Wednesday, March 4, 2026
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जानिए यादव परिवार और चौधरी परिवार के अद्भुत किस्से?

आज हम आपको मुलायम यादव परिवार और चौधरी चरण सिंह परिवार के बारे में बताने वाले हैं!उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल के बीच कभी दोस्ती तो कभी दुश्मनी का रिश्ता रहा है। करीब पांच दशक से मुलायम सिंह यादव और चौधरी चरण सिंह परिवार के बीच मिलने- बिछड़ने का सिलसिला चलता रहा है। कभी अजित सिंह ने जाल बिछाकर मुलायम सिंह यादव से नेता प्रतिपक्ष का पद छीना था। मुलायम ने अपने चरखा दांव में फंसाकर अजित सिंह के मुख्यमंत्री बनने के सपने को तोड़ दिया। इसी तरह पिछले दो लोकसभा चुनाव में सपा के साथ के बाद भी रालोद खाता खोलने में कामयाब नहीं हुई। जाटलैंड में अजित सिंह का पतन हुआ। हालांकि, एक प्रकार से मानें तो समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने चौधरी चरण सिंह की पार्टी लोक दल के साथ अपने राजनीतिक कैरियर की शुरुआत की थी। दरअसल, मुलायम पहली बार वर्ष 1967 के विधानसभा चुनाव में राम मनोहर लोहिया की संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से विधायक बने। कांग्रेस के चंद्रभानु गुप्ता तब केवल 19 दिन के लिए सीएम बने थे। इसके बाद चौधरी चरण सिंह मुख्यमंत्री बने। हालांकि, यूपी विधानसभा पहली बार अपना कार्यकाल नहीं पूरा कर पाई। 12 अक्टूबर 1967 को लोहिया के निधन के बाद 1969 में दोबारा चुनाव हुआ। कांग्रेस के चंद्रभानु गुप्ता फिर मुख्यमंत्री बने। इस बार भी वे सरकार को स्थिर कर पाने में कामयाब नहीं हुए। चौधरी चौधरी चरण सिंह को दोबारा मुख्यमंत्री बनाया गया। हालांकि, पांच साल में रिकॉर्ड पांच मुख्यमंत्री बदले गए और दो बार राष्ट्रपति शासन लगा।  मुलायम सिंह यादव ने चौधरी चरण सिंह की बनाई पार्टी भारतीय कृषक दल में शामिल हो गए। यूपी चुपाव 1974 में बीकेडी के ही टिकट पर मुलायम चुनावी मैदान में उतरे और जीते। इसी साल सोशलिस्ट पार्टी और कृषक दल का विलय हो गया और नई पार्टी भारतीय लोक दल बनाई गई। इमरजेंसी के बाद वर्ष 1977 में बीएलडी जनता पार्टी का हिस्सा हो गई। सरकार बनी तो मुलायम सिंह यादव पहली बार सहकारिता और पशुपालन मंत्री बने। चौधरी चरण सिंह और जनता पार्टी का साथ केवल दो साल का रहा। चौधरी चरण सिंह ने वर्ष 1979 में लोकदल नाम से नई पार्टी बनाई।

1979 में चौधरी चरण सिंह ने लोक दल का गठन किया। उन्होंने हेमवती नंदन बहुगुणा को लोक दल का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया। मार्च 1987 में चौधरी चरण सिंह की तबीयत खराब हुई तो पिता की बनाई गई पार्टी पर चौधरी अजीत सिंह अपना वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास शुरू किया। हालांकि, उनकी परेशानी सीनियर नेताओं की खेमेबाजी थी। पार्टी के अधिकतर बड़े नेता कर्पूरी ठाकुर, नाथूराम मिर्धा, चौधरी देवीलाल और मुलायम सिंह यादव उस समय हेमवती नंदन बहुगुणा के साथ थे। 29 में 1987 को चौधरी चरण सिंह के निधन के बाद बड़ा खेल हुआ। अजित सिंह के इशारे पर लोक दल के विधायकों की बैठक हुई। इस बैठक में मुलायम सिंह यादव को विधायक दल के नेता पद से हटा दिया गया। मुलायम जब पार्टी के विधायक दल के नेता के साथ- साथ नेता प्रतिपक्ष पद से भी हटा दिए गए। उनकी जगह अजीत सिंह ने सत्यपाल सिंह यादव को विपक्ष का नेता बना दिया। मुलायम के लिए यह अपमान का घूंट था, जिसका उन्होंने अपने ही अंदाज में बदला लिया।

लोक दल पर अजित सिंह के दावे के बाद टूट हुई। लोक दल दो भागों में बंट गई। लोक दल अजित और लोक दल बहुगुणा के रूप में विभाजन हुआ। चौधरी देवी लाल, कर्पूरी ठाकुर, शरद यादव, नाथूराम मिर्धा और मुलायम सिंह यादव जैसे नेता हेमवती नंदन बहुगुणा के साथ रहे। हालांकि, उत्तर प्रदेश के अधिकतर विधायक अजीत सिंह के साथ थे।

11 अक्टूबर 1988 को लोकनायक जयप्रकाश नारायण के जन्मदिन के दिन एक नई पार्टी बनाई गई। इसका नाम जनता दल रखा गया। जनता पार्टी, लोक दल अजीत, लोक दल बहुगुणा और सोशलिस्ट कांग्रेस सभी इसके घटक के तौर पर शामिल हुए। कुछ महीने बाद 1989 में यूपी में विधानसभा चुनाव हुआ। यूपी विधानसभा सीट की कुल 425 सीटों पर चुनाव हुए। प्रदेश में सारे कांग्रेस विरोधी एकजुट थे। जनता दल ने यूपी विधानसभा की 356 सीटों पर चुनाव लड़ा और 208 सीटों पर जीत हासिल की। कांग्रेस 410 सीटों पर चुनाव लड़कर महज 94 पर उसे जीत दर्ज कर पाई। जनता दल सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन बहुमत से उसके पास पांच सीटें कम थीं। इसके बाद मुलायम ने खेल शुरू किया।

मुलायम को 1987 के अपमान का घाव अब तक साल रहा था। जनता दल बहुमत आराम से जुगाड़ कर सकती थी। लेकिन, लखनऊ से दिल्ली तक इसकी कसरत शुरू हुई। यूपी के सीएम पद पर पुख्ता दावा अजित सिंह का था। लेकिन, मुलायम सिंह यादव भी अपनी दावेदारी छोड़ने को तैयार नहीं थे। उस समय चौधरी देवीलाल का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए चल रहा था। विश्वनाथ प्रताप सिंह भी कई बार कह चुके थे कि जो सब चाहेंगे, वही होगा। लेकिन, देवीलाल ने ही बीपी सिंह का नाम प्रधानमंत्री के लिए प्रस्तावित कर दिया। पीएम पद की रेस में तब चंद्रशेखर का नाम भी चल रहा था। लेकिन, चौधरी देवीलाल ने उन्हें झटका दे दिया था। अजीत सिंह भी बीपी सिंह के खेमे में थे। मुलायम ने बाजी पलटने के लिए अपने राजनीतिक गुरू चंद्रशेखर को साधा था। हालांकि, ऐन मौके पर पलटी मारकर देवीलाल की तरफ चले गए।

बीपी सिंह के नाम पर मुहर लग गई। बीपी सिंह अजित सिंह को सीएम बनाना चाहते थे, ताकि देश के सबसे प्रदेश पर उनकी पकड़ रहे। लेकिन, मुलायम किसी भी स्थिति में अजित को सीएम नहीं बनने देना चाहते थे। लखनऊ में शक्ति प्रदर्शन हुआ। मुलायम के चरखा दवंव में अजित सिंह फंस गए। बाहुबली डीपी सिंह और बेनी प्रसाद वर्मा ने मुलायम सिंह यादव के पक्ष में विधायकों का नंबर बढ़ा दिया। सीएम बनाने के लिए अजीत सिंह खेमे के 11 विधायक भी मुलायम को वोट कर गए। दोनों पक्षों की वोटिंग में मुलायम को 115 और अजीत सिंह को 110 वोट मिले। पांच विधायकों के अंतर ने अजीत सिंह का मुख्यमंत्री बनने का सपना तोड़ दिया और मुलायम प्रदेश की कुर्सी पर बैठ गए।

जनता दल में मचे घमासान के बाद वीपी सिंह को पीएम पद छोड़ना पड़ा। चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने। मुलायम सिंह यादव उनकी समाजवादी जनता पार्टी में शामिल हो गए। अजीत सिंह पहले कांग्रेस में गए और उसके बाद 1996 में अलग होकर राष्ट्रीय लोक दल नाम की पार्टी का गठन कर लिया। 1993 में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी गठित कर ली। इसके बाद दोनों के बीच हितों का टकराव खत्म हो गया। वर्ष 2002 में हुए यूपी विधानसभा चुनाव के बाद अजित सिंह ने मुलायम सिंह को मुख्यमंत्री बनाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। दरअसल, यूपी चुनाव 2002 में समाजवादी पार्टी ने 143 सीटें जीती थी। बहुजन समाज पार्टी को 98 सीटों पर जीत मिली। भारतीय जनता पार्टी के खाते में 88 सीटें आईं। कांग्रेस को 25 और अजित सिंह की राष्ट्रीय लोक दल को 14 सीटों पर जीत मिली।

विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी थी, लेकिन भाजपा और राष्ट्रीय लोक दल ने बसपा को समर्थन दे दिया। मिली जुली सरकार बनाई गई। मुख्यमंत्री मायावती बनीं। लालजी टंडन, ओम प्रकाश सिंह, कलराज मिश्र जैसे नेता सरकार में कैबिनेट मंत्री थे। मायावती के काम करने का तरीका भाजपा को रास नहीं आया। 26 अगस्त 2003 को हितों के टकराव के बाद मायावती ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसी दिन मुलायम ने सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया। अजित सिंह ने तब अपने 14 विधायकों का समर्थन मुलायम को दिया था। यह दोस्ती की एक नई शुरुआत थी। बहुजन समाज पार्टी से भी 13 विधायक टूटकर मुलायम के साथ आ गए। बाद में भाजपा ने भी मुलायम को समर्थन दे दिया। मुलायम और अजित सिंह की दोस्ती इसके साथ पक्की होती चली गई। मुलायम सरकार में अजीत सिंह की खास अनुराधा चौधरी को नंबर दो का स्थान मिला था।

