रक्षा मंत्रालय की अनुबंध बातचीत समिति की रिपोर्ट मंजूर कर ली गई है। एक सूत्र ने बताया, ‘अनुबंध पर अक्टूबर के मध्य में हस्ताक्षर होने की उम्मीद है। लागत, यहां एक MRO (रखरखाव, मरम्मत, ओवरहाल) सुविधा की स्थापना, प्रदर्शन-आधारित लॉजिस्टिक सहायता और ऐसे अन्य मुद्दों को कठिन बातचीत के बाद अंतिम रूप दे दिया गया है।’ हालांकि इस सौदे में कोई सीधा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (ToT) नहीं होगा, लेकिन 31 दूर से संचालित विमानों को यहां इकट्ठा किया जाएगा। ड्रोन-निर्माता जनरल एटॉमिक्स भारत में निवेश करेगा और 30 प्रतिशत से ज्यादा घटकों की सोर्सिंग भारतीय कंपनियों से करेगा। ड्रोन-निर्माता जनरल एटॉमिक्स स्वदेशी रूप से ऐसे उच्च-ऊंचाई वाले, डेवलेप ड्रोन विकसित करने के लिए DRDO और अन्य को गाइड भी करेगा।

पिछले महीने खबर आई थी कि भारत इस सौदे के लिए तकनीकी-व्यावसायिक बातचीत में तेजी ला रहा है। इस सौदे के तहत 15 सी गार्जियन ड्रोन नौसेना के लिए और 8-8 स्काई गार्जियन सेना और भारतीय वायुसेना के लिए रखे गए हैं। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब चीन और पाकिस्तान दोनों ही अपने सशस्त्र UAV के बेड़े को लगातार बढ़ा रहे हैं।

लगभग 40 घंटे तक 40,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर उड़ान भरने के लिए डिज़ाइन किए गए, 31 MQ-9B ड्रोन 170 हेलफायर मिसाइलों, 310 GBU-39B सटीक-निर्देशित ग्लाइड बम, नेविगेशन सिस्टम, सेंसर सूट और मोबाइल ग्राउंड कंट्रोल सिस्टम के साथ आएंगे। भारत भविष्य में ड्रोन को स्वदेशी हथियारों से भी लैस करेगा, जिसमें DRDO द्वारा विकसित की जा रही नौसैनिक शॉर्ट-रेंज एंटी-शिप मिसाइल (NASM-SR) भी शामिल हैं। लंबी दूरी के रणनीतिक ISR (खुफिया, निगरानी, टोही) मिशन और क्षितिज के ऊपर लक्ष्यीकरण के अलावा, ड्रोन युद्ध-विरोधी और पनडुब्बी-रोधी युद्ध संचालन कर सकते हैं।

यह हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में चीनी नौसेना की बढ़ती मौजूदगी में जरूरी हो जाता है, इसकी पनडुब्बियां जमीनी सीमाओं के बाद समुद्री क्षेत्र में भारत के लिए एक बड़ी रणनीतिक चुनौती पेश करने में सक्षम हैं। एक अधिकारी ने कहा, ‘चीन IOR में अपने सर्वे और रिसर्च जहाजों को व्यवस्थित रूप से तैनात कर रहा है ताकि पानी के नीचे डोमेन जागरूकता और पनडुब्बी संचालन के लिए उपयोगी महासागरीय और अन्य डेटा का नक्शा बनाया जा सके। चीनी परमाणु-संचालित पनडुब्बियां, जो अब तक कभी-कभार IOR में आती हैं, निकट भविष्य में इस क्षेत्र में नियमित तैनाती पर होंगी।’

भारत को उम्मीद है कि उसे दो से तीन वर्षों में लड़ाकू आकार के ड्रोन की शुरुआती डिलीवरी मिल जाएगी, और वह IOR के लिए अराकोणम और पोरबंदर और भूमि सीमाओं के लिए सरसावा और गोरखपुर में ISR कमांड और नियंत्रण केंद्रों पर उन्हें तैनात करने की योजना बना रहा है।

आईएसएल में मोहम्मडन की पहली जीत, फैनेयर्स ने चेन्नईयिन एफसी को हराया चेन्नई

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मोहम्मडन ने चेन्नईयिन एफसी के खिलाफ जीत हासिल की। यह आईएसएल में उनकी पहली जीत है। उन्होंने तीन मैचों में चार अंक बटोरे। लालरेमसंगा फनाई ने चेन्नईयिन एफसी के खिलाफ गोल किया। आईएसएल में मोहम्मडन एससी की पहली जीत. इस लीग में कोलकाता के तीन क्लब खेल रहे हैं. मोहन बागान सुपर जाइंट्स और ईस्ट बंगाल के बाद मोहम्मडन ने आईएसएल में जगह बनाई। वे आई-लीग जीतने के बाद आईएसएल में आए। ब्लैक एंड व्हाइट ब्रिगेड ने गुरुवार को अवे मैच जीत लिया।

मोहम्मडन ने गुरुवार को चेन्नईयिन एफसी के खिलाफ जीत हासिल की। उन्होंने तीन मैचों में चार अंक बटोरे। लालरेमसंगा फनाई ने चेन्नईयिन एफसी के खिलाफ गोल किया। उन्होंने मैच का एकमात्र गोल 39वें मिनट में किया.

मोहम्मडन ने इस बार आईएसएल में पहले दो मैच घरेलू मैदान पर खेले। लेकिन जीत नहीं सके. मोहम्मडन डूरंड कप विजेता नॉर्थईस्ट यूनाइटेड के खिलाफ पहला मैच हार गया। उन्होंने दूसरे मैच में एफसी गोवा के खिलाफ ड्रा खेला। गुरुवार का मैच चेन्नईयिन एफसी के खिलाफ था। उस मैच को जीतकर मोहम्मडन ने आईएसएल में पहली जीत का मुंह देखा.