2003 में शुरू हुई मुलायम सिंह यादव और अजीत सिंह की दोस्ती लोकसभा चुनाव 2004 में भी बरकरार रही। राष्ट्रीय लोक दल 10 सीटों पर लड़ी और तीन सीटें जीतने में कामयाब हुई। बागपत से एक बार फिर अजित सिंह सांसद चुने गए। उसी दौरान समाजवादी पार्टी में अमर सिंह का दबदबा बढ़ रहा था। अमर सिंह और अजित सिंह के बीच रिश्ते अच्छे नहीं थे। इसका असर समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल गठबंधन पर भी पड़ा। 2007 में हुए यूपी विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने 206 सीटों पर जीत दर्ज की सपा की सत्ता से विदाई हो गई। इस चुनाव में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल के बीच तनातनी काफी बढ़ गई थी। अजित सिंह ने 254 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे। हालांकि, उन्हें महज 10 सीटों पर जीत मिली। लोकसभा चुनाव 2009 में अजित सिंह ने भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया।

चौधरी चरण सिंह, चौधरी अजित सिंह के बाद जयंत चौधरी भी समाजवादी पार्टी के साथ जुड़े दिखाई दिए। 6 मई 2021 को अजित सिंह के निधन के बाद अखिलेश यादव और जयंत चौधरी की नजदीकी काफी बढ़ती दिखी। सपा- रालोद गठबंधन यूपी चुनाव 2022 में रहा। इस चुनाव में राष्ट्रीय लोक दल और समाजवादी पार्टी के गठबंधन ने पश्चिमी यूपी में भाजपा को कड़ी टक्कर दी। गठबंधन के तहत रालोद को सपा ने 33 सीटें दी। पार्टी 8 सीटों पर जीत दर्ज करने में कामयाब रही। पिछले दिनों अखिलेश यादव ने जयंत चौधरी के साथ लोकसभा चुनाव के गठबंधन की घोषणा की थी। लेकिन, दावा किया जा रहा है कि एक बार फिर रालोद अपनी राह अलग करने की तैयारी में है।

क्या अखिलेश यादव को बार-बार तोड़ रही है बीजेपी?

बीजेपी अखिलेश यादव को बार-बार तोड़ रही है! उत्तर प्रदेश की राजनीति में मोटे तौर पर देखें तो वर्तमान में एक तरफ भाजपा गठबंधन है, दूसरी तरफ सपा गठबंधन। बसपा भी है लेकिन जिस तरह का उसका प्रदर्शन है, उस लिहाज से वह वोट कटवा की स्थिति में ही दिख रही है। सत्तारूढ़ भाजपा के सामने विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा अखिलेश यादव हैं। कई मौके ऐसे आए हैं, जब अखिलेश यादव ने अपनी रणनीति से भाजपा को झटका दिया है। लेकिन प्रदेश की सियासत में भाजपा संगठन हमेशा इस चुनौती को पार कर जाती है। जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोकदल के साथ संभावित गठबंधन भी इसी कड़ी का हिस्सा है। जयंत भाजपा के साथ गए तो अखिलेश यादव की पश्चिम उत्तर प्रदेश मुहिम को तगड़ा नुकसान हो सकता है। वैसे ये पहला मौका नहीं है जब भाजपा ने अखिलेश के सहयोगियों को ही पाले में कर लिया हो। 2018 के लोकसभा उपचुनाव से ये सिलसिला जारी है। याद कीजिए 2018 का वो लोकसभा उपचुनाव। 2017 में प्रचंड जीत हासिल करने के बाद भाजपा के हौसले बुलंद थे। गोरखपुर से सांसद योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बन चुके थे। वहीं फूलपुर से सांसद केशव प्रसाद मौर्य डिप्टी सीएम बनाए जा चुके थे। दोनों ने ही संसदीय सीट से इस्तीफा दिया और विधान परिषद सदस्य चुन लिए गए। इसी गोरखपुर और फूलपुर सीट पर उपचुनाव 2018 को हुआ। उपचुनाव से पहले भाजपा उत्साह से लबरेज थी। माना जा रहा था कि ये चुनाव महज औपचारिकता ही हैं, गोरखपुर पहले से योगी का गढ़ माना जाता था, वहीं फूलपुर में केशव प्रसाद माैर्य भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रहे थे और अच्छी पकड़ मानी जाती थी। लेकिन भाजपा के ‘शोर’ के बीच समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव नई रणनीति के साथ मैदान में उतर रहे थे। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन का लाभ उन्हें नहीं मिला। बुरी हार के बाद अखिलेश ने छोटे दलों को साधने की नई रणनीति पर काम करना शुरू किया। इसी क्रम में निषाद पार्टी के साथ सपा ने गठबंधन किया और संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद को गोरखपुर से सपा के सिंबल पर चुनाव मैदान में उतारा गया। वहीं दूसरी तरफ फूलपुर से अखिलेश ने नागेंद्र सिंह पटेल को चुनाव मैदान में उतारा।

अखिलेश की ये रणनीति सफल रही और भाजपा को गोरखपुर और फूलपुर दोनों जगह अप्रत्याशित करारी हार का सामना करना पड़ा। गोरखपुर की हार इतनी बड़ी थी कि 29 साल बाद पहली बार वहां गोरक्षपीठ का वर्चस्व टूटा था। प्रवीण निषाद ने भाजपा के उपेंद्र दत्त शुक्ला को मात दी। वहीं फूलपुर में नागेंद्र सिंह पटेल ने भाजपा के कौशलेंद्र सिंह पटेल को हरा दिया। इस जीत के बाद अखिलेश जश्न मना रहे थे, वहीं सकते में आई भाजपा अपनी नई रणनीति पर काम करने में जुट गई।

2019 का लोकसभा चुनाव आते-आते संजय निषाद की निषाद पार्टी समाजवादी पार्टी का साथ छोड़कर भाजपा के साथ चले गए। वही प्रवीाण निषाद जिन्होंने उपचुनाव में भाजपा को हराया था, 2019 के लोकसभा चुनाव में संत कबीर नगर से भाजपा के टिकट पर लड़े और आसानी से जीत गए। जाहिर है भाजपा ने अखिलेश यादव को पहला झटका दे दिया था। इसके बाद 2022 का चुनाव आते-आते अखिलेश ने अपने कुनबे में फिर से छोटे दलों को जोड़ने पर ध्यान केंद्रित किया। इसी क्रम में उन्होंने एक तरफ अपना दल कमेरावादी कमेरावादी की पल्लवी पटेल काे साथ लिया वहीं ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा को जोड़ा।

अखिलेश की ओम प्रकाश राजभर को जोड़ने की रणनीति अच्छी मानी गई। क्योंकि 2017 विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ राजभर गठबंधन में थे और चार सीटें उनके खाते में आई थीं। वह भाजपा सरकार में मंत्री भी बनाए गए लेकिन अनबन होने के चलते बीच में ही गठबंधन से दूर हो गए थे। 2022 में अखिलेश ने उन्हें सपा के साथ गठबंधन में शामिल किया। इस चुनाव में दोनों दलों काे लाभ हुआ। ओम प्रकाश राजभर की सीटें बढ़कर 6 हो गईं। यही नहीं गाजीपुर से आजमगढ़ तक सपा के प्रदर्शन में ओम प्रकाश राजभर के साथ गठबंधन का विशेष योगदान भी माना गया। लेकिन चुनाव बाद भाजपा ने ओम प्रकाश राजभर को पाले में लाने की जुगत भिड़ाए रखी और आखिरकार राजभर की पार्टी सुभासपा एक बार फिर एनडीए में वापसी कर चुकी है।

प्रमुख दलों की बात करें तो अखिलेश यादव इस समय यूपी में कांग्रेस, राष्ट्रीय लोकदल के साथ आगे बढ़ रहे थे। लोकसभा चुनाव से पहले सपा की तरफ से 7 सीटें रालोद को देने की बात भी आई। अखिलेश यादव की तरफ से कांग्रेस को भी 11 सीटें देने की बात कही गई हालांकि कांग्रेस की तरफ से कोई पुष्टि नहीं हुई। बहरहाल, पश्चिम उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल के साथ सपा की दावेदारी काफी मजबूत मानी जा रही थी। कारण ये था कि किसान आंदोलन से लेकर तमाम मुद्दों पर जयंत चौधरी ने कई जिलों में जमीन पर काफी मेहनत की। उसका फायद भी उन्हें विधानसभा चुनावों में मिला। 2022 के विधानसभा चुनाव में जयंत चौधरी की रालोद ने सपा गठबंधन के साथ मिलकर 8 सीटें जीतीं। महज एक सीट पर आ सिमटी रालोद के लिए ये बड़ी छलांग थी। ऐसे समय में जब बसपा जैसे दल के पास सिर्फ एक विधायक हैं, जयंत 8 विधायक लेकर मजबूती से खड़े हैं।

लेकिन भाजपा अखिलेश के इस मजबूत साथ को तोड़ने के लिए बैकडोर से प्रयास जारी रखी। हाल ही में खबरें आने लगीं कि जयंत चौधरी को भाजपा ने 4 सीटों का ऑफर दिया है। कुछ सीटों पर और बात चल रही है। इस बीच शुक्रवार को केंद्र सरकार ने चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देने की घोषणा कर दी। जयंत लगातार इसके लिए प्रयासरत थे। घोषणा के फौरन बाद जयंत चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक्स पर किए गए पोस्ट को रिपोस्ट करते हुए लिखा गया, ” दिल जीत लिया! “

इस बयान के बाद चर्चाएं तेज हैं कि जयंत चौधरी अब भाजपा में जा रहे हैं। अगर ऐसा होता है तो अखिलेश यादव के लिए पश्चिम उत्तर प्रदेश में बुरी खबर ही कही जाएगी। किसान नेता चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न दिए जाने की घोषणा के बाद जयंत चौधरी ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी लोगों की भावनाओं को समझते हैं। भाजपा से गठबंधन के सवाल पर जयंत ने कहा कि मैं किस मुंह से इंकार करूंगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेरे पिता अजित सिंह का सपना साकार किया है। प्रधानमंत्री देश की मूल भावना को समझते हैं। मेरे लिए यह यादगार और भावुक करने वाला पल है।

क्या बीजेपी में शामिल होंगे आरएलडी के जयंत चौधरी?

आरएलडी के जयंत चौधरी या बीजेपी में भी शामिल हो सकते हैं! उत्तर प्रदेश में एक बार फिर विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. को झटका लगता दिख रहा है। दावा किया जा रहा है कि विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. के सहयोगी राष्ट्रीय लोक दल की भारतीय जनता पार्टी के साथ नजदीकी बढ़ रही है। रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी भाजपा के संपर्क में हैं। आने वाले दिनों में भाजपा के साथ राष्ट्रीय लोक दल का गठबंधन हो सकता है। इन कयासबाजियों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में भूचाल ला दिया है। भाजपा- रालोद गठबंधन की सुगबुगाहट ने ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज कर दी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए भाजपा लगातार एक मजबूत साथी की तलाश में दिख रही है। पहले भी कई बार राष्ट्रीय लोक दल को साधने की कोशिश की गई। हालांकि, अब तक जयंत चौधरी भाजपा के साथ जाने के लिए तैयार नहीं दिख रहे थे। उनकी नीति ने विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. को जाटलैंड में मजबूत बनाया था। अब उनके बदले रुख से इस इलाके में I.N.D.I.A. की धार कमजोर हो सकती है। पिछले दिनों में समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव और जयंत चौधरी की मुलाकात हुई। इसके बाद अखिलेश यादव ने जयंत चौधरी के साथ लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर गठबंधन का ऐलान किया। इस ऐलान को एक तरफा माना जा रहा है। दावा किया जा रहा है कि अखिलेश यादव ने सीटों के मुद्दे पर जयंत चौधरी को कोई वाजिब आश्वासन नहीं दिया है। दरअसल, जयंत चौधरी विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. के तहत कम से कम 12 सीटों की मांग कर रहे हैं। वहीं, समाजवादी पार्टी 4 से 5 सीटों पर राष्ट्रीय लोक दल के उम्मीदवार खड़ा करने का भरोसा दे रही है। सूत्रों का दावा है कि समाजवादी पार्टी ने रालोद को ऑफर दिया है कि वह अपने जिताऊ उम्मीदवारों को समाजवादी पार्टी के सिंबल पर चुनावी मैदान में उतर सकते हैं। लेकिन, जयंत चौधरी इसके लिए तैयार नहीं दिख रहे हैं।

भारतीय जनता पार्टी की ओर से भी जयंत चौधरी को 4 से 5 सीटों के दिए जाने का आश्वासन मिलने का दावा किया गया है। इसके बाद जयंत चौधरी और भाजपा के बीच की नजदीकियां बढ़ने लगी हैं। 12 फरवरी को जयंत चौधरी की बागपत की रैली के स्थगित किए जाने का कारण भी यही माना जा रहा है। लोकसभा चुनाव के मैदान में भाजपा और रालोद एक साथ उतार सकते हैं। इससे पश्चिमी उत्तर प्रदेश का समीकरण पूरी तरह से बदल जाएगा। जाट वोट बैंक का एक बड़ा वर्ग पिछले दिनों जयंत चौधरी के साथ जाता दिखा है। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी 2014 के बाद पहली बार पश्चिम उत्तर प्रदेश में उस स्तर पर मजबूत नजर नहीं आ रही है। पार्टी यूपी में मिशन 80 के साथ आगे बढ़ रही है।

दावा किया जा रहा है कि अगर जयंत चौधरी एनडीए में शामिल होते हैं तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ- साथ राजस्थान और हरियाणा में भी भाजपा की स्थिति मजबूत होगी। ऐसे में I.N.D.I.A. को एक और झटका आने वाले समय में लगने की संभावना बढ़ गई है। वहीं, भाजपा के साथ पिछली बार जब 2009 में रालोद ने मिलकर चुनाव लड़ा था तो 7 में से 5 सीटें जीतने में कामयाब हुई थी। उसके बाद से लोकसभा चुनाव में पार्टी का खाता भी नहीं खुल पाया है।

समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ सबसे बड़ी परेशानी उन्हें पुराने सहयोगियों को साथ जोड़कर रखने की रही है। अखिलेश के साथ जैसे ही कोई नया दल जुड़ता है, पुराने सहयोगी छिड़कने लगते हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश ने कांग्रेस को साथ जोड़ा था, लेकिन 2019 आते- आते गठबंधन धराशायी हो गया। लोकसभा चुनाव 2019 में बसपा के साथ गठबंधन किया। चुनाव परिणाम जारी होने के कुछ समय बाद गठबंधन टूट गया। कुछ यही स्थिति यूपी विधानसभा चुनाव 2022 के नतीजे के बाद दिखी। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर अखिलेश यादव पर गंभीर आरोप लगाते हुए गठबंधन से बाहर हो गए। इसी प्रकार महान दल और अन्य छोटी-छोटी पार्टियों ने भी अखिलेश से किनारा कर लिया।

लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन करते दिख रहे हैं। माना जा रहा है कि राहुल गांधी की न्याय यात्रा के दौरान अखिलेश यादव उनके मंच पर रायबरेली या अमेठी में दिख सकते हैं। ऐसे में समाजवादी पार्टी अब किसी अन्य दल को उस स्तर पर तरजीह देने के मूड में नहीं है। कांग्रेस के लिए भी अखिलेश ही सीटें तय कर रहे हैं। रालोद को अधिक भाव देने के मूड में नजर नहीं आ रहे। पार्टी के भीतर नेताओं के बीच लोकसभा चुनाव का उम्मीदवार बनने की होड़ है। 2019 के लोकसभा चुनाव में मायावती से गठबंधन के बाद बड़े पैमाने पर पार्टी नेताओं की नाराजगी सामने आई थी। चुनाव में बड़े दल के साथ गठबंधन के कारण समाजवादी पार्टी को अपनी सीटें देनी पड़ती हैं। इस कारण कार्यकर्ताओं की नाराजगी सामने आती रही है।

लोकसभा चुनाव 2019 में भी सपा लोकसभा चुनाव 2014 की तर्ज पर महज 5 सीट जीतने में कामयाब रही थी। पिछले 5 सालों में समाजवादी पार्टी ने रामपुर और आजमगढ़ जैसा अपना गढ़ भारतीय जनता पार्टी के हाथों गंवाया है। ऐसे में कांग्रेस के साथ गठबंधन के बाद पार्टी अपने कार्यकर्ताओं और कोर वोट बैंक को किसी भी स्थिति में नाराज करने के मूड में नहीं है। कांग्रेस का दावा 20- 25 सीटों का है। वहीं, रालोद को 12 सीटें चाहिए। मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद अखिलेश के सामने अब अग्निपरीक्षा है। हालांकि, सहयोगियों को साधकर चलने में वे अभी कामयाब होते नहीं दिख रहे हैं।

राहुल गांधी की न्याय यात्रा ने कांग्रेस के लिए परेशानी बढ़ाई हुई है। पूर्वोत्तर से बंगाल होते बिहार में प्रवेश करने के साथ ही कांग्रेस को बड़ा झटका लगा। विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. की नींव तैयार करने वाले बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने यह झटका दिया। वे I.N.D.I.A. से अलग हो गए। एक बार फिर एनडीए के पाले में जाकर नीतीश कुमार ने नौंवी बार प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ग्रहण किया। न्याय यात्रा बंगाल पहुंची तो तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष और सीएम ममता बनर्जी ने राहुल गांधी पर करारा हमला बोला। बीड़ी पत्ता किसानों के बीच पहुंचने पर तंज कसा। बंगाल में 40 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा कर दी। वहीं, यूपी में 14 फरवरी को न्याय यात्रा प्रवेश करेगी। इससे पहले ही पश्चिमी यूपी के जाटलैंड की ताकतवर पार्टी रालोद के साथ छोड़ने की सुगबुगाहट तेज हो गई है।

आखिर आरक्षण की सीमा क्यों हटाना चाहती है कांग्रेस?