39 मिनट बाद फैनाई को गेंद चेन्नइयन के बॉक्स में मिली. मोहम्मडन के आक्रामक खिलाड़ी ने गेंद को नेट में डालने में कोई गलती नहीं की. उन्होंने चेन्नईयिन की रक्षा में कमियां दिखाईं। मोहम्मडन क्लब के 133 साल के इतिहास में फनाई हुई। मिजोरम के इस युवा फुटबॉलर ने मोहम्मडन को आईएसएल में पहली जीत दिलाई. पहले हाफ में आगे बढ़ने के बाद डिफेंस ने ब्लैक एंड व्हाइट ब्रिगेड को बरकरार रखा। चेन्नईयिन बार-बार दाएँ फ़्लैंक पर हमला करने की कोशिश कर रही थी। मोहन बागान के पूर्व फुटबॉलर कियान नासिरी ने इस मैच में चेन्नईयिन जर्सी की शुरुआत की। लेकिन वह टीम को जीत नहीं दिला सके. चेन्नईयिन के युवा बंगाली गोलकीपर शमिक मित्रा ने कई अचूक गोल बचाए. अन्यथा चेन्नइयन अधिक गोल से हार सकती थी। (यह खबर अभी प्रकाशित हुई है। विवरण जल्द ही आ रहे हैं। कुछ देर बाद पेज को ‘रिफ्रेश’ करें, आपको ताजा खबर दिखेगी। तेजी से खबर पहुंचाते समय भी हमें सूचना की सच्चाई से अवगत रहना होगा। इसलिए कोई भी ‘खबर’ ‘ (‘फर्जी समाचार’ के समय में यह दृष्टिकोण और भी महत्वपूर्ण है)

दिमित्री पेट्राटोस मोहन बागान सुपर जाइंट्स की उम्मीदों में से एक हैं। पिछले सीज़न में अकेले 10 गोल किये थे। टीम ने आईएसएल लीग जीती। लेकिन इस बार भी वह उस तरह से ध्यान नहीं खींच पाए. आप स्वयं खुश नहीं रह सकते.

मोहन बागान शनिवार को बेंगलुरू के खिलाफ खेलेगा. यह मोहन बागान का इस सीजन में आईएसएल में पहला मैच होगा। इससे पहले पेट्राटोस ने कहा था कि वह अपने खेल से खुश नहीं हैं। पेट्राटोस ने कहा, “मैं अपने खेल से कभी खुश नहीं हूं।” पिछले सीज़न में भी नहीं. फुटबॉल में हमेशा सुधार की गुंजाइश रहती है।’ मैं वह प्रयास करता हूं. सीज़न अभी शुरू हुआ है. मैं अभी भी अपने खेल से खुश नहीं हूं. उम्मीद है कि आने वाले दिनों में इसमें सुधार होगा।”

कोच जोस मोलिना बाहर के मैचों को लेकर ज्यादा चिंतित नहीं हैं। उन्होंने कहा, ”मैं यह नहीं सोचता कि मैं किस मैदान पर खेल रहा हूं, या किस टीम के खिलाफ खेल रहा हूं. अगला मैच बैंगलोर से है. वे इस सीजन अच्छा खेल रहे हैं. मैंने योजना बना ली है कि उनके खिलाफ कैसे खेलना है।’ लेकिन आउटडोर मैदान में खेलने के लिए अलग से कोई तैयारी नहीं होती।”

पेट्राटोस ने कहा कि वह वैसा ही खेलना चाहता है जैसा कोच उससे कहता है। मोहन बागान के आक्रामक फुटबॉलर ने कहा, “कोच की अपनी योजना है।” हम वैसे ही खेलेंगे जैसे वह हमें खेलने के लिए कहेंगे।”

पिछले मैच में कोच ने जेमी मैक्लारेन को बाहर कर दिया था. लेकिन उन्होंने आखिरी 15 मिनट खेले. पेट्राटोस ने कहा, “मैं मैक्लारेन के साथ पहले भी खेल चुका हूं।” वह बहुत अच्छे फुटबॉलर हैं. वह जल्दी ठीक होने की कोशिश कर रहे हैं. धीरे-धीरे मैच खेलने के लिए तैयार हो रहा हूं. उम्मीद है कि हम जल्द ही एक साथ खेलेंगे।” मोहन बागान शनिवार को बेंगलुरू के खिलाफ खेलेगा. यह मोहन बागान का इस सीजन में आईएसएल में पहला मैच होगा। इससे पहले पेट्राटोस ने कहा था कि वह अपने खेल से खुश नहीं हैं। पेट्राटोस ने कहा, “मैं अपने खेल से कभी खुश नहीं हूं।” पिछले सीज़न में भी नहीं. फुटबॉल में हमेशा सुधार की गुंजाइश रहती है।’ मैं वह प्रयास करता हूं. सीज़न अभी शुरू हुआ है. मैं अभी भी अपने खेल से खुश नहीं हूं. उम्मीद है कि आने वाले दिनों में इसमें सुधार होगा।”

चश्मा स्मार्ट हैं! इसे मेटा-मास्टर जुकरबर्ग ने पहना है! मूल्य कितना है? इससे क्या होता है?

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बिल्कुल स्मार्टफोन की तरह. स्मार्ट चश्मे में कैमरा, स्पीकर, माइक्रोफोन भी होते हैं। एआई प्रौद्योगिकियां, प्रोसेसर और बहुत कुछ हैं। मार्क जुकरबर्ग ने बुधवार रात अपनी फेसबुक प्रोफाइल तस्वीर बदल दी। तस्वीर में जुकरबर्ग की आंखों पर चश्मा लगा हुआ है. मेटा-मास्टर आमतौर पर चश्मा नहीं पहनते हैं। कुछ महीने पहले अंबानी अपनी पत्नी की शादी के मौके पर भारत आए थे। अनंत अंबानी की घड़ी पर झुकने से पहले जुकरबर्ग ने दूर से तालियां बजाईं। तब भी उन्हें चश्मा पहने नहीं देखा गया था. हालांकि, बुधवार को उन्होंने फेसबुक पर चश्मा पहनकर जो तस्वीर पोस्ट की, वह वही चश्मा नहीं है। वे चश्मे वे सभी काम करने में सक्षम हैं जो तेज़ नज़र वाले जेम्स बॉन्ड, शर्लक होम्स या फेलुदारा अगर असली पात्र होते तो ऐसे चश्मे पहनना चाहते! दूसरी ओर, वह इसे संग्रह में रखना चाहता था।

क्योंकि, मेटा का कहना है, वे चश्मे न केवल दृष्टि को स्पष्ट बनाते हैं, बल्कि कई ऐसी चीजें भी ला सकते हैं जो दृष्टि के लिए अदृश्य हैं! और भी बहुत कुछ कर सकते हैं.

बुधवार को मेटर का ‘कनेक्ट 2024’ कार्यक्रम था। वहां, मेटा ने नया एआई सक्षम ‘रे बैन मेटा ऑगमेंटेड रियलिटी ग्लासेस’ जारी किया। फेसबुक-व्हाट्सएप-इंस्टाग्राम की मूल कंपनी मेटा ने सितंबर 2023 में चश्मे की सूचना दी। सामने आया स्मार्ट चश्मा! बिल्कुल स्मार्टफोन की तरह. स्मार्ट चश्मे में कैमरा, स्पीकर, माइक्रोफोन भी होते हैं। एआई प्रौद्योगिकियां, प्रोसेसर और बहुत कुछ हैं। जिसकी मदद से बिना जेब या बैग से फोन निकाले सिर्फ चश्मे की मदद से व्हाट्सएप या मैसेंजर पर आसानी से मैसेज भेजा जा सकता है। चश्मा अपने ‘मालिक’ के लिए भी बहुत सारी जानकारी याद रखेगा। ऐसी जानकारी जो भविष्य में काम आ सकती है. सुदूर सड़कों पर खतरों की पूर्व चेतावनी से लेकर अच्छा भोजन कहां मिलेगा- यहां तक ​​कि कानों में विदेशी भाषाओं का अनुवाद करना भी। ऐसा स्मार्ट चश्मा.