वर्तमान में कांग्रेस आरक्षण की सीमा हटाना चाहती है! जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव की तारीख नजदीक आ रही है वैसे-वैसे सभी राजनीतिक दल अपने तरकश से मारक तीर निकाल रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान एक नया सियासी दांव चला है। उन्होंने कल कहा है कि अगर केंद्र में इंडिया गठबंधन की सरकार बनती है तो आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा को खत्म कर दिया जाएगा। राहुल ने एक्स पर एक वीडियो पोस्ट कर लिखा कि आरक्षण पर जो 50% की लिमिट है, हम उसे उखाड़कर फेंक देंगे। ये कांग्रेस और INDIA की गारंटी है। पिछले साल कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी कहा था कि अगर उनके गठबंधन की सरकार केंद्र में बनती है तो 50 प्रतिशत आरक्षण सीलिंग को खत्म कर दिया जाएगा। 1992 में इंदिरा साहनी जजमेंट जिसे मंडल जजमेंट भी कहा जाता है, उसमें आरक्षण की सीमा को लेकर फैसला दिया गया था। जजमेंट के मुताबिक सरकार 50 फीसदी से ज्यादा रिजर्वेशन नहीं दे सकती। सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की बेंच ने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि रिजर्वेशन की लिमिट 50 फीसदी की सीमा क्रॉस नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि संविधान के अनुच्छेद-16 (4) कहता है कि पिछड़ेपन का मतलब सामाजिक पिछड़ेपन से है। शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ेपन, सामाजिक पिछड़ेपन के कारण हो सकते हैं लेकिन अनुच्छेद-16 (4) में सामाजिक पिछड़ेपन एक विषय है। अगर रिजर्वेशन में कोई सरकार 50 फीसदी की सीमा को पार करती है तो वह कानूनी जांच के दायरे में होगा और जो मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था है उसमें टिक पाना मुश्किल है।

सुप्रीम कोर्ट ने1992 में 9 जजों की संवैधानिक पीठ ने 6-3 के बहुमत से फैसला सुनाया था। उसने 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण को कामय रखा था। सिर्फ अपवादों को छोड़ उसने आरक्षण की 50 फीसदी सीमा तय करने का फैसला सुनाया था। बाद में 1994 में संविधान में 76वां संशोधन हुआ था। इसके तहत तमिलनाडु में रिजर्वेशन की सीमा 50 फीसदी से ज्‍यादा कर दी गई थी। यह संशोधन संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल किया गया है। राहुल गांधी के ओबीसी आरक्षण की सीमा खत्म करने के बयान के पीछे कांग्रेस का राजनीतिक दांव माना जा रहा है। दरअसल, बीजेपी राम मंदिर के जरिए अपने कोर वोटरों के साथ-साथ ओबीसी वोटरों को भी लुभा रही है। कांग्रेस को ये पता है कि इस पिच पर वह बीजेपी का मुकाबला नहीं कर पाएगी। ऐसे में राहुल गांधी ने अपनी यात्रा के दौरान ओबीसी आरक्षण की सीमा खत्म करने का दांव चला है। राहुल ने एक्स पर जो वीडियो पोस्ट किया है उसमें कहा है कि संविधान में जो प्रावधान है उसे मुताबिक 50 फीसदी से अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता है। लेकिन कांग्रेस और इंडिया गठबंधन इसे उखाड़ फेकेगी। उन्होंने साथ ही कहा कि आदिवासियों और दलितों के आरक्षण में कोई कटौती नहीं होगी।

जब कांग्रेस ने जाति जनगणना कराने की मांग शुरू की तो पीएम नरेंद्र मोदी ने इसकी काट के लिए कहा था कि उनके लिए तो केवल दो जातियां हैं अमीर और गरीब। पिछले साल हुए 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी और पीएम मोदी ने इसी तर्ज पर चुनाव प्रचार किया। बीजेपी ने 5 में से तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में चुनाव जीत लिया। कांग्रेस के दांव की काट खोजते हुए पीएम मोदी ने तब चार स्तंभ का जिक्र किया था। महिला, किसान, गरीब और युवा। पीएम मोदी ने यूपी के बुलंदशहर के चुनाव प्रचार के दौरान भी इन चारों स्तंभ का जिक्र किया था। ऐसे में कांग्रेस के पास इसकी काट के लिए कोई चुनावी हथियार होना जरूरी हो गया था। माना जा रहा है कि राहुल ने जिस तरीके से ओबीसी आरक्षण की सीमा को खत्म करने की बात कही है वो पीएम मोदी के बयान का तोड़ है।

राहुल की भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान इस बयान के भी सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। दरअसल, कांग्रेस का प्लान बीजेपी के ओबीसी वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश है। पिछले दो लोकसभा चुनावों में बीजेपी को ओबीसी वोटरों का बड़ा समर्थन मिला था। देश में ओबीसी वोट बैंक काफी मजबूत और बड़ा है। सभी दल चुनावी वैतरणी पार करने के लिए ओबीसी वोटरों पर फोकस करती है। पिछले तीन लोकसभा चुनावों में बीजेपी का ओबीसी वोट बैंक लगातार बढ़ता गया है। 2009 के आम चुनाव में भगवा दल को 22 फीसदी ओबीसी वोट मिले थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 34 फीसदी ओबीसी वोट मिले। वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी 44 प्रतिशत ओबीसी वोट हासिल कर लिए। जाहिर है अगर बीजेपी के साथ देश का करीब-करीब आधा ओबीसी वोटर इस मजबूती से जुड़े रहेंगे तो कांग्रेस के लिए 2024 के आम चुनाव में मुश्किल होगी। इसलिए राहुल के आरक्षण की सीमा खत्म करने के दांव को उसी से जोड़कर देखा जा रहा है।

राहुल गांधी पिछले काफी वक्त से जाति जनगणना और ओबीसी आरक्षण के मुद्दे पर हमलावर हैं। लेकिन बीजेपी की सियासी गणित के कारण उनको सफलता नहीं मिल पा रही है। बीजेपी ओबीसी वोटरों को खुद से जोड़े रखने के लिए बड़ा अभियान चला रही है। अब राहुल ने भी ओबीसी वोट के लिए दांव चल दिया है। लेकिन राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के बाद बीजेपी ने जिस आक्रामक तरीके से ओबीसी वोटरों को साधने का प्रयास किया है उससे कांग्रेस के लिए राह उतनी आसान नहीं रहने वाली है। राहुल ने एक दांव चला तो जरूर है लेकिन आम चुनाव में इसका कांग्रेस को क्या फायदा होगा ये देखना रोचक होगा।

इस बार के भारत रत्न से क्या साबित करना चाहती है मोदी सरकार?

आज हम आपको बताएंगे कि इस बार के भारत रत्न से मोदी सरकार क्या साबित करना चाहती है!लोकसभा चुनाव के ऐलान से पहले ही बीजेपी ने विपक्षी दलों को धराशाही करने का मन बना लिया है। बीजेपी का फोकस 400 सीटों पर है, जिसके चलते बीजेपी एक के बाद एक दांव चल रही है। इसी कड़ी में बीजेपी ने शुक्रवार को तेलंगाना और आंध्र को चुनावी तौर पर साधने की कोशिश की है। केंद्र की एनडीए सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित करने का फैसला किया है। 2019 में दिग्गज कांग्रेस नेता और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न मिलने के बाद बीजेपी ने एक और दिग्गज कांग्रेस नेता और पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि नरसिम्हा राव को भारत रत्न देने के पीछे 2024 लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी की एक सोची-समझी राजनीतिक चाल है। इस फैसले से बीजेपी ने गांधी परिवार को निशाने पर लिया है। दरअसल पीएम मोदी कई बार कांग्रेस और गांधी परिवार पर राव को अपमानित करने का आरोप लगा चुके हैं। ऐसे में जिसका कांग्रेस ने सम्मान नहीं किया, उसका सम्मान बीजेपी कर रही है। वहीं दूसरी तरफ बीजेपी इस फैसले के जरिए राव के गृह राज्य आंध्र प्रदेश के मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश भी कर रही है।  पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह, पी वी नरसिम्हा राव और मशहूर वैज्ञानिक व देश में हरित क्रांति के जनक डॉ एम एस स्वामीनाथन को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को खुद ‘एक्स’ पर पोस्ट के जरिए यह घोषणा करते हुए तीनों के योगदान की सराहना की। इस साल अब तक 5 लोगों को भारत रत्न देने की घोषणा हुई है, जो कि अब तक की सर्वाधिक संख्या है। कुछ दिनों पहले ही सरकार ने जननायक कर्पूरी ठाकुर और पूर्व उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के लिए भारत रत्न की घोषणा की थी।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ‘एक प्रतिष्ठित विद्वान और राजनेता के रूप में नरसिम्हा राव ने विभिन्न पदों पर रहते हुए भारत की व्यापक सेवा की। उन्हें आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और कई वर्षों तक संसद सदस्य और विधान सभा सदस्य के रूप में किए गए कार्यों के लिए भी याद किया जाता है।’ मोदी ने कहा कि उनके दूरदर्शी नेतृत्व ने भारत को आर्थिक रूप से उन्नत बनाने, देश की समृद्धि और विकास के लिए एक ठोस नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा, ‘प्रधानमंत्री के रूप में नरसिम्हा राव का कार्यकाल महत्वपूर्ण कदमों से भरा था, जिसने भारत को वैश्विक बाजारों के लिए खोला और इससे आर्थिक विकास के एक नए युग की शुरूआत हुई।’ प्रधानमंत्री ने कहा कि इसके अलावा, भारत की विदेश नीति, भाषा और शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान एक नेता के रूप में उनकी बहुमुखी विरासत को रेखांकित करता है। उन्होंने कहा, ‘नरसिम्हा राव ने न केवल महत्वपूर्ण परिवर्तनों के माध्यम से भारत को दिशा दी बल्कि उसकी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को भी समृद्ध किया।’ संयुक्त आंध्र प्रदेश में जन्में नरसिम्हा राव वर्ष 1991 से 1996 तक भारत के प्रधानमंत्री पद पर रहे थे।

कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी ने पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव को ‘भारत रत्न’ दिए जाने की घोषणा का शुक्रवार को स्वागत किया। सोनिया गांधी ने कहा, ‘मैं इसका (घोषणा) स्वागत करती हूं। क्यों नहीं?’ प्रधानमंत्री बनने से पहले राव विदेश मंत्री, गृह मंत्री और रक्षा मंत्री सहित कई अन्य महत्वपूर्ण पदों पर भी रहे। वे 1971 से 73 तक आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। राव का जन्म 28 जून 1921 को करीमनगर में हुआ था जो अब तेलंगाना का हिस्सा है।