लगभग एक साल पहले लॉन्च होने के बावजूद, मेटर स्मार्ट ग्लास में अभी भी कई नवीनतम एआई प्रौद्योगिकी विशेषताएं हैं। मेटा ने अपने ‘कनेक्ट 2024’ में कहा, उन्होंने चश्मे के नए संस्करण में विभिन्न तरीकों से एआई तकनीक का उपयोग किया है। मेटा में स्मार्ट फोन पर Google Assistant या Apple के Siri जैसा AI असिस्टेंट भी है। यदि आप उसे ‘हे ​​मेटा’ कहते हैं, तो वह कमांड को पूरा करने के लिए अलादीन के दीपक राक्षस की तरह दिखाई देगा। लेकिन आपको अगली बात कहने के लिए बार-बार ‘हे मेटा’ कहने की जरूरत नहीं है। यदि आपका कोई प्रश्न हो तो वह तुरंत उत्तर देगा।

कनेक्ट 2024 में, मेटा ने स्मार्ट ग्लास के कई मॉडल का अनावरण किया। इनमें से एक यह है कि फ्रेम और ग्लास दोनों पारदर्शी हैं। यह दिखाता है कि चश्मे के अंदर तकनीक कहां है। कैमरा, स्पीकर, प्रोसेसर, माइक्रोफ़ोन – सब कुछ देखा जा सकता है। जुकरबर्ग ने चश्मा पहने हुए अपनी एक तस्वीर फेसबुक पर पोस्ट की। मेटा ने लिखा, “स्पष्ट, चमकीला रे-बैन-मेटा अभी आया है,” प्रत्येक जोड़ी स्मार्ट चश्मे की कीमत $299 से शुरू होती है। यानी भारतीय मुद्रा में 25 हजार रुपये से शुरुआत. अमेरिका के निवर्तमान राष्ट्रपति जो बिडेन ने देश में कोरोना की स्थिति समेत विभिन्न मुद्दों को ‘सेंसर’ करने के लिए मेटा पर दबाव डाला! फेसबुक के निर्माता मार्क जुकरबर्ग ने अमेरिकी कांग्रेस को भेजे पत्र में यह दावा किया है.

अमेरिकी सदन के प्रतिनिधि को संबोधित पत्र में जुकरबर्ग ने लिखा, ”2021 में व्हाइट हाउस समेत बाइडन प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने कोरोना की स्थिति को छिपाने के लिए ‘मेटा’ पर दबाव डाला होगा.” इसके अलावा अन्य चीजों को ‘सेंसर’ कर दिया गया. हम नहीं माने तो नाराज़ हो जाते हैं. हालाँकि यह अंततः हमें तय करना था कि कौन सी सामग्री रखी जाएगी और कौन सी नहीं, मुझे अब एहसास हुआ कि उस समय हमें और अधिक स्पष्टवादी होना चाहिए था। मुझे माफ़ करें बाइडेन प्रशासन ने जो किया है वह गलत है.”

जुकरबर्ग ने यह भी कहा कि मेटा बाहर से किसी भी दबाव के सामने अपने नियम नहीं बदलेगा। यदि भविष्य में ऐसी कोई घटना होती है तो वे इसका पुरजोर विरोध करेंगे। इसके अलावा उन्होंने लिखा, ”उस वक्त बिडेन के परिवार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे. शुरुआत में पता चला कि खबर फर्जी है. ये फर्जी खबर रूस फैला रहा है. फिर हम खबर की प्रामाणिकता की जांच करने के लिए पोस्ट को हटा देते हैं। लेकिन बाद में हमें पता चला कि इस खबर को फैलाने में रूस का कोई हाथ नहीं था. हमें पोस्ट हटाना भी अनुचित लगा. हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों।’ भविष्य में हम सच्चाई की जांच किए बिना पोस्ट नहीं हटाएंगे.” फेसबुक बॉस कहते हैं, नहीं! वह पक्ष में नहीं है! वे किसी के दबाव में मेटा के नियम नहीं बदल रहे हैं. अब उनका लक्ष्य तटस्थ रहना है.

मीरपुर में आखिरी टेस्ट खेलना चाहते हैं शाकिब, बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड नहीं लेगा सुरक्षा की जिम्मेदारी

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दक्षिण अफ़्रीकी टीम अक्टूबर में बांग्लादेश में खेलने जाएगी. शाकिब उस सीरीज में मीरपुर में खेलने के बाद टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लेना चाहते हैं. लेकिन क्या घर लौटने पर आपको पर्याप्त सुरक्षा मिलेगी? बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (बीसीबी) जिम्मेदारी नहीं लेगा. शाकिब अल हसन अपने करियर का आखिरी टेस्ट मीरपुर में खेलना चाहते हैं. यह बात उन्होंने गुरुवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कही. खुद को टी20 टीम में नहीं देख रहे. हालांकि, दक्षिण अफ्रीका अक्टूबर में बांग्लादेश में खेलने जाएगा। शाकिब उस सीरीज में मीरपुर में खेलने के बाद टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लेना चाहते हैं. लेकिन क्या घर लौटने पर आपको पर्याप्त सुरक्षा मिलेगी? बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (बीसीबी) जिम्मेदारी नहीं लेगा.

शाकिब ने कानपुर में टेस्ट और टी20 से संन्यास की घोषणा की. उन्होंने यह भी कहा कि अगर उन्हें पर्याप्त सुरक्षा दी जाए तो वह आखिरी टेस्ट देश की धरती पर खेलना चाहते हैं. हालांकि, बीसीबी अध्यक्ष फारूक अहमद ने कहा कि सुरक्षा मुहैया कराने का मामला उनके हाथ में नहीं है.