नरसिम्हा राव भले ही भारत के आर्थिक सुधार के जनक मानते जाते हैं, लेकिन उनकी गांधी परिवार से दूरी जगजाहिर थी, लेकिन उनका गांधी परिवार से दूरी जगजाहिर थी। यहां तक की बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बार-बार कांग्रेस पर नरसिम्हा राव की उपेक्षा करने और उनकी जयंती नहीं मनाने का आरोप लगाया है। उनके विरोधियों का एक तर्क ये भी है कि 2004 में राव के पार्थिव शरीर को कांग्रेस मुख्यालय में ले जाने की अनुमति नहीं दी गई थी, जिसका इस्तेमाल वो कांग्रेस पर निशाना साधने के लिए करते हैं। दिसंबर 2004 में, जब राव का निधन हुआ, उनके पार्थिव शरीर को कांग्रेस मुख्यालय के मुख्य द्वार के बाहर रखा गया था और उन्हें अंदर जाने की अनुमति नहीं दी गई थी। हालांकि सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह जैसे वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि दी गई थी, लेकिन यह कांग्रेस मुख्यालय के बाहर ही किया गया था। जब से राव का निधन हुआ, उनके परिवार को लगता है कि गांधी परिवार ने उनके साथ उचित व्यवहार नहीं किया।

नरसिम्हा राव, अविभाजित आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के बड़े नेता और दक्षिण भारत से पहले प्रधानमंत्री बनने वाले व्यक्ति थे। पीएम मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि देते हुए इसे भुलाया नहीं था। पीएम मोदी ने ट्वीट किया, ‘नरसिम्हा राव को आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री, केंद्र मंत्री और कई वर्षों तक सांसद और विधायक के रूप में उन्होंने जो काम किया, उसके लिए भी उन्हें याद किया जाता है।’ यह घटनाक्रम तब सामने आया है जब बीजेपी दक्षिण में अपना दायरा बढ़ाना चाहती है, पार्टी लोकसभा सीटों के मामले में उत्तरी राज्यों में लगभग पूरी तरह से स्थापित है। बीजेपी दक्षिण भारत में तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में अपनी सीटों का एक बड़ा हिस्सा हासिल करने पर ध्यान दे रही है।बीजेपी चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी और अभिनेता-राजनेता पवन कल्याण की जन सेना पार्टी (जेएसपी) के साथ भी लगातार संपर्क में है।

लोकसभा चुनाव में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है। BJP इस चुनाव में 400 सीटों का लक्ष्य लेकर तैयारियों में जुटी है। 2019 के लोकसभा चुनाव में BJP ने 303 सीटें जीती थी। पीएम नरेंद्र मोदी के नाम और नैशनलिज्म की लहर पर सवार BJP ने 2014 के लोकसभा चुनाव से भी ज्यादा सीट और वोट पर्सेंट हासिल किया। 2014 में 31% वोट और 282 सीटें मिली थीं। 2019 में वोट पर्सेंट बढ़कर 37 हो गया। अब जबकि BJP ने 400 सीटें जीतने का टारगेट रखा है तो जाहिर है कि उसे वोट पर्सेंट भी बढ़ाना होगा, साथ ही नई सीटों पर, जहां बीजेपी पहले नहीं जीती थी, वहां भी जीत हासिल करनी होगी।

तेलंगाना के उपमुख्यमंत्री मल्लू भट्टी विक्रमार्क और भारत राष्ट्र समिति बीआरएस के अध्यक्ष एवं तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव को ‘भारत रत्न’ पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की शुक्रवार को सराहना की। विक्रमार्क ने देश के विकास में नरसिम्हा राव के शानदार योगदान को याद करते हुए कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया जाना तेलंगाना और कांग्रेस के लिए गर्व की बात है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री को यह पुरस्कार देने के लिए केंद्र को धन्यवाद दिया और कहा कि नरसिम्हा राव द्वारा रखी गई आर्थिक सुधारों की नींव के कारण भारत आज दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर उभरा है। उन्होंने एक विज्ञप्ति में कहा, ‘मुझे लगता है कि महान राजनेता और बहुभाषाविद् नरसिम्हा राव को भारत रत्न मिलना कांग्रेस और तेलंगाना के लिए गर्व की बात है।’ चन्द्रशेखर राव केसीआर ने कहा कि धरती पुत्र नरसिम्हा राव के लिए भारत रत्न पुरस्कार तेलंगाना के लोगों को दिया गया सम्मान है। उन्होंने एक विज्ञप्ति जारी कर कहा, ‘केसीआर, बीआरएस की मांग का सम्मान करते हुए पी वी नरसिम्हा राव को भारत रत्न से सम्मानित करने के लिए केंद्र को धन्यवाद देते हैं।’

क्या भारत गायब कर देगा चीनी बाजार?

आने वाले समय में भारत अब चीनी बाजार गायब करने वाला है! चीन की कहानी बिगड़ चुकी है। अपने शेयर बाजारों में जान फूंकने के लिए उसने पूरी ताकत झोंक दी है। लेकिन, उसे अब तक कामयाबी हाथ नहीं लगी है। चीन के शेयर बाजार उसकी अर्थव्‍यवस्‍था की बिगड़ती सेहत की ओर इशारा कर रहे हैं। 2023 में ड्रैगन के सीएसआई 300 स्टॉक मार्केट इंडेक्स ने 15 फीसदी नुकसान झेला है। इस दौरान विदेशी निवेशकों ने उसके शेयरों में ताबड़तोड़ बिकवाली की। दुनिया को इसमें चीन की स्‍टोरी का ‘द एंड’ होता दिखता है। लेकिन, आपको अंदाजा है कि इस पूरी कहानी में फायदा उठाने वाला सबसे बड़ा किरदार कौन है? कोई और नहीं वह भारत है। भारतीय शेयर बाजार इसी दौरान 20 फीसदी उछल गए। इस कामयाबी में विदेशी निवेशकों की बड़ी हिस्‍सेदारी रही। उन्‍होंने हमारे बाजारों में दिल खोलकर पैसा लगाया। इस दौरान उन्‍होंने 21 अरब डॉलर से ज्‍यादा की खरीदारी की। पिछले साल शेयर बाजार में शायद जो कुछ हुआ वह चीनी सरकार को पसंद नहीं आया है। उसे लगा कि वह भारत से हार रही है। इसलिए उसने सारे तिकड़म लगाने शुरू कर दिए। हाल ही में उसने स्टॉक ट्रेडिंग पर टैक्स आधा कर दिया है। चीनी सरकार चाहती है कि ज्‍यादा लोग निवेश करें। बैंकों को अपने पास कितना पैसा रखना होगा, इस लेकर उसके सेंट्रल बैंक ने नियमों में ढील दी। इसका मतलब है कि बाजार में ज्‍यादा पूंजी उपलब्ध हो।

सरकार समर्थित चीनी कंपनियों या जिन्हें जानकार ‘नेशनल टीम’ कहते हैं, उन्हें भी बाजारों में निवेश करने के लिए प्रोत्‍साहित किया गया है। उन्होंने पिछले महीने में लगभग 10 अरब डॉलर मूल्य के चीनी शेयरों में निवेश किया है। यह सब बाजार को सहारा देने के लिए किया गया है। सवाल यह है कि क्या चीन का सरकारी हस्तक्षेप उसके शेयर बाजार को बचा पाएगा? अगर आप पीछे यानी 2015 में जाएंगे तो आपको लगेगा कि इसका जवाब ‘हां’ है। उस समय भी CSI 300 क्रैश हुआ था। इसे उबारने के अंतिम प्रयास में चीनी सरकार ने पहली बार ‘नेशनल टीम’ का गठन किया था। उन लोगों ने बाजार में जमकर पैसा लगाया। चीनी शेयर बाजार की लगभग 6 फीसदी हिस्‍सेदारी खरीद ली गई। साल के अंत तक CSI 300 ने अमेरिकी S&P 500 से बेहतर प्रदर्शन किया था। जब चीनी सरकार समर्थित कंपनियों ने शेयर बाजार में निवेश किया तो इसने अन्य निवेशकों को एक मैसेज दिया। मैसेज था- अगर सरकार इन शेयरों पर अपना पैसा लगाने को तैयार है तो वे क्यों नहीं? उनके निवेश से बाजार में लिक्विडिटी में भी सुधार हुआ। नतीजा यह हुआ कि शेयरों की कीमतें छोटी अवधि में स्थिर हो गईं।

यही कारण है कि ‘नेशनल टीम’ फिर से एक्टिव है। लेकिन, हर कोई इस बात से सहमत नहीं है कि जो 2015 में काम आया वह चीन में 2024 में भी काम करेगा। दरअसल, चीन की अर्थव्यवस्था उस समय काफी मजबूत स्थिति में थी। यह केवल शेयर बाजार का बुलबुला था जो फूट गया था। लिहाजा, निवेशक भी बुलबुला फूटने के बाद वापस आने को इच्छुक थे। हालांकि, आज हालात वैसे नहीं हैं।

चीन के सख्त लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था को चरमरा कर रख दिया है। बेलगाम निर्माण गतिविधि के कारण चीनी रियल एस्टेट डेवलपर्स डिफॉल्‍ट के कगार पर हैं। यहां तक कि चीनी उपभोग का भविष्य खतरे में है। यह सबकुछ इशारा करता है कि निवेशक चीनी कंपनियों के शेयर बेच रहे हैं। उन्हें आज चीन में वास्तविक आर्थिक समस्या का एहसास हो रहा है। निवेशक सरकारी हस्तक्षेप को अच्‍छा नहीं मानते हैं। ऐसे में वे दांव लगाने से बचेंगे। साथ ही उन्हें इस बात की भी चिंता हो सकती है कि जब सरकार इन शेयरों से बाहर निकलने का फैसला करेगी तो क्या होगा? इससे फिर बाजार औंधे मुंह गिर सकते हैं।

चीन की ‘नेशनल टीम’ को अपने बाजारों में स्थिरता लाने के लिए अब तक किए गए प्रयासों से लगभग तीन गुना ज्‍यादा ताकत लगानी होगी। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो इसका मतलब साफ होगा। जब चीनी सरकार समर्थित कंपनियों ने शेयर बाजार में निवेश किया तो इसने अन्य निवेशकों को एक मैसेज दिया। मैसेज था- अगर सरकार इन शेयरों पर अपना पैसा लगाने को तैयार है तो वे क्यों नहीं? उनके निवेश से बाजार में लिक्विडिटी में भी सुधार हुआ। नतीजा यह हुआ कि शेयरों की कीमतें छोटी अवधि में स्थिर हो गईं।विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों की ओर कूच करना जारी रखेंगे। विदेश के बड़े कारोबारी घराने पहले से ही भारतीय बाजारों पर फिदा हैं। जब उनका पैसा आएगा तो यह हमारे बाजार को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है।

वर्तमान में बच्चे क्यों कर रहे हैं भयावह हत्याएं?

वर्तमान में बच्चे भयावह हत्याएं करते जा रहे हैं! दिल्ली में एक लड़की हर रोज की तरह अपने भाई को स्कूल से लाने के लिए घर से निकलती है, उसे इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं होता है अगले कुछ मिनटों में उसके साथ क्या होने वाला है। दरअसल स्कूल के पास अचानक एक 16 साल का नाबालिग लड़का उस मासूम पर तेजाब फेंक देता है। हैरान करने वाली बात है कि वह लड़की उसे जानती तक नहीं थी और उसने एसिड से अटैक कर दिया। यह वारदात हर किसी को परेशान कर रही है। हर किसी के मन सवाल उठ रहा है कि लड़के ने एक अनजान लड़की पर तेजाब क्यों फेंका? पुलिस के मुताबिक, इस लड़के का किसी अन्य लड़की से विवाद हुआ था। इसके बाद वो काफी तनाव में था। लड़की से विवाद के बाद उसने गुस्से में आकर किसी अन्य लड़की पर तेजाब फेंक दिया। पुलिस ने इस मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 326B और 341 के तहत केस दर्ज किया है। यह पूरा मामला दिल्ली के बुराड़ी का है। बुराड़ी पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज से विडियो ग्राफिक्स बनवाकर आरोपी को पकड़ा। आरोपी इस लड़की को पहले से नहीं जानता था। उसने सामने आई इस लड़की पर अचानक हमला किया। घटना की जानकारी मिलने पर बुराड़ी थाने की पुलिस एक्टिव हुई। पुलिस ने संबंधित धाराओं में केस दर्ज कर घटनास्थल और उसके आसपास सीसीटीवी फुटेज को खंगाला। उसमें आरोपी के हुलिये को देखा, स्लो मोशन में उसके वीडियो ग्राफिक्स निकाले। जिसके बाद पुलिस आरोपी तक पहुंच पाई। डीसीपी ने कहा, ‘आरोपी के बारे में बताया गया है कि उसने नीली पैंट पहन हुई थी। बैकपैक और एडिडास स्पोर्ट्स जूते पहने हुए थे और चेहरे को सफेद रूमाल से ढका था।’ सावधानीपूर्वक जांच करने के बाद, सीसीटीवी टीम ने अपराध स्थल से लगभग दस मिनट की दूरी पर, लगभग एक किलोमीटर दूर भाग रहे एक लड़के की पहचान की। डीसीपी ने कहा, ‘हालांकि चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन लड़के का दिए गए विवरण से मेल खाता है।’ पीड़िता के इंस्टाग्राम अकाउंट की जांच से 5 संदिग्धों का पता चला जो उसके संपर्क में थे। सभी संदिग्धों की जांच के बावजूद कोई सफलता नहीं मिली। भागते हुए संदिग्ध के फुटेज का उपयोग करके एक धीमी गति वाला वीडियो तैयार किया गया था, जो टीमों के लिए अतिरिक्त जानकारी प्रदान करता था। क्षेत्र के स्कूलों से, उपलब्ध सुरागों के आधार पर निगरानी के लिए दो को शॉर्टलिस्ट किया गया।

पुलिस के मुताबिक, यह घटना 24 जनवरी को शास्त्री पार्क एक्सटेंशन में हुई थी। नाबालिग लड़की पर एक युवक ने केमिकल फेंका, जिसकी वजह से उसकी आंख, नाक और गले में चोट आई। घायल लड़की को नजदीकी अस्पताल ले जाया गया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद उसे छुट्टी मिल गई। पीड़ित लड़की ने इस घटना के लिए किसी पर शक जाहिर नहीं किया। पुलिस ने घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज चेक की, जिसकी जांच करने पर एक लड़के को क्राइम सीन से भागते हुए देखा गया। इस फुटेज में लड़के का चेहरा नजर नहीं आ रहा था। इस बीच पुलिस ने पीड़ित लड़की के इंस्टाग्राम अकाउंट की हिस्ट्री से पांच संदिग्धों के बारे में जानकारी जुटाई। उनकी भूमिका को चेक किया गया। लेकिन वारदात में इनका हाथ नहीं मिला। पुलिस ने इस एरिया के दो स्कूलों की निगरानी शुरू की। सुबह सात बजे से दूसरी शिफ्ट खत्म होने तक सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया। पुलिस ने एक संदिग्ध को चिन्हित किया। उस लड़के ने क्राइम सीन के नजदीक वाले रास्ते को चुना। आखिर में उसके शरीर की कद-काठी और फुटेज में नजर आए संदिग्ध को देख उसे पकड़ा गया। उससे बातचीत की गई तो उसने अपराध में अपना हाथ होने की बात स्वीकार ली। उसने पानी में कास्टिक पाउडर मिलाकर बोतल में भरने के बाद फेंका था।

नाबालिग लड़की ने बताया कि वह बुधवार को दोपहर करीब 1 बजे अपने 10 वर्षीय चचेरे भाई को स्कूल से लेने गई थी। शास्त्री पार्क एक्सटेंशन पर एक युवक पीड़िता के पास आया और उसने उस पर केमिकल फेंक दिया, जिससे उसकी आंखों, गर्दन और नाक पर खुजली और जलन होने लगी। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, ‘पीड़िता को बुराड़ी के सरकारी अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के बाद उसे छुट्टी दे दी गई।’ पीड़िता ने व्यक्तिगत दुश्मनी, या किसी लड़के के साथ प्रेम संबंध से साफ इंकार किया है। पुलिस ने बताया कि अपराध स्थल पर कोई सीसीटीवी कैमरा नहीं था। पुलिस उपायुक्त मनोज कुमार मीना ने कहा, ‘इस केस को सुलझाने के लिए कई टीमें लगाई गईं। एक टीम ने पीड़िता की प्रोफाइलिंग, उसकी सोशल मीडिया हिस्ट्री, पिछले कॉन्टैक्ट्स और अन्य जानकारी पाने का प्रयास किया। एक अन्य टीम को अपराध स्थल की ओर जाने वाली 6 सड़कों के सीसीटीवी फुटेज की समीक्षा करने, संदिग्ध द्वारा उठाए गए संभावित मार्गों का अस्थायी मानचित्र बनाने का काम सौंपा गया था।’ तीसरी टीम, सादे कपड़ों में स्कूलों के पास तैनात हो गई।

आखिर क्यों बढ़ रहे हैं देश में हत्याओं के मामले?

देश में वर्तमान में हत्याओं के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं! हाल ही में रिलीज हुई एनिमल मूवी का यह गीत इतने खून-खराबे के साथ पर्दे पर फिल्माया गया है, शायद ही कमजोर दिल के लोग इसे देख पाएं। हद तो तब हो जाती है जब फिल्म का हीरो विलेन की गर्दन को ISIS के आतंकी की तरह लहुलूहान कर देता है। यहां मसला एक फिल्म का नहीं है, बल्कि मिर्जापुर जैसी तमाम वेब सीरीज और पंजाबी एल्बम सॉन्ग में खुलेआम परोसी जा रही हिंसा का है। दरअसल अब पर्दे पर फिल्माए जा रहे क्राइम सीन आम जीवन में भी देखने को मिल रहे हैं। मामला अब गंभीर होता जा रहा है। ताजा उदाहरण आज ही देखने मिला है। दिल्ली में बेखौफ शूटर ने सैलून में घुसकर एक शख्स की खोपड़ी खोल दी है। इससे पहले फेसबुक लाइव के दौरान एक नेता की गोली मारकर हत्या का मामला सामने आया है। महाराष्ट्र में बीजेपी विधायक ने शिवसेना नेता को पुलिस स्टेशन के भीतर गोलियों से भून डाला। यह घटना डरा रही है। आखिर फिल्मी अंदाज में हो रहीं हत्याओं का जिम्मेदार कौन है? यह सवाल अब उठने लगा है। इस सवाल के जवाब में जितनी देरी होगी, उतनी ही जघन्य हत्याओं के मामलों में इजाफा होगा। समाज के अधिकांश बुद्धिजीवी मानते हैं कि इन हत्याओं के पीछे फिल्में और क्राइम वेब सीरीज हैं। उनका तर्क है कि फिल्मों में हीरो को सरेआम मर्डर करते हुए दिखाया जाता है। यह फिल्में और वेब सीरीज अपराध का महिमामंडन करती है। अपराध को ग्लैमर की तरह पेश करती हैं। जिसका सीधा असर लोगों के दिमाग पर पड़ता है। खासतौर पर युवाओं के दिमाग पर। उन्हें लगता है कि हत्या का मॉर्डन स्टाइल कूल है। लेकिन वह इस बात को भूल जाते हैं कि रील और रियल लाइफ में जमीन और आसमान का फर्क है, और अपराध की दुनिया में फंस जाते हैं। सोशल मीडिया साइट्स भी बढ़ते अपराध के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं, क्योंकि सोशल साइट्स पर भी हिंसा को बढ़ावा देने वाली रील दिनभर वायरल होती हैं। हाल ही में पब्लिक प्लेस में हुए मर्डर के कुछ वीडियो तो रोंगटे खड़े करने वाले हैं।