गुरुवार को बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड की बैठक हुई. इसके बाद फारूक ने मीडिया से कहा, ”सुरक्षा का मुद्दा हमारे हाथ में नहीं है. इस पर फैसला शाकिब को लेना है. बोर्ड कुछ नहीं कह सकता. बोर्ड किसी व्यक्ति विशेष को व्यक्तिगत सुरक्षा प्रदान करने का जोखिम नहीं उठा सकता। साथ ही उन्होंने कहा, ”सुरक्षा का मुद्दा सरकार के उच्चतम स्तर पर तय किया जाना चाहिए. बीसीबी कोई एजेंसी नहीं है, न ही पुलिस है। हमें यह जानना होगा कि सरकार सुरक्षा मुहैया कराएगी या नहीं.” हालांकि, बीसीबी अध्यक्ष फारूक चाहते हैं कि शाकिब अपने करियर का आखिरी टेस्ट घरेलू धरती पर खेलें। फारूक ने कहा, ”अगर शाकिब भी उनकी तरह देश की धरती पर आखिरी टेस्ट खेल सकते हैं तो मेरा भी मानना ​​है कि इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता.”

बीसीबी अध्यक्ष ने यह भी कहा कि शाकिब की सेवानिवृत्ति की घोषणा उनका अपना निर्णय था। फारूक ने कहा, ”शाकिब इस वक्त अपनी जिंदगी के बेहद बुरे दौर से गुजर रहे हैं। हमने बोर्ड की ओर से उन्हें कुछ भी समझाने की कोशिश नहीं की.’ उन्हें लगा कि यह उनके लिए संन्यास लेने का सही समय है। मैं उनके फैसले का सम्मान करता हूं।”

बांग्लादेश में चुनाव जीतकर शाकिब संसद सदस्य बने. लेकिन 5 अगस्त को शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से वह देश नहीं लौटे हैं. पाकिस्तान के खिलाफ टेस्ट खेला. इंग्लैंड में काउंटी क्रिकेट खेला. अब भारत के खिलाफ टेस्ट सीरीज खेल रहे हैं. सरकार गिरने के बाद शाकिब समेत 147 लोगों पर हत्या का मामला चला. शाकिब को नहीं पता कि घर लौटने पर उसे गिरफ्तार किया जाएगा या नहीं.

बांग्लादेश के पूर्व कप्तान ने गुरुवार को कहा, ”मैं आखिरी टेस्ट मीरपुर में खेलना चाहता हूं. मैं बांग्लादेश जाने के बारे में नहीं सोच रहा हूं. मेरी चिंता वहां से निकलने की है. मैंने इस बारे में बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड से बात की है। वे प्रयास कर रहे हैं अन्यथा, कानपुर मेरा आखिरी टेस्ट होगा।”

शाकिब अल हसन ने अंतरराष्ट्रीय टी20 से संन्यास की घोषणा की. वह देश के लिए छोटे फॉर्मेट में नजर नहीं आएंगे. शाकिब उन दो क्रिकेटरों में से एक हैं जिन्होंने 2007 से 2024 तक हर टी20 विश्व कप में खेला है। इस साल विश्व कप जीतने के बाद एक और भारतीय क्रिकेटर रोहित शर्मा ने संन्यास ले लिया। इस बार शाकिब ने संन्यास ले लिया. यानी रोहित की तरह टी20 वर्ल्ड कप शाकिब की ट्वेंटी20 फॉर्मेट में आखिरी सीरीज बन गई.

भारत के खिलाफ कानपुर में दूसरा टेस्ट खेलने से पहले शाकिब ने पत्रकारों से अपने संन्यास के बारे में बात की. सिर्फ टी20 ही नहीं बल्कि उन्होंने ये भी बताया कि वो बाकी दोनों फॉर्मेट से कब संन्यास लेंगे. इसके बाद अटकलें शुरू हो गईं कि क्या बांग्लादेशी क्रिकेटर अपना आखिरी टेस्ट कानपुर में खेलेंगे?

टी20 से अपने संन्यास के बारे में बात करते हुए शाकिब ने कहा, ”मुझे लगता है कि यह पद छोड़ने का सही समय है. नये लोगों को मौका मिलना चाहिए. मैंने टी20 को लेकर बोर्ड के सभी सदस्यों, चयनकर्ताओं और अध्यक्ष से बात की है. फिलहाल अगली सीरीज में नए खिलाड़ियों को आने दीजिए. उन्हें एक मौका दिया जाए।”

लेकिन साथ ही शाकिब ने संन्यास से वापसी का मौका भी छोड़ दिया. उन्होंने कहा, ”मैं फ्रेंचाइजी लीग खेलना जारी रखता हूं। छह महीने, एक साल के बाद अगर बीसीबी को लगता है कि मैं प्रदर्शन कर रहा हूं और फिट हूं तो मैं पुनर्विचार कर सकता हूं। लेकिन अभी मैं खुद को टी-20 में नहीं देखता हूं।”

क्या पलकें उड़ते समय एक जैसी नहीं होतीं? एयरमैन ने बताया जल्दी नींद आने का तरीका

जैसा कि नाम से पता चलता है – कुछ ऐसा जो नींद के समय को बढ़ाने या नींद को बेहतर और गहरी बनाने में मदद करता है। पिछले कुछ दिनों से उन सभी नींद के अनुकूल तरीकों पर चर्चा हो रही है। शुद्ध, उत्तम 6-7 घंटे की नींद। आखिरी बार आप सप्ताह के सात दिनों में से कम से कम चार दिन इस तरह कब सोए थे? क्या आप याद कर सकते हैं? आप क्या प्रश्न सोच रहे हैं! इस दौर में ऐसा सवाल मन में आता है या क्यों! तो चलिए प्रश्न को और सरल बनाते हैं – क्या सप्ताह में कम से कम 2-3 दिन शुद्ध 6 घंटे की नींद होती है? मोटे तौर पर यह जानना कि उत्तर क्या होगा। क्योंकि, सर्वे कहता है कि भारत में 61 फीसदी लोग दिन में 6 घंटे भी नहीं सो पाते हैं. कम से कम पिछले 12 महीनों में तो नहीं. केवल 39 प्रतिशत भारतीयों को प्रतिदिन 6 घंटे की नींद मिलती है। दो साल पहले भी यह अनुपात 50-50 था. दूसरे शब्दों में कहें तो भारतीयों में अनिद्रा की बीमारी दो साल में 11 फीसदी बढ़ गई है! ऐसे में पिछले कुछ दिनों से अचानक एक शब्द ने पूरी दुनिया में धूम मचा दी- ‘स्लीपमैक्सिंग’. जिसने नींद के शौकीनों को जगा दिया है!

यह स्लीपमैक्सिंग क्या है?