मुंबई में कैमरे पर दनादन फायरिंग और शिवसेना उद्धव गुट के एक नेता की लाइव हत्या का मंजर दहला देने वाला है। फेसबुक पर जिस किसी ने यह खौफनाक वीडियो देखा वह दंग रह गया। लाइव मर्डर की तस्वीरों को देखकर हर कोई दहल गया। मुंबई में हुए इस मर्डर में शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट के पूर्व नगर सेवक अभिषेक घोषालकर को गोली मारी गई और वो भी फेसबुक लाइव के दौरान।ऐसा मर्डर शायद ही इससे पहले कभी देखा गया हो। वहीं हाल ही में महाराष्ट्र के उल्हासनगर में हिल लाइन पुलिस स्टेशन के अंदर बीजेपी विधायक गणेश गायकवाड़ ने कथित तौर पर शिवसेना नेता महेश गायकवाड़ को गोली मार दी। दोनों नेताओं के बीच कथित तौर पर जमीन को लेकर विवाद चल रहा था।

श्री राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुखदेव सिंह गोगामेड़ी की बीते साल 5 दिसंबर को जयपुर में गोली मार कर हत्या कर दी गई। सुखदेव सिंह को जयपुर के श्यामनगर इलाके में गोली मारी गई। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर भी वायरल हुआ था। वीडियो में बदमाश फिल्मी स्टाइल में फायरिंग करते हुए सुखदेव सिंह गोगामेड़ी को मौत के घाट उतार देते हैं। सुखदेव सिंह का राजनीति में काफी अच्छा वर्चस्व था। गोगामेड़ी की हत्या की जिम्मेदारी लॉरेंस बिश्नोई गैंग के साथी रोहित गोदारा ने ली।

दिल्ली में बीते साल हत्या की एक घटना को कुछ तरह से अंजाम दिया गया जिसे देखकर हर किसी के रोंगटे खड़े हो गए। हत्या की यह घटना तब सुर्खियों में आई जब इसका सीसीटीवी फुटेज वायरल हुआ। दिल्ली के वेलकम इलाके की मजदूर कॉलोनी में घटी हत्या की इस घटना की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सीसीटीवी फुटेज में एक लड़का गली के अंदर से कुछ घसीटकर लाते हुए दिखाई देता है। पहले तो वह कोई भारी सामान जैसा दिखता है, लेकिन बाद में पता चलता है कि वह किसी व्यक्ति की लाश को घसीट कर ला रहा है। इसके बाद लड़का उस शख्स के ऊपर ताबड़तोड़ चाकुओं से हमला करता है। सीसीटीवी फुटेज में वह करीब 100 बार चाकुओं से हमला करता दिखाई देता है। जब शख्स के जिस्म में कोई हरकत नहीं होती है तो उसे मरा समझकर लड़का डांस करता है। दिल्ली में सरेराह इस तरह की हत्या ने लोगों को झकझोर के रख दिया।

रियल दुनिया के अपराध से पहले फिल्मों और बेव सीरीज में दिखाई जा रही हिंसा पर रोक लगाना बेहद जरूरी हो गया है। लेकिन सवाल खड़ा होता है कि सेंसर बोर्ड के होते हुए फिल्मों और वेब सीरीज में इतनी हिंसा कैसे दिखाई जा रही है। यहां सरकार की भूमिका पर भी सवालियां निशान लगता है। उधर समाजिक संगठन का भी इस दिशा में कोई प्रयास नहीं हैं। समाज और सरकार के सुस्त रवैये की वजह से फिल्मों में जघन्य अपराध के सीन खुलेआम परोसे जा रहे हैं। ताज्जुब की बात तो यह है कि लोग इन फिल्मों को खूब सराहा भी रहे हैं। ऐसी फिल्मों का कारोबार भी 500-600 करोड़ से ज्यादा का हैं। लेकिन हमें इस बात पर ध्यान देना होगा कि हम हिंसा को ग्लैमर की तरह परोसने वाली जिन फिल्मों का समर्थन कर रहे हैं, वहीं समाज में भयानक रूप धारण करके वापस आ रही हैं।

पीएम नरेंद्र मोदी के दौरे से पहले पाकिस्तान रेंजर्स ने जम्मू में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बीएसएफ पोस्ट पर गोलीबारी की.

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मोदी के दौरे से पहले पाक रेंजर्स ‘सक्रिय’, जम्मू में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बीएसएफ पोस्ट पर फायरिंग पाकिस्तान रेंजर्स बलों ने बुधवार शाम जम्मू में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर भारतीय सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की पोस्ट पर हमला कर दिया। पाकिस्तान में चुनाव का मोड़ आते ही सीमा पर अशांति रोकने की कोशिशें फिर शुरू हो गईं. लेकिन ‘सामान्य प्रवृत्ति’ के अनुसार, सीधा हमला जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर नहीं, बल्कि चिह्नित अंतरराष्ट्रीय सीमा पर होता है!

पाकिस्तान रेंजर्स ने बुधवार शाम जम्मू में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर भारतीय सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की चौकी पर हमला कर दिया. बीएसएफ के मुताबिक, शाम करीब साढ़े पांच बजे मकवाल चौकी को निशाना बनाकर मशीन गन और मोर्टार से हमला किया गया. बीएसएफ के जवानों ने भी पाक हमले का जवाब दिया. हालांकि गोलीबारी करीब 20 मिनट तक जारी रही, लेकिन बीएसएफ का कोई भी जवान घायल नहीं हुआ. संयोग से, पिछले नवंबर में, संघर्ष विराम समझौते को तोड़ते हुए, पाक बलों ने जम्मू के सांबा जिले के रामगढ़ सेक्टर में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर अकारण हमला किया। उस घटना में बीएसएफ का एक जवान शहीद हो गया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 20 फरवरी को जम्मू-कश्मीर का दौरा करेंगे. बीएसएफ का मानना ​​है कि यह हमला उससे पहले की योजना के मुताबिक किया गया है. उन्होंने बांग्लादेशी लड़की के लिए भारत में अपनी मृत मां का चेहरा देखने की पूरी व्यवस्था की। बांग्लादेश सेना ने बीजीबी से बात की और शवों को सीमा पर लाया गया. वहां बेटी जरीना मंडल ने नम आंखों से अपनी मां को अंतिम विदाई दी.

मार्टियारी भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित एक गांव है। उस गांव की एक लड़की जरीना मंडल की शादी बांग्लादेश के गोएशपुर गांव में हुई. तब सीमा पर कंटीले तार नहीं थे. बीएसएफ इतनी सख्त नहीं थी. फलस्वरूप उसका अपने पिता के घर आना-जाना सहज हो जाता था। कंटीले तारों की बाड़ लगने के बाद से वह रास्ता बंद है. जरीना की मां नूरजना मंडल (81) का रविवार को निधन हो गया। खबर बेटी जरीना को जाती है. वह आखिरी बार अपनी मां का चेहरा देखने के लिए तरस रहे थे. बहन की कहानी सुनने के बाद दादा ने बानपुर बीएसएफ कैंप के अधिकारियों से संपर्क किया। सारी बातें सुनने के बाद बीएसएफ ने बांग्लादेश के बीजीबी से संपर्क किया. दोनों सेनाओं के कमांडरों ने तय किया कि नूरजन मंडल के शव को सीमा की ‘जीरो’ लाइन पर ले जाया जाएगा. वहीं बेटी जरीना बांग्लादेश से आएंगी. अंत में शून्य रेखा पर माँ के अंतिम दर्शन करना
मत पीना. मृतक नूरजना मंडल के बड़े बेटे इस्लाम मंडल ने कहा, ”बहन को आखिरी बार अपनी मां का चेहरा देखने का मौका देने के लिए बीएसएफ और बीजीबी को बहुत-बहुत धन्यवाद. हम भी कितने दिन बाद जरीना
कुछ दिन पहले नादिया के कृष्णगंज में बांग्लादेश सीमा के पास एक गृहस्वामी के पिछवाड़े में लगभग 15 किलोग्राम अवैध सोना पाया गया था। ऐसी ही एक घटना हाल ही में मुर्शिदाबाद के जलांगी बॉर्डर पर भी हुई थी. कंटीले तारों की बाड़ से महज 500 मीटर की दूरी पर एक घर की खुदाई से भारी मात्रा में प्रतिबंधित कफ सिरप निकला। इन दो घटनाओं के आधार पर, सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के जांचकर्ताओं ने तस्करी की नई तकनीकों की खोज की। बीएसएफ सूत्रों के मुताबिक, जवानों को धूल चटाने के लिए तस्करी का सामान अब पिछवाड़े में दफनाया जा रहा है! बाद में मामला ठंडा होने पर सीमा पर निगरानी ढीली होने पर ही उसे गंतव्य तक पहुंचाया जाता है और गंतव्य तक पहुंचाया जाता है।

बीएसएफ सूत्रों के मुताबिक, गुप्त सूत्र से सूचना मिलने के बाद 32वीं बटालियन समेत कोलकाता के राजस्व खुफिया विभाग के अधिकारियों ने नदिया के कृष्णगंज थाने के विजयपुर गांव के एक घर में छापेमारी की. उन्होंने वहां तलाशी ली और 106 सोने के बिस्कुट बरामद किए। उस घटना में गिरफ्तार किए गए लोगों से पूछताछ के बाद पता चला कि उस घर में तस्करी के मकसद से बिस्किट छुपाए गए थे. बरामद सोने के बिस्कुट का वजन 14.296 किलोग्राम है। पूछताछ में पकड़े गए लोगों ने बताया कि उन्होंने सोने के बिस्कुट बांग्लादेश के नास्तिपुर गांव के रहने वाले मसूद और नासिर नाम के दो तस्करों से इकट्ठा किए थे. वे इन्हें विजयपुर क्षेत्र के पास गेडे गांव के निवासी संतोष हलदर को देने वाले थे। क्योंकि सीमा पर बीएसएफ बहुत सक्रिय थी इसलिए निगरानी से बचने के लिए सोने के बिस्कुट को कुछ दिनों के लिए तस्कर के घर में छिपा दिया गया था।

बीएसएफ सूत्रों के मुताबिक, एक अन्य घटना में मुर्शिदाबाद के जलांगी थाना क्षेत्र में परशपुर सीमा से महज कुछ सौ मीटर की दूरी पर एक गृहस्वामी के घर में प्रतिबंधित कफ सिरप का भंडार होने की सूचना मिली थी. पूरा घर छान मारा लेकिन कुछ नहीं मिला। लंबी तलाशी और पूछताछ के बाद पिछवाड़े से भारी मात्रा में प्रतिबंधित कफ सिरप बरामद किया गया. घर के मालिक और मुख्य आरोपी टाइटन मंडल की पत्नी को गिरफ्तार कर लिया गया. उससे पूछताछ के बाद पता चला कि वह तस्करों से फेंसिडिल की बोतलें खरीदकर रखता था। इसके बाद इस प्रतिबंधित कफ सिरप की बोतलों को बांग्लादेश में डिमांड पर सप्लाई किया जाता था. इस घटना में उसके खिलाफ मादक पदार्थ तस्करी निषेध के तहत मामला दर्ज किया गया है.