जैसा कि नाम से पता चलता है – कुछ ऐसा जो नींद के समय को बढ़ाने या नींद को बेहतर और गहरी बनाने में मदद करता है। सोने के उन सभी तरीकों को लेकर हाल ही में सोशल मीडिया पर चर्चा शुरू हो गई है। तस्वीरों, वीडियो, रिले हर जगह अच्छी नींद का रहस्योद्घाटन शुरू हो गया है। स्वाभाविक रूप से, ‘स्लीपमैक्सिंग’ एक ‘वायरल ट्रेंड’ बन गया है। लेकिन क्या ‘स्लीपमैक्सिंग’ या नींद की गुणवत्ता बढ़ाना इतना आसान है? यदि आप कुछ नियमों का पालन करें, तो क्या आप नींद के स्वर्ग तक पहुँच सकते हैं? ‘स्लीपमैक्सिंग’ के लिए वास्तव में क्या अनुशंसित है?

3. स्लीप ट्रैकर: स्लीप ट्रैकर यह ट्रैक करने में मदद करता है कि नींद कितनी गहरी है, कितनी लंबी गहरी नींद है, कितनी छोटी या हल्की नींद है। स्लीपमैक्सर्स कहते हैं, समझने से समस्या हल नहीं होगी!

4. जे’ स्ट्रैप: यह स्ट्रैप खर्राटों की समस्या होने पर मदद करता है। साथ ही स्लीपमैक्सर्स का कहना है कि नींद के दौरान मुंह बंद रखने से फेफड़ों में ऑक्सीजन का संचार बढ़ जाता है।

5. रेड लाइट थेरेपी: स्लीपमैक्सर्स का कहना है कि अगर आपको अनिद्रा है तो रेड लाइट थेरेपी नींद में मदद कर सकती है।

6. मेलाटोनिन: मेलाटोनिन नींद में भी मदद करता है।

7. अश्वगंधा: अश्वगंधा के नियमित सेवन से गहरी नींद की अवधि बढ़ने का दावा किया जाता है।

वास्तव में क्या काम करता है?

डॉक्टरों का कहना है कि हर पद्धति के अपने फायदे और नुकसान हैं। लेकिन ये भी सच है कि सिर्फ कुछ तरीके अपनाने से अच्छी नींद की गारंटी नहीं है. उदाहरण के लिए, मैग्नीशियम तेल को कई लोग नींद के लिए फायदेमंद बताते हैं। लेकिन यह निर्धारित करने के लिए और अधिक शोध की आवश्यकता है कि क्या यह सभी मामलों में समान रूप से प्रभावी है। इसी तरह ‘माउथ टेपिंग’ कुछ लोगों के लिए उपयोगी है लेकिन सभी के लिए नहीं।

डॉ. शंकर एस. विरादर फिर कहते हैं, “दरअसल, छह घंटे की शुद्ध नींद आजकल इतनी दुर्लभ है कि लोग इसे पाने के लिए किसी भी चीज़ से चिपके रहते हैं। जो भी सुझाव दिए जा रहे हैं, उनमें से कई कई मामलों में काम भी करते हैं। जैसा कि यह सच है, यह भी सच है कि यह काम करेगा या नहीं यह कुछ कारकों पर निर्भर करता है।”
हालांकि, मनोचिकित्सक स्नेहा शर्मा कहती हैं, ”स्पीड के युग में, काम पर मानसिक तनाव, बेहिसाब जीवनशैली, लंबे समय तक कंप्यूटर या मोबाइल स्क्रीन पर घूरना धीरे-धीरे नींद के स्तर और गुणवत्ता को कम कर रहा है। चूँकि यह एक समस्या है, नींद के बारे में बहुत अधिक उधेड़बुन करने के परिणामस्वरूप यह प्रतिकूल भी है।” इसे ऑर्थोसोम्निया कहा जाता है. यदि आप ‘स्लीपमैक्सिंग’ करते समय उस समस्या में पड़ जाते हैं, तो यह फिर से कठिन है।

भले ही आप उड़ान की शुरुआत और अंत में आकाश की सुंदरता को देखने में कुछ समय बिताते हों, लेकिन लंबी यात्रा बहुत नीरस लगती है। अगर आप लंबी यात्रा के दौरान थोड़ी सी नींद ले सकें तो जैसे समय जल्दी बीत जाता है, शरीर भी चुस्त-दुरुस्त हो जाता है। लेकिन, जब आप सोते हैं!

मैं सोना नहीं चाहता. किसी की बातें, दो आँखों की रोशनी एक जैसी नहीं होती।

एक फ्लाइट अटेंडेंट ने यात्रियों की नींद की समस्या के समाधान के लिए अपने अनुभव से कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। उन्होंने छह साल तक एक एयरलाइन में काम किया।

उनकी सलाह, आधी रात में, आंखों में नींद लाने के लिए पहले आराम से बैठ जाएं। इसके बाद कुछ छोटी-छोटी चीजों की मदद से पलकें भारी हो जाएंगी।

वे कौन सी चीजें हैं?
‘आई मास्क’ या ‘शोर रद्द करने वाले हेडफ़ोन’, ‘ईयर प्लग’ और ‘लैवेंडर ऑयल’। आरामदायक, ढीले कपड़े भी आवश्यक हैं। फ्लाइट अटेंडेंट का कहना है, “आराम से बैठो, आंखों पर मास्क, कानों में ईयर फोन, रोशनी और शोर से मुक्ति।” लैवेंडर तेल का उपयोग आवश्यक तेल के रूप में किया जाता है। इसकी गंध मन को शांत करने में मदद करती है। यात्री चाहें तो इसका इस्तेमाल भी कर सकते हैं.

शौक का पौधा ठीक से नहीं बढ़ रहा, कैसे करें देखभाल फूलों की कमी नहीं होगी?

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एक पौधे को पूर्ण रूप से खिलने के लिए शुरू से ही देखभाल की आवश्यकता होती है। यदि आपको मिट्टी से खाद, पर्याप्त पानी और प्रकाश मिलेगा तो सद वृक्ष बड़ा होगा। बगीचे की सुंदरता बढ़ाने के लिए उन्होंने शौकिया तौर पर बेर के पेड़ लगाए। लेकिन वह पेड़ ठीक से बढ़ नहीं रहा है? इस बारे में चिंता न करें, जानें कैसे रखें देखभाल जबागा होगा फूलों से भरपूर?

अंकुर

पहला कदम पौधे रोपना है। इसके लिए नर्सरी से अच्छी गुणवत्ता वाली पौध का चयन करना चाहिए. थोड़े मोटे तने वाले स्वस्थ पौधे खरीदें। इस पौधे को आप 12 इंच के टब में लगा सकते हैं.

मिट्टी तैयार है

गमले की मिट्टी तैयार करना बहुत महत्वपूर्ण है। पौधों की वृद्धि काफी हद तक मिट्टी की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि पेड़ के नीचे पानी जमा न हो। इसलिए सबसे पहले टब के निचले हिस्से को पत्थर और रेत से भर दें। मिट्टी तैयार करने के लिए 50 प्रतिशत दोमट मिट्टी, 10 प्रतिशत रेत की आवश्यकता होगी. पौधे रोपने के बाद आधार की मिट्टी को धीरे-धीरे मजबूत करना चाहिए।

सूरज और हवा
रसीले पौधों को बढ़ने के लिए पर्याप्त रोशनी और हवा की आवश्यकता होती है। लेकिन शुरुआत में अगर पौधों को तेज धूप में रखा जाए तो वे सूख सकते हैं। सबसे पहले पौधे को छायादार जगह पर रखना चाहिए. अगर यह थोड़ा बड़ा हो जाए तो इसे धूप में रख दीजिए.

जल

नियमित रूप से पानी दें। हालाँकि, यदि पानी मिट्टी में जमा हो जाता है, तो यह पौधे को नुकसान पहुँचा सकता है। यदि आप सप्ताह में एक बार मिट्टी खोदेंगे तो पौधा अच्छे से विकसित होगा।

उर्वरक

पौधे में फूल आने के लिए आवश्यकतानुसार उर्वरक डालना महत्वपूर्ण है। जैविक खाद का प्रयोग करना बेहतर है। तरल, सूखी जैविक खाद दी जा सकती है। उर्वरक फूल आने से पहले या बाद में लगाना चाहिए। प्याज के छिलके, केले के छिलके बेर के पौधों के लिए उर्वरक के रूप में उपयोग किए जा सकते हैं। 100 मिलीलीटर तरल प्याज उर्वरक और 70 मिलीलीटर केले के छिलके उर्वरक को छानकर 2 लीटर पानी में मिला देना चाहिए। आप पौधे में 100 मिलीलीटर तरल उर्वरक लगा सकते हैं।

कीटनाशक

पेड़ पर फंगस का हमला होता है. यदि हां, तो कीटनाशकों का प्रयोग करना चाहिए। लेकिन उस स्थिति में यह देखना चाहिए कि छिड़काव करते समय कीटनाशक जमीन पर न गिरे। यदि ऐसा है तो पौधे की गुणवत्ता ख़राब हो सकती है. जबाफुल से सौंदर्य उपचार की बात करें तो सबसे पहली चीज जो दिमाग में आती है वह है बाल। जाबाफुल लगाने से बालों का झड़ना, पतला होना, समय से पहले बूढ़ा होना रोका जा सकता है। जोजोबा के फूलों में अमीनो एसिड होता है। यह बालों में केराटिन प्रोटीन का उत्पादन बढ़ाता है। नतीजतन, बाल उलझते नहीं हैं, रेशम की तरह मुलायम होते हैं। नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन से मिली जानकारी के अनुसार, इस फूल में विटामिन ई और विटामिन सी होता है। ये बालों को समग्र रूप से स्वस्थ रखते हैं, सिर की त्वचा में रक्त संचार बढ़ता है, रोम छिद्रों को भी पोषण मिलता है। यह नये बाल उगने में भी मदद करता है। इसके लिए आप जाबाफुल तेल को अपने सिर पर लगा सकते हैं। वह तेल घर पर कैसे बनाएं?

जाबाफुल तेल कैसे बनाये?

– एक बर्तन में थोड़ा पानी गर्म करें. इसमें कई जबाफुल दें. जब यह उबल जाएगा तो आप देखेंगे कि पानी का रंग बदल गया है। जब यह सामान्य तापमान पर आ जाए तो तरल को छलनी से छान लें। इस बार तरल और नारियल तेल को बराबर मात्रा में एक साफ कांच के कंटेनर में मिलाएं। आप चाहें तो जैतून के तेल का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। नहाने से एक घंटा पहले इस मिश्रण को अपने सिर पर लगाएं। फिर इसे शैंपू कर लें।

हालाँकि, हर कोई नहीं जानता कि जाबाफुल का उपयोग त्वचा की देखभाल के लिए किया जा सकता है। जाबाफुल में मौजूद तत्व त्वचा के लिए भी फायदेमंद होते हैं। जिस तरह केराटिन बालों के लिए जरूरी है, उसी तरह त्वचा के लिए भी जरूरी है। उम्र बढ़ने के कारण त्वचा की कसावट खत्म हो जाती है, झुर्रियां भी पड़ने लगती हैं। जबाफुल से बनी क्रीम इस समस्या को खत्म कर देती है।

कैसे बनाएं ‘एंटी-रिंकल’ क्रीम?

एलोवेरा के छिलके, नारियल तेल और कटहल की पंखुड़ियों को एक साथ अच्छी तरह मिला लें। इस तरह ब्लेंड करें कि यह एक गाढ़े जेल की तरह बन जाए। रात को सोने से पहले अपने चेहरे को माइल्ड फेसवॉश से धोएं और इस क्रीम को लगाएं। पूजा में अभी कई दिन बाकी हैं. अगर इसे नियमित रूप से लगाया जाए तो झुर्रियों की समस्या को नियंत्रण में रखा जा सकता है।

क्या भारत के लिए उठ रही है हथियार सप्लाई करने की मांग?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वर्तमान में भारत के लिए हथियार सप्लाई करने की मांग उठ रही है या नहीं! गाजा से लेकर यूक्रेन तक बारूद की बारिश हो रही है। महीनों से चल रहे इन युद्धों की वजह से पूरी दुनिया में हथियारों की भारी डिमांड काफी बढ़ गई है। हालत यह है कि सुपर पावर अमेरिका और अन्‍य नाटो देश समय पर यूक्रेन को हथियार नहीं मुहैया करा पा रहे हैं। वहीं इजरायल को भी हथियारों और गोला बारूद की भारी कमी हो गई है। उसे अमेरिका से बड़े पैमान पर हथियार लेना पड़ा है लेकिन वॉशिंगटन ने कई तरह के हथियार देने से मना कर दिया है। इस हिंसाग्रस्‍त दुनिया में अब भारत के हथियारों और गोला बारूद को लेकर बवाल मचा हुआ है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने पश्चिमी देशों को तोप के गोले भेजे थे जो अब यूक्रेन पहुंच जा रहे हैं जिससे रूस नाराज हो गया है। इससे पहले इजरायल को ड्रोन और विस्‍फोटक भेजने के मामले में देश के अंदर से लेकर बाहर फलस्‍तीन तक बवाल मच चुका है। द‍ हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक गाजा युद्ध के शुरुआती दिनों में इजरायल ने भारत से तोप के गोले मांगे थे लेकिन भारत ने यह नीतिगत फैसला किया कि वह तेलअवीव को यह सप्‍लाइ नहीं करेगा। रक्षा सूत्रों ने कहा कि रूस और यूक्रेन के बीच लड़ाई में भारत दृढ़तापूर्वक तटस्‍थ है और यह फैसला किया है कि वह कोई भी घातक हथियार किसी देश को नहीं देगा।

रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है, ‘इजरायल को भारत की ओर से बहुत कम हथियारों का निर्यात किया जाता है। यह भारत है जो इजरायल के हथियारों पर निर्भर है। असल‍ियत यह है कि गाजा युद्ध की वजह से भारत को होने वाली सप्‍लाई प्रभावित हुई है।’ भारतीय रक्षा सूत्रों ने कहा, ‘गाजा युद्ध के शुरुआती दिनों में इजरायल ने भारत से 155 और 105 एमएम के तोप के गोले मांगे थे। हमने नीतिगत फैसला किया कि उन्‍हें यह नहीं देंगे। इजरायल खुद भी अपने वादों को पूरा करने में सफल नहीं रहा। जो हथियार वे हमें देने वाले थे, वे अब उसे खुद ही इस्‍तेमाल कर रहे हैं। भारत से इजरायल को बहुत ही कम हथियार गया है।’

उन्‍होंने कहा कि यह दिखाता है कि भारत किस तरह से हथियारों के आयात पर निर्भर है। यही नहीं रूस से भी हथियारों और उनके पार्ट की आपूर्ति बहुत प्रभावित हुई है। भारत को अभी तक दो एस 400 मिसाइल डिफेंस सिस्‍टम नहीं मिल पाए हैं। हालांकि इजरायल की कुछ कंपनियां अभी भारत में निर्माण करती हैं तो उनके बनाए हुए कुछ पार्ट इजरायल जाते हैं। वहीं यूक्रेन को भारतीय तोप के गोले पहुंचने पर भी भारत ने ऐसे देशों को ताकीद किया है और सप्‍लाई को रोका गया है। कई देश चाहते हैं कि तोप के गोले उन्‍हें दिया जाए लेकिन भारत उन्‍हें मंजूरी नहीं दे रहा है। उन्‍होंने बताया कि कई ऐसे हथियार जिन्‍हें भारत ने कुछ देशों को यूक्रेन युद्ध शुरू होने से पहले बेचा था, वे अब इसे यूक्रेन भेज रहे हैं। इसका पता नहीं लग पा रहा है। भारत ने कुल गोला बारुद 50 मिल‍ियन डॉलर का ही निर्यात किया है जो बहुत कम है।

रिपोर्ट के मुताबिक इजरायल और हमास तथा यूक्रेन युद्ध की वजह से भारत बहुत कठिन स्थिति में पहुंच गया है। रूस और इजरायल दोनों ही भारत के घनिष्‍ठ मित्र देश हैं और इस विवाद से वह बहुत कठिन परिस्थिति में फंस गया है। रूस भारत को सबसे ज्‍यादा हथियार देता है, वह भी तब जब पिछले दो दशक में अमेरिका बड़ा सप्‍लायर बन गया है। वहीं इजरायल को अडानी ने Hermes 900 ड्रोन का निर्यात किया है। वहीं भारत ने कुछ विस्‍फोटक को भी इजरायल को भेजा था जो कई चीजों में इस्‍तेमाल किया जा सकता है। इसी को लेकर विवाद हो रहा है। भारत के कई व‍िपक्षी दलों ने इजरायल को हथियार नहीं देने की मांग की है।

आईडीएसए के महानिदेशक सुजन चिनाय ने रूसी मीडिया वेबसाइट स्‍पुतनिक से बातचीत में कहा कि आर्मेनिया अब और ज्‍यादा तोपों के लिए बातचीत कर रह है। चिनाय ने कहा कि ये 155 एमएम की तोपें अत्‍याधुनिक तकनीक से लैस हैं और इन्‍हें कहीं भी तेजी से पहुंचाया जा सकता है। इससे दुश्‍मन के ठिकानों पर बहुत ही सटीक तरीके से हमला बोला जा सकता है। इन तोपों की ताकत से आर्मेनिया की सेना बहुत प्रभावित हुई है। इससे पहले भारत ने आर्मेनिया को स्‍वाथी रेडॉर दिया था जिससे दुश्‍मन के हथियारों की सटीक लोकेशन मिल जाती है। यह पूरी डील 4 करोड़ डॉलर की थी।

इसके अलावा आर्मेनिया ने अजरबैजान के खतरे को देखते हुए भारत से पिनाका मल्‍टी बैरल रॉकेट लॉन्‍चर भी खरीदने की इच्‍छा जताई है जो अपनी क्‍वालिटी के लिए जाने जाते हैं और दुनिया के अन्‍य देशों में उनकी डिमांड है। पिनाका सिस्‍टम की यह डील 25 करोड़ डॉलर की हो सकती है। चिनाय ने कहा कि भारत का रक्षा उद्योग न केवल भारत को हथियारों का निर्माता बना रहा है, बल्कि सैन्‍य प्रॉडक्‍ट का बड़ा सप्‍लायर बनकर उभर रहा है। भारत अपने डिफेंस सप्‍लाई चेन को सुरक्षित बनाने के लिए सक्रिय होकर काम कर रहा है।

वहीं भारत की तोपों की बात करें तो यह अपनी कटेगरी में सबसे अच्‍छी हैं। इन्‍हें ऊंचाई वाले इलाकों में आसानी से तैनात किया जा सकता है। भारतीय सेना भी इस तरह के 310 तोपों का ऑर्डर देने जा रही है। इस तोप को डीआरडीओ, भारत फोर्ज और टाटा ने मिलकर बनाया है। इस तोप से 50 किमी तक दुश्‍मन के ठिकानों को तबाह किया जा सकता है। यह तोप मात्र 1 मिनट में 5 गोले दाग सकती है। साथ ही एक घंटे में 60 गोले दागने की ताकत रखती है।