बीएसएफ सूत्रों के मुताबिक, दोनों घटनाओं में एक जैसी प्रवृत्ति देखी गई है, इसलिए सीमा पर नए ऑपरेशन शुरू किए गए हैं। सेना को भी उम्मीद है कि तस्करों की नई रणनीति को जल्द ही नाकाम कर दिया जाएगा. दक्षिण बंगाल फ्रंटियर के डीआइजी एके आर्य ने कहा, ‘कई मामलों में, रणनीति में बदलाव के कारण सीमा के पास के गांवों के यार्डों से तस्करी का सामान खोदा गया है। पहले तो गति पकड़ना कठिन था, लेकिन कई बंदियों से पूछताछ से नई जानकारी प्राप्त हुई। हमें उम्मीद है कि तस्कर नई तरकीबें खोज लेंगे.

दीपिका पादुकोण को बाफ्टा 2024 में प्रस्तुतकर्ता के रूप में चुना गया.

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इस बार ऑस्कर के बाद स्टेज पर दीपिका! अभिनेत्री दीपिका पादुकोण ने डेविड बेकहम, दुआ लीपा और अतिथि सितारों के साथ प्रस्तुतकर्ता के रूप में 2023 में ऑस्कर में भाग लिया। इस बार बाफ्टर मंच पर नजर आएंगी बॉलीवुड की ‘मस्तानी’. अभिनेत्री ने मंगलवार को सोशल मीडिया पर खुशखबरी साझा की। दीपिका पादुकोण पहले ही हॉलीवुड में डेब्यू कर चुकी हैं। पिछले साल दीपिका ने ऑस्कर के मंच पर भी कदम रखा था. इस बार दीपिका बाफ्टा स्टेज पर नजर आएंगी. दीपिका ब्रिटिश एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन आर्ट्स के पुरस्कार समारोह में शामिल होंगी। एक्ट्रेस ने मंगलवार को इंस्टाग्राम स्टोरी पर यह खबर दी. ‘बाफ्टा’ समारोह लंदन के रॉयल फेस्टिव ऑडिटोरियम में आयोजित होने जा रहा है।

स्टोरी में दीपिका ने ‘बफ्तार’ का इनविटेशन लेटर भी दिया। 19 फरवरी को दीपिका सिनेमा जगत की उत्कृष्टता का सम्मान करने के लिए इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलख जगाएंगी. इस मंच पर दीपिका डेविड बेकहम, केट ब्लैंचेट, दुआ लीपा जैसे सितारों के साथ एक ही कतार में नजर आएंगी. दीपिका के एक बार फिर इंटरनेशनल मंच पर आने की खबर से एक्ट्रेस के फैंस खुश हैं. उस दिन के इवेंट में दीपिका क्या पहनेंगी इसे लेकर भी अटकलें चल रही हैं. हालांकि, दीपिका ने अभी तक इस संबंध में कोई अन्य जानकारी नहीं दी है। पूरे देश की नजर इस पर है कि बॉलीवुड की ‘मस्तानी’ 19 तारीख को क्या करेंगी. अभिनेत्री ने 2023 में ऑस्कर मंच पर एक प्रस्तुतकर्ता के रूप में भाग लिया था। दीपिका ने भारतीय फिल्म ‘आरआरआर’ के गाने ‘नाटू नाटू’ के साथ ऑस्कर मंच पर अपने ब्रॉडवे-शैली प्रदर्शन की घोषणा की। उन्होंने पूरे देश को गौरवान्वित किया. इस बार दीपिका की सफलता के ताज में एक नया पंख जुड़ने जा रहा है। वैलेंटाइन डे पर लाल रंग पहनने की योजना बना रहे हैं? उन लोगों के लिए जिन्होंने अभी तक यह तय नहीं किया है कि विशेष दिन पर कैसे कपड़े पहने जाएं, अभिनेत्री दीपिका पादुकोण के पहनावे से प्रेरणा लें। रेड ड्रेस में अनन्या दीपिका की तरह दिख सकती हैं. लेकिन यह सिर्फ अच्छे कपड़े पहनने के बारे में नहीं है। ड्रेस के साथ-साथ आपका मेकअप और हेयर टाई भी आकर्षक होनी चाहिए आप भी दीपिका के बोल्ड लुक में सज सकती हैं। आप बिना ज्यादा मेकअप किए भी बोल्ड लुक ला सकती हैं। पश्चिम एशियाई देशों में पहले ही फिल्म की रिलीज पर रोक लगा दी गई थी. फिल्म की रिलीज के बाद बॉक्स ऑफिस पर नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे. इस बार ऋतिक रोशन और दीपिका पादुकोण स्टारर ‘फाइटर’ के लिए एक नई मुसीबत आ गई है। वायुसेना के एक अधिकारी ने फिल्म के एक खास सीन के खिलाफ शिकायत दर्ज कराते हुए निर्माताओं को नोटिस भेजा है।

इंडियन एयरफोर्स फिल्म में रितिक और दीपिका का एक किस सीन है। आगंतुकों को कोई दिक्कत नहीं है. लेकिन शिकायतकर्ता के मुताबिक, किस के दौरान दोनों कलाकार एयरफोर्स की वर्दी में नजर आए। परिणामस्वरूप यह स्थिति देश की जनता में वायुसेना के प्रति गलत संदेश भेज सकती है। मालूम हो कि फिल्म के इस सीन पर असम के एक एयरफोर्स अधिकारी ने आपत्ति जताई थी और शिकायत की थी. फिल्म में ऋतिक और दीपिका जम्मू-कश्मीर में ड्यूटी पर तैनात दो वायु सेना अधिकारियों की भूमिका में हैं। फिल्म में 2019 पुलवामा आतंकी हमले और पाकिस्तान के बालाकोट में भारतीय सेना के ऑपरेशन को भी शामिल किया गया है। इसके अलावा फिल्म पिछले कुछ सालों में भारत-पाकिस्तान सीमा पर दोनों देशों के बीच हुए संघर्ष के बारे में भी बात करती है।

‘फाइटर’ पिछले महीने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर रिलीज हुई थी। लेकिन फिल्म ने अब तक वर्ल्डवाइड बॉक्स ऑफिस पर 350 करोड़ रुपये की कमाई कर ली है, जो उम्मीद से काफी कम है. इसी सिलसिले में हाल ही में डायरेक्टर सिद्धार्थ आनंद के कमेंट पर हंसी का दौर शुरू हो गया है. सिद्धार्थ के मुताबिक देश में आने वाले पर्यटकों का एक बड़ा हिस्सा हवाई यात्रा नहीं करता है. इसलिए आम दर्शक फिल्म के कंटेंट से जुड़ नहीं पाते. नवंबर 2007. फरहा खान द्वारा निर्देशित यह फिल्म दिवाली सीजन के दौरान रिलीज हुई थी। उस फिल्म में बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान ने हीरो का किरदार निभाया था. उनके सामने एक नवोदित अभिनेत्री थीं। इनका नाम है दीपिका पादुकोण. दीपिका ने बॉलीवुड में फिल्म ‘ओम शांति ओम’ से डेब्यू किया था। पहली ही फिल्म में एक्ट्रेस को शाहरुख के साथ काम करने का मौका मिला। इसके बाद दीपिका को पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा। दीपिका ने ‘लव आज कल’, ‘कॉकटेल’, ‘ये जवानी है दीवानी’, ‘तमाशा’ जैसी फिल्मों में काम करके बॉलीवुड में अपनी जगह पक्की कर ली है। डायरेक्टर संजय लीला भंसाली की ‘गोलियों की रासलीला राम-लीला’, ‘बाजीराव मस्तानी’, ‘पद्मावत’ में भी उनके काम को सराहा गया है। इसके अलावा शाहरुख के साथ ‘चेन्नई एक्सप्रेस’, ‘हैप्पी न्यू ईयर’, ‘पठान’ जैसी फिल्मों में काम किया। हाल ही में आई फिल्म ‘जवां’ में भी वह शाहरुख के साथ एक खास रोल में नजर आए थे। शाहरुख उन्हें अपनी फिल्म के लिए ‘लकी चार्म’ मानते हैं। फिल्म में दीपिका हो तो फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट होती है बिस्वास बदशार! लेकिन शाहरुख नहीं, दीपिका के सपनों का हीरो कोई और है। एक्ट्रेस उस ‘स्टार’ के साथ हिंदी फिल्म में काम करना चाहती थीं। क्या आप जानते हैं कि वह कौन है?