क्या अपना परमाणु हथियार टेस्ट करना चाहते हैं राष्ट्रपति पुतिन?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या राष्ट्रपति पुतिन अपना परमाणु हथियार टेस्ट करना चाहते हैं या नहीं! रूस की उत्तरी न्यूक्लियर टेस्ट साइट पर सुरंगें तैयार की जा रही हैं। एक जापानी थिंक टैंक ने हाल ही में ली गई सेटेलाइट इमेजरी के आधार पर ये दावा किया है। सैटेलाइट इमेजरी के आधार पर 18 सितंबर, 2024 को टोक्यो विश्वविद्यालय में एडवांस्ड साइंस एंड टेक्नोलॉजी के ओपन लेबोरेटरी फॉर इमर्जेंस स्ट्रैटेजीज (रोल्स) ने अपनी रिपोर्ट में रूस की उत्तरी नोवाया जेमल्या परमाणु परीक्षण स्थल पर महत्वपूर्ण निर्माण गतिविधियों होने की बात कही है। इन तस्वीरों ने संभावित परमाणु परीक्षण और एडवांस वेपन सिस्टम, विशेष रूप से ब्यूरवेस्टनिक न्यूक्लियर-पावर क्रूज मिसाइल तैयार किए जाने के बारे में अटकलें तेज कर दी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, रोल्स ने पहली पाया है कि इन गर्मियों में परमाणु परीक्षण सुरंगों से मिट्टी हटाई जा रही थी। गर्मी के बाद भी यहां अतिरिक्त हलचल देखी गई। इन गतिविधियों ने परमाणु परीक्षण और हथियार विकास के संबंध में रूस के इरादों के बारे में अटकलें लगाई हैं। ये अटकलें इसलिए बढ़ी हैं क्योंकि प्रमुख रूसी वैज्ञानिक मिखाइल कोवलचुक ने कुछ समय पहले नोवाया जेमल्या में परमाणु परीक्षण फिर से शुरू करने की वकालत की थी।

सितंबर की सेटेलाइट तस्वीरों से साइट में कुछ जगहों से मिट्टी हटाने का पता चला है, जिससे पता चलता है कि सुरंगों में भूमिगत कार्य चल रहा है। इसके अतिरिक्त तस्वीरों ने बड़े पैमाने पर परिवहन जहाजों और रोसाटॉम विमानों के आगमन के साथ-साथ नोवाया जेमल्या पर बड़े पैमाने पर निर्माण की पुष्टि की। रोल्स थिंक टैंक ने कहा कि यह साफ नहीं है कि ये गतिविधियां रूस के चल रहे परमाणु परीक्षणों से जुड़ी हैं या नहीं लेकिन यह कुछ महत्वपूर्ण तैयारी का इशारा करती है।

इन तस्वीरों ने ब्यूरवेस्टनिक मिसाइल को भी चर्चा में ला दिया है। कई विश्लेषकों का मानना है कि नोवाया जेमल्या पर निर्माण कार्य ब्यूरवेस्टनिक के टेस्ट से जुड़ा है। ये रूसी लॉ-फ्लाइंग, न्यूक्लियर पावर्ड और न्यूक्लियर आर्म्ड क्रूज मिसाइल है। इस मिसाइल को एक मानक रॉकेट इंजन का उपयोग करके लॉन्च किया जाता है, जिसके बाद उड़ान में एक छोटा परमाणु रिएक्टर सक्रिय होता है, जिससे यह महत्वपूर्ण दूरी तय करने में सक्षम होता है। ब्यूरवेस्टनिक को ‘फ्लाइंग चेरनोबिल’ उपनाम दिया है। ब्यूरवेस्टनिक मिसाइल अभी सफल नहीं मानी गई है। इसके कई परीक्षण हुए हैं, जिनमें से अधिकतर के परिणाम सकारात्मक नहीं आए। 2019 में आर्कान्जेस्क के पास एक परीक्षण विफल हुआ था और इसके परिणामस्वरूप कम से कम पांच मौतें हुई थीं, हालांकि रूस ने परीक्षण की विफलता को स्वीकार नहीं किया है।

नोवाया जेमल्या परमाणु परीक्षण स्थल, जो रूसी रक्षा मंत्रालय के नियंत्रण में है। इस साइट का उपयोग अन्य उद्देश्यों के अलावा, परमाणु हथियारों की विश्वसनीयता को सत्यापित करने के लिए किए गए परीक्षणों के लिए किया गया है। नोवाया जेमल्या में पहला परीक्षण 1950 के दशक में आयोजित किया गया था। 1987 में यहां एक हादसा हुआ था, जब माटोत्स्किन सारी सुरंग में एक परीक्षण विस्फोट के बाद शाफ्ट ढह गए और वायुमंडल में एक रेडियोधर्मी बादल फैल गया। नोवाया जेमल्या में रूस का आखिरी परमाणु परीक्षण 1990 में हुआ था।

बता दे कि रूसी समर्थक सैन्य ब्लॉगर यूरी पोडोल्याका ने बताया कि यूक्रेन ने टोरोपेट्स के क्षेत्र में एक गोला-बारूद डिपो पर हमला किया। रूसी राज्य मीडिया ने बताया था कि विस्फोट स्थल पर पारंपरिक हथियारों का एक बड़ा शस्त्रागार था। टवेर के गवर्नर इगोर रुडेन्या ने बताया कि यूक्रेनी ड्रोनों को मार गिराया गया है। हालांकि इस हमले से आग लग गई और कुछ निवासियों को इलाके से निकाला जा रहा है। यूक्रेन की एसबीयू राज्य सुरक्षा सेवा के एक सूत्र ने रॉयटर्स को बताया कि ड्रोन हमले ने मिसाइलों, निर्देशित बमों और तोपखाने गोला-बारूद के भंडारण वाले एक गोदाम को नष्ट कर दिया।

कैलिफोर्निया के मोंटेरे में मिडिलबरी इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के जॉर्ज विलियम हर्बर्ट के अनुसार, असत्यापित सोशल मीडिया वीडियो में दिखाए गए मुख्य विस्फोट का आकार 200-240 टन उच्च विस्फोट के अनुरूप था। कई युद्ध ब्लॉगर्स ने सवाल उठाया कि जिस जगह की सुरक्षा बेहद मजबूत है, वहां ड्रोन इतने बड़े विस्फोट कैसे हो सकता है। 2018 की आरआईए स्टेट समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, रूस 1,000 साल पुराने शहर टोरोपेट्स में मिसाइलों, गोला-बारूद और विस्फोटकों के भंडारण के लिए एक शस्त्रागार का निर्माण कर रहा था, जिसकी आबादी सिर्फ 11,000 से अधिक है। तत्कालीन उप रक्षा मंत्री दिमित्री बुल्गाकोव ने 2018 में आरआईए को बताया कि यह सुविधा मिसाइलों और यहां तक कि एक छोटे परमाणु हमले से हथियारों की रक्षा कर सकती है।

यूक्रेन ने पिछले दो वर्षों में अपने घरेलू ड्रोन उत्पादन में वृद्धि की है और रूसी क्षेत्र पर हमले बढ़ा दिए हैं। यूक्रेन के अब तक के सबसे बड़े ड्रोन हमले में सितंबर में रूसी राजधानी को निशाना बनाया गया था। इस हमले में कम से कम एक की मौत हो गई थी और मॉस्को के हवाई अड्डों पर उड़ानें बाधित हो गईं थीं